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ऐसे मनीषियों को जानना जरूरी जो सचमुच महान हैं : त्रिपाठी

कार्यक्रम का उद्घाटन करते विश्‍वनाथ त्रि‍पाठी।

दिल्ली। जब पूरा देश चारित्रिक दारिद्रय से गुजर रहा है तब अपने इतिहास से ऐसे मनीषियों को जानना जरूरी है जिन्हें भले महानता का सर्टिफिकेट न दिया गया हो लेकिन जो सचमुच महान हैं। पालि साहित्य और बौद्ध दर्शन के महान विद्वान भरतसिंह उपाध्याय के पुण्य स्मरण प्रसंग में सुपरिचित आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि भरतसिंह उपाध्याय ने भगवान बुद्ध की जैसी जीवनी लिखी है उसके बारे में यही कहना उचित होगा कि यदि भगवान बुद्ध खड़ी बोली में गद्य लिखते होते तो वह अपनी बातें ठीक ऐसी ही लिखते जैसी उपाध्याय जी ने लिखी हैं। उन्‍होंने कहा कि दलित और स्त्री विमर्श की ठेठ भारतीय परम्परा देखनी हो तो वह थेर साहित्य में देखी जानी चाहिए जिसे हिन्दी पाठकों के लिये भरतसिंह उपाध्याय ने बहुत प्रमाणिक रूप से रखा। यह आयोजन वि‍श्‍वनाथ त्रिपाठी की सद्य प्रकाशित संस्मरण पुस्तक ‘गंगा स्नान करने चलोगे’ के संदर्भ में किया गया था। इस पुस्तक में हिन्दू कॉलेज के पूर्व प्राध्यापक और मनीषी भरतसिंह उपाध्याय पर भी संस्मरण है जिसके अंश लेखक ने सुनाये। भारतीय ज्ञानपीठ के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में भरतसिंह उपाध्याय के संदर्भ में हिन्दी के दिवंगत मनीषी आचार्यों की सुदीर्घ परम्परा को स्मरण करते हुए त्रिपाठी ने कहा कि दिल्ली विश्‍वविद्यालय के इतिहास में पहली बार किसी आयोजन में भरतसिंह उपाध्याय को याद किया जा रहा है।

इससे पहले अतिथियों का परिचय देते हुए डॉक्‍टर रामेश्‍वर राय ने विश्‍वनाथ त्रिपाठी के लेखन और भाषा शैली पर विस्तार से प्रकाश डाला। हिन्दी साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉक्‍टर पल्लव ने ‘गंगा स्नान करने चलोगे’ को विधाई अंतर्क्रिया का अनुपम उदाहरण बताते हुए कहा कि यह पुस्तक केवल संस्मरणों का सुख नहीं देती अपितु हिन्दी साहित्य के अनेक व्यतीत पक्षों और समकालीन मुहावरों का बोध भी कराती है।

अध्यक्षता कर रहे कवि-कथाकार अजित कुमार ने पुराने दिनों का स्मरण करते हुए अनेक संमरण भी सुनाये। महाविद्यालय की हिन्दी भित्ति पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ का लोकार्पण विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने किया। इस पत्रिका के परामर्शदाता डॉक्‍टर अरविन्द संबल ने पत्रिका की जानकारी दी। पत्रिका के छात्र सम्पादक आशु मंडोर, राजकुमार और आरती ने स्वागत किया। कॉलेज के पूर्व आचार्य सुरेश ऋतुपर्ण एवं कवि शैलेन्द्र चौहान ने अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया। समारोह स्थल पर भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा लगाई पुस्तक प्रदर्शनी का बड़ी संख्या में युवाओं ने लाभ लिया। आयोजन में लेखक मनोज मोहन, प्राध्यापक अभय रंजन, डॉक्‍टर हरीन्द्र कुमार, डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर, रविरंजन, ज्ञान प्रकाश, आशु मिश्रा एवं विभाग की प्रभारी डॉक्‍टर रचना सिंह ने भागीदारी की। हिन्दी साहित्य सभा के संयोजक असीम अग्रवाल ने स्वागत तथा घनश्याम दास स्वामी ने आभार व्यक्त किया।

प्रस्‍तुति‍ : नितिन मिश्रा, मीडिया प्रभारी, हिन्दी साहित्य सभा, हिन्दू कॉलेज, दिल्ली

बेतवा, विश्‍वनाथ त्रिपाठी और तीन कवि

विश्वनाथ त्रिपाठी

नरेश सक्सेना

मानवीय करुणा के प्रसंग अनन्त हैं।
करुणा मनुष्यों के प्रति, पशु-पक्षियों के प्रति और पेड-पौधों के प्रति
किन्तु पत्थरों प्रति?
पत्थरों की ऊब और अकेलेपन की अनुभूति और उनके दुख और
विस्थापन की कचोट की यह मर्मान्तक कथा तो अनोखी और अभूतपूर्व है।
ऐसा कोई प्रसंग हिन्दू धर्मग्रन्थों में आया हो, याद नहीं पड़ता
बइबिल और कुरान में कहीं हो तो हो।
हिंसा और घृणा से भरे इस समय में क्या किसी का पत्थरों के विस्थापन से विचलित होना सम्‍भव है?
हाँ, है ऐसा एक व्यक्‍ति‍। जिसका नाम है विश्‍वनाथ त्रिपाठी,
यह हमारे समय और कविता की एक ऐतिहासिक घटना है।
ऐसी कविता जिसका कथ्य रूप का मोहताज नहीं है। इस कथ्य के साक्षी अनेक हैं।

मैं इस बारें में कुछ नहीं कहूँगा। कहेंगी ये कवितायें जिन्हें हिन्दी के तीन महत्वपूर्ण कवियों ने अपने मौलिक ढंग से लिखा है। ये तीन कवि हैं विनोद कुमार शुक्ल, भगवत रावत और पूर्णचन्द्र रथ। तीनों कवितायें यहाँ प्रस्तुत है जो मनुष्य की सम्‍वेदना उसकी सहृदयता और सदाशयता के असीम विस्तार का सन्देंश आने वाली पीढियों को देती रहेंगी।

विश्‍वनाथ त्रिपाठी एक आलोचक के रूप में विख्यात हैं। सच्चाई यह है कि यह कवि पहले हैं और उससे भी पहले एक मनुष्य। शुरुआत उन्ही की एक कविता से करते हैं-

जल्लाद

फाँसी पर चढ़ा रहे थे
और नकाब पहने थे,
सद्दाम ने नकाब पहनना स्वीकार नहीं किया
फाँसी चढ़ते वक्त

नकाब न पहनने के कारण
फाँसी का फन्दा पडा़ चेहरा
देखा लोगों ने

वे याद रखेंगे
जल्लादों को, नकाबों को
और फाँसी का फन्दा पडें
सद्दाम के चहेरे को।

पिंजडे़ के पक्षी को

विनोद कुमार शुक्ल

पिंजडे़ के पक्षी को
स्वतंत्र करने के लिये
जंगल नहीं जाना होता
घर के आँगन में पिंजडा़ खोल
उडा़ दिया जाता है तो
छत की मुँडेर या पास के पेड़ की ओर
पक्षी चला जाता होगा।
पता नहीं कहाँ किस पेड से
पकडा़ गया हो।
पर गगन वही है
सब जगह उड़ने का।
एक बार जब विश्‍वनाथ बेतवा गये
तो नदी के बहते जल से
एक गोल पत्थर उठा लाये
जो उनके घर के आँगन के
खुले गगन में बरसों पकडा़ हुआ पडा़ रहा।
वे दुबारा बेतवा गये
तब पत्थर साथ ले गये
पारदर्शी जल के नीचे
याद कर, वहीं उसी जगह
दूसरे पत्थरों के बीच
पकडे़ पत्थर को छोड़ स्वतंत्र किया
स्वयं उन्मुक्‍त हुए
देखकर मैं
जिसे बताया मैंने, वह भी।

