
लक्ष्मण राव- लगन और श्रम की गरिमा का साकार रूप हैं, जिसने विषमताओं से कभी हार नहीं मानी और सफलता जिसकी मुट्ठी में है। उनके बारे में आलेख-
नई दिल्ली के हिंदी भवन में, जहां साहित्य के दिग्गज कभी खत्म न होने वाली साहित्यिक सभाओं और गोष्ठियों में उलझे रहते हैं, वहीं भवन के ठीक सामने पटरी पर एक चायवाला चुपचाप चाय बनाता रहता है। ग्राहक के लिए चाय बनाने के बाद अगर तुरंत कोई ग्राहक उसके सामने नहीं होता, तो उस अतंराल में वह पढऩे या लिखने लगता है। पढऩे और लिखने में अजीब-सी लगने वाली यह बात उस समय अविश्वसनीय हो उठती है, जब हमें यह बताया जाता है कि वह शख्स साहित्यकार है। यह है- चायवाला साहित्यकार यानी लक्ष्मण राव, जो दो ग्राहकों के बीच मिले समय का सदुपयोग अपने सृजन में करता है।
लक्ष्मण राव का जन्म 22 जुलाई, 1954 को महाराष्ट्र में, अमरावती जिले की धामणगांव तहसील के छोटे से गांव तड़ेगांव-दशासर में हुआ। गांव की याद आते ही वह अपने अतीत में खो जाते हैं। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। उनके पिता की दो शादी हुई। पहली पत्नी से दो बेटी हुईं। पत्नी की मृत्यु होने पर उन्होंने दूसरी शादी पत्नी की बहन से कर ली। उनसे चार बेटे और एक बेटी हुई। इस तरह परिवार में तीन बहनें, चार भाई, माता-पिता और दादी थीं। कुल छह एकड़ जमीन थी। उससे गुजारा नहीं हो पाता था। पूरा परिवार खेतों में मजदूरी करता था।
आसपास दो-चार संपन्न परिवार भी थे। वे सभ्य दिखाई देते थे। उनका बड़ा सम्मान होता था। लक्ष्मण राव सोचता कि हम ऐसे क्यों नहीं हैं? हमारी आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण हमें कोई पूछता नहीं है। हमें भी इनके जैसा बनना है।
लक्ष्मण की आठवीं तक की शिक्षा गांव में स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हुई। उसके स्कूल में रामदास पढ़ता था। सीनियर था। आवारा था। वह अमीर घर से था। उसका बाप मर चुका था। उसने प्रिंसिपल पर डस्टर फेंका था। अगर फल नहीं तोडऩे दिए जाते तो टहनियां तोड़ देता। वह बोर्ड की परीक्षा में दूसरी बार भी फेल हो गया। उसकी मां एडमिशन दिलाने आई। प्रिंसिपल ने पूछा कि क्यों लाई हो इस लड़के को? मां ने कहा कि हमारा एक ही बच्चा है। हम इसे पढ़ाना चाहते हैं। पढ़ाना आपका काम है। हमारा काम है स्कूल में लाना। प्रिंसिपल ने उसका एडमीशन कर लिया।
कुछ दिन पहले स्कूल में अंग्रेजी के टीचर आए थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा भव्य था। अपटूडेट रहते थे। हैंड राइटिंग सुधारने पर जोर देते। विद्यार्थियों से कहते कि जब तक हैंड राइटिंग नहीं सुधारोगे, मैं नहीं पढ़ाऊंगा। उच्चारण सुधारने को कहते। जब कोई बच्चा फिलिम कहता तो वह टोक देते, ”फिलिम क्या होता है, फिल्म बोलो।” ऐसे बहुत से शब्द उन्होंने सुधरवाए। उनका बहुत सम्मान था। जब वह सड़क से गुजरते थे तो ग्रामीण सम्मान में खड़े हो जाते थे।
