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कवि‍ता जि‍न्‍दगी की ओर ले जाती है : पवि‍त्रन तीकूनी

पवि‍त्रन तीकूनी

केरल के तीकूनी में जन्मे युवा मलयालम कवि‍ पवि‍त्रन तीकूनी के दस काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्‍हें कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानि‍त कि‍या जा गया है। केरल दिवस के दौरान विशाखपटणम पहुँचे पवित्रन तीकूनी से हिन्‍दी एवं मलयालम कवि व बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्स द्वारा लिया गया साक्षात्कार-

संतोषः आपने कवितायें लिखना कब शुरू किया ? पहली कवि‍ता कब और कहाँ प्रकाशित हुई ?
पवित्रन: मैं अस्सी के अंतिम दौर में कवितायें लिखने लगा। मेरी पहली कविता ‘चंद्रिका’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। कविता का शीर्षक था- ‘रोसापूवूम मेषुकुतिरियुम़’ (गुलाब का फूल व मोमबत्ती)।

संतोष: ‘मुरीवकलुडे वसंतम’ (घावों का वसंत) से ‘कुरीदिक्कु मुनपु’ (हत्या से पहले) तक की यात्रा को आप कैसे आँकते हैं ?
पवि‍त्रन: मेरा जीवन बहुत ही कठिनाइयों से गुजरा। पिताजी की मानसिक हालत खराब थी, जिसके चलते माँ ने दूसरी शादी की। घर में कमानेवाला कोई नहीं था इसलिये मैं चौथी कक्षा में पढ़ते वक्त घर छोड़कर भाग कर कण्णूर पहुँचा। वहाँ एक होटल में काम करने लगा।

एक नवम्बर की बात है। वहीं पास के एक स्कूल में बाल दिवस पर प्रतियोगितायें हो रही थीं। मैंने भी प्रतियोगिता में भाग लिया और मुझे पुरस्कार मिला। पुरस्कार देते समय मुझसे मेरे स्कूल का नाम पूछा तो मैं चुप रहा। तो मन में फिर से पढ़ने की इच्छा जागी।

मैं घर वापस आ गया। घर के पास स्थित स्कूल में पढ़ने लगा। ‍पि‍ताजी स्कूल जाते हुए बच्चों पर पत्थर फेंकते और गाली-गलोच करते। पिताजी की इस हरकत से तंग आकर मैं घर से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित वटटोली हाई स्कूल में पढ़ने लगा। दसवीं कक्षा पहली श्रेणी में पास हुआ। फिर मुंगेरी सरकारी कॉलेज में इंटरमीडिएट के लिये दाखिल हुआ और पहली श्रेणी में पास हुआ।

इस बीच फिर से पिताजी के कारण मुझे घर छोड़कर भागना पडा़। इस बार मैं वयनाड जिले में पहुँचा। वहाँ एक नाई के घर आश्रय मिला। उनके साथ रहकर नाई का काम सीखा। इस बीच माही के सरकारी कॉलेज में बी.ए. में एडमि‍शन मिला। लेकिन मेरा नसीब ठीक नहीं था। मेरी बहन की शादी करवानी थी। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। इसलिये बीस साल की उम्र में मुझे शादी करनी पडी़। मुझे जो कुछ मि‍ला उसे बहन को देकर उसकी शादी करवा दी।

मुसीबत फिर भी नहीं टली। दो साल बाद बहन अपने बच्चे को लेकर वापस घर आ गयी। मैं पूरी तरह टूट गया और अपनी बीवी और दो बच्चों को लेकर अलेप्पी पहुँचा। वहाँ पर अपनी बेटी को नोचकर, रुलाकर भीख मांगी ताकि पापी पेट को पाला जाय।ऐसे में एक दिन भीख मांगते समय मुझे एक आदमी ने पुकारा। वह मुझे समीप के एक कार्यालय में ले गया। वहाँ पर राजन कैलाश नामक कवि ने मुझे गले लगाकर पूछा, ‘‘आप पवित्रन तीकूनी हैं न?’’ मैं अवाक रह गया। उन्होंने मुझे मेरा एक काव्य सग्रंह दिखाया और कहा, ‘‘तुम कवितायें लिखना मत छोडो़। तुम्हारी कविताओं में जिन्दगी है।’’ तब से आज तक मैंने जीने के लिये कई काम किये, लेकिन कविता का सहारा नहीं छोडा़।

