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नरक भी यहीं है, स्वर्ग भी : सुधीर शर्मा

अपराधी से लेखक बने सुधीर शर्मा ने अपराध की अंधेरी गलियों से गुजरते क्या कुछ झेला-सहा! उन तल्ख यादों के मीठे संस्मरण…

मेरी साढ़े दस बरस की सजा खत्म होने में लगभग दो   बरस बाकी रह गये थे। साहित्य व साहित्यकारों से मिले प्यार व सहारे ने मेरी सजा को आसान कर दिया था। फिर भी सजा की कठोरता व खुरदुरेपन ने दिलो-दिमाग पर अपनी खरोंचें छोड़ दी थीं। अमानवीय और बेतुकी जेल व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार थी। कभी-कभी लगता कि दुनिया में नरक कहीं है तो वह इस जेल-जीवन को जीते हुए है। तब सजा के दिन बड़े पीड़ादायक महसूस होते।  बंदी की जितनी छोटी या बड़ी सजा बाकी रहती, सिर्फ उसी के बारे में सोचकर बंदी की रूह फना हो जाती। हालांकि मेरी आजादी में अभी दो बरस बाकी थे, लेकिन आजाद होने की हूक मुझे जब-तब तरंगित कर देती। मैं दिमाग को मजबूत करता कि दो ही बरस तो रह गये हैं।
कुछ महीने पहले मुझे वास्को की सब-जेल से फिर सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। विभूति नारायण राय और सुमन भटटाचार्य की इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट इसका कारण बनी। इसका संज्ञान लेते हुए गोवा हाईकोर्ट ने गृह सचिव व जेल प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए कई सुधार के निर्देश दिए थे। वास्को जेल के अफसरों ने मुझे सिरदर्द मानते हुए जेल आईजी से सिफारिश की कि इस उद्दंड और खतरनाक कैदी को आग्वाद की सेंट्रल जेल भेजा जाए। नतीजन मैं फिर से सेंट्रल जेल में पटक दिया गया।
इस बार यहां जो अधीक्षक था, वह भी सिविल सर्विस का अफसर था। उसे राज्य प्रशासन ने दंड स्वरूप जेल अधीक्षक के पद पर भेजा था। यह अधीक्षक रहमदिल इंसान था। सभी बंदियों को एक नजर से देखता। कुछ शोहदे रंगबाजों ने इसकी नरमदिली का नाजायज फायदा उठाया। संतरी-जेलर लोग भी बेपरवाह हो गए। इससे चिढ़कर जेल अधीक्षक ने अपनी नरमदिली को बंद कर दिया, लेकिन मेरे प्रति उसका व्यवहार पूर्ववत रहा। इन्हीं दिनों असगर वजाहत, भीष्म साहनी, राजेंद्र यादव, मैनेजर पांडेय, अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा सहित तीस साहित्यकारों ने गोवा के राज्यपाल के लिए एक मर्मस्पर्शी अपील लिखी। इसमें गुजारिश की गई थी कि सुधीर शर्मा का संवाद हम लेखकों से निरंतर बना हुआ है। उसके अंदर बहुत गहरा और समझदार पाठक है। हम सभी उसकी कद्र करते हैं। जेल प्रशासन उसके साहित्य शौक को लेकर उसे प्रताडि़त करता है। यह अन्याय बंद होना चाहिए। अपील राजभवन पहुंची और उसने अपना असर दिखाया। राजभवन ने जेल आईजी को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर दिया।
जेल अधीक्षक ने मुझे अपने केबिन में बुलाया और असगर वजाहत की अपील दिखाई। वे उस नई आफत से परेशान हो गये थे, यह उनके चेहरे से स्पष्ट था। मैं अपील को पूरा पढ़ भी नहीं पाया था कि अधीक्षक ने बड़ी मिठास से कहा, ”शर्मा, मैंने कभी तुम्हारी डाक सामग्री या किसी किताब को रोका है?” उसकी बात का मेरे पास कोई जवाब न था। मैं अपील को अधूरा छोड़कर  विनम्रता से बोला, ”सर, आप अभी आए हैं। आपने मुझे पूरा सहयोग दिया है। लेकिन पूर्ववर्ती जेल अफसरों ने जब बेवजह की तानाशाही चलाई, तब मैंने साहित्यकारों को अपनी पीड़ा लिखी थी। यह अपील उसी का नतीजा है।” अधीक्षक ने टुकड़े-टुकड़े में मेरा साहित्य प्रेम जाना था। असगर साहब की अपील से वह खासा प्रभावित हुआ। बातचीत में उसने बड़ी उत्सुकता से साहित्यकारों के बारे में पूछा और जानकर खुशी, हैरानी और अविश्वास जताया। फिर वह अपनत्व जताते हुए बोला, ”शर्मा, मैं मानता हूं कि मेरे पूर्ववर्ती अधीक्षकों और जेलरों ने तुम्हारे साथ बड़ी ज्यादती की। यह बहुत गलत था, लेकिन आई.जी. साहब ने मुझसे जवाब मांगा है। मैं चाहता हूं कि तुम चंद लाइनों में लिखकर दे दो, अब तुम्हारे साथ कोई भी ज्यादती नहीं हो रही है।” अधीक्षक की बात सही थी। एक क्षण सोचने के बाद मैंने अधीक्षक साहब से कागज पेन मांगा और तुरंत ही जेल आई.जी. को लिख दिया कि अब मेरी किताबों, डाक व रात के पढऩे-लिखने पर बंदिश नहीं है। इससे अधीक्षक को सुकून मिल गया। वह मेरी इस साफगोई से प्रभावित हुआ। वह मुझे तेज और न्यायप्रिय कैदी मानने लगा।                                      पिछले कुछ दिनों से मुझे रात में बुखार रहने लगा था। मैंने लापरवाही की थी। बाद में मैंने जेल कम्पाउंडर से दो-तीन बार बुखार की गोली ली, जिनका कोई असर नहीं हुआ। मैंने सोचा क्षमता से ज्यादा व्यायाम करने और देर रात तक पढऩे-लिखने की वजह से यह बुखार है। जब खांसी-कफ बढ़ा तो मैंने बाहर के सरकारी अस्पताल में भेजने की गुजारिश की, जो उसने मान ली।
हमारी जेल में अस्पताल के नाम पर एक कमरे में कुछ दर्द निवारक गोलियां थीं। कंपाउंडर सुबह दस से सायं चार बजे तक अस्पताल चलाता था। रविवार व अन्य सरकारी छुट्टियों पर यह कमरा बंद रहता। डॉक्टर कोर्ट के निर्देश के बाद हफ्ते में दो दिन, दो घंटे के लिए आता और बंदियों को भेड़-बकरी की तरह जांचकर कंपाउंडर को सरकारी अस्पताल से दवाई लाने का निर्देश देता। अगर दवाई मिली तो वह एक-दो दिन बाद बंदी तक पहुंचती या फिर बंदी को जेब के पैसे से खरीदनी पड़ती। हालत यह थी कि बुखार तक के लिए बंदी को बाहर के  सरकारी अस्पताल जाना पड़ता। यह भी तब होता, जब डॉक्टर इस बात को लिखकर देता। आपात-चिकित्सा सुविधा के अभाव में मेरे सामने ग्यारह कैदियों ने दम तोड़ा था।