नौ

भगवत रावत

हिन्दी के एक अकेले फक्कड़ आलोचक
सचमुच के विद्वान
आपादमस्तक डूबे हुए साहित्य के सागर में
बतरस में माहिर
सहृदय इतने कि बडे़-बडे़ कवि
और कलाकार उन्हें देखते ही रह जायें

पान के शौकीन
चटोर मिष्ठान के
गोरे-चिट्टे मँझोले कद के
सत्तर पार कर चुके इतने खूबसूरत इंसान
कि अच्छों-अच्छों के कद उनसे छोटे पड़ जायें

यानी पंडित विश्‍वनाथ त्रिपाठी को जानते हैं आप
आधी से ज्यादा उम्र से रहते आ रहे हैं उसी दिल्ली में
जिसमें रहते हैं आप
वे भी आप ही की तरह आये थे रोटी-रोजी के चक्कर में
और बस गये वहीं
पर उनका आज तक कुछ नहीं बिगाड़ पायी दिल्ली

जब भी उनसे मिलेंगे आप
लगेगा आपको कि पंडित जी अभी-अभी उतरे हैं
बलिया-गोरखपुर की किसी ट्रेन से
और दिल्ली की चौडी़ सड़क पार नहीं कर पा रहे हैं

समय-समय की बात
कुछ ऐसा संयोग घटित हुआ भोजपुरी और बुन्देली में
कि एक दिन पंडित जी और मैंने ओरछा में
साथ-साथ किया स्नान वेत्रवती में जिसे बुन्देली में
कहते हैं बेतवा

बेतवा की बीच धारा के कुछ रंग-बिरंगे घिसे हुए
श्यामल-धूसर-चिकने गोल-गोल पत्थर
भा गये विश्‍वनाथ जी को
और वे उन्हें अपने साथ ले गये दिल्ली

और देखिये कि ठीक एक बरस बाद
उन्हीं गर्मियों के दिनों में
बेतवा की उसी धार में, उन्हीं पत्थरों को
वापस स्थापित करते देखा मैंने विश्‍वनाथ जी को
तो मैं उन्हें देखता रह गया भौंचक्का
और विश्‍वनाथ जी मानो मन ही मन क्षमा माँगते रहे
बेतवा से।

पत्थर से

पूर्णचन्द्र रथ

बेंत सी बलखाती
पुरानी नगरी के पास से गुजरती
इस नदीं में पत्थर ही पत्थर
ऐतिहासिक अडिग चट्टान
या छोटे-छोटे शालिग्राम

कुछ ले गये विश्‍वनाथ जी
पारसाल दिल्ली
अपना कैक्टस गमला घर सजाने

खुश नहीं थे
सीमेंट कोलतार के जनअरण्य में
भयभीत बच्चे ग्रामीण दिखे सर्वदा
अमूर्तन के शिल्प में असंगत विन्यास
धरा पर वर्णों का संकट
अकारण कुंठित अस्‍ति‍त्व में सहता भला
ले आया इनकी माटी से मिलाने
भूल या कहो अपराध हल्का करने

दिव्य चेहरे पर आर्य अवगाहन
विश्‍वनाथ जी ने गमछे में बँधे
पत्थर सारे डाल दिये नदी में

तंरगायित रही बेतवा
निष्कलुष वे डूबे
जल आकाश में उन्मुक्‍त
रवि रशिमयों के आलोक से अपराजेय
दिपदिपाने लगा।

(‘कथादेश’, अगस्‍त 2012 से साभार)

वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी और बद्री नारायण को शमशेर सम्‍मान

नई दिल्ली : 2011 का प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान सृजनात्मक गद्य के लिए वरिष्ठ आलोचक और गद्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी व कविता के लिए हि‍न्‍दी के प्रतिष्ठित कवि बद्री नारायण को दि‍या जाएगा। सम्मान समारोह जून, 2012 में नई दिल्ली में होगा। इस सम्मान के लिए साहित्यकार का चयन देशभर से प्राप्त अनुशंसाओं के आधार पर वरिष्ठ रचनाकारों की एक समिति करती है। इस बार इस समिति में कवि विष्णु नागर, लीलाधर मंडलोई, राजेंद्र शर्मा व मदन कश्यप थे। सम्मानित रचनाकार को सम्मान निधि, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न दिया जाता है।

नयी पीढ़ी के हौसलों को देखकर लगता है, भारत स्‍वप्‍नहीन नहीं हुआ : वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका 'साझा' के पहले अंक का लोकार्पण करते अति‍थि‍गण।

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका ‘साझा’ के पहले अंक के लोकार्पण समारोह की रि‍पोर्ट-

नई दि‍ल्‍ली : नयी पीढ़ी के रचनात्मक प्रयासों को देखकर पुरानी पीढी़ को जो खुशी मिलती है, उसे अभी नयी पीढी़ अनुभव नहीं कर सकती, लेकिन नयी पीढी के हौसलों को देखकर लगता है कि भारत अभी स्वप्नहीन नहीं हुआ है। यह बात 09 जनवरी, 2012 को गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में उर्दू-हिन्दी की वीडियो पत्रिका ‘साझा’ के पहले अंक का लोकार्पण करते हुए हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी ने कही। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर असगर वजाहत ने और संचालन ‘संवेद’ के संपादक किशन कालजयी ने किया। उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका ‘साझा’ जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय के ‘कर्मेंदु शिशिर शोधागर’ द्वारा निर्मित की गई है। ‘साझा’ के पहले अंक का निर्देशन संजय जोशी ने और उसका संपादन किशन कालजयी ने किया है। किशन कालजयी ने बताया कि उर्दू और हिन्‍दी की यह छमाही साझी वीडियो पत्रिका दोनों भाषाओं के दर्शकों से रूबरू होगी।

युवा आलोचक विभास कुमार ने ‘साझा’ वीडियो पत्रिका की पृष्ठभूमि व ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय, जर्मनी द्वारा स्थापित ‘कर्मेंदु शिशिर शोधागर’ का परिचय देते हुए बताया कि यह शोधागार मूलतः कर्मेंदु शिशिर द्वारा ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय को उपलब्ध करवाई गई अत्यंत ही दुर्लभ और ऐतिहासिक लघु पत्रिकाओं के संकलन और उनके डिजीटलीकरण की विजनरी योजना का परिणाम है। इस सन्‍दर्भ में आने वाले समय में यह शोधागार हिन्दी साहित्य के शोधार्थियों के लिये बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। इसकी स्थापना में आलोचक कर्मेंदु शिशिर की सक्रिय भूमिका रही है। कर्मेंदु शिशिर के इस अमूल्य योगदान का प्रतिदान करने के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय ने अपने इस शोधागार का नाम कर्मेंदु शिशिर के नाम पर रखने का निश्चय किया, जो कि अपने आप में एक सराहनीय कदम है। ‘कर्मेंदु शिशिर शोधागार’ के माध्यम से हिन्‍दी की लघु पत्रिकाओं को डिजिटल रूप में तब्दील करके उन्हें संरक्षित करने और इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों को सुलभ कराने की अत्यंत महत्ती परियाजना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है।

