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मैं अपनी कविता को माँ मानता हूँ : लीलाधर मंडलोई

लीलाधर मंडलोई

नई दिल्ली : ‘‘मेरी कविता के अनेक रूप मेरी माँ के ही विभिन्न रूप है। माँ से विलग होकर मैं मानो कोई कविता कह नहीं पाता, अतः मैं कविता को अपनी माँ ही मानता हूँ।’’ यह भावपूर्ण विचार लब्धप्रतिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई ने 13 जून 2012 को साहित्य अकादेमी द्वारा उन पर केंद्रित ‘कवि-संधि’ कार्यक्रम में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि मैं अपनी कविताओं की भाषा और फार्म में लगातार तोड़-फोड़ करता रहता हूँ। मेरे पहले कविता-संग्रह में जहाँ बुंदेली के चौकड़िया छंद का प्रभाव है तो अगले संग्रहों में उर्दू का प्रभाव। दूरदर्शन में कार्य के दौरान कविताओं को कैमरे की नज़र से भी लिखने की कोशिश की। मैं जहाँ-जहाँ गया वहाँ की भाषा, मुहावरे को कविता में उतारने की कोशिश करता रहा हूँ।

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा कविताओं का पाठ किया। ‘गिरगिट’, ‘घरेलू मक्खी’, ‘त्यौहार का दिन’, ‘रिश्ता’, ‘बेटियों से क्षमा याचना’, ‘आदिवासियों का आधुनिक प्रार्थना गीत’, ‘दिल्ली के बारे में’ आदि कविताओं को श्रोताओं ने बेहद पसंद किया।

कार्यक्रम के आरम्‍भ में अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि मंडलोई कविता में आदिवासियों मज़दूरों, प्रकृति के प्रति केवल सरोकर ही व्यक्त नहीं करते, उनको एक चुनौती के रूप में भी लेते हैं। वह बुद्धि-वैभव के अतिक्रांत संसार के बरबस अपनी कविता में मनुष्य के पास बुनियादी नातेदारी के साथ जाना चाहते हैं। कार्यक्रम के अंत में उनकी कविताओं पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि उनकी कविता में केवल माँ ही नहीं पूरा परिवार लिपट कर आता है जो बहुत बड़ी बात है।

कार्यक्रम में उनकी पीढ़ी के कवियों के अलावा अनेक युवा कवि भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। पंकज सिंह, मंगलेश डबराल, दिनेश कुमार शुक्ल, मदन कश्यप, प्रभाकर श्रोत्रिय, अनामिका, मिथिलेश श्रीवास्तव, विष्णु नागर, विमल कुमार, कुमार अनुपम आदि कुछ प्रमुख नाम हैं।

प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा

लेखक को समझा जाना सबसे ज़रूरी है : रमेशचंद्र शाह

लेखक-चिन्तक रमेशचंद्र शाह।

नई दि‍ल्‍ली : लेखक के लिये सबसे बड़ा पुरस्कार उसके लिखे को पाठकों द्वारा समझे जाने में होता है। यह विचार प्रसिद्ध लेखक-चिन्‍तक रमेशचंद्र शाह ने साहित्य अकादेमी द्वारा 17 अप्रैल, 2012 को आयोजित कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’  में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि भारतीय लोग इतिहास का मिथकीय स्वरूप पसन्‍द करते हैं,  जिसके चलते हमारी ‘इनोसेंस’ तो बचती है लेकिन इतिहास कमज़ोर हो जाता है।

अल्मोड़ा में बिताये अपने बचपन के दिनों को उन्होंने ‘गोबर गणेश’ उपन्यास के पहले अध्याय ‘घर की घड़ी’ को पढ़ कर साझा किया। अपने पिता की दुकान और उसमें आई रद्दी में आये साहित्य को पढ़कर ही उनकी लिखने-समझने-जानने की इच्छा जागृत हुई। इसी क्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मकथा लिखना बहुत कठिन है, क्योंकि सत्य को अकेले चलने-फिरने में दिक्कत होती है। उसे कल्पना के ढीले-ढाले पहनावे के साथ ही ठीक से चलाया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि मेरी भाषा के पहले संस्कार बालमुंकुद गुप्त के निबंधों से प्राप्त हुये। हँसोड़ शैली में गहन इतिहास बोध के साथ लिखी यह शैली मुझे अब तक प्रिय है। अपनी रचनाओं पर बात करते हुए कहा कि ‘गोबर गणेश’ जो कि मेरा पहला उपन्यास है, मुझे सबसे प्रिय है। ‘क़िस्सा गु़लाम’ उपन्यास के बारे में उन्होंने कहा कि पहले यह मैंने अंग्रेज़ी में लिखा था और अज्ञेय के कहने पर कई साल बाद इसको दुबारा हिन्‍दी में लिखा। इस उपन्यास ने मुझे सबसे ज़्यादा संतोष दिया। उन्होंने आपातकाल में लिखी अपनी कविता ‘हरिश्‍चन्‍द्र आओ’ सहित कई अन्य कविताएँ सुनाईं। अपने उपन्यास ‘गोबर गणेश’ के आरम्‍भि‍क अंश और निबंध ‘वह और मैं’ का भी पाठ किया।

कार्यक्रम के अंत में पाठकों के सवालों का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि ‘गोबर गणेश’ का अगला हिस्सा उन्होंने पाठकों के अनुरोध पर ‘विनायक’ के रूप में लिखा है।

इससे पहले अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने उनका विस्तृत जीवन परिचय देते हुए कहा कि अपनी संवादी शैली से पाठकों को प्रभावित करने वाले शाह जी ने अज्ञेय और प्रसाद की तरह हर विधा में श्रेष्ठ साहित्य की रचना की है। उन्होंने पश्‍चि‍म के दर्शन की बजाये भारतीय अनुभव की ज़मीन पर अपनी दार्शनिकता को तरज़ीह दी है।

1937 में अल्मोड़ा में जन्में शाह की इंटर तक की शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। आगे की शिक्षा इलाहाबाद और आगरा में पूरी करने के बाद वह 1961 में हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल में अंग्रेज़ी के अध्यापक नियुक्त हुये और 1997 में वहीं से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुये। बाद में निराला सृजन पीठ के निदेशक भी रहे। इनको ‘व्यास सम्मान’ तथा ‘पदमश्री’ अंलकरण से भी सम्मानित किया गया है।

इनके 11 उपन्यास, 9 काव्य-संग्रह, 7 कहानी-संग्रह, आलोचना की 10 किताबें, 10 निबंध-संग्रह सहित डायरी, अनुवाद, बाल साहित्य, यात्रावृत्त की पुस्तकें प्रकाशित हैं।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

साहित्य अकादमी के युवा और अनुवाद पुरस्कार घोषि‍त

नई दि‍ल्‍ली : साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित होने वाले साहित्योत्सव समारोह की औपचारिक शुरुआत 13 फरवरी को अकादमी प्रदर्शनी-2011 के उद्घाटन से हुई। प्रदर्शनी में अकादेमी की वर्षभर की गतिविधियों पर आधारित छायाचित्रों और सूचनाओं को संजोया गया है। इसका उद्घाटन प्रसिद्ध सिंधी साहित्यकार वासुदेव मोही ने किया। इस अवसर पर अकादेमी के सचिव अग्रहार कृष्‍णमूर्ति ने अकादेमी की उपलब्धियों का संक्षिप्त ब्यौरा दिया।

साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार-2011 घोषि‍त

साहित्य अकादमी ने 16 भाषाओं में अपने प्रथम युवा पुरस्कार की घोशणा की; डोगरी और सिंधी के अतिरिक्त बाकी भाषाओं में पुरस्कारों की घोषणा बाद में की जाएगी। छह कविता-संग्रहों, एक उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रहों, एक जीवनी, एक निबंध-संग्रह तथा दो नाटकों के लिए साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार घोषि‍त किया गया।

पुरस्कारों की अनुशंसा 24 भारतीय भाषाओं की निर्णायक समितियों द्वारा की गई तथा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में आयोजित अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में इन्हें अनुमोदित किया गया।

उमा शंकर चौधरी (हिन्‍दी), वीरन्ना मादिवालरा (कन्नड), निसार आज़म (कश्‍मीरी), ऐश्‍वर्य पाटेकर (मराठी), गायत्रीबाला पांडा (ओडि़या) और परमवीर सिंह (पंजाबी) को उनके कविता-संग्रह हेतु पुरस्कृत किया गया।

विनोद घोषाल (बांग्‍ला), सुश्‍मेश चंद्रोथ (मलयालम्), दुलाराम सहारण (राजस्थानी), जोफा गोन्साल्वीस (कोंकणी) और वेमपल्ली गंगाधर (तेलुगु) को उनके कहानी-संग्रह तथा एम. तवासी (तमिल) को उनके उपन्यास हेतु पुरस्कृत किया गया।

आनंद कुमार झा (मैथिली) और ध्वनिल पारेख (गुजराती) को उनके नाटक, विक्रम संपत (अंग्रेज़ी) को उनकी जीवनी तथा अरिंदम बरकतकी (असमिया) को उनके निबंध-संग्रह के लिए पुरस्कृत किया गया।

पुरस्कार स्वरूप एक उत्कीर्ण ताम्रफलक और एक 50,000/- रुपये की राशि‍ एक विशेष समारोह में प्रदान की जाएगी।

साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2011

भाषा           शीर्षक एवं विधा                                रचनाकार

असमिया        अनुशीलन (निबंध-संग्रह)                   अरिंदम बरकतकी
बांग्‍ला          डानाओला मानुष (कहानी-संग्रह)            विनोद घोषाल
अंग्रेज़ी         ‘माई नेम इज गौहर जान’ – द लाइफ़ एंड   विक्रम संपत
टाइम्स ऑफ़ ए म्युजिसियन (जीवनी)
गुजराती       अंतिम युद्ध(नाटक)                            ध्वनिल पारेख
हिन्दी          कहते है तब शंहशाह सो रहे थे (कविता-संग्रह) उमा शंकर चौधरी
कन्नड           नेलादा करुणेया दानी (कविता-संग्रह)       वीरन्ना मादिवालरा
कश्‍मीरी         पत्ते लेजी ज़ून दरस (कविता-संग्रह)          निसार आज़म
कोंकणी          निर्णय (कहानी-संग्रह)                          जोफा गोन्साल्वीस
मैथिली          हठात् परिवर्तन (नाटक)                        आनंद कुमार झा
मलयालम       मरण विद्यालयम् (कहानी-संग्रह)             सुश्‍मेश चंद्रोथ
मराठी          भुईशास्त्र (कविता-संग्रह)                          ऐश्‍वर्य पाटेकर
ओडि़या         गान (कविता-संग्रह)                              गायत्रीबाला पांडा
पंजाबी          अमृत वेला (कविता-संग्रह)                      परमवीर सिंह
राजस्थानी       पीड़ (कहानी-संग्रह)                              दुलाराम सहारण
तमिल           सेवलकट्टु (उपन्यास)                         एम. तवासी
तेलुगु          मोलोकलापुन्नामी (कहानी-संग्रह)         वेमपल्ली गंगाधर

साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार-2011

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में रवीन्द्र भवन, नई दिल्ली में सोमवार 13 फ़रवरी 2012 को आयोजित अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में 22 पुस्तकों को साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार-2011 के लिए अनुमोदित किया गया। नेपाली और संस्कृत भाषाओं के पुरस्कारों की घोषणा बाद में की जाएगी। पुरस्कार के रूप में 50000/- रुपये की राशि‍ और उत्कीर्ण ताम्र फलक इन पुस्तकों के अनुवादकों को अगस्त-2012 में आयोजित एक विशेष समारोह में प्रदान किए जाएँगे।

पुरस्‍कृत होने वाली पुस्‍तकें- अदम्य शक्‍ति‍ (सुरेश शर्मा, असमिया), राघवेर दिनरात (जयंत देवनाथ, बांगला), भलगानिफ्राय गंगा (हरिनारायण खाख्लारी, बोड़ो), दो गज़ ज़मीन (जितेन्द्र उधमपुरी, डोगरी), सीकिंग द बिलव्ड (अंजू मखीजा, अंग्रेज़ी ), कार्मेलीन (दर्शाना ढोलकिया, गुजराती), गिफ़्ट पैकेट (एस. शेषारत्नम्, हिन्‍दी), नन्नु अवनल्ला… अवालु…(तमिल सेल्वी, कन्नड), वूनल ते सिरयी (सतीश विमल, कश्‍मीरी), महाकवि गोविन्द पै (एल. सुनीता बाय, कोंकणी), उपरवास कथात्रयी (खुशी लाल झा, मैथिली), मीरायुम महात्मावुम (के.बी. प्रसन्न कुमार, मलयालम), करि मांगखे करि फङ्गे (एस. नंदकिशोर सिंह, मणि‍पुरी), रजई (कविता महाजन, मराठी), उमराव जान अदा (संग्राम जेना, ओडि‍या), भारती निक्की कहाणी     (गुरबक्स सिंह फ्रैंक, पंजाबी), अेक चादर मैली सी (कमल रंगा, राजस्‍थानी), संताड़ पाहड़ा (ठाकुरदास मुर्मू, संताली), शादी ता करी (जेठो लालवाणी, सिंधी), परावइगल ओरुवेलइ थूंगी पोयिएसक्कलम (इंद्रन, तमि‍ल), प्रताप मुदलियार चरित्र (एस. जयप्रकाश प्रताप, तेलुगु), मुंतखाब दलित कहानियाँ (एफ.एस. एजाज़, उर्दू)।

काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार

काशीनाथ सिंह

नई दिल्ली : प्रख्यात हिन्दी कथाकार काशीनाथ सिंह को उनके उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ के लिए हिन्दी भाषा के साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2011 के लिए चुना गया है। अकादेमी पुरस्कार 2011 के लिए चुने गए छह अन्य उपन्यासकार हैं: गोपालकृष्‍ण पै (कन्नड),  क्षेत्री बीर (मणिपुरी),  कल्पनाकुमारी देवी (ओडि़या), बलदेव सिंह (पंजाबी),  अतुल कनक (राजस्थानी) और एस. वेंकटशन (तमिळ)।

अपने काव्य-संग्रहों के लिए पुरस्कृत आठ कवि हैं: (स्व.) कबीन फुकन (असमिया), मनींद्र गुप्त (बाङ्ला), प्रेमानंद मोसाहारि (बोडो), नसीम शफाई (कश्‍मीरी), मैल्विन रोड्रीगस (कोंकणी), आदित्य कुमार मांडी (संताली), हरेकृष्‍ण शतपथी (संस्कृत) और खलील मामून (उर्दू)।

