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कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।

जरूरत नहीं है दुखहरण मास्टर की: संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में सुरती खाते और बात-बात पर छड़ी भाँजते जिन ‘दुखहरण मास्टर’ का वर्णन किया गया है, वे आमतौर पर भारतीय अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते रहे हैं। लेकिन अब स्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं। गाँवों के स्कूलों में कहीं-कहीं दुखहरण मास्टर के वंशज भले दिख जाएँ, लेकिन शहरों ने उनकी प्रजाति को विलुप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पब्लिक स्कूलों में तो पुरुषों के अध्यापक बनने के रास्ते लगभग बंद कर दिए गए हैं। अब चुस्त, सुंदर, आकर्षक, ‘मैम’ पब्लिक स्कूलों की शोभा बढ़ाने लगी हैं। ऐसे में दुखहरण मास्टर की प्रजाति का विलुप्त होना अनिवार्य हो गया है। और यह अच्छी खबर है। लेकिन क्या पहनावे और बोलने के ढंग के बदलने से दुखहरण मास्टर की छड़ी भाँजने की मानसिकता बदल गई है? शायद नहीं! आज भी अध्यापकों और अध्यापिकाओं में शारीरिक दंड देने की प्रवृत्ति विद्यमान है। डाँट-डपट की तो बात ही क्या? ऐसे स्कूल या शिक्षक ढूँढ़ने पर ही मिल सकते हैं जो अपने विद्यार्थियों को डाँट-डपट, दंड वगैरह देने से परहेज करते हों। कभी-कभी तो बच्चों को भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने की खबरें अखबारों और टी.वी. में आती रहती हैं। ऐसी खबरों को देखने, पढ़ने के बाद दुःख होता है कि हमारे शिक्षक इस स्तर पर भी उतर सकते हैं?

दूसरी तरफ, यह सुखद बात है कि सरकार, स्कूल प्रशासन, माता-पिता बच्चों को शारीरिक दंड देने के सख्त खिलाफ हो गए हैं। शिक्षकों की प्रवृत्ति भले ही नहीं बदली हो, लेकिन वे बच्चों को दंडित करने से पहले सौ बार जरूर सोचने लगे हैं। हालाँकि बच्चों को डाँट-डपट और तरह-तरह से भयभीत करने से वे अब भी बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका मानना है कि बच्चे अनुशासन में नहीं रहेंगे तो वे उन्हें पढ़ा कैसे पाएँगे? और उन्हें अनुशासन में रखने के लिए तो डाँट-डपट जरूरी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बच्चों की बड़ी तादात को सँभालना होता है। वे आखिर उन्हें सँभालें भी तो कैसे? प्राइमरी स्तर पर एक ही शिक्षक पूरी क्लास को पढ़ाता है। पढ़ाने के साथ-साथ उसे यह भी देखना होता है कि बच्चे आपस में मार-पीट न करें। यहाँ तक कि पानी पीते या पेशाब को जाते भी वे अगर मार-पीट करें और किसी को खरोंच भी आ जाए तो संबंधित कक्षा का शिक्षक ही दोषी माना जाता है। ऐसे में, एक सरकारी स्कूल के युवा शिक्षक हेमेन्द्र मोहन की कही बात गौर करने लायक है, ‘‘पहले वाली स्थिति ही अच्छी थी। विद्यार्थी शिक्षकों का लिहाज करते थे, कहा मानते थे। अब तो सीनियर क्लास के लड़के शिक्षकों को ही धमकाते हैं कि आप कुछ कहोगे तो मैं प्रिसिंपल से शिकायत कर दूँगा।’’

