नागार्जुन, धूमिल जैसे जनकवियों की परम्परा के कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के पहले कविता संग्रह ‘नयी खेती’ पर शोध छात्रा और युवा लेखिका शेफालिका की समीक्षा-
रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ नए अंदाज नए तेवर के कवि हैं । ‘नयी खेती’ इनका पहला काव्य संग्रह है। यह बात बहुत अद्भुत है कि आज के समय में जहाँ कुछ ऐसे भी लिखनेवाले हैं, जिन्हें लिखने कि बेचैनी से पहले छप जाने की टीस सताती रहती है, नाक में दम किये रहतीं, वहीं विद्रोही छपने-छपवाने और लिखने-लिखवाने की कुश्ती से बेफिक्र हैं। विद्रोही ने कविता का बस पाठ किया, जगह-जगह- ढाबा, कैंटीन, जन-आन्दोलन, सड़कों पर कवितायें बस कहते रहे। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के विद्यार्थियों ने बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें छपने-छपवाने और कविताओं को जमा करने के लिए तैयार किया। दरअसल विद्रोही पर बात करना न केवल उनकी कविता पर बात करना है, बल्कि उन कविताओं पर बात करना है जो कविता के मायने को सार्थक बनाती हैं। न छपकर भी जिस तरीके से जेएनयू में तीन दशकों तक हरेक पीढ़ी के दिमाग में कुछ पंक्तियों को टंकित कर दिया है, वे किसी भी ‘इरेजर’ या ‘बैकस्पेस’ से मिटनेवाली नहीं हैं। न छपकर भी बी.बी.सी. से लेकर स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री और विदेशों में भी सुने जाने वाला यह इंसान विरोध दर्ज करने की मिसाल है।
इस पुस्तक में कविताओं के साथ बिरहा गीत, गजलें और नज्म भी हैं। बिरहा गीत अवधी में हैं। इसके अलावा सभी हिंदी में हैं।
इस पुस्तक की पहली कविता ‘जन-गण-मन’ में कवि भारतीय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। कवि इस कविता में मौत की बात करता है और वह मौत इस चरमराई हुई व्यवस्था, झूठे वादों-दावों की है- ‘मैं भी मरूँगा/और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा/मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा’। कवि अपनी मृत्यु की बात भी करता है, मगर वह पतझर में नहीं बसंत में मरना चाहता है। जब हर तरफ हरियाली हो, सबका पेट भरा हो, भूख से किसी की मौत न हो रही हो- ‘फिर मैं मरूं- आराम से, उधर चलकर बसंत ऋतु में/जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है।’ बसंत ऋतु की यह चाह उनकी सकारात्मकता को सामने लाता है।
इस संग्रह की बड़ी ख़ासियत इसकी गेयता है। आम इस्तेमाल, बोलचाल के शब्द हैं। अधिकांश कवितायेँ राजनीतिक हैं। एक कविता है ‘नूर मियां!’ कविता में दादी की आँखों का, नूर मियां के सुरमे का तो बखान है ही, साथ ही साथ भारत-पाकिस्तान के विभाजन के ऊपर भी संकेत है- ‘क्यों चले गए पाकिस्तान, नूर मियां?/कहते हैं कि नूर मियां के कोई था नहीं/तब क्या हम कोई नहीं होते थे नूर मियां के?/नूर मियां क्यों चले गए पाकिस्तान?/बिना हमको बताये ?।’ ‘नूर मियां!’ और ‘नानी’ दम भर में पढ़ी जाने वाली कवितायें हैं। लगता है, कवि अपने बचपन की कहानी सुना रहा है । इसी कहानी के माध्यम से वह राजनीतिक सवाल सामने रखता है।