कर्मेंदु शिशिर के सहायक और कवि मित्र मदन कश्यप ने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि कर्मेन्दु शिशिर ने दिन-रात एक करके हिन्दी की लघु पत्रिकाओं के अंक एकत्रित किए थे और हिन्दी के शोधार्थियों के लिए इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय के साथ मिलकर इनके संरक्षण की योजना बनाई। इस सन्‍दर्भ में उन्होंने संस्कृत के विकास में जर्मन विद्वानों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा संस्थाओं की निष्क्रियता और लालफीताशाही के कारण हमें विदेशी शिक्षा संस्थानों की सहायता लेनी पड़ती है। उन्होंने हिन्‍दी भाषा और साहित्य के प्रति संवेदनशीलता के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय की सराहना की और बताया कि यह कितना विडम्‍बनापूर्ण है कि हमें अपनी भाषाओं और अपनी विरासत के संरक्षण के लिए विदेशों की ओर देखना पड़ता है।

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका ‘साझा’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत ने कहा कि वह ऐसे प्रयासों को उम्मीद की एक ऐसी किरण के रूप में देखते हैं जो भविष्य को रोशनी देगी। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हमारी भाषा और संस्कृति की जो दुर्गति हुई है, उसके लिए सबसे ज्यादा हमारी सरकारी संस्थायें जिम्मेदार हैं। आजादी मिलने से हमारे नागरिक समाज में अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर एक प्रकार की शिथिलता सी आ गई थी। हमने खुद कुछ करने की बजाये सरकारी प्रयासों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास किया और सरकारों ने हमें निराश किया है लेकिन ऐसे प्रयास उम्मीद जगाते है। समारोह में लेखकों और साहित्य प्रेमियों के साथ-साथ कर्मेंदु शिशिर की बेटी भी उपस्थित थीं।

प्रस्‍तुति‍ : प्रमोद मीणा, हि‍न्‍दी , सहायक प्रोफेसर, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, कालापेट, पुडुच्चेरी – 605014

सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं संजीव : रवीन्‍द्र त्रिपाठी

संजीव कुमार को देवीशंकर पुरस्कार प्रदान करते विश्‍वनाथ त्रिपाठी।

नई दि‍ल्‍ली : युवा आलोचक संजीव कुमार को उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ के लिए पंद्रहवां देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार वरिष्‍ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। 05 अप्रैल, 2011 को नई दिल्‍ली स्थित साहित्‍य अकादेमी के रवीन्‍द्र भवन में आयोजित समारोह में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी समाज अवस्‍थी जी के प्रति बहुत ही आत्‍मीय और अपनापन महसूस करता है। इसलिए युवा आलोचक संजीव कुमार को यह सम्‍मान प्रदान करते हुए मैं स्‍वयं को सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं।
समारोह के संचालक रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्‍वों की ओर ध्‍यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए हैं। वह अध्‍यवसाय और सूक्ष्‍म-द़ृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं और उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते हैं। उनकी पुरस्‍कृत पुस्‍तक ऐसी कोशिश का सुफल है।
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अवस्‍थी जी के सहकर्मी रहे सत्‍यदेव चौधरी ने संस्‍मरणात्‍मक वक्‍तव्‍य में कहा कि अवस्‍थी जी अपने अध्‍ययन-अध्‍यापन, लेखन व जीवन-शैली में आधुनिक थे। उन्‍होंने हमेशा अख्‍यात और नए लेखकों को लेखन के लिए प्रेरित और प्रोत्‍साहित किया। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निधन से पूर्व उनकी केवल पांच पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं, जबकि उसके बाद से अब तक कई किताबें आ चुकी हैं और लगातार चर्चा में रही हैं।
पुरस्‍कृत आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि यह अवसर मुख्‍यत: अवस्‍थी जी का जन्‍मदिन मनाने का है और किसी युवा आलोचक को उसके कार्य के लिए प्रोत्‍साहित करना तो उसका हिस्‍सा भर है। उन्‍होंने इस तथ्‍य की ओर ध्‍यान दिलाया कि छत्‍तीस साल की छोटी-सी उम्र में अवस्‍थी जी ने साहित्यिक हलके में जैसा और जितना हस्‍तक्षेप किया, वह हम जैसों के लिए गहरे आश्‍चर्य का विषय है और अपने समय का कोई ज्‍वलंत प्रश्‍न नहीं रहा होगा जिस पर अवस्‍थी जी ने लिखित मुठभेड़ न की हो। और इस मुठभेड़ के लिए भारतीय काव्‍य और काव्‍यशास्‍त्र की परंपरा से लेकर पश्चिम के साहित्‍य सिद्धांतों के अपने ज्ञान का समुचित उपयोग ने किया हो।
इस अवसर पर आयोजित ‘उपन्‍यास और हमारा समय’ विषयक विचार गोष्‍ठी का प्रारंभ करते हुए पंकज बिष्‍ट (रामजी यादव द्वारा पढ़े गए पर्चे में) ने कहा कि उपन्‍यास की पहली और आखिरी विशेषता उसकी समकालीनता ही है और इस रूप में उपन्‍यास और हमारे समय पर बात करने का दूसरा अर्थ उपन्‍यास और हमारा समाज या फिर समाज और उपन्‍यास के रिश्‍ते को रेखांकित करना है। आजादी के बाद हिंदी उपन्‍यास को हाशिए पर धकेल दिए जाने का परिणाम भी हम देख रहे हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि 40 करोड़ हिंदीभाषियों के पास 40 अच्‍छे उपन्‍यासकार नहीं हैं। रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज कोई निश्चित या पारिभाषिक शब्‍द नहीं है। इससे गांव-शहर, परंपरा-आधुनिकता के साथ बहुत कुछ समाया है। हिंदी में उपन्‍यास-आलोचना का आत्‍मविश्‍वास कविता-आलोचना की तुलना में काफी संकट में रहा है। आशुतोष कुमार ने समय के साथ उपन्‍यास के रिश्‍ते को विश्‍लेषित करते हुए कहा कि उपन्‍यास समय की सूची अवधारणा के खिलाफ खड़ा है और स्‍मृति, यथार्थ और कल्‍पना के बीच की दूरी उपन्‍यास की औपन्‍यासिकता को तय करती है, औपनिवेशिक इतिहास के शोषण के रूपों का आख्‍यान बनाती है और इस तरह वह खंडित होते मनुष्‍य के मनुष्‍य होने के अहसासों को रेखांकित करता है।
संजीव कुमार ने कहा कि लेखक पाठक को रोना तो रोते हैं, लेकिन खुद उन्‍होंने इस पाठक तक जोड़ने, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्‍या किया ? अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे भाषीय खिलंदड़ापन करता गप्‍पोड़ कहा गया। उपन्‍यासकार को अगर उपन्‍यासकार बने रहना है तो उसे तरह-तरह की आवाजों को स्‍पेस देना ही होगा।
अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में अशोक वाजपेयी ने महाकाव्‍य और उपन्‍यास के अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि महाकाव्‍य मनुष्‍य को पवित्रता के बोध से मुक्‍त नहीं हो पाता ओर उपन्‍यास मनुष्‍य की अपवित्रता के बोध से। एक लोकतांत्रिक कर्म के रूप में उपन्‍यास ने ही सबसे अधिक चालू नैतिकता को चुनौती दी है, एक तरह की नैतिक प्रश्‍नवाचकता को चिह्नित किया है। इस मायने में वह हमारी स्‍वतंत्रता का विस्‍तार करता है, उसके प्रति हमारी जवाबदेही पुष्‍ट करता है।
अंत में अनुराग अवस्‍थी ने सभी को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।

सादतपुर के बाबा : राधेश्‍याम तिवारी

जनकवि‍ बाबा नागार्जुन के जनशताब्‍दी वर्ष पर उन्‍हें स्‍मरण कर रहे हैं वरि‍ष्‍ठ कवि‍ राधेश्‍याम ति‍वारी-

