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बेराजगारों और भारतीय भाषाओं के पक्ष में एक पुस्तिका : सुधीर सुमन

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सीसैट (सिविल सर्विसेज एप्टिट्यूड टेस्ट) में किए गए बदलावों के खिलाफ कुछ माह पहले ही नौजवानों का असंतोष और गुस्सा भड़का हुआ था। प्रतियोगी नौजवान सड़कों पर उतर पड़े थे और पुलिसिया दमन का स्वाद भी उन्हें चखना पड़ा था। कुछ विद्वानों को यह नौकरशाही में शामिल हो जाने के लिए आतुर हिंदीभाषी प्रतियोगी छात्र-नौजवानों का आंदोलन लग रहा था, तो कुछ के तर्क थे कि सिविल सेवाओं में जाना है, तो अंग्रेजी अच्छी होनी ही चाहिए। अखबारों और सोशल मीडिया में सीसैट के एक प्रश्‍नपत्र में अंगरेजी के हिंदी अनुवाद के दुरूह और अपठनीय नमूने खासे चर्चा में रहे। लेकिन इस आंदोलन ने शिक्षा और रोजगार की नीतियों के बड़े सवालों को भी छेड़ दिया, इस ओर ध्यान दिलाने के लिहाज से मृणालिनी शर्मा की 64 पृष्ठों की पुस्तिका ‘सीसैट: विवाद और विकल्प’ बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें शिक्षा, रोजगार और भाषा के सवाल को जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के बतौर देखा गया है।

इस किताब को पढ़ते हुए पता चलता है कि दौलत सिंह कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर जब 1979 में सिविल सेवा में भारतीय भाषाओं को प्रवेश मिला, तो परीक्षा अभ्यर्थियों की संख्या 1970 के मुकाबले दस गुनी हो गई यानी एक लाख को पार कर गई।

1989 में गठित सतीशचंद्रा कमेटी ने परीक्षा परिणामों के आधार पर यह आकलन किया कि सामान्य उम्मीदवारों के लगभग बीस प्रतिशत और एस.सी, एस.टी के पचास प्रतिशत इस अवधि में निम्नवर्ग से आए। इस कमेटी ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि इनमें अधिकांश गांवों और कस्बों से आए हैं। यद्यपि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लगभग दर्जन भर राष्ट्रीय परीक्षाओं में एकमात्र सिविल सर्विसेज परीक्षा में ही उम्मीदवारों को अपनी भाषा यानी हिंदी, तमिल, तेलुगु समेत आठवीं अनुसूची में मौजूद भाषाओं में उत्तर लिखने की सुविधा मिली, लेकिन देश के अंग्रेजीदां नौकरशाहों और नेताओं को ये सुविधा भी बर्दास्त नहीं है। 2011 में सीसैट के प्रश्‍ननपत्रों में जो प्रावधान लाए गए, वह न केवल अंगरेजी, बल्कि इंजीनियरिंग, विज्ञान और एम.बी.ए. आदि के छात्रों के लिए ज्यादा फायदेमंद थे। प्रश्‍नों का अंग्रेजी से हिंदी में बेहद कठिन भाषा में अनुवाद का मसला तो है ही, सामान्य ज्ञान का पहला परचा जिसमें इतिहास, भूगोल और राजनीति शास्त्र होता है, उसमें न्यूनतम अर्हता अंक प्रतिशत 15 है और दूसरा परचा जिसमें समझ, तर्कशक्ति और आंकड़ों के विश्‍लेषण के साथ अंगरेजी भी है, उसमें न्यूनतम अर्हता अंक प्रतिशत 35 है।
इस पुस्तिका में आंकड़ों के जरिए दिखाया गया है कि सीसैट लागू होने के बाद भारतीय भाषाओं के माध्यम से अंतिम रूप से चुने जाने वाले उम्मीदवारों की संख्या पंद्रह-बीस प्रतिशत से घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई। लेखिका का निष्कर्ष यह है कि नई परीक्षा प्रणाली अंग्रेजी जानने वाले अमीरों और क्रीमीलेयर के हित में है और गरीब, दलित, आदिवासी और ग्रामीण लोगों के विरोध में है।

यह पुस्तिका महज सीसैट पर ही केंद्रित नहीं है, बल्कि शिक्षा, भाषा नीति, स्कूल प्रणाली और प्रशासनिक परीक्षाओं के लेकर बनाए गए आयोगों और समितियों के लोकतांत्रिक फैसलों से गुजरते हुए पाठक को इस सच्चाई के बीच ले जाकर खड़ा कर देती है कि किस तरह आजादी के इतने वर्षों बाद भी अंगरेजी योग्यता का पर्याय बनी हुई है। सिविल सेवाओं की परीक्षा से अंगरेजी को बाहर नहीं किया गया था, बल्कि भारतीय भाषाओँ को उसके बराबर रखा गया था। लेकिन वह भी बर्दास्त नहीं हुआ, उसे भी खत्म करने की साजिश की गई।

लेखिका का मानना है कि प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंगरेजी की अनिवार्यता ने ही निजी अंगरेजी स्कूलों और कोचिंगों की संख्या को बढ़ावा दिया है। भारतीय इंजीनियरिंग सेवा, वन सेवा, चिकित्सा सेवा, आर्थिक सेवा, प्रबंधन और तकनीकी संस्थानों, विधि विश्वविद्यालयों की समेत अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालयों और कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं तक में अंग्रेजी के वर्चस्व पर यह पुस्तिका बड़े तार्किक तरीके से सवाल उठाती है।

यह पुस्तिका देश के करोड़ों दलित, वंचित, गरीब, आदिवासी और पिछड़ी ग्रामीण पृष्ठभूमि के नौजवानों की बेरोजगारी के प्रति भी संवेदित है। लेखिका ने ठीक ही लिखा है कि नौजवान सिर्फ अधिकारी ही नहीं बनना चाहते, वे किसी तरह एक अदद नौकरी चाहते हैं। लेकिन अब हाल यह है कि कर्मचारी चयन आयोग के तहत जो परीक्षाएं हो रही हैं, वहां सिविल सेवाओं की परीक्षाओं से भी कई गुना ज्यादा अंगरेजी का वर्चस्व कायम हो चुका है। बैंकों की भर्ती में भी अंगरेजी और कंम्प्यूटर की अनिवार्यता है, जिसके कारण ‘पूरा गरीब भारत नौकरियों से बाहर’ होता जा रहा है।

सीसैट में अंगरेजी के समर्थकों के तर्कों का तो जवाब इस पुस्तिका में दिया ही गया है, तमाम संस्थानों में भारतीय भाषाओं में पढ़ाई और परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता के पक्ष में मजबूत तर्क भी इसमें दिए गए हैं।
पुस्तिका में एक जगह बताया गया है कि दुनिया के सबसे समृद्ध विकासशील देशों का शासन, प्रशासन और शिक्षा उसी भाषा में है, जो उनकी जन्मभाषा है। इनमें महज चार की भाषा ही अंगरेजी है। ठीक इसके विपरीत बीस सबसे गरीब देशों में अट्ठारह देशों में प्रशासन की भाषा अंगरेजी है, जो कि वहां के लोगों की जन्मभाषा नहीं है। इसके साथ ही अफ्रीकी देशों में प्रशासन की भाषा अंग्रेजी और फ्रेंच होने को उनकी दुर्दशा से जोड़ते हुए लेखिका सवाल करती हैं- ‘क्या भारत के ऊपर अंगरेजी लादना उसको और गर्त में भेजना नहीं है?’

वे इस जरूरत पर जोर देती हैं कि ‘छात्रों ने सड़कों पर उतरकर जिस नब्ज पर उंगली रखी है, पूरे देश को उसके संकेत सुनने और समझने की जरूरत हैं।’ ‘हम सबका दायित्व है कि इस मौके को हाथ से न जाने दें, और शिक्षा व रोजगार दोनों के लिए अपनी भाषाओं की ओर लौटें।…यह  लौटना आजादी के बाद का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक कदम होगा और सही मायने में आजादी का अर्थ भी।’

 

सीसैट: विवाद और विकल्प

(भारतीय भाषाएं Vs अंग्रेजी)
लेखिका: मृणालिनी शर्मा
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433, नीतिखंड-3, इंदिरापुरम्, गाजियाबाद-201014
मूल्य: 30 रुपये

यह पुस्‍तक निम्‍न स्‍थानों पर भी उपलब्‍ध है-

1:पीपीएच बुक शॉप
जी-18, आउटर सर्किल
मेरि‍ना आर्कड, कनाट सर्कस, नई दि‍ल्ली -1

2: पाण्डेय बुक शॉप
एच-169, शॉप नंबर-12, नजदीक पानी की टंकी
सेक्टेर-12, नोएडा-201301

3: व्यावस्थापकीय कार्यालय
जनमत 267, पुराना कटरा,   इलाहाबाद

4: कि‍ताबघर
जीआईजी रोड, पाण्डे गांव
पि‍थौरागढ़- 262501
मोबाइल नं- 9411707450

5: बुक वर्ल्ड
10-ए, एस्ले हॉल (परेड ग्राउंड के पास)
देहरादून, उत्तराखंड

6: Thougths
मुखानी चौराहे के निकट, हल्द्वानी

मार्केज को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

ESPAÑA GARCÍA MÁRQUEZ

नई दि‍ल्‍ली : 18 अप्रैल 2014 को लातिन अमरीका के अद्भुत किस्सागो गैब्रियल गार्सिया मार्केज ने 87 साल की उम्र में हमसे विदा ली। उनका कथा संसार लातिन अमरीका के देशों के पिछड़े माने जाने वाले समाजों की जिंदगी की समझ के साथ ही इस समाज के दुख-दर्द, हिंसा, असमानता, आवेग और गतिशीलता से पूरी दुनिया को बावस्ता कराता है।

