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गौरैया का पुनर्वास : कान्तिकुमार जैन

सुबह-सुबह धूप में फुदकती-चहकती गौरैया अब अमूमन दिखाई नहीं पड़ती। यह नन्‍ही-सी चिड़िया दुर्लभ होती जा रही है। गौरैया को लेकर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का संस्‍मरण-

बचपन में ही जिन पक्षियों से मेरी पहचान हो गई थी, उनमें गौरैया और कौआ प्रमुख हैं। मुझे गौरैया अच्छी लगती है। सहज, शालीन, निराभिमानी और प्रसन्न। वह कोई शोर नहीं करती, न जबरदस्ती स्वयं को आप पर लादती है। वह घरेलू पक्षी है- अहिंसक और शांतिप्रिय। दूसरों की भावनाओं का खयाल रखने वाला कौआ भी घरेलू पक्षी है, पर वह उद्घत और कर्कश है। आप उसका भरोसा नहीं कर सकते। कृष्ण नंद जब आंगन में खेल रहे हैं- माखन रोटी खाते हुए और कौए ने क्या किया ? ‘हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।’ यह आजकल की चेन स्नैचिंग की तरह का घटिया काम था। गौरैया ऐसा नहीं करती। कौआ बोलता भी तो कैसा है- कांव, कांव कर्कश। गौरैया मृदुभाषिणी है। बहुत हुआ तो चीं-चीं करेगी। अंग्रेजी में ‘टी वी टुट टुट।’ हिन्दी के प्रकृतिप्रेमी कवि सुमित्रानंदन पंत की चिड़िया ‘टी वी टुट टुट’ बोलती है। इन दिनों लोकप्रिय नेताओं और अभिनेताओं के जो ट्विटर छपते हैं, वे यही हैं ‘टी वी टुट टुट।’ कौआ किसी के सिर पर बैठ जाए तो बड़ा अपशगुन होता है। गौरैया के साथ ऐसा नहीं होता। वह तो दो वियोगियों को मिलाने वाला पक्षी है- जायसी ने गौरैया को प्रमाण पत्र दिया है – ‘जेहि मिलावै सोई गौरवा।’ गौरैया के लिए मेरे मन में बड़ा प्यार है।
बचपन में मैंने एक कहानी पड़ी थी। एक राजा की कहानी पर मुझे अब लगता है कि उस कहानी का शीर्षक होना चाहिए था- एक गौरैया की कहानी। गौरैया ने कैसे अपनी अक्ल और लगन से एक किसान की जान बचाई थी और राजकुमारी से उसका ब्याह  करवाया था। आप भी सुनें-
एक राजा था, कहानियां सुनने का बेहद शौकीन, पर उसकी एक शर्त होती थी, कहानी ऐसी हो, जो कभी खत्म न हो। यदि कहानी खत्म हो गई तो कहानी सुनाने वाले का सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। पर यदि कहानी ऐसी हो, जिसका कभी अंत ही न हो तो पुरस्कार भी बड़ा था। आधा राज्य और राजा की एकमात्र सुन्दर बेटी से विवाह। राज्य के और बाहर के भी अनेक प्रतिस्पर्धी आए। कोई एक रात कहानी कह पाया कोई दो रात। तीन-चार रातों तक कहानी सुनाने वाले भी आए, पर सबका अंत एक ही होता, सिर धड़ से अलग कर दिया जाता। पर आधे राज्य की और उससे बढ़कर राजकुमारी के पाणिग्रहण की संभावना इतनी आकर्षक थी कि लोग सिर हथेली पर रखे खींचे चले आते और बाजी हारकर प्राण गंवा बैठते।
राजा के राज्य में एक युवा किसान भी था। बड़ा विदग्ध, धैर्यवान, समझदार और चतुर। उसने एक रणनीति बनाई और चला आया राजा को कहानी सुनाने। लोगों ने लाख मना किया, पर वह युवक इतना आत्मविश्वास दीप्त था कि जैसे उसे पता हो इस पूरे प्रसंग का अंत क्या होगा? उसने कहानी शुरू की- एक था राजा। राजा ने टोका, तुमको कहानी की शर्त तो पता है न ! कहानी खत्म हुई कि तुम गए काम से। युवक ने राजा को शर्त के उत्तरार्ध की याद दिलाई। राजा ने हुंकारी भरी। युवक ने कहानी का सिरा पकड़ा-
एक था राजा । उसके राज्य की धरती बड़ी उर्वर थी। उसमें बहुत धान होता। राजा ने राज्य में बड़े-बड़े भंडार बनवा रखे थे। उन भंडारों में धान इकट्ठा की जाती। राज्य में सूखा पड़े, अकाल आए तो भी कोई भूखा न मरे। प्रजा तो प्रजा, उस राजा के राज्य में पशु-पक्षी भी बड़े सुखी थे। गौरैया तो जब चाहती, भंडार में आकर दाना ले जाती। एक दिन एक गौरैया आई और भंडार से एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। फिर एक चिड़िया और आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा इस फुर्र-फुर्र से उक्ता रहा था, बोला, ‘कहानी आगे बढ़ाओ।’ भावी दामाद बोला, ‘कैसे बढ़ाएं? राजा के राज्य में न धान की कमी थी, न गौरैयाओं की।’ उसने फिर फुर्र-फुर्र शुरू  की। एक रात बीती, दूसरी बीती, तीसरी के बाद चौथी आई। अब राजा को गुस्सा आ गया, कहानी आगे बढ़ा, नहीं तो तेरी गर्दन धड़ से अलग हो जाएगी। किसान चतुर था। उसने कहा शर्त तो यही है कि जब तक कहानी खत्म न हो, तब तक आप कुछ नहीं कर सकते। उसने फिर शुरू किया- एक गौरैया आई और एक दाना लेकर उड़ गई- फुर्र। राजा को पसीना आ गया। समझ गया कि इस बार किसी चतुर आदमी से पाला पड़ा है। आखिर में हार कर राजा ने उस चतुर युवक को अपना आधा राज्य सौंप दिया और राजकुमारी के साथ उसके सात फेरे करवाए।

बचपन की यह कहानी मेरा पीछा नहीं छोड़ती। मैंने इस कहानी से यह सीखा कि आदमी में धैर्य हो और वह थोड़ी समझदारी से काम ले तो जीत उसी की होती है। उसके सहायक  भी भरोसे के होने चाहिए। गौरैया आदमी की सबसे अच्छी दोस्त है। वह संकट में आपका साथ देती है। चीन में वहां के नेताओं ने हरित क्रांति के फेर में एक  नारा दिया था- ‘एक गौरैया मारो और एक चवन्नी ले जाओ।’ एक चवन्नी के लालच में वहां की गौरैया की आबादी बहुत कम हो गई। फलस्वरूप खेती के दुश्मन  कृमि-कीटों की संख्या बढ़ गई। चीनी नेताओं को अपनी गलती समझ में आई। उन्होंने अपनी नीति बदली और देश में कृषि उत्पादन की वुद्घि के लिए उन्हें  गौरैयाओं का पुनर्वास करना पड़ा।
बचपन की प्यारी गौरैया का मैं कुछ भला कर सकूं, इसका मौका पिछले साल मुझे अनायास ही मिला। विगत वर्ष सितंबर-अक्टूबर की एक सुबह मैंने देखा कि मेरे घर की बैठक झड़ चुकी थी, फिर उसमें खिड़की के नीचे ये तिनके कहां से आए? पत्नी ने बताया कि ये तिनके उस घोंसले के हैं, जो गौरैया इन दिनों खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच बना रही है। चिड़िया अपनी चोंच में एक तिनका दबाकर लाती और बड़ी जुगत से खिड़की की मच्छर जाली और कांच के बीच जमाती। उसका चिड़ा भी इस काम में उसकी मदद कर रहा था। मैंने कहा कि उसका घोंसला अलग करो, इससे बैठक की साफ-सफाई में दिक्कत होती है, पर पत्नी मुझसे सहमत नहीं हुई। पत्नी ने बताया कि पिछले साल चिड़िया ने़ अपना घोंसला सामने के  प्रवेश द्वार पर लगी चमेली में बनाया था, पर जब चमेली से आंगन में कचरा बढ़ने लगा तो चमेली का वितान अलग करना पड़ा था। वितान अलग हुआ तो गौरैया का घोंसला भी उजड़ गया। अब गौरैया दंपत्ति अपने आशियाने के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में था। लगता है उसे खिड़की के कांच और मच्छरजाली के बीच का ठिकाना सुरक्षित लगा। अब उसे उजाड़ना ठीक नहीं। घोंसला मिटेगा तो बेचारी के अंडे कहां होंगे? वह आसन्न प्रसवा है। फिर उसके चूजे कहां जाएंगे?
पत्नी गौरैया के मातृत्व को लेकर चिंतित थी। मुझे उसकी चिंता सही लगी। मुझे लगा सुरुचि और व्यवस्था के नाम पर किसी का घर-बार उजाड़ना ठीक नहीं। हमने उस साल घर की पुताई नहीं करवाई। पुतैया ने कहीं घोंसले को उखाड़ दिया तो, वहां कोई खतरा मोल नहीं लिया जा सकता।
एक दिन सबेरे हम लोग चाय पी रहे थे कि घोंसले से चीं-चीं की आवाजें आईं। गौरैया के अंडे फूट गए थे। मां प्रसन्न थी, पिताजी भी अपने पितृत्व की खुशी में फुदक-फुदककर नाच रहे थे। पत्नी ने आंगन में एक सकोरे में पानी भर दिया और मुरमुरे फैला दिए थे।
अम्माजी आतीं, चोंच में दाने समेटतीं और चूजों को दाना खिलातीं, उसे चोंच में भरकर पानी ले जाते भी हमने यह चोंचलेबाजी देखी। पर यह चोंचलेबाजी बहुत दिनों तक नहीं चली। चूजे बड़े हो गए, वे अपने पर खोलने लगे, घोंसले से बाहर उड़ने लगे, खुद दाने चुगने लगे और चोंच भी तर करने लगे। चिड़िया और चिड़े ने  उन्हें इस लायक बना दिया कि वे अपनी देखरेख स्वयं कर सकें।
एक दिन हमने देखा गौरैया का आशियाना खाली है। अब हमारी बैठक में तिनके नहीं गिरते। अब हम खिड़की के पल्ले खोलने लगे हैं। थोड़ी-सी संवेदना से हमने गौरैया की एक पीढ़ी को बचा लिया।
एक विस्थापित गौरैया का पुनर्वास कर हमें बड़ी खुशी हुई। पत्नी ने उसके बाद यह नियम ही बना लिया है कि वह रोज सबेरे आंगन में रखे सकोरे में पानी भर दे और नीचे मुरमुरे, कनक बिखेर दे। आओ गौरैया आओ, पानी पियो और दाना खाओ। आखिर तुमने एक युवा की जान बचाई और राजकुमारी से उसकी शादी करवाई थी। उस किसान का जो तुमने भला किया था, उसका प्रतिदान संभव नहीं है, पर तुम्हारे लिए हम जो भी थोड़ा-बहुत कर सकें, हमें करना चाहिए।



मेरा बचपन : नरेंद्र सिंह नेगी

उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के बचपन का संस्‍मरण-

पैतृक गांव पौड़ी (नान्दलस्यूं) में मेरा बचपन भी एक साधारण ग्रामीण परिवार में सुख-दुखों के बीच हंसते-खेलते बीता। पिता स्वर्गीय उमरावसिंह नेगी आजादी से पूर्व के नायब सुबेदार थे, किंतु उनकी पेंशन इतनी कम थी कि बड़े परिवार का भरण-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाता था। मां स्वर्गीय समुद्रा देवी एक  ग्रामीण घरेलू महिला थीं और गाय-भैंस पालकर घर चलाने में पिता का हाथ बंटाती थीं। यूं तो गांव में हमारी खेती भी थी, किंतु पहाड़ की उखड़ खेती में पसीना अधिक और अनाज कम ही उगता था। मां को खेतों और जंगलों में खटते तथा आर्थिक तंगी से जूझते पिता के माथे की लकीरें मैंने अपनी उम्र से पहले ही पहचाननी शुरू कर दी थीं।

इसके बावजूद बचपन में माता-पिता और बहनों का भरपूर लाड़-प्यार मिलता रहा। पिता के पुत्र मोह की इन्तहां यह थी कि कक्षा 1-2 में स्‍कूल से घर आने के बाद वे मुझे बाकी बहनों से छिपकर एक  दुकान से दूध-जलेबी खिलाते थे। इस पक्षपाती लाड़ का याद कर आज भी शर्मिंदा होता हूं।  यह शायद बड़े परिवार के पिता की मजबूरी रही हो। बढ़ते परिवार और आर्थिक तंगी ने बचपन में ही मुझे अंतर्मुखी और गंभीर स्वभाव का बना दिया। मुझसे बड़ी दो बहनों को पिताजी पढ़ा नहीं पाये, इसका हमेशा दुख रहा, बाकी मैंने और मुझसे छोटे सभी भाई-बहनों (एक भाई व पांच बहनों) ने स्नातक तक शिक्षा पाई।

पौड़ी गांव में मेरे बचपन के साथी थे बिल्लू (वीरेन्द्र सिंह), राजू (राजेन्द्र सिंह), ज्ञानू (ज्ञान सिंह),  कालू (धर्म सिंह) और मुझे नरू कहते थे। गांव में पटवारियों का चौक  और पौड़ी बाजार में गांधी मैदान (अंग्रेजों का टैनिस कोर्ट) हमारे खेल के प्रिय मैदान और फुटबाल प्रिय खेल था। हम गांव के लड़के बाजारी लड़कों से किसी-न-किसी बात को लेकर अक्सर झगड़ते रहते थे। यह शायद गांव के शहरीकरण की खुंदक  रही हो। मुझे याद है, बचपन में हम अपने भूम्याल कन्ड़ोलिया देवता के मंदिर से लोगों द्वारा भेंट चढ़ाये गये पैसे उठाया करते थे, तब देवताओं से ज्यादा पैसों की जरूरत हम बच्चों को थी। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही मैंने अपने कुछ साथियों के साथ कन्ड़ोलिया देवता पर भजनों की एक कैसेट निकालकर ब्याज चुकाने का प्रयास किया,  मूल तो जीवन भर नहीं चुका पाऊंगा।

मेरे बचपन की एक मजे की बात यह रही कि कक्षा-1 से 4 तक  मैं पौड़ी में लड़कियों के हाई स्‍कूल में पढ़ा,  जहां मेरे तयेरे भाई स्वर्गीय अजीत सिंह नेगी संगीत टीचर थे। इस गर्ल्‍स स्‍कूल में मेरे साथ पौड़ी बाजार के तीन लड़के और थे- ईशमोहन,  अजीत गोयल और सुधीर खण्डूड़ी। इससे पहले कि हम बच्चे लिंगभेद समझ पाते,  कक्षा-चार पास करने के बाद प्रिंसिपल महोदया ने हमारे हाथों में अभिभावकों के नाम पत्र थमा दिये कि अब आपके लड़के बडे़ (जवान) हो गये हैं। इन्हें गर्ल्‍स स्‍कूल से हटाकर लड़कों के स्‍कूल में भर्ती करें। दर्जा-5 में मुझे वार मेमोरियल हाईस्‍कूल, लैन्सड़ौन भर्ती कर दिया गया, जहां मात्र एक साल ही पढ़ पाया। उन दिनों लैन्सडौन में नरभक्षी बाघ के आतंक और मां की जिद्द के कारण पिताजी मुझे वापस पौड़ी ले आये और मेसमोर इंटर कॉलेज, पौड़ी में कक्षा-6 में भर्ती करा दिया। फिर इंटर तक यहीं पढ़ा। पौड़ी की सुप्रसिद्ध रामलीला में संगीतकार भाई अजीतसिंह नेगी एवं मदनसिंह नेगी के प्रोत्साहित करने पर वानर से लेकर अहिल्या, भरत, शत्रुघन के पार्ट खेलना बचपन के यादगार क्षण हैं। एक  बार पिताजी के साथ बैकुंठ चतुर्दशी मेले में श्रीनगर गया और मेले की भीड़ में खो गया, तब श्रीनगर में रातभर मेला चलता था। सारी रात एक  पीपल के पेड़ के नीचे रोता रहा। भीड़ में ढूंढते-ढूंढते आखिर सुबह तक  परेशान पिताजी वहां पहुंच ही गये।

12-13 साल की उम्र में सिनेमा देखने का शौक  ऐसा चढ़ा कि पौड़ी में टिनशीट और तम्बू से बने सिनेमा हाल में हम बिना टिकट लिये चुपके से घुस आते थे और अक्सर पकड़े जाने पर पिट-पिटाकर बाहर कर दिये जाते थे। पौड़ी में उन दिनों टिंचरी शराब का बड़ा जोर था। टिंचरी की खाली बोतलें जमा कर सिनेमा के टिकट का जुगाड़ करते रहे। पिक्चर का नशा इस कदर बढ़ता गया कि एक  दिन गांव के दोस्तों के साथ घर से छिपकर एक  निर्माणाधीन भवन में पत्थर की रोड़ी तोडऩे चल दिया।  उन दिनों एक कनस्तर रोड़ी तोडऩे पर ठेकेदार से आठ आने मिलते थे और सिनेमा का न्यूनतम टिकट छह आने का था। पता नहीं पिताजी को पहले ही दिन हमारी इस खून-पसीने की जायज कमाई का कैसे पता चला कि वहां पहुंचकर उन्होंने मुझे तो कम मारा पर बेचारे ठेकेदार की ऐसी-तैसी कर दी।

हिंदी फिल्मी गीतों के शौक के बावजूद अपने स्वभाव के चलते मैंने कभी स्‍कूल-कॉलेज के मंचों पर गाने नहीं गाये, किंतु बचपन में गांव में माता-पिता के साथ देखे-सुने घडेले, मण्डाण, थडिया चौंफुला गीतों की लोकधुनों का बाल मन-मस्तिष्‍क पर इतना गहरा असर रहा कि आगे चलकर लोकगीत-संगीत की राह पर चल पड़ा और ऐसा चला कि अभी तक  गिरता-पड़ता चल ही रहा हूं।

(डॉ. अतुल शर्मा (देहरादून) द्वारा ‘बचपन’ नाम से संपादित शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से साभार)

 

हि‍मपात की डायरी : अतुल शर्मा

पहाड़ी क्षेत्रों में हि‍मपात का सि‍लसि‍ला जारी है। मंसूरी में बर्फ पड़ने पर कवि‍ और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा को ऐसी स्‍थि‍ति‍यों में की गई यात्राओं का स्‍मरण हो आया-

मंसूरी से देहरादून तक पैदल यात्रा के कई संस्‍मरण हैं। यहां 16 फरवरी की रात पड़ी बर्फ का ही जि‍क्र अभीष्‍ट है। मंसूरी में बर्फ पड़ी। देहरादून में दो दि‍न बादल घि‍रे रहे। ओले, बारि‍श और सर्द हवाओं ने मोटे स्‍वेटर नि‍कलवा दि‍ए। कुछ समय  पहले जब मैं नींद में था, तब मंसूरी धनौल्‍टी में खूब बर्फ पड़ी। 17 फरवरी सुबह खि‍ली धूप में मन हो रहा था कि‍ बर्फ के पास चल दूं। पहले भी कई बार गया हूँ। मुझे ऐसी यात्राएं याद आ गईं। देहरादून से राजपुर तक बस में गए। वहां से शहंशाही आश्रम से कुछ आगे मंसूरी की तरफ पैदल चल दि‍ए। उस समय चूने की खानें बंद नहीं थीं। वहां छोटे ट्रक जि‍न्‍हें गट्टू कहते थे, उन पर सवार होकर तीन कि‍लोमीटर की चढ़ाई चढ़ गए। वहां से एक छोटी सी पगडंडी से पहाड़ी का एक छोटा हि‍स्सा चढ़कर मंसूरी का पैदल रास्‍ता शुरू हो गया। ये पहाड़ी रास्‍ता झाड़ीपानी तक ले जाता था। बायीं तरफ से दून घाटी दूर तक दि‍खती थी। और इधर छोटा-सा पहाड़ी गांव गुमसुम और ठंड में डूबा हुआ था। पैदल चलना थकाने वाला बि‍ल्‍कुल नहीं था। मेरे साथ सुप्रसि‍द्ध हास्‍य कवि‍ ओमप्रकाश आदि‍त्‍य, गीतकार रमानाथ अवस्‍थी, कथाकार रमेश गौड़ आदि‍ थे। पि‍ताजी ने मेरी ड्यूटी लगा दी इन्‍हें पैदल मंसूरी यात्रा करवाने की। झाड़ीपानी पहुंचने पर पहाड़ और सड़क के कि‍नारे बर्फ दि‍खने लगी थी। सभी पुलकि‍त थे। वहां चाय पी और गुड़ खरीदा। छोटे से पहाड़ी रास्‍ते की घुमावदार सड़कें कुछ देर बाद बर्फ से ढकीं मि‍लीं। गुड़ और ताजी बर्फ खाते हुए आगे नि‍कल पडे़। नीचे के रास्‍ते को इंगि‍त करके ऊपर चल रहे लोगों ने रमानाथ जी का गीत गुनगुनाया था। धीरे-धीरे चलते हुए बर्फ हमारा साथ दे रही थी। पि‍क्‍चर पैलेस मंसूरी से पहले बार्लोगंज में आधे घंटे बैठे। वहां सैलानि‍यों के हि‍मपात और स्‍थानीय लोगों के हि‍मपात में अन्‍तर समझ आया था। पि‍क्‍चर पैलेस पहुंचने से पहले सीढ़ि‍यों, छतों, पेडों की पत्‍ति‍यों से बर्फ झड़ रही थी। मोड़ों के साथ धूप आती और फि‍र पहाड़ी के पीछे छि‍प जाती।

बहुत सालों बाद दि‍ल्‍ली में आकाशवाणी के लि‍ए रि‍कार्डिंग के सि‍लसि‍ले में गया तो वहां वि‍वि‍ध भारती के प्रोडयूसर के रूप में रमानाथ अवस्‍थी मि‍ले। यह 1971 की बात होगी। कवि‍ व रेडि‍यो नाटकों के प्रख्‍यात अभि‍नेता देवराज दि‍नेश से परि‍चय कराया तो अवस्‍थी जी बोले, ‘‘अतुल, तुम्‍हारे साथ पैदल मंसूरी चढ़ गये थे। वहां से लाये छोटे-छोटे पत्‍थर आज भी मेरे बगीचे के पेड के नीचे रखे हैं।’’

