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आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

‘स्कूल’ का नाम लेते ही हम सबके दिल-दिमाग में स्कूल की एक परम्परागत छवि उभरती है जिसमें एक भवन है, शि‍क्षक और शि‍क्षिकाएं हैं, घण्टी है, एक पूर्व निर्धारित कार्य योजना यानी समय सारिणी है, समय सारिणी से संचालित कुछ नीरस जड़ कक्षाएं हैं, और कक्षाओं में हैं डरे सहमे बच्चे। बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं, उनके मन में स्कूल आने की न तो ललक है और न ही उत्साह। उनके फीके चेहरे और स्वप्नहीन सूखी आंखों में उदासी और भय पसरा है। बच्चे जो समाज का भविष्य हैं, लेकिन जिनमें सीखने का आनन्द मर चुका है। क्या नहीं लगता है कि वे बच्चे जिनके कंधों पर परिवार और समाज की एक बड़ी जिम्मेवारी आने वाली है, वे मजबूत, कुशल और अन्दर से कुछ सीख पाने के आनन्द के भाव से भरे-भरे हों।

लेकिन नैराश्‍य की इस स्कूली मरुभूमि में कुछ स्कूल मरूद्यान की भांति जीवन की आस जगाने वाले भी हैं। जहां बचपन कलरव करता है। जहां बच्चों में प्रवाहमान ऊर्जा कुछ नया रचने को आतुर है, जहां कबाड़ में भी कला एवं सृजन के नव आयाम दिखाई पड़ते हैं। जहां कल्पना को विकसित करने को विस्तृत फलक उपलब्ध है और आजादी भी। तो आइए मिलते है दो ऐसे ही स्कूलों से जहां न कोई घण्टी है न कोई समय सारिणी। और हां, कक्षाएं भी नहीं हैं। पहले स्कूल का नाम है- ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल‘ भोपाल। प्रश्‍न उठता है कि आखिर यह कैसा स्कूल है और इसके पीछे क्या उद्देश्‍य रहे होंगे और परम्परागत स्कूलों से यह किन मायनों में अलग हैं।

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल भोपाल।

स्कूल के अकादमिक समन्वयक, अनिल सिंह जानकारी देते हैं, ‘‘शैक्षिक क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था ‘एकलव्य’ में काम करने वाले तीन व्यक्ति प्रमोद मैथिल, राजेष खिंदरी और टुलटुल बिश्‍वास एक ऐसे स्कूल का सपना देख रहे थे, जहां शि‍क्षक और छात्र एक धरातल पर खड़े होकर एक साथ सीखने-सिखाने की यात्रा आरम्भ करें, न कोई आगे न कोई पीछे, सब साथ-साथ बढ़ें, कदम-दर-कदम। जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी बात रखने की पूरी आजादी हो और सवाल उठाने का अधिकार भी। जहां हाथ में हुनर हो और मन में कुछ नया सीख पाने का आत्मविश्‍वास भी। तो तीनों ने मार्च 2012 में 6 बच्चों के साथ ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल’ की शुरुआत की।’’

किराये के भवन में संचालित आनन्द निकेतन स्कूल के एक पूरे दिन की गतिविधियां बच्चों को न केवल रिझाती हैं, बल्कि स्वतः सृजन की ओर उन्मुख भी करती हैं। सुबह का पहला सत्र आरम्भ होता हैं दौड़ भाग और कुछ एक्सरसाईज करने से। लेकिन वहां न तो कोई सीटी होती है न कोई निर्देश, और न पहले से तय कोई टीचर। बस बच्चे अपने मन से जो समझते हैं, उसे करते रहते हैं और एक-दूसरे को देखकर एक क्रम बना लेते हैं। सुबह नौ से पौने दस के बीच स्कूल का छोटा मैदान रंगबिरंगी तितलियों से सज जाता है, क्योंकि बच्चों की कोई यूनीफार्म तय नहीं है और विभिन्न रंगबिरंगी पोषाकों में बच्चे तितलियां और फूल ही तो हैं। सूरज की बढ़ती चमक के साथ ही शुरू होता है ‘मार्निंग गैदरिंग’ के रूप में दिन का संगीतमय, रोचक और मस्ती भरा दूसरा सत्र। इसे हम प्रार्थना सत्र भी कह सकते हैं पर यह परम्परागत स्कूली प्रार्थना सत्र से बिल्कुल अलग और ताजगी भरा है। यहां सब बच्चे मिलकर हर्ष-उल्लास और हास-परिहास के साथ विविध भावों एवं रस से ओतप्रोत गीत गाते हैं। ये गीत हिन्दी सहित विविध भारतीय भाषाओं-बोलियों यथा पहाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, भोजपुरी, बांग्ला, झारखण्डी, तमिल और अंग्रेजी में हैं, जिन्हे बच्चों ने शि‍क्षकों के साथ मिलकर खुद चुना है। इनसे बच्चे न केवल विविध भाषाओं के सौन्दर्य से परिचित होते हैं, साथ ही अपने अनुभव को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन गीतों में जीवन के विविध पक्षों के चटकीले रंग समाहित हैं। प्रकृति से अनुराग एवं सह अस्तित्व है। नदी, पर्वत, धरती, जंगल, पक्षियों से संवाद है। मित्रता है, सबके लिए न्याय है और समानता व समरसता के उदात्त भाव भी। गीतों की सुरीली तान, लय, ताल, स्वरों का आरोह-अवरोह और ढपली एवं ढोलक की थाप। बस मन बंध सा जाता है और एक ऐसे विश्‍व की कल्पना में खो जाता है जहां आनन्द है बस अनिर्वचनीय आनन्द।

आनन्द निकतन डेमोक्रेटिक स्कूल का अगला सत्र ‘पोडियम’ कहलाता है, बच्चों की अपनी बातचीत करने और पिछले दिन के कामों की समीक्षा का सत्र। यह स्कूल की अद्भुत और महत्वपूर्ण गतिविधि है। पिछले दिन स्कूल में क्या कुछ घटित हुआ, कौन सी कहानी-कविता सुनी, कहां गये, क्या चित्रकारी की और उसमें कौन से रंग भरे। कैसा लगा, कौन-सी गतिविधि मजेदार थी और कौन-सी बोरिंग। घर और स्कूल दोनों जगह के अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति यहां देखी जा सकती है। यहां बच्चे लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन का सुमधुर परिवेश बनाते एवं जीते हुए दिखाई देते हैं। अपनी बात कहने और दूसरों की बातें धैर्य से सुनने एवं महत्व देने का पाठ अनायास सीख जाते हैं। स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं हैं, बल्कि उम्र वर्ग के समूह हैं। 3 से 4 वर्ष, 4 से 5 वर्ष, 6 से 8 वर्ष, 8 से 10 वर्ष, और 10 से 12 वर्ष के बच्चों के अलग-अलग पांच समूह है, जिन्हें क्रमश: बटरफ्लाई, बडर्स, स्क्वैरल, पीकॉक और डीयर नाम से जाना जाता है। यह नाम बच्चों ने अपने लिए खुद चुने हैं। बच्चे अपने समूहों में ही पोडियम की गतिविधि करते हैं, जिसमें उनके साथ एक फैसिलिटेटर होता है। फैसिलिटेटर बच्चों की अभिव्यक्ति को पोडियम रजिस्टर में अक्षरश: उनके कहे अनुसार ही दर्ज करता जाता है। बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति का यह मंच स्कूल की ताकत और पहचान है। बच्चों में इससे न केवल अपनी बात रखने का तरीका आया है, बल्कि कहने में निर्भीकता, स्पष्टता और तार्किकता भी बढ़ी है। फैसलिटेटर को भी पिछले दिन की कक्षाओं में की गई गतिविधियों का आभास मिलता है। इस गतिविधि‍ में नित नए प्रयोग होते रहे हैं। शुक्रवार के दिन बड़े बच्चों के लिए स्कूल द्वारा दिए गए या खुद से चुने विषय पर तैयारी करके बोलने की शुरुआत हुई है, इसे बच्चों ने ही आकार दिया है। इसके अतिरिक्त लिखने-पढ़ने की दक्षता वाले बच्चे पिछले दिन का विवरण अपने पोडियम रजिस्टर में लिख कर लाते और पढ़कर सुनाते हैं। पोडियम के लिए बच्चों में उत्सुकता, गंभीरता और उतावलापन बताता है कि यह उनके लिए कितना खास और रुचिपूर्ण सत्र होता है।

पोडियम सत्र के बाद बच्चे नाश्‍ता करने हेतु कुछ देर का अवकाश लेते हैं। फिर प्रारम्भ होता है ‘डे प्लानिंग’ यानी अपने समूहों में दिनभर की योजना बनाने का सत्र। बच्चों की शत-प्रतिशत भागीदारी, आपसी संवाद, नोक-झोक एवं सामान्य तरीके से व्यक्ति और संसाधन की उपलब्धता, सबकी सहमति और सुविधा, व्यावहारिकता, निरंतरता, जरूरत और उपयोगिता के आधार पर बच्चे दिनभर की गतिविधियों की योजना और क्रम तय करते हैं। इससे बच्चों में जहां खुद निर्णय लेने और उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का भाव आता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी रुचि, पसंद और जरूरत को भी जगह दे रहे होते हैं। यहां किए गए निर्णयों में अहम नहीं टकराते, बल्कि सामूहिक निर्णय करने एवं उदारमन से स्वीकारने का संस्कार जन्मता है।

अब बच्चे अपनी तय कार्य योजना के अनुसार विभिन्न अकादमिक कक्षों में जाते हैं, जहां पहले से ही फैसलिटेटर अपनी तैयारी के साथ मौजूद होते हैं। इन अकादमिक कक्षों में विषय की प्रकृति के अनुकूल रिसोर्स मैटेरियल, बच्चों के काम का डिस्प्ले मैटेरियल और दूसरी सहायक शि‍क्षण की सामग्री होती है, जो बच्चों को विषय से सहजता से जोड़ती है। ये कक्ष भी अनूठे हैं, लैंग्वेज एण्ड इन्क्वैरी रूम,  आर्ट एण्ड एस्थेटिक रूम, सेंस ऑफ हिस्ट्री एण्ड सोसाइटी रूम, चाइल्ड साईंटिस्ट रूम और रूम फार न्यूमरेसी एण्ड लाजिक। औपचारिक स्कूली ढांचे में बच्चों की रूढ़ कक्षाएं होती हैं, जिनमें बच्चे सुबह से शाम तक एक ही कक्ष में बैठे रहते हैं और शि‍क्षक आते-जाते रहते हैं। इसके उलट आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल में फैसिलिटेटर अकादमिक कक्ष में होते हैं और बच्चे अपनी योजना के अनुसार उस क्रम से अकादमिक कक्षों में जाते हैं। इससे जहां एक तरफ तो फैसिलिटेटर को अपने कक्ष में तैयारी करने का अवसर मिलता है और वह अपने कक्षों को लगातार बेहतर बना रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को एक अकादमिक कक्ष से निकलकर दूसरे अकादमिक कक्ष में जाने का अवसर मिलता है। वह उन्हें एक विषय की प्रकृति के प्रभाव से निकलकर दूसरे में जाने की सुगमता देता है। कक्ष बदलने से नए अकादमिक कक्ष का वातावरण उस विषय के साथ जीवंत जुड़ाव बनाने में मददगार होता है।

तत्पश्‍चात आधे घंटे के लंच ब्रेक में सभी बच्चे और शि‍क्षक एक साथ बैठकर अपने-अपने टिफिन साझा करते हैं और इस तरह संगत व साथ खाने का मजा लेते हैं। सब्जियों, अचारों, रोटी, पूडी, पराठों का आदान-प्रदान इस सत्र को खास बनाता है। लंच के बाद बच्चे अपनी तय की हुई योजना के अनुसार अकादमिक कक्षों में जाते हैं और अंतिम सत्र में खेलकूद होता है। इसमें शि‍क्षक भी बच्चों के साथ खेलते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों बच्चों के साथ कबड्डी खेलते हुए अनिल जी के बायें हाथ में चोट लगी थी। पर पूरी तन्मयता एवं जिजीविषा के साथ खेलना जारी था, क्योंकि चोटें खेलों का एक हिस्सा ही तो हैं।

स्कूल प्रायः 9 बजे प्रारम्भ होता है और 3 बजे छुट्टी हो जाती है। जरूरत के अनुसार बच्चे 5 बजे तक भी स्कूल में रह सकते हैं और अभिभावक उन्हें सुविधानुसार स्कूल से ले जाते हैं। साढ़े 3 से साढे़ 4 बजे तक फैसिलिटेटर अपनी शेयरिंग मीटिंग में एक-एक बच्चे की भागीदारी और उसकी लर्निंग पर बारीकी से बातें करते हैं। इस मीटिंग में हर फैसिलिटेटर को हर कक्षा के बारे में और हर बच्चे के बारे में जानकारी हो रही होती है। फैसलिटेटर एक दूसरे को फीडबैक और सुझाव भी देते हैं। शनिवार का दिन बड़े बच्चों के लिए स्वतंत्र रूप से अपना काम करने का होता है। इसमें वे अपने असाईनमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, एक्सपेरीमेंट्स या फिर स्पेशल क्लास करते हैं। कोशि‍श होती है कि बच्चों को इसमें फैसिलिटेटर की कम से कम जरूरत पड़े। शनि‍वार का दिन फैसिलिटेटर्स के लिए भी अगले सप्ताह की प्लानिंग, सत्रों और गतिविधियों के लिए शि‍क्षण सामग्री निर्माण करने और बच्चों के पोर्टफोलियो (स्टूडेण्ट्स फाईल) अपडेट करने का दिन होता है। हर क्षण ऊर्जा और रचनात्मकता से भरा हुआ दिन सभी को बेहतर करने को उत्साहित और प्रेरित करता है।

आनन्द निकेतन स्कूल के बारे में बताते हुए अनिल सिंह कहते हैं, ‘‘जीवन का लक्ष्य है आनन्द प्राप्त करना, लेकिन परम्परागत शि‍क्षा में खुशी के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए एक ऐसी जगह बनाने की जरूरत थी जहां बच्चे खुश रह सकें। टीचर्स और अभिभावक भी आनन्द ले सकें। स्कूल बच्चों के लिए उनके घर का विस्तार हो। और सबसे बढ़कर अपने लिए खुद तय करने के मौके हो। उसी सोच का परिणाम है- आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। कक्षा आठवीं तक की मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में आज 65 बच्चे अध्ययनरत हैं जो विविध सामाजिक स्तर एवं आय वर्ग से आते हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यवसायी, कर्मचारी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के बच्चे एक समावेशी और बालमैत्री पूर्ण परिवेश में 5 शि‍क्षकों के साथ विविध गतिविधियों के माध्यम से हर पल सीखते-सिखाते हैं। यहां पाठ्यपुस्तकों का बंधन, अनुशासन की जकड़न, बोझिल नीरस कक्षाएं, बस्ते का बोझ और परीक्षाओं का भय नहीं है, बल्कि एक प्रकार का खुलापन है, आजादी है, हक है और मौके हैं। कुछ सत्रों में प्रायः अभिभावक भी शामिल होते हैं। सतत् और व्यापक मूल्यांकन पद्धति है। हर बच्चे की प्रोफाईल है जिसमें स्कूल में बच्चे की सत्रों में सहभागिता, अन्य बच्चों एवं शि‍क्षकों से व्यवहार एवं उसके रुझान, अभिव्यक्ति, अभिभावकों व सहपाठियों के विचार आदि के समग्र प्रदर्शन के आधार पर सामूहिक निर्णय होता है। यहां बच्चे को उसकी रुचि और समझ अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है। सच कहूं तो यहां हम सब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और सीखने-सिखाने की कोई जल्दबाजी भी नहीं है।’’

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल की अधिगम की इस रसवती धारा में बच्चे और शि‍क्षक अवगाहन कर नित नवीन तौर तरीके विकसित करते रहेंगे। मुझे विश्‍वास है- स्कूल का परिवेश बच्चों के मधुर हास्य और कोमल सृजन से सदैव जीवन्त बना रहेगा। प्रेम, न्याय एवं समतायुक्त एक अहिंसक लोकतांत्रिक समाज रचना की ओर उनके अनथके कदम बढ़ते रहेंगे।

इधर लगभग दो दशकों से शि‍क्षा विषेशकर प्राथमिक शि‍क्षा क्षेत्र की चुनौतियों एवं सतह पर उभरे सवालों से जूझते हुए समाधान की दिशा में सार्थक कदम बढ़े हैं। इस पहलकदमी को शि‍क्षा की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ये प्रयास जहां सरकारी स्तर पर राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शि‍क्षा अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसमें स्कूलों में ढांचागत बदलाव करते हुए किसी बच्चे की शि‍‍क्षा प्राप्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने की एक कोशि‍श की गई हैं, वहीं विस्तृत शैक्षिक फलक पर निजी प्रयासों से भी शि‍क्षा के गुणात्मक सुधार हेतु कुछ उल्लेखनीय नवीन प्रयास हुए है। आपको ऐसे ही एक स्कूल से परचित कराने जा रहा हूं जिसने प्राथमिक शि‍क्षा की परम्परागत छवि, शि‍क्षण एवं मूल्यांकन पद्धति तथा धारणा को न केवल तोड़ा है, बल्कि एक विकल्प भी प्रस्तुत किया है। हालांकि उसके नाम से कहीं दूर-दूर तक भी आभास नहीं होता कि यह किसी स्कूल का नाम है। आप नाम जानना चाहेंगे ? तो लीजिए नाम हाजिर है- ‘इमली महुआ’। पड़ गए न आप अचरज में कि यह कैसा नाम है, क्या कभी ऐसा भी नाम होता है किसी स्कूल का। पर यह सच है और इमली महुआ स्कूल ने अपने प्रदर्शन से एक राह बनायी है जिस पर चलकर विद्यालयों की एक कैदखाने की बन गई छवि से मुक्ति पाकर बालमैत्रीपूर्ण लोकतांत्रिक परिवेश रचा जा सकता है।

इमली महुआ स्कूल के बारे में जानकारी देते हुए संस्थापक प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘इमली महुआ स्कूल छत्तीसगढ़ राज्यान्तर्गत बस्तर के जंगल के बीच कोंडागांव जिला के मुरिया एवं गोंड़ जनजाति बहुल गांव बालेंगापारा में स्थित है। पास में तीन गांव है- कोकोड़ी, कोदागांव और जगड़हिन पारा। ये सभी गांव स्कूल से 3 से 4 किमी की दूरी पर हैं। यह स्कूल नर्सरी से कक्षा 8 तक संचालित हैं। वर्तमान सत्र में 40 बच्चे अध्ययनरत हैं, जो 3 से 15 आयु वर्ग के हैं। वर्तमान में स्कूल का अपना भवन है, पर स्कूल की शुरुआत ‘घोटुल’ में 2 बच्चों, जिसमें एक लड़की थी, और 3 शि‍क्षकों के साथ अगस्त 2007 में हुई थी। यहां कोई परीक्षा नहीं होती है। स्कूल को वित्तीय मदद ‘आकांक्षा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चैन्नै’  द्वारा दी जाती है, जोकि एक सत्र में अधिकतम 60 बच्चों के लिए निश्‍चि‍त है। स्कूल के तीन चौथाई बच्चे मुरिया एवं गोंड़ जनजाति के हैं। शेष बच्चे अनुसूचित और पिछड़ी जातियों यथा कलार, गांडा एवं पनका जाति समूहों से सम्बंधित हैं। 90 प्रतिषत बच्चे पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं।’’

