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सिनेमा के जादू और सरोकारों की पड़ताल : संजय जोशी

गुणवत्ता, विषय की विविधता और कम लागत से बन रहे सि‍नेमा और डॉक्‍यूमेंटरी की वि‍शेषताओं की पड़ताल करता युवा नि‍र्माता-नि‍देशक संजय जोशी का आलेख-  

एक : शताब्दी वर्ष में भुवन शोम की याद

हिन्दुस्तानी सिनेमा के सौ साल पूरे होने पर अगर 10 सबसे ख़ास हिन्‍दी फ़ीचर फिल्मों   की सूची बनाएँ तो 1969 में मृणाल सेन द्वारा निर्मित श्‍वेत-श्याम फीचर फिल्म ‘भुवन शोम’ निश्चय ही हर किसी की सूची में शामिल होगी।

बलाई चन्द्र मुखोपाध्याय ‘बनफूल’ की इसी नाम की बंगाली कहानी पर बनी ‘भुवन शोम’  को 1969 के तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ‘भुवन शोम’ की कहानी में बहुत पेंच नहीं हैं। एक हैं शोम साहब (उत्पल दत्त), बंगाल के रहने वाले। वह रेलवे के बहुत बड़े अधिकारी हैं और अकेले हैं। ईमानदार इतने कि अपने बेटे तक को नहीं बख्‍शा। उनकी जिन्दगी में बस काम ही है और कुछ नहीं। ऐसे अकेले ईमानदार शोम साहब दौरे पर सौराष्ट्र जाते हैं। मकसद है टीटी बाबू जाधव पटेल (साधू मेहर) की बेईमानी पर सजा सुनाना और पंछियों का शिकार करना। गाँव में जिस किसान की लड़की गौरी (सुहासिनी मुले) उन्हें शिकार पर ले जाती है उसी से जाधव पटेल की शादी होनी है। जाधव पटेल की सजा के इंतजाम से ज्यादा वक्त शोम साहब का गौरी के साथ पंछियों का शिकार करने में बीतता है और फिल्म का असल मजा भी इसी हिस्से में है। गौरी का साथ शोम साहब के जीवन में ऐसा रस घोलता है कि वह दुनिया के आठवें आश्चर्य की तरह गौरी के होने वाले मियाँ जाधव पटेल  को माफ़ कर देते हैं।
वैसे देखें तो फिल्म  के लिहाज से यह कोई बहुत उतार-चढ़ाव वाली कहानी नहीं है। लेकिन जो चीज भुवन शोम को अपने समय की और फिल्मों से अलहदा बनाकर एक ख़ास श्रेणी में रखती है वह है पूरी फिल्म में हासिल सहज परिवेश जो अपनी बुनावट से आपको सौराष्ट्र की गंध से परिचित करवाता है। जैसे कि शोम साहब जब पहली बार  भैंसागाड़ी में बैठकर गाँव जाते हैं तो एक शॉट में कतार से पानी लाने जा रही सौराष्ट्री औरतों का झुण्ड भी पास से गुजरता है। इस दृश्य से जुड़े स्थानीय गीतों का कोरस फिल्म को स्थानीय बनाने में और मदद करता  है।  दूसरी बात यह कि फिल्मकार किस खूबसूरती के साथ फिल्म के केंद्रीय भाव को दर्शकों तक संप्रेषित करने में सफल होता है। मेरे लिये शोम साहब से परिचित होना उतना ख़ास नहीं है और न ही यह ख़ास है कि आखिरकार एक बड़े अधिकारी का दिल पिघल गया। खास यह है कि किस तरह सिनेमा की भाषा का कुशल संयोजन करते हुए निर्देशक मृणाल सेन एक बहुत ख़ास बात कि कैसे सुन्दर भावों के संस्पर्श से लोग बदलते हैं, को सिनेमाई व्याकरण में रूपांतरित कर ले जाते हैं।  इस बात को हासिल करने के लिए पंछियों के शिकार का दृश्य ही ऐसा प्लाट था जहाँ निर्देशक कथा के प्रवाह को रोककर इस केंद्रीय भाव का विस्तार कर सकता था।