‘धोबन का पता’, ‘कन्हई कहार’, ‘भुखाली हलवाह’ शीर्षक कवितायें साधारण और आम-सी लग सकती हैं, लेकिन ‘धोबन का पता’ की जड़ें राजा रघु और उनकी प्रजाओं तक है, वहीं ‘भुखाली हलवाह’ वर्तमान व्यवस्था में फंसा हुआ है। जहाँ पूंजीवादी व्यवस्था उसे सबकुछ से महरूम रखती है और अर्द्धसामंती व्यवस्था उसे जी हुजूरी से मुक्त नहीं होने देती। कविता की चंद पक्तियां- ‘बिना सुरती के सबेरे कुछ होता ही नहीं/नहीं होता सुरती खाने के बाद भी/क्योंकि सबेरे कुछ होने के लिए/सोने के पहले भी कुछ होना चाहिए।’
संग्रह की कविताओं में वर्तमान व्यवस्था के प्रति विद्रोह, पुरानी बातों की चीर-फाड़, अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ गुस्सा, पूंजीवादी और सामंती ताकतों के खिलाफ आवाज है। लंबी कविताओं में एक अन्य कविता है- ‘कथा देश की…’। तमाम तरह के दंगों से लेकर हिंसा के व्यापारियों की बात की गयी है। दंगों के सरताज अमरीका की दादागिरी विश्वभर में फैली हुई है। भारतीय लोकतंत्र के आका भी उसके इशारे पर देश को झोंकने को तैयार बैठे हैं। राजनेता की सलाह होती है कि हम तो बुत बने ही हैं तुम भी कठपुतली हो जाओ ताकि खेल और आसान हो जाए। हमारे देश के लम्पट राजनीतिक/जनता को झांसा दे रहे हैं कि/बगावत मत करो/हिंदुस्तान सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने वाला है/जनता कहती है/ भाड़ में जाये सुरक्षा परिषद! हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे। यह कविता कई परतों के साथ पूरी होती है।
विद्रोही की लंबी कविता पढ़ते हुए मैंने पाया कि ये कविताएं समग्रता में तो कई बातों को, सवालों को सामने लाती ही हैं, साथ ही इन कविताओं को अलग-अलग भागों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने पर भी पूरी कविता ही लगती हैं। ‘नई खेती’ का कवि नई दुनिया रचने की बात करता है। नयापन लिए हुए यह कवि कई स्तरों पर नवीनता लिए है। ‘नई दुनिया’ कविता में कवि कहता है- ‘एक दुनिया हमको गढ़ लेने दो/जहां आदमी-आदमी की तरह/रह सके, कह सके, सुन सके, सह सके।’ क्रांति के लिए आगे बढ़ने को कवि प्रेरित करता है। कई छोटी कविताओं में कबीर के तेवर मिलते हैं। कबीर ने जैसे दो टूक बात कही थी वैसा ही भाव यहां भी है- तुम्हारे मान लेने से/पत्थर भगवान हो जाता है/लेकिन तुम्हारे मान लेने से/पत्थर पैसा नहीं हो जाता।’ कवि नये समाज की बात करता है- ‘उनका मानना है कि बगैर हाथ-पैर हिलाए-डुलाए न तो सामाजिक बदलाव संभव है ना ही क्रांति। व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि उसको बदलना जोखिम जैसा है। राहें पथरीली उबड़-खाबड़ और टेढ़ी है। अब तो टेढ़ी राहे हैं कि टांगे टूट जाएंगी,/ये मां की पोसी टागें हैं भला कब काम आएगीं।’ इंकलाब का आकांक्षी कवि विद्रोही वामपंथी राजनीति में अपनी आस्था रखता है। इंकलाब के लिए खून का होना जरूरी है। खून होने भर से भी बात बनने वाली नहीं है। अनहोनी, भ्रष्टाचार, साम्राज्यवादी ताकतों, फिरकापरस्त नीतियों, जन विरोधी नीतियों के खिलाफ खून खौलना भी जरूरी है- ‘खून मर जाए तो इंकलाब ही न हो/इंकलाब न हो तो खून मर जाएगा।’ ‘अंधकार में’ कविता के माध्यम से कवि पंचायत बिठाना चाहता है। जिन बातों पर पंचायत बैठनी है वे हैं- गरीबों के तन पर वस्त्र और पेट में अनाज क्यों नहीं है, गरीबों की लाशों को गिद्ध नालियों में क्यों फेंक रहा है? दरोगा की बीबी का हार खोने पर बेवाओं के गहने को क्यों बटोरा जा रहा है? काजल, टिकुली, सिंदूर लगाना प्रश्नवाचक क्यों बन गया गरीबों के लिए?
