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मृत्युंजय : चंद्रकुँवर बर्त्‍वाल

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

कवि‍ चंद्रकुँवर वर्त्‍वाल और सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला 1939 से 42 तक लखनऊ में एक-दूसरे के सम्‍पर्क में रहे। उसके बाद परि‍स्‍थि‍ति‍यां ऐसी बनीं कि‍ दोनों बि‍छुड़ गये। अस्‍वस्‍थ होने के कारण वर्त्‍वाल हि‍मवंत की ओर चले गये। नि‍राला भी उन दि‍नों अस्‍वस्‍थ थे। यातनाओं के बीच उनका जीवन चल रहा था। एक दि‍न वर्त्‍वाल ने नि‍राला को पत्र के रूप में ‘मृत्‍युंजय’ कवि‍ता भेजी जो उनके जीवन तथा नि‍राला के काव्‍य की उच्‍चतम व्‍याख्‍या है-

सहो अमर कवि ! अत्याचार सहो जीवन के,
सहो धरा के कंटक, निष्ठुर वज्र गगन के !
कुपित देवता हैं तुम पर हे कवि, गा गाकर
क्योंकि अमर करते तुम दु:ख-सुख मर्त्य भुवन के,
कुपित दास हैं तुम पर, क्योंकि न तुमने अपना शीश झुकाया
छंदों और प्रथाओं के नि‍र्बल में,
कि‍सी भांति‍ भी बंध ने सकी ऊँचे शैलों से
गरज-गरज आती हुई तुम्‍हारे नि‍र्मल
और स्‍वच्‍छ गीतों की वज्र-हास सी काया !
नि‍र्धनता को सहो, तुम्‍हारी यह नि‍र्धनता
एक मात्र नि‍धि‍ होगी, कभी देश जीवन की !
अश्रु बहाओ, छि‍पी तुम्‍हारे अश्रु कणों में,
एक अमर वह शक्‍ति, न जि‍स को मंद करेगी,
मलि‍न पतन से भरी रात  सुनसान मरण की !
‍अंजलि‍यां भर-भर सहर्ष पीवो जीवन का
तीक्ष्‍ण हलाहल, और न भूलो सुधा सात्‍वि‍की,
पीने में वि‍ष-सी लगती है, कि‍न्‍तु पान कर
मृत्‍युंजय कर देती है मानक जीवन को !

नि‍राला जयंती पर कवि‍तायें

हिंदी साहि‍त्य के प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला की जयंती वसंत पंचमी को मनायी जाती है। इस अवसर पर उन पर लि‍खी लेखक/कवि‍ शमशेर, राजेंद्र कुमार, भवानीप्रसाद मि‍श्र, नागार्जुन, शेखर जोशी और रामवि‍लास शर्मा की कवि‍ताएं-

निराला के प्रति : शमशेर

भूलकर जब राह- जब-जब राह भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम को आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वा स बन मेरे लिए-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि ! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते ‘शक्ति औ’ कवि के मिलन का हास मंगलमय,
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कठस्वर में तुम्हारे कवि,
एक ऋतुओं के विहँसते सूर्य !
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह !
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
सधना स्वर से
शांत-शीतलतम।
हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि:
जानता क्या मैं-
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(और विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !

दृष्टि-दान : राजेंद्र कुमार

जहां-जहां हम देख सके
आपनी आँखें
तुमको,
देखा, तुम हो
दिखलाते वहाँ-वहाँ, दुख की
दिपती आँखें,
ऐंठीले सुख की –
जिन्हें देख-छिपती आँखें;
यह दृष्टि तुम्हारी ही है दुख को मिली
दिख गई खुद की ताकत
उसे, अनेक मोर्चों पर-
हार-हार
जिन पर हम सबको
बार-बार डटना ही है
छंटना ही है, वह कोहरा-घना-
दृष्टि को छेंक रहा है जो
यों दृष्टि तुम्हारी मिली
हमारी मिली
वह दृष्टि तुम्हारी
मिली
दिख सकी हमें जुही की कली
‘विजन बन वल्लारी पर … सुहाग-भरी
स्नेह-स्पप्न-मग्न… अमल-
कोमल तनु तरुणी…’
नहीं तो रह जाती वह
किसी नायिका के जूडे़ में खुँसी,
किसी नायक के गले-पड़ी
माला में गुँथी…
कहाँ वह होती यों सप्राण
कि होती उसकी खुद भी
कोई अपनी प्रेम-कथा उन्मुक्त!
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
दिख सकी हमें- तोड़ती पत्थर
वह- ‘जो मार खा रोई नहीं’
रह जाती जो अनदिखी
अन्यथा
इलाहाबाद के पथ पर
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
राम पा गये जिं‍दगी में आने की राह
नहीं तो
भटक रहे होते पुराण के पन्नों पर प्रेतात्म…,
आ रमे हमारे बीच
ठीक हम जैसों
की फि‍क्रों में हुए शरीक
‘अन्याय जिधर हैं, उधर शक्ति’-
यह प्रश्न
विकटता में अपनी
पहले से भी कुछ और विकट है आज,
वह आवाज़-
‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ कहां
गुम हुई,
खोजते हमें निकलना है,
नहीं हम दृष्टि-हीन
फिर हमें प्रमाण पात्रता का देना होगा
फिर शक्ति करेगी हमें
और, हम ही होंगे-
हाँ,  हम ही-पुरुषोत्तम नवीन
(‘आदर्श’, कलकत्ता, 1965 में प्रकाशि‍त)

