
अधिकांश लोगों ने बचपन का वह दौर देखा होगा, जब गली-मुहल्ले में एक्का-दुक्का टीवी होती थी और उस पर कार्यक्रम देखने के लिए मन में बेचैनी। मेजबान के यहां भीड़ लग जाती थी। सिनेमा हॉल में फिल्म देखना तो उत्सव जैसा होता था। टीवी की घर-घर में पहुंच और मनोरंजन के अन्य साधनों के विकास ने उस दौर का अंत कर दिया। पटना के सिनेमा हॉल वैशाली के बहाने उस रोमांचकारी दौर और उसके अंत पर युवा कथाकार संजीव कुमार का स्मृति लेख-
Memory is the only one of our mental faculties that we accept as working normally when it malfunctions. -Mary Warnock
कम लोगों को पता होगा कि जिस प्रतिभाबहुल हिन्दी जगत ने एक ओर टेलीविजन के लिए दूरदर्शन, स्वीमिंग पूल के लिए तरण ताल- जैसे शब्द गढ़े और दूसरी ओर इंस्पेक्टर के लिए निसपिटर (नासपिटा के ध्वनिसाम्य पर), लॉर्ड के लिए लाट, अल्युमिनियम के लिए ललमुनियाँ इत्यादि का आविष्कार किया, उसी ने इन दोनों परम्पराओं को मिलाते हुए मूवीज-टॉकीज यानी चलती बोलती तस्वीरों (के प्रदर्शन की जगह) के लिए एक शब्द दिया है- चलन्तिका टीका। बदकिस्मती से यह शब्द खुद अचलन्तिका साबित हुआ, पर बिहार के बेगूसराय शहर से सम्बन्ध रखने वाले लोग वहां के ऐतिहासिक सिनेमाघर ‘श्री कृष्ण चलन्तिका टीका’ के कारण इससे परिचित हैं, भले ही वे इसे जातिवाचक संज्ञा न मानते हों। वैसे भी यह मानने से ज्यादा जानने या पहचानने का मामला है और मेरी महीन मेधा का साधुवाद कीजिए, जिसने पहली ही भिड़न्त में इसकी जातिवाचकता को पहचान लिया। तब से जो भी सिनेमाघर मुझे अपना-सा लगा, उसे मैंने इस श्रुतिमधुर कुलनाम के साथ ही पुकारा है। यह सब सिर्फ इसलिए बता रहा हूँ, ताकि आप मानस चलन्तिका टीका को रामचरितमानस का कोई चलताऊ किंवा प्रचलित भाष्य न समझ बैठें। यह तो कोटि-कोटि कविआए हुए जनों द्वारा कोटिशः प्रयुक्त रूपक अलंकार की एक और आजमाइश भर है। मानस चलन्तिका टीका- यानी मनरूपी टॉकीज। …फिलहाल इसके मटमैले पर्दे पर स्मृति के मायावी प्रोजेक्टर से प्रक्षेपित एक और चलन्तिका टीका- वैशाली- की दास्तान देख-सुन रहा हूँ, जाहिर है, सुनाने के लोभ से। मूल में यह दास्तान काफी-कुछ धुँधली और सम्बन्ध-व्यवस्था-रहित है और इस लिहाज से शायद वह दास्तान है ही नहीं। दिक्कत ये है कि उस धुन्ध और अव्यवस्था को दूर किये बगैर सुनाने का काम हो नहीं सकता। इसलिए कुछ तो उस मायावी प्रोजेक्टर के चलते जो माध्यम होने के साथ-साथ बहुधा हमारी जरूरत को भाँप कर सम्पादक और सर्जक की भूमिका अख्तियार कर लेता है और कुछ मेरी सचेत कोशिशों के चलते, अपने शब्दावतार में यह दास्तान काफी हद तक सुसम्बद्ध दिखलाई पड़ेगी।
काश, स्मृति मूलतः इतनी व्यवस्था-प्रिय होती!
अब याद नहीं कि वह खबरनवीस कौन था, जिसने हमारी सांध्य सभा में यह स्कूप पेश किया कि ‘कौमनिटी सेंटर के पिछुअत्ती ए गो हॉल बनेगा।’ पटना में उन दिनों सिर्फ ‘हॉल’ कहा जाय, तो मतलब होता था, सिनेमा हॉल। दूसरे स्थानों और कालों में भी यह मतलब होता होगा, पर शायद तभी जब इस शब्द के प्रयोग का सन्दर्भ स्पष्ट हो। मसलन ‘फलाँ फिल्म किस हॉल में चल रही है?’ मैं जिस भाषिक व्यवहार की बात कर रहा हूँ, उसमें बिना किसी स्पष्ट सन्दर्भ के भी ‘हॉल’ का मतलब सिनेमा हॉल ही होता है या कहिए, होता था। यह शायद उस ठिगने शहर का अपना तरीका था, सिनेमा घरों की विराटता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का। चारमंजिला इमारतें तक उन दिनों मुश्किल से मिलती थीं और हमने सुन रखा था कि बम्बई में पच्चीसवीं मंजिल पर रहने वालों के घरों में ऑक्सीजन का सिलेण्डर, एहतियातन, हमेशा मौजूद रहता है। इस सुनावत पर भरोसा न करने की कोई वजह नहीं थी। हम पढ़े-लिखे बालक थे और हमें पता था कि ऊँचाई के साथ-साथ वायुमण्डल विरल होता जाता है।
बहरहाल, ‘हॉल बनेगा’ की खुशी को अभी हम सहेज भी नहीं पाये थे कि खबरनवीस ने एक झटका दिया, गोया चुम्बन के बाद चाँटा, बकौल राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह। बताया, ‘बनेगा, बकी अभी टाइम लगेगा। रिजर्व बैंक वाला लोग केस कर दिया है कि हमारा क्वार्टर के सामने हॉल नहीं बनना चाहिए। फैमिली वाला जगह है ना! हॉल बनने से त लफुआ सब का जुटान होने लगेगा।’ रिजर्व बैंक वालों का इस तरह राजेन्द्र नगर की महान सांस्कृतिक उपलब्धि के आड़े आना हम सभी को बेहद नागवार गुजरा। हमने सर्वसम्मति से इस लोकोक्ति को दुहराया कि ऊपर वाला सब कुछ देखता है; उसके यहां देर है, अन्धेर नहीं। दो एक ने तो लगे हाथ कभी उस बैंक में खाता न खुलवाने की कसम खा ली और मेरी पक्की जानकारी है कि वे आज तक इसपर अडिग हैं।