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रातभर बर्फ पड़ी। जब मैं सो रहा था, मुझे बर्फ के कई रंग याद आने लगे। सुबह मुझे याद आया कि‍ एक दूसरी मंसूरी हि‍मपात यात्रा में मैं घनश्‍याम रतूड़ी़ सैलानी के साथ चल रहा था। सैलानी ने प्रसि‍द्ध चि‍पको आन्‍दोलन में जनजागरण का नब्‍बे प्रति‍शत कार्य अपने गीतों से कि‍या था। मुझे इस सूनी सड़क के कि‍नारे चलते हुए एक अंग्रेज दि‍खाई दि‍या। वह अपनी मस्‍ती में चल रहा था। मैंने बर्फ का गोला बनाया और उसकी पीठ पर दे मारा। उसकी कोई प्रति‍क्रि‍या नहीं थी। वह सड़क कि‍नारे खड़ा हो गया। हम लोगों को उसके पास से नि‍कलना पड़ा। वह कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद अंग्रेज पीछे था और हम आगे। एकाएक सोच की चुप्‍पी तोड़ते हुए एक बर्फ का गोला मेरी गर्दन से होते हुए बनि‍यान में घूस गया। अंग्रेज ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘दि‍स इज दे वे। इन्‍जॉय द स्‍नोफॉल।’’ उसने हमसे हाथ मि‍लाया और यह कहकर पगडंडी में गुम हो गया- ‘‘आई एम रस्‍कि‍न बॉंड।’’

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मंसूरी की पैदल यात्रा रेखा, रंजना, रीता, वि‍क्‍की, बेबी, अलका और कथाकार भीमसेन त्‍यागी (जि‍न्‍हें हम अंकल कहते थे) के साथ हुई। ये यात्रा बड़ी गुमसुम चल रही थी। त्‍यागी जी के लतीफे-ठहाके गुंजते। बर्फ के गोले मारने का खेल शुरू नहीं हुआ था। सब त्‍यागी अंकल से संकोच कर रहे थे। बच्‍चों के साथ बच्‍चा बनने का हुनर उनके पास था। एकाएक बर्फ के गोले मारने की शुरुआत त्‍यागी जी ने कर दी। फिर जो बर्फ के गोलों की भरमार हुई, उससे आसपास के पर्यटक भी अछूते नहीं रहे। हमारा काफि‍ला और बड़ा हो गया। पीछे-पीछे बच्‍चों की फौज और आगे-आगे बर्फ का गोला उछालते त्‍यागी अंकल चल रहे थे।

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यह आन्‍दोलन के दि‍न थे। उत्‍तराखंड आन्‍दोलन में 100 दि‍न तक उत्‍तरकाशी में कलादर्पण संस्‍था ने प्रभातफेरि‍यां नि‍कालीं। सर्दियों में गि‍रती हुई बर्फ में मेरा गीत गाती हुई टोली पारम्‍परि‍क ढोल दमाऊ के साथ सुबह नि‍कल जाती- ‘वि‍कास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्‍यों/नदी पास है मगर ये पानी से दूर-दूर क्‍यों।’ 0बर्फ पड़ती रहती और आन्‍दोलन की आग भड़कती रहती।

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कल रात पड़ी बर्फ पूरे गढ़वाल-कुमाऊं के ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ढक गई। कढ़की में ऐसी ही एक सर्द मौसम में डॉक्‍टर कौशि‍क, डॉक्‍टर मधुसूदन कम्‍बल लेकर नि‍कल पडे़ और रात ग्‍यारह बजे ठि‍ठुरती ठंड में फुटपाथों, स्‍टेशनों और दुकानों के बंद शटर के बाहर बि‍ना कम्‍बल के सोते हुए लोगों को कम्‍बल उढ़ाते हुए नि‍कल पडे़। सुबह उठकर जि‍सने कम्‍बल देखा होगा, उसे पता ही नहीं होगा कि‍ उसे ये गर्माहट कि‍सने दी।

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)

माफ करना हे पिता! : शंभू राणा

वरि‍ष्‍ठ लेखक शंभू राणा का अपने पि‍ता पर लि‍खा यह संस्मरण अद्भूत है। पि‍ता पर जि‍स तरह से बेबाकी से उन्होंने लि‍खा है, ऐसा बहुत कम पढ़ने को मि‍लता है-

सभी के होते हैं, मेरे भी एक (ही) पिता थे। शिक्षक दिवस सन् 2001 तक मौजूद रहे। उन्होंने 70-72 वर्ष की उम्र तक पिता का रोल किसी घटिया अभिनेता की तरह निभाया,  मगर पूरे आत्मविश्वास के साथ। लेकिन मैं उन्हें एकदम ही ‘पीता’ नहीं कहने जा रहा। इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे, बल्कि इसलिये कि चाहे जो हो आदमी कुल मिलाकर कमीने नहीं थे। किसी भी आदमी का यही एक ‘दुर्गुण’ बाकी सारे ‘गुणों’ पर भारी है। बाकी शिकायत, बल्कि शिकायतों का कपड़छान तो यही कि उन्होंने पिता के रोल की ऐसी तैसी करके रख दी। न जाने किस बेवकूफ ने उन्हें बाप बना दिया।

उनका बारहवाँ और वार्षिक श्राद्ध तो मैं हरिद्वार जाकर कर आया था। उधार और चंदे के पैसों से, जैसा भी बन पड़ा। आज सोचता हूँ कि कलम से भी उनका तर्पण कर दूँ। ऊपर मैंने शिकायतों का जिक्र किया लेकिन यह तर्पण जाहिर-सी बात है श्रद्धावश ही है, शिकायतन नहीं।

पिता का मेरा साथ लगभग 32 वर्षों तक रहा, लगभग मेरे जन्म से उनकी मृत्यु तक। माँ का साथ काफी कम और वह भी किस्तों में मिला। पिता के साथ यादों का सिलसिला काफी लम्बा है। यादें देहरादून से शुरू होती हैं। मेरी पैदाइश भी वहीं की है। यादें आपस में गुड़-गोबर हुई जा रही हैं, कौन पहले, कौन बाद में। लेकिन शुरू कहीं से तो करना पड़ेगा ही। सबसे पहले दिमाग में जो एक धुँधली-सी तस्वीर उभरती है वह यूँ है- गर्मियों के दिन हैं, पिता बेहद हड़बड़ी में दोपहर को घर आते हैं। शायद दफ्तर से इजाजत लिये बिना आये हैं। मैं बीमार हूँ। मुझे कम्बल में लपेट कर दौड़े-दौड़े डॉक्टर के पास ले जाते हैं। डॉक्टर मुझे सुई लगाता है। पिता लौट कर माँ से कहते हैं- ‘‘डॉक्टर कह रहा था कि आधा घंटा देर हो जाती तो बच्चा गया था हाथ से।’’ उस दिन तो बच्चा हाथ आ गया पर फिर कभी उनके हत्थे नहीं चढ़ा।

एक और तस्वीर है यादों के एलबम में… बारिश हो रही है, सड़क में एड़ियों से ऊपर तक पानी भरा है। मुझे उल्टी-दस्त हो रहे हैं और पिता भीगते हुए पब्लिक नल में सरे बाजार मुझे धो रहे हैं। इन दोनों घटनाओं का जिक्र उन्होंने अपने अंतिम समय तक अक्सर किया कि ऐसे पाला तुझे मैंने। ऐसी बातें सुनकर अपने भीतर से अपना ही कोई अनाम/अदृश्य हिस्सा बाहर निकल कर सजदे में गिर जाता है। और हो भी क्या सकता है? ऐसी बातों का कैसा ही जवाब देना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि बदतमीजी भी। मैं एक आदर्श बेटा नहीं, मगर ‘राग दरबारी’ का छोटे पहलवान भी नहीं हो सकता जो अपने बाप कुसहर प्रसाद से कहता है कि हमने लिख कर तो दिया नहीं कि हमें पैदा करो। तो पिताजी महाराज, ऋणी हूँ तुम्हारा और इस ऋण से उऋण होने की कोई सूरत नहीं। न तुम्हारे जीते जी था, न आज हूँ किसी लायक। जब तक रहे तुम पर आश्रित था, आज दोस्तों पर बोझ हूँ। इनसान के अंदर जो एक शर्म नाम की चीज होती है, जिसे गैरत भी कहते हैं, मैंने उसका गला तो नहीं दबाया पर हाँ, उसके होटों पर हथेली जरूर रखे हूँ। शर्म आती है लेकिन जान कर बेशरम बना हूँ। सच कहूँ तुम्हारे जाने के बाद स्थितियाँ ज्यादा खराब हुई हैं। परिस्थितियों के डार्क रूम में किसी नैनहीन-सा फँसा पड़ा हूँ। कामचोर तो नहीं पर हाँ, एक हद तक निकम्मा जरूर हूँ।

लेकिन यह उऋण होने का खयाल मेरे मन में आ ही क्यों रहा है? मैं तो इस खयाल से सहमत ही नहीं कि माँ-बाप के ऋण से कोई उऋण भी हो सकता है। क्या यह किसी लाले-बनिये का हिसाब है, जिसे चुका दिया जाये? हाँ, लाला बोले, कितना हिसाब बनता है तुम्हारा? हाँ, यार ठीक है ‘वैट’ भी जोड़ो, डंडी मार लो, छीजन काट लो, औरों से दो पैसा ज्यादा लगा लो और कुछ? हाँ, अब बोलो। दो दिन देर क्या हुई यार कि तुमने तो चौराहे पर इज्जत उतार ली। लो पकड़ो अपना हिसाब और चलते-फिरते नजर आओ। आज से तुम्हारा हमारा कोई रिश्ता नहीं। अब ऋण तो कुछ इसी तर्ज में चुकता किया जाता है। क्या माँ-बाप से इस जबान में बात करनी चाहिये? मैं तो नहीं कर सकता। क्यों न हमेशा उनका कर्जदार रहा जाये और एक देनदार की हैसियत से खुद को छोटा महसूस करते रहें। माँ की प्रसव पीड़ा और पिता का दस जिल्लतें झेल कर परिवार के लिये दाना-पानी जुटाने का मोल तुम चुका सकते हो नाशुक्रो कि उऋण होने की बात करते हो?

शहर वही देहरादून, मोहल्ला चक्कूवाला या बकरालवाला जैसा कुछ। पास में एक सूखा-सा नाला या नदी है, जहाँ खास कर सुबह के वक्त सुअर डोलते हैं। कतार में मिट्टी-गारे से बनी खपरैल की छत वाली चार-छ: कोठरियाँ हैं। हर कोठरी में अलग किरायेदार रहता है। कोठरी के भीतर एक दरवाजा है, जो इस कोठरी को उस से जोड़ता है। यह दरवाजा अपनी-अपनी ओर सब बन्द रखते हैं। बाहर-भीतर जाने का दरवाजा अलग है। एक दिन माँ इस दरवाजे की झिर्री में हाथ डाल कर दरवाजे के उस ओर रखे कनस्तरों तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। झिर्री काफी छोटी है, न उसका हाथ पहुँच पाता न मेरा। इस ओर कनस्तर खाली हैं। मुझे भूख लगी है, शायद माँ भी भूखी है। पिता कहाँ हैं, कनस्तर क्यों खाली हैं, पता नहीं। याद नहीं। इस चित्र के चित्रकार भी तुम्हीं हो पिता मेरे। इस तस्वीर को मैं नोंच कर फेंक नहीं सकता एलबम से। लेकिन यह सब कह कर आज तुमसे शिकायत नहीं कर रहा। ऐसा करके क्या फायदा। वैसे भी तुम कभी घरेलू मामलों में जवाबदेह रहे नहीं। सूचना का अधिकार तुम पर लागू नहीं होता था। शिकायत या कहो कि झुँझलाहट मुझे खुद पर है कि मैं इस चित्र का कोई रचनात्मक उपयोग नहीं कर पाया। तब से आज तक यह अनुभव दिमाग की हंडिया में बस खदबदा रहा है। मैं इसे दूसरों के आगे परोसने लायक नहीं बना पाया कि औरों की तृप्ति से मेरा असंतोष कम हो। ऐसी बातों को यूँ सपाटबयानी में कहने से दूसरों के दिलों में सिर्फ दया ही उपजती है जो कि अपने काम की नहीं। अब ऐसा भी नहीं कि हर चीज हमेशा काम की न होती हो, दया-ममता लड़कियों के भी तो नाम होते हैं।

इसी कोठरी में मुझसे तीनेक साल छोटी बहन लगभग इतनी ही उम्र की होकर गुजर जाती है। उससे कुछ समय बाद, जब एक दोपहर पिता मुझे डॉक्टर के पास ले गये थे। बीमार हम दोनों थे, वह कम, मैं ज्यादा। उस बच्ची का नाम याद है, गुड्डी था। माँ, पिता और मेरी जो एक मात्र फोटो मेरे पास है, उसमें वह भी माँ की गोद में है- शहद वाला निप्पल चूसती हुई। पिता कुर्ते की बाँहें समेटे मुझे गोद में लिये बैठे हैं। मैंने उस वक्त किसी बात पर नाराज होकर अपना एक हाथ अपने ही गरेबान में अटका लिया था। वह हाथ आज भी वहीं टँगा है। वैसे मुझे याद नहीं, पर इस तस्वीर को देख कर पता चलता है कि माँ की एक आँख दूसरी ओर देखती थी। दो भाई-बहन मुझसे पहले गुजर चुके थे, दो मेरे बाद मरे। मुझमें पता नहीं क्या बात थी कि नहीं मरा। बाद में पिता ने कई बार मन्नत माँगी कि तू मर जाये तो मैं भगवान को सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँ। यार, नंगा करके चौराहे पर सौ दफे जुतिया लो, पर ऐसी ‘बेइज्जती खराब’ तो मती करो! प्रसाद की रकम पर मुझे सख्त ऐतराज है। कुछ तो बढ़ो। मैं इनसान का बच्चा हूँ भई, चूहे का नहीं हूँ। सवा रुपये में तो कुछ भी नहीं होगा, बुरा मानो चाहे भला। इनसान की गरिमा और मानवाधिकार नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं? भगवान से या शैतान से, जिससे मर्जी हो कह दो कि जो चाहे उखाड़ ले, सवा रुपये में तो हम किसी भी सूरत नहीं मरेंगे। भूखे नंगे रह लेंगे, मरेंगे नहीं। प्रसाद खाकर तुलसीदास की तरह मस्जिद में सो रहेंगे।

फिर याद आता है कि माँ मायके चली जाती है। न जाने कितने अर्से के लिये और क्यों। मैं पिता के पास क्यों रह जाता हूँ जबकि उस उम्र के बच्चे को माँ के पास होना चाहिये? पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगते हैं। दफ्तर में दो-एक लोगों की आज भी याद है। एक दीक्षित जी थे, थोड़ा मोटे से, शकल याद नहीं। बड़ी ही संक्रामक हँसी हँसते थे। एक जल्ला सिंह थे। पिता की तरह चपरासी (बकौल पिता- ‘चढ़ बेटा फाँसी’)। शायद कांगड़ा के रहने वाले थे। जल्ला सिंह एक दिन घर से आयी चिट्ठी पढ़ रहे थे। उसकी एक पंक्ति याद है- कमर झुकाने का समय है, छुट्टी लेकर आ जाओ। मैंने पिता से इसका मतलब पूछा, उन्होंने बताया कि खेती-बाड़ी का समय है। धान यूँ झुक कर रोपते हैं। जल्ला सिंह को आज भी ग्रुप फोटो में नामों का क्रम देखे बिना पहचान लेता हूँ। पिता अर्थ एवं संख्या (सांख्यिकी) विभाग में थे। उनके कहे मुताबिक डीएम साला उनके विभाग के बिना दो कदम नहीं चल सकता। सारे डाटा हमारे पास होते हैं। डीएम हम से घबराता है।

शाम लगभग सात-आठ बजे का समय है। पिता खाना बना रहे हैं। मैं बरामदे में खेल रहा हूँ। गेट खोल कर ऑफिस का कोई कर्मचारी अहाते में दाखिल होता है। पिता उसका कमरा खोल देते हैं। वह आदमी बैठ कर कोई फाइल निपटाने लगता है। पिता फिर रसोई में जुट जाते हैं। करीब आधे घंटे बाद वह आदमी बाथरूम में घुस जाता है और तभी बिजली चली जाती है। पिता लालटेन या मोमबत्ती लेकर दफ्तर के खुले कमरे में जाते हैं। कुछ देर इन्तजार करने के बाद आवाज देते हैं। वह आदमी और जवाब दोनों नदारद। पिता मुझे कंधे में बिठाते हैं और हाथ में डंडा लेकर अंधेरे बाथरूम में ताबड़तोड़ लाठी चार्ज कर देते हैं। जवाब में जब किसी की चीख नहीं सुनाई दी तो उन्होंने नतीजा निकाला कि बिजली चली जाने के कारण वह आदमी बिना बताये चला गया। उनकी इस हरकत का मतलब मैं कभी नहीं समझ पाया। दुर्घटनावश मेरा खोपड़ा डंडे की जद में नहीं आ पाया।

कुछ समय बाद माँ फिर देहरादून आ जाती है। हम पास ही किराये की एक कोठरी में रहने लगते हैं। यह कोठरी पहले वाली से बेहतर है। कतार में चार-पाँच कोठरियाँ हैं, छत शायद टिन की है। मकान मालिक का घर हम से जरा फासले पर है। वह एक काफी बड़ा अहाता था जिसमें आम, लीची और कटहल वगैरहा के दरख्त हैं। अहाते में एक कच्चा पाखाना था जिसकी छत टूट या उड़ गयी थी। जब कोई पाखाने में हो उस वक्त दरख्तों में चढ़ना अलिखित रूप से प्रतिबंधित था। इसी तरह कोई अगर दरख्त में चढ़ा हो तब भी… अहाते में एक ओर मकान मालिक के दिवंगत कुत्तों की समाधियाँ थीं जिनमें वह हर रोज सुबह को नहा-धोकर फूल चढ़ाता था। फूल चढ़ाने के बाद हाथ जोड़ कर शीश नवाता था कि नहीं, भगवान की कसम मुझे याद नहीं।

मकान मालिक लगभग तीसेक साल का था। दुबला पतला, निकले हुए कद का, चिड़चिड़ा-सा, शायद अविवाहित था। परिवार में उसकी विधवा माँ और दो लहीम-शहीम-सी बिन ब्याही बहनें थीं। एक का नाम रागिनी था, दूसरी का भी शर्तिया कुछ होगा। परिवार में एक नौकर था श्रीराम। गठा हुआ बदन, साँवला रंग और छोटा कद। उसके नाम की पुकार सुबह के वक्त कुछ ज्यादा ही होती थी। मालिक मकान के परिवार का मानना था कि इस बहाने भगवान का नाम जबान पर आ रहा है। वे राम पर श्रद्धा रखने वाले सीधे-सच्चे लोग थे, हाथ में गंडासा लेकर राम-राम चिल्लाने वाले नहीं। ऐसे लोग तब अंडे के भीतर जर्दी के रूप में होंगे तो होंगे, बाहर नहीं फुदकते थे। बेचारा श्रीराम अपने नाम का खामियाजा दौड़-दौड़ कर भुगत रहा था। परिवार वाले उसे काम से कम बेवजह ज्यादा पुकारते।

एक दिन सुबह के वक्त मैं खेलता हुआ मकान मालिक के आँगन में जा पहुँचा। सामने रसोई में श्रीराम कुछ तल-भुन रहा था और मुझ से भी बतियाता जा रहा था। तभी अचानक न जाने क्या हुआ कि आँगन में एक ओर बने गुसलखाने का दरवाजा भड़ाम से आँगन में आ गिरा। भीतर मकान मालिक की बहन नहा रही थी। दरवाजा गिरते ही वह उकड़ूँ अवस्था में न जाने किस जानवर की-सी चाल चलती तथाकथित कोने में खिसक गयी- श्रीराम को पुकारती हुई। श्रीराम ने रसोई से निकल कर श्रीकृष्ण की सी हरकतें कीं। उसने दोनों हाथों से टिन का दरवाजा उठाया, उसकी आड़ से गुसलखाने के भीतर एक भरपूर नजर डाल कर दरवाजा चौखट से यूँ टिका दिया जैसे लाठी दीवार से टिकाते हैं। आइये दो मिनट का मौन धारण कर उस लड़की की हिम्मत को दाद दें। ऐसे गुसलखाने कई बार देखे कि जिनके भीतर जाते ही गूँगा आदमी भी गवैया बन जाता है। मगर वैसा चौखट से जुदा, कील-कब्जों से सर्वथा विरक्त दरवाजे वाला बाथरूम फिर देखने में नहीं आया और न नहाती हुई लड़की ही फिर कभी दिखी। समय भी कई बार अजीब हरकत कर बैठता है। अब भला लॉलीपॉप की उम्र के बच्चे को शेविंग किट भेंट करने की क्या तुक है?