आज मैं जो भी हूँ वह कविता के कारण ही है। कविता को जानने से पहले मैंने कविता लिखना शुरू किया। जैसे-जैसे मैं कवितायें लिखता गया, वे प्रकाशित होती गईं। अब मैं कविताओं को जानकर लिख रहा हूँ।

संतोषः आपने किन-किन कवियों को पढा़ है और किन-किन कवियों ने आपको प्रभावित किया है ?
पवित्रन: जैसे मैंने आपको बताया जिन्‍दगी की आपाधापी में मुझे पढ़ने का समय नहीं मिला। इंटरमीडिएट की पढा़ई के बाद अन्य कवियों को पढ़ने लगा। के. सच्चिदानंदन, अयप्प पणिकर, बालचंद्रन चुल्लकाड, कुरीपुषा श्रीकुमार आदि की कवितायें मुझे अच्छी लगती हैं लेकि‍न किसी का खास प्रभाव मुझ पर नहीं है।

संताषः 1990 से 2000 के साल केरल की कविता के इतिहास में अनोखे हैं। इस दौरान आपको मिलाकर ग्यारह कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। वरिष्ठ कवि श्री आटूर रविवर्मा ने इन दस कवियों पर ‘पुदुमोषीवषिकल’ (नये रास्ते) नामक किताब का सम्‍पादन करते हुए इन कवियों को साहित्यिक जगत से परिचित करवाया। इस किताब में आपको शामिल नहीं किया गया। कोई खास वजह?
पवित्रनः मुझे इसका कोई गम नहीं है। मैं किसी भी कवि द्वारा चलाये जी रही संस्थाओं में अपने को शामिल नहीं करता। तब भी और आज भी मैं जि‍न्‍दगी के एक छोटे से रास्ते से गुजर रहा हूँ। मेरा विश्‍वास है कि कविता मृत्यु की ओेर नहीं, बल्कि जिन्‍दगी की ओर ले चलती है।

मैंने और कवि मित्र एस. जोसफ ने ऐसी कवितायें लिखीं जो पहले किसी ने नहीं लिखीं। मछली बाजार, वहाँ का माहौल आदि पर हमने कवितायें लिखीं। कविता के लिये जो जगह मना थी, हम वहाँ चले गये और उन अवस्थाओं पर कवितायें कीं क्योंकि हमारा विश्‍वास था कि वहाँ भी जिन्‍दगी है और वहाँ भी लोग रहते हैं।

इसलिये आपके द्वारा बताए संग्रह में शामिल कवियों की अपेक्षा मेरी कविताओं को पाठकों ने पहचाना और सराहा है। इसके लिये मैं पाठकों का आभारी हूँ। अब तक मेरे नौ काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सब मिलाकर मैंने अब तक 600 कवितायें लिखी हैं।

संतोषः आपकी कविताओं में मार्क्सवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। आपको नहीं लगता कि आज मार्क्सवाद अपनी प्रासंगिकता खो चुका है?
पवित्रनः यह सही है कि मेरी कविताओं में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव है। मेरी राय में मार्क्सवाद दुनिया का सबसे उत्कृष्ठ सिद्धान्त है। लेकिन खेद की बात है कि इसको सही मायने में न समझा गया और न ही अमल किया गया। आज मार्क्सवाद अपने सिद्धान्तों से कोसों दूर है।

संतोषः तेलुगु के महाकवि श्री श्री ने इस प्रकार बताया है, ‘कुछ भी कविता बनने में अक्षम नहीं है, लेकिन शिल्प पक्ष मुख्य है।’ आपकी राय में अच्छी कविता क्या है?
पवित्रनः हाँ, यह सही है कि कविता में शिल्प पक्ष महत्वपूर्ण है लेकिन केवल शिल्प पक्ष पर ध्यान देने से कविता नहीं बनती। कविता पढ़ने के बाद पाठक यदि मेरी पक्तियों में अपनी जिन्‍दगी के किन्ही क्षणों या अवस्थाओं से अपने को जोड़ पाये तो मैं अपने को कृतार्थ महसूस करूँगा। मेरी राय में कविता में आप जिन्‍दगी को पढ़ पायें तो वही अच्छी कविता है।

संतोषः आपने कई विषयों पर कवितायें लिखी हैं।आपकी शैली में एकरूपता आती जा रही है। आपके समकालीन कवियों में भी यह समस्या है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे बच निकलना है?
पवित्रनः हाँ, मैं यह मानता हूँ, मेरे लिये कविता एक प्रवाह है। मैंने अब तक जो कवितायें लिखी हैं, उनमें से कोई भी कविता जबरदस्ती नहीं लिखी गई है। अपनी शैली से हटना आसान नहीं है। ‘वीटीलेकुल्ला वषीकल’ (घर की ओर का रास्ता) कविता में मैंने एक अलग शैली में कविता लिखी है। यह सही है कि मेरे समकालीनों की शैली में भी एकरूपता है। बदलाव जरूरी है। मेरा विश्‍वास है कि मेरे मित्र भी इससे छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे।