लफ्फा़ज़ मैं बनाम निराला : भवानी प्रसाद मिश्र

लाख शब्दों के बराबर है
एक तस्वीर !
मेरे मन में है एक ऐसी झांकी
जो मेरे शब्दों ने कभी नहीं आँकी
शायद इसीलिए
कि, हो नही पाता मेरे किए
लाख शब्दों का कुछ-
न उपन्यास
न महाकाव्य !
तो क्या कूँची उठा लूँ
रंग दूँ रंगों में निराला को ?
आदमियों में उस सबसे आला को?
किन्तु हाय,
उसे मैंने सिवा तस्वीरों के
देखा भी तो नहीं है ?
कैसे खीचूँ, कैसे बनाऊँ उसे
मेरे पास मौलिक कोई
रेखा भी तो नहीं है ?
उधार रेखाएँ कैसे लूँ
इसके-उसके मन की !
मेरे मन पर तो छाप
उसकी शब्दों वाली है
जो अतीव शक्तिशाली है-
‘राम की शक्ति पूजा’
‘सरोज-स्मृति’
यहाँ तक कि ‘जूही की कली’
अपने भीतर की हर गली
इन्हीं से देखी है प्रकाशित मैंने,
और जहाँ रवि न पहुँचे
उसे वहाँ पहुँचने वाला कवि माना है,
फिर भी कह सकता हूँ क्या
कि मैंने निराला को जाना है ?
सच कहो तो बिना जाने ही
किसी वजह से अभिभूत होकर
मैंने उसे
इतना बड़ा मान लिया है-
कि अपनी अक्ल की धरती पर
उस आसमान का
चंदोबा तान लिया है
और अब तारे गिन रहा हूँ
उस व्यक्ति से मिलने की प्रतीक्षा में
न लिखूंगा हरफ, न बनाऊंगा तस्वी्र !
क्यों कि‍ हरफ असम्भव है,  तस्वीर उधार
और मैं हूँ आदत से लाचार-
श्रम नहीं करूँगा
यहाँ तक
कि निराला को ठीक-ठीक जानने में
डरूँगा, बगलें झाँकूँगा,
कान में कहता हूँ तुमसे
मुझ से अब मत कहना
मैं क्या खाकर
उसकी तस्वीर आँकूँगा !

निराला के नाम पर : नागार्जुन

बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न  तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।
क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे श्रृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !
राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !
रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ,  मुख से न फूटा वचन ?
क्षेपकों की बाढ़ आयी, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, वेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

संगम स्मृति : शेखर जोशी

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती।
इन्दीवर की कथा रही:
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।
ओ महाप्राण !
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती !
किन्तु न रीती !

कवि : रामविलास शर्मा

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अब कहां यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाटवाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
घूसर संध्या में कवि उदास है बीतराग !
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण,- ज्योति का सहस्नार।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिये लेख,
गाते हैं वन के विहग ज्योति का गीत एक।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।
इन वन्य जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छंट गया तीक्ष्‍ण बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि घूसर प्रकाश।
उस वज्र हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिये विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।
कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक  कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।

मैं और मेरा लेखन : बालशौरि रेड्डी

अपने रचनाकर्म के बारे में बता रहे हिंदी और तेलुगु के बीच सेतु का काम करने वाले वरिष्‍ठ लेखक बालशौरि रेड्डी

मैं अपने गत बीस वर्ष की साहित्यिक सर्जनात्मक प्रक्रिया पर विचार करता हूँ, तो मेरे समक्ष कई मर्मस्पर्शी प्रसंगों का स्मरण ताज़ा हो उठता है। वे स्मरण मुझे पुलकित कर देते हैं।

बीस वर्ष का समय किसी भी लेखक के जीवन में कम महत्व का नहीं होता। यौवन के प्रांगण में पग धरते मैंने कुतूहल, जिज्ञासा और आश्‍चर्यजनक प्रकृति का निरीक्षण किया। प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के अवलोकन से मेरा हृदय संभ्रम एवम् हर्षातिरेक से भर उठा और उस वक्‍त मेरे हृदय में जो स्पन्दनशीलता हुई उसके कारण अनुभूतियाँ बहिर्गत होने को मचल उठीं। फलतः सर्जनात्मक प्रक्रिया साकार हो गई।