शाम का वक्त है। पिता मेरा हाथ थामे द्वारका स्टोर बाजार (शायद यही नाम था) की ओर जा रहे हैं। कंधे में झोला है, झोले में तेल के लिये डालडा का डमरूनुमा डब्बा। राशन लेने निकले हैं। दुकान में भीड़ है। पिता उधार वाले हैं, उनका नम्बर देर तक नहीं आता। मैं काउण्टर से सट के खड़ा हूँ। खड़े-खड़े टाँगें दुखने लगी हैं। छत से टँगे तराजू में जब सामान तोल कर उतारा जाता है तो उसका एक पल्ला पेंडुलम की तरह झूलता है और मैं हर बार अपना सर बचाने के लिये पीछे हटता हूँ। यह दृश्य उधार वाले ग्राहक के प्रति दुकानदार की नापसंदगी के प्रतीक के रूप में मुझे खूब याद है। यह बिम्ब भी अकसर कोंचता है। तगादा-सा करता हुआ यादों के मुहाफिजखाने में कहीं मौजूद है। इसका भी कोई इस्तेमाल नहीं हो पाया।

पिता दफ्तर से दो-एक किलो रद्दी कागज उड़ा लाये हैं, जिन्हें बेच कर कुछ पैसे मिल जायेंगे। शाम के झुरमटे में साइकिल में मुझे साथ लिये कबाड़ी के पास जा रहे हैं। साइकिल दुकान के बाहर खड़ी कर मेरा हाथ थामे पानी-कीचड़ से बचते आगे बढ़ते हैं कि एकाएक बड़ी फुर्ती से मुझे गोद में उठा कर साइकिल की ओर भागने लगते हैं। बहुत देर तक ताबड़तोड़ साइकिल चलाते रहते हैं। साँसें बुरी तरह फूली हुई हैं। मैं कुछ भी समझ नहीं पाता, डरा-सहमा-सा साइकिल का हैंडल कस कर पकड़े हूँ। बाद में पिता बताते हैं कि कबाड़ी की दुकान में सीआईडी का आदमी खड़ा था ताकि उन्हें सरकारी कागज बेचते रंगे हाथ पकड़ ले। पिता के मुताबिक साइकिल ने इज्जत रख दी, वर्ना जेल जाना तय था। उन्हें अपनी साइकिल पर बड़ा नाज था। बकौल उनके वह मामूली साइकिल नहीं थी, रेलवे की थी। रेलवे की साइकिल का मतलब अब वही जानें। शायद ‘रेले’ को रेलवे कहते हों। जहाँ तक मुझे याद है, वह साइकिल उनकी अपनी नहीं थी, किसी की मार रखी थी।

देहरादून की ये यादें सन् 1971 के आस-पास और उसके कुछ बाद की हैं। समय का अंदाज एक घुँधली-सी याद के सहारे लगा पाता हूँ। शाम को रोशनदानों में बोरे ठूँस दिये जाते थे और कमरे के अंदर जलती हुई ढिबरी को गुनाह की तरह छिपाया जाता। बाहर घटाटोप अंधेरा। यकीनन उस समय सन् 71 की भारत-पाक जंग चल रही होगी। उसी के चलते अंधेरे का राज था- ब्लैक आउट। रोशनी से परहेज जंग में ही किया जाता है। न सिर्फ दिये की रोशनी से बल्कि दिमाग पर भी स्याह गिलाफ चढ़ा दिये जाते हैं। जो कोई अपने दिमाग पर पर्दा न डाले, युद्घ के वास्तविक कारणों, जो कि अमूमन कुछ लोगों के अपने स्वार्थ होते हैं, पर तर्कसंगत बात करे, वह गद्दार है। सामान्य दिनों में देश को अपनी माँ कह कर उसके साथ बलात्कार करने वाले अपनी माँ के खसम उन दिनों खूब देशभक्ति का दिखावा करते हैं।

माँ बीमार है, अस्पताल में भर्ती है। पिता दफ्तर, अस्पताल और घर सब जगह दौड़े फिर रहे हैं। मैं दिन भर घर में छोटे भाई के साथ रहता हूँ। यह भाई कब कहाँ से टपका, मुझे याद नहीं। मैं खुद बहलाये जाने की उम्र का हूँ, उसे नहीं बहला पाता। उसे झुलाने, थपकियाँ देने के अलावा बोतल से दूध पिलाता हूँ और अपनी समझ के मुताबिक पानी में चीनी घोल कर देता हूँ। शहद वाले निप्पल से कई बार बहल भी जाता है। उसे बहलाते हुए अकसर मुझे नींद आ जाती है। रोते-रोते थक कर वह भी सो जाता है। गर्मियों के दिन, दरवाजे चौपट खुले हुए।

शाम को पिता दफ्तर से लौट कर खाना बनाते हैं। फिर छोटे भाई को गोद में लिये एक हाथ से दरवाजे में ताला लगाने का करतब करते हैं। कंधे में बिस्तरा, झोले में खाना और चाय का सामान, एक हाथ में स्टोव लिये मुझे साथ लेकर पैदल अस्पताल जाते हैं। अस्पताल के बरामदे में लकड़ी की दो बेंचों के मुँह आपस में जोड़ कर बिस्तरा बिछाया जाता है, जिसमें दोनों बच्चे सो जाते हैं। पिता रात भर माँ और हमें देखते हैं। यह सिलसिला न जाने कितने दिन, लेकिन कई दिनों तक चला। दून अस्पताल की धुँधली-सी यादें हैं। गेट के बाहर सड़क में खाली शीशियाँ बिका करती थीं। तब अस्पताल में अनार के जूस-सा दिखने वाला एक घोल भी मरीजों को मिलता था, जिसके लिये लोग शीशी खरीदते थे। समझदार लोग शीशी घर से लाते, दस-बीस पैसे की बचत हो जाती। यह घोल मिक्चर कहलाता और हर मर्ज में मुफीद मान कर दिया जाता था। मिक्चर स्वाद में शायद कसैला-सा होता था लेकिन मीठा तो हरगिज नहीं।

उन्हीं दिनों कभी मैंने पिता से पूछा कि क्या इंदिरा गांधी तुमको जानती है ? क्योंकि वह खुद को सरकारी नौकर बताते थे और लोग कहते थे कि सरकार इंदिरा गांधी की है। मतलब कि वह इंदिरा गांधी के नौकर हुए। मालिक अपने नौकर को जानता ही है। मेरा सवाल ठीक था। ऐसे ही एक बार मैंने उनसे पूछा, जब मैं तुम्हें याद कर रहा था तब तुम कहाँ थे, क्या कर रहे थे।

देहरादून की यादें बस इतनी-सी है। शायद सन् 74 में देहरादून छूट गया और आज तक फिर कभी वहाँ जाने का इत्तेफाक नहीं हुआ। कई चीजें और वाकयात आज भी यूँ याद हैं जैसे हाल ही की बात हो। पिता का दफ्तर, पास ही में चाय की दुकान, तिराहे पर साइकिल मैकेनिक गुलाटी। उसके बाँये मुड़ कर थोड़ा आगे अहाते के भीतर हमारी कोठरी। चित्रकार होता तो ये सब कैनवस में उकेर सकता था।

फिर पिता का तबादला अल्मोड़ा हो जाता है, बकौल उनके ऑन रिक्वेस्ट। अल्मोड़ा आकर हम गाँव में रहने लगे। पिता गाँव से शहर नौकरी करने आते-जाते हैं। कुछ समय बाद माँ फिर बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हो जाती है। पता नहीं क्या मर्ज था। पिता तीमारदारी और नौकरी साथ-साथ करते हैं। मुझे ननिहाल भेज दिया जाता है। एक दिन नानी के साथ माँ से मिलने गया था। याद नहीं हमारी क्या बातें हुई थीं। स्टूल में बैठा पाँव हिलाता उसे देखता रहा। पिता दहेज में मिले तांबे-पीतल के थाली-परात (जो कि उनकी गैरमौजूदगी के कारण ननिहाल में सुरक्षित थे) बेच-बेच कर दवा-दारू कर रहे थे।

माँ से वह आखिरी मुलाकात थी। माँ की याद मेरे लिये कभी भी भावुक कर देने वाली नहीं रही। ऐसा शायद इसलिये कि उसका मेरा साथ काफी कम रहा। हाँ, मुझे काठ का बना एक गोल डब्बा अकसर याद आता है। धानी रंग के डब्बे में लाल-हरी फूल-पत्तियाँ बनी थीं। माँ का सपना था कि कभी पैसे जुटे तो अपने लिये नथ बनावाऊँगी, यह डब्बा नथ रखने के काम आयेगा। वह डब्बा मैं संभाल कर नहीं रख पाया। माँ साक्षर थी, मुझे पढ़ाया करती थी। गाँव में एक बार उसने मेरे पूछने पर पशुओं की मिसाल देकर बताया कि इनसान के बच्चे भी इसी प्रक्रिया से पैदा होते हैं। मैं हैरान होता हूँ इस बात को सोच कर। ऐसी बातें आजकल की उच्च शिक्षित माँएं भी अपने बच्चों को बताने की जुर्रत नहीं करतीं। तब तो बच्चा अगर किसी बात पर ‘मजा आ गया’ कहता तो तमाचा खाता था। क्योंकि तब माँ-बाप को मजा सिर्फ एक ही चीज में आता था, जिसके नतीजे में कम से कम दर्जन भर बच्चे हर वक्त मजे को बदमजगी में बदल रहे होते, जिन्दगी अजीरन बन जाती।

सुबह का समय है। दिन जाड़ों के धूप निकली है मगर खुद ठिठुरी हुई-सी। आँगन में छोटे मामा मुझे पीट-पीट कर हिन्दी पढ़ा रहे हैं। ऊपर सड़क में जो एक दुकान है, वहाँ से बीच वाले मामा को आवाज देकर बुलाया जाता है। मामा मुझे भेज देते हैं कि जाकर पूछ आऊँ  कि क्या काम है। ताकि अगर कोई बबाली काम हो तो बहाना बनाया जा सके। पाले से भीगे पथरीले रास्ते पर नंगे पाँव चलता हुआ करीब आधा किमी दूर दुकान में जाता हूँ। दुकानदार मुझे लौटा देता है कि तेरे मतलब की बात नहीं, नवीन को भेज। थोड़ी देर बाद मामा आकर बताते हैं कि अस्पताल में माँ चल बसी। तब डाक विभाग के हरकारे डाक के थैले लेकर पैदल चला करते थे। उन्हीं से पिता ने जवाब भिजवाया था। मेरे कॉपी-किताब किनारे रखवा दिये जाते हैं। मेरे लिये सीढ़ियों में बोरा बिछा दिया गया। लोग कहते हैं, देखो कैसा बड़ों की तरह रो रहा है। वे लोग दहाड़ें सुनने के आदी थे। दहाड़ें मारते हुए सर फोड़ने को आमादा आदमी को संभालने और संसार की असारता पर बोलने के सुख से अनजाने ही उन्हें वंचित कर रहा था मैं।

इसके शायद दूसरे ही दिन छोटे मामा मुझे पिता के पास गाँव छोड़ गये, जहां पिता माँ का क्रियाकर्म कर रहे थे। शायद तकनीकी मजबूरी के कारण ऐसा करना पड़ा होगा। मैं काफी छोटा था और चचा-ताऊ  कोई थे नहीं। हिन्दुओं के शास्त्र भारतीय संविधान की तरह काफी लचीले हैं, जैसा बाजा बजे वैसा नाच लेते हैं। चाहें तो हर रास्ता बंद कर दें और अगर मंशा हो तो हजार राहदारियाँ खुल जाती हैं।

माँ के क्रियाकर्म से निपट कर पिता फिर दफ्तर जाने लगे। सुबह मेरे लिये खाना बना कर रख जाते हैं। रात को 8-9 बजे लौट कर आते हैं। टॉर्च और जरकिन लेकर एकाध किमी दूर नौले से पानी लाते हैं। खाना बनाते हैं। उनके लौटने तक मैं दूसरों के घरों में बैठा रहता हूँ। बाद में पिता पानी का जरकिन सुबह साथ लेकर जाते हैं जिसे रास्ते में पड़ने वाले गाँव में रख जाते हैं। शाम को उसी दिशा में नौले जाने का फेरा बच जाता है। मैं दिन भर सूखे पत्ते-सा यहाँ-वहाँ डोलता रहता। दूसरे बच्चों के साथ गाय-बकरियाँ चराने जाता (अपनी कोई गाय बकरी नहीं थी)। दूसरे बच्चों की देखादेखी कीचड़नुमा पानी के तालाब में नहाता, काफल के पेड़ों में चढ़ता-गिरता। लगभग साल भर यूँ ही बीत गया। इसी दरमियान मैं स्कूल भी जाने लगा, कुछ उसी तर्ज पर जैसे गाय-बकरियाँ चराने जाता था और वह भी सीधा तीसरी क्लास में। शायद इसलिये कि मेरी हिन्दी चौथी-पाँचवी के बच्चों से अच्छी थी। मास्टर का बोला हुआ मैं कम या बिना गलती के लिख लेता। शायद इसी बात से मास्टर साहब प्रभावित हो गये हों। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि शिक्षा की बुनियाद रखते ही हिल गयी। इस ऐतबार से मेरी गिनती घोड़े में न गधे में। बाद में दुश्मनों ने काफी समझाया-उकसाया कि भई ऊपर का माला पक्का करवा लो और दीवारों में पलस्तर भी। अब भला झुग्गी की छत भी कहीं सीमेंट और लोहे की हो सकती है।

माँ की मौत के साल बीतते-बीतते पिता जब्त नहीं कर पाये और दूसरी शादी की बातें होने लगीं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुझे बताया गया कि मेरी देखभाल कौन करेगा। घर, खेती-बाड़ी सब वीरान हो जायेंगे। यह सब बहाना था, बकवास था। पिता साफ झूठ बोल रहे थे। कारण शुद्ध रूप से शारीरिक था, इतनी समझ मुझमें तब भी थी (बाकी आज भी नहीं)। पिता अपने निजी, क्षणिक सुख के लिये शादी करना चाह रहे थे। मुझे देखभाल की ऐसी कोई जरूरत नहीं थी और खेती-बाड़ी ऐसी माशाअल्लाह कि आम बो कर भी बबूल न उगे।

पिता ने बड़ा ही अराजक किस्म का जीवन जिया था। अपनी जवानी का लगभग तीन चौथाई हिस्सा हरिद्वार, मुरादाबाद और बिजनौर जैसी जगहों पर किसी छुट्टे साँड-सा बिताया था। बाद में उनके जीजा जी ने पकड़-धकड़ कर उनकी शादी करवायी थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, उनकी शादी उस समय के हिसाब से काफी देर में हुई थी। पिता मुरादाबाद में किसी भाँतू कॉलोनी का जिक्र अक्सर किया करते थे कि गुरु हम वहाँ शराब पीने जाया करते थे़.़.। बाद में मेरे एक दोस्त ने भाँतू कॉलोनी के बारे में जो मुझे मोटा-मोटा बताया, उसे मैं यहाँ जानबूझकर नहीं कह रहा। क्योंकि हो सकता है कि बात गलत हो और भाँतू कॉलोनी का कोई शरीफजादा मुझ पर मुकदमा लेकर चढ़ बैठे। पिता कहते थे कि हमने अपना ट्रांसफर बिजनौर या मुरादाबाद से देहरादून इसलिये करवाया ताकि हम जौनसार की ब्यूटी देख सकें। देखी या नहीं, वही जानें।

तो पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। नतीजतन बाप-बेटे के बीच जो एक अदृश्य मगर नाजुक-सा धागा होता है उसमें गाँठ पड़ गयी, शीशे में बाल आ गया। पिता के पास शायद वह आँख नहीं थी कि उस बाल को देख पाते। उस समय वह सिर्फ अपनी खुशी देख रहे थे। मानो मैं गिनती में था ही नहीं। अगर था भी तो शायद वह मान कर चल रहे थे कि उनकी खुशी में मैं भी खुश हूँ या कुदरती तौर पर मुझे होना चाहिये। मैं इस तरह का बच्चा नहीं था कि पूड़ी-पकवान और हो-हल्ले से खुश हो लेता, बहल जाता। पिता जो कर रहे थे वह मुझे हरगिज मंजूर नहीं था। लेकिन मैं उन्हें रोक भी नहीं सकता था। विमाता से मैं कई सालों तक हूँ-हाँ के अलावा कुछ नहीं बोला। मजबूरी में बोलना भी पड़ा तो ऐसे कि जैसे किसी और से मुखातिब होऊँ। आज भी किसी संबोधन के बिना ही बातचीत करता हूँ। दोषी मेरी नजर में पिता थे, विमाता की क्या गलती? पिता ने मेरे लिये अजीब-सी स्थिति पैदा कर दी थी। मैं उनकी इस हरकत (शादी) को कभी भी नहीं पचा पाया। जाहिर-सी बात कि मैं कोई सफाई नहीं दे रहा, सिर्फ अपनी स्थिति और मानसिक बनावट का बयान कर रहा हूँ। विमाता का व्यवहार कभी मेरे लिये बुरा नहीं रहा। संबंध हमारे चाहे जैसे रहे हों पर मान में मेरी ओर से कोई कमी नहीं और मान मेरी नजर में कोई दिखावे की चीज नहीं।

विमाता की एक बात ने मुझे तब भी काफी प्रभावित किया था। शादी के एकाध महीने बाद वह एक दिन पूड़ी-पकवानों की सौगात लिये मेरी ननिहाल अकेले जा पहुँची कि मुझे अपनी ही बेटी समझना, इस घर से नाता बनाये रखना। ऐसी बातें जरा कम ही देखने में आती हैं। आज मेरे संबंध ननिहाल में चाहे तकरीबन खत्म हो गये हों पर गाँव में मेरा जो परिवार है उसके ताल्लुकात मेरी जानकारी में अच्छे हैं, सामान्य हैं।

इस शादी से पिता शुरुआती दिनों के अलावा कभी खुश नहीं रह पाये। साल भर भी नहीं बीतने पाया कि लड़ाई-झगड़े शुरू हो गये। मनमुटाव का ऐसा कोई खास कारण नहीं, बस झगड़ना था। पिता महिलाओं के प्रति एकदम सामंती नजरिया नहीं रखते थे (उनके कद के हिसाब से सामंती शब्द कुछ बड़ा हो गया शायद)। गाँव में उनका मजाक इसलिये उड़ाया जाता कि यह आदमी अपनी बीवी को तू नहीं तुम कह कर पुकारता है। बावजूद इसके झगड़ा होता था। हाँ, पिता काफी हद तक टेढ़े थे, कान के कच्चे और कुछ हद तक पूर्वाग्रही भी। ऐसे लोग हर जगह होते हैं जो दानों पक्षों के कान भर कर झगड़ा करवाते हैं और खुद दूर से मजा लेते हैं। विमाता का भी यह दूसरा विवाह था, एक तरह की अल्हड़ता मिजाज में काफी कुछ बची रह गयी थी और सौंदर्यबोध का सिरे से अभाव। हालाँकि अपनी नजर में कोई भी फूहड़ नहीं होता, सभी का अपना-अपना सौंदर्यबोध होता है। पिता बड़े सलीकेदार, गोद के बच्चे को भी आप कह कर बुलाने वाले और कबाड़ से जुगाड़ पैदा करने वाले आदमी थे। नहीं निभनी थी, नहीं निभी।

पिता के दिमाग की बनावट बेहद लचकदार थी। वह कई मामलों में वैज्ञानिक सोच रखने वाले, परम्पराओं के रूप में कुरीतियों को न ढोने वाले व्यक्ति थे। उनका गाँव वालों से कहना था कि हमें मडुवा-मादिरा जैसी परम्परागत और लगभग निरर्थक खेती को छोड़ ऐसी चीजें उगानी चाहिये, जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। खुद हमें इन चीजों को खरीदना पड़ता है। मसलन हल्दी, अदरक, गंडेरी, आलू, दालें वगैरा। फलों के पेड़ और फूल भी। हमें शहरों में जाकर बर्तन मलने, लकड़ी बेचने जैसे जिल्लत भरे कामों के करने की जरूरत नहीं है। जहाँ तक जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाने की बात है, अगर सारा गाँव इस काम को करने लगेगा तो बाड़ और पहरे का भी इंतजाम हो जायेगा। एक अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता। उनके दिमाग की बनावट को समझने के लिये एक और मिसाल देने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा। गाँव में कोई किसी को लोटे के साथ अपने खेत में बैठा देख ले (रिवाज दूसरे के खेत में ही बैठने का है) तो गरियाने लगता है कि अरे बेशर्म तुझे गंदगी फैलाने को मेरा ही खेत मिला? बैठा हुआ आदमी बीच में ही उठ कर किसी और के खेत में जा बैठता है। पिता के विचार इस बारे में जरा अलग और क्रांतिकारी थे। उनका कहना था कि एक तो तुम उसके खेत को इतनी महान खाद मुफ्त में दो और बदले में गाली खाओ, क्या फायदा? क्यों न धड़ल्ले से ससुर अपने खेत में जाकर बैठो। खुला खेल फर्रुखाबादी।

एक रोज सीढ़ियों से लुढ़क कर मैं अपना माथा फुड़वा बैठा। लोगों ने घाव में चीनी-चरस ठूँस कर कपड़ा बाँध दिया। कुछ दिन बाद घाव पक कर रिसने लगा, उसमें मवाद पड़ गया। पिता एक दिन मुझे अल्मोड़ा ले आये। जहाँ दो-एक हफ्ते तक घाव की मरहम-पट्टी होती रही और ढेर सारे पेंसिलीन के इन्जेक्शन लगे। पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगे। कहीं से एक स्टोव ले आये, अटक-बिटक के लिये सरकारी हीटर था ही। भगौने का ढक्कन तवा, उल्टी थाली चकला, गिलास बेलन बन गया। बैंच-टेबलें खटिया और पर्दे-कुशन बिस्तरा। कुछ ही समय बाद पास ही में किराये की कोठरी (फिर कोठरी) मिल गयी। मेरा दाखिला स्कूल में करवा दिया गया। यह सब सन् 81-82 की बात है।

इसके बाद दो-चार बार गाँव जाना हुआ, पर वहाँ मेरा मन नहीं लगा। मुझे शहर रास आने लगा था। आखिरी बार गाँव मुझे यज्ञोपवीत संस्कार के लिये ले जाया गया। यह तब की बात है जब नवाज शरीफ पहली बार (जाहिर-सी बात है कि पाकिस्तान के) प्रधानमंत्री बने थे। गाँव में रहने का अनुभव बस तीनेक साल का है।

पिता का गाँव आना-जाना लगा रहा। शायद उन्होंने जादू टोना भी एकाध बार करवाया- मेरे गाँव न जाने को लेकर। पिता ने फिर से चार संतानें पैदा कीं। पहली मरी हुई, बाकी तीन स्वस्थ हैं, पर शायद प्रसन्न न हों। उन्होंने संतत्ति के रूप में अपनी अंतिम रचना रिटायरमेंट के बाद प्रस्तुत की। गोया रिटायर कर दिये जाने से खुश न हों और अपनी रचनात्मक क्षमता साबित कर उन्होंने सरकार को मुँहतोड़ जवाब दिया हो।

रिटायर होने के ठीक अगले दिन उन्होंने सड़क में बैठ कर लॉटरी बेचना शुरू कर दिया। ऐसा करने की हार्दिक इच्छा उनकी काफी समय से थी। उनका खयाल था कि जिस दिन वह लॉटरी बेचने लगेंगे उस दिन सब (दूसरे लॉटरी वाले) अपना बिस्तरा गोल कर लेंगे। और कि गुरु, हमारे चारों ओर लोग यूं उमड़ पड़ेंगे जैसे गुड़ में मक्खियाँ लगती हैं। उनका खयाल था कि वह इस धंधे में लखपति़.़. शायद करोड़पति भी बन सकते हैं। उनका कहना था कि हम यहाँ से अपने गाँव तक एक पुल बनायेंगे। वगैरा-वगैरा। हाँ, तो लोग उनके इर्द-गिर्द खूब मँडराये। लोगों ने दो-एक महीने में ही गुड़ में से ‘ड़’ चूस लिया और ‘गु’ छोड़ दिया। अब क्योंकि ‘ड़’ के बिना ‘गु’ अकेला मीठा नहीं होता, इसलिये मक्खियों ने दूसरे बाग-बगीचों का रुख किया। खेल खतम, पैसा हजम। बच्चा लोग बजाओ…, ताली बजाने को कोई मौजूद नहीं था।

उन जैसा स्वप्न विश्लेषक शायद ही कोई दूसरा हो, एक नम्बर वाली लॉटरी के मामले में। मसलन वह कहेंगे कि गुरु हमने कल रात सपने में गाय को सीढ़ी चढ़ते देखा, हमें उसकी चार टाँगें दिखायी दीं। तो चढ़ने का बना चव्वा और चार टाँगों का भी चव्वा ही बनता है। इन दोनों को जोड़ कर बना अट्ठा। मतलब कि आज चव्वा और अट्ठा पकड़ लो और सपोर्ट में रख लो दुक्की। कई दिनों से बंद पड़ी है दुक्की। सपने में अगर शादीशुदा औरत दिखे तो मतलब कि आज जीरो खुलेगा, क्योंकि औरतें बिन्दी लगाती हैं। कुँवारी लड़की का नम्बर अलग बनता था और अगर प्रश्नकर्ता सपने में महिला के साथ कुछ ऐसी-वैसी हरकत कर रहा हो तो उससे कुछ और नम्बर निकलता था। मैं अधिकांश प्रतीकों को भूल गया हूँ, जो कि अद्भुत थे। सपनों से नम्बर निकालने के पीछे जो कारण और तर्क थे वो कल्पनातीत थे। मेरे खयाल में यह सट्टे के तौर-तरीके हैं और पिता ने मैदानी इलाकों में रहते हुए सट्टा न खेला हो, ऐसी गलती उनसे कैसे हो सकती थी?

