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अच्‍छी रचना मानव के पक्ष में खड़ी होती है : विश्‍वनाथ त्रिपाठी

नई दिल्‍ली : किताबघर प्रकाशन के संस्‍थापक पंडित जगतराम आर्य के जन्मदिवस 16 दिसंबर को ‘आर्य स्मृति साहित्य समारोह: 2012’ का आयोजन किया गया। इस बार की सम्मान-शृंखला-19 में उपन्यास की पांडुलिपि आमंत्रित की गई थीं। पुरस्कार की घोषित राशि इकतीस हजार रुपये थी और लेखक की निर्धारित आयु सीमा 40 वर्ष थी। संयोगवश, पांडुलिपियों की संख्‍या सीमित रही तथा सम्मान योग्य पांडुलिपि की भी अनुपस्थिति रही। संयोजक तथा परामर्शदाता के अनुसार यह निर्णय लिया गया कि स्तरीय पांडुलिपि के अभाव में यह सम्मान प्रदान न किया जाए। साथ ही, इस बार ‘आलेख पुरस्कार’ की एक अतिरिक्त घोषणा भी की गई थी। किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किए जा रहे बहुखंडीय बृहद् किशोर उपन्यास ‘गुल्लू और एक सतरंगी’ (लेखक : श्रीनिवास वत्स) के खंड-1 पर समीक्षात्मक आलेख लिखने वाले दो प्रतिभागियों को घोषित राशि 5100/- रुपये के लिए सम्मानित किया जाना था। आलेखकार अजितकुमार तथा डॉ. विजयकुमार महांति को यह सम्मान देने की घोषणा हुई थी। व्यक्तिगत तथा अपरिहार्य कारणों से दोनों विजेता समारोह में उपस्थित न हो सके।

साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सभागार में हिन्‍दी के विख्यात सर्जक-आलोचक डॉ. विश्‍वनाथ त्रिपाठी की अध्यक्षता में समारोह आरंभ हुआ। संगोष्ठी का संचालक युवा आलोचक पल्लव ने किया।

‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के संयोजक और किताबघर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत ने संयोजकीय वक्तव्य में समारोह के वक्ताओं तथा साहित्यिक समाज से अनुरोध किया कि इस तथ्य की जाँच की जानी चाहिए कि क्या इधर हिन्‍दी में उपन्यास लेखन की स्थिति में कुछ ठहराव या बदलावों के संकेत उभर रहे हैं।

आलोचक पल्लव ने संगोष्ठी के केंद्रीय विषय ‘उपन्यास का प्रदेश’ पर चर्चा करते हुए कहा कि आज हिन्‍दी उपन्यास की विधागत अंतर्प्रक्रियाएं कई विधाओं में आ-जा रही हैं और इससे उपन्यास की पारम्‍परिक लेखन प्रविधि में कुछ नया जुड़ता प्रतीत हो रहा है। काशीनाथ सिंह ने ‘काशी का अस्सी’ में जिस शिल्पविधि को अपनाया है, वह विचारणीय है कि उस कृति को उपन्यास के खाँचे-ढाँचे में देखा जाए या नहीं। यह भी कि ‘शेखर: एक जीवनी’ या ‘मैला आंचल’ के जैसा शास्त्रीय रूप इधर के उपन्यास-लेखन में देखने को नहीं मिल रहा है। इसी प्रसंग में उन्होंने चित्रा मुद्गल के प्रकाशित उपन्यासों का संदर्भ देते हुए बताया कि उनके प्रत्येक उपन्यास की जमीन नई और लिखने की तकनीक भी भिन्न है। इस प्रकार के लेखकीय योगदान से विधा की विकासमान धारा हमारे सामने आती है और उपन्यास की सोद्देश्यता का क्षेत्र व्यापक होता है।

प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल ने कहा कि हाँ, विधाओं की एक-दूसरे के मध्य आवाजाही हुई है। मगर कौन-सी कृति किस विधा में स्थित है, यह प्रायः आलोचक तय कर रहे हैं। उपन्यास अपने समय और देशकाल का गहरा आख्यान होता है। मगर कुछ कृतियों को ‘उपन्यास’ सिद्ध कर देने की हड़बड़ी इधर आलोचकों में बढ़ी है। यह उचित है कि पितामह की धोती की तरह का परिवेश हम छोड़ रहे हैं, मगर पौधे को जड़ों से उखाड़ना उचित नहीं है। कुछ दशकों पूर्व लम्‍बी कहानी लेखन की परम्‍परा अस्तित्व में थी। देखते-देखते उन्हें लघु उपन्यास, फिर उपन्यासिका और अंत में ‘उपन्यास’ ही कहा जाने लगा। ‘उपन्यास का प्रदेश’ तो विधाओं के लोक में होता ही है मगर प्रदेशों का अपना उपन्यास भी होता है। संजीव का उपन्यास ‘किसनगढ़ के अहेरी’ अपनी आँचलिकता के लिए जाना जाता है। व्यापक समस्याओं से जुड़ने वाले स्थानिक या आँचलिक उपन्यासों का भी अभाव नहीं है हिन्‍दी में। कृष्णा सोबती,  रांगेय राघव में अपने-अपने सरोकारों का चित्रण हैं। रचना के स्तर लेखकीय प्रयोग होते रहे हैं, होने भी चाहिए। कहानी में निजता की पहचान प्रमुख होती है तो उपन्यास में वही सार्वजनिकता की ताकत और ऊर्जा पैदा करती है। हिन्‍दी के बड़े उपन्यासकार रांगेय राघव, यशपाल, अमृतलाल नागर…एक प्रतिमान गढ़ते हैं जिनके समक्ष खड़े होने में मुझे बीस वर्षों तक झिझक रही। अच्छे समाज की कल्पना को साकार रूप देना बडी़ रचना की मांग करता है। एक सीमा तक जाकर तो रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी उपन्यास की प्रतीति देते हैं। मगर संस्कृत के बाद, उपन्यास गद्य की विधा बनी। निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल जैसा गद्य लिखना एक चुनौती भरा कार्य है। समाज के स्वरूप का दबाव भी अपनी जगह काम करता है। लेखक का सर्जक रूप परकायाप्रवेश की स्थिति और तेजस्विता पैदा करता है। ‘रेहन पर रग्घू’, ‘अपना मोर्चा’ निश्चित ही उपन्यास हैं, मगर ‘काशी का अस्सी’? मैं समझती हूँ कि परम्‍परा का पुनर्निर्माण भले हो जाने दें, मगर उसके शाश्वत रूप में सेंध लगाना उचित नहीं होगा। प्रकाशकों का भी दबाव हो सकता है कि उपन्यास चूँकि आसानी से बिक सकते हैं, इसलिए कई अन्य विधाओं के ग्रंथों को भी उसी तर्ज पर ‘उपन्यास’ कहने दिया जाता है।