अन्धेर सचमुच नहीं था। रिजर्व बैंक क्वार्टर्स वाले केस हार गये। ऐसा कुछ हकीकत में हुआ था या कि अफसानों और अफवाहों में ही केस लड़ा भी गया और जीता-हारा भी गया, मैं नहीं जानता। पर यह सच है कि कुछ समय बाद हॉल बनने की शुरुआत हो गई। यह सन् 75-77 की बात रही होगी, जब सम्पूर्ण क्रान्ति की लहर के साथ शहर के तमाम लफंगों ने अपने को क्रान्तिकारियों में शुमार करा लिया था और प्रतिक्रिया में भद्र समाज का एक बड़ा हिस्सा तमाम क्रान्तिकारियों को लफंगों में शुमार करने लगा था। हॉल बनने की शुरुआत का जब समाचार मिला, तो हममें से कइयों ने क्रान्तिकारी लफंगों और लफंगे क्रान्तिकारियों के मुँह से सुनी हुई बात ‘जे.पी. जिन्दाबाद’ का उद्घोष किया। उत्साह के भाव को रसदशा तक पहुँचाने का यह माना हुआ तरीका था। एक मित्र ने तो, जो उम्र में मुझसे तीन-चार साल बड़ा यानी चौदह-पन्द्रह की लपेट में रहा होगा, उत्साह में कदमकुआँ थाने के गेट पर खड़े बन्दूकधारी सिपाही को मामू कह कर हुलका दिया और फिर यज्जा-वज्जा-शैली में भाग खड़ा हुआ। यह भी इमरजेंसी के दौर में उत्साह व्यक्त करने की एक लोकप्रिय पद्धति थी। इसी में कभी तथाकथित मामू पीछे पड़ जाय, तो पद्धति जरा महंगी पड़ती थी। उस दिन भी हममें से एक को मुखबिर बना कर मामू ने उत्साही बालक पुन्नू का घर खोज ही लिया। फिर उसे यह समझाने में पुन्नू के घरवालों को खासी मिहनत करनी पड़ी कि लड़का हॉल के साइड यानी साइट पर गया हुआ था और उसका काम चालू देखकर उत्साह में आ गया था। फिर जो हुआ, वह तो स्वाभाविक ही था। इसमें लड़के का क्या कसूर!
बात वाजिब थी। हमारे इलाके को एक सिनेमा हॉल की जितनी सख्त जरूरत थी और हॉल बनने की उम्मीद जगते ही इस जरूरत को जितनी शिद्दत से महसूस किया जाने लगा था, उसे देखते हुए पुन्नू का उत्साह और तज्जनित कर्म अनुचित नहीं था। उत्साह के कारणों की चर्चा आगे सविस्तार होगी; जहाँ तक तज्जनित कर्म का सवाल है, वह दौरे-जहाँ से मिली हुई एक रस्म की अदायगी भर थी, कोई मौलिक उद्भावना नहीं। इसके लिए भला एक बालक को कसूरवार कैसे ठहराया जाता! दौरे-जहाँ का करिश्मा क्या था, यह इससे समझिए कि पप्पू के छोटे भाई (प.छो.भा.) ने, जो उन दिनों बोलना सीख ही रहा था, राइम-रटन्त की शुरुआत ‘जानी जानी यस पापा’ या ‘मछली जल की रानी है’ की जगह ‘देवकान्त बरुआ, इन्दू जी के…..(तुक मिलाएँ!)’ से की थी और वह भी बिना किसी के सिखाए। उम्र के थोड़े फर्क के बावजूद हमारी पीढ़ी की हालत कमोबेश प.छो.भा. जैसी ही थी। हमें भी न तो उस उथल-पुथल के टुच्चेपन की समझ थी, न ही उसके औदात्य की। तभी तो रात के आठ बजे जब हमारी गली से सौ कदम के फासले पर स्थित लोकनायक जयप्रकाश के आवास से थाली और कनस्तर बजने की आवाजें आनी शुरू होतीं और चन्द मिनटों कि भीतर पूरा पटना शहर थालियों और कनस्तरों की ढनढनाहट से गूँजने लगता, तब उसे प्रतिरोध का दिगन्तव्यापी नाद मान कर नहीं, बड़ों के बचपने का इजहार मान कर हमारी खुशी सारे बाँध तोड़ने लगती थी। हम उसमें काफी बढ़-चढ़ कर योगदान करते थे, जिसे आज आप चाहें तो प्रतिरोध के कोरस में हमारा ऐतिहासिक योगदान कह सकते हैं, पर जिसके पीछे हमारी प्रेरणा निहायत क्षणवादी होती थी। क्षणों में जीने की यह संकीर्णता एक बार खासी मंहगी पड़ी थी, जब रसोईघर से थाली-कनस्तर की मांग पर दुत्कारे जाने के बाद हमारे समवयस्क, तथापि आदरणीय मित्र मनोज जी ने हड़बड़ी में बिजली के खम्भे को लोहे की छड़ से पीटना शुरू किया और ऊपर तारों के जमघट में कुछ ऐसी सम्पूर्ण क्रान्ति मची कि आसपास के तीन-चार घरों में रातभर के लिए बत्ती गुल हो गई।
