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संजीव ठाकुर की कवि‍ताएं        

संजीव ठाकुर

पीढ़ियाँ

हम पीते थे चाय एक साथ
फुटपाथ पर बैठते थे
अपने गम बिछाकर
बतियाते थे दुनिया की, जहान की
गलियाते थे
साहित्यिक चूतियापे को
मठों को, मठाधीशों को
पत्रिकाओं के संपादकों को
प्रकाशकों के कारनामों को
आलोचकों की क्षुद्रताओं को
पिछले दरवाजे से पुरस्कार झटकता कोई शख़्स
हमें नागवार गुजरता था
पुस्तक विमोचन समारोहों को हम
कहा करते थे
भांड -मिरसियों का काम !

समय बदलता गया धीरे–धीरे
हममें से कुछ लोग
आलोचक बन गए
झटक लिया किसी ने कोई पुरस्कार
सुशोभित कर रहा कोई
किसी पत्रिका के संपादक का पद
अकादमी की गतिविधियाँ
किसी की जेब में हैं !
डोलते हैं दस–बीस प्रकाशक
कंधे पर रखे झोले की तरह
विमोचन समारोहों में
झलक जाता है
किसी का विहंसता चेहरा ।

गलिया रहे हैं चार लोग
सफदर हाशमी मार्ग के फुटपाथ पर
चाय पीते हुए–
संपादकों को,
प्रकाशकों को,
आलोचकों को,
मठाधीशों को…!

लगाम दो

अब भी लगाम दो
चाह को
इतना भी चाहता है कोई
मृग मारीचिका को ?

हल

हल हो सकता है सवाल
सुख के एक टुकड़े का
तुम
मेरे बारे में सोचना
शुरू तो करो !

वस्तुस्थिति

कुछ भी तो नहीं है
अपने लिए
आँसू के सिवा

किसे बताऊँ ?

किसे बताऊँ
उसने
मेरे हृदय पर मूत दिया है ?
कचरे की टोकरी
रख दी है
नाक पर !मेरी कमजोरी तुम जानते हो
कृपा कर किसी को नहीं बताना –
मैं अव्वल दर्जे का पाजी हूँ
मेरे पास वह सब नहीं
जो जरूरी है जीने के लिए
आज की परिभाषा में !

जरूरत नहीं है दुखहरण मास्टर की: संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में सुरती खाते और बात-बात पर छड़ी भाँजते जिन ‘दुखहरण मास्टर’ का वर्णन किया गया है, वे आमतौर पर भारतीय अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते रहे हैं। लेकिन अब स्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं। गाँवों के स्कूलों में कहीं-कहीं दुखहरण मास्टर के वंशज भले दिख जाएँ, लेकिन शहरों ने उनकी प्रजाति को विलुप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पब्लिक स्कूलों में तो पुरुषों के अध्यापक बनने के रास्ते लगभग बंद कर दिए गए हैं। अब चुस्त, सुंदर, आकर्षक, ‘मैम’ पब्लिक स्कूलों की शोभा बढ़ाने लगी हैं। ऐसे में दुखहरण मास्टर की प्रजाति का विलुप्त होना अनिवार्य हो गया है। और यह अच्छी खबर है। लेकिन क्या पहनावे और बोलने के ढंग के बदलने से दुखहरण मास्टर की छड़ी भाँजने की मानसिकता बदल गई है? शायद नहीं! आज भी अध्यापकों और अध्यापिकाओं में शारीरिक दंड देने की प्रवृत्ति विद्यमान है। डाँट-डपट की तो बात ही क्या? ऐसे स्कूल या शिक्षक ढूँढ़ने पर ही मिल सकते हैं जो अपने विद्यार्थियों को डाँट-डपट, दंड वगैरह देने से परहेज करते हों। कभी-कभी तो बच्चों को भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने की खबरें अखबारों और टी.वी. में आती रहती हैं। ऐसी खबरों को देखने, पढ़ने के बाद दुःख होता है कि हमारे शिक्षक इस स्तर पर भी उतर सकते हैं?

दूसरी तरफ, यह सुखद बात है कि सरकार, स्कूल प्रशासन, माता-पिता बच्चों को शारीरिक दंड देने के सख्त खिलाफ हो गए हैं। शिक्षकों की प्रवृत्ति भले ही नहीं बदली हो, लेकिन वे बच्चों को दंडित करने से पहले सौ बार जरूर सोचने लगे हैं। हालाँकि बच्चों को डाँट-डपट और तरह-तरह से भयभीत करने से वे अब भी बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका मानना है कि बच्चे अनुशासन में नहीं रहेंगे तो वे उन्हें पढ़ा कैसे पाएँगे? और उन्हें अनुशासन में रखने के लिए तो डाँट-डपट जरूरी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बच्चों की बड़ी तादात को सँभालना होता है। वे आखिर उन्हें सँभालें भी तो कैसे? प्राइमरी स्तर पर एक ही शिक्षक पूरी क्लास को पढ़ाता है। पढ़ाने के साथ-साथ उसे यह भी देखना होता है कि बच्चे आपस में मार-पीट न करें। यहाँ तक कि पानी पीते या पेशाब को जाते भी वे अगर मार-पीट करें और किसी को खरोंच भी आ जाए तो संबंधित कक्षा का शिक्षक ही दोषी माना जाता है। ऐसे में, एक सरकारी स्कूल के युवा शिक्षक हेमेन्द्र मोहन की कही बात गौर करने लायक है, ‘‘पहले वाली स्थिति ही अच्छी थी। विद्यार्थी शिक्षकों का लिहाज करते थे, कहा मानते थे। अब तो सीनियर क्लास के लड़के शिक्षकों को ही धमकाते हैं कि आप कुछ कहोगे तो मैं प्रिसिंपल से शिकायत कर दूँगा।’’

जाहिर है, शिक्षकों और विद्यार्थियों के रिश्ते में दरार पैदा हो गई है। यह दरार पब्लिक स्कूलों में थोड़ी कम दिखाई देती है। वहाँ शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच माहौल अधिक दोस्ताना है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह दोस्ताना स्वाभाविक नहीं, बल्कि व्यावसायिक दबाव की वजह से अधिक है। आज के माता-पिता यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे महँगे स्कूलों में जाएँ और वहाँ से मुर्गा बनकर या पीठ पर छड़ी के निशान लेकर घर वापस आएँ। वे अपने बच्चों पर एक उँगली तक पड़ते नहीं देखना चाहते। ऐसे में पब्लिक स्कूलों की यह मजबूरी हो जाती है कि वे बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित न होने दें। स्कूल-प्रशासन का अंकुश शिक्षकों पर रहता है, छात्र या माता-पिता की शिकायत पर किसी शिक्षक को निष्कासित करते उन्हें देर भी नहीं लगती। यही वजह है कि पब्लिक स्कूलों के शिक्षक/शिक्षिका विद्यार्थियों से बहुत सहज और फ्रेंडली दिखाई देते हैं। शिक्षकों की तरफ से देखें तो निश्चय ही उनके लिए यह भूमिका बड़ी कठिन हो सकती है। उन्हें अपने तन-मन को रोके रखकर बच्चों को अनुशासित रखना है और पढ़ाना है। शिक्षकों की इस कशमकश के बारे में पब्लिक स्कूल की एक शिक्षिका श्रीमती लीना का कहना है- ‘‘हमें बहुत मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है। मैं भी इस पक्ष में हूँ कि बच्चों को मारा-पीटा न जाए, डाँटा-डपटा न जाए, लेकिन बिना डाँटे-डपटे बच्चों को सँभालना आसान भी तो नहीं होता? आखिर कभी-कभार घर में हम अपने बच्चों को डाँटते-डपटते हैं या नही?’’

श्रीमती लीना भी अपनी जगह सही हैं, लेकिन बच्चों के कोण से देखें तो उन्हें न तो घर में डाँट-डपट पसंद है, न ही स्कूल में। न तो डाँटने-डपटने वाले माता-पिता उन्हें पसंद है, न ही शिक्षक। हाँ, वे डाँट-डपट के इतने आदी हो गए हैं कि वे थोड़ी बहुत डाँट सहन को भी तैयार रहते हैं। एक पब्लिक स्कूल की छठी कक्षा की छात्रा तृषा का कहना है, ‘‘मेरी कक्षा में सभी टीचर्स बहुत अच्छी हैं। हँसमुख और फ्रेंडली। पर कभी-कभी हमें डाँटती भी हैं। कभी-कभी जब उनका मूड ज्यादा खराब रहता है तो वे हमें ज्यादा डाँटती हैं। मेरे ख्याल से उन्हें डाँटना तो चाहिए, लेकिन कम!’’

सवाल है कि बच्चों को डाँटा-डपटा क्यों जाए? इसलिए कि वे बड़ों की बात नहीं मानते? शिक्षकों की नहीं सुनते?…बच्चों के जीवन और शिक्षण पर चिंतन और अपने चिंतन का क्रियान्वयन करने वाले दुनिया भर के शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात का विरोध किया है। बच्चों से अपनी बात मनवाने के लिए जोर-जबरदस्ती करते माता-पिता और शिक्षक उनकी आलोचना के विषय रहे हैं। टॉल्सटॉय, ए.एस.नील, जॉन होल्ट, मकारांको, रवीन्द्रनाथ, गिजुभाई जैसे शिक्षा शास्त्री बच्चों की आजादी के पक्षधर रहे हैं। बच्चों को भयमुक्त वातावरण में पालने और पढ़ाने के पक्षधर रहे हैं। एस.एस. नील जैसे शिक्षक तो अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी देते थे कि विद्यार्थी उन्हें उनके नाम से पुकार सकते थे। गिजुभाई ने भी अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी दी थी कि ‘गिजुभाई पगला गए हैं’ कह सकते थे। विद्यार्थियों पर हर वक्त अंकुश रखने वाले शिक्षक इस आजादी की कल्पना तो नहीं ही कर सकते हैं। नील और गिजुभाई जैसे लोग उन्हें बेवकूफ भी लग सकते हैं। जबकि नील और गिजुभाई जैसे शिक्षक इसलिए बच्चों को आजादी देने के पक्ष में थे कि इससे वे आजाद और कुंठा रहित नागरिक के रूप में विकसित होंगे। नील और गिजुभाई के इस दर्शन को समझने और अपनाने वाले शिक्षकों की आज कितनी आवश्यकता है? शिक्षकों के द्वारा दी गई आजादी का उपभोग करते हुए भी शिक्षकों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखना विद्यार्थियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

आज के हिसाब से देखें तो यह सच है कि हमारे यहाँ एकलव्य या आरुणि जैसे शिष्य नहीं रहे। सच तो यह भी है कि हमारे गुरु अब ब्रह्मा नहीं रहे? शिक्षा को व्यवसाय में बदल देने वाले गुरु राम और युधिष्ठिर जैसे शिष्य तैयार भी कैसे कर सकते हैं? इस मूल्यहीन समय में सद्गुरुओं की जितनी जरूरत है, उतनी ही उनकी कमी दिखाई देती है। सद्गुरु भाषण से नहीं, बल्कि अपने आचरण से अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे, दंड से नहीं, प्रेम, प्रोत्साहन से काम लिया करते थे। तभी उनकी दी हुई शिक्षा चिर स्थायी हुआ करती थी।