किसी बड़ी फिल्म को हासिल करने के लिये उतनी ही महत्वपूर्ण  टीम का होना एक अनिवार्य शर्त है। यह थोड़ा अचरज की बात ही है कि मृणाल सेन की यह पहली हिन्‍दी फिल्म होते हुए भी सिनेमाई व्याकरण की ऊँचाइयों और सौन्दर्य से लबरेज है। केके महाजन का कविता जैसा कैमरा और विजय राघव का संगीत मृणाल सेन के बहुत काम आया। गौरी के रूप में गाँव की अल्हड किशोरी बनी सुहासिनी मुले पहली बार सेलुलाइड पर काम कर रही थीं। किसी एकदम नयी कलाकार से काम करवाना बहुत बड़ा जोखिम भी होता है और अगर आइडिया क्लिक कर गया तो ‘भुवन शोम’ जैसी फिल्म हासिल हो जाती है। यह जानना भी रोचक होगा कि सुहासिनी मुले अपने पूरे कैरियर में ‘भुवन शोम’ से बड़ी लकीर न खींच सकीं।
शिकार पर जाने के दौरान ही शोम साहब का कायांतरण होता है। पूरी फिल्म में मजाक का एक बहुत धीमा स्वर लगातार बजता रहता है। यह स्वर फिल्म की शुरुआत में भी है जब मृणाल सेन शोम साहब के परिचय के बहाने अमिताभ बच्चन की सधी हुई कमेंटरी में सोनार बंगाल और  बंगालियों पर व्यंग्‍य कसते हैं। शोम साहब सौराष्ट्र में पंछियों का शिकार तभी कर सकेंगे, जब वह यहाँ के जैसे लगेंगे। इस क्रम में गौरी उन्हें ख़ास बाना पहनाती है। सूट-बूट से लैस बंगाली अफसर में रस घोलने के लिए बाना का यह परिवर्तन बहुत सहज लगता है। कमाल के अभिनेता उत्पल दत्त सौराष्ट्री बाना पहने हुए जिस तरह की  शारीरिक हरकतें करते हैं एक नये माहौल में प्रवेश करने के लिये वे सटीक लगती हैं। शिकार के दृश्य में जैसे ही पंछियों के झुण्ड के झुण्ड आने शुरू होते हैं शोम साहब शिकार भूलकर आसमान, बादल और पंछियों की काव्यात्मक उड़ान  में उलझ जाते हैं। इस उलझाव को गहरी कलात्मकता के साथ केके महाजन के कैमरे और विजय राघव राव  के संगीत ने पकड़ा है। मृणाल सेन पंछियों की उड़ान वाले लम्बे पैन शाटों को कई बार दुहाराते हैं, कभी दाएँ से बाएँ तो कभी बाएँ से दाईं। इसी तरह ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर। इस क्रम में विजय राघव द्वारा इस्तेमाल किया गया सितार का लगातार  बजता झाला इस काव्यात्मकता को एक नयी ऊँचाई पर ले जाता है।
शिकार के दृश्य में शिकार से ज्यादा शिकारी पंछियों की उड़ान से चमत्कृत होता  है इसलिए शिकार न कर पाने से कोई हताशा नहीं उपजती, बल्कि जब आखिरी में एक पंछी का शिकार कर लिया जाता है तो घायल पंछी की तीमारदारी के जरिये भी उस कोमल जान और एक नये संसार से परिचित होने का ही सिलसिला शुरू हो जाता है। शिकार का दृश्य ही इस फिल्म की सर्वाधिक  उत्तेजना वाला हिस्सा है। फिर बहुत जल्दी ही फिल्म की कहानी  ख़त्म होती है। शोम साहब को गौरी से  पता चलता है कि जिस जाधव पटेल को वह दण्डित करने आये हैं, वही उनकी गौरी का मरद बनेगा।
बिना किसी अनावश्यक खिंचाव के फिल्म ख़त्‍म होती है। बदले हुए शोम साहब वापिस अपने देश जाते हैं और बदले में जाधव पटेल फिर से ड्यूटी पर बहाल हो जाता है।