मैं पहले भी अस्पताल जा चुका था। इस वजह से हथकड़ी बंधे कैदी की ड्रेस पहने आदमी को देखकर लोगों की दृष्टिï व भाव कैसे बदलते हैं, इससे वाकिफ था। पुलिस एस्कॉर्ट के कुछ सिपाही मुझसे परिचित हो गये थे। एक परिचित सिपाही इस दिन मेरे साथ था। वह मुझे डॉक्टर के पास ले गया। यह गोरा-चिट्टा संभ्रात सा दिखने वाला नवयुवक था, जो मेडिकल कॉलेज का छात्र था। वह सीनियर डॉक्टरों के अंडर में रहा था। उसने एक हिकारत भरी उड़ती नजर मुझ पर डाली और व्यंग्य से कोंकणी भाषा में सिपाही से पूछा, ”यह किस जुर्म में आया है?” सजा काटते-काटते मैं कोंकणी समझने लगा था। जिस नजरिये से डॉक्टर ने, सिपाही से पूछा, उसने मेरे मन को वितृष्णा से भर दिया। मुझे वह डॉक्टर बड़ा ही कुरूप लगने लगा। यह तनाव मेरे चेहरे पर आ गया। सिपाही ने मेरे चेहरे को पढ़ लिया और शांत स्वर में बोला- यह जेल पुलिस को मालूम होगा। हम इसे अस्पताल लाने और छोडऩे के लिए सिविल पुलिस हैं। मुझे पुलिस वाले की यह बुद्घिमता अच्छी लगी।  डॉक्टर ने बड़े अनमने ढंग से नब्ज, जीभ, आंखें देखने के बाद दवाई लिखकर दे दी, इस दवाई से कुछ सुधार नहीं हुआ, बुखार ज्यों का त्यों बना रहा।
उन दिनों जेल में टी.बी. का संक्रमण तेजी से  फैला। तीन बंदियों की मौत हो गई और दस-बारह बंदी मरीज बन गये। कुछ दिनों के ज्यादा बुखार के बाद मेरी हालत बिगडऩे लगी। खाना-पीना बंद हो गया। एक ड्यूटी जेलर को साथी बंदी ने यह बात बताई तो वह दौड़ा-दौड़ा अधीक्षक के पास गया। अधीक्षक ने तुरंत चार जेल-गार्डों के साथ मुझे अस्पताल भेज दिया।
इस बार वहां का डॉक्टर संजीदा था। उसने मेरी बिगड़ी हालात को देखा और तुरंत एक्स-रे करवा कर उसकी जांच की। फिर उसने जेल-गार्डों को पास के टी.बी. अस्पताल में ले जाने को कहा। यह सुनकर जेल गार्डों के चेहरे काले पड़ गए। एक ड्यूटी करने के  बाद अब यह नई ड्यूटी उन्हें कतई मंजूर नहीं थी। लेकिन नियम से बंधे होने के कारण उन्हें यह काम पूरा करना पड़ा। मन में मुझे कोसते हुए टी.बी. अस्पताल ले गये।
इमरजेंसी में दो नवयुवक डॉक्टर थे। वे मेरी जांच करने लगे। जांच के बाद उन्होंने आपस में चर्चा की और जेल गार्डों से कहा, ”इसे टी.बी. हो गई है। भर्ती करना पड़ेगा।” डॉक्टरों के इस वाक्य ने संतरियों के चेहरों को और काला कर दिया। उन्होंने डॉक्टरों को समझाना शुरू किया कि अस्पताल में बंदी की सुरक्षा करने का काम  सिविल पुलिस का है। हम जेल में नियमित ड्यूटी पर हैं। बंदी के साथ यहां बंध जाने से हमारी ड्यूटी और दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो जायेगी। जब तक प्रदेश पुलिस नहीं आयेगी, तब तक हमें बंदी के साथ बंधना पड़ेगा। हम कैदी को सुबह अस्पताल भेजेंगे, तब एडमिट करने से सभी संतरी इस जिम्मेदारी से मुक्त होंगे। जेल-गार्डों के इन तर्कों का डॉक्टरों पर जरा भी असर नहीं हुआ। उनकी बातों को उन्होंने चलाऊ ढंग से लिया और संजीदा होकर बोले, ”आपकी परेशानी को आप ही समझ सकते हैं। हमें उससे कोई मतलब नहीं हैै। मरीज की हालत ऐसी है कि उसे तुरंत भर्ती करना जरूरी है।”
ड्यूटी डॉक्टर ने पुलिस वालों को कहा, ”अस्पताल के दो तलों पर कैदियों को रखने के अलग से दो कमरे बने हैं। किसी भी कमरे की चाबी तुम हेड नर्स से ले लो और कैदी को उसमें रखो।”इसके बाद डॉक्टर ने मुझे एडमिट करने के दस्तखत ले लिए। वार्ड ब्वॉय ने जब मेरे थैले को चैक किया तो उसमें तेल, पेस्ट, साबुन, कच्छे, तौलिए के अलावा दो किताबें व ढेर सारे लिखे खत व कोरे कागज निकले। इससे वार्ड ब्वॉय के साथ डॉक्टर भी हैरानी से मुझे देखने लगा। डॉक्टर ने बड़ी मिठास से पूछा, ”यह किताब तुम पढऩे के लिए लेकर आए हो?” मेरी मौन सहमति पर उसने मुस्कुराते हुए वार्ड ब्वॉय को मेरा थैला देने का इशारा किया। पुलिस वालों के नंबर लिखने के बाद डॉक्टर ने वार्ड ब्वॉय को हमें हेड नर्स के पास ले जाने को कहा।
वार्ड ब्वॉय हमें बाहर छोड़कर हेड नर्स के केबिन में गया। उससे कुछ बात की। हेड नर्स बाहर आई। यह नर्स एक भारी बदन की प्रौढ़ा थी। बाहर आकर उसने अपने चश्मे को ठीक करते हुए मुझे घूरा, फिर पुलिस वालों से पूछा, ”यह किस केस में है?ÓÓ पुलिस वाले कुछ बोलते इससे पहले मैंने जवाब दिया, ”मैडम, मैं एन.डी.पी.एस. एक्ट की सजा काट रहा हूं।” तब उसने एन.डी.पी.एस. का अर्थ पूछा। इस पर मैंने उसे चालू भाषा में बताया कि यह ड्रग केस हैं। मैं ब्राउन शुगर रखने की सजा काट रहा हूं। इस पर उसने बड़ी हिकारत से मुझे देखा और पुलिस वालों से मेरे केस पेपर लेकर उसकी एंट्री की। इसके साथ ही उसने पुलिस वालों से यह भी पूछा, ”मैं कैसा कैदी हूं?” पुलिस वाले उसके इन बेतुके सवालों से बेजार हो रहे थे, लिहाजा उन्होंने हेड नर्स से कहा, ”यह बड़ा अच्छा कैदी है। तुम फिक्र न करो।” परंतु उससे हेड नर्स को तसल्ली न हुई। वह अपनी अनुभवी आंखों से मुझे तोलती रही और मेरे एडमिशन के कागजों को भरती रही। उसने हमें अपने पीछे आने का इशारा किया। अपने केबिन से चलते हुए कुछ कदम दूर आकर एक जगह रुक गई और वार्ड ब्वॉय को एक चाबी देकर कमरा खोलने को कहा।
कमरे में लोहे के दो टूटे पलंग थे, जिन पर बरसों पुराने चिथड़े उड़े हुए बदबूदार मैले गद्दे पड़े थे। गद्दों पर जितना भी कपड़ा बचा था, उस पर रोगियों के गू-मूत की पपड़ी जगह-जगह जमी थी। मेरे साथ पुलिस वाले भी अंदर आये। वह कमरे को जांच कर यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि कमरे के अंदर से कैदी के फरार होने की कोई गुंजाइश तो नहीं है। पुलिस वालों ने कमरे का मुआयना किया। यह देखकर तसल्ली हुई कि ऐसी कोई गुंजाइश वहां नहीं थी। उन्होंने पलंग पर पड़े उन गद्दों को उड़ती नजर से देखा और फिर मुझसे मुखातिब हुए, ”अच्छा शर्मा, तुम आराम करो, हम बाहर अपनी ड्यूटी पर हैं।”