मैंने 1948 में लिखना शुरू किया। मेरी पहली रचना हिन्दी में प्रकाशित हुई।

प्रारम्भ में मेरी रुचि निबन्ध लिखने की रही। किसी विषय-विशेष से मैं प्रभावित होता अथवा तत्सम्बन्धी सम्यक्-ज्ञान प्राप्त करता, तभी मैं उस विषय के सम्बन्ध में अपने मन्तव्य व्यक्त करने के लिए लेखनी उठाता।

परिचयात्मक और ज्ञानवर्धक लेख मेरे काफी प्रकाशित हुए। प्रायः उन दिनों में जो भी मेरी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, उनका विषय प्रधानतः सामयिक रहा। यद्यपि सामयिक घटनाओं के परिवेश में मैंने स्थायित्व का स्पर्श करने का अवश्य प्रयत्न किया है, इस कार्य में मुझे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई, कह नहीं सकता, परन्तु इससे मुझे आत्म-सन्तोष अवश्य प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिए उस समय सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

आत्म-प्रकाशन की जो मूल-प्रवृत्ति या सहज-वृत्ति स्वभावगत होती है उसी से मुझे लिखने की प्रेरणा मिली।

वैसे मेरी प्रेरणा के अनेक स्रोत हैं। मैं कह नहीं सकता, अभिव्यक्‍त‍ि की राह में किस स्रोत का प्राधान्य रहा, किन्तु इतना सत्य है कि विन्ध्याचल समीपवर्तिनी प्रकृति ने मेरे हृदय को आवश्यकता से अधिक अभिभूत किया, परिणामस्वरूप निसर्ग की उस अपूर्व सुषमा की अर्चना करते मेरी अनुभूतियाँ अभिव्यक्‍त होने को तड़प उठीं।

प्रकृति और हृदय के बीच में जो सौन्दर्य का सेतु बन गया, वह आदान-प्रदान का, आराधन-अर्चन का मार्ग प्रशस्त कर गया। हृदय का सुमन खिल उठा, अनुभूति रूपी भ्रमर गुंजार करने लगे। इस प्रकार नीरवता में निसर्ग संगीत की लहरी शून्य को ध्वनि प्रकम्पित करने लगी।

हृदयस्थ बालकवि गुनगुना उठा। तुकबन्दी हुई। उस कविता पर उछल पड़ा, उसे बार-बार पढ़ा, गुनगुनाया, उसे हृदय से लगाया।

मुझे लगा-आज नहीं तो कल, सफलता का द्वार अपने आप खुल जाएगा। गतिशील हूँ, लक्ष्य दूर नहीं है, किन्तु जब मैं मूर्धन्य कलाकारों की कृतियों का अध्ययन करता और अपनी अनुभूतियों के साथ मिलान करके देखता तो मुझे प्रतीत होता कि मेरी भावात्मक पूँजी अत्यल्प है और मैं उन महाकवियों के समक्ष निर्धन हूँ।

क्रमशः मुझे विदित हुआ कि मैं जिस रूप में अपने को अभिव्यक्‍त करना चाहता हूँ, कर नहीं पाता हूँ। यद्यपि दो-तीन मित्रों ने जो साहित्यिक हैं, मेरी कविता की प्रशंसा की, उत्साहवर्द्धक वचन कहे, लेकिन मुझे सन्तोष नहीं हुआ। मेरे मन के भीतर-ही-भीतर असन्तोष की आग सुलग रही थी। मैंने सोचा, यदि मैं इस असन्तोष को इसी प्रकार पालता रहूँ, तो एक दिन अवश्य पागल हो जाऊँगा। इसी संशयात्मा को लेकर मैं अपने आचार्य पण्डित गंगाधर जी मिश्र की सेवा में पहुँचा और उनसे अपनी आत्मग्लानि की बात बतायी। पण्डित जी ने बड़ी सहानुभूति, सहृदयता और वात्सल्य-भाव से मुझे समझाया-‘रेड्डी जी, मैं सच्ची बात कहूँगा, तुम निराश न होना। क्योंकि मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ और तुम्हारी प्रतिभा से भी परिचित हूँ, इसीलिए मैं तुमको ग़लत राह पर छोड़ना नहीं चाहता। सत्य तो यह है कि जितना अच्छा गद्य लिख सकते हो, उतनी अच्छी कविता नहीं। मेरा अनुभव यह बताता है कि गद्य के प्रति तुम्हारी स्वाभाविक जो अभिरुचि है, जो झुकाव है, जो लगन है, वह कविता के प्रति चाहते हुए भी नहीं हो सकती। तुम जो अभिरुचि दिखाते हो या दिखाने की चेष्टा करते हो अथवा दिखाना चाहते हो वह कृत्रिम है। अतः तुम्हारे हितैषी के नाते मेरी यह सलाह है, तुम समय और सन्दर्भ के अनुरूप गद्य की विभिन्न विधाओं पर कलम चलाओ, अवश्य तुम्हें सफलता मिलेगी।’

पण्डित जी का यह सुझाव मेरी भावी साहित्यिक सर्जनात्मक यात्रा का पाथेय बना और सम्बल बना।

