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कन्‍हैया लाल ‘मत्‍त’ की जन्‍मशताब्‍दी पर कार्यक्रम 14 को

गाजियाबाद : प्रसिद्ध कवि कन्‍हैया लाल ‘मत्त’ के जन्‍मशताब्‍दी वर्ष के अवसर पर गंधर्व संगीत महाविद्यालय, नेहरू नगर-द्वितीय, गाजियाबाद में उनके कृतित्‍व और व्‍यक्तित्‍व पर केंद्रित कार्यक्रम का आयोजन 14 अगस्‍त, 2011 को दोपहर 3 बजे से किया जा रहा है। इस मौके पर स्‍मारिका ‘गुंज अनबूझे सफर की’ और उनकी किताब ‘ये जिन्‍दगी के लटके’ का विमोचन किया जाएगा।

चर्चित कथाकार और मत्त जी के पुत्र योगेन्‍द्र दत्‍त शर्मा द्वारा उनके जीवन पर आधारित उपन्‍यास ‘कालिंदी से हरनंदी तक एक अनबुझा सफर’ का भी विमोचन किया जाएगा। उपन्‍यास पर विश्‍वनाथ त्रिपाठी, पंकज बिष्‍ट, महेश दर्पण, प्रकाश मनु, भारतेन्‍दु मिश्र विचार रखेंगे।

मत्त जी का संक्षिप्‍त परिचय-

मत्त जी का जन्‍म 18 अगस्‍त, 1911 को टूंडला से चार किलोमीटर दूर ग्राम जारखी में हुआ। जारखी उनका ननिहाल था। पिता पंडित घासीराम शर्मा हाथरस में थे। बचपन हाथरस में बिता और यहीं प्रारम्भिक शिक्षा हुई। इसके बाद पढ़ने के लिए आगरा आ गए। यहाँ रहकर शिक्षा पूरी की। विवाह के बाद बुलंदशहर आ गए। करीब सात-आठ महीने यहां रहे। दिल्‍ली में रक्षा मंत्रालय में लिपिक की नौकरी लग जाने के बाद गाजियाबाद आ गए और आजीवन रहीं रहे। हालांकि उनकी ख्‍याति बाल कवि के रूप में अधिक है, लेकिन उन्‍होंने प्रौढ़ साहित्‍य भी काफी मात्रा में लिखा। उनका देहांत 2 दिसम्‍बर, 2003 को हुआ।

प्रमुख कृतियां-

प्रौढ़ साहित्‍य– अर्घ्‍यपाद्य, श्रद्धा के फूल, आगे बढ़ो, जवान, अपनी वाणी : अपने गीत, गंध कहीं खो गई आदि।

बाल साहित्‍य- बोल रही मछली कित्‍ता पानी, आटे बोटे सैर सपाटे, जम रंग का मेला, सैर करें बाजार की, जंगल में मंगल, खेल तमाशे आदि।

मत्त जी हिंदी में लोरियां लिखने वाले पहले कवि हैं। लोरियों की पहली किताब ‘लोरियाँ और बालगीत’ 1941 में प्रकाशित हुई। इसके अलावा ‘रजत-पालना’ और ‘स्‍वर्ग-हिंडोला’ उनकी लोरियों की पुस्‍तकें हैं।

 

 

 

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।