इसके पहले कि मैं इमली महुआ स्कूल के बारे में विस्तार से बात करूं, मुझे लगता है कि हम उस आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को समझने का प्रयास करें जिनके बीच ‘स्कूल’ काम कर रहा है। इससे जहां हम एक ओर आदिवासी जीवन के रीति-रिवाज, ज्ञान, परम्परा एवं विश्‍वास की एक झलक देख सकेंगे, साथ ही स्कूल की राह आ रही कठिनाइयों, चुनौतियों एवं शि‍क्षकों के समर्पण को भी जान-समझ सकेंगे। आजादी के 68 साल बाद भी बालेंगापारा का चतुर्दिक वनवासी जीवन विकास से दूर एवं आधुनिकता से अछूता है। वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीते हैं। अपनी आजीविका एवं भोजन के लिए वे खेती और शि‍कार पर आश्रित हैं। मछली पकड़ना, छोटे जानवरों खरगोश, सुअर आदि का शि‍कार करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। पशुपालन भी करते हैं, पर दूध के लिए नहीं, बल्कि गोश्‍त के लिए। क्योंकि आदिवासी समाज दूध पर बछड़े का ही हक मानता हैं, मनुष्‍य का नहीं। आदिवासी समाज अपने बच्चों के साथ इज्जत से बर्ताव करता है। माता-पिता बच्चों के स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। छोटे बच्चों से काम नहीं करवाया जाता हालांकि बच्चे अपने बड़ों को काम करते हुए देखकर काम करने का तरीका सीख जाते हैं और बड़े होने पर उनकी मदद करते हैं। आदिवासी समाज में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। परस्पर सहयोग भावना इन्हें मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी भावना को सम्मान देते हुए स्कूल में भी कोई प्रतिस्पर्धा आयोजित नहीं की जाती। आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर स्कूल बन्द कर दिया जाता है क्योंकि वे स्कूल को खुशि‍यों का घर मानते हैं और ऐसे मौके पर स्कूल खोलना उनके प्रति असंवेदना का ही प्रदर्शन होगा। आदिवासी समाज, विशेषरूप से मुरिया और गोंड जानजातियों में अपने बच्चों को परम्परागत ज्ञान,  नृत्य,  संगीत एवं कला सीखने-सिखाने की संस्था ‘घोटुल’ होती है, जिसमें एक बड़े कुटीर में सभी युवक-युवतियां शाम से सुबह तक निवास करते हैं। इसमें अपना जीवन साथी चुनने की भी छूट होती है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहां वे पारिवारिक और सांसारिक समझ विकसित करते हैं। हालांकि यह चलन शहरी संस्कृति के दबाव एवं बाहरी लोगों के दखल से अब बहुत कम हो गया है।

इमली महुआ स्कूल।

विद्यालय का आरम्भिक नाम रखा गया था ‘इमली महुआ नई तालीम सेण्टर फार लर्निंग’। पर यह बच्चों के लिए याद कर पाने और बोलने के लिए बहुत लम्बा था, तो बच्चो ने आपसी निर्णय से एक नया नाम चुना- ‘इमली महुआ स्कूल’। स्कूल बारहों महीने सोमवार से शनिवार प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक लगता है। हरेक बच्चे का नाम किसी न किसी कक्षा में अंकित होता है, पर बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक स्कूल में कक्षाओं की बजाय आयु आधारित बच्चो के चार समूह थे जो सपरी (3-5 वर्ष), सेमर (7-12 वर्ष), सीताफल (8-10 वर्ष) और सूरजमुखी (11-15 वर्ष) नाम से पहचाने जाते थे। यहां पढ़ाये जाने वाले विषयों में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी, विज्ञान, पर्यावरण शि‍क्षण/सामाजिक बदलाव, योग, संगीत, मिट्टी का काम, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई जैसे विषय शामिल हैं। स्कूल के शि‍क्षण की माध्यम भाषा हिन्दी के और हल्बी हैं। क्लास बच्चों की मांग पर होती है। बोर होने पर बच्चे मना कर देते हैं। बच्चे रोजाना कई अलग-अलग तरह की गतिविधियां करते हैं और पढ़ाई भी उन्हीं का एक हिस्सा है। लूडो, कैरम, सांप-सीढ़ी, शतरंज, क्रिकेट के साथ ही लकड़ी के गुटकों और मांटेसरी की शैक्षिक सामग्री से भी अनेक आकृतियां बनाते-बिगाड़ते हुए बच्चे खेलते रहते हैं। दरअसल, यह खेलना भी एक प्रकार का सीखना है। कुछ बच्चे दिनभर खेलते हैं। स्कूल में न तो घण्टी बजती है, न स्कूल का गेट बंद होता है। बच्चे कभी भी आ सकेते हैं और जब चाहें घर जा सकते हैं। समय का आकलन सूरज को देखकर कर लेते हैं। बड़े बच्चे घर का काम करके आते हैं। यहां कक्षाएं और टाइम टेबिल का बंधन नहीं हैं। खुला सत्र भी होता है जिसमें बच्चे कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं। हर बच्चा अलग-अलग चीजें करता है। एक ही समय में कुछ बच्चे सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी का काम करते हैं तो कुछ तबला-हारमोनियम पर अभ्यास कर रहे होते हैं। हम प्रत्येक दिन छोटी चैकियों पर बहुत सारी किताबें और लर्निंग मैटेरियल इस तरह से बिछा देते हैं कि बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें और तब वे अपनी रुचि एवं सुविधा अनुसार सामग्री चुन लेते हैं और शि‍क्षक के साथ काम करते हैं। फिर दो घण्टे बाद मिलते हैं तब हाजिरी ली जाती है और बातचीत करते हैं। दोपहर का समय सामूहिक भोजन का समय होता है। बच्चे भोजन अपने घरों से लाते हैं, पर हरेक दिन कुछ बच्चे टिफिन नहीं ला पाते, तब स्कूल से उतनी थालियां ली जाती हैं और सभी बच्चे एवं शि‍क्षक अपने टिफिन में से भोजन का थोड़ा हिस्सा थालियों में क्रमश: रखते जाते हैं। इस प्रकार टिफिन साझा करते हुए बच्चे भोजन का आनन्द लेते हैं। सप्ताह में एक बार पूरे स्कूल का एक साथ लाईब्रेरी क्लास होती है जहां बच्चे पुस्तकों को पढ़ने के साथ-साथ उनका रखरखाव, रजिस्ट्ररों में पुस्तकें दर्ज करने एवं उनको एक पहचान संख्या देने, पुस्तकें निर्गत करने एवं जिल्दसाजी करने जैसे काम सीखते हैं। गत सत्र में पास के सरकारी स्कूल के बच्चे भी शामिल हो जाते थे, लेकिन अब उनका आना बन्द हो गया है।

शुक्रवार के दिन स्कूल आधे दिन का होता है और शुरुआत सामूहिक गान से होती है। उसके बाद स्कूल की सफाई, रखरखाव, मरम्मत और सामान की गिनती का वक्त होता है जिसमें बाल्टी, मग, लोटा, झाड़ू आदि की गिनती होती है। कच्चे फर्श की गोबर से लिपाई की जाती है। साढ़े दस बजे तक ये काम निबटाने के बाद सामूहिक नाश्‍ते का समय होता है और तब चने, मौसमी फल, खजूर, आदि मिल बांटकर खाते हैं। वैसे कुछ साल पहले तक शुक्रवार की दोपहर के बाद का समय हाट जाने का होता था और सूरजमुखी समूह के बच्चे अपने बनाये हुए मिट्टी के काम- खिलौने, घड़े आदि बाजार बेचने जाते थे और स्कूल के लिए सप्ताह भर का राशन एवं हरी सब्जियां लाते थे, पर अब इसमें बदलाव किया गया है और लगातार बदलाव करते रहना ही इमली महुआ की खूबी है। लेकिन ये बदलाव बच्चों का सामूहिक निर्णय है जो संवाद आधारित होता है। स्कूल में बच्चे अपनी दिनचर्या खुद तय करते हैं। पढ़ने के लिए कोई भी किसी बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता। प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘यहां हरेक को छूट और स्वतंत्रता है। आजादी के कारण हम फलते-फूलते हैं और उसके अभाव में मुरझाते हैं।’’

शनिवार का दिन बाहर घूमने का दिन होता है। छोटे बच्चे दो समूहों में जंगल या किसी पहाड़ी पर पिकनिक मनाने जाते हैं। बड़े बच्चे साईकिल से आसपास के गांवों, महत्वपूर्ण इमारतों, सांस्कृतिक स्थानों की यात्रा पर जाते हैं। यह यात्रा 20 से 50 किमी तक की हो सकती है। स्वाभाविक है कि वापसी पर वे अपने अनुभव लिखते हैं और अन्य बच्चों के साथ साझा करते हैं। रविवार का दिन आराम और आगामी कार्य योजना बनाने का होता है। एपीसीटी  की ओर से प्रत्येक बच्चे को छात्रवृत्ति दी जाती है, जो बच्चे और उसकी मां के संयुक्‍त खाते में जमा की जाती है।

स्कूल की अब तक की शैक्षिक-सामाजिक यात्रा पर खुशी जताते हुए प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘आदिवासी बच्चों को ऐसी शि‍क्षा दी जाए, जिससे उनकी विशि‍ष्‍ट सभ्यता बरकरार रहे और नई समस्याओं एवं चुनौतियों से निबटने की कुशलता पैदा हो। तीन-चार साल तक शि‍क्षण पद्धति शि‍क्षक केन्द्रित थी और बच्चों के हित का निर्णय शि‍क्षकों के हाथ में था। लेकिन स्कूल ने देखा कि आदिवासी जीवन में हरेक व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो स्कूल ने भी बदलाव किया। अब यहां किसी मुद्दे पर सबकी राय ली जाती है और एक सामूहिक निर्णय लिया जाता है। हरेक का एक वोट निश्‍चि‍त होता है। समय-समय पर निर्णयों की समीक्षा भी होती है। साल में एक बार बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं ताकि बच्चे शहरी जीवन की वास्तविकता को नजदीक से समझ सकें। अमीर से अमीर व्यक्ति के घर ले जाते हैं और गरीब व्यक्ति के घर भी। पिछलें दिनों कुछ रेड लाईट एरिया और रैनबैक्सी के मालिक के बंगले पर ले गए थे। फुटपाथ पर जिंदगी जीते लोगों से भी भेंट होती है ताकि बच्चों का अनुभव विस्तृत हो सके और बडे़ होने पर बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को कहीं अधिक गंभीरता के साथ निर्वाह कर सकें। हम यहां हमेशा के लिए नहीं आए हैं। वर्ष 2030 तक हम यहां रहेंगे, पर हमें विश्‍वास है, तब तक स्कूल संचालन के लिए पर्याप्त लोग तैयार हो चुके होंगे।’’

‘इमली महुआ स्कूल’ के परिवेश में लोक का संस्कार है और जीवन का लययुक्त प्रवाह भी। यहां श्रम के प्रति सम्मान है तो जिजीविषा का आह्वान भी। यहां बच्चों को उनके बालपन के निश्‍छल व्यवहार के साथ जीने की स्वीकृति है न कि पग-पग पर बड़ों का हस्तक्षेप और आपत्ति। यहां पल-पल रचनात्मक उत्साह और उल्लास है और कुछ नया गढ़ पाने का विश्‍वास भी। यहां के प्रयोग को हम प्राथमिक शि‍क्षा के क्षेत्र में एक सार्थक पहल के रूप में देख सकते हैं।

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन : अनुपम मिश्र

अनुपम मि‍श्र

अनुपम मि‍श्र

सेंट्रल इंस्‍टीट्यूट ऑफ एजूकेशन के 67वें स्थापन दि‍वस के अवसर पर 19 दि‍संबर 2014 को दि‍या गया अनुपम मि‍श्र का भाषण-

कोई एक सौ पचासी बरस पहले की बात है। सन् 1829 की। कोलकाता के शोभाबाजार नाम की एक जगह में एक पाठशाला की, स्कूल की स्थापना हुई थी। यह स्कूल बहुत विशिष्ट था। इसकी विशिष्टता आज एक विशेष व्यक्ति से ही सुनें हम। विनोबा इस स्कूल में 21 जून सन् 1963 में गए थे। उन्होंने यहां शिक्षा को लेकर एक सुन्दर बात-चीत की थी। उसके कुछ हिस्से हम आज यहाँ दुहरा लें और फिर आगे की बात-चीत इसी किस्से से बढ़ सकेगी।

विनोबा कहते हैं कि इस स्कूल से कई महान विद्यार्थी निकले हैं। इनमें पहला स्थान शायद रवीन्द्रनाथ का है। उनकी स्मृति में इस स्कूल में एक शिलापट्ट भी लगाया गया है। स्कूल इस पट्ट में बहुत गौरव से बताता है कि यहाँ रवीन्द्रनाथ पढ़ते थे। यह बात अलग है कि उस समय रवीन्द्रनाथ को भी मालूम नहीं था कि वे ही ‘रवीन्द्रनाथ’ हैं। और न स्कूल वालों को, उनके संचालकों को मालूम था कि वे आगे चल कर ‘रवीन्द्रनाथ’ होंगे।

यह स्कूल गुरुदेव का आदरपूर्वक स्मरण करता है। लेकिन गुरुदेव भी उस स्कूल का वैसे ही आदर के साथ स्मरण करते हों- इसका कोई ठीक प्रमाण मिलता नहीं। हाँ, एक जगह उन्होंने यह जरूर लिखा है कि, मैं पाठशाला के कारावास से मुक्त हुआ, स्कूल छोड़कर चला गया। यानी इस स्कूल में उनका मन लगा नहीं। चित्त नहीं लगा। पर स्कूल वालों ने तो अपना चित्त उन पर लगा ही दिया था।

विनोबा फिर इस प्रसंग को स्कूल से बिलकुल अलग एक और संस्था से जोड़ते हैं। स्कूल संस्था है गुणों के सर्जन की तो यह दूसरी संस्था है दुर्गुणों के विसर्जन की। जीवन में कुछ भयानक गलतियाँ, भूले हो जाएँ तो ऐसा माना जाता है कि उन भूलों को, गलतियों को मिटाने का काम इस संस्था में होता है। यह संस्था है कारावास, जेल। इसमें सामान्य अपराधियों के अलावा सरकारें, सत्ताएँ, तानाशाह आदि कई बार ऐसे लोगों को भी जेल के भीतर रखते हैं, जो उस दौर की सत्ता के हिसाब से कुछ गलत काम करते माने जाते हैं। पर बाद में तो समाज उन्हें अपने मन में एक बड़ा दर्जा दे देता है।

विनोबा कहते हैं कि जिस किसी कारावास में बड़े-बड़े लोग बन्दी बनाकर रखे जाते हैं, बाद में उन लोगों के नाम भी वहाँ एक पत्थर पर, एक बोर्ड पर लिख दिए जाते हैं। वे यहाँ थे- इस पर कारावास को बड़ा गौरव का अनुभव होता है और वह उसे अब सार्वजनिक भी कर देना चाहता है।

नैनी जेल में नेहरूजी, यरवदा जेल में गाँधीजी और मंडाले में लोकमान्य तिलक और साउथ अफ्रीका की ऐसी ही किसी जेल में नेल्सन मंडेला का नाम पत्थर पर उत्कीर्ण मिल जाएगा।

स्कूल और कारागार तो एक-दूसरे से नितान्त भिन्न, एकदम अलग-अलग संस्थाएँ होनी चाहिए- एकदम अलग-अलग स्वभाव की व्यवस्थाएँ होनी चाहिए। इन्हें चलाने वाली बातें अलग भी होनी चाहिए। कारागार की समस्याएँ भी पूरी दुनिया में लगभग एक-सी हैं और स्कूल की समस्याएँ भी लगभग एक-सी। कारागार में सुधार होना चाहिए- इसे कहते सब हैं, मानते सब हैं, पर कभी एकाध किरण चमक जाए, दो-चार योगासन सिखा दिए जाएँ, हॉलीवुड और उसी की तर्ज पर बॉलीवुड भी एकाध फिल्म बना दे- इससे ज्यादा कुछ हो नहीं पाता। कारागार सुधर नहीं पाते और कभी तो लगता है कि हमारे स्कूल तक वैसे बनने लगते हैं। किसी भी महीने के अखबार पलट लें, स्कूलों में क्या-क्या नहीं हो रहा।

रवीन्द्रनाथ ने विनोबा के शब्दों में कहें तो सदोष और तंग तालीम के कारण अपने स्कूल को कारावास कहा था। लेकिन विनोबा पूछते हैं कि इन स्कूलों में यदि आज भी ऐसी ही तालीम दी जाती है तो सोचने की बात है आखिर इनका सुधार कब होगा। स्कूल ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चे मुक्त मन से सीखें।

तो इसी कठिन काम में, स्कूलों को कारागार न बनने देने में आप सब लोग जुटे हैं। न जाने कब से लगे हैं। यह संस्था, सीआईई शिक्षण के विराट संसार में अभिनव प्रयोगों को प्रोत्साहन देने के लिए ही बनी थी। इसके उद्घाटन के अवसर पर मौलाना आजाद का दिया गया भाषण अभी भी हमारी धरोहर की तरह है। पढ़ना, पढ़ाना और पढ़ाने वालों को पढ़ाना- ऐसी तीन स्तर की स्कूल व्यवस्था में क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या कमी है, क्या अच्छाई है- यह तो आप सब मुझसे बेहतर ही जानते हैं। मैं उस काम के लिए यों भी अयोग्य ही साबित होऊंगा। खुद पढ़ने में, पढ़ाने में मेरी कोई खास गति नहीं थी। पुराने किस्से-कहानियों में नचिकेता का किस्सा मुझे बचपन में बहुत भा गया था। नचिकेता की मृत्यु विषयक जिज्ञासा, यम से उस बालक का संवाद आदि बातों से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। उस कहानी में एक जगह नचिकेता, जिसे स्वागत भाषण कहते हैं- वैसे कुछ बुदबुदाता है। उसी बुदबुदाहट में यह पता चलता है कि नचिकेता कोई बहुत होशियार छात्र नहीं रहा है। न वह अगली पंक्ति का छात्र था और न कोई पिछली पंक्ति का। जरा औसत किस्म का छात्र था वह। मैं भी ऐसा ही औसत दर्जे का छात्र रहा, पढ़ाई के अपने पूरे दौर में।

इस औसत दर्जे पर मैंने और आगे सोचा। कोई अध्ययन जैसा, निष्कर्ष जैसा काम तो नहीं किया पर इसे दूसरी पीढ़ी को भी सौंपने का काम सहज ही कर लिया था मैंने।

