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बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

गिरगिट : अन्तोन चेखव

अन्तोन चेखव

पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालोंवाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झड़बेरियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी।…चौक में एक भी आदमी नहीं। ….भूखे लोगों की तरह दुकानों और शराबखानों के खुले हुए दरवाजे ईश्वर की सृष्टि को उदासी भरी निगाहों से ताक रहे थे, यहां तक कि कोई भिखारी भी आसपास दिखायी नहीं देता था।
“अच्छा! तो तू काटेगा? शैतान कहीं का!” ओचुमेलोव के कानों में सहसा यह आवाज आयी, “पकड़ तो लो, छोकरो! जाने न पाये! अब तो काटना मना हो गया है! पकड़ लो! आ…आह!”
कुत्ते की कि‍कि‍याने की आवाज सुनायी दी। आचुमेलोव ने मुड़कर देखा कि व्यापारी पिचूगिन की लकड़ी की टाल में से एक कुत्ता तीन टांगों से भागता हुआ चला आ रहा है। कलफदार छपी हुई कमीज पहने, वास्कट के बटन खोले एक आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह कुत्ते के पीछे लपका और उसे पकड़ने की कोशिश में गिरते-गिरते भी कुत्ते की पिछली टांग पकड़ ली। कुत्ते के कि‍कि‍याने और वहीं चीख- ‘जाने न पाये!’ दोबारा सुनाई दी। ऊंघते हुए लोग दुकानों से बाहर गरदनें निकालकर देखने लगे, और देखते-देखते एक भीड़ टाल के पास जमा हो गयी, मानो जमीन फाड़कर निकल आयी हो।
“हुजूर! मालूम पड़ता है कि कुछ झगड़ा-फसाद हो रहा है!” सिपाही बोला।
आचुमेलोव बाईं ओर मुड़ा और भीड़ की तरफ चल दिया। उसने देखा कि टाल के फाटक पर वही आदमी खड़ा है। उसकी वास्कट के बटन खुले हुए थे। वह अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाये, भीड़ को अपनी लहूलुहान उँगली दिखा रहा था। लगता था कि उसके नशीले चेहरे पर साफ लिखा हुआ हो, “अरे बदमाश!” और उसकी उँगली जीत का झंडा है। आचुमेलोव ने इस व्यक्ति को पहचान लिया। यह सुनार खूकिन था। भीड़ के बाचोंबीच अगली टांगें फैलाये अपराधी, सफेद ग्रेहाउँड का पिल्ला, छिपा पड़ा, ऊपर से नीचे तक कांप रहा था। उसका मुंह नुकिला था और पीठ पर पीला दाग था। उसकी आंसू-भरी आंखों में मुसीबत और डर की छाप थी।
“यह क्या हंगामा मचा रखा है यहां?” आचुमलोव ने कंधों से भीड़ को चीरते हुए सवाल किया। “यह उॅँगली क्यों ऊपर उठाये हो? कौन चिल्ला रहा था?”
“हुजूर! मैं चुपचाप अपनी राह जा रहा था, बिल्कुल गाय की तरह,” खूकिन ने अपने मुँह पर हाथ रखकर, खाँसते हुए कहना शुरू किया, “मिस्त्री मित्रिच से मुझे लकड़ी के बारे में कुछ काम था। एकएक, न जाने क्यों, इस बदमाश ने मरी उँगली में काट लिया।..हुजूर माफ करें, पर मैं कामकाजी आदमी ठहरा,… और फिर हमारा काम भी बड़ा पेचीदा है। एक हफ्ते तक शायद मेरी उँगुली काम के लायक न हो पायेगी। कुछ  मुझे हर्जाना दिलवा दीजिए। और हुजूर, कानून में भी कहीं नहीं लिखा है कि हम जानवरों को चुपचाप बरदाश्त करते रहें।..अगर सभी ऐसे ही काटने लगें, तब तो जीना दूभर हो जायेगा।”

“हुंह..अच्छा..” ओचुमेलाव ने गला साफ करके, त्योरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “ठीक है।…अच्छा, यह कुत्ता है किसका? मैं इस मामले को यहीं नहीं छोडूँगा! कुत्तों को खुला छोड़ रखने के लिए मैं इन लोगों को मजा चखाऊँगा! जो लोग कानून के अनुसार नहीं चलते, उनके साथ अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा! ऐसा जुर्माना ठोकूँगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा। बदमाश कहीं के! मैं अच्छी तरह सिखा दूँगा कि कुत्तों और हर तरह के ढोर-डंगर को ऐसे छुट्टा छोड़ देने का क्या मतलब है! मैं उसकी अक्‍ल दुरुस्त कर दूँगा, येल्दीरिन!”

सिपाही को संबोधित कर दरोगा चिल्लाया, “पता लगाओ कि यह कुत्ता है किसका, और रिपोर्ट तैयार करो! कुत्ते को फौरन मरवा दो! यह शायद पागल होगा।…मैं पूछता हूं, यह कुत्ता किसका है?”
“शायद जनरल जिगालोव का हो!” भीड़ में से किसी ने कहा।
“जनरल जिगालोव का? हुँह…येल्दीरिन, जरा मेरा कोट तो उतारना। ओफ, बड़ी गरमी है।…मालूम पड़ता है कि बारिश होगी। अच्छा, एक बात मेरी समझ में नही आती कि इसने तुम्हें काटा कैसे?” ओचुमेलोव खूकिन की ओर मुड़ा, “यह तुम्हारी उँगली तक पहुंचा कैसे? यह ठहरा छोटा-सा जानवर और तुम हो पूरे लम्बे-चौड़े। किसी कील-वील से उँगली छील ली होगी और सोचा होगा कि कुत्ते के सिर मढ़कर हर्जाना वसूल कर लो। मैं खूब समझता हूं! तुम्हारे जैसे बदमाशों की तो मैं नस-नस पहचानता हूं!”
“इसने उसके मुंह पर जलती सिगरेट लगा दी थी, हुजूर! यूं ही मजाक में और यह कुत्ता बेवकूफ तो है नहीं, उसने काट लिया। यह शख्स बड़ा फिरती है, हुजूर!”
“अबे! झूठ क्यों बोलता है? जब तूने देखा नहीं, तो गप्प क्यों मारता है? और सरकार तो खुद समझदार हैं। वह जानते हैं कि कौन झूठा है और कौन सच्चा। और अगर मैं झूठा हूँ तो अदालत में फैसला करा लो। कानून में लि‍खा है… अब हम सब बराबर हैं। खुद मेरा भाई पुलिस में है..बताये देता हूं….हाँ…।”
“बंद करो यह बकवास!”
“नहीं, यह जनरल साहब का कुत्ता नहीं है।” सिपाही ने गंभीरतापूर्वक कहा, “उनके पास ऐसा कोई कुत्ता है ही नहीं, उनके तो सभी कुत्ते शिकारी पौण्डर हैं।”
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“जी सरकार।”
“मैं भी जनता हूं। जनरल साहब के सब कुत्ते अच्छी नस्ल के हैं। एक-से-एक कीमती कुत्ता है उनके पास। और यह तो बिल्कुल ऐसा-वैसा ही है, देखो न! बिल्कुल मरियल है। कौन रखेगा ऐसा कुत्ता? तुम लोगों का दिमाग तो खराब नहीं हुआ? अगर ऐसा कुत्ता मास्‍को या पीटर्सबर्ग में दिखाई दे तो जानते हो क्या हो? कानून की परवाह  किये बिना, एक मिनट में उससे छुट्टी पा ली जाये! खूकिन! तुम्हें चोट लगी है। तुम इस मामले को यों ही मत टालो।…इन लोगों को मजा चखाना चाहिए! ऐसे काम नहीं चलेगा।”
“लेकिन मुमकिन है, यह जनरल साहब का ही हो।” सिपाही बड़बड़ाया, “इसके माथे पर तो लिखा नहीं है। जनरल साहब के अहाते में मैंने कल बिल्कुल ऐसा ही कुत्ता देखा था।”
“हां-हां, जनरल साहब का तो है ही!” भीड़ में से किसी की आवाज आयी।
“हुँह।…येल्दीरिन, जरा मुझे कोट तो पहना दो। अभी हवा का एक झोंका आया था, मुझे सर्दी लग रही है। कुत्ते को जनरल साहब के यहां ले जाओ और वहां मालूम करो। कह देना कि मैने इस सड़क पर देखा था और वापस भिजवाया है। और हॉँ, देखो, यह कह देना कि इसे सड़क पर न निकलने दिया करें। मालूम नहीं, कितना कीमती कुत्ता हो और अगर हर बदमाश इसके मुँह में सिगरेट घुसेड़ता रहा तो कुत्ता बहुत जल्दी तबाह हो जायेगा। कुत्ता बहुत नाजुक जानवर होता है। और तू हाथ नीचा कर, गधा कहीं का! अपनी गन्दी उँगली क्यों दिखा रहा है? सारा कुसूर तेरा ही है।”
“यह जनरल साहब का बावर्ची आ रहा है, उससे पूछ लिया जाये।…ऐ प्रोखोर! जरा इधर तो आना, भाई! इस कुत्ते को देखना, तुम्हारे यहां का तो नहीं है?”
“वाह! हमारे यहां कभी भी ऐसा कुत्ता नहीं था!”
“इसमें पूछने की क्या बात थी? बेकार वक्त खराब करना है,” ओचुमेनलोव ने कहा, “आवारा कुत्ता है। यहां खड़े-खड़े इसके बारे में बात करना समय बरबाद करना है। तुमसे कहा गया है कि आवारा है तो आवारा ही समझो। मार डालो और छुट्टी पाओ?’’
“हमारा तो नहीं है।” प्रोखोर ने फिर आगे कहा, “यह जनरल साहब के भाई का कुत्ता है। हमारे जनरल साहब को ग्रेहाउँड के कुत्तों में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उनके भाई साहब को यह नस्ल पसन्द है।”
“क्या? जनरल साहब के भाई आये हैं? ब्लादीमिर इवानिच?” अचम्भे से ओचुमेलोव बोल उठा, उसका चेहरा आह्वाद से चमक उठा। “जर सोचो तो! मुझे मालूम भी नहीं! अभी ठहरेंगे क्या?”
“हां।”
“वाह जी वाह! वह अपने भाई से मिलने आये और मुझे मालूम भी नहीं कि वह आये हैं! तो यह उनका कुत्ता है? बहुत खुशी की बात है। इसे ले जाओ। कैसा प्यारा नन्हा-सा मुन्ना-सा कुत्ता है। इसकी उँगली पर झपटा था! बस-बस, अब कांपों मत। गुर्र…गुर्र…शैतान गुस्से में है… कितना बढ़िया पिल्ला है!
प्रोखोर ने कुत्ते को बुलाया और उसे अपने साथ लेकर टाल से चल दिया। भीड़ खूकिन पर हंसने लगी।
“मैं तुझे ठीक कर दूंगा।” ओचुमेलोव ने उसे धमकाया और अपना लबदा लपेटता हुआ बाजार के चौक के बीच अपने रास्ते चला गया।

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

बुद्धिमान राजा : फ़ैयाज़ अहमद

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यह कहानी है जंगल के राजा शेर की। शेर और राजाओं की तरह नहीं था। यह राजा था बड़ा चालाक, बड़ा शातिर। हर काम सोच-विचार कर करता। हर निर्णय संभल कर लेता। यही कारण था कि वह वर्षों से राज कर रहा था। कभी-कभार किसी कोने से अगर विरोध की हल्की-सी भी चिंगारी उठती, उस पर फ़ौरन पानी डाल देता। मंत्री से संतरी तक सभी राजा की बुद्धिमानी के क़ायल थे।

एक दिन राजा को अचानक विचार आया कि उसके मंत्रीमंडल में एक भी पक्षी नहीं है। फिर उसने सोचा, ‘क्यों न अपने मंत्रीमंडल में इस बार पक्षियों को भी शामिल कर लिया जाए।’

और राजाओं की तरह यह राजा अपनी राय या अपना विचार किसी पर थोपता नहीं था, क्योंकि उसे थोपने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। उसने बड़ी विनम्रता से अपने दिल की बात अपने मंत्रियों से कही। अब राजा का मन था और उसका विचार, कौन मना करता। सारे मंत्रियों ने बिना सोचे-समझे ‘हाँ’ में सिर हिला दिए। महामंत्री गीदड़ की पक्षियों से कभी नहीं बनती थी। गीदड़ राजा की इस सोच से ख़ुश तो नहीं था मगर ‘ना’ कहने की उसमें हिम्मत नहीं थी। ‘जान की अमान पाऊं तो कुछ कहूँ?’ राजा ने अपने शाही अन्दाज़ में मुस्कराते हुए कहा, ‘‘इजाज़त है!’’ महामंत्री गीदड़ बोला, ‘‘महाराज की सोच कभी ग़लत हुई है? महाराज ने कुछ सोचकर ही पक्षियों को मंत्रीमंडल में शामिल करने का निर्णय लिया होगा। बस एक समस्या है……।’’ महाराज ने बात पूरी ही नहीं होने दी और बड़े प्यार से बोले, ‘‘कैसी समस्या?’’

महराज की इसी अदा पर तो पूरा मंत्रीमंडल जान छिड़कता था। वह कभी गुस्सा नहीं होते थे। फिर भी गीदड़ डर गया और उसने कांपते स्वर में अपनी बात पूरी की, ‘‘…पक्षियों का एक विशाल समूह है, इसमें से कौन उनका प्रतिनिधि बनेगा? और कैसे?’’ राजा मुस्कराए, बारी-बारी से सभी को देखा और बोले, ‘‘एक आम सभा में, मैं ख़ुद पक्षियों का नेता नियुक्त करुँगा। मुनादी करवा दी जाए।’’

मुनादी हो गई। पक्षियों के बीच बड़े उत्साह का माहौल बन गया। हर तरफ़ जश्न मनाया जाने लगा। पटाख़े छूटने लगे। गीत-संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। राजा की जय-जयकार हो रही थी, जैसे राजा ने उन्हें मंत्रीमंडल में जगह नहीं, बल्कि पूरा राज-पाट देने का फैसला कर लिया हो। ख़ैर जो भी हो उनके लिये तो बड़ी बात थी। पहली बार उनकी ओर से किसी को राजा के समक्ष उनकी समस्या रखने का मौक़ा मिल रहा था। उनके लिये यही काफ़ी था। अब उनके सामने एक ही समस्या थी। बहुत बड़ी समस्या!! कौन होगा उनका नेता? कौन लड़ेगा उनकी ओर से? यह विचार आते ही रंग में भंग पड़ गया हो, जैसे। सभी सिर जोड़ कर बैठ गए। तय हुआ कि पक्षियों की एक आम सभा बुलाई जाए। आनन-फ़ानन सभा भी बुला ली गई। सभी पहुँचे, यहाँ तक कि उनके समर्थन में कीड़े-मकोड़े भी आ गए, मगर एक ग़ायब था… भटकू कौवा! वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी अनुपस्थिति को लेकर सभी बातें करने लगे।

‘‘जब मुनादी हो रही थी, उस समय भटकू ही सब से आगे-आगे था।’’

‘‘कहाँ चला गया?’’

‘‘अपने रिश्तेदार के यहाँ तो नहीं चला गया?’’

‘‘इस स्थिति में कोई ऐसा कैसे कर सकता है?’’

‘‘मगर वह है कहाँ?’’

‘‘उसे तलाश किया जाए।’’

‘‘उसे राजमहल की तरफ़ जाते देखा गया है!’’

‘‘मतलब!’’

‘‘आप ख़ुद समझ लीजिये।’’

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘इधर कुछ दिनों से भटकू को कई बार राजमहल की ओर जाते देखा गया है।’’

‘‘हो सकता है, वह उधर किसी और काम से गया हो?’’

सभा में इसी तरह की बातें होती रहीं, मगर उनका नेता कौन होगा, यह तय नहीं हो पाया। अब सभी की नज़र थी आम सभा पर।

आम सभा में सभी ने अपने-अपने कमाल दिखाए। बुलबुल ने गाना सुनाया तो मोर ने नाच दिखाया। मगर बात बन नहीं रही थी। नाचने या गाने से मंत्रीमंडल का काम नहीं चल सकता था। ख़बर लाने-ले जाने के लिये तो कबूतर ठीक था… मगर एक मंत्री के रुप में? नहीं, नहीं… राजा को कुछ जँचा नहीं। जँचता भी कैसे? आँखों में तो कोई और बसा था। शाम होने वाली थी। परिणाम की घोषणा भी करनी थी। राजा उठे। प्यार से थोड़ा ग़ुर्र-ग़ुर्र किया, दहाड़ कर गला साफ़ किया, पंजों को हिला-हिला कर अपनी जनता को अपनी तरफ़ आकर्षित किया, फिर मुस्कराते हुए एक ओर देखा और किसी को मंच पर आने का इशारा किया। भटकू कौवे को मंच पर लाया गया। पूरा मजमा स्तब्ध था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि भटकू को मंत्री बनाया जाएगा। वैसे भटकू ने यहाँ तक पहुँचने में बड़ी मेहनत की थी। इतने पापड़ बेले थे कि ख़ुद लाग़र हो गए थे। लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है? मंत्री तो बन ही गए…सभा समाप्त हो गई। एक बार फिर से पूरा जंगल राजा की जय-जयकार से गूंज उठा।

लेकिन बहुतेरों के मन में एक सवाल था,… ‘भटकू राजा का प्रतिनिधि बना या पक्षियों का?’