मैंने निबन्ध लिखना शुरू किया- उत्साह और अहम् के प्रकटीकरण के हेतु। मेरे उत्साह को उत्साहित किया श्री काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रमर’ तथा श्री कमलापति त्रिपाठी ने।

मेरी पहली रचना ‘ग्राम संसार’ में छपी। जिस दिन रचना छपी उस दिन मेरे अन्तर में ऐसा ज्वार उठा जिसने मुझे इतना प्रभावित किया कि मेरी रचना का कार्य निरन्तर गतिमान रहा। मैंने अपनी रचना को चार-पाँच बार पढ़ा, जो कोई सामने आया उस को दिखाया, सलाह एवं सुझाव माँगा।

युगाराध्य सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने मुझे अच्छे सुझाव दिये। मैं वाराणसी में गाय घट पर जहाँ रहता था, निराला जी भी आचार्य गंगाधर मिश्र जी के साथ वहीं रहते थे। निराला जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का भी मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि मैं उनसे प्रेरणा ग्रहण कर लिखता गया।

वाराणसी में रहते मैंने लिखा अत्यल्प, परन्तु अध्ययन अधिक किया। विभिन्न प्रकार की शैलियों से परिचित होता गया और अपनी प्रिय विधाओं के सूक्ष्म निरीक्षण में प्रवृत होता गया। उस प्रकार परोक्ष रूप में मेरे भीतर का लेखक बन रहा था।

कोई भी व्यक्‍त‍ि एकाध दिन में लेखक नहीं बन बैठता। यद्यपि सृजानात्मक प्रवृत्ति अभिव्यक्ति की राह ढूंढ़ती रहती है, तथापि अनुभूतियों के परिपक्व होने पर ही वे स्पष्ट रूप से बहिर्गत होती हैं। अध्ययन, सामाजिक अनुभव, चिन्तन-मनन, पर्यटन इत्यादि विचारों में गहनता, व्यापकता और सम्पन्नता लाते हैं।

मद्रास में साहित्य विभाग में कार्य करते विभिन्न विषयों के संकलन तैयार करने, लेख लिखने, भूमिका तथा टिप्पणियाँ लिखने में अच्छा अनुभव प्राप्त हुआ।

प्रारम्भ में कतिपय प्रमुख पत्रों में मैंने अपनी इच्छा से रचनाएँ भेजीं और वे प्रकाशित भी हुईं। तत्पश्‍चात् विविध पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों ने रचनाएँ माँगते मेरा आह्वान किया, यथायोग्य पारिश्रमिक भी दिया। यहाँ से मेरा लेखन-व्यवसाय कुछ योजनाबद्ध हो गया। प्रतिदिन नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखता गया, साथ ही साथ अध्ययन भी चालू रहा।

मैंने विभिन्न विषयों पर समीक्षात्मक लेख लिखे। उनका हिन्दी-जगत में अच्छा स्वागत भी हुआ। सम्पादक और पाठकों ने भी प्रशस्ति के पत्र भेजे। मैं कुछ और सँभल कर लिखने लगा।

रचना की मेरी दूसरी प्रक्रिया अनुवाद की रही है। मैंने कभी अपनी इच्छा से कोई अनुवाद नहीं किया। प्रायः मेरे सभी अनुवाद सम्पादकों की माँग पर ही किये गए हैं।

मेरे लेखन कार्य में अनुवाद की भी अच्छी परम्परा रही है और आज तक मैंने तेलुगु से हिन्दी में ढाई हजार पृष्ठों से अधिक अनुवाद किया है।

मेरी सर्जनात्मक रचनाएँ विविध रूपों में आई हैं। उनमें निबन्ध, उपन्यास, एकांकी, कहानी, जीवनियाँ, साहित्य, इतिहास, रेडिया-वार्ता, भाषण और अनुवाद मुख्य हैं।

पुस्तक रूप में प्रकाशित मेरी पहली कृति ‘पंचामृत’ है। इसके लेखन की प्रेरणा और योजना के सूत्रधार पण्डित श्रीराम शर्मा है। मुझसे सर्वथा अपरिचित होते हुए भी उपर्युक्‍त पुस्तक के लेखन का कार्य मुझे सौंपा और मैंने बड़ी ही निष्ठा और ईमानदारी से यह कार्य तीन महीने के अन्दर पूरा किया।

‘पंचामृत’ में तेलुगु के पाँच युग-प्रवर्तक कवियों के कृतित्व एवम् व्यक्तित्व पर विश्‍लेषणात्मक समीक्षा के साथ उनकी कृतियों के प्रमुख अंशों का हिन्दी रूपान्तर भी प्रस्तुत हुआ है। प्रारम्भ में तेलुगु साहित्य की धारा का संक्षिप्त परिचय तथा छन्द, अलंकार आदि का विवेचन भी हुआ है। अन्त में शब्दार्थ भी परिशिष्ट के रूप में जोड़ दिये गए हैं।

हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं में इसकी अच्छी समीक्षा हुई। उद्भट विद्वानों की प्रशंसा प्राप्त हुई। यह कृति सन् 1954 में प्रकाशित हुई और 1956 में भारत सरकार के शिक्षा-मंत्रालय ने दो हजार रुपयों का पुरस्कार देकर इसे सम्मानित किया और उसी वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने भी तीन सौ रुपये का पुरस्कार इसी ग्रन्थ के लिए प्रदान किया।

शासन द्वारा सम्मानित होने पर लेखक का दायित्व बढ़ गया। बड़ी जिम्मेदारी के साथ लिखने की आवश्यकता हुई।

पहली कृति के द्वारा मौलिक लेखन और अनुवाद-दोनों प्रक्रियाओं का सूत्रपात हुआ। ये दो धाराएँ समानान्तर होकर अबाध-गति से प्रवाहित होने लगीं।

उन धाराओं की पुष्टि ‘आन्ध्रभारती’ और ‘अटके आँसू’ कृतियों द्वारा हुई।

‘आन्ध्रभारती’ मेरे द्वारा समय-समय पर हिन्दी के विभिन्न पत्रों में प्रकाशित तेलुगु साहित्य सम्बन्धी विविध विधाओं पर प्रणीत गवेषणात्मक निबन्धों का संग्रह है। इसमें कुल बीस निबन्ध हैं। दो-चार तुलनात्मक भी हैं। यह ग्रन्थ सन् 1959 में कला निकेतन, पटना द्वारा प्रकाशित हुआ और 1960 में उ.प्र. शासन द्वारा पुरस्कृत हुआ। इसकी भूमिका हिन्दी के यशस्वी विद्वान् डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा स्व. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने लिखी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उस पर अच्छी सम्मति भेजकर लेखक को प्रोत्साहित किया था।

‘अटके आँसू’ तेलुगु की बारह उत्तम कहानियों का संग्रह है। विभिन्न लेखकों की ये कहानियाँ तेलुगु कहानी की प्रवृत्तियों और शैलियों का परिचय कराती हैं। इसकी भूमिका स्व. आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखी। उन्होंने मेरी पहली कृति ‘पंचामृत’ की समीक्षार्थ आई हुई देख, उसका बड़े प्रेम से अध्ययन ही नहीं किया अपितु उस पर ‘साहित्य’ में (अक्टूबर सन् 1955 के अंक में) सम्पादकीय भी लिखा था।

इन कृतियों के प्रकाशन के बाद लेखक को हिन्दी जगत से पर्याप्त प्रोत्साहन प्राप्त हुआ और साथ ही विभिन्न प्रकाशकों से पुस्तकों की माँग करते हुए कई पत्र भी मिले। उस समय से लेकर आज तक मेरी विविध विषयों पर अठारह पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं।

उनमें मौलिक और अनुवाद की संख्या समान कही जा सकती है।

अनुवादों में कहानी-संग्रहों की संख्या अधिक है। राष्ट्रभाषा-प्रचार समिति, वर्धा ने मेरी सोलह अनूदित कहानियों को ‘तेलुगु की उत्कृष्ट कहानियाँ’ नाम से प्रकाशित किया। ‘हिन्द पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड’, दिल्ली ने ‘तेलुगु की श्रेष्ठ कहानियाँ’ नाम से बारह कहानियाँ और आन्ध्र प्रदेश साहित्य अकादमी, हैदराबाद ने ‘तेलुगु की बीस कहानियाँ’ प्रकाशित कीं।

भारतीय ज्ञानपीठ, काशी से राष्ट्र-भारती ग्रन्थमाला के अन्तर्गत मेरे द्वारा अनूदित एकांकी संग्रह ‘नयी धरती’, ‘तेलुगु की प्रतिनिधि रचनाएँ’ नाम से प्रथम-पुष्प के रूप में प्रकाशित हैं। वह तेलुगु के विख्यात नाटककार, कवि एवम् निबन्ध लेखक श्री नाल वेंकटेश्‍वर राव, एम.पी. सम्पादक ‘दैनिक आन्ध्रज्योति’ के एकांकियों का अनुवाद ही है।

मद्रास उच्च न्यायालय के भूतपूर्व प्रधान न्यायाधीश श्री पी.वी. राजमन्नार के सुप्रसिद्ध सामाजिक नाटक ‘मनोरमा’ का हिन्दी रूपान्तरण किया जो ‘नेशनल पब्लिशिंग हाउस’ दिल्ली से प्रकाशित है।

तेलुगु के सुप्रसिद्ध कवि व लेखक श्री तोरि नरसिंह शास्त्री के ऐतिहासिक उपन्यास ‘रुद्रमा देवी’ का हिन्दी रूपान्तरण साहित्य अकादमी दिल्ली के लिए किया। अन्य मौलिक रचनाओं में ‘तेलुगु-साहित्य का इतिहास’ अपनी अलग विशिष्टता रखता है। मैंने गत दस-बारह वर्षों में तेलुगु साहित्य का जो अध्ययन एवम् अनुशीलन किया उसका सुन्दर फल यह ग्रन्थ है। साढ़े तीन सौ पृष्ठों में प्रकाशित यह ग्रन्थ हिन्द समिति, सूचना विभाग, उ.प्र. सरकार, लखनऊ द्वारा प्रकाशित है। इस ग्रन्थ के प्रणयन में मैंने जितना श्रम किया उतना शायद अन्य किसी ग्रन्थ के लिए नहीं किया।