संतोषः ‘सौजन्यम’ (मुफ्त), ‘पटटम’ (पंतग) आदि कविताओं में आपने गाँधीजी का जि‍क्र कि‍या है। क्‍या आप मानते हैं कि‍ गाँधी जी आज भी प्रासंगिक हैं?
पवित्रनः गाँधी जी युग पुरुष थे। सत्‍य और अहिंसा के उपासक थे। उनका कहना था कि यदि आपको कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी दि‍खायें। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। क्‍योंकि‍ आज के समय में व्‍यक्‍ति‍ इतना वि‍नयशील बनें, यह सम्‍भव नहीं होता। अहिंसा का मार्ग अच्‍छा है लेकि‍न सहने की भी तो एक हद होती है।

संतोष : आज साहि‍त्‍य, राजनीति‍ और धर्म अपने लक्ष्‍यों से हट गये हैं। इसके प्रति‍ आपकी क्‍या प्रति‍क्रि‍या है?
पवि‍त्रन: आज व्‍यक्‍ति‍ अपने स्‍वार्थ के लि‍ये कि‍सी भी राजनीति‍क दल, संस्‍था से जुड़ जाता है। जब कोई दल सत्‍ता में है तो वह कई समस्‍याओं को स्‍वीकारता है, वही दल जब वि‍पक्ष में बैठता है तो उन्‍हीं बातों को नकारता है। आज राजनीति‍ मौकापरस्‍त ज्‍यादा व समाज सेवा कम करती है। जहाँ तक साहि‍त्‍य की बात है, यहाँ भी राजनीति‍ हावी होने लगती है। यही बात धर्म की भी है। राजनीति‍ का हस्‍तक्षेप धर्म और साहि‍त्‍य में नहीं होना चाहि‍ये।

संतोष : आपकी कवि‍ताओं का अनुवाद हि‍न्‍दी, अंग्रेजी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में हुआ है। क्‍या कवि‍ता का अनुवाद न्‍यायोचि‍त है ?
पवि‍त्रन: मैंने अनुवाद पढ़ा है। तमि‍ल कवयि‍त्रि‍यों तथा स्‍पेन की एक हजार साल पुरानी कवि‍ताओं का मलयालम अनुवाद पढ़ा है। उसी प्रकार हि‍न्‍दी में केदारनाथ सिंह और एकांत श्रीवास्‍तव की कवि‍ताओं को अनुवाद के माध्‍यम से पढ़ा। कवि‍ताओं का अनुवाद बहुत ही कठि‍न काम है। एक पौधे को उसकी मि‍ट्टी से उखाड़ कर दूसरी मि‍ट्टी में लगाना अनुवाद है। अगर यह ध्‍यान से नहीं कि‍या गया तो नतीजा बुरा हो सकता है। आप अनुवाद के क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहे हैं। साहि‍त्‍य जगत को आप जैसे अनुवादक की जरूरत है जो बडे़ लगन और नि‍ष्‍ठा से अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं। अनुवादक की बदौलत ही एक भाषा का रचनाकार को दूसरी भाषा से परि‍चि‍त हो पाता है।

संतोष : मछली बेचना आपका पेशा है। क्‍या आपको लगता है कि‍ कहीं-न-कहीं एक कवि‍ की छवि‍ को इससे ठेस पहुँची है?
पवि‍त्रन : पाठकों से मेरा अनुरोध है कि‍ मेरी कवि‍ताओं को स्‍वीकारें, न कि‍ मेरे पेशे पर जायें। पापी पेट को पालने के लि‍ये मैं बाजार में मछली बेचता हूँ। हाँ, कभी-कभी साहि‍त्‍यि‍क खेमों में मुझे अपने पेशे के कारण वह आदर नहीं मि‍लता जो मुझे मि‍लना चाहिये।

