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विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

विवेक भटनागर

लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी ग़ज़ल के प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। उनकी ग़ज़लें मुख्य तौर पर आम आदमी की पीड़ा से सरोकार रखती हैं, वहीं उनके शे’रों में आध्यात्मिक स्वर भी प्रमुखता से सुनाई पड़ता है। हिंदी अकादमी दिल्ली समेत कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित इस ग़ज़लकार की प्रस्तुत हैं तीन ग़ज़लें

1

आजकल हालात कुछ अच्छे नहीं हैं
सच के पैरोकार ही सच्चे नहीं हैं

आंकड़ों के झुनझुनों का क्या करेंगे
मत हमें बहलाओ, हम बच्चे नहीं हैं

इस नई संवेदना का रूप देखें
नाक ऊंची है मगर कंधे नहीं हैं

हम रियाया हैं मेरे जिल्लेइलाही
हम तुम्हारे ताश के पत्ते नहीं हैं

उन पे है अल्लाह की नज़रे इनायत
जो किसी अल्लाह के बंदे नहीं हैं

हैं हमारी सिरफिरी ख़्वाहिश का बोझा
फूल से बच्चों के ये बस्ते नहीं हैं

वो सफ़र भी क्या सफ़र है, जिस सफ़र में
मंज़िलें तो हैं मगर रस्ते नहीं हैं

2

कोई आए तो रोशनी लेकर
बुझती आंखों की ज़िंदगी लेकर

आसमानों पे आंकड़े मत लिख
आ ज़मीनों पे बेहतरी लेकर

अब ख़ुलूसो-वफ़ा की क्या क़ीमत
क्या करेगा ये आदमी लेकर

एक ही दिल था मेरे सीने में
जा रहा है वो अजनबी लेकर

मैं समंदर हूं, पानियों का हुजूम
फिर भी जीता हूं तिश्नगी लेकर

वस्ल के वक़्त अपनी आंखों में
बैठ जाती हो इक नदी लेकर

जी रहा है विवेक भटनागर
शे’र दर शे’र त्रासदी लेकर

3

सुख़न में हाज़िरी है और क्या
मुहब्बत आपकी है और क्या

मगर से मछलियों की दुश्मनी
सरासर ख़ुदक़ुशी है और क्या

इसी पर टांग दे नेकी-बदी
समय की अलगनी है और क्या

धुएं के साथ गहरी दोस्ती!
हवा भी बावली है और क्या

झुकी नज़रों से सबकुछ देखना
अदा-ए-दिलबरी है और क्या

अभी रफ़्तार की बातें न कर
सड़क यह अधबनी है और क्या

ज़ुबां पर बंदिशें रख दो मगर
नज़र भी बोलती है और क्या

सहाफ़त के बदलते दौर में
ख़बर अब सनसनी है और क्या

तवे पर रक़्स है इक बूंद का
हमारी ज़िंदगी है और क्या

उतरकर ख़ुद में ख़ुद को देख लूं
ये ख़्वाहिश आख़िरी है और क्या

विवेक भटनागर की चार ग़ज़लें

विवेक भटनागर

विवेक भटनागर

एक

उसके दिल में इस क़दर तनहाइयां रक्खी मिलीं
उसकी आंखों में वही परछाइयां रक्खी मिलीं

कुछ जगह रक्खी मिली दीवार अपने दरमियां
कुछ जगह पर गहरी-चौड़ी खाइयां रक्खी मिलीं

टूटता दम दफ़्तरों में मां की ममता का मिला
परवरिश करने को घर में बाइयां रक्खी मिलीं

कुछ किताबों में दबी थीं बेतरह दिलचस्पियां
टेक्स्ट बुक में तो फ़क़त जम्हाइयां रक्खी मिलीं

नाज़ था हमको जवानी पर मगर कुछ दिन हुए
रुख़ पे अपने झुर्रियां और झाइयां रक्खी मिलीं

ज़र्दियां मजदूर-मेहनतकश के थीं चेहरों पे जो
मेरी ग़ज़लों में वही रानाइयां रक्खी मिलीं