कमरे का दरवाजा खुला था। वार्ड ब्वॉय शौचालय में जमी गंदगी को धुलवाने के लिए सफाई करने वाले को खोज रहा था। उसके न मिलने पर वह मेरे लिए चद्दर लेने चला गया। पुलिस वालों ने हेड नर्स से चाबी लेकर फिर से ताले को चैक किया। कमरे में मैं अकेला था। मैंने पलंग पर पड़े गद्दों को पलट कर देखना चाहा कि दूसरी तरफ वो किस हाल में हैं। जैसे ही मैंने गद्दे को उठाया, उसका जीर्ण-शीर्ण कपड़ा पलंग के जंग लगे लोहे के खांचों में उसके आकार में चिपका रह गया और गद्दा रूई के साथ ऊपर आ गया। गद्दे की रूई व उसके भीतर उठे भभके से सिर चकरा गया। सांस रुकती सी महसूस हुई। मन घिना गया। उस गद्दे को छोड़ मैंने दूसरा गद्दा उठाया। उसका कपड़ा तो नहीं चिपका, पर उसमें पांच-पांच इंच के तीन गड्ढ़े थे। एक गड्ढ़े की रूई के आस-पास मुझे तिलचट्टे के दो-तीन अंडे दिखाई दिए। एक सिहरन से भरकर मैंने उधड़ी रूई को हटाया तो दो तिलचट्टे तेजी से निकल भागे। भीतर उनके कई अंडे बिखरे पड़े थे। मैं यही सोचता रह गया कि आखिर पहले आए बंदी इन गद्दों पर किस तरह सो पाए होंगे?
पुलिस वालों ने दरवाजों को बंद करके कुंड़ी लगा दी थी। दरवाजे का ऊपरी हिस्सा लोहे की सलाखों का था ताकि बंदी मरीज को दवाई देने में सुविधा रहे और अंदर झांककर पुलिस वाले बंदी को देख सकें। मैं दरवाजे के पास गया। सामने की बैंच पर बैठे पुलिसवालों को अपने पास बुलाया और बोला, ”हवलदार साहब, आप जरा अंदर आकर गद्दे देख लें। इतनी गंदगी भरे गद्दे पर सोया जा सकता है? मैं वार्ड ब्वॉय से इस बात पर सवाल करूंगा, तब आप यह नहीं कहना कि मैं अस्पताल में लफड़ा कर रहा हूं।” मेरे तेवर देखकर दोनों पुलिस वाले सकपका गये। एक ने मुझे नसीहत देनी चाही कि सरकारी अस्पतालों की हालत ऐसी ही है। तुम्हें इसी गद्दे पर सोना पड़ेगा। उसकी इस बात पर मैं खिन्नता से भर उठा। बिना किसी लाग-लपेट के मैंने कहा, ”हवलदार, अगर तुम सोचते हो कि मैं इस गंदे गद्दे पर लेटूंगा तो यह मुमकिन नहीं। मुझे सजा काटते हुए साढ़े आठ बरस हो गये हैं। तुम्हारे जी.आर.पी. के कई पुलिस वाले मुझे इन सालों में अस्पताल लाए और ले गए हैं। तुम उनसे पूछना। मैं बेकार में झगड़ा नहीं करता।” मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि दूसरा पुलिस वाला बोल उठा, ”शर्मा, मैं तुम्हें जानता हूं। उसने जिस अदब के साथ लफ्ज बोले वह हवलदार के उफान को रोकने के लिए काफी थे। हवलदार ने अपना रुख बदला और अस्पताल की व्यवस्था को कोसने लगा। मेरे फिर से कहने पर वह अंदर आया। जैसे ही मैंने गद्दे को थोड़ा पलटा, उसे देखकर उसने मुंह बिचका लिया और एक ही झटके में बाहर निकल गया। उसने दरवाजा भी बंद न किया कि वार्ड ब्वॉय एक धुली तार-तार चद्दर को बैड पर पटकते हुए बोला, ”यह चद्दर है। बिछा लेना। पाखाना, गुसलखाना भीतर जाना।”
मैंने उसकी बात पर तवज्जो न देकर अपनी बात कही, ”ये गद्दे गंदे हैं। (फिर एक गद्दे को पलटकर  दिखाया।) तिलचट्टों ने यहां अंडे दे रखे हैं। इन पर कैसे सोया जा सकता है? आप मुझे पुराना पर थोड़ा साफ गद्दा दे दीजिए। मेरे बोलने के लहजे से वार्ड ब्वॉय सतर्क हुआ। लेकिन तुरंत ही संभलते हुए उसने अपना बीज मंत्र बोल दिया, ”सभी बंदी इसी पर सोकर गये हैं। और गद्दे नहीं हैं। तुम्हें इसी पर सोना पड़ेगा।”  उसका यह रुख देखकर मेरी समझ में आ गया कि इससे बात करना बेकार होगा। दो टूक बात करने की नीयत से मैंने कहा, ”भाई मुझे लगता है तू कैदी को इंसान नहीं समझ रहा है। इस बेड़ी और कैदी के कपड़े देखकर तू कैदी को जानवर से भी बदतर समझ रहा है। अपनी नजर को ठीक कर। मैं इस गद्दे पर न सोकर फर्श पर लेटूंगा। जब डॉक्टर आयेगा तो मैं यह गद्दा दिखाकर उससे इसे बदलने की गुजारिश करूंगा। तुम जाओ, तुमने अपना काम कर दिया।” मेरे शब्दों को बाहर बैठे पुलिस वालों ने भी सुना और वह भी अंदर आ गये। वार्ड ब्वॉय के पास मेरी बात का कोई जवाब न था। पुलिस वाले चुप रह कर हम दोनों की शक्लों को देखने लगे।
कुछ देर बाद वह हेड नर्स के साथ लौटा। हेड नर्स ने आते ही धौंस जमानी शुरू कर दी। उसने दृढ़ स्वर में कहा, ”हमारे पास और गद्दे नहीं हैं। तुम्हें इन्हीं गद्दों पर सोना पड़ेगा।” उसके शब्दों में आदेश का पुट ज्यादा था। इस हेड नर्स से मेरा परिचय आते-आते हो गया था। कैदियों के प्रति उसका जो पूर्वाग्रह था, वह उसके शब्दों में छलक रहा था। उसके इस नजरिये ने मेरे भीतर आग लगा दी। मैंने बिफरते हुए वह गद्दा उठाया, जिसमें तिलचट्टे के अंडे थे और उसे दिखाकर पूछा, ”क्या कैदी होने भर से मुझे इस गद्दे पर सोने की सजा है? मैडम, कैदी भी इंसान है। आप उसे इंसान समझने की कोशिश करो। मैं इस गद्दे पर न सोकर जमीन पर सोऊंगा।”
मेरी दृढ़ता से वह विचलित हुई। अपने को सहेजा और फैसला सुनाया, ”तुम फर्श पर सोना चाहते हो तो तुम्हारी मर्जी। हमारे पास बदलने के लिए गद्दे नहीं हैं।”
हेड नर्स को एक कैदी से उलझते देख, दो नर्स व अन्य लोग वहां रुककर कौतूहल से देखने लगे। ”तो ठीक है मैडम, मैं यहीं फर्श पर बैठूंगा-लेटूंगा। डॉक्टर साहब आयेंगे तो मैं उन्हें अपनी परेशानी बताऊंगा।” मेरा जवाब था।
हेड नर्स को मेरी बात बड़ी नागवार लगी। एक धूर्त मुस्कान के साथ उसने पुलिस वालों को देखा और बोली, ”तुम कैसे कैदी को लेकर आए हो। यह तो बात-बात पर हमसे झगड़ा करता रहेगा।”
मैं उसकी बात पर चुप लगाने वाला था, पर अचानक ही दिल-दिमाग में कुछ घटा और मुंह से बाहर आया, ”सही बात आपसे कहना अगर झगड़ा है तो निश्चित जानिये मैं यह झगड़ा करता रहूंगा। क्या एक कैदी आपसे सही बात नहीं पूछ सकता?”