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र, बीएसी-2

सुख : प्रबोध कुमार

प्रबोध कुमार

8 जनवरी, 1935 को जन्‍में सुप्रसि‍द्ध लेखक प्रबोध कुमार ने 1955-56 में लि‍खना-छपना शुरू कि‍या। करीब एक दशक तक उनकी कहानि‍याँ ‘कहानी’, ‘कल्‍पना’, ‘कृति’‍ आदि‍ प्रति‍ष्‍ठि‍त पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त होकर खासी चर्चित हुईं। उन्‍होंने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। उनकी कहानी –

मीरा के दाँत जब भी टूटते, वह उन्हें चूहे के बिल में डाल देती जिससे दोबारा निकलने पर वे चूहे के दाँतों की तरह सुडौल हों। उस दिन जब फिर उसका एक दाँत टूटा तो उसे ले वह फुदकती बिल की तरफ चली। तभी न जाने कहाँ से आ, उसके हाथ से दाँत छीन, विशू भाग गया। वह रोते-राते उसके पीछे दौड़ी लेकिन विशू को पकड़ना आसान नहीं था। हारकर बरामदे में बैठ, वह बीच-बीच में बह आती नाक घुटकने लगी। सबसे बड़ा डर उसे यह था कि विशू ने दाँत यदि खपरैल पर फेंक दिया तो नया दाँत खपरे की तरह होगा। विशू की माँ उसकी माँ के साथ पड़ोस के घर में थीं जहाँ उसी रात घर की सबसे बड़ी लड़की सरला की शादी थी। उसकी शिकायत सुनने वाला दूसरा कोई वहाँ था नहीं। विशू बगीचे में खड़ा उसे मुँह चिढ़ा रहा था। मीरा की बेहद इच्छा हुई कि जा कर उसका मुँह नोंच ले लेकिन वह जानती थी कि विशू मुँह नुचवाने वहाँ खड़ा नहीं रहेगा।

विशू ने इस उम्मीद से कि मीरा उसके पीछे-पीछे भागेगी, कहा, ‘‘अच्छा ले जाओ अपना दाँत, हमें नहीं चाहिए’’, लेकिन उस पर कोई असर न होते देख वह घाट पर चला गया। छुट्टियों में अपनी माँ के साथ जब भी वह मीरा के घर आता तो उन दोनों का अधिकतर समय तालाब पर बीतता था। घने पेड़ों के कारण, पास होने पर भी वह घर से दिखाई नहीं देता था। वहाँ पहुँचने पर उन्हें लगता कि घर से बहुत दूर चले आये हैं। विशू को तालाब बहुत पसंद था। उसके तीन किनारों पर शहर के मकान आकर यदि ठहर न जाते तो पानी में गिर पड़ते। मकानों के बीच काफी संख्या में कलशदार मंदिर फँसे थे। उनकी नुकीली आकृतियाँ दिन भर पानी में डोलती रहतीं। तालाब की चौथी ओर नीली-भूरी पहाडिय़ाँ थीं जिनमें मीरा के अनुसार, चुड़ैल छिपकर रात में उन्हें सताने की योजना बनाती थी। पहले उन्हें, जब तक कोई बड़ा व्यक्ति साथ न हो, तालाब पर बिल्कुल जाने नहीं दिया जाता था। बाद में बड़ों की व्यस्त दिनचर्या में बच्चों को किसी बात के लिए मना करना शायद एक बेमतलब आदत बन गयी थी, क्योंकि वह एक बार मना करने के बाद कोई भी यह देखने का कष्ट नहीं करता कि उन्होंने कहना माना या नहीं। एक कारण शायद यह भी रहा हो कि अब उन्हें तैरना आ गया था, यद्यपि अब भी वे पानी में तभी उतरते जब घाट पर काफी लोग नहाते रहते। पिछली गर्मियों में मीरा के पिता ने उन्हें तैरना सिखाया था। मीरा की देखादेखी वह भी उसके पिता को बाबूजी कहता था। सुबह होते ही दोनों अपनी तूंबियाँ सहेज तैयार हो जाते। उसके बाद उन्हें लगता कि बाबूजी जानबूझ कर चाय पीने में या दाढ़ी बनाने में देर लगा रहे हैं। उतावली में वे, घाट के रास्ते में, बाबूजी से हमेशा दस-बीस कदम आगे रहते। वहाँ पहुँचते ही वे अपने ऊपर के कपड़े उतार, तूंबियाँ बाँधकर बड़े लड़कों की तरह सिर के बल पानी में कूदने का अभिनय करने लगते। बाबूजी आकर देखते कि उनकी तूंबियाँ ठीक से बंधी हैं या नहीं। मीरा की तूंबियाँ उन्हें रोज दोबारा बाँधनी पड़तीं। पानी में जाकर जब वह हाथ फैला खड़े हो जाते, तब दोनों एक के बाद एक पानी में कूद पड़ते। तैरते समय उनके नौसिखिया हाथ-पैरों से बहुत पानी छिटकता जिसका आसपास नहाते लोग बुरा मानते। मीरा पर तो कोई असर न होता लेकिन विशू थोड़ी देर को सहम जाता। पानी से भारी हो बार-बार नीचे खिसकता निकर ठीक करता वह मीरा को देखने लगता। मीरा की सफेद पतली चड्डी में हमेशा हवा भर जाती जिससे कपड़े का एक गुब्‍बारा पानी में हर जगह उसका पीछा करता, एक पिचकता तो दूसरा तैयार हो जाता। नहाकर जब वे निकलते तो उनके होंठों पर पपडिय़ाँ जमी रहतीं। तूंबियाँ खोलने के बाद वे गर्मी के दिन होने पर भी थोड़ी देर तक तौलियों में छिपे रहते। वह जब अपना बदन पोंछता तो पाता की मीरा की अपेक्षा उसकी कमर में रस्सी के लाल निशान कम उभरे हैं।

विशू ने जोर से पत्थर फेंका तो वह चार-पाँच बार पानी पर उचटता काफी दूर जाकर डूब गया। तिजहरिया में कपड़े धोती तीन वयस्क औरतों को छोड़ घाट पर और कोई नहीं था। जब मीरा साथ रहती तो उसका काफी समय इसी तरह पत्थर उचकाने में बीतता। तब यदि कोई घाट पर होता तो उन्हें खेल में बाधा पड़ने का डर लगा रहता। घाट के पास, कुछ दिन हुये, एक मढ़ि‍या बनी थी। वहाँ से वे पानी में फेंकने के लिये पत्थर की चीपों के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठा करते। मीरा के फेंके पत्थर पानी पर उचटने की जगह हमेशा हवा में अधगोला बनाते डब्ब-से पानी के नीचे चले जाते। उसे आश्चर्य होता कि विशू कैसे पत्थरों को इतनी बार उचटा लेता है। कभी-कभी आसपास के कुछ लड़के आकर उनके खेल में शामिल हो जाते। उनसे जब विशू हारता तो मीरा को बुरा लगता, खेल में उसकी रुचि खत्म हो जाती।

‘‘अब घर चलो विशू, खूब देर हो गयी है।’’

‘‘अभी तो सब लोग सो रहे होंगे।’’

‘‘नहीं, वहाँ चलो, बगीचे में खेलेंगे।’’

‘‘अच्छा, रुको अभी चलते हैं।’’

विशू फिर खेल में व्यस्त हो जाता। मीरा तालाब की संकरी फसील पर चढ़ घूमने लगती। जब उसे तैरना नहीं आता था तो ऐसा करते हमेशा डरती कि कहीं पानी में न गिर पड़े। फसील पर अपनी समझ में काफी देर घूम चुकने के बाद वह अक्सर पेशाब करने बैठ जाती। इतनी बड़ी होकर भी उसे समय या जगह का जरा भी खयाल नहीं रहता था। चाची, एक-दूसरे की माँ को वे चाची कहते, के पास मीरा के पेशाब करने से सम्‍बन्‍धि‍त कि‍स्‍सों का ढेर था। चाची अक्‍सर उससे कहा करतीं कि‍ मीरा के लिए अब फिर से रबर की चादर लानी पड़ेगी। मीरा उनकी इस आदत से बहुत चिढ़ती थी। उसे सबसे बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि वह विशू को क्यों सारी बातें बता देती हैं। विशू इतना खराब था कि झगड़ा होने पर उन्हीं बातों से उसे चिढ़ाता।

‘‘विशू, अब चलो।’’ मीरा उन लड़कों के साथ विशू को नया खेल शुरू करते देख उतावली हो उठती। विशू ध्यान नहीं देता तो वह गुस्से में पीछे से उसकी कमीज पकड़ लेती।

‘‘अब चलो विशू, सच्ची खूब देर हो गयी।’’

‘‘बस, थोड़ी देर और रुक जाओ।’’

‘‘नहीं, अब चलो।’’

‘‘तो तुम जाओ, हम अभी आते हैं।’’

‘‘हम चाची से बता देंगे कि विशू तालाब पर खूब शैतानी कर रहा है।’’

कहकर मीरा सचमुच चल पड़ती। कहने को तो विशू कह देता, जाओ बता देना, हमें किसी का डर नहीं पड़ा है, लेकिन जल्द ही उस धमकी का असर उस पर छा जाता। अधरस्ते ही वह मीरा को पकड़ लेता। खुशी में मीरा यह पूछना भूल जाती कि जब उसे किसी का डर नहीं पड़ा है तो फिर चला क्यों आया। रास्ते में हमेशा कोई फूलों का गुच्छा या कोई विचित्र से रंग का पत्ता तोडऩे के लिए विशू से आग्रह करती। कुछ पेड़ों पर तो वह चढ़ जाता, लेकिन कुछ इतने पतले या झाड़ीनुमा होते कि उनके फूल तोडऩे के लिए जमीन पर से ही कोशिश करना पड़ती।

जब वह उचक कर भी वहाँ तक नहीं पहुंच पाता तो मीरा उससे घोड़ा बनने को कहती। विशू दोनों हाथ जमीन पर टेक देता तो वह फूल तोडऩा छोड़ उसका गर्दन पर सवार हो जाती। उसकी चड्डी में से हमेशा पेशाब के साथ, धुले कपड़ों की मिली-जुली बास आती थी, जिसे वह सूँघना न चाहते भी सूँघता था। मीरा एक बार बैठ जाता तो तब तक उसकी गर्दन नहीं छोड़ती जब तक कि विशू खुद उसकी पतली टांगों के बीच से सिर न निकाल लेता। इस प्रयास में अक्सर दोनों ही जमीन पर गिर पड़ते। विशू कहता कि अब वह कभी उसके लिए फूल नहीं तोड़ेगा लेकिन ऐसी बातें या तो वह कहने के साथ ही भूल जाता, या उसे उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता कि वह जब कुछ कहता है तो फिर उसे करता क्यों नहीं।

मीरा के बिना विशू की समझ में नहीं आ रहा था कि घाट पर क्या करे। पत्थर उचटाने के खेल से बहुत जल्द ऊब कर अब वह एक पेड़ के नीचे बैठा था। तालाब के दूसरे किनारे के पास एक आदमी नंगे बदन डोंगे में बैठा, मछली मार रहा था। सारे तालाब पर छोटी-छोटी लहरें उभरी थीं। जिनके ऊपर सूरज गोल टुकड़ों में चिलक रहा था। कभी-कभी कोई चिडिय़ा बहुत तेजी से नीचे आ, पानी की सतह को छूती फिर आसमान में उड़ जाती। मीरा को रुला कर अब विशू को बहुत बुरा लग रहा था। उसे मीरा पर कुछ गुस्सा भी आया कि वह उतनी जल्दी रोने क्यों बैठ गयी। उसे आश्चर्य था कि मीरा इतनी-सी बात भी क्यों नहीं समझ सकी कि वह दाँत खपरैल पर कभी भी नहीं फेंकता। चूहे के बिल को छोड़ टूटे दाँत के लिए और कोई जगह होती ही नहीं।

मीरा ने जब कहा, ‘‘विशू चलो, तुम्हें चाची बुला रही हैं’’ तो वह चौंक गया। उसने मुड़ कर देखा तो वह दूसरी तरफ देखने लगी। पहले तो उसकी समझ में नहीं आया कि अम्मा को उसने कौन-सा काम आ पड़ा, लेकिन मीरा को दूसरी ओर देखता पा, वह काफी डर गया। उसकी इच्छा हुई कि चुगली करने पर मीरा को पकड़कर मार लगाए, लेकिन एक अपराध के बाद दूसरा अपराध करने पर उसमें हिम्मत नहीं थी।

‘‘जाओ, अम्मा से कह दो कि हम थोड़ी देर में आते हैं।’’

‘‘नहीं, उन्होंने कहा है कि उसे लेकर जल्दी आओ। वह बरामदे में खड़ी हैं।’’

‘‘तुमने चुगली क्यों की, हम क्या तुम्हें दाँत दे नहीं देते?’’ विशू ने मीरा को छोटा-सा सफेद दाँत लौटा दिया। मीरा मन में जरूर खुश हुई होगी। लेकिन विशू से बिना कुछ कहे वह उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

‘‘हम अम्मा से कह देंगे कि दाँत तो हमने पहले ही मीरा को लौटा दिया था।’’

‘‘वह मानेंगी ही नहीं।’’

‘‘तुम चुप रहो। तुमसे कौन बात कर रहा है?’’

‘‘नहीं रहते, जाओ।’’

‘‘तुम्हें मार तो नहीं खानी, मीरा?’’

‘‘तुम हमें मारोगे तो चाची तुम्हें भूसे वाली कोठरी में बंद कर देंगी?’’

विशू कुछ नहीं बोला। एक बार मीरा को खेल-खेल में मारने पर सचमुच उसे काफी देर उस कोठरी में बन्‍द रहना पड़ा था। यदि मीरा की माँ उसे न निकालती तो उसकी माँ ने तो तय कर लिया था कि उसे रात भर बन्‍द रखेंगी। उसने एक बार मुड़ कर मीरा को देखा कि शायद बचाव का कोई रास्ता निकल आए, लेकिन वह जमीन की तरफ देखती चल रही थी। घर के अहाते में पहुँच विशू की चाल बहुत धीमी पड़ गयी। इधर-उधर देखता, जब वह बरामदे के बिल्कुल करीब पहुँचा तो उसे अम्मा कहीं नहीं दिखीं। इससे पहले कि वह मीरा से कुछ पूछता, उसकी पीठ पर एक घूँसा मार, क्या बुद्धू बनाया-क्या बुद्धू बनाया गाती मीरा चौके की तरफ भाग गयी।

उसे बचाने वालों की वहाँ कमी नहीं होगी, यह सोच विशू अपनी माँ के कमरे में आ, खाट पर लेट गया। इस तरह से बुद्धू बन जाना उसे बहुत अखरा। उस समय घर में हो रहा हल्ला उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। पड़ोसी के यहाँ जगह कम होने से उनके कई मेहमान मीरा के यहाँ टिके थे। उनके साथ आये बच्चे तमाम वक्त रोते-चिल्लाते रहते। उनसे, बहुत थोड़ी जान-पहचान होने के कारण, विशू कतराता था। वैसे, उन बच्चों का अपना गिरोह ही इतना बड़ा था कि उन्हें विशू या मीरा को अपने खेलों में शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मीरा जरूर कभी-कभी उनमें से कुछ को फोड़ अपना अलग दल बना लेती जिसमें उसके चाहने पर भी विशू नहीं रहता था।

किवाड़ के पास से मीरा ने उसे पुकारा तो उसने आँखें बन्‍द कर लीं।

‘‘विशू, देखो हम कौन-सी किताब लाये हैं,’’  कहती वह उसका खाट के पास आ गयी।

‘‘विशू।’’

‘‘क्या है?’’