लेकि‍न यह बताते हुए मुझे गर्व महसूस होता है कि‍ केरल में खासकर मलबार इलाके के कई प्रसि‍द्ध कॉलेजों में मुझे मुख्‍य अति‍थि‍ के रूप में आमंत्रि‍त कि‍या गया। मुझे कई साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों का उद्घाटन करने का सौभाग्‍य मि‍ला। यह सब इस बात का सबूत है कि‍ लोग मेरे पेशा नहीं, बल्‍कि‍ मेरी कवि‍ताओं को चाहते हैं। यही नहीं केरल में इंटरमीडि‍एट और बी.ए. मलयालम के लि‍ये मेरी कवि‍ताओं को चुना गया है। इससे ज्‍यादा खुशी मेरे लि‍ये क्‍या हो सकती है।

संतोष : आपको अब तक प्राप्‍त पुरस्‍कारों के बारे में कुछ बताएं?
पवि‍त्रन: मुझे अब तक लगभग बारह पुरस्‍कार मि‍ल चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं- कनक श्री पुरस्‍कार, इंडि‍यन जेसीस पुरस्‍कार, आशान पुरस्‍कार, रहीम एचेरी पुरस्‍कार, पंतजलि‍ पुरस्‍कार और कैरली पुरस्‍कार।

संतोष : आपकी नई योजनाएं क्‍या हैं? कोई नया काव्‍य संग्रह नि‍कट भवि‍ष्‍य में प्रकाशि‍त होने वाला है?
पवि‍त्रन : डी.सी. बुक्‍स की ओर से मेरा नया कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त होने वाला है। पहली बार एक उपन्‍यास लि‍ख रहा हूँ। इस यात्रा (आंध्र प्रदेश की यात्रा) के आधार पर आंध्र प्रदेश के स्‍कैचस शीर्षक से कुछ नई कवि‍तायें लि‍खी हैं और कुछ वापस जाकर लि‍खूँगा।

संतोष : आशा करता हूँ कि‍ आप ज्‍यादा कवि‍तायें लि‍खें और आपको ज्‍यादा कामयाबी मि‍ले। आपने समय दि‍या इसके लि‍ये आभारी हूँ।
पवि‍त्रन : धन्‍यवाद आपको भी। अनुवाद के क्षेत्र में आप और भी नये रचनाकारों को परि‍चि‍त करायें।

पागलपन: माधवी कुटटी

अंग्रेजी की प्रख्यारत लेखिका कमला दास ( 31 मार्च, 1934- 31 मई, 2009)  मलयालम में माधवी कुटटी के नाम से लिखती थीं। उन्हेंल आत्म कथा ‘माई स्टोरी’ से काफी शोहरत मिली। केरल के त्रिचूर जिले में जन्मीं कमला दास की अंग्रेजी में ‘द सिरेंस’, ‘समर इन कलकत्ता’, ‘दि डिसेंडेंट्स’, ‘दि ओल्डी हाउस एंड अदर पोएम्स ’, ‘अल्फाेबेट्स ऑफ लस्ट’’, ‘दि अन्ना‘मलाई पोएम्सल’ और ‘पद्मावती द हारलॉट एंड अदर स्टोरीज’  आदि बारह पुस्तजकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मलयालम में ‘पक्षीयिदू मानम’, ‘नरिचीरुकल पारक्कुम्बोल’, ‘पलायन’, ‘नेपायसम’, ‘चंदना मरंगलम’ और ‘थानुप्पू’  समेत पंद्रह पुस्ताकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्ष 1984 में कमला दास नोबेल पुरस्कामर के लिए नामांकित हुईं। इसके अलावा उन्हेंि एशियन पोएट्री पुरस्कारर(1998), केन्ट पुरस्काार (1999), एशियन वर्ल्डस पुरस्कारर (2000), साहित्यत अकादेमी (2003), वयलॉर पुरस्काोर (2001), केरल साहित्य9 अकादेमी पुरस्कालर (2005) आदि से सम्मादनित किया गया।
उनकी इस कहानी का अनुवाद युवा कवि‍ और अनुवादक संतोष अलेक्से ने कि‍या है-

कई लोगों से सुनने के बाद ही मैं यकीन कर सकी कि अरुणा पागल हो गयी है। दिल्ली से आने के दूसरे ही दिन मैं उसके घर गयी। अरुणा की सुन्‍दर नेपाली नौकरानी ने दरवाजा खोला। वह हँसी और उसके दाँतों में पान चबाने के कारण लगे दाग दिखाई दिये।

‘‘तुम्हारी मालकिन कहाँ है ?’’ मैंने पूछा।

‘‘मालकिन बीमार है।’’ उसने कहा, ‘‘पाँच महीने हो गये।’’ उसके बताये हुये कमरे में मैंने देखा कि अरुणा ने लाल साड़ी पहनी हुई थी और चारपाई पर बैठकर छत की ओर देख रही थी।

‘‘अरुणा तुझे क्या हुआ।’’ मैंने पूछा, ‘‘तू इतनी दुबली कैसे हो गयी है।’’

वह आकर मरे गले लग गयी। उसके बालों में पसीने की गंध थी। अरुणा मेरे गले में हाथ डालकर मुझे देखती रही।

‘‘तू  इतने दिनों से मुझे मिलने क्यों नही आई ?’’ उसने पूछा, ‘‘क्या तू मुझे नापसंद करने लगी?’’