एक बार किसी ने आकर उन्हें बताया कि मैंने कल रात खुद को हाथी पर बैठे देखा। पिता ने इसका मतलब उन्हें बताया कि आज अट्ठा पड़ेगा। दो-एक दिन बाद वही साहब कहने लगे कि मैं जमीन में खड़ा हूँ। हाथी मेरे बगल में खड़ा है। पिता ने कहा कि आज आप चव्वा पकड़ लें। प्रश्नकर्ता ने कहा ऐसा कैसे? जवाब मिला – अब क्या जिन्दगी भर हाथी में ही बैठे रहेंगे? परसों हाथी में थे तो अट्ठा खुला, आज हाथी से उतर गये हैं तो उसका जस्ट आधा कर लीजिये। कौन-सा कठिन है।

मेरे एक दोस्त ने उन्हें एक काल्पनिक सपना कह सुनाया कि मैंने जंगल में आग लगी देखी तो उस पर पानी डालकर बुझा दिया। प्रश्नकर्ता का मकसद लॉटरी का नम्बर निकलवाना नहीं था, उसे पिता के जवाब में दिलचस्पी थी। पिता ने बिना सोचे जवाब दिया- हाँ ठीक तो है। आपने आग में पानी डाल दिया, आग बुझा दी… बस। बड़ा आसान है। योगेश बाबू, पढ़े-लिखे जवान आदमी हो, इतना भी नहीं समझते कि इस उम्र में ऐसे सपने आते हैं।

दो-एक महीने तक अपने आसपास मक्खियों का भिनभिना महसूस कर पिता अज्ञातवास में गाँव चले गये। करीब छ: महीनों तक हम दोनों ने एक दूसरे की कोई खोज-खबर नहीं ली। मैं इस अर्से में कबाड़ से जुगाड़ पद्धति से जिन्दा रहा। पिता की पेंशन न जाने कहाँ अटक गयी थी। वह ऐसे महारथी थे कि गाँव में रह कर भी हरकारों के जरिये लॉटरी के शेयर मार्केट में अपना दखल बनाये रहे। सपने देख-देख कर नम्बर निकाल रहे थे। लॉटरी हार- जीत रहे थे। अब हरकारे कितनी ईमानदारी बरतते होंगे कहना मुश्किल है। वह छ: महीने बाद अचानक प्रकट भये एक दिन गोर्की जैसी मूछें बढ़ाये हुए। पेंशन चल पड़ी थी।

लॉटरी उनसे तब तक नहीं छूटी जब तक सरकार ने इसे बंद न कर दिया। इस धंधे में असफल रहने का कारण उनकी नजर में मैं था। बकौल उनके- गुरु, हम तो क्या का क्या कर दें, इस शख्स से जो हमें इतना-सा सहयोग मिल जाये। मैंने कब उनके हाथ बाँधे, उन्होंने मेरा कहा कब किया, याद नहीं। जो भी चीज उनके मन मुताबिक न होती, उसका ठीकरा मेरे सर फोड़ा जाता। उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी मेरे साथ चस्पा कर रखी थीं कि जिनका मुझ से कोई मतलब नहीं था। उनके कहे मुताबिक वह बीमार पड़ना तब से शुरू हुए जब से उन्होंने भात खाना शुरू किया। वर्ना पहले तो हम उस घर में ही नहीं जाते थे जहाँ चावल पक रहा हो। गुरु, हमारी शादी (पहली) में सात गाँवों की पंचायत बैठी, सिर्फ हमारी वजह से भात का प्रोग्राम कैंसिल कर पूड़ियाँ बनीं। तो चावल वह मेरी वजह से अपनी जान पर खेल कर खाये जा रहे थे। जबकि सच यह है कि मुझे चावल कोई इतने पसंद नहीं कि भात खाये बिना खाया हुआ सा न लगे। पिता सुबह को चावल बना कर परोस दें तो मैं क्या कर सकता था, सिवाय इसके कि चुपचाप खा लूँ और देखने वाले की नजर में अपने बाप की सेहत से खिलवाड़ करता हुआ रंगे हाथों पकड़ा जाऊँ। गुनहगार कहलाऊँ। पिता दूसरों की नजर में बुजुर्ग, सीधे और भलेमानुष, मैं कमीना और बूढ़े बाप को सताने वाला। परिस्थितियाँ कभी भी मेरे अनुकूल नहीं रहीं।

मकान मालिक लोगों की जो जमीन यूँ ही पड़ी-पड़ी कूड़ेदान का काम कर रही थी, पिता ने उसमें शाक-सब्जियाँ उगाना शुरू कर दिया। यह काम वह पहले भी करते ही थे। अब होलटाइमर थे। बारहों महीने मौसम के मुताबिक सब्जी खेत में मौजूद। सब्जी तोड़-तोड़कर पास-पड़ोस में बाँट रहे हैं। इस-उस को दे रहे हैं। पेड़ों को पब्लिक नल से पानी ढोकर सींच रहे हैं। और मजे की बात कि न आप मिर्च खाते हैं न बैगन। बैगन का नाम आपके मुताबिक दरअसल बेगुन है, इसमें कोई गुण नहीं होता। भगवान इसकी रचना भूलवश कर बैठा। अचार के सीजन में बड़े-बड़े केनों में अचार ठुँसा पड़ा है। लहसुन छील-छील कर उँगलियों के पोर गल गये हैं। आपके कथनानुसार कोई खाता नहीं, वर्ना हम तो ससुर टर्रे का भी आचार डाल दें। टर्रा मतलब मेंढक। बड़ियों के मौसम में बड़ी मुंगौड़ियों की रेलम-पेल। बड़ी पिता के मुताबिक स्वास्थ्य खराब करने वाली चीज है, उसकी तासीर ठंडी होती है। एक बार उन्होंने 17 किलो माश की बड़ियाँ बना डालीं। 17 किलो माश को धोना, साफ करना और सिल में पीसना अपने आप में एक बड़ा काम है- संस्था का काम है। पर उन्होंने पीस डाला रो-धोकर मुझे सुनाते हुए रुआँसी आवाज में कि मेरा कोई होता तो माश पीस देता। ऐसे चूतियापे के कामों में सचमुच मैंने कभी उनका साथ नहीं दिया। सिवाय इसके कि अचार का आम या बड़ियाँ छत में सूखने पड़ी हैं, बूँदाबाँदी होने लगी तो उन्हें उठा कर भीतर रख दूँ। सोचने वाले सोचते कि इस आदमी ने अचार-बड़ियों का कुटीर उद्योग खोल रखा है। अच्छा-भला मुनाफा हो रहा है। इसका लड़का अगर थोड़ा हाथ बँटा देता तो क्या बुरा था। आखिर यह बूढ़ा आदमी इतनी मेहनत किसके लिये कर रहा है। सचमुच बेटा इसका नासमझ है और कमीना भी। मुझे कहीं पनाह नहीं थी।

पाव या आधा लीटर दूध को दिन भर में चार-छ: बार उबाल कर उसकी मलाई निकाली जा रही है, फिर 10-15 दिन में उससे घी बन रहा है। आने वाले को दिखाया जाता है- देखिये, हमारे हाथ का घी, मलाई से बनाते हैं हम। देखने वाला वाह करता, मेरा मन उसे तमाचा जड़ने का होता। क्योंकि वह 100 ग्राम जो घी है मैं जानता हूँ वह जैतून और बादाम के तेल से भी महंगा पड़ गया है। और उस पर तुर्रा ये कि अमूमन घी अचानक गायब हो जाता। पूछने पर पता चलता कि फलाँ को दे दिया। बेकार चीज है, खाँसी करता है।

ताश खेलना उन्हें बेहद पसंद था। उनकी नजर में यह एक महान खेल था जो कि दिमाग के लिये शंखपुष्पी और रोगने-बादाम जैसी प्रचलित चीजों से ज्यादा गुणकारी था। उनके मुताबिक अगर बच्चों को अक्षर ज्ञान ताश के पत्तों के जरिये करवाया जाये तो वे जल्दी सीखेंगे और उनका दिमाग भी खुलेगा। जरा ऊँचा सुनते थे, ऐसे मौकों पर मैं चिढ़कर लुकमा देता कि वे बच्चे नौकरी-रोजगार से न भी लग पाये तो जुआ खेल कर रोजी कमा ही लेंगे। सामने बैठा आदमी इस पर हँसने लगता। पिता सोचते कि वह उनकी बात पर हँस रहा है। इसलिये जोश में आकर दो-चार ऐसी बातें और कह जाते। मैंने उन्हें घंटों अकेले ताश खेलते देखा है। ताश में एक खेल होता है ‘सीप’। यह खेल उन्हें ज्यादा ही पसंद था। चाहे जितनी तबियत खराब हो, सीप का जानने वाला कोई आ जाये तो कांखते-कराहते उठ बैठते और खेल जारी रहने तक सब दर्द तकलीफ भूल जाते। अगर दो-एक बाजी हार जाते तो चिढ़ कर खेल बंद कर देते कि- बंद करिये, हमारी तबियत ठीक नहीं। पता नहीं साला केंसर है, न जाने क्या है। जीतने पर उनका जोश बढ़ जाता। फिर सामने वाला खिलाड़ी चाहे गणित में गोल्ड मैडलिस्ट क्यों न हो, उसे सुनना पड़ता कि गुरु, आपका हिसाब बड़ा कमजोर है। कौन पत्ता फेंक दिया, कौन-सा हाथ में है, इत्ता-सा हिसाब नहीं रख सकते।

खिलाने-पिलाने के बड़े शौकीन थे। तरह-तरह के प्रयोग खाने में अकसर होते रहते। करेले की रसेदार सब्जी मैंने उन्हीं के हाथ बनी खायी। सब्जी परोसते हुए उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि असल में करेला ऐसे नहीं बनता। इसे बारीक काट कर तवे में सूखा बनाया जाता है। जरा भी कड़वा नहीं होता। एक बार उन्होंने मेरे कुछ दोस्तों को बुलवा भेजा। आइये गुरु, देखिये आज हमने आपके लिये क्या बनाया है! उस दिन बिच्छू घास की सब्जी बनी थी। शराब मैंने पहली बार उन्हीं के साथ चखी। जब कभी पास में पैसे हों, मूड हो तो कहते वाइन लेगा, है मूड? आज साली ठंड भी है यार। मैं चुपचाप हाथ पसार देता और जाकर पव्वा ले आता। दोनों बाप-बेटे हमप्याला हम निवाला होते, कुल्ला करके सो जाते।

आखिरी दो-तीन सालों में उनका दम बेहद फूलने लगा था इसलिये धूम्रपान छोड़ कर सुर्ती फटकने लगे थे। अब उनकी नजर में सुर्ती भी एक महान चीज थी। एक बार उन्होंने मेरे एक दोस्त को सुर्ती पेश की। दोस्त ने कहा मुझे आदत नहीं है, चूने से मुँह फट जायेगा। पिता ने उसे समझाया- गुरु, शादी से पहले लड़कियाँ भी इसी तरह डरती हैं… बाद में सब ठीक हो जाता है। आपको भी आदत पड़ जायेगी। खाया कीजिये, बड़ी महान चीज है, दिमाग तेज करती है।

कई बार वह ऐसी बातें सिर्फ कहने के लिये कह जाते कि जिसकी निरर्थकता का उन्हें खुद भी अहसास होता। मसलन, गुरु, कुत्ता बड़ा महान जीव होता है। उसके धार्मिक खयालात बहुत ऊँचे होते हैं। उसे अगर रास्ते में दूसरे कुत्ते काट खाने को न आयें तो वह रातोंरात हरिद्वार जाकर नहा आये। मेरा ऐतराज था कि जो कुत्ते उसका रास्ता रोकने को बैठे रहते हैं वो खुद क्यों नहीं उससे पहले हरिद्वार चले जाते? पिता बात बदल देते या चिढ़ जाते।

किसी को अंग्रेजी शराब पीता देखते तो कहते- ये साली बड़ी बेकार चीज है, ठर्रा बड़ी महान चीज है। ठर्रे वाले को राय होती कि ये कोई अच्छी चीज थोड़ा है, आँतें गला देती है। कम लो, अच्छी चीज लो, इंगलिश पिया करो। इसी तरह उनका दिन चाय पीने और चाय की बुराइयाँ गिनवाने में बीतता।

उनका दावा था कि अगर कोई उन्हें सात फाउंटेन पैनों में सात रंग की स्याहियाँ भर कर ला दे तो वे असल जैसा दिखने वाला नकली नोट बना सकते हैं। उनका इतना-सा काम किसी ने करके नहीं दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था चौपट होने से बच गयी। इस नेक काम में मैंने भी सहयोग नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कहा- देखना गुरु, अब अटलजी मैरिज कर लेंगे। सैटल हो गये हैं न। पिता जैसे थे मैंने ठीक वैसे ही कलम से पेंट कर दिये। न मैंने उनका मेकअप किया, न उन पर कीचड़ उछाला। उन्हें याद करने के बहाने माँ, जिसकी याद मुझे जरा कम ही आती है, को भी याद कर लिया और खुद अपने अतीत की भी गर्द झड़ गयी। बात से बात निकलती चली गयी, डर है कहीं रौ में कुछ गैरजरूरी न कह गया होऊँ।

मेरे लिये पिता की दो छोटी सी ख्वाहिशें थीं- एक तो मुझे किसी तरह चार-छ: बोतल ग्लूकोज चढ़ जाये। जिससे मैं थोड़ मोटा हो जाऊँ। मेरा दुबलापन उनके अनुसार सूखा रोग का लक्षण था। ग्लूकोज चढ़ने से मैं बकौल उनके ‘बम्म’ हो जाता। और दूसरी ख्वाहिश थी कि अनाथालय से मेरी शादी हो जाये। जाहिर -सी बात है कि मैंने हमेशा की तरह यहाँ भी उन्हें सहयोग नहीं किया और नतीजतन इतना दुबला हूँ कि मेरी उम्र मेरे वजन से ज्यादा है।

बाबा नागार्जुन: कुछ संस्मरण : अतुल शर्मा

जनशताब्दी वर्ष पर बाबा नागार्जुन को शि‍द्दत से याद कर रहे हैं कवि‍, लेखक और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा-
प्रतिष्ठित जनकवि बाबा नागार्जुन उम्र की जिस दहलीज पर मिले, उस समय स्वाभाविक थकान घेरे रहती है। लेकिन बाबा नागार्जुन इसके अपवाद रहे। मैंने पहली मुलाकात में ही मस्ती, घुमक्कड़ी फक्कड़पन और ठहाकों से घुली मिली अद्भुत गहरी जि‍जि‍वि‍षा अनुभव की।
डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून का यूनियन वीक। एक तरफ चुटकुलेबाजों का तथाकथित कवि सम्मेलनीय मंच और दूसरी तरफ युवाओं से भरे हॉल में बाबा नागार्जुन का इंतजार। यह जनपक्षीय संदेश देने के लिए किया गया कार्यक्रम था। साहित्य का जनसंघर्षों के साथ भीतरी रिश्ता नागार्जुन जैसे प्रतीक को लेकर किया गया आयोजन था।
बाबा देहरादून पहुंचे। कुछ समय बाद उन्हें एक बड़े होटल में ठहरा दिया गया। मोटा खादी का कुर्ता, ऊंचा पजामा, खि‍चड़ी दाढ़ी, सिर से गले तक मफलर और मफलर के ऊपर टोपी। मोटा खादी का कोट, हाथ में छड़ी। एक दरी में छोटा सा बिस्तर रस्सी से बंधा था। एक झोला था जिसमें किताबें व दवाई की बोतलें थीं। सहज देहाती युगपुरुष बाबा नागार्जुन भव्य होटल के रंगीन पर्दों, दीवारों, खिड़कियों और फर्नीचरों के बीच चल रहे थे। पीछे युवाओं की उत्साही भीड़ थी। एक सुविधाजनक सोफे में बैठकर उन्होंने अपनी सांसों को संयत करने के लिए पानी मांगा। एक नजर युवाओं की तरफ डाली और मुस्कुफराये। फिर पैर सोफे पर चढ़ा कर बैठ गए। छात्र संघ अध्यक्ष जो उन्हें सादतपुर से गाड़ी में लाए थे, उन्हें इशारे से बुलाया और कहा, ‘‘अतुल को बुला सकते हो?’’
मेरे पास फोन आया- ‘बाबा देहरादून पहुंच गए हैं। आपको याद कर रहे हैं।’ कुछ ही देर बाद मैं बाबा के सामने था। वह मेरा हाथ पकड़कर बैठ गए। हंसे और कुछ बातें कीं। फिर धीरे-धीरे उठे, अपना छोटा सा रस्सी बंधा बि‍स्तर सामने रखवाया, झोला कंधे पर टांगा और छड़ी ढूंढने लगे। न मैं कुछ समझ पाया और न कोई और।
‘‘अतुल के घर जाऊंगा।’’ विनम्रता और दृढ़ता के साथ बाबा ने कहा। सब चौंके। उन्होंनें मेरा हाथ पकड़ा। सब बाहर की तरफ चलने लगे। न कोई विवाद न कोई संवाद। मेरी क्या हिम्मत मैं कुछ कहूँ। मेरे लिए तो यह अप्रत्याशित सौभाग्य था।
‘‘वहीं रहूंगा।’’ बाबा ने निर्णायात्मक स्वर में कहा। बाहर निकल छात्रसंघ अध्यक्ष ने मुझे अलग बुलकर कहा, ‘‘एक- डेढ़ घंटे बाद कार्यक्रम है। बाबा को वहां भी पहुंचना है।’’
‘‘मुझे बताओ मैं क्या कर सकता हूं ?’’ मैंने कहा।
‘‘मैं आपके साथ चलता हूं और साथ ही कॉलेज ले आयेंगे।’’ छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा। गाड़ी में बाबा बहुत खुश थे।
हम जहां पहले रहते थे, उसके सामने बजरी बिछा एक लॉन था। और उसके आसपास पिताजी के लगाए बावन तरह के गुलाब, कैक्टस, बोगेनवैलिया, कुछ सब्जियां और अन्य पौधे लगे थे। जाफरी वाला मकान, टीन की छत, नींबू के पेड़ से सटा हुआ एक कमरा। वहां रखी चारपाई और दो कुर्सियां। बाबा वहीं बैठे, फिर लेट गए। मैंने परिवार में अम्मा जी, रीता, रेखा और रंजना को मिलवाया। वह उठकर बैठ गए। एकदम बोले, ‘‘अतुल, मुझे तो मेरा परि‍वार मि‍ल गया।’’ अम्मा जी से कहा, ‘‘थोड़ी सी खिचड़ी खाऊंगा।’’ हमें बहुत अच्छा लग रहा था, पर छात्रसंघ पदाधिकारियों की धड़कनें बहुत बढ़ रही थीं।
बाबा मेरा हाथ पकड़कर बाहर आये। और क्यारियों में घूमने लगे। अपनी छड़ी से इशारा करते हुए बोले, ‘‘यह तो सर्पगंधा है। रक्तचाप की अचूक औषधि। यह कैलनडूला एन्टीबायटिक।’’ ऐसे कई पौधे उन्होंने गिना दिये। वह कहने लगे, ‘‘लगता है बहुत जानकार आदमी थे शर्मा जी।’’ (शर्मा जी यानी स्वतंत्रता सेनानी कवि श्रीराम शर्मा प्रेम)। काफी देर गुलाब को देखते रहे। और फिर कमरे की ओर जाने लगे। इतनी देर में खिचड़ी बन चुकी थी। उन्होंने बहुत थोड़ी-सी खिचड़ी और सब्जी खाई। और फिर मुझसे पूछा, ‘‘कितनी देर में है आयोजन?’’ मैंने कहा, ‘‘शुरू ही होने वाला होगा।’’ ‘‘तो फिर चलते हैं वहीं पर, सामान यहीं रहेगा। मैं भी यहीं रहूंगा।’’ मैंने न जाने क्यों पूछ लिया, ‘‘यहां कोई असुविधा तो नहीं होगी?’’  इस पर वह नाराज हो गए। उन्होंने कहा, ‘‘खबरदार जो मेरे घर को असुविधाजनक कहा।’’
डी.ए.वी. कॉलेज हॉल- बाबा के आने से खलबली मच गई। राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत यात्रा और निराला के समकालीन आपातकाल में सक्रिय काव्यमय विद्रोह करने वाले मैथिली साहित्य में साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हिंदी के वरिष्ठतम कवि, गद्यकार व आन्दोलनकारी बाबा नागार्जुन बार-बार मंच से यही कहते रहे कि- जन से होते हुए जन तक पहुंचना ही लक्ष्य है। दिल्ली से उनके साथ आये महेश दर्पण और देहरादून के कवियों के साथ उन्होंने काव्यपाठ किया। ‘मंत्र’ कविता सुनाई। छात्र-छात्राओं के साथ घंटों बैठे रहे। रिश्ते जोड़ लिये। सबको हमारे घर का पता देते रहे। और अद्भुत निरन्तरता के संवाद बाबा नागार्जुन से मिलने दो दिन तक हमारे यहां मेला लगा रहा। चाय का बड़ा भगोना रेखा ने चढ़ा दिया था। युवा और वृद्ध, साहित्यकार और रंगकर्मी अलग-अलग सोच के राजनीतिक लोगों से हमारा घर भरा रहा। बाबा क्या आये जश्न हो गया। तभी तो वे जनकवि हुए।
अगले दिन मेरे आग्रह पर महादेवी पीजी कॉलेज के हिन्दी विभाग में भी उन्होंने शिरकत की। रात को सोते समय कहने लगे, ‘‘आज मेरी पांच हजार से ऊपर फोटो खिंची होंगी। ये सोच रहे हैं कि मैं इतनी जल्दी चला जाऊंगा। इन्हें पता नहीं कि अभी बहुत दिन जियूंगा।’’ वह ठहाका मार कर हंसे। मैंने मन ही मन सोचा, बाबा नागार्जुन कभी समाप्त हो ही नहीं सकते। वह हमारे यहां कई दिन तक रहे।
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जयहरि‍खाल, पौड़ी गढ़वाल- बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस। वाचस्पति के यहां आकर वह हर साल रहते थे। उसका फोन आया कि ‘‘बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस है। तुम्हें आना है।’’ मैं यह अवसर कैसे चूकता। लैंसडाउन के पास छोटी-सी बस्ती जयहरिखाल पहुंच गया। वहां वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित बाबा नागार्जुन की काव्यपुस्तक ‘ऐसा क्या कह दिया मैंने’ का विमोचन हुआ। शेखर पाठक, गिर्दा आदि मौजूद थे। काव्यगोष्ठी  हुई। बाबा ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘अकाल’ सुनाई। और लोगों ने भी काव्य पाठ किया। मैंने दो जनगीत सुनाए। उसकी एक पंक्ति पर बाबा काफी देर तक बोले। यह मेरे लिये उत्साहजनक था। पहली पंक्ति थी-
‘ये जो अपनी शिरायें हैं सारी पगडंडियां गांव की हैं।’
और दूसरी कविता की पंक्ति थी- ‘जिस घर में चूल्हा नहीं जलता, उसके यहां मशाल जलती है।’ मेरी इन दोनों पंक्तियों पर काफी देर तक चर्चा की। जयहरिखाल को केन्द्र मान कर कई कविताएं लिखी थीं जो गढ़वाल विश्वविद्यालय के कोर्स में पढ़ाई जाती हैं।
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नैनीताल- नागार्जुन, गिर्दा और मैं नुक्कड़ कवि सम्मेलन में काव्यपाठ कर रहे थे। बाबा ने एक पंक्ति सुनाई- ‘एक पूत भारत माता का। कंधे पर है झंडा। पुलिस पकड़ कर जेल ले गई। बाकी रह गया अंडा।’ यह सबको बहुत पसंद आई। साहित्य समझ भी आये और परिवर्तन की दिशा में कार्य भी करे। यह मकसद ठीक लगा। उन्होंने चलते समय अपनी घड़ी देते हुए कहा, ‘‘अतुल, यह लो मैं तुम्हें समय देता हूं।’’ यह कहकर वह खुद ही ताली बजाकर बच्चों की तरह खिलखिलाये और बाबाओं की तरह चले गये मुड़कर नहीं देखा।
ये दृश्य कभी भूलता नहीं। ऐसे बहुत से संस्मरण मेरे पास हैं जो नैनीताल, हल्द्वानी, कौसानी, पौड़ी, अल्मोड़ा, देहरादून ही नहीं, बल्कि दिल्ली तक फैले हुए हैं। बहुत लोगों में बाबा इस तरह से जीवित हैं।
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दिल्ली विश्वपुस्तक मेला। एक स्टॉल पर बाबा बैठे हैं। वह किसी पुस्तक का विमोचन करने को तैयार हैं। उनसे मिले बहुत वर्ष हो गये थे। सोचा कि पहचान भी पायेंगे कि नहीं। उनके पास गया और प्रणाम किया। वह किसी और से बात करने लगे। मैं चलने लगा। उन्होंने लपक कर मेरा हाथ पकड़ा, ‘‘अरे, इतनी जल्दी क्या है? देहरादून जाना है क्या?’’ वह फिर चिरपचित हंसी के साथ मिले। अच्छा लगा कि भीड़ भरी दुनिया में अभी कुछ लोग ऐसे हैं जो मन से जुड़ते हैं। उन्होंने गढ़वाल की कई बातें पूछीं। एकएक दिल्ली के नामवर लोगों ने उन्हें घेर लिया। भीड़ के पीछे खड़ा मैं भी बाबा के साथ जुड़ा रहा। आज भी जुड़ा हूं।