एक दिन उन्होंने प्रिंसिपल से पूछा, ”यह रामदास कौन है? पंद्रह दिन से एबसेंट है।”
प्रिंसिपल ने कहा, ”यह लड़का ऐसा ही है। यह तुम्हारे ऊपर भी डस्टर फेंकेगा या थप्पड़ मार देगा।”
टीचर ने कहा, ”इससे मैं मिलना चाहता हूं।”
वह उसी दिन रामदास के घर गए। उससे बात की। उन्होंने सोचा कि इतने इंटेलीजैंट लड़के को खराब बता रहे हैं। उससे कहा, ”तुम्हें कल से स्कूल आना है। आओगे तो हां बोलो और यदि नहीं आना है तो अभी मना कर दो।”
रामदास ने कहा, ”सर, मैं जरूर आऊंगा।”
टीचर ने उसे ऐसा माहौल दिया कि वह पूरी तरह बदल गया। उसने सभी शरारतें छोड दीं। पढाई-लिखाई में ध्यान देने लगा। सभी टीचर उसे पसंद करने लगे। एक दिन रामदास अपने मामा के घर जा रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। रामदास की नहाने की इच्छा हुई। वह नदी में कूद गया। लेकिन वह लौटकर नहीं आया। बाद में गांव वालों ने उसके शव को बाहर निकाला।
इस घटना ने बालक लक्ष्मण राव को अंदर तक झकझोर दिया। वह दिन-रात रामदास के बारे में सोचता रहता। यह घटना उसके लेखक बनने में प्रेरणा बनी। उसने सोचा कि इस पर कोई कहानी लिखी जाए। उसने तय कर लिया कि उसे लेखक बनना है। तय तो कर लिया, लेकिन इससे लेखक तो नहीं बना जा सकता था। लेखक बनने के लिए गहरे अध्ययन की जरूरत थी। इसके लिए वह पाठ्यक्रम की पुस्तकों के साथ-साथ विद्यालय के पुस्तकालय में साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन भी करने लगा। इस दौरान उसने कई लेखकों की रचनाएं पढ़ीं।
लक्ष्मण सातवीं-आठवीं में पढ़ता था। स्कूल में कोई कार्यक्रम होता तो टीचर कहते कि कुछ नाटक-वाटक कर। वह कहता कि नाटक तो मैं कर नहीं पाऊंगा क्योंकि मुझे आता नहीं। कोई कविता या लेख पढ़कर सुनाऊंगा। वह किसी का लेख या निबंध याद कर सुना देता। टीचर पूछते कि तेरा लिखा हुआ है। वह मना कर देता। टीचर कहते कि तू लिख। उसे सुना। लक्ष्मण ने गांधीजी, विवेकानंदजी आदि महापुरुषों के बारे में निबंध लिखे। अपने स्कूल के बारे में भी लिखा। लोगों को बहुत पसंद आया। लोगों ने कहा कि हम भी स्कूल देखते हैं, लेकिन हमारे दिमाग में ये बाते नहीं आईं। इससे लक्ष्मण को लेखन के लिए प्रोत्साहन मिला। उसने उपन्यास लिखा- ‘रामदास’।
गांव के संपन्न लोगों के बच्चे उच्च शिक्षा के लिए गांव से बाहर जाते थे। लक्ष्मण ने सोचा कि मैं भी उच्च शिक्षा के लिए अमरावती जाऊंगा। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। पैसे थे नहीं। गंभीर समस्या खड़ी हो गई कि कैसे जाया जाए?