ललित मंगोत्रा (डोगरी), ग्रेस (मराठी)  और शामला सदाशिव (तेलुगु) को निबंध-संग्रह हेतु पुरस्कृत किया गया।

रामचंद्र गुहा (अंग्रेजी) को विवरणात्मक इतिहास हेतु पुरस्कार दिया जाएगा, जबकि मोहन परमार (गुजराती) को कहानी-संग्रह,  एम.के. सानू (मलयाळम्) को जीवनी और मोहन गेहानी (सिंधी) को नाटक हेतु।

साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष श्री सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में अकादेमी के कार्यकारी मंडल की दिल्ली में सम्पन्न बैठक में 21 दिसम्‍बर को विभिन्न भाषाओं के निर्णायक मण्डलों द्वारा चुनी गई 22 पुस्तकों को साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए अनुमोदित किया गया। मैथिली के लिए बाद में पुरस्कार घोषित किया जाएगा। नेपाली भाषा के लिए कोई पुरस्कार नहीं दिया जा रहा।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार के रूप में एक उत्कीर्ण ताम्रफलक,  शॉल और एक लाख रुपये की राशि दी जाती है। घोषित पुरस्कार 14 फ़रवरी 2012 को नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष समारोह में रचनाकारों को दिए जाएँगे।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2011

भाषा                 शीर्षक एवं विधा                             रचनाकार
असमिया       एई अनुरागी एई उदास (कविता-संग्रह)                   (स्व.) कबीन फुकन
बाङ्ला                बने आज कनचेर्टो (कविता-संग्रह)                मनींद्र गुप्त
बोडो                  अखाफोरनि दैमा (कविता-संग्रह)                 प्रेमानन्द मोसाहारि
डोगरी                 चेतें दियां ग’लियाँ (निबंध)                     ललित मगोत्रा
अंग्रेज़ी                इण्डिया आफ़्टर गांधी (विवरणात्मक इतिहास)              रामचंद्र गुहा
गुजराती               अंचलो  (कहानी-संग्रह)                               मोहन परमार
हिन्दी                रेहन पर रग्घू (उपन्यास)                      काशीनाथ सिंह
कन्नड                स्वप्न सारस्वत (उपन्यास)                            गोपालकृश्ण पै
कश्‍मीरी               न छ़ाय न अक्स (कविता-संग्रह)                 नसीम शफाई
कोंकणी               प्रकृतिचो पास (कविता-संग्रह)                          मेल्विन रोड्रीगस
मलयाळम्             बशीर: एकान्त वीधियिले अवधूतन (जीवनी)        एम.के. सानू
मणिपुरी               नंगबु ङगाईबडा (उपन्यास)                     क्षेत्री बीर
मराठी                वार्याने हलते रान (निबंध-संग्रह)                 ग्रेस (मणिक गोडघाटे)
ओडि़या               अचिह्न बासभूमि (उपन्यास)                           कल्पनाकुमारी देवी
पंजाबी                ढावां दिल्ली दे किंगरे… (उपन्यास)               बलदेव सिंह
राजस्थानी             जून-जातरा (उपन्यास)                               अतुल कनक
संस्कृत               भारतायनम् (महाकाव्य)                              हरेकृष्‍ण शतपथी
संताली                बंचाओ लरहाई (कविता-संग्रह)                          आदित्य कुमार मांडी
सिन्धी                … ता ख्याबां जो छा तिंडो (नाटक)              मोहन गेहानी
तमिळ                कवल कोट्टम (उपन्यास)                      एस. वेंकटेशन
तेलुगु                 स्वरालयालु (निबंध-संग्रह)                      शामला सदाशिव
उर्दू                  आफ़ाक़ की तरफ़ (कविता-संग्रह)                 खलील मामून
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टिप्पणी:       1.  नेपाली में कोई पुरस्कार नहीं।
2.  मैथिली में पुरस्कार बाद में घोषित किया जाएगा।

दिनेश कुमार शुक्ल का कविता-पाठ

नई दिल्ली : साहित्य अकादेमी के ‘कवि-संधि’ कार्यक्रम में  08 दिसंबर, 2011 को हिन्‍दी के वरिष्ठ कवि दिनेश कुमार शुक्ल का कविता-पाठ आयोजित किया गया। शुक्ल ने कानपुर प्रवास के दौरान लिखी गई अपनी दो छोटी कविताओं ‘भाई कवि’ और ‘खोलो आँख’ से शुरू कर 15 अन्य कविताएँ प्रस्तुत कीं। सस्वर पढ़ी गई इन कविताओं में कुछ लम्बी कविताएँ ‘यह रंग है क्या?’ तथा ‘चैत की चैपाई’ भी शामिल थीं। ‘यह रंग है क्या?’ शीर्षक कविता की यह पंक्तियाँ श्रोताओं द्वारा बेहद पसंद की गईं -

बहुत से रंग हैं उधेड़बुन के उन्हीं में दुनिया उलझ रही है
कहीं जो साबुन का बुलबुला है उसी को सूरज समझ रही है।
समय के गिरगिट ने रंग बदला रंगों के रंग भी बदल गए हैं।
गुफा से आकर पुराने अजगर तमाम इतिहास निगल गये हैं।

‘नया नियम’ शीर्षक की यह पंक्तियाँ भी सराही गईं-
अब कहाँ सम्‍भव
बिना आवाज़ का संगीत
बिना भाषा की कविता
बिना हवा का तूफ़ान
बिना बीज के फल
बिना युद्ध का समय
नहीं,
उस तरह सम्‍भव नहीं हो पाता
अब संसार।

उनके द्वारा सुनाई गई अन्य कविताओं के शीर्षक थे- ‘काया की माया रतनज्योति’, ‘चतुर्मास’, ‘सुबह से पहले’, ‘पान-फूल’, ‘षटपद’, ‘पुनुरोदय’, ‘चैत की चैपाई’, ‘भूल’, ‘सागर का सभागार’, ‘आएँगे हम भी अगर आ पाये’, ‘विलोमानुपात’, ‘पूस के खेत की रात, जगह जानी-पहचानी’।

कविता-पाठ से पहले अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने दिनेश कुमार शुक्ल का परिचय देते हुए कहा कि शुक्ल जी की कविता में हम अतिपरिचित समय के अलिखित चहरे को भी पढ़ सकते हैं। उनकी कविता समस्त आशंकाओं, स्मृतियों, संवेदनाओं को सुरक्षित रखने की कविता है। खास देशज और लोक स्वर उनकी विशिष्टता है। उनकी कविता में स्मृति और यथार्थ की अनुभूतियों को महसूस किया जा सकता है।

1950 में कानपुर के नर्वल गाँव में जन्मे दिनेश कुमार शुक्ल की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। उनका पहला कविता-संग्रह ‘समयचक्र’ 1997 में आया। इसके बाद आपके छह अन्य काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ताजा काव्य-संग्रह ‘समुद्र में नदी’ इसी वर्ष ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ से आया है। आपने पाब्लो नेरूदा की कविताओं का अनुवाद भी किया है जो एक काव्य पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। ‘केदार सम्मान’ और ‘सीता स्मृति सम्मान’ से सम्मानित शुक्ल गुड़गाँव में रह रहे हैं।

कार्यक्रम में नामवर सिंह, केदारनाथ सिह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, मदन कश्यप, मिथिलेश श्रीवास्तव, वीरेन्द्र कुमार वरनवाल, प्रेमपाल शर्मा, रामकुमार कृषक व अन्य कवि/लेखक उपस्थित थे।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