जाहिर है, शिक्षकों और विद्यार्थियों के रिश्ते में दरार पैदा हो गई है। यह दरार पब्लिक स्कूलों में थोड़ी कम दिखाई देती है। वहाँ शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच माहौल अधिक दोस्ताना है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह दोस्ताना स्वाभाविक नहीं, बल्कि व्यावसायिक दबाव की वजह से अधिक है। आज के माता-पिता यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे महँगे स्कूलों में जाएँ और वहाँ से मुर्गा बनकर या पीठ पर छड़ी के निशान लेकर घर वापस आएँ। वे अपने बच्चों पर एक उँगली तक पड़ते नहीं देखना चाहते। ऐसे में पब्लिक स्कूलों की यह मजबूरी हो जाती है कि वे बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित न होने दें। स्कूल-प्रशासन का अंकुश शिक्षकों पर रहता है, छात्र या माता-पिता की शिकायत पर किसी शिक्षक को निष्कासित करते उन्हें देर भी नहीं लगती। यही वजह है कि पब्लिक स्कूलों के शिक्षक/शिक्षिका विद्यार्थियों से बहुत सहज और फ्रेंडली दिखाई देते हैं। शिक्षकों की तरफ से देखें तो निश्चय ही उनके लिए यह भूमिका बड़ी कठिन हो सकती है। उन्हें अपने तन-मन को रोके रखकर बच्चों को अनुशासित रखना है और पढ़ाना है। शिक्षकों की इस कशमकश के बारे में पब्लिक स्कूल की एक शिक्षिका श्रीमती लीना का कहना है- ‘‘हमें बहुत मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है। मैं भी इस पक्ष में हूँ कि बच्चों को मारा-पीटा न जाए, डाँटा-डपटा न जाए, लेकिन बिना डाँटे-डपटे बच्चों को सँभालना आसान भी तो नहीं होता? आखिर कभी-कभार घर में हम अपने बच्चों को डाँटते-डपटते हैं या नही?’’

श्रीमती लीना भी अपनी जगह सही हैं, लेकिन बच्चों के कोण से देखें तो उन्हें न तो घर में डाँट-डपट पसंद है, न ही स्कूल में। न तो डाँटने-डपटने वाले माता-पिता उन्हें पसंद है, न ही शिक्षक। हाँ, वे डाँट-डपट के इतने आदी हो गए हैं कि वे थोड़ी बहुत डाँट सहन को भी तैयार रहते हैं। एक पब्लिक स्कूल की छठी कक्षा की छात्रा तृषा का कहना है, ‘‘मेरी कक्षा में सभी टीचर्स बहुत अच्छी हैं। हँसमुख और फ्रेंडली। पर कभी-कभी हमें डाँटती भी हैं। कभी-कभी जब उनका मूड ज्यादा खराब रहता है तो वे हमें ज्यादा डाँटती हैं। मेरे ख्याल से उन्हें डाँटना तो चाहिए, लेकिन कम!’’

सवाल है कि बच्चों को डाँटा-डपटा क्यों जाए? इसलिए कि वे बड़ों की बात नहीं मानते? शिक्षकों की नहीं सुनते?…बच्चों के जीवन और शिक्षण पर चिंतन और अपने चिंतन का क्रियान्वयन करने वाले दुनिया भर के शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात का विरोध किया है। बच्चों से अपनी बात मनवाने के लिए जोर-जबरदस्ती करते माता-पिता और शिक्षक उनकी आलोचना के विषय रहे हैं। टॉल्सटॉय, ए.एस.नील, जॉन होल्ट, मकारांको, रवीन्द्रनाथ, गिजुभाई जैसे शिक्षा शास्त्री बच्चों की आजादी के पक्षधर रहे हैं। बच्चों को भयमुक्त वातावरण में पालने और पढ़ाने के पक्षधर रहे हैं। एस.एस. नील जैसे शिक्षक तो अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी देते थे कि विद्यार्थी उन्हें उनके नाम से पुकार सकते थे। गिजुभाई ने भी अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी दी थी कि ‘गिजुभाई पगला गए हैं’ कह सकते थे। विद्यार्थियों पर हर वक्त अंकुश रखने वाले शिक्षक इस आजादी की कल्पना तो नहीं ही कर सकते हैं। नील और गिजुभाई जैसे लोग उन्हें बेवकूफ भी लग सकते हैं। जबकि नील और गिजुभाई जैसे शिक्षक इसलिए बच्चों को आजादी देने के पक्ष में थे कि इससे वे आजाद और कुंठा रहित नागरिक के रूप में विकसित होंगे। नील और गिजुभाई के इस दर्शन को समझने और अपनाने वाले शिक्षकों की आज कितनी आवश्यकता है? शिक्षकों के द्वारा दी गई आजादी का उपभोग करते हुए भी शिक्षकों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखना विद्यार्थियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

