नई दिल्ली : इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा शुरू की गई काव्य-पाठ की कार्यक्रम-श्रृंखला ‘कवि के साथ’ का पाँचवा आयोजन 8 जुलाई 2012 को शाम 7 बजे से गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटैट सेंटर लोधी रोड, नई दिल्ली में किया जायेगा। इस बार वरिष्ठ कवि असद जैदी के साथ गिरिराज किराडू और सुधांशु फिरदौस काव्यपाठ करेंगे।
कवि और कविता से कविताप्रेमी हिन्दी समाज का सीधा सम्पर्क-सम्वाद बढ़े, यही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसमें हर बार हिन्दी कविता की तीन पीढ़ियाँ एक साथ काव्यपाठ करती हैं। पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत करते हैं।
इस बार के तीनों कवियों की एक-एक कविता-
नामुराद औरत/असद जैदी
नामुराद औरत
रोटी जला देती है
बीस साल पहले किसी ने
इसकी लुटिया डुबो दी थी
प्यार में
नामुराद औरत के पास
उस वक़्त
दो जोड़ी कपड़े थे
नामुराद औरत भूल गई थी
दुपट्टा ओढ़ने का सलीक़ा
नामुराद औरत की
फटी थी घुटनों पर से शलवार
इतने बरस बीत गये
बेशरम उतनी ही है
बेशऊर उतनी ही है
अब तो देखो इसकी
एक आँख भी जा रही है
टूटी हुई बिखरी हुई पढ़ाते हुए/गिरिराज किराडू
एक प्रतिनियुक्ति विशेषज्ञ की हैसियत से
(मानो उनके कवियों का कवि हो जाने को चरितार्थ करते हुए)
लगभग तीस देहाती लड़कियों के सम्मुख
होते ही लगा शमशेर जितना अजनबी कोई और नहीं मेरे लिये
मैंने कहा कि उनकी कविता का देशकाल एक बच्चे का मन है
कि उनके मन का क्षेत्रफल पूरी सृष्टि के क्षेत्रफल जितना है
कि उनकी कविता का खयालखाना है जिसके बाहर खड़े
वे उसे ऐसे देख रहे हैं जैसे यह देखना भी एक खयाल हो
कि वे उम्मीद के अज़ाब को ऐसे लिखते हैं कि अज़ाब खुद उम्मीद हो जाता है
कि उनके यहाँ पाँच वस्तुओं की एक संज्ञा है और पाँच संज्ञाएं एक ही वस्तु के लिये हैं
अपने सारे कहे से शर्मिन्दा
इन उक्तियों की गर्द से बने पर्दे के पीछे
कहीं लड़खड़ाकर गायब होते हुए मैंने पूछा
अब आपको कविता समझने में कोई परेशानी तो नहीं ?
उनका जवाब मुझे कहीं बहुत दूर से आता हुआ सुनाई दिया
जब मैं जैसे तैसे कक्षा से बाहर आ चुका था और शमशेर से और दूर हो चुका था।
वह जुलाई थी या अगस्त/सुधांशु फिरदौस
वह जुलाई थी या अगस्त
ठीक ठीक याद नहीं हैं
बस इतना याद है
बारिश हो रही थी
और सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये
घुटनों तक डूबी वह भीग रही थी
सर पे धान के हरे-हरे बिचरों का बोझा
पांक से लिथड़ी उसकी सुगरपंखी फ्रॉक
नाक में तार की मुडी हुई नथुनी
और मेह गिर रहा था हम दोनों के बीच
वह रोपनी का आखिरी दिन था
उसके बाद छोड़ आया सिंगाही
छोड़ आया अपनी बोली
छोड़ आया अपना पानी
छोड़ आया वहीं चौर के शीशम के पेड़ से टंगी अपनी कमीज़
कैलेंडर में साल बदले हैं स्कूल और कॉलेज बदले हैं
बदले हैं शहर फटे बनियानो की तरह
जीता रहा हूँ अपने ही देश में विस्थापितों की तरह
जिन्दगी में आई है लडकियाँ
जैसे आती हैं बरसाती नदियाँ
छप्पर तक बहा के ले गयी हैं
फिर भी बची रह गयी है माँ की दी हुई चूड़ियाँ
उलझा रहा हूँ किताबों के मकड़जाल में
रटता रहा हूँ गणित के दुर्लभ प्रमेओं को
सोचता रहा हूँ आदमी को गुलाम बनाने वाले अल्गोरिथमो के बारे में
टावर ऑफ़ हनोई के बारे में
यूलेरियन सर्किट के बारे में
हेमिल्टोनियन ग्राफ के बारे में
आज ऑफिस से जब घर लौटा हूँ
अकेले बंद कमरे का दरवाजा खोला हूँ
बिस्तर पे लेट के जैसे हीं आँखे बंद की हैं
तो ऐसा लग रहा है
सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये वह अब भी भीग रही है
और शीशम के पेड़ से टंगी वह कमीज़ अब भी वहीं हिल रही है


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