संचालक पल्लव ने कहा कि हर सर्जक का अपना एक मानसिक प्रदेश भी हुआ करता है। संजीव हमारे समय के ऐसे रचनाकार हैं जिनका ध्यान इस देश के हाशिए पर स्थित लोगों के जीवन की कथा को उकेरने पर गया है। उनके उपन्यास ‘सूत्रधार’ आदि से पता लगता है कि वह अपना परिश्रम,  प्रतिभा, साधना और समर्पण के साथ लेखन किया करते हैं।

कथाकार संजीव ने हिन्‍दी के अनेक ऐसे उपन्यासों का स्मरण दिलाया जो कि साहित्य के तथाकथित समकालीन और सुपरिचित क्षेत्रों से एकदम विलग हैं। कामतानाथ के ‘कालकथा’ से लेकर भगवानदास मोरवाल के ‘काला पहाड़’ और ‘रेत’, चंद्रकांता के ‘कथा सतीसर’, नासिरा शर्मा के ‘कुइंयाजान’ तथा मैत्रेयी पुष्पा के ‘इदन्नमम’, ‘अलमा कबूतरी’ और चित्रा मुद्गल के ‘आंवा’ उपन्यास का उल्लेख किया। उन्होंने ऐसे उपन्यासों का संक्षेप में उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे ये कृतियाँ उस रचनात्मक धारा से भिन्न है, जिसे कि प्रचलित लेखन धारा के रूप में देखा जाता है। ऐसे उपन्यासों में विषय और परिवेश ही नायक कहे जा सकते हैं। दोहराव वाले विषयों की एकरसता और वर्चस्व को तोड़ते ये उपन्यास, भले ही अचर्चित रह जाते हैं मगर इनके रचने का महत्त्व तो कम नहीं होता। ममता कालिया के उपन्यास ‘दौड़’ को भी अन्य कई उपन्यासों के साथ संजीव ने उल्लेखनीय बताया।

अपनी रचना-प्रक्रिया के विषय में संजीव का कहना था कि मैं स्वयं उपन्यास का कीड़ा रहा हूँ मगर फिर भी हिन्‍दी, भारतीय या विश्‍व की अन्य भाषाओं के विराट उपन्यास साहित्य को जानने का दावा नहीं कर सकता। मगर यह सच है कि विश्‍व साहित्य की केंद्रीय विधा उपन्यास ही है। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘लज्जा’ जैसे चर्चित उपन्यासों को उन्होंने दस्तावेजीकरण का नमूना बताया। अपात्र कृतियों को उत्कृष्ट रचना घोषित करने की आलोचकीय हड़बड़ी को संजीव ने ‘साहित्यिक अपराध’ बताते हुए आलोचना के समकालीन परिदृश्य पर निराशा व्यक्त की। ड्राइंगरूम में बैठकर, जमीनी स्तर के अनुभव नहीं अर्जित किए जा सकते। इतिहास तथ्य है जबकि उपन्यास लेखन कला, इस अंतर को हमारे लेखकों और आलोचकों को समझना होगा। कच्ची रचना सृजन नहीं हो सकती। दस्तावेज और तथ्यों की धूल हटाकर ही हम किसी अध्ययनपरक उपन्यास की रचना कर सकते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के इस कदम को साहसिक बताया कि कमजोर कृति को पुरस्कृत करने के स्थान पर उन्होंने सम्मान को शून्य कर देने की प्रक्रिया अपनाई।

संजीव ने युवा उपन्यासकारों के सामने उपस्थित नई चुनौतियों के आधिक्य को भी रचना-बंजरता की उत्पन्न स्थिति से जोड़कर देखा। कैरियर और वेतन की धमक-चमक में, समाज में ठहरकर विचार करने की बुद्धिजीवीय सक्रियता में ह्रास हुआ है, कमी आई है। जन आंदोलनों का विलोप होना,  तंत्र की एक अन्य शातिराना हरकत है। इसलिए इस सबमें उलझा युवक रचनात्मक योगदान नहीं कर पा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि समय की गति-दुर्गति को देखते हुए यह वांछनीय है कि हम छोटे कलेवर के उपन्यास लिखें। विषय और कथ्य की पहुँच आम जन तक हो और आतंकित करने वाली भाषा के प्रयोग से बचें। लेखक यह भी देखें कि इस बीच पाठक की रुचियाँ बदली हैं। समाज में फैली विसंगतियों पर लेखकों को ही ध्यान देना होगा। उनके लिए फरिश्ते आसमान से नहीं उतरेंगे।

‘इदन्नमम’ और ‘अलमा कबूतरी’  जैसी कृतियों की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के अनुसार हिन्‍दी में प्रचलित ‘युवा लेखन’ के जुमले को अब नकार देने का समय है। उन्होंने स्वयं अपना लेखन चालीस वर्ष की आयु के बाद तब शुरू किया था, जब उन्हें अपने रचनाकार के पास पर्याप्त परिपक्वता के अर्जित होने का आत्मविश्‍वास हो चला था। उन्होंने कहा कि नब्बे के दशक में भी ‘न लिखने का कारण’ शीर्षक चिंताएं उपस्थित रही हैं। उन्होंने अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यासों का हवाला देते हुए कहा कि हमें चिंता यह होनी चाहिए कि लिखना है और उत्कृष्ट लिखना है। चिंता यह होनी चाहिए कि जो लिखा जाए वह गहराई से, डूबकर लिखा जाए। आज का लेखक जल्दी में है, हड़बड़ी में है। हमें शोध के लिए अपने विषय के क्षेत्रों में जाना होगा। रेणु के ‘मैला आंचल’ उपन्यास को अपनी रचनात्मक प्रेरणा बताते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि कैसे एक अंचल विशेष की कहानी होते हुए भी वह उपन्यास, राष्ट्रीय चरित्र और स्वभाव की कृति बन जाता है। ‘इदन्नमम’ और ‘चाक’ जैसे उपन्यासों में मैंने उन नारी पात्रों को खोजा है जो अपनी कथा को संप्रेषित कर पाती हैं, जुबान दे पाती हैं। लोकगीतों में वर्णित स्त्रिायों की व्यथा को मैंने अपनी रचनाओं में स्थान देने का उपक्रम किया है।