6 मार्च 1927 को कोलम्बिया के छोटे से शहर आर्काटका में जन्मे गैब्रियल खोसे द ला कन्कर्डिया गार्सिया मार्केज का यह शहर 20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया के नक्शे पर भीषण औपनिवेशिक लूट के नाते दिखा। यही शहर और उसके अनुभव बाद में मार्केज के रचना संसार के बीज बने। ‘क्रानिकल्स ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड’, ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा’, ‘ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क’, ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ आदि मार्केज के नामी गिरामी उपन्यास हैं। वास्तविक घटनाओं को मिथकों के साथ जबर्दस्त ढंग से गूँथ देने की उनकी क्षमता ने उन्हें विश्वस्तर पर ऐसा उपन्यासकार बना दिया जिसके विरोधियों को भी उसका सम्मान करना पड़ता था।

1982 में उनको साहित्य के नोबल सम्मान से नवाजा गया। सम्मान समारोह के मौके को उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध के मंच के रूप में बदल दिया। इस मौके पर बोलते हुए उन्होने न सिर्फ लातिन अमेरिकी जमीन पर अंग्रेजी उपनिवेशवाद की क्रूरताओं का जिक्र किया, बल्कि अमरीका और यूरोप के कॉर्पोरेट घरानों द्वारा इस इलाके में की जा रही लूट और भयानक दमन को भी बेनकाब किया। उन्होने साफ-साफ कहा कि उनकी कहानियाँ गायब हुए लोगों, मौतों और राज्य प्रायोजित नरसंहारों के बारे में हैं जो कॉर्पोरेट हितों के लिए रचे जाते हैं।

मार्केज को याद करते हुए श्रद्धांजलियों में पीली तितलियों, लाल चींटियों, चार साल ग्यारह हफ्ते दो दिन चली बारिश आदि मिथकीय कथातत्त्वों का जिक्र तो काफी हो रहा है, पर उनकी इस शैली के पीछे की असलियत पर निगाह अपेक्षाकृत कम ही टिकती है। मार्केज के सामने एक पूरी ढहा दी गई सभ्यता थी, जिसे उन्होंने भोगा और महसूस किया था। मार्केज के नाना गृहयुद्धों में भाग ले चुके थे और नानी जीवन की ‘असंभव’ किस्म की कहानियाँ सुनाया करती थीं। शायद इतिहास की अकादमिक व्याख्या की जड़ता से अलग पूरी हकीकत बताने की छटपटाहट ही मार्केज को उस शिल्प तक ले गई जिसे पश्चिमी अकादमिक जन ‘जादुई यथार्थवाद’ कहते हैं। इतिहास की वर्तमान धारणा से पहले अन्य किस्म की अवधारणाएं विभिन्न समाजों में रही आई हैं। मार्केज ने इन धारणाओं को भी अपने बयान के लिए चुना।

लातिन अमरीका की जमीन 20वीं सदी में समाजवाद के नए प्रयोगों के लिए जानी गई। फिदेल कास्त्रो इस आंदोलन के प्रतीक पुरुष बने। ठीक ऐसे ही लातिन अमरीकी देशों की जमीन से पुराने यथार्थवाद को बदलने-विकसित करने वाले ढेरों रचनाकार पैदा हुए, जिनकी अगुवाई मार्केज ने की। संयोग से ज्यादा ही है कि फिदेल, मार्केज के उपन्यासों के पहले कुछ पाठकों में शुमार हैं। दोनों ही वामपंथ की लड़ाइयों को अलग-अलग मोर्चों पर विकसित करने वाले योद्धा हैं। मार्केज की प्रतिबद्धताएं हमेशा ही वामपंथ के साथ रहीं। वेनेजुएला, निकारागुआ और क्यूबा के वाम आंदोलनों के साथ उनके गहन रिश्ते थे। अनायास नहीं कि उनकी रचनाशीलता के अमरीकी प्रसंशक उनके वामपंथी होने को कभी पचा नहीं पाये।

हम तीसरी दुनिया के लोग औपनिवेशिक विरासत के चक्के तले पिसने को बखूबी समझते हैं, पश्चिमी आधुनिकता के साथ ही अलग तरह का देशज इतिहास-बोध हमें भी हासिल है, ऐसे में मार्केज अपनों से ज्यादा अपने लगते हैं। एक पूरी सभ्यता का बनना और उसका नष्ट होना हमारे अपने देश-काल में भी धीरे-धीरे घटित होता जा रहा है। हम भी मिथकों के औजार से यथार्थ को और बेहतर तरीके से और संपूर्णता में देख सकते हैं।

आज जब हमारे देश में अमरीकी तर्ज पर ही स्मृतिहीनता और फर्जी इतिहासबोध लादा जा रहा है, तब मार्केज के उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ के आखिर हिस्से के एक वर्णन की याद बेहद प्रासंगिक है। भारी वर्षा के बाद कत्ल कर दिये गए 3000 हड़ताली मजदूरों की स्मृति लोगों के दिमाग से धुल-पुंछ जाती है। अकेले खोसे आर्कादियों सेगुंदो इस बात को याद है और वह लोगों से इस बावत बात करता है पर लोग भूल चुके हैं।

ऐसी स्मृतिहीनता को दर्ज करना और स्मृतिहीन बनाने वाली ताकतों, व्यवस्थाओं, कॉर्पोरेटों के खिलाफ प्रतिरोध रचना ही मार्केज को सही श्रद्धांजलि होगी !

जन संस्कृति मंच दुनिया की जनता के इस दुलारे कथाकार को सलाम करता है।

मशहूर दलित चिंतक कंवल भारती की गिरफ्तारी की निंदा

कंवल भारती

कंवल भारती

नई दिल्ली: मशहूर दलित चिंतक कंवल भारती की फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी के संदर्भ में रामपुर (उत्तर प्रदेश) में यूपी पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी बेहद निंदनीय है। यह लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है। कंवल भारती ने आरक्षण और दुर्गा नागपाल के मुद्दे को लेकर फेसबुक पर जो टिप्पणी की है, वह लोकतंत्र और सामाजिक समानता के प्रति प्रतिबद्ध एक जिम्मेवार लेखक की चिंता और बेचैनी को ही जाहिर करती है। सरकार और मंत्रियों के नकारेपन और उनके द्वारा अपराधियों की सरपरस्ती के खिलाफ किसी भी लोकतंत्रपसंद व्यक्ति का गुस्सा वाजिब है।

न्यायालय से जरूर कंवल भारती को जमानत मिल गई है, पर हमारी मांग है कि अखिलेश सरकार इस कृत्य के लिए माफी मांगे और कंवल भारती को आरोपमुक्त करे। हमारी यह भी मांग है कि उत्तर प्रदेश में माफियाओं और अपराधियों की लूट के तंत्र को कायम रखने के लिए जिस तरह  सांप्रदायिक-जातिवादी भावनाएं भड़काने की कोशिशें सरकारी मंत्री कर रहे हैं,  उन पर अविलंब रोक लगाई जाए।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