प्राथमिक शिक्षा के दौर में अपने जीवन की जब पहली परीक्षा देकर मेरा बेटा कुछ चिन्तित-सा घर लौटा तो मैंने पूछ ही लिया था कि क्या बात है ऐसी। उत्तर था पर्चा अच्छा नहीं हुआ। वह और आगे कुछ बताता, उससे पहले ही मैंने पूछा कि तुम्हारी कक्षा में और कितने साथी हैं। उत्तर था- चालीस।

तब तो किसी-न-किसी को चालीसवाँ नम्बर भी आना पड़ेगा। वह तुम भी हो सकते हो। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं होगी और तुम्हें भी नहीं होनी चाहिए।

यह जो नम्बर गेम चल पड़ा है, इसका कोई अन्त नहीं है। कृष्ण कुमारजी ने बहुत पहले एक सुन्दर लेख लिखा था, शायद आज से कोई छह बरस पहले- जीरो सम गेम। इस खेल में किसी को कोई लाभ नहीं हो रहा, लेकिन हमारी एक-दो पीढ़ियों को तो इसमें झोंक ही दिया गया है।

घर का कचरा तो कभी-कभी दरी के नीचे भी डाल कर छिपा दिया जाता है पर समाज में यदि यह भावना बढ़ती गई कि 90 प्रतिशत से नीचे का कोई अर्थ नहीं तो हर वर्ष हमारी शिक्षण संस्थाओं से निकले इतने सारे, असफल बता दिए गए छात्र कहाँ जाएँगे। कितनी बड़ी दरी चाहिए नब्बे प्रतिशत से कम वाले इस नए कचरे को छिपाने के लिये? मीटरों नहीं किलोमीटरों लंबी-चौड़ी दरी। लगभग पूरा देश ढँक जाए इतनी बड़ी दरी बनानी पड़ेगी। फिर दरी के नीचे छिपे नब्बे के नीचे वाले भला कब तक शान्त बैठेंगे- दरी में वे जगह-जगह छेद करेंगे, उसे फाड़ कर ऊपर झांकेंगे।

मैंने तय किया था कि आज आप सबके बीच में दो ऐसे स्कूलों का किस्सा रखूँगा जो इस 90-99 के फेर से बचे रहे। इनमें से एक तो ऐसा बचा कि उसने 90-99 के फेर को अपने आस-पास के लोगों तक को ठीक से समझाया और एक ऐसा काम कर दिखाया जो हम खुद भी नहीं कर पाते- उसने समाज में अच्छी शिक्षा के दरवाजे खोले, मगर अपने दरवाजे बन्द कर दिए।

99 का फेर हमारे बच्चों में अपूर्णता की ग्लानि भरता है। वह उन्हें जताता रहता है कि इससे कम नम्बर आने पर तुम न अपने काम के हो, न अपने घर के काम के और न समाज के काम के। फिर वे खुद ऐसा मानने लगते हैं, उनके माता-पिता भी उन्हें इसी तरह देखने लगते हैं। फिर ये तीनों विभाजन एक ही रूप में समा जाते हैं। वह रूप है रोज-रोज बढ़ता बाजार। तुम बाजार के काम के नहीं। तुम पूरे नहीं हो, पूर्ण नहीं। अपूर्ण हो। निहायत बेवकूफ हो। खुद पर भी बोझा हो, हम पर भी बोझा। हर साल ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जो बताते हैं कि 99 न आ पाने का, अपूर्णता का बोझा कितना भारी हो जाता है कि उस बोझ को उठाकर जीवन जीने के बदले इन कोमल बच्चों को, किशोर छात्रों को अपनी जान दे देना, आत्महत्या करना ज्यादा ठीक लगता है।

उन स्कूलों पर आने से पहले एक बार फिर विनोबा का सहारा ले लें। वे रवीन्द्रनाथ के स्कूल वाले प्रसंग में ही एक बहुत ऊँची बात कहते हैं। वे बच्चों को भी उतना ही पूर्ण मानते हैं, जितने पूर्ण उनके माता-पिता हैं। वे ईशउपनिषद के पूर्णमदः पूर्णमिदम का उल्लेख करते हैं। यह भी पूर्ण, वह भी पूर्ण। माँ-बाप भी पूर्ण, बच्चे भी पूर्ण और उनके शिक्षक भी पूर्ण। यदि माँ-बाप की अपूर्णता देखकर बच्चे को शिक्षा दोगे तो पहले तो छात्र अपूर्ण दिखेगा और फिर माँ-बाप शिक्षक में भी अपूर्णता देखने लगेंगे।

यह जरा कठिन-सी बात लगती है- पूर्णता और अपूर्णता की। लेकिन बच्चे को पूर्ण समझ कर तालीम देने लगें तो कल शिक्षण का ढँग ही बदल जाएगा। विनोबा कहते हैं कि‍ इसके लिए बच्चे के आस-पास की सारी सृष्टि आनन्दमय होनी चाहिए। स्कूल भी आनन्दमय होना चाहिए। तब स्कूल में छुट्टी का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह कोई सजा तो नहीं है। वह तो आनन्द का विषय है।

ऐसी बातें ‘दूर की कौड़ी’ लगेंगी। पर समय-समय पर अनेक शिक्षाविदों ने, शिक्षा शास्त्रियों ने, क्रान्तिकारियों तक ने, उन सबने जिनने समाज की शिक्षा पर कुछ सोचा-समझा था- उनने आकाश कुसुम जैसी कल्पनाएँ की तो हैं। उनके नाम देशी भी हैं, विदेशी भी। पढ़ाने का पूरा शास्त्र जानने वाले आप सब उन नामों से मुझसे कहीं ज्यादा परिचित हैं। और इसमें भी शक नहीं कि निराशा के एक लम्बे दौर में साँस लेते हममें से ज्यादातर को लगेगा कि ऐसा होता नहीं है।

लेकिन दून या ऋषि जैसे परिचित नामों से अलग हट कर पहले हम एक गुमनाम स्कूल की यात्रा करेंगे आज।

स्कूल का नाम नहीं पर वहाँ पहुंचने के लिए कुछ तो छोर पकड़ना पड़ेगा न। इसलिए गाँव के नाम से शुरू करते हैं यह यात्रा। गाँव है- लापोड़िया। जयपुर जिले में अजमेर के रास्ते मुख्य सड़क छोड़कर कोई 20-22 किलोमीटर बाएँ हाथ पर।

यहाँ नवयुवकों की एक छोटी-सी टोली कुछ सामाजिक कामों में, खेलकूद में, भजन गाने में लगी थी। गाँव में एक सरकारी स्कूल था। पर सब बच्चे उसमें जाते नहीं थे। शायद तब सरकार को भी ‘सर्व शिक्षा अभियान’ सूझा नहीं था। गाँव में पुरखों के बने तीन बड़े तालाब थे, पर वे न जाने कब से टूटे पड़े थे। बरसात होती थी पर इन तालाबों में पानी नहीं टिकता था। अगल-बगल से बह जाता था। इन्हें सुधारे कौन। पंचायत तो ग्राम विकास की योजनाएँ बनाती थी! और उन योजनाओं में यह सब तो आता नहीं था।

गाँव में पशु- बकरी, गाय, बैल काफी थे। और चराने के लिए ग्वाले थे। ग्वाले ज्यादातर बच्चे ही थे, किशोर, जिन्हें आप सब शायद ‘दूसरा दशक’ के नाम से भी जानते हैं। गोचर था जरूर पर हर गाँव की तरह इस पर कई तरह के कब्जे थे। घास-चारा था नहीं वहाँ। इसलिए ये ग्वाले पशुओं को दूर-दूर चराने ले जाते थे।

नवयुवकों की छोटी-सी टोली इन्हीं बच्चों में घूमती थी। किसी पेड़ के नीचे बैठ उन्हें भजन सिखाती, गीत गवाती। इस टोली के नायक लक्ष्मण सिंह जी से आप पूछेंगे तो वे बड़े ही सहज ढंग से बताते हैं कि कोई बड़ा ऊँचा विचार नहीं था हमारे पास। न हम नई तालीम जानते थे, न पुरानी तालीम और न किसी तरह की सरकारी तालीम। शिक्षा का कहने लायक कोई विचार हमें पता नहीं था।

यह किस्सा है सन् 1977 का। दिन भर ऐसे ही गाते-बजाते पशु चराते। एक साथी थे गोपाल टेलर। इतनी अंग्रेजी आ गई थी कि दर्जी के बदले टेलर शब्द ज्यादा वजन रखता है बस। तो गोपाल टेलर को लगा कि दिन में तो ये सब काम होते ही हैं, रात को एक लालटेन जला कर कुछ लिखना-पढ़ना भी तो सीखना चाहिए।

सरकारी स्कूल था पर उसमें तो भरती होना पड़ता था, रोज दिन को जाना पड़ता था। रात को कोई क्यों पढ़ाएगा? सरकारी शाला के समानान्तर कोई रात्रि शाला खोलने जैसी भी कोई कल्पना नहीं थी। सरकार के टक्कर पर कोई प्राइवेट स्कूल भी खोलने की न तो इच्छा थी, न हैसियत। लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि अच्छे विचारों को उतारने में समय लगता है, मेहनत लगती है, साधन लगते हैं- यह सब भी हमें कुछ पता नहीं था। नहीं तो हम तो इस सबसे घबरा जाते और फिर कुछ हो नहीं पाता। हमारे पास तो बस दो चीजें थीं- धीरज और आनन्द।

गाँव को पता भी नहीं चला और गाँव में सरकारी स्कूल के रहते हुए एक ‘और’ स्कूल खुल गया। हमें भी नहीं पता चला कि यह कब खुल गया। स्कूल खुल ही गया तो हमें पता चले उसके गुण। कौन से गुण और क्या ये सचमुच गुण ही थे। यह सूची बहुत लम्बी है। आप जैसे शिक्षाविद इन पर काम करेंगे तो हमें इन गुणों को और भी समझने का मौका मिलेगा।

किससे करवाते उद्घाटन, क्यों करवाते उद्घाटन जब पता ही नहीं कि यह स्कूल कब खुल गया? स्कूल का नाम भी नहीं रखा था, नाम तो तब रखते जब होश रहता कि कोई स्कूल खुलने जा रहा है। जब बिना नाम का स्कूल खुल ही गया तो फिर तो यही सोचने लगे कि स्कूल का नाम क्यों रखना। क्या यह भी कोई जरूरी चीज है?

नेताओं के नाम पर बने स्कूलों की कमी नहीं, क्रान्तिकारियों, शहीदों, सन्तों, मुनियों, ऋतुओं, ऋषियों और तो और जात-बिरादरी के ऊँचे और छुटभैये नेताओं के नाम पर भी सब तरफ स्कूल हैं ही। पर सचमुच अगर पूरे देश में हर गाँव में स्कूल खोलने हों तो कोई पाँच-सात लाख नामों की जरूरत पड़ेगी। नया क्या हो पाएगा तो कुछ मत करो। गुमनाम स्कूल चल पड़ा। बच्चों से कहाँ जा रहे हो जैसे प्रश्न पूछने वाले लोग थे नहीं। न पोशाक थी न वर्दी थी, बस्ता बोझ वाला भी नहीं था, बिना बोझ वाला बस्ता भी नहीं था। स्कूल जैसा कुछ था नहीं तो नाम किसका रखते!

भवन नहीं था, न अच्छा, न गिरता-पड़ता। चलता-फिरता स्कूल था। आज यहाँ, कल वहाँ। गर्मी के मौसम में बड़े बरगद के नीचे, ठण्ड के दिनों में खुले में धूप के साथ। प्रश्न पूछने वालों की क्या कमी। कोई पूछ ही बैठे कि और बरसात के दिनों में कहाँ लगाओगे स्कूल? तो उत्तर मिलता कि सब बच्चे तो किसान-परिवार से हैं। बरसात में वे सब अपने खेतों में काम करते हैं। यानी तब छुट्टी रखी जाएगी क्या? उत्तर मिलता कि नहीं। उन दिनों हमारे बच्चे गुणा-भाग सीखते हैं। गुणा-भाग कैसा? भगवान का गुणा-भाग। एक मुट्ठी गेहूँ बोने से जो पौधे उगेंगे, उनकी बाली गिन कर तो देखो। प्रकृति का विराट गुणा-भाग समझने का इतना सुन्दर मौका कब मिलेगा। सारे सरल और कठिन गुणा-भाग, दो दूनी चार जैसे सारे पहाड़ों का पहाड़, गणित का पहाड़ भी खेती के गुणा-भाग से छोटा ही, बौना ही होगा। यह नया बीज-गणित, बीजों का गणित जीवन के शिक्षण का भाग है।

कक्षाओं का शुरू में विभाजन नहीं था पर धीरे-धीरे पहली टोली के बच्चे आगे बढ़े तो, वे अपने आप दूसरी कक्षा में आ गए। वे अपने पीछे जो खाली जगह कर आए थे, उसमें अब उत्साह से एक नई जमात आ गई। पर पहली कक्षा में पढ़ा क्या? कौन-सा पाठ्यक्रम? कोई बना बनाया ढाँचा नहीं रखा गया था। जो अक्षर ज्ञान सरकारी स्कूल में पढ़ाया जाता था, या कहें नहीं पढ़ाया जाता था, उसे यहाँ बिना डाँटे-फटकारे पढ़ा दिया था। और साथ में अनगिनत नई बातें, जानकारियाँ पाठ्यक्रम के अलावा भी। कुछ पचास पेड़-पौधों के नाम तो उन्हें आते ही थे, लेकिन अब उन नामों को लिखना भी आ गया था।

पहली से दूसरी कक्षा के बीच यों कोई दीवार तो नहीं थी, भवन ही नहीं था फिर भी बच्चों को लगा कि स्कूलों में परीक्षा होती है तो हमारी परीक्षा कब होगी? नवयुवकों की टोली खुद कोई बड़ी पढ़ी-लिखी तो थी नहीं। आपस में बैठ दो-चार तरह के प्रश्न- भाषा, अक्षर ज्ञान, गिनती आदि के बना लिए। एकाध वर्ष इस तरह से पर्चे बने, पर्चे जाँचे भी गए और पास-फेल बताने के बदले बच्चों को बुलाकर उनकी गलतियाँ वगैरह जो थीं, वो सब समझा दीं और उन्हें अगली कक्षा में भेज दिया।

फिर इस टोली को लगा कि जीवन में प्रश्न पूछना भी तो आना चाहिए बच्चों को। क्यों न हम उन्हें अभी से प्रश्न पूछना सिखाने लगें। इससे हम भी कुछ नया सीखेंगे और वे भी। तय हुआ कि हरेक छात्र एक प्रश्न पत्र खुद बनाएगा। बीस छात्रों की कक्षा में एक ही विषय पर बीस प्रश्न पत्र तैयार हो गए। यह भी निर्णय किया गया कि उन्हें आपस में पत्तों की तरह फीट कर एक दूसरे में बाँट दिया जाए। देखा गया कि सभी प्रश्न पत्र ठीक-ठाक बने थे, न बड़े सरल न बहुत कठिन। उत्तरों की जाँच टोली के सदस्यों ने ही की।

एकाध वर्ष इसी तरह चला। फिर यह बात भी ध्यान में आई कि प्रश्न जब बच्चे बना ही रहे हैं तो उत्तर पुस्तिका की जाँच हम क्यों करें! यह काम भी बच्चों पर डाल कर देखना चाहिए। आखिर जीवन में अपना खुद का मूल्यांकन सन्तुलित ढँग से करना भी आना चाहिए। न अपने को कोई तीसमारखाँ समझे और न दूसरों से गया गुजरा। सहज आत्मविश्वास से बच्चों का मन खुलना और खिलना चाहिए। प्रश्न भी तुम्हीं पूछो, उत्तरों की जाँच-पड़ताल भी तुम्हीं करो, अब। टोली की जरूरत पड़े तो मदद ली जा सकती है। निष्पक्षता दूसरों के प्रति और अपने प्रति भी सीखनी चाहिए। अपना हाथ जगन्नाथ जैसे मुहावरे पढ़ तो लो पर उन्हें अपने से दूर ही रखो।

इस गुमनाम स्कूल का कोई संचालक मण्डल नहीं था। अध्यक्ष, सदस्य, मन्त्री, प्रधानाचार्य, कोषाध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं था। महीने में कुल जितना खर्च होता, उतना चन्दा माता-पिता से मिल जाए तो फीस क्यों लेना। कई बार कोई कहता कि फसल कटने पर हम कुछ दे पाएँगे, अभी तो है नहीं। स्कूल में कोई रजिस्टर नहीं था, इसलिए फीस, हाजरी, किसने दिया पैसा, किसने नहीं- ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड नहीं रखा गया।

बच्चे पढ़ रहे थे, खेल रहे थे, आनन्द कर रहे थे। गाँव में इन नवयुवकों की टोली की एक संस्था भी थी- ग्राम विकास नवयुवक मण्डल। उसमें कई तरह के मेहमान आते थे। कभी आस-पास से तो कभी दूर-दूर से भी। टोली उन मेहमानों से भी कहती कि थोड़ा समय निकालें और हमारे बच्चों से भी बातें करें।

क्या बातें? कुछ भी बताएँ जो आपको ठीक लगे। एक वर्ष में 25-30 विजिटिंग फैकल्टी। तरह-तरह की जानकारियाँ। स्कूल चल पड़ा मजे-मजे में।

इधर, इन बच्चों के चेहरों पर सचमुच ज्ञान की एक चमक-सी दिखने लगी थी। जो परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेज रहे थे, वे भी अब कभी-कभी इस विचित्र स्कूल में आने लगे थे। उन्हें भी यहाँ का वातावरण खुला-खुला-सा दिखा। डाँट-फटकार, मारा-पीटी कुछ नहीं। बच्चे महकते-से, चहकते-से दिखते थे। कुछ परिवारों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकाल कर इस स्कूल में डाल दिया।

नवयुवकों की टोली को लगा कि एक ही गाँव में कम-से-कम शिक्षा को लेकर होड़ नहीं मचनी चाहिए। लक्ष्मण सिंह जी एक दिन सरकारी स्कूल चले गए। प्रधान मास्टरजी से मिले। बड़ी विनम्रता से उन्हें भी अपने स्कूल आने का निमन्त्रण दिया। कहा ये भी आपके ही बच्चे हैं, आपका ही स्कूल है। यहाँ थोड़ी भीड़ ज्यादा हो गई थी तो वहाँ कुछ कर लिया है।

धीरे-धीरे वहाँ के एकाध मास्टर इधर भी आने लगे। वे यहाँ के बच्चों में ज्यादा रमने लगे। एक बड़ा अन्तर तो समझदारी का था। उधम यहाँ बिलकुल नहीं था। बचपन था, बचपना नहीं था। उमर में सयाने हुए बिना बच्चे व्यवहार में कितने सयाने हो सकते हैं- इसका कुछ चित्र उभरने लगा था।

इस बीच गाँव के तीनों टूटे तालाब भी नव-युवकों की टोली और उनकी संस्था को बाहर से मिली कुछ मदद से बन गए थे। यहाँ पानी कम ही बरसता है। कोई 24 इंच। पर अब जितना भी बरसता उसे रोकने का पूरा प्रबन्ध हो गया था। तब आई बारी गाँव के गोचर को ठीक करने की, कब्जे हटाने की। फिर इस आन्दोलन में इस स्कूल के सभी बच्चों ने भाग लिया। कभी-कभी तो ठण्ड की रातें गोचर में रजाई ओढ़ कर पहरा देते हुए भी कटीं- अपने माता-पिता के साथ।