अमरावती के एक डॉक्टर लक्ष्मण के पिताजी के परिचित थे। उन्होंने कहा कि इसे हमारे यहां भेज दो। यह क्लीनिक का काम कर लेगा। इसके साथ पढ़ भी लेगा। यह थोड़ा-सा आधार उसे मिला और वह अमरावती चला गया।
डॉक्टर के यहां आने के बाद उसे लगा कि वह पढऩे के लिए नहीं आया है, एक नौकर बनकर आया है। वह यहां नौकर की तरह काम कर रहा है। सुबह सात बजे उठने के बाद झाडू-पोंछे से लेकर दूसरे कई काम थे- शाम का सामान खरीदना, बच्चों की देखभाल करना और फिर चौकीदारी करना। वह सोचता कि यदि वापस जाऊंगा तो लोग पूछेंगे कि तू वापस क्यों आया? पिताजी बार-बार कहते कि मुझे अपनी समस्या बता। वह कहता कि उसे कोई परेशानी नहीं है। समस्या थी तो लेकिन बताने की इच्छा नहीं होती। वह सोचता कि पिताजी को बताऊंगा तो वह गांव वापस ले जाएंगे और फिर पढ़ाई छूट जाएगी। इसलिए वह चुपचाप सब सहता रहा। वहां वह तीन साल रहा। नौवीं और दसवीं पास की।
हिंदी पर अधिकार जमाने के लिए वह ‘धर्मयुग’, ‘सप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी हिंदी पत्रिकाएं, हिंदी उपन्यास व निबंध पढऩे लगा। इससे भाषा में सुधार हुआ। भाषा में तराश लाने के लिए वह इलाहाबाद से प्रकाशित ‘संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ’ नामक हिंदी संस्कृत शब्दकोश खरीदकर उसकी सहायता से अध्ययन करने लगा। उसे लगने लगा कि हिंदी पर उसका अच्छा अधिकार हो गया है, तो उसने 1973 में मुंबई हिंदी विद्यापीठ की हिंदी की परीक्षा दी। किसी ने सलाह दी की हिंदी का लेखक बनना है तो हिंदी की रचनाएं पढ़ो। वह पढ़ता गया।
अमरावती में एक सोसायटी लोन देती थी। उससे लोन लेकर लक्ष्मण मुबई चला गया। यह 1973 की बात है। अपने जीवन के अनुभवों का आधार बनाकर उपन्यास लिखा था- ‘नई दुनिया की नई कहानी’। ‘रामदास’ था ही। मुंबई जाने का मकसद था उपन्यासों पर फिल्मों का निर्माण हो। कई डायरेक्टरों, अभिनेता व अभिनेत्रियों से बात हुई। कोई बहाना बना देता तो कोई कहता कि आठ दिन बाद आना। आठ दिन बाद आने के लिए कहने का मकसद यह था कि आठ दिन तक कोई यहां रह नहीं पाएगा। तब तक वापस चला जाएगा। लेकिन लक्ष्मण की समझ में यह बात नहीं आई। वह उनकी बात सच समझता। इस तरह धक्के खाते चार दिन बीत गए।
वह डायरेक्टर के दफ्तर में गया। वहां का चपरासी अमरावती का रहने वाला था। उसने पूछा कि तुम यहां क्यों घूम रहे हो? लक्ष्मण ने कारण बता दिया। उसने सलाह दी कि फटाफट अपना टिकट कटाओ और वापस चले जाओ। ये सब तुमसे झूठ बोल रहे हैं। यहां कुछ नहीं होगा। बड़े-बड़े धक्के खा रहे हैं। तुम कहां हो? तुम्हें हिंदी भी ढंग से नहीं आती। लक्ष्मण वहां से वापस आ गया।
डॉक्टर साहब अमरावती स्पिनिंग मिल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में थे। उन्होंने चिट्ठी लिखी और अगले दिन ही लक्ष्मण को वहां नौकरी मिल गई। वह मजदूरी करने लगा। नेकर-बनियान पहनकर धागे के बंडल उठाना, दूसरी जगह ले जाना, इस तरह के काम करता।