अगर बनारस शि‍व के त्रिशूल पर टिका है, तो हम कह सकते हैं कि दिल्ली का सादतपुर बाबा नागार्जुन की कविताओं पर टिका है। नागार्जुन की कविताएं ऐसे लोगों को चुभती हैं जो इस व्यवस्था के पक्षधर या पोषक हैं। और यही नागार्जुन की कविताओं की ताकत भी है। ऐसे कवियों-लेखकों के लिए भी बाबा आदर्श नहीं हो सकते जो वातानुकूलित घर में बैठकर तपती दोपहरी में कविताएं लिखते हैं और मार्क्सवाद के सिद्धांतों को अपनी सुविधा के अनुरूप ढालने के आदी हैं। बाबा अपने समय के महत्वपूर्ण कवि इसलिए भी थे कि उन्होंने अपने लेखन के अनुरूप ही जीवन भी जीया। वे ऐसे कवि नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। हिन्दी में ही नहीं, विश्‍व साहित्य में ऐसा व्यक्तित्व विरल है जो अपने जीवन और लेखन में समान हो। आधुनिक हिन्दी साहित्य में महाप्राण निराला को छोड़कर ऐसा कोई दूसरा लेखक दिखाई नहीं देता। शयद इसीलिए नागार्जुन ने निराला के संबंध में लिखा है- ‘‘हे कवि कुल गुरु, हे महाप्राण, हे संन्यासी/तुम्हें समझता है साधारण भारतवासी।’’ निराला पर लिखते हुए एक तरह से बाबा ने अपने बारे में भी लिखा है। नागार्जुन भी जनता के कवि थे। जनकवि थे। जैसे बनारस बाबा विश्‍वनाथ की नगरी है, वैसे ही सादतपुर बाबा नागार्जुन की नगरी है। जैसे शि‍व औघड़ दानी थे,  वैसे ही बाबा नागार्जुन हिन्दी के औघड़ कवि। उन्हें हिन्दी का तांत्रिक कवि भी कहा जा सकता है। उनकी ‘मंत्र’ कविता को इस दृष्‍टि‍ से देखा जाना चाहिए। वे अपनी तांत्रिक कविता से इस ‘तंत्र’ को श्‍मशान तक पहुंचाना चाहते थे। वे भोजन भी तांत्रिक करते थे। वर्ष 1985 में कोलकाता के एक होटल में एक साथ भोजन करते हुए बाबा ने मुझसे कहा था- ‘‘क्या तुम तांत्रिक भोजन करते हो ?’’  मैं चकित था- ‘‘यह तांत्रिक भोजन क्या होता है!’’ उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘असली पंडितों का भोजन मांस, मछली…।’ ’ जब उन्हें पता चला कि मैं तांत्रिक भोजन नहीं करता तो बाबा ने बैरे को बुलाकर कहा-‘‘इस बाल कवि को छेना की मिठाई दो और मुझे मछली…।’’ वहां उपस्थित लोग बाबा के इस नटखट और अनन्य आत्मीय व्यवहार से अभिभूत थे। बाबा से यह मेरी पहली मुलाकात थी। उनका पूरा व्यक्तित्व ऐसा था कि‍ कोई अपरिचित देखकर कह नहीं सकता कि इस रूप-विन्यास में बैठा यह बूढ़ा व्यक्ति महाकवि नागार्जुन हैं। बाबा ने सहजता को साध लिया था। तीन दिनों तक साथ रहने, खाने-पीने और साथ कविता पढ़ने के बाद उनसे जो रिश्‍ता बना उसे आज भी मैं पूरी उष्‍मा के साथ महसूस करता हूं।

कितने लोगों की स्मृतियों में कितने तरह से बसनेवाले नागार्जुन मेरे लिए सिर्फ बाबा थे। उनके पूरे व्यक्तित्व में कोई ऐसा आतंक नहीं था जो आमतौर पर आज के प्रायोजित कवियों-लेखकों में होता है। बाबा खांटी देसी कवि थे- कबीर की परम्परा के कवि। इसका अहसास मुझे तब भी हुआ, जब उनकी नगरी सादतपुर में 21 नवम्बर, 2010 को उनका शताब्दीवर्ष बनाया जा रहा था। उस दिन ऐसा लगा कि हम लोग नाहक ही यह दुखद भ्रम पाले हुए हैं कि बाबा अब हम लोगों के बीच नहीं हैं। उस दिन जब सुबह साढे़ छह बजे लेखक-चित्रकार हरिपाल त्यागी के यहां गया तो लगा कि बाबा अभी भी हम लोगों के बीच ही बैठे हुए हैं और बता रहे हैं कि देखो इस हरिपाल को- ‘‘रेखने सौं जादू भरें, सुजन सखा हरिपाल।’’ त्यागीजी ने बाबा की 28 कविताओं पर पोस्टर और उनका एक तैल चित्र भी तैयार किया है। मेरे साथ बेटा उत्कर्ष भी था। त्यागीजी के यहां बनारस से बाचस्पतिजी आए थे। बाबा पर होने वाले आयोजन में शामिल होने के लिए। हम लोग थोड़ी देर वहां बैठे। इस बीच भी बाबा ने हमलोगों को चैन से बैठने नहीं दिया। प्रत्येक वाक्य में वे आ टपकते थे। त्यागीजी के पास मसाला बहुत है। बाबा के बारे में उन्होंने कहा कि एक बार नागार्जुन किसी के यहां गए थे। भोजन में रोटी थी। लेकिन रोटी ऐसी कि दांतों से खींचो तो वह कटने का नाम ही न ले। सो बाबा ने खीझकर घर वाले से कहा- ‘‘अगर ये रोटी तुम्हारे सिर पर दे मारूं तो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे, लेकिन इस रोटी का कुछ नहीं बिगड़ेगा।’’ त्यागीजी की बात सुनकर बाचस्पतिजी की कुंडली भी जागृत हो गई और उन्होंने भी बाबा से जुड़े जहरीखाल के कई संस्मरण सुनाए। फिर हमलोग पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रातः पौने सात बजे-बाबा नागार्जुन के निवास पर पहुंचे।

वहां मैं दूसरी बार गया था। पहली बार तब जब बाबा जीवित थे। जब मैं उनसे मिला था,  वह समय सर्दी का था। बाबा एक खाट पर बैठे धूप का आनंद ले रहे थे। मैं उनके पास कितनी देर बैठा और क्या-क्या बातें हुईं ठीक-ठीक याद नहीं। बस इतना याद है कि बाबा घर-परिवार की बातें पूछते रहे। गोया घर का कोई बुजुर्ग सदस्य वर्षों बाद मिला हो। उस समय वह दमा से परेशान थे। देखा, वहां अभी भी एक तख्त रखा हुआ है। उनके बेटे श्रीकांतजी से जब मैंने कहा कि कभी बाबा यहीं धूप में बैठा करते थे और मैंने उनका दर्शन यहीं किया था,  तो उन्होंने कहा- ‘‘अभी भी यहां धूप आती है…।’’ मैंने कहा- ‘‘धूप तो आएगी ही मगर…।’’ मेरी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि तभी एक लड़की आ गई। त्यागीजी ने बताया कि ये कणिका है यानी बाबा ने जिसके लिए ‘कणिका डियर’ कविता लिखी है। बाबा की पोती है। लोग धीरे-धीरे जुटने लगे थे। तभी देखा कुछ बच्चों के साथ सैनिक अंदाज में कथाकार महेश दर्पण हाजिए हुए। हम लोग भी उन्हीं के नेतृत्व में बाबा के निवास पर हाजिर हुए थे। महेशजी के आते ही हम सभी लोग एलर्ट हो गए। आज के महाभारत के कृष्‍ण महेशजी ही थे। अंतर सिर्फ इतना था कि कृष्‍ण ने अर्जुन युद्ध करने की बात कही थी, लेकिन महेशजी आज के आयोजन में कृष्‍ण भी थे और अर्जुन भी। उनके साथ पूरी एक सेना थी। बच्चों की सेना। सबके हाथों में महेशजी ने तख्तियां दे रखी थीं। जिन पर बाबा की कविताओं की पांक्यिां लिखी थीं। थोड़ी ही देर में रामकुमार कृषक, कौशल कुमार,  वीरेन्द्र जैन, हीरालाल नागर, रूपसिंह चंदेल, अरविंद कुमार सिंह, आशीष, विजय श्रीवास्तव, सुभाष आदि के साथ अनेक किशोर-किशोरियां भी धीरे-धीरे जुटते चले गए।