‘‘बता, तुझे कौन नापसंद करने लगा ? ’’

‘‘वो… मेरे पति।’’

‘‘मुझे विश्‍वास नहीं होता। तुझे गलतफहमी हो गयी है। तुझसे नफरत करने का कोई कारण ही नहीं है।’’

अरुणा बिस्तर पर लेट गई। ‘‘वह सब तू विश्‍वास नहीं करेगी विमला।’’ उसने कहा, ‘‘आजकल मेरी बातों का कोई विश्‍वास नहीं करता। वे कहते हैं कि मैं पागल हूँ। मैं बच्चों को सताती हूँ। चाकू से मैं लोगों को डराती हूँ। तूने यह सुना होगा।’’

‘‘ये सब बातें कौन फैलाता है।’’ मैंने पूछा।

‘‘मेरे पति और… बाकी सब। अब बच्ची भी मेरे पास नहीं आती। मेरी सास उसको ले गयी। पिछले महीने जब मैंने रोकर, हल्ला मचाया तब वे बच्ची को लेकर आये। लेकिन बच्ची ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा,  ‘माँ,  तू पागल है’।’’

‘‘यह सब कब शुरू हुआ ?’’ मैंने पूछा।

‘‘मुझे याद नहीं है।’’ अरुणा ने कहा,  ‘‘मुझे समय का कोई ज्ञान नहीं है। वे कहते हैं कि मैंने पति की हत्या करने की कोशिश की, चाकू लेकर उनका पीछा किया। विमला! तू ही बता, क्या मैं यह सब कर सकती हूँ?’’

मैंने केवल सिर हिलाया।

‘‘पड़ोसी मुझसे डरते हैं। उन्होंने मेरी नौकरानी से पूछा कि मेरा पति मुझे पागलाखाने क्यों नहीं ले जाते ?’’

‘‘किसने कहा?’’ मैंने पूछा।

‘‘वही फूलमती। तू उसे जानती नहीं है न। अब वह इस घर की रानी है। अब मेरे पति के साथ बिस्तर भी बाँटने लगी है।’’

‘‘नहीं, अरुणा,  यह सब गलत है। तुझे गलतफहमी हो गयी होगी।’’ मैंने कहा।

‘‘मेरी बातों पर कोई विश्‍वास नहीं करता।’’ वह बुदबुदायी।

‘‘तू यहाँ से चली क्यों नहीं जाती?” मैंने पूछा, ‘‘अगर बात सही है तो अपमानित होकर यहाँ क्यों रहती है ?  तू अपने पिताजी के पास जा सकती है न ?’’

‘‘यह नहीं हो सकता।’’ अरुणा ने कहा, ‘‘बीच-बीच में रात को बत्ती जलाकर देखती हूँ तो पति को सोया पाती हूँ। दोनों हाथों के नीचे सिर रखकर बच्चों के समान सोते हैं। विमला,  मेरे पति कितने सुन्‍दर लगते हैं सोते हुये। उन्हें देखकर सारे दु:ख भूल जाती हूँ। नहीं,  मैं उनको छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी। विमला तू समझ रही है न !’’

एल थॉमस कुट्टी की कवि‍ताएं

एल थॉमस कुट्टी

युवा मलयालम कवि एल. थॉमस कुट्टी के दो कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुके हैं। इसके अलावा थिएटर एवं नाटकों पर भी एक किताब प्रकाशित। थिएटर एवं फोल्कलोर के लिये मशहूर। कोजिकोड विश्‍ववि‍द्यालय के मलयालम विभाग में एसोसिएट प्रोफ्रेसर के रूप में कार्यरत। उनकी चार कवि‍ताएं। इनका अनुवाद बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्‍स ने कि‍या है-

बुखार

मैं
मिट्टी का मैला बिस्‍तर
आह, दवाई
एवं मेरा कमरा
बुखार से पीडित है

तेरे पास से
कफ की दुर्गन्‍ध आ रही है
हमारे बैल रूपी श्रृंगार में
पहले से ही बुखार था