तो कहना ये है कि हम नादान बालक थे और हमारे प्रतिनिधि पुन्नू की कारस्तानी प.छो.भा. की राइम-रटन्त जितनी ही निष्पाप थी। हमें तो यह पता भी नहीं था कि सिपाही को मामू क्यों कहा जाता है। आज सोचता हूँ, तो इसका सम्बन्ध उस लोकविश्वास के साथ जान पड़ता है, जिसके अनुसार भान्जे को पीटने वाले के हाथ बुढ़ापे में कांपते हैं। उन दिनों पुलिस वालों से आन्दोलनकारियों की मुठभेड़ें अक्सर हुआ करती थीं। ऐसी ही किसी घातक रूप से मजेदार मुठभेड़ में किसी लाठी खाते आन्दोलनकारी ने किसी लाठी भाँजते सिपाही को मामू कह कर उस लोकविश्वास का लाभ उठाने की कोशिश की होगी। तभी से यह मजाक चल पड़ा होगा और उत्साह के हर मौके को घातक रूप से मजेदार बनाने के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा होगा।
इस विषयान्तर के बाद अब चर्चा उस उत्साह के कारण, यानी हमारी जरूरतमन्दगी की! उस समय तक पटना शहर के सभी सिनेमाघर गांधी मैदान और रेलवे स्टेशन के आसपास थे। ये जगहें तब की यातायात सुविधाओं को देखते हुए हमारे इलाके से दूर पड़ती थीं। इससे हमें जो घाटे होते थे, वे इस प्रकार हैं- 1. अगर अभिभावकों से छुप कर फिल्म देखनी हो, तो तीन की बजाय साढ़े चार घण्टे घर से गायब रहना पड़ता था, जिसमे रिस्क ड्योढ़ा था। 2. अगर अनुमति लेकर फिल्म देखना चाहें, तो दूरी के नाम पर आवेदन को टाला जाता था। मसलन, ‘अगले महीने चाचा आयेंगे, तब उनके साथ जाना।’ और 3. सिनेमाघरों के शो-केस में लगे ‘स्टिल्स’ को देखने-जैसे छोटे, किन्तु अनिवार्य कार्य के लिए इतनी दूरी तय करनी पड़ती थी। ये सभी घाटे उस इलाके में रहने के चलते हमें उठाने पड़ते थे, जो उस समय से एकाध दशक पहले तक पटना का एक छोर हुआ करता था। राजेन्द्र नगर को छूती हुई रेलवे लाइन गुजरती थी और उसके बाद बाइपास। यही पटना की दक्षिणी सीमा थी, हमारे होश सम्भालने से पहले तक, ऐसा हमने सून रखा था। हमारे होशमन्द होते-होते बाइपास के उस पार कंकड़बाग नामक एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी तेजी से बसने लगी थी। कंकड़बाग का अतीत, वर्तमान और भविष्य हमारे इलाके के मध्यवर्गीय घरों में अक्सर चर्चा का विषय हुआ करता था। वहां जमीन ले चुके लोग किराये के मकान में रहने वाले अपने ऐसे परिचितों पर तरस खाते थे, जो वहां एक कट्ठा जमीन तक नहीं ले सके और वहां जमीन न ले पाने वाले यह कहकर अपनी तकदीर को कोसते थे कि जब हजार रुपये कट्ठा जमीन मिल रही थी, तब यह सोच कर नहीं ली कि कौन जायेगा उस उजाड़ में रहने! ‘मति मारी गयी थी’- ऐसा यथार्थवादियों का निष्कर्ष होता और ‘भगवान को मंजूर नहीं था’- इस पर वे पहुँचते, जो अपनी मति का सम्मान बचने के लिए यथार्थवाद से दूर हट गये थे। ढेर सारी भविष्यवाणियों के हवाले से तरस खाने और ढेर सारी विगत परिस्थितियों के हवाले से अफसोस करने का यह चलन बड़ों की बैठकों से इतना हावी था कि हमारी किशोर पीढ़ी को जब परिपक्व बातचीत का शौक चर्राता, तो हम इमरजेंसी की खूबियों-खामियों पर चर्चा करने के साथ-साथ ‘कंकड़बाग में जमीन की खरीद-फरोख्त उर्फ क्या से क्या हो गया’ को भी अपना विषय बनाते थे। वैसे सच पूछा जाय, तो हम कभी इस बात के कायल नहीं हो पाये कि किसी भले आदमी को कंकड़बाग में जा बसना चाहिए। हमें तब किसी ने यह नहीं बतलाया था कि कंकड़बाग न बस रहा होता, तो हमारे इलाके को सिनेमाघर का उपहार भी नहीं मिलता। उसके बसने के साथ-साथ शहर का केन्द्र हमारी ओर खिसकता आ रहा था और सिनेमाघर की योजना राजेन्द्र नगर के इसी नये स्टेटस का नतीजा थी। अगर बाइपास, जिसका नाम अब पुराना बाइपास हो चुका है, के पार खेत ही खेत होते, तो उससे पचास कदम इधर सिनेमाघर बनाने का ख्याल किसी के दिमाग में भला क्यों आता! इस तरह हमें कंकड़बाग का अहसानमन्द होना चाहिए था, जो कि अज्ञानवश हम नहीं थे।
चर्चा सिनेमाघर की जरूरत पर चल रही थी। तो उसका ऐसा है कि वह सिर्फ हम किशोरों को ही नहीं, हमारे माता-पिताओं को भी थी। सिनेमा मनोरंजन का मुख्य, बल्कि अपने तरह का एकमात्र साधन था और आसपास हॉल न होने की स्थिति में रिक्शा-भाड़ा इत्यादि मिलाकर मामला खासा खर्चीला पड़ जाता था। नौटंकी या फगुआ-चैती- जैसे सामूहिक गान से अपना मनोरंजन करना या किसी की दालान पर घण्टों बैठकी मारना सम्भव नहीं था, क्योंकि आखिर शहरीपन भी कोई चीज है। यह सही है कि बगल के ही इलाके लोहानीपुर में यह शहरीपन नदारद था, पर हमारे थ्री स्टार मुहल्ले में इस चीज की खासी पूछ थी। मानसिकता के स्तर पर उसकी पूछ न भी होती, तो वस्तुगत परिस्थितियों मे वह शहरीपन विद्यमान था। सिन्धियों, पंजाबियों, मारवाड़ियों और बंगालियों