ग्रन्थ के प्रारम्भ में मैंने तेलुगु प्रदेश का भौगोलिक स्वरूप प्रस्तुत किया है। तदुपरान्त आन्ध्र का वैदिककाल से लेकर भाषावार-प्रान्त रचना तक व इतिहास संक्षेप में दिया है। इसके बाद क्रमशः तेलुगु भाषा की प्रशस्ति, विकास का परिचय कराया है। इसके अनन्तर तेलुगु के समस्त साहित्य को छः युगों में विभाजित कर प्रत्येक युग की पृष्ठभूमि के साथ उस युगीन परिस्थितियों, कवियों तथा उनकी कृतियों का भी सम्यक् विवेचन किया है।

हिन्दी से भिन्न प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डालते हुए उन परम्पराओं का भी विश्‍लेषण कर गद्य और पद्य की विविध धाराओं का समग्र विकास संक्षिप्त में प्रस्तुत किया। यह ग्रन्थ तेलुगु और हिन्दी विद्वानों के द्वारा भी प्रशंसित है। इसकी भूमिका हिन्दी समिति के तत्कालीन सचिव श्री ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखी है। हिन्दी के महाकवि डॉ. रामधारी सिंह दिनकर ने आमुख लिखा है।

‘सत्य की खोज’ मेरे मौलिक बालकोपयोगी एकांकियों का संग्रह है। ‘आन्ध्र के महापुरुष’ और ‘तेलुगु की लोक-कथाएँ’ भी पर्याप्त लोकप्रिय हुई हैं।

इस समय मेरे लेखन की दिशा कथा-साहित्य की है।

उपन्यास लिखने की न मैंने कभी कल्पना की थी और न योजना ही बनायी थी। मैं इसे संयोग की ही संज्ञा दूँगा कि अचानक एक दिन राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली के अधिपति श्री विश्‍वनाथ मल्होत्रा जी से पत्र मिला कि मैं उन्हें एक उपन्यास लिख कर दूँ। पत्र पाते ही मैं चौकन्ना हो गया। सोचा कि लिख दूँ कि उपन्यास लिखना नहीं जानता हूँ। फिर मन में आया कि जब प्रकाशक यह विश्‍वास करते हैं कि मैं उपन्यास लिख सकता हूँ तो मुझे यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि मैं नहीं लिख सकता।

वैसे मैंने हिन्दी के प्रायः सभी प्रमुख उपन्यासों का अध्ययन किया था, उनपर आलोचना पढ़ी थी, उपन्यास की कला की बारीकियों का सैद्धान्तिक ज्ञान भी रखता था। उपन्यास लिखने की रीति-नीतियों से परिचित था। फिर क्या था, मैं कथावस्तु का अन्वेषण करने लगा।

विचार करते-करते मेरे मस्तिष्क में यह बात आई कि शबरी का चरित्र जो रामायण में चित्रित है, उसकी पृष्ठभूमि तथा उस युगीन स्थितियों का उसमें वर्णन नहीं हुआ है। मुझे उन दिनों में तेलुगु के अनेक रामचरित सम्बन्धी काव्य ग्रन्थों का अनुशीलन करना पड़ा था। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अभिनन्दन ग्रन्थ के लिए ‘तेलुगु साहित्य में रामचरित’ शीर्षक पर एक निबन्ध लिख भेजने का आदेश दिया था। उस सन्दर्भ में शबरी के चरित्र से बहुत प्रभावित हुआ।

परिणामस्वरूप अध्यात्म रामायण तथा रामायण सम्बन्धी अनेक आलोचनाएँ और रामायणकालीन सांस्कृतिक एवं सामाजिक दशा का भी अध्ययन किया। शबर जाति से सम्बन्धित तेलुगु साहित्य में उपलब्ध ग्रन्थों के अवलोकन से मुझे विदित हुआ कि शबरी के जीवन के पूर्वी तथा परवर्ती सामाजिक परिवेश में एक कल्पनात्मक सुन्दर औपन्यासिक कृति प्रस्तुत की जा सकती है।

मैंने स्थानीय कॉलेज के एक प्राध्यापक को बुलाया। उन्होंने मुझे यह आश्‍वासन दिया कि आप बोलते जाइये, मैं लिखता जाऊँगा। मैंने उपन्यास की परिकल्पना कथावस्तु की रूपरेखा दस पृष्ठों में तैयार की। सुबह और शाम बोलता गया। तेईस दिनों में उपन्यास तैयार हुआ। मैंने पाण्डुलिपि को आद्यन्त एक बार पढ़ा। आवश्यक सुधार, काट-छांट करके टाइप के लिए दिया। टाइप की हुई एक प्रति प्रकाशनार्थ भेज दी।