जब हमलोग बाबा के घर से निकल कर बाहर प्रभात फेरी के लिए पंक्तिबद्घ हो रहे थे, तभी विष्‍णुचंद्र शर्मा आ गए। विष्‍णुजी का रूप-विन्यास देखते ही बन रहा था। घुटने के नीचे तक उनका स्लिपिंग गाउन बेहद आकर्षक लगा। ऐसा लगा कि इस खास अवसर पर बाबा की आत्मा को रिझाने के लिए ही उन्होंने यह गाउन पहन रखा है। अगर बाबा जीवित होते तो विष्‍णुजी को देखकर कहते- ‘‘विष्‍णु, यह गाउन मुझे दे दो, तुम दूसरा खरीद लेना…।’’  इसके बाद विष्‍णुजी की क्या टिप्पणी होती, यह उनके मूड पर निर्भर करता। संभव है कि वे कहते यह केवल ‘विचंश’ के लिए है। इसी में मेरी पहचान है। यह सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए है। आपके लिए कोई दूसरा कोट मंगवा दूंगा…।’’ और महेश दर्पण की ओर मुखातिब होकर कहते- ‘‘महेश,  चांदनी चौक से एक कोट बाबा के लिए लेता आना। रुपये मुझसे ले लेना और हां, यह ध्यान रखना कि वह कोट बिलकुल मेरे जैसा न हो…।’’ उस दिन विष्‍णुजी सचमुच सबसे अलग लग रहे थे। जैसे त्यागीजी अपने चि़त्रों में अलग लगते हैं,  कृषकजी अपने गीतों में और महेशजी कहानियों में उसी तरह विष्‍णुजी अपने गाउन में अलग लग रहे थे। आते ही विष्‍णुजी ने सबसे पहले बाबा के घर के चौखट पर माथा टेका। यह देख मेरी आंखें गीली हो गईं। उसके बाद हम लोग प्रभात फेरी में इन पक्तियों को दुहराते हुए निकल गए-

‘‘अमल-धवल गिरि के शि‍खरों पर/बादल को धिरते देखा है/सादतपुर की इन गलियों ने/बाबा को चलते देखा है।’’  इसकी पहली दो पंक्तियां तो बाबा की हैं,  लेकिन दूसरी पक्ति सलिलजी की है। इन पंक्तियों को दुहराते हुए बार-बार मेरी वाणी बंध-सी जाती थी। ऐसा लगता था जैसे वाणी बर्फ बनकर कंठावरोध कर रही हो। बड़ी मुश्‍कि‍ल से मैं अपने को रोक पाता था और इन पंक्तियों की गूंज में भी मौन हो जाता था।

वरि‍ष्‍ठ आलोचक वि‍श्‍वनाथ त्रिपाठीजी के शब्दों में- ‘‘1980 ई में भोपाल में ‘महत्व केदारनाथ अग्रवाल’ का आयोजन हुआ। आयोजन मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। सभा में नागार्जुन अध्यक्ष,  वक्ताओं में त्रिलोचन, केदरनाथ सिंह, धनंजय वर्मा, इन पंक्तियों का लेखक भी। धनंजय और पंक्ति लेखक ने पर्चा पढ़ा। किसी के पर्चे में ‘ऐंद्रिय’ शब्द आया था। त्रिलोचन को बोलने को कहा गया। त्रिलोचन ने लगभग 45 मिनटों तक एंद्रिय शब्द का अर्थ, एंद्रिय और ऐंद्रिक के अर्थ में अंतर, हिंदी शब्दोकोशों का महत्व, उनके निर्माण का इतिहास आदि बताया। केदार का पूरे भाषण में नामोल्लेख तक नहीं। 46 मिनट में धैर्य टूट गया। श्रोता तो सांस दबाए रहे। केदारनाथ अग्रवाल ने डपटकर कहा- ‘’त्रिलोचन, तुम शब्दकोशों पर बोलने आए हो या मुझ पर, मेरी कविताओं पर। यह (उन्होंने एक चकार का प्रयोग करते हुए कहा) बंद करो।’’ त्रिलोचन वाक्य बीच में छोड़कर चुप बैठ गए। कुछ हुआ ही नहीं मानो। सभा में, मौन में स्पदित वातावरण विषम छा गया। नागार्जुन अध्यक्ष थे। बोले, ‘‘केदार त्रिलोचन से उम्र में बड़े हैं। हमारे बीच ऐसा होता आया है। केदार जहां आदरणीय होते हैं वहां हम फादरणीय हो जाते हैं। जहां हम आदरणीय होते हैं वहां वह फादरणीय हो जाते हैं। आज तो केदार आदरणीय हैं और फादरणीय भी हो गए।’’  हंसी-ठहाके से विषम मौन टूटा। नागार्जुन बेवजह गंभीरता ओढ़ने वाले कवि नहीं थे। उनके पास जीवन का रस था इसीलिए वे अपने आसपास के माहौल में भी रस घोलते रहते थे। उनके लिए यह भी जरूरी नहीं था कि वे सिर्फ लेखकों-कवियों के बीच ही रह सकते थे। अनपढ़ और जन सामान्य के लिए भी वे उतने ही सुलभ और आत्मीय थे जितना लेखकों-कवियों के लिए। कहते हैं, इसी सादतपुर में एक वृद्ध गुर्जर महिला थी। बाबा के प्रति उसके मन में विशेष अनुराग था।

दो बजे से कार्यक्रम का दूसरा सत्र शुरू होना था। मैं घर से सीधे विजय श्रीवास्तव के घर जा रहा था कि रास्ते में मिल गए युवा कवि रमेश प्रजापति। वे भी मेरे साथ हो लिए। विजयजी के यहां से निकल कर हम लोग कृषकजी के घर की ओर मुड़ने ही वाले थे कि सामने से एक कार गुजरी। उसमें से आवाज आई- ‘‘ऐ रमेश…।’’ मैंने देखा तो कार में डा. भारतेंद्रु मिश्र थे। मिश्रजी के साथ थे डॉ विश्‍वनाथ त्रिपाठी। त्रिपाठीजी ने कहा- ‘‘हमलोग विष्‍णुजी को लेकर आ रहे हैं। विष्‍णुजी मेरे बनारस के मित्र हैं…।’’ त्रिपाठीजी का विष्‍णुजी के प्रति यह आत्मीय भाव मन को छू गया और उनका एक संस्मरण बाबा के संदर्भ में याद आया।