मैत्रेयी पुष्पा के अनुसार बदलावों के आगमन से हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। मैं गाँव में जाती हूँ तो पाती हूँ कि वहाँ किशोरी-युवतियाँ फेसबुक पर हैं, कंप्यूटर पर काम कर रही हैं। बहुएं मोबाइल पर बातें कर रही हैं, अर्थात् अभिव्यक्ति और संप्रेषण के नए दरवाजे इस नई तकनीक के माध्यम से खुल रहे हैं। उनका मानना था कि हमें प्रश्नांकित होने में भय या संकोच नहीं लगना चाहिए। आम प्रश्नों के उत्तर देते हैं, तो नई दृष्टि का अनुसंधान भी होता है। अभी-अभी किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘तबदील निगाहें’ में मैंने अपने वरिष्ठों से खूब प्रश्‍न किए हैं जिनमें प्रेमचंद, जैनेंद्र और भगवतीचरण वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार शामिल हैं। उपन्यास आपके जीवन को नई राह देते हैं, नई तलाश भी देते हैं। अनुभूत सत्य को जानने के लिए मैं काफी फील्डवर्क करती हूँ। अपने पात्रों के मध्य जाकर रहा करती हूँ और उनकी जिजीविषा और विवशता को उपन्यास का ताना-बाना बनाती हूँ। इसीलिए अनुभव, विशिष्ट रचना के रूप में बोला करते हैं। ऐसे में पाठक-समाज को अपनी छवि दिखती है तो वह कृति विशेष को पढत़ा है। मेहनत, प्रतिभा और धैर्य किसी भी कृति की गुणवत्ता को बढा़ने का काम करते हैं।

हिन्‍दी के वरिष्ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अपने वाङम्य के ज्ञान के बिना अच्छा साहित्य नहीं लिखा जा सकता और आज मंच पर जो तीनों उपन्यासकार उपस्थित हैं, इनके बिना समकालीन हिन्‍दी उपन्यास का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। शाश्वत रूप से स्थापित कृतियों के बारे में उन्होंने कहा कि काल के सदियों लम्‍बे कालखंड के समय के झरते रेशों ने उन्हें महानता सौंपी है, इसलिए एक पुनर्पाठ से उनके महत्त्व को निरस्त कर पाना दुष्कर कार्य है। उन्होंने कहा कि आलोचक के रूप में उन्हें कई बार बहुत असुरक्षा महसूस होती है क्योंकि मूल्याँकित रचना के प्रतिमान और उनके स्रोतों से प्रायः अवगत रहना मुश्किल प्रक्रिया है। इस तरह आलोचक भी वंचित हैं,  दुखित हैं। साहित्य लेखक पाठक को समाज के समकाल से सूचित करता है और पाठक की सुरुचियों में वृद्धि और विकास लाता है। कला और संगीत आदि ललित सर्जनाएं भी यही काम करती हैं। मगर आज के बाजारवाद और साम्राज्यवादी नजरिए ने हमारा स्वाद बदल दिया है।

उन्‍होंने कहा कि ‘स्व’ की जगह ‘पर’ का बोलबाला है। इस तंत्र का पुर्जा बनने पर यह पाठ पढ़ना अनिवार्य है कि जो है,  वह नहीं है बल्कि वह है जो नहीं है। ‘हिंदू’, ‘जनसत्ता’ आदि समाचार-पत्र पढ़कर पता लगता है कि समाज में क्या विसंगतियाँ व्याप्त हैं। लेखक वहाँ से कच्ची सामग्री उठा सकता है। समय की दुर्दम चुनौतियों को स्वीकार करने पर ही लेखक अपना सांस्कृतिक योगदान दे पाता है। समाज की तथाकथित विकास प्रक्रिया को दिशाहीन बताते हुए उन्होंने कहा कि अच्‍छी रचना मानव के पक्ष में खड़ी होती है। मानव निरपेक्ष विकास को उद्घाटित, प्रकाशित कर यह बताना होगा कि हम दिशाहीनता की स्थिति के मारे हैं। अच्छे उपन्यास वही हुए हैं जिनके कथ्य में बिखराव है, वैसा ही बिखराव जैसा कि जीवन में सचमुच पाया जाता है। और लेखक को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाठक उसकी अंतिम शरणस्थली है। ऐसे में जबकि हम त्याग करने का सुख ही भूल गए हैं, इसमें व्यापक पाठक वर्ग के हृदय में अपनी बात उतारनी है, जीवन का ग्राफ ही साहित्यिक उपन्यास का शिल्प हो सकता है।

कथाकार संजीव- कुछ नोट्स : प्रेमपाल शर्मा

कथाकार संजीव

6 जुलाई, 2012 को कथाकार संजीव 65 वर्ष के हो गये । प्रेमचंद की विरासत थामे इस उपन्‍यासकार का हाल ही में प्रकाशित उपन्‍यास ‘रह गयी दिशायें इसी पार’ उनकी कथा यात्रा का महत्‍वपूर्ण पड़ाव है । इससे पहले उनके प्रकाशित उपन्‍यास हैं:- ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान ! नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पाँव तले की दूब’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ और ‘सूत्रधार’ ।

‘तीस साल का सफ़रनामा’, ‘आप यहाँ हैं’, ‘भूमिका और अन्‍य कहानियाँ’, ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’, ‘प्रेत मुक्ति और अन्‍य कहानियाँ’, ‘ब्‍लैकहोल’, ‘खोज’, ‘दस कहानियाँ’, ‘गति का पहला सिद्धांत’, ‘गुफा का आदमी’ और ‘आरोहण’ उनके कहानी संग्रह हैं ।

वरि‍ष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा की डायरी के अंश संजीव के रचना कर्म को समझने के लि‍ये महत्‍वपूर्ण हैं-