आज के हिसाब से देखें तो यह सच है कि हमारे यहाँ एकलव्य या आरुणि जैसे शिष्य नहीं रहे। सच तो यह भी है कि हमारे गुरु अब ब्रह्मा नहीं रहे? शिक्षा को व्यवसाय में बदल देने वाले गुरु राम और युधिष्ठिर जैसे शिष्य तैयार भी कैसे कर सकते हैं? इस मूल्यहीन समय में सद्गुरुओं की जितनी जरूरत है, उतनी ही उनकी कमी दिखाई देती है। सद्गुरु भाषण से नहीं, बल्कि अपने आचरण से अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे, दंड से नहीं, प्रेम, प्रोत्साहन से काम लिया करते थे। तभी उनकी दी हुई शिक्षा चिर स्थायी हुआ करती थी।

और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

अचानक उसका हाथ पेंट की पिछली जेब में गया। फिर अन्य सभी जेबें देखीं। जैकिट की भीतरी जेब को टटोलते ही दो वर्ष की बेरोजगारी झेलने के बाद सरकारी स्कूल में मास्टर बनने की सारी खुशी एक ही क्षण में फुर्र हो गई। चौबीस साल का युवक दोनों हाथों से सिर पकड़ कर रास्ते के किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया। लतड़-पथड़-पस्त। तीन सौ किलोमीटर बस से एवं बारह और छः, अठारह किलोमीटर पैदल यात्रा की थकान अचानक एकमुश्‍त उसके सिर पर सवार हो गई और उसके पूरे शरीर को शि‍थिल कर दिया। उसने जल्दी-जल्दी अपनी सभी जेबें टटोलीं। जैकिट उतारकर स्वेटर को झटका। पीठ से पिट्ठू उतार कर अंदर देखा। उसका बटुआ कहीं नहीं था। स्मृति को टटोला। कल की रात उसने विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर पर गुजारी थी। स्थानीय चतुर्थ श्रेणी कर्मी, लेकिन आतिथ्य में नम्बर एक। आदमी गरीब, लेकिन दिल का अमीर। सुबह चार बजे विदा होते समय उसने चारपाई की बगल में रखे बक्से पर से अपनी घड़ी पहनी थी और बटुआ उठाकर पूरे होशो-हवास में अपनी जैकिट की अंदर की जेब के हवाले किया था। फिर वह दौड़ पड़ा था बारह किलोमीटर का पैदल पथ दो घंटे में तय कर छः बजे की बस पकड़ने के उद्देश्‍य से। आधी दूरी तय भी कर चुका था लेकिन…..

उसने घड़ी देखी। पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। बिना पैसे के दो दिन की तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा असम्भव थी। नया इलाका। न जान न पहचान। पौ फटने लगी थी। दूर उत्तर-पूरब की चोटियां रक्ताभ होने लगीं थीं। उतरते पथरीले रास्ते की छाया अब दूर तक दिख रही थी। निर्जन अकेला रास्ता। वापस चलना होगा। उसने पिट्ठू लटकाया। इसी रास्ते के किनारे कहीं पड़ा मिलेगा, उसका बटुआ। न हो तो महिपाल या सती मास्साब ही जाने तक की व्यवस्था उधारी में कर देंगे। वह दो कदम चढ़ा, लेकिन थके पैर उसे चार कदम पीछे खींच लाये। फिर से बैठ गया, सिर पकड़कर।