तुम याद आए और तुम्हारे साथ जमाने याद आए :सुधीर सुमन

मेहदी हसन

मेहदी हसन

13 जून 2012 को उस्ताद मेहदी हसन का निधन हुआ था, पर पिछले एक साल में कभी नहीं लगा कि वे हमारे बीच नहीं हैं। वैसे भी पिछले कई वर्षों से वे गा नहीं रहे थे, इसके बावजूद वे हमारे स्मृतियों के किसी तलघर में नहीं चले गए थे, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में वे गहरे रचे-बसे हुए थे और आगे भी रहेंगे। आज बाजार आए दिन नई नई आवाजें उछालता रहता है, नए नए आकर्षणों को बड़ी धूम से प्रचारित करता है, लेकिन वे आवाजें बहुत देर तक हमारे दिलो दिमाग या जीवन में टिक नहीं पातीं, मेहदी हसन की आवाज मानो इस प्रवृत्ति को चुनौती देती है, वह मानो कहती है कि मैं कोई उपभोक्तावादी लहर से पैदा उत्पाद नहीं हूं, मैं तो मनुष्य के जीवन और संस्कृति के गहरे अनुभवों और उसकी सृजनात्मक शक्ति की अभिव्यक्ति हूं। कुछ जो शाश्वत भावनाएं हैं, जिनसे तमाम कलाएं जन्मी और विकसित हुई, उसकी अभिव्यक्ति की जो परंपरा है उसी की बेमिसाल देन हूं। मुझमें अपनी मिट्टी, अपने जल, अपनी जबान और अपने जैसे हजारो-लाखों लोगों का हाल-ए-दिल दर्ज है। इसीलिए तो बहुत सीधे और सहज तरीके की गजल ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भूला न सकोगे’ को जब हम मेहदी हसन की आवाज में सुनते हैं, तो वह सिर्फ किसी प्रेमी की उपेक्षा की पीड़ा और इस दावेदारी की गजल नहीं रह जाती कि उपेक्षा के बावजूद प्रेमी की वफा में इतनी ताकत है कि उसे भुलाया नहीं जा सकता, बल्कि उसमें वफा के बावजूद उपेक्षित और वंचित किए जाने की जाने कितनी दास्तानें जुड़ जाती हैं।
भारत-पाकिस्तान के रिश्ते के संदर्भ में अहमद फराज की गजल ‘रंजिश ही सही’ जरूर ज्यादा लोकप्रिय रही, शायर अहमद फराज से भी इसे सुनाने की अक्सर फरमाइशें की जाती थीं और वह भी कबूल करते थे कि यह तो मेहदी हसन की गजल हो गई है। लेकिन ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो’ को सुनते हुए अक्सर मुझे लगता है, मानो इसमें उन करोड़ों लोगों के विषाद का इजहार हो रहा है, जिन्होंने इस देश और इसकी संस्कृति को रचने में साझी भूमिका निभाई, मगर इतिहास के एक खास मोड़ पर अपने मादर-ए-वतन के प्रति ही गैर वफादार करार दिए गए। खुद मेहदी हसन की जिंदगी को विभाजन की इस त्रासदी के बगैर समझा नहीं जा सकता। राजस्थान के अपने गांव और पूूरे भारत के प्रति उनके जबर्दस्त लगाव की कुछ घटनाओं की चर्चा लोग करते रहे हैं। कई बार लगता ही नहीं कि उनके द्वारा गायी गई गजल में (भले वह किसी फिल्म के लिए क्यों न गाई गई हो) महज कोई नायक किसी नायिका के प्रति संबोधित है। इसी गजल की अगली पंक्तियां हैं- न जाने मुझे क्यों यकीन हो चला है, मेरे प्यार को तुम मिटा न पाओगे/ मेरी याद होगी, जिधर जाओगे तुम, कभी नग्मा बनके कभी बनके आंसू। मेहदी हसन को सुनते हुए कभी नहीं लगता कि भारत और पाकिस्तान दो भिन्न मुल्क हैं, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि हम बिल्कुल अभिन्न हैं।
अकारण नहीं है कि भारत में मुस्लिम विरोध और पाकिस्तान विरोध के जरिए अंधराष्ट्रवादी व सांप्रदायिक उन्माद भड़काए जाने की जो राजनीति रही है, उसका प्रतिकार करने वालों को जाने-अनजाने मेहदी हसन की आवाज बेहद सुकून प्रदान करती रही है। वे हमारे लिए हमारी साझी संस्कृति के बहुत बड़े प्रतिनिधि थे। मैंने खुद नब्बे के दशक की शुरुआत में जो पहला कैसेट खरीदा था, वह मेहदी हसन का था, जिसमें शोला था जल बुझा हूं, रंजिश ही सही, जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं आदि मशहूर गजलें थीं। बीस साल की उम्र मंे पहली बार देश की राजधानी दिल्ली एक रेडियो प्रोग्राम के सिलसिले में आया था और यहां से लौटते वक्त वह कैसेट और चांदनी चैक से एक सस्ता सा वाकमैन खरीद कर ले गया। वाकमैन तो जल्द ही खराब हो गया, पर वह कैसेट आज भी मेरे एक जिगरी दोस्त के पास सुरक्षित है।
हमारी पीढ़ी को फैज, फराज, मीर और दाग जैसे शायरों से जोड़ने वाले मेहदी हसन ही थे। उन्होंने इन शायरों की जिन गजलों का चुनाव किया, उसे सुनते हुए हम न केवल साहित्य की बेमिसाल परंपरा से जुड़े, बल्कि आधुनिक और प्रगतिशील भावबोध भी हमारे भीतर घुलता गया। अक्सर यह बात जो मन में चलती रहती है कि हिदी उर्दू की पढ़ाई अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ होनी चाहिए, तो इसके पीछे भी मेहदी हसन जैसे गायकों की भी बड़ी भूमिका है, जिन्होंने अपनी गायकी के सहारे हमें इन महान शायरों की रचनाओं की खासियत से रूबरू कराया।
मेहदी हसन के गुजर जाने के बाद उनके द्वारा गायी गई अपने पसंद की गजलों को याद करने लगा, तो तुरत दो दर्जन से अधिक गजलें जुबान पर आ गईं। मुझे महसूस हुआ कि दूसरे किसी गायक द्वारा गाई गईं पसंदीदा गजलों से यह संख्या अधिक है। बल्कि मीर, फैज, गालिब और अहमद फराज को छोड़ दें तो कई गजलों के शायरों का नाम भी जेहन में कम ही रहता है। यकीन से भरी और हौले से अपने भरोसेे में लेने वाली मेहदी हसन की आवाज का जादू ही सर्वोपरि होता है, जो उन शायरों की रचनाओं में मौजूद भावनाओं और अर्थों की बारीकियों को अत्यंत कुशलता से खोलते हुए, हमारे भाव-जगत से बेहद आत्मीय संवाद करता है। कई बार तो उनके द्वारा गायी गई किसी पसंदीदा गजल के शायर का नाम जब पता चलता है, तो हम एक अजीब सी खुशी से भर उठते हैं। ऐसा ही मेरे साथ ‘रोशन जमाले यार से है अंजुमन तमाम’ गजल सुनते हुए हुआ। मैं उन्हीं के अंदाज में इसे दोस्तों के बीच गाता भी रहा हू, लेकिन शायर का नाम ही पता नहीं था। अभी कुछ महीने पहले खुद मेहदी हसन के एक प्रोग्राम की रिकार्डिंग सुनते हुए मुझे पता चला कि इसके रचनाकार हसरत मोहानी हैं, वही चुपके चुपके रात दिन वाले हसरत मोहानी, आजादी के  आंदोलन की इंकलाबी शख्सियत हसरत मोहानी। इसी तरह इंकलाबी शायर हबीब जालिब की मशहूर गजल ‘दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुख सहते हैं’ को अपनी आवाज के जरिए मकबूल बनाने और बहुतों के दिल की आवाज का बयान बना देने का श्रेय भी मेहदी हसन को ही जाता है। मीर की गजल ‘पत्ता पत्ता बुटा बुटा हाल हमारा जाने है’ को जब मेहदी हसन की आवाज में पहली बार सुना, तो लगा कि इससे बेहतर कोई और नहीं गा सकता। और अपने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की गजल- ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’ हो या फिर मीर की ‘देख तो दिल कि जां से उठता है/ये धुंआ सा कहां से उठता है’ और दाग की ‘गजब किया तेरे वादे पे एतबार किया’, ऐसा लगता है कि ये गजलें मेहदी हसन की आवाज के लिए ही बनी थीं। जहां तक गुलों में रंग भरे और शोला था जल बुझा हूं सरीखी फैज और फराज की कई गजलों की मकबूलियत की बात है, तो इसमें मेहदी हसन की आवाज की भी बहुत बड़ी भूमिका है। यद्यपि गालिब की गजल दिले नांदा तुझे हुआ क्या है मेहदी हसन की आवाज में मुझे व्यक्गित तौर पर उतनी प्रभावशाली नहीं लगती, लेकिन यह एक अपवाद है। परवीन शाकिर की गजल कूबकू फैल गई मेहदी हसन की आवाज में गाई गई ऐसी गजल है, जिसे अब भी खूब पसंद किया जाता है। मिलन की खुशी- (यूं जिंदगी की राह में टकरा गया कोई, दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं) और बिछड़ने का गहरा दर्द- (अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले, हमें कोई गम नहीं था गमे आशिकी से पहले) जिस गहराई से इस आवाज में अभिव्यक्त होता है, वह इसे श्रोताओं का बेहद आत्मीय बनाता है। एक गजल है- इलाही आंसू भरी जिंदगी किसी को न दे/ खुशी के बाद गमे-बेकसी किसी को न दे। अपने एक प्रिय कामरेड के संग्रह में से मैंने इसे पहली बार सुना था और लंबे समय तक समझता रहा कि यह गालिब की गजल होगी। लेकिन हाल में पता चला कि इसे मशरूर अनवर ने लिखा था और पाकिस्तानी फिल्म ‘हमे जीने दो’ के लिए मेहदी हसन ने इसे गाया था। मैं अक्सर यह भी सोचता रहा हूं कि मेरे साथी जो अपने साथियों के निजी दुखो को जाहिर करने को बहुत अहमियत नहीं देते थे और खुद भी अपने दुखों की झलक आज भी किसी को नहीं लगने देते, उनके संग्रह में यह गजल क्यों है? क्या यह इसे सुनते हुए कोई कथार्सिस होता है,  जैसे जो हमारे दुख अभिव्यक्त नहीं हो पाते, जो हमारे अंदर घर किए रहते हैं, इस गजल को सुनते हुए मानो हम उनसे मुक्त होते हैं। जिस अंदाज मे मेहदी हसन गाते हैं- उजाड़ के मेरी दुनिया को रख दिया तूने, मेेरे जहान के मालिक ये क्या किया तूने, वह दुख और शिकायत की इंतहा लगती है। अब इलाही या जहान के किसी मालिक की अवधारणा में भले ही किसी का यकीन न हो, पर दुनिया उजड़ने के दुख का श्रोताओं के अपने दुख से बिल्कुल तादात्म्य हो जाता है। उजड़ने और बिछड़ने का गम मेहदी हसन की आवाज में बड़ी असरदार तरीके से सामने आता है। और यह गम मानो वफा पैमाना भी है। फराज की गजल में जब वे गाते हैं- ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफा के मोती/ ये खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिले, तो इसे साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।
वह आवाज आज भी गूंज रही है- जिदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मरकर भी मेरी जान तूझे चाहूंगा। यह कोई भाववाद नहीं या किसी अपार्थिव सत्ता में कोई यकीन नहीं, बल्कि तमाम दुश्वारियों के बीच अपने होने का यकीन है। एक जिंदगी जिस जमीन और मिट्टी से विस्थापित हुई, जिसके बीच सरहदों की दीवारें खींच गईं, उसकी बाड़ाबंदियों को तोड़ती हुई, मरके भी उसी की खुश्बू में शामिल होने की यकीन है मेहदी साहब की आवाज।