श्रीलाल शुक्ल को व्यंग्यकार के खाते में डालना अनुचित

श्रीलाल शुक्ल के चित्र पर फूल अर्पण करते विश्वानाथप्रसाद तिवारी

नई दिल्ली : प्रख्यात हिन्दी कथाकार श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में  02 नवंबर, 2011 को साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा में लगभग सभी वक्ताओं ने उन्हें केवल व्यंग्यकार के रूप में मान्यता देने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा करके हम उनके विशाल और विविधतापूर्ण रचनाकर्म को नज़रअंदाज कर रहे हैं। साहित्य अकादेमी के सभागार में शाम 5 बजे आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा में सबसे पहले श्रीलाल शुक्ल की पुत्रवधु साधना शुक्ल ने अकादेमी को इस आयोजन के लिए तथा उपस्थिति सभी लेखकों/पत्रकारों का धन्यवाद दिया।

अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने नए लेखकों के प्रति उनकी उदारता को याद करते हुए कई संस्मरण सुनाए। अज्ञेय पर गोरखपुर विश्वविद्यालय में उनके दिए गए वक्तव्य को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इतने विद्धतापूर्ण व्यक्तित्व को केवल व्यंग्य लेखक मान लेना बहुत गलत है। प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि उनके जाने से लखनऊ का साहित्यिक आकाश सूना हो गया है। वह नम्रता की पराकाष्ठा थे। उन्होंने व्यंग्य में जो प्रबंधाकत्मता और महाकाव्यता पैदा की वह दुर्लभ है। वह संभवतः लेखकीय गरिमा के अंतिम प्रतीक थे।

विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन्हें स्वतंत्र भारत का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाली हिन्‍दी लेखक बताते हुए कहा कि शुरू में आलोचकों ने ‘राग दरबारी’ की उपेक्षा इसलिए की कि वे उस समय व्यंग्य उपन्यास की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। उन्होंने उनके संस्कृत, उर्दू, संगीत की व्यापक समझ और स्वाभिमान की भी चर्चा की। प्रयाग शुक्ल ने उन्हें हर बार चौंकाने वाला रचनाकार बताया। वह कला, संगीत से लेकर किसी भी विषय पर अपने विचार और लेखन से हमेशा प्रभावित करते रहे। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने लखनऊ में बन्‍दी रहने के दौरान जेल में आकर मिलने की चर्चा करते हुए कहा कि श्रीलाल जी ने कभी रचना के साँचे को दोहराया नहीं। उनका लिखा, आने वाली पीढि़यों के लिए चुनौती रहेगा। मंगलेश डबराल ने उनके लेखन के विस्तृत दायरे की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था और सर्वण समाज की पतनशीलता को बेहद विश्वसनीयता के साथ चित्रित किया। उन्होंने उत्तर भारत के समाज का नया रूपक सामने रखा। वे पहले साहित्यकार थे, जिन्होंने दलित साहित्य का पक्ष लिया।

कृष्णदत्त पालीवाल ने उन्हें अखण्ड व्यक्तित्व का रचनाकार बताते हुए कहा कि उनमें कहीं कोई दोहराव नहीं है। वह जो कहते थे, करते थे। व्यंग्य उनकी लेखन शैली थी। उसे विधा मान लेने की गलती हम सब करते रहते हैं, जो उचित नहीं है।

श्रद्धांजलि सभा में कैलाश वाजपेयी, प्रो. इंद्रनाथ चौधुरी, उद्भ्रांत, गंगा प्रसाद विमल, सुशील सिद्धार्थ और पद्मा सचदेव ने भी विचार व्यक्त किए।

श्रद्धांजलि सभा में उनकी दोनों बेटियों मधुलिका और विनीता तथा उनके पुत्र और पुत्रवधु के अलावा आलोक जैन, रणजीत साह, मदन कश्यप, रामकुमार कृषक, देवेन्द्र चौबे, रेखा सिंह, कृष्ण कल्पित आदि उपस्थित थे। अंत में ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने साहित्य अकादेमी द्वारा तैयार शोक प्रस्ताव पढ़ा और उपस्थित सभी लोगों ने खड़े होकर एक मिनट का मौन रखा।

प्रस्तुति – अजय कुमार शर्मा

विश्‍वनाथ प्रसाद साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष बने

नई दिल्ली : हिंदी के वरिष्ठ कवि-आलोचक विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष चुने गए हैं। सन 1954 में स्थापित साहित्य अकादमी के इतिहास में यह पहला मौका है जब हिंदी का साहित्यकार उपाध्यक्ष चुना गया है। अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष पंजाबी के कवि-समालोचक सुतिंदर सिंह नूर के निधन के बाद से यह पद रिक्त चल रहा था। शनिवार को गुवाहाटी में इसके लिए हुए चुनाव में कन्नड़ के नाटककार प्रसन्ना और मैथिली साहित्यकार विद्यानाथ झा विदित भी प्रत्याशी थे। इसके लिए पड़े कुल 66 मतों में से 47 विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को मिले। प्रसन्ना को 15 और विदित को 4 वोट मिले।
गौरतलब है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों पर नियुक्ति के लिए शुरू से ही निर्वाचन प्रणाली का प्रयोग किया जाता रहा है। इसमें मतदान अकादमी की सामान्य परिषद के सदस्य करते हैं। ये सदस्य विभिन्न राज्यों की अकादमियों के अलावा साहित्य-संस्कृति से जुड़ेराष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिनिधि होते हैं। चुनाव नियमत: पांच वर्षों के लिए होता है। हालांकि तिवारी का कार्यकाल सिर्फ रिक्त अवधि यानी सन 2012 तक के लिए होगा।
1940 में  कुशीनगर के रायपुर भैंसही-भेडिहारी गांव में जन्में विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी एक लोकप्रिय शिक्षक भी रहे। गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त हुए। वह गोरखपुर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका ‘दस्तावेज’ के संपादक हैं। यह पत्रिका रचना और आलोचना की पत्रिका है, जो 1978 से नियमित प्रकाशित हो रही है। सन् 2011 में उन्हें व्यास सम्मान प्रदान किया गया। इस समय वह हिन्दी सलाहकार मंडल, साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली के संयोजक थे।

माँ-बेटे के कोमलतम रिश्ते की विरल अनुभूतियों का बयान : रमेश तैलंग

साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित कथाकार प्रकाश मनु के बाल उपन्‍यास एक था ठुनठुनिया का अवलोकन कर रहे हैं चर्चित लेखक रमेश तैलंग-

कथा-पुरुष देवेन्द्र सत्यार्थी अक्सर कहा करते थे कि पाठक (आलोचक) को किसी भी कृति का मूल्याँकन लेखक की ज़मीन पर बैठ कर करना चाहिए। सत्यार्थीजी की यह उक्‍ति‍ मुझे इसलिए भी याद आ रही है कि ‘एक था ठुनठुनिया’ को पढ़ते हुए मैं कई बार कई जगह पर फिसला हूँ। शायद यही कारण है कि रचना कई बार पुनर्पाठ की अनिवार्यतः माँग करती है।

सरसरी तौर पर देखें तो एक था ठुनठुनिया एक पितृहीन पाँच साल के बच्चे की साधारण-सी कथा है जो अपनी चंचलता और विनोदप्रियता से अपनी माँ के साथ-साथ पूरे गांव वालों का प्रिय बन जाता है और किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते अपनी सूझ-बूझ, कला-प्रवीणता और मेहनत से एक दिन अपनी माँ का सहारा बनकर सफलता की ऊँचाइयाँ हासिल करता है। पर इस साधारण-सी दिखने वाली कथा में कई असाधारण बिंदु गुंफित हैं।