डायरी : 1991

सारिका के जनवरी 1980 के पुरस्‍कार अंक में ‘अपराध’ कहानी छपी थी- प्रथम पुरस्‍कृत । तब से आज तक सैंकड़ों कहानियाँ पढ़ीं होंगी किन्‍तु बहुत कम ऐसी हैं जिन्‍हें लौट-लौट कर पढ़ने को मन करता है । रामचन्‍द्र शुक्‍ल के शब्‍दों में- प्रेम में हम एकाधिकार चाहते हैं जबकि श्रद्धा में हम चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उसे प्‍यार करें । शायद एकमात्र कहानी जिसकी मैंने बीसियों प्रतियाँ कराके उनको दी हैं जो हिन्‍दी कहानी की दरिद्रता को रोते हैं या जिनकी नजरों में आने से यह कहानी रह गयी । नक्‍सलवाद को मैंने पहली बार उसी कहानी के माध्‍यम से अनुभव किया था । इससे पहले पता नहीं मैंने नक्‍सलवाद नाम सुना भी था या नहीं । किन्‍तु उसके बाद इस विचारधारा को न मैं निगल पाया, न अस्‍वीकार कर पाया और यह सब असर है ‘अपराध’ कहानी के पात्र बुलबुल और सचिन का । लोहे की भट्टी में तपे हुए दहकते अंगारे से पात्र ।

यूनिवर्सिटी में किसी को रिसर्च करते देखता हूँ तो याद आता है- ‘अपराध’ कहानी पर किया जाने वाला शोध । लाइब्रेरी ढूँढ़ते, खोजते, हर शोधार्थी की हर थीसिस मुझे ऐसा प्रयास लगती है कि जिसका कोई उपयोग नहीं इस सामाजिक व्‍यवस्‍था में । मात्र डिग्री के लिये- किसी पिता के मंसूबों को साधने, तो कभी किसी रिश्‍तेदार की नाक को लम्‍बा करने के लिये । जब भी किसी बड़ी नदी को मैंने रेलगाड़ी में पार किया है, मेरी आँखों में ‘अपराध’ पर लिखी थीसिस छपाक से पानी में गिरती है और सारी नदी में कागज छितराने लगते हैं । और बुलबुल भी । बुलबुल डॉक्‍टर थी । सचिन कहता है- दीदी तुमी बुझवैना । ये सामंतोवादी शिक्षा व्‍योवस्‍था । तो अगले ही पल प्‍यार की ठंडी फुहार छोड़ती बुलबुल । ऐसो ! हमार राजकुमार ।

कहानी में सचिन को दारोगा के मुँह पर थूकने का प्रसंग कितना सार्थक है । दारोगा जी । तुम नहीं समझोगे । अपने बेटे को भेज देना- उसे समझा दूंगा । कितनी गहरी पकड़ है- वक्‍त के साथ हम सभी सुभाष, नेहरू बनते हुए अंत में गांधी में तब्‍दील हो जाते हैं । सचमुच गर्म खून की भाषा गर्म खून ही समझ सकता है ।

साहित्यिक आलोचना की परिधियों से परे यह कहानी कुछ बड़े सीधे-सीधे प्रश्‍न खड़ा करती है । क्‍या हिंसा को और बड़ी हिंसा और नफरत को नफरत से दबाया जा सकता है ? जो व्‍यवस्‍था स्‍वयं अपराध को पैदा करती हो, उसके कारणों को जानने और लीपापोती के लिए अनुसंधान या आयोग, कमेटियाँ बनाने का कोई अर्थ है ? आखिर कौन सी मजबूरी है जिसके चलते डॉक्‍टरी पढ़ रही संघमित्रा, जो मुर्दे की चीरफाड़ से भी बेहोश हो जाती थी, परिस्थितियों के वश में स्‍वयं शातिर अपराधी बन जाती है ? सिद्धार्थ और सचिन जो एक छत के नीचे मार्क्‍स, लेनिन और ‘सामन्‍तोवादी शिक्षाव्‍योवस्‍था’ को समझने की कोशिश कर रहे हैं; उनमें से एक अपराध की दुनिया से गुजरता हुआ जेल के सीखंचों के पीछे पहुँच जाता है और दूसरा उन्‍हीं प्रवृत्तियों पर तथाकथित शोध करके फलता-फूलता है । क्‍योंकि सिद्धार्थ, सेशन जज-पिता, एस.पी.-बड़े भैय्या, जिलाधीश- छोटे भैय्या और गृह सचिव जीजाजी की बदौलत ऐन वक्‍त पर सचिन से ठीक विपरीत साँचे में फिट कर दिया जाता है । सुविधा भोगी ये सब वही चेहरे हैं जिनके लिए ‘न्‍याय तथ्‍य सापेक्ष है, सत्‍य सापेक्ष नहीं । तथ्‍य का प्रमाण स्‍वयं में सामर्थ्‍य सापेक्ष है । अत: निर्णय लचीला होता है । पुलिस एफ.आई.आर. प्रस्‍तुत करती है । चार्जशीट पेश करती है । गवाह होते हैं अपराध के सबूत । वकील होते हैं, कानून की किताबें होती है । इन सबमें से पर्त-दर-पर्त जो निष्‍कर्ष छन-छन कर आता है, हम वहीं निर्णय तो दे सकते हैं । और फिर तुम जिसकी सिफारिश करने आये हो उसका तो मुकाबला ही सत्‍ता से है जो हमेशा न्‍यायपालिका पर हावी रहती है ।’ सेसन जज पिता का सचिन के पिता को यह कहना है तो बेटे सिद्धार्थ के लिए यह कि ‘सी.बी.आई. वाले कब के तुम्‍हारे विरुद्ध कदम उठा चुके होते । बचते आये हो तो अपने जीजाजी के चलते । लेकिन यही रवैया रहा तो आई फाइनली वार्न यू….यानि कि बड़े-बड़े सिद्धान्‍तों की दुहाई देता हुआ न्‍याय ऐसा तरल पदार्थ जिसे जिस पात्र में ढाल दें वैसा ही ढल जायें । और सिद्धार्थ आ गया सुधार के रास्‍ते, उस साँचे की बदौलत जो उसे मिला और सचिन बना खूँखार नक्‍सलवादी उसी व्‍यवस्‍था के दूसरे साँचे में ढलकर ।