‘‘लो, यह किताब लाये हैं हम तुम्हारे लिए।’’

‘‘हमें नहीं चाहिए तुम्हारी किताब।’’

मीरा थोड़ी देर चुप खड़ी रही फिर किताब उसका खाट पर रख, बाहर चली गयी। अच्छी तरह से आश्वस्त होकर कि वह कहीं से देख नहीं रही है, विशू वह जासूसी उपन्यास पढऩे लगा। करीब दस-बारह पन्ने पढऩे के बाद आहट सुनकर वह फिर सोने का बहाना करने लगा। उसकी खाट से थोड़ा हट कर मीरा ने फर्श पर कैरम बोर्ड बिछा दिया। विशू अधमुंदी आँखों से उसे गोट गलत जमाकर खेलते देखने लगा। वह कैरम बोर्ड बहुत पुराना था। उस पर चारों तरफ खिंची समानांतर रेखायें लगभग मिट चुकी थीं। सिर्फ एक छेद को छोड़ बाकी की, मटमैली जालियाँ फट कर नीचे झूलने लगी थीं। उन फटी जालियों वाले छेदों में गोटें गिरतीं तो अक्सर लुढ़कती बहुत दूर तक चली जातीं। मीरा को खेल से अधिक ऐसी गोटों को पकडऩे में मजा आता था। कैरम बोर्ड की रेखायें यदि स्पष्ट  होतीं, तब भी मीरा के निकट कोई अन्‍तर न पड़ता। वह गप्पे को कहीं भी रखकर निशाना साधती थी।

‘‘मीरा, तुम बहुत हल्का कर रही हो।’’

मीरा इतनी जोर से चौंकी कि गप्पे पर उसका उँगली फिसल गयी।

‘‘हम तो खेल रहे हैं।’’

‘‘तुम बाहर जाकर क्यों नहीं खेलती?’’

‘‘तुम भी खेलों न हमारे साथ विशू।’’

‘‘तुमसे गोटें तक तो जमाते नहीं बनतीं।’’

‘‘अच्छा, दिखायें जमाकर?’’

विशू के हाँ कहने पर दोनों कुहनियाँ कैरम बोर्ड पर रख, मीरा बड़ी लगन से गोटें जमाने लगी। बीच-बीच में वह अपनी समझ में कोई गलती करती तो थोड़ी देर गाल में उँगली धँसा कर कुछ सोचने लगती, फिर किसी काली गोट की जगह सफेद या सफेद की जगह काली गोट रख देती। सभी गोटें रख चुकने पर उसने विशू की तरफ देखा तो वह, एकदम गलत, कहकर कैरम बोर्ड के पास जा बैठा।

‘‘ठीक तो है विशू।’’

जवाब न दे, वह उन्हें ठीक से जमाने लगा। मीरा ने नीला गप्पा अपने हाथ में ले लिया। काली गोटें उसे अच्छी नहीं लगती थीं। उसे पता था कि जो शुरू करता है, उसकी सफेद गोटें होती हैं।

वे खेलने लगे। मीरा जब अचरज से उसे एक के बाद एक गोटे लेते देखती तो विशू बहुत खुश होता, लेकिन थोड़ी ही देर में वह ऊब गया। मीरा इतनी जल्दी अपनी बारी खो देती कि उसे लगता वह अकेला ही खेल रहा है।

‘‘हमें तो भूख लगी है।’’

‘‘आज तो सरला दीदी के यहाँ खाने जाना है।’’

‘‘चलो चौके में कुछ खा लेंगे।’’

मीरा ने फिर एतराज नहीं किया। खाना उसके प्रिय कामों में एक था। चौके में उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला, लेकिन मीरा को वह जगह मालूम थी जहाँ उनसे छिपाकर मिठाइयाँ या फल रखे जाते थे।

अच्छी तरह खा कर वे अपनी करतूत छिपाने में लगे थे कि तभी बाजों की आवाज सुनाई दी।

‘‘विशू, बारात।’’ मीरा लगभग चिल्ला पड़ी।

दौड़ते-दौड़ते वे पड़ोसी के घर पहुँच गये। मीरा के पिता उस घर के अन्य लोगों के साथ वहाँ खड़े थे। उन सभी के हाथों में मालायें थीं जिन्हें वे बारातियों को पहना रहे थे। वे दोनों भी एक-दूसरे का हाथ थामे, वहाँ जाकर खड़े हो गये। मीरा को कई लोगों ने प्यार से अपनी मालायें पहना दीं। विशू को भी शायद पहनाते, लेकिन वह थोड़ा हट कर खड़ा हो गया था। उसे उन लोगों से काफी शर्म लग रही थी। वैसे भी वह नये लोगों से बहुत झेंपता था। उसकी माँ जब किसी मेहमान से कहतीं, ‘मेरा विशू चौदह का हो गया है’ तब भी उसके कान जलने लगते।

सब लोगों के साथ विशू भी पण्‍डाल में आ गया। मीरा अपनी सरला दीदी को देखने घर में चली गयी। पण्‍डाल में लगी रंगीन कागज की झंडियाँ हवा में फरफरा रही थीं। बाहर का अन्‍धेरा तेज रोशनी में और भी घना हो गया था। वहाँ, रोशनी में चमकती आसपास के पेड़ों की निचली डालों के अतिरिक्त, कुछ भी नहीं दिख पड़ता था। उन लोगों को शरबत पीते देख विशू की भी इच्छा हुई कि पिए। उसने सोचा, यदि कोई खुद लाकर दे देगा तो वह पी लेगा। काफी राह देखने पर भी जब कोई उसके पास नहीं आया तो वह मीरा का इंतजार करता, पण्‍डाल के बाहर, विरल घास पर लेट गया। मीरा उसे ढूँढती जब उस किनारे पहुँची जहाँ वह लेटा था, तो विशू ने उसे बुला लिया।

‘‘विशू, सरला दीदी बहुत खराब है,’’ कहती वह उसके पास जाकर बैठ गयी।

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्होंने हमसे बात ही नहीं की।’’

‘‘मीरा, तुमने शरबत पिया?’’

‘‘हाँ, दो गिलास। खूब अच्छा है। तुमने कितने गिलास पिये विशू?’’

विशू चुप रहा। उसने सोचा मीरा से अपने लिए मंगवाए, लेकिन टाल गया।

‘‘विशू, तुमने सरला दीदी की साड़ी देखी?’’

‘‘कैसी है?’’

‘‘इतनी चमक रही है कि क्या बतायें। अम्मा चाची से कह रही थीं कि बनारस से लायी है।’’ कहकर मीरा उसके पास लेट गयी।

‘‘हमें तो नींद आ रही है विशू।’’

‘‘यहाँ मत सोओ, घर चलकर सोना।’’

‘‘विशू, हमारा एक दाँत और हिल रहा है। तुमने चौके वाला बिल देखा है?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘खूब बड़ा है, सबेरे तुम्हें दिखायेंगे।’’

उसके बाद जब एक बार विशू कहकर वह काफी देर चुप रही तो विशू ने उसकी तरफ देखा। वह सो चुकी थी। उसका एक हाथ छाती पर पड़ा था। विशू के सिर में छोटे-छोटे कंकड़ गड़ रहे थे। उसने मीरा के पेट पर सिर रख लिया। काफी देर तक उसके पेट से आती गुड़-गुड़ आवाज सुनता इस बात से खुश होता रहा कि कल नहीं तो परसों तक वे पिन्ने बच्चे यहाँ से चले जायेंगे, फिर मीरा को घर ले जाने के लिए जगाने लगा।

अचार: देवेन्‍द्र कुमार

कथाकार देवेन्द्र कुमार

कथाकार देवेन्‍द्र कुमार की कहानी और उस पर चर्चित कवि रमेश तैलंग की टिप्‍पणी-

नेपथ्य में सहजतापूर्वक खड़े हिंदी के सशक्त कथाकार देवेन्द्र कुमार की यूँ तो ‘दिलावर खड़ा है’, ‘कितने लाख असीम’, ‘चिड़िया’, ‘खेल’, ‘अचार’ जैसी  अनेक यादगार कहानियाँ हैं जो मुझे प्रिय हैं। पर ‘अचार’ इनमें अति- विशिष्ट है। इस कहानी का आरम्भ पति-पत्नी के बीच जिस  सहज संवादपटुता के साथ होता है, अंत उतनी ही मार्मिक वेदना के साथ घटित होता है।
शब्दों के मामले में देवेन्द्र सचमुच बहुत ही मितव्ययी हैं और कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा कहते हैं।
दूसरी विशिष्ट बात यह कि उनकी कहानियों में स्त्रियां, बच्चे, और पक्षी इतनी संवेदनशीलता के साथ उपस्थित होते हैं कि वे पाठक के हृदय में अपनी अनिवार्य  जगह बना लेते हैं।
‘अचार’ कहानी का बच्चा जहां एक ओर बाल श्रम की  मजबूरी  पर प्रश्नचिह्न लगता है वहीँ दूसरी ओर उस हादसे की ओर भी मार्मिकता के साथ इंगित करता है जो घटित तो एक हलकी-सी आवाज के साथ होता है पर उसकी अनुगूँज बहुत दूर तक सुनाई देती है- रमेश तैलंग

मैं अचार कभी नहीं खाऊंगा, यह कसम उठाने से भी अब छुटकारा मिलने वाला नहीं था। गर्मी की उमस भरी शाम भीड़-भाड़ भरे सब्जी बाजार में कैसी हो सकती है, इसे कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है।
वैसे गलती मेरी ही थी। पिछली शाम को भोजन करते हुए मैंने अचार मांग लिया। बस, आफत शुरू हो गई। पत्नी ने हठ ठान ली कि तुरंत बाजार जाकर आम लाने हैं और अचार डालना है।
‘‘तो ठीक है।’’ मैंने कहकर टालना चाहा था।
‘‘बाजार से कच्चे आम लाने होंगे।’’
‘‘हूँ।’’
अगली शाम दफ्तर से आया तो उन्होंने मेरे हाथ में एक बड़ा थैला और तौलिया थमा दिया।
‘‘यह तौलिया किसलिए। क्या हम नदी पर नहाने जा रहे हैं?’’ मैंने हँसकर बात को हल्का करना चाहा था।
‘‘आम खरीदकर धोना, पोंछना और फिर कटवाकर लाने होंगे। आम का अचार क्या ऐसे ही मिल जाएगा?’’ एक गंभीर स्वर आया।
कार्यक्रम बन चुका था। अब मेरे कंधों पर टिकाकर उस पर अमल होना था।
मैंने उमस और भीषण गर्मी की आड़ में छिपना चाहा लेकिन कुछ देर बाद मैं और वह बाजार की ओर बढ़ रहे थे।

सब्जी बाजार में सामान्य से अधिक यानी बेहद भीड़ थी। शायद लोग समझते थे, सब्जी वहाँ फ्री मिलती थी। संकरी सड़के के दोनों ओर फुटपाथों पर और उनसे पीछे सब्जियों के ढेर लगे थे। सब्जी वालों ने फुटपाथ से आगे बढ़कर सड़क पर काफी हिस्सा घेर रखा था। बची हुई संकरी सड़क-पट्टी पर ट्रैफिक पी.पी. करता रेंग रहा था। सब्जी बेचने वाले अलग-अलग सुरों में बोलियां बोल रहे थे। और मैं सब तरफ से धकियाता हुआ मेले में भटके हुए बच्चे की तरह चौंधियाई आंखों से देखता सोच रहा था- अचार! … कैसे पड़ेगा अचार!
‘‘भई, मैं नहीं रुक सकता। थोड़ी देर यहाँ रहा तो पागल हो जाऊंगा। अच्छा यही होगा कि हम बाजार से अचार का डिब्बा मंगवा लें।’’
‘‘जी नहीं, पता है बाजार का अचार कितना महंगा होता है। और फिर क्वालिटी का क्या भरोसा?’’  पत्नी ने जवाब देते हुए सब्जियों के टीलों के बीच कहीं-कहीं नजर आती कच्चे आमों की ढेरियों पर नजरें टिका दीं। एक तो उमस भरी गर्मी, ऊपर से गैस लालटेनों की चौंधरी भुकभुकाहट। मैंने कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहा, पर पत्नी तब तक एक सब्जी वाले से झुककर मोलभाव करने में व्यस्त हो गई थीं।
मैंने मन में कहा- ‘चलो, आम तो मिले।’
लेकिन नहीं…. शायद भाव ज्यादा थे या और कुछ गड़बड़ थी। मैंने पत्नी को दूसरे, तीसरे और फिर पता नहीं कौन से नंबर के ढेर की ओर झुकते, मोलभाव करते और फिर सिर हिलाकर आगे बढ़ते देखा। लगातार उनके पीछे चलना जरूरी था। अब हम सब्जी वाले के छोर तक जा पहुंचे थे। इससे आगे अंधेरा था।
अब मुझे मौका मिला, ‘‘कोई बात नहीं, हम फिर किसी दिन आ जाएंगे। अब हमें घर चलना चाहिए। आगे तो आम हैं नहीं।’’
‘‘नहीं, अभी हम दूसरी तरफ तो गए ही नहीं हैं। देखो-देखो, कैसे ढेर लगे हैं!’’ और फिर मेरे जवाब का इंतजार किए बिना वह सड़क को लांघकर दूसरी तरफ चली गईं और यहां भी वही सिलसिला दोहराया जाने लगा।
बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि हम कैसे क्या करेंगे। आम खरीदना, एक-एक आम को धोना, तौलिए से पोंछना और आम का कटवाकर घर पहुंचाना। बाजार में ठीक से खड़े रहने की तो गुंजाइश थी नहीं, फिर अचार के लिए इतना कुछ करना! कैसे… कैसे…!

आखिर एक सब्जी वाले से दाम तय हुए।
वह तोलने को तैयार हुए तो पत्नी ने पूछा, ‘‘आमों को धोने का इंतजाम है?’’
सब्जीवाला फिर हँसा, ‘‘आप भी बहन जी! यहां इतनी देर से गला सूख रहा है। पीने के लिए तो पानी है नहीं और आप… जरा उधर देखिए, सब बहनजियां ऐसे ही आम कटवा रही हैं… देखिए… वहां उधर…।’’
संकेत की दिशा में देखा- अरे हां, वही तो, कुछ औरतों एक झुंड में खड़ी थीं। आवाजें आ रही थीं- ‘मेरे आम पहले काटो… ऐ सुना नहीं… हम… कब से खड़े हैं…!’
इसके साथ ही सरौते से खट-खट की आवाज भी आ रही थी। तो आम काटने वाला भी पास ही मौजूद है! लेकिन इससे पहले आमों को धोना, पोंछना…।
गुस्सा दिखाने का मौका मिला था, ‘‘अगर ऐसी ही बात थी तो हमें बाल्टी में पानी लेकर आना चाहिए था… या फिर आम घर ले चलो- वहीं सब कर लेंगे।’’ मैं चिड़चिड़ा रहा था।
‘‘बस, रहने दो। घर पर आम काटने का सरौता कहां है और फिर काटेगा कौन? आम की जगह उंगलियां काटेंगे। नहीं-नहीं, यहां इंतजाम है। एक लड़का काट रहा है।’’
‘‘लेकिन धोना… इसका इंतजाम…!’’ मैंने उनकी कमजोरी पकड़ ली थी।
‘हूं।‘ पत्नी ने चिंताकुल नजरों से इधर-उधर देखा। यह तो सचमुच मुश्किल हुई। लगा, शायद इसी बात से छुटकारा मिल जाए।
तभी एक आवाज सुनाई दी, ‘‘मैं धुलवा दूंगा आपके आम।’’
पतली, पिनपिनाती आवाज! मैंने घूमकर देखा- आठ-नौ बरस का एक छोकरा था। शायद वह हमारी नोक-झोंक में रस ले रहा था।
मुझे गुस्सा उतारने का पहला मौका मिला था, ‘‘धो देगा! धो दे फिर… कहां धोएगा?’’
‘‘यहीं धोऊंगा।’’ वह मेरी बात से हिला तक नहीं था।
‘‘पानी है?’’ पत्नी ने पूछा।
‘‘हां, है।’’
‘‘कहां है पानी?’’ मैंने इधर-उधर देखा। वह सरासर झूठ बोल रहा था।
‘‘वहां है, उधर…!’’ वह पता नहीं, कहां इशारा कर रहा था?
‘‘तो लेकर आ…!’’
‘‘आप जाना मत। मैं अभी लेकर आया पानी। फिर आम काट भी दूंगा। वहां सरौता भी हैं।’’ कहकर वह तुरंत भीड़ में गायब हो गया।
दुकानदार ने आम तोलकर एक तरफ डाल दिए। मैं आम थैले में भरने लगा तो पत्नी ने टोका-‘‘पहले धुलेंगे, फिर पोंछना होगा। अभी गड़बड़ मत करे।’’