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

बीसवीं शताब्दी के तानसेन- उस्ताद बड़े गुलाम अली खान :  संजीव ठाकुर

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान

आज से करीब ढाई-तीन सौ साल पहले फजल दाद खान नाम के एक पठान शख्स लाहौर के पास स्थित कसूर नाम के स्थान में ‘सुर की देवी’ की तलाश में निकले। उन्होंने सुन रखा था कि ‘सुर की देवी’ को पहाड़ों, जंगलों और नदियों में पाया जा सकता है तो वे सालों साल ‘सुर की देवी’ की तलाश में भटकते रहे। एक दिन वे एक पत्थर से सिर टेककर बैठे हुए थे कि सामने के जंगल से आवाज़ आई—”फजल दाद! मैं यहाँ हूँ।’’

फजल दाद उस आवाज़ की दिशा में गए तो देखा कि संपूर्ण जंगल स्वर्णिम प्रकाश से जगमगा रहा था। अंदर जाने पर उन्हें एक लंबी स्त्री दिखाई पड़ीं जो ऊपर आकाश की ओर उड़ रही थीं। उन्होंने फजल दाद को संगीत का वरदान दिया और वापस लौटकर अपने लोगों को संगीत सिखाने को कहा। ‘सुर की देवी’ ने यह भी कहा कि ‘संगीत तुम्हारे परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगा।’ फजल दाद कसूर लौट आए। वरदान पाकर लौटने के कारण लोग उन्हें पीर फजल दाद खान कहने लगे। वे अपने लोगों को संगीत सिखाने लगे।

फजल दाद के वरदान पाने की यह कहानी सच हो या न हो, यह तो सच है कि संगीत इस परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला—खल्क अली खान, इरशाद अली खान, इदा खान, अली बख्श खान से होते हुए बड़े गुलाम अली खान तक पहुँच गया। पीर फजल दाद खान से चला आया संगीत का यह घराना ‘कसूर का घराना’ कहलाया! इस घराने में यों तो बड़े गुलाम अली खान के पिता अली बख्श खान और चाचा काले खान की गिनती देश के चोटी के गायकों में की जाती थी, लेकिन बड़े गुलाम अली खान ने जो ख्याति अर्जित की वह इस घराने के किसी भी गायक के लिए संभव नहीं हो सकी थी। बड़े गुलाम अली खान की प्रतिभा को पहचानकर उनके पिता अली बख्श खान ने कहा था—‘‘हमारी सात पीढिय़ों में भी तुम्हारे जैसा कोई न हो सका, न ही आगे किसी के होने की संभावना है।’’ अली बख्श खान की बात सही साबित हुई!

कसूर घराने के होने के बावजूद अपनी गायकी को और अधिक समृद्ध करने के लिए बड़े गुलाम अली खान के पिता अली बख्श और चाचा काले खान ने पटियाला घराने के उस्ताद फतेह अली खान साहब से तालीम ली थी। इस तरह उनकी गायकी में कसूर और पटियाला दोनों घराने का रंग आ गया था। उनका घराना भी आगे ‘कसूर-पटियाला का घराना’ कहा जाने लगा। बड़े गुलाम अली खान, जिन्होंने अपने पिता और चाचा दोनों से तालीम ली थी, दोनों की गायकी की विशेषताओं से लैस हो गए थे। पिता से सरगम और चाचा से तानों की अदायगी के गुर उन्होंने सीखे थे।

बड़े गुलाम अली खान का जन्म कसूर में 2 अप्रैल, 1902 को हुआ था—पिता अली बख्श और माता माई बुड्ढी की पहली संतान के रूप में। घर में संगीत का वातावरण होने के कारण गुलाम अली ने तीन-चार साल की उम्र में ही स्वरों को थोड़ा-बहुत समझ लिया था। मातृभाषा की तरह उन्होंने सरगम सीखा था। छुटपन में ही गुलाम अली ने गड़ेरियों, किसानों, फकीरों और जोगियों से सुनकर ढेर सारे गीत सीख लिये थे। कसूर के लोग उनको रोककर ये गीत सुना करते थे। कभी वे बाजार मिठाई या दही लेने जाते तो हलवाई उन्हें गाना सुनाने को कहता। गाना सुनकर हलवाई उन्हें दही-मिठाई दे देता और पैसे भी नहीं लेता। माँ इस बात पर गुस्सा करतीं।

संगीत के प्रति गुलाम अली के लगाव को देखकर उनके पिता ने छ: साल की उम्र में उन्हें अपने छोटे भाई के हवाले कर दिया था। काले खान ही उन्हें संगीत सिखाते थे। पुत्र नहीं होने की वजह से काले खान उन्हें पुत्र की तरह ही मानते थे। गुस्सा आने पर पिटाई भी करते थे। गुलाम अली अपने चाचा की सेवा में लगे रहते थे और संगीत सीखते रहते थे। तीन ही साल में उन्होंने इतना सीख लिया कि अपने चाचा के साथ संगत करने लगे। नौ साल की उम्र में उन्होंने दिल्ली-दरबार में काले खान का संगत किया था। जार्ज पंचम के दिल्ली आगमन के अवसर पर दिल्ली-दरबार में होने वाले संगीत के कार्यक्रम में उस्ताद काले खान को भी बुलाया गया था। काले खान के संगत कलाकार के रूप में गुलाम अली दिल्ली गए थे। राजा-महाराजा और नवाबों के सामने गाने की चुनौती का सामना करने का उनका यह पहला अनुभव था।

उस्ताद काले खान की तरह ही गुलाम अली की आवाज़ में ताकत थी। उसको उन्होंने रियाज के द्वारा और अधिक ताकतवर बना दिया था। पहले लाहौर के निकट सुनसान इमारत चार बुर्जी में पूरे गले से किया गया रियाज और बाद में रावी के किनारे रात भर किया गया रियाज उनके गले को तैयार करने में काफी मददगार रहा था। 1918 में चाचा काले खान की असामयिक मृत्यु के बाद तो गुलाम अली रियाज पर और अधिक ध्यान देने लगे थे। असल में उस्ताद काले खान की मृत्यु के बाद कसूर और लाहौर के लोग कहने लगे थे—”संगीत तो काले खान के साथ ही कसूर से चला गया। इस परिवार में अब वैसा कौन हो सकता है?’’….यह बात गुलाम अली को चुभ गई और उन्होंने अपने चाचा की तरह का गायक बनने की ठान ली। अब वे दिन-रात रियाज करने लगे। रियाज के साथ-साथ वे सारंगी बजाना भी सीखते थे। सारंगी के इस अभ्यास ने भी उनके गले को तैयार करने में काफी मदद पहुँचाई थी।

काले खान की मृत्यु के बाद गुलाम अली की माँ ने गुलाम अली को पिता के पास जम्मू जाने को कहा। गुलाम अली के पिता जम्मू में रहा करते थे। जम्मू में उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली थी। जम्मू में गुलाम अली को देखकर पिता बहुत खुश हुए, लेकिन बेटे को सौतेली माँ के साथ रखने में उन्हें परेशानी थी। इस वजह से उन्होंने अपनी एक शिष्या के घर गुलाम अली को रखवा दिया। कुछ दिनों बाद पिता ने बेटे को एक पल्टा सिखा दिया और लाहौर लौटकर पूरे साल उसका रियाज करने को कहा। गुलाम अली ने उन्हें गाकर सुनाया तो वे भावुक हो गए और आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हारे जैसा गायक हमारे खानदान में पैदा नहीं हुआ था!

गुलाम अली अठारह-उन्नीस साल के थे, जब वे अपने पिता के साथ लखनऊ की एक महफिल में गाने गए थे। अवध के ताल्लुकेदारों की महफिल में उन्होंने पिता के साथ गाया था। एक दिन लखनऊ के एक हम्माम में नहाते हुए उनकी मुलाकात लखनऊ के प्रसिद्ध गायक उस्ताद नज़ीर खान से हुई। नज़ीर खान उन्हें लखनऊ की जानी-मानी तवायफ नब्बन बाई के यहाँ ले गए। उस्ताद नज़ीर खान ने गुलाम अली से कहा—”मैं जानता हूँ कि तुम्हारे चाचा और पिता ने तुम्हें अच्छी तालीम दी है और तुम एक अच्छे गायक हो, लेकिन तुम अपने स्केल से ऊपर के स्केल में गा सकते हो?’’ गुलाम अली ने विनम्रता से जवाब दिया—”खुदा की मेहरबानी और आपके आशीर्वाद से, आप जिस स्केल में कहें, मैं गा सकता हूँ।’’….नज़ीर खान खुद हारमोनियम लेकर बैठे, तबला और तानपूरा मिलाया गया। और जब गुलाम अली ने मंद्र स्वर में गायन किया तो उनकी आवाज़ हारमोनियम के मंद्र स्वर से भी नीची थी। इसी तरह उन्होंने तार सप्तक में तान लेकर उस्ताद को अचंभित कर दिया। उस्ताद नज़ीर खान ने गुलाम अली के सम्मान में अपने कान छू लिये। नब्बन बाई उनके गाने से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें कुछ दिन अपने घर रहने का आग्रह करने लगीं। शाम में जब नब्बन बाई को सुनने लखनऊ के बड़े लोग आए, नब्बन बाई ने गुलाम अली को गाने को कह दिया। लखनऊ के संगीत प्रेमी लोगों पर गुलाम अली के गायन का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। जब गुलाम अली लौटकर पिता के पास आए तो पिता ने गुस्सा दिखाते हुए कहा—”बहुत हो गया। कल सुबह नाई आकर तुम्हारी घुँघराली लटें काट जाएगा। सारे फसाद की जड़ यही है। औरतें तुमसे इसी वजह से आकर्षित होती हैं।’’

अगले दिन गुलाम अली के बाल मूँड़ दिए गए और अविलम्ब पिता उन्हें लेकर लाहौर वापस आ गए!

लाहौर लौटकर गुलाम अली फिर से रावी तट पर रात भर रियाज करने लगे। चाँदनी रात हो या अँधेरी रात, वे रियाज करना नहीं छोड़ते। धीरे-धीरे लोगों को पता चल गया कि गुलाम अली रात में रियाज करते हैं। उनका गायन सुनने लोग रात में रावी तट पर पहुँच जाते। इससे गुलाम अली को श्रोताओं के समक्ष गाने का अनुभव भी मिल जाता। 1921 में पिता के फालिज के शिकार हो जाने पर रावी तट पर उनके रियाज का क्रम टूट गया। अब घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। उन्होंने अपने परिवार के साथ-साथ अपनी सौतेली माँ और सौतेले भाई-बहनों की जिम्मेदारी भी उठा ली। इसके लिए वे जगह-जगह कार्यक्रम देने लगे। शीघ्र ही श्रेष्ठ युवा गायकों में उनकी गिनती होने लगी। उन्हीं दिनों उनका नामकरण बड़े गुलाम अली के रूप में हुआ। दरअसल गुलाम अली नाम के एक और गायक थे। लोग उन्हें छोटे गुलाम अली कहते थे। बड़े गुलाम अली को लोग बड़े गुलाम अली कहने लगे।

1927 ई. में बड़े गुलाम अली की शादी अल्लाह जिवाई से हो गई। अपनी पत्नी के साथ गुलाम अली ने लाहौर के कूचा कश्मीरियां में अपनी गृहस्थी बसाई। दो साल बाद अल्लाह जिवाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम करामत अली रखा गया। इसके डेढ़ साल बाद दूसरा बेटा आया, जिसका नाम मुनव्वर रखा गया। लेकिन बड़े गुलाम अली का यह सुखद वैवाहिक जीवन अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। पाँच साल होते-होते इस पर ग्रहण लग गया। 1932 में अचानक बीमार होकर अल्लाह जिवाई अल्लाह को प्यारी हो गईं। दो छोटे-छोटे बच्चों को उनके परिवार वालों ने सँभाला और बड़े गुलाम अली को संगीत ने। उन्हीं दिनों अपने सुरमंडल के तार छेड़कर उन्होंने गाया—”याद पिया की आए, यह दु:ख सहा न जाए, हाय राम!”….अचानक आ गई इन पंक्तियों में से बड़े गुलाम अली खान का दु:ख फूट रहा था। हृदय से निकली इन पंक्तियों और स्वरों से उस दिन एक ऐसी ठुमरी सृजित हुई थी जो बड़े गुलाम अली की सबसे लोकप्रिय ठुमरियों में तो शुमार की ही जाती है, विरह की अभिव्यक्ति के खयाल से आज भी इसका कोई सानी नहीं है। इसी तरह बड़े गुलाम अली की एक और बहुचर्चित ठुमरी उन्हीं दिनों पहली बार गाई गई थी—”का करूँ सजनी, आए न बालम।….रोवत-रोवत कल ना पड़त हैं, याद आवत जब उन की बतियाँ!”

