12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्बे चकियाँ में जन्मीं डॉक्टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू. से पी-एच.डी. की है। इनके लेख–कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कुछ कवितायें-
अस्थायी
अख़बारों के चंद पन्नों में सिमटी जिंदगियों में
ताजेपन सा कुछ भी नहीं
रात के पड़े खाने सुबह की तरह
रोते-बिलखते मासूम चेहरे पल के मेहमाँ
गाते-गुनगुनाते मुखड़े होंठो की चुभन
एक क्षण के पश्चात ढल जाते हैं रात्रि सरीखे
चंद चर्चाओं के बाज़ार क्षणिक गरम, तवे से
छपाक-छपाक की भड़ास क्षण में गायब
रेत पर गिरे बूंदों के अस्तित्व के मानिंद
बरखा-बहार और मधुवन की मधुर ध्वनि
धड़कनों में शोर मचाते खलबली अभी-अभी
करवट के साथ पन्ने पलटते दृश्य और दृष्टि बदले सभी
परिवर्तित परिवेश की पुकार सुनाई देती कभी-कभी
सुमधुर योजनाओं की ललकार दिखाई देती चहुओर
न रुकने वाली वक्त की सुइयाँ टीम-टीम कर लुप्त होतीं
एक चेहरा उभरता है प्रेयसी के जुल्फों में कैद
चितवन की चंचलता चहक उठती
नयेपन का अंदाज़ पलक झपकने के साथ
बुलबुले से अस्तित्वविहीन हो जाता
खबरों की दुनिया में निरंतर गहमागहमी बनी रहती
निरुउत्तर प्रजा पल्लवित पुण्य बनी हुई
लेकिन भू धरा थमने के जगह डोलती रहती
थिरकती साँसों के लय पर वायु नृत्य करते
नटते, रिझते और रिझाते रम्भाने लगते
पात्र में रखे पानी सा मटमैला और फीका बन जाते
दिखने में धवल और स्वच्छ लगते
भागते, दौड़ते कल्पना के सागर में छलांग लगाते
छलकते आँसू रंगीन चित्रों के गुजरते ही सूख जाते
चिथड़े-चिथड़े सुख की तलाश में निकल पड़ते एक और लम्बी यात्रा पर
नंगे, खुले और खुरदरे पैरों के निशान जह-तह बिखरे पड़े
उनकी आवाज़ाही का कोई स्थायी प्रमाण नहीं
नर-शरीर की तरह अस्थायी, क्षणभंगुर और जुगनू की तरह
यहाँ सब कुछ सिमटा हुआ है बिखरे तौर पर
ढेर में तब्दील होते मलबा सा नहीं
बल्कि सपनों के कलेजे पर बिछे फूलों के कतारों की तरह
एक-एक कतरन से तैयार वस्त्र सा सुसज्जित, आकर्षक किन्तु अस्थायी
इस जिंदगी के बदले
इस जिंदगी के बदले
दो जून की रोटी नहीं मिली
सौदों के अम्बार मिले जिनकी वजह से नर्क के द्वार खुले
हँसते-खिलते गुलशन में
पतझड़ सदियों से बने हुए हैं
पगडंडियों से झुरमुट की तरह रौंद दिये गये
एक-एक करके चुने गए उम्मीद के दाने
भेड़-बकरियों में बाँट दिये गये
गर्दन जबह करके जबरदस्ती जुराबे बाँधी गई
कपड़े तार-तार कर दिये गये…!