के कई परिवार हमारे मुहल्ले में रहते थे। आज तख़्मीना करने बैठता हूँ, तो थोड़ी हैरत होती है कि यह प्रेम-प्रिपासु उस उम्र में जब-जब दिल के हाथों लाचार हुआ, उसकी वजह कोई-न-कोई पंजाबन या बंगालन थी। बिहारी परिवारों में भी कोई भोजपुरी भाषी इलाके से आता था, कोई मिथिलान्चल से। इन सब तरह के बाशिन्दों के बीच कोई कौटुम्बिक या पीढ़ीगत रिश्ता हाने का सवाल ही नहीं था। इनके बीच पुश्तों के साझा अनुभव नहीं थे, एक-जैसा पेशा नहीं था, एक-जैसी नियति नहीं थी। ऐसे में शहरीपन उनका शौक ही नहीं, उनकी मजबूरी भी थी और मनबहलाव के गँवई साधन पूरी तरह उनकी पकड़ से छू चुके थे। बस ले-देकर एक सिनेमा का आसरा रह गया था। इसके अलावा रेडियो नाम की भी एक चीज हुआ करती थी, जिसके शॉर्ट वेव पर कोई मनचाहा स्टेशन पकड़वाने में तनी हुई रस्सी पर चलने का-सा अनुभव होता था। इसे सिनेमा के विकल्प की तरह इस्तेमाल करना वैसा ही था, जैसे विलायती शराब की कमी को देसी ठर्रे की बजाय चाय से पूरा करना। जहाँ तक टी.वी. का सवाल है, ये उसके तुतलाने के दिन थे। उसका सर्वभक्षी विस्तार अभी बहुत दूर की चीज थी।
सिनेमा हॉल बनने की शुरुआत के आसपास ही टी.वी. का प्रवेश हमारे इलाके में हुआ था। राजेन्द्र नगर रोड नं. 1 और 2 के जो मकान तिनकोनिया पार्क की परिधि में और उसके आसपास थे, उनमें से दो या तीन में ही टी.वी. सेट हुआ करता था। जिन-जिन घरों में यह बला थी, उनमें रविवार की शाम का तो आलम न पूछिए। बैठक में रखे सोफों-कुर्सियों को दीवार से लगा दिया जाता और बीच की जगह में जाजिम-चादर इत्यादि बिछा कर बीसियों लोगों के बैठने की व्यवस्था की जाती। अक्सर यह व्यवस्था नाकाफी साबित होती थी। इसलिए पाँच बजे से शुरू होने वाली फिल्म के लिए लोग साढ़े चार बजे से ही जगह लूटने लगते थे। अन्ततः फिल्म शुरू होने के समय तक बैठक में मुख्यधारा के समाज के अलावा एक हाशिए का समाज भी दिखलाई पड़ने लगता था, जिसमें सही समय पर न आने वाले आगन्तुकों के साथ-साथ मेजबान परिवार के सदस्य भी शामिल होते थें। यह हाशिए का समाज खिड़कियों पर चढ़ा, दीवारें के सहारे खड़ा या दरवाजे की चौखट में अड़ा नजर आता था।
मेजबान परिवार के सदस्यों को हाशिए की जगह मुख्यधारा में बैठ कर फिल्म देखने का मौका तभी मिलता था, जब कोई कला-फिल्म दिखलाई जा रही हो। पर, जाहिर है, इस मौके का भी वे पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। आध-पौन घण्टे में टी.वी. बन्द कर दी जाती और दूरदर्शन वालों केा गरियाने का अध्याय अगले ढाई घण्टे तक जारी रहता। कई बार तो ऐसी फिल्म की घोषणा होते ही लोग रविवार की शाम का कोई और कार्यक्रम तय कर लेते थे। मिसाल के लिए जिस रविवार को मणि कौल की ‘दुविधा’ आने वाली थी, उस शाम हमारे सभी महत्वपूर्ण ठिकानों पर ताला बन्द पाया गया या फिर यह सूचना मिली कि आज टी.वी. नहीं चलेगा। हार कर कला की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हम बालकों को एक घर की बरसाती में रहने वाले कुँवारे घोष बाबू के यहाँ पहुँचना पड़ा, जो ‘मिली’ फिल्म के बरसाती-वासी अमिताभ बच्चन की तरह ही पूरी दुनिया से कटे-कटे रहते थे। घोष बाबू ने बिना कोई खुशी या नाराजगी जाहिर किये हम लोगों को बरसाती में बिठाया ओर शुरुआती विज्ञापनों के बीच ही यह समझाया कि ‘फिलिम शमझने वाला है। आप लोक अगर हाल्ला मचाएगा, तो फिलिम का मैशेज शमझ नहीं पायेगा। इश्लिए इदर शान्ति शे…।’ हम लोगों ने यथासम्भव शान्ति से रहने की कोशिश भी की, लेकिन हम उत्तरोत्तर इस कोशिश में असफल होते गये। अब धुँधली-सी याद है कि पहली बार हम लोगों के मुँह से ‘फिक्क’-सी हँसी तब निकली, जब बैलों के गले की घण्टियों और पहिए की चर्रक-चूँ के साथ बहुत देर तक चलती रहने वाली बैलगाड़ी एक विशाल पेड़ के नीचे रुकी और नायक ने पर्दा हटाते हुए नायिका से पूछा, सम्भवतः उस फिल्म का पहला संवाद, ‘केले खाओगी?’ इस हँसी से आगे बढ़ते-बढ़ते हम इस हद तक गये कि नायक को देवानन्द का नौकर और नायिका को हेमा मालिनी की आया घोषित करते हुए कहकहे लगाने लगे। ठीक इसी समय घोष बाबू ने उठ कर टी.वी. बन्द कर दिया और हम उनके कूचे से बेआबरु होकर निकले। बाहर हम लोगों के बीच यह मुद्दा बहस तलब बना कि घोष बाबू ने ऐसा हमारी हरकतों से ऊब कर किया था या फिल्म से ऊब कर?