हमें खड़े-खड़े काफी देर हो गई पर वह छोकरा पानी लेकर नहीं आया। मैं भड़ास निकालने का मौका तलाश रहा था, पर तभी वह आ गया। आवाज सुनाई दी, ‘‘आ गया पानी।’’
‘‘कहां है पानी?’’
उसके हाथ में प्लास्टिक की बड़ी थैली थी। उसमें भरे पारदर्शी पानी में रोशनियां चमक रही थीं।
‘‘इसमें कैसे धुलेंगे आम?’’
वह मुस्कराया, शायद मेरे अनाड़ीपन पर- ‘‘मैं थैली पकड़कर खड़ा रहूंगा। आप हाथ में एक-एक आम पकड़कर इसमें डुबाकर रगडऩा। आम धुल जाएंगे। फिर उन्हें कपड़े से पोंछकर थैले में रख लेना।’’
‘‘अगर आम डालने से थैली फट गई और पानी गिर गया तो…!’’
‘‘जैसे वह कह रहा है, वही ठीक है।’’ पत्नी ने मुझे अपनी बात पूरी नहीं करने दी। मैंने थैली में भरे पानी में एक आम सावधानी से डुबाया और उसे धोने लगा। छोकरा थैली भर पानी को हाथों से पकड़े सावधान मुद्रा में खड़ा था।
जब मैं आम को धोकर बाहर निकालता तो उसके चेहरे पर छींटे पड़तीं, लेकिन वह जैसे मूरत की तरह स्थिर खड़ा था। आंखें बिना झपके खुली हुईं, होंठ सख्ती से एक-दूसरे पर चिपके हुए। मैं आम धोकर पत्नी को थमाता, वह तौलिए से पोंछकर उसे टोकरी में डालती जातीं, जिसे सब्जी वाले ने बड़ी मेहरबानी करके हमें दे दिया था। लगा इस धोने-पोंछने के काम में कई घंटे बीत गए थे। हमारे अचार अभियान का एक दौर पूरा हो चला था। लेकिन अभी तो बहुत कुछ करना बाकी था।

‘‘मैं आम कटवा दूंगा, एक किलो के तीन रुपये लगेंगे।’’ लड़के ने कहा और थैली भर पानी जो आम धोने के बाद अपारदर्शी हो चुका था, सड़क पर फेंक दिया। छींटे उछले और सब्जी वाले की झापड़ उसके गाल पर पड़ा, ‘‘हरामी के… देखता नहीं…।’’
वह बिना गाल सहलाए चुप खड़ा रहा, फिर टोकरा सिर पर रखकर बोला, ‘‘मेरे पीछे आओ। मैं आम कटवा देता हूं।’’
इससे पहले कि मैं और पत्नी कुछ कह पाते वह पलक झपकते ही भीड़ में खो गया।
मैं पागल की तरह इधर-उधर देखने लगा। सड़क पर रेंगते ट्रैफिक के सब तरफ बेशुमार भीड़ में हम कहां खोजेंगे ? अगर वह न मिला तो ?
मुझे गुस्सा आ गया। मैंने दुकानदार से कहा, ‘‘वह कहां गया?’’
‘‘मैं क्या जानूं!… अच्छा, आप आमों के पैसे दीजिए और एक तरफ हो जाइए। दूसरे ग्राहकों को लेने दीजिए।’’ उसे लगा था कि इस चक्कर में हम उसके पैसे मारकर भागने की फिराक में थे।
मैंने पैसे दिए और पत्नी का हाथ पकड़कर आगे चला, ‘‘अब कहां खोजें उसे ?’’
पत्नी ने कुछ कहा नहीं। लड़का शायद आम लेकर रफूचक्कर हो चुका था। कैसे प्यार से आम धुलवाने का नाटक कर रहा था। कोई ठिकाना है इस दुनिया का!
‘‘तुम्हें उसका ध्यान रखना चाहिए था। जब वह आमों का टोकरा लेकर चला था तो उसके पीछे जाना चाहिए था।’’

पता नहीं, अभी और क्या-क्या सुनना बाकी था। अब कुछ कहने को नहीं था। मैं पत्नी का हाथ थामे उस हुजूम में धक्के खाते, घिसटते हुए ट्रैफिक के बीच मेंढक की तरह फुदकते, बचते-बचते, खुद को कोसते हुए पूरी सड़क के कई चक्कर काट आया, पर वह छोकरा कहीं दिखाई न दिया।
यह सब पत्नी की आम धुलवाने की जिद के चलते हुए था और शायद अब उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हो गया था। वह चुपचाप मेरे पीछे-पीदे चलती जा रही थीं।
तभी आवाज आई, ‘‘बाबूजी…!’’
मैंने आवाज की दिशा में देखा- वही था। वही छोकरा, जो हमारे आम लेकर गुम हो गया था, सब्जी के ढेर के पीछे से हाथ हिलाकर हमें बुला रहा था। मन हुआ, दौड़कर गर्दन पकड़कर घसीट लाऊं। लेकिन यह संभव नहीं था। वह सब्जियों के ढेर के पीछे था। आगे कई औरतें खड़ी थीं। खट-कट, कट-खट की आवाजें आ रही थीं जैसे कुछ काटा जा रहा हो, पर दिखाई कुछ नहीं दे रहा था।
मैंने चिल्लाकर कहा, ‘‘कहां भाग गया था?… हम कब से ढूंढ रहे थे!’’
वह सब्जियों के ढेर के पीछे से निकलकर बाहर आया, ‘‘मैं तो आम लेकर यहीं आ गया था। यहीं तो काट रहा हूँ आम। पर आप ही पता नहीं कहां…!’’
‘‘अच्छा-अच्छा, ज्यादा बातें न बना- हमारे आम कहाँ हैं?’’
‘‘वो रहे आपके आम…।’’ उसने एक टोकरी की तरफ इशारा किया। देखकर तसल्ली हुई। हां, वही थे हमारे आम…।
‘‘तो अब तक काटे क्यों नहीं!’’
‘‘आपसे पूछकर ही तो काटता…। एक आम की कितनी फांकें काटनी हैं? आठ, बारह या सोलह!’’ उसने सफाई दी।
‘‘अभी टैम लगेगा पहले औरों के कटेंगे… और भाव होगा होगा रुपये किलो…!’’ सामने ढेर के पास बैठे दुकानदार ने सख्त आवाज में कहा, फिर छोकरे से कहा, ‘‘वहां क्या बिटर-बिटर कर रहा था। जल्दी से काट-पीटकर काम खत्म
कर…!’’
छोकरा फिर से सब्जियों के ढेर के पीछे जा पहुंचा। अब मैं उसे देख नहीं पा रहा था। और हमारे आम भी नजर नहीं आ रहे थे।
‘‘आप जरा हटकर खड़े हो जाइए… मैंने बताया न अभी टैम लगेगा। आपसे पहले भी कई लोग खड़े हैं।’’
मैंने देखा एक तरफ कुछ औरतें गोलबंद खड़ी थीं, आवाजें उभर रही थीं- ‘‘जल्दी…, देखो हमारे आम दूसरे आमों में मिल न जाएं।’’
अब प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। जैसे राक्षस की जान तोते में थी,  मैं आम में था। जब तक आम कटकर थैले में भरे जाकर घर नहीं पहुंच जाते, मेरी मुक्ति नहीं हो सकती थी।
भीड़ बढ़ती जा रही थी।
‘खट-कट… कट-खट’ की आवाजें लगातार आ रही थीं। पता नहीं छोकरा हमारे आम काट रहा था या… मैंने पुकारा, ‘‘ओ अरे…!’’
‘‘बाबूजी, आपने तो नाक में दम कर लिया!’’ सब्जी वाला गुर्राया, फिर पीछे मुड़कर चिल्लाया, ‘‘पीछे से उठकर बाहर आ… तेरी कट-कट ने तो मेरी दुकानदारी ही चौपट कर दी है।’’
उसने छोकरे का हाथ पकड़कर बाहर खींचा और सड़क पर धकेल दिया। साथ में सरौता और एक बोरा भी फेंके गए।
‘‘हमारे आम… हमारे आम…!’’ कई बेचैन आवाजें उभरीं।
‘‘आपके आम जरूर मिलेंगे…!’’ सब्जी वाले ने छाती पर हाथ मारकर एक औरत की तरफ सिर झुकाया।
छोकरा अब सड़क के बीचोंबीच अपना बोरा बिछाकर बैठ गया था। उसने सरौता टिका लिया था और फिर से आम काटने में जुट गया था। खट-कट-खट आम कट रहे थे, पर वे हमारे आम नहीं थे।
‘‘भई, हमारे आम काट दो।’’
लेकिन वह तो हमारी ओर देख ही नहीं रहा था। बस सिर झुकाए आम काटे जा रहा था। फिर उसके नीचे झुके मुंह से आवाज ऊपर आई, ‘‘बाबूजी, बस थोड़े-से रह गए हैं। फिर तसल्ली से काट दूंगा।’’
मैंने देखा, वह चारों ओर से घिरा हुआ था। भीड़ के बीच अंधेरे में बैठा आम काट रहा था, आवाजें आ रही थीं- कट-खट-खट-खट… पर वह खुद दिख नहीं रहा था।
लोगों से घिरी उस जगह में रोशनी नहीं पहुंचने दी जा रही थी। दुकानदार ने न जाने क्यों उसे वहां बिठा दिया था।
‘‘बारह फांकें काटो। नहीं-नहीं- सोलह करो। ये ज्यादा बड़ी हैं।’’
‘‘मैं सोलह कर देता हूं। उसकी आवाज किसी गहरे कुएं में से आ रही थी।’’
‘‘हां, सोलह ठीक हैं।’’
‘‘पैसे इधर… पैसे इधर…!’’ सब्जी वाले की आवाज गूंज उठी… ‘‘आम कटवाकर पैसे इधर दीजिए, नहीं तो हिसाब गड़बड़ हो जाएगा।’’
‘‘हिसाब… कैसा हिसाब…!’’
कट-खट… खट-कट… आम कट रहे थे। उसके चारों ओर अचार के आम कटवाने वालों की भीड़ थी, जैसे किसी बाजीगर के चारों ओर मजमा लगा हो।
कट-खट… खट!
‘‘जल्दी करो… हमें दूर जाना है। जल्दी…’’
कट-खट… खट-खट…!
‘‘जल्दी…!’’
और फिर उस कट-खट के बीच एक-दूसरी आवाज हुई थी, हल्की-सी सिसकारी…! हां, मैंने सुना था… सरौता आम पर नहीं पड़ा था।
बाजीगर का जादू टूट गया था। लोग लहर की तरह उछले थे, काई की तरह फट गए थे। वे अपने आम उठा रहे थे, आपस में छीनाझपटी कर रहे थे। उन्हें आम चाहिए थे।
लेकिन हमारे आम कहां थे? मुझे वे कहीं नजर नहीं आ रहे थे। शायद वे काटे ही नहीं गए थे। अब मैं वहां नहीं रुक सकता था। हां, वह आवाज, जो सरौते के आम पर गिरने की नहीं थी, मैंने सुनी थी।
सोम बाजार अपने पूरे निखार पर था। भीड़, रोशनी, होका, माल बिक रहा था लेकिन आम…? वे कहां कट रहे थे? हमारे आम… कौन काटेगा उन्हें… और अचार… मुझे कुछ पता नहीं था। मैं पत्नी का हाथ पकड़कर पीछे हट रहा
था- हमारे आम!

 

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गौरैया का पंख: केवल तिवारी

युवा लेखक-पत्रकार केवल तिवारी की कहानी-

गर्मियां शुरू होने पर दो बातें हमेशा कुछ परेशान-सी करती हैं। मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी और बच्चे को। एक समस्या को पत्नी अपने हिसाब से कम-ज्यादा मान बैठती है, दूसरी शाश्वत समस्या है। इन समस्याओं में एक तो  कूलर को अपने मन से शुरू न कर पाने का दंश और दूसरा बच्चे के स्कूल से मिला भारी-भरकम होमवर्क। कूलर हम कई बार इसलिए अपने मन से नहीं खोल पाते क्योंकि अक्सर हमारा वह कबूतरों के लिए ‘मैटरनिटी सेंटर’ बन जाता है। कूलर खोलते ही कभी वहां कबूतरनी अंडों को  सेती हुई दिखती है और कभी छोटे-छोटे बच्चों के मुंह में खाने का कुछ सामान ठूंसती हुई सी। कबूतरों का मेरे कूलर के प्रति प्रेम कई वर्षों से है। जब मेरी मां जीवित थी, कहा करती थी घर में चिडि़यों का घोंसला बनाना बहुत शुभ होता है। किराये के एक मकान में एक बार कबूतर ने हमारे घर में घोंसला बनाया, अंडे दिए और उसके बच्चे हमारे सामने उड़े। उसके कुछ माह बाद मेरे घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। घोंसला बनाना और उसमें बच्चे होना शुभ होता है, यह बात मेरी पत्नी के दिमाग में घर कर गई है। लेकिन कबूतरों के प्रति मेरे मन में स्नेह कभी नहीं पनप पाया। उल्टे एक बार चोरी-छिपे मैंने उसके घोंसले को  तोड़ दिया था। असल में उसका घोंसला अभी बन ही रहा था कि गर्मियों ने ऐसा तेवर दिखाना शुरू कर दिया कि कूलर की जरूरत महसूस होने लगी। मेरी पत्नी ने ताकीद की कि कूलर की सफाई करने में मेरी मदद करो। मैंने तुरंत हां कर दी और काम की शुरुआत पहले मैं ही करने के इसलिए राजी हो गया क्योंकि मुझे पूरी आशंका थी कि घोंसला देखते ही वह कूलर वाली खिड़की के किवाड़ बंद कर देगी। और न जाने कितने दिन ये किवाड़ बंद रहेंगे। हो सकता है पूरी गर्मी भर। इस आशंका को भांपते हुए मैंने पत्नी को चाय बनाने भेजा और कूलर वाली खिड़की खोलने लगा,  देखा कबूतरों का एक जोड़ा अपना घर बनाने में मशगूल है। खिड़की खोलते ही जोड़ा तो  उड़ गया, लेकिन आशियाना लगभग तैयार था। मैंने सबसे पहले उसे उठाकर नीचे फेंक दिया। असल में हमारे पूरे मोहल्ले में इतने अधिक कबूतर हैं कि हर समय वही चारों तरफ दिखते हैं। जहां बैठे तुरंत गंदगी कर देते हैं। बालकनी को दिनभर साफ करते रहो। कपड़े तार में डाले नहीं कि तुरंत गंदा कर दिया।

कूलर अंदर खिसकाने की आवाज सुनते ही पत्नी आई और बोली कोई घोंसला तो  नहीं बनाया है न कबूतरों ने। मैंने कहा, नहीं। उसने ‘अच्छा’ इतनी जोर से कहा, जैसे आश्चर्य और खुशी दोनों बातें उसमें मिली हुई हों। खैर वह गर्मी हमारी ठीक कटी। कूलर चलने के बाद जब तक वह रोज खुलता, बंद होता कोई पक्षी वहां अपना आशियाना बसाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उन्होंने आसपास अपना ठौर ढूंढ़ लिया। वह वर्ष बच्चे के स्कूल का पहला साल था, इसलिए होमवर्क भी बहुत नहीं मिला था और वह गर्मी हमारे लिए बहुत अच्छी बीती।

इस साल भी गर्मी भयानक पड़ी और गर्मी शुरू होने से पहले से ही कबूतरों का खौफ मेरे मन में था। माताजी वाले कमरे का कूलर हमने अंदर ही निकाल रखा था। क्योंकि मां अब इस दुनिया में रही नहीं, वह कमरा अमूमन खाली भी रहता है। कभी कोई मेहमान आ गया तो ठीक। या फिर टीवी देखना हो या खाना खाना हो  तो  हम उस कमरे का इस्तेमाल करते हैं। उस कमरे के कूलर को पहले से इसलिए अंदर निकालकर रख दिया गया कि कहीं दूसरे कूलर के पास अंडे-बच्चे हो गए तो  इस कूलर का इस्तेमाल किया जा सकेगा। दूसरे कमरे के कूलर के आसपास भी मैं कबूतरों को फटकने नहीं दे रहा था। होते-करते कबूतर मुक्त कूलर की खिड़की हमें मिल गई, लेकिन उनका अड्डा बालकनी और अन्य स्थानों पर होने लगा। उनकी संख्या लगातार इस कदर बढ़ रही थी कि कभी-कबार पत्नी भी झल्ला जाती। खासतौर पर तब, जब उसे धुले कपड़े दोबारा धोने पड़ते।