विद्रोही के इस संग्रह में जहां रूढि़यों का सीधा-सीधा नकार है, क्रांति का आह्वान है, नये समाज की संकल्पना है, वहीं कवि चीजों को लेकर साफ और सुलझी समझ रखता है। तर्क देता है, जोश से भरता है, नई पौधों को, कुछ न करने की स्थिति में दुत्कारता है, मानदण्डों को पलटना चाहता है। वह ‘जन प्रतिरोध’ कविता में कहता है- ‘बड़ा भयंकर बदला चुकाती है ये जनता’।
‘औरतें’ इस संग्रह की जबरदस्त कविता है । कुएं में कूदकर जान देनेवाली और चिता में जलकर जान देनेवाले बयान के लिये वह पुलिस और पुरोहित दोनों को जिम्मेवार मानती हैं। कुएं में कूदकर जान देनेवाली और चिता में जलकर मरने के बयान के पीछे कवि पुलिस और पुरोहित दोनों को जिम्मेदार मानता है। औरतों की दशा के लिए जिम्मेदार मर्द ही होते हैं- ‘औरतें रोती जाती हैं/मरद मारते जाते हैं/औरतें और जोर से रोती हैं/मरद और जोर से मारते हैं/औरतें खूब जोर से रोती हैं/मरद इतने जोर से मारते हैं कि/वे मर जाती हैं।’ औरतों को मारने-पीटने, यातना देने का पुराना इतिहास रहा है। औरतों की मौत का शिनाख्त करते हुए विद्रोही मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी से वहां तक जाता है, जहां तक औरतों की जली लाश और इंसानों की हडि्डयां बिखरी पड़ी हैं। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए वह बयान देते हैं कि- ‘इतिहास में वह पहली औरत कौन थी/जिसे सबसे पहले जलाया गया/मैं नहीं जानता/लेकिन जो भी रही होगी/ मेरी माँ रही होगी।’
हिन्दी कविता के साथ-साथ भोजपुरी और अवधी के लोकगीत में भी हक़ हुकूक मांगते हैं- ‘जनी जनिहा मनइया जगीर मांगात/ई कलिजुगहा मजूर पूरी शीर मांगात/बीड़ी-पान मांगात/सिगरेट मांगात/कॉफी-चाय मांगात/ कप-प्लेट मांगात/नमकीन मांगात/आमलेट मांगात/कि पसिनवा के बाबू आपन रेट मांगात।’ पसीने का रेट मांगता यह कवि नई खेती कर नई फसल उगाने का ठान चुका है और कहता है- ‘अगर जमीन पर भगवान जम सकता है/तो आसमान में धान भी जम सकता है/और अब तो/दोनों में एक होकर रहेगा/या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा/ या आसमान में धान जमेगा।’
कविता संग्रह में एक बेचैनी है कुछ कर गुजरने की, कुछ नया न होने की। व्यवस्था के प्रति कड़वाहट है, खीझ है और धिक्कार है। कवि की पूरी लड़ई हक और हुकूक की लड़ाई है, मनुष्य के मनुष्य होने की लड़ाई है। मनुष्य को उसके हक दिलाने की कोशिश है। विद्रोही कहते हैं कि ‘लोग हक छोड़ दें पर मैं क्यूं हक छोड़ दूं।’
गजल और नज्म संग्रह का अंतिम पड़ाव है। इनमें भी कवि का वही स्वर है जो कविताओं और गीतो में है। यहां भी वही तड़प, बेचैनी, कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ ठोस न कर पाने की छटपटाहट है। ‘तोड़ पाऊंगा किसी दिन क्या मैं जंजीरें गुलामी/रोक पाऊंगा किसी दिन क्या मैं जंजीरें गुलामी।’
पिछले कई वर्षों या एक दशक की कविता को उठाकर यदि निष्पक्ष भाव से उसका मूल्यांकन किया जाए और अकेले विद्रोही की कविता को सामने रखा जाए तो पाठकों में बेचैनी, पछतावा, इच्छा और सामने कई सारे सवाल होंगे। बेचैनी कि इनकी और कविता कहां है, चलो उसको ढूँढ़ निकाले, पछतावा कि कहां था यह कवि जिसे हम ढूँढ़ नहीं पा रहे थे, जिसका पाठ नहीं कर पा रहे थे पहले, और सवाल और इच्छा यह जानने की क्या नागार्जुन, धूमिल, मुक्तिबोध जैसी जन की कविताएं अभी लिखी जाती हैं ?
विद्रोही का रचना संसार इतना व्यापक है कि ‘सुरती’ से लेकर ‘व्हाइट हाऊस’ तक की बात करता है। वहां मोहनजोदड़ो, बेवीलोनिया, मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता भी है।
कवि विद्रोही की यह पुस्तक ऐसे समय में हमारे बीच आई है जब सारी हदें पार हो रही हैं। घोटालेबाजों और घूसखोरों की जमात खड़ी है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं, मारी जा रही हैं, मुश्किल से किसी संस्थान पहुंचे पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राएं भी आत्महत्याएं कर रहे हैं। यह संग्रह सिलसिलेवाद, भ्रष्टाचार पर तो तमाचा है ही साथ ही साथ पूरी पीढ़ी के सामने प्रश्न छोड़ता हैं कि कब तक यह सब यूं ही चलता रहेगा ?
पुस्तक - नयी खेती( कविता संग्रह), कवि – रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’
मूल्य : पेपर बैक- 60 रुपये, सजिल्द- 100 रुपये, पृष्ठ- 150
प्रकाशक: सांस्कृतिक संकुल, जन संस्कृति मंच
टी-10, पंचपुष्प अपार्टमेन्ट, अशोक नगर, इलाहाबाद- 211001, उत्तर प्रदेश
नोट – पुस्तक मंगाने के लिए के.के. पाण्डेय से 09415366520 पर संपर्क किया जा सकता है।
विद्रोही जी से संबंधित दो लिंक-
विद्रोही की कविताएं
हमारे विद्रोही जी : प्रणय कृष्ण



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