बड़े गुलाम अली अपने तैयार गले और सुमधुर आवाज़ के साथ पूरे देश में कार्यक्रम देते घूम रहे थे। उनके घूमते रहने और लौटकर लाहौर आने में एक कनस्तर घी की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। घर से निकलते हुए वे अपने और अपने साजिंदों के उपयोग के लिए एक कनस्तर घी रखवा लेते थे। घी का वह कनस्तर जहाँ खाली हो जाता, वहीं से वे घर को लौट जाते। लौटकर घर आते तो बच्चों के लिए तरह-तरह के उपहार लाते। पास-पड़ोस के लोग उम्मीदें लेकर उनके पास आने लगते। किसी की बेटी का ब्याह बड़े गुलाम अली के आने तक रुका होता तो किसी की बीमारी का इलाज। खान साहब किसी को निराश नहीं करते। उनका विश्वास था कि जब उनकी जेब खाली हो जाएगी, अल्ला मियाँ फिर से उसे भर देंगे।

लाहौर के हीरामंडी में उन दिनों गुलजार बाई नाम की एक तवायफ रहा करती थीं। वह युवा थीं, अच्छा गाती थीं। उनका नाम था। जब उन्होंने बड़े गुलाम अली के बारे में सुना तो उनसे मिलने की इच्छा जताई। बड़े गुलाम अली उनसे मिलने गए। अब वह गुलजार बाई की शाम की महफिल में रोज जाने लगे। गुलजार बाई के गाने में संगत देने के लिए सारंगी भी बजाने लगे। संगीत से जुड़ा उनका नाता धीरे-धीरे प्यार के नाते में बँध गया। लेकिन एक दिन क्या हुआ कि महफिल में गुलजार बाई ने एक नए श्रोता की ओर कुछ ज्यादा ध्यान दे दिया। गुलाम अली को गुस्सा आ गया। वे महफिल छोड़कर घर चले आए और बैग में अपना सामान भरकर स्टेशन को चल पड़े। टिकट खिड़की पर जाकर उन्होंने एक टिकट माँगा। खिड़की पर बैठे क्लर्क ने पूछा—”कहाँ का टिकट चाहिए?” तो बड़े गुलाम अली बोले—”पहली गाड़ी जहाँ जाती हो, वहीं का टिकट दे दीजिए!” क्लर्क ने बताया—”अगली गाड़ी बम्बई जा रही है।“’’ बड़े गुलाम अली ने बम्बई का टिकट लिया और गाड़ी के आने पर उस पर बैठ गए। यह 1940 का कोई दिन था।

बम्बई पहुँचकर बड़े गुलाम अली ने भेंडी बाजार का पता पूछा। अपने चाचा काले खान से उन्होंने भेंडी बाजार में रहने वाली गायिका गंगा बाई का नाम सुन रखा था। बस वे पूछते-पाछते गंगा बाई के घर पहुँच गए। गंगा बाई ने उन्हें अपने घर पर ठहराया। थोड़े दिनों बाद अपने दु:ख से निकलकर बड़े गुलाम अली ने रियाज करना शुरू कर दिया। गंगा बाई उनके गायन से बहुत प्रभावित हुईं। गंगा बाई के घर आने-जाने वाले लोग भी उनके गायन से प्रभावित होते। धीरे-धीरे बम्बई के संगीत प्रेमियों के बीच गुलाम अली की चर्चा होने लगी। एक दिन बम्बई की प्रसिद्ध गायिका जद्दन बाई (अभिनेत्री नरगिस की माँ) के घर संगीत का कार्यक्रम रखा गया। वहाँ फिल्म से जुड़ी कई हस्तियाँ भी मौजूद थीं। बड़े गुलाम अली के गायन ने सबका मन मोह लिया। उन्हें नजराना दिया गया और अलग-अलग जगहों पर गाने का आमंत्रण भी।

कई महीने बाद एक दिन पता लगाकर बड़े गुलाम अली की प्रेमिका गुलजार बाई बम्बई पहुँच गईं। वह गुलाम अली को लाहौर लौट चलने को मनाने लगीं। वह गुलाम अली का साथ पाने के लिए अपना धन, अपनी संपत्ति, यहाँ तक कि गायन छोड़ देने को तैयार थीं। लेकिन बड़े गुलाम अली का दिल नहीं पिघला तो नहीं ही पिघला। गुलजार बाई को अकेले लाहौर लौटना पड़ा।

गंगा बाई के घर में रहते हुए ही बड़े गुलाम अली को निजामुद्दीन खान जैसे तबला वादक मिले और मिले ‘हरि ओम तत् सत’ भजन के बोल। ‘हरि ओम तत् सत’ के बोल लेकर एक गायक बड़े गुलाम अली के पास आए थे। आकर उन्होंने यह भजन बड़े गुलाम अली को सुनाया था। बड़े गुलाम अली इससे इतने प्रभावित हुए कि ‘पहाड़ी’ में इसकी धुन बना दी। यह बड़े गुलाम अली का बहुचर्चित भजन है। महात्मा गाँधी ने एक बार इसे बड़े गुलाम अली के मुँह से सुना था और प्रशंसा में उनको पोस्टकार्ड लिखा था।

बम्बई में रहते हुए बड़े गुलाम अली को साल-डेढ़ साल हो गए थे। एक दिन उनके बेटे मुनव्वर का पत्र आया जिसमें उन्होंने पिता को याद करते हुए लिखा था—”अगर मैं चिडिय़ा होता तो उड़कर आपके पास चला आता और आपके साथ ही रहता।’’ बेटे की इस बात का ऐसा प्रभाव पड़ा कि बड़े गुलाम अली तुरंत लाहौर लौट गए। लाहौर में उनके बेटों की अच्छी देखभाल हो रही थी, यह देखकर उन्हें अच्छा लगा। अब उन्होंने छोटे बेटे मुनव्वर को संगीत सिखाना भी शुरू कर दिया।

1943 का वर्ष अवसान पर था। घर के अंदर बैठे बड़े गुलाम अली कुछ नया सृजन करने की तैयारी में थे कि डाकिए की आवाज़ ने बाधित कर दिया। उठकर गए तो डाकिया उन्हें एक पत्र दे गया। पत्र बम्बई से आया था। वह ‘विक्रमादित्य संगीत उत्सव’ का निमंत्रण-पत्र था। इस संगीत उत्सव में, जहाँ हिन्दुस्तान के कई दिग्गज शास्त्रीय गायक हिस्सा लेने वाले थे, बड़े गुलाम अली को बुलाया जाना बड़े सम्मान की बात थी। कार्यक्रम अगले वर्ष यानी 1944 में होना था। बड़े गुलाम अली दुबारा बम्बई गए। कार्यक्रम में उन्होंने ‘मारवा’ और ‘पूरिया’ जैसे दो बहुत मिलते-जुलते रागों पर अपना अधिकार दिखलाकर अपनी धाक जमा दी। कार्यक्रम में उस्ताद फैयाज खाँ, अल्लादिया खान, केसर बाई जैसे प्रतिष्ठित गायक-गायिकाओं का भी गायन हुआ था। उनके बीच बड़े गुलाम अली खान ने अपना सिक्का मनवा लिया था।

कार्यक्रम के बाद सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ प्रो. बी.आर. देवधर बड़े गुलाम अली के पास गए और उनके शक्तिशाली गायन का राज़ पूछा। बड़े गुलाम अली खान ने कहा—”पंडित जी! मैं यहाँ आपको वह नहीं बता सकता हूँ। आप मुझे अपने स्कूल में बुलाइए, वहाँ बताऊँगा।’’

प्रो. देवधर ने ससम्मान उन्हें अपने स्कूल में बुलाया। अगले दिन प्रो. देवधर के विद्यार्थियों और संगीतकारों के बीच बड़े गुलाम अली ने अपने गाने की ताकत का प्रदर्शन किया। उनके गले से ऐसी आवाज़ निकल रही थी जैसे दस तानपूरों को मिलाकर आवाज़ निकल सकती है। इसके बाद उन्होंने रियाज करने के तरीके के बारे में बतलाया था। फिर कणयुक्त स्वरों के प्रयोग का तरीका भी बतलाया था।

बम्बई में ही उस्ताद बड़े गुलाम अली खान को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञ जी.एन. बाला सुब्रमण्यम ने मद्रास आने का निमंत्रण दिया। बड़े गुलाम अली ने मद्रास जाकर अपना गायन प्रस्तुत किया। वहाँ भी उन्होंने श्रोताओं का मन मोह लिया। श्रोताओं में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी जैसी गायिका भी मौजूद थीं। कार्यक्रम के बाद शाल ओढ़ा कर सम्मानित करते हुए जी.एन. बाला सुब्रमण्यम ने बड़े गुलाम अली को ‘संगीत सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया था। इस कार्यक्रम के बाद दक्षिण के कुछ और स्थानों पर भी उन्हें गाने को बुलाया गया। अपने कार्यक्रमों को प्रस्तुत कर वे लाहौर लौट गए।

1947 में बड़े गुलाम अली अफगानिस्तान के राजा ज़हीर शाह के निमंत्रण पर अफगानिस्तान गए। ज़हीर शाह बड़े गुलाम अली के इतने बड़े प्रशंसक थे कि उन्होंने उस्ताद को काबुल में बस जाने और दरबारी गायक का पद सँभालने का आग्रह कर डाला। लेकिन उस्ताद ने उनके आग्रह को नहीं माना और वे लाहौर को चल पड़े। लाहौर लौटने में उन्हें बड़ी कठिनाई हुई। उस्ताद अफगानिस्तान में ही थे कि इधर हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता की आग भड़क उठी थी। हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे को लूट-मार रहे थे। किसी तरह बड़े गुलाम अली अपने घर पहुँचे थे। उसी वर्ष देश का विभाजन हुआ था और बड़े गुलाम अली ने फिर से अपनी गृहस्थी बसाने की बात सोची। उनके तबलावादक मित्र ने अल्ला राखी नाम की एक विधवा स्त्री का पता बताया और पैंतालीस वर्ष के विधुर गुलाम अली ने तीस वर्ष की उस विधवा स्त्री से विवाह कर लिया। बड़े गुलाम अली अपनी दूसरी पत्नी से भी उतना ही प्रेम करने लगे। यही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी को बुरके से बाहर निकाला और आधुनिक स्त्री के रूप में रहने की आजादी दी। किसी कार्यक्रम में जाते हुए वे पत्नी को भी साथ रखते। धीरे-धीरे पत्नी नई तहजीब सीखती गईं। उनका घर अब संगीतकारों और संगीत प्रेमियों के लिए हमेशा खुला रहने लगा। अल्ला राखी दिल से सबका स्वागत करतीं। हाँ, उन्हें पति का बेफिक्र होकर खर्च करना अच्छा नहीं लगता था। वे भविष्य के लिए भी कुछ-कुछ बचाना चाहती थीं, लेकिन बड़े गुलाम अली उनकी यह बात नहीं सुनते। कोई जरूरतमंद चाहे वह सगा-संबंधी हो, पास-पड़ोसी हो या संगीतकार, उनके घर से खाली हाथ नहीं जा सकता था।