मेरे इस आक्रामक रुख पर हेड नर्स की भौंहें तन गईं। लेकिन मुंह से कुछ फूटते न बना। उसके जाने के बाद पुलिस वालों ने दरवाजे पर ताला लगा दिया।
मैं फर्श पर बैठा आने वाले हालात के बारे में सोचकर चिंतित था। शुरुआत में ही खटपट हो गई। वार्ड ब्वॉय एक बार आकर मुझे देख गया था। कुछ देर बाद वह फिर आया और मुझे रोगी की ड्रेस देते हुए बोला, ”इसे पहन लो।”
उस दिन संयोग से अस्पताल के सी.एम.ओ. औचक दौरे पर थे। मेरे कमरे के सामने दीवार थी, पर तिरछा होकर देखने से रोगियों का आधा वार्ड दिखाई देता था। दाहिनी ओर हेड नर्स का रेस्ट रूम, किचन, दवाइयों का स्टोर व रोगियों का खाना खाने का हॉल था। सी.एम.ओ. साहब आए तो पुलिस ने सलाम ठोक कर तुरंत ताला खोल दिया। मैंने हाथ जोड़कर मौन अभिवादन किया, जिसका जवाब सी.एम.ओ. ने बड़ी शालीनता से दिया। डॉक्टरों ने मेरा नाम पूछकर केस पेपर उनके सामने कर दिए। उन्हें गौर से पढऩे के बाद उन्होंने मेरे रोग के बारे में डॉक्टरों से चर्चा की व दवाइयों के निर्देश दिए। उन्होंने पुलिस से मेरे केस व सजा के बारे में पूछा। यह पुलिस क्या बताती? मैंने खुद ही अपने केस व सजा के बारे में बताया। यह जानकर वह हैरान रह गये कि मैं सजा के साढ़े आठ साल पूरे कर चुका हूं। उस मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने सहृïदयता से मेरी शिक्षा, काम व जन्म स्थान पूछा। सच्चाई जानने के बाद उसने मेरे प्रति बड़ी सहानुभूति जताई। कहा, ”तुम्हारी यह बीमारी चंद दिनों में खत्म हो जायेगी। तुम जरा भी न घबराना।”
सी.एम.ओ. के इस आचरण से मेरा दिल खिल उठा। उनकी इस संवेदना का आभार व्यक्त करने के बाद मैं थोड़ा रुका और बोला, ”साहब, आपकी मानवीय दृष्टि की मैं बड़ी कद्र करता हूं। मेरी एक गुजारिश और है।” यह कहते हुए मैंने पलंग पर बिछे गंदे गद्दे को पलटा और तिलचट्टे के अंडे को दिखाता हुआ बोला, ”सर, इस तरह के गंदे गद्दे पर किस तरह सोया जायेगा?” गद्दे की दशा व उसकी उधड़ी रूई में पड़े तिलचट्टों के अंडों को देखकर साहब जड़ से हो गए। कुछ कहते न बना। उन्होंने वार्ड ब्वॉय को गद्दा बदलने के लिए कहा फिर मुझसे मुखातिब होकर बोले, ”सुधीर शर्मा, तुम्हारा गद्दा यह बदल देगा। तुम अब आराम करो। कुछ भी परेशानी हो तो हेड नर्स को बताना।”
सी.एम.ओ. के जाने के कुछ देर बाद वार्ड ब्वॉय एक पुराना कम गंदा गद्दा लेकर आया और खिसियाये शब्दों में कहने लगा, ”अस्पताल में गद्दे हैं ही नहीं। इसे मैं दूसरे वार्ड से लेकर आया हूं।” उसने गद्दे को पटक कर अपना काम पूरा किया और चलता बना।
गद्दे के बदल जाने से उन सभी नर्सों व वार्ड ब्वॉयों को बड़ा आश्चर्य हुआ जो यह मान बैठे थे कि किसी भी हाल में इस कैदी का गद्दा नहीं बदला जायेगा। इसे उसी गंदे गद्दे पर सोना पड़ेगा।
नियमित ड्यूटी के डॉक्टर आए। उन्होंने केस पेपरों व एक्स-रे की जांच की। फिर पूछा, ”कुछ ऐसी दवाइयां जो हमारे अस्पताल में नहीं हैं, तुम्हें खरीदनी पड़ेंगी। क्या तुम खरीद सकते हो?” मेरे ना कहने पर उसने कहा, ”तब तो परेशानी खड़ी हो जाएगी।”
”सर, अभी तो मेरे पास पैसे नहीं हैं। लेकिन जेल-जमा खाते में मेरे पास पैसे हैं। उन पैसों से मैं दवाई खरीद सकता हूं। इसमें दो दिन लग जायेंगे।” डॉक्टर ने दवाई की पर्ची लिखकर दे दी।
सुबह जब मैं अस्पताल के लिए चला था तो जेल अधीक्षक व कैदियों की केस फाइल लाने-ले जाने वाले संतरी दोनों को पता था कि मैं अस्पताल में भर्ती होने जा रहा हूं इसलिए जेल संतरी जरूर टी.बी. अस्पताल आयेगा। उसी के हाथ मैं अपने पैसे से दवाई मंगा सकता था। अधीक्षक दवाइयों के लिए बिना कहे ही मेरे जमा खाते से पैसे दे देंगे। इसमें कोई परेशानी न थी। इसमें दो दिन जाते थे। दवाई किस तरह आयेगी? मैं इसी सोच में डूबा था।
मैंने कमरे में चारों ओर देखा। बाहर रोड वाली दीवार में मजबूत लोहे की जालीदार खिड़की थी, जहां से मैं बाहर के लोगों को देख सकता था। पाखाने, गुसलखाने को देखकर मैं दरवाजे पर आया और उसमें बनी छोटी खिड़की से वार्ड ब्वॉय को आवाज देकर बुलाया। वह खीजते हुए सामने आया। मैंने कहा, ”मुझे आप एक झाड़ू लाकर दे दें। मैं कमरे, गुसलखाने, पाखाने सभी को खुद साफ करूंगा।” मेरी बात सुनकर वार्ड ब्वॉय के चेहरे पर हैरानी छा गयी। उसे मुझसे इस बात की कतई उम्मीद न थी। उसने संयत होते हुए कहा, ”तुम रहने दो, भाई! हमारा सफाई करने वाला आदमी यह करेगा।” मेरे फिर से दोहराने पर वह खुद गया और सीखों वाली झाड़ू लेकर आ गया। मैंने हल्के-हल्के से पूरी सफाई की। बाहर सामने की ओर पड़ी लंबी बैंच पर बैठे पुलिस वाले व अस्पताल की दो महिलाकर्मी यह देख रही थीं। अब अस्पताल में भर्ती मरीज व उनके परिचित भी पुलिस को बैठे देखकर कैदी मरीज के लिए उत्सुकता से भर कर मेरे कमरे के दरवाजे के चक्कर काटने लगे। वे मेरे दुबले-पतले शरीर व सूखे मुंह पर रखी दाढ़ी को घूरते-निहारते पुलिस वालों से पूछकर अपनी जिज्ञासा को शांत करते।
