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वीरेन डंगवाल, हेमंत कुकरेती औए उस्मान खान का कविता पाठ 22 को

नई दिल्‍ली : इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा शुरू की गई काव्य-पाठ की कार्यक्रम-श्रृंखला ‘कवि के साथ’ के दूसरे आयोजन में 22 सितम्‍बर, 2011 को शाम सात बजे से कैजुरिना हॉल, इंडिया हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड, नई दिल्ली में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि वीरेन डंगवाल कविता पाठ करेंगे। उनके साथ युवा कवि हेमंत कुकरेती और उस्मान खान  भी अपनी कविताओं का पाठ करेंगे।

कवि और कविता से कविताप्रेमी हिंदी समाज का सीधा संपर्क-संवाद बढ़े, इसी उद्देश्य से शुरू किये गए इस कार्यक्रम का आयोजन हर दूसरे माह में हुआ करेगा। इसमें हर बार हिंदी कविता की दो पीढ़ियां एक साथ मंच पर होंगी। पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत कर सकेंगे।
तीनों कवियों की एक-एक कविता-

कुछ चीजें आती हैं एक साथ : उस्मान खान

जैसे कोई कहे – प्यार

तो किनारे पड़ी एक नाव में उतरी शाम और
जंगली फूलों का गुच्छा तोहफे में
उदास रतजगों के मोड़ पर
अकेला खड़ा नीम

जैसे कोई कहे – घर
तो सिलाई मशीन की घड़-घड़

डम्मर लगे तीर
दांत काटे सिक्के
रोज़गार कार्यालय के सामने खड़ा खजेला कुत्ता एक

जैसे कोई कहे – देश
तो श्मशान में एक इमली का पेड़
जिस्म से जान खेंचता चाँद
घर लौटी औरतें
और घर नहीं लौटी औरतें
जो कहा गया था
’सारे जहाँ से अच्छा’
उसके अलावा भी बहुत कुछ
एक साथ कौंध्ता है बहुत कुछ
हालाँकि,
पर्यायवाची नहीं !

दुनिया का नागरिक : हेमन्त कुकरेती

मैं दुनिया का नागरिक हूँ

यह देश मेरा निवास है

मुझमें पराजय का क्रोध है
और लड़ने की हमेशा बची इच्‍छा

जब हम इतने अलग हैं
तो प्रेम कैसा ?

जब एक नहीं हैं तो किसका
यह देश और इसका प्रेम ?

जो ऐसे प्रेम के नाम पर दी जाती है
मैं उस यातना के खिलाफ हूँ

मैं जीवित हूँ कि सोचता भी हूँ
दूसरे के समान जीवन
जीने के बारे में।

कुछ कद्दू चमकाए मैंने : वीरेन डंगवाल

कुछ कद्दू चमकाए मैंने
कुछ रास्तों को गुलज़ार किया
कुछ कविता-टविता लिख दी तो
हफ़्ते भर ख़ुद को प्यार किया

अब हुई रात अपना ही दिल सीने में भींचे बैठा हूँ
हाँ जीं हाँ वही कनफटा हूँ, हेठा हूँ
टेलीफ़ोन की बग़ल में लेटा हूँ
रोता हूँ धोता हूँ रोता-रोता धोता हूँ
तुम्हारे कपड़ों से ख़ून के निशाँ धोता हूँ

जो न होना था वही सब हुवाँ-हुवाँ
अलबत्ता उधर गहरा खड्ड था इधर सूखा कुआँ
हरदोई मे जीन्स पहनी बेटी को देख
प्रमुदित हुई कमला बुआ

तब रमीज़ कुरैशी का हाल ये था
कि बम फोड़ा जेल गया
वियतनाम विजय की ख़ुशी में
कचहरी पर अकेले ही नारे लगाए
चाय की दुकान खोली
जनता पार्टी में गया वहाँ भी भूखा मरा
बिलाया जाने कहॉं

उसके कई साथी इन दिनों टीवी पर चमकते हैं
मगर दिल हमारे उसी के लिए सुलगते हैं

हाँ जीं कामरेड कज्जी मज़े में हैं
पहनने लगे है इधर अच्छी काट के कपडे
राजा और प्रजा दोनों की भाषा जानते हैं
और दोनों का ही प्रयोग करते हैं अवसरानुसार
काल और स्थान के साथ उनके संकलन त्रय के दो उदहारण
उनकी ही भाषा में :

” रहे न कोई तलब कोई तिश्नगी बाकी
बढ़ा के हाथ दे दो बूँद भर हमे साकी ”
“मजे का बखत है तो इसमे हैरानी क्या है
हमें भी कल्लैन द्यो मज्जा परेसानी क्या है ”

अनिद्रा की रेत पर तड़ पड़ तड़पती रात
रह गई है रह गई है अभी कहने से
सबसे ज़रूरी बात।