पके हुए कौमार्य व
समाधान ढूँढनेवाले प्‍यासों के लिये
सीपियाँ बहती महानदी के
बिम्‍बों के लिये व
इकट्ठे हो रहे पवित्रताओं में
पहले से ही बुखार था

बुखार होते हुये भी
सारे रंगीन नामपट्ट
कल मेहमान बने
हरे से मारून
व सफेद से पीला निकला
बचपन में मैं
रंगों के घोल से
पगला गया

दिशा खोए हुए पतंग सा
मैंने टूटी दीवार पर
उड़ने की कोशिश की
मेरे रास्‍ते को रोककर
परछाइयों ने मुझे
दिव्‍य अनुभूतिहीनता व
शराब के बुरे असर के बारे में
सुबह की रोशनी में
टहनी कटे पेडों के बारे में
बसेरा लेने जगह ढूँढते
कौए के बारे में उपदेश दिया

मैं नींबू का नाश
व बेल की भलाई को भूल गया
मैंने
अकाल व धरती का स्‍त्रोत्र गाया

बुखार ने
सब कहीं उदासी को उतारा
दुनिया एक अपरिचित चीज बन गई
मैं गर्म माथा एवं
काँपते शरीरवाला
एक साधारण बुखार हूँ

मरणोपरांत

राष्‍ट्र के लिये हम
डेढ किलो भारवाले
बच्‍चों को पैदा करेंगे

राष्‍ट्र के लिये हम
नन्‍हे होठों में
राष्‍ट्रभाषा में देशभक्ति ठूँस देंगे

राष्‍ट्र के लिये हम
नन्‍ही पीठ पर दामों की सूची लगाकर
किंडरगार्डेन भेज देंगे

राष्‍ट्र के लिये उन्‍हें
पश्‍चि‍म की दादा-दादी की कहानियाँ
एवं प्रायोजित फीचर फिल्‍म दिखायेंगे

राष्‍ट्र के लिये हम
उनकी छाती को फूलायेंगे
एवं कद को बढा़येंगे

राष्‍ट्र के लिये उन्‍हें
बेरैक में सुलायेंगे
मारे जाने वाले को खानेवाले बनायेंगे
मारने का पाप
मारी गई वस्‍तु को खाने से मुक्‍त हो जाएगा

इस प्रकार नये साल में
मरणोपरांत वीरचक्र को
गले लगाकर रो पडेंगे

बालों का पकना

बालों के पकने से
मुझे डर लगता है
सुबह की रोशनी से भी

मैं बालों व आँखों में
काले रंग का उपयोग
करता हूँ

समय ने जो रोशनी दी
उसमें छिपाई गई सच्‍चाइयाँ
कठिन हो रहे हैं
शब्‍द दृष्टि एवं जिन्‍दगी

शुरू से अंत तक
सब जगह अंधेरा होने दो
फिर बीच में यह पवित्रता क्‍यों
जिन्‍दगी की भट्ठी
साफ बालोंवाला मुकुट प्रदान करती है

जब था

लो, तेरे लिये बालू
बडे़ हो जाओ
पालो पोसो
फिर उपेक्षा करो
लो, तेरे लिये
थोडा़ सा दर्द
गले में आवाज छिपकने तक
आहिस्‍ता से पियो खाओ
फिर इल्‍जाम लगाओ
जो भी रंगीन है
वह मेरा नहीं है
क्षण तो रूकता भी नहीं
मैं दाँत हूँ
सिंह के मुँह से गिरा

ओ.एन.वी. कुरुप की तीन कवितायें

ओ.एन.वी. कुरुप

27 मई 1931 को कोल्लम जिले के चवरा गाँव में ज‍‍न्‍में मलयालम के लब्धप्रतिष्ठ कवि ओ.एन.वी. कुरुप (ओट्टप्लाक्कल् नीलकंठन वेलु कुरुप) का रचना संसार काफी विस्‍तृत है। उन्‍हें साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, ज्ञानपीठ पुरस्‍कार, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी फेलोशिप, केरल विश्वविद्यालय से डी.लिट की उपाधि, पद्मश्री आदि से सम्‍मानित किया जा चुका है। सोवियत संघ, युगोस्लेविया, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी आदि कई देशों में देशों की यात्रायें की। कविता, डायरी, अनुवाद आदि विभिन्‍न विधाओं में 35 किताबें प्रकाशित। उनकी तीन कवितायें। इनका अनुवाद मलयालम के युवा कवि और बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्‍स ने किया है-