दोपहर के खाने का वक्त हो गया। एक पुलिस वाले ने कमरे का ताला खोला और खाना लेने को कहा। मैंने बड़े अदब व अपनेपन से पूछा कि वह मुझे कैसे जानता है? उसने उसी गर्मजोशी से बताया कि जेल के बंदी व पुलिस वाले तुम्हारा किसी न किसी बात पर जिक्र करते हैं और अस्पताल की गाड़ी में हम कई बार आए-गए हैं। उसने यह भी बता दिया कि उसकी ड्यूटी चार घंटे बाद फिर से वहीं होगी। कल से दो-दो घंटे की ड्यूटी हो जायेगी। जी.आर.पी. ऑफिस ने एक हवलदार और दो सिपाहियों की ड्यूटी लगा दी है।
खाना खाने के बाद मैंने उसे इंडियन एक्सपे्रस की रिपोर्ट की वह फोटोकापी दिखाई जिसे श्री विभूति नारायण राय व सुमंत भट्टाचार्य ने लिखा था। इस फोटोकापी को जेल में ऐसे ही मौकों के लिए लाया था। उसकी चंद पंक्तियां पढ़कर ही वह अचंभित हो गया और मुझे अविश्वास से देखने लगा। हवलदार बेंच पर बैठा बड़ी जिज्ञासा से अपने सहकर्मी को ताकने लगा।
मैंने विनम्रता से पूछा, ”साहब, क्या तुम मेरी एक मदद कर सकते हो?”
उसकी सवालिया नजरों को देखकर मैंने अपनी बात सीधे-साफ लफ्जों में रखी, ”डाक्टर ने मुझे पचास रुपये से कम की एक दवाई को बाहर से खरीदने के लिए कहा है। अगले दो दिन में मैं अपने जेल गार्ड से पैसा लेकर आपको लौटा दूंगा। विश्वास रखो, मैं तुम्हारा पैसा लटकाऊंगा नहीं। आप मुझे यह दवाई खरीद कर देंगे तो आपका बड़ा उपकार होगा।ÓÓ क्षण भर की देर किए बिना उसने मेरी दवाई के लिए हामी भर दी। उसकी इंसानियत ने मुझे भिगोकर रख दिया। उसने मुझसे दवाई की पर्ची ली और चार घंटे बाद वह मुझे दवाई थमाते हुए बोला, ”शर्मा, अगर तुम्हें और भी दवाइयों की जरूरत पड़े तो चिंता न करना, मैं लाकर दूंगा।”
दवाई थामते हुए मेरा मन भारी हो गया। आंखें नम हो गईं। मैं इतना ही कह सका, ”आपका यह उपकार मैं हमेशा याद रखूंगा।” हमारे इस संवाद ने दूसरे पुलिस वालों पर अपना अलग प्रभाव छोड़ा। इससे यह हुआ कि बदली में आए जी.आर.पी. वाले जो पहले हद से ज्यादा सतर्कता से पेश आ रहे थे, अब सामान्य से लगने लगे।
पहले दो दिन मेरे लिए मानव-मन-विज्ञान के नये आकाश खोलने वाले रहे। इन दो दिनों में मुझ कैदी रोगी को सभी अस्पतालकर्मी व पुलिसकर्मियों ने अपने-अपने नजरिये से देखा, पूछा और उसी के हिसाब से तारतम्य बिठाया। इनमें सबसे रोचक बात उन पुलिसकर्मियों से होती जो हमेशा इसी बात पर चिंतित रहते कि क्या पता, मैं कहीं गुल न हो जाऊं। तब मैं दिन में दो बार उन्हें जरूर बताता कि अगर मैं चाहता तो गुल हो जाता। तुम इस हालत में थे कि तुम्हें मेरे गुल होने का पता ही कुछ मिनट बाद चलता। इस वास्तविकता को समझकर पुलिसकर्मी जान गये कि मेरी यहां से फरार होने में कोई रुचि नहीं है।
मैंने उन्हें बताया कि छह बरस पहले एक बार मैं इस अस्पताल में चैकिंग कराने आया था और हथकड़ी के खुलते ही दोनों पुलिस कर्मियों से निहत्था निबटकर मैं अस्पताल के साथ लगे जंगल में भागा था। वहां छह सात ग्वालों ने घेरकर मुझे तुम्हारे जी.आर.पी. ऑफिस भेजा जो जंगल के दूसरी ओर है। तुम चाहो तो पुराने सिपाहियों से पूछ सकते हो। उन्हें यह बात बताना मुझे इसलिए जरूरी लगा कि उस तमाशे के चलते अस्पताल के लोग व पुलिसवाले मुझे पहचान गये थे। पहरे के सिपाही बदलते रहने से क्या पता कोई पुराना सिपाही आ जाए और मुझे पहचान कर दूसरों को डरावनी कहानी न सुनाए। यही बात अस्पताल कर्मियों पर लागू होती थी। इसलिए मैंने खुद ही बताना बेहतर समझा।
दो दिन बाद जब अस्पताल की ड्यूटी का जेल गार्ड मेरे पास आया तो मैं उस पर बड़ा खफा हुआ। उसने आने में एक दिन जाया क्यों किया। जेल गार्ड जेल में मेरे प्रति बड़ी इज्जत व सहानुभूति रखता था। मेरे गुस्से से वह रुआंसा हो गया और न आने के झूठे बहाने बनाने लगा। वह कैसे भी मेरे कोप से बचना चाहता था। उसकी सफाई के बाद मैंने आगे की बात पूछी तो उसने मुझे तीन खत व एक सौ पचास रुपये देते हुए बताया कि इन-इन बंदियों ने तुम्हारे लिए यह खत और पैसे भेजे हैं। (उस वक्त डॉ. कुसुम अंसल जी द्वारा की गई मदद का एक बड़ा हिस्सा मेरे जेल-जमा खाते में मौजूद था।) जेल गार्ड के आने पर पुलिस वालों ने दरवाजा खोल कर खुला ही रखा और निर्विकार भाव से वह मुझे खत व पैसे लेते देखते रहे। जेल गार्ड ने अधीक्षक की शुभकामनायें देकर कहा, ”साहब ने तुम्हारी हर दवाई को खरीदकर देने को कहा है और वह खुद भी तुमसे मिलने को कह रहे थे।” जेल के अंदर का हाल-चाल बताने के बाद उसने न आने के लिए फिर से माफी मांगी। उसके लाए पैसों में से कुछ पैसे मैंने पहले ही अलग कर लिए थे। उन्हें उसकी जेब में ठूंसते हुए मैंने बड़े अपनत्व से कहा, ”इनसे तुम मेरी तरफ से एक बार नाश्ता कर लेना।ÓÓ उसने मेरे हाथ को रोकने की नाकामयाब कोशिश की। मुंह से उससे कुछ बोलते न बना। चेहरे पर कृतज्ञता छा गई। उसने मेरी दवाई की जरूरत पूछी और फिर से आने का वायदा करके चला गया।
मैंने सबसे पहले उस पुलिस वाले का ऋण चुकाया जिसने मुझे अपनी जेब के पैसे से दवाई लाकर दी थी।