सेशन जज पिता और एस.पी. भाई के सामने टी.वी. के सेनिटोरियम से सचिन के पिता हाँफते-हाँफते दौड़े आये । किन्‍तु न सचिन के पिता की याचना का कोई असर पड़ा, न सचिन का अपनी सफाई में एक शब्‍द न कहने का । उल्‍टे नक्‍सलवाद को खत्‍म करने के लिए नक्‍सलवादी गाँव को जलाने के पुरस्‍कार स्‍वरूप उनका प्रोमोशन हो गया ।

लेकिन उसी सचिन की सिफारिश यदि राजनेता, एम.एल.ए., एम.पी. या व्‍यवस्‍था का बड़ा अफसर एस.पी., जज, सेक्रेटरी करता या इनके किसी आदमी का आदमी निकल आता तो भी क्‍या दंड वही रहता ? यह सच केवल बिहार या बंगाल का सच नहीं है, आज पूरे देश का सच बन चुका है । कन्‍याकुमारी से लेकर कश्‍मीर और आसाम से सोमनाथ तक गाया जाने वाला राग इस दोगली व्‍यवस्‍था का क्रूर चेहरा है ।

1967 में बंगाल के नक्‍सलवाड़ी गाँव से शुरू हुए इस आंदोलन ने देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और इसके पक्ष-विपक्ष में चली आ रही मीलों लम्‍बी बहस का अभी भी कोई सिरा नहीं नजर आ रहा । अनेकानेक गुटों में फलता-फूलता यह आन्‍दोलन स्‍वाधीन भारत के इतिहास में आज भी उतना प्रासंगिक बना हुआ है जितना सत्‍तर के दशक में । लेकिन जो निष्‍कर्ष, निर्णय लाखों करोड़ों पन्‍नों में नहीं मिलेंगे वे इस छोटी सी कहानी में बहुत संतुलित ढंग से रखे गये हैं- एक सहज पारदर्शी भाषा में । इतनी गुरु गम्‍भीर विचारधारा का इतना पठनीय प्रस्‍तुतीकरण । नक्‍सलवाद पर यूँ तो और भी कहानियाँ, उपन्‍यास आये हैं पर इतनी खूबसूरती के साथ समस्‍या को शायद ही किसी ने उठाया हो । संजीव यहीं बाजी मार ले गये हैं । शुरू से अंत तक अदृश्‍य, बारीक धागों में बुनी सचिन और संघमित्रा की प्रेम कहानी- बिल्‍कुल ‘उसने कहा था’ की तर्ज पर । किन्‍तु सौ वर्ष बाद के सामाजिक यथार्थ के अनुकूल व अनुरूप । मौजूदा भारत की मुकम्मिल तस्‍वीर जिसमें अपने समय का सब कुछ बोलता है- प्‍यार, नाते-रिश्‍ते, व्‍यवस्‍था, जेल, विचारधारा । हिन्‍दी साहित्‍य जिन कहानियों के बूते विश्‍व साहित्‍य को टक्‍कर दे सकता है ‘अपराध’ उनमें से एक है ।

कहानी की एक अद्वितीय विशेषता उसका शिल्‍प पक्ष भी है । एकदम लचीला-फंतासी का ऐसा प्रयोग जिसमें घटनाओं को मनमर्जी पाठकों के सामने रखा जा सकता है । उसका प्रवाह कहानी खत्‍म होने से पहले भी पाठक को नहीं छोड़ता और न खत्‍म होने के बाद ।

हिन्‍दी की सर्वश्रेष्‍ठ कहानियों में से एक । यहीं कुछ कारण हैं जिससे मैं बार-बार इसकी प्रतियाँ कराता हूँ और दोस्‍तों को देता हूँ- देखो हिन्‍दी कहानी क्‍या चीज  है ? मेरे मित्रों ने कहा कि यह कहानी बहुत भावुक है । मैं चुप रहता हूँ । यदि समाज का इतना वास्‍तविक यथार्थ घिनौना रूप भी आपको भावुक नहीं बना सकता है तो साहित्‍य आखिर क्‍या बला है ? मैंने यह कहानी 1980 में पढ़ी थी और आज 1991 में भी मुझे भावुक बनाती है तो मैं ऐसी भावुकता की कद्र करता हूँ ।

साहित्‍य का अधिकांश क्‍या भावुकता के बिना सम्‍भव हो पाता ?

डायरी : 3 मार्च 2011

यह देश का दुर्भाग्‍य है कि 60 सालों के बाद भी सत्‍ता उन लोगों के पास सरकती चली गई जिसमें समाजवादी संविधान के बावजूद एक आदमी पाँच हजार करोड़ का मकान मुम्‍बई में बनवा रहा है । दो-चार किलोमीटर की यात्रा भी हेलीकॉप्‍टर से करते हैं और गरीब मुल्‍क का इतना पैसा उनके गुप्‍त नामों से विदेशी बैंकों में जमा है, जिसे अगर बाँट दिया जाए तो पूरे देश में खुशहाली लौट आए । इसी दुर्भाग्‍य की परछाई साहित्‍य को घेरे है । वैसे भी साहित्‍य, समाज या राष्‍ट्र का दर्पण ही तो होता है । नतीजा यह हुआ कि वह कहानी और उपन्‍यास जो दिल्‍ली या महानगरों में पहुँचे साहित्‍यकार पश्‍चि‍म, लैटिनी लेखकों के वक्‍तव्‍य, अंग्रेजी अदा के तड़के और स्‍त्री स्‍वतंत्रता के नाम पर मनोवैज्ञानिक फ्राइड की आड़ में जरा साहित्यिक अंदाज में सैक्‍स के चित्रण में रहे, उन्‍हें मीडिया या परजीवी आलोचक बुद्धिजीवियों के बैंड बाजे ने सारे देश के लिए आदर्श माना । जब आदर्श ऐसा हो तो संजीव जैसा ग्राम, कस्‍बाई, मजदूर संवेदना का कथाकार कहाँ टिकता ? बंगाल की कुलटी जैसी छोटी-सी जगह में दिन-रात अपनी नौकरी करते हुए जो लिखता रहा उसे दिल्‍ली में बैठे आलोचकों ने शायद ही कभी जिक्र करने लायक समझा हो ।

