
साहित्य से पहली मुलाकात, उसके जादुई असर और बाल साहित्य की स्थिति पर कथाकार प्रकाश मनु का आलेख-
सच कहूँ तो ये ऐसे क्षण हैं जब मैं अपने आपको थोड़ी अजब सी स्थिति में पा रहा हूँ और क्या कहूँ, कैसे कहूँ, कुछ ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा। कभी लगता है, बहुत कुछ है कहने को और मुझे कह ही डालना चाहिए। या कुछ तो जरूर कहना चाहिए जो मुझे अरसे से भीतर इतना मथता रहा और अब भी मथ रहा है। पर फिर अगले ही क्षण लगने लगता है कि नहीं, कुछ कहा न जाएगा। कुछ न कहूँ, चुप ही रहूँ—यह अच्छा है।
इस दुविधा से बचने का एक तरीका शायद यह समझ में आया कि बचपन में जाकर थोड़ा उन लम्हों को टटोलूँ, जब साहित्य या किताब की दुनिया से पहला-पहला परिचय हुआ था। और तभी मैंने थोड़ा-थोड़ा जाना था कि एक छोटी सी सौ-डेढ़ सौ सफे की किताब यह करिश्मा कैसे करती है कि वह हर इनसान के भीतर झाँक लेती है और पत्थर को भी थोड़ा मुलायम, थोड़ा इनसान बना देती है।
और मुझे लगता है कि यह सब जो जादू है, एक अजब सी मायानगरी का जादू यानी लिखना, लिखने का आनंद या कि किताब पढऩा, पढऩे का आनंद…यहाँ तक कि किताब के नजदीक जाने का रोमांच और कोई रचना, कोई बढिय़ा रचना जो आपको आत्मिक तृप्ति दे और आपके अबूझ सवालों का जवाब दे, आपको निराशा से बचाकर राह सुझाए, एक नई मंजिल की ओर इशारा करे, उसे पढऩे का एक निराला सा आनंद—इसकी शुरुआत तो शायद बचपन से ही हो जाती है, चाहे वह कितने ही अबोध और नौसिखिए रूप में हो। मगर किताब का उजाला नन्हे हाथों में आता है और फिर कैसे उसके दिल-दिमाग में फैलता है, यह मैंने जाना है। सभी लोगों ने इसे किसी न किसी रूप में महसूस किया होगा।
मुझे याद है, बचपन में एक बार ‘मनमोहन’ पत्रिका मेरे हाथ में आ गई थी। उस पत्रिका का एक अंक पढ़ लेना मुझे किस कदर रोमांच दे गया है, उसे बता पाना लगभग असंभव है। वह आज भी मेरे लिए एक तिलिस्म, एक जादू की तरह है। अभी तक किताब का मतलब मैं पाठ्य पुस्तक ही समझता था। मगर पाठ्य पुस्तकों की स्पष्ट ही सीमाएँ थीं। वे अच्छी लगती थीं, पर मन उनके साथ खुलकर बहता नहीं था। एक दूरी, एक परायापन सा था। पर मनमोहन को देखा तो लगा, और पहली बार लगा, कि अखबारी कागज पर छपी एक साधारण सी छपाई वाली पत्रिका भी मन पर जादू कर सकती है! उसमें बहुत सी कहानियाँ थीं, कविताएँ थीं, लेख थे, पहेलियाँ थीं। और वे सब के सब मैं इस कदर चाट गया, जैसे एक भुक्खड़ को बहुत दिनों बाद बढिय़ा भोजन मिला हो, मन और तबीयत के व्यंजन खाने को मिले हों। एक बच्चे की बाल साहित्य से यह पहली मुलाकात थी और वह इस कदर प्रेममयी और रोमांचक थी कि दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी प्रेमकथा को उस पर निछावर किया जा सकता है। एक छोटा सा अबोध बच्चा था और वह पहली बार अपने हाथ-पैर हिलाते हुए मुक्त हवा में तैर रहा था, आसमान में उड़ रहा था और उसे लग रहा था कि यह सारी दुनिया मेरी है, यह आसमान मेरा है। ओह! मेरे घर के दरवाजे-खिड़कियाँ अभी तक बंद थीं। मैंने कभी इस नए जादू और रोमांच को जाना ही नहीं। आज एक छोटी सी पत्रिका, जो कि शायद उन दिनों चवन्नी या अठन्नी की रही होगी, एकाएक उसने वे सारी खिड़कियाँ-दरवाजे खोल दिए कि मैं उडऩे लगा, उड़ता रहा, उड़ता रहा बहुत देर तक। और मैंने महसूस किया मेरे अंदर बहुत सारे आसमान हैं, बहुत सारी सृष्टियाँ हैं, बहुत सारी कल्पनाओं और जिज्ञासाओं का ब्रह्मांड व्याप्त है, उनका आनंद है, और बहुत गहरी संवेदना है जिसे मैं छू सकता हूँ, देख सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ।