भीमसेन जोशी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता : जसम

संगीतज्ञों में शहंशाह भीमसेन जोशी ने सोमवार को पुणे में 89  बरस की उम्र में आखीरी सांसे लीं। अपने धीरोदात्त, मेघ-मन्द्र स्वर के सम्मोहन में पिछले  60 सालों से भी ज़्यादा समय से संगीत विशेषज्ञों और सामान्य लोगों को एक साथ बांधे रखनेवाले जोशी जी संभवत: आज की दुनिया के महानतम गायक थे। वे सचमुच भारत रत्न थे। जन संस्कृति मंच उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करता हे और उस महान साधक को अपनी श्रद्धांजलि भी।
जोशी जी  4 फरवरी, 1922 को कर्नाटक के गदग, (धारवाड़)  में जन्में थे। उन्हें भारत रत्न (2008) , तानसेन सम्मान (1992) , पद्म भूषन (1985) , संगीत के लिए संगीत नाटक एकेडमी पुरस्कार (1975)  और पद्मश्री (1972)  समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था। उन्होंने अपनी अंतिम प्रस्तुति 2007 में सवाई गन्धर्व महोत्सव में दी। अब्दुल करीम खान के शिष्य सवाई गन्धर्व उनके गुरु थे और जोशी जी उनकी याद में हर साल पुणे में संगीत सम्मलेन आयोजित करवाते थे।
शुरू से ही जोशी जी यायावर थे। तीन साल की उम्र के जोशी जी घर से गायब हों या तो मुआज्ज़िन की अज़ान की नक़ल करते या फिर किसी मंदिर में ‘हवेली संगीत’ सुनते पाए जाते। किराना घराने के उस्ताद अब्दुल करीम खान का गाया राग झिंझोटी रेडियो पर सुना और 11 साल की उम्र में घर छोड़ गुरु की तलाश में उत्तर की और निकल भागे। बिना पैसे के खड़गपुर, कोलकाता, दिल्ली घूमते-घामते जालंधर पहुंचे और फिर वहां से सलाह मिली कि अब्दुल करीम खान साहब के प्रखर शिष्य सवाई गन्धर्व से सीखो। इस दौरान उन्होंने कई तरह के काम किये। अंततः उन्हें गुरु मिले सवाई गन्धर्व।
हिन्दुस्तानी के साथ ही मराठी और कन्नड़ संगीत में भी उनके योगदान को कभी भुलाया न जा सकेगा।  शास्त्रीय संगीत को जनप्रिय बना देने की उनमें अद्भुत सलाहियत थी। तुकाराम सहित ढेरों भक्त कवियों की कविताओं को उन्होंने संगीत में पिरोकर श्रोताओं का मान उन्नत करने का यत्न किया। उनके लिए शास्त्रीय संगीत कोई उच्च भ्रू विशिष्टों की जागीर न था। शास्त्रीय संगीत के दरवाज़े उन्होंने आम इनसान के लिए खोल दिए थे।
जोशी जी की सांगीतिक प्रतिभा बहुआयामी थी। उन्होंने फिल्मों के लिए भी कुछ गाने गाये, भजन गाये, और शास्त्रीय संगीत तो खैर उनका अपना घर ही था। किराना घराने की उस्ताद अब्दुल करीम खान साहब से चली आ रही परम्परा में जोशी जी ने बहुत कुछ जोड़ा। घरानों की शुद्धता के नियम के वह कभी आग्रही नहीं रहे।  दरअसल किराना घराने के तो वह उस्ताद थे ही, पर अपनी गुरु बहन गंगूबाई हंगल से अलग, दूसरी रंगत और घरानों के प्रभाव भी उनकी गायकी में घुल-मिल जाते हैं। उनका मानना था कि  एक शिष्य को गुरु की दूसरे दर्जे की नक़ल करने की बजाय उसके गायन को विकसित करने वाला होना चाहिए। उनके गायन में कहीं सवाई गन्धर्व और रोशन आरा बेगम का असर है तो कहीं मल्लिकार्जुन मंसूरऔर केसरी बाई का। ऐसा मानते हैं कि जोशी जी की सा (षडज) की अदायगी में केसरीबाई का काफी असर है। जोशी जी अपनी शैली से भी लगातार लड़ते रहे,  विकसित  करते रहे। इसी जज्बे और संशोधनों का प्रमाण है कि किराना घराने की लम्बी परम्परा में सिर्फ उन्होंने ही राग रामकली को गाने की हिम्मत की।
उदात्तता से भरी उनकी मंद्र आवाज़ में जबरदस्त ताकत थी। पौरुषेय ताकत जिसका अपना एक अलग सौंदर्य होता है। बावजूद इसके कि वह हिन्दुस्तान के सबसे बड़े शास्त्रीय संगीतकारों में शुमार किये जाते थे,  जोशी जी की खासियत स्वरों के मूल स्वरूप पर उनकी अद्भुत पकड़ थी। अपने अंतिम दिनों के एक इंटरव्यू में भी उन्होंने रोजाना लम्बे रियाज की बात तस्लीम की थी।  मज़ाक में अपने को संगीत का  हाई कमिश्नर कहने वाले जोशी जी सच में इस ओहदे से कहीं जियादा के हकदार थे, कहीं बड़ी शख्सियत थे । हिंदी की दुनिया की तरफ से श्रद्धांजलि स्वरूप  उनपर लिखी हिन्दी कवि वीरेन डंगवाल की कविता प्रस्तुत है-
भीमसेन जोशी
मैं चुटकी में भर के उठाता हूँ
पानी की एक ओर-छोर डोर नदी से
आहिस्ता
अपने सर के भी ऊपर तक
आलिंगन में भर लेता हूँ मैं
सबसे नटखट समुद्री हवा को
अभी अभी चूम ली हैं मैंने
पांच उसाँसे रेगिस्तानों की
गुजिशता  रातों की सत्रह करवटें
ये लो
यह उड़ चली 120 की रफ़्तार से
इतनी प्राचीन मोटरकार
यह सब रियाज़ के दम पर सखी
या सिर्फ रियाज़ के दम पर नहीं!
(जन संस्कृति मंच की और से प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