शमशाद बेगम की शख्सियत के साथ कोई मिक्सिंग संभव नहीं

शमशाद बेगम

शमशाद बेगम

नई दिल्ली: मंगलवार 23 अप्रैल को मशहूर पार्श्‍वगायिका शमशाद बेगम हमारे बीच नहीं रहीं। चालीस और पचास के दशक के फिल्मों की लोकप्रिय गायिका शमशाद बेगम की आवाज में गाए गए कई गीत बाद के दौर में भी लोकप्रिय रहे। वह जीवित थीं इसका कोई खास ख्याल बाजार और फिल्म उद्योग को नहीं रहा, पर उनकी खनकदार आवाज में गाए गए कई मशहूर गानों को नब्बे के बाद गीत-संगीत के रिमिक्स के बाजार द्वारा खूब इस्तेमाल किया गया। चुलबुले, तीक्ष्ण और वजनदार आवाज वाले उन गानों के साथ जिस तरह के उत्तेजक दृश्यों को मिक्स किया गया, उससे उन गानों में मौजूद पवित्रता, नैसर्गिकता और अबोध अल्हड़पन का मानो एक तरह से विनाश तो हुआ, लेकिन यह भी साबित हुआ कि चालीस-पचास के दशक में उन्होंने लयकारी और शोखी का जो अंदाज रचा था, उसके सामने नए जमाने का संगीत कितना फीका लगता है। फिर भी बाजार उन गानों को गाने वाली शख्सियत को अपने साथ मिक्स नहीं कर सका। उस व्यक्तित्व के साथ कोई रिमिक्सिंग संभव नहीं था। वह शोहरत की पागल दौड़ और खुद को सुर्खियों में रखने की होड़ से मुक्त थीं। कई दशक पहले उन्होंने फिल्म और संगीत उद्योग से खुद को अलग कर लिया था।

शमशाद बेगम का जन्म पंजाब के अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 को हुआ था। एक परंपरागत मुस्लिम परिवार में जन्मी मियां हुसैन बख्श और गुलाम फातिमा की आठ संतानों मे से एक शमशाद को बचपन से ही गाने का शौक था। ग्रामोफोन पर बजने वाले गानों की वह नकल करती थीं। मोहर्रम के मर्सिये भी याद करके सुनाती थीं। बचपन से ही वह मशहूर गायक के.एल. सहगल की प्रशंसक थीं और बताती थीं कि उनकी फिल्म ‘देवदास’ उन्होंने 14 बार देखी। उनके गाने के शौक को उनके चाचा ने काफी प्रोत्साहित किया। 13 साल की उम्र में जीनोफोन कंपनी ने उनकी आवाज में एक पंजाबी गाना रिकार्ड किया, जो बेहद मकबूल हुआ। उसी कंपनी से मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर भी जुड़े हुए थे, जो शब्दों के शुद्ध उच्चारण की उनकी क्षमता के प्रशंसक हो गए। 1937 में उन्हें लाहौर रेडियो स्टेशन में गाने का मौका मिला, फिर उन्होंने पेशावर रेडियो और दिल्ली रेडियो स्टेशन के लिए भी गाने गाए। कहते हैं कि रेडियो पर उनकी आवाज को सुनकर ही कई संगीत निर्देशकों ने उन्हें अपनी फिल्मों के लिए गवाने की पेशकश की। 1939 में बैरिस्टर गणपतलाल बट्टो के साथ उनका विवाह हुआ और उसके बाद 1940 में फिल्मों के लिए गाने का सिलसिला शुरू हुआ। 1940 में उन्होंने पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ के लिए पहली बार गाया। इसके बाद पंजाबी फिल्म ‘चौधरी’ में उन्हें गाने का मौका मिला। दोनों फिल्मों के गाने बेहद मकबूल हुए। उनकी आवाज के प्रशंसक संगीतकार गुलाम हैदर ने ‘खजांची’(1941) और ‘खानदान’ (1942) में उनसे गवाया। फिर उन्हीं के साथ 1944 में वह मुंबई चली आईं और अगले दो दशक से अधिक समय तक वह हिन्‍दी सिनेमा की ऐसी गायिका बनी रहीं, जिनकी खनकदार आवाज का जादू सब पर तारी रहा। गुलाम हैदर, सी. रामचंद्र, खेमचंद्र प्रकाश, राम गांगुली, एस.डी. वर्मन, नौशाद और ओ.पी. नय्यर सरीखे अपने दौर के सारे प्रतिभावान संगीतकारों के लिए उन्होंने गाने गाए। नौशाद और ओ.पी.नय्यर ने उनकी आवाज की खासियत को सर्वाधिक समझा, इसलिए कि शमशाद बेगम की आवाज में जो एक देशज खनक थी, लोकगायिकी और लोकस्वर का जो अंदाज था, मिट्टी का खुरदुरापन और उसकी जो महक थी, वह लोकधुनों के पारखी इन संगीतकारों के संगीत में और भी निखर गई। हालांकि यह शमशाद बेगम की ही आवाज थी, जिसे सी. रामचंद्र ने ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ जैसे पाश्चात्य शैली वाले गानों में जबर्दस्त तरीके से उपयोग किया। यह कम ही लोगों को पता है कि शास्त्रीय संगीत की उन्होंने बाकायदा शिक्षा ली थी। वह सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब की शागिर्द थीं। बचपन के दिन भुला न देना ( दीदार ), दूर कोई गाए (बैजू बावरा), छोड़ बाबुल का घर, होली आई रे कन्हाई, ओ गाडी वाले गाडी धीरे हाँक रे (मदर इंडिया),  मेरे पिया गए रंगून (पतंगा), मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का (बाबुल), सैया दिल में आना रे (बहार), धरती को आकाश पुकारे, मोहन की मुरलिया बाजे (मेला), तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर (मुगल-ए-आजम), लेके पहला पहला प्यार, कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना (सी.आई.डी), कभी आर कभी पार (आर पार), कजरा मुहब्बत वाला(किस्मत) जैसे सदाबहार गाने शमशाद बेगम की याद को हमेशा जिंदा रखेंगे। शमशाद बेगम ने कभी अपना म्यूजिकल ग्रुप ‘द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट’ भी बनाया था जिसके जरिए उन्होंने पूरे देश में प्रस्तुतियां दी थीं।

भारत सरकार को बहुत देर से उनकी याद आई। जब पद्मभूषण जैसे पुरस्कारों की साख खत्म हो चुकी थी और इसके लिए जोड़तोड़ और सत्ता से नजदीकी एक खुला पैमाना बन चुका था, तब 2009 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ दिया गया। शमशाद बेगम जिन्होंने हिंदी-उर्दू के अलावा पंजाबी, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं में 500 से ज्यादा गाने गाए, जो हमेशा अपना फोटो खिंचवाने से बचती रहीं, उनकी आवाज ही उनकी पहचान है, वही विश्वसनीय है और विश्वसनीय है श्रोताओं की पसंद, सरकारी सम्मान और रिमिक्सिंग का उपभोक्ता समाज उसके सामने कोई महत्व नहीं रखता। शमशाद बेगम के एक प्रशंसक चंद्रकांत मोहन लाल ने उन पर ‘खनकती आवाज शमशाद बेगम‘ नाम की एक किताब लिखी है।

1955 में अपने खाबिंद गनपतलाल बट्टो के निधन के बाद से शमशाद बेगम अपनी बेटी ऊषा रात्रा के साथ रहती थीं। दामाद लेफ्टिनेन्ट कर्नल वाई. रात्रा जहां रहे वे वहीं रहीं और रिटायरमेंट के बाद जब वे स्थायी तौर पर मुम्बई में रहने आ गए तो शमशाद जी भी फिर से मुंबई आ गईं। 1998 में एक गलतफहमी से उनके निधन की खबर आ गई थी। लेकिन इस बार उन्होंने हमेशा के लिए अपने चाहने वालों को अलविदा कह दिया। जन संस्कृति मंच की ओर से शमशाद बेगम को हार्दिक श्रद्धांजलि!

सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को रिहा करने की मांग

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में कबीर कला मंच (पुणे) के इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के खिलाफ लम्‍बे समय से जारी राज्य दमन की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और विगत 2 अप्रैल को महाराष्ट्र विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किए जाने वाले चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली की अविलंब रिहाई की मांग करते हैं। गर्भवती शीतल साठे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और सचिन माली को एटीएस के हवाले कर दिया गया है। इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के साथ राज्य सत्ता का यह पूर्णरूपेण गैर-लोकतांत्रिक और आपराधिक व्यवहार है। अखबार जिसे नक्सल समर्थकों का आत्मसमर्पण कह रहे हैं, वह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि फर्जी आरोपों के कारण भूमिगत होने के लिए मजबूर किए गए और आतंकवाद निरोधक दस्ता द्वारा निरंतर तलाशी की प्रतिक्रिया में उठाया गया लोकतांत्रिक प्रतिवाद है। जन संस्कृति मंच के हम साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हैं और उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताडि़त किए जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील करते हैं। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयां इस प्रतिवाद को संगठित करेंगी।

शासकवर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानांतर अगर कोई जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए संस्कृतिकर्म को अपनी जिंदगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बंधती है। कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों ने दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अपने गीतों और नाटकों के जरिए लोगों को संगठित करने का काम किया है। यह इस देश और इस देश की जनता के प्रति उनके असीम प्रेम को ही प्रदर्शित करता है।

शीतल और सचिन ने एटीएस के आरोपों से इनकार किया है कि वे छिपकर नक्सलियों की बैठकों में शामिल होते हैं या आदिवासियों को नक्सली बनने के लिए प्रेरित करते हैं। दोनों का कहना है कि वे डॉ.  बाबा साहेब अंबेडकर, अण्णा भाऊ साठे और ज्योतिबा फुले के विचारों को लोकगीतों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाते हैं। सवाल यह है कि क्या अंबेडकर या फुले के विचारों को लोगों तक पहुँचाना गुनाह है? क्या भगतसिंह के सपनों को साकार करने वाला गीत गाना गुनाह है? सवाल यह भी है कि अगर कोई संस्कृतिकर्मी माओवादी विचारों के जरिए ही इस देश और समाज की बेहतरी का सपना देखता है, तो उसे अपने विचारों के साथ एक लोकतंत्र में संस्कृतिकर्म करने दिया जाएगा या नहीं?

इसके पहले मई 2011 में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) ने कबीर कला मंच के सदस्य दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले को दमनकारी कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले पर आरोप लगाया गया कि वे माओवादी हैं और जाति उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक विषमता के मुद्दे उठाते हैं। पिछले दो सालों में इस आरोप को साबित करने के लिए कुछ किताबें पेश की गईं और यह तथ्य पेश किया गया कि कबीर कला मंच के कलाकार समाज की खामियों को दर्शाते हैं और अपने गीत-संगीत और नाटकों के जरिए उसे बदलने की जरूरत बताते हैं। प्रशासन के इस रवैये के कारण कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों को छुपने के लिए विवश होना पड़ा, जिन्हें राज्य ने ‘फरार’ घोषित कर दिया। राज्य के इस दमनकारी रुख के खिलाफ कबीर कला मंच के इन युवा कलाकारों के पक्ष में प्रगतिशील-लोकतांत्रिक लोगों की ओर से दबाव बनाने के बाद गिरफ्तार कलाकारों को जमानत मिली। जाहिर है कि‍ उसी आरोप में शीतल साठे और सचिन को भी पकड़ा गया है।

हम सिर्फ जमानत से संतुष्ट नहीं है, बल्कि मांग करते हैं कि कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे अविलंब खत्म किए जाएं और उन्हें तुरंत रिहा किया जाए, संस्कृतिकर्मियों पर आतंकवादी या माओवादी होने का आरोप लगाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बाधित न किया जाए तथा उनके परिजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाए।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

पाश हमारे राष्ट्रकवि हैं : सुधीर सुमन

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क्रान्‍ति‍कारी कवि‍ पाश के शहादत दि‍वस पर सुधीर सुमन का आलेख-

पाश का जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के गाँव तलवंडी सलेम में हुआ था। उनका पारिवारिक नाम अवतार सिंह था। उनके पिता सेना में थे और मेजर पद से रिटायर हुए। लेकिन एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्में अवतार सिंह किशोर उम्र से ही सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की लड़ाई से जुड़ गये और महज 38 साल की उम्र में भारतीय शासकवर्ग द्वारा पैदा किए गये खालिस्तानी पृथकतावादियों की गोलियों से शहीद हुए।

अवतार सिंह ने पंद्रह साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और उसी समय उनका जुड़ाव कम्युनिस्ट आंदोलन से हुआ और दो साल बाद जब उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई, उसी साल ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ और उसने राष्ट्र, लोकतंत्र और देशभक्ति को आम मेहनतकश जनता की नजर से परिभाषित करने पर जोर दिया। पाश एक बौद्धिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता की तरह उस आंदोलन से जुड़ गये। उन्होंने राजनीति और साहित्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन का भी जमकर अध्ययन किया। नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का उनके यहाँ जमावड़ा होने लगा। मात्र 19 साल की उम्र में उन्हें एक झूठे केस में फँसाकर जेल में डाला गया और भीषण यंत्रणाएं दी गईं। लेकिन उनके इंकलाबी विचारों को कुचलने में शासकवर्ग विफल रहा। उस लोहे को नष्ट करने में उसे सफलता नहीं मिली, बल्कि लोहा फौलाद में ढलता गया। कवितायें जेल से बाहर आती रहीं और 1970 में उनका पहला कविता संग्रह ‘लौहकथा’ प्रकाशित हुआ, जिसमें 36 कविताएं थीं, जिन्होंने हिन्‍दी की क्रान्‍ति‍कारी कविता को नई चमक और आवेग दे दी। यह जनता का लोहा था, जिस लोहे में उसकी आकांक्षा, प्रतिरोध और उसके नैतिक मानवीय मूल्यों बड़ी मजबूती से मुखरित थे- मैंने लोहा खाया है/आप लोहे की बात करते हो/लोहा जब पिघलता है/तो भाप नहीं निकलती/जब कुठाली उठानेवालों के दिलों से/भाप निकलती है/तो लोहा पिघल जाता है/पिघले हुए लोहे को/किसी भी आकार में/ढाला जा सकता है।

पाश ने ज्यादातर कवितायें पंजाबी में ही लिखीं। जिस कविता को हिन्‍दी में उपलब्ध उनकी एकमात्र कविता बताया जाता है, उसकी पंक्तियाँ देखने लायक हैं- ‘वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने?/ इस जर्जर शरीर में लिखी/लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने?’ और सचमुच हिन्‍दी ही नहीं,  दूसरी भारतीय भाषाओं के पाठकों ने भी लहू की उस शानदार इबारत को पढ़ा और लहू के रिश्ते सा ही आत्मीय महसूस किया। जिस तरह भगतसिंह हमारे राष्ट्रनायक हैं, उसी तरह पाश मुझे अपने राष्ट्रकवि लगते हैं, जनता के वास्तविक राष्ट्र के स्वप्न को आकार देने वाले और उसे हकीकत में बदलने के लिये चलने वाले संघर्षों के साथी कवि। अपनी चर्चित कविता ‘भारत’ में उन्होंने लिखा है-

भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए

बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। जाहिर है उनके लिए ‘भारत’ ऐसा शब्द नहीं है, जिसकी रक्षा के नाम पर जनता के जनवादी अधिकारों और उसके लिए चलने वाले आंदोलनों को शासकवर्ग कुचलता है। बकौल पाश-

इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं….
उनके लिए जिंदगी एक पंरपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति

अवतार सिंह साहित्य की दुनिया में पाश के नाम से मशहूर हुए। पिछले चार दशक की भारतीय कविता की दुनिया में पाश एक ऐसा नाम है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज करना सम्‍भव नहीं है। उनकी कवितायें क्रान्‍ति‍कारी कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रतिनिधि आवाज तो बनी ही हुई हैं, जिस तरह शहीद-ए-आजम भगतसिंह के नारे और कई कथन भारतीय जनता के रोजमर्रा जीवन का हिस्सा बन गये, हर किस्म के परिवर्तनकामी शक्तियों ने जिस तरह इंकलाब जिंदाबाद को अपना लिया, उसी तरह पाश की कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं। ‘हम लड़ेगे साथी’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी कवितायें। ये दोनों कालजयी कवितायें हैं और हर किस्म की गुलामी के खिलाफ आजाद जिंदगी के लिये हर स्तर से लड़ने के लिये और बदलाव के सपनों को न मरने देने के लिए प्रेरित करती हैं- जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी/जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी/लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी/और हम लड़ेंगे साथी…..