1975 में बिजली कटौती के कारण मिल बंद हो गई। लक्ष्मण गांव चला गया और खेती करने लगा। लेकिन गांव में उसका मन नहीं लगा। कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उसे लगता कि यहां उसकी जिंदगी बरबाद हो रही है। गांव वाले कहते कि तूने पांच-दस साल खराब कर दिए। अब फिर गांव में आया है। गांव में रहता तो और कुछ कर लेता। गांव के तेरे साथ के लड़के मैट्रिक पास कर आगे निकल गए। कोई बी.ए. कर रहा है, कोई एम.ए., एम.कॉम. कर रहा है। तू बेकार की कहानियां बनाता है कि यह हो गया, वो हो गया। इन बातों से उसका मन खिन्न हो जाता।
लक्ष्मण ने पिताजी से कहा, ”आप मुझे कुछ पैसे दे दो। मैं नौकरी के लिए अमरावती जाना चाहता हूं।” यह उसने झूठ बोला था। उसका विचार भोपाल जाने का था। भोपाल जाने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि जब वह मुंबई गया था तो वह दिल्ली और भोपाल भी गया था। भोपाल दिल्ली के रास्ते में था। लक्ष्मण का मकसद लेखक बनना था। उसने सोचा कि भोपाल ही काम बन जाएगा तो दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा।
पिताजी ने कहा, ”नौकरी नहीं लगी तो वापस आ जाना। परेशान मत होना।” उन्होंने चालीस रुपये दे दिए।
गांव का एक लड़का अमरावती में इंजीनियरिंग कर रहा था। लक्ष्मण उसके साथ अमरावती आ गया।
वह लड़का बोला, ”तू चल, मेरे साथ हॉस्टल में ठहर जा।”
लक्ष्मण ने कहा, ”नहीं, तुम्हारे साथ हॉस्टल में नहीं ठहरना।”
वह बोला, ”एक दिन क्यों नहीं रह पाएगा। मैं हॉस्टल में रख लूंगा।”
लक्ष्मण लड़के के साथ हॉस्टल चला गया।
लक्ष्मण ने कहा, ”मैं तुझे काम की बात बताता हूं। मैं भोपाल जा रहा हूं। घर जाकर बता देना कि मैं भोपाल चला गया।”
वह बोला, ”यार, यह तू बड़ा गलत काम कर रहा है।” वह पढ़ रहा था। उसने किताब बंद कर दी। आगे बोला, ”तू पहले बता देता तो मैं साथ नहीं लाता। घर वाले कहेंगे कि तू साथ में ले गया था और पता नहीं कहां भगा दिया? ”
लक्ष्मण ने कहा, ”डरने वाली कोई बात नहीं है। मैं बच्चा नहीं हूं। 19-20 साल का हूं। तू चिंता मत कर। कह देना भोपाल चला गया।”
वह बोला, ”देख भई, यह बड़ी बुरी बात है। अगर तेरे पास पैसे नहीं हैं तो कोई बात नहीं। मैं तुझे देता हूं। तू वापस चला जा।”
लक्ष्मण ने कहा, ”पैसे मेरे पास हैं। लेकिन मैं वापस नहीं जाऊंगा। मैं भोपाल ही जाऊंगा। मैं तेरे से झूठ नहीं बोलूंगा।”
लक्ष्मण भोपाल की गाड़ी में बैठ गया।
चालीस रुपये दो दिन में खत्म हो गए। उसने सोचा कि ऐसा काम मिलना चाहिए कि रहने की भी जगह हो और खान-पान भी होता रहे। ऐसा काम या तो मजदूरी होता है या ढाबे में बरतन मांजना। वह प्लेटफार्म पर सोता था। आखिर के तीन रुपये रह गए थे। वह दिन में काम ढूंढता। भोपाल में कालोनियां बन रही थीं। वह वहां गया। उसे ईंटें ढोने का काम मिल गया। पांच रुपये रोज मिलते। वहां उसने नब्बे दिन काम किया। उसके पास 110 रुपये हो गए।