अपराधों का बयान

आज राह चलते दिखाई दी दीनता
व सुनाई पडे़ रूदन
मेरा पीछा करती है
जो अब भी मेरे दिल में हैं

वह पीडा़
शायद अदृश्य सलीब है
मेरी आत्मा की स्वर्णिम मूर्ति
उसे वहन करती है

इस दोरूखी जीवन में
मुश्किल रास्तों से गुजरते हुए
मुझे दिल की बात सुनाई देती है

दूसरों के दर्द में
तेज होती है मेरे दिल की धड़कन
शायद यही है मेरा बल
और मेरी दुर्बलता

मै अच्छे दिनों और अच्छे लोगों का
स्वप्न देखता हूँ
शायद यही मेरी बीमारी है
क्या इसका कोई इलाज है ?

छूने पर बजते तार-सी
कस गई है मेरी नसें
मेरे मन से रिसते हैं गीत
जैसे घाव से रिसता है खून

आज भी

आज भी आकाश घना है
कहीं सलीब पर
आज भी हमें प्यार करनेवाला
झटपटा रहा होगा

आज भी किसी रईस के भोज में
गरीब के मेमने को छीनकर
कोई वध कर रहा होगा 

आज भी कहीं
अपनों के खून से कोई
आँगन का लीपा-पोती कर रहा होगा 

आज भी आकाश घना है
कहीं एक बेचारी बहन पर
कोई अत्याचार कर रहा होगा

आज भी पडो़सी के
अँगूर के बाग को
कोई तबाह कर रहा होगा

आज भी हजारों गालों पर
खिलनेवाले केसर के फूलों को कोई
हड़प रहा होगा

आज भी थोडी़ से मृत सपनों के लिए
किसी के सीने में
जल रही होगी चिता

आज भी खुशी से
उड़ रहे नन्हे कपोत को
कोई बाण से गिरा रहा होगा

आज भी एक अधनंगे
बूढे़ को नमस्कार कर
कोई गोली चला रहा होगा

आज भी
आकाश घना होने पर
मेरा मन अंधकार से भर जाता है
क्या आज सूर्यास्त के बाद
सूरज फिर नहीं उगेगा ?

तू

यहाँ पहुँचते वसंत की जीभ को
तूने उखाड़ दिया
चिडियों की चोंच से
कोई आवाज नहीं निकलती 

तूने वसंत के सौभाग्य को
हड़प लिया
देख
अब यहाँ गंधहीन फूल खिले हैं

नदी में तैरते मछली परिवार को
तूने तबाह कर दिया
नदी भी तेरे द्वारा तोडे़ गए
दर्पण के टुकड़ों-सी
बिखरी पडी़ है

तू मनुष्य को धीमी गति से मरने की
गोलियों बेचकर
धनी बना
और अब खुद दवा के इंतजार में है
तू साँस लेता है हवा में
और पेय जल में
और इनमें मृत्यु का चारा टांगता है
जिस टहनी पर बैठा हुआ है
उसी को खुद काटता है

तू आँखें मलते उठते शहर को
विषैली गैस का कफन ओढ़ाकर
हमेशा के लिए सुलाता है

अगली शताब्दी का
इंतजार करती काली चिडिया का
गला घोंटता है तू
निषाद ! बंद कर यह सब !

संतोष अलेक्स की कवितायें

युवा मलयालम कवि संतोष अलेक्स का जन्म 1971  में केरल के तिरूवल्ला में हुआ। उनकी कविताओं का हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु एवं ओडिया भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इन कविताओं का अनुवाद स्‍वयं कवि द्वारा किया गया है-

सीमा

चावल की खेती करने
जगह ढूंढते-ढूंढते
सीमा पर पहुँचा
इस पार व उस पार
एक ही सूर्य-चाँद
बारिश
हवा
तूफान
बाडा जानता है नफरत के बीज बोनेवाले को
शतरंज के मोहरे-सा
घोडा़, हाथी, रथ
सिपाही आगे बढ़ने लगे
राजा की मृत्यु नहीं होती
हारे या जीते
वह राजा ही है
बस,
सीमा पर अंतिम मौत
मेरी हो!

दूरी

हाथ दुखने पर
मैंने
आँख व आँसू के बीच की दूरी को नापा
फिर
पर व फड़फड़ाहट
पृथ्वी व मरूद्वीप
धुँआ व आग
वस्तु व परछाई
लहर व समुंदर के बीच की दूरी
को नापा
लेकिन
हाथ व दर्द की दूरी को
नाप न सका!