विभाजन के बाद बड़े गुलाम अली लाहौर में ही रह रहे थे। वहीं 1951 में उन्हें बम्बई से मोरारजी देसाई का निमंत्रण आया। मोरारजी देसाई उन दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। बड़े गुलाम अली उनका निमंत्रण पाकर बम्बई गए। वहाँ उनका जैसा स्वागत किया गया, उसे देखकर उस्ताद भाव-विभोर हो गए। और जब मोरारजी देसाई ने उनसे कहा—”खान साहब! हिन्दुस्तान में आपके इतने प्रशंसक हैं, आप यहीं वापस क्यों नहीं आ जाते?” तो खान साहब ने कहा—”अगर मैं हिन्दुस्तान की नागरिकता पा लेता हूँ तो यह बहुत अच्छा होगा। मैं लाहौर में रहता था, विभाजन होने पर खुद-ब-खुद पाकिस्तानी हो गया।”

मोरारजी देसाई ने बड़े गुलाम अली को भारतीय नागरिकता दिलाने की कोशिश शुरू कर दी। दो-तीन साल की कागजी कार्यवाही के बाद 1954 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें भारतीय नागरिकता दे दी। पाकिस्तानी अधिकारी बड़े गुलाम अली को भारत आने से रोक रहे थे। उस्ताद को धन-सम्पत्ति, मकान का प्रलोभन दे रहे थे, लेकिन उस्ताद ने कहा, ‘‘उन्हें सब कुछ तो दिया जा सकता है, मगर हिन्दुस्तान में रहने वाले उनके हजारों प्रशंसकों को पाकिस्तान कैसे लाया जा सकता है?” उस्ताद अपना परिवार लेकर बम्बई आ गए। बम्बई में उन दिनों ओंकार नाथ ठाकुर, केसर बाई, अल्लादिया खान, हीरा बाई बरोडकर, काले नजीर खान, अमान अली खान, विष्णु दिगंबर पलुस्कर जैसे गायक-गायिका रहते थे। बड़े गुलाम अली इन संगीतकारों की दुनिया के अभिन्न अंग बन गए। धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया के लोगों से भी उनका परिचय हुआ। लेकिन फिल्मों में गाने से वे परहेज ही करते रहे। लेकिन के. आसिफ ने उन्हें घेर ही लिया। के. आसिफ जब ‘मुग़ले आज़म’ बना रहे थे, तब उन्होंने तानसेन के रूप में बड़े गुलाम अली का गायन रखने की बात सोची। वे उस्ताद के पास गए और उनसे निवेदन किया—”मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि यह फिल्म अच्छी बने। लेकिन यह फिल्म तभी यादगार बन सकती है जब तानसेन के रूप में आप गाएँ।’’

फिल्मी दुनिया की जानकारी रखने वाले पत्रकार हरीश तिवारी ने इस प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखा है कि के. आसिफ को टालने की गर्ज से बड़े गुलाम अली खान साहब ने उन दिनों के हिसाब से काफी बड़ी रकम (पाँच हजार रुपये) माँगी। के. आसिफ बोले—”मैं आपको पन्द्रह हजार दूँगा।’’ अब उस्ताद अपनी बात से कैसे मुकर सकते थे? उनको ‘मुग़ले आज़म’ में गाना ही पड़ा। उन्होंने राग रागेश्री में ‘शुभ दिन आए’ बंदिश गाई। युद्ध में विजय पाकर लौट रहे सलीम के स्वागत में यह गीत बज रहा था। इसी फिल्म में सलीम और अनारकली के बाग में मिलन की पृष्ठभूमि में रियाज करते तानसेन सुने जा सकते हैं। बड़े गुलाम अली की आवाज़ में तानसेन एक ठुमरी गा रहे थे—’प्रेम जोगन बन आई।’

उस्ताद बड़े गुलाम अली का पारिवारिक और पेशेवर जीवन बड़ा अच्छा बीत रहा था कि नियति ने अपने क्रूर बाण उन पर चला दिए। महाराष्ट्र के अकोला में वे कार्यक्रम दे रहे थे। यह 1961 की बात है। मंच पर ही उनकी तबीयत खराब होने लगी। उन्होंने अपने संगतकारों से कहा—”मैं अपने हाथ नहीं हिला पा रहा हूँï!” उसी हालत में उन्होंने कार्यक्रम पूरा किया और शीघ्र ही बम्बई चले गए। वहाँ ‘बॉम्बे हास्पीटल’ में उन्हें भरती कराया गया। उन पर फालिज का असर हो गया था। उनका पूरा बायाँ अंग फालिज का शिकार हो गया था। वे हिल-डुल नहीं पा रहे थे। मुँह से बोली भी नहीं निकल पा रही थी। यह उनके लिए एक गहरा आघात था। रोज गाने वाले गुलाम अली के लिए बिना गाए रहना बहुत मुश्किल था। उन्होंने एक दिन डॉक्टर से कहा भी—”अगर मैं गा नहीं सकता तो मैं जीना भी नहीं चाहता।’’

अस्पताल से जब वे घर आए तब उन्होंने फिर से रियाज करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी खोई हुई आवाज़ पा ली। एक बार फिर वे कार्यक्रम देने की स्थिति में आ गए। भले ही उनका पुत्र मुनव्वर और संगतकार उन्हें पकड़कर मंच तक ले जाते हों लेकिन मंच पर जाते ही वे वही गुलाम अली हो जाते थे।

1963 में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान कलकत्ता की यात्रा पर गए। कलकत्ता उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं बस जाने का फैसला कर लिया। वे बम्बई से कलकत्ता आ गए। पार्क सर्कस के बेग बगान में एक फ्लैट किराए पर ले लिया। कलकत्ता के संगीत-प्रेमी लोगों और उस्ताद विलायत खान, अली अकबर खान, करामत खान, शौकत अली खान और रहिमुद्दीन डागर जैसे संगीतकारों ने उनका तहे दिल से स्वागत किया। अब कलकत्ता के लोगों के सामने उनकी सांगीतिक प्रतिभा का प्रदर्शन अक्सर होने लगा। उनकी ख्यति कुछ इस कदर फैली कि रामकृष्ण मिशन आश्रम की ओर से उन्हें गाने का न्योता भिजवाया गया। बड़े गुलाम अली ने खुशी-खुशी यह न्योता स्वीकारा और कार्यक्रम के दिन अपने दल-बल के साथ वहाँ पहुँच गए। उन्होंने वहाँ राग पीलू में ‘राधे कृष्ण बोल, तेरा क्या लगेगा मोल’ भजन गाकर सुनाया। कार्यक्रम के बाद आश्रम के प्रमुख स्वामी ने बड़े गुलाम अली के पैर छुए और उन्हें सोने की चेन उपहार में दी।

बड़े गुलाम अली खान साहब की खासियत यह थी कि वे जिस भाव से स्वामी जी के आश्रम में या पीर की मजार पर या किसी आत्मीय के घर में गा सकते थे, उसी भाव से किसी जेल में भी। यही वजह थी कि जब उन्हें कलकत्ता के अलीपुर जेल में गाने का न्योता मिला तो उन्होंने बिना किसी हील-हुज्जत के उसे स्वीकार कर लिया। और हिंसक कैदियों के सामने ‘मालकौंस’ गाकर उन्होंने उन्हें नफरत से दूर प्यार की दुनिया में पहुँचा दिया। उनके गायन का ऐसा प्रभाव कैदियों पर पड़ा कि वे उन्हें उठने नहीं दे रहे थे। तब खान साहब ने ‘पहाड़ी’ में एक ठुमरी सुनाई—’अब तो आवो साजना, पूरी हो मन की आशा!’ इसके बाद उन्होंने कैदियों से कहा—‘‘अब मैं थक गया हूँ। अल्लाह ने चाहा तो फिर हाजिर हूँगा।’’ इसके बाद उनका कार्यक्रम खत्म हुआ।

ढेर सारे संगीत प्रेमी नवाबों, राजाओं, जमींदारों की तरह हैदराबाद के नवाब जहीर यार जंग भी बड़े गुलाम अली खान के प्रशंसक थे। उनके आग्रह पर उस्ताद 1965 में कार्यक्रम देने हैदराबाद गए। वहाँ से लौटकर आने के बाद विशाखापत्तनम में उनका स्मरणीय कार्यक्रम हुआ। 1967 के दिसम्बर में वे अपने परिवार और संगतकारों के साथ फिर हैदराबाद गए। हैदराबाद की यह यात्रा इहलोक की उनकी अंतिम यात्रा थी। जनवरी 1968 में उन्हें दमा का तेज दौरा पड़ा। डॉक्टर के इलाज से दमा तो ठीक हुआ, लेकिन साँस की तकलीफ बनी रही। उस्ताद के बेटे मुनव्वर को अनहोनी की आशंका होने लगी तो उन्होंने पाकिस्तान से अपने सगे-संबंधियों को बुलवा लिया। 22 अप्रैल, 1968 को उस्ताद ने मुनव्वर से कहा—”अब केवल चौबीस घंटे बचे हैं, जब मैं तुम्हें तकलीफ दूँगा।’’ मुनव्वर ने कहा—”अब्बा! ऐसे मत बोलिए, अब तो आप ठीक हो रहे हैं!’’

23 अप्रैल, 1968 की सुबह मुर्गे ने बाँग दी तो उस्ताद ने मुनव्वर से कहा—”तुमने सुना? मुर्गा राग तोड़ी में बाँग दे रहा था!” फिर उन्होंने मुनव्वर की माँ को याद किया। इसके बाद उनकी साँस की डोर टूट गई। चार मीनार इलाके के ‘दायरा मीर मोमिन’ कब्रगाह में उन्हें दफना दिया गया।

बड़े गुलाम अली खान कई मामलों में बड़े थे। गायकी में तो बड़े थे ही, व्यक्ति के रूप में भी बहुत बड़े थे। अपने आस-पास के लोगों की मदद करते चलना उन्हें खूब आता था। जाति-धर्म से वे बहुत ऊपर उठे हुए थे। उन्हें कई बार पूछा जाता, टोका जाता कि ‘आप मुसलमान होकर भी हिन्दुओं के देवी-देवता के भजन क्यों गाते हैं?’ तो वे साफ-साफ कहते—’ईश्वर एक है।’’ उनके बहुचर्चित भजन ‘हरि ओम् तत् सत’ गाने के बारे में संगीत के किसी विद्वान ने उनसे पूछा—”खान साहब, आप इतने भावपूर्ण ढंग से हिन्दू भजन कैसे गा लेते हैं?” खान साहब ने आश्चर्य से पूछने वाले की ओर देखा और कहा—”ईश्वर, सत्य और हक़ एक ही हैं। मैं जिस समय ‘हरि ओम् तत् सत’ गाता हूँ, उस समय मेरे मन में अल्ला रहते हैं। भाषाएँ अलग-अलग हैं लेकिन अल्ला, खुदा, हरि सभी एक ही उस परम सत्ता के नाम हैं। अंग्रेज उनके लिए ‘गॉड’ शब्द का प्रयोग करते हैं, हिन्दू ‘परमात्मा’। सीधी सी बात है, पता नहीं लोग इसे क्यों नहीं समझते हैं?”

