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संवेदनापरक लघुकथायें : संतोष दीक्षित

क‍थाकार वीरेन्‍द्र नारायण झा का लघुकथायें विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर खासी चर्चित हुई हैं। उनके लघुकथा संग्रह ‘भगवान भरोसे’ पर संतोष दीक्षित की टिप्‍पणी-

आज के इस रफ्तारपसंद समय में सबकुछ फटाफट करने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से पनप रही है। लघुकथाओं को भी साहित्य की फटाफट विधा कहा जा सकता है क्योंकि आज के समय में इसकी प्रासंगिकता काफी बढ़ चुकी है। यद्यपि लघुकथा के प्रचलन के साथ ऐसी बात नहीं। यह पुरानी विधा है और काफी पहले से एवं लगातार लिखी जा रही है। आज के समय में इसके बढ़ते प्रचलन का एक कारण इसका लघु आकार एवं सीमित शब्द संख्या तो है ही, जिसके कारण इसे फटाफट पढ़ा जा सकता है। लेकिन साहित्य और कला की दुनिया के लिए यह कोई उल्लेखनीय मानदंड नहीं। जाहिर है कि लघुकथाओं में आकार के अतिरिक्त भी कुछ ऐसा है जिसे ‘देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’ जैसी उक्ति के साथ ही समझा जा सकता है। लघुकथा का इल्म और शिल्प इसी में है कि कितने कम से कम शब्दों का इस्तेमाल का हम कितनी मारक बात कह सकते हैं। यह बूंद में समुद्र का एहसास कराने से लेकर गागर में सागर भरने जैसा कठिन सृजनात्मक संकल्प है। इसीलिए इस विधा में उसी को पैठने का अवसर मिल सकता है जो इस कला के उस्ताद हो। वीरेन्द्र नारायण झा भी ऐसे ही उस्तादों की परंपरा की एक कड़ी के रूप में उभरते दीख पड़ते हैं। उनके लघुकथा संग्रह ‘भगवान भरोसे’ को पढक़र उनकी सृजनधर्मिता के प्रति इतना भरोसा तो किया ही जा सकता है।

वीरेन्द्र मिथिलांचल के हैं। वर्ष दर वर्ष बाढ़ की विभीषिका झेलते क्षेत्र के। यह विभीषिका कई जगह पूरी मार्मिकता के साथ तो कई जगहों पर चुटीले व्यंग्य के रूप में प्रकट हुई है इस संग्रह के ‘भगवान भरोसे’, ‘कटाक्ष’, ‘सपना’, ‘परदेशी’ जैसी लघुकथाओं में। पुस्तक का आवरण पृष्ठ भी इसी प्राकृतिक आपदा से जूझते लोगों के एक दृश्य को समर्पित है। ‘भगवान भरोसे’ संग्रह की बहुत सारी लघुकथायें संवेदनापरक हैं। यद्यपि लघुकथाओं में व्यक्त संवेदना इकहरी होती है लेकिन वीरेन्द्र झा ने कुछ लघुकथाओं में ऐसा कौशल दिखलाया है कि वह अपनी एक अमिट छवि हमारे हृदय पर अंकित कर जाती हैं। ‘शिक्षा’, ‘लेबर डे’, ‘दुखिया की भूख’, ‘सखी’, ‘स्वांग’, ‘नृशंस’, ‘उष्मा’, ‘मिट्टी की औरत’ आदि लघुकथाओं को इस दृष्टि से देखा, परखा जा सकता है।

आज के समय में बाजार और राजनीति को दरकिनार कर नहीं चला जा सकता। इस संग्रह में भी इन विषयों पर गंभीर लघुकथाएं हैं। ‘बाजार’, ‘शरण’ आदि के साथ-साथ राजनीतिपरक लघुकथाओं के रूप में ‘आग’, ‘बचाव’, ‘जातिवाले’, ‘झंडा’ आदि लघुकथाओं को रखा जा सकता है। लेखक आज के समाज में हो रहे परिवर्तनों से भी नावाकिफ नहीं। इसकी झलक ‘बच्चे की खुशी’, ‘खेल खेल में’ तथा ‘अपहरण’ जैसी अनेक लघुकथाओं में पायी जा सकती है। ‘पेड़ की जुबान से’ तथा ‘बदजात’ जैसी लघुकथाओं के माध्यम से लेखक की पर्यावरण सम्‍बन्‍धी चिंता जाहिर होती है।

वीरेन्द्र झा निश्चित रूप से एक रेखांकित किये जाने योग्य लघुकथाकार के रूप में इस संग्रह के माध्यम से उभरते हैं। उनके रचना कौशल की बानगी ‘नाइन्‍साफी’, ‘रिश्ते’, ‘ईमानदारी’, ‘डैशिंग अफसर’ जैसी लघुकथाओं में देखी जा सकती है। इस संग्रह में कुछ भर्ती की लघुकथाएं भी हैं। इससे बचा जा सकता था। कुल मिलाकर इस लघुकथा संग्रह में समकालीन जीवन की हलचल के साथ-साथ समकालीन समाज की विरूपताएं भी खुलकर प्रकट हुई हैं। लघुकथा जगत में इस संग्रह का स्वागत किया जाना चाहिए।

पुस्तक : भगवान भरोसे (लघुकथा संग्रह), मूल्य : 180/- रुपये मात्र
लेखक : वीरेन्द्र नारायण झा
प्रकाशक : साहित्य संसद, आर.जेड-35बी, गली नम्‍बर- 1ए, कैलाशपुरी एक्‍सटेंशन, नई दिल्ली-110045