एक बार लंबे समय के लिए बाबा प्रवास पर रहे। लौटने पर जब उस वृद्धा से मिलने गए तो उसने देखते ही कहा- ‘‘‘रे बाबा, तू कहां मर गया था रे..।’’ बाबा उसके अटपटे प्रेम को ताड़ गए और अभिभूत हो गए। तुलसी ने राम-केवट संवाद के संदर्भ में कुछ ऐसी ही स्थिति का वर्णन किया है- ‘‘प्रेम लपेटे अटपटे विहसे करुणा अयन…।’ ’बाबा ने जो उस बृद्धा से कहा उसका आशय यही था कि मिलने में सचमुच इतना गैप नहीं होना चाहिए। बाबा ऐसी ही जगहों से कविता का वि‍षय और शब्द ग्रहण करते थे। हम कह सकते हैं कि बाबा अटपटे प्रेम के अद्भुत कवि थे।

इसी सादतपुर में ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जिन्हें देखकर ऐसा लगेगा कि वे एक साथ जवां पैदा हुए होंगे- एक तो वे स्वयं और दूसरा उनका शब्दकोश। बाबा भाषा शब्दकोश से नहीं, उस जनता से ग्रहण करते थे, जिसके लिए वे लिखते रहे। आज अगर बाबा होते तो हफ्ते-दस दिन में एक बार हमारे यहां अवश्‍य आ जाते और आते ही सबसे पहले किचेन में संजना के पास जाते और कहते- ‘‘देखो तुम खीर तो बहुत अच्छा बनाती हो, पूड़ी भी लाजवाब होती है, बस थोड़ा ध्यान रखो कि सब्जी में सूखी मिर्च मत डाला करो। मैं अस्सी बरस का उजबक। पेट का मरीज हूं…।’’ और मौका देखकर वे यह भी कह देते- ‘‘तुम इतनी सुंदर, समझदार हो और ‘जिंदालोग’ की संपादक भी। फिर कैसे इस बेवकूफ के पल्ले पड़ गई..।’’ और फिर मुस्करा देते…। यह बाबा का किचन पोलिटिक्स था। अगर संजना अपने संपादकीय विवेक का इस्तेमाल करते हुए कहती कि बाब, आप अपनी कोई नई कविता ‘जिंदालोग’ के लिए दे दीजिए तो बाबा झोले से अपना कोई संग्रह निकालते और कहते- ‘‘इसमें सारी कविताएं नई हैं। जो चाहो ले लो, लेकिन यह ध्यान रखो कि अगर कविता है तो कभी पुरानी नहीं होगी और अगर नहीं है तो वह चाहे कितनी भी नई क्यों न हो उसे छापकर क्या करोगी। यह सिर्फ कुछ पत्रिकाओं की चोंचलेबाजी है।’’ वह यह भी कह सकते थे कि ‘‘जब ये टीवी चैनल वाले एक ही खबर को दिनभर और कई-कई दिनों तक दिखा सकते हैं तो कोई अच्छी कविता हम अनेक बार क्यों नहीं छाप सकते।’’  बाबा नए लोगों से जुड़कर खुद भी नया हो जाते थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि सिर्फ तुम्ही लोग मुझसे कुछ नहीं सिखते। मैं भी तुम लोगों से नरंतर सिखता रहता हूं।

बहरहाल आज भी जब त्यागीजी, कृषकजी,  महेशजी, पटना के मेरे अनन्य मित्र डा. शि‍वनारायण आदि आत्मीय मेरे निवास पर आते हैं तो लगता है कि बाबा की परंपरा अभी भी बची हुई है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में जीवन ज्योति पब्लिक स्कूल में अनेक पुराने मित्र और परिचित मिल गए। राठीजी (गिरिधर राठी) से बहुत दिनों बाद मिलना हुआ था। उनकी आत्मीयता ने मुझे बहुत बल दिया है। वे जब तक ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक रहे, बराबर मुझसे कुछ लि‍खवाते रहे। यह उनका आत्मीय व्यवहार अनेक युवा लेखकों के साथ रहा। उनके साथ किरणजी (राठीजी की पत्नी) और त्रिनेत्र जोशी भी थे। जोशीजी से भी लम्बे समय बाद भेंट हुई थी। कार्यक्रम के इस सत्र में डा. वि‍श्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि नागार्जुन की जन्मशती सारे देश में मनाई जा रही है। लेकिन सादतपुर में इसका मनाया जाना विशेष महत्व रखता है। यह समारोह तरौनी में मनाए गए समारोह से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करना आज की जरूरत है। बाबा का फोटो आपने किसी राजनेता के साथ नहीं देखा होगा। यहां आप यह विचार कीजिए कि आज जो प्रतिष्‍ठि‍त साहित्यकार हैं,  वे किनसे मिलते हैं और नागार्जुन किनसे मिलते थे। समालोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने बाबा के कुछ संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा- ‘‘एक बार दिनकरजी ने मुझसे कहा कि बाबा उनसे मिल लें। मैंने बाबा से जब यह कहा तो वे बहुत नाराज हुए और पूछा कि तुमने दिनकर को क्या जवाब दिया ? मैं चुप। बाद में जब दिनकरजी ने बाबा की नाराजगी के बारे में जाना तो वे खुद उनसे मिलने आए और उनसे माफी मांगी।’’

यहां यह बता दूं कि बाबा अपने स्वाभिमान के लिए जतना विख्यात थे, उतने ही सजग दूसरे के स्वाभिमान के प्रति भी थे। बात 12 नजवरी, 1985 की। उस समय तक मैंने बाबा का नाम तो जरूर सुना था, लेकि‍न उनको देखा नहीं था। यहां तक कि उनकी तस्वीर भी नहीं। कोलकाता से डा. शंभुनाथ सिंह का आमंत्रण मिला था कि बाबा नागार्जुन के सान्निध्य में युवा कवियों का तीन दिवसीय सम्मेलन है। कटिहार के बी. झा. कॉलेज के हिन्दी के मेरे प्रोफेसर दीपकजी ने भी मुझे उत्प्रेरित किया कि ऐसा अवसर कभी-कभी ही मिलता है सो जरूर जाना चाहिए। वहां देशभर के युवा लेखक-कवि जुटे थे। ठहरने की व्यवस्था कलकत्ता विश्‍ववि‍द्यालय में थी। बाकी लोगों की तरह फर्श पर मैंने भी अपना विस्तर लगा दिया। ठीक उसी समय एक बूढा़ व्यक्ति वहां आए,  जिनके आते ही सभी लोग उनके पास इस तरह घि‍र गए जैसे चीनी पर चिंटियां घि‍र जाती हैं। उन सबों से वह सज्जन रस ले लेकर बातें करते रहे। मैं समझ नहीं पाया कि ये कौन हैं,  इसीलिए मैं चुपचाप अपने बिस्तर पर बैठा रहा। वैसे भी बिना परिचय के लपककर मिलने का मेरा स्वभाव कभी नहीं रहा, वह चाहे कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो। थोड़ी देर बाद जब हम लोग कार्यक्रम स्थल पर गए, तो देखा वही सज्जन अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे हैं। मेरे बगल में कानपुर के आईआईटी के प्रोफेसर हेमंत दीक्षित थे। दीक्षितजी स्वभाव से बड़े सरल थे। जब मैंने दीक्षितजी से उनके के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यही तो बाबा नागार्जुन हैं। मैं चकित था। बाबा के प्रति मेरे मन में जो छवि थी वह दूसरे तरह की थी। यानी किसी हाईफाई व्यक्ति की। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बाबा फिर आए और मेरे बिस्तर पर ही बैठ गए। मैंने उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने पूछा-‘‘कहां से आए हो?’’ ‘‘कटिहार से।’’ मैंने कहा। बाबा आंखें बंदकर कुछ देर तक सोचते रहे। मैं समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या है? सोचने लगे। उसके बाद मैंने गहरे महसूस किया कि बाबा मेरे प्रति कुछ ज्यादा ही कृपालु लगे। बाद में उन्होंने कहा, ‘‘तुम खास हो, क्योंकि रेणु के क्षेत्र से आए हो…।’’ बाबा का अपने सामकालीनों के प्रति यह आत्मीय भाव आज के समय में दुर्लभ है। हिन्दी में आज कितने ऐसे लोग हैं जो अपने समकालीनों से इतना गहरा जुड़ाव रखते हैं। आज का हिन्दी लेखक अपने ही लोगों से इतना दाह करने लगा है कि इतना कोई तो औरत अपने सौत भी न करती होगी। कोई थोड़ा अच्छा लिखने लगा या उसकी चर्चा होने लगी तो उसके हजार शत्रु हो जाते हैं। यह बात बाबा में नहीं थी। सभी एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। इस संदर्भ में केदारनाथ अग्रवाल की बाबा के लिए लिखी कविता याद आती है- ‘‘आओ साथी गले लगा लूं/तुम्हे, तुम्हारी मिथिला की प्यारी धरती को, तुममे ब्यापे विद्यापति को/और वहां की जनवाणी का छंद चूम लूं/और वहां के गढ़-पोखर का पानी छूकर नैन जुड़ा लूं/और वहां के दुख मोचन, मोहन माझी को मित्र बना लूं/’’