30 जुलाई, 1975 को जीटी एक्सपे्रस से दिल्ली आ गया। जो समस्या भोपाल की थी, वो दिल्ली की भी थी। सबसे पहले यहां जमना था। वह काम ढूंढने लगा। दो दिन बिरला मंदिर की धर्मशाला में रहा। उन दिनों दिल्ली में खूब बारिश हो रही थी। करीब रोज ही सुबह से शाम तक वर्षा होती रहती। इसलिए इमारत का काम नहीं मिला। विष्णु दिगंबर मार्ग पर पांच-छह ढाबे थे। एक में वह काम करने लगा। वहां उसने छह महीने खाने-पीने और 35 रुपये महीने पर काम किया। यहां काम करते हुए लिखने-पढऩे के लिए समय नहीं मिल रहा था। उसका मन उचटने लगा। मालिक उसकी ईमानदारी को देखते हुए छोडऩा नहीं चाहता था। उसने वेतन बढ़ाकर 60 रुपये महीने कर दिया। लेकिन लक्ष्मण ने कहा कि मेरा मन इस काम में नहीं लग रहा है। उसने काम छोड़ दिया। वह मजदूरी का काम ढूढऩे लगा।
राउ तुला मार्ग पर भवन बन रहे थे। लक्ष्मण वहां मजदूरी करने लगा। वहां उसने करीब एक साल काम किया। इस दौरान कुछ पैसे भी इकट्ठा कर लिए। चिट्ठी के लिए पता ढाबे का दिया हुआ था, वह वहां बीच-बीच में आता रहता। उसने सोचा कि क्यों न वहां दुकान जमा ले। ढाबे वाला मालिक उसे बहुत चाहता था। वह भी कहने लगा कि दुकान लगा ले। मैं पैसे दे दूंगा। मेरी दुकान की देखभाल भी हो जाएगी। तू ईमानदार आदमी है। मेरी मदद भी हो जाएगी।
20 जून, 1977 को लक्ष्मण राव ने दिगंबर मार्ग पर स्थित सुचेता भवन के सामने चबूतरा बनाकर पान, बीड़ी-सिगरेट बेचना शुरू कर दिया। यहां भी चैन नहीं मिला। समय-समय पर उसके चबूतरे को दिल्ली पुलिस व दिल्ली नगर निगम ने उजाड़ा। लक्ष्मण राव का मकसद दुकानदार बनना नहीं, साहित्यकार बनना था।
लक्ष्मण राव साहित्यकार बनने की धुन में दिन में मेहनत करता और रात को पढ़ता-लिखता। उसे पता चला कि दरियागंज में संडे को किताबों का मार्केट लगता है। वह दरियागंज की पटरी पर लगने वाले पुस्तक बाजार में संडे को किताबें ढूंढ़ता और सप्ताह भर पढऩे के लिए खरीद लेता। यहां से उसने शेक्सपीयर, पे्रमचंद, शरत आदि का साहित्य पढ़ा। इन्हें पढ़कर उसे लगा कि उसने जो कुछ लिखा है, वह कुछ भी नहीं है। इसमें भाषा बिल्कुल ठीक नहीं है। ये जो पढ़ा वह कहां और जो मैंने लिखा वो कहां? इस कमी को दूर करने के लिए वह दिन-रात पढ़ता रहता। उसने धीरे-धीरे ‘रामदास’ को इम्प्रूव किया।
उन्होंने सोचा कि अब इनका प्रकाशन कराना चाहिए। वे अपनी पांडुलिपि लेकर दरियागंज में प्रकाशकों के पास गए। यह 1978 के मध्य की बात है। उन्हें बेहद कड़ुवे अनुभव हुए।
प्रकाशकों से कहा कि यह मेरी लिखी हुई पुस्तकें हैं। इन्हें प्रकाशित कराना चाहता हूं। किसी प्रकाशक ने कहा कि पेपर नहीं है। किसी ने कोई और बहाना बनाया। एक प्रकाशक ने तो यहां तक कहा, ”गेट आउट फ्राम हियर। तुम्हें पता नहीं किताबें कैसे छपती हैं।”