गाँव में सभी जातियों के परिवार हैं। चोरी-छिपे कई परिवार आस-पास के हिरण, खरगोश का शिकार करते थे। गोचर उजड़ जाने से इनकी संख्या भी कम हो गई थी। पर गोचर सुधरने लगा तो वन के ये छोटे पशु भी आने लगे।

तब गाँव लापोड़िया ने सबकी बैठक कर शिकार न खेलने का संकल्प लिया। इसका स्कूल से यों कोई खास सम्बन्ध नहीं दिखेगा पर शहर के अपने बच्चे स्कूलों की तरफ से कभी-कभी चिड़ियाघर जाते हैं न। लापोड़िया गाँव ने अपने पूरे क्षेत्र को खुला चिड़ियाघर घोषित किया। सब की निगरानी से। इसमें स्कूल ने भी साथ दिया। जगह-जगह वन्य प्राणियों के संरक्षण, संवर्धन के बोर्ड बना कर लगा दिए गए और उस इबारत को लोगों के मन में भी उतारने की कोशिश की गई।

इस खुले चिड़ियाघर में शहरों के चिड़ियाघरों की तरह भले ही शेर, हाथी या जिराफ न हों लेकिन जो भी जानवर और पक्षी थे वे इस स्कूल की तरह ही खुले में घूमते थे और उनके बीच घूमते थे ये बच्चे।

स्कूल की कक्षाएँ आगे बढ़ती गईं। पहली दूसरी हो गई, दूसरी तीसरी। इस तरह जब पहली बार सातवीं कक्षा आठवीं बनी तो आठवीं की बोर्ड की ऊँची दीवार बच्चों के सामने खड़ी थी। सन् 1985 की बात होगी। अब तक तो वे खुद अपनी परीक्षा लेते थे, खुद ही प्रश्न बनाते थे, खुद ही अपने उत्तरों को सावधानी से जाँचते थे। अब उन्हें दूसरों के बनाए प्रश्न-पत्र मिलने वाले थे। उनके उत्तर भी कोई और जाँचने वाले थे। लेकिन बच्चों को, इस टोली को और उनके माता-पिता को भी इसकी कोई खास चिन्ता नहीं थी। बोर्ड की परीक्षा के अदृश्य डर से यह स्कूल मुक्त था।

पूरी तैयारी थी पहली बार आठवीं की इस अपरिचित बाधा से मिलने की। सब बच्चों के फॉर्म राज्य शिक्षा बोर्ड में प्राइवेट छात्र की तरह जमा कराए गए। वहीं के सरकारी स्कूल में उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली। अपने स्कूल में परीक्षा भी अपनी ही थी। तुरन्त परिणाम आ जाता था। यहाँ शिक्षा मण्डल का विशाल संगठन था। पूरे राज्य में फैला हुआ। इसलिए परिणाम आने में लम्बा इन्तजार करना पड़ा। पर जो बच्चे परीक्षा दे चुके थे, उन्होंने इस बीच में स्कूल आना बन्द नहीं किया। वे हमेशा की तरह आते रहे। नई-नई चीजें करते रहे, अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाते भी रहे।

परिणाम आया। इस गुमनाम स्कूल की पूरी कक्षा इस दीवार को मजे में फांद गई थी। परिणाम शत-प्रतिशत था।

बच्चों की संख्या भी बढ़ चली थी, इसलिए शिक्षकों की जरूरत भी पड़ी। पर यह संख्या दो या तीन से ज्यादा कभी नहीं हो पाई। बाकी पढ़ाई बच्चे मिलकर करते। बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा को पढ़ाते। अंग्रेजी, विज्ञान और गणित में थोड़ा अभ्यास रखने वाले रामनारायण बुनकर किसी और शहर से विवाह कर गाँव में आई राजेश कंवर ने मदद दी। पर ये भी बच्चों को पढ़ाने की कोई डिग्री नहीं रखते थे। पढ़ाते-पढ़ाते सीखते गए, सिखाते गए।

बच्चे सन् 1985 के बाद हर साल आठवीं की एक दीवार कूदते-फाँदते रहे। हाँ, स्कूल की इमारत तो कभी-भी नहीं बनी, पर कुछ वर्ष बाद पाठ्यक्रम की किताबें बढ़ने लगीं। तो कुछ नई खरीद करनी पड़ी। इन किताबों-कॉपियों को रोज-रोज घर से भारी बस्ते में लाना और फिर स्कूल से वापस घर ले जाने के नियम भी बड़े लचीले रखे गए। चाहो तो ले आओ, चाहो तो ले जाओ। एक घर में किसी कोने में बनी आलमारियों में सबके बस्ते रखने का इन्तजाम भी हो गया था। जिसे होमवर्क कहा जाता है वह यहाँ नहीं था। यों भी घर में कोई कम काम होते हैं क्या? घर के ऐसे कामों में माता-पिता का हाथ बटाना भी तो एक शिक्षण ही है।

स्कूल में जब ठीक मानी गई संख्या में शिक्षक ही नहीं थे तो चपरासी जैसा पद भी कहाँ होता। देश भर के, शायद दुनिया भर के स्कूलों में बजने वाली घण्टी यहाँ नहीं बजती थी। इसलिए दिन का समय अलग-अलग विषयों के घण्टों में बाँटा नहीं जाता था।

आज भाषा पढ़ रहे हैं तो दो-चार दिन भाषा, व्याकरण, उच्चारण, विभक्तियाँ- सब कुछ अच्छे-से पढ़ समझ लो। फिर बारी गणित की आ गई तो दो-चार दिन गुणा-भाग का मजा लो। कभी-कभी तो एक ही विषय पूरे हफ्ते चल जाता। पचास मिनट की तलवार किसी के सिर पर नहीं लटकती थी। न शिक्षक पर न छात्र पर।

फि‍र स्कूल में किसी घर से एक अखबार भी आने लगा। बड़े बच्चों को किताबों के अलावा अखबार पढ़ने की भी इच्छा हो तो वह पूरी की जानी चाहिए। सभी घरों में यों भी अखबार नहीं आता था। फिर बच्चों ने अखबार की खबरों पर टिप्पणी भी देना, अपनी पसन्द, नापसन्द भी बताना शुरू किया। फिर वे थोड़ा आगे बढ़े। खुद हाथ का लिखा दो-चार पन्ने का एक अखबार भी निकालने लगे। स्कूल का नाम नहीं था, अखबार भी बिना नाम का। हफ्ते में एक बार। हाथ से गाँव की, स्कूल की, खेती-बाड़ी की, आस-पास की खबरें, टिप्पणियाँ लिखी जातीं। गाँव से 20 किलोमीटर दूर जयपुर-अजमेर सड़क पर दूदू कस्बे में फोटो कॉपी मशीन थी। शहर आते-जाते किसी के हाथ से हस्त लिखित सामग्री भेज दी जाती। कोई सौ प्रतियाँ वापस आ जातीं। इसे बच्चों के अलावा गाँव के बड़े लोग भी खरीदते और चाय तक की दुकानों पर इसे पढ़ा जाने लगा था। आठ आना या एक रुपया दाम भी रखा गया ताकि फोटो कॉपी का खर्च निकल आए। कोशिश की जाती कि अधिक-से-अधिक बच्चे इसमें अपनी राय रखें, कुछ-न-कुछ सब लिखें। ऐसा स्कूल चला सकने वाली टोली, उसका गाँव अभी एक और विचित्र प्रयोग करने जा रहा था।

गाँव ने शिकार बन्द कर दिया था। वन्य प्राणियों का संरक्षण गाँव खुद कर रहा था। खुले चिड़ियाघर का जिक्र पहले आ ही चुका है।

गाँव के तीनों तालाब ठीक होकर अब लबालब भरने लगे थे। एक तालाब पर चुग्गा भी रखा जाने लगा था। हर घर अपनी फसल से कुछ अनाज निकाल कर इस चुग्गा-घर में बनी एक कोठरी में जमा करने लगा था। यहाँ से इसका एक अंश रोज निकाल कर एक विशेष बने चबूतरे पर डाल दिया जाता था। इस चबूतरे पर बिल्ली-कुत्ते झपट नहीं सकते थे। आस-पास की कई तरह की चिड़ियों के झुण्ड यहाँ बेफिक्र आते और दाना चुगते थे। सुबह से शाम तक चहचहाहट बनी रहती थी।

चूहे कहाँ नहीं हैं। लापोड़िया में खूब थे। किसानों के घरों में कहीं-न-कहीं तो अनाज की बोरियाँ होंगी ही। एक दिन लक्ष्मण सिंह जी को लगा कि हम सब घरों में चूहों को पकड़ने के लिए पिंजरे रखते हैं। पकड़ते तो खुद हैं पर फिर बच्चों को पिंजरा पकड़ा कर कहते हैं, बाहर छोड़ कर आओ या मार दो। पेड़ बचा रहे हैं, वन्य प्राणी बचा रहे हैं, लेकिन घर के प्राणी को मार रहे हैं।

इस चूहे ने हमारा भला ऐसा क्या बिगाड़ा है? बम्बई के सिद्धि विनायक मन्दिर में पूजा करने बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोगों के जाने की खबरें छपती हैं, कैलेण्डरों में तरह-तरह के गणेशजी मिलते हैं और उन्हीं के पास बैठा रहता है यह चूहा। पर हम उसे न जाने कब से मारे चले आ रहे हैं। न सन्त उसे बचाते हैं, न मुनि लोग, न सरकारें। अरे वो तो चूहा मारने के लिए इनाम भी देती हैं। अनाज का दुश्मन नम्बर एक मानती है सरकार चूहों को।

गाँव के कुछ लोग मिलकर बैठे। बातचीत चली कि इस पर क्या किया जा सकता है। सबने माना कि अनाज भी बचे और चूहा भी। प्रयोग के तौर पर गाँव की आबादी से दो-चार कदम की दूरी पर एक चूहा घर बनाने का निर्णय हुआ। न जीव दया का नारा। न अहिंसा को परमधर्म बताने का कोई ऊँचा झण्डा। बस प्रकृति को समझकर अपना कर्तव्य निभाने की एक कोशिश भर करने की बात थी।

कोई दस बीघा जमीन इस काम के लिए निकाली गई इस चूहा घर के लिए। एक तरह की झाड़ी से बाड़ लगाई ताकि एकदम बिल्ली कुत्ते न घुस पाएँ। सबको बता दिया गया कि घरों में चूहों को पकड़ें तो मारे नहीं, इस चूहा घर में लाकर उन्हें छोड़ दें।

घर के कोनों में दुबके चूहे जब यहाँ दस बीघा में छूटने लगे तो उन्हें कैसा लगा- ये तो टीवी वाले उनसे कभी पूछ ही लेंगे। पर जो यहाँ आया उसने अपने शानदार बिल बनाने शुरू कर दिए। कुछ ही समय में चूहा घर आबाद हो गया, बस्ती बस गई। गाँव में चील, उल्लू भी हैं, साँप भी, बिल्ली भी हैं, चूहे भी। प्रकृति में सब कुछ सबके सहारे मिल-जुलकर चलता है।

गाँव में चूहा घर बना गया। वहाँ के पेड़ों पर जो चिड़ियाँ बैठतीं उनकी बीट से तरह-तरह की घास के बीज नीचे गिरते। चूहा घर में बिल बन गए, आस-पास घास उग आई। उन्हें जितना भोजन चाहिए उतना मिल गया, जितनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, घास के कारण उतनी सुरक्षा मिल गई और जितने चूहे इन चील, उल्लुओं को चाहिए, उतने उन्हें मिल ही जाते होंगे।

चूहा घर बने अब दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। गाँव में चूहों की आबादी नहीं बढ़ी है। प्रकृति सन्तुलन खुद रखती है। खुद चूहे आजादी का महत्व जानते हैं। शायद वे खुद अपनी आबादी पर नियन्त्रण रखे हैं।

तो क्या घरों में चूहे एकदम खत्म हो गए हैं अब वे घरों में नहीं आते? लक्ष्मण सिंह जी बड़े ही सहज ढँग से उत्तर देते हैं कि देखिए, आप भी कभी-कभी घर का खाना खाते-खाते अघा जाते हैं तो किसी दिन होटल में, ढाबे में चले ही जाते हैं। इसी तरह एकाध बार ये चूहे भी अपना घर छोड़ कर हमारे घरों में आकर हलवा-पूरी या कुछ तो भी खा जाते हैं पर अब प्रायः वे घरों के भीतर वैसे नहीं रहते जैसे पहले रहते थे। अब उनके अपने घर हैं, आरामदेह बिल हैं- यह जीवन उनके लिए ज्यादा स्वाभाविक है, सहज है। शायद ज्यादा आनन्द का है। घर के कारागार से उनकी मुक्ति हुई है।

कारागार से फिर स्कूल को याद कर लें। लापोड़िया ने स्कूल को आनन्दधाम बनाया। फिर देखा कि गाँव का सरकारी स्कूल भी थोड़ा-थोड़ा सुधर चला है। नवयुवकों की इस टोली ने फिर सन् 2006 में तय किया कि हमें किसी की होड़ में तो स्कूल चलाना नहीं था। तो क्यों न इसे अब बन्द कर दें।

सृजन किया था जैसे चुप-चाप, उसी तरह एक दिन उस स्कूल का विसर्जन कर दिया। न नाम था, न भवन, न बैंक में कोई खाता था, न कोई संचालक मण्डल, न ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें स्कूल बन्द करने के बाद किसी तरह की बेरोजगारी का सामना करना पड़ता। या कि वे धरना देते दरवाजे पर। सबने मिलकर शुरू किया था। सबने मिल कर उसे सिरा दिया, उसका विसर्जन कर दिया।

विसर्जित होकर यह विचार पूरे गाँव में फैल गया है। लोग अच्छी बातें सीखने की कोशिश करते हैं, बुरी बातों को विसर्जित करने का प्रयास करते हैं। सब अच्छा सीख गए, सब बुरा मिटा दिया- ऐसा तो नहीं कह सकते पर इसी लम्बे दौर में इस क्षेत्र में 9 वर्ष का भयानक अकाल पड़ा था। आधे से कम बरसात गिरी थी, पर गाँव में एक बूँद पानी की कमी नहीं थी। गाँव के तीनों तालाब ऊपर से सूख गए थे पर इनने गाँव के भूजल को इतना सम्पन्न बना दिया था कि कोई सौ कुँओं में से एक भी कुँआ सूखा नहीं था, नौ साल के अकाल में। पूरे दौर में ठीक-ठीक फसल होती रही हर खेत में। गाँव के बच्चों को दूध तक मिलता रहा, वहाँ के गोचर के कारण। जयपुर की सरस डेयरी को भी इस अकालग्रस्त गाँव से सबसे पौष्टिक दूध मिला। सरकार ने उसका प्रमाणपत्र भी दिया था तब।

फिर कोई चार साल पहले इस इलाके में इतना अधिक पानी गिरा कि जयपुर शहर में भी बाढ़ आ गई, आस-पास के कई गाँव डूबे थे तब। पर लापोड़िया बाढ़ में डूबा नहीं। उसके तालाबों ने फिर सारा अतिरिक्त पानी आने वाले दौर के लिए समेट लिया था।

लापोड़िया गाँव ने न तो सरकारी स्कूल की निन्दा की, न कोई निजी प्राइवेट स्कूल उसकी टक्कर पर खोला, न किसी कारपोरेट को, कम्पनी को उसकी सामाजिक जिम्मेदारी जता कर शिक्षा में सुधार की योजना बनाई। उसने ममत्व, यह तो मेरा है, मान कर एक गुमनाम स्कूल खोला, शिक्षण को कक्षा की दीवारों से उठा कर पूरे गाँव में फैलने का विनम्र प्रयास किया और फिर उसे चुपचाप समेट भी लिया। एक भी पुस्तिका या कोई लेख इस प्रयोग को अमर बनाने के लिए उसने छापा नहीं।

शुरू में हमने दो स्कूलों की चर्चा करने की बात रखी थी। दूसरा स्कूल लापोड़िया गांव से थोड़ा अलग स्वभाव का है। यह पंजाब के गुरुदासपुर जिले के तुगलवाला गाँव में चल रहा है। पर यह लापोड़िया की तरह गुमनाम नहीं है। शिक्षा के कड़वे दौर में इस मीठे स्कूल का नाम है- बाबा आया सिंह रियाड़की स्कूल। सन् 1925 में यहाँ के एक परोपकारी बाबा आया सिंह ने इसकी स्थापना पुत्री पाठशाला के रूप में की थी। गुरुमुख परोपकार उमाहा उनका घोष वाक्य था- यानी गुरु का सच्चा सेवक परोपकार भी बहुत चाव से, आनन्द से करे।

यह विद्यालय यों कोई 15 एकड़ में फैला हुआ है पर बहुत चाव से, आनन्द से काम करने के कारण आस-पास के अनेक गाँवों के मनों में, उनके हृदय में इस स्कूल ने जो जगह बनाई है, उसका तो कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता। यहाँ प्राथमिक शाला- यानी पहली कक्षा से एम.ए. तक की शिक्षा दी जाती है। छात्राओं की संख्या है लगभग 3000। इसमें से कोई 1000 छात्राएँ अपने पास के घरों से आती हैं। दूर के गाँवों की कोई 2000 छात्राएँ यहाँ छात्रावास में रहती हैं। पढ़ाई का खर्च महीने के हिसाब से नहीं, वर्ष के हिसाब से है। रोज आने-जाने वालों की फीस लगभग एक हजार रुपए सालाना है। जो यहीं रहती हैं, उन्हें पढ़ाई, आवास और भोजन का खर्च लगभग 6,600 रुपया देना होता है। पूरे वर्ष का। जिन परिवारों को यह मामूली-सी फीस भी ज्यादा लगे- उनसे एक रुपया भी नहीं लिया जाता। भरती होने के लिए आने वाली किसी भी छात्रा को यहाँ वापस नहीं किया जाता। सचमुच, विद्यामन्दिर के दरवाजे हरेक के लिए खुले हैं।

3000 छात्राओं वाले इस शिक्षण संस्थान में बहुत गिनती करें तो शायद दस-पांच शिक्षक मिल जाएँगे। पढ़ाई का, पढ़ाने का सारा काम छात्राएँ ही करती हैं। बड़ी कक्षाओं की छात्राएँ अपने से छोटी कक्षाओं को पूरे उत्साह से पढ़ाती हैं। सैल्फ टीचिंग डे हमारे स्कूलों में होता है पर यहाँ तो सेल्फ टीचिंग इयर है पूरा।

सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, इतने बड़े शिक्षण संस्थान का पूरा प्रबन्ध छात्राओं के हाथ में ही है। यह काम दरवाजे पर होने वाली चौकीदारी से लेकर प्रधानाध्यापक के कमरे तक जाता है। साफ-सफाई, बिजली-पानी, इतनी बड़ी संख्या में छात्राओं का नाश्ता, दो समय का भोजन, तीन-चार मंजिल की इमारतों की टूट-फूट, नया निर्माण- सारे काम छात्राओं की टोलियाँ मिल बाँट कर करती हैं। संस्थान के रोजमर्रा के सब काम निपटाने के बाद इन्हीं छात्राओं की टोलियाँ जरूरत पड़ने पर आस-पास के गाँवों में सामाजिक विषयों पर, कुरीतियों पर, भ्रूण हत्या, नशाखोरी जैसे विषयों पर जन-जागरण के लिए पद यात्राओं पर भी निकल पड़ती हैं।

यह एक ऐसा संस्थान माना जाता है जहाँ पंजाब के प्रायः सभी मुख्यमंत्री, राज्यपाल वर्ष में एकाध बार माथा टेकने आ ही जाते हैं। पर इस संस्थान ने आज तक पंजाब सरकार से मान्यता नहीं माँगी है। सरकार ने मान्यता देने का प्रस्ताव अपनी तरफ से रखा तो भी स्कूल ने विनम्रता से मना किया है।

इसके संचालक श्री सरदार स्वरन सिंह विर्क का कहना है कि बच्चों की फीस से, खेती-बाड़ी, फल-सब्जी के बगीचों से इतना कुछ मिल जाता है कि विद्यालय को सरकार से मदद लेने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर शासन की मान्यता का मतलब है शासन के तरह-तरह के नियमों का पालन। ज्यादातर नियम व्यवहार में उतारना कठिन होता है तो लोग उन्हें चुपचाप तोड़ देते हैं। फिर झूठ बोलना पड़ता है। ना, यह सब यहाँ होता नहीं। इस स्कूल को इस इलाके में सच की पाठशाला के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ छात्राएँ बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाएँप्राइवेट छात्र की तरह देती हैं।

पूरे देश में परीक्षाओं में नकल करने के तरह-तरह के नए तरीके, नई तकनीकें खोजी जा रही हैं। पंजाब के परीक्षा में नकल एक बड़ी समस्या है। नकल रोकने के फ्लाइंग दस्ते तक हैं। लेकिन गाँव तुगलवाला की यह संस्था नकल के बदले छात्राओं की अकल और उनके संस्कारों पर जोर देती है। यह बताते हुए थोड़ा अटपटा भी लगता है कि यहाँ नकल पकड़ने वाले को एक बड़ा इनाम दिए जाने का बोर्ड तक लगा है !