मसलन, पहला बिंदु तो ठुनठुनिया की माँ के ममता भरे उस सपने से जुड़ा है जिसमें वह ठुनठुनिया के बड़े तथा सक्षम होने पर परिवार के भरण-पोषण की समस्या का निदान खोज रही है। पुत्रजन्म के एक साल बाद ही पति का देहावसान किसी भी माँ के लिए बज्राधात से कम नहीं होता खासकर उस गरीब परिवार में जहाँ जीवनयापन का अर्थ सतत संघर्ष के सिवा कुछ और नहीं है- ‘‘बस यही तो मेरा सहारा है, नहीं तो भला किसके लिए जी रही हूँ मैं। ……अब जरूर मेरे कष्ट भरे दिन कट जाएँगे।…… मेरा तो यही अकेला बेटा है ….. लाड़ला! इसी के सहारे शायद बुढ़ापा पार हो जाए।’’

दूसरा बिंदु,  ठुनठुनिया की माँ के मन में पल रहे उस अज्ञात डर का है जो उसे सदैव इस आशंका से आतंकित किए रहता है कि उसका इकलोता बेटा और एकमात्र सहारा ठुनठुनिया अगर किसी कारणवश उससे दूर चला गया तो उसका क्या होगा। क्या वह उसका वियोग सह पाएगी? और एक दिन जब मानिक लाल कठपुतली वाले के साथ ठुनठुनिया सचमुच गाँव छोड़ कर चला जाता है और काफी दिनों तक माँ की सुध नहीं लेता तो माँ का यही डर प्रत्यक्ष हो कर उसके सामने आ खड़ा होता है। पूर्वअध्यापक अयोध्याप्रसाद जब ठुनठुनिया को अपने साथ लेकर गाँव लौटते हैं तो कई दिनों से बीमार पड़ी माँ का अकुलाता हृदय ठुनठुनिया के सामने उपालंभ भरे स्वर में फट पड़ता है- ‘‘बेटा ठुनठुनिया, तूने अपनी माँ का अच्छा ख्याल रखा। कहा करता था-‘माँ, माँ, तुझे मैं कोई कष्ट न होने दूँगा। पर देख, तूने क्या किया?’’

तीसरा बिंदु शैशव और किशोरावस्था के बीच झूलते ठुनठुनिया के उस निश्छल, विनोदप्रिय एवं निर्भीक स्वभाव का है जिसके तहत वह अपने गाँव गुलजारपुर के भारीभरकम सेहत वाले जमींदार गजराज बाबू को हाथी पर सवार देखकर विनोद करता है- ‘‘माँ! माँ! देखो, हाथी के ऊपर हाथी…, देखो माँ,  हाथी के ऊपर हाथी।’’ ठुनठुनिया के विनोदी एवं निर्भीक स्वभाव का वहाँ भी परिचय मिलता है जहाँ वह भालू का मुखौटा लगा कर रात को रामदीन काका सहित बहुत से गाँव वालों को पहले डराता है और कुछ दिनों बाद गाँव के ही एक उत्सव में भालू नाच दिखाने के बाद इस रहस्य का पर्दा भी खोल देता है,  बिना इस भय के कि उसकी इस शरारत के लिए उसे सजा भी मिल सकती है। यह और बात है कि उसे सजा तो नहीं मिलती, गजराज बाबू द्वारा गुलजारपुर के रत्न का खिताब अवश्य मिल जाता है।

यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि आमतौर पर बहुत से बच्चों में पढ़ाई से हट कर कंचे खेलने, पतंग उड़ाने, पेंच लड़ाने या कुछ ऐसा कर गुजरने की इच्छा बलवती होती है जो दूसरे न कर सके। ठुनठुनिया इसका अपवाद नहीं। वह भी इन सभी कामों में अपनी महारत सिद्ध करना चाहता है और ऐसा कर भी लेता है । यही नहीं उसकी एक दबी हुई इच्छा यह भी है कि वह पढ़ाई की जगह खिलौने बनाकर या कठपुतली का नाच दिखा कर अपने तथा अपनी माँ के लिए खूब पैसा कमाए। उसकी यही इच्छा उसे पहले रग्घु काका के खिलौने बनाने तथा बाद में मानिक लाल के कठपुतली नचाने की कला के प्रति आकर्षित करती है और अचानक माँ से दूर एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ थोड़ा पैसा और शोहरत तो है पर वह माँ नहीं है जिसकी जिंदगी का हर पल उसी के सहारे टिका हुआ है।

स्कूली शिक्षा से विचलन और कम से कम समय में येन-केन प्रकारेण ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह अंकुरण के बाद पल्लवित होती आज की नई पीढ़ी को किस तरह उनके सही लक्ष्‍य तथा अपने प्रियजनों से दूर भटका रही है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण ठुनठुनिया के चरित्र में देखने को मिलता है।

पर वो कहते हैं न कि अंत भला सो सब भला।

अपने पूर्व अध्यापक अयोध्या प्रसाद के साथ जब ठुनठुनिया आगरा से वापस अपने गाँव गुलजारपुर लौटता है तो उसके जीवन की राह ही बदल जाती है। अब वह दोबारा स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ाई में पूरी तरह जुट जाता है और हाईस्‍कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। पढ़ाई के साथ-साथ उसकी क्रियात्मक कलाओं में अभिरुचि तथा प्रवीणता उसे एक दिन कपड़ा फैक्टरी के मालिक कुमार साहब तक पहुँचा देती है जो इंटर पास करने के बाद ठुनठुनिया को उसकी कुशलता तथा विश्वास पात्रता के चलते अपने डिजाइनिंग विभाग में असिस्टेंट मेनेजर की नौकरी दे देते हैं। इस तरह ठुनठुनिया जहाँ अपनी मां गोमती का वर्षों से पाला हुआ सपना पूरा करता है, वहीं गोमती अपने बेटे के लिए उसके अनुरूप बहू भी ढूंढ़ लेती है।

एक था ठुनठुनिया का एक और बेहद मनोरंजक प्रसंग वह है जहाँ ठुनठुनिया अपने दोस्तों के उपहास से तंग आकर अपनी माँ के सामने अपना नाम बदलने की पेशकश रखता है। उत्तर में जब माँ उसे शहर जा कर कोई नया नाम खोज लेने के लिए कहती है तो ठुनठुनिया की कशमकश देखते बनती है। जब वह अशर्फीलाल को भीख माँगते, हरिश्चंद्र को जेब काटते और छदामीमल को सेठ की जिंदगी जीते हुए देखता है तो उसको समझ आ जाती है कि उसे और किसी दूसरे नाम की जरूरत नहीं, वह तो ठुनठुनिया ही भला।

आह वे फुंदने वाले प्रसंग को पढ़कर मुझे राम नरेश त्रिपाठी की कहानी सात पूंछों वाला चूहा स्मरण हो आई। लोक में ऐसी कथाएं अनेक रूपों में प्रचलित होकर लेखकों को प्रेरित करती है जहाँ कहीं-कहीं साम्य भी नजर आ जाता है।

एक था ठुनठुनिया की एक प्रमुख विशेषता है प्रकाश मनु की बाल-सुलभ चुलबुली भाषा और कथा कहने का खिलंदड़ा अंदाज जो उन्हें कथा लेखक से कहीं ज्यादा कुशल कथावाचक के रूप में स्थापित करते हैं।