‘शबरी’ पाठकों के हाथों में पहुँची। हिन्दी जगत् ने अच्छा स्वागत किया। देखते-देखते दो संस्करण निकल गए।

सुप्रसिद्ध कथाकार श्री आरिगपूड़ि ने ‘दक्षिण भारत’ (जनवरी 1960) में ‘शबरी’ की समीक्षा करते लिखा-‘शबरी’-जैसा कि नाम सूचित करता है, रामायण की पृष्ठभूमि में लिखा गया है, पर यह रामायण की एक भिन्न शैली व माध्यम में पुनरावृत्ति नहीं है। यह मौलिक है- कथावस्तु में और कथाशैली में भी। उपन्यासकार ने कल्पना की लम्बी और ऊँची उड़ान ली है, पर यथार्थता का साथ नहीं छोड़ा। शैली विषयोचित हैं। इसमें गम्भीरता है, गति है।

यह श्री रेड्डी का उपन्यास-क्षेत्र में प्रथम प्रयास है, पर इसमें प्रथम प्रयास की कदाचित् कोई त्रुटियाँ हों। विचारों की गम्भीरता है ही, अभिव्यक्ति की कला में भी वे सिद्धहस्त हैं।’

यह उपन्यास इस समय हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास की विशारद परीक्षा की पाठ्य पुस्तक है।

राजपाल एण्ड सन्स ने मुझसे एक और उपन्यास माँगा। इस बार मैंने ‘जिन्दगी की राह’ लिखा। इस उपन्यास के कारण ही मुझे विशेष ख्याति मिली। भारत सरकार के शिक्षा-मन्त्रालय ने 1966 में पन्द्रह सौ रुपये का पुरस्कार देकर मेरा उत्साहवर्धन किया। इसके भी तीन-चार संस्करण निकल गए। और इस समय श्री वेंकटेश्‍वर विश्‍वविद्यालय, तिरुपति में बी.ए. की पाठ्य-पुस्तक के रूप में नियत है।

मेरा तीसरा मौलिक उपन्यास-‘यह बस्ती-ये लोग’ है, जो एस. चाँद एण्ड कं., दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। यह भी सामाजिक उपन्यास है। नगरीय सभ्यता पर व्यंग्यात्मक चित्रण उपन्यास में हुआ है।

चौथा मौलिक उपन्यास-‘भग्न सीमाएँ’ है जो राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित है। इस उपन्यास का भी हिन्दी पाठकों ने बड़ा अच्छा स्वागत किया। इसके दो संस्करण निकल गए हैं और इस वक़्त आन्ध्र विश्‍वविद्यालय, वालटेर में पी.यू.सी. में नियत है।

पाँचवाँ उपन्यास-‘बैरिस्टर’ है जो राजपाल एण्ड सन्स द्वारा इस मास में प्रकाशित होनेवाला है, छप कर तैयार है।

छठा मौलिक उपन्यास-‘एक स्वप्न: एक सत्य’ है। मेरे विचार में यह उपन्यास अपने ढंग का है। इसमें मैंने कुछ नवीनता दर्शाने का अवश्य प्रयास किया है। इस उपन्यास में सहायक पात्रों की संख्या कुछ अधिक है। प्रधान पात्रों के सम्पर्क में आने वाले कतिपय आंगिक पात्र सदा साथ नहीं चलते, अपितु घटना-चक्र के अनुरूप उभरते और लुप्त भी होते जाते हैं।

इस उपन्यास की अधिकांश घटनाएँ यथार्थ होते हुए भी काल्पनिक हैं और काल्पनिक होते हुए भी यथार्थ हैं। कल्पना और यथार्थ की क्रीड़ास्थली यह उपन्यास है। इस उपन्यास में स्वप्न आदर्श है और सत्य यथार्थ है। जीवन में द्वन्द्वात्मक अनुभूतियाँ स्वप्न और सत्य का उद्घाटन करती जाती हैं और उसे सहजता प्रदान करती हैं।

मैं इसे अपना सौभाग्य ही समझूंगा कि मुझे हिन्दी के अच्छे प्रकाशक मिले हैं। मेरी आदत रचना लिखकर रखने की कभी नहीं रही है। जब कभी कोई प्रकाशक रचना माँगता है, तभी मैं लिखकर देता हूँ। किन्तु मैं अब अनुभव करने लगा हूँ कि अवकाश के क्षणों में कुछ-न-कुछ लिखकर रखूँ ताकि उसका उपयोग अनुकूल वातावरण के मिलते ही कर सकूँ।