दो

शबे ग़म इस क़दर ठहरी हुई है
क़रीब आकर सहर ठहरी हुई है

जहां से हम चले मंज़िल की जानिब
वहीं पर रहगुज़र ठहरी हुई है

छलक कर आंख से पाकीज़गी की
चमक रुख़सार पर ठहरी हुई है

बताती है सही दो बार टाइम
घड़ी चारों पहर ठहरी हुई है

टहल कर रेत में लौटा समंदर
किनारे पर लहर ठहरी हुई है

करे किससे शिकायत पत्थरों की
ये डाली बेसमर ठहरी हुई है

किसी दिन भी बदल सकता है मंज़र
बहुत दिन से नज़र ठहरी हुई है

तीन

हां, तो मैं कह रहा था कि आते रहा करो
रिश्ता वही है, जिसको निभाते रहा करो

अपनी मुहब्बतों को लुटाते रहा करो
बदले में दुगना प्यार कमाते रहा करो

उठता है कोई, उसको गिराने को हैं बहुत
गिरते हुओं को यार उठाते रहा करो

या तो बढ़ाओ ज्ञान सुनो सबकी गुफ़्तगू
या कितना ज्ञान है ये बताते रहा करो

होकर बड़े वो नींद की गोली न खाएंगे
बच्चों को लोरी गा के सुलाते रहा करो

नन्हे दियो! तुम्हीं से उजालों की रौनकें
जल-जल के तीरगी को बुझाते रहा करो

तुमको तो मोक्ष चाहिए, दुनिया की क्या पड़ी
गंगा में सारे पाप बहाते रहा करो

हैं ये क़लम उठाने की शर्तें विवेक जी
जागे रहो, सभी को जगाते रहा करो

चार

कुछ लोग दिखावे की फ़क़त शान रखे हैं
तलवार रखें या न रखें, म्यान रखे हैं

गीता ये रखे हैं, तो वो कुरआन रखे हैं
हम घर में मगर मीर का दीवान रखे हैं

बाज़ार है ये, नींद के मारे हैं खरीदार
व्यापारी यहां ख़्वाब की दूकान रखे हैं

जब ज़िंदगी नुकसानो नफ़े पे नहीं चलती
सुख-दुख के लिए लोग क्यों मीज़ान रखे हैं

ग़ुरबत को धरम मान के कुछ लोग तो अक्सर
नवरात्र के व्रत, रोज़ए रमज़ान रखे हैं

जो हक़ हैं ग़रीबों के उन्हें भीख समझकर
देते हैं अगर, उनपे वो एहसान रखे हैं

पत्थर वो चलाते हुए टुक सोच तो लेता
पुरखों ने इन्हीं संग में भगवान रखे हैं

बच्‍चों का विज्ञान-बोध : विवेक भटनागर

apne bachche ko den vigyan drishti

आमतौर पर विज्ञान के बारे में धारणा है कि यह बड़ा ही कठिन विषय होता है। यह सिर्फ एक भ्रामक धारणा है। जो ज्ञान हमारी जिंदगी से जुड़ा हो, वह कठिन कैसे हो सकता है? उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते यानी हर वक्‍त, हर गतिविधि में हम विज्ञान को ही जीते हैं। विज्ञान के कठिन होने की धारणा बनने के पीछे हमारी शिक्षा पद्धति की भूमिका हो सकती है, जो बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना उसे विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करती है। बच्चा शुरू से ही कुछ-न-कुछ सीखना शुरू कर देता है। वह जो कुछ भी देखता है, उसे जानने की कोशिश करता है। उसकी उत्सुकता ही उसका वह ज्ञान-बोध है, जो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसके सवाल भी बढ़ते जाते हैं। कुछ का मतलब वह स्वयं समझता है, लेकिन कुछ बातों में जब उसे संशय होता है, तो वह सवाल करता है। इसी में उसके विज्ञान को समझने की दृष्टि छिपी होती है। ऐसे में बच्चे को, उसके सवालों को सुलझाने में अभिभावकों को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा, तभी बच्चे की विज्ञान-दृष्टि बन पाएगी। हाल ही में नैन्सी पाउलू और मोर्गेरी मार्टिन की पुस्तक हिंदी में अनूदित होकर आई है- अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि। आशुतोष उपाध्याय ने इस पुस्तक का बड़ा ही सरल और सुबोध अनुवाद किया है।