पुस्तक- एक था ठुनठुनिया (2007),  पृष्ठ-95
प्रकाशक- शब्दकलश,  एस-55 प्रताप नगर, दिल्ली-110007
मूल्य- 100 रुपये

बाल साहित्य की दुनिया में बहुत बेशकीमती नगीने है : प्रकाश मनु

साहि‍त्‍य से पहली मुलाकात, उसके जादुई असर और बाल साहि‍त्‍य की स्‍थि‍ति‍ पर कथाकार प्रकाश मनु का आलेख-

सच कहूँ तो ये ऐसे क्षण हैं जब मैं अपने आपको थोड़ी अजब सी स्थिति में पा रहा हूँ और क्या कहूँ, कैसे कहूँ, कुछ ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा। कभी लगता है, बहुत कुछ है कहने को और मुझे कह ही डालना चाहिए। या कुछ तो जरूर कहना चाहिए जो मुझे अरसे से भीतर इतना मथता रहा और अब भी मथ रहा है। पर फिर अगले ही क्षण लगने लगता है कि नहीं, कुछ कहा न जाएगा। कुछ न कहूँ, चुप ही रहूँ—यह अच्छा है।

इस दुविधा से बचने का एक तरीका शायद यह समझ में आया कि बचपन में जाकर थोड़ा उन लम्हों को टटोलूँ, जब साहित्य या किताब की दुनिया से पहला-पहला परिचय हुआ था। और तभी मैंने थोड़ा-थोड़ा जाना था कि एक छोटी सी सौ-डेढ़ सौ सफे की किताब यह करिश्मा कैसे करती है कि वह हर इनसान के भीतर झाँक लेती है और पत्थर को भी थोड़ा मुलायम, थोड़ा इनसान बना देती है।

और मुझे लगता है कि यह सब जो जादू है, एक अजब सी मायानगरी का जादू यानी लिखना, लिखने का आनंद या कि किताब पढऩा, पढऩे का आनंद…यहाँ तक कि किताब के नजदीक जाने का रोमांच और कोई रचना, कोई बढिय़ा रचना जो आपको आत्मिक तृप्ति दे और आपके अबूझ सवालों का जवाब दे, आपको निराशा से बचाकर राह सुझाए, एक नई मंजिल की ओर इशारा करे,  उसे पढऩे का एक निराला सा आनंद—इसकी शुरुआत तो शायद बचपन से ही हो जाती है, चाहे वह कितने ही अबोध और नौसिखिए रूप में हो। मगर किताब का उजाला नन्हे हाथों में आता है और फिर कैसे उसके दिल-दिमाग में फैलता है, यह मैंने जाना है। सभी लोगों ने इसे किसी न किसी रूप में महसूस किया होगा।

मुझे याद है, बचपन में एक बार ‘मनमोहन’ पत्रिका मेरे हाथ में आ गई थी। उस पत्रिका का एक अंक पढ़ लेना मुझे किस कदर रोमांच दे गया है, उसे बता पाना लगभग असंभव है। वह आज भी मेरे लिए एक तिलिस्म, एक जादू की तरह है। अभी तक किताब का मतलब मैं पाठ्य पुस्तक ही समझता था। मगर पाठ्य पुस्तकों की स्पष्ट ही सीमाएँ थीं। वे अच्छी लगती थीं, पर मन उनके साथ खुलकर बहता नहीं था। एक दूरी, एक परायापन सा था। पर मनमोहन को देखा तो लगा, और पहली बार लगा, कि अखबारी कागज पर छपी एक साधारण सी छपाई वाली पत्रिका भी मन पर जादू कर सकती है! उसमें बहुत सी कहानियाँ थीं, कविताएँ थीं, लेख थे, पहेलियाँ थीं। और वे सब के सब मैं इस कदर चाट गया, जैसे एक भुक्खड़ को बहुत दिनों बाद बढिय़ा भोजन मिला हो, मन और तबीयत के व्यंजन खाने को मिले हों। एक बच्चे की बाल साहित्य से यह पहली मुलाकात थी और वह इस कदर प्रेममयी और रोमांचक थी कि दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी प्रेमकथा को उस पर निछावर किया जा सकता है। एक छोटा सा अबोध बच्चा था और वह पहली बार अपने हाथ-पैर हिलाते हुए मुक्त हवा में तैर रहा था, आसमान में उड़ रहा था और उसे लग रहा था कि यह सारी दुनिया मेरी है, यह आसमान मेरा है। ओह! मेरे घर के दरवाजे-खिड़कियाँ अभी तक बंद थीं। मैंने कभी इस नए जादू और रोमांच को जाना ही नहीं। आज एक छोटी सी पत्रिका, जो कि शायद उन दिनों चवन्नी या अठन्नी की रही होगी, एकाएक उसने वे सारी खिड़कियाँ-दरवाजे खोल दिए कि मैं उडऩे लगा, उड़ता रहा, उड़ता रहा बहुत देर तक। और मैंने महसूस किया मेरे अंदर बहुत सारे आसमान हैं, बहुत सारी सृष्टियाँ हैं, बहुत सारी कल्पनाओं और जिज्ञासाओं का ब्रह्मांड व्याप्त है, उनका आनंद है, और बहुत गहरी संवेदना है जिसे मैं छू सकता हूँ, देख सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ।

मुझे अब भी याद है कि उस मनमोहन में एक राजकुमारी थी जिसकी नाक किसी वजह से लंबी, लंबी, बहुत लंबी होती जा रही थी। यहाँ तक कि वह जंगलों, झाडिय़ों तक चली गई और काँटों से लहूलुहान हो गई। तब उसकी पीड़ा से मैं किस कदर तड़पा और छटपटाया था आपको बता नहीं सकता। फिर उस कहानी का नायक, पता नहीं वह कौन था, उसने कुछ ऐसा किया कि वह नाक छोटी हुई और राजकुमारी फिर राजकुमारी बन गई। वैसी ही राजकुमारी जिसे मैं पहले से जानता था और पसंद करता था। तब मुझे कुछ चैन पड़ा। वरना अब तक तो मेरी साँस ही रुकी हुई थी।

उसके बाद फिर एक और अनुभव। बच्चों की एक और पत्रिका ‘चंदा मामा’ कहीं से हाथ आ गई और उस पूरे अंक में एक रहस्य और रोमांच भरा बाल उपन्यास छपा था। मैंने उसे आधा पढ़ा और फिर आधा वहीं रुक गया, क्योंकि मुझे अपने बड़े भाईसाहब की दुकान पर जाकर उनकी मदद करनी थी। शाम को उन्होंने किसी काम से भेजा,  तो मुझे मुक्ति मिली। मैं दुकान से छूटा तो वह पत्रिका जेब में ही थी और मुझमें इतना धैर्य नहीं था कि कहीं बैठकर उसे पढ़ लूँ। मैं दुकान से निकला और रास्ते में चलते हुए उस किताब को पढऩे लगा। आस-पास रिक्शे-ताँगे, लोगों की भीड़-भाड़, पौं-पौं, पैं-पैं। लेकिन एक बच्चे की अपनी प्रिय पत्रिका से मुलाकात अबाध जारी थी। अब भी याद है, पूरे रास्ते भर मैं उस उपन्यास को पढ़ता गया था। आज सोचकर काँप उठता हूँ कि अगर मेरा एक भी कदम गलत पड़ गया होता तो…? कुछ भी हो सकता था, कुछ भी।