यादों में रहेंगे सदा: सन्तोष कुमार चतुर्वेदी

प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन को पुनर्स्‍थापित करने वालों में महत्‍वपूर्ण कथाकार मार्कण्‍डेय पर उनके साथ कथा पत्रिका में सहायक रहे युवा कवि सन्‍तोष कुमार चतुर्वेदी का संस्‍मरण और लंबी कविता-

कवि केदार नाथ सिंह की एक छोटी कविता ‘जाना’ की पंक्तियां हैं-

मैं जा रही हूं- उसने कह

जाओ – मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

18 मार्च, 2010 को सायं सवा पांच बजे के आसपास आजमगढ़ से जब मार्कण्डेयजी की बड़ी पुत्री डॉ स्वस्ति सिंह का फोन आया कि ‘पापा नहीं रहे’- तब मैंने हिन्दी की इस सबसे खौफनाक क्रिया को शि‍द्दत से महसूस किया। मैं स्तब्ध था क्योंकि ठीक इसी दिन वह दिल्ली से आजमगढ़ लौटने की तैयारियां कर रहे थे। कैफियात एक्सप्रेस से उनको आजमगढ़ लौटना था। इलाहाबाद में हम अपने तरीके से उनकी अगवानी की तैयारियों में लगे हुए थे। लेकिन एक पल में जैसे सब कुछ गड़बड़ हो गया। अब लौट रहा था ताबूत में रखा हुआ उनका पार्थिव शरीर और हम इलाहाबाद जंक्‍शन पर शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, श्री प्रकाश मिश्र, सूर्यनारायण आदि साथियों के साथ सुबह सवा नौ बजे के आसपास अत्यन्त भीगे मन से रीवांचल एक्सप्रेस का इन्तजार कर रहे थे।

मार्कण्डेय सिर्फ एक नाम भर नहीं थे। वे सिर्फ एक कहानीकार, उपन्यासकार, एकांकी लेखक, आलोचक, कवि या सम्पादक भर नहीं थे, सिर्फ नयी कहानी आन्दोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक नहीं थे- अपितु बहुत कुछ और भी थे। इलाहाबाद को जुनून की हद तक चाहने वाले, प्यार करने वाले। जीवन के अन्तिम समय तक गंवई संस्कारों को अपने में सुरक्षित संरक्षित रखने वाले। अपने से जुड़े हुए लगभग सारे लोगों का बहुत बहुत ख्याल रखने वाले। अत्यन्त विनम्र स्वभाव वाले, हर दिल अजीज और सबसे बढ़कर असीम संवेदनाओं से भरे हुए वे एक बेहतर इन्सान थे। उनके चेहरे की चिरपरिचित हंसी हमेशा बहुत कुछ कहती थी। यद्यपि आज वह स्मृतियों में जीवित हैं, अपनी रचनाओं में जीवित हैं, लेकिन एक कटु सच्चाई यह है कि आज उनका न होना इलाहाबाद को बहुत खल रहा है।

जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकान्त वर्मा, सत्यप्रकाश मिश्र के बाद मार्कण्डेय का जाना इलाहाबाद को गहरे तौर पर सूना कर गया है। शेखर जोशी और अमरकान्त जैसे अपने इस अभिन्न मित्र के इस तरह अचानक चले जाने से अवाक और एकदम अकेले पड़ गये हैं। और हम जैसे नये रचनाकारों के लिए, जिन्होंने साहित्य का ककहरा सीखना अभी शुरू ही किया है, तो यह वज्रपात के समान है। उनके होने भर से हम अपने प्रति गहरे तौर पर आश्‍वस्त होते थे। उनके होने भर से हमारा आत्मविश्‍वास जैसे अपने चरम पर होता था।

समय का पहिया भला कब रूका है कि वह हमारे लिए रुकता। समय के प्रवाह के इस क्रम में हम आज जैसे अपना सब कुछ गवां बैठे थे। इसी बीच महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्‍वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित दूरस्थ शि‍क्षा केन्द्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. सन्तोष भदौरिया का फोन आया कि 20 मार्च, 2010 को केन्द्र के हॉल में सायं 5 बजे से मार्कण्डेय जी पर एक श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन है। संयोगवश यह शनिवार का दिन था। पिछले 14-15 वर्षों से शनिवार और रविवार का दिन मेरे लिए वह खास दिन होता था कि जैसे ही घड़ी की सुइयां शाम के 4 बजातीं दादा का फोन आ जाता- ‘क्या कर रहे हो भाई, उठो और जल्दी से आ जाओ। चाय बन रही है। कथा का बहुत सारा काम करना है।’ इतना सुनना होता कि मैं यन्त्रवत तैयार हो कर जल्दी-जल्दी रिक्‍शे से उनके राजापुर स्थित आवास ए डी-2, एकाकी कुंज, मेयो रोड पहुंच जाता, जो हमारे लिए ‘कथा’ का मुख्यालय भी हुआ करता।

जब हम उनके घर पहॅुचते, हमारे लाख मना करने के बावजूद, जैसाकि उनका स्वभाव था, वे अपने हाथों एक प्लेट में मिठाइयां और ठण्डा पानी लाते। मम्मी विद्यावती जी (मार्कण्डेय जी की पत्नी) गठिया के अपने असहनीय दर्द को दरकिनार कर चाय बनातीं। और तब उनकी पसन्दीदा चना लाई और चाय के साथ बातचीत का अन्तहीन दौर शुरू हो जाता। बीच-बीच में हम कथा के लिए लेखकों को कुछ चिट्ठियां लिखते और लेखकों से रचनाओं के लिए फोन करते-कराते। पिछले कई वर्षों से मेयो रोड से गुजरते हुए, जहां उनका आवास एकाकी कुंज है, एक बार भी ऐसा नहीं हुआ होगा कि दादा से मिले बिना हम निकल जायें। और इस 20 मार्च को पहली बार जब जाना भी हो रहा था तो दादा पर ही आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भाग लेने के लिए। इससे बढ़कर विडम्बना मेरे लिए और क्या हो सकती थी।

दादा को सबकी परवाह रहती थी। उनका स्पेस बहुत व्यापक था जिसमें कॉलोनी के घरों में चौका बासन करने वाली निम्न वर्ग की लड़कियां और महिलाएं होती थीं। घर में काम करने वाला बिजली का मिस्त्री होता था। कॉलोनी के छोटे’छोटे बच्चे होते थे तो दूसरी तरफ साहित्य शीर्ष पर आसीन प्रोफेसर नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, शि‍व कुमार मिश्र या नन्द किशोर नवल होते थे। घर पर काम करने वाली महरी का बच्चा बीमार है तो उसे दवाई दिलवाना, अगर उसकी लड़की ने कक्षा 8 पास कर लिया तो नवें दर्जे में एडमिशन दिलवाना, दूध देने वाले के बच्चे के लिए कहीं नौकरी की व्यवस्था कराना, किसी कवि या कहानीकार ने अगर कुछ लिखा है तो उस पर गोष्ठी के आयोजन की व्यवस्था कराना आदि-आदि तमाम तरह की समस्याएं दादा की अपनी समस्या बन जाती थीं। वे खुद आगे आ कर उन सारी समस्याओं के निराकरण का प्रयास करते थे। दूसरी तरफ उनकी चिन्ता का विषय यह भी होता कि वरिष्ठ आलोचक शि‍व कुमार मिश्र को रिटायरमेन्ट के बाद बहुत कम पेन्‍शन मिल रही है। इतनी महंगाई के जमाने में उनका गुजारा कैसे होता होगा। वरिष्ठ आलोचक नन्द किशोर नवल जो वर्ष 2009 में अधिकांश समय तक तमाम बिमारियों से जूझते रहे, के स्वास्थ्य को ले कर भी वे अक्सर चिन्तित दिखायी पड़ते और मेरे जाते ही कहते, ‘सन्तोष जरा जल्दी से नवल जी को फोन मिलाओ। उनके तबियत की खबर ली जाए।’ शेखर जोशी आजकल कहानियां नहीं लिख रहें किसी तरह से उनसे नयी कहानी लिखवानी है। सतीश जमाली का स्वास्थ्य और उनकी आर्थिक दिक्कतें जैसे दादा की अपनी दिक्कतें बन जाती थीं।

संभवतः वर्ष 2009 के दिसम्बर महीने की वह 20 तारीख थी, जब स्वस्ति दीदी उनके गले की समस्याओं के मद्देनजर बनारस हिन्दू विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में उनको दिखलाने के लिए लिवा गयी थीं। जांच के बाद यह पता चला कि उनके गले में फिर से कैन्सर ग्रोथ हो गया है। यह बात दादा को बतायी नहीं गयी थी। लेकिन लगता है कि दादा को इसका आभास अच्छी तरह से हो चुका था। दो साल पहले भी गले के कैन्सर से वे जूझ चुके थे, पर इस बार जैसे उनको सब पता था। उसी दिन रोज की तरह ही जब उनसे मेरी बात हुई तब उन्होंने मुझे बताया- ‘सन्तोष मामला फिर गड़बड़ हो गया।’ मैंने उन्हें मजबूत करने के उद्देश्‍य से कहा- ‘दादा इलाज से सब कुछ ठीक हो जायेगा। आप बिल्कुल चिन्ता मत करिए।’ तब दादा ने कहा -‘हां, ठीक ही कहते हो। लेकिन… चलो… देखा जायेगा।’

और फिर वह भी दिन आया जब दिल्ली के रोहिणी में राजीव गांधी कैन्सर इन्स्टीट्यूट में उनके गले के कैन्सर की पुष्टि हो गयी। 29 जनवरी को उन्हें दिल्ली रेडियोथिरेपी कराने के लिए जाना था। मैं उनसे मिलने तथा स्टेशन तक छोड़ने के लिए उनकी छोटी बेटी डॉ. शस्या ठाकुर के आवास थार्नहिल रोड स्थित टेमेरिन ट्री गया। हमेशा उत्साहित रहने वाले तथा हम सबको हमेशा उत्साहित करने वाले हम सबके दादा आज मुझे पहली बार बहुत हतोत्साहित लगे।

उनका मनोबल बढा़ने के लिए हम तमाम बातें कर रहे थे, गढ़ रहे थे, लेकिन सब जैसे व्यर्थ साबित हो जा रहा था। एक विषाद उनके चेहरे पर साफ-साफ पढा़ और महसूस किया जा सकता था। प्रयागराज एक्सप्रेस पर उन्हें बिठाते हुए और दिल्ली के लिए रवाना करते हुए हम पहली बार बहुत अजीबोगरीब महसूस कर रहे थे। हमारे लिए जैसे अनहोनी का पूर्वाभास था, जिसे नकारने की कोशि‍शों में हम लगे हुए थे। दादा का यह इलाहाबाद का छोड़ना अन्तिम बार का इलाहाबाद का छोड़ना होगा, यह हम कहां जान पाये थे। यह हम कहां स्वीकार कर पाये थे।

दादा के गले की रेडियोथिरेपी एक बार फिर से 01 फरवरी से दिल्ली के रोहिणी के राजीव गांधी कैन्सर इन्स्ट्टीट्यूट में चालू हो गयी। विशेषज्ञ डाक्टरों ने उनकी उम्र और रोग की जटिलता से जुड़ी आगे आने वाली तमाम संभावित दिक्कतों का जिक्र किया। यह भी पता चला कि यह कैन्सर अब उनके फेफडों तक पहुंच चुका है, जो लाइलाज है। स्वस्ति दीदी ने तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद उनके गले की रेडियोथिरेपी कराने का निर्णय लिया। अब हम सबके सामने कोई विकल्प भी तो नहीं बचा था। उनकी उम्र के व्यक्ति के लिए रेडियोथिरेपी और वह भी दो ही साल के अन्दर दुबारा झेल पाना बहुत मुश्‍कि‍ल भरा काम था। फिर भी उनकी रेडियोथिरेपी चालू हुई और फिर वह मौत के साथ दो-दो हाथ करने में मजबूती से जुट गये।

विगत 8-10 सालों से एक ऐसा सिलसिला बन गया था जिसमें प्रायः उनसे रोज ही दसियों बार कथा के संदर्भ में बातचीत होती। हालांकि बीमारी के मद्देनजर मैं अब उनसे बातें करने में संकोच करता, लेकिन वह किसी भी वक्त फोन मिला कर दिल्ली से ही मुझसे तमाम योजनाओं पर बात करने लगते। ‘सपने तुम्हारे थे’ (कविता संग्रह) और ‘पत्थर और परछाइयां’ (एकांकी संग्रह) जो कम्पोज हो गया है, उसे अब छपवा देना है। उसका कवर बेहतर बनवाना है। सरोज सिंह की थिसिस जो प्रेमचन्द पर है, किताब के रूप में जल्दी लानी है। और हां-‘कथा’ के अगले अंक की तैयारियों के लिए क्या कर रहे हो आदि आदि तमाम बातें उनकी जुबान पर होती थीं। मैं उनसे यही कहता- ‘यह सब काम आपके इलाहाबाद लौटने तक हो जायेगा। आप जल्दी से पहले स्वस्थ तो हो जाइए।’ मगर उन्हें तो जल्दी थी। जैसे वे भलीभांति यह जान गये हों कि अब बहुत ज्यादा जीवन नहीं बचा है। कम से कम बच गये इस समय का वे जैसे आदतन पूरा उपयोग कर लेने के लिए बेहद उतावले दिख रहे थे।

इधर फोन पर अक्सर उनका सवाल होता- ‘दिल्ली कब आ रहे हो? जल्दी से आ जाओ। तुमसे तमाम बातें करनी हैं।’ मेरा भी मन उनके बिना इलाहाबाद में कहां लग रहा था। अपने महाविद्यालय से छुट्टी ले कर मैं 09 फरवरी को दिल्ली पहुंचा। मुझे देखते ही दादा पहले की तरह ही जैसे उत्साह से भर गये हों। यद्यपि उनकी बीमारी की स्थिति को देखते हुए हम उनसे कम से कम बातचीत करना चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी बीमारी की परवाह कहां थी। उन्हें तो तमाम बातें करनी थीं। रोज-ब-रोज मन्द पड़ती हुई आवाज भी उनके हौसले को पस्त नहीं कर पायी थी। दस दिनों का दिल्ली का मेरा समय उनके साथ कब और कैसे कट गया, इसका बिल्कुल पता ही नहीं चला। बातचीत का विषय साहित्य से शुरू होता और फिर यह क्रम राजनीति, समसामयिक घटनाओं, खेलकूद, फिल्म, थियेटर आदि तक बिन रूके चलता चला जाता। उनके पास संस्मरणों का अथाह खजाना था। कमलेश्‍वर, दुष्यन्त कुमार से जुड़े हुए…। भैरव प्रसाद गुप्त, उपेन्द्र नाथ अश्‍क, श्रीकृष्ण दास से जुड़े हुए…। माया प्रेस से जुड़े हुए…। प्रतापगढ़ से जुड़े हुए…।

उनके हार्ट अटैक के इलाज के दौरान दिल्ली के साहित्यकारों जैसे मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा, कृष्णा सोबती, राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, अशोक बाजपेयी से जुड़े हुए…। उनके गांव बराई से जुड़े हुए…। प्रतापगढ़ से जुड़े हुए…। और इन सबसे स्वयमेव ही जुड़ जाता उनका अपना इलाहाबाद। जिसके बिना वह हमेशा बेचैन रहते। जहां रहने के वह तमाम बहाने ढूंढते। और जब कभी स्वस्ति दीदी उन्हें आजमगढ़ बुलाने के लिए फोर्स करतीं, तब इलाहाबाद न छोड़ने के हजार बहाने गढ़ते हुए।

अबकी बार दिल्ली में अपना इलाज कराते हुए दादा किसी को भी यह खबर देना नहीं चाहते थे। उनके रहने-सहने का जो अन्दाज रहा है, उसमें वे अपने को दीन हीन दिखने-दिखाने से बचना चाहते थे। दिल्ली पहुंच कर मैंने जब उनकी बीमारी की बात विश्‍वनाथ त्रिपाठी, ममता कालिया, रवीन्द्र कालिया, वीर भारत तलवार, आनन्द प्रकाश, उदभ्रान्‍त, कुमुद शर्मा, संजय जोशी आदि को बतायी तो वह पहले तो मुझे झिड़की पिलाते हुए बोले ‘इसकी क्या जरूरत थी। तुम नाहक ही सबको परेशान करते रहते हो।’ फिर इन लोगों से फोन पर प्रेमपूर्वक बातें करते हुए किसी भी समय मिलने आने की बात कहते। समय-समय पर जब ये लोग आते तब एक बार फिर शुरू हो जाता इनके साथ बातों का… यादों का एक अन्तहीन सिलसिला।