इसी तरह की एक घटना पाकिस्तान में घटी थी। खान साहब रेडियो-पाकिस्तान पर गाने को गए थे। देश विभाजन के बाद पाकिस्तान के आला अधिकारी संगीत और कला को भी विभाजित करने की कोशिश में लगे थे। वैसे ही एक अधिकारी ने उन रागों, ठुमरियों और दादरा को रेडियो पर प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया था, जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं के नाम थे। बड़े गुलाम अली खान साहब उस दिन जब ‘मियां की तोड़ी’ में ‘अब मोरी राम, राम री दइया’ गाकर निकले, उस अधिकारी ने कहा—”खान साहब! ये राम-राम क्या है? अब रहीम-करीम के बारे में सोचिए!”

अधिकारी की बात से बड़े गुलाम अली दु:खी हो गए। उन्होंने कहा—”आप परंपरा से चली आ रही रचना में हेर-फेर नहीं कर सकते। वे उसी तरह गाई जाएँगी, जैसी वे रची गई हैं। खैर, उसे भूल जाइए। अब मैं आपके रेडियो स्टेशन के लिए नही गाऊँगा। रेडियो-पाकिस्तान के पैनल से मेरा नाम निकाल दीजिए।’’

बड़े गुलाम अली जैसे सच्चे संगीत साधक के लिए ईश्वर और संगीत में कोई भेद नहीं था। वे कहा करते थे—”संगीत ही मेरा खुदा और संगीत ही मेरी नमाज है।“ जो आदमी संगीत को ही खुदा मानता हो उसके लिए राम-रहीम और कृष्ण-करीम में अंतर हो भी कैसे सकता था?

बड़े गुलाम अली स्वाभिमानी व्यक्ति थे। इसी वजह से उन्होंने किसी राजा के दरबार में नौकरी करने की बात नहीं सोची। जिन राजाओं और नवाबों से वे मिलते थे, बराबरी के स्तर पर मिलते थे। वे खुद को किसी जागीरदार से कम नहीं समझते थे। संगीत के इस जागीरदार का कहना था—”नवाबों की जागीरें हो सकती हैं, मेरी जागीर मेरा संगीत है। वे अपने साम्राज्य के मालिक हो सकते हैं, मैं अपनी सल्तनत का सुल्तान हूँ।’’

शास्त्रीय संगीत में लोग अक्सर किसी न किसी चमत्कार की चर्चा किया करते हैं। मियां तानसेन के ‘मल्हार’ गाने पर वर्षा होने और ‘दीपक’ गाने पर शरीर के जल उठने की बात लोग करते आ रहे हैं। ‘अपने युग के तानसेन’ बड़े गुलाम अली खान के बारे में भी इस तरह की कई बातें कही जाती हैं। एक बार लाहौर के निकट के किसी गाँव के चौधरी उन्हें मनाकर कार्यक्रम देने ले गए। जुलाई का महीना था। उन्होंने गाने के लिए ‘मियां मल्हार’ राग का चयन किया। उनके अंतरा गाते-गाते आकाश में काले-काले बादल घुमड़ आए और ठंडी-ठंडी फुहारें पडऩे लगीं। विलंबित के बाद वे द्रुत की बंदिश गाने लगे—”बिजली चमके, बरसे मेहर, आई लो बदरवा!” उस समय दो मोर पास के जंगल से आ गए और चबूतरे पर चढ़कर पंख फैलाकर नाचने लगे। बड़े गुलाम अली ने अपना गायन ज़ारी रखा और उनका तबलची मोर के नृत्य से मिलता-जुलता ताल बजाने लगा।

इसी तरह काबुल में कार्यक्रम देते हुए एक चमत्कार देखा गया था। जब खान साहब ज़हीर शाह के महल में गा रहे थे, एक सफेद कबूतर उड़कर आ गया और वह ध्यान लगाकर खान साहब का गाना सुनने लगा। फिर वह पंख फैलाकर धीरे-धीरे नाचने लगा।

बड़े गुलाम अली खान साहब को प्रकृति से बहुत प्रेम था। प्रकृति की चीजों को वे बड़े ध्यान से देखते थे और उनको अपने गायन में उतारते थे। जैसे कि किसी पार्क में या झील के किनारे या नदी के किनारे बैठकर सूर्यास्त देखकर या पक्षियों को उड़ते, चहकते, नाचते या कूदते देखकर उन्हें तानों की बुनावट सूझती थी। संगीत के कुछ गंभीर विद्वानों ने भी उनके इस गुण को लक्षित किया है। श्री एस.के. सक्सेना ने ऐसी दो घटनाओं का वर्णन किया है, जब प्रकृति में देखी-सुनी चीजों को खान साहब ने अपने तान में लाकर दिखलाया था। एक बार दिल्ली घराने के प्रसिद्ध गायक उस्ताद चाँद खान के घर बड़े गुलाम अली का कार्यक्रम चल रहा था। अचानक एक बिल्ली लोगों के बीच आ गई और थोड़ी देर में खुद वहाँ से चली गई। खान साहब ने भी बिल्ली का जाना देखा और अगले ही गायन में उन्होंने बिल्ली के जाने को तान के जरिए दिखला दिया।

दूसरी घटना भी दिल्ली की ही है। सुबह के एक कार्यक्रम में वे ‘भैरवी’ गा रहे थे। अचानक पास से गाड़ी का इंजन गुजरा, जिसकी तेज आवाज़ ने श्रोताओं को परेशान कर दिया। लेकिन तुरंत ही बड़े गुलाम अली साहब ने ठीक उसी आवाज़ को दिखलाते हुए जो तान लिया, उससे श्रोता दंग रह गए।

बड़े गुलाम अली खान साहब की शिष्या मालती गिलानी ने भी अपनी किताब में खान साहब की इस विशेषता को रेखांकित किया है। मालती गिलानी ने लिखा है कि खान साहब प्रकृति के मिजाज और अपने आस-पास की आवाज़ों से बहुत प्रभावित होते थे। बिजली का चमकना, बादलों का गरजना, वर्षा का होना आदि उनके अंदर जज्ब होता रहता था और गाते हुए तानों में वे बिजली की चमक ले आते थे तो गमक में बादलों की गडग़ड़ाहट!

बड़े गुलाम अली खान के बारे में एक सवाल बार-बार किया जाता है कि वे ठुमरी गायक के रूप में अच्छे थे या खयाल-गायक के रूप में? और जवाब यह है कि वे दोनों में अच्छे थे। यह अलग बात है कि बड़े गुलाम अली एक ही राग को घंटों गाते जाने में पुनरावृत्ति का खतरा देखते थे और छोटी-छोटी रचनाओं के द्वारा अपने गायन की चमक दिखला जाते थे ।  लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे खयाल के मामले में कमजोर थे। वे वास्तव में ‘चौमुखया गवैया’ थे। खयाल और ठुमरी तो वे गाते ही थे, दादरा और टप्पा भी गाते थे। ग़ज़ल और भजन गाते थे। तराना गाते थे, सबद गाते थे। सूफियाना कलाम गाते थे, पंजाबी लोकगीत गाते थे। गायन की किसी एक विधा के निकष पर उनको परखना किसी अन्याय से कम नहीं होगा।

बड़े गुलाम अली खान साहब के प्रिय राग थे—मालकौंस, विहाग, देश, भूपाली, जौनपुरी, भैरवी, दरबारी कान्हड़ा, यमन, बागेश्वरी आदि। उनकी गाई खूबसूरत ठुमरियों में से ‘बाजूबंद खुल-खुल जाए, (भैरवी) ‘का करूँ सजनी आए न बालम’ (जंगला भैरवी,) ‘प्रेम की मारे कटार’ (सोहनी,) ‘कंकर मार जगा गयो रे’ (पीलू,) ‘कटे न बिरहा की रात’ (पीलू,) ‘ना जा पी परदेस सजनवा’ (शिवरंजनी), तोरे नैनां जादू भरे’ (तिलंग), ‘रस के भरे तोरे नैन’ (भैरवी), ‘अब तो आवो साजना’ (पहाड़ी), ‘याद पिया की आए’ (मिश्र कौशिक ध्वनि) आदि ठुमरियाँ कालातीत की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। ‘हरि ओम तत् सत’ (पहाड़ी) जैसे भजन भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

‘सुगम संगीत के बादशाह’ कहे जाने वाले बड़े गुलाम अली, ‘मैलोडी के बादशाह’ भी कहे जाते हैं। ‘सबरंग’ नाम से सैकड़ों बंदिशें भी उन्होंने लिखी हैं। आज प्राय: सभी शास्त्रीय गायकों के हाथ में रहने वाले साज ‘सुरमंडल’ के हिन्दुस्तानी संगीत में प्रथम प्रयोग का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।

भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ (1962) और विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. (1964) अलंकरण से सम्मानित बड़े गुलाम अली खान के संगीत की विशेषता बतलाते हुए उनकी शिष्या मालती गिलानी ने कहा है कि ‘उनका संगीत इंद्रधनुष के समान था, जिसमें रोमांस, भाव और आध्यात्मिकता की छायाएँ लिपटी हुई थीं। संगीत की विदुषी सुशीला मिश्र ने तो बड़े गुलाम अली के बारे में यहाँ तक लिखा है कि ‘कौन जानता है, आगे आने वाली पीढ़ी उन्हें उसी तरह याद करे जिस तरह हम तानसेन को याद करते हैं!’

और संगीत विशेषज्ञ एस.के. सक्सेना सभी महत्त्वपूर्ण गायकों को ध्यान में रखकर कहते हैं, ”फैयाज खान के बाद हिन्दुस्तानी संगीत में कोई ऐसा गायक नहीं हुआ जिसे बड़े गुलाम अली से श्रेष्ठ कहा जा सके।’’ शायद एस.के. सक्सेना गलत नहीं कहते।

आदर्शवाद का ओवरडोज : संजीव ठाकुर

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित परशुराम शुक्ल की यह किताब एक शिक्षक दीनदयाल के आदर्श जीवन और उसके कर्म को दिखलाने का काम करती है। अपनी मेहनत और लगन से आई.ए.एस. बनने वाले दीनदयाल अपने सहयोगियों, अधिकारियों और नेताओें के भ्रष्टाचार से तंग आकर नौकरी छोड़ देते हैं और गाँव में जाकर मास्टरी करने लगते हैं। मास्टरी करते हुए ही वह जाति-पाति के खिलाफ काम करते हैं, गाँव को नशा-मुक्त करवाते हैं, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारते है, किसी साहूकार को ईमानदार बनाते है, प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम चलाते है। आगे चलकर वह आदिवासियों के बीच काम करते हैं और उनकी संगीत-मंडली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं। अपने कामों के कारण वह राष्ट्रपति से सम्मान पाते हैं तो आदिवासियों की संस्कृति पर किताब लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाते हैं यानी हर तरह की सफलता वह पाते हैं। सवाल उठता है कि एक साथ इतने-इतने काम करने वाले मास्टर दीनदयाल क्या असली पात्र हो सकते हैं? बच्चों को पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई इस किताब को नकलीपन बच्चों से भले ही छुपा रह जाए, लेकिन क्या वे इससे जुड़ाव महसूस कर पाएँगे? इससे प्रेरणा ग्रहण कर पाएँगे? क्या आदर्शवाद के इस ओवरडोज को वे पचा पाएँगे? सच्चाई तो यह है कि बच्चे वैसे ही पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं, जो उनके आस-पास के हों? उनके जैसे हों!