शुरू में कहीं विनोबा की एक बात कही थी- छात्र भी पूर्ण, उसके माता-पिता भी पूर्ण और शिक्षक भी पूर्ण। यहाँ शिक्षण का काम तीन चरणों में होता है। पहले में एक शिक्षिका पचास छात्राओं को पढ़ाती है। फिर दस-दस के समूहों को पढ़ाया जाता है। इन समूहों में कोई छात्रा किसी कारण से कुछ कमजोर दिखे तो उसे अपूर्ण, मूर्ख नहीं माना जाता- तब उसे एक अलग शिक्षिका समय देती है और उसे कुछ ही दिनों में सबसे साथ मिला दिया जाता है।

शिक्षा के स्वावलम्बन की ऐसी मिसाल कम ही जगह होंगी- केवल गेहूँ, धान ही पैदा नहीं होता। इतनी बड़ी रसोई शाला का पूरा आटा यहीं पिसता है, धान की भूसी यहीं निकाली जाती है। गन्ना पैदा होता है तो गुड़ भी यहीं पकता है, सौर ऊर्जा है, गोबर गैस है। काम दे चुकी छोटी-सी-छोटी चीज़ भी कचरे में नहीं फेंकी जाती- सब कुछ एक जगह इकट्ठा करने वाली टोली है और फिर इस कबाड़ से क्या-क्या जुगाड़ बन सकता है- उसे भी देखा जाता है। बची चीजें बाकायदा कबाड़ी को बेची जाती हैं और उसकी भी पूरी आमदनी का हिसाब रखा जाता है।

सर्व धर्म समभाव पर विशेष जोर देने की बात ही नहीं है। वह तो है ही यहाँ के वातावरण में। दिन की शुरुआत सुबह गुरुवाणी के पाठ से होती है। परिसर की सफाई रोज नहीं होती। सप्ताह में एक बार। क्योंकि 3000 की छात्र संख्या होने पर भी कोई कहीं कचरा नहीं फेंकता। स्वच्छता अभियान यहाँ बिना किसी नारे के बरसों से चल रहा है।

आप सभी शिक्षा के संसार में बाकी संसार की तरह आ रही गिरावट की चिन्ता कर रहे हैं, उसे अपने-अपने ढँग से सम्भाल भी रहे हैं। आज सब चीजें, सुरीले से सुरीले विचार अन्त में जाकर बाजार का बाजा बजाने लग जा रहे हैं। शिक्षा की दुनिया में शिक्षण अपने आप में एक बड़ा बाजार बन गया है। पर जैसे बाजार में मुद्रास्फीति आई है ऐसे ही शिक्षा के बाजार में भी यह मुद्रास्फीति आ गई है। पहले सन्तरामजी बी.ए. से काम चला लेते थे। आज तो पीएचडी का दाम भी घट गया है।
हम में से कई लोगों को इसी परिस्थिति में आगे काम करना है। जो पढ़ाई आज आप कर रहे हैं, वह आगे-पीछे आपको एक ठीक नौकरी देगी- पर शायद इसी बाजार में। प्रायः साधारण परिवारों से आए हम सबके लिए यह एक जरूरी काम बन जाता है। इसलिए आप सबको एक छोटी-सी सलाह- नौकरी करें जीविका के लिए। लेकिन चाकरी करें बच्चों की। हम अपनी नौकरी में जितना अंश चाकरी का मिलाते जाएँगे, उतना अधिक आनन्द आने लगेगा।

विनोबा से हमने आज की बात प्रारम्भ की थी। उन्हीं की बात से हम विराम देंगे। यह प्रसंग बहुत सुन्दर है। इसे बार-बार दुहराने में भी पुनर्रुक्ति दोष नहीं दिखता। उनके शब्द ठीक याद नहीं। भाव कुछ ऐसे हैं:

पानी जब बहता है तो वह अपने सामने कोई बड़ा लक्ष्य, बड़ा नारा नहीं रखता कि मुझे तो बस महासागर से ही मिलना है। वह बहता चलता है। सामने छोटा-सा गड्ढा आ जाए तो पहले उसे भरता है। बच गया तो उसे भर कर आगे बढ़ चलता है। छोटे-छोटे ऐसे अनेक गड्ढों को भरते-भरते वह महासागर तक पहुँच जाए तो ठीक। नहीं तो कुछ छोटे गड्ढों को भर कर ही सन्तोष पा लेता है।

ऐसी विनम्रता हम में आ जाए तो शायद हमें महासागर तक पहुँचने की शिक्षा भी मिल जाएगी।

बाल मंदिर के पुजारी गिजुभाई : संजीव ठाकुर

15.11.1885-23.06.1939

15.11.1885-23.06.1939

बच्चों के लालन-पालन, विकास और शिक्षा की चिंता करने वाले लोग पूरी दुनिया में हुए हैं। प्रायः सभी ने शिक्षा आदि के प्रचलित तरीकों का विरोध किया है और बच्चों की आजादी की वकालत की है। अपने देश में जिन लोगों ने इस दिशा में चिंतन-मनन किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, अरविन्द घोष, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जाकिर हुसैन, डॉ. अम्बेडकर आदि का नाम ससम्मान लिया जाता है। इस क्षेत्र के नामों में से एक नाम जो इनसे कम महत्त्व का नहीं है, अक्सर लोगों की जुबाँ पर आने से रह जाता है। अक्सर भुला दिया जाने वाला वह नाम है, गुजरात के शिक्षा शास्त्री गिजुभाई का। सच्चाई तो यह है कि काफी अरसे तक लोगों को इस नाम का पता ही नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने और गुजराती में दो सौ से अधिक पुस्तकें लिखने के बावजूद गिजुभाई को गुजरात से बाहर जानने वाले कम ही लोग थे। यह तथ्य तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगता है, जब हमें यह जानने को मिलता है कि गिजुभाई की महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक ‘दिवास्वप्न’ का हिन्दी अनुवाद 1932 में ही हो चुका था।

गिजुभाई के काम को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली दबा सकता है। एक अकेला शख्स! न कोई सरकारी सहायता। न कोई अनुदान! बस अपनी लगन और बच्चों के प्रति लगाव के बल पर वह काम कर डाला, जो किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए भी संभव नहीं है। बच्चों के बीच काम करने के साथ-साथ लेखन के लिए समय निकालना और किसी लेखक से अधिक लिख जाना, इसके अलावा माता-पिता और शिक्षकों के लिए पत्रिका निकालना गिजुभाई जैसे समर्पित और परिश्रमी व्यक्ति के लिए ही संभव था। शुरू में गिजुभाई ने भी कहाँ सोचा था कि उन्हें शिक्षा की दिशा में जाना है? उन्होंने तो वकालत की पढ़ाई की थी और वकालत का पेशा अपनाया था। लेकिन उनकी दिशा बदल गई। उनकी दिशा बदलने का काम किया एक पुस्तक ने जो उन्हें एक मित्र ने पढ़ने को दी थी। ‘मोंटेसरी मदर’  नाम की इस पुस्तक के बारे में स्वयं गिजुभाई ने लिखा है- ‘अगर मुझको किसी ने पहले ही सावधान कर दिया होता कि ‘मोंटेसरी मदर’ नामक पुस्तक पढने से मेरी जीवन-धारा ही बदल जाएगी, जीवन एक नए प्रकाश से जगमगा उठेगा और मुझको एक नई क्रांतिकारी दृष्टि प्राप्त हो जाएगी, तो मेरे जैसा एक वकील इस पुस्तक को अपने हाथ में थामता या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।’ (‘बाल शिक्षण: जैसा मैं समझ पाया’, पृ. 17)

और गिजुभाई केस की वकालत छोड़ बच्चों की वकालत करने लगे, बच्चों के बहुत बड़े वकील बन गए! उन्होंने न केवल बच्चों की आजादी की वकालत की, बल्कि बच्चों को सिखाने-पढ़ाने की परंपरागत पद्धतियों पर भी प्रहार किया और शिक्षा का एक ऐसा मॉडल विकसित कर समाज के सामने रखा कि जिसे अपनाकर समाज बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण तो उपलब्ध करा ही सकता है, प्रताडना और मानसिक दबाव से निजात भी दिला सकता है।

गिजुभाई बच्चों से प्रेम करते थे। वे चाहते थे कि माता-पिता और शिक्षक भी सही मायनों में बच्चों से प्रेम करें। माता-पिता और शिक्षक बालकों के लिए भयहीन माहौल बनाएँ। बिना डाँट-डपट के, बिना मार-पिटाई के उनकी परवरिश करें। उन्हें शिक्षित करें। घर और विद्यालयों को बालकों के सृजनात्मक विकास में बाधक जानकर गिजुभाई बहुत चिंतित होते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘घर और विद्यालय ऐसे स्थल हैं, जहाँ बालकों की सृजनशीलता का सहज स्वाभाविक रीति से विकास होता है और यही वे स्थल हैं, जहाँ उनके सृजन को रोकने, विकृत करने अथवा निर्मूल करने का काम होता है।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, पृ.18)

बच्चों के विकास में सबसे बड़ा बाधक गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट, दंड वगैरह है। गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट या दंड देकर किसी बच्चे को पढ़ाया-लिखाया नहीं जा सकता। ‘अगर ऐसा करने से बालकों की बुद्धि बढ़ सकती हो तो किसी भी बेवकूफ को मारपीट कर बुद्धिमान बना सकते हैं।’ (प्राथमिक शाला में शिक्षक, पृ. 55)

गिजुभाई तो बच्चों को स्वतंत्र वातावरण में रखना और शिक्षित करना चाहते थे। दंड, पुरस्कार, लोभ, लालच से दूर रखकर सच्ची स्वतंत्रता देना चाहते थे। निश्चय ही गिजुभाई के इस स्वतंत्रता-सिद्धांत से स्वतंत्र नागरिक को तैयार किया जा सकता है। लेकिन इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक ले जाने के पक्ष में गिजुभाई नहीं थे। वे यह तो चाहते थे कि बच्चे अपने शरीर से, मन से, आत्मा से स्वतंत्र हों, लेकिन समाज के नियम-कायदे को तोड़कर, सामाजिक परिवेश की उपेक्षा कर गाली-गलौच, मार-पीट करने जैसी आजादी हासिल करना चाहें तो उन्हें ऐसी आजादी न देने के पक्ष में भी गिजुभाई थे। हाँ, बच्चों को स्वनिर्णय लेने और स्वावलंबन की ओर बढ़ाने में गिजुभाई हमेशा आगे रहते थे। उनका तो यह मानना था कि जो बच्चे बड़ों से हर काम पूछकर करते हैं, उन्हें दरअसल रोकने की जरूरत है।

बच्चों को स्वावलंबी बनाने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए गिजुभाई ने यह जरूरी समझा था कि बच्चे छोटे-मोटे काम खुद करें। नहाना, खाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कंघी करना, ऐसे ही काम थे। अपनी शाला में तो गिजुभाई बच्चों से ये काम करवाते ही थे, माता-पिता को भी प्रेरित करते थे कि वे उन्हें ऐसे काम करने से न रोकें।

गिजुभाई बच्चों को पल-पल पिलाए जाते उपदेशों से भी बहुत आहत होते थे। उनका मानना था कि ऐसे उपदेशों से बच्चों का विकास कतई नहीं होता।

गिजुभाई का चिंतन और लेखन बहुआयामी था। एक ओर उन्होंने माँ-बाप को बच्चों के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किताबें लिखीं तो दूसरी ओर शिक्षकों को ‘शिक्षित’ करने के लिए। बच्चों को भाषा-व्याकरण कैसे सिखाएँ? गणित को आसान तरीके से कैसे बतलाएँ? बच्चों को कथा-कहानी क्यों कहें? शिक्षा में चित्रकला, संगीत, कारीगरी को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दें? इन सब पर गिजुभाई ने विस्तार से अपनी कलम चलाई है। इन सब के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियाँ भी लिखी हैं। इन कहानियों के जरिये उन्होंने बच्चों को अलग-अलग तरह की बातें सिखाने का काम किया ही था, कक्षा में बच्चों का मन लगाने का काम भी किया था। खेल-कूद, संगीत, घुमक्कड़ी आदि को अपने विद्यालय में शामिल कर गिजुभाई ने एक ऐसा स्नेहिल वातावरण तैयार किया था कि बच्चे अपने घर ही नहीं जाना चाहते थे। क्या आज ऐसे किसी स्कूल की कल्पना की जा सकती है, जहाँ से बच्चे घर ही नहीं जाना चाहें? ऐसा तो तभी संभव हो सकता है न, जब बच्चों को रोका-टोका न जाए, जबरन ‘ज्ञानी’ न बनाया जाए, उनको अपने मन का काम करने की छूट दी जाए, पढ़ाने की पद्धति अनौपचारिक हो, शिक्षक हाथ में बेंत लेकर चलने के बदले प्यार की छड़ी से काम लें?

अपनी पुस्तक ‘प्राथमिक शाला में शिक्षक’ में गिजुभाई ने विस्तार से लिखा है कि उनके विद्यालय में क्या होना जरूरी है और क्या होना जरूरी नहीं है? इसे पढ़कर पता चलता है कि गिजुभाई कितने मुक्त विद्यालय की चाह रखते थे?

गिजुभाई ने बच्चों का सम्मान किया था, उन्हें प्रेम किया था। इसीलिए उनका ‘बाल मंदिर’ वास्तव में बच्चों की पूजा का स्थान बन सका था और वे शिक्षक न रहकर बच्चों के लिए ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके थे। शिक्षाविद् मधुरी देसाई ने गिजुभाई के व्यक्तित्व के उस पहलू पर गौर करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘गिजुभाई ने माँ जैसी सूक्ष्म दृष्टि और ममता भरी नजरों से बालकों को देखा था और उनके व्यक्तित्व को सजगतापूर्वक विकसित करने का प्रयत्न किया था। सघन मूँछों वाला प्रभावशाली स्वरूप होते हुए भी गिजुभाई बालकों के समीप आ सके और उनका विश्वास पा सके, तभी वे ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके।’ (प्राथमिक शाला में चिट्ठी वाचन, भूमिका)

परंपरागत विद्यालयों में गिजुभाई को बहुत सी बुराइयाँ नजर आती थीं। सजा देना तो एक बुराई थी ही, बालकों को गलत ढंग से पढ़ाना, रटाना, पुरस्कार या लालच देकर कोई काम कराना भी उनकी दृष्टि में बड़ी बुराई थी। इसी तरह गृहकार्य का बोझ देने वाले स्कूल भी उन्हें तनिक न सुहाते थे। गृहकार्य में लगे बच्चों को देखकर गिजुभाई काँप-काँप जाते थे। गृहकार्य बच्चों के लिए उन्हें एक ‘त्रास’ नजर आता था। इतने घंटे पाठशाला में बिताकर आने के बाद गृहकार्य से जूझते बच्चों को देखकर उन्हें दुख होता था। गृहकार्य को वे बच्चों के लिए नुकसानदेह ही मानते थे।

गिजुभाई को बालकों के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ थी। वे शिक्षकों से भी बाल-मनोविज्ञान की समझ की अपेक्षा रखते थे। वे चाहते थे कि शिक्षक हर बात पर बच्चों को रोकें-टोकें नहीं। न ही बच्चों को ‘बेहूदा, आलसी, लापरवाह, ठग, निकम्मा’ आदि कहें। बच्चों पर इन शब्दों से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षक बच्चों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें।

शिक्षा के एक अनिवार्य अंग- परीक्षा को गिजुभाई गैर जरूरी समझते थे। विद्यालयों में ली जाने वाली परीक्षाओं को वे एक ओर मिथ्याभिमान और दूसरी ओर निराशा का जनक मानते थे। परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों में अभिमान का भाव और बुरे अंक लाने वालों में निराशा का भाव देखकर उन्हें निराशा होती थी। विद्यालयों के साथ-साथ घरों में भी तरह-तरह की परीक्षाओं से गुजरते बच्चों को देखकर गिजुभाई को अच्छा नहीं लगता था। दूसरों के हिसाब से ही अपनी जिंदगी जीने का आदी होता आदमी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने लिखा है- ‘परीक्षा शाला में ही नहीं चलती, हमारे घरों में भी तरह-तरह की स्पष्ट-अस्पष्ट परीक्षाएँ चलती हैं। यही कारण है कि आज का मनुष्य अपने भीतर का नहीं रहा, बाहर का बन गया। स्वयं अपने लिए जीने की बजाय बाहर के लिए जीता है। …बाह्य पैमाने पर स्वयं को मापता है और इसी में संतोष एवं सार्थकता का अनुभव करता है। संक्षेप में, वह अपने भीतर से मरकर यानी अपनी आत्मा से मरकर बाहर से यानी शरीर से जीता है।’ (शिक्षक हों तो, पृ. 117)

जाहिर है, मरी हुई आत्मा का मनुष्य मरी हुई जिंदगी ही जिएगा,  मरे हुए समाज का निर्माण ही करेगा। हताशा, कुंठा, अवसाद जैसी मानसिक व्याधियाँ उसे चारों ओर से जकड़ लेंगी।