संजय जोशी के मि‍त्र अनुराग दादा का इन्टरव्यू लेना चाहते थे। दादा से जब मैंने इस बात की चर्चा की तो शुरुआती ना-नुकुर के पश्‍चात वह इन्टरव्यू देने के लिए राजी हो गये। अनुराग को 21 फरवरी, रविवार का दिन इसके लिए दिया गया। रेडियोथिरेपी से दादा की आवाज मन्द पड़ने लगी थी। इसके बारे में अनुराग से निवेदन किया गया कि यदि इन्टरव्यू छोटा हो तो दादा की सेहत के लिए बेहतर होगा। लेकिन जैसा कि स्वस्ति दीदी ने बताया इन्टरव्यू का सिलसिला जब शुरू हुआ तो वह लगभग एक घण्टे तक चला। दादा का यह अन्तिम इन्टरव्यू होगा, यह बात हम भला कहां जानते थे।

इन्स्टीट्यूट में इलाज कराते हुए भी दादा ने एक कहानी का सूत्र खोज लिया था। इन्स्टीट्यूट में काम करने वाली एक खूबसूरत नर्स का नाम उन्होंने ‘सुग्गी’ कर दिया था। सुग्गी को लेकर एक से जुड़ कर एक कथानक उनके मन मस्तिष्क में तैयार हो रहे थे। इसी प्रसंग में उनके खयालों में पता नहीं कहां से साइकिल चलाते दुष्यन्त कुमार आ खड़े होते जो घर लौटती सुग्गी के रिक्‍शे से टकरा कर गिर जाने का अभिनय करते। घायल दुष्यन्त कुमार को सुग्गी उठा कर इलाज कराने ले जातीं। और फिर अपनी राह चल पड़ती यह कहानी। इस कहानी में ईरान से इलाज कराने दिल्ली आया वह गोरा चिट्टा शेख भी शामिल हो जाता जो अपने बेटे-बेटी के साथ हमें राजीव गांधी कैन्सर इन्स्ट्टीट्यूट में प्रायः दिखायी पड़ता। मन मस्तिष्क में बुनी गयी उनकी वह कहानी कागज पर उतरने के पहले ही अनाथ हो गयी।

16 मार्च, 2010 की सुबह 8 बजे फुसफुसाती आवाज में दादा का फोन आया- ‘सन्तोष, मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। अब जीने की इच्छा नहीं हो रही।’ बातचीत के दौरान ऐसा लगा जैसे बातों के इस जादूगर की आवाज के तार अब टूट रहे हैं। वह जादूगर जो हमेशा जीवन से भरा रहता। जो जब, जहां, जैसे, जिस तरह चाहता बातों को शुरू करता, नचाता। बातों को मनचाहे सूत्र से जोड़ देता और फिर एक विशि‍ष्ट अन्दाज में अंजाम तक पहुंचा देता। सुनने वाला मन्त्र मुग्ध हो उन्हें और उनकी बातों को एकटक निहारता और सुनता रहता।

मुझे याद नहीं किस सिलसिले में दूधनाथ सिंह ने यह बात कही, पर इस सन्दर्भ में मुझे हमेशा याद आती है कि अगर नामवर सिंह वाचिक परम्परा में आलोचना के शीर्ष पर हैं तो अपने गुरु मार्कण्डेय जी भी वाचिक परम्परा में कथक्कड़ी के शीर्ष पर हैं। इसमें वे बेजोड़ हैं। वाकई इस क्षेत्र में अप्रतिम प्रतिभा के धनी मार्कण्डेय जी की बातों, वृतान्तों, कथाओं, संस्मरणों को हमने बहुत करीब से देखा-सुना-जाना और महसूस किया है, यह बात तो हम फख्र के साथ कह ही सकते हैं।

दादा आज हमारे बीच नहीं हैं। हकीकत होते हुए भी इसे मानने का मन नहीं होता। और जब कभी इसे ले कर मन उदास होने को होता है तो हम इसे आश्‍वस्त करने में जुट जाते हैं कि दादा हमारे पास ही तो हैं। निराला जी की ये पंक्तियां कितनी सच हैं-

मरण को जिसने वरा है

उसी ने जीवन भरा है

दादा हमारे पास हैं- अपनी तमाम स्मृतियों, वृतान्तों, कहानियों और अपनी अन्य रचनाओं और अपने द्वारा सम्पादित कथा के तमाम अंकों में। हमारे स्मरण में है आज भी बिल्कुल जैसे का तैसा उनका जीवन। किसी ने कहा भी तो है – देखने के लिए देखने वाले नजर की जरूरत होती है। सच भी तो यही है। हम वह नजर विकसित कर उनकी बातों, विचारों और सिद्धान्तों को आगे ले जाकर उन्हें जीवित रख सकते हैं। उन्हें किसी संकीर्ण दायरे में तो बांधा ही नहीं जा सकता। उनके इस व्यापक फलक को हम और व्यापक करें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि प्रकट करने का, मेरी समझ से उपयुक्त तरीका हो सकता है।

एक आदमी जिया करता था लगातार

(मार्कण्डेय दादा के लिए)

उनके बारे में तमाम बातें

जानने का दावा कर सकता हूं

बावजूद इसके

एहतियातन यह भी कहा जा सकता है

कि बहुत कुछ नहीं भी जान पाया

उनके बारे में

उनके अन्दरूनी ज़ख्मों के बारे में तो कत्तई नहीं

जिनका टपकना

तमाम कोशिशों के बाद भी

नहीं उतर पाता था

उनके चेहरे पर

जानते हुए भी नहीं जान पाये

जैसे अपने को ही जीते हुए

नहीं जान समझ पाते हम

खुद अपने ही जीवन की पहेली

जीवन भर

जैसे आंखें खुली होने के बावजूद

टंग जाता है इन पर एक ऐसा पर्दा

जिससे हो कर देखते हुए भी

नजर नहीं आता हमें कुछ भी

फिर भी

एक आदमी के तौर पर मैं उनको

बखूबी जानता-पहचानता था

रिश्‍तों के तार को

अपनी  धुन के मुताबिक छेड़ते हुए

गढ लेते थे वे

बातों-बातों में ही

कोई न कोई बात

उनको फुहारों के रूप में

कई बार महसूस किया था मैंने

तपती हुई धूप में जब

धरती का कलेजा

जगह-जगह से फटने लगता था

और किसानों की आंख में

उग आती थी

दिन में ही जोन्ही

उमड़-घुमड़ कर घिर आते थे वे आदतन

आसमान में घटा बन कर

फिर बरसने लगते थे

धरती पर इस कदर

छहर-छहर

कि भीग जाती थी समूची मिट्टी

तब हरियाली झूलने लगती थी

धरती की डाल पर

डाल कर झूला

बेखौफ हो कर

वृक्ष रूप में पाया

जब-जब उनको देखा मैंने

जब कभी आते लोग थके-मांदे

अपनी छांव तले बैठा कर

हांकने लगते वे फौरन

अपनी पत्तियों का बेना

वे खिल उठते अपने फूलों में

किसी के दुख को कम करने खातिर तत्काल ही

और भूखों के आगे तो

अपनी ही पत्तियों के दोने में परोस देते

अपनी ही डाल के पके फल

बिना किसी हिचक के

उनसे बतियाना

हमेशा एक पेड़ से बतियाना था

उसकी हरियाली

और उसकी जड़ों से बतियाना था

दिल खोल कर पूरी-पूरी

देश दुनिया की

सच्ची-मुच्ची बातें

जिसे अक्सर दोहराता था मैं

उनसे बातें करते-करते

सूरज बन कर

दुनिया का अन्धेरा दूर करते

मैंने उन्हें अपनी आंखों देखा था

खुद में वे जलते रहते थे प्रतिपल

जैसे हजारों हाइडोजन बम

फूट पड़े हों एक साथ

और धधक उठा हो

उनका अपना धरातल

लेकिन दूर सुदूर कहीं

फैलने लगा हो उजास

और आसमान की लहरों पर

फिसलता हुआ चांद पड़ने लगा हो शीतल

अपनी करामाती किरनों से

वे जब चाहते रच देते इन्द्रधनुष

तमाम रंगों को समोते हुए

खुद उन तमाम रंगों से होते हुए

आसमान में बिखरे हुए बादल भी

तब उनके किरनों की उजास से

भर-भर आते

टहाटह लाल हो जाते

एक अनोखे अन्दाज में

कथा रूप में तो वाकई बेजोड़ थे वे

कई-कई प्रसंग एक साथ जुड़ते थे उनसे

कई-कई युगों

कई-कई धाराओं को

अपने साथ समाहित करते

कुछ-कुछ सच्चे

तो कुछ झूठे-मुट्ठे लगने वाले अन्दाज में

हकीकत को हू-ब-हू बयां करते

इस कथा में ही कहीं

अपनी चोट से व्यथित नजर आते

दिख जाते वे

और जब कभी कहीं हम

डूबते दिखायी पड़ते

निराशा के भंवर में

भांप जाते वे तुरन्त

आ जाते अपनी पतवार संभालते

हमको हमारी राह दिखलाते

तमाम-तमाम बातें बतलाते

इतना ही जाना मैंने उनको जितना देखा

लेकिन इतना भी नहीं जाना

कि ढाल दूं उन्हें ही

एक कहानी के दायरे में तुरत फुरत

हमारे लिए तो यह भी मुश्‍किल है कि

उन्हें कविता के बीच ला कर रख दूं

जैसे का तैसा

और रही जहां तक नाटक की बात

तो इतना समझ लीजिए

कि कई नाटकों में कई मौकों पर

उनकी आंखें कई-कई बार

नम होते पाया था मैंने

और इसे कहीं से भी

नाटक कहना मुनासिब नहीं

वे तो एक आदमी थे

आदमियत से पूरी तरह से भीगे हुए

जीवन की आपाधापी में

जीवन को बचाते बसाते हुए

आदमी की शक्ल में

एक ठेठ आदमी

अपने घर-बार में मशगूल रहते हुए भी

दूसरों की चिन्ता में

लगातार घुलता हुआ एक आदमी

वे तो एक कहानी थे

दूसरों के जीवन को

अपनी फिक्र में गढ़ते हुए

वे तो बस एक घबराहट थे

प्रतिरोध की आहट

लगातार कम होते जाने से

बेहिसाब घबराये हुए

वे तो एक नदी थे

लगातार…  लगातार…

बहते हुए

अपने पानी से

एक कविता रचते हुए

दोनों किनारों की दूरी को

हर पल पाटते हुए

सच-सच कहूं

तो बस इतना ही जानता हूं मैं उनको

इससे कम या इससे ज्यादा

कुछ भी नहीं

कि लगातार कठोर होते जा रहे समय में

बहुत नरम थे वे

कि लगातार ठण्डे पड़ते जा रहे जमाने में

आंच जैसे गरम थे वे

कि हताशाओं के दौर में

एक गहरी आस से थे वे

कि विश्‍वासघातों के दौर में

एक पक्के विश्‍वास थे वे

बार-बार महसूस किया मैंने

कि एक आदमी

जिया करता था उनके अन्दर

ठीक अपनी ही शर्तों पर

लेकिन अपनी लचक से भरा हुआ भरपूर

विद्रूपताओं और कट्टरताओं के इस दौर में भी

एक आदमी जिया करता था

उनके अन्दर

निरन्तर

अपने धर्म और अपनी जाति के अहम को

लगातार दरकिनार करते हुए

अपने साथ-साथ

हमें भी लगातार

कुछ और अधिक

आदमी बनाते हुए

08.08.2010

विधाओं की कोई एल.ओ.सी. नहीं होती : कान्तिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन उन संस्‍मरणकारों में से जिन्‍होंने संस्‍मरण को साहि‍त्‍य की केंद्रीय वि‍धा के रुप में स्‍थापित किया। उनके संस्‍मरण खासे चर्चित और कुचर्चित भी हुए। उनसे प्रसिद्ध समीक्षक साधना अग्रवाल की बातचीत-

कान्ति जी, जहाँ तक मुझे मालूम है, छत्तीसगढ़ी बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन आपने किया है- नई कविता और भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य पर भी आपका कार्य है। आलोचना की पुरानी फाइल पलटने से मुझे उसमें आपका एक लेख- ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ देखने को मिला। मुक्तिबोध मंडल के कवियों ने ही आरंभ में ‘नर्मदा की सुबहकी योजना बनाई थी जिसे अज्ञेय ने न केवल झटक लिया बल्कि बहुत से पुराने कवियों को हटा दिया। ऐसा क्यों कर हुआ? कृपया इसे स्पष्ट करें।

1972 में जब मैं मप्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लिए ‘नई कविता’ नामक पुस्तक लिख रहा था, तब मैंने देखा कि विवेचकों के आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण नई कविता का सच्चा इतिहास नहीं लिखा जा सका है। हिन्दी में समीक्षा को ही इतिहास मान लिया जाता है। नई शोध के फलस्वरूप उपलब्ध नई जानकारी को इतिहास में समाहित करने की परंपरा हमारे विश्वविद्यालयों में नहीं है। मैंने उक्त पुस्तक में मुक्तिबोध के विवेचन के साथ जब ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ का विचार सामने रखा तो डॉ. जगदीश गुप्त जैसे नई कविता के विचारकों ने प्रारंभ में अपनी असहमति प्रकट की, किन्तु बाद में वे भी मेरे तर्कों और तथ्यों से आश्‍वस्‍त हुए।

मुक्तिबोध ने ‘नर्मदा की सुबह’ की योजना बनाई थी। मुक्तिबोध के मित्र और शुजालपुर में उनके विद्यालय-सहयोगी रह चुके वीरेन्द्र कुमार जैन मानते हैं कि मालवा में ही हिन्दी की प्रयोगवादी और नई कविता का जन्म हुआ था। बाद में इस काव्यधारा में नेमिचंद जैन और भारतभूषण अग्रवाल जुड़े। वीरेन्द्र कुमार जैन ने मुक्तिबोध पर लिखे और 13 मई, 1973 के ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित अपने लंबे संस्मरण में स्पष्ट किया है कि कैसे अज्ञेय जी की संगठन क्षमता के कारण उन्हें ‘तारसप्तक’ के संपादन के लिए आमंत्रित किया गया। ठीक यही बात शमशेर जी ने भी कही है। अज्ञेय जी ने ‘तार सप्तक’ की मूल सूची से कुछ नाम निकाल दिए और कुछ नए जोड़ दिए। अज्ञेय तारसप्तक के झंडा बरदार नेता नहीं थे। मुक्तिबोध के ‘अनन्य मित्र और मुक्तिबोध मंडल के कवि’ प्रमोद वर्मा ने मुझे अपने पत्र में लिखा: ‘दूसरा तारसप्तक’ छप चुका था। मुक्तिबोध को यह देखकर हैरानी हुई कि नई कविता के नाम से प्रस्तुत छठे दशक की कविता ‘तारसप्तक’ के मूलतः वामपंथी रुझान को काट तराश कर कोरम कोर, सौंदर्यपरक कलावादी बना दी गई है। ऐसा तो छायावाद के जमाने में भी नहीं हुआ था। तो क्या यह सब उनके नव स्वाधीन देश को अंतरराष्ट्रीय पूँजीवाद की गिरफ्त में रहे चले आने के लिए ही किया जा रहा था?’

मैंने मुक्तिबोध मंडल की अपनी स्थापना का लंबा विवेचन किया जो डॉ. नामवर सिंह संपादित ‘आलोचना’ में छपा भी। इस विवेचन में जिन कवियों और विचारकों के नाम आए थे वे सब मेरे परिचित मित्र थे, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, रामकृष्ण श्रीवास्तव, जीवनलाल ‘विद्रोही’, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे- सभी मुक्तिबोध के प्राचीन मित्र। परसाई और भाऊ समर्थ भी गो वे कवि नहीं थे। मुक्तिबोध ने बहुत सोच-विचार कर कवियों की सूची की अंतिम रूप दिया और उनकी कविताएँ भी एकत्र की थीं। यदि ‘नर्मदा की सुबह’ छप गई होती तो हिन्दी की स्वतंत्रता परवर्ती कविता का इतिहास कुछ दूसरा ही होता। अज्ञेय जी ने सप्तक श्रृंखला के माध्यम से मुक्तिबोध द्वारा प्रस्तावित ‘नर्मदा की सुबह’ वाली वामपंथी रुझान की कविता को हाईजैक कर लिया। सप्तकों की खानापूरी करने के लिए बाद में वे बहुत ही साधारण कवियों को ही हाईलाइट करते रहे। ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख में मैंने विवेचित कवियों का समीक्षात्मक आकलन तो किया ही था, उनका संस्मरणात्मक आख्यान भी प्रस्तुत किया था, दोनों को ताने-बाने की तरह बुनते हुए। मेरे बाद के संस्मरणों में इसी शैली का उपयोग किया गया है। मुझे संतोष है कि यह शैली सामान्य पाठकों के साथ ही सुधी आलोचकों को भी पसंद आई। यह शैली विद्वत्ता का आतंक पैदा करने के स्थान पर हार्दिकता जगाती है।

कायदे से सागर विवि के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष होने के नाते ही नहीं, बल्कि आप में जो आलोचनात्मक प्रतिभा है, उसे देखते हुए आपको आलोचक होना चाहिए था, क्योंकि आपके संस्मरणों में आपके आलोचक की चमक की चिंगारी जहाँ-तहाँ प्रचुरता से दिखती है, मेरे मन में जब-तब यह सवाल उठता है। कृपया अपनी स्थिति से हमें परिचित कराएँ।

एक समय था जब हिन्दी का विश्‍वविद्यालयीन अध्यापक कवि होता ही था। फिर कवि के रूप में प्रतिष्ठा न मिलने पर वह कविता का पाला छोड़कर आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय होता था। आचार्य नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह जैसे अनेकानेक कवि-आलोचकों से हम परिचित हैं। हमारे यहाँ आलोचना के साथ विद्वता का फलतः गंभीरता का अनिवार्य रिश्ता माना जाता है। विद्वता आतंकित तो करती है, आकर्षित नहीं करती। हमारे विश्‍वविद्यालय विद्वत्ता का विकास तो करते हैं, संवेदना का नहीं। ज्यादा विद्वत्ता से मुझे भय लगता है। ऐसा नहीं है कि आलोचना के क्षेत्र में मैंने कुलांचे न भरी हों, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। वहाँ कोई किसी को तब तक घास नहीं डालता जब तक उसके साथ अपना गुट या शिष्यमंडली न हो। आलोचना के क्षेत्र में मेरी स्थिति शरणार्थी की थी। हिन्दी समाज कुम्हार के उस चाक के समान है जो माँगे दिया न देय। ऐसे में मैंने संस्मरणों की राह पकड़ी, शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने के लिए। वह भी लगभग दिवसावसान के समय। समीक्षा को मैंने संस्मरणों की मुस्कान से मिला दिया, 33, 67 के अनुपात में। यह मेरी अपनी ‘रेसेपी’ थी। मेरी यह ‘रेसेपी’ आलोचकों को पसंद आई। मेरे अच्छे संस्मरण वे माने गए, जिनमें मैंने रचनाकार या चिंतक या अध्यापक के छोटे-छोटे आत्मीय प्रसंगों के आधार पर उसके व्यापक एवं बृहत्तर रचना कर्म और जीवन मूल्यों का विश्‍लेषण किया। जैसे बच्चन के, डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के, रजनीश के या ‘सुमन’ के। आप चाहें तो इन्हें संस्मरणात्मक समीक्षा कह लें या समीक्षात्मक संस्मरण। ‘तुम्हारा परसाई’ शीर्षक पुस्तक मैंने इसी शैली में लिखी है।

पाठकों को गंभीरता और आलोचना की यह फिजां पसंद आई। याद कीजिए, शायर का वह मंसूबा जिसमें वह कहता है:

क्यों न फिरदौस में दोजख को मिला दें या रब

सैर के वास्ते थोड़ी सी फिजां और सही।

मेरे संस्मरण साहित्य की सैर के शौकीनों को यही थोड़ी सी फिजां मुहैया करते हैं।

सागर विवि से अवकाश प्राप्त करने के बाद संस्मरण लिखने की बात सहसा आपके मन में कैसे उठी? यूँ जहाँ-तहाँ आपने इसका संकेत दिया है लेकिन मुझे लगता है आपके पाठक के नाते मेरे मन में इस प्रश्‍न को लेकर जो जिज्ञासा है, उसका निदान आप ही कर सकते हैं।

संस्मरण लिखने की न तो मेरी कोई तैयारी थी, न ही आकांक्षा, कोई योजना भी न थी। डॉ. कमला प्रसाद के कहने से मैं श्रीमती सुधा अमृतराय पर एक संस्मरण लिख चुका था। उसे मित्रों ने पसंद किया, भाषा विज्ञान जैसा नीरस विषय पढ़ाने वाले से ऐसी तरल भाषा और रोचक शैली की अपेक्षा किसी को नहीं थी। ऐसे में एक दिन स्थानीय महाविद्यालय के अध्यापक मित्र घर आए। वे लेखक भी हैं, समीक्षा जैसी गुरु गंभीर विधा में लिखते हैं। कमला से उन्हें एलर्जी है, पुराने सहयोगी रह चुकने कारण। उनके गुरुओं ने उन्हें बताया था कि संस्मरण हल्की-फुल्की विधा है। उनके गुरु के गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी प्रेमचंद द्वारा संपादित ‘हंस’ के आत्मकथांक/संस्मरणांक का काफी मखौल उड़ा चुके थे। उन्हें लगा कि भाषा विज्ञान और समीक्षा के पुण्य तीर्थ से संस्मरण के गटर में पतन मेरे सारे पुण्यों को नष्ट कर देगा। मेरे उद्धार की चिंता के कारण उन्होंने फरमाया-संस्मरण तो वो लिखता है जो चुक जाता है। संस्मरण तो मरे हुओं पर लिखे जाते हैं। कुछ भी लिख दो, मरा हुआ व्यक्ति न प्रतिवाद कर सकता है, न ही आपकी खबर ले सकता है। फिर संस्मरण तो आत्मश्‍लाघा की विधा है। जिसे कोई भाव नहीं देता, वह अपनी पीठ ठोकने लगता है। संस्मरण उनके लिए शेड्यूल्ड कास्ट विधा थी और संस्मरण लेखक को वे कुल की हीनी, जात कमीनी, ओछी जात बनाफर राय का सगोत्री मानते थे। उनकी चेतना पर संस्मरण का मरण काबिज था, संस्‍मृत के पक्ष में भी, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिपरक सोनोग्राफी की। सुमन जी, त्रिलोचनजी या प्रेमशंकर जी ने तो कम आपत्ति की, उनके अनुगतों ने ज्यादा हो-हल्ला मचाया।

जो जितना पुराना और बड़ा कांवड़िया था, उसने उतना ही ज्यादा हल्ला मचाया। यह सब तो सच है पर लिखना नहीं चाहिए। कुछ ने मेरी औकात बताई। क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा। कुछ ने मुझ पर ‘क्रुयेलिटी’ का आरोप लगाया। मुझे संतोष है कि सुमन जी ने अपने होशो हवास में ‘हंस’ में प्रकाशित मेरा संस्मरण पढ़ लिया था, प्रेमशंकर जी ने भी। मैं संस्मरण श्रद्धालुओं के लिए नहीं लिखता। आस्था सुदृढ़ करने के लिए जो संस्मरण पढ़ते हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे ‘कल्याण’ या ‘कल्पवृक्ष’ पढ़ें। इसी बीच दो दुर्घटनाएँ और हो गईं। मेरी कूल्हे की हड्डी टूट गई, काफी अर्से तक चलना-फिरना दूभर हो गया। न पुस्तकालय जा सकते, न ही अपने अध्ययन कक्ष की अलमारियों की ऊपरी शेल्फों से किताब निकाल सकते। ईश्‍वर प्रदत्त इस चुनौती का सामना मैंने संस्मरण लिखकर किया। ईश्‍वर से तो मैं निबट लिया पर कमलेश्वर का क्या करूँ? कमलेश्‍वर को अध्यापकों की सारी प्रजाति ‘पतित’ और ‘नालायक’ लगती है। उनके लेखे ‘रचनशीलता’ही सर्वोपरि है। सो भैये, लो ‘एक पतित और नालायक प्राध्यपक’ के संस्मरण पढ़ो। जान कर संतोष हुआ कि उनको मेरे संस्मरण पठनीय ओर प्रिज्म की तरह लगे। वाहे गुरु की फतह।

सवाल यह भी है कि पहला संस्मरण लिखने-छपने के बाद पत्रिका के संपादक और पाठकों की प्रतिक्रिया का आप पर कैसा असर हुआ?