तीन-चार दिन में ही दवाइयों ने अपना असर दिखाया। मेरी तबियत सुधरने लगी। भूख भी बढऩे लगी। अस्पताल के बजट में मरीज का जितना खाना था वह पेट भरने के लिए नाकाफी था। जेल का बेस्वाद उबला खाना खाते-खाते मेरी भूख भी मर गई थी। जेल की बनिस्पत अस्पताल के खाने में थोड़ी राहत थी। थोड़ा नमक-मिर्च ठीक मिलने से भूख बड़ी तीखी महसूस होने लगी। इस बात को मेरे बिना बोले ही रसोई की इंचार्ज और खाना बांटने वाली महिला ने महसूस किया और मुझसे कहा, ”शर्मा, तुम्हें खाना कम पड़ता है तो तुम पेट भर खाना लिया करो।ÓÓ उनकी इस आत्मीयता, अपनत्व ने मुझे ध्वस्त कर दिया। मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि जेल, बीमारी और भूख की इस परेशानी में इस तरह कोई साथ देगा। उन दोनों महिलाओं ने खुद ही आगे हाथ बढ़ाकर मेरी इस परेशानी को हर लिया। ”एक अनजान, बीमार कैदी को जो आप यह जीवन दे रही हैं, मैं जीवन भर इसका ऋणी रहूंगा।” कहते-कहते मेरी आंखें भर आईं।
मेरी कृतज्ञता से वह चमत्कृत सी रह गईं। एक कैदी से शायद उन्हें इस तरह की कृतज्ञता की उम्मीद नहीं थी। अपने अतीत में मैंने तरह-तरह के व्यंजनों को चखा, लेकिन इन महिलाओं के दिए इस दान से मुझे पहली बार महसूस हुआ कि भोजन में प्राण होता है। मैं चिंतन करता- जेल और बीमारी के बुरे वक्त में किए गए उनके इस उपकार से क्या मैं कभी मुक्त हो पाऊंगा?
मुझे सबसे ज्यादा हैरानी इस बात से थी कि मेरा अतीत जानने के बाद भी इन कम पढ़ी-लिखी महिलाओं ने मेरे प्रति ये जज्बात रखे। अस्पताल के नियमों के हिसाब से हर मरीज को एक ही माप से खाना दिया जाता है। उससे ज्यादा देना दंडनीय है। दोनों महिलाओं ने हिम्मत करके मुझे भरपेट भोजन दिया।
अस्पताल में हमारे वार्ड की महिला सफाई कर्मचारी से भी मेरा संवाद इस तरह बना-  वह तीस-पैंतीस साल की गोरी-चिट्टी अच्छे नैन-नक्श की महिला थी। दूसरे दिन उसने पुलिस से कहा कि वह कैदी रोगी के कमरे की सफाई करना चाहती है। दरवाजा खुलने के बाद वह सहमती हुई सी कमरे में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर खासा तनाव था। उसके इस तरह सहमने से मुझे चोट पहुंची। अभी उसने अपनी झाड़ू और पोंचा जमीन पर नहीं रखा था। वह उन्हें जमीन पर रख पाती, उससे पहले ही मैं बोला, ”कल मैंने खुद ही कमरे को साफ किया था। जब तक मैं यहां हूं, मैं खुद ही कमरे और पाखाने को साफ करता रहूंगा। यह मामूली काम है और आप इसके लिए परेशान न हों।”
उसने इसे बड़े अविश्वास से सुना, फिर सहज होती हुई बोली, ”नहीं नहीं… तुम क्यों साफ करोगे! यह तो हमारी ड्यूटी है।” लेकिन मैंने फिर अपनी बात दोहरा दी।
खाने की तरह रोगी को सुबह का नाश्ता भी पर्याप्त नहीं मिलता था। एक कप चाय और चार ग्लूकोज के बिस्कुट से दोपहर तक का समय निकालना मुश्किल हो जाता था। सफाई करने वाली बाई कभी-कभी अपने सहकर्मी के न आने से सुबह का नाश्ता भी बांट देती। अस्पताल में बाहर (होटल) का खाना आना मना था। परंतु सुबह के वक्त  होटल का मालिक चाय, पकौड़ी, बे्रड के साथ दो लड़कों को अस्पताल भेजता था, जो पूरे अस्पताल का चक्कर लगा कर यह नाश्ता बेचते। रात को रोगियों के पास रुके उनके परिचित मुख्य ग्राहक होते।
मैं लोगों को नाश्ता करते हुए देखता तो मेरी कुछ खाने की इच्छा हो आती। उस वक्त मुझे तीन-चार रुपये की कीमत मालूम पड़ती। चाय बेचने वाले दोनों लड़के सफाई करने वाली महिलाकर्मी से बड़े अपनेपन से बात करते थे। यह देखकर मैंने उस महिलाकर्मी से कहा, ”मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं। मुझे इन लड़कों से सुबह पांच-छह रुपये रोज का नाश्ता उधार चाहिए। मैं अस्पताल छोडऩे से पहले यह पैसे अदा कर दूंगा। अभी मुझे कुछ दिन और अस्पताल में रहना पड़ेगा।” महिला ने मौन रहकर मेरी प्रार्थना को सुना फिर मेरी आंखों में गहरे तक देखती हुई बोली, ”शर्मा, तुम्हें जितना भी नाश्ता करना हो, कर लिया करना। मैं उन लड़कों से बोल दूंगी। तुम पैसे की फिक्र नहीं करना।” और तुरंत ही वह उन लड़कों को खोजने चली गई। मुझे लगा मेरे खुद के पाखाने को साफ करने की बात ने उस पर गहरा असर डाला। सिर्फ कैदी भर होने से वह उलझी मनोदशा से मेरा कमरा साफ करे, मुझे कतई मंजूर नहीं था। मैंने उसे यही बात समझाई। खुदा जाने, उस पर क्या असर हुआ। उसके बाद वह मुझे अपने घर का बना खाना भी लाकर देने लगी। पहली बार उसके घर का खाना खाते हुए रूह थरथरा गई। उसके बाद वह जब-तब ड्यूटी से राहत पाती, पुलिस वालों के साथ बेंच पर बैठ जाती और मुझसे बड़े जिज्ञासा भरे सवाल करने लगती।
जैसे यही कम न हो। एक दिन रात दस बजे मैं दरवाजे की खिड़की पर खड़ा पुलिसवालों से बतिया रहा था। एक वृद्धा एक थैली लेकर मुझे कौतुक से ताकते हुए रसोईघर की तरफ गई और कुछ देर बाद अधभरी थैली के साथ लौटी। मेरे दरवाजे के पास वह रुकी और सौम्यता के साथ मुझे ताकने लगी। दुबली-पतली काया की यह वृद्धा गोवानी घरेलू फ्राक पहने थी। उसकी आंखों में करुणा व आत्मीयता देखकर मैंने खुद ही बताया, ”मैं ड्रग केस की सजा काट रहा हूं और अब मेरी सजा कुछ ही बाकी रह गई है।” सुनकर उसने छाती पर क्रास बनाया और जीसस की भक्ति की किसी पंक्ति को बुदबुदाते हुए उसने मुझे आशीर्वाद दिया। फिर ऐसे बातें करने लगी, जैसे वह बरसों से परिचित हो। मैं उसे माई कहकर बुलाने लगा।