इस किताब के जरिए परशुराम शुक्ल ने ‘बाल धारावाहिक’नाम की एक ‘नई’ विधा को स्थापित करने का प्रयास किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया है। ‘बाल धारावाहिक’ को परिभाषित करते हुए भूमिका में उन्होंने लिखा है- ‘बाल धारावाहिक को एक विशिष्ट संरचना वाली ऐसी कहानी शृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी प्रत्येक कहानी अपने पीछे की कहानियों और आगे की कहानियों से स्वतंत्र होती है और संबद्ध भी!’ उनकी इसी परिभाषा के आधार पर इस किताब की परीक्षा करें तो हम पाएँगे कि इस ‘धारावाहिक’के कुछ अध्याय अन्य अध्यायों से सर्वथा स्वतंत्र हो गए हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ और ‘पश्चाताप के आँसू’ ऐसे ही दो अध्याय हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ तो एक लोककथा को परिवर्तित कर इस धारावाहिक में घुसा दिया गया है। इसको पढ़कर पाठक अचरज में पड़ सकते है कि किसी ठाकुर के सेवकों के द्वारा धकेलकर बाहर कर दिए गए दीनदयाल क्या वही दीनदयाल हैं, जो इतने बड़े-बड़े काम करते हैं? इसी तरह ‘पश्चाताप के आँसू’में बेचारे मास्टर दीनदयाल को जिस तरह आध्यात्मिक विषयों का प्रवचनकर्ता बना दिया गया है और किसी दूसरे कथावाचक की दुष्टता का शिकार दिखा दिया गया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल भी लगता है। और कोई गलत नहीं कि ऐसी अनर्गल बातें इस किताब में एक नहीं अनेक हैं।

इस किताब को पढ़कर जो सवाल सबसे अधिक मुखरता से सिर उठाता है वह यह कि क्या साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के पास अच्छी और बुरी चीज को परखने को कोई पैमाना नहीं है? इस स्तरहीन किताब को छपवाकर साहित्य अकादेमी हिन्दी के व्यापक पाठक-वर्ग को आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

पुस्तक: मास्टर दीनदयाल, परशुराम शुक्ल

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 60  रुपये

संजीव ठाकुर की बाल कवि‍ताएं

sanjeev-thakur

संजीव ठाकुर

ताल

पंखा चलता हन-हन–हन
हवा निकलती सन-सन–सन।

टिक-टिक–टिक–टिक चले घड़ी
ठक-ठक–ठक–ठक करे छड़ी।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप
आँधी आती हिप–हिप –हिप।

फू–फू–फू फुफकारे नाग
धू–धू–धू जल जाए आग।

कोयल बोले कुहू-कुहू
पपीहा बोले पिऊ-पिऊ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल
लहर–लहर लहराए बाल ।san

मुश्किल हो गई

पापा जी की टांग टूट गई
अब तो भाई मुश्किल हो गई!
कौन मुझे नहलाएगा ?
विद्यालय पहुंचाएगा ?
सुबह की सैर कराएगा ?
रातों को टहलाएगा ?
चिप्स –कुरकुरे लाएगा ?
कोल्ड –ड्रिंक पिलवाएगा ?
आइसक्रीम खिलाएगा ?
मार्केट ले जाएगा ?

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी
एक छीन ली पापा से
एक झटक ली मामा से
मम्मी ने अपने हिस्से की
दे दी उसको एक पकौड़ी !

फिर आई उसकी थाली
जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी
प्याज और आलू वाली
उसने न दी एक किसी को
खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

कौआ काका

कौआ काका क्या कहते हो
आएँगी मेरी नानी ?
सोच मिठाई की बातें
मुँह में भर आया पानी ।

न जाने क्या–क्या लेकर
आएँगी मेरी नानी
मैं तो तुमको एक न दूँगा
मुझे नहीं बनना दानी !

लेकिन काले कौए काका
अगर नहीं आईं नानी
कौन मुझे दिलवाएगा
प्यारी सी गुड़िया रानी

इस जाड़े को …

इस जाड़े को दूर भगाओ
सूरज भैया जल्दी आओ !

जाड़े में देखो तो कोयल
भूल गई गाना
चिड़ियों के बच्चों ने मुँह में
न डाला दाना !सूरज भैया आओ
थोड़ी गर्मी ले आओ
और हमारे साथ बैठकर
पिज्जा–बर्गर खाओ !साथ रहोगे तो जाड़े की
दाल रहेगी कच्ची
दादी का तो हाल बुरा है
हो जाएगी अच्छी !

गर्मी आ जाए तो चाहे
आसमान में जाना
जाड़े के मौसम में लेकिन
वापस आ जाना

बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र

मिट्ठू : संजीव ठाकुर

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स्कूल से आकर, खाना खाकर रोज की तरह श्रुति बालकनी में खड़ी हो गई थी। उसकी मम्मी किचन में काम कर रही थीं। तभी कहीं से आकर एक तोता रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति उसे देख बहुत खुश हुई। उसने उसे पकडऩा चाहा, मगर वह उड़ गया और दो मिनट बाद फिर आकर रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति ने समझा, ‘जरूर इसे भूख लगी है।‘ वह किचन के अंदर गई और फ्रिज से ब्रेड का टुकड़ा निकालकर ले आई। मम्मी पूछती रह गईं कि ‘क्या ले जा रही हो?’ लेकिन उसने नहीं बताया। मम्मी उसका पीछा करते-करते बालकनी तक आ गईं। मम्मी के आते ही तोता उड़कर चला गया।

श्रुति नाराज हो गई, ”आप क्यों आ गईं? मेरा तोता उड़कर चला गया। मैं उसके लिए ब्रेड लाई थी।’’

”बेटा! तोतों को ब्रेड ज्यादा पसंद नहीं है। उन्हें तो भिगोए चने पसंद हैं और हरी मिर्चें पसंद हैं।’’ मम्मी ने समझाना चाहा।

”तो ठीक है, मैं हरी मिर्च ही ले आती हूँ।’’ श्रुति ने कहा और फ्रिज खोलकर हरी मिर्च ले आई। लेकिन तोता दुबारा नहीं आया। निराश होकर श्रुति सो गई।

अगले दिन फिर जब श्रुति स्कूल से आकर, खाना खाकर बालकनी में खड़ी थी, तोता फिर आ पहुँचा। श्रुति खुश हो गई। बोली, ”आओ, तोता, आओ! मैं तुम्हारे लिए मिर्च लाती हूँ।’’

वह मिर्च ले आई। तोता उसे खाने लगा। श्रुति को देखकर बहुत मजा आ रहा था। वह सोच रही थी, ”अब इसे मिर्च लगेगी और यह ‘आह! आह!’ करने लगेगा।‘’ लेकिन पूरी मिर्च खाने के बाद भी तोता निश्चिंत बैठा रहा।

श्रुति मम्मी को यह बात बताना चाहती थी इसलिए वह अंदर गई। तोते के मिर्च खाने की बात बताई और कहा, ”मम्मी! कल थोड़े चने भिगो देना? मैं तोते को दूँगी!’’

”ठीक है।’’ कहकर मम्मी उसे सोने को ले गई। सोते समय वह तोते की ही बात करना चाहती थी। उसे लग रहा था कि तोते का भी कोई नाम होना चाहिए। पता नहीं उसके मम्मी-पापा ने उसका क्या नाम रखा होगा? उसने अपनी मम्मी से यह बात पूछी। मम्मी ने बताया, ”इसका नाम मिट्ठू है।’’

”अच्छा! बड़ा प्यारा नाम है! आपको कैसे पता चला?’’ श्रुति ने कहा।

”बेटे! सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही हुआ करते हैं।… अब सो जाओ।’’

श्रुति की समझ में नहीं आया कि सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही क्यों होते हैं? लेकिन उसे यह नाम पसंद आया था।

अब वह रोज मिट्ठू की प्रतीक्षा करती। उसके लिए चना-मिर्च एक कटोरे में लेकर बाहर खड़ी रहती। एक दूसरे कटोरे में पानी भी रख लेती। मिट्ठू रोज आता। उछलता, कूदता। मिर्च खाता, पानी पीता और फुर्र हो जाता। अब वह श्रुति के कंधे पर भी चढ़कर बैठ जाता, कभी उसकी हथेली पर भी। लेकिन जैसे ही वह उसे पकडऩा चाहती, वह उड़ जाता।

मम्मी श्रुति के रोज-रोज के इस खेल से ऊबतीं। उसे जल्दी सोने को कहतीं। श्रुति को सोना अच्छा नहीं लगता—मिट्ठू के साथ खेलना अच्छा लगता था। उसने एक उपाय निकाल लिया। मम्मी के साथ वह बिस्तर पर चली जाती और आँखें मूँदकर सोने का नाटक करती। जब उसकी मम्मी सो जातीं तो उठकर बालकनी में चली जाती, और मिट्ठू के साथ खेलती।

एक दिन इसी तरह मम्मी को सुलाकर जब वह बालकनी में गई तो मिट्ठू नहीं आया। वह सोने चली गई। अगले दिन भी वह नहीं आया। उसके अगले दिन भी नहीं। कई दिनों तक वह नहीं आया तो श्रुति परेशान हो गई।

एक दिन मम्मी की डाँट की परवाह न कर उसने पूछ ही लिया, ”मम्मी! अब मिट्ठू क्यों नहीं आता?’’

”तुम्हें कैसे पता कि नहीं आता है? तुम तो सो जाती हो? वह आता होगा।’’

”नहीं मम्मा! मैं तो रोज मिट्ठू से मिलती थी। तुम्हारे सोने के बाद वह आता था।’’

”तो ठीक ही है, नहीं आता है। अब कम-से-कम तुम ठीक से सोओगी तो?’’

”मगर मम्मी, वह आता क्यों नहीं?’’

”क्या पता बेटे?….हो सकता है किसी बहेलिये ने उसे पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया हो? बाजार में बेच दिया हो?’’

”ये बहेलिया क्या होता है, मम्मा?’’

”बेटे! बहेलिया पक्षियों को पकडऩे वाला होता है।’’

”वो तो बहुत खराब आदमी होता है मम्मा!’’

आज सोते समय श्रुति सोच रही थी कि कहीं से उसके पास सचमुच की कोई बंदूक आ जाती तो वह बहेलियों को उसी तरह गोली मार देती, जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है!….पता नहीं उसका मिट्ठू कहाँ चला गया?