आज के बच्चे अलग हैं। हम कह सकते हैं कि उनमें विज्ञान एवं तकनीक का सहज-ज्ञान इन्बिल्ट होता है। लेकिन हम गलती यह करते हैं कि उन्हें अपने बचपन की तरह ट्रीट करते हैं। पुस्तक में लिखा है- ‘माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना है, जो हमारे अपने बचपन से बिल्कुल अलग है। इकीसवीं सदी में इस देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें प्राथमिक कक्षाओं में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का हमसे ज्यादा प्रशिक्षण मिला होगा।’

पुस्तक कहती है कि विज्ञान महज तथ्यों का अंबार नहीं है। तथ्य महज उसका एक हिस्सा हैं। विज्ञान में चार चीजें शामिल हैं। पहली, जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना। दूसरा- घटना की वजह का अंदाजा लगाना। तीसरा, अपने अंदाजे को सही या गलत सिद्ध करने के लिए जांच करना। चौथा, जांच में आए परिणाम का मतलब निकालना। पुस्तक में बच्चों के लिए छोटे-छोटे कई प्रयोग दिए गए हैं, जो घर में ही किए जा सकते हैं और जिनसे विज्ञान के बड़े-बड़े सिद्धांतों को समझा जा सकता है। इन प्रयोगों में अभिभावकों को क्‍या करना चाहिए और बच्चों को क्‍या करना चाहिए, विस्तार से बताया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बच्चों में विज्ञान-दृष्टि और विज्ञान-बोध को बढ़ाने का बेहद सरल प्रयास है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि
लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन
अनुवाद: आशुतोष उपाध्‍याय

मूल्‍य (अजिल्‍द) : 40 रुपये
(सजिल्‍द) : 75 रुपये

प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण, 11 जनवरी 2014 से साभार)

जिसका काम उसी को साजे : वि‍वेक भटनागर

युवा कवि‍-पत्रकार वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

एक गधा था चंपक वन में
ढेंचू जिसका नाम
सीधा-सादा, भोला-भाला
करता था सब काम।

एक बार वह लगा सोचने
मैं भी गाना गाऊँ
जंगल के सब जानवरों पर
अपनी धाक जमाऊँ
लेकिन गधा अकेले कैसे
अपना राग अलापे
यही सोचकर गधा बेचारा
मन ही मन में झेंपे
कालू कौए को जब उसने
मन की बात बताई
कालू बोला- ढेंचू भाई
इसमें कौन बुराई
हम दोनों मिलकर गाएँगे
अपना नाम करेंगे
कोयल-मैना के गाने की
हम छुट्टी कर देंगे
मैं काँव-काँव का राग गढ़ूँ
तुम ढेंचू राग बनाना
डूब मरेगा चुल्लू भर में
तानसेन का नाना।

इतने में आ गई लोमड़ी
फिर उनको बहकाने
बोली- तुम तो गा सकते हो
अच्छे-अच्छे गाने
शेर सिंह राजा को जाकर
अपना राग सुनाओ
उनको खुश कर राजसभा में
मंत्रीपद पा जाओ।

अगले दिन था राजसभा में
उन दोनों का गाना
ढेंचू-ढेंचू-काँव-काँव का
बजने लगा तराना
वहाँ उपस्थित सब लोगों ने
कान में उंगली डाली
गाना खत्म हो गया लेकिन
बजी न एक भी ताली
निर्णय दिया शेरसिंह ने तब
कर्कश है यह गान
इससे हो सकता है प्रदूषित
हरा-भरा उद्यान
जाकर इस जंगल के बाहर
तुमको गाना होगा
वरना इस गाने पर तुमको
टैक्स चुकाना होगा।