लेकिन बच्चे और बाल साहित्य का जो रिश्ता होता है, वह कुछ अजब सी दीवानगी वाला रिश्ता है। उसमें ये सारी चीजें नहीं चलतीं। और यह दीवानगी न होती, तो दुनिया के हजारों लेखक और लाखों पाठक बार-बार तकलीफें झेलकर भी, यों दौड़-दौड़कर किताबों की दुनिया के नजदीक न जाते। और बच्चों में—मैंने महसूस किया है—यह दीवानगी कहीं अधिक होती है। मैं विनम्रता से कहना चाहूँगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तमाम आतंक के बावजूद आज भी वह है और बनी रहने वाली है।

अब हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में दो बातें। मुझे लगता है, हिंदी के बाल साहित्य पर बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ खानापूर्ति वाली ढेरों चीजें हैं, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएँ भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। निरंकारदेव सेवक, सर्वेश्वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएँ लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्‍व कविता में पांक्तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्रकुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले, दिलीप एम. सालवी और देवेंद्र मेवाड़ी सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। रेखा जैन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और केशवचंद्र वर्मा ने बच्चों के लिए ऐसे दिलचस्प नाटक लिखे जिन्होंने बाल नाटकों की धारा ही बदल दी। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी अद्भुत और रोमांचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से एक मूर्धन्य कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ.जाकिर हुसैन ने बच्चों के लिए बड़ी अद्भुत कहानियाँ लिखीं हैं और वे उपलब्ध हैं। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि कोई उस पर तरस खाए।

एक दूसरी चीज जो मुझे बहुत विचलित करती है वह यह कि आज के बच्चे से जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टँगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके मानो उसे असमय प्रौढ़ बना दिया गया है। सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएँ पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं काँप उठता हूँ।

अब ‘एक था ठुनठुनिया’…! दो-एक बातें इसके बारे में भी कहने का मन है। सच कहूँ तो इस पर प्रथम साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने का पत्र मिला, तो मुझे एक सुखद और अकल्पनीय आश्‍चर्य सा हुआ था। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें,  उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हाँ,  कुछ बाल पाठकों की बहुत उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मुझे याद हैं और उनमें से एक चेहरा भी, जिसने बड़े अटपटे ढंग से लेकिन असाधारण उत्साह से ठुनठुनिया के बारे में अपनी राय बताई थी। ठुनठुनिया उसे भा गया था, और इसे बताते हुए अति उत्साह में वह कुछ हकलाने लगा था। कुल मिलाकर तो बस इतना ही था जिसे मैंने सँजोकर रख लिया और जो मेरे साथ रहेगा। अब उस पर बाल साहित्य के मर्मज्ञों का भी ध्यान गया तो लगा, चलो, इस उपन्यास में कुछ तो है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और वह मेरी तरह उनके साथ भी रह गया। इससे एक तरह की खुशी तो होती ही है।

यों ठुनठुनिया थोड़ा अजीब पात्र है, जिसका परिवेश थोड़ा गँवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ सा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह परिस्थितियों से कतई हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हँसी की फुरफुरियां फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में भी वह पस्त नहीं होता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे न सही, मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आँखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा, इसलिए उसकी समझ बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिलों को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है, इसीलिए चाहे रग्घू खिलौने वाला हो, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला मानिकलाल या फिर गाँव का भारी-भरकम शख्सियत वाला जमींदार, हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की माँ! इसके बारे में तो सिर्फ इतना ही कि उपन्यास में कई प्रसंग हैं, जिन्हें लिख रहा था तो ममता से झुक आई डाली की तरह मेरी माँ सामने थी और ठुनठुनिया मैं था, मैं खुद। बस, अब कुछ और कहना शायद फिजूल है। हाँ, ठुनठुनिया की एक बात शायत सभी पाठकों को अच्छी लगी कि वह जिंदगी में आगे बढ़ता है, मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भुत दुनिया रच डालता है, जिसमें कला-संगीत, नाटक और हँसी-खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूँ तो खुद मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।

अंत में बस इतना और कि मैं जो ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ सरीखे उपन्यासों और आलोचनात्मक लेखों में डूबा हुआ था, बाल साहित्य में शायद कुछ देर से आया। पर आया तो इसका श्रेय सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका और वहाँ के बहुत अच्छे मित्रों और स्नेहिल सहयात्रियों को ही जाता है। हम लोग शायद एक कारवाँ की तरह थे और बुरे वक्तों में भी एक अलग तरह की अबोधता का पूरा आनंद ले रहे थे। ‘नंदन’ में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा, अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तभी जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। पिछले आठ-दस वर्षों से हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने में जुटा हूँ और वह अब लगभग पूरा होने वाला है। वह सामने आए तो लगेगा कि यह जीवन एकदम निरर्थक तो नहीं गया। इसलिए कि उसमें ऐसे अनेक लोगों का जिक्र है जो अनाम मर गए, लेकिन घोर अभावों के बावजूद बाल साहित्य को बेशकीमती नगीने दे गए। यह इतिहास पूरा हो तो लगेगा कि मुझे उन सभी का आशीर्वाद मिल गया है।

(मनुजी को उनके बाल उपन्‍यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर हि‍दी के लि‍ए साहि‍त्‍य अकादमी के पहले बाल साहि‍त्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त कि‍या गया है। उन्‍होंने यह व्‍याख्‍यान सम्‍मान समारोह में दि‍या था।)

मासुमियत के सिक्‍के भले ही कागज के भी हो, चल सकते हैं : जसबीर भुल्‍लर

पंजाबी के लिए साहित्‍य अकादमी का पहला बाल साहित्‍य पुरस्‍कार सुप्रसिद्ध कथाकार जसबीर भुल्‍लर को प्रदान किया गया है। बाल साहित्‍य को लेकर समारोह में दिया गया उनका वक्‍तव्‍य-

हम जरा पीछे की ओर झांकें तो आदिकाल से मांओं, नानियों-दादियों ने मौखिक बाल साहित्‍य को अपनी स्‍मृतियों में संभालकर रखा है और बाल साहित्‍य की किस्‍मों के साथ बच्‍चों को बड़ा किया है।

मौखिक बाल-साहित्‍य की परंपरा अभी समाप्‍त नहीं हुई है।

बचपन में बहुत सारी बातें (कहानियां) मैंने भी सुनी थीं। उन कहानियों का परी-अंश मुझे मोह लेता था, लेकिन ज्‍यादातर वो साहित्‍य बच्‍चों की उम्र से बड़ा होता था। उदाहरण के लिए ‘पंच फूलां रानी’ वाली बात (कहानी) ही ले लो। उस कहानी की रानी को प्रत्‍येक सुबह पांच फूलों से तोला जाता था, लेकिन जिस रात वह रानी कहीं दूर देश के अपने चाहने वाले राजकुमार को मिल लेती थी तो उसका भार पांच फूलों से अधिक हो जाता था। वो कहानी औरत-मर्द के संबंधों की थी, परंतु बच्‍चों को सुनाई जाती थी।

दरअसल, पंजाब की मेरी वाली पीढ़ी के पास सही मायनों में बाल साहित्‍य था ही नहीं। बाल साहित्‍य के नाम पर तब जो कुछ भी उपलब्‍ध था, वो प्रेरणा से खाली था। उस समय की कहानियों में बहुत कुछ तिलिस्‍मी–सा होता था। दीया रगड़ने भर से चहल-पहल हो जाती थी। राख की चुटकी भर से गरीब आदमी राजा बन जाता था। सोना बनाने वाले पत्‍थर मिल जाते थे। गुप्‍त खजाना मिल जाता था।