प्रकाशकों के इस अपमानपूर्ण व्यवहार को उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने तय किया कि किताबें खुद ही छापनी पड़ेंगी। अगर खुद छापते हैं तो छपेंगी, नहीं तो नहीं छप पाएंगी। उन्होंने सात हजार रुपये इकट्ठा किए। जीवन की घटनाओं पर आधारित उपन्यास ‘नई दुनिया की नई कहानी’ 1979 में स्वयं खर्च कर प्रकाशित किया। उस समय दिल्ली में जमीन पचास रुपये गज मिल जाती थी। यदि वह चाहते तो इतने पैसों में मकान बना सकते थे। लेकिन उन्होंने मकान बनाने की बजाए, किताब प्रकाशित करना बेहतर समझा। लोग आश्चर्य से कहते, ”देखो, पान बेचने वाले ने किताब लिखी है।” तरह-तरह की बातें होतीं। बहुत से लोग उत्साहित होकर कहते कि देखो, पान बेच रहा है और किताब लिख रहा है। कुछ कहते कि यह सीआईडी का आदमी है, क्योंकि यह ढंग से रहता है। अच्छा बोलता है। यह पान बेच रहा है, लेकिन पान वाला लगता नहीं है। किताब भी छप रही है इसकी।
लक्ष्मण राव के पास टाइम्स ऑफ इंडिया की सीनियर रिपोर्टर उषा राय आईं। उन्होंने इंटरव्यू लिया। एक फरवरी, 1981 को टाइम्स ऑफ इंडिया की संडे मैगजीन में आलेख छपा। इसके छपते ही लक्ष्मण राव के पास जगह-जगह से पत्र आने लगे। लोग मिलने आने लगे। रेडियो-टेलीविजन वाले आए। कई लोग अंग्रेजी में बात करते। उन्हें लगता कि और अध्ययन करना पड़ेगा। पढऩा पड़ेगा। तिमारपुर पत्राचार विद्यालय में ग्यारहवीं में एडमीशन ले लिया। वहां से बारहवीं की। दिल्ली विश्वविद्यालय से एक्सटर्नल केनडीडेट के रूप में बी.ए. किया। इस समय उनकी आयु थी चालीस वर्ष।
13 जून, 1986 में उनकी शादी हुई। हर आदमी की तरह शादी के बाद लेखन में थोड़ा-बहुत व्यवधान आया। लेकिन उन्होंने लिखना-पढऩा जारी रखा। 2000 में ‘नर्मदा’ छपा।
1992 में उनका महत्वाकांक्षी उपन्यास ‘रामदास’ प्रकाशित हुआ। इसे लोगों ने बहुत पसंद किया। इसकी 2200 प्रतियां प्रकाशित कराई गई थीं।
उन्होंने ‘रामदास’ कई दुकानों और वितरकों के पास बेचने के लिए रखा। उनकी चाय की दुकान से कुछ लोग किताब ले जाते। जब वे पढ़कर आते तो गले मिलते। बहुत से पैसे भी दे जाते। इससे प्रमाणित था कि ‘रामदास’ अच्छा उपन्यास है। उन्हें लगा कि जहां-जहां ‘रामदास’ रखा, बिक गया होगा। वह दुकानदारों और वितरकों के पास गए। सबके पास ‘रामदास’ वैसे ही पड़ा था। एक-दो ने तो उपन्यास उठाकर भी नहीं देखा था। कारण पूछने पर वे बहाने बनाने लगे। उन्होंने सभी प्रतियां वापस ले लीं। वह किताबों को थैले में रखकर स्कूल-कॉलेजों के पुस्तकालय में बेचने के लिए जाने लगे। अधिकतर अध्यापक-अध्यापिकाओं ने ‘रामदास’ पसंद किया और खरीदने की इच्छा जाहिर की। इस तरह उन्होंने पांच-छह साल में ‘रामदास’ की सभी प्रतियां बेच दीं।