पहला संस्मरण छपा अप्रैल-अक्टूबर ‘96 की ‘वसुधा’ में। वह किंचित् लंबा था, डॉ. कमला प्रसाद ने कहा कि आपके संस्मरण ‘वसुधा’ के बहुत पन्‍ने घेरते हैं पर रोचकता के कारण पाठक उन्हें पूरा पढ़ते हैं। मैं छोटे संस्मरण लिख ही नहीं पाता। छोटे संस्मरण मुझे या तो शोक प्रस्ताव जैसे लगते हैं या चरित्र प्रमाणपत्र जैसे। ‘हंस’ में मेरे लंबे-लंबे संस्मरण छपे और पाठकों को पसंद आए। भारत भारद्वाज ने लिखा कि संस्मरणों का जो दिग्विजयी अश्‍व काफी अर्से से प्रयाग और काशी के बीच घूम रहा था, वह अब सागर में स्थायी रूप से बाँध लिया गया है। मेरे संस्मरणों पर कमला प्रसाद को और राजेन्द्र यादव को बहुत सुनना पड़ा, अश्‍लीलता को लेकर। अश्‍लीलता मेरे संस्मरणों में मेरे कारण नहीं थी, संस्मृत के अपने व्यक्तित्व के कारण थी। पर कई सुधियों को दुःशासन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण में अश्‍लीलता या अनैतिकता नहीं दिखाई पड़ी, दिखाई पड़ी वेदव्यास द्वारा महाभारत में चीरहरण का उल्लेख किए जाने पर। इन दिनों एक विज्ञापन आ रहा है दूरदर्शन पर। लड़की पूछती है- क्या खा रहे हो? लड़का कहता है- लो तुम भी खाओ। लड़की फिर कहती है- पर यह तो तंबाखू है। लड़का कहता है- जीरो परसेंट टोबेको, हंड्रेड परसेंट टेस्ट। मेरे संस्मरणों में भी अश्‍लीलता जीरो प्रतिशत ही है, स्वाद कुछ लोगों को शत-प्रतिशत मिलता है। यह उनकी अपनी स्वादेन्द्रिय का कमाल है।

संस्मरण हिन्दी में एक अरसे से लिखे जाते रहे हैं बल्कि पिछले वर्षों में काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह एवं रवीन्द्र कालिया की संस्मरण पुस्तकें भी छपीं जो वस्तुतः उनके समकालीन रचनाकारों पर केन्द्रित हैं। आपने किस तरह संस्मरण की पूरी परंपरा से अलग हटकर कबीर के कपूत बनने का साहस संजोया?

अभी कुछ दिन हुए, संस्मरणों के एक प्रेमी पाठक मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने बातचीत के दौरान बचपन में पूछी जाने वाली एक बुझौवल सुनाई:

तीतर के इक आगे तीतर

तीतर के इक पीछे तीतर

आगे तीतर पीछे तीतर

बताओ कुल कितने तीतर

फिर इस बुझौवल का संस्मरण-पाठ भी पेश किया:

का के है आगे इक का

का के पीछे है इक का

आगे इक का, पीछे इक का

बताओ कुल कितने हैं का

यहाँ एक का काशीनाथ का है, दूसरा कालिया का, तीसरा इस नाचीज कान्तिकुमार का है। यह सब कबीर के कपूत हैं, कपूतों की वह परंपरा ‘उग्र’ और ‘अश्क’ से होती हुई कृष्णा सोबती, हरिपाल त्यागी तक पहुँचती है। मैं भी इसी परंपरा का एक पड़ाव हूँ। मैं कुछ ज्यादा ही कपूत साबित हुआ।

कुछ विद्वानों का मत है कि आपने संस्मरण विधा को हाल के दिनों में प्रकाशित अपने संस्मरणों से केन्द्रीय विधा बना दिया है। इस बारे में आपको क्या कहना है?

इस संबंध में मैं क्या कहूँ? संस्मरण विधा आज समकालीन लेखन की केन्द्रीय विधा बन गई हैं, इसमें संदेह नहीं। पर इसका सारा श्रेय मेरा ही नहीं है। काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह के संस्मरणों से इस विधा में जो खुलापन आया था, उससे पाठकों की एक मानसिकता बन गई थी। मुझे उस मानसिकता का लाभ मिला। किसी भी संस्मरणीय के केवल कृष्णपक्ष का उद्घाटन करना लक्ष्‍य नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व की संरचना के तानों-बानों और उसके परिवेश की सन्निधि में उसकी रचनात्मकता के छोटे-बड़े प्रसंगों के माध्यम से ‘स्कैनिंग’ मेरा अभीप्सित है। अपने संस्मरणों को रोचक और पठनीय बनाने के लिए रचनात्मक कल्पना का उपयोग तो मैंने किया है पर ‘फेकता’(fake) का नहीं। मेरे संस्मरणों में अनेक प्रसंग सेंधे भरने के लिए गाल्पनिक तो हो सकते हैं पर वे पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। अपने संस्मरणों में मैं स्वयं को बचाकर नहीं चलता।

मैंने कभी डायरी नहीं लिखी। स्मृति के और पुराने पत्रों के सहारे ही लिखता हूँ। एकाध संस्मरण में जहाँ भ्रमवश दूसरों से सुने तथ्यों के सहारे मुझसे घटनाओं की पूर्वापरता में गड़बड़ी हुई है, पाठकों ने मुझे पकड़ लिया है, इसका अर्थ मैंने यही लगाया कि हिन्दी में सुधी और सावधान पाठकों की कमी नहीं है। असावधानीवश हुई इन चूकों को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं हुआ। जैसे ‘विद्रोही’ के संदर्भ में कमलेश्‍वर ने या मुक्तिबोध के संदर्भ में ललित सुरजन ने या ‘वसुधा’ के अंतिम अंक के संबंध में भारत भारद्वाज ने मेरी त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। ये त्रुटियाँ किसी बदनीयती के कारण नहीं हुईं। संस्मृतों के संपूर्ण व्यक्तित्व या रचनाशीलता के नियामक तत्त्वों के मेरे निष्कर्षों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर भूल तो भूल है।

अपने संस्मरणों पर मेरे पास हजारेक पत्र तो आए ही होंगे। टेलीफोन भी कम नहीं आए। लोग पाठकों के न होने का रोना बेवजह ही रोते हैं। अकेले रजनीश वाले संस्मरण पर ही मुझे सैकड़ों पत्र मिले और अभी तक मिल रहे हैं। देश से भी, विदेशों से भी। इन पत्रों के आधार पर मैंने एक श्रृंखला लिखने का मन बनाया है- संस्मरणों के पीछे क्या है? रजनीश के संस्मरण पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं वाला संस्मरण तो लिखा भी जा चुका है- ‘रजनीश का दर्शन: आध्यात्मिक दाद खुजाने का मजा।’असल में संस्मरणों को संस्मृत का ही आईना नहीं होना चाहिए, उसे उसके परिवेश का भी अता-पता देना चाहिए। उसे प्रचलित जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता की भी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। मेरे लिए संस्मरण विशिष्ट कालखंड का सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास है।

पिछले दिनों हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में रसाल जी, अंचल जी और सुमन जी पर जिस तरह आपके संस्मरण छपे उससे आपके दुश्मनों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ, लेकिन सच बात यह भी है कि आज हिन्दी की कोई भी पत्रिका आपके संस्मरण के बिना अधूरी लगती है। क्या अब आप पूर्णतः संस्मरण समर्पित हैं या और भी आपकी कोई योजना है?

आपके इस प्रश्‍न के उत्तर में मैं नसीम रामपुरी का एक शेर उद्धृत करना चाहता हूँ:

हार फूलों का मेरी कब्र पर खुद टूट पड़ा

देखते रह गए मुँह फेर के जाने वाले

ऐसा तो नहीं है कि मैं अब संस्मरण छोड़कर कुछ और नहीं लिखता, पर अब जो कुछ लिखता हूँ, वह संस्मरणमय हो उठता है। ‘तुम्हारा परसाई’ मेरी नव्यतम पुस्तक है जिसे मैंने परसाई जी के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। ‘तुम्हारा परसाई’ पढ़कर एक नामी-गिरामी प्रकाशक ने मुझे लिखा कि मुक्तिबोध पर भी ऐसी पुस्तक मैं क्यों नहीं लिखता? मेरा उत्तर था, ऐसी पुस्तक लिखने के जितने धैर्य और समय की आवश्यकता है, वह अब मेरे पास नहीं है। हाँ, मुक्तिबोध जी के नागपुर के दिनों पर लिखने का मन जरूर बना रहा हूँ, ‘महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से। यह जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, रामकृष्ण श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे, भाऊ समर्थ, हरिशंकर परसाई जैसे रचनाकारों के साहित्य, संस्मरणों और पत्रों के माध्यम से नागपुर के दिनों के मुक्तिबोध के जीवन, मानसिकता और रचनाशीलता को ‘डिस्कवर’ करने की संस्मरणमय कोशिश होगी। इस कोशिश के कुछ अंश आपने ‘हंस’, ‘वसुधा’, ‘साक्षात्कार’, ‘आशय’, ‘अन्यथा’, ‘परस्पर’ जैसी पत्रिकाओं में देखे भी होंगे। मालगुड़ी डेज़ की तरह अपने बचपन के दिनों का वृत्तांत भी मैं लिख रहा हूँ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के नाम से। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल के अभावों, संघर्षों, शोषण, प्रकृति से तादात्म्य और लोक की अदम्य जिजीविषा का आख्यान। यह भी संस्मरणात्मक ही होगा। फिर संस्मरणों की मेरी नई पुस्तक भी है-‘जो कहूँगा, सच कहूँगा’ नाम से। एक तरह से ‘लौटकर आना नहीं होगा’ का दूसरा खंड। इन संस्मरणों में मेरी शिकायत मानवीय दुर्बलता से उतनी नहीं, जितनी टुच्चे स्वार्थों और संकीर्ण सोच के कारण किए जाने वाले छल, छद्म और फरेब से है। कथनी और करनी में जितनी दूरी आज दिखाई पड़ रही है, उतनी शायद कभी नहीं रही। मानवीय गरिमा का क्षरण करने वाली किसी भी चतुराई या संकीर्णता से मुझे एलर्जी है। इस एलर्जी को प्रकट करना दुश्मनों की संख्या में इजाफा करना है। मेरे दुश्मन बढ़ रहे हैं अर्थात् मेरे संस्मरण ठीक जगह पर चोट कर रहे हैं। ‘मे देअर ट्राइव इनक्रीज़’।

अभी शब्द शिखरपत्रिका में आपके नाम लिखे कुछ महत्वपूर्ण लेखकों के पत्र छपे हैं। राजेन्द्र यादव के लिखे पत्रों से ऐसा आभास होता है कि आप पर लगातार दबाव डालकर हंसके लिए उन्होंने आपसे संस्मरण लिखवाए ही नहीं बल्कि आपको जेल भिजवाने का भी पूरा प्रबंध कर दिया है। वस्तुस्थिति क्या है, यह आप ही बताएँगे।

नहीं, राजेन्द्र यादव का मुझ पर संस्मरण के लिए कोई दबाव नहीं था। संस्मरण के पात्र का चुनाव सदैव मेरा ही रहा है, उसका ढंग भी। अब 70 साल की उम्र में कोई मुझ पर दबाव डालकर कुछ लिखा लेगा, यह प्रतीति ही मुझे हास्यास्पद लगती है। राजेन्द्र यादव अच्छे संपादक हैं, वे रचनाकार की सीमाओं को और क्षमताओं को पहचानते हैं। वे साहसी भी हैं, मुझे लगता है वे जितने बद नहीं, बदनाम उससे बहुत ज्यादा हैं। शायद बदनामी मनोवैज्ञानिक रूप से उनके लिए क्षतिपूर्ति उपकरण है। बदनामी और विवाद उन्हें अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए अनिवार्य लगते हैं। कुछ लोग होते हैं जिन्हें चर्चा में बने रहना अच्छा लगता है। चर्चा और बदनामी उनके लिए लगभग पर्याय होते हैं। मैं आपको बताऊँ, ‘अंचल’ वाला संस्मरण तो कोई छापने को तैयार ही नहीं था। अंचल प्रगतिशील रह चुके थे, ‘लाल चूनर’वाले। अतः प्रगतिशील खेमे की पत्रिकाएँ अपने नायक का सिंदूर खुरचित रूप दिखाने को तैयार नहीं थीं। अंचल जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। अतः सम्मेलन से संबद्ध पत्रिकाओं के अपने संकोच थे। अक्षय कुमार जैन ने तो मुझे साफ लिखा कि हिन्दी के पाठक अभी ऐसी मानसिकता के नहीं हो पाए हैं कि वे आपके ऐसे संस्मरण पचा सकें। ‘वागर्थ’ (उस जमाने की), ‘वाणी’, ‘अक्षरा’ जैसी निरामिष पत्रिकाओं से मैं क्या उम्मीद करता? अन्ततः मैंने वह राजेन्द्र यादव को भेज दिया। राजेन्द्र यादव से मेरी कोई आत्मीयता नहीं थी। जीवाजी विश्‍वविद्यालय में मैंने उनका उपन्यास नहीं लगाया था। वे मुझसे रुष्ट थे। सोचा, उनको भी खंगाल लिया जाए। हफ्ते भर में उनका पत्र आया, शीघ्र छपेगा। ‘अंचल’ छपने पर बड़ा बावेला मचा। अश्‍लील, क्रुयेल, अनैतिक, चरित्रहनन, खुद बड़े पाक बने फिरते हैं टाइप। जेल पहुँचाने का इंतजाम राजेन्द्र यादव ने नहीं, मेरे मित्रों ने किया। भोपाल के मेरे एक बहुत पुराने मित्र ने जो स्वयं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बड़ा तो नहीं, पर उनके समकक्ष मानते हैं, अंचल जी की बेटी को कानूनी कार्यवाही के लिए उकसाया। वह स्वयं अनुभवी है, उसके पति न्यायाधीश हैं। वे कानून के जानकार हैं, समझदार। अतः उन मित्र महोदय के बहकावे में नहीं आए। हाँ, एक अखिल मुहल्ला कीर्ति के धनी कवि ने जरूर मुझ पर मानहानि जैसा कुछ करने की धमकी दी। पर वे भी टांय-टांय फिस्स से ज्यादा नहीं बढ़ पाए। सुधीर पचौरी और विष्णु खरे जैसी सुधी और नीरक्षीर विवेकी विचारकों ने अश्‍लीलता की चलनी में मेरी छानबीन की, यह भूलकर कि सूप कहे तो कहे, चलनी क्या कहे जिसमें बहत्तर छेद। हिन्दी समाज में अश्‍लीलता की कबड्डी खेलना समीक्षकों का सबसे पसंदीदा खेल है। यार लोग चाहते हैं कि मैं मित्रों के कांधे पर चढ़कर नहीं, भूतपूर्व मित्रों के कांधों पर चढ़कर अंतिम यात्रा पर निकलूँ। यहाँ हर पड़ोसी, दूसरे की खिड़की में ताक-झाँक की फिराक़ में रहता है, अपनी खिड़की में मोटे-मोटे ‘ब्लाइंड’ डालकर। अपने संस्मरणों के हर शब्द के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। किसी राजेन्द्र यादव के पाले में गेंद फेंकना बेईमानी भी है, अनैतिकता भी। वह कायरता तो है ही।

कहने की जरूरत नहीं कि आज हिन्दी में आपने संस्मरण विधा में नई जान फूंकी है और हर नया लेखक कान्तिकुमार जैन बनने की कोशिश में लगा है। आप इस स्थिति को किस रूप में देखते हैं।

आपके इस तरह के प्रश्‍न के उत्तर में मैं आपको एक लतीफा सुनाना चाहता हूँ- स्कूल में पढ़ने वाले और नए-नए तरुण हुए एक छात्र को उसके एक सहपाठी ने एक प्रेम प्रसंग के निपटारे के लिए द्वंद युद्ध में ललकारा। यह युद्ध तलवारों से लड़ा जाना था। ललकारित छात्र ने अपने पिताजी से कहा कि पिताजी, आप मेरे लिए एक लंबी तलवार बनवा दें जो सहपाठी की तलवार से छह इंच लंबी हो। पिताजी समझ गए। बोले- बेटे! यदि तुम्हें सामनेवाले को परास्त करना है तो छह इंच आगे बढ़कर मारो। इस तरह के युद्ध तलवार की लंबाई से नहीं, भीतर के हाँसले से लड़े जाते हैं। यदि किसी का मेरुदंड कमजोर हो तो न तलवार की लंबाई काम आती है, न पिताजी का संरक्षण। ऐसे लोगों को संस्मरण नहीं लिखने चाहिए।

मुझे लगता है कि आपके संस्मरणों के पीछे परसाई खड़े हैं आशीर्वाद की मुद्रा में, क्योंकि यह बात तो बिल्कुल साफ है कि आपके भीतर के आलोचक और परसाई के व्यंग्य की धार से आपके संस्मरण परवान चढ़े हैं। वैसे तो अपनी नई पुस्तक तुम्हारा परसाईमें विनम्रतापूर्वक यह कहकर कि तुम्हारा परसाई में मेरा क्या है, आपने अपना संकोच स्पष्ट कर दिया है फिर भी कुछ बचा रहता है परसाई से उऋण होने के लिए। इस प्रसंग में आप कुछ और जोड़ना चाहेंगे।

परसाई जी मेरे मित्र थे- आत्मीय और अंतरंग। उनका और मेरा लगभग चालीस वर्षों का साथ था। उनसे प्रेरित और प्रभावित न होना कठिन था। वे मुझसे बड़े थे, प्रतिष्ठित। फिर विचारधारा के स्तर पर भी मैं उनके बहुत निकट रहा हूँ। मुझे उनकी जो बात सबसे पसंद थी वह यह कि अपनी विचारधारा की वे अपने व्यंग्यों में घोषणा नहीं करते थे, उसे संवेदित होने देते थे। जैसे बिजली इंसुलेटेड वायर के भीतर ही भीतर दौड़ती रहती है, यहाँ से वहाँ तक। पर अंत में वह तार झटका भी देता है और प्रकाश भी। इस अर्थ में वे हिन्दी के अनेक वामपंथी लेखकों से विशिष्ट हैं। दुर्भाग्य है कि हिन्दी में संघवाद, विचारधारा और उसके संगठनों का प्राधान्य है। हर संगठन अपने आदमी की तमाम-तमाम चूकों, खामियों, विचलनों को ढाँकने-मूँदने में लगा है। ठीक राजनीतिक दलों की तरह। संप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, छल, घोटालों, बेईमानियों का हम गुट निरपेक्ष या संगठन तटस्थ होकर विरोध नहीं करते। परसाई ऐसा करते थे। इसीलिए परसाई की मार चतुर्मुखी होती थी ओर उनका प्रभाव भी इसीलिए सब तरह के पाठकों पर था। ऐसे समय परसाई जी जैसे लेखकों को होना चाहिए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता है, जिसमें अपने अवसान के समय सूर्य पूछता है कि मेरे बाद पृथ्वी का अंधकार कौन दूर करेगा। मिट्टी का एक दिया सामने आया। बोला- अपनी शक्ति भर मैं करूँगा। मैं मिट्टी का वही दिया हूँ।

तुम्हारा परसाईएक विलक्षण पुस्तक है जो काशीनाथ सिंह जी की पुस्तक काशी का अस्सीकी तरह धमाके से विधाओं की वर्जनाओं को तोड़ती है। संस्मरणात्मक भी यह है लेकिन उससे ज्यादा परसाई के जीवन और लेखन का मोनोग्राफ। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

विधाओं का वर्गीकरण तो साहित्य शास्त्रियों ने सुविधा के लिए कर रखा है। विधाओं की चौहद्दी में बँधने से रचनाकारों की क्रियेटिविटी बाधित होती है। जैसे बहुत घिसने से बासन का मुलम्मा छूट जाता है, वैसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी काम में आते रहने से विधाओं की दीप्ति भी फीकी पड़ जाती है। समर्थ रचनाकार प्रत्येक युग में साहित्य के परिधान में कुछ न कुछ परिवर्तन करता है। वास्तव में विधाओं की कोई एलओसी नहीं होती। विधाओं का अतिक्रमण करने से साहित्य की थकान मिटती है, साहित्यकार की भी। ‘तुम्हारा परसाई’ को मैंने जानबूझकर परसाई के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। इससे परसाई जी के जीवन के और लेखन के तानों-बानों को समझने में सुविधा होती है। मुझे संतोष है कि इधर हिन्दी के बहुत से लेखक संस्मरण लिखने में रुचि ले रहे हैं। हर पत्रिका के लिए संस्मरण लगभग अनिवार्य हो गए हैं। इन संस्मरणों से हिन्दी साहित्य के वास्तविक इतिहास का कच्चा माल सामने आ रहा है। हिन्दी साहित्य के समकालीन इतिहास की दूसरी परंपरा का सामने आना कई दृष्टियों से वांछनीय है।

अंतिम सवाल, मुझे ठीक से नहीं मालूम लेकिन मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपकी धर्मपत्नी साधना जैन का आपके लेखन में कितना सहयोग है- आपकी स्मृति को रिफ्रेश करने में या संदर्भों को दुरुस्त करने में?