सैंकड़ों कहानियॉं संजीव ने लिखी हैं और हर कहानी एक नयी जमीन तोड़ती है । ‘तीस साल का सफरनामा’ से बात शुरू की जाए तो यह कहानी आजादी के बाद चकबंदी के नाम पर जो कुछ हुआ उसकी व्‍यथा कथा है । 1977 में यह कहानी लिखी गई थी तो ‘सुरजा’ आजादी की तरह तीस साल का था लेकिन ‘तीस की उम्र में ही उसके निचुड़े चेहरे, उस पर उगी बेतरतीब दाड़ी एक ऐसा चलता-फिरता दस्‍तावेज है जिस पर तीस साल की आजादी का इतिहास भूगोल सब कुछ पढ़ा जा सकता है ।’ श्रीलाल शुक्‍ल के ‘राग दरबारी’ में भी ऐसे ही गाँव के स्‍कूल प्रधान, पंचायत के सैंकड़ों चित्र उभरते हैं लेकिन संजीव की कहानियाँ कभी-कभी उस पर भी भारी पड़ती हैं । नयी पीढ़ी तो गाँव की भी, चकबंदी में हुए अन्‍याय को नहीं समझ सकती शहर की तो बात छोड़ो । उन्‍हें जिन्‍हें यह नहीं पता कि दूध मदर डेयरी से आता है या गाय-भैंस भी देती हैं । गाँव के जमींदार पैसे वाले जिनके यहाँ चकबंदी की लूट का चित्र देखिए । ‘जी ! …….. लूट शब्‍द पर आपको आपत्ति है ? चकों को देखकर आप ही कोई उचित शब्‍द सुझाइये । यह रहा सरजू पांडे का चक । जमीन आठ आने मालियत की थी । कानूनगो साहब को प्रसन्‍न कराकर चौदह आने मालियत की बनी और फिर नहर के बगल दो आने मालियत की ऊसर में आकर सात गुनी बन गयी । समय पर खरबूजे और दशहरी आम न पहुँचा पाने के कारण सन्‍तोखी कोइरी और मैकू कुरमी के द्वार पर के खेत और बाग का स्‍वामित्‍व खटाई में पड़ गया । गणेसी बढ़ई थोड़ा टेंटिया गया था । दो ही कुर्सियाँ तो माँगी थीं साहब ने ! फल यह हुआ कि उसकी सिंचित गोंअड़ एक बीघे जमीन सोलह से दस आने मालियत की हो गयी । गणेसी गिड़गिड़ाया तो कानूनगो ने कानून की बारीकी समझायी – बाग की छाया पड़ रही थी उस खेत पर (पृष्‍ठ 110)।

हजारों गरीब छोटे किसान इस चकबंदी ने बरबाद कर दिए तो वहीं भ्रष्‍ट, नौकरशाही, रिश्‍वत के बल पर नये अमीर सामंत पैदा हुए । धीरे-धीरे इन्‍होंने लोकतंत्र के नाम पर सत्‍ता पर भी कब्‍जा किया । और सत्‍ता पर कब्‍जा होने के बाद अगला अध्‍याय शुरू होता है यानि कि रामहरख पांडे, लोटन यादव और रमाशंकर सिंह जैसे समृद्ध किसान सामंती कागजों पर भूमिहीन बन गये और हरखू, लोटू और शंकर हरिजन के नाम से बंजर जमीन इन्‍हें मिल गई । ऐसे चरित्र, चित्र, भाषा शायद ही इधर के किसी लेखक के पास हों ।

पिछले दिनों 60 साल की आजादी के बाद माओवाद, नक्‍सलवाद की आवाजें फिर उठ रही हैं । सुरजा की जमीन तो गई ही गई उसे एक चोरी के आरोप में जेल भी भिजवा दिया गया और सत्‍ता का चमत्‍कार देखिए जिस नंबरदार ने उसे जेल भिजवाया था उसी ने उसको बाहर निकलवाकर वाहवाही लूटी । इन स्थितियों में कौन पागल नहीं हो जाएगा और वही सुरजा के साथ हुआ । ऐसे प्रसंगों पर अखबारों में ऐसी खबरें आने पर बुद्धिजीवियों के बीच बहस चल पड़ी । ‘ब्‍लैक पैंथर ! मार्क्‍स का वर्ग-संघर्ष !…. नहीं-नहीं, लोहिया का वर्ण-संघर्ष ! किसी ने हेगेल के ‘फेनो-मेनोलॉजी ऑफ़ माइंड’ से प्रभावित बता डाला तो किसी ने फेनन की ‘द रैचेड ऑफ़ द अर्थ’ में ही इसका स्रोत ढूँढ निकाला । बड़े तर्क-वितर्क के बाद यह मान लिया गया कि सुरजा नक्‍सलपंथी है ।’

यदि इस कहानी को ‘तीस साल का सफरनामा’ के बजाय साठ साल का सफरनामा कह कर फिर से छापा जाए तब भी चमकते भारत की चकबंदी में पाठक पाएंगे कि सुरजा की तकदीर में कोई अंतर नहीं आया । उसे सत्‍ता अभी भी नक्‍सलवादी या माओवादी बता रही हैं । लेखक की कल्‍पना की उड़ान देखिए जो वह कहानी की अंतिम लाइन में कहता है ‘और जनाब कुसुमपुर की नियति को फुला दीजिये तो यह पूरे देश की नियति हो जाएगी ।’ मात्र तीस साल की उम्र में संजीव ने ऐसी ढेरों कहानियॉं हिन्‍दी साहित्‍य को दी । उनको बड़े बुद्धिजीवियों के बड़े समारोहों में वह कुर्सी भले ही न मिली हो लेकिन हिन्‍दी पट्टी के गाँव के अधिकतर नौजवान उनकी एक-एक कहानी को छाती से चिपकाए फिरते हैं ।