बाल मंदिर के पुजारी गिजुभाई : संजीव ठाकुर

15.11.1885-23.06.1939

15.11.1885-23.06.1939

बच्चों के लालन-पालन, विकास और शिक्षा की चिंता करने वाले लोग पूरी दुनिया में हुए हैं। प्रायः सभी ने शिक्षा आदि के प्रचलित तरीकों का विरोध किया है और बच्चों की आजादी की वकालत की है। अपने देश में जिन लोगों ने इस दिशा में चिंतन-मनन किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, अरविन्द घोष, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जाकिर हुसैन, डॉ. अम्बेडकर आदि का नाम ससम्मान लिया जाता है। इस क्षेत्र के नामों में से एक नाम जो इनसे कम महत्त्व का नहीं है, अक्सर लोगों की जुबाँ पर आने से रह जाता है। अक्सर भुला दिया जाने वाला वह नाम है, गुजरात के शिक्षा शास्त्री गिजुभाई का। सच्चाई तो यह है कि काफी अरसे तक लोगों को इस नाम का पता ही नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने और गुजराती में दो सौ से अधिक पुस्तकें लिखने के बावजूद गिजुभाई को गुजरात से बाहर जानने वाले कम ही लोग थे। यह तथ्य तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगता है, जब हमें यह जानने को मिलता है कि गिजुभाई की महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक ‘दिवास्वप्न’ का हिन्दी अनुवाद 1932 में ही हो चुका था।

गिजुभाई के काम को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली दबा सकता है। एक अकेला शख्स! न कोई सरकारी सहायता। न कोई अनुदान! बस अपनी लगन और बच्चों के प्रति लगाव के बल पर वह काम कर डाला, जो किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए भी संभव नहीं है। बच्चों के बीच काम करने के साथ-साथ लेखन के लिए समय निकालना और किसी लेखक से अधिक लिख जाना, इसके अलावा माता-पिता और शिक्षकों के लिए पत्रिका निकालना गिजुभाई जैसे समर्पित और परिश्रमी व्यक्ति के लिए ही संभव था। शुरू में गिजुभाई ने भी कहाँ सोचा था कि उन्हें शिक्षा की दिशा में जाना है? उन्होंने तो वकालत की पढ़ाई की थी और वकालत का पेशा अपनाया था। लेकिन उनकी दिशा बदल गई। उनकी दिशा बदलने का काम किया एक पुस्तक ने जो उन्हें एक मित्र ने पढ़ने को दी थी। ‘मोंटेसरी मदर’  नाम की इस पुस्तक के बारे में स्वयं गिजुभाई ने लिखा है- ‘अगर मुझको किसी ने पहले ही सावधान कर दिया होता कि ‘मोंटेसरी मदर’ नामक पुस्तक पढने से मेरी जीवन-धारा ही बदल जाएगी, जीवन एक नए प्रकाश से जगमगा उठेगा और मुझको एक नई क्रांतिकारी दृष्टि प्राप्त हो जाएगी, तो मेरे जैसा एक वकील इस पुस्तक को अपने हाथ में थामता या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।’ (‘बाल शिक्षण: जैसा मैं समझ पाया’, पृ. 17)

और गिजुभाई केस की वकालत छोड़ बच्चों की वकालत करने लगे, बच्चों के बहुत बड़े वकील बन गए! उन्होंने न केवल बच्चों की आजादी की वकालत की, बल्कि बच्चों को सिखाने-पढ़ाने की परंपरागत पद्धतियों पर भी प्रहार किया और शिक्षा का एक ऐसा मॉडल विकसित कर समाज के सामने रखा कि जिसे अपनाकर समाज बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण तो उपलब्ध करा ही सकता है, प्रताडना और मानसिक दबाव से निजात भी दिला सकता है।

गिजुभाई बच्चों से प्रेम करते थे। वे चाहते थे कि माता-पिता और शिक्षक भी सही मायनों में बच्चों से प्रेम करें। माता-पिता और शिक्षक बालकों के लिए भयहीन माहौल बनाएँ। बिना डाँट-डपट के, बिना मार-पिटाई के उनकी परवरिश करें। उन्हें शिक्षित करें। घर और विद्यालयों को बालकों के सृजनात्मक विकास में बाधक जानकर गिजुभाई बहुत चिंतित होते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘घर और विद्यालय ऐसे स्थल हैं, जहाँ बालकों की सृजनशीलता का सहज स्वाभाविक रीति से विकास होता है और यही वे स्थल हैं, जहाँ उनके सृजन को रोकने, विकृत करने अथवा निर्मूल करने का काम होता है।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, पृ.18)

बच्चों के विकास में सबसे बड़ा बाधक गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट, दंड वगैरह है। गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट या दंड देकर किसी बच्चे को पढ़ाया-लिखाया नहीं जा सकता। ‘अगर ऐसा करने से बालकों की बुद्धि बढ़ सकती हो तो किसी भी बेवकूफ को मारपीट कर बुद्धिमान बना सकते हैं।’ (प्राथमिक शाला में शिक्षक, पृ. 55)

गिजुभाई तो बच्चों को स्वतंत्र वातावरण में रखना और शिक्षित करना चाहते थे। दंड, पुरस्कार, लोभ, लालच से दूर रखकर सच्ची स्वतंत्रता देना चाहते थे। निश्चय ही गिजुभाई के इस स्वतंत्रता-सिद्धांत से स्वतंत्र नागरिक को तैयार किया जा सकता है। लेकिन इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक ले जाने के पक्ष में गिजुभाई नहीं थे। वे यह तो चाहते थे कि बच्चे अपने शरीर से, मन से, आत्मा से स्वतंत्र हों, लेकिन समाज के नियम-कायदे को तोड़कर, सामाजिक परिवेश की उपेक्षा कर गाली-गलौच, मार-पीट करने जैसी आजादी हासिल करना चाहें तो उन्हें ऐसी आजादी न देने के पक्ष में भी गिजुभाई थे। हाँ, बच्चों को स्वनिर्णय लेने और स्वावलंबन की ओर बढ़ाने में गिजुभाई हमेशा आगे रहते थे। उनका तो यह मानना था कि जो बच्चे बड़ों से हर काम पूछकर करते हैं, उन्हें दरअसल रोकने की जरूरत है।

बच्चों को स्वावलंबी बनाने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए गिजुभाई ने यह जरूरी समझा था कि बच्चे छोटे-मोटे काम खुद करें। नहाना, खाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कंघी करना, ऐसे ही काम थे। अपनी शाला में तो गिजुभाई बच्चों से ये काम करवाते ही थे, माता-पिता को भी प्रेरित करते थे कि वे उन्हें ऐसे काम करने से न रोकें।

गिजुभाई बच्चों को पल-पल पिलाए जाते उपदेशों से भी बहुत आहत होते थे। उनका मानना था कि ऐसे उपदेशों से बच्चों का विकास कतई नहीं होता।

गिजुभाई का चिंतन और लेखन बहुआयामी था। एक ओर उन्होंने माँ-बाप को बच्चों के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किताबें लिखीं तो दूसरी ओर शिक्षकों को ‘शिक्षित’ करने के लिए। बच्चों को भाषा-व्याकरण कैसे सिखाएँ? गणित को आसान तरीके से कैसे बतलाएँ? बच्चों को कथा-कहानी क्यों कहें? शिक्षा में चित्रकला, संगीत, कारीगरी को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दें? इन सब पर गिजुभाई ने विस्तार से अपनी कलम चलाई है। इन सब के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियाँ भी लिखी हैं। इन कहानियों के जरिये उन्होंने बच्चों को अलग-अलग तरह की बातें सिखाने का काम किया ही था, कक्षा में बच्चों का मन लगाने का काम भी किया था। खेल-कूद, संगीत, घुमक्कड़ी आदि को अपने विद्यालय में शामिल कर गिजुभाई ने एक ऐसा स्नेहिल वातावरण तैयार किया था कि बच्चे अपने घर ही नहीं जाना चाहते थे। क्या आज ऐसे किसी स्कूल की कल्पना की जा सकती है, जहाँ से बच्चे घर ही नहीं जाना चाहें? ऐसा तो तभी संभव हो सकता है न, जब बच्चों को रोका-टोका न जाए, जबरन ‘ज्ञानी’ न बनाया जाए, उनको अपने मन का काम करने की छूट दी जाए, पढ़ाने की पद्धति अनौपचारिक हो, शिक्षक हाथ में बेंत लेकर चलने के बदले प्यार की छड़ी से काम लें?

अपनी पुस्तक ‘प्राथमिक शाला में शिक्षक’ में गिजुभाई ने विस्तार से लिखा है कि उनके विद्यालय में क्या होना जरूरी है और क्या होना जरूरी नहीं है? इसे पढ़कर पता चलता है कि गिजुभाई कितने मुक्त विद्यालय की चाह रखते थे?

गिजुभाई ने बच्चों का सम्मान किया था, उन्हें प्रेम किया था। इसीलिए उनका ‘बाल मंदिर’ वास्तव में बच्चों की पूजा का स्थान बन सका था और वे शिक्षक न रहकर बच्चों के लिए ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके थे। शिक्षाविद् मधुरी देसाई ने गिजुभाई के व्यक्तित्व के उस पहलू पर गौर करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘गिजुभाई ने माँ जैसी सूक्ष्म दृष्टि और ममता भरी नजरों से बालकों को देखा था और उनके व्यक्तित्व को सजगतापूर्वक विकसित करने का प्रयत्न किया था। सघन मूँछों वाला प्रभावशाली स्वरूप होते हुए भी गिजुभाई बालकों के समीप आ सके और उनका विश्वास पा सके, तभी वे ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके।’ (प्राथमिक शाला में चिट्ठी वाचन, भूमिका)

परंपरागत विद्यालयों में गिजुभाई को बहुत सी बुराइयाँ नजर आती थीं। सजा देना तो एक बुराई थी ही, बालकों को गलत ढंग से पढ़ाना, रटाना, पुरस्कार या लालच देकर कोई काम कराना भी उनकी दृष्टि में बड़ी बुराई थी। इसी तरह गृहकार्य का बोझ देने वाले स्कूल भी उन्हें तनिक न सुहाते थे। गृहकार्य में लगे बच्चों को देखकर गिजुभाई काँप-काँप जाते थे। गृहकार्य बच्चों के लिए उन्हें एक ‘त्रास’ नजर आता था। इतने घंटे पाठशाला में बिताकर आने के बाद गृहकार्य से जूझते बच्चों को देखकर उन्हें दुख होता था। गृहकार्य को वे बच्चों के लिए नुकसानदेह ही मानते थे।

गिजुभाई को बालकों के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ थी। वे शिक्षकों से भी बाल-मनोविज्ञान की समझ की अपेक्षा रखते थे। वे चाहते थे कि शिक्षक हर बात पर बच्चों को रोकें-टोकें नहीं। न ही बच्चों को ‘बेहूदा, आलसी, लापरवाह, ठग, निकम्मा’ आदि कहें। बच्चों पर इन शब्दों से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षक बच्चों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें।

शिक्षा के एक अनिवार्य अंग- परीक्षा को गिजुभाई गैर जरूरी समझते थे। विद्यालयों में ली जाने वाली परीक्षाओं को वे एक ओर मिथ्याभिमान और दूसरी ओर निराशा का जनक मानते थे। परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों में अभिमान का भाव और बुरे अंक लाने वालों में निराशा का भाव देखकर उन्हें निराशा होती थी। विद्यालयों के साथ-साथ घरों में भी तरह-तरह की परीक्षाओं से गुजरते बच्चों को देखकर गिजुभाई को अच्छा नहीं लगता था। दूसरों के हिसाब से ही अपनी जिंदगी जीने का आदी होता आदमी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने लिखा है- ‘परीक्षा शाला में ही नहीं चलती, हमारे घरों में भी तरह-तरह की स्पष्ट-अस्पष्ट परीक्षाएँ चलती हैं। यही कारण है कि आज का मनुष्य अपने भीतर का नहीं रहा, बाहर का बन गया। स्वयं अपने लिए जीने की बजाय बाहर के लिए जीता है। …बाह्य पैमाने पर स्वयं को मापता है और इसी में संतोष एवं सार्थकता का अनुभव करता है। संक्षेप में, वह अपने भीतर से मरकर यानी अपनी आत्मा से मरकर बाहर से यानी शरीर से जीता है।’ (शिक्षक हों तो, पृ. 117)