शमशेर की कवि‍ता में प्राइवेट-पब्‍लि‍क के बीच अंतराल नहीं : डंगवाल

नई दि‍ल्‍ली: शमशेर अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। उनसे हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से वाबस्ता रहने की सीख मिली। 21 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय शमशेर जन्मशती समारोह में ‘शमशेर और मेरा कविकर्म’ नामक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चर्चित कवि वीरेन डंगवाल ने यह बात कही। इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया, जिसमें उनके समकालीन कई कवियों ने उनकी कविता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे।

कवि अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छुने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। कवि मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी प्रेम कविताओं में अमूर्तन है। त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को संवेदना को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर बेहद उदार और जनपक्षधर थे। स्वप्न और यथार्थ की उनकी कविताओं में गहरा मेल दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी पक्षधरता थी और स्त्री की स्वतंत्र बनाने पर उनका जोर था। उनके प्रभाव से उनका कविता,  मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है,  उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। इसके साथ ही पार्टी और व्यक्ति का द्वंद्व भी। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। यद्यपि नागार्जुन के बाद उनकी कविता के सर्वाधिक पोस्टर बने, लेकिन वे जनसंघर्षों के नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद की मुक्ति के आनंद के कवि हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत शमशेर द्वारा पढ़ी गई उनकी कविताओं के वीडियो के प्रदर्शन से हुई। काव्यपाठ की अध्यक्षता इब्बार रब्बी और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दि‍न 22 जनवरी को आयोजि‍त कार्यक्रम कर अध्‍यक्षता करते हुए चर्चित मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि‍ शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं,  जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि‍ प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैरप्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है।

साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी़ विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे। गद्य ही सीमाएं को तोड़ता हैं। इसे मुक्ति का माध्यम समझना चाहिए।

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है।

इलाहाबाद से आए आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। कवि-आलोचक सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

युवा कथाकार अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है,  इस ओर वह बार-बार संकेत करते हैं। युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानीयत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है,  जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। कवि-पत्रकार अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया। हालिया प्रकाशित दूधनाथ सिंह द्वारा संपादित संस्मरणों की किताब के फ्लैप पर अज्ञेय की टिप्पणी को उन्होंने इसी तरह की प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। उन्होंने शमशेर की कुछ कम चर्चित कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनमें आत्मालोचना, द्वंद्व और मोह भी है।

आयोजन में कला आलोचक रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। यह व्याख्यान उनके चित्रों और कविताओं को समझने के लिहाज से काफी जानकारीपूर्ण था। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। शमशेर का गद्य भी महत्वपूर्ण है जो उनके चित्र और कविता को समझने में मदद करता है और उसी तरह चित्रकला उनकी कविता को समझने में मददगार है।

सुप्रसिद्ध चित्रकार-साहित्यकार अशोक भौमिक ने चित्रकला के जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं। इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।

गाजियाबाद में काव्य गोष्ठी 19 को

गाजियाबाद: लिखावट की ओर से घर-घर कविता के तहत 19 सितंबर को शाम पांच बजे डी-106, सैक्टर-9, न्यू विजय नगर, गाजियाबाद में सामूहिक कविता पाठ का आयोजन किया जा रहा है। वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, मिथिलेश श्रीवास्तव, आर. चेतनक्रांति, विनीत तिवारी और रंजीत वर्मा काव्य पाठ करेंगे। आयोजन श्रीमति प्रोमिला देवी माथुर की स्मृति को समर्पित है।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार भीमसेन त्यागी की स्मृति में लेखक-प्रकाशक मोहन गुप्त का संस्मरण पाठ व गिरीश चंद तिवाडी गिर्दा की स्मृति में सुश्री जया मेहता व अनुराग द्वारा उनकी कविताओं का पाठ भी किया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मिथिलेश श्रीवास्तव करेंगे। विस्तृत जानकारी के लिए मेजबानी कर रहे हैं पत्रकार संजीव माथुर से 9911646458 पर संपर्क कर सकते हैं।