तीन राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करने के बावजूद इस फिल्म को उस तरह दर्शक नहीं मिले जिस तरह हर शुक्रवार को रिलीज़ होने वाली औसत अच्छी  फिल्म को मिल जाते हैं लेकिन सिनेमा के शौकीनों के लिये अच्छी  खबर यह है कि वे इसकी डीवीडी महज 149 रुपये में हासिल कर सकते हैं जो पिछले साल ही नयी सज-धज के साथ अल्ट्रा कम्‍पनी ने पेश की है।

दो : संकट में केबीके समाचार

पिछले दस वर्षों में उड़ीसा  की नवीन पटनायक सरकार ने एक काम पूरी तन्मयता और निरंतरत़ा  के साथ किया और यह काम था एक के बाद एक बहुराष्ट्रीय कम्‍पनियों के साथ समझौते करके उड़ीसा  के प्राकृतिक संसाधनों की नोच खसोट का कीर्तिमान स्थापित करना। एक के बाद एक हुए एमओयू के चलते उड़ीसा के सत्ता के गलियारों में काफी पैसा बहा और इस बहाव ने कार्यपालिका, न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक किसी नहीं छोड़ा। ऐसे मुश्किल समय में उड़ीसा के दो छोटे लेकिन काम के समूहों का जिक्र जरूरी है। एक समूह है जिसने पहले उड़ियाभाषी पत्रिका ‘समदृष्टि’ के जरिये और फिर मध्यांतर वीडियो मैगजीन के जरिये उड़ीसा की नोच खसोट पर गम्भीरता से काम किया।

आज हम एक दूसरे समूह केबीके समाचार के बारे में ही जानने की कोशिश करते हैं जो बहुत जिम्मेदारी की  एक पारी पूरी करने के बाद आज अपने अस्तित्व को बचाने   के संघर्ष में जुटा है। केबीके समाचार यानि कालाहांडी बोलांगीर कोरापुट समाचार, केबीके इलाके में रहने वाले युवाओं का समूह है जिसका नेतृत्व मोहम्मद असलम पिछले सात सालों से कर रहे हैं। इस समूह की शुरुआत 2005 में हुई जब केबीके इलाके में रहने वाले युवाओं को मुख्यधारा के अखबारों और टीवी न्यूज़ चैनलों की खबरों की मंशा पर संदेह होने लगा। केबीके समाचार के मुखिया मोहम्मद असलम ही अपने समूह में सर्वाधिक पढ़े-लिखे हैं, उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की है, जबकि केबीके दूसरे युवा साथी छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले कामकाजी उत्साही युवा जो अपनी आजीविका के लिए साइकिल के पंचर बनाने से लेकर पान बीड़ी-सिगरेट और मोबाइल के रिचार्ज कूपन तक बेचने का काम करते हैं। केबीके उनके लिये आय का साधन नहीं, बल्कि दिल की पसंद का काम है।
यह जानना मजेदार है कि  केबीके समाचार की प्रस्तुति हूबहू मुख्यधारा के टीवी न्यूज़ से उधार ली गयी थी, आधे घंटे की साप्ताहिक प्रस्तुति में यहाँ भी एक एंकर महोदय थे टाई लगाए, एक लोगो था केबीके  समाचार का, नीचे खबरों की पट्टियाँ भी थीं, लेकिन इन सबके बावजूद  इस साप्ताहिक प्रस्तुति में न तो टीआरपी के लिये बेतुकेपन की मारामारी थी, न ही बाबाओं और भूतों के मकड़जाल की बेवकूफियाँ। जो था उसका साहस था, जैसा साजो-सामान और मजे की पूँजी से लैस सबसे तेज और सबसे आगे रहने वाला मीडिया कभी न कर सका। हर सप्ताह  केबल टीवी के 35 स्थानीय नेटवर्कों  के जरिये केबीके समाचार 2005 से कालाहांडी, बोलांगीर और कोरापुट इलाकों की सच्ची कहानियाँ अनगढ़ तरीके से सुना रहा है। उड़ीसा के ये इलाके  सदियों से उपजाऊ होने के बावजूद भूख से सर्वाधिक मौतों के रिकार्ड भी अपने नाम करते रहे हैं और अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने के बाद जल, जंगल और जमीन की तबाही भी यहाँ अबाध गति से चालू है। केबीके ने भी ‘समदृष्टि’ की ही तरह बहुत उच्च क्वालिटी के वीडियो हासिल करने की बजाय दूर दराज तक के इलाकों में अपना नेटवर्क बनाने और एकदम नये और हाशिये के लोगों के हाथ में कैमरा पकडा़ने का काम किया जिसके परि‍णामस्वरूप बीच-बीच में जो भी छिटपुट तस्वीरें बड़ी कंपनियों की बदमाशियों की हमें मिलती रही हैं, उनका स्रोत भी प्राय ‘समदृष्टि’  या ‘केबीके’ की  टीमों के प्रयास रहे हैं। ‘समदृष्टि’ के छोटे और तीखे वीडियो के कारण ही शक्तिशाली कंपनी वेदांता से चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड ने अपने कई सौ करोड़ रुपये वापिस निकाले।
सात सालों तक बने रहने के बावजूद केबीके आज की तारीख में गहरे संकट से गुजर रहा है। उनका मासिक खर्च 25000 रुपये है जिसका एक बड़ा हिस्सा पिछले दिनों तक वह केबल नेटवर्क पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों से कर लेते थे, लेकिन अब केबल की बड़ी कंपनियों के आने के बाद उनका विस्तार भी 35 केबल नेटवर्क से घटकर 25 तक पहुँच गया है। अब उनका मासिक घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है और उनके बने रहने की सम्‍भावना लगातार कम होती जा रही है। उनका बहुत सारा काम अब यू ट्यूब के जरिये ही प्रसारित हो पा रहा है।