सीधा

पहाडी पर स्थित
पेड़ की टहनी पर खडे़ होकर
उसने सम्‍बोधित किया
सच बतलाने के लिए प्रेरित करनेवाले
रावुण्णी मास्टर
कठिनाइयों से जूझने का साहस दिलानेवाली
बहन
मिलकर बांटने को उत्साहित
भाई
दया भरी माँ
इस दुनिया में मुझे
सीधे खड़ा रहना है

गले में डाले फंदे के संग
नीचे की ओर कूदकर
वह सीधा ही खड़ा रहा !

सुबह

सुबह ने आकर मुझे चुम्बित किया तो
मैं उठकर बरामदे में पहुंचा
आराम कुर्सी में बैठ कर
बीती रात को रचे षड्यंत्रों को याद करने  की काशिश की
इस बीच गाय ने रंभाया
और सारे षड्यंत्र उसमें विलीन हो गए
जिसे पुन: याद नहीं कर सका

प्रेम गीत

हमारे
प्यार से
सहपाठी ईर्ष्‍या करते थे

आम प्रेमियों की तरह
हमने
कुछ नहीं किया

इसलिए
आज भी हम
प्यार करते हैं
उसका अपना परिवार है
मेरा अपना

भला

यीशु और सुकरात
भले लोग थे

फिर भी
मारे गए

मुझे भला नहीं
बनना

गर्मियां

गर्मियों का मतलब
शहर से गांव लौटना होता है

वहां जाने-अनजाने संबंधियों के संग
खेतों में अहातों में खेलता फिरा
तालाब में डुबकियां लगाईं
जामुन और इमलियों के पेडों पर चढ़ा
इस तरह बीत गए कितने ही दिन
पर रिश्तों की कीमत जानी जब
शहर लौटने का समय हो चुका था

 

 

सहिरा तंगल की कविताएं

केरल के पालघाट जिले में जन्‍मीं युवा मलयालम कवयित्री के दो काव्य संग्रह एवं एक उपन्यास प्रकाशित हो चुका है । कविता के लिए ‘अरेबिया साहित्य पुरस्कार’ एवं ‘केरल सरकार का एमेरजिंग राइटर’ पुरस्कार से सम्मानित सहिर तंगल की इन कविताओं का अनुवाद बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्‍स ने किया है-

पुल

बारूदों के गोदाम में
आग लगी
सपनों से तू उसे जला डाला

समुद्र से थम न सका
आसमान से ढक न सका
मैं चकित होकर खडी़ हूँ

केवल उस तरफ जा पानेवाला पुल
दूर भाग निकलने पर भी
पीछा करती आंखें

तेरा रूदन
गज़ल बन हरेक कोने में
पीछा करती हैं

कौन देख रहा है ?

कौन किसे देख रहा है ?
दिन रात को देख रहा है ?

आंख मन को ?
मोर पंख इंद्रधनुष को?

शहद की बूंद होंठ की लालिमा को ?
उंगलियॉं स्पर्श को ?

तेरा प्यार
कविता की करूणा को ?

किसे देख रहे हो
कौन देख रहा है ?

जून

यहां पर जून का महीना नहीं है
इंतजार भी नहीं है
कांटेदार पौधे में कांटे नहीं हैं
ऊंट प्यास का संचय नहीं करता
दौड़कर घुस न पाने जैसा
किसी प्रकार की यात्रा संभव नहीं हो रही
मेरे दिन अंधे के
हाथ का कलेंडर बन रहा है
जुलाई के पहले वे मिट रहे हैं

मेरा जून
खो गया है मेरे लिए

गहरा समुदंर

वह चीज किस समुंदर में
खो गई ?
बिना कोई निशानी छोड़

मां जब बच्चे से
गुस्सा करती है तो
उसकी एक आंख में गुस्सा व
दूसरे में आंसू होता है

कौन सा नाविक
इस रास्ते से आएगा ?

मेरा मन एवं
तेरा झांकना
कितनी गहराई में है ?

बागबान

कविता के मंच में
कविता की खोज में भटकनेवाला कवि

गाने के अंत में
दिल को खोजनेवाला राग

तैयार किए हुए गीत को कसने के लिए
वीणा के टूटे तारों को सहलाती उंगलियाँ

तेरी जरूरत है कहते हुए सुबकने पर
गजलों को सुलाकर मंच से
उतरता हुआ गायक

हरी चादर में फूलों को सुलाता
बागबान