गिजुभाई बुद्धि की जगह हृदय को महत्त्व देते थे। वे चाहते थे कि बच्चों की बुद्धि से पहले उनके हृदय का विकास हो। ‘क्योंकि अगर मनुष्य का हृदय विकसित हो गया तो उसकी बुद्धि उसे सन्मार्ग पर ले जाएगी।’ इसके लिए वे शिक्षा में संगीत, कला, नाटक, कारीगरी आदि को शामिल करना जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि ‘संगीत व चित्रकला का ज्ञान प्राप्त करने वाला बालक स्पर्धा, द्वेष, क्लेष-तकरार या मारपीट नहीं करेंगे, अपितु वे सौंदर्य के सात्त्विक उपासक बनेंगे। सौंदर्य की सात्त्विक उपासना ने दुनिया में कभी किसी का अहित नहीं किया।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, प्रस्तावना)

गिजुभाई के चिंतन पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को जानने-समझने के बाद हमें यह लगता है कि गिजुभाई ने विदेश के कई शिक्षाशास्त्रियों के साहित्य का अध्ययन-विश्लेषण किया था। और मधुमक्खी की तरह अनेक जगहों से मधु का संचयन कर अपने जीवन में उतारा था। मारिया मोंटेसरी तो उनकी आदर्श ही थीं। इनके अलावा ए.एस. नील, पेस्तालॉजी और प्रोबले के विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया था। लेकिन उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों का अंधानुकरण नहीं किया था। उन्होंने स्वविवेक, स्वानुभव और स्वप्रयोग से भी बहुत कुछ अर्जित किया था। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को भारतीय परिवेश के हिसाब से ही धारण किया था।

गिजुभाई गुजरात के भावनगर में उस समय अपने शिक्षा-संबंधी प्रयोग कर रहे थे, जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। गिजुभाई का काम प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप में ही इस लड़ाई में योगदान तो दे ही रहा था। आजाद बच्चों को तैयार कर प्रकारांतर से वे आजाद देश और आजाद दुनिया ही तो तैयार कर रहे थे। और फिर समय-समय पर वे सीधी तरह आजादी की लड़ाई में शरीक भी तो होते थे। 1930 ईस्वी में बारडोली-सत्याग्रह में शामिल किसानों के बीच वे अपने बच्चों के साथ गए थे। किसानों के छोटे-छोटे बच्चों को एकत्र कर वे उन्हें नहलाते-धुलाते थे, खेलाते थे, गीत-कहानी सुनाते थे, लिखना-पढ़ना सिखाते थे। क्या यह आजादी के आंदोलन में उनका योगदान नहीं था? उन्होंने बच्चों की वानरी सेना बनाकर गाँव-गाँव जाने, प्रभातफेरी निकालने, शराब के ठेकों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग करने का काम भी खूब किया था। तभी तो उनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने लिखा था- ‘गिजुभाई के बारे में कुछ लिखने वाला मैं कौन हूँ? उनके कार्यों ने तो मुझे सदैव मुग्ध किया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनका कार्य आगे बढ़ चलेगा।’ (‘विश्व के शिक्षाशास्त्री’, पृ. 321)

शिक्षा और बच्चों के समुचित विकास की दिशा में गिजुभाई का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। गिजुभाई के विचारों को शिक्षकों तक पहुँचाने हेतु इन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनकी ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक तो सभी शिक्षकों और माता-पिता को निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए। गिजुभाई जैसे शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को अपनाकर शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व के महान् शिक्षाशास्त्रियों की पंक्ति में ससम्मान रखे जाने योग्य गिजुभाई को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जन्म 15 नवंबर 1885 को भावनगर रियासत के चित्तल गाँव में हुआ था और मृत्यु बम्बई में 23 जून 1939 को। उनका पूरा नाम गिरजाशंकर बधेका था। पिता भगवान जी बधेका वकील थे। 12 वर्ष की उम्र में गिजुभाई का विवाह हरिबेन के साथ हो गया था। दुर्भाग्यवश हरिबेन की मृत्यु हो गई। हरिबेन की मृत्यु के बाद 1906 में जड़ीबेन के साथ उनका द्वितीय विवाह हुआ। 1907 में वे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा पर गए थे और 1909 में भारत लौट आए थे। 1910 में बंबई में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की थी और 1913 में हाई कोर्ट में प्लीडर हो गए थे। 1915 में वे शैक्षणिक संस्था ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ के कानूनी सलाहकार बने थे। 1916 से वे दक्षिणामूर्ति में अध्यापन का कार्य करने लगे थे। 1920 में उन्होंने ढाई से पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भावनगर की तख्तेश्वर टेकरी पर ‘बाल मंदिर’ की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन कस्तूरबा गाँधी ने किया था। इस ‘बाल मंदिर’ में बच्चों को वास्तव में मंदिर के देवता की तरह रखा जाता था। 1936 में गिजुभाई ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ से मुक्त हो गए थे। इसी वर्ष कराची में आयोजित बाल मेले में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिरकत की थी। 1938 में राजकोट में उन्होंने एक ‘अध्यापन मंदिर’ की स्थापना की थी। यह उनका अंतिम महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

गिजुभाई ने गुजराती में करीब 225 पुस्तकें लिखी हैं। ‘दिवास्वप्न’, ‘माता-पिता से’, ‘शिक्षक हों तो’, ‘मोंटेसरी पद्धति’, ‘प्राथमिक शाला में शिक्षा-पद्धतियाँ,’ ‘प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा’, ‘चलते-फिरते’ आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘चोर मचाए शोर’, ‘चूहा सात मूँछों वाला’, ‘मुनिया रानी’, ‘नकल बिन अकल’, ‘खड़बड़-खड़बड़’, ‘मेंढक और गिलहरी’, आदि गिजुभाई की पुस्तकें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध हैं। इन कथाओं के जरिये उन्होंने बच्चों को ही नहीं, माता-पिता और शिक्षकों को भी शिक्षित करने का काम किया है।

गिजुभाई की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी बच्चों के माता-पिता और शिक्षक ‘शिक्षित’ हो पाए हैं या नहीं, यह सवाल आज भी उतना ही मौजूँ है। और शायद इसीलिए गिजुभाई की ये पंक्तियाँ भी आज उतनी ही मौजूँ हैं-

‘जब तक बालक घरों में मार खाते हैं
और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय,
बाग-बगीचे और क्रीड़ांगण न बनें
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?’

और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

अचानक उसका हाथ पेंट की पिछली जेब में गया। फिर अन्य सभी जेबें देखीं। जैकिट की भीतरी जेब को टटोलते ही दो वर्ष की बेरोजगारी झेलने के बाद सरकारी स्कूल में मास्टर बनने की सारी खुशी एक ही क्षण में फुर्र हो गई। चौबीस साल का युवक दोनों हाथों से सिर पकड़ कर रास्ते के किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया। लतड़-पथड़-पस्त। तीन सौ किलोमीटर बस से एवं बारह और छः, अठारह किलोमीटर पैदल यात्रा की थकान अचानक एकमुश्‍त उसके सिर पर सवार हो गई और उसके पूरे शरीर को शि‍थिल कर दिया। उसने जल्दी-जल्दी अपनी सभी जेबें टटोलीं। जैकिट उतारकर स्वेटर को झटका। पीठ से पिट्ठू उतार कर अंदर देखा। उसका बटुआ कहीं नहीं था। स्मृति को टटोला। कल की रात उसने विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर पर गुजारी थी। स्थानीय चतुर्थ श्रेणी कर्मी, लेकिन आतिथ्य में नम्बर एक। आदमी गरीब, लेकिन दिल का अमीर। सुबह चार बजे विदा होते समय उसने चारपाई की बगल में रखे बक्से पर से अपनी घड़ी पहनी थी और बटुआ उठाकर पूरे होशो-हवास में अपनी जैकिट की अंदर की जेब के हवाले किया था। फिर वह दौड़ पड़ा था बारह किलोमीटर का पैदल पथ दो घंटे में तय कर छः बजे की बस पकड़ने के उद्देश्‍य से। आधी दूरी तय भी कर चुका था लेकिन…..

उसने घड़ी देखी। पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। बिना पैसे के दो दिन की तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा असम्भव थी। नया इलाका। न जान न पहचान। पौ फटने लगी थी। दूर उत्तर-पूरब की चोटियां रक्ताभ होने लगीं थीं। उतरते पथरीले रास्ते की छाया अब दूर तक दिख रही थी। निर्जन अकेला रास्ता। वापस चलना होगा। उसने पिट्ठू लटकाया। इसी रास्ते के किनारे कहीं पड़ा मिलेगा, उसका बटुआ। न हो तो महिपाल या सती मास्साब ही जाने तक की व्यवस्था उधारी में कर देंगे। वह दो कदम चढ़ा, लेकिन थके पैर उसे चार कदम पीछे खींच लाये। फिर से बैठ गया, सिर पकड़कर।

कल नियुक्ति की औपचारिकता पूरी करने के बाद सती मास्साब ने उसे लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया था- ‘‘भाई जी! हम तो पांच साल से पड़े हैं, इस बीहड़ में। दूध-पानी, साग-भाजी कुछ नहीं मिलेगा। न बिजली, न सड़क, न अखबार। तीसरी दुनिया है। क्या करोगे, यहां नौकरी करके। वह भी एड-हॉक। इस बार तो लोग मात्र पांच सौ रुपए खर्च करके मनमाफिक जगह पर नियुक्ति पाए हैं। कल सामान लेने जा रहे हो, तो नैनीताल होते हुए चले जाओ। क्या पता अभी भी घर के नजदीक किसी जगह का जुगाड़ हो जाए। वरना इस गलती पर कई बरस पछताओगे।’’

वह पछता ही तो रहा था। काश! मास्साब का भाषण न हुआ होता तो वह सुबह यों हड़बड़ी में न भागता। पहले बीमार मां की तीमारदारी में ध्यान ही नहीं रहा कि नियुक्तियां भी हो रही हैं। नियुक्ति मिली तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर वह भी एट द इलेवन्थ आवर। सोच रहा था, उसके साथ ही यह सब क्यों होता है। तभी उस शांत पथ पर एक किशोर बालक की आवाज गूंजी- ‘‘ ऊपर से पत्थर आ रहे हैं, भागो। ’’

पन्द्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर उसका हाथ पकड़ कर खींचे लिये जा रहा था। अगले मोड़ पर जब दोनों रुके, तब तक पत्थरों का एक रेला गड़गड़ाते, धूल उड़ाते हुए ऊपर से आकर पहाड़ी की तलहटी में बहती नंदाकिनी नदी में समा गया था।

‘‘ साब, मैं अभी न आता तो आज आप बचते नहीं। आप इस इलाके के तो नहीं हो। यहां पर तो लगातार पत्थर गिरते रहते हैं। ऊपर देखकर नीचे भागना पड़ता है। आप हैं कि सिर देकर बैठे हैं।’’ उसकी आंखों में भोलापन, घबराहट, संदेह, जिज्ञासा जाने क्या-क्या था।

पत्थरों का अचानक आया रेला तो धड़धड़ाता हुआ नदी में समा गया था, लेकिन वह अब भी अपने अंदर की धड़धड़ को संयत करने का प्रयास ही कर रहा था। बाप रे बाप। बड़ी अनहोनी शायद टल गई थी।

‘‘धन्यवाद बेटे।’’ उसने कहा, ‘‘ तुम तो देवदूत बनकर आए। मैं कल ही ऊपर गांव के हाई स्कूल में आया था। नया मास्टर बनकर। अपने घर वापस जा रहा हूं, सामान लाने…।’’

बच्चे के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव आए। अंदर शायद कहीं सम्मान के किसी टुकड़े ने हिचकोला खाया।

‘‘ प्रणाम गूरजी…मैं दिलबर…गांव के स्कूल में नौ में पढ़ता हूं…मैं भी बाजार जा रहा…चलो… साथ चलते हैं…।’’ बच्चे ने मास्साब का पिट्ठू उठा लिया।

‘‘ मगर मैं तो वापस जा रहा हूं…स्कूल को।’’

‘‘ क्यों? ’’

‘‘ दरअसल, मेरा बटुआ हड़बड़ी में कहीं गिर गया है, रास्ते में। ’’

दिलबर के चेहरे पर कई भाव एक साथ आने-जाने लगे। वह कभी अजनबी मास्टर की तरफ देखता, कभी जमीन को घूरने लगता। फिर उसने जेब से एक काले रंग का बटुआ निकाला और मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘यह है? ’’

‘‘ अरे, हां। तुम्हें कहां मिला?’’ मास्साब ने उसके हाथ से बटुआ झपट लिया और सीने से ऐसे लगाया मानो निकलते हुए प्राण वापस चेप रहे हों।

‘‘ धन्यवाद दिलबर, मैंने तो तुम्हें एक भी पाठ नहीं पढ़ाया अभी,  लेकि‍न तुमने पहले ही मुझे गुरु दक्षिणा दे दी।’’ कहते हुए मास्साब ने बटुआ संभाल कर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये हैं। फिर कहोगे…।’’ अजीब से भाव आए थे, दिलबर के चेहरे पर।

‘‘अरे, नहीं यार। ’’ मास्साब ने बटुआ उसके सामने खोलते हुए सौ-पचास के नोटों पर यों ही हाथ फेरते हुए कहा।

‘‘ ठीक है। चलो चलते हैं।’’ बटुआ मिलते ही मास्साब के शि‍थिल शरीर में पुनः ऊर्जा का संचरण हो चुका था। उन्होंने दिलबर के हाथों से अपना पिट्ठू ले लिया।

दिलबर के साथ गपशप में बची हुई छः किलोमीटर की पैदल यात्रा कब पूरी हुई मास्साब को पता ही नहीं चला। उन्होंने दिलबर से इलाके और विद्यालय के बारे में तमाम जानकारी भी प्राप्त की। चहकती और बहकती कई बातों से कई बार मास्साब को लगा कि दिलबर कक्षा नौ में पढ़ने वाला सामान्य बच्चा नहीं है। दिलबर ने बताया था कि उनके स्कूल में कई साल से गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक आए ही नहीं। चार गुरुजी में से तीन ही एक बार में स्कूल में रहते हैं। दूर का स्कूल हुआ। एक गुरुजी घर जाते हैं, बारी-बारी से। मास्साब ने वादा किया कि अगले सोमवार से वह उन्हें अंग्रेजी के साथ गणित और विज्ञान भी पढ़ाएंगे। दिलबर की तो हिन्दी और सामान्य अध्ययन में भी मदद करेंगे। मास्साब दिलबर की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। अब इस अति पिछड़े इलाके में सेवा करने का भाव उनके मन में मजबूती लेने लगा। स्थान परिवर्तन का प्रयास उन्हें व्यर्थ लगने लगा। उनके मन में कुछ योजनाएं आकार लेने लगीं। स्टेशन पहुंच कर बस में बैठते हुए पचास रुपये का एक नोट बटुए से निकाल कर दिलबर की तरफ बढ़ाते हुए मास्साब ने कहा, ‘‘बेटे! मैं और क्या दे सकता हूं तुम्‍हें, फिर भी…। ’’

‘‘नहीं, गूरजी नहीं।’ ’कहते हुए दिलबर सामने की गली में भागता चला गया।

नौकरी सरकारी थी, लेकिन पक्की नहीं। एक महीने का नोटिस या एक महीने का वेतन देकर कभी भी सेवा समाप्ति की शर्त थी, नियुक्ति पत्र में। लेकिन पहले विद्यार्थी से यह मुलाकात और संवाद कोई सामान्य बात नहीं थी। अंतिम बार जब दिलबर से नजरें मिली थीं, तो मास्साब को उसकी आंखों में अनेक डूबते-उतराते प्रश्‍न दिखे थे। एक उपेक्षा का भाव भी था, जो उन्हें पच नहीं पा रहा था। चालक ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस छोटे से स्टेशन को छोड़कर घूं…घूं करती हुई पहाड़ी पर चढ़ने लगी। नन्हा दिलबर सहयात्री बनकर बैठ गया था मास्साब के मन-मस्ति‍ष्‍क में। उसकी बातें रास्तेभर उन्हें रह-रहकर याद आती रहीं।

अगले सोमवार को रोजमर्रा की आवश्यकता का हल्का-फुल्का सामान लेकर मास्साब अपने विद्यालय पहुंचे। प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में उनकी आंखें दिलबर को ही तलाश रहीं थीं, लेकिन वह नहीं दिखा। मास्साब ने परिचय संबोधन में बच्चों से कहा कि वह बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहेंगे और उनकी प्रत्येक समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे। अंग्रेजी के साथ गणित-विज्ञान भी उन्हें पढ़ाएंगे। बच्चों को उनसे डरने की जरूरत नहीं। उन्हें अपना दोस्त समझें। अपने मन की बातें कहें। जितने अधिक चाहें, प्रश्‍न पूछें। किसी तरह की डर या झिझक महसूस न करें। अच्छे बच्चे जिज्ञासु होते हैं और प्रश्‍न पूछते हैं। जो बच्चे पूछते हैं, वही सीखते हैं। सीखने की शुरुआत ही प्रश्‍न से होती है। ऐसा नहीं कि शि‍क्षक के पास हर प्रश्‍न का उत्तर हमेशा उपलब्ध होता है। ऐसे बहुत सारे प्रश्‍न होते हैं, जिनके उत्तर शि‍क्षकों को भी पता नहीं होते हैं। लेकिन आप-हम मिलकर उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाश करने की कोशि‍श करेंगे। उत्तरों की तलाश करते हुए ही तो हम बहुत कुछ सीखते जाते हैं और यही ज्ञान है। ज्ञान पहले से तैयार कोई माल नहीं है, बल्कि इसी तरह उसका सृजन होता है। प्रश्‍न ही हैं, जो  ज्ञान सृजन की खिड़की को खोलते हैं। इसलिए प्रश्‍नों का हमेशा स्वागत रहेगा। मास्साब की बातें सुन बच्चों के चेहरों में एक अलग सी चमक छा गई। शि‍क्षकों के बीच खुसर-पुसर शुरू होने लगी थी।

मास्साब को कक्षा नौ की कक्षाध्यापकी सौंपी गई थी। पहले वादन में उन्होंने कक्षा में जाकर उपस्थिति ली।

‘‘ महिधर प्रसाद ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ खुशाल सिंह ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’

‘‘ …………………. ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’ मास्साब ने जोर से दोहराया।

‘‘ नठ गया।’’ पीछे के बेंच से दबी-सी आवाज आई।

‘‘ नठ गया मतलब? ’’ मास्साब ने पीछे बैठे बच्चे से पूछा।

महिधर ने खामोशी से सिर झुका लिया। अन्य बच्चे भी खामोश हो गए। मास्साब ने हाजिरी पूरी की और पहले दिन का पहला कक्षा शि‍क्षण प्रारम्भ किया। पहला दिन बच्चों के साथ जान-पहचान में ही बीत गया। यद्यपि दिलबर कई बार मास्साब के मानस पटल पर आता-जाता रहा, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं।

यह बात लोगों को पता चल चुकी थी कि नये मास्साब हैं तो अंग्रेजी के, लेकिन गणित-विज्ञान भी पढ़ाएंगे। महिधर के पिता गिरधर तिवारी अभिभावक संघ के अध्यक्ष थे और पूर्व सैनिक भी। उन्होंने बेटे की पढ़ाई की गरज से तुरत-फुरत अपने मकान में मास्साब के रहने की व्यवस्था कर दी। बच्चे स्कूल से एक टेबल और दो कुर्सी भी ले आए। आज पहला ही दिन था। तखत पर अपना बिस्तर फैलाकर मास्साब ने महिधर के घर पर ही भोजन किया। इस बीच जान-पहचान की छुटमुट बातें भी होती रहीं। महिधर के पिता ने बताया कि महिधर कक्षा एक से आठ तक लगातार कक्षा में दूसरे स्थान पर रहता आया है। अब मास्साब के साथ रह कर पढ़ाई करेगा तो पहला आया करेगा।

भोजन के बाद मास्साब कुर्सी लेकर आंगन में बैठ गए। पूर्णिमा की रात थी। चांद अपने पूरे शबाब पर था। गांव का स्कूल बसासत के अंतिम छोर पर था और स्कूल से ही लगा महिधर का मकान। ऊपर की ओर बांज का हरा-भरा जंगल और नीचे की ओर नदी घाटी तक फैले हुए छोटे-छोटे तोक। पत्थर की स्लेटों से ढकी घरों की छतें चांदनी में छोट-छोटे शीशे के चौकस टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। मास्साब के मानस पटल पर रह-रह कर दिलबर की यादें और बातें टकरा रही थीं। तभी महिधर आकर सामने बैठ गया। सिर झुकाकर। मास्साब बतियाने लगे, ‘‘कहो महिधर! तो तुम दूसरे ही रहते हो कक्षा में। पहला कौन रहता है, भाई? ’’

‘‘ जी दिलबर। गूरजी! दिलबर चोर नहीं था।’’

‘‘ मैंने कब कहा? ’’ मास्साब चौंक पड़े।

‘‘ गुलाब सिंह सेठ ने शि‍कायत की कि दिलबर ने उसकी दुकान से दो सौ रुपये निकाल लिए। ’’

‘‘ अच्छा!’’