इस जिंदगी के बदले
खपचालियाँ घोंप-घोंप कर मुरब्बे बना दिये गये
चीनी की जगह नमक रगड़ा गया
स्वाद लेकर चखने के स्थान पर
कसैले पान की तरह थूक दिये गये
खाने के लिये जूठन परोसे गये जैसे ज़ायकेदार छप्पन भोग
छटपटाहट होती रही लेकिन कोलाहल न बन सके
हवन कुण्ड में डाले गये घी की भाँति
धीरे-धीरे जलते हुए बदबू फैलाने लगे
गीली लकड़ी की तरह सुलग-सुलग कर
इस जिंदगी के बदले
मुझे बना दिया गया
आस्मा से गिरती हुई ओसें की बूंदें
पशुओं के आगे पड़े चारे के तिनके की भाँति
बिछा दिये गये अरमान के सारे उपागम
ठहरे हुए पानी के चारों-ओर
फैली हुई बजबजाती काई
जिसके चौमुहाने पर जैसे भिनभिनाती मख्खियाँ
मछली की सी तड़फाड़ाहट
उथल-पुथल करती नसें
इस जिंदगी के बदले
हमें दिये गये
बदलते विस्तर की तरह रोज़ एक नई सेज
उठाये-बिछाए जाते रहे
एक दिन से कई रातों तक
फैले बदबू से गहन घृणा के पात्र बनने तक
बेमज़ा भोजन की तरह
पटक दी जाती थाली सी
वदन माज दिए जाते
पेस्ट से घिसते दाँतों से
मशीन में काट दिये जाते चारे की तरह
इस जिंदगी के बदले
धब्बे लगी दीवार में तब्दील कर दिये जाते
एक नामुराद मुलाजिम की तरह
धकिया दिये जाते
घुटन के मकान में कैद किये जाते
परिंदे के पर काटकर उसे उड़ने पर मजबूर से किये जाते
हथेलियों पर अंगारे रख दिये जाते
बर्फ के टुकड़े मुख में घुसेड़ कर
आँखों में फूलों के सेज सजाये जाते
सिसकी अन्तःपुर में सुरक्षित रह जाती
इस जिंदगी के बदले
खुरपी पकड़ाकर बिराने में ठेल दिये जाते
उड़ती रेतों को पकड़ने की फरमाईश की जाती
घुमड़ते बादलों के झुर्रियों को गिनवाए जाते
एक बैल की तरह बलुहट में जोत दिये जाते
ताबूत में कैद लाश से जुगाली कराई जाती
पर्वत शिखरों पर जमें बर्फ के रेम्बों दिखाये जाते
अनसुनी कहानियों के किस्से दोहराते हुए
गरम तवे पर रोटी सेंकती उसे ठंडा लोहे में परिवर्तित कर दिये जाते
फिर घन पर घन बरसाए जाते
उसके सपाट होने तक
इस जिंदगी के बदले
नेत्रों पर चिलमन चढ़ा दिये गये
झूठे वादों के साथ दगा ही मिले
कुत्तों की तरह बोटी-बोटी नोचकर खाए
भूखे पेट पर रोलर चलाकर
जश्न मनाने की मन्नत मानी गई
धमकियों के दम पर धमनियाँ जब्त कर लिये गये
तपते रेत पर छोड़ दिये गये
महल की नींव रखने के लिये
इमारत के चारों पाए कूल्हों पर टिका दिये
भावी रिश्तों के नाम पर सब कुछ होता रहा
इस जिंदगी के बदले
खच्चर सरीखे लादी ढोते रहे
लगन कभी भी कम न हुई
चाहत के दिये जलते रहे
एक-एक दिन गुजरते गये उम्मीद बंधी रही
सुबह की किरण फूटते ही
हिम्मत की ताकत दुगुने दम से लग जाती
लेकिन बेड़ियों में कैद जिंदगी
अपने अंत की ओर बढ़ रही थी
उसे रोकना मुमकिन न था
हथौड़े की मार से जिस्म बेजान हो गये
इस जिंदगी के बदले
यातना के सागर में डुबो दिये गये
खारे पानी से गल गये
हड्डियों का ढ़ाँचा बरकारार रहा
युगों-युगों तक सिला की तरह
लहराते ख़्वाब खो गये
यादों के पट पलकों में खुल रहे हैं
चीनी-जल की तरह घुल गये