इस गर्मी में कूलर तो गर्मी शुरू होते ही चल निकला, लेकिन बच्चे को होमवर्क अच्छा-खासा मिल गया। खैर यह होमवर्क तो मिलना ही था, इसलिए यह मान लिया गया कि कोई बात नहीं, किसी तरह से कराएंगे। बच्चा अपनी मां के साथ लखनऊ एक विवाह समारोह में चला गया और योजना बनी कि कुछ दिन वहां मेरे बड़े भाई के घर रहा जाए। बच्चा अपने ताऊ और ताई के साथ रहना और मौज-मस्ती करना बहुत पसंद करता है। इधर छोटे से बच्चे को  भी अपने होमवर्क की बहुत चिंता थी। मैंने भरोसा दिलाया कि कुछ काम लखनऊ में पूरा हो जाएगा। मेरी दीदी का छोटा बेटा कुछ करा देगा और कुछ काम मैं पूरा करा दूंगा। उसके मिले तमाम कामों में एक यह भी शामिल था, जिसमें पांच प्रकार की चिडि़यों के पंखों को एकत्र करना था। मैंने इस काम को  पूरा करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।घर में अकेला था।

एक दिन सुबह देर से उठा, बालकनी का दरवाजा खुला तो देखा वहां गौरैया इधर-उधर घूम रही है। कबूतरों से नफरत करने वाला मैं गौरैया को देखते ही बहुत खुश हो गया। मुझे इस बात का दुख हुआ कि मेरे पास कैमरा नहीं है। एक पुराना कैमरा है भी तो रील वाला, उसमें रील नहीं है। मेरे बालकनी में जाने से वह भाग नहीं जाए, इस आशंका से मैं अंदर आ गया। जिज्ञासावश थोड़ी देर बाद मैं फिर बालकनी मैं गया। मैंने चारों तरफ देखा मुझे गौरैया नहीं दिखी। मुझे तमाम उन खबरों की जानकारी थी, जिसमें कहा जा रहा था कि गौरैया अब कहीं नहीं दिखती। उनकी प्रजाति विलुप्‍त होने की कगार पर है। मुझे लगा हो  न हो मेरा भ्रम रहा होगा। वह पंछी गौरैया तो  नहीं रही होगी। तभी मैंने देखा फुर्र से उड़ती हुई बालकनी की छत से गौरैया सामने की छत की तरफ उड़ गई। मैंने जिज्ञासावश बालकनी की छत की ओर देखा। वहां पंखा लगाने के लिए बने बिजली के बड़े छेदनुमा गोले में कुछ घासफूस लटकती दिखाई दी। गौरैया मेरे घर में घोंसला बना रही है। मैं इतना खुश हो गया मानो मुझे कोई खजाना मिल गया हो। मैंने बालकनी में कुछ चावल के दाने बिखेर दिए और बालकनी बंद कर कमरे में आ गया। अब मैं दरवाजे के छेद से देख रहा था, गौरैया बार-बार उन दानों को उठाती। फिर कहीं से तिनका लाती और बालकनी की छत में अपने आशियाना बनाने में मशगूल हो जाती। मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो  शायद गौरैया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि विलुप्‍त होने वाली है अब कुछ बच्चों को  यहां जनेगी।

अब मेरी जिज्ञासा रोज बढ़ती। सुबह उठकर मेरा पहला काम उस घोंसले की तरफ देखना होता था। नीचे रखे गमले में मैं कुछ पानी भर देता। शायद इसमें से वह पानी पी लेगी। एक दिन तो मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी। मैंने देखा गौरैया का छोटा सा बच्चा मुंह खोलकर चूं-चूं कर रहा है और उसकी मां इधर-उधर से कुछ लाकर उसके मुंह में डाल रही है। कई बार टुकड़ा बड़ा होता तो  नीचे गिर जाता। गौरैया फट से नीचे आती उस गिरे टुकड़े को उठाकर ले जाती और अपने बच्चे के मुंह में डाल देती। इस बार आश्चर्यजनक यह था कि मेरे वहां खड़े होने पर भी गौरैया डर के मारे भाग नहीं रही थी। मैं यह देखकर कुछ चावल के दाने और ले आया। मेरे सामने ही गौरैया उन दानों पर टूट पड़ी। मैंने फिर बालकनी का दरवाजा बंद किया और अपने काम में मगन हो गया। मन किया कि लखनऊ फोन करके बताऊं कि गौरैया ने एक घौंसला बनाया है। बालकनी की छत पर। उसका बच्चा भी हो गया है। शायद मेरी पत्नी बहुत प्रसन्न हो।  इसलिए कि अक्सर कबूतरों को  भगाने और उन्हें घोंसला नहीं बनाने देने को  आतुर एक चिडि़या का घोंसला देखकर कितना खुश हो  रहा है। लेकिन एक हफ्ते बाद वे लोग आ ही जाएंगे, फिर उन्हें सारा नजारा दिखाऊंगा, यह सोचकर मैंने फोन नहीं किया। कैमरा नहीं होने का दुख मुझे सालता रहा। मैं बालकनी बंद कर घर में आ गया और नहाने के बाद आफिस के लिए निकल गया। आफिस के रास्ते में अनेक मित्र मिले, मैंने सबसे गौरैया के घोंसले की बात बताई। किसी ने कहा, वाह कितनी अच्छी बात है। ज्यादातर ने यह कहा कि गौरैया का घोंसला बनाना तो बहुत शुभ होता है। इधर बच्चे के होमवर्क के लिए चिडि़यों के पंख एकत्र करने की बात मुझे याद आई। कबूतरों के तो अनगिनत पंख मेरे इर्द-गिर्द रहते हैं, कभी-कभार देसी मैना भी दिख जाती है। मैंने कहा, पंख एकत्र हो  ही जाएंगे। मेरे मन में इन दिनों रोज-रोज बढ़ते गौरैया के बच्चे को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी। मैं कल्पना करता काश! यहीं गौरैया अपना स्थायी निवास बना ले। यह बच्चा हो, इसके बच्चे हों। कभी दूसरी गौरैया आए। इस तरह के तमाम खयाल मेरे मन में आते। गौरैया परिवार की चर्चा भी अक्सर अपने मित्रों से करता।

खैर एक दिन गौरैया के बच्चे को अपनी मां के मुंह से रोटी का छोटा-सा टुकड़ा खाता देख मैं आफिस चला गया। अगले दिन मैं किसी मित्र के यहां रात में रुक गया। उसकी अगली दोपहर घर पहुंचा तो  सबसे पहले बालकनी में पहुंचा। बालकनी में बच्चा जो  धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था उल्टा लटका हुआ था। वह अक्सर तब भी ऐसे ही लटकता दिखता था, जब उसकी मां उसे खाना खिलाती थी। मैं दो-चार मिनट तक उसे लगातार देखता रहा। मेरा दिल धक कर रहा था। उसमें कोई हरकत नहीं दिख रही थी। उसकी मां भी कहीं नहीं दिख रही थी। एक दिन पहले वहां डाले चावल के दानों में से कुछ किनारे पर पड़े हुए थे। मैं कुछ समझ नहीं पाया। मैंने कुर्सी लगाकर जोरदार तरीके से ताली बजाई। लेकिन बच्चे में कोई हरकत नहीं हुई। वह बस उसी अंदाज में उल्टा लटका हुआ था। मैंने गौर से देखा कि बच्चा मर चुका था। उसकी मां गायब थी। मैं अंदर आकर धम से बैठ गया। मन बहुत खिन्न हो  गया। कभी इधर जाता,  कभी इधर। पानी पीने को  भी मेरा मन नहीं हुआ। फिर बालकनी में गया, मरे हुए बच्चे का एक पंख नीचे गिर गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस पंख को अपने बच्चे के होमवर्क के लिए सहेज कर रख लूं या उड़ जाने दूं।

 