शहरों में डीटीएच सेवा अनिवार्य किये जाने के बाद केबल आपरेटर खत्म हो जायेंगे तो केबीके समाचार जैसे स्वतंत्र पहलकदमियों के सामने और गहरा  संकट खड़ा होगा। अभी यूपी में प्रदेश सरकार ने केबल नेटवर्क के सहारे बड़े और छोटे शहरों में स्थानीय चैनल चलाने वालों के सामने इसी तरह का संकट खड़ा कर दिया है। सरकार ने इन पर रोक तो नहीं लगाई, लेकिन मनोरंजन कर के नाम पर इतना कर थोप दिया कि यह खर्च वे उठा नहीं सकते । तमाम कमजोरियों और अपने अनगढ़पन के बावजूद ये लोकल चैनल कार्पोरेट हाउस नियंत्रित समाचार चैनलों के सामने एक विकल्प साबित हो रहे थे। आने वाले दिनों में डीटीएच सेवा के जरिए बड़े कार्पोरेट हाउस का हमारे मनोरंजन व समाचार चैनलों के प्रसारण तंत्र पर पूरी तरह नियंत्रण हो जाने वाला है। ऐसे में हमें केबीके समाचार जैसे जनपक्षधर स्वतंत्र पहलकदमियों को बचाने और उन्हें विस्तारित करने के नये रास्ते खोजने होंगे।

तीन: बॉक्स आफिस पर  ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव’