साधना मेरी पत्नी हैं पढ़ी-लिखीं, साहित्यिक समझ से भरपूर। घटनाओं के पूर्वापर क्रम की और व्यक्ति द्वारा उच्चरित कथन को ज्यों का त्यों दुहरा सकने की उनमें विलक्षण प्रतिभा है। उर्दू के शेर तो उन्हें ढेरों याद हैं। अपने संस्मरण लेखन में जहाँ कहीं मैं अटकता हूँ, स्मृति का मैगनेट साफ करने में वे मेरी सहायता करती हैं। वे मेरी जीवन-संगिनी हैं फलतः संस्मरण-संगिनी भी। 1962 में मुझसे विवाह के उपरांत वे मेरे सारे मित्रों को जानती हैं और उन्हें समझती भी हैं। मैं डायरी नहीं लिखता पर यदि लिखता तो पत्नी से छिपाकर नहीं रखता। मैं हिन्दी के उन लेखकों में नहीं हूँ जो अपनी पत्नी को दर्जा तीन पर स्थान देते हैं- पहले मेरा लेखन, फिर मेरे दोस्त, फिर तू। मैं उन लेखकों में भी नहीं हूँ जो यह कहकर गौरवान्वित होते हैं, लेखन तो मेरा अपना है, मेरी पत्नी का इसमें कोई योग नहीं है। ऐसे लोग या तो मुझे सामंती पुरुषाना अहंकार से ग्रस्त लगते हैं या अपनी पत्नी को निर्बुद्धि समझते हैं। संयोग से न तो मुझमें वैसा अहंकार है, न ही साधना वैसी निर्बुद्धि हैं।

अपने संस्मरणों में अपनी पत्नी का उल्लेख करने का परिणाम यह हुआ है कि बहुत से संस्मरण लेखक अपनी पत्नी को भी क़ाबिले उल्लेख समझने लगे हैं। एक ने तो अपनी पत्नी को करवाचौथी परिधि से निकालकर साहित्य का कोई पुरस्कार भी दिलवा दिया है। गुजरात की एक धर्मपत्नी ने जिनके पति अच्छे खासे साहित्यकार हैं और जिन्होंने प्रेम विवाह किया था, बड़े दुःख से मुझे लिखा- काश! मेरे पति भी अपने संस्मरणों में उसी सम्मान और स्नेह से मेरा उल्लेख करते जैसे आप अपनी पत्नी का करते हैं। उस उमर में जब साहित्यकार पति और कुछ नहीं कर सकता, उसे इतना तो करना ही चाहिए।

(भारतीय लेखक, अक्टूबर-दिसंबर, 05  से साभार)

एक विनम्र राजसी व्यक्‍त‍ित्‍व : शेखर जोशी

आज के राजनेताओं के जीने के शाही अंदाज और बड़बोलेपन को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कभी बेहद विन्रम और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले राजनेता भी होते थे। ऐसे ही एक राजनेता थे, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द। वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी का संस्मरण-

राजनीति के शीर्षस्थ महापुरुषों से आत्मीय परिचय कभी नहीं रहा था। पारिवारिक स्तर पर ‘प्रीमियर सैप- पं. गोविन्द वल्लभ पन्तजी का यदा-कदा जिक्र होता, लेकिन लखनऊ या नैनीताल जाकर उनके दर्शन का सौभाग्य कभी नहीं मिला। हमारे निकटस्थ समाजसेवी और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी पंडित हरीकृष्ण पाण्डेजी थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब कुछ व्यवस्थित हो पाए तो उन्होंने अल्मोड़ा- कौसानी मोटरमार्ग पर रणमण (रनबन) में अपने औषधालय की स्थापना की। वन्देमातरम् का संक्षिप्त रूप ‘बंदे’उनका प्रिय अभिवादन शब्द था। श्‍वेत खादी परिधान में ऊनी पंखी लपेटे औषधालय में सुगन्धित औषधियों के बीच हमेशा चार-छह आदमियों से घिरे हुए उन्हें देखना बहुत प्रीतिकर लगता था। पिताजी का उनसे गहरा भाईचारा था। पिताजी से ही जाना था कि कुली बेगार आंदोलन से लेकर सन् 42 के आन्दोलन तक पाण्डेजी ने कुमाऊँ की जनता को जागृत करने के लिए कितना संघर्ष किया, कुर्बानी दी और उनके परिवारजनों ने कैसी यातनाएँ सही थीं। लेकिन पाण्डेजी के प्रफुल्लित चेहरे और सौम्य व्यवहार से उनके भूमिगत जीवन के कष्टों, कारावास की यातनाओं को कोई आभास नहीं मिलता था। वास्तविक सेनानी की तरह उन्होंने इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को सहज स्वीकार किया था। अल्मोड़ा और बरेली जेलों में रहते हुए पाण्डेजी न केवल प्रदेश के प्रायः सभी शीर्षस्थ नेताओं के सम्पर्क में आए वरन उनके प्रीतिभाजन भी बन गए थे।

संभवतः ऐसी ही आत्मियता के कारण उस बार बाबू सम्पूर्णानन्दजी ने अपनी कौसानी यात्रा से लौटते हुए रणमण के औषधालय में पाण्डेजी का आतिथ्य स्वीकार किया था।

यह सन् 1947 की गर्मियों की बात है। मेरा अनुमान है तब सम्पूर्णानन्दजी उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षामंत्री थे। उस घटना के एक दिन पूर्व में पाण्डेजी के औषधालय में पहुँचा था। मेरा रणमण जाना अकारण नहीं था। यह प्रसंग मेरा अपनी प्रारंभिक पाठशाला के लगाव से जुड़ा हुआ है। शायद यह केवल मेरा ही अनुभव नहीं है कि हम ग्रामिण अंचल के लोग जीवनभर अपनी प्रारंभिक शाला से जितनी आत्मीयता से जुड़े रहते हैं उतना अन्य किसी संस्था से नहीं जुड़ पाते। हमारी स्मृतियों में कलम-दवात-पाटी का वह प्रथम साक्षात्कार अपने श्रद्धास्पद गुरु, प्रिय सहपाठियों और विद्यालय की सामान्य इमारत और पेड़-पौधों के साथ हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित रह जाता है। मेरा सौभाग्य था कि मेरे गुरुजनों ने भी मुझे उस पाठशाला से और गहरे जुड़ने के अवसर दिए। संभवतः मेरी कलात्मक रुचि ने उन्हें प्रभावित किया था। इस कारण उनका आग्रह रहता कि मैं प्रतिवर्ष गर्मियों की छुट्टियों में अन्य प्रदेश से घर आने पर अपनी शाला के लिए कोई चित्र या अलंकरण बनाया करूँ। यह मेरे लिए विशेष गर्व का विषय हुआ करता और प्रतिवर्ष मेरा यह प्रयास रहता कि किसी नए विषय पर अपनी कलम कूँची आजमाऊँ और अपनी भेंट शाला में प्रस्तुत करूँ।

उस बार किसी पत्रिका में एक रोचक कैलेंडर देखकर मैंने उसकी रंगबिरंगी अनुकृति तैयार की थी। अपनी भेंट को अधिक प्रभावकारी और टिकाऊ बनाने की इच्छा से मैं अपनी उस कलाकृति को फ्रेम में मढ़वाना चाहता था। गाँव में यह सुविधा सहज संभव नहीं थी। पिताजी ने मेरा मंतव्य जानकर मुझे सुझाव दिया कि औषधालय के गोदाम से प्लाइवुड का टुकड़ा लेकर मैं वहीं बढ़ई से उसे फ्रेम करवा लूँ।

पाण्डेजी मेरी गतिविधियों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने जिज्ञासा की तो मैंने अपनी चपलता में फ्रेम लग चुकने पर उन्हें अपनी कलाकृति दिखाने का वचन दिया। बढ़र्इ ने उस कलाकृति को चौखटे में बाँधकर अपनी कारीगरी से निश्‍चय ही उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि कर दी थी। मैंने सगर्व पाण्डेजी के सम्मुख अपना कृतित्व प्रदर्शित किया और उन्हें उसकी बारीकियाँ समझायीं तो पाण्डेजी ने स्नेह से मुझे चपतियाते हुए साधुवाद दिया। फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो, वह बोले, ‘कल मंत्रीजी आ रहे हैं। उनके जलपान की व्यवस्था करनी है। तुम लोग शहरी बालक ठहरे, सलीके से कर लोगे। बसन्त, तारी को लेकर सुबह आ जाना। इस तस्वीर को आज यहीं रहने दो कल ले जाना।

मैं पाण्डेजी का आशय नहीं समझ पाया था लेकिन तब भी अपनी कलाकृति को वहीं रखकर घर चला आया। दूसरे दिन हम लोग प्रातःकाल ही मंत्रीजी को देखने की उत्सुकता में औषधालय पहुँच गए। मंत्रीजी के स्वागत की सामान्य तैयारियाँ हो रहीं थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षों में मंत्रियों, सांसदों को लेकर आज की-सी आपाधापी, चापलूसी और मुंह दिखौवल नहीं होती थी। ग्रामांचल के थोड़े बहुत सामाजिक लोग ही वहाँ उपस्थित थे। सड़क के मोड़ के उस पार जब किसी मोटरगाड़ी का हार्न सुनाई देता तो सबकी उत्सुक निगाहें उस ओर उठ जातीं। सुबह के समय गरुड़-सोमेश्‍वर से अल्मोड़ा-रानीखेत-काठगोदाम को आने वाली गाड़ियों का क्रम चालू था और हरबार वह उत्सुकता जन्म लेती और फिर भीड़ में निराशा छा जाती।

किंचित् प्रतीक्षा के बाद अंततः मंत्रीजी की लम्बी कार आ पहुँची। पीछे-पीछे और भी दो-तीन छोटी गाड़ियों का काफिल था।

किसी राजसी व्यक्ति को देखने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं स्वीकार करता हूँ कि मंत्रीजी की जैसी भव्य कल्पना मैंने मन ही मन कर रखी थी प्रत्यक्षतः उन्हें वैसा न पाकर मैं निराश ही हुआ था। श्यामवर्ण, दीर्घकेशी सम्पूर्णानन्दजी सहजभाव से कार से उतरकर पाण्डेजी से स्नेहपूर्ण मिले। उनके साथ पारिवारिक महिलाएँ भी थीं लेकिन राजसी आभा से प्रभावित करने योग्य कोई व्यक्तित्व मुझे दिखाई नहीं दिया।

हम लोग चाय-नाश्ते की व्यवस्था में व्यस्त हो गए। बैठक में क्या कुछ वार्तालाप होता रहा इससे हम अनभिज्ञ ही रहे। संभवतः बीते दिनों के संस्मरण दुहराये गए हों, पुराने साथियों को याद किया गया हो या स्थानीय समस्याओं पर चर्चा हुई हो।

जलपान समाप्त हो चुकने पर अचानक मेरी पुकार हुई। मैं चौंक पड़ा। लेकिन पाण्डेजी के आदेश की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। ससंकोच मैं बैठक में उपस्थित हुआ तो पाण्डेजी को सम्पूर्णानन्दजी से मेरा परिचय कराते हुए सुना, ‘यह बालक हमारे मित्र जोशीजी के चिरंजीव हैं। बहुत मेधावी हैं। इसी वर्ष राजपूताना से मैट्रिक की परीक्षा दी है। अब आगे इन्जिनियरिंग में जाना चाहते हैं। इनके लिए किसी प्रकार की छात्रावृत्ति की व्यवस्था हो सकती तो इनकी इच्छा पूरी हो जाती।’

फिर जैसे पाण्डेजी को कुछ याद आया हो, उन्होंने मुझे आदेश दिया, ‘वह चित्र जो तुम कल दिखा रहे थे, उसे लेकर तो आओ।’

अपनी कलाकृति को दूसरे कमरे से ले आने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं था। मैं निरीह भाव से अपनी कृति को लेकर उपस्थित हो गया।

पाण्डेजी ने फिर अतिशयोक्ति की, ‘बहुत मेधावी बालक है, यह अद्भुत चीज बनाई है इन्होंने।’

फिर आदेश हुआ, ‘हाँ, हाँ भाई, बताओ। कल तुमने मुझे कुछ बताया था कि इस तालिका से गणना करके कैसे पिछले सौ वर्ष के दिन-वार निकाल लेते हो।’

वह कैलेंडर यदि मेरी मौलिक सूझबूझ का परिणाम होता तो शायद मुझे वैसी घबराहट नहीं हुई होती। उधार ली हुई प्रतिभा और ऊपर से पाण्डेजी द्वारा अपनी अयाचित प्रशंसा सुनकर मैं असहज हो गया था। लेकिन सम्पूर्णानन्दजी ने बालसुलभ उत्सुकता से गणना की विधि के बारे में अपनी ओर से जिज्ञासा कर मेरा उत्साह बढ़ा दिया, ‘अच्छा, यह बताइए 15 अगस्त, 1947 को क्या वार था।’

मैंने गणना कर वार बताया तो सम्पूर्णानन्दजी ने सहर्ष उसकी पुष्टि की। फिर ऐसी ही किसी महत्त्वपूर्ण तिथि के बारे में जिज्ञासा हुई और मैंने गणना कर सही उत्तर दे दिया।

सम्पूर्णानन्दजी ने अपने व्यवहार से ऐसा प्रदर्शित किया जैसे मैंने कोई अनोखी विधि का आविष्कार कर उन्हें आश्‍चर्य में डाल दिया हो।

मुझे प्रोत्साहित करने के लिए ही जैसे उन्होंने अपनी कन्याओं को संबोधित कर कहा, ‘आप लोग देख रही हैं, कैसा अद़्भुत कैलेंडर इन्होंने बनाया है।’

पाण्डेजी ने मुझे संकेत किया कि मैं वह कलाकृति मंत्रीजी को उपहार स्वरूप भेंट कर दूँ। आज सोचता हूँ वह कितनी साधारण-सी वस्तु थी जिसे पाण्डेजी के आदेश पर मैंने सम्पूर्णानन्दजी को भेंट किया था। लेकिन उसका बड़प्पन था कि उन्होंने उसे एक अमूल्य निधि की भाँति हार्दिक स्वीकार के साथ ग्रहण किया और अपने किसी सहयोगी को उसे कार में सहेज कर रखने का आदेश भी तत्काल दे दिया।

वर्षों बाद, ज्ञान होने पर, सम्पूर्णानन्दजी के कृतित्व और विराट व्यक्तित्व का परिचय मिला। और तब यह सोचकर मुझे आश्‍चर्य होता है कि इतिहास, दर्शन, ज्योतिष और खगोलशास्त्र के महान मनीषी ने उस दिन रणमण में सड़क किनारे पाण्डेजी के औषधालय के छोटे से कक्ष में अपनी विनम्रता का कैसा परिचय दिया था।

एकाकी देवदारु: शेखर जोशी

विकास के नाम पर पेड़ों को काटा जाना आम बात है। कभी हमने सोचा कि वह पेड़ किसी का संगी-साथी और आत्मीय भी हो सकता है। वर्षों बाद कथाकार शेखर जोशी अपने गांव गए तो बचपन के संगी देवदारु को न देखकर उनके मन में ऐसी टीस उठी, मानों कोई आत्मीय बिछड़ गया हो-

हिमालय के आंगन का वन-प्रांतर! और उस सघन हरियाली के बीच खड़ा वह अकेला देवदारु! खूब सुंदर, छरहरा और सुदीर्घ!  सहस्रों लंबी-लंबी बांहें पसारे हुए। तीखी अंगुलियां और कलाइयों में काठ के कत्थई फूल पहने हुए। ऐसा था हमारा दारुवृक्ष- एकाकी देवदारु! हमारी भाषा के आत्मीय संबोधन में ‘एकलु द्यार!’
वृक्ष और भी कई थे। कोई नाटे, झब्बरदार। कोई घने, सुगठित और विस्तृत। कोई दीन-हीन मरभुखे, सूखे-ठूंठ से। बांज, फयांट, चीड़, बुरांश और पांगर के असंख्य पेड़। समस्त वनप्रांतर इस वनस्पति परिवार से भरा-पुरा रहता था- वर्ष-वर्ष भर, बारहों मास, छहों ऋतुओं में।
देवदारु के वृक्ष भी कम नहीं थे। समीप ही पूरा अरण्य ‘दारु-वणि’ के नाम से प्रख्यात था। हजारों-हजार पेड़ पलटन के सिपाहियों की मुद्रा में खड़े हुए। कभी ‘सावधान’ की मुद्रा में देवमूर्ति से शांत और स्थिर तो कभी हवा-वातास चलने पर सूंसाट-भूंभाट करते साक्षात् शिव के रूप में तांडवरत। लेकिन हमारे ‘एकाकी देवदारु’ की बात ही और थी। वह हमारा साथी था, हमारा मार्गदर्शक था। ‘दारुवणि’ जहां समाप्त हो जाती, वहां से प्राय: फर्लांग भर दूर, सड़क के मोड़ पर झाड़ी-झुरमुटों के बीच वह अकेला अवधूत-सा खड़ा रहता था। जैसे, कोई साधु एक टांग पर तपस्या में मग्न हो।
सुबह-सुबह पूरब में सूर्य भटकोट की पहाड़ी के पार आकाश में एक-दो हाथ ऊपर पहुंचते तो उसका प्रकाश पर्वत शिखरों के ऊपर-ऊपर सब ओर पहुंच जाता था। एकाकी दारु के शीर्ष में प्रात: का घाम केसर के टीके से अभिषेक कर देता। रात से ही पाटी में कालिख लगा, उसे घोंट-घाट, कमेट की दावात, कलम और बस्ता तैयार कर हम लोग सुबह झटपट कलेवा कर अपने प्राइमरी स्कूल के पंडितजी के डर से निकलते। गांव भर के बच्चे जुटने में थोड़ा समय लग ही जाता था और कभी-कभार किसी अनखने-लाड़ले के रोने-धाने, मान-मनौवल में ही किंचित विलम्ब हो जाता तो मन में धुकुर-पुकुर लग जाती कि अब पंडितजी अपनी बेंत चमकाएंगे। आजकल की तरह तब घर-घर में न रेडियो था, न घड़ी। पहाड़ की चोटी के कोने-कोने में घाम उतर आया तो सुबह होने की प्रतीति हो जाती थी। ऐसे क्षणों में स्कूल के रास्ते में हमारी भेंट होती थी ‘एकाकी दारु’ से। वही हमको बता देता था कि अब ‘हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए’ प्रार्थना शुरू हो गई होगी। कि अब गोपाल सिंह की दुकान से हुक्के का आखिरी कश खींचकर मास्टर साहब कक्षा में आ गए होंगे।
‘एकाकी दारु’ के माथे पर केसर का नन्हा टीका देखकर हम निश्चिंत हो जाते थे कि अब ठीक समय पर प्रार्थना में पहुंच जाएंगे। यदि बालिश्त भर घाम की पीली पगड़ी बंध गई तो मन में धुकुर-पुकुर होने लगती थी और हम पैथल की घाटी के उतार में बेतहाश दौड़ लगा देते थे और यदि किसी दिन दुर्भाग्य से सफेद धूप का हाथ भर चौड़ा दुशाला एकाकी दारु के कंधे में लिपट जाता था तो हमारे पांव न स्कूल की ओर बढ़ पाते थे, न घर की ओर लौट पाते थे। किसी कारण घर से स्कूल की और प्रस्थान करते हुए हम मन ही मन ‘एकाकी दारु’ से मनौतियां मनाते कि वह केसर का टीका लगाए हमें मिले।
सांझ को स्कूल से लौटते समय चीड़ के ठीठों को ठोर मारते, हिसालू और किलमौड़े के जंगली फलों को बीनते-चखते, पेड़ों के खोखल में चिडिय़ों के घोंसलों को तलाशते, थके-मांदे ‘दारुवणि’ की चढ़ाई पार कर जब हम ‘एकाकी दारु’ की छाया में पहुंचते तो एक पड़ाव अनिवार्य हो जाता था। कोई-कोई साथी उसकी नीचे तक झुकी हुई बांहों में लेट कर झूलने लगता। कोई उसकी पत्तियों के ढेर पर फिसलने का आनंद लेता। सुबह शाम का ऐसा संगी था हमारा ‘एकाकी दारु’।
वर्षा बाद मैं उसी मार्ग से गांव लौट रहा था। जंगलात की बटिया अब मोटर सड़क बन गई है। परंतु जिस समय उस मोड़ पर सड़क को चौड़ा करने के लिए निर्माण विभाग वाले एकाकी दारु को काट रहे होंगे, रस्सियां लगा कर उसकी जड़-मूल को निकालने का षडय़ंत्र रच रहे होंगे, उस समय शायद किसी ने उन्हें यह न बताया होगा कि यह स्कूली बच्चों का साथी ‘एकाकी दारुÓ है, इसे मत काटो, इसे मत उखाड़ों, अपनी सड़क को चार हाथ आगे सरका लो। शायद सड़क बनवाने वाले उस साहब ने कभी बचपन में पेड़-पौधों से समय नहीं पूछा होगा, उनकी बांहों पर बैठकर झूलने का सुख नहीं लिया होगा और सुबह की धूप के उस केसरिया टीके, पीली पगड़ी और सफेद दुशाले की कल्पना भी नहीं की होगी।
अब वहां सिर्फ एक सुनसान मोड़ है और कुछ भी नहीं।