एक और कहानी है उनकी ‘भूखे रीछ’ । तीस साल का सफरनामा यदि चकबंदी, गाँव के किसान की विकट स्थितियों का बयान है तो ‘भूखे रीछ’ मिलों, फैक्‍ट्रि‍यों में काम करने वाले मजदूरों की । राम लाल एक आयरन की फैक्‍ट्री में काम करता है । सायरन की आवाज उठते ही चटपट फैक्‍ट्री की तरफ दौड़ लगाता है । दिन के भुकभुके की तरह कहानी की शुरूआत होती है । राम लाल दातौन फाड़कर ‘ओ-ओ’ करते हुए जीभ साफ करके बंगले की फालतू नल पर दो-एक कुल्‍ली करने के बाद हर-हर गंगे करता हुआ नल के नीचे नहाने बैठ जाता है । फिर देह का पानी पोंछे बिना ही बसाती बनियान पर कालिख-पुती कमीज डालकर बेडौल पतलून-जूते से लैस होकर आवाज लगाता है, रज्‍जो sss ! रज्‍जो sss ! अरी ओ तुरकानी, आज फिर लेट करायेगी क्‍या !’ (पृष्‍ठ 56) सूदखोर सिर्फ गाँव के सिमाने के अंदर ही नहीं मिलों के अंदर भी बैठे हैं । बलदेव राय जैसे सैंकड़ों बिना कोई काम किये तनख्‍वाह भी पाते हैं और औने-पोने सूद का पैसा भी बटोरते हैं । राम लाल सोचता है कि सूदखोर लोगों को गेट के अन्‍दर ढुका लिया जाता है । सारे नियम कायदे हम छोटे लोगों के लिये ही हैं । ये ‘वाचन वार्ड’ लोग कॉय को हैं……. खाली इसलिए कि सरकार के हाथ में जाने से पहले कारखाने का सारा माल बाहर बेच दें !’ …..वह कुछ और बोलने वाला है मगर यह सोचकर सिटपिटा जाता है कि कहीं साले झूठी चोरी के इल्‍जाम में फँसा दें तो….. ? (पृष्‍ठ 63)

दिल्‍ली में बैठे आलोचक कहानी में गाँव तलाशते हैं ? कहाँ मिलेगा उन्‍हें   गाँव ? कौन गाँव, देहात, कस्‍बा फैक्‍ट्री में रहता है आज या काम करता है ? लेखन में पूरी की पूरी पीढ़ी, आलोचक समेत शहर में आ चुकी है । चंद कथाकार जिनकी कहानियों में गाँव जिंदा हैं उनमें हैं काशीनाथ सिंह, संजीव… । ‘चाकरी’, ‘मरोड़’, ‘भूखे रीछ’ कहानियों में कहानी उतनी नहीं चलती जितनी कथाकार के अन्‍दर । ‘भूखे रीछ’ में मजदूर बस्‍ती का पूरा जीवन है । नल की लाइन में खड़ा रामलाल, ओवरटैम की इच्‍छा में किसी साथी की मौत, बीमारी मांगता, सूदखोर राय से बचकर निकलने की कोशिश में गेट पर अचानक राय आवाज से पकड़ा जाता । बसाती, बनियान, कमीज पतलून में फैक्‍ट्री में छह बजे से पहले घुसने की कोशिश करना । संजीव ने यह जीवन जिया है इसीलिये यह सब लिख पाये ।

सन् अस्‍सी के आसपास मिल मालिकों के शोषण की तरकीबों और उनके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को इस कहानी में सुना जा सकता है । किसी भी मुद्दे पर हड़ताल हो, हड़ताल शुरू तो होती है लेकिन पैसे के बूते मालिक उसे तोड़ने में भी कोई देर नहीं लगाते । पिछले तीस साल पहले के समय पर नजर डालिये, तो इस कहानी में प्रतिरोध की कुछ प्रतिध्‍वनियाँ बहुत साफ हैं । साठ साल के बाद तो यूनियन जैसे चीजें ही नहीं बचीं ।

सन् अस्‍सी में ‘अपराध’ कहानी ने संजीव को उस दौर का नायक कथाकार बना दिया था । वह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । दुर्भाग्‍य बस यही है कि हिन्‍दी कहानी का वह नायक आज हिन्‍दी और हिन्‍दी की दुनिया की राजनीति के चलते वैसे ही किसी अंधेरे, एकांत की तरफ बढ़ रहा है जहाँ ‘तीस साल के सफरनारमा’ का सुरजा या ‘भूखे रीछ’ का राम लाल या ‘अपराध’ कहानी का सचिन पहुँचा था । यदि देश की सत्‍ता उनके हाथों में पहुंचती जो वाकई इस देश का पेट भर रहे हैं, तो संजीव, प्रेमचंद के बाद सबसे प्रमाणिक कथाकार होते ।

सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं संजीव : रवीन्‍द्र त्रिपाठी