आजादी के आंदोलन के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए और भविष्य में देशी और विदेशी शासकवर्ग के बीच समझौते की आशंका जताते हुए भगतसिंह ने यही तो कहा था कि शोषण के विरुद्ध जनता की लड़ाई भिन्न-भिन्न रूपों में जारी रहेगी। पाश के आदर्श भगतसिंह थे और उन्होंने लिखा था कि लेनिन की पुस्तक के उस मुड़े हुए पन्ने से पंजाब की नौजवानी को वे आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसे छोड़कर भगतसिंह फाँसी पर चढ़े थे। आज पाश पंजाब ही नहीं, भारत के हर उस नौजवान के प्रिय कवि हैं, जो मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट और आक्रोशित है और इसमें बदलाव चाहता है।

हमारे दौर में जिस तरह जीवन के संकट और असुरक्षा के बहाने हमारे भीतर यथास्थिति के तर्क घर करते जाते हैं, पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक’ उसी से टकराती है- ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती/पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती/गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती/….सबसे खतरनाक होता है/मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना/घर से निकलना काम पर/और काम से लौटकर घर आना/सबसे खतरनाक होता है/हमारे सपनों का मर जाना।’ अकारण नहीं है कि हमें एक यंत्र या गुलाम में तब्दील कर देने वाली राजनीतिक पार्टियों और शासकवर्ग को सपनों को इस तरह जगाए रखने की कोशिश खतरनाक लगती है, पाठ्यक्रम में पाश की कविता होना खतरनाक लगता है। एक दूसरी कविता में उन्होंने लिखा है- ‘हम अब खतरा हैं सिर्फ उनके लिये/जिन्हें दुनिया में बस खतरा ही खतरा है’। ‘युद्ध और शांति’, ‘प्रतिबद्धता’, ‘पुलिस के सिपाही से’, ‘जहाँ कविता खत्म होती है’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’, ‘धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘सलाम’, ‘घास’, ‘वफा’, ‘सच’, ‘जिंदगी/मौत’ जैसी उनकी कई कवितायें हैं, जो बार-बार उद्धृत की जाती हैं। वर्ग-संघर्ष को वह जनता की मुक्ति का रास्ता समझते हैं और यह कभी नहीं भूलते कि ‘यहाँ हर जगह पर एक बार्डर है/जहाँ हमारे हक खत्म होते हैं/और प्रतिष्ठित लोगों के शुरू होते हैं।’ और प्रतिष्ठित लोगों यानी शासकवर्ग हमेशा उनके निशाने पर रहता है। इस लिहाज से अपेक्षाकृत कम उद्धृत की जाने वाली कविता ‘द्रोणाचार्य के नाम’ को भी देखा जा सकता है।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की खासियतों को रेखाँकित करते हुए प्रो. नामवर सिंह ने कहा था कि उसने साहित्य का रुख गाँवों की ओर मोड़ा, पाश की कविता और उनके रचनाकार-व्यक्तित्व दोनों पर यह बात लागू होती है। उन्होंने ‘सिआड़’, ‘हेम ज्योति’ ‘हाँक’ और ‘एंटी-47’ का सम्‍पादन करते हुए कई महत्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक लेख लिखे। 1971 में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपने गाँव से ‘सिआड़’ पत्रिका निकाली। 1982-83 में उन्होंने गाँवों में हस्तलिखित पत्रिका ‘हाँक’ को लोगों के बीच वितरित करने काम भी किया। यह लोगों की वैचारिक-राजनीतिक चेतना को उन्नत बनाने की ही कोशिश थी।

पाश वामपंथ के पिछलग्गूपन को कतई पसंद नहीं करते थे। ‘हमारे समयों में’ नामक अपनी बहुचर्चित कविता में उन्होंने लिखा-

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाउँ
मार्क्‍स का सिंह- जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारों, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था।

मगर इस कुफ्र के बावजूद न वह निराश हुए न उनकी कविता। वह एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद और पृथकतावाद दोनों से लड़ते रहे और खालिस्तानी उग्रवादियों की गोलियों से भगतसिंह की शहादत के दिन ही शहीद हुए।

अगर उन्हीं की कविता पंक्तियों से उन्हें याद किया जाए, तो ‘प्रतिबद्ध’ कविता की ये पंक्तियाँ बिल्कुल वाजिब हैं उनके लिये-

हम झूठमूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
जिंदगी, समाजवाद या कुछ और

बाजार के दबावों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद थे गणेश पाइन

ganesh pyne

पेंटर ऑफ डार्कनेस के नाम से मशहूर चि‍त्रकार गणेश पाइन का 12मार्च 2013 को नि‍धन हो गया। जन संस्‍कृति‍ मंच की ओर से श्रद्धांजलि‍-

नई दिल्ली: बाजार के दबावों और उसकी शर्तों के खिलाफ एक खामोश प्रतिवाद की तरह सृजनरत रहने वाले मशहूर चित्रकार गणेश पाइन का मंगलवार 12  मार्च को कोलकाता के एक अस्पताल में दिल के दौरे से निधन हो गया, सीने में दर्द के कारण उन्हें सोमवार को वहाँ भर्ती किया गया था।

1937 में जन्मे गणेश पाइन आजादी के बाद की दूसरी पीढ़ी के कलाकार थे और कई मामले में अपने समकालीनों में सर्वथा अलग थे। अपनी कला के प्रचार के प्रति प्रायः उदासीन रहने वाले गणेश पाइन लोकस्मृतियों, परम्‍परा और जनजीवन को एक कलाकार की कल्पना से जोड़कर पेश करने के लिए चर्चित रहे। उन्होंने इसका जिक्र कई बार किया कि कैसे उन्होंने एक बूढ़े मोची का चित्र बनाया, तो पूरा होने पर ध्यान में डूबे किसी दार्शनिक की तरह लगने लगा, कि कैसे किसी सफाई मजदूर का चित्र उन्होंने बनाया, तो उसका चेहरा कवि की तरह नजर आने लगा। अपने चित्रों में वस्तु या यथार्थ को हुबहू पेश करने की बजाय उसे अपनी मनःस्थितियों के अनुरूप पेश करना उन्हें ज्यादा भाता था। और यह मन  मानो दादी माँ की कथाओं में मग्न बच्चे का मन था, जहाँ ‘हत्यारा’ अचानक कहीं से नहीं टपक पड़ता था, बल्कि अतीत से निकलकर आता था, लोककथाओं से निकले किसी पुराने योद्धा की वेशभूषा में पुराने किस्म की ही तलवार लेकर। वे बताते थे कि बचपन में दादी माँ के मुँह से सुनी कहानियों का भी असर उनके चित्रों पर था। ‘हत्यारा’ शीर्षक चित्र मानो आज के हत्यारों की वंश परम्‍परा का दस्तावेज है। राजा, रानी, सौदागर, रथ आदि उनके चित्रों में नजर आते हैं- एक पूरा अतीत है, जिसे आजादी के बाद की पीढ़ी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, लेकिन जो विभिन्न रूपों में उसके अवचेतन का हिस्सा बने हुए हैं। यहाँ यह गौर करने लायक है कि अन्य भारतीय कलाकारों की तरह मिथकीय देवी-देवता, महापुरुष या ऐतिहासिक राजा-रानी को उन्होंने अपने चित्रों का विषय नहीं बनाया, बल्कि वे नामहीन हैं, किसी ऐतिहासिक या मिथकीय संदर्भ से उनका नाता नहीं है। गणेश पाइन के एक चित्र का शीर्षक ही है- ‘एक प्राचीन पुरुष की मृत्यु’। वे प्राचीन दुनिया की कल्पनाओं में हमेशा खोए रहने वाले व्यक्ति नहीं थे, भविष्य की कल्पनाएं उन्हें भाती थी, उन्हें टीवी पर साइंस फिक्शन वाले सीरियल देखना पसंद था। कविताओं में उनकी दिलचस्पी थी और जीवनानंद दास उनके प्रिय कवि थे।

उन्हें पेंटर ऑफ डार्कनेस यानी अंधेरे का चित्रकार भी कहा गया, क्योंकि मौत की छाया उनके कई चित्रों में दिखती है। इसका कारण वे बताते थे कि नौ साल की उम्र में ही 1946 में उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों को करीब से देखा था, जिसका प्रभाव उनके चित्रों पर पड़ा तथा इसके अलावा कई प्रियजनों के बिछड़ने का भी असर पड़ा। कोलकाता गवर्नमेंट कॉलेज के स्नातक  गणेश पाइन ने लम्‍बे समय तक एनिमेटर का काम किया। वे अपने चित्रों पर वाल्ट डिजनी के कार्टूनों का प्रभाव भी मानते थे। अपने बेहतरीन रेखाँकन के लिए भी उन्हें जाना गया। लेकिन इससे भी ज्यादा वे अपने चित्रों की खास शैली के लिए मशहूर रहे। टेंपरा माध्यम में काम करना उन्हें पसंद था।

गणेश पाइन की जिंदगी भी अपने समकालीन आधुनिक चित्रकारों से सर्वथा अलग थी। करीब पाँच दशक के अपने कैरियर में उनका ज्यादा समय कोलकाता में ही गुजरा, वे आयोजनों और समारोहों से प्रायः बचते रहे। यद्यपि पश्चिम की तमाम आधुनिक कला शैलियों से वे परिचित थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन पर अवनींद्रनाथ टैगोर के अतिरिक्त हाल्स रेम्ब्रांडिट व पाल क्ली का ज्यादा असर है। पाइन भारत के उन गिने-चुने कलाकारों में थे, जो पश्चिम की आधुनिक कला और उसके बाजार से कभी आतंकित नहीं हुए। भारत के अतिरिक्त पेरिस, लंदन, वाशिंगटन और जर्मनी सहित दुनिया भर में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई गईं। एमएफ हुसैन गणेश पाइन के प्रशंसकों में थे। कुछ लोगों की राय है कि इसने भी उनके चित्रों की कीमत बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की, लेकिन खुद वे बाजार के पीछे कभी नहीं भागे, बल्कि उनके चित्रों का दुर्लभ होना ही उनको मूल्यवान बनाता था।