जीवन से इस कदर मोह बढ़ता रहा लेकिन उड़ान भरने की मनाही थी
वह आज भी बरौनियों में मसखारे से चिपके हैं
सूरज कुछ कहता
सूरज कुछ कहता है
सदा चुप-चुप रहता है
बंधनमुक्त विचरता है
स्नेहमग्न उलहना देता है।
धूप की तपिस तड़प रही है
अनजाने जख्म से जूझ रही है
कब मुक्त होंगें कर्तव्य से
पीड़ा की वेदना व्यथा सुना रही है।
नीरव में पड़े तन्हा खड़े हैं
दयार्द्र की उम्मीद से भरे हैं
मदांध मानव से गिला है
हम भी प्रेमातुर हेतु बने हैं।
यावज्जीवन के आमरण हैं
प्रतिक्षण के विवरण हैं
कष्टापन्न को सहते हैं
देशार्पण में लगे रहते हैं।
मार्गव्यय का लोभ नहीं है
सदाचार में तल्लीन हैं
व्यभिचार से रिश्ता नहीं है
भयमुक्त संचित नरोत्तम हैं।
नीलाम्बर के वासी हैं
पृथ्वीजन के पोषक हैं
शरणागत के दास हैं
कलाप्रवीण विद्यार्थी हैं।
धर्मविमुख नहीं करते हैं
पथभ्रष्ट के भी हमराही हैं
अँधेरे के दुश्मन हैं
उजाले के देवालय हैं।
पनचक्की से घुमरते हैं
देहलता से लिपटते हैं
नीलकमल से सुसज्जित हैं
पीताम्बर से चमकते हैं।
कनकलता से मिताई है
यहाँ न कोई महाजन है
नगरवास में रहता हूँ
शिलालेख सा अमिट हूँ।
सुनता न कोई आपबीती है
आनंदमग्न लोग स्नेहमग्न हैं
दर्द के रेखांकित से अंजान हैं
बीचोंबीच उभरे, जवाब खामोश हैं।
शोकाकुल करुणा से देखते हैं
मुँहमाँगा वरदान सहश्र पाते हैं
व्याकुल मन बेमतलब भटकते हैं
कर्मभूमि को मालगाड़ी सा ठेलते हैं।
गगन में हरफनमौला से फिरते हैं
पदच्युत का कोई भय नहीं है
देशनिकाला कभी नहीं हो सकता है
हम सृष्टि संचालन के पथगामी हैं।
कमलनयन में उम्मीद बन सजते हैं
पंचतत्व के उत्कृष्टतम स्वामी हैं
पर्णकुटी से महलों तक में रहते हैं
आशाओं के दीपक बन जलते हैं।
छटपटाहट
कहीं दूर से रौशनी आ रही थी
आसमान में बादलों के बीच तारें
मिट्टी के जर्रे-जर्रे में कसक थी
कमरे में बल्ब खमोशी के गीत गा रहे थे
वह दूर खड़ी कुकृत्य को देख रही थी
लब खामोश थे पलाश के पेड़ रो रहे थे
पत्तों की सरसराहट भय चित्र खींच रहे थे
बगल कमरे में लेटी माँ खाँस रही
पीड़ा, दर्द, कसक की आहटें हल्की-हल्की आ रही थीं
पेड़ों पर अपने घोसले में पंक्षी गहरी निद्रा में निमग्न थे
दरवाजे के कोने खड़ी शीतल छाया
अंदर के जलन से लपलपा रहे थे
अपनी गरज बाबली जबरदस्ती घसीटती रही
अफ़यूनी जुनूनी निर्णय से तन-वदन टूट रहा था
अफ़सोस, दिल गड्ढे में धँसता जा रहा था
स्त्री के समक्ष स्त्री का लूट लिया संसार
दम तोड़ दिए आह, सिसकी और लज्जता ने
नोटों की गड्डियाँ आँखों में लहरा रही थीं
नसों में दौड़ते खून पानी के शक्ल अख्तियार करते जा रहे थे
अय तेरी कुरबत, मनमाने सो कर ले
चक्कर काटती धरती घूम कर आ जायेगी दुबारा अपनी जगह
इस काया को छोड़ते ही एक नए छाया में अवतरित होते हुए
आस्मा में टिमटिमायेंगे
उड़ता गप्पा का उपहार देते हुए
कुछ गाँठे खोलते हुए चिंता की लकीरे घिर आईं
बादलों के आँचल न ढक सके
समाज के ताने में गूंथे व्यंगवाणों को।
(एक सच्ची घटना पर आधारित है।)




Recent Comments