‘‘ सती मास्साब ने प्रार्थना में दिलबर की बहुत बेइज्जती की और बहुत मारा उसे। फिर सभी बच्चे भी दिल्वा रचो! दिल्वा रचो! कह कर हर समय उसे चिढ़ाने लगे। गुलाब सिंह सेठ सरपंच भी हैं। पंचायत ने बेचारे दिलबर के पिता पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया। उन्होंने बकरी बेचकर जुर्माना भरा और उस दिन दिलबर को खूब मारा।’’

‘‘ फिर क्या हुआ?’’ मास्साब के चेहरे में दुःख और आश्‍चर्य के मिश्रित भाव थे।

‘‘ उस दिन फीस डे था। दिलबर सुबह अंधेरे में ही मेरे घर आया। वह मेरा अच्छा दोस्त था। उसने खिड़की के पास आकर मुझे जगाया। एक कापी और पेन मांगकर वह अंधेरे में ही कुछ लिखने लगा। उसने अपने पिताजी के लिए चिट्ठी लिखी और पचास रुपये मुझे पकड़ाए और दिलबर नठ गया। गूरजी! डर के कारण मैंने चिट्ठी और रुपये छुपा दिए। किसी को नहीं बताया।’’

महिधर रुआंसा हो गया और चिट्ठी और रुपये मास्साब के हाथ में पकड़ाकर चला गया। मास्साब चन्द्रमा के मध्यम प्रकाश में चिट्ठी पढ़ने लगे-‘‘पिता जी! मुझे माफ कर देना। घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुआ हूं। गुलाब सेठ अपने को बहुत बड़ा अंग्रेज समझता है। मैंने उसकी दुकान से एक कापी खरीदी थी। कापी अंदर से फटी निकली। मैं कापी लौटाने गया तो उसने  कहा, ‘‘ यू ब्लडी लेबर्स’ सन।’’ पिता जी यह अंग्रेजी में गाली होती है। मैंने भी उससे कह दिया, ‘‘ यू ब्लडी, युअर फादर ब्लडी।’’ उसने मुझे एक झापड़ मार दिया। मैं चुपचाप चला आया। मुझे दुःख है कि मेरी बात न आपने सुनी, न पंचायत ने। स्कूल में मास्साब ने भी नहीं। ऐसे गांव में रहकर, ऐसे स्कूल में फीस देकर पढ़ने से मैं क्या सीखूंगा। इसलिए फीस के पैसे भी वापस भेज रहा हूं। आपका दो महीने का तमाखू का खर्चा तो होगा। मुझे ढ़ूंढने मत आना। मैं बहुत दूर जा रहा हूं। आपका अभागा बेटा- दिलबर।

मास्साब चिट्ठी पढ़कर सन्न रह गए। लोग अपने-अपने घरों में दुबक चुके थे। गांव में शांति थी। गांव की सीमा से पहाड़ी की चोटी तक पसरा जंगल खामोश था। सीढ़ीदार खेत लमलेट थे। सिर्फ पहाड़ों से उतरकर ढलान पर बहती नंदाकिनी का शोर रात के सन्नाटे में कानों से टकरा रहा था। अचानक आसमान में चमकते चांद को एक काले बादल के टुकड़े ने आकर ढक लिया और पूरी घाटी स्याह हो गई। मास्साब अपने कमरे में जाकर तखत पर पसर गए। ज्यों ही नींद पास आती दिलबर की आवाज कान खींच देती, ‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये थे। फिर कहोगे…।’’

सुबह प्रार्थना स्थल पर खुद के द्वारा कही बातें बार-बार प्रश्‍न के रूप में उनके सामने खड़ी हो जा रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

( चिंतामणि जोशी राजकीय इंटर कालेज टोटानोला, पिथौरागढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्‍ता हैं। कविता और कहानी लिखते हैं। एक कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुका है। वह दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)

सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा

kamal joshi,school

दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोनों ही खुद भी खिलखिलाते हैं और दुनिया को भी। मैं बात कर रहा हूं, सोसाइटी के एकदम बगल में बने सरकारी स्कूल की। चिल्लागांव का स्कूल। लगभग तीन हजार बच्चे पॉश कॉलोनियों के बीचों बीच। लेकिन इसमें इन सोसाइटियों का एक भी बच्चा पढ़ने नहीं जाता। बीस वर्ष के इतिहास को भी टटोलें तो भी नहीं। प्राचार्य ने खुद बताया था- ‘बीस-तीस हजार की आबादी वाली सोसाइटियों का एक भी बच्चा, कभी भी इस सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा।‘ असमानता के ऐेसे द्वीप हर शहर में बढ़ रहे हैं। उनके लिए अलग और आभिजात्य बेहद महंगे स्कूल हैं। इनमें कई स्कूल किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी या बिल्डर के हैं। दरअसल, ऐसे सभी निजी स्कूल ऐसे ही मालिकों के हैं। पुराने धंधों की बदौलत एक नया धंधा स्कूल का, जो अब पुराने सारे धंधों से ज्यादा चमकार लिए है।

खैर, मेरे अंदर सरकारी स्कूल से छूटे बच्चों की खिलखिलाहट हिलोरे ले रही है। पूरी सड़क भरी हुई। बच्चे-बच्चियों दोनों। पैदल चलता अद्भुत रेला। कुछ बस स्टैंड की तरफ बढ़ रहे हैं, तो कुछ चिल्लागांव की तरफ। जब से मेट्रो ट्रेन आई है, पास के अशोक नगर, नोएडा तक के बच्चे इस सरकारी स्कूल में लगातार बढ़ रहे हैं। जमुना के खादर में बसे यू.पी, बिहार के मजदूरों का एक मात्र सहारा भी है, यह सरकारी स्कूल। जिस स्कूल को यहां आसपास की संभ्रांत कॉलोनियों के बाशिंदे गंदा और बेकार मानते हैं, चिल्ला गांव, खादर के बच्चों के लिए इस स्कूल का प्रांगण बहुत महत्त्व रखता है। केवल स्कूल ही तो है, जहां वे खेल पाते हैं। चीजों की कीमत वे जानते हैं, जिन्हें मिली न हो। भूख हो या नींद या जीवन की दूसरी सुविधाएं। अभाव ही सौन्दर्य भरता है।

कभी-कभी इन हजारों बच्चों की खिलखिलाहट को नजदीक से सुनने का मन करता है। सरकारी स्कूल के न गेट पर एक भी कार, न स्कूटर। न स्कूली बस। और तो और नन्हें-मुन्ने बच्चों तक को लेने आने वाले भी नहीं। कौन आएगा? मां किसी अमीर के घर काम कर रही होगी और पिता कहीं मजदूरी कर रहे होगा। इन्हें उम्मीद भी नहीं। इन के पैरों ने चलना खुद सीखा है। इसके बरक्स तीन सौ मीटर के फासले पर ही एक निजी स्कूल है। उसे उसके अंग्रेजी नाम ए.एस.एन. से ही सभी जानते हैं, आदर्श शिक्षा निकेतन के नाम से नहीं। स्कूल प्रबंधन भी नहीं चाहता कि‍ हिन्दी नाम से पहचाने जाना। हिन्दी नाम से स्कूल का शेयर भाव नीचे आ जाएगा। फिर धंधा कैसे चमकेगा? बड़ी-बड़ी फीस, किताबों, ड्रेस, स्कूल बस के अलग पैसे और फिर रुतबा। इसी रुतबे का खामियाजा पड़ोस की सार्वजनिक सड़क को भुगतना पड़ता है। सुबह स्कल खुलते और बंद होते दोनों वक्त ए.एस.एन. की विशाल पीली-पीली बसें आड़ी-तिरछी प्रवेश करती, लौटती, गुर्राती, कंडक्‍टर के हाथों से पिटती-थपती, जो कोहराम मचाती हैं, उससे वहां के पॉश बाशिंदे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठे कुढ़ते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। कारण या तो उनके बच्‍चों पर इस स्‍कूल ने उपकार किया है अथवा निकट भविष्य में उन्हें दाखिले के लिए भीख मांगनी पड़ सकती है। इन अपार्टमेंटों में प्रसिद्ध पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और फिल्मकार भी हैं, जो अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए किसी की भी र्इंट से र्इंट बजा देंगे। लेकिन इन स्कूलों की इतनी ऊंची फीस, शोर और शोषण के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोल सकते। पड़ोस की सड़कें और फुटपाथ इन स्कूलों से त्रस्त हैं। किनारे बैठे सब्जी-ठेले वालों को भी स्कूल में होने वाले सत्संग के दिन भगा दिया जाता है! कोई है पूछने वाला कि स्‍कूल-मदरसों में सत्‍संग, कीर्तन का क्या काम?

जहां सरकारी स्कूल के गेट पर एक भी कार, स्कूटर नहीं था, इन निजी स्कूलों के गेट पर सैकडों कारें लगी होती हैं। यहां बच्चे कम, कारें ज्यादा दिख रही हैं। इसीलिए बच्चों की चहचहाट के बजाये कार के हार्न की आवाजें। दो बजे से पहले ही इनके अभिभावक अपनी बड़ी-बड़ी कारें ए.सी. चालू कर के ऐसे सटा कर लगाते हैं कि उनके चुन्नू मुन्नू और वयस्क बच्चे भी स्‍कूल के दरवाजे से निकलते ही उसमें आ कूदें। इन कार और बसों ने थोड़ी देर के लिए पूरी सड़क रोक दी है। केवल यहां नहीं पूरे शहर में। एक-एक बच्चे को कभी-कभी लेने वाले दो-दो। बावजूद इसके इन मोटे-मोटे बच्चों के चेहरों पर उदासी, थकान क्यों पसरी हुई है? सरकारी स्कूल के बच्चे इन्हीं कारों के बीच बचबचाकर रास्ता तलाशते गुजर रहे हैं और मुस्करा भी रहे हैं।  वाकई सड़क अमीरों की, स्कूल और देश भी। गरीबों का तो बस संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में समाजवाद, समानता जैसे कुछ शब्द लिखे हुए हैं। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा!

फोटो : कमल जोशी

फीस की फाँस : अनुराग

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हर साल नया शैक्षिक सत्र होने के साथ ही लगभग शत-प्रतिशत निजी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन और अभिभावक आमने-सामने आ जाते हैं। मुद्दा वहीं जो पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है- फीस में अत्यधिक वृद्धि और मनमाना एनुअल चार्ज। कई स्कूलों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि पुलिस बुलानी पड़ती है। मजेदार बात यह है कि इसी दौरान कुछ अभिभावक अपने बच्चों का एडमिशन कराने के लिए  इन्हीं स्कूलों के प्रबंधकों के आगे नाक रगड़ रहे होते हैं। उनके हर नियम-कायदे को मानने को लेकर उनका जवाब होता है, केवल ‘हां’। जरूरत पडऩे पर किसी की सिफारिश कराई जाती है। और इन सबके बावजूद डोनेशन तो देनी ही है। कैसी विडम्बना है कि आज अपने बच्चे के एडमिशन के लिए चिरौरी करने वाले ये माता-पिता भी अगले साल आंदोलनकारी अभिभावकों में शामिल हो जाएंगे। जब से देश में निजी स्कूलों का दौर शुरू हुआ है, एक भी अभिभावक ऐसा नहीं मिलेगा, जिसने बच्चा का एडमिशन कराते समय स्कूल प्रबंधन से हर साल बढऩे वाली फीस और एनुअल चार्ज के बारे में चर्चा की हो। या यह शर्त रखी होगी कि हर साल इतने प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढ़ाओगे और एनुअल चार्ज नहीं देंगे। जब सब कुछ स्कूल प्रबंधकों की मर्जी से हो रहा है तो बाद में हायतौबा मचाने का क्या तुक है?
कमीज सौ-पचास रुपये से लेकर हजारों रुपये में आती है। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से ब्राड की कमीज खरीद लेता है और महंगी होने की शिकायत भी नहीं करता। निजी स्कूल भी ब्रांड बन गए हैं। हमें अपने बच्चों की अच्छी-बुरी शिक्षा से कोई मतबल नहीं है। हमें उनके लिए शिक्षा के ब्रांड की चिंता है ताकि समाज में कमीज के टैग की तरह इसका भी प्रदर्शन कर सकें।
यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मूल सोसाइटी के स्कूल की ब्रांच तो गिनी-चुनी हैं, बाकी तो उन्होंने फ्रेंचाइजी दी हुई हैं।
पिछले दिनों एक स्कूल के आंदोलनरत अभिभावकों से मिलने हुआ। सभी की आर्थि और सामाजिक स्थिति काफी अच्छी थी। वे धरना-प्रदर्शन कर चुके थे। जनप्रतिनिधियों से लेकर सीबीएसई के चेयरमैन से भी कई बार मिल चुके थे। गरमागरम बहस हो रही थी। सभी का लहू खौल रहा था। मैंने सुझाव दिया कि आप अपने क्षेत्र में सरकारी स्कूल की मांग क्यों नहीं करते? हर साल होने वाला यह झंझट ही खत्म हो जाएगा। सभी ने मुझे ऐसे घूर कर देखा, मानो मैंने
उन्हें आत्महत्या करने के लिए कह दिया हो।
इससे बड़ा भ्रम कुछ नहीं हो सकता कि निजी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। अधिकांश स्कूलों में ‘शिक्षा के उद्देश्य’ को लेकर ही सन्नाटा है, तो बाकी मुद्दों पर बात ही क्या की जाए। कोई भी व्यवसाय शुरू करने से उसकी विशेषज्ञता हासिल की जाती है या दो-चार साल कहीं काम करके अनुभव जुटाया जाता है। लेकिन स्कूल तो प्रापटी डीलर, डेयरी वाला, नेता-अभिनेता कोई भी खोल लेता है। बस पैसा होना चाहिए। इन स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्ति के क्या मापदंड है, यह अबूझ पहेली है। नियुक्ति के बाद उन्हें कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। फिर वहां बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा कैसे मिल सकती है? अधिक पैसे वसूलने के लिए आलीशान बिल्डिंग, महंगा फर्नीचर, हर क्लास में एसी और कंप्यूटर लगा देने भर से तो अच्छी शिक्षा बच्चों को नहीं मिल सकती। सरकारी स्कूलों में अध्यापक की नियुक्ति के लिए शिक्षा से जुड़ी विशेष डिग्री या सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। नियुक्ति से पहले ट्रेनिंग दी जाती है और समय-समय पर वर्कशाप आदि को भी आयोजन किया जाता रहता है। कौन-कौन से और कि‍तने निजी स्कूल अपने यहां अध्यापकों की नियुक्ति से पहले और बाद में यह प्रक्रिया अपनाते हैं। फिर इन स्कूलों के शिक्षक कैसे
श्रेष्ठ शिक्षक हो सकते हैं?

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

अकेले टेक्नोलॉजी नहीं है स्कूलों की बीमारी का इलाज : केंटारो टोयामा

school

सन 2013 के बसंत में मैंने एक महीने तक अपनी सुबहें लेकसाइड स्कूल में बिताईं। यह सिआटल का एक प्राइवेट स्कूल है, जहां प्रशांत उत्तरपश्‍चि‍म में रहने वाले भद्रलोक के बच्चे पढ़ते हैं। लाल ईंटों से बना स्कूल का आलीशान परिसर किसी आईवी लीग कॉलेज जैसा भव्य दिखाई देता है और इसकी फीस भी उन्हीं जैसी है। इस स्कूल में गिल गेट्स ने पढ़ा है और यहां अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट के अफसरों के बच्चे पढ़ने आते हैं। जाहिर है, स्कूल में टेक्नोलॉजी की कोई कमी नहीं- शिक्षक स्कूल के इन्टरनेट पर एसाइनमेंट्स पोस्ट करते हैं;  ई-मेल से कक्षाओं को निर्देश देते हैं;  और हर बच्चा लैपटॉप (अनिवार्यतः) और स्मार्टफोन (अनिवार्य नहीं) लेकर स्कूल पहुंचता है।

इस पसमंजर में इनके माता-पिता क्या रुख रहता है, जब वे सोचते हैं कि उनके बच्चों को थोड़ी और खुराक की जरूरत है? मैं यहां एक वैकल्पिक शिक्षक के तौर पर गया था और मुझे कई स्तर के बच्चों की मदद करनी थी। इनमें से कुछ कैलकुलस ऑनर्स करना चाहते थे। ये मेहनती छात्र थे लेकिन उन्हें महज एक शाबासी देने वाले की जरूरत थी, क्योंकि वे कठिन सवालों पर काम कर रहे थे। भारी शिक्षणेत्तर गतिविधियों के बोझ से दबे कुछ अन्य छात्र ज्यामिति और बीजगणित के साथ जूझ रहे थे। मैं इसके लिए आवश्यक सामग्री के चयन और उनके असाइनमेंट्स में उन्हें मदद करता था। एक अन्य समूह को किसी ख़ास मदद की जरूरत नहीं थी। उन्हें बस थोड़ा-बहुत उकसाना पड़ता था ताकि समय पर अपना होमवर्क पूरा कर लें। इतनी विविधता के बावजूद छात्रों में एक बात समान थी- उनके माता-पिता अतिरिक्त पढ़ाई के लिए खुलकर पैसा खर्च कर रहे थे।

मैंने जो कुछ पढ़ाया वह गणित की वेबसाइट्स और खान एकेडमी के फ्री वीडियोज में उपलब्ध था। इतना ही नहीं, हर छात्र को पूरे वक्त इन्टरनेट सेवा मिलती थी। इतनी सारी टेक्नोलॉजी और 9:1 के शानदार शिक्षक-छात्र अनुपात के बावजूद वहां के अभिभावक चाहते थे कि उनके नौनिहालों को किसी वयस्क की ओर से थोड़े और मार्गदर्शन की जरूरत है।

लेकसाइड स्कूल के अभिभावक टेक्नोलॉजी के बजाय बड़ों के मूल्यवान मार्गदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने के मामले में अकेले नहीं हैं। दूसरे पढ़े-लिखे पेशेवर अभिभावक भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। सिलिकन वैली के अधिकारी अपने बच्चों को वालड्राफ़ स्कूल में पढ़ाते हैं। इस स्कूल में आठवीं कक्षा तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध है। स्टीव जॉब्स ने एक बार स्वीकार किया था कि ‘वह अपने बच्चों को आई-पैड नहीं देते। घर पर बच्चे कितनी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करेंगे, हमने इसकी सीमा तय की हुई है।’

ये माता-पिता टेक्नोलॉजी विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनके काम के देखते हुए उन्हें डिजिटल धर्म का समर्पित प्रचारक कहा जा सकता है। लेकिन वे स्पष्टतः इस बात में विश्वास नहीं करते कि ज्यादा मशीनें इस्तेमाल कर लेने से शिक्षा अच्छी हो जाती है। उनकी इस समझ की पीछे आखिर राज क्या है?