इस संदर्भ यह उल्लेखनीय है कि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे। यह प्रेम ही इनकी कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि उन चारों में ऐसा व्यवहार नागार्जुन ही कर सकते थे कि जो व्यक्ति स्वागत में बिस्तर छोड़कर उनकी अगवानी में नहीं उठा, वह उसी के बिस्तर पर आ कर बैठ गए। उसके बाद बाबा का बिस्तर भी वहीं लग गया। उस रात करीब दो बजे मेरी नींद खुली तो दखा बत्ती जल रही थी और बाबा कुछ लिख रहे थे। मुझे देखा तो कहने लगे, ‘‘नींद नहीं आ रही है। दमा ने बेदम कर दिया है…।’’ मैंने लक्ष्य किया बाबा पोस्टकार्ट पर लिख रहे थे। उसमें पता था ‘तरौनी’ का। कार्यक्रम के अंतिम दिन बाबा ने मेरी डायरी में लिखा- ‘‘काश, आंखें/पीठ की ओर होतीं!/काश, पीठ के कान होते!/काश, सिर/खिसक-खिसक कर/कभी-कभी/दिल के नीचे आ लगता!’’ बाबा की आंखें पीठ की ओर भी थीं। इसीलिए उनकी कविताएं उनलोगों की व्यथा की कथा कहती हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद भी कहीं पीछे छूट गए हैं।

बाबा से अंतिम मुलाकात 1994 में दिल्ली के प्रगति मैदान के विश्‍वपुस्तक मेले में हुई थी। वे राजपाल एंड संस के स्टाल पर कोई पुस्तक देख रह थे। मेरे साथ संजना भी थी। हम दोनों ने बाबा के पांव छूए, तो बाबा बेहद खुश हुए। जब संजना से परिचय करवाया तो उसके सिर पर हाथ रखकर कहने लगे- ‘‘खूब फलो-फूलो..।’’ उसके बाद बाबा ने कहा- ‘‘बहुत देर से मेले में था। अब मैं जाना चाहता हूं…।’’ बाबा उसके बाद सचमुच मेले से चले गए- इस दुनिया के मेले से। उसके कुछ ही दिनों बाद वे दरभंगा गए तो फिर कभी नहीं लौटे।

कोलकाता की ही एक और घटना,  जिसे मैं कभी नहीं भूल नहीं पाता। हुगली नदी के किनारे स्थित जूट मिल के गेट पर मिल मजदूरों के बीच काव्य पाठ का आयोजन था। जहां तक मुझे याद है हजारों की संख्या में वहां मजदूर कवियों के स्वागत में पहले से जमा थे। वहां पहुंचने पर मजदूरों ने जिस तरह कवियों का स्वागत किया, वैसा फिर कभी देखने को नहीं मिला। उस दिन पहली बार लगा था कि कविता लिखना आज सार्थक हो गया। क्योंकि जिनके लिए ये कविताएं हैं, वे उन कविताओं को सुनने के लिए आतुर थे। वहां मैंने सबसे पहले एक गीत सुनाया था। गीत की पंक्तियां थीं- ‘‘सदियों से जो ढूंढ रहे हैं/उत्तर ज्ञानी-ध्यानी में/प्यासे ही अब डूब गए हैं गंगाजी के पानी में।’’ और भी कवियों ने कविताएं सुनाईं, लेकिन वे कविताएं इतनी उम्दा थीं कि मजदूरों के पल्ले नहीं पड़ीं। इसलिए मुझे पुनः कविता सुनाने को कहा गया। मैं संकोच में पड़ गया तो बाबा ने कहा- ‘‘जन कवि हो। जनता सुनना चाहती है तो सुनाओ…।’’ उसके बाद वहां उपस्थित युवा कवियों से बाबा ने कहा- ‘‘छंद में लिखो या मुक्त छंद में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर उसमें लोक चेतना नहीं है तो…। सिर्फ छंद कविता नहीं है और न ही मुक्त छंद कविता है। ये सिर्फ प्रस्तुति के माध्यम भर हैं। कविता हमारे जीवन से आती है। जैसा जीवन होगा, वैसी कविता होगी…।’’ सच तो यह है कि कविता के मामले में बाबा मध्यमार्गी थे। उन्हें न तो छंदों से परहेज था न मुक्त छंद से। उनकी पीढ़ी के बाकी कवियों के साथ भी लगभग यही बात रही। यही कारण है कि उनकी पीढ़ी के कवियों में विविधता अनेक स्तरों पर देखी जा सकती है। अपनी पीढी़ के बाकी कवियों की अपेक्षा बाबा की कविताओं में जनपदीयता का प्रभाव अधिक है। इसीलिए उनकी कविताएं जनता के अधिक करीब लगती हैं। यह बाबा की कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। बाबा की कविताएं अबुझ पहेली जैसी नहीं हैं। उनकी कविताएं हकलाती नहीं हैं। वे पानी पी-पीकर कविताएं नहीं लिखते थे,  बल्कि जिनके खिलाफ वे लिखते थे उन्हें वे पानी पिला-पिलाकर कविताएं सुनाते थे। लेकिन आज बाबा की परंपरा की कविताओं को संचार माध्यमों से लगभग दूर कर दिया गया है। जो कविताएं प्रकाश में आ रही हैं उनसे यह भ्रम पैदा हो रहा है कि हिन्दी में ऐसी ही कविताएं लिखी जा रही हैं। यही कारण है कि प्रकाशक कविता संग्रह छापने से कतराने लगे हैं और जनता कविता से दूर होती जा रही है। सच तो यह है कि आज भी जनता को अच्छी कविता का इंतजार है। इसके लिए जरूरी है कि प्रकाशक अच्छे कविता संग्रहों की तलाश करें। जो संग्रह वे छाप रहे हैं, उनकी सरकारी खरीद तो हो सकती है लेकिन जनस्वीकृति नहीं मिल सकती। जनपक्षधर साहित्य के लिए आज जैसा संकट है, पहले ऐसा शायद कभी नहीं था। इसका कारण यह है कि पहले साहित्य के पीछे बाजार था, लेकिन अब बाजार में साहित्य है। जो बाजार देगा उसी का साहित्य संचार माध्यमों में आएगा। प्रकाशक उसे ही छापेंगे और पुरस्कार समितियां उन्हें ही पुरस्कृत करेंगी। सारा मामला लेन-देन का है। इसलिए इसको लेकर बहुत निराश होने की जरूरत नहीं है। बचता है अंततः साहित्य ही। अगर अच्छा कुछ लिखा जा सका तो वही सबसे बड़ी उपलब्धि है। कोशि‍श भी इसी की होनी चाहिए। अच्छे साहित्य को पुरस्कार की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि पुरस्कृत साहित्य के प्रति संदेह होने लगा है। हिन्दी का यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि निराला को साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं मिला, जबकि साहित्य अकादेमी की स्थापना के दस वर्ष बाद तक निराला जीवत रहे। और नागार्जुन को भी जो मिला वह हिन्दी के लिए नहीं, मैथिली के लिए। फिर भी उम्मीद है कि बाबा की परंपरा की कविताएं आएंगी। वह आएंगी, लेकिन टीबी के जरिए नहीं, अखबारों के जरिए नहीं, वह हवाई जहाज से नहीं आएंगी और न हीं महंगी गाड़ियों से आएंगी। वह चल चुक
ी हैं तो आएंगी ही, लेकिन थोड़ा विलंब से, क्योंकि उन्हें पांव-पैदल ही आना है। उनकी कविताओं को स्मरण करते हुए जब मैं सादतपुर की गलियों में प्रभात फेरी कर रहा था तो लगा कि इन्हीं गलियों से बाबा न जाने कितनी बार गुजरे होंगे। आज भी मैं उनके कदमों की आहट गहरे महसूस करता हूं।