उपर्युक्त प्रकरण से यह स्पष्ट है कि रविवार की फिल्म देखने के मामले में हम बालकों और किशोरों का हुजूम रिश्ते की नजदीकी-दूरी या परिचय-अपरिचय की परवाह नहीं करता था। हम अँगुली पकड़ कर पहुंचा पकड़ने वाले लोग थे। जहाँ थोड़ी-सी गुंजाइश दिखी, हम वहाँ पूरा कब्जा जमा लेते। पर लड़कियों और माता-पिताओं की स्थिति ऐसी नहीं थी। माता-पिता तो हमारी तरह किसी भी घर में घुस जाने का गँवारपन दिखला नहीं सकते थे और जहाँ तक लड़कियों का सवाल था, उन्हें माता-पिता की निगाहों के सामने ही रहना था, इसलिए जहाँ वो नहीं, वहाँ ये नहीं। यों शहरीपन और गँवारपन की समझ हममें भी थी, लेकिन इस समझ की बिना पर मुफ्त की फिल्म देखने का लोभ संवरण करना हमें ज्यादती लगती थी। इस प्रकार लज्जा और लोभ में से बुजुर्ग लोभ का गला घोंटते थे, हम लज्जा का। और लड़कियाँ? मेरा अन्दाजा है कि हर रविवार की शाम उनमें से ज्यादातर खुद अपना गला घोंटने की नाकाम कोशिश करती थीं।
तो ये था वह पूरा सांस्कृति परिदृश्य, जिसके बीच रख कर आपको वैशाली सिनेमा हॉल के महत्व और उससे जुड़ी हमारी उत्तेजना को समझना होगा। जी हाँ, यही नाम था उसका, जो हमने तब जाना, जब पहली बार उसके प्रस्वावित निर्माण-स्थल पर गये। केस, हकीकत या अफसाने में, तब चल ही रहा था। इसलिए हॉल बनने की शुरुआत नहीं हुई थी। सिर्फ एक बड़ा-सा बोर्ड लगा था, जिस पर आर्किटेक्ट की कल्पना तस्वीर मे उतारी गई थी। इस तस्वीर में सब कुछ निहायत भव्य और सुन्दर था, पर सबसे खूबसूरत थी उस नाम की लिखावट, जो भवन के दाहिने हिस्से में उसके शिखर पर मुकुट की तरह सजा हुआ था। तस्वीर को देख कर हम सभी गौरवान्वित हुए, क्योंकि यह वह चीज थी, जो ठीक हमारे मुहल्ले के मुहाने पर बनने जा रही थी। फिर तो जब-जब हम सामूहिक स्तर पर आत्मगौरव की थोड़ी भी कमी महसूस करते, उस साइट पर जाकर तस्वीर को देख आते थे। स्टे-आर्डर हटने के बाद जब काम की शुरुआत हो गई, तब उस धूल-धक्कड़ में भी हमारा जाना-आना लगा रहा। उस प्रकार आप कह सकते हैं कि हमारी अनवरत देख-रेख में वैशाली का निर्माण-कार्य सम्पन्न हुआ।
वैशाली के बनने के साथ-साथ उसके आसपास कई चीजें बन रही थीं। बात ये थी कि रेलवे क्रासिंग की ओर जाती सड़क का वह हिस्सा अब तक थोड़ा वीराना-सा था, पर हॉल बनने की शुरुआत होते ही दूकानों और ढाबों की तादाद भी बढ़ने लगी। इस तरह काम पूरा होते-होते उस जगह की शक्ल काफी बदल चूकी थी। बाद के दौर में सब्जियों की खरीददारी में बचाये गये पैसे से चाट, समोसा, मसाला डोसा इत्यादि खाना होता, तो हम उत्तर में नाला रोड तक जाने की बजाय दक्षिण में वैशाली तक जाना पसन्द करते थे। आखिर नाला रोड हमारे होश सम्भालने के पहले से ही जमा-जमाया बाजार क्षेत्र था, जबकि वैशाली और उसके आजू-बाजू का पूरा विकास हमारी देख-रेख में हुआ था!