हबीब का घर : जवाहर गोयल

प्रसिद्ध लेखक जवाहर गोयल की कहानी-

हम सबको उस दिन भी क्रिकेट खेलना था। क्योंकि वह छुटटी का दिन था। फिर हबीब मियां का फरमान था कि स्कूल टीम को रोज अभ्यास करना जरूरी है। लेकिन कप्तान के कहने के बावजूद हम लोगों ने मैदान देर से पहुचना तय किया था। हबीब को हमने पहले ही बता दिया था कि सुबह हम सभी उनके घर सेवैंया खाने आएंगे। फिर वहीं से खेलने के लिए स्कूल पहुंचेंगे। उस दिन ईद थी।
हबीब का घर जिस इलाके में था,  उसकी सड़कें कच्ची थीं। सड़क की गिट्टियां उखड़ी रहने से साइकिल पंचर होने का भय हमेशा रहता था। तंग गलियों में उन कच्चे-पक्के मकानों के बीच में हबीब का घर था। उस गली के ज्यादातर मकानों के दरवाजे-खिड़कियों में बोरे का फट्टा पुरानी चादर या रंगीन प्लास्टिक, आड़ के लिए पर्दों के बतौर टंगे रहते थे। वहां कौन क्या पेशा करता है,  समझना आसान नहीं था। शहर छोटा था। सभी एक-दूसरे को पहचानते थे। कोई भी एक-दूसरे के लिए पूरा अजनबी नहीं था। उस गली में दूसरे मकानों की बनिस्‍बत हबीब का मकान अपेक्षाय: संपन्न लगता था। एक वही पूरा सीमेंट का बना पक्का मकान था। मय छत और सीमेंट के खप्परों वाले छप्पर के, खिड़कियां काठ की थीँ। बनने के बाद उन पर कभी रंग नहीं हुआ था। इस कारण खिड़कियों का काठ पुराना और काला-सा हो गया था। पर बुरा नहीं लगता था। खिड़कियां शायद कभी खुली ही नहीं या फिर हमने उन्हें कभी खुला नहीं देखा।
इसी तरह दरवाजे के निचले हिस्से का काठ भी काफी कुछ गल चुका था। दरवाजा तब भी मजबूत था। उघारे काठ का ऊपरी हिस्सा, खासकर कब्जों के पास का पूरा भाग, पूरी तरह दुरुस्त था। भले ही धूसर काला-सा लगता था। शहर में ऐसे बहुत ही कम घर थे जिनमें बिजली की घंटी लगी हो। मेरे किसी भी मित्र के घर बिजली की घंटी नहीं लगी थी। दरअसल घरों के दरवाजे दिन में बंद नहीं किए जाते थे। जब सब सोने को हाते तब ही दरवाजों को बंद किया जाता। हम लोग तो सड़क से ही दोस्‍त को आवाज लगाते हुए, घर में सीधा भीतर तक चले जाते। जिससे मिलना चाहते थे, उसे खोजकर या फिर वहां जो भी मिला उससे बतियाकर लौट जाते थे। किंतु हबीब के घर बिजली की घंटी लगी थी। बाहर के दरवाजे की चौखट पर ऊपर की ओर बिजली की घंटी का काले प्लास्टिक का गोल बटन धूप में साफ चमकता था। इसे दबाने पर जोरों से किर्र को आवाज गूजंती..। उस गली के शांत,  मंद मिजाज में वह आवाज चारों ओर ऐसी गूंजती कि हम लोग थोड़ा सहम-सा जाते, कि आवाज सुनकर कोई नाराज न हो जाए। लेकिन जल्दी से कोई उत्तर भी नहीं मिलता था। थोड़ी देर के बाद ऊपर छत की तरफ से या फिर भीतर वाले कमरे से कोई खटका सुनाई देता या किसी हरकत की आवाज होती। ‘कौन’ या ‘आया’ की आवाज नहीं आती। थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुलता। कई बार जब दरवाजा खुलता तो उसे खोलनेवाला आड़ में होता और दिखाई नहीं देता। या फिर दरवाजा खोलने के बाद, आड़ से हटकर भीतर चला गया होता, बिन कुछ कहे। दरवाजे के पीछे लोहे की एक सांकल थी। लकड़ी का एक खटका भी था। पहले सांकत खोली जाती। सांकल के झूलने से कड़-कड़ की आवाज होती। जब खटका झटकाया जाता तब लकड़ी के घिसने की आवाज के साथ दरवाजा एक खड़ी दरार में खुल जाता। बाहर धूप होने के बावजूद दरवाजे की खुली दरार के भीतर अंधेरा दिखाई देता। तब हम लोग दरवाजा ठेलकर, सड़क पर पड़े उस बड़े चौकोर पत्थर पर पैर रखकर भीतर घुस जाते, जो सीढ़ी का काम देता था। ये सारी बातें इतनी भिन्न पर सहज थीं कि कभी मन में यह उत्सुकता नहीं हुई कि दरवाजे के गल गए निचले हिस्से से हम भीतर झांककर देखते कि दरवाजा किसने खोला था।
यदि दरवाजा इफ्तिकार भाई या एजाज साब ने खोला होता तो ये दरवाजा खोलने पर अवश्य कहते ‘हबीब चला गया’ या ‘बैठो, आता है।’ इफ्तिकार भाई हबीब से तीन साल बड़े थे। वे ही हबीब के पहले स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। वे तब स्कूल की टीम में आरंभिक गेंदबाज और आरंभिक बल्लेबाज दोनों ही थे। वे ही स्कूल टीम के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जो सफेद पतलून,  सफेद कमीज व सफेद चमड़े के जूते पहनते थे। उनके पास क्रिकेट के बड़े खिलाडिय़ों के समान, क्रिकेट की एक गोल सफेद टोपी भी थी। जो मैंने पहली बार उन्ही को पहने देखी थी। उनकी पतलून में, दायीं जेब के सामने का हिस्सा, गेंद के लगातार घिसे जाने के कारण हमेशा लाल दाग लिए होता था। उन दिनों हम लोग मैदान में जाकर क्रिकेट खेलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। स्‍कूल के लाल बजरीवाले रास्ते पर ही मैंटिंग बिछाकर खेलते थे। दरवाजा खोलने पर इफ्तिकार भाई ओठों को एक ओर तिरछा खींचकर मुस्कुराते कहते, ‘कैसे हो’ या चौंकते ‘अरे आप।’ मुझे सुनकर बहुत अटपटा लगता। उनका लहजा नफासत लिए काफी संतुलित और नपा-तुला होता। तब तक मैंने अपने लिए ‘आप’ का संबोधन किसी और से नहीं सुना था। तुम और तू से ही सारा काम पूरा हो जाता था। तब मेरी उम्र ही क्या थी। मुझे उनका आप, उनके घर में पहले कमरे के उस पर्दे की तरह लगता, जो भीतर जाने  वाले दरवाजे पर लटका,  बाकी घर को अदृश्य करता था। वह नीली छींट का पुराना सूती परदा था। लगभग जमीन को छूता हुआ। परदा लकड़ी के गोल डंडे पर कसकर इस तरह लगा था कि उसे बिल्कुल भी सरकाया नहीं जा सकता था। हबीब के घर का यह पहला कमरा एकदम खाली था।
उसे कमरे में सादे काठ की एक पुराने बेंच के अलावा और कुछ भी नहीं था। यहां घुसने पर हम लोग पैर हिलाते उस बेंच पर बैठ जाते और हबीब के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते। खाली कमरे की दो दीवालों में दो खिड़कियां भी थीं। उनके लोहे के काले सींखचे अपनी खास मौजूदगी बताते लगते। ये दोनों ही खिड़कियां सदा से बंद थीं। इनका सादा काठ पुरानेपन के कारण काली-सी लकीरों से पट गया था। पहले कमरे का दरवाजा खुलते ही खाली कमरे में वह बेंच सामने दिखती। उस बेंच के पीछे की दीवार पर एक आलमारी बनी हुई थी। आलमारी के पल्ले लकड़ी के बने थे। उनमें कांच भी लगा था। आलमारी सदा खाली रहती आई। उसकी ताकों पर अखबार भी नहीं बिछाया गया। वह भी खड़ी दरार में अधखुली-सी रही।
यदि दरवाजा एजाज साब ने खोला होता तो हम अतिरिक्त अदब के साथ उन्हें नमस्‍ते कहा करते। एजाज साब,  इफ्तिकार भाई से काफी बड़े थे। वे सदा ही बहुत गंभीर दिखाई देते। अब सोचाता हूं तो ऐसा लगता है कि वह गंभीरता से अधिक उदासी थी। उस उम्र में तो उदासी शब्द का अर्थ भी पूरी तरह समझ में नहीं आता था। एजाज साब क्या करते हैं,  यह हम लोगों को मालूम नहीं था। ऐसा कम ही हुआ कि दरवाजा उन्हें खोलना पड़ा हो। या तो वे घर के भीतर ही रह आते होंगे या फिर घर या शहर के बाहर। सुना था कि बहुत साल पहले जब वे स्कूल के छात्र थे तब हमारे स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। बल्ले लाने के लिए एक बार जब हम लोग हबीब के घर गए, तब बल्ला देते हुए उन्होंने बल्ला पकडऩे के हमारे ढंग को जांचा था और समझाया था कि उंगलियों की पकड़ व हथेलियों का फासला कैसा होना चाहिए। शायद उसी वजह से,  उसके बाद मेरा डिफेंस पक्का हो गया और पांच फीट से भी नाटा होने के बावजूद मुझे स्‍कूल की टीम में पक्की जगह मिल गई। तब मेरे लेटकट और लेग ग्लांस पक्के हो गए थे।
हबीब के घर,  उस कमरे का पलस्‍तर पानी से भगकर कई जगह पर फूल गया था जिसे ठक-ठकाने पर पोली आवाज आती थी। पानी जरूर खिड़कियों से भीतर आता होगा। छत काठ की मोटी बल्लियों पर, बिना टूट-फूट के दुरुस्‍त फैली थी। कमरे की दीवार दो-तीन जगह रेत-सीमेंट के गारे से सुधारी गई थी। जिसमें वहां बडे़-बडे़ पुराने गाढ़े रंग के धब्‍बे पड़ गए थे। उन पर कभी पुताई नहीं हुई। घर में भी शायद पुताई कभी नहीं हुई। उस गली के मकानों में पुताई तभी होती जब कोई दीवार तोड़कर नया कुछ बनाया जाता। यहां के कच्ची मिट्टी के बने घरों में छुई या गोबार से लिपाई जरूर हो जाती थी- खासकर तीज-त्‍योहार आने पर। उस गली से गुजरने पर अक्‍सर लहुसन के तेज बघार की महक आती जो उसके मिजाज की हिस्सा थी।
हम जब बाहर के कमरे में बैठे हबीब का इंतजार करते होते, तब भी घर के भीतर किसी के बातचीत करने की आवाज कभी नहीं आती थी। हां, हबीब जब बल्ला लिए बाहर आता, तब उसका चेहरा खिला और मुस्कुराता हुआ होता। लगभग हमेशा ही वह कप्तानी आवाज में ‘चलो’ कहता,  और बाहर निकलकर सड़क पर खड़ा हो जाता। हम उसके बाद ही उसके घर के बाहर निकलते। फिर यह दरवाजा बंद हो जाता और सांकल लगने की आवाज आती।
हबीब इतना ऊंचा और दुबला था कि आश्चर्य होता, उसमें इतना दम खम कहां से आता था। उसे हर तरह की गेंदबाजी में महारत थी। खासकर उसकी स्पिन हवा में उछाल के साथ इतनी अचूक और कारगर होती थी कि हम सभी को विश्वास था कि आने वाले सालों में वह टेस्ट नहीं तो रणजी के मैच में तो जरूर खेलेगा। स्कूल की टीम का प्रमुख बल्लेबाज भी वही था। उसके रहते हमारी टीम दूसरी टीम से हार भी सकती है, सोचा नहीं जा सकता था। हबीब के लिए क्रिकेट से बढ़कर और कुछ भी नहीं था। पढ़ाई के बारे में हम लोगों में बातचीत कम ही होती। कापी-किताबों का लेन-देन भी नहीं करते थे। कभी-कभार साथ में सिनेमा देखने जरूर चले जाते थे। खासकर उस टाकीज में जो नई मस्जिद के पास थी। जहां टाकीज के बगल से कतार में लोहे की जाली बनाने वालों की दुकानें थीं, जिनमें लोहे की वैल्डिंग का काम होता रहता, जिसकी चिंगारियों का उचटना-चटखना देखते मन नहीं थकता था। इन्हीं दुकानों के बीच में कुछ खुली-सी खपरैली चाय की दुकानें भी थीं। जिनमें अक्सर लुंगी-बनियान पहने कुछ लोग बैठे चाय पीते रहते या अखबार पढ़ते होते। रेडियों में उर्दू खबरें सुनते रहते। ये होटल चौड़ी नाली के ऊपर बांस का रपटा बिछाकर, उस पर बेंच रखकर बनाए गए थे। इनके खंभों पर काबा का चित्र या किसी पीर-फकरी वाले कैलेंडर लगे होते थे। हबीब वहां चाय नहीं पीता था।
हबीब में गजब का आत्मविश्वास था। वह बहुत कम बोलता था। अपनी तरफ से बातों की शुरुआत भी कम ही करता था। उसके घर ईद के दिन हमें कांसे के बड़े से साफ कटोरेभर सेवैंया खाने को मिलती। गाढ़ा दूध ऊपर तक भरा होता। हमारे घर सेवैंया बनती नहीं थीं,  क्योंकि बनने पर वह केंचुआनुमा दिखती थी। हम लोग शाकाहारी थे। संस्कार इतने पक्के थे कि फुआ अक्सर झिड़कतीं- ‘मलेच्छ मत हो जाओ’, ‘मांस खाने वालों के घर मत खाया करो।’ चमकता,  दूध सेवैंयाभरा कटोरा कभी खराब नहीं लगा। न ही कोई हिचक हुई। न शाकाहारीपने पर ही कोई खरोंच आई।
उसके घर के बाहर वाले कमरे की उसी अकेली बेंच पर बिठलाकर हम सबको वहां सेवैंया खिलाई जातीं। उसके घर के भीतरी हिस्से में हम कभी नहीं गए, न ही झांका। न कभी हबीब की अम्मीजान को देखा। न ही कभी उनकी आवाज सुनी। हबीब का घर भीतर से एक अनजाने रहस्‍य की तरह हमारे लिए अबूझा रहा। उसके घर के बारे में हम सब कुछ भी नहीं जाते थे,  सिवाय इस बात के कि थोड़ा अलग तरह का होते हुए भी उसका घर,  हम सबके घरों सा एक घर था। कभी ऐसा नहीं लगा कि वे अभाव मे टूटते हैं। न ही कभी उस घर में संपन्नता का ही कोई सबूत दिया। सिवाय इसके कि हबीब मियां जब घर के बाहर निकलकर आते तब उनका चेहरा खिला हुआ व ताजा होता। उनके कपड़े साफ सुथरे रहते जिन्‍हें वे खुद ही धोते और इस्त्री करके पहनते थे। उनकी साइकिल भी साफ-सुथरी और दुरुस्त होती थी। सीट पर रेक्सीन का काला कवर।
स्कूल की पढ़ाई के बाद हबीब से मिलना नहीं हो सका। मैं शहर के बाहर पढऩे चला गया था और उसने उसी शहर के एकमात्र कॉलेज में दाखिला ले लिया। कई सालों बाद की बात है, एक बार जब शहर लौटा तब बस स्‍टैंड में ही कारदार भाई से मुलाकात हो गई। बड़ी अजीब-सी मुलाकात थी वह। जिस बस में मैं अपने शहर लौट रहा था, उसका एक चक्‍का रास्ते में पंचर हो गया था। बस सीधी वर्कशाप के टिन के शेड में जाकर लगी थी। बस से उतरकर टहलने लगा तो देखा कि जो मिस्त्री बस में जैक लगा रहा था, वह कोई और नहीं भाई अब्दुल कारदार ही थे। कारदार भाई हम लोगों से काफी बड़े थे। उम्र में तो इफ्तिकार भाई से भी अधिक के थे। शहर में एक मशहूर खिलाड़ी रह चुके थे। एक जमाने में हाकी टीम के गोलकीपर थे, फुटबाल टीम के फुलबैक थे और क्रिकेट टीम में विकेटकीपर और धुआंधार बल्‍लेबाज थे। राज्‍य की टीम में भी खेल चुके थे। मैंने बचपन में उनके कई मैच देखे थे। एक बार तो हाकी के फाइनल मैच में अपनी हारती टीम को बचाने के लिए उन्होंने एक अजीब काम किया। मैच के आखिरी पांच मिनट बचे थे। उनके टीम को एक गोल से पिछड़ रही थी। वे गोलकीपर थे। उन्होंने पैड उतारकर, लगभग जुनून में तेजी से दौड़कर आगे आकर, सेंटर फारवर्ड की भूमिका निभाई। पांच मिनट में उन्होंने दो गोल दागे। हजारों दर्शक स्तब्ध रह गए। हारती टीम को जिताकर वे लौटे। शहर में उन्हें कंधे पर उठाकर जुलूस निकला। उसके बाद जब कीनिया के साथ भारत के हाकी टेस्ट मैच देखे, तब मुझे लगा कि कारदार भाई, भारत के गोलकीपर शंकर लक्ष्मण से कम नहीं हैं।
वर्कशाप में बस के पंचर को सुधारते हुए  कारदार भाई ने मुझे उस दिन बताया था कि हबीब मियां दो सौ मील दूर, सतपुड़ा के जंगलों के बीच, किसी कागज बनाने वाली फैक्टरी में स्टोरकीपर हैं। शादी कर ली है और बच्‍चे भी हैं। उसके बाद बस स्टैंड से घर जाते हुए जब हबीब के घर के सामने से गुजरा, तब लगा कि वह गली पहले से अधिक संकरी हो गई है। सड़क व मकानात पहले से अधिक कमजोर हो गए थे। हबीब के घर का पलस्तर बुरी तरह झड़ चुका था। दरवाजे और खिड़कियां सदा की तरह बंद थीं। लगता था जैसे अब वहां कोई नहीं रहता हो। उसी यात्रा के दौरान,  अपने एक मित्र से वह बात पता लगी जिससे हबीब के घर का रहस्‍य कुछ-कुछ समझ में आने लगा।
आज इस बैसाखी दुपहरी में जाने क्‍यों हबीब मियां इस कदर यादों में आ रहे हैं? अपने शहर से हजारों मील दूर और अपने बचपने से अनेकों वर्षों बाद, इस कदर हबीब के यादों में उमड़ने का रहस्‍य क्‍या हो सकता है? मैं हबीब के घर के रहस्य को छोड़,  उनकी इस याद के रहस्य को समझने में उलझता चला गया।
दरअसल एक वारदात हुई थी। अखबारों से रोजाना यह ज्ञान तेजी से बढ़ रहा था कि हमारी जात क्या है और दूसरे की जात क्या है। हमारा धर्म क्या है और दूसरों का धर्म क्या है। इसी सब में मेरा मन कुछ उचाट रहने लगा था। इसी दौरान तमाम हादसों के बीच रोज सुबह आफिस जाते हुए, मेरी गाड़ी के हमसफर साथी बहुत उत्तेजित रहने लगे थे। मेरे ये साथी खुले मिजाज और खुली जबान के आदमी थे। सरकारी कंपनी में काम करते थे। उन्हें बराबर यह ध्यान रहता कि वे एक बड़े पद पर हैं। दर्जे के हिसाब से वे देश की चुनिंदा एक प्रतिशत जनसंख्या में गिने जाते। उन दिनों सुर्खियों में दंगों की खबरें थीं। सरकार के कमजोर पैर डगमगा रहे थे। गाड़ी में बैठते ही थोड़े से समय में वे अपने आप ढेर से बयान दे देते। उनकी भाषा बेबाक और बेलाग थी। साफ और आम गालियों से सज्जित थी। स्‍वभाव खरा और हरा था। वे ऐसा समझते थे कि अपनी बात कह देने से निजी कर्तव्‍य पूरे हो जाते हैं। मन में जो आता बेहिचक कह डालते। गाड़ी संकरी गली से गुजरती और सामने अगर उघारा खेलता बच्‍चा बीच सड़क में होता तो बुरी तरह चिड़चिड़ा जाते थे। उन दिनों उनके मन में यह विश्वास पक्का-सा हो गया था कि लोगों को एक बार में ही पूरा सबक सिखा देना चाहिए। उनकी बातें सुनते हुए जल्दी ही मैं ऊंधने लगता। क्योंकि मौन रहकर ही उन्हें नकारा जा सकता था। बातचीत मे उनसे उलझना उनके विलास को बढ़ावा देना था।
इसी ऊंघ के रास्ते से मुझमें हबीब की याद ने प्रवेश किया था। यह उनके चेहरे की याद नहीं थी। याद थी हबीब के घर के उस सूने कमरे की,  जो सीधा मुझे हबीब के हृदय की धड़कने सुना रहा था। हबीब के घर का वह कमरा इस तरह से खाली था। उसमें केवल एक उघारी बेंच पड़ी रहती थी। उसी तरह खाली और उघारी थी खुली आलमारी। पुराने काठ की काली पड़ गई खिड़कियां । लोहे के काले सींखचे। गल गए काठ के दरवाजे। याद आई उस उदासी की जो एजाज साब की गंभीरता में थी। उस सन्नाटे की जो घर के हर चप्‍पे में था, हर आदमी में था। याद आई हबीब की अम्मीजान की जिन्‍हें हम बच्चों ने कभी नहीं देखा। लेकिन जिनकी मौजूदगी दरवाजे की आड़ में, छींट वाले सूती परदे के पीछे और बंद खिड़कियों के मौन में हमेशा देखते रहे,  जानते रहे। क्यों नहीं मिल पाए उनकी अम्मीजान से हम? जब वे इतनी अच्छी सेवैंया बना भर-भर कटोरे खिलाती थीं,  तो अपने हाथों से क्यों नहीं दुलारा इमें उन्होंने ? क्या सिर्फ इसी शर्म से कि हबीब ने कभी अपने पिता को नहीं देखा था। पिता भी ऐसे जो हबीब के जन्म के बाद ही, हरा-भरा परिवार छोड़ कर पाकिस्‍तान चले गए। वहीं बस गए। दूसरा निकाह कर लिया। चार बच्चे कर लिए। वे फिर कभी लौटकर नहीं आए। कुछ सालों तक पैसा जरूर घर भेजा। पर बाद में तो खत आना भी बंद हो गए। याद आई हबीब की सटीक गेंदबाजी की स्पिन और करारे करीनेदार शाट्स, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए जो उनके घर की डसे हुए था।
अचानक मेरी ऊंघ में एक ख्याल या सवाल कौंधा। मैं विस्मय से गाड़ी में बैठे साथी का चेहरा ताकने लगा। उस समय वे स्वयं से कहते हुए एक पूरी कौम को बर्खास्त कर रहे थे। ‘क्या हुआ, ऐसे क्यों,  ताक रहे हो?’ उन्‍होंने पूछा। मैं चुप रहा। मन में उठा सवाल उनसे पूछ नहीं पाया। क्‍योंकि मुझे साफ दिख गया था कि वक्‍त आने पर हबीब के पिता की तरह, वे भी कोई काम कर सकते हैं। मैं उन्‍हें ताकता रह गया।

जवाहर गोयल की अन्‍य रचनाएं

-छंटते बादल खि‍लती धूप : जवाहर गोयल

-जवाहर गोयल की कुछ कवि‍ताएं

मृत्यु का दृश्य : सलीम

तेलुगु के युवा लेखक सैयद सलीम के पाँच उपन्यास, 140 कहानियां और 100 से अधिक कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। मानवतावादी दृष्टिकोण उनके रचनाकर्म की विशेषता है। उनकी इस कहानी का अनुवाद आर.शांता सुंदरी ने किया है-

इतवार का दिन, दोपहर का समय था। हवा जैसे थम गई थी, जैसे उसे लॉकर में बंद करके किसी ने रख दिया हो! बडी उमस थी।
सायन्ना खाना खा रहा था। उसने अपनी बीवी की ओर देखा और कहा, ‘‘ज़रा पंखा तो चला देना!” बीवी ने कनखियों से उसकी ओर देखकर कहा, “पिछले महीने बिजली का बिल चार सौ का आया था, भूल गए?”
“अरे कोई बात नहीं। बडी़ गर्मी है। खाने का मन नहीं कर रहा है। थोडी़ देर के लिए चला दे।” वह बीवी का स्वभाव जानता था। पैसे का बडा मोह है उसे। एक भी पैसा खर्च नहीं करने देती…जैसॆ अपनी जान निकालकर देना पड़ रहा हो, ऐसे बर्ताव करती है। वह कितना भी हाड़तोड़ मेहनत करे तो भी खुश नहीं होती, ऊपर से कहती है, “बस इसी के लिए दिन-रात खटते रहते हो?”
उसने नाक भौंह सिकोडते हुए पंखा चला दिया। पंखे की हवा आने लगी तो सायन्ना को राहत मिली…जैसे बदन में जान वापस आ गई हो।
“ज़रा सा छाछ तो डाल दे।” उसने बीवी से कहा। पनीली छाछ डाल दी बीवी ने।
“यह क्या? इसमे छाछ तो है ही नहीं.पानी ही पानी है!”
“हां हां ! तेरी कमाई में यह नहीं तो क्या दही और मलाई वाली लस्सी मिलेगी?” बस, सायन्ना चुपचाप खाने लगा। इतने में बाहर से किसी की आवाज़ सुनाई दी। उसनॆ थाली उठाकर रही सही छाछ पी और बाहर भागा। वहां अरुणोदया अपार्टमेंट्स का वाचमैन खडा था। बोला, “बिजली गई है! साब ने तुझे फौरन आने को कहा है।”
सायन्ना के घर के आसपास दो-तीन अपार्टमेंट्स हैं। वह पैसा ज़्यादा नहीं मांगता और काम मन लगाकर करता है, इसलिए बिजली का काम हो तो सायन्ना को ही बुलाते हैं लोग। कमीज़ पहनकर, अपना सामान का थैला लेकर घर से निकल पडा वह।