आतंकी गतिविधियों के लिये कभी बदनाम रहा महाराष्ट्र का मालेगाँव मुस्लिम बुनकरों और स्थानीय फिल्म निर्माण के दीवानेपन  के लिये भी जाना जाता  है। युवा फिल्मकार फैज़ा अहमद खान  ने बहुत मेहनत और खूबसूरती के साथ मालेगाँव में फिल्म निर्माण के दीवानेपन को अपनी 52 मिनट की डॉक्यूमेंटरी  ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव’  में चिन्हित करने की सफल कोशिश की है।  ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव’ से  शहर के हिन्दू- मुस्लिम विभाजन और 15-16 घंटे लूम पर खटने वाले बुनकरों के लिये बड़े परदे के महत्व का पता चलता है। शहर में वीडियो कैमरे पर फीचर फिल्में बनाने का खूब चलन है। आमतौर पर बॉलीवुड या हॉलीवुड की फिल्मों से ही कथानक लिये जाते हैं, ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव’ में फैज़ा ऐसे  ही एक स्थानीय निर्माता नासिर द्वारा बनायी जा फिल्म ‘मालेगाँव का सुपरमैन’ की निर्माण प्रक्रिया के बहाने छोटे शहर में सिनेमा के रिश्ते को समझने की कोशिश करती हैं। यह फिल्म ‘जन संस्कृति मंच’ द्वारा आयोजित  ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के कई फिल्म फेस्टिवलों के अलावा देश के दूसरे फिल्म फेस्टिवलों  में भी दिखाई गयी और हर जगह खूब सराही गयी है।
पिछली 29 जून को ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव’ मुंबई, अमदाबाद, पुणे, बंगलुरु और सूरत के सिनेमाघरों में बाकायदा रिलीज़ की गयी। जहाँ-जहाँ इसे ठीक शो टाइम मिला और इसका प्रचार किया गया, वहाँ वासेपुर की रंगदारी के बावजूद इसे भी अच्छे दर्शक मिले। निर्देशक फैज़ा के मुताबिक़ मुंबई में जुहू के 300 सीटों वाला हॉल इस डॉक्यूमेंटरी और मालेगाँव की कहानी को देखने के लिये पूरा भरा था, वितरण की भाषा में कहें तो हाउसफुल। ऐसा ही कुछ पुणे में भी हुआ जहाँ इसे दुपहर 3.30 और 9.00 बजे का शो मिला। जहाँ-जहाँ  ठीक से प्रचार हुआ और शो टाइम ठीक मिला, वहाँ 52 मिनट की डॉक्यूमेंटरी को भी दर्शकों ने सम्मान दिया और इस मिथ को तोडा़ कि डॉक्यूमेंटरी सिर्फ ख़ास लोगों की पसंद होती हैं। दर्शकों के उत्साह से उत्साहित होकर फैज़ा और उनके प्रोडूसर अब अगले सप्ताह इसे  कुछ और चुनिन्दा शहरों में रिलीज़ करने की तैय्यारी कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि किसी भारतीय डॉक्यूमेंटरी को पहली बार मुख्यधारा के सिनेमाघरों में जगह मिली है। इसी साल अप्रैल में मुंबई में रात में चूहे पकड़ने वालों की कहानी कहती मिरिअम चंडी की डॉक्यूमेंटरी Rat Race रिलीज़ हुई और 2010 में जयदीप वर्मा की भारतीय म्यूज़िक बैंड इंडियन ओशन पर बनी डॉक्यूमेंटरी ‘लीविंग होम’ को भी बड़ा पर्दा नसीब हुआ। इससे भी पहले 2005 में आनंद पटवर्धन अपनी महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंटरी ‘वार एंड पीस’  को सिनेमाघरों में रिलीज़ कर चुके थे। लेकिन ये उदाहरण हर सप्ताह रिलीज़ होने वाली मुख्यधारा की फीचर फिल्मों की तुलना में बहुत कम हैं इसीलिए अपने तमाम कौशल, मेहनत और खूबियों से तैयार अनेकों डॉक्यूमेंटरी वे असर न दिखा सकीं जो औसत दर्जे की बॉलीवुड फीचर फिल्म कर गुजरती है और जिस पर हमेशा उत्तेजना में रहने वाला मीडिया लहालोट हो जाता है। गुणवत्ता, विषय की विविधता और लागत की तुलना अगर भारतीय फीचर फिल्म और डॉक्यूमेंटरी से करें तो बिना शक डॉक्यूमेंटरी सिनेकार बॉलीवुड की चमक के आगे बीस नहीं, इक्कीस साबित होंगे। अगर हम पिछले पाँच वर्षों में बनी ही कुछ डॉक्यूमेंटरी फिल्मों के नाम ही गिनायें तो स्थिति साफ़ हो जायेगी। आनंद पटवर्धन की दलित और वाम राजनीति पर ‘जय भीम कॉमरेड’, संजय काक की कश्मीर में आजादी के सवाल को टटोलती  ‘जश्ने-आजादी’, सबा दीवान की उत्तर भारत की पाँच तवायफ गायिकाओं की  कहानी ‘द अदर साँग’, अमुधन आरपी की तमिलनाडु में परमाणु संयंत्र लगाये जाने के विरोध में बनी तीन फिल्में  ‘रेडिअशन स्टोरी पार्ट 1, 2 और 3’, अजय भारद्वाज की पंजाब में विभाजन के दर्द को महसूसती ‘रब्बा हुन की करिए’, युसूफ सईद की पाकिस्तान में शास्त्रीय संगीत की परम्‍परा के बहाने भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक रिश्ते की कहानी ‘ख्याल दर्पण’ ऐसी फिल्में हैं जिनका विकल्प करोड़ों रुपये की पूँजी वाले हमारे फिल्मोद्योग के पास फिलहाल नहीं दिखता है।
कामना करता हूँ कि फैज़ा और उनके प्रोडूसर की टीम ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगाँव’ को बॉक्स ऑफिस पर सफल  बनाने के लिये खूब मेहनत करें और दर्शक इस मेहनत को कामयाब बनायें। अगर ऐसा सचमुच में सम्‍भव हुआ तो आने वाले दिनों में निश्‍चय ही बॉलीवुड भी इन गैर ग्लैमर फिल्मों से कुछ कहानियाँ उधार लेकर फीचर फिल्मों के दर्शकों को गहरे अहसास में ले जायेगा और हर बार की तरह हमें अपने जीवन सत्य को समझने के लिये विश्‍व सिनेमा का सहारा नहीं थामना होगा।
(समकालीन जनमत के जुलाई-2012 अंक में प्रकाशित)