कल नियुक्ति की औपचारिकता पूरी करने के बाद सती मास्साब ने उसे लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया था- ‘‘भाई जी! हम तो पांच साल से पड़े हैं, इस बीहड़ में। दूध-पानी, साग-भाजी कुछ नहीं मिलेगा। न बिजली, न सड़क, न अखबार। तीसरी दुनिया है। क्या करोगे, यहां नौकरी करके। वह भी एड-हॉक। इस बार तो लोग मात्र पांच सौ रुपए खर्च करके मनमाफिक जगह पर नियुक्ति पाए हैं। कल सामान लेने जा रहे हो, तो नैनीताल होते हुए चले जाओ। क्या पता अभी भी घर के नजदीक किसी जगह का जुगाड़ हो जाए। वरना इस गलती पर कई बरस पछताओगे।’’

वह पछता ही तो रहा था। काश! मास्साब का भाषण न हुआ होता तो वह सुबह यों हड़बड़ी में न भागता। पहले बीमार मां की तीमारदारी में ध्यान ही नहीं रहा कि नियुक्तियां भी हो रही हैं। नियुक्ति मिली तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर वह भी एट द इलेवन्थ आवर। सोच रहा था, उसके साथ ही यह सब क्यों होता है। तभी उस शांत पथ पर एक किशोर बालक की आवाज गूंजी- ‘‘ ऊपर से पत्थर आ रहे हैं, भागो। ’’

पन्द्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर उसका हाथ पकड़ कर खींचे लिये जा रहा था। अगले मोड़ पर जब दोनों रुके, तब तक पत्थरों का एक रेला गड़गड़ाते, धूल उड़ाते हुए ऊपर से आकर पहाड़ी की तलहटी में बहती नंदाकिनी नदी में समा गया था।

‘‘ साब, मैं अभी न आता तो आज आप बचते नहीं। आप इस इलाके के तो नहीं हो। यहां पर तो लगातार पत्थर गिरते रहते हैं। ऊपर देखकर नीचे भागना पड़ता है। आप हैं कि सिर देकर बैठे हैं।’’ उसकी आंखों में भोलापन, घबराहट, संदेह, जिज्ञासा जाने क्या-क्या था।

पत्थरों का अचानक आया रेला तो धड़धड़ाता हुआ नदी में समा गया था, लेकिन वह अब भी अपने अंदर की धड़धड़ को संयत करने का प्रयास ही कर रहा था। बाप रे बाप। बड़ी अनहोनी शायद टल गई थी।

‘‘धन्यवाद बेटे।’’ उसने कहा, ‘‘ तुम तो देवदूत बनकर आए। मैं कल ही ऊपर गांव के हाई स्कूल में आया था। नया मास्टर बनकर। अपने घर वापस जा रहा हूं, सामान लाने…।’’

बच्चे के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव आए। अंदर शायद कहीं सम्मान के किसी टुकड़े ने हिचकोला खाया।

‘‘ प्रणाम गूरजी…मैं दिलबर…गांव के स्कूल में नौ में पढ़ता हूं…मैं भी बाजार जा रहा…चलो… साथ चलते हैं…।’’ बच्चे ने मास्साब का पिट्ठू उठा लिया।

‘‘ मगर मैं तो वापस जा रहा हूं…स्कूल को।’’

‘‘ क्यों? ’’

‘‘ दरअसल, मेरा बटुआ हड़बड़ी में कहीं गिर गया है, रास्ते में। ’’

दिलबर के चेहरे पर कई भाव एक साथ आने-जाने लगे। वह कभी अजनबी मास्टर की तरफ देखता, कभी जमीन को घूरने लगता। फिर उसने जेब से एक काले रंग का बटुआ निकाला और मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘यह है? ’’

‘‘ अरे, हां। तुम्हें कहां मिला?’’ मास्साब ने उसके हाथ से बटुआ झपट लिया और सीने से ऐसे लगाया मानो निकलते हुए प्राण वापस चेप रहे हों।

‘‘ धन्यवाद दिलबर, मैंने तो तुम्हें एक भी पाठ नहीं पढ़ाया अभी,  लेकि‍न तुमने पहले ही मुझे गुरु दक्षिणा दे दी।’’ कहते हुए मास्साब ने बटुआ संभाल कर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये हैं। फिर कहोगे…।’’ अजीब से भाव आए थे, दिलबर के चेहरे पर।