खैर! वैशाली बनकर खड़ी हो गई, तब उसके मुहूर्त का दिन तय हुआ और हम लोग उत्सुकतापूर्वक इन्तजार करने लगे कि देखें, कौन-सी फिल्म लगती है! हमारी उत्सुकता की तान निराशा पर टूटी, जब उसका उद्घाटन महान सामाजिक फिल्म ‘आनन्द आश्रम’ से हुआ। फिर हमारे ही बीच के किसी परिपक्व दिमाग ने सुझाया कि जब शुरू के कुछ दिन वैसे ही हाउसफुल जाने हैं, तो हॉल-मालिक क्या बेवफूक है, जो ‘आनन्द आश्रम’ की जगह ‘डॉन’ के चक्कर में पड़े। इस सूझ से हमारी निराशा दूर हुई। किन्तु निराशा पर यह विजय बहुत टिकाऊ नहीं थी। हमने पाया कि एक-के-बाद-एक महान सामाजिक या महान फ्लॉप फिल्में हमारी इस महान उपलब्धि पर हावी हैं। भूले-भटके कभी चर्चित फिल्म लग जाती थी। वह भी ज्यादातर गांधी मैदान के पास के किसी हॉल का शुरुआती हंगामा बाँटने के लिए। ऐसी फिल्म आमतौर पर दो हफ्ते के लिए लगाई जाती और हाउसफुल रहते हुए ही उतर भी जाती थीं। बहुत कम हिट फिल्में ऐसी रही होंगी, जो अकेले वैशाली के हिस्से आयी हों। इसमें हमें कोई सन्देह नहीं था कि वैशाली पटना का सबसे उम्दा हॉल है। पहली बार 70 एम.एम. स्क्रीन, पहली बार स्टीरियो साउण्ड ट्रैक, सबसे बड़ा और खुला हुआ परिसर। ‘एलिफिन्सटन’ की लॉबी में जहाँ ब्लीचिंग पाउडर की गन्ध थी, वहीं वैशाली की लॉबी में मशीन से भूने जाते पॉपकार्न और बढ़िया इत्र की मिली-जुली खुशबू बसी हुई थी। इन सबके बावजूद ‘जानी दुश्मन’, ‘कुर्बानी’, ‘हिम्मतवाला’, ‘मुकद्दर का सिकन्दर’- जैसी फिल्में उसकी किस्मत में कम ही आती थीं और वह भी ज्यादातर एलिफिन्सटन, वीणा, अशोक या अप्सरा की थाली से फेंके गये टुकड़े की तरह। वजह शायद ये रही हो कि व्यावसायिक केन्द्रों के आसपास सिनेमाघरों के जो दो गुच्छे थे, उनसे छिटक कर वह एक रिहायशी इलाके में अलग-थलग पड़ी थी। किसी सुपरहिट फिल्म को अकेले उसके भरोसे छोड़े देने में वितरक पचास बार सोचते होंगे। मैं यह अन्दाजा ही लगा सकता हूँ, क्योंकि वितरण-व्यवसाय की प्राथमिकताओं और काम के तरीकों के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है।
मुझे यह भी पता नहीं कि कब वैशाली की स्तरहीनता को ही नियति मान कर हम आशा-निराशा से ऊपर उठ गये। साल-छः महीने में कोई ‘ए’ ग्रेड फिल्म लग जाती, तो हम खुश होते थे। नहीं लगने की सूरत में दुखी नहीं होते थे। बाद को जब हमने हाफ टाइम से बिना टिकट फिल्म देखने का सिलसिला शुरू किया, तब यह बात अच्छी तरह दिमाग में बैठ गयी कि वैशाली जैसी भी है, हमारे बुरे दिनों की साथी है।
हाफ टाइम से बिना टिकट फिल्म देखने का आइडिया हमारे बीच के ही किसी खुराफाती दिमाग ने निकाला था। आइडिया यों था कि इण्टरवल से ठीक पहले अगर हॉल की चारदीवारी के भीतर चले आओ, तो इण्टरवल में बाहर आई भीड़ के साथ अन्दर जाकर बैठा जा सकता है और बाद की आधी फिल्म देखी जा सकती है। ‘जानी दुश्मन’ का हाउस फुल दौर बीतने के बाद आइडिया पर अमल किया गया। कामयाबी मिली। उत्साहित हो कर ‘जानी दुश्मन’ के उत्तरार्द्ध को हमने सात-आठ दफा देखा। इसके बाद तो सिलसिला ही चल पड़ा। इस कार्यवाही में सिर्फ दो-तीन चीजों का खयाल रखना पड़ता था। एक तो यह कि मैटिनी शो के दरम्यान चार से सवा चार बजे के बीच हॉल की चारदीवारी के भीतर चले जाएँ, क्योंकि इण्टरवल से ठीक पहले मेन गेट बन्द कर दिये जाते थे। दूसरा यह कि बालकनी में बैठें, क्योंकि उसके वर्गीय आधार के चलते वहां चेकिंग कम होती थी। तीसरे, एक बार में चार से ज्यादा लोग न जाएँ। ये सावधानियाँ बरतते हुए हम साल भर से ज्यादा समय तक यह सिलसिला चला ले गये। उसके बाद, जैसा कि एक मूर्धन्य गीतकार कह गये हैं, छोटी-सी इक भूल ने सारा गुलशन जला दिया। हुआ यों कि एक दिन हम तीन लोग बालकनी के सुख से ऊब कर फर्स्ट क्लास में बैठ गये और वह भी ऐसी कतार में, जहाँ हमारे अलावा और कोई नहीं था। राजेन्द्र कुमार की कोई फिल्म थी, जिसका नाम सदमे के कारण भूल गया हूँ। जनाब अभी यात्रा से लौट कर नायिका को तस्वीरों से भरी अलबम दिखला ही रहे थे कि हमारे चेहरों पर टार्च की चुंधियाती रोशनी पड़ी। रोशनी ने टिकट की माँग की और हमने रोशनी से ही मुखातिब होकर कहा कि नहीं है। ‘तीनों को बुक करो।’ रोशनी ने गरज कर कहा। फिर दो लोग हमें अर्द्धचन्द्र होकर बाहर की ओर ले चले। कतारों के बीच धकियाये जाते हुए मैंने विधाता को धन्यवाद दिया, जिसने हॉल के भीतर अन्धेरे का प्रावधान रखा है। साथ ही यह प्रार्थना भी की कि यह जो तकनीकी पदबन्ध है, बुक करना, उसका कोई भयावह अर्थ न हो। बाहर आये। पहलवान जी, अर्थात् मुख्य दरबान के आगे पेशी हुई। पहलवान ने कद-काठी में सबसे बड़ा देखकर मुझी से पूछना शुरू किया।
‘अन्दर कैसे आया?’
‘इण्टरवल में।’
‘कहाँ रहता है?’
‘राजेन्द्र नगर, 1 नम्बर।’
‘कहाँ पढ़ता है?’
‘पाटलिपुत्रा।’
‘किस क्लास में?’
‘नौवाँ नवीन।’
‘सेक्शन?’
‘ए।’
‘रॉल नम्बर?’