गणेश पाइन ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में कला पर बाजारवाद के बढ़ते दबाव के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि ‘पहले के चित्रकारों के लिए कला जीवन का एक मकसद थी। अब कला की बिक्री बढ़ने से जहाँ चित्रकारों को लाभ हुआ है, वहीं इसने कुछ कलाकारों की कुछ नया कर दिखाने की क्षमता को नष्ट कर दिया है। लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको इससे एक नया उत्साह मिला है।’ हालाँकि कला को अपने जीवन का मकसद बताते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि ‘रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण इसी से मेरी रोजी-रोटी भी चलती है। जहाँ तक चित्रों के लिए विषय का सवाल है, मैं अपने अंतर्मन से ही इसे तलाशता हूँ।’ उनका मानना था कि ‘कला समाज का सौंदर्य है। अगर कला की उपेक्षा हुई तो समाज का सौंदर्य और संतुलन नष्ट हो जाएगा।’

अपनी ही शर्तों पर खामोशी से अपना काम करने वाले, बाजार की शर्तों को नामंजूर करते हुए कला और स्मृति की अपनी परम्‍परा के साथ अविचल सृजनरत रहने वाले इस विलक्षण भारतीय चित्रकार को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

न्याय और सुरक्षा के मुद्दे संघर्षों की दिशा तय करेंगे

कार्यक्रम में पत्रकार अमि‍त सेन गुप्तान और लेखि‍का अरुंधति राय।

कार्यक्रम में पत्रकार अमि‍त सेन गुप्ता और लेखि‍का अरुंधति राय।

नई दि‍ल्‍ली : अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से 2 मार्च, 2013 को इंडिया इस्लामिक सेंटर में आयोजित दूसरे सालाना आयोजन में ‘मैपिंग एंगर: स्पॉन्टेनियस प्रोटेस्ट ऐंड कम्पिलिसीट साइलेंस’ विषय पर जानी-मानी एक्टिविस्ट लेखिका अरुंधति राय और पत्रकार अमित सेन गुप्ता के बीच विचारोत्तेजक बातचीत हुई। अमित ने शुरुआत बांग्लादेश से की, जहाँ आजकल 1971 में जनसंहार, बलात्कार और उत्पीड़न की घटनाओं को अंजाम देने वालों के खिलाफ जनता न्याय की मुहिम चला रही है और न्यायपालिका की ओर से उन्हें दंडित किया जा रहा है। कश्मीर और भारत की स्थितियों की बांग्लादेश से तुलना करते हुए अरुंधति ने कहा कि दोनों भिन्न तरह की चीजें हैं। बांग्लादेश के प्रसंग में भारत सरकार कह सकती है कि उसने मुक्ति योद्धाओं का साथ दिया। खुद भारत सरकार लिट्टे जैसे संगठनों की मदद करे तो ठीक, पर यहाँ कोई उसी तरह की माँग करता है तो उसे सरकार और मीडिया पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कहता है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में बहुत महत्वपूर्ण और दिलचस्प आंदोलन चल रहा है, जाहिर है लोगों की स्मृतियाँ 1971 से जुड़ी हुई हैं, पर स्मृतियाँ निर्मित भी की जाती हैं। स्मृति अपने आप में बहुत ही ट्रिकी विषय है।

अमित सेन गुप्ता ने जब पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में सुहार्तो शासनकाल में इंडोनेशिया में जनसंहार रचाने वाले सालिम ग्रुप का जिक्र किया, तो अरुंधति ने छूटते ही नेल्सन मंडेला का नाम लिया, जो एक दौर में दुनिया में प्रतिरोध के नायक थे, लेकिन उनकी सरकार बनने के बाद उसी सुहार्तो को वहाँ का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिया गया। और तो और उसी सुहार्तो के कारनामों पर जो फिल्म बनी, उसे धन फोर्ड फाउंडेशन की ओर से मिला। इसलिए नैतिकता की कोई स्पष्ट प्र्रवृत्ति नहीं है। अमित सेन गुप्ता ने 1971 के आसपास के सालों में दुनिया में छात्र-युवा आंदोलनों और संस्कृति-कला के क्षेत्र में उभरे आंदोलनों के इंद्रधनुषी आयामों की ओर ध्यान आकृष्ट किया, तो अरुंधति ने बीच में चुटकी लेते हुए कहा कि इंद्रधनुष में काला रंग नहीं होता। अमित ने स्पष्ट किया कि‍ उनका आशय इस वक्त चल रहे विभिन्न किस्म के जनआंदोलनों से है,  मसलन इसी वक्त में जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है और वहाँ एक पुलिस अधिकारी सोनी सोढ़ी के गुप्तांग में पत्थर भरता है, जिसे यूपीए की सरकार गैलेंट्री एवार्ड देती है और तब कोई बड़ा आंदोलन नहीं होता, लेकिन दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली ही नहीं देश के छोटे-छोटे कस्बों और शहरों में भी लोग सड़कों पर उतर पड़ते हैं, कई जगह बिना सैद्धांतिक राजनीतिक समझदारी के भी, तो इसे किस तरह समझा जाए?

anil sinha memorial foundation

अरुधंति ने कहा कि दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ जो प्रोटेस्ट हुआ, वह महिला आंदोलनों और जेंडर स्टडी का विषय अधिक है। केरल की सूर्यनल्ली के मामले तथा कश्मीर, खैरलांजी, छत्तीसगढ़ में महिलाओं के साथ हुए बलात्कारों पर समाज के रुख पर उन्होंने सवाल उठाया। कला माध्यमों में बलात्कार को उत्तेजना के एक विषय के तौर पर इस्तेमाल करने की मलयालम फिल्मों की आम प्रवृत्ति का उन्होंने उदाहरण दिया। बैंडिट क्वीन नाम की मशहूर फिल्म का जिक्र करते हुए अरुंधति ने कहा कि वहाँ फूलन देवी को एक फेमस विक्टिम ऑफ रेप के तौर पर पेश किया गया, एक फेमस बैंडिट के तौर पर नहीं। सोनी सोढ़ी का जिक्र करते हुए अरुंधति ने कहा कि दरअसल बलात्कार महिलाओं को आतंकित करने की एक स्ट्रैटजी है, बांग्लादेश, श्रीलंका हर जगह ऐसा ही किया गया।

प्रोटेस्ट के कमोडिटी बनने की प्रवृत्ति पर अरुधंति ने चिंता जाहिर की। उन्होंने चिदंबरम के बयान को याद किया जो कि गैंगरेप के तीन दिन बाद समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ में छपा, जो गरीबों को ही अपराधी के तौर पर चिह्नित करता है। बातचीत में आर्म्‍स स्पेशल पावर एक्ट की चर्चा भी हुई। उमर अबदुल्ला और नीतीश कुमार द्वारा गुजरात सरकार की तारीफ के बरअक्स दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा गुजरात जनसंहार के दोषी के तौर पर मोदी के प्रतिवाद का अमित सेन गुप्ता ने जिक्र किया। संसद पर हमले और अफजल की फाँसी का संदर्भ भी आया। अरुंधति ने सवाल उठाया कि 84 में 3000 सिक्खों, 1993 में मुंबई में तथा 2001 में गुजरात में हजारों मुसलमानों पर हमला किया जाना क्या लोकतंत्र पर हमला नहीं था? इसे लेकर इतनी घृणित चुप्पी क्यों है?

छत्तीसगढ़ में माओवादी आंदोलन का जिक्र करते हुए अरुधंति ने कहा कि वहाँ आदिवासी तो महज इसलिए लड़ रहे हैं कि जो है उसे उनके पास रहने दिया जाए, उसे भी न छिना जाए। अमित सेन गुप्ता ने पोस्को द्वारा महिलाओं और बच्चों पर बर्बर जुल्म ढाने की घटना की चर्चा की,  जगतपुर,  काशीपुर में वर्षों से चल रहे आंदोलनों की ओर ध्यान दिलाया और आदिवासी विद्रोहों की परम्‍परा से उनका संबंध जोड़ा। और सवाल किया कि क्या हम आज के दौर में किसी संघर्षों को लेकर कोई नई परिकल्पना कर सकते हैं?

अरुंधति राय ने कहा कि जब हम कहते हैं कि जनता खुद तय करेगी तो इसका मतलब ही है कि हम नहीं जानते कि वह प्रतिरोध किस तरह करेगी, उसका प्रतिरोध हिंसक होगा या अहिंसक, इसे उनके मुद्दे और जमीनी हकीकतें तय करेंगी। अरुंधति ने आंदोलनों के एनजीओकरण पर भी चिंता जाहिर की और कहा कि न केवल सरकार, बल्कि विपक्ष, एनजीओ और यहाँ तक कि अब लिटरेरी फेस्टिवल के जरिए साहित्य पर भी कारपोरेट का कब्जा हो चुका है। रिलायंस के 27 टीवी चैनल्स आ गये हैं। टाटा स्टील लिटरेरी फेस्टिवल में सलमान रुश्दी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रायोजित करेगा और खुद जगदलपुर में आदिवासियों के दमन पर चुप्पी साध लेगा। उन्होंने आदिवासियों उनके जंगल और जमीन से बेदखल करने वाली कम्‍पनियों द्वारा अस्पताल और लॉ स्कूल खोलने पर भी सवाल उठाया। जिसे अमित सेन गुप्ता ने प्रतिरोध के संकट यानी क्राइसिस ऑफ रेसिस्टेंस के तौर पर चिह्नित किया। बातचीत आखिरकार यहाँ पहुँची कि इस वक्त कोई बड़ा विकल्प नहीं है, खुद मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियाँ भी सवालों के दायरे में हैं। अरुंधति ने कहा कि यह बड़ी बेईमानियों और बड़ी चुप्पियों का दौर है। सारे बड़े विचार असफल हो चुके हैं। अब स्मॉल आइडिया का दौर है, जो न्याय और सुरक्षा के सवालों और संघर्षों में मौजूद है, वह दंतेवाड़ा में भी है और वह मारुति फैक्ट्री के मजदूरों के संघर्ष में भी है।

बातचीत के बाद श्रोताओं ने अरुंधति से सवाल भी किए। वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने स्मॉल थिंग्स के संबंध में उनके आइडिया के बारे में पूछा। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के सम्‍पादक आनंदस्वरूप वर्मा ने कहा कि सारी चीजों को नकार कर किस तरह के स्टेट की कल्पना की जा सकती है? युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि चूँकि अरुंधति राय की बातों पर लोग गौर करते हैं और वे चाहते हैं कि वे किसी चीज के बारे में क्या सोचती हैं, इसलिए उन्हें इसका ध्यान रखना चाहिए। फिर उन्होंने दिल्ली गैंगरेप के बाद के आंदोलन में शामिल मध्यवर्गीय लोगों की दुनिया को अलगा कर देखे जाने पर सवाल खड़ा किया कि क्या वह अपने आप में स्वायत्त दुनिया है या उसमें से भी बहुत सारे लोग नीचे गिर रहे हैं और कुछ थोड़े से लोग किसी तरह ऊपर जा रहे हैं? क्या इस मध्यवर्गीय दुनिया से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए?