‘‘अरे, नहीं यार। ’’ मास्साब ने बटुआ उसके सामने खोलते हुए सौ-पचास के नोटों पर यों ही हाथ फेरते हुए कहा।

‘‘ ठीक है। चलो चलते हैं।’’ बटुआ मिलते ही मास्साब के शि‍थिल शरीर में पुनः ऊर्जा का संचरण हो चुका था। उन्होंने दिलबर के हाथों से अपना पिट्ठू ले लिया।

दिलबर के साथ गपशप में बची हुई छः किलोमीटर की पैदल यात्रा कब पूरी हुई मास्साब को पता ही नहीं चला। उन्होंने दिलबर से इलाके और विद्यालय के बारे में तमाम जानकारी भी प्राप्त की। चहकती और बहकती कई बातों से कई बार मास्साब को लगा कि दिलबर कक्षा नौ में पढ़ने वाला सामान्य बच्चा नहीं है। दिलबर ने बताया था कि उनके स्कूल में कई साल से गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक आए ही नहीं। चार गुरुजी में से तीन ही एक बार में स्कूल में रहते हैं। दूर का स्कूल हुआ। एक गुरुजी घर जाते हैं, बारी-बारी से। मास्साब ने वादा किया कि अगले सोमवार से वह उन्हें अंग्रेजी के साथ गणित और विज्ञान भी पढ़ाएंगे। दिलबर की तो हिन्दी और सामान्य अध्ययन में भी मदद करेंगे। मास्साब दिलबर की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। अब इस अति पिछड़े इलाके में सेवा करने का भाव उनके मन में मजबूती लेने लगा। स्थान परिवर्तन का प्रयास उन्हें व्यर्थ लगने लगा। उनके मन में कुछ योजनाएं आकार लेने लगीं। स्टेशन पहुंच कर बस में बैठते हुए पचास रुपये का एक नोट बटुए से निकाल कर दिलबर की तरफ बढ़ाते हुए मास्साब ने कहा, ‘‘बेटे! मैं और क्या दे सकता हूं तुम्‍हें, फिर भी…। ’’

‘‘नहीं, गूरजी नहीं।’ ’कहते हुए दिलबर सामने की गली में भागता चला गया।

नौकरी सरकारी थी, लेकिन पक्की नहीं। एक महीने का नोटिस या एक महीने का वेतन देकर कभी भी सेवा समाप्ति की शर्त थी, नियुक्ति पत्र में। लेकिन पहले विद्यार्थी से यह मुलाकात और संवाद कोई सामान्य बात नहीं थी। अंतिम बार जब दिलबर से नजरें मिली थीं, तो मास्साब को उसकी आंखों में अनेक डूबते-उतराते प्रश्‍न दिखे थे। एक उपेक्षा का भाव भी था, जो उन्हें पच नहीं पा रहा था। चालक ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस छोटे से स्टेशन को छोड़कर घूं…घूं करती हुई पहाड़ी पर चढ़ने लगी। नन्हा दिलबर सहयात्री बनकर बैठ गया था मास्साब के मन-मस्ति‍ष्‍क में। उसकी बातें रास्तेभर उन्हें रह-रहकर याद आती रहीं।