भारतीय अनुवाद परिषद की प्रोपराइटर नीता गुप्ता ने 15000 रुपये दिए और अगले उपन्यास को प्रकाशित करने की योजना बनाने को कहा। सन् 2000 में उपन्यास ‘नर्मदा’ छपा। इसका विमोचन परिषद के मंच पर हुआ। कार्यक्रम में कमलेश्वर, मृणाल पांडे, टी.एन. चतुर्वेदी उपस्थित थे।
एक दिन पूर्व सांसद शशिभूषण आए। उन्होंने पूछा, ”भाई, क्या तुम्हारा नाम लक्ष्मण राव है? ”
लक्ष्मण राव ने कहा, ”हां, जी।”
शशिभूषण बोले, ”तुम इंदिराजी से मिल लो। वह बार-बार कहती हैं कि ‘महाराष्ट्र से एक लड़का आया हुआ है। पेड़ के नीचे बैठकर किताबें लिखता है। तुम लोग कुछ काम नहीं करते हो।’ तुम इंदिराजी से जरूर मिल लो।”
लक्ष्मण राव ने कहा, ”मुझे वहां कौन मिलने देगा? आप अपने साथ ले चलो।”
शशिभूषण ने कहा, ”नहीं…नहीं। तुम्हें वहां सिफारिश की जरूरत नहीं है। तुम चले जाओ। तुम्हारे बारे में अखबारों में बहुत छपा है। उसकी कटिंग और अपनी कुछ किताबें ले जाना।”
लक्ष्मण राव ने जवाब दिया, ”ठीक है। मैं मिल लूंगा।”
27 मई, 1984 को त्रिमूर्ति भवन में लक्ष्मण राव को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौका मिला। इंदिरा गांधी उनसे बहुत प्रभावित हुईं। लक्ष्मण राव ने कहा कि मैं आपके बारे में लिखना चाहता हूं। इंदिरा गांधी ने कहा कि मेरे बारे में लोगों ने बहुत लिखा है। आप लिखना चाहते हैं तो हमारे कार्यकाल के बारे में लिखिए। हमारे प्रशासनकाल में क्या होता है, वो सब लिखिए। लक्ष्मण राव ने एक आउट लाइन तैयार की और दिन-रात जुटकर तीन महीने में नाटक लिखा- ‘प्रधानमंत्री’ और छाप भी दिया। 31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की हत्या कर दी गई। लक्ष्मण राव अपना नाटक उन्हें भेंट न कर सके। इसका उन्हें आज भी मलाल है।
इस नाटक के छपने के बाद लेखन के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया। अहिंदी भाषी होने के कारण उनकी भाषा अटपटी थी। आलोचकों ने भाषा में सुधार लाने पर जोर दिया। उन्होंने दिन-रात मेहनत कर भाषा को सुधार लिया।
1995 में लक्ष्मण राव का स्टाल तोड़ दिया गया। जहां उनका स्टाल था, वह जगह किसी ओर को दे दी। लक्ष्मण राव को उसी जगह जमना था। आसपास भवन बन रहे थे। हिंदी भवन, पंजाबी भवन की लेबर उनके पास चाय पीने आती थी। उन्होंने सोचा कि क्यों ने मैं हिंदी और पंजाबी भवन के सामने बैठकर चाय बेचूं। उसके बाद से वह वहां चाय बेचते हैं।
प्रकाशक अकसर शिकायत करते हैं कि हिंदी की पुस्तकें बिकती नहीं। लोगों की दिलचस्पी पढऩे में नहीं है। हिंदी का भविष्य अंधकारमय है। लेकिन अकेले लक्ष्मण राव इस अंधकार को चीरने वाली मशाल की तरह दिपदिपा रहे हैं।