बाल साहित्‍य के नाम पर जो कुछ भी था, वो सब बच्‍चों को अपाहिज बनाने के लिए था, उन्‍हें संघर्ष करने से रोकता था।

पंजाबी में बाल साहित्‍य का स्‍वतंत्र अस्तित्‍व और सर्जना के सचेत प्रयत्‍न दरअसल स्‍वतंत्रता के पश्‍चात ही समाने आए हैं।

बाल साहित्‍य की सर्जना के आरंभ के दौर में हम ने बच्‍चों को बहुत नुकसान किया है और बाल साहित्‍य का भी। बाल साहित्‍य के नाम पर हम सामाजिक कद्रों-कीमतों की घनी खुराक बच्‍चों को पिलाते रहे हैं। पत्रिकाओं और पाठ्य पुस्‍तकों की जरूरतों की पूर्ति हेतु रचनाएं लिखी गई हैं और उस बचकाने साहित्‍य को हमने बाल साहित्‍य की संज्ञा दी है। बाल साहित्‍य का निर्झर हमने सहज रूप से नहीं बहने दिया।

आधुनिक साहित्‍यकार इसके प्रति चेतन हुआ है। उसने बाल मनोविज्ञान को भी समझने का प्रयत्‍न किया है और बच्‍चों की आवश्‍यकताओं को भी। उसे मालूम है कि दुनिया की कोई ताकत किसी बच्‍चे को उसकी इच्‍छा के विरुद्ध साहित्‍य नहीं पढ़वा सकती। वह पढ़ते हुए सो सकता है, जम्‍हाई ले सकता है और पुस्‍तक को परे हटा सकता है।

जब कोई यूं करता है तो वह अपने ढंग से मुझे बाल साहित्‍य की समझ भी प्रदान कर रहा होता है। वह साफ शब्‍दों में कहता-सा प्रतीत होता है- ‘‘मुझसे जो भी बात करनी है, सरलता से करो, साफ व स्‍प्‍ष्‍ट। कहानी को मुश्किल मत करो। कहानी को पंख लगे होने चाहिए ताकि मैं भी उस कहानी के साथ उड़ पाऊं। आपकी रचना मेरे अंदर इतनी उड़ान भर दे कि मैं किसी ग्रह तक पहुंच सकूं। आप मेरे लिए परी-कथा के दरवाजे भी खोल दो। किसी भी और दुनिया को कोई दरवाजा मेरे लिए बंद न रखो।’’ यह मांग बच्‍चे बाल साहित्‍य के प्रत्‍येक लेखक से करते हैं।

बाल साहित्‍य लिखने के लिए कलम उठाने से पहले मैं अपने बचपन की ओर लौटा था। मेरे बाल साहित्‍य के बीज वहीं पर बिखरे पडे़ थे और मैंने एक-एक करके चुने हैं।

जब मेरे पिताजी थके-हारे अपने काम से लौटते तो कमीज उतार कर खूंटी पे टांग देते थे और कुछ पल आराम के लिए लेट जाते थे। तब मैं चार वर्ष का नन्‍हा बालक उनकी नाभि में से रूई निकालता और उस रूई से रजाई बनाने की कल्‍पना करता।

क्‍या तीन-चार वर्ष का वह बालक कभी उस रूई के साथ रजाई बना पाया। वह बच्‍चा बड़ा हो गया है। इस प्रश्‍न के उत्‍तर में मैं आपके समक्ष खड़ा हूं। देख लो, चाहे मैंने वो रजाई बना ली है। कल्‍पना की इंतहा के साथ मैं कुछ भी बना लूं।

बाल साहित्‍य की बातें करते हुए बचपन की एक घटना मेरे सामने आ गई है, जिसने साहित्‍य की शक्ति का एहसास भी मुझे करवा दिया है।

वह घटना इस प्रकार है-

तब मैं मुश्किल से चार साल का था। मेरी मां धागे से सीने-पिरोने का कुछ काम कर रही थी। धागे का गोला उनके पास ही पड़ा था। उस गोले में गत्‍ते का एक गोल टिक्‍का फंसा पड़ा था। गत्‍ते का वह गोल टिक्‍का पैसे की भांति लग रहा था। उस टिक्‍के पर सुनहरी अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। वो शायद फैक्‍टरी का नाम था, जिसने धागा बनाया था। मुझे लगा गत्‍ते का वह गोल टिक्‍का एक पैसा था जिसे में खर्च कर सकता हूं।

मैं वो पैसा लेकर बाहर की तरफ चल पड़ा। गली के मोड़ पर हलवाई की दुकान थी। गत्‍ते का वो सिक्‍का हलवाई को देकर मैंने गुलाब जामुन की ओर संकेत किया।

हलवाई ने एक बार हाथ में पकड़े गत्‍ते के पैसे की ओर देखा और एक बार मेरी ओर। वह मुस्‍कुराया और दोने में गुलाब जामुन रखकर मेरी ओर सरका दिया।

तब मुझे मालूम नहीं था, लेकिन आज मैं मानता हूं कि मासुमियत के सिक्‍के भले ही कागज के भी हो, चल सकते हैं।

मेरे भीतर का वह बच्‍चा अभी तक जीवित है। मैंने उसे अपने सांसों में बसाया हुआ है। उसकी मासुमियत, सहजता और सादगी बरकरार है… और यही बाल साहित्‍य की शक्ति है।

जिस साहित्‍यकार के भीतर का बच्‍चा समय की गर्दो- गुब्‍बार में कहीं  खो जाता है, उसे बाल साहित्‍य नहीं लिखना चाहिए। उसे बाल साहित्‍य लिखने का कोई अधिकार नहीं है।

मेरे बचपन के पास बाल साहित्‍य की सर्जना हेतु बड़ी उपजाऊ मिट्टी थी। अभी भी मैं उसी मिट्टी से कहानी उगा रहा हूं। उस मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ने कभी भी खत्‍म नहीं होना है।

मैं चाहता हूं बाल साहित्‍य के द्वारा बच्‍चों को सुंदर दुनिया का सपना दूं ताकि वे अपना परी लोक खुद सर्ज सकें। वे अच्‍छे मनुष्‍य बनने के मार्ग की ओर चलते रहें।

बाल साहित्‍य के द्वारा कितनी सुंदर दुनिया बन सकती है, फिलहाल तो हम इसका अनुमान ही लगा सकते हैं।

आज आप सब विशेष रूप में बाल साहित्‍य के जश्‍न में शामिल होने के लिए आए हैं तो बच्‍चों के लिए एक कहानी अपने साथ लेकर जाना।

‘‘अण्‍डे के अंधेरे में जन्‍म ले रहे चूजे ने चोंच के साथ टुक-टुक अण्‍डा तड़क गया, टूट गया और चूजा अण्‍डे से बाहर आ गया। बाहर आकर उस चूजे ने अपने से पहले अण्‍डों में से निकले चूजों को बताया, आज तो कमाल हो गई। एक बहुत बढि़या बात का पता चला है। हमें हमेशा टुक-टुक करते रहना चाहिए, कुछ न कुछ हो जाता है।’’

बस कहानी इतनी ही है। आपने देख ही लिया है कि बाल साहित्‍य की इस टुक-टुक के साथ कुछ हो गया है।