जब मैंने उससे पूछा कि वह मुझे देखकर रुक क्यों गई थी? तो उसने कहा, ”वह किसी भी कैदी को देखती है तो उसे अपने स्वर्गवासी पति की याद आ जाती है। उसने पैंतीस बरस पुलिस की नौकरी की व हवलदार होकर रिटायर हुआ।” वृद्धा खुद भी अस्पताल में नर्स रहकर रिटायर हुई थी। सभी डाक्टर व नर्स उसे बड़ा सम्मान देते थे। उसने घर में मुर्गियां व सूअर पाल रखे थे। वह कूड़ेदान में पड़े खाने को थैली में रखकर मुर्गियों व सूअरों के लिए ले जाती थी। अगले दिन वह अपने नियत समय पर आई और बातचीत के बाद संजीदा होते हुए बोली, ”शर्मा तो ब्राह्मण होते है, तुम मछली, मांस खाते हो?” उसके पूछने में इतना अपनत्व था कि मैं उसे देखता रह गया। फिर खिलते हुए बोला, ”क्या बात है!” और हंसते हुए बात पूरी की, ”मैं इंसान ही ढंग का नहीं हूं। ब्राह्मण तो बाद की बात है। गोवा के जिस मोजेज कार्डोस के घर में एक साल रहा, वहां मैंने मेंढ़क, बगुला व कछुए का मांस भी खाया। इसलिए आप मुझे ब्राह्मïण भूलकर भी न समझें।” इस पर उसने राज खोला कि वह मेरे लिए घर से मुर्गी बनाकर लाना चाहती है। पहरे के पुलिस वाले मेरे साथ घटी हर बात का एक हिस्सा बनते थे। वह चाहते तो उस वृद्धा को खाना लाने से रोक सकते थे लेकिन उन्होंने इसे मां-बेटे की मुलाकात समझा और यह वृद्धा हर रोज आकर मुझे मां की ममता व वात्सल्य देने लगी।
हेड नर्स ने शुरुआत में मेरे साथ जो व्यवहार किया उसके लिए उसे पश्चाताप था। दवाई या दूसरी वजह से जब मेरा उसका आमना-सामना होता तो मैं उसका अभिवादन जरूर करता। मेरा यह अभिवादन उसे शर्म से गाड़ देता। उड़े चेहरे के साथ वह नजरें न मिलाती हुई जवाब देती। एक दिन उसने पुलिस से कहलवा कर अपने रेस्ट रूम में बुलाया और पुलिस वालों से गुजारिश की कि वह मुझे कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दें। वह मुझसे कुछ बात करना चाहती है। पुलिस वालों ने कोई ऐतराज नहीं किया। हेड नर्स ने मुझे सामने की कुर्सी पर बैठने को कहा और मुस्कुराते हुए बोली, ”शर्मा, तुम मेरे से बहुत नाराज होगे? मैंने शुरू में तुम्हारे साथ बड़ा रूखा बरताव किया। बाद में मुझे इस बात का अहसास हुआ। इसी बात की माफी मांगने के लिए मैंने तुम्हें बुलाया है।ÓÓ  जिस अपनत्व व मिठास से उसने मुझे यह कहा, उससे मेरे मन की कड़ुवाहट धुल गई जो उसके रूखे और पूर्वाग्रह भरे व्यवहार से पैदा हो गई थी। मैंने उसे ‘इंडियन एक्सपे्रस’ की कापी दिखाकर कहा, ”मैं पेशेवर अपराधियों के बीच रहा हूं। अब भी अच्छा आदमी नहीं हूं, लेकिन आपके इस बड़प्पन ने मुझे नया मानवीय बोध दिया है।”
हेड नर्स ने ‘इंडियन एक्सपे्रस’ की कहानी कुछ डॉक्टरों और सहकर्मियों को बता दी। नतीजन, उन लोगों ने भी बड़ी जिज्ञासा के साथ उसे पढ़ा और बड़े प्रभावित हुए। इस बात पर कोई भी यकीन करने को तैयार नहीं था कि भारतीय पुलिस सेवा का एक वरिष्ठï अधिकारी एक अनजान कैदी का इस तरह साथ दे सकता है। अस्पताल कर्मियों ने ही बताया कि पहले के कुछ कैदी बड़े उजड्ड़ थे। एक ने सफाई महिलाकर्मी को कमरा साफ करते समय दबोचने की कोशिश की, जिससे उनके दिलो-दिमाग में नकारात्मक संदेश गया और वह सभी कैदियों को एक ही दृष्टि से देखने लगी।
सात-आठ दिन के बाद तबियत सुधर गई और मैं बैठने लायक हो गया। मैंने जेल गार्ड से अपनी डाक मंगवाई। उसने ढेरों खत व पत्रिकायें लाकर मेरे सामने कर दीं। पहले मैं सिर्फ पढ़ता था। अब मैंने लिखना शुरू कर दिया। पुलिसकर्मी व अस्पताल कर्मी पहले ही मेरे पढऩे के शौक से हैरान थे, अब यह लिखना देखकर वह चकरा गये। उनकी हैरानी मुझे बड़े जोश व ऊर्जा से भर देती।
मैं उन्नीस दिन उस टी.बी. अस्पताल में रहा। डॉक्टरों ने मुझे स्वस्थ घोषित करके जाने की इजाजत दे दी। अस्पताल के अधिकतर डॉक्टर मेरे परिचित हो गये। वे ड्रग्स के बारे में मुझसे वास्तविक जानकारी लेते थे। मेरे नशेड़ी व अपराध जीवन के अनुभवों को वह इतना मंत्रमुग्ध होकर सुनते कि नर्स उन्हें ध्यान दिलाती, दूसरे लोग उनका इंतजार कर रहे हैं। मेरे साहित्य शौक को सभी ने सराहा व हिंदी लेखकों के प्रति आभार व्यक्त किया, जिन्होंने अनजान कैदी को सहारा देकर जीवन में फिर से खड़ा किया।
जेल के फर्श पर साढ़े आठ साल सोने के बाद मेरी बीमारी ने मुझे पलंग पर सोने के सुख के साथ-साथ और भी बहुत कुछ दिया। भले ही यह अस्पताल का एक बंद कमरा था लेकिन यहां का जीवन जेल-जीवन से अलग था। साहित्य ने जो संवेदनायें मेरे भीतर उत्पन्न की थी, उन्हें मैं भिन्न-भिन्न रूपों में यहां घटते देखता तो आजादी की टीस उठ खड़ी होती। आजादी का अर्थ समझ आता। दरवाजे पर बनी खिड़की से मैं जब चाहता बाहरी दुनिया से संवाद बना लेता। तब मुझे लगता मेरी यह बीमारी मेरे लिए एक वरदान बनकर आई है जिसने मुझे बाहरी दुनिया के बीच रहने का मौका दे दिया है।
जेल वापस जाने के लिए मैं सुबह से अपनी चीजों को सहेज रहा था तो उस स्वेटर को मैंने थैले में रखा जिसे एक महीने पहनकर मैं अपने बुखार की ठंड को दूर करता रहा था। अस्पताल में भी मैं इसे पहनकर ही आया था। यह स्वेटर मुझे लेखिका हुस्न तबस्सुम निहां ने भेजा था। अपनी सजा में मैंने तब पहली बार स्वेटर पहना था। अपनी बीमारी के चलते यह स्वेटर मेरे लिए कितना मूल्यवान और उपयोगी साबित हुआ, इसे सिर्फ मैं ही जान सकता हूं।