अरुणोदया अपार्टमेंट्स के सेक्रटरी बहुत बेचैन था। तीन साल पहले उसने वालंटरी रिटाइरमेंट ले लिया था। दोनों बच्चे अमेरिका में सेटल हो गए। उसने सोचा रिटायर होने के बाद मिलने वाले पैसों पर जो ब्याज मिलेगा उससे ज़िंदगी आराम से गुज़र जाएगी, पर सरकार ने बैंक के डिपाजिटों पर ब्याज आधा करके रख दिया तो उसके सारे सपने अधूरे रह गए।
इसीलिए वेलफेयर चुनाव में खडे़ होकर जीत हासिल की और सॆक्रटरी बन गया। हाथ में काम भी है और पैसा भी आता है। कुल साठ फ्लेट हैं। मेंटिनेंस के नाम पर हर फ्लैट से हर महीने पांच सौ रुपये वसूल किए जाते हैं। यानी महीने में तीस हज़ार। झूठे खर्च खाते में लिखना, किए गए खर्च कुछ बढा़कर लिखना, ऐसे काम तो वह खूब जानता है।
एक घंटे पहले ट्रान्सफार्मर में से ज़ोर की आवाज़ हुई और लपटें निकलने लगीं। बिजली गुल हो गई। सॆक्रटरी होने के नाते इसे ठीक कराने की ज़िम्मेदारी उसकी थी… सिरदर्द का काम। पर सचमुच बडी उमस थी। शायद बारिश होनेवाली है। पसीने से बदन तरबतर हो रहा था। वैसे भी कांक्रीट जंगल जैसे बडे-बडे फ्लैट। कहीं पेड-पौधों का नाम ही नहीं…पत्थर और सीमेंट के सिवा हरियाली तो है ही नहीं।
सायन्ना का इंतज़ार करते हुए वह और भी खीजने लगा। उसे देखते ही पूछा, “इतनी देर क्यूं कर दी ?”
“खाना खा रहा था साब!” कहकर एक ही पल में वह फटाफट टान्सफार्मर पर चढ़ गया।
“ज़रा जल्दी कर।” कहकर सॆक्रेटरी अपने फ्लैट मे घुस गया। मन ही मन खुश हो रहा था कि सायन्ना को दो सौ देकर खाते में एक हज़ार लिख दूंगा।

श्रीनिवास को बहुत झुंझुलाहट हो रही थी। वह एक टीवी चैनल में कैमरामैन था। वह एक ऐसा डाक्युमेंटरी बनाना चाहता था जो पुरस्कार प्राप्त करने के स्तर की हो। वह सोच रहा था कि ऐसा कौन-सा विषय होगा जो इस स्तर का होगा।
बाल कर्मचारी, कूडे़ में से कागज़ बीनते गरीब, बचपन में ही वेश्यावृत्ति में लगाई गई अभागिन लड़कियां, अरब शेखों के हाथों बिकनेवाली अमीनाओं की कहानियां…ये सब पहले ही बन चुके थे। नया विषय चुनना होगा। बिलकुल नया और अनोखा हो। नेशनल ज्‍योग्रफी चैनल में हाल ही में उसने एक अद्भुत कार्यक्रम देखा था। एक हिरण को बाघ के मारने का दृश्य। बाघ हिरण का पीछा करता है, हिरण जान बचाने के लिए भागता है। बाघ मारना चाहता है और हिरण बचना चाहता है। अंत में बाघ हिरण को पकड़ ही लेता है। तब कैमरामैन ने उस हिरण की आंखों में मौत के खौफ को बहुत ही स्पष्ट रूप से कैमरे में बांधा था। ऐसा ही कोई विलक्षण चीज बनाना चाहता था श्रीनिवास।
सिगरेट पर सिगरेट फूंकते हुए सोच ही रहा था कि इतने में ज़ोर की अवाज़ आई। चौंककर उसने खिड़की से बाहर झांका। फ्लैट के सामने बने ट्रान्सफार्मर से धुआं निकल रहा था। बिजली भी चली गई थी। गर्मी से राहत पाने के लिए खिड़की के पाट पूरी तरह खोल दिए। अब उमस के कारण घबराहट होने लगी तो ठीक से सोच भी नहीं पा रहा था।
कुछ देर चहलकदमी की, लेटने की कोशिश की, लेटा नहीं गया, पता नहीं यह कब तक  ठीक कराया जायेगा। उसने तीसरी मंज़िल में रहनेवाले सेक्रेटरी को फोन लगाया। उधर से झिड़की सुनाई दी, “यह चौबीसवां फोन है…।”
एक घंटा बीत गया।
उसने खिड़की से बाहार एक बार और नज़र घुमाई। सायन्ना बडी़ फुर्ती से ट्रान्सफार्मर पर चढ़ रहा था। वह समझ नहीं सका कि अगर ट्रान्सफार्मर जल गया तो ऊपर चढ़कर सायन्ना क्या करेगा। छोटा-मोटा रिपेयर तो नहीं कि पैसों के लिए जान जोखिम में डाल दे…जीवन संघर्ष…इस शीर्षक से डाक्युमेंटरी बनाई जा सकती है ! यह बात दिमाग में आते ही उसने हेंडीकैम चला दिया और सायन्ना पर ज़ूम कर दिया।

सायन्ना दसवीं फेल था। फिर उसने बिजली का काम सीख लिया। अब उसे दस साल का तजुर्बा है। वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर तो नहीं है फिर भी फौरन गड़बड़ समझकर पल में उसे ठीक कर देता है। कहां छूने से जान को खतरा है, यह वह अच्छी तरह जानता था।
उसके हाथ चुस्ती से चलने लगे। वह जल्द से जल्द नुक्स को पकड़कर उसे ठीक कर देना चाहता था। किसी दूसरी जगह से भी बुलावा आया था। यह काम खत्‍म करके वहां जाएगा तो पैसे ज़्यादा मिलेंगे, यही सोच रहा था। उस समय अचानक उसे अपनी बीवी याद आ गई। उसकी कैंची जैसी चलती ज़बान, पैसों का मोह, घायल कर देनेवाली बातें,  हज़ार वोल्‍ट के झटके की तरह सताने लगे।
ध्यान बंटने से हाथ फिसल गया, ऐसी जगह पर पडा़ जहां पड़ना नहीं चाहिए था। सायन्ना चीखकर उछल पडा। मानो हाथ को किसी ने धारदार चाकू से ज़ोर से कतर दिया हो, ऐसा दर्द उठा। ट्रान्सफार्मर पर बने जंगले पर धडाम से मुंह के बल गिर गया।
चीख सुनते ही श्रीनिवास सतर्क हो गया। इतना ज़ोर का झटका लगा…अब यह बच नहीं पाएगा। यह सोचकर उसने कैमरा सायन्ना पर ज़ूम किया। वह अभी सांस ले रहा था। मृत्यु वेदना से छटपटा रहा था…मौत के मुंह में जा रहा था। रह-रहकर उसका शरीर झटके खा रहा था। इसका शीर्षक-  ‘मौत का दृश्य’ रखा जा सकता है, यह सोच मन में आते ही वह बडे़ ध्यान से दृश्य का चित्रण करने लग गया।
उस अपार्टमेंट में रहने वाले लोग बाहर आकर सायन्ना को देखते खडे़ रहे। सेक्रेटरी भागता हांफता आ गया। कटी पतंग की तरह ट्रान्‍सफार्मर के जंगले पर निढाल पडे़ सायन्ना को देखकर उसकी बी.पी. बढ़ गया। वह परेशान होने लगा कि पैसा बचाने के चक्कर में यह कैसी झंझट सिर पर ले ली ! उसने गौर से देखा। सायन्ना के शरीर में हरकत बिलकुल नहीं हो रही थी। यह कहीं पुलिस केस न बन जाए, यह सोच मन में आते ही वह सिहर गया। इतने में किसी ने कहा, “बिजली विभाग को फोन लगाइए। वे जबतक पवर सप्लाइ बंद नहीं करेंगे इसे नीचे नहीं उतारा जा सकता। बस सेक्रेटरी फोन करने को दौड़ पडा़।

बिजली के दफ्तर में साम्बमूर्ति अखबार के पन्ने पलटता बैठा था। वह भी नाखुश था। नाम के वास्ते बिजली का दफ्तर है, पर ऊपर पंखा न जाने कितने पुराने युग का है । हवा कम और शोर ज़्यादा देता है। कभी भी टूटकर गिर सकता है, यह डर बना रहता है। बडी़ उमस थी।
और दो घंटों की बात है, फिर ड्यूटी खत्‍म हो जाएगी। मुझे रिलीव करने जो आता है वह बदमाश तो शराबी है। पता नहीं समय पर आएगा या नशे में किसी सड़क किनारे पडा़ होगा। वैसे भी आज खास दिन है। बीवी बच्चों को लेकार गांव गई है। शाम को श्यामला को बुलाया है। वह ताला देखकर कहीं लौट न जाए। उसे चमेली के फूल बहुत पसंद हैं। रास्ते में खरीद लूंगा। साथ में क्वार्टर बोतल व्हिस्की और दो चिकेन बिरियानी के पेकेट भी।
फोन बज उठा। उधर से किसी ने कहा, “ट्रान्सफार्मर पर चढ़कर एक लड़का बिजली का झटका लगने से गिर पडा़।’’
यह सुनते ही साम्बमूर्ति तनकर सीधा बैठ गया। पूछा, “कहां?”
जवाब आया, “वहीं ट्रान्सफार्मर पर ही…।”
“मैं पूछ रहा हूं आप कहां से बोल रहे हैं? हादसा कहां हुआ?”
उधर से पता बताया गया।
तुरंत साम्बमूर्ति को तसल्ली हो गई। “प्राइवेट आदमी को ट्रान्सफार्मर पर नहीं चढा़ना चाहिए, क्या अपको मालूम नहीं?” उसने कहा।
“वह सब बाद में देखेंगे। हमें यह भी मालूम नहीं कि लडका ज़िंदा है या मर गया…उसे नीचे उतारना है। आप फौरन इस एरिया का कनेक्‍शन काट दो!”
“मैंने कम्‍प्‍लेंट लिख ली है। आपका नंबर है- छत्तीस। सब कर्मचारी कम्‍प्‍लेंट ठीक करने बाहर गए हैं, आते ही भेज दूंगा।”
“मैं ट्रान्सफार्मर की मरम्मत की बात नहीं कर रहा हूं। इस लाइन की बिजली काट देंगे तो हम उस लड़के को उतार लेंगे।”
“मैं भी यही कह रहा हूं जनाब ! कम्‍प्‍लेंट लिख ली है। जब भी बन पडे़गा भेज दूंगा।”
“अरे! आप हालत की नज़ाकत को समझो भाई ! यहां आदमी मौत से जूझ रहा है और..।” साम्बमूर्ति ने फोन काट दिया।
‘‘सरकारी नौकर जैसे सबका नौकर हो गया। ऐसे चिल्ला रहा है जैसे मेरा बास है। बुलाते ही दौड़कर जाना होगा?’’ वह झुंझला उठा।

वाचमैन ने खबर दी तो सायन्ना की बीवी रोती-कलपती आ गई। सेक्रेटरी को पहले ही डर था कि कहीं यह पुलिस का केस न बन जाए। अब यह औरत इतना शोर मचा रही थी तो उसका दिल ज़ोरों से धडकने लगा।
रोते-रोते उसने सेक्रेटरी को देखा तो कहने लगी, “आपने बुलाया तो चला आया साब! वह नहीं जानता था कि यह मौत का बुलावा है।”
यह सुनते ही सेक्रेटरी का दिल धक से हो गया। और कुछ देर इसी तरह बोलने दिया तो साफ कहेगी कि तुम्हारी वजह से ही मरा है । उसने मन ही मन हिसाब लगाया। पुलिस केस होगा तो हज़ारों रुपये खर्च करनॆ पडेंगे। इससे अच्छा है कि पैसे का लालच देकर इसका मुंह बंद किया जाए। यह सस्ता सौदा होगा। हर एक घर से पांच सौ मिल जाएं तो भी तीस हज़ार रुपये हो जाएंगे। और थाने के चक्कर काटने से भी बच सकते हैं। पति मर गया…अकेली औरत…बेसहार बेवा…ऐसे कहने पर हर कोई पैसा दे देगा।
ऐसा सोचते ही वह उस औरत के पास गया और तसल्ली देते हुए कहा, “तुम दुखी मत हो। सायन्ना बडा़ अच्छा है। हमारे कांप्लेक्स में हर कोई उसे जानता है और मानता भी है। हम सब मिलकर पच्चीस तीस हज़ार तुम्हें देंगे। उससे कुछ काम धंधा करके गुज़ारा कर लेना।”
यह सुनते ही एक पल के लिए उसकी आंखों में आशा की चमक कौंध गई, पर उसे छुपाते हुए फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, “हाय मैं क्या करूं…मेरा सुहाग छीन लिया तूने हे भगवान…दया नहीं आयी तुझे…!”

“धत् तेरे की…इस एस.आई. साले को मुफ्त के केस ही मिलते क्या ?” थाने से बाहर आते ही पुलिस सिपाही से यह कहकर दूसरी ओर मुंह करके थूक दिया हेड कांस्‍टेबल ने। सिपाही ने सिर हिलाकर हां में हां मिलाई। हेड ने फिर कहा, “वह कोई गधा ट्रान्सफार्मर पर चढ़कर मरा तो हमारी शामत आ गई। उसे नीचे उतारना, लाश का पंचनामा कराना और उसके परिवारवालों के सुपुर्द करना,  ये सारे काम करने तक हमारी ज़िंदगी कुत्ते की ज़िंदगी ही रहेगी।”
“मैंने तो एस.आई. के घर बरतन भी मांजे, मेडम के लिए सब्ज़ी खरीद लाया…इसके बावजूद वह हमसे खुश क्यों नहीं है, समझ में नहीं आता।”
“अरे, समझाकर! उसकी जात और हमारी जात अलग है। यही असली वजह है। मुझे गुस्सा आ गया ना तो इसपर डी.जी.पी. को लिखूंगा…इसके खिलाफ केस कर दूंगा हां! तब देखना इसे नक्सलाइट एरिया में भेज दिया जाएगा।”
बात करते-करते दोनों अरुणोदया अपार्टमेंट्स पहुंच गए। पहलॆ सोचा था कि यह फायदा का सौदा नहीं था, पर सेक्रेटरी के बर्ताव को और उसके डरे-डरे चेहरे को देखते ही वह समझ गया कि कहां ज़ोर देने से पैसे मिलेंगे। उसने सारा मामला सेक्रेटरी से उगलवाया। केस निपटाने के लिए कितना खर्च होगा यह बता दिया। आधे घंटे तक दाम पर बहस करने के बाद कुछ तय हुआ, तब देखा सायन्ना की ओर, जो चमगादड की तरह लटका था।
“अब पांच बज चुका है। यह तो बहुत देर पहले मरा था न ? अबतक लाश को नीचे क्यों नहीं उतारा ? क्या कर रहे थे आप ?” वह गरजा।
“उसे उतारने के लिए ऊपर चढ़ना था। पावर बंद नहीं किया गया तो कैसे चढते ? आप ही कुछ करो ना ?” गुस्से को पीकर सेक्रेटरी ने कहा।
“मुझे क्या पता? क्या मैं कोई इलेक्ट्रीशियन हूं?  फिर एक बार फोन करो। कहो एस.आई. साहब का हुक्‍म है। नहीं मानता तो ऊपर बैठे अफसर को शिकायत करेंगे। ”
छ्ह बजे जीप में बिजली विभाग से एक ए.ई. और दो कर्मचारी आए। सेक्रेटरी से कुछ देर बात करके इंजीनियर ने ऊपर सायन्ना की ओर देखा और कहा, “इतना बडा़ झटका लगने के बाद बचना मुश्किल है। वह तो मर गया होगा।”
“अरे क्या हम नहीं जानते वह मर गया है ? इसके लिए तेरे सर्टिफिकेट की ज़रूरत है क्या ?” मन ही मन सेक्रेटरी बुदबुदाया और कहा, “आप बिजली बंद करवाओ तो हम लाश को उतारें।”
“नहीं पहले मेरे बास को रिपोर्ट करनी पडॆ़गी।” यह कहकर तीनों वापस जीप में बैठकर चले गए।