मुझे अब भी याद है कि उस मनमोहन में एक राजकुमारी थी जिसकी नाक किसी वजह से लंबी, लंबी, बहुत लंबी होती जा रही थी। यहाँ तक कि वह जंगलों, झाडिय़ों तक चली गई और काँटों से लहूलुहान हो गई। तब उसकी पीड़ा से मैं किस कदर तड़पा और छटपटाया था आपको बता नहीं सकता। फिर उस कहानी का नायक, पता नहीं वह कौन था, उसने कुछ ऐसा किया कि वह नाक छोटी हुई और राजकुमारी फिर राजकुमारी बन गई। वैसी ही राजकुमारी जिसे मैं पहले से जानता था और पसंद करता था। तब मुझे कुछ चैन पड़ा। वरना अब तक तो मेरी साँस ही रुकी हुई थी।
उसके बाद फिर एक और अनुभव। बच्चों की एक और पत्रिका ‘चंदा मामा’ कहीं से हाथ आ गई और उस पूरे अंक में एक रहस्य और रोमांच भरा बाल उपन्यास छपा था। मैंने उसे आधा पढ़ा और फिर आधा वहीं रुक गया, क्योंकि मुझे अपने बड़े भाईसाहब की दुकान पर जाकर उनकी मदद करनी थी। शाम को उन्होंने किसी काम से भेजा, तो मुझे मुक्ति मिली। मैं दुकान से छूटा तो वह पत्रिका जेब में ही थी और मुझमें इतना धैर्य नहीं था कि कहीं बैठकर उसे पढ़ लूँ। मैं दुकान से निकला और रास्ते में चलते हुए उस किताब को पढऩे लगा। आस-पास रिक्शे-ताँगे, लोगों की भीड़-भाड़, पौं-पौं, पैं-पैं। लेकिन एक बच्चे की अपनी प्रिय पत्रिका से मुलाकात अबाध जारी थी। अब भी याद है, पूरे रास्ते भर मैं उस उपन्यास को पढ़ता गया था। आज सोचकर काँप उठता हूँ कि अगर मेरा एक भी कदम गलत पड़ गया होता तो…? कुछ भी हो सकता था, कुछ भी।
लेकिन बच्चे और बाल साहित्य का जो रिश्ता होता है, वह कुछ अजब सी दीवानगी वाला रिश्ता है। उसमें ये सारी चीजें नहीं चलतीं। और यह दीवानगी न होती, तो दुनिया के हजारों लेखक और लाखों पाठक बार-बार तकलीफें झेलकर भी, यों दौड़-दौड़कर किताबों की दुनिया के नजदीक न जाते। और बच्चों में—मैंने महसूस किया है—यह दीवानगी कहीं अधिक होती है। मैं विनम्रता से कहना चाहूँगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तमाम आतंक के बावजूद आज भी वह है और बनी रहने वाली है।
अब हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में दो बातें। मुझे लगता है, हिंदी के बाल साहित्य पर बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ खानापूर्ति वाली ढेरों चीजें हैं, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएँ भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। निरंकारदेव सेवक, सर्वेश्वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएँ लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्व कविता में पांक्तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्रकुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले, दिलीप एम. सालवी और देवेंद्र मेवाड़ी सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। रेखा जैन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और केशवचंद्र वर्मा ने बच्चों के लिए ऐसे दिलचस्प नाटक लिखे जिन्होंने बाल नाटकों की धारा ही बदल दी। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी अद्भुत और रोमांचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से एक मूर्धन्य कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ.जाकिर हुसैन ने बच्चों के लिए बड़ी अद्भुत कहानियाँ लिखीं हैं और वे उपलब्ध हैं। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि कोई उस पर तरस खाए।
एक दूसरी चीज जो मुझे बहुत विचलित करती है वह यह कि आज के बच्चे से जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टँगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके मानो उसे असमय प्रौढ़ बना दिया गया है। सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएँ पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं काँप उठता हूँ।
