
पहाड़ी क्षेत्रों में हिमपात का सिलसिला जारी है। मंसूरी में बर्फ पड़ने पर कवि और सामाजिक कार्यकर्ता अतुल शर्मा को ऐसी स्थितियों में की गई यात्राओं का स्मरण हो आया-
मंसूरी से देहरादून तक पैदल यात्रा के कई संस्मरण हैं। यहां 16 फरवरी की रात पड़ी बर्फ का ही जिक्र अभीष्ट है। मंसूरी में बर्फ पड़ी। देहरादून में दो दिन बादल घिरे रहे। ओले, बारिश और सर्द हवाओं ने मोटे स्वेटर निकलवा दिए। कुछ समय पहले जब मैं नींद में था, तब मंसूरी धनौल्टी में खूब बर्फ पड़ी। 17 फरवरी सुबह खिली धूप में मन हो रहा था कि बर्फ के पास चल दूं। पहले भी कई बार गया हूँ। मुझे ऐसी यात्राएं याद आ गईं। देहरादून से राजपुर तक बस में गए। वहां से शहंशाही आश्रम से कुछ आगे मंसूरी की तरफ पैदल चल दिए। उस समय चूने की खानें बंद नहीं थीं। वहां छोटे ट्रक जिन्हें गट्टू कहते थे, उन पर सवार होकर तीन किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ गए। वहां से एक छोटी सी पगडंडी से पहाड़ी का एक छोटा हिस्सा चढ़कर मंसूरी का पैदल रास्ता शुरू हो गया। ये पहाड़ी रास्ता झाड़ीपानी तक ले जाता था। बायीं तरफ से दून घाटी दूर तक दिखती थी। और इधर छोटा-सा पहाड़ी गांव गुमसुम और ठंड में डूबा हुआ था। पैदल चलना थकाने वाला बिल्कुल नहीं था। मेरे साथ सुप्रसिद्ध हास्य कवि ओमप्रकाश आदित्य, गीतकार रमानाथ अवस्थी, कथाकार रमेश गौड़ आदि थे। पिताजी ने मेरी ड्यूटी लगा दी इन्हें पैदल मंसूरी यात्रा करवाने की। झाड़ीपानी पहुंचने पर पहाड़ और सड़क के किनारे बर्फ दिखने लगी थी। सभी पुलकित थे। वहां चाय पी और गुड़ खरीदा। छोटे से पहाड़ी रास्ते की घुमावदार सड़कें कुछ देर बाद बर्फ से ढकीं मिलीं। गुड़ और ताजी बर्फ खाते हुए आगे निकल पडे़। नीचे के रास्ते को इंगित करके ऊपर चल रहे लोगों ने रमानाथ जी का गीत गुनगुनाया था। धीरे-धीरे चलते हुए बर्फ हमारा साथ दे रही थी। पिक्चर पैलेस मंसूरी से पहले बार्लोगंज में आधे घंटे बैठे। वहां सैलानियों के हिमपात और स्थानीय लोगों के हिमपात में अन्तर समझ आया था। पिक्चर पैलेस पहुंचने से पहले सीढ़ियों, छतों, पेडों की पत्तियों से बर्फ झड़ रही थी। मोड़ों के साथ धूप आती और फिर पहाड़ी के पीछे छिप जाती।
बहुत सालों बाद दिल्ली में आकाशवाणी के लिए रिकार्डिंग के सिलसिले में गया तो वहां विविध भारती के प्रोडयूसर के रूप में रमानाथ अवस्थी मिले। यह 1971 की बात होगी। कवि व रेडियो नाटकों के प्रख्यात अभिनेता देवराज दिनेश से परिचय कराया तो अवस्थी जी बोले, ‘‘अतुल, तुम्हारे साथ पैदल मंसूरी चढ़ गये थे। वहां से लाये छोटे-छोटे पत्थर आज भी मेरे बगीचे के पेड के नीचे रखे हैं।’’
#
रातभर बर्फ पड़ी। जब मैं सो रहा था, मुझे बर्फ के कई रंग याद आने लगे। सुबह मुझे याद आया कि एक दूसरी मंसूरी हिमपात यात्रा में मैं घनश्याम रतूड़ी़ सैलानी के साथ चल रहा था। सैलानी ने प्रसिद्ध चिपको आन्दोलन में जनजागरण का नब्बे प्रतिशत कार्य अपने गीतों से किया था। मुझे इस सूनी सड़क के किनारे चलते हुए एक अंग्रेज दिखाई दिया। वह अपनी मस्ती में चल रहा था। मैंने बर्फ का गोला बनाया और उसकी पीठ पर दे मारा। उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। वह सड़क किनारे खड़ा हो गया। हम लोगों को उसके पास से निकलना पड़ा। वह कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद अंग्रेज पीछे था और हम आगे। एकाएक सोच की चुप्पी तोड़ते हुए एक बर्फ का गोला मेरी गर्दन से होते हुए बनियान में घूस गया। अंग्रेज ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘दिस इज दे वे। इन्जॉय द स्नोफॉल।’’ उसने हमसे हाथ मिलाया और यह कहकर पगडंडी में गुम हो गया- ‘‘आई एम रस्किन बॉंड।’’
#
मंसूरी की पैदल यात्रा रेखा, रंजना, रीता, विक्की, बेबी, अलका और कथाकार भीमसेन त्यागी (जिन्हें हम अंकल कहते थे) के साथ हुई। ये यात्रा बड़ी गुमसुम चल रही थी। त्यागी जी के लतीफे-ठहाके गुंजते। बर्फ के गोले मारने का खेल शुरू नहीं हुआ था। सब त्यागी अंकल से संकोच कर रहे थे। बच्चों के साथ बच्चा बनने का हुनर उनके पास था। एकाएक बर्फ के गोले मारने की शुरुआत त्यागी जी ने कर दी। फिर जो बर्फ के गोलों की भरमार हुई, उससे आसपास के पर्यटक भी अछूते नहीं रहे। हमारा काफिला और बड़ा हो गया। पीछे-पीछे बच्चों की फौज और आगे-आगे बर्फ का गोला उछालते त्यागी अंकल चल रहे थे।
#
यह आन्दोलन के दिन थे। उत्तराखंड आन्दोलन में 100 दिन तक उत्तरकाशी में कलादर्पण संस्था ने प्रभातफेरियां निकालीं। सर्दियों में गिरती हुई बर्फ में मेरा गीत गाती हुई टोली पारम्परिक ढोल दमाऊ के साथ सुबह निकल जाती- ‘विकास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्यों/नदी पास है मगर ये पानी से दूर-दूर क्यों।’ 0बर्फ पड़ती रहती और आन्दोलन की आग भड़कती रहती।
#
कल रात पड़ी बर्फ पूरे गढ़वाल-कुमाऊं के ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ढक गई। कढ़की में ऐसी ही एक सर्द मौसम में डॉक्टर कौशिक, डॉक्टर मधुसूदन कम्बल लेकर निकल पडे़ और रात ग्यारह बजे ठिठुरती ठंड में फुटपाथों, स्टेशनों और दुकानों के बंद शटर के बाहर बिना कम्बल के सोते हुए लोगों को कम्बल उढ़ाते हुए निकल पडे़। सुबह उठकर जिसने कम्बल देखा होगा, उसे पता ही नहीं होगा कि उसे ये गर्माहट किसने दी।
Recent Comments