अगले सोमवार को रोजमर्रा की आवश्यकता का हल्का-फुल्का सामान लेकर मास्साब अपने विद्यालय पहुंचे। प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में उनकी आंखें दिलबर को ही तलाश रहीं थीं, लेकिन वह नहीं दिखा। मास्साब ने परिचय संबोधन में बच्चों से कहा कि वह बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहेंगे और उनकी प्रत्येक समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे। अंग्रेजी के साथ गणित-विज्ञान भी उन्हें पढ़ाएंगे। बच्चों को उनसे डरने की जरूरत नहीं। उन्हें अपना दोस्त समझें। अपने मन की बातें कहें। जितने अधिक चाहें, प्रश्‍न पूछें। किसी तरह की डर या झिझक महसूस न करें। अच्छे बच्चे जिज्ञासु होते हैं और प्रश्‍न पूछते हैं। जो बच्चे पूछते हैं, वही सीखते हैं। सीखने की शुरुआत ही प्रश्‍न से होती है। ऐसा नहीं कि शि‍क्षक के पास हर प्रश्‍न का उत्तर हमेशा उपलब्ध होता है। ऐसे बहुत सारे प्रश्‍न होते हैं, जिनके उत्तर शि‍क्षकों को भी पता नहीं होते हैं। लेकिन आप-हम मिलकर उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाश करने की कोशि‍श करेंगे। उत्तरों की तलाश करते हुए ही तो हम बहुत कुछ सीखते जाते हैं और यही ज्ञान है। ज्ञान पहले से तैयार कोई माल नहीं है, बल्कि इसी तरह उसका सृजन होता है। प्रश्‍न ही हैं, जो  ज्ञान सृजन की खिड़की को खोलते हैं। इसलिए प्रश्‍नों का हमेशा स्वागत रहेगा। मास्साब की बातें सुन बच्चों के चेहरों में एक अलग सी चमक छा गई। शि‍क्षकों के बीच खुसर-पुसर शुरू होने लगी थी।

मास्साब को कक्षा नौ की कक्षाध्यापकी सौंपी गई थी। पहले वादन में उन्होंने कक्षा में जाकर उपस्थिति ली।

‘‘ महिधर प्रसाद ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ खुशाल सिंह ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’

‘‘ …………………. ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’ मास्साब ने जोर से दोहराया।

‘‘ नठ गया।’’ पीछे के बेंच से दबी-सी आवाज आई।

‘‘ नठ गया मतलब? ’’ मास्साब ने पीछे बैठे बच्चे से पूछा।

महिधर ने खामोशी से सिर झुका लिया। अन्य बच्चे भी खामोश हो गए। मास्साब ने हाजिरी पूरी की और पहले दिन का पहला कक्षा शि‍क्षण प्रारम्भ किया। पहला दिन बच्चों के साथ जान-पहचान में ही बीत गया। यद्यपि दिलबर कई बार मास्साब के मानस पटल पर आता-जाता रहा, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं।

यह बात लोगों को पता चल चुकी थी कि नये मास्साब हैं तो अंग्रेजी के, लेकिन गणित-विज्ञान भी पढ़ाएंगे। महिधर के पिता गिरधर तिवारी अभिभावक संघ के अध्यक्ष थे और पूर्व सैनिक भी। उन्होंने बेटे की पढ़ाई की गरज से तुरत-फुरत अपने मकान में मास्साब के रहने की व्यवस्था कर दी। बच्चे स्कूल से एक टेबल और दो कुर्सी भी ले आए। आज पहला ही दिन था। तखत पर अपना बिस्तर फैलाकर मास्साब ने महिधर के घर पर ही भोजन किया। इस बीच जान-पहचान की छुटमुट बातें भी होती रहीं। महिधर के पिता ने बताया कि महिधर कक्षा एक से आठ तक लगातार कक्षा में दूसरे स्थान पर रहता आया है। अब मास्साब के साथ रह कर पढ़ाई करेगा तो पहला आया करेगा।

भोजन के बाद मास्साब कुर्सी लेकर आंगन में बैठ गए। पूर्णिमा की रात थी। चांद अपने पूरे शबाब पर था। गांव का स्कूल बसासत के अंतिम छोर पर था और स्कूल से ही लगा महिधर का मकान। ऊपर की ओर बांज का हरा-भरा जंगल और नीचे की ओर नदी घाटी तक फैले हुए छोटे-छोटे तोक। पत्थर की स्लेटों से ढकी घरों की छतें चांदनी में छोट-छोटे शीशे के चौकस टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। मास्साब के मानस पटल पर रह-रह कर दिलबर की यादें और बातें टकरा रही थीं। तभी महिधर आकर सामने बैठ गया। सिर झुकाकर। मास्साब बतियाने लगे, ‘‘कहो महिधर! तो तुम दूसरे ही रहते हो कक्षा में। पहला कौन रहता है, भाई? ’’

‘‘ जी दिलबर। गूरजी! दिलबर चोर नहीं था।’’

‘‘ मैंने कब कहा? ’’ मास्साब चौंक पड़े।

‘‘ गुलाब सिंह सेठ ने शि‍कायत की कि दिलबर ने उसकी दुकान से दो सौ रुपये निकाल लिए। ’’

‘‘ अच्छा!’’