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पिछला पूरा दशक मैंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एजुकेशनल टेक्नोलॉजी को डिजाइन करने, समझने और पढ़ाने में बिताया। भारत के बंगलुरु शहर में मैंने एक पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) के साथ एक से ज्यादा माउस जोड़कर छात्र की अन्योन्य क्रिया बढ़ाने सम्बंधी एक प्रयोग किया। युगांडा के ग्रामीण इलाके में जब बच्चे एक अंगुली से शिकारी की तरह टाइपिंग का गेम खेलते तो मुझे घबराहट होने लगती। सिआटल, वाशिंगटन में किशोरावस्था से कम आयु के बच्चों की कंप्यूटर साक्षरता की कक्षा में मुझे टेक्नोलॉजी से पैदा होने वाले भटकाव से जूझना पड़ा। इस सभी प्रोजेक्ट्स में मुझे इकलौता और आसान पैटर्न दिखाई दिया। मैं इसे टेक्नोलॉजी का ‘विस्तारण नियम’ (लॉ ऑफ़ एम्प्लीफिकेशन) कहता हूं- टेक्नोलॉजी का प्राथमिक प्रभाव इंसानी ताकत के विस्तार के रूप में प्रकट होता है। इसलिए शिक्षा में टेक्नोलॉजी पहले से मौजूद शैक्षिक धारकता (पेडागॉजिकल कैपेसिटी) में इजाफा कर देती है।

विस्तारण एक स्पष्ट विचार प्रतीत होता है- यह इतना भर कहता है कि टेक्नोलॉजी के औजार से इंसानी ताकत को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन अगर यह इतना स्पष्ट है तो इसके इतने गहन परिणाम होने चाहिए, जो आम तौर पर नजरअंदाज नहीं किये जा सकते। मसलन विस्तारण के मुताबिक़ शैक्षिक टेक्नोलॉजी के बड़े पैमाने पर उपयोग के बहुत कम सकारात्मक परिणाम आये हैं। किन्हीं चुनिन्दा नमूनों को लें, कुछ स्कूल अच्छा कर रहे पाए गए तो कुछ बहुत बेकार। कुछ मामलों में कंप्यूटर शामिल करना फायदेमंद साबित हुआ (पायलट अध्ययन में जिन्हें दिखाया गया है), लेकिन कमजोर स्कूलों के मामलों में इसने उन्हें अपने मुख्य उद्देश्य से ही भटका दिया। कुल मिलाकर परिणाम शून्य ही निकला।

एक अपेक्षाकृत बड़ी समस्या यह है कि स्कूल प्रशासक शिक्षक प्रशिक्षण के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन नहीं करते। जब शिक्षक को ही नहीं पता कि डिजिटल उपकरणों को कैसे शामिल करना है तो टेक्नोलॉजी के जरिये धारकता के विस्तारण की ख़ास गुंजाइश नहीं रह जाती। जब एक प्राइवेट कंपनी मुनाफा कमाने में नाकामयाब होने लगती है तो कोई यह उम्मीद नहीं करता कि अत्याधुनिक डाटा सेंटर, ज्यादा उत्पादन दिलाने वाले सॉफ्टवेयर और सभी कर्मचारियों को नए लैपटॉप देकर परिस्थितियों को उलटा जा सकता है।

और स्कूल के बाहर जो कंप्यूटर हैं, उनका क्या? क्या होता है जब बच्चों को डिजिटल उपकरणों से सीखने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है, जैसा कि टेक्नोलॉजी के बहुत से पैरोकार नसीहत देते हैं? यहां टेक्नोलॉजी बच्चों की प्रवृत्तियों का विस्तार करती है। यकीनन बच्चों में सीखने, खेलने और बढ़ने की स्वाभाविक इच्छा होती है। लेकिन उनमें खेलते हुए खुद को भटका देने की भी स्वाभाविक इच्छा होती है। डिजिटल टेक्नोलॉजी इन दोनों इच्छाओं को विस्तार देती है। इन दोनों का संतुलन बिंदु हर बच्चे में अलग-अलग होता है लेकिन कुल मिलाकर अगर किसी किस्म का वयस्क मार्गदर्शन न हो तो भटकने की प्रवृत्ति प्रभावी हो जाती है। ठीक ऐसे ही निष्कर्ष अर्थशास्त्री रॉबर्ट फैर्ली और जोनाथन रॉबिन्सन को अपने शोध से हासिल हुए। कैलिफोर्निया के कुछ बच्चों को लैपटॉप देकर किए गए शोध में उन्होंने पाया- जिन बच्चों को लैपटॉप दिए गए थे, श्रेणी, कक्षा-स्तरीय परीक्षा परिणाम, उपस्थिति और अनुशासन जैसे तमाम शैक्षिक मानकों पर उनके प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखाई दिया। हालांकि उन्होंने लैपटॉप का इस्तेमाल सोशल मिडिया और वीडियो गेम्स के लिए ज़रूर किया। यानी, अगर आप उन्हें बहु-उपयोगी टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराते हैं, जिसका इस्तेमाल शिक्षा और मनोरंजन, दोनों के लिए किया जा सकता है, तो बच्चे मनोरंजन को ही चुनेंगे। टेक्नोलॉजी खुद बच्चों के रुझान को नहीं बदल सकती, यह उसका विस्तार भर करती है।

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यह जानना कि अमेरिकी शिक्षा को किन बीमारियों ने जकड़ा हुआ है, मुसीबतों के पिटारे को खोलने जैसा है। यह मुसीबत बचपन की गरीबी से जुड़ी हो सकती है या संसाधनों से जूझ रहे स्कूल डिस्ट्रिक्ट की। संभव है शिक्षकों के खराब वेतनमान से इसका संबंध हो या फिर प्राइवेट स्कूलों में जाने की होड़ से। सच्चाई इनमें से कई के मिले-जुले असर में भी निहित हो सकती है, मगर कंप्यूटरों की कमी में तो कतई नहीं। यहां तक कि टेक्नोलॉजी के झंडाबरदार भी नहीं कहते कि अमेरिकी शिक्षा टेक्नोलॉजी की कमी के कारण पतन की ओर जा रही है।

अमेरिका में शिक्षा के बारे में ज्यादातर विमर्श दूसरे देशों से तुलना से पैदा होता है। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट (पीसा) ने 2012 के अपने नतीजों में अमेरिकी छात्रों को गणित में 27वें और रीडिंग में 17वें स्थान पर रखा था। लेकिन समग्र तौर पर भले ही अमरीकी बच्चे पिछड़ते दिखाई पड़ रहे हों, मजबूत बच्चे कतई पीछे  नहीं हैं। उदाहरण के लिए वार्षिक इंटरनेशनल मैथ ओलंपियाड में, जहां प्रत्येक देश अपने बेहतरीन 6 बच्चों को बेहद मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिए भेजता है, अमेरिका लगातार तीन शीर्ष देशों में जगह बनाए हुए है।

लेकिन जैसा कि पीसा के आंकड़े बताते हैं, इसमें शानदार प्रदर्शन करने वाले देश सिर्फ अमीरों के ही नहीं, बल्कि हर बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा का इंतजाम करते हैं। दुर्भाग्य से इस मामले में अगर दुनिया के 33 अमीर देशों से तुलना करें तो अमेरिका का रिकॉर्ड बहुत खराब है। 15 वर्ष तक के बच्चों के नामांकन के मामले में यह तीसरा सबसे कम नामांकन वाला देश है (करीब 20 प्रतिशत अमेरिकी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)। और स्कूल असमानता के लिहाज से अमेरिका सबसे बुरा प्रदर्शन करने वालों में 9वें स्थान पर हैं- यहां अमीर और गरीब बच्चों के बीच प्राप्तांकों में भारी अंतर दिखाई देता है। हर कोई जानता है कि हमारे स्कूल असमान हैं। पर कम लोग स्वीकार करते हैं कि स्कूलों के बीच असमानता असल में वैश्विक स्तर पर हमारे खराब प्रदर्शन का कारण है।

अगर शैक्षिक असमानता ही अहम मुद्दा है तो डिजिटल टेक्नोलॉजी के जखीरे खड़े कर देने से स्थितियां नहीं बदलने वालीं। टेक्नोलॉजी प्रदत्त विस्तारण का यह संभवतः सबसे कम समझा गया पहलू है। एक कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी शिक्षामंत्री अर्ने डंकन ने शिक्षा में टेक्नोलॉजी के उपयोग को बढ़ाने (45 गुना टेक्नोलॉजी और शिक्षक मात्र 25 गुना) की वकालत करते हुए कहा, ‘टेक्नोलॉजी उन गरीबों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण छात्रों के लिए बरबरी के अवसर पैदा करती है, जिनके पास घर में लैपटॉप या आईफोन नहीं हैं’, लेकिन यह सोच एक खुशफहमी से ज्यादा कुछ नहीं; यह भ्रामक है और गलत दिशा में ले जाता है। टेक्नोलॉजी संपत्ति व उपलब्धियों में पहले से मौजूद असमानता को और ज्यादा बढ़ा देती है। ज्यादा शब्दभण्डार वाले बच्चे विकीपीडिया से ज्यादा हासिल करते हैं। वीडियो गेम्स मानसिक रूप से कमजोर बच्चों में भटकाव को बढ़ा देते हैं। अमीर माता-पिता अपने बच्चों के लिए डिजिटल प्रणालियों की प्रोग्रामिंग सिखाने वाला ट्यूटर लगा सकते है, जबकि दूसरे बच्चे इन प्रणालियों को महज चलाना भर सीख रहे होते हैं। स्कूल में टेक्नोलॉजी पहुंच के लिहाज से बराबरी से खेलने के मौके पैदा कर सकती है, लेकिन ऐसे मौके खिलाड़ी के कौशल में कोई इजाफा नहीं करते। शिक्षा के लिहाज से यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यूनिवर्सिटी ऑफ कलिफोर्निया, इरविन में प्रोफेसर और एजुकेशनल टेक्नोलॉजी क्षेत्र के शीर्ष दिग्गजों में शुमार मार्क वार्शौर कहते हैं, ‘स्कूलों में सूचना एवं संचार टेक्नोलॉजी के प्रवेश से असमानता के मौजूदा रूपों का ही विस्तार होता है।’

अगर टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में काम कर रहे अभिभावक अपने बच्चों के मामले में सही हैं, तो अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था को चाहिए कि वह टेक्नोलॉजी को बढ़ाने के बजाय जरूरतमंद बच्चों के लिए अच्छे शिक्षकों के इंतजाम पर ज्यादा ध्यान दे। नजारा बेशक डरावना और चुनौतीपूर्ण है, मगर शैक्षिक अवसरों में असमानता की बीमारी को टेक्नोलॉजी की तगड़ी खुराक से दुरुस्त नहीं किया जा सकता। मुंह बाए खड़ी सामाजिक-आर्थिक खाई को लक्ष्य किए बिना टेक्नोलॉजी खुद ब खुद इसे पाट नहीं सकती, उलटे यह इसे और चौड़ा कर देगी।

(यह लेख केंटारो टोयामा की आने वाली पुस्तक ‘गीक हैरेसी: रेसक्यूइंग सोशिअल चेंज फ्रॉम द कल्ट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ से लिया गया है.)

अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

सरकारी स्कूल में पढ़ाने का सार्थक कदम : अनुराग

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राजधानी दि‍ल्‍ली के मटि‍याला वि‍धानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक गुलाब सिंह ने अपने छोटे बेटे का पब्लिक स्कूल से नाम कटाकर उसका दाखिला
सरकारी स्कूल में करवा दि‍या है। स्थानांतरण प्रमाण-पत्र नहीं मिल पाने के कारण वह निजी स्कूल में पढ़ रहे अपने बड़े बेटे का दाखिला सरकारी स्कूल में नहीं करवाया सके। वह 10वीं कक्षा का छात्र है।अगले वर्ष उसका दाखिला भी सरकारी स्कूल में करवा दिया जाएगा।

ऐसे समय में जब शि‍क्षा का नि‍जीकरण तेजी से हो रहा है और उच्‍च ही नहीं, मध्‍य और नि‍म्‍न वर्ग भी सरकारी स्‍कूलों की अपेक्षा घर-घर दुकान की तरह खुले तथाकथि‍त पब्‍लि‍क स्‍कूलों को प्राथमिकता दे रहा है, वि‍धायक गुलाब सिंह का अपने बच्‍चों को पब्‍लि‍क स्‍कूल से सरकारी स्‍कूल में पढ़ाने का फैसला साहसि‍क और प्रशसंनीय है।

वि‍धायक बेटे के सरकारी स्‍कूल में पढ़ने से उस स्‍कूल की शि‍क्षा और प्राशसि‍नक व्‍यवस्‍था पर सकारात्‍मक असर पडे़गा। इसका लाभ उस स्‍कूल में पढ़ रहे अन्‍य बच्‍चों को भी प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से मि‍लेगा। दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍थि‍ति‍ है कि‍ नौकरशाहों, सरकारी कर्मचारि‍यों, सम्‍पन्‍न लोगों और मध्‍यवर्ग ने भी अपने बच्‍चों को सरकारी स्‍कूलों में पढ़ाना बंद कर दि‍या है। सि‍फारि‍श कराएंगे, मोटा डोनेशन और हर महीने अच्‍छी-खासी फीस देंगे, बीच-बीच में स्‍कूल को चढ़ावा चढ़ाते रहेंगे और
इस सबका रोना भी रोएंगे, लेकि‍न बच्‍चे के लि‍ए स्‍कूल चाहि‍ए ऐसा, जि‍सके नाम के आगे पब्‍लि‍क स्‍कूल, कांवेंट स्‍कूल जैसे शब्‍द जुडे़ हों। उस स्‍कूल में क्‍या पढ़ाया जाता है और कितने योग्‍य अध्‍यापक उस स्‍कूल में हैं, इससे उसे कोई खास मतलब नहीं होता। अभिभावकों ने मान लिया
है कि पब्‍लिक या कांवेट शब्‍द ऐसे ही अच्‍छे स्‍कूल की गारंटी हैं, जैसे सामना खरीदने में आइएसआइ चिह्न का होना। हमारी इसी मानसि‍कता ने सरकार को मौका दे दि‍या है कि‍ वह सरकारी स्‍कूल नहीं खोल रही है और जो खुले हैं, उन्‍हें या बंद कि‍या जा रहा है या पीपीपी मॉडल के नाम नि‍जी हाथों को सौंपा जा रहा है। ऐसे में और सरकारी स्‍कूल खोलने की बात करना भी बेईमानी है।

हर साल की तरह आजकल इस बार फि‍र कई स्‍कूलों में फीस और एनुअल चार्ज में बेतहाशा वृद्धि‍ के खि‍लाफ अभि‍भावकों का आंदोलन चल रहा है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, शासन-प्रशासन से गुहार लग रहे है, कुछ ने न्‍यायालय का दरवाजा भी खटखटाया है और कई जगह तो स्‍कूल प्रबंधन और अभि‍भावकों के बीच झड़प भी हो चुकी है, लेकि‍न इस सबका परि‍णाम क्‍या नि‍कलेगा? बहुत हुआ तो फीस व एनुअल चार्ज में दो-चार प्रतिशत की कमी और मामला रफादफा। अब तो हर साल यह सब एक रस्‍म अदायगी जैसा होना लगा है। शायद ये निजी स्‍कूल वाले भी इसके लिए तैयार रहते हैं। इसलिए वे पहले ही तीस-चालीस प्रतिशत तक बढ़ोत्‍तरी कर देते हैं। ऐसे में पांच-सात प्रतिशत कम करने पर भी उन पर कोई खास असर नहीं पड़ता।

इस समस्‍या का स्‍थाई समाधान शिक्षा के सरकारीकरण में ही है। सरकार स्‍कूल खोले, उनमें व्‍यवस्‍थागत खामियां दूर करे और अध्‍यापकों को गैरसरकारी कार्यों में न लगाए। शिक्षकों को अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। स्‍कूलों में शिक्षा के स्‍तर सुधार होगा तो अभिभावक भी इस ओर कदम बढ़ाएंगे। बकौल उत्‍तराखंड के बागेश्‍वर जिले के गरुड खंड के खंड शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्‍वत उनके खंड के स्‍कूलों में सभी शिक्षकों सहयोग से शिक्षा का स्‍तर बेहतर हुआ है। इसका परिणाम है कि कई अभिभावकों ने अपने बच्‍चों का निजी स्‍कूलों से निकालकर सरकारी स्‍कूलों में एडमिशन कराया है। यह अनुभव बहुत कुछ कहता है।

अभिभावकों को इसके लिए आगे आना होगा। कल्‍पना कीजिए कि किसी मंत्री, सचिव, आइएएस अधिकारी या किसी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति का बच्‍चा सरकारी स्‍कूल में पढ़ता है। वह अपने पिता को स्‍कूल की शिक्षा और वहां की कमियों के बारे में बताता है तो उसका तुरंत और प्रभावशाली ढंग से समाधान होगा।

विधायक गुलाब सिंह का कथन महत्‍वपूर्ण है कि नेता लोगों के बीच बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उस पर खुद अमल नहीं करते। यहां नेताओं के साथ ही अन्‍य लोगों को शामिल कर लिया जाए तो स्‍थिति यही है। विधायक गुलाब सिंह ने तो एक शानदार पहल की है। हम न जाने कब इस ओर कदम बढ़ाएंगे।