यह सफेद झूठ है कि हिंदी में पाठकों की कमी है। जो समाचारपत्र कुछ बरस पहले हजारों में बिकते थे, उनकी पाठक संख्या लाखों में और कुछ की तो करोड़ों में पहुंच गई है। समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के पाठक इतनी बड़ी संख्या में हैं तो पुस्तकों के पाठकों का अकाल क्यों पड़ा है? सच यह है कि हिंदी के प्रकाशक धन कमाने के शार्टकट- सरकारी खरीद पर निर्भर हैं। उन्होंने पाठक की पूरी तरह उपेक्षा कर दी है। आप पाठक की उपेक्षा करेंगे तो जाहिर है, पाठक भी आपकी उपेक्षा करेंगे।
सरकारी खरीद में पुस्तकें जिस-तिस का प्रभाव डलवा कर और अधिकारियों को रिश्वत देकर बेची जाती हैं। रिश्वत की दर तीस प्रतिशत से लेकर चालीस प्रतिशत तक पहुंच गई है। रिश्वत में इतनी मोटी रकम तभी दी जा सकती है, जबकि किताबों की कीमतें अनाप-शनाप बढ़ाई जाएं। भ्रष्टाचार की इस आपाधापी में हिंदी पुस्तकों की कीमतें इस कदर बढ़ गई हैं कि वे बेचारे पाठक की पहुंच से बाहर हो गई हैं। वह किसी तरह जोर खाकर अपनी पसंद की पुस्तक खरीदना चाहे तो भी पुस्तक मिल ही नहीं पाती। प्रकाशक पाठक तक पहुंचने की कोशिश तो करता ही नहीं, उसे पुस्तक सुलभ भी नहीं कराता। हिंदी प्रकाशकों के लिए (और लेखकों के लिए भी) यह शर्म की बात है कि पुस्तक जैसी पवित्र वस्तु को रिश्वत के सहारे बेचा जा रहा है और साहित्य के नाम पर लाखों के घोटाले किए जा रहे हैं।
लक्ष्मण राव कहते हैं- अगर पुस्तकों की कीमतें मुनासिब रखी जाएं और उन्हें पाठकों तक पहुंचाया जाए तो हिंदी में पाठकों की कमी नहीं है। मेरे पास न कोई वितरण तंत्र है, न प्रचार तंत्र, फिर भी मैं आधे दिन परिश्रम करके अपनी पुस्तकों की 2000 प्रतियां आराम से बेच लेता हूं। इसके विपरीत पूरे वितरण तंत्र वाले प्रकाशक 500 और कभी-कभी 300 प्रतियां छाप कर ही भरपूर मुनाफा कमा लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे लेखक और पाठक के बीच सेतु की अपनी भूमिका को कतई भूल गए हैं।
लक्ष्मण राव की की दिनचर्या बेहद व्यस्त है। वह नौ बजे चाय की दुकान पर आ जाते हैं। रात नौ बजे तक चाय बेचते हैं। जिन दिनों स्कूल-कॉलेज खुले रहते हैं, ग्यारह बजे से डेढ़-दो बजे तक किताबें बेचते हैं। बहुत से लोग सलाह देते हैं कि अब चाय क्यों बेच रहे हो? उनका कहना है कि चाय की दुकान से घर चल रहा है। इस काम को कैसे छोड़ दूं। बीच में समय मिलता है तो लिख-पढ़ लेता हूं। घर जाकर देर रात तक लिखते-पढ़ता हूं। रात को नींद खुल जाती है तो फिर पढऩे या लिखने लगता हूं। उन्हें लगता है कि कोई जरूरी काम करना था, जो रह गया है। उनके जीवन का एक ही मकसद है- पढऩा और लिखना। उनकी महत्वाकांक्षा है कि उनकी किताबों को स्कूलों के कोर्स में पढ़ाया जाएं। उनके लिखने का मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि एक लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त करना है। लक्ष्मण राव की इच्छा है कि अगले दस वर्षों में लगभग 20 किताबें लिखूं। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि वह इस मकसद में कामायब होंगे।
Recent Comments