‘‘ सती मास्साब ने प्रार्थना में दिलबर की बहुत बेइज्जती की और बहुत मारा उसे। फिर सभी बच्चे भी दिल्वा रचो! दिल्वा रचो! कह कर हर समय उसे चिढ़ाने लगे। गुलाब सिंह सेठ सरपंच भी हैं। पंचायत ने बेचारे दिलबर के पिता पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया। उन्होंने बकरी बेचकर जुर्माना भरा और उस दिन दिलबर को खूब मारा।’’

‘‘ फिर क्या हुआ?’’ मास्साब के चेहरे में दुःख और आश्‍चर्य के मिश्रित भाव थे।

‘‘ उस दिन फीस डे था। दिलबर सुबह अंधेरे में ही मेरे घर आया। वह मेरा अच्छा दोस्त था। उसने खिड़की के पास आकर मुझे जगाया। एक कापी और पेन मांगकर वह अंधेरे में ही कुछ लिखने लगा। उसने अपने पिताजी के लिए चिट्ठी लिखी और पचास रुपये मुझे पकड़ाए और दिलबर नठ गया। गूरजी! डर के कारण मैंने चिट्ठी और रुपये छुपा दिए। किसी को नहीं बताया।’’

महिधर रुआंसा हो गया और चिट्ठी और रुपये मास्साब के हाथ में पकड़ाकर चला गया। मास्साब चन्द्रमा के मध्यम प्रकाश में चिट्ठी पढ़ने लगे-‘‘पिता जी! मुझे माफ कर देना। घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुआ हूं। गुलाब सेठ अपने को बहुत बड़ा अंग्रेज समझता है। मैंने उसकी दुकान से एक कापी खरीदी थी। कापी अंदर से फटी निकली। मैं कापी लौटाने गया तो उसने  कहा, ‘‘ यू ब्लडी लेबर्स’ सन।’’ पिता जी यह अंग्रेजी में गाली होती है। मैंने भी उससे कह दिया, ‘‘ यू ब्लडी, युअर फादर ब्लडी।’’ उसने मुझे एक झापड़ मार दिया। मैं चुपचाप चला आया। मुझे दुःख है कि मेरी बात न आपने सुनी, न पंचायत ने। स्कूल में मास्साब ने भी नहीं। ऐसे गांव में रहकर, ऐसे स्कूल में फीस देकर पढ़ने से मैं क्या सीखूंगा। इसलिए फीस के पैसे भी वापस भेज रहा हूं। आपका दो महीने का तमाखू का खर्चा तो होगा। मुझे ढ़ूंढने मत आना। मैं बहुत दूर जा रहा हूं। आपका अभागा बेटा- दिलबर।

मास्साब चिट्ठी पढ़कर सन्न रह गए। लोग अपने-अपने घरों में दुबक चुके थे। गांव में शांति थी। गांव की सीमा से पहाड़ी की चोटी तक पसरा जंगल खामोश था। सीढ़ीदार खेत लमलेट थे। सिर्फ पहाड़ों से उतरकर ढलान पर बहती नंदाकिनी का शोर रात के सन्नाटे में कानों से टकरा रहा था। अचानक आसमान में चमकते चांद को एक काले बादल के टुकड़े ने आकर ढक लिया और पूरी घाटी स्याह हो गई। मास्साब अपने कमरे में जाकर तखत पर पसर गए। ज्यों ही नींद पास आती दिलबर की आवाज कान खींच देती, ‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये थे। फिर कहोगे…।’’

सुबह प्रार्थना स्थल पर खुद के द्वारा कही बातें बार-बार प्रश्‍न के रूप में उनके सामने खड़ी हो जा रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

( चिंतामणि जोशी राजकीय इंटर कालेज टोटानोला, पिथौरागढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्‍ता हैं। कविता और कहानी लिखते हैं। एक कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुका है। वह दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)