श्रीनिवास बहुत खुश था, जैसे कोई बहुत बडा़ काम कर रहा हो। रह-रहकर सायन्ना के शरीर में होनेवाली हरकत देख वह फूला नहीं समा रहा था। मृत्यु के पलों को इस तरह क्लोज़प में बांधना ही एक रिकार्ड है, इस बात से उसका उत्साह और बढ़ने लगा।
वाचमैन की बीवी ऐलम्मा, को यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसकी उम्र चालीस के करीब होगी। छरहरा बदन पर मेहनत करने की वजह से चुस्त बहुत थी। गांव में बिजली के तारों से उलझने से जलकर मरनेवाले कौवों को उसने एक-दो बार देखा था। सायन्ना को देखकर वे कौवे याद आए तो उसका मन भर आया। उसे उतारने की कोई  कोशिश नहीं कर रहा है, इस बात से वह हैरान थी। उसने तय किया कि अब किसी से  उम्मीद न करके खुद कुछ करना चाहिए। वह जाकर सीढी़ ले आई। उसे ट्रान्सफार्मर से लगाया और साडी को दोनों पैरों के बीच से बांधकर चढ़ने को तैयार हो गई।
“ऎ…क्या करती है?…मरेगी तू…बिजली चालू है।” वाचमैन नीचे से चिल्लाया।
“कुछ नहीं होगा…नहीं मरूंगी मैं…तू चुप रह।”
वह ऊपर चढ़ गई और ट्रान्सफार्मर को छूए बिना खडी़ हो गई। एक हाथ की दूरी पर पडा़ था सायन्ना का शरीर।
“छूना मत… झटका लग जाएगा और तू भी मरेगी।” वाचमैन फिर चिल्लाया।
इस बार उसे भी डर लगा।
नीचे उतर आई और घर से लकडी का लंबा टुकडा ले आई। वह दो फुट लंबा था। उसने उससे सायन्ना के शरीर को धकेलने की कोशिश की। धकॆलना आसान था, पर नीचे गिरने से कहीं सर फट गया तो! नीचे देखते हुए कहा, “एक गद्दी डाल दो नीचे।”
“अरे मरे हुए को चोट का डर क्या? नीचे फेंक दो!” वाचमैन ने कहा।
उधर श्रीनिवास बडी चुस्ती से यह सब रिकार्ड कर रहा था।
सेक्रेटरी ने अपने घर से गद्दी मंगवाई। नीचे चटाई डालकर उसपर गद्दी डाली और पुरानी चादर भी बिछाई।
ऐलम्मा ने पूरा ज़ोर लगाकर सायन्ना को नीचे की ओर धकेला। धम्म से वह गद्दी पर गिर पडा।
सब लोग उसकी ओर भागे। सायन्ना की बीवी फिर रोने लगी।
हेड कांस्‍टेबल ने सायन्ना की नाक के पास उंगली रखकर देखा। कुछ समझ नहीं आया तो छाती पर हाथ रखकर देखा और दो मिनट बाद चिल्लाया, “यह अभी ज़िंदा है! एंबुलैन्स को फोन करो।”
आधे घंटॆ बाद एंबुलैन्स आयी। जब सायन्ना को उसमे चढा़या जा रहा था तो उसमे सांस बाकी थी। अस्पताल पहुंचने से पहले, बीच रास्ते में वह मर गया।

श्रीनिवास ने कैमरा बंद किया और अलमारी में रख दिया।
साम्‍बमूर्ति तीन पेग पीने के बाद श्यामला के साथ बिरियानी चखने में लगा था।
इस अचानक आए खर्च को किस तरह भरा जाए इसी सोच में डूबा था सेक्रेटरी।
क्रिया कर्म के खर्च तो दे दिए, पर वह पच्चीस तीस हज़ार दॆगा या नहीं यही चिंता सायन्ना की बीवी को बेचैन कर रही थी। उस समय साथ कोई भी नहीं था जो गवाही दे सके, यह सोचते ही उसका दिल बैठने लगा।
“मैंने यह काम तीन घंटे पहले किया होता तो वह बच जाता।” ऐलम्मा को यही सोच खाए जा रही थी। वह अपराध बोध से ग्रस्त हो गई।

टोबा टेक सिंह : सआदत हसन मंटो

उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो (11 मई, 1912 – 18 जनवरी, 1955) का आज से जन्‍मशताब्‍दी वर्ष शुरू हो रहा है। इस अवसर पर उनकी कालजयी कहानी-

बँटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिन्‍दुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्‍लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान  पागल हिन्‍दुस्तान के पागलख़ानों में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुँचा दिया जाए और जो हिन्‍दू और सिख पाकिस्तान के पागलख़ानों में हैं, उन्हें हिन्‍दुस्तान के हवाले कर दिया जाए।

मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या  ग़ैर-माक़ूल, बहरहाल दानिशमन्‍दों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं, और बिलआख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुकर्रर हो गया।

अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहक़ीन हिन्‍दुस्तान में ही में थे, वहीं रहने दिए गए,  बाक़ी जो बचे, उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। पाकिस्‍तान से चूँकि क़रीब-क़रीब तमाम हिन्‍दू-सिख जा चुके थे,  इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ, जितने हिन्‍दू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।

उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुँची तो बड़ी दिलचस्‍प चेमेगोइयॉं होने लगीं।

एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बाक़ायदगी के साथ ‘ज़मींदार’ पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्‍त ने पूछा, ‘‘मोलबी साब, यह पाकिस्‍तान क्‍या होता है…?” तो उसने  बड़े गौरो-फ़िक्र के बाद जवाब दिया, ‘‘हिन्‍दुस्‍तान में एक ऐसी जगह है जहां  उस्तरे बनते हैं !” यह जवाब सुनकर उस का दोस्त मुतमइन हो गया।

इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा, “सरदार जी हमें हिन्‍दुस्‍तान  क्‍यों भेजा जा रहा है… हमें तो वहॉं की बोली नहीं आती…।” दूसरा मुसकराया, ‘‘मुझे तो हिन्‍दुस्‍तानी बोली आती है, हिन्‍दुस्‍तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं…।”

एक दिन नहाते-नहाते एक मुसलमान पागल ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया ।

बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे, उनमें अक्सरीयत ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे दिला कर पागलख़ाने भिजवा दिया था  कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ, यह कुछ-कुछ समझते थे कि हिन्‍दुस्तान क्यों तक्‍सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाक़िआत से यह भी  बेख़बर थे। अख़बारों से उन्‍हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मोहम्मद अली जिन्नाह है जिसको कायदे-आजम कहते हैं, उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्‍तान है। यह कहां हैं,  इसका महले-वकू  क्या है, उसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिन्‍दुस्तान में, अगर हिन्‍दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है, अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह  कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए भी हिन्‍दुस्तान में थे।

एक पागल तो हिन्‍दुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्‍तान और हिन्‍दुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज्‍यादा पागल हो गया। झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठ कर दो घंटे मुसलसल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्‍दुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी… सिपाहियों ने जब उसे  नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा, ‘‘मैं हिन्‍दुस्तान में रहना चाहता हूँ न पाकिस्तान में… मैं इस दरख्‍त  ही पर रहूँगा।” बड़ी  देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू-सिख दोस्तों से गले मिल-मिलकर रोने लगा-  इस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिन्‍दुस्तान चले जाएँगे।

एक एम.एस-सी पास रेडियो इन्जीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्‍दीली नमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतार कर  दफेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू` कर दिया।

चिंयौट के एक मोटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में पन्द्रह-सोलह मर्तबा नहाया करता था, यकलख्‍त यह आदत तर्क कर दी- उसका नाम मोहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्नाह है,  उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार दे कर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया।

लाहौर का एक नौजवान हिन्‍दू वकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया था, जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्‍दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत  दुख हुआ। अमृतसर की एक हिन्दू लड़्‌की से उसे मुहब्बत हो गई थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था- वह उन तमाम हिन्दू और मुस्लिम लीडरों को गालियाँ देता था  जिन्होंने मिल-मिलाकर हिन्‍दुस्तान के दो टुकड़े कर दिए, और उसकी महबूबा हिन्‍दुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी।… जब तबादले की बात शुरू` हुई तो उस वकील को कई पागलों ने  समझाया कि वह दिल बुरा न करे… उसे हिन्‍दुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिन्‍दुस्तान में जहां उस की महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था, उसका ख्याल था कि अमृतसर में उसकी प्रेक्टिस नहीं चलेगी।

यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इन्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्‍दुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ, वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी, यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा, ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं, क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए ब्‍लडी इन्डियन चपाटी तो ज़हर माहर नहीं करना पड़ेगी ?

एक सिख था जिस को पागलख़ाने में दाख़िल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक़्त उसकी ज़बान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे-  ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन….।” वह दिन को सोता  था न रात को। पहरेदारों का यह कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से  में वह एक लहजे़ के लिए भी नहीं सोया, वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक्‍त खड़े रहने से उसके पांव सूज गए थे और पिंडलियॉं भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेट कर आराम  नहीं करता था।

हिन्‍दुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक जब कभी पागलख़ाने में गुफ्तुगू होती थी तो वह गौर से सुनता था, कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख्याल है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता, ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट….!” लेकिन बाद में  ‘आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट’ की जगह ‘आफ़ दि टोबा टेक सिंह गवर्नमेंट’ ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछ्ना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहां है, जहां का वह रहने वाला है। किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिन्‍दुस्‍तान में, जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिन्‍दुस्‍तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है… क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है, कल हिन्‍दुस्‍तान में  चला जाए… या सारा हिन्‍दुस्‍तान ही पाकिस्तान बन जाए… और यह भी कौन सीने पर हाथ रख कर कह सकता था कि हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से  गायब ही हो जाएँ…!

इस सिख पागल के केस छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे,  चूंकि बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और सर के बाल आपस में जम गए थे जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी, मगर आदमी बे-ज़रर था- पन्द्रह बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फ़साद नहीं किया था। पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में  उसकी कई ज़मीनें थीं, अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में बांधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए।

महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे, एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिन्‍दुस्‍तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना-जाना बन्द हो गया।

उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह  कहते थे। उसको यह कत्‍अन मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है,  महीना कौन-सा है, या कितने साल बीत चुके हैं, लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अक़ारिब उससे मिलने के लिए आने के करीब होते थे तो उसे अपने आप पता चल जाता था, चुनांचे वह दफेदार से कहता कि उसकी मुलाक़ात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता। अपने वह कपड़े जो वह कभी  इस्‍तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूं सज-बनकर मिलनेवालों के पास  जाता। वह उससे कुछ पूछ्ते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार ‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…’ कह देता।

उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में  जवान हो गई थी। बिशन सिंह‍ उसको पहचानता ही नहीं था- वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंखों से आंसू बहते थे।

पाकिस्तान और हिन्‍दुस्‍तान का क़िस्सा शुरू  हुआ तो उसने  दूसरे पागलों से पूछ्ना शुरू  किया कि टोबा टेक सिंह कहां है,  जब  उसे इत्‍मीनानबख्‍श जवाब न मिला तो उस की कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी, पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने  वाले आ रहे हैं,  पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बन्द हो गई थी जो उसे  उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी- उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे। वह आएँ तो वह उनसे पूछे कि टोबा टेक सिंह कहां है… वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि  पाकिस्तान में है या हिन्‍दुस्‍तान में- उसका ख्याल था कि वह टोबा  टेक सिंह ही से आते हैं, जहां उसकी ज़मीनें हैं।

पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को ख़ुदा कहता था। उससे जब एक  रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिन्‍दुस्‍तान  में  तो उसने हस्‍बे-आदत कहक‍हा लगाया और कहा “वह पाकिस्तान में है न  हिन्‍दुस्‍तान में,  इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं दिया…।’’

बिशन सिंह ने इस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्‍म दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर खुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि  उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे।

एक दिन तंग आकर बिशन सिंह खुदा पर बरस पड़ा, ‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा  ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह…।’ इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो,  सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते।

तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया। मुसलमान दोस्‍त पहले कभी नहीं आया था। जब बिशन सिं‍ह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापस जाने लगा, मगर सिपाहियों  ने उसे रोका, ‘‘यह तुमसे मिलने आया है… तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है…।’’

बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कन्धे पर हाथ रखा, ‘‘मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फ़ुरसत ही न मिली… तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिन्‍दुस्‍तान चले गए थे… मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की…  तुम्‍हारी  बेटी रूपकौर….’’ वह कहते-कहते रुक गया।

बिशन सिंह कुछ याद करने लगा, ‘‘बेटी रूपकौर….” _

फ़ज़लदीन ने रुक-रुककर कहां, ‘‘हां… वह… वह भी ठीक-ठाक है… उनके साथ ही चली गई थी…।’’

बिशन सिंह ख़ामोश रहा।

फ़ज़लदीन ने कहना शुरू  किया,  ‘‘उन्‍होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछ्ता रहूं… अब मैंने सुना है कि तुम  हिन्‍दुस्‍तान जा रहे हो…  भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी… भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन  राज़ीखुशी है… दो भूरी भैंसें जो वह छोड़ गए थे,  उनमें से एक ने कट्‌टा दिया है… दूसरी के कट्‌टी हुई थी, पर वह छह दिन की होके मर गई… और… मेरे लायक़ जो ख़िद्‌मत हो,  कहना,  मैं हर वक़्त तैयार हूं…  और यह तुम्‍हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूं…।’’

बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा, “टोबा टेक सिंह कहां है… ?”

फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा, ‘‘कहां हैं…? वहीं है, जहां था…।’’

बिशन सिंह ने फिर पूछा, ‘‘पाकिस्तान में या हिन्‍दुस्‍तान में ?’’

‘‘हिन्‍दुस्‍तान में… नहीं, नहीं पाकिस्तान में…!” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया।

‘‘बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया-  ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड  हिन्‍दुस्‍तान आफ़ दी दुर फिटे मुंह…!’’

तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुंच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।

सख़्त सर्दियां थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिन्‍दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुईं,  मुताल्लिका अफ़सर भी हमराह थे- वागह के बार्डर पर तरफ़ैन के सुपरिंटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कारवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू` हो गया,  जो रातभर जारी रहा।

पागलों को लारियों से निकालना और दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था, बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रज़ामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि वह इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे, उनको कपडे़ पहनाए जाते तो वह उन्‍हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते- कोई गालियां बक रहा है… कोई गा रहा है… कुछ आपस में झगड़  रहे हैं… कुछ  रो रहे हैं, बिलख रहे हैं।  कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-गोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दांत से  दांत बज रहे थे ।

पागलों की अक्‍सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में  नहीं आ रहा था कि उन्‍हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। वह चन्द  जो कुछ सोच-समझ सकते थे, ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’  और ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’  के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मर्तबा फ़साद होते होते बचा, क्योंकि बाज़  मुसलमानों ओर सिखों को यह नारे सुन कर तेश आ गया था।

जब बिशन सिंह की बारी आई और वाग‍ह के उस पार का मुताल्लिक अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा, ‘‘टोबा टेक सिंह कहां  है… पाकिस्तान में या हिन्‍दुस्‍तान में ?’’

मुताल्लिक अफ़सर हँसा, ‘‘ पाकिस्तान में…!’’

यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमांदा साथियों के पास पहुंच गया।

पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़  लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे,  मगर उसने चलने से इनकार कर दिया, ‘‘टोबा  टेक सिंह यहां है… !’’ और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,  ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान…!’’

उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिन्‍दुस्‍तान में चला गया है, अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहां भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना। जब उसको ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह  इस अन्दाज़ में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया, जैसे अब उसे कोई ताक़त  नहीं हिला सकेगी। आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई,  उसको वहीं खड़ा रह्‌ने दिया गया और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।

सूरज निकलने से पहले साकित व सामित बिशन सिंह के हलक से एक फ़लक-शिगाफ़ चीख़ निकली।

इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और देखा कि वह आदमी  जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुंह लेटा है-  उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिन्‍दुस्‍तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे  पाकिस्तान, दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।