सुनकर शेरसिंह का निर्णय
हो गये दोनों दंग
जैसे भरी सभा में दोनों
हो गये नंग-धड़ंग।
शेर सिंह की बातें सुनकर
सपने से वे जागे
जिसका काम उसी को साजे
और करे तो डंडा बाजे।

चि‍त्र: अंजलि‍ कुमारी

विवेक भटनागर की तीन गजलें

एक

यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है
लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है

पुण्य के आकाश की सीमा नहीं है
पाप जल्दी भरने वाला इक घड़ा है

भूख क्यों हर रोज लगती है, न जाने
इस गरीबी का ये मुश्किल आँकड़ा है

देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है

साँप मिलते हैं विषैले उस जगह पर
जिस जगह पर भी किसी का धन गड़ा है

यह वही है जो कि कंधों पर खड़ा था
भीड़ के पैरों तले कुचला पड़ा है।

दो

अपना खुद से सामना है
इसलिए मन अनमना है

सब तनावों की यही जड़
खुद का खुद से भागना है

इसको भी तुम जीत मानो
खुद से कैसा हारना है

अपनी नजरों में गिरा जो
उसको फिर क्या मारना है

डूब जाने को सतह तक
लोग कहते साधना है।

तीन

वो आशियानों में घर रखेंगे
कि आसमानों के पर रखेंगे?

तुम्हारे कदमों के नीचे काँटे
तुम्हारे कदमों पे सर रखेंगे

तुम्हारा साया दगा करेगा
जो रास्ते में शजर रखेंगे

कि तुम भी शायद मुकर ही जाओ
हम आँखें अश्कों से तर रखेंगे

इधर है सोफा उधर है टीवी
ईमानदारी किधर रखेंगे?

तुम अपने पैरों को बाँध रक्खो
तुम्हारे आगे सफर रखेंगे

जो खुद ही खबरों की सुर्खियां हैं
वो क्या हमारी खबर रखेंगे।

वि‍ज्ञान मि‍त्र : वि‍वेक भटनागर

खेल-खेल में बच्‍चों को वि‍ज्ञान सि‍खाने और वैज्ञानि‍क सोच वि‍कसि‍त करने के उद्देश्‍य से प्रकाशि‍त ‘प्रथम वि‍ज्ञान’ पर युवा लेखक-आलोचक वि‍वेक भटनागर की टि‍प्‍पणी-

‘प्रथम विज्ञान’ का प्रवेशांक देखकर प्रसन्नता हुई। कारण यह है कि आज विज्ञान का युग है और हमारे दैनंदिन जीवन में विज्ञान ही ऐसी शक्ति है, जो न सिर्फ हमारे जीवन को सहज बनाती है, बल्कि एक प्रगतिशील नजरिया भी देती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोगों की सोच को वैज्ञानिक बनाया जाए, ताकि वे बाहरी और भीतरी दोनों तरह के विकास के साथ कदमताल कर सकें। ‘प्रथम विज्ञान’ से ये संभावनाएं जागती हैं कि यह पत्रिका बच्चों में वैज्ञानिक संस्कार जगा सकेगी। अवश्य ही बच्चे विज्ञान को एक रुक्ष विषय की तरह न लेकर, उसकी रसमयता में डूबेंगे और अपना बेहतर नजरिया विकसित करेंगे।

प्रथम वि‍ज्ञान ( द्वैमासि‍क बुलेटि‍न)
मूल्‍य: 10 रुपये
संपादन : आशुतोष उपाध्‍याय
संपादकीय कार्यालय: प्रथम रि‍सोर्स सेंटर
बी-4/54, सफदरजंग एनक्‍लेव,
नई दि‍ल्‍ली- 110092

 

सुपरमैन हैं मेरे पापा : विवेक भटनागर

युवा कवि‍ वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
अक्सर चीतों से भिड़ जाते
शेरों से न तनिक घबराते
भालू से कुश्ती में जीते
हाथी तक का दिल दहलाते
मगरमच्छ का जबड़ा नापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