इस बातचीत से चित्रकार सादकेन की दो पेंटिग्स के पोस्टर जारी किए गये। वरिष्ठ चित्रकार और लेखक अशोक भौमिक ने कहा कि कला और कला समीक्षा की दुनिया में सत्ता की संस्कृति हावी रही है, अनिल सिन्हा ने अपने लेखन और संगठन जसम के जरिए जिसका हमेशा विरोध किया। आज आम आदमी को चित्रकला से जिस तरह काट दिया गया, अनिल सिन्हा इससे चिंतित थे और यह चिंता उनकी कला समीक्षाओं में भी दिखती है। सत्ता की संस्कृति ने जिस तरह बंगाल के महाअकाल की त्रासदी को अपने चित्रों में दर्ज करने वाले जैनुल आबदीन को भुला दिया, उसी तरह सादकेन को भुला दिया। अशोक भौमिक ने कहा कि जैनुल आबदीन, चित्तो प्रसाद और सादकेन के लिए हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कोई फर्क नहीं है, वे तीनों देशों की जनता के चित्रकार हैं। उन्होंने वादा किया कि अगले साल के आयोजन में जैनुल आबदीन के पोस्टर जारी किए जाएंगे। संचालन ऋतु सिन्हा ने किया।

(सुधीर सुमन, जन संस्कृति मंच, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)

मानवीय-मुक्ति के इतिहास का अमर योद्धा

hugo Rafael Chávez Frías

नयी दिल्ली : ह्यूगो रैफेल शावेज फ्रिआस (28 जुलाई 1954- 5 मार्च, 2013)  21वीं सदी के समाजवाद के स्वप्नद्रष्टा और अनुपम प्रयोगकर्ता तथा भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नई विश्‍व-व्यवस्था की अजेयता के मिथक को ध्वस्त करनेवाले महान जन-नायक और क्रांतिकारी, वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने 5 मार्च 2013 के दिन दुनिया को अलविदा कहा। पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से वह कैंसर से जूझते हुए अब तक पद की शपथ नहीं ले सके थे। दुनिया ने 21 सदीं का अब तक का महानतम साम्राज्यवाद-विरोधी योद्धा खो दिया। यह क्षति जितनी वेनेजुएला और लैटिन अमरीका की जनता की है, उतनी ही  विश्‍व के तमाम शोषितों की है, जिन्हें शोक को शक्ति में बदलना है, उनके प्रयोगों को अंतिम जीत तक जारी रखना है।

शावेज ने 21वीं सदी में लैटिन अमरीका के साम्राज्यवाद-विरोधी उभार को 18वीं-19वीं सदी के लैटिन अमरीका की स्पैनिश दासता से मुक्ति (साइमन बोलिवार द्वारा की गई क्रान्ति) की अगली कड़ी के रूप में परिभाषित किया। सैन्य अधिकारी रहे शावेज ने 1992 में अमरीका समर्थित वेनेजुएला के वहाँ नव-उदारवादी निजाम के खिलाफ नागरिक तख्ता पलट की असफल कोशिश की और दो साल जेल में रहे।1998 में साम्राज्यवाद-विरोधी ऐसे गठबंधन के प्रतिनिधि के बतौर वे चुनाव जीते जिसने देश के नये जनतांत्रिक संविधान का वायदा किया। नया संविधान एक साल के भीतर बना जो स्त्री-पुरुष समानता पर आधारित था, जिसमें स्त्रियों और मूल निवासियों को तमाम नये अधिकार दिये गये, राष्ट्रपति सहित सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को प्राप्त हुए, शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिकों के मौलिक अधिकार बना दिये गये। 1998 से लेकर 2012 का चुनाव जीतने तक वह लगातार वेनेजुएला के राष्ट्रपति चुने जाते रहे।  अमरीकी षड्यंत्र से जब अप्रैल 2002 में उनके  तख्ता-पलट की कोशिश की गई तो जनता ने सड़कों पर उतर कर उसे नाकाम कर दिया। शावेज ने न केवल तेल कम्‍पनियों का बल्कि टेलिकॉम सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण कम्‍पनियों का राष्ट्रीयकरण किया, बड़ी कम्‍पनियों पर शिकंजा कसा और उन पर टैक्स बढाए, विश्‍व-बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का क़र्ज़ चुका कर इनसे संबंध खत्म किया तथा ‘बैंक आफ साउथ’ नाम से दक्षिण अमरीकी देशों के अपने केन्द्रीय बैंक का 2007 में निर्माण किया। फिदेल कास्त्रो के साथ मिलकर शावेज ने अमरीकी वर्चस्व के विरुद्ध, उसके विकल्प के बतौर लैटिन अमरीकी देशों बोलीविया, क्यूबा, डोमोनिका, होंडूरास, निकारागुआ और वेनेजुएला का व्यापार संघ ‘बोलीवारियन आल्टरनेटिव फॉर पीपुल्स ऑफ आवर अमेरिकाज़’ (आल्बा) का निर्माण किया।

जब दिसंबर 2002 में बड़ी कम्‍पनियों ने तालाबंदी करके अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की, तो शावेज ने पूँजीपतियों द्वारा बंद किये गये कारोबारों को राज्य की भागीदारी के साथ श्रमिकों की समिति के हवाले कर दिया। विकास के ढाँचे, स्वशासन के तमाम मुद्दे और बजट के एक हिस्से को कैसे खर्च किया जाए, ये सारे निर्णय हजारों  सामुदायिक नागरिक समितियों (प्रत्येक समिति 200-400 परिवारों की है) के हवाले किये गये। 2004 से 2012 के बीच शावेज के नेतृत्व में वेनेजुएला की गरीबी घट कर आधी हो गई, बेरोजगारी बीस फीसदी से घट कर सात फीसदी हो गई, निरक्षरता समाप्त हो गई, वेनेजुएला की खेती योग्य ज़मीन का पचहत्तर फीसदी हिस्सा जो पहले महज पाँच फीसदी लोगों के हाथ में था, उसके एक अच्छे- खासे हिस्से को सरकार ने अपने हाथों में लेकर सहकारी खेती कराना शुरू किया और लाखों परिवारों का पुनर्वास किया।  शावेज ने अपने लाये संविधान में निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाए जाने के अधिकार की पहली अग्नि-परीक्षा खुद दी। 2004 में  उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाने के लिये हुए जनमत संग्रह में वे विजयी हुए। 20 सितंबर 2006 के दिन संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेम्बली में बोलते हुए शावेज ने अमरीकी साम्राज्यवाद को ललकारते हुए कहा था, ” हे, विश्‍व के तानाशाह! मुझे महसूस होता है कि तुम्हारे जीवन के बाकी के दिन दु:स्वप्न की तरह बीतेंगे।” सचमुच वे जीवन के अंत तक साम्राज्यवादियों और फाँसीवादी ताकतों के लिए दु:स्वप्न बने रहे और उनके  हमले झेलते रहे।

शावेज के नेतृत्व में वेनेजुएला तमाम लैटिन अमरीकी देशों को खुले हाथों हर तरह की मदद करता रहा। 2008 में तबाही और अन्न के लिये दंगे झेल रहे हैती को शावेज ने अपने देश से 364 टन गोश्त, सब्जियाँ और अनाज भिजवाए। अमरीकी राजसता के भीषण विरोधी शावेज वहाँ की गरीब जनता को बेहद प्यार करते थे जिसका प्रमाण उन्होंने बारम्बार दिया, खासतौर पर कैटरीना समुद्री तूफ़ान के समय राहत की पेशकश करके।

वह लैटिन अमरीका ही नहीं, बल्कि इरान, ईराक, फिलिस्तीन, लेबनान यानी हर वो देश जो अमरीकी साम्राज्यवाद का सताया हुआ था, उसके हितों के सर्वोत्तम विश्‍व प्रवक्ता थे।

शावेज अब शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मानवीय-मुक्ति के इतिहास में वह अमर रहेंगे। उनकी स्मृति को हमारा सलाम!

(सुधीर सुमन, जन संस्कृति मंच, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)