‘एक।’
पहवान हैरत से मुझे ऊपर-नीचे देखने लगा। आधे मिनट का विस्मित मौन। फिर पूछा, थोड़े बदले हुए स्वर में, ‘पाटलिपुत्रा में फर्स्ट आता है, बोर्ड इम्तहान में मेरिट लिस्ट में रहेगा और ई धन्धा? क्लास-टीचर शमीम साब हैं ना!’
‘जी।’
‘बतला दें उनको?’
‘……’
‘जाओ, भागो। आगे से आया है त बड़ी मार मारेंगे। बड़ा आदमी बनना है कि हॉल का दरबानी करना है।’
हम बुक न किये जाने का- उसका जो भी मतलब हो- शुक्र मनाते बाहर आये। फिर बेटिकट क्या, बाटिकट भी हॉल में घुसने का साहस कम-से-कम मुझे अगले एक-डेढ़ साल तक नहीं हुआ।

शायद इसी बीच हमारे बिहार माध्यमिक बोर्ड के इम्तहान भी हुए, जिसमें सर गणेशदत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल की कक्षा दसवीं नवीन के सेक्शन ‘ए’ का रोल नम्बर 1 मेरिट लिस्ट में अनुपस्थित पाया गया। इतना ही होता, तब भी कोई बात न थी। उसी स्कूल के दो ‘लो प्रोफाइल’ विद्यार्थी लिस्ट में मौजूद थे। तेज झटका लगा। नतीजतन मैं साहित्यकार बन बैठा। यह अपने लुप्त आत्मसम्मान को फिर से हासिल करने की बेचैन कोशिश थी। ‘हमन दुनिया से यारी क्या’ वाली मुद्रा के चलते पुराने संगी-साथियों से मेल-जोल कम हुआ। परिचय के नये वृत्त बने। सिनेमाघरों के शो-केस में लगे ‘स्टिल्स’ देखने का शौक छूटा और उसकी जगह राजकमल प्रकाशन और पी.पी.एच. में खड़े होकर किताबें देखने का शौक तारी हुआ। वैशाली पास रह कर भी दूर होती गई। अब उसके पास से गुजरे कभी-कभी महीनों बीत जाते। कुल मिलाकर, सन् 82 की बोर्ड परीक्षाओं के बाद के इन वर्षों में वह मेरे सरोकार या उत्सुकता की चीज नहीं रह गई थी। ऐसा नहीं कि मैंने उन दिनों फिल्में नहीं देखीं। ‘हिम्मतवाला’ और ‘मुकद्दर का सिकन्दर’ तभी देखी गई थीं। ऐसा नहीं कि मैं कभी यों ही भटकता वैशाली के परिसर में नहीं गया। ‘पुकार’ की होर्डिंग बनाते एक मजदूर की कलाकारी किंवा कलाकार की मजदूरी को नजदीक से तभी देखा था। इन सबके बावजूद उन तीन-चार सालों की मेरी याददाश्त में वैशाली की मौजूदगी बहुत झीनी है।
हो सकता है, यह समझ बहुत सब्जेक्टिव हो, पर मुझे बड़ी शिद्दत से महसूस होता है कि इस समय तक आते-आते मेरे लंगोटिया यार और मुहल्ले के लोग भी वैशाली से लगभग वीतराग हो गये थे। उनकी सान्ध्य-सभा में जब कभी मैं शामिल होता, वह कहीं भी एजेण्डे में न होती। टेलीविजन तिनकोनिया पार्क को घेरने वाले लगभग सभी घेरों में आ चुका था। हिन्दी के बेमिसाल किस्सागो मनोहर श्याम जोशी के गढ़े हुए पात्र इन घरों के सदस्य बन चुके थे। प्रसारण की तकनीकी गुणवत्ता में काफी सुधार हो गया था और अब चलती-बोलती तस्वीरों की रबड़ के टुकड़े की मानिन्द खींच-तान नहीं होती थी। तवे- जैसे रिकार्ड की जगह कैसेट्स और उसमें भी टी सिरीज के आने से मनचाहे गाने जब चाहे सुनने का अधिकार निम्न मध्यवर्गीय जनों को भी मिल गया था। रेडियो सीलोन से सिबाका गीतमाला सुनने के लिए तनी हुई रस्सी पर चलने की अब जरूरत नहीं थी।
इन्हीं वर्षों में वैशाली के ठीक सामने वह फ्लाई ओवर बनाकर तैयार हुआ था, जो रेलवे क्रासिंग के ऊपर से निकलता हुआ राजेन्द्र नगर और कंकड़बाग को जोड़ता है। इसका निर्माण रुकवाने के लिए हॉल वालों ने काफी कोशिश की, क्योंकि इससे वैशाली के सामने की जगह तंग हो रही थी और भव्यता आहत। इसका निर्माण रुकवाने के लिए शायद रिजर्व बैंक वालों और आसपास के दूसरे निवासियों ने भी कोशिश की, क्योंकि फ्लाई ओवर के साथ चोरी-झपटमारी का कोई नजदीकी रक्त-सम्बन्ध उन्होंने ढूँढ़ निकाला था। पर विरोध के बावजूद जैसे वैशाली का बनाना नहीं रुका था, वैसे ही फ्लाई ओवर का बनना भी नहीं रुका। ठीक-ठीक किस साल उसका काम पूरा हुआ, मुझे याद नहीं। पर इतना अवश्य याद है कि काम के दरम्यान वैशाली तक जाने वाले रास्ते की जो टूट-फूट हुई थी, उसकी लम्बे समय तक कायदे से मरम्मत नहीं हो पायी और न ही मलबे को ठिकाने लगाया गया। वजह शायद ये हो कि मुख्य ट्रैफिक के लिए अब उस रास्ते की दरकार नहीं रह गई थी। कंकड़बाग जाने के लिए इस फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं वैशाली को ऊपर से देखता, तो वह उतनी विराट और उत्तुंग नहीं लगती थी।