संजीव कुमार को देवीशंकर पुरस्कार प्रदान करते विश्‍वनाथ त्रिपाठी।

नई दि‍ल्‍ली : युवा आलोचक संजीव कुमार को उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ के लिए पंद्रहवां देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार वरिष्‍ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। 05 अप्रैल, 2011 को नई दिल्‍ली स्थित साहित्‍य अकादेमी के रवीन्‍द्र भवन में आयोजित समारोह में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी समाज अवस्‍थी जी के प्रति बहुत ही आत्‍मीय और अपनापन महसूस करता है। इसलिए युवा आलोचक संजीव कुमार को यह सम्‍मान प्रदान करते हुए मैं स्‍वयं को सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं।
समारोह के संचालक रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्‍वों की ओर ध्‍यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए हैं। वह अध्‍यवसाय और सूक्ष्‍म-द़ृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं और उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते हैं। उनकी पुरस्‍कृत पुस्‍तक ऐसी कोशिश का सुफल है।
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अवस्‍थी जी के सहकर्मी रहे सत्‍यदेव चौधरी ने संस्‍मरणात्‍मक वक्‍तव्‍य में कहा कि अवस्‍थी जी अपने अध्‍ययन-अध्‍यापन, लेखन व जीवन-शैली में आधुनिक थे। उन्‍होंने हमेशा अख्‍यात और नए लेखकों को लेखन के लिए प्रेरित और प्रोत्‍साहित किया। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निधन से पूर्व उनकी केवल पांच पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं, जबकि उसके बाद से अब तक कई किताबें आ चुकी हैं और लगातार चर्चा में रही हैं।
पुरस्‍कृत आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि यह अवसर मुख्‍यत: अवस्‍थी जी का जन्‍मदिन मनाने का है और किसी युवा आलोचक को उसके कार्य के लिए प्रोत्‍साहित करना तो उसका हिस्‍सा भर है। उन्‍होंने इस तथ्‍य की ओर ध्‍यान दिलाया कि छत्‍तीस साल की छोटी-सी उम्र में अवस्‍थी जी ने साहित्यिक हलके में जैसा और जितना हस्‍तक्षेप किया, वह हम जैसों के लिए गहरे आश्‍चर्य का विषय है और अपने समय का कोई ज्‍वलंत प्रश्‍न नहीं रहा होगा जिस पर अवस्‍थी जी ने लिखित मुठभेड़ न की हो। और इस मुठभेड़ के लिए भारतीय काव्‍य और काव्‍यशास्‍त्र की परंपरा से लेकर पश्चिम के साहित्‍य सिद्धांतों के अपने ज्ञान का समुचित उपयोग ने किया हो।
इस अवसर पर आयोजित ‘उपन्‍यास और हमारा समय’ विषयक विचार गोष्‍ठी का प्रारंभ करते हुए पंकज बिष्‍ट (रामजी यादव द्वारा पढ़े गए पर्चे में) ने कहा कि उपन्‍यास की पहली और आखिरी विशेषता उसकी समकालीनता ही है और इस रूप में उपन्‍यास और हमारे समय पर बात करने का दूसरा अर्थ उपन्‍यास और हमारा समाज या फिर समाज और उपन्‍यास के रिश्‍ते को रेखांकित करना है। आजादी के बाद हिंदी उपन्‍यास को हाशिए पर धकेल दिए जाने का परिणाम भी हम देख रहे हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि 40 करोड़ हिंदीभाषियों के पास 40 अच्‍छे उपन्‍यासकार नहीं हैं। रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज कोई निश्चित या पारिभाषिक शब्‍द नहीं है। इससे गांव-शहर, परंपरा-आधुनिकता के साथ बहुत कुछ समाया है। हिंदी में उपन्‍यास-आलोचना का आत्‍मविश्‍वास कविता-आलोचना की तुलना में काफी संकट में रहा है। आशुतोष कुमार ने समय के साथ उपन्‍यास के रिश्‍ते को विश्‍लेषित करते हुए कहा कि उपन्‍यास समय की सूची अवधारणा के खिलाफ खड़ा है और स्‍मृति, यथार्थ और कल्‍पना के बीच की दूरी उपन्‍यास की औपन्‍यासिकता को तय करती है, औपनिवेशिक इतिहास के शोषण के रूपों का आख्‍यान बनाती है और इस तरह वह खंडित होते मनुष्‍य के मनुष्‍य होने के अहसासों को रेखांकित करता है।
संजीव कुमार ने कहा कि लेखक पाठक को रोना तो रोते हैं, लेकिन खुद उन्‍होंने इस पाठक तक जोड़ने, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्‍या किया ? अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे भाषीय खिलंदड़ापन करता गप्‍पोड़ कहा गया। उपन्‍यासकार को अगर उपन्‍यासकार बने रहना है तो उसे तरह-तरह की आवाजों को स्‍पेस देना ही होगा।
अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में अशोक वाजपेयी ने महाकाव्‍य और उपन्‍यास के अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि महाकाव्‍य मनुष्‍य को पवित्रता के बोध से मुक्‍त नहीं हो पाता ओर उपन्‍यास मनुष्‍य की अपवित्रता के बोध से। एक लोकतांत्रिक कर्म के रूप में उपन्‍यास ने ही सबसे अधिक चालू नैतिकता को चुनौती दी है, एक तरह की नैतिक प्रश्‍नवाचकता को चिह्नित किया है। इस मायने में वह हमारी स्‍वतंत्रता का विस्‍तार करता है, उसके प्रति हमारी जवाबदेही पुष्‍ट करता है।
अंत में अनुराग अवस्‍थी ने सभी को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।

राय और कालिया का विरोध जारी

नई दिल्ली : नया ज्ञानोदय में प्रकाशित विभूतिनारायण राय के इंटरव्यू में लेखिकाओं के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणी का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसके लिए पत्रिका के संपादक को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराते हुए लेखकों के समूह ने शुक्रवार को ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। उन्होंने पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया के इस्तीफे की मांग की। दूसरी ओर विभिन्न संगठनों ने भी इसके खिलाफ मोर्चा खोल लिया है।
ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करने वाले लेखकों का कहना है कि इसके लिए संपादक सबसे ज्यादा दोषी है क्योंकि उन्होंने महिला विरोधी बातचीत को बगैर संपादन छाप दिया। लेखकों ने कालिया के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की और उन्हें अविलंब हटाने की मांग की। प्रदर्शन को उग्र होता देख भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी आलोक जैन को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने इस मामले को न्यास के सामने उठाने की बात कही।
प्रदर्शन में संजीव, मैत्रेयी पुष्पा, रेखा अवस्थी, भाषा सिंह, सर्वेश, विमल कुमार, जीतेंद्र कुमार, गीताश्री, अनीता भारती आदि ने भाग लिया।
दूसरी ओर लखनऊ की साहित्यिक संस्था प्रतिमान की ओर से आयोजित गोष्ठी में लेखकों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विभूति नारायण की टिप्पणी की कड़ी निंदा की।
डा. कुसुम वाष्र्णेय ने गोष्ठी का संयोजन किया। गोष्ठी में प्रस्ताव पास किया कि पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया ने जिस तरह श्रेष्ठ साहित्यिक मूल्यों की विदाई कर बाजारूपन को प्रश्रय दिया है, यह उसी की कुत्सित परिणति है। यह लेखिकाओं की बेबाक अभिव्यक्ति को भोंथरा करने की सोची-समझी साजिश है। इसके लिए राय और कालिया समान रूप से जिम्मेदार हैं। प्रस्ताव में भारत सरकार और ज्ञानपीठ न्यास से मांग की गई कि दोनों को उनके दायित्व से मुक्त कर दिया जाए। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा, कवयित्री कात्यायनी, नरेश सक्सेना, आलोचक वीरेंद्र यादव आदि ने विचार रखे।
उत्तराखंड की संस्था महिला समाख्या प्रदेश के सभी जिलों में प्रेस कांफे्रंस कर राय की टिप्पणी का विरोध कर रही है।