शमशेर की कवि‍ता में प्राइवेट-पब्‍लि‍क के बीच अंतराल नहीं : डंगवाल

नई दि‍ल्‍ली: शमशेर अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। उनसे हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से वाबस्ता रहने की सीख मिली। 21 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय शमशेर जन्मशती समारोह में ‘शमशेर और मेरा कविकर्म’ नामक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चर्चित कवि वीरेन डंगवाल ने यह बात कही। इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया, जिसमें उनके समकालीन कई कवियों ने उनकी कविता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे।

कवि अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छुने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। कवि मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी प्रेम कविताओं में अमूर्तन है। त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को संवेदना को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर बेहद उदार और जनपक्षधर थे। स्वप्न और यथार्थ की उनकी कविताओं में गहरा मेल दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी पक्षधरता थी और स्त्री की स्वतंत्र बनाने पर उनका जोर था। उनके प्रभाव से उनका कविता,  मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है,  उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। इसके साथ ही पार्टी और व्यक्ति का द्वंद्व भी। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। यद्यपि नागार्जुन के बाद उनकी कविता के सर्वाधिक पोस्टर बने, लेकिन वे जनसंघर्षों के नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद की मुक्ति के आनंद के कवि हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत शमशेर द्वारा पढ़ी गई उनकी कविताओं के वीडियो के प्रदर्शन से हुई। काव्यपाठ की अध्यक्षता इब्बार रब्बी और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दि‍न 22 जनवरी को आयोजि‍त कार्यक्रम कर अध्‍यक्षता करते हुए चर्चित मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि‍ शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं,  जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि‍ प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैरप्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है।

साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी़ विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे। गद्य ही सीमाएं को तोड़ता हैं। इसे मुक्ति का माध्यम समझना चाहिए।

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है।

इलाहाबाद से आए आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। कवि-आलोचक सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

युवा कथाकार अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है,  इस ओर वह बार-बार संकेत करते हैं। युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानीयत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है,  जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। कवि-पत्रकार अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया। हालिया प्रकाशित दूधनाथ सिंह द्वारा संपादित संस्मरणों की किताब के फ्लैप पर अज्ञेय की टिप्पणी को उन्होंने इसी तरह की प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। उन्होंने शमशेर की कुछ कम चर्चित कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनमें आत्मालोचना, द्वंद्व और मोह भी है।

आयोजन में कला आलोचक रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। यह व्याख्यान उनके चित्रों और कविताओं को समझने के लिहाज से काफी जानकारीपूर्ण था। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। शमशेर का गद्य भी महत्वपूर्ण है जो उनके चित्र और कविता को समझने में मदद करता है और उसी तरह चित्रकला उनकी कविता को समझने में मददगार है।

सुप्रसिद्ध चित्रकार-साहित्यकार अशोक भौमिक ने चित्रकला के जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं। इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।

सादतपुर में 21 नवंबर को नागार्जुन जन्‍मशती समोराह

नई दिल्‍ली : बाबा नागार्जुन की जन्‍मशती के अवसर पर सादतपुर में समोराह का अयोजन किया जा रहा है। प्रभातफेरी से शुरू होकर कार्यक्रम दिनभर चलेगा।

यह वर्ष हिंदी-उर्दू के कई बडे़ रचनाकारों का जन्‍मशती वर्ष है। इस संदर्भ में जनपक्षधर सरोकारों के लिए समादृत बाबा नागार्जुन का जन्‍मशती समारोह सादतपुर (नागार्जुन नगर) साहित्‍य समाज की ओर से 21 जून को जीवन ज्‍योति सीनियर सेकेंडरी स्‍कूल, सादतपुर विस्‍तार, करावलनगर रोड, दिल्‍ली में मनाया जा रहा है।

सुबह 7 बजे बाबा नागार्जुन के चित्रों/पोस्‍टरों और बैनरों सहित उनकी कविताओं का सस्‍वार पाठ करते प्रभात फेरी निकाली जाएगी।

मुख्‍य समारोह की शुरुआत दोपहर 2 बजे होगी। चर्चित चित्रकार हरिपाल त्‍यागी द्वारा निर्मित बाबा के कविता पोस्‍टरों तथा बाबा की पुस्‍तकों और उन पर केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं की प्रदर्शनी का उद्घाटन बाबा की पोती कणिका और कवि कुबेर दत्‍त करेंगे।

2.30 बजे हरिपाल त्‍यागी द्वारा रचित बाबा के तेलचित्र का अनावरण वरिष्‍ठ लेखक और बाबा के आत्‍मीय वाचस्‍पति करेंगे। विद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा सामुहिक गायन किया जाएगा। इसके बाद श्रीराम लेडी कॉलेज में लेक्‍चरार प्रीति प्रकाश प्रजापति बाबा नागार्जुन की कविता की संगीतबद्ध प्रस्‍तुति देंगी।

3 बजे विभिन्‍न रचनाकारों द्वारा बाबा की गद्य और पद्य रचनाओं से चुनिंदा अंशों का पाठ किया जाएगा। यह पाठ दिनेश कुमार शुक्‍ल, रामकुमार कृषक, लीलाधर मंडलोई, मणिकांत ठाकुर, भारतेंदु मिश्र, गंगेश गुंजन, अरविंद कुमार सिंह आदि वरिष्‍ठ लेखक/कवि करेंगे।

3.30 बजे बाबा को लेकर सादतपुरवासी अपने अनुभव साझा करेंगे और बाबा के महत्‍व और मूल्‍यांकन को रेखांकित किया जाएगा। इसमें विश्‍वनाथ त्रिपाठी, भगवान सिंह, विष्‍णुचंद्र शर्मा, रेखा अवस्‍थी, मैनेजर पांडेय, सुधीर विद्यार्थी आदि वरिष्‍ठ रचनाकारों के अलावा आम लोगों की भी भागेदारी होगी।

5 बजे चाय-नाश्‍ते के लिए विराम के बाद 5.30 बजे बाबा से संबंधित कुछ प्रस्‍तावों को रखा जाएगा। इसके साथ ही बाबा नागार्जुन पर केंद्रित साहित्‍य अकादमी और एनसीईआरटी द्वारा निर्मित फिल्‍मों का प्रदर्शन किया जाएगा।

इस संबंध में विस्‍तृत जानकारी के लिए मोबाइल नंबर 9868935366, 9810481433 पर संपर्क किया जा सकता है।