भूत-प्रेत भी उनसे डरते
सारे उनकी सेवा करते
सभी चुड़ैलें झाड़ू देतीं
सारे राक्षस पानी भरते
उनमें पापा का डर व्यापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

आसमान तक सीढ़ी रखते
खूब दूर तक चढ़ते जाते
इंद्रलोक में जाकर वह तो
इंद्रदेव से हाथ मिलाते
उनसे डर इंद्रासन कांपा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

मां का मौन : विवेक भटनागर

युवा कवि और गजलकार विवेक भटनागर को इस कविता के लिए 1995 में हिंदी अकादमी दिल्ली ने पुरस्कृत किया था-

लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला
मांज दिया है तवा, हुआ था बेहद काला
फिर भी कहती मत जा बाहर लुक्का-छिप्पी खेल खेलने…।

बड़े सबेरे उठकर मैंने
सारे घर के कपड़े फींचे
न्हिला-धुला कर लछमिनिया को,
उलझे बाल जतन से खींचे
भूखी गइयों की नांदों में
खली डाल कर सानी की है
हुई मांजकर बरतन काली
दी हुई अंगूठी नानी की है,
लगा दिया है बटन सुई से
संजू के नेकर में काला….।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला….।

जब बाहर जाती तो कहती
बेटी तू मत बाहर खेल,
तू लड़की है, कामकाज कर
लड़कों के संग कैसा मेल
क्या लड़कों के साथ खेलना
कोई पाप हुआ करता है?
लड़की का क्या कद बढ़ जाना
अम्मा पाप हुआ करता है?
फिर तो अम्मा चारदिवारी
लगती है मकड़ी का जाला…।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला…।

लेकर कलम-बुदिक्का मैंने
पाटी में था लिखा ककहरा
पाठ याद किए थे सारे
था जीवन में उन्हें उतारा…।
पांच पास करते ही तुमने
मुझे मदरसा छुटा दिया है
घर-गृहस्थी में क्यों अम्मा,
मुझको उलझा अभी दिया है
जो कुछ पढ़ा, अभी तक उसका
इन कामों में पड़ा न पाला….।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला…।

हाथों को पीला करने में
इतना चिंतित क्यों रहती हो?
दहेज जुटाने की चिंता में
सारी रात जगा करती हो…।
याद करो, सन्नो दीदी को
सास-ससुर ने जला दिया था
क्या अम्मा, यह भी होता है
कोई रस्म-रिवाज यहां का…।
तुम फिर कैसे जी पाओगी
लाड़-प्यार से तुमने पाला…।

लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला
मांज दिया है तवा, हुआ था बेहद काला
फिर भी कहती मत जा बाहर लुक्का-छिप्पी खेल खेलने…।

विवेक भटनागर की दो गजलें

युवा लेखक और पत्रकार विवेक भटनागर की दो गजल-

गांव में कठपुतलियों के

क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
खलबली है गांव में कठपुतलियों के
 
और रंगों के लिए रंगींतबीयत
गिरगिटों ने पर तराशे तितलियों के
 
देखिये पक्षी तड़ित चालक हुए तो
हल नहीं होंगे मसाइल बिजलियों के
 
चांद की आंखों में डोरे सुर्ख तो थे
कम न थे तेवर सुहानी बदलियों के
 
आज गांवों ने किए सौदे शहर से
नथनियों के, पायलों के, हंसलियों के
 

बेहतर होगा जुबां फेंक दो

खिड़की-रोशनदान फेंक दो
ऐसा सब सामान फेंक दो
 
किसी बंद कमरे के अंदर
हवादार दालान फेंक दो
 
अच्छे से जीने की खातिर
बचा-खुचा सम्मान फेंक दो
 
बेहतर होगा जुबां फेंक दो
या फिर अपने कान फेंक दो
 
महरूम सभी चीजों से होकर
खालीपन का भान फेंक दो