थोड़ी देर बाद वह वृद्धा माई प्रकट हो गई जो सुबह अस्पताल नहीं आती थी। उसके हाथ में एक पैकेट था। मेरे अभिवादन करते ही उसने वह पैकेेट मुझे थमाया और भारी दिल से बोली, ”बेटा, आज तू चला जायेगा, इसी महीने क्रिसमस है। मैं यह केक तेरे लिए लाई हूं।” उसके भीगे शब्दों ने मेरे भीतर तूफान खड़ा कर दिया। मेरी सहजता न जाने कहां विलीन हो गई। नथुने फड़कने लगे। आवाज भरभरा गई। मुझे लगा जैसे आसपास के पूरे वातावरण में जीसस क्राइस्ट तैरने लगे हों। सलाखों के बीच से हाथ डालकर उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा और लरजते हुए बोली, ”शर्मा, तू छूटने के बाद मेरे घर जरूर आना।” मैं भला उसे क्या कहता। उसके दोनों हाथों को पकड़कर मैंने माथे से लगाया और बोला, ”तूने मुझे जीसस क्राइस्ट का मतलब समझा दिया है इसलिए कैदमुक्त होने के बाद मैं तेरे पैर छूने जरूर आऊंगा।”
सफाई महिलाकर्मी उस दिन अपनी ड्यूटी पर पहले ही आ गई। उसने मुझे आवाज देकर बुलाया और एक छोटा सा गोल टिफन पकड़ाते हुए वह बोली,  ”तुम आज जा रहे हो, इसमें थोड़ा सा खाना है। मैं चाहती हूं कि तुम इसे खाकर जाओ।ÓÓ यह बोलते हुए उसकी आंखें डबडबा गईं और स्वर भारी हो गया। सुबह से इस स्तर का यह तीसरा अनुभव था। मैं अपने भीतर उठे आवेगों को रोकने में खामोश रहा। उसने सलाखों के भीतर अपना हाथ डाला और मेरी बांह को हल्के से पकड़ कर बोली, ”शर्मा, तुम कैदी होने के बाद भी अच्छे आदमी हो। मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करती हूं।” वह इस बात से बहुत प्रभावित थी कि  मैंने चायवाले का उधार जाने से पहले चुका दिया था। बड़ी मुश्किल से मैं उसे कह पाया, ”मैं हमेशा तुम्हारा ऋणी रहूंगा।” उसकी आंखों की बूंदों ने दुनिया भर के कलुष को धो दिया। मुझे दुनिया बड़ी खिली-खिली सी महसूस होने लगी।

सुधीर शर्मा : अपराधी के साहित्‍यकार बनने की गाथा

अपनी घुटन व अंधेरे से मुक्ति मुझे साहित्यिक रचनाओं से मिली हे। रचनाओं ने ही मुझे नई प्राणवायु और उजाला दिया है। मैंने इस बात को आत्मसात कर लिया है कि रचना जीवन के अंधकार से जूझने वाली मनुष्यता की आत्मिक शक्ति है…
यह किसी बुद्धिजीवी का वक्तव्य या किसी कहानी-उपन्यास का संवाद नहीं, बल्कि एक कैदी की कठोर जिंदगी की हकीकत है। दस साल की सजा काट चुके सुधीर शर्मा को साहित्य ने नई रोशनी दिखायी, जिसके प्रकाश में उसने अपराध की दुनिया  को छोडऩे का निश्चय कर लिया।
सुधीर शर्मा कौन है? वह कैसे अपराधी बना, उसका साहित्य से कैसे संपर्क हुआ और इस अपराध के दलदल से वह कैसे निकला, इसकी बड़ी रोमांचक, दास्तान है।
सुधीर शर्मा का जन्म 9 सितंबर, 1962 को दिल्ली में एक गरीब घर में हुआ। उसके पिता पूर्णचंद्र शर्मा एक फैक्टी में क्लर्क थे । वह ईमानदार और मेहनती इंसान थे लेकिन सख्त रवैये के कारण घर में हिटलरी कानून चलाते थे। जैसे- सुधीर गली के बच्चों के साथ नहीं खेलेगा। वह डंडे के बल पर पढ़ाने के हामी थे। मां कमला देवी चार जमात पास सीधी-सादी धार्मिक गृहिणी। इन कानूनों का पालन उन्हें भी करना पड़ता था। वह अपनी ममता का गला घोंटकर इनका पालन करतीं। कभी-कभी न करने पर उन्हें भी प्रताडि़त होना पड़ता। सुधीर को बाहरी बच्चों के साथ न खेलने देने से वह शायद उसे बुराइयों से बचाना चाहते हों, लेकिन उनकी इस सख्ती ने सुधीर के बलमन पर उल्टा प्रभाव डाला। समय के साथ-साथ वह कक्षाओं में आगे बढ़ता गया। उसकी छोटी बहन का जन्म हुआ। उस समय सुधीर की उम्र दस वर्ष थी। बहन के आने के बाद भी उसके हम उम्र दोस्तों की कमी पूरी नहीं हुई। पिताजी के हिटलरी कानून ज्यों के त्यों थे।
नौंवी में विषय चुनने की बात आई। सुधीर की ड्राइंग बहुत अच्छी थी। वह ड्राइंग लेना चाहता था। उसने पिताजी को बताया। उन्होंने एक झापड़ के साथ निर्देश दिया कि कॉमर्स लो। ड्राइंग लेकर क्या पेंटर बनना है? सुधीर पढ़ाई में अच्छा था। उसने मन मारकर कॉमर्स ली। वह किसी तरह बस पास होने का ध्यान रखता। अब पिताजी की तानाशाही के प्रति उसके मन में विद्रोह कुलबुलाने लगा। लेकिन वह खामोशी ही रहता।
हायर सैकेंडरी पास कर उसने एक सांध्य कॉलेज में दाखिला ले लिया। उसे पार्ट टाइम में कनाट प्लेस की मशहूर न्यूज एजेंसी मेें काम मिल गया। कॉलेज की आजादी और कनाट प्लेस की दुनिया ने उसे एक नई दुनिया से परिचित कराया। घर के रूढि़वादी-घुटन भरे माहौल से यह दुनिया अलग थी। कॉलेज में वह यह देखकर दंग रह गया कि लड़कों के माता-पिता उनके साथ दोस्त की तरह बात करते हैं। कनाट प्लेस की दुनिया उसे दूसरी ही लगी, जिसे वह फिल्मों में देखा करता था। वह जिस न्यूज एजेंसी में काम करता था, उसके अखबार व पत्रिकाएं सभी दूतावासों, मंत्रालयों और पंच सितारा होटलों में जाती थीं। काम करने से उसे आत्मविश्वास मिला। वह अपनी तनख्वाह घर में देता और अपना जेब खर्च एक-दो रुपये निकाल लेता।