अब ‘एक था ठुनठुनिया’…! दो-एक बातें इसके बारे में भी कहने का मन है। सच कहूँ तो इस पर प्रथम साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने का पत्र मिला, तो मुझे एक सुखद और अकल्पनीय आश्चर्य सा हुआ था। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें, उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हाँ, कुछ बाल पाठकों की बहुत उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मुझे याद हैं और उनमें से एक चेहरा भी, जिसने बड़े अटपटे ढंग से लेकिन असाधारण उत्साह से ठुनठुनिया के बारे में अपनी राय बताई थी। ठुनठुनिया उसे भा गया था, और इसे बताते हुए अति उत्साह में वह कुछ हकलाने लगा था। कुल मिलाकर तो बस इतना ही था जिसे मैंने सँजोकर रख लिया और जो मेरे साथ रहेगा। अब उस पर बाल साहित्य के मर्मज्ञों का भी ध्यान गया तो लगा, चलो, इस उपन्यास में कुछ तो है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और वह मेरी तरह उनके साथ भी रह गया। इससे एक तरह की खुशी तो होती ही है।
यों ठुनठुनिया थोड़ा अजीब पात्र है, जिसका परिवेश थोड़ा गँवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ सा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह परिस्थितियों से कतई हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हँसी की फुरफुरियां फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में भी वह पस्त नहीं होता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे न सही, मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आँखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा, इसलिए उसकी समझ बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिलों को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है, इसीलिए चाहे रग्घू खिलौने वाला हो, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला मानिकलाल या फिर गाँव का भारी-भरकम शख्सियत वाला जमींदार, हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की माँ! इसके बारे में तो सिर्फ इतना ही कि उपन्यास में कई प्रसंग हैं, जिन्हें लिख रहा था तो ममता से झुक आई डाली की तरह मेरी माँ सामने थी और ठुनठुनिया मैं था, मैं खुद। बस, अब कुछ और कहना शायद फिजूल है। हाँ, ठुनठुनिया की एक बात शायत सभी पाठकों को अच्छी लगी कि वह जिंदगी में आगे बढ़ता है, मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भुत दुनिया रच डालता है, जिसमें कला-संगीत, नाटक और हँसी-खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूँ तो खुद मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।
अंत में बस इतना और कि मैं जो ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ सरीखे उपन्यासों और आलोचनात्मक लेखों में डूबा हुआ था, बाल साहित्य में शायद कुछ देर से आया। पर आया तो इसका श्रेय सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका और वहाँ के बहुत अच्छे मित्रों और स्नेहिल सहयात्रियों को ही जाता है। हम लोग शायद एक कारवाँ की तरह थे और बुरे वक्तों में भी एक अलग तरह की अबोधता का पूरा आनंद ले रहे थे। ‘नंदन’ में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा, अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तभी जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। पिछले आठ-दस वर्षों से हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने में जुटा हूँ और वह अब लगभग पूरा होने वाला है। वह सामने आए तो लगेगा कि यह जीवन एकदम निरर्थक तो नहीं गया। इसलिए कि उसमें ऐसे अनेक लोगों का जिक्र है जो अनाम मर गए, लेकिन घोर अभावों के बावजूद बाल साहित्य को बेशकीमती नगीने दे गए। यह इतिहास पूरा हो तो लगेगा कि मुझे उन सभी का आशीर्वाद मिल गया है।
(मनुजी को उनके बाल उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर हिदी के लिए साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्होंने यह व्याख्यान सम्मान समारोह में दिया था।)
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