वैसे इस वक्‍त मेरी प्रवृत्ति उपन्यास लिखने की ओर अधिक है। इन दिनों में मुझे लिखने की प्रेरणा बहुधा समाज से ही प्राप्त होती है। नित्यप्रति होनेवाली घटनाओं, समाचार-पत्रों, कार्टूनों, मित्रों तथा परिचित व्‍यक्तियों की आप-बीती घटनाओं, यदा-कदा चित्रों से भी मुझे प्रेरणा मिलती है। ग्रन्थ तथा पत्रिकाओं के पठन के समय उनसे सम्बन्धित समानान्तर भावनाएँ जो कि मेरे अनुभव में सुनने तथा देखने में आई होती हैं, मेरी संवेदनशीलता द्वारा पुष्ट होकर अभिव्यक्‍त होने को मचलती हैं।

प्राकृतिक दृश्य, मूक-प्राणी, सिनेमा आदि भी मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं। जब कभी विभिन्न व्यक्तियों के मुखमण्डलों का सूक्ष्म निरीक्षण करता हूँ तब उन पर प्रकट होने वाले भावों को पढ़ने का प्रयास करता हूँ और उनके अन्तःकरण में प्रविष्ट हो जाता हूँ, तब मेरे मस्तिष्क और हृदय में जो मन्थन होता है तथा उसके कारण मेरे मानस पर जो स्थाई प्रभाव पड़ता है, उससे प्रेरित होकर तटस्थ-बुद्धि से विचार करता हूँ और अपनी अनुभूतियों को परिष्कृत कर लेता हूँ।

मैं जब कभी कुछ लिखता हूँ, अथवा लिखाता हूँ, उस समय मैं इस बात का अवश्य ध्यान रखता हूँ कि मैं जिस भाव का चित्रण करूँ, वह केवल एक हृदय का न हो, असंख्य हृदयों का उसमें प्रतिबिम्ब हो। वह स्वाभाविक हो तथा पाठकों के हृदयों को उद्वेलित कर सके।

मैं अपनी रचनाओं के लिए अधिकांश घटनाओं का चयन अपने अनुभव, अध्ययन, यात्रा, चिन्तन-मनन द्वारा करता हूँ, तार्किक-बुद्धि से उन पर विचार करता हूँ। इस प्रकार श्रवण, दृश्य, मनन व अध्ययन के पश्‍चात कल्पना का सहारा पाकर मेरी अनुभूतियाँ कथा का रूप धारण करती हैं।

मैं अपने अध्ययन-कक्ष में लिखने या लिखाने बैठता हूँ तो बच्चों के कोलाहल, रेडियो की ध्वनि से भी मैं विचलित नहीं होता हूँ।

मेरे लिखने व लिखाने का समय प्रातःकाल साढ़े सात बजे से दस बजे तक, रात को छह से दस बजे तक। विशेष स्थिति में ही रात में बड़ी देर तक जाग कर लेखन-कार्य करता हूँ।

मैं समय पर भोजन व निद्रा के पालन का अधिक ध्यान रखता हूँ। यदि लिखने की रुचि नहीं रही तो कभी-कभी दो-तीन महीनों में केवल अध्ययन, यात्रा इत्यादि में ही समय बिता देता हूँ। कोई रचना शुरू करता हूँ तो उसके पूरा होने तक मैं कभी विराम नहीं लेता।

लिखने या बोलने के पूर्व मैं योजना-सूत्र बना लेता हूँ। संक्षेप में, लेखन के समय मेरा ध्यान इस दिशा में अवश्य रहता है कि उपन्यास का कलेवर इतने पृष्ठों से ज्यादा न हो। अनावश्यक कलेवर न बढ़े। संक्षेप में सारी बातें आ जाएँ। यही कारण है कि मैंने अपने प्रारम्भिक पाँच उपन्यास दो सौ पृष्ठों के लिखे हैं। छठा उपन्यास पाँच सौ पृष्ठों का योजनाबद्ध होकर ही बन सका है।

मेरी धारणा है एक लेखक के लिए साहित्यिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, अपितु जीवन से सम्बन्धित सभी क्षेत्रों एवं विषयों का प्राथमिक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।

अनुवाद के सम्बन्ध मे मेरी मान्यता है कि अनुवाद में मूल-भावों के सौन्दर्य की रक्षा हो तथा अनूदित भाषा की प्रकृति का प्रतिबिम्ब हो।

प्रत्येक भाषा में उस प्रदेश की सांस्कृतिक, सामाजिक तथा जीवन शैली का दृष्टिकोण निहित रहता है। यदि अनुवाद करते समय उसका सजीव चित्रण नहीं होता तो दूसरी भाषा में उसका विकृत अथवा कृत्रिम स्वरूप ही उपस्थित नहीं होता, अपितु मूल लेखक के प्रति अन्याय भी होगा।

अनुवाद की शैली में गति हो। पढ़ते समय पाठक को यह प्रतीत न हो कि यह अनुवाद है। यदि अनुवाद में मूल तादात्म्य न हो तो वह उत्तम अनुवाद नहीं कहलाएगा। अनुवाद में शब्दों की ध्वनि तथा ध्यानिगर्भित विचारों को उसी रूप में उतारना आवश्यक है।

(अपने-अपने बालशौरि रेड्डी से साभार)