जाहिर है, मरी हुई आत्मा का मनुष्य मरी हुई जिंदगी ही जिएगा,  मरे हुए समाज का निर्माण ही करेगा। हताशा, कुंठा, अवसाद जैसी मानसिक व्याधियाँ उसे चारों ओर से जकड़ लेंगी।

गिजुभाई बुद्धि की जगह हृदय को महत्त्व देते थे। वे चाहते थे कि बच्चों की बुद्धि से पहले उनके हृदय का विकास हो। ‘क्योंकि अगर मनुष्य का हृदय विकसित हो गया तो उसकी बुद्धि उसे सन्मार्ग पर ले जाएगी।’ इसके लिए वे शिक्षा में संगीत, कला, नाटक, कारीगरी आदि को शामिल करना जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि ‘संगीत व चित्रकला का ज्ञान प्राप्त करने वाला बालक स्पर्धा, द्वेष, क्लेष-तकरार या मारपीट नहीं करेंगे, अपितु वे सौंदर्य के सात्त्विक उपासक बनेंगे। सौंदर्य की सात्त्विक उपासना ने दुनिया में कभी किसी का अहित नहीं किया।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, प्रस्तावना)

गिजुभाई के चिंतन पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को जानने-समझने के बाद हमें यह लगता है कि गिजुभाई ने विदेश के कई शिक्षाशास्त्रियों के साहित्य का अध्ययन-विश्लेषण किया था। और मधुमक्खी की तरह अनेक जगहों से मधु का संचयन कर अपने जीवन में उतारा था। मारिया मोंटेसरी तो उनकी आदर्श ही थीं। इनके अलावा ए.एस. नील, पेस्तालॉजी और प्रोबले के विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया था। लेकिन उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों का अंधानुकरण नहीं किया था। उन्होंने स्वविवेक, स्वानुभव और स्वप्रयोग से भी बहुत कुछ अर्जित किया था। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को भारतीय परिवेश के हिसाब से ही धारण किया था।

गिजुभाई गुजरात के भावनगर में उस समय अपने शिक्षा-संबंधी प्रयोग कर रहे थे, जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। गिजुभाई का काम प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप में ही इस लड़ाई में योगदान तो दे ही रहा था। आजाद बच्चों को तैयार कर प्रकारांतर से वे आजाद देश और आजाद दुनिया ही तो तैयार कर रहे थे। और फिर समय-समय पर वे सीधी तरह आजादी की लड़ाई में शरीक भी तो होते थे। 1930 ईस्वी में बारडोली-सत्याग्रह में शामिल किसानों के बीच वे अपने बच्चों के साथ गए थे। किसानों के छोटे-छोटे बच्चों को एकत्र कर वे उन्हें नहलाते-धुलाते थे, खेलाते थे, गीत-कहानी सुनाते थे, लिखना-पढ़ना सिखाते थे। क्या यह आजादी के आंदोलन में उनका योगदान नहीं था? उन्होंने बच्चों की वानरी सेना बनाकर गाँव-गाँव जाने, प्रभातफेरी निकालने, शराब के ठेकों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग करने का काम भी खूब किया था। तभी तो उनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने लिखा था- ‘गिजुभाई के बारे में कुछ लिखने वाला मैं कौन हूँ? उनके कार्यों ने तो मुझे सदैव मुग्ध किया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनका कार्य आगे बढ़ चलेगा।’ (‘विश्व के शिक्षाशास्त्री’, पृ. 321)

शिक्षा और बच्चों के समुचित विकास की दिशा में गिजुभाई का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। गिजुभाई के विचारों को शिक्षकों तक पहुँचाने हेतु इन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनकी ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक तो सभी शिक्षकों और माता-पिता को निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए। गिजुभाई जैसे शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को अपनाकर शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व के महान् शिक्षाशास्त्रियों की पंक्ति में ससम्मान रखे जाने योग्य गिजुभाई को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जन्म 15 नवंबर 1885 को भावनगर रियासत के चित्तल गाँव में हुआ था और मृत्यु बम्बई में 23 जून 1939 को। उनका पूरा नाम गिरजाशंकर बधेका था। पिता भगवान जी बधेका वकील थे। 12 वर्ष की उम्र में गिजुभाई का विवाह हरिबेन के साथ हो गया था। दुर्भाग्यवश हरिबेन की मृत्यु हो गई। हरिबेन की मृत्यु के बाद 1906 में जड़ीबेन के साथ उनका द्वितीय विवाह हुआ। 1907 में वे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा पर गए थे और 1909 में भारत लौट आए थे। 1910 में बंबई में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की थी और 1913 में हाई कोर्ट में प्लीडर हो गए थे। 1915 में वे शैक्षणिक संस्था ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ के कानूनी सलाहकार बने थे। 1916 से वे दक्षिणामूर्ति में अध्यापन का कार्य करने लगे थे। 1920 में उन्होंने ढाई से पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भावनगर की तख्तेश्वर टेकरी पर ‘बाल मंदिर’ की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन कस्तूरबा गाँधी ने किया था। इस ‘बाल मंदिर’ में बच्चों को वास्तव में मंदिर के देवता की तरह रखा जाता था। 1936 में गिजुभाई ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ से मुक्त हो गए थे। इसी वर्ष कराची में आयोजित बाल मेले में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिरकत की थी। 1938 में राजकोट में उन्होंने एक ‘अध्यापन मंदिर’ की स्थापना की थी। यह उनका अंतिम महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

गिजुभाई ने गुजराती में करीब 225 पुस्तकें लिखी हैं। ‘दिवास्वप्न’, ‘माता-पिता से’, ‘शिक्षक हों तो’, ‘मोंटेसरी पद्धति’, ‘प्राथमिक शाला में शिक्षा-पद्धतियाँ,’ ‘प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा’, ‘चलते-फिरते’ आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘चोर मचाए शोर’, ‘चूहा सात मूँछों वाला’, ‘मुनिया रानी’, ‘नकल बिन अकल’, ‘खड़बड़-खड़बड़’, ‘मेंढक और गिलहरी’, आदि गिजुभाई की पुस्तकें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध हैं। इन कथाओं के जरिये उन्होंने बच्चों को ही नहीं, माता-पिता और शिक्षकों को भी शिक्षित करने का काम किया है।

गिजुभाई की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी बच्चों के माता-पिता और शिक्षक ‘शिक्षित’ हो पाए हैं या नहीं, यह सवाल आज भी उतना ही मौजूँ है। और शायद इसीलिए गिजुभाई की ये पंक्तियाँ भी आज उतनी ही मौजूँ हैं-

‘जब तक बालक घरों में मार खाते हैं
और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय,
बाग-बगीचे और क्रीड़ांगण न बनें
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?’

संजीव ठाकुर  की बाल कवि‍ताएं

रोते रहते

रोंदूमल जी रोंदूमल
रोते रहते रोंदूमल
बात कोई हो या न हो
बस रोएँगे रोंदूमल !

मम्मी ने कॉफी न दी
पापा ने टॉफी न दी
फिर तो बात बतंगड़ कर
रोएँगे ही रोंदूमल !

किसी से मुँह की खाएँगे
चाहे खुद धकियाएंगे
अपने मन की न कर पाए
तो रोएँगे रोंदूमल !

जा छुपते

चोर एक न उनसे भागे
भौंक –भौंक कर कुत्ते हारे
बच्चों को तो खूब डरा दें
क्योंकि वे होते बेचारे !

गली–मुहल्ले के कुत्ते
होते हैं बीमार
सड़ी-गली चीजें ही हरदम
वो खाते हैं यार !

घर में पलने वाले कुत्ते
ऐयाशी करते
ए सी में सोते हैं
नाज़ों –नखरों में पलते !

चोर देखकर उनकी भी
सिट्टी होती गुम
जा छुपते मालिक के पीछे
नीचे करके दुम !

बहुत मजा आता है

जाड़े की गुनगुनी धूप में
पैर पसारे लेटे
या फिर खाते मूँगफली के
दाने बैठे–बैठे
बहुत मजा आता है भाई 
बहुत मजा आता है !

मक्के की रोटी पर थोड़ा
साग सरसों का लेकर
या फिर गज़क करारे वाले
थोड़ा–थोड़ा खाकर
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

औ अलाव के चारों ओर
बैठे गप–शप करते
बुद्धन काका के किस्से
लंबे–लंबे सुनते
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

गधे का गाना

गधे ने गाया गाना
उल्लू ने पहचाना
बंदर ने उसे माना
मेंढक हुआ दीवाना ।

कोयल ने मारा ताना–
‘तुझे न म्यूजिक आना ‘
गधे को फर्क पड़ा न
गाता रह गया गाना !

चलो चलें हम मॉल

हम जाएंगे शिप्रा मॉल
कोकू ! रख दो अपनी बॉल

रिक्शे से हम जाएंगे
मैक्डोनल्ड में खाएंगेचलने वाली सीढ़ी पर
हम तुम चढ़ते जाएंगे
अंदर मिलती आइसक्रीम
दोनों जमकर खाएंगे ।चम-चम करती दुकानों से
मैं ले लूँगी सुंदर ड्रेस
ले लेना तुम दो–एक गाड़ी
खूब लगाना फिर तुम रेस ।कोकू ! जल्द सँवारो बाल
हम चल रहे शिप्रा मॉल !

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा
अब कैसे नहलाओगी ?
क्या चावल धो पाओगी ?
दाल कहाँ से लाओगी ?
झाड़ू–पोंछा, बर्तन कपड़े
तुम कैसे कर पाओगी ?
सूख रहे जो पौधे बाहर
उनका क्या कर पाओगी ?
कहीं आ गया कोई घर पर
उनको क्या दे पाओगी ?
कितनी बार कहा पापा ने
बात कभी न मानोगी
हो जाएगी खाली टंकी
तब जाकर पछताओगी !

बाहर जाकर खेलो

खेल रहा है बाहर पिंटू
तुम भी घर से निकलो चिंटू !बाहर जाओ, दौड़ो, कूदो
क्या टी॰ वी से चिपके हो ?
कंप्यूटर से खेल रहे तुम
पके आम से पिचके हो !
बाहर खेल रहे हैं बच्चे
तुम उन सबसे छिपके हो ?बाहर जाकर खेलो चिंटू
बाहर खेल रहा है पिंटू !

मुझे सुहाता

मुझे सुहाता मेरी अम्मा
दीपों का त्योहार
अंधकार का दुश्मन होता
दीपों का त्योहार ।

लोग जलाते हैं दीये
घर में और गली में
तरह–तरह बल्ब लगते
घर में और गली में

‘दीपावली मुबारक हो ‘
सब कहते हैं सबको
‘आओ एक मिठाई खा लो ‘
सब कहते हैं सबको !

बस फट–फट आवाज़ पटाखों की
न सुहाती मुझको
बारूद की दुर्गंध ज़रा भी
नहीं सुहाती मुझको !