वह नवें दशक के मध्य से थोड़ा आगे या पीछे का कोई दिन रहा होगा, जब फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं उसे देख कर ठिठक गया। वहाँ एक अस्वाभाविक वीरानगी थी। पार्किंग में कोई गाड़ी-स्कूटर नहीं, पीछे साइकिल-स्टैण्ड भी खाली। टिकट काउण्टर के सामने क्यू के लिए लगाये गये लोहे के घेरे सूने पड़े थे। सामने की सीढ़ियों पर इक्का-दुक्का लोग थे, जिन्हें देख कर लगा नहीं कि फिल्म देखने आये होंगे। सीढ़ियों के ऊपर शीशे के दरवाजे का एक पल्ला खोल कर पहलवान जी ने अपनी कुर्सी लगा रखी थी। दाहिनी ओर चारदीवारी के साथ किसी फिल्म की होर्डिंग लगी थी, जिसकी फीकी रंगत बता ही थी कि फिल्म की किस्मत-जैसी भी रही हो, होर्डिंग ने सिल्वर जुबली पूरी कर ली है। मुझे लगा कि हॉल बन्द पड़ा है। लौट कर साथियों से पूछताछ की, तो पता चला कि उसे बन्द हुए दो महीने बीत चुके हैं। हॉल के चार हिस्सेदार थे, जिनमें कुछ अनबन चल रही थी। इस अनबन के बीच ‘कहानी फूलमती की’ और ‘नारद गाथा’- जैसी फिल्मों के सहारे वैशाली कई महीनों तक घिसटती रही। फिर जब अनबन अदालत तक पहुँच गई, तब उसे बन्द कर दिया गया।
लगता है कि ‘हमन दुनिया से यारी क्या’ वाले इस स्वयंभू साहित्यकार को ही नहीं, इसके स्थानीय भाई-बन्दों को भी वैशाली के बन्द होने से कोई फर्क नहीं पड़ा था। पड़ा होता, तो उसे लेकर चर्चाएँ अवश्य होतीं और मैं दो महीने तक इस घटना से नावाकिफ न रहता।
सन् 89 में मैं दिल्ली आ गया। हर गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में पटना जाना होता। पता नहीं क्यों, अब वैशाली की स्थिति और गति में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी। यह दिलचस्पी शायद वैसी ही थी, और है, जैसी किशोरावस्था में अपने बचपन की जंग लगी तिपहिया साइकिल और विकलांग गुड्डे-गुड़ियों को लेकर होती है। हर बार मैं यह सुनने के लिए कान खड़े रखता कि वैशाली का क्या मामला चल रहा है। एक बार सुना, लालू प्रसाद यादव ने उसे खरीद लिया है (क्या इसलिए कि उसके बनने का समाचार सुनते ही हमने जे.पी. जिन्दाबाद का नारा लगाया था!) और वह दुबारा चालू होने वाली है। दूसरी बार सुना कि वह बात अफवाह थी। खरीदा किसी और ने है। चालू होने ही वाली थी कि पी.डब्ल्यू.डी. ने खतरनाक पाया। बिना पर्याप्त मरम्मत के उसे जनता के लिए खोला नहीं जा सकता और हालत ये है कि नये मालिक ने अपनी पाई-पाई उसे खरीदने में ही झोंक दी है, अब वह मरम्मत नहीं करा सकता। तीसरी बार सुना कि उसे मालगोदाम में तब्दील करने की योजना है। यह मेरी अब तक की आखिरी जानकारी थी। जानकारी मिलते ही याद आया कि गांधी मैदान के सामने का एक सिनेमा हॉल ‘रीजेण्ट’ बहुत पहले कभी मालगोदाम हुआ करता था। इसे क्या कहें नियति का मजाक, जिसका फलसफा बहुत पहले वैशाली में ही ‘ग्रैण्ड रिवाइवल’ पर देखी गई ‘वक्त’ ने समझाया था।
सन् 95 में अपनी ताजा-ताजा शादी के बाद मैं पटना गया था। पत्नी को लेकर फ्लाई ओवर की तरफ घूमने निकल गया। शाम धुँधलका था, जब ऊपर चढ़ते हुए उस पर मेरी नजर पड़ी। उसके परिसर में धुँधलका थोड़ा और गहरा था, क्योंकि अन्दर कहीं बिजली-बत्ती नहीं थी और बाहर की स्ट्रीट-लाइट उतने विशाल परिसर की चारदीवारी से चार-पाँच कदम आगे ही दम तोड़ देती थी। चारदीवारी से लगा हुआ बाहर का हिस्सा भी, जहाँ कभी ठेलों, खोमचों, पान-सिगरेट की दुकानों और ढाबों का ताँता हुआ करता था, बिल्कुल वीरान था। इस वीरानगी और नीम अन्धेरे में अपने सर पर नाम का मुकुट सजायें वह ऐसी दीख रही थी, माने दरबार का पूरा तामझाम समेट लिए जाने के बावजूद कोई बादशाह जड़ाऊ हीरों से खाली कर दिये गये अपने तख्त पर बैठा हो। मैंने पत्नी को यह दृश्य दिखलाया। हम दोनों काफी देर तक फ्लाई ओवर की रेलिंग पर टिके उसे देखते रहे और मुझे रेणु के वे पात्र याद आये, जो गौने के बाद घर आती अपनी पत्नियों को निलहे साहबों की कोठी दिखलाया करते थे।
‘‘जरा यहाँ गाड़ी धीरे-धीरे हाँकना! कनिया साहेब की कोठी देखेंगी। …यही है मकै साहब की कोठी।..वहाँ है नील महने का हौज!
नई दुलहिन ओहर के पर्दे को हटाकर घूँघट को जरा पीछे खिसकाकर झाँकती है- झरबेर घने जंगलों के बीच ईंट-पत्थर का ढेर! कोठी कहाँ है?
दूल्हे का चेहरा गर्व से भर जाता है- अर्थात् हमारे गाँव के पास साहेब की कोठी थी, यहाँ साहेब-मेम रहते थे।’’ (मैला आँचल)



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