पहला आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल 14 से

नई दि‍ल्‍ली : प्रतिरोध के सिनेमा अभियान का यह 26वां और आजमगढ़ का पहला फिल्म फेस्टिवल 14 जुलाई को सुबह 11 बजे आजमगढ़ के नेहरू हाल में शुरू होगा। लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय के वक्तव्य से इसकी शुरुआत होगी।

फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्मों के साथ दिल्ली से संजय काक व अनुपमा श्रीनिवासन और भुवनेश्‍वर से सूर्यशंकर दाश हिस्सा लेंगे। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की पहली डाक्यूमेंटरी ‘खामोशी’, जो कि पूर्वांचल में महामारी की तरह कायम इन्सेफेलाइटिस बीमारी से सम्बंधित है, भी दिखाई जायेगी।

इस फेस्टिवल में छोटी-बड़ी 15 फिल्मों के अलावा अशोक भौमिक द्वारा प्रगतिशील भारतीय चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी ‘जन चेतना के चितेरे’ और अजय जेतली और अंकुर द्वारा तैयार विश्‍व सिनेमा की 11 कालजयी फिल्मों के पोस्टरों की प्रदर्शनी भी दिखाई जायेगी। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी भी डीवीडी और किताबों की बिक्री के लिये अपना स्टाल लगायेगी। फेस्टिवल के दूसरे दिन  सुबह 11 बजे से लेकर 1 बजे तक बच्चों के लिये एक छोटी और एक फ़ीचर फिल्म दिखाई जायेगी। इस मौके पर अशोक भौमिक  के उपन्यास ‘ शिप्रा एक नदी का नाम है’ का लोकार्पण भी होगा।  फेस्टिवल में शिरकत करने के लिए किसी भी तरह के औपचारिक आमन्त्रण की जरूरत नहीं है।

अधि‍क जानकारी के लि‍ये सम्‍पर्क करें- संजय जोशी,  संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा का राष्ट्रीय अभियान, जन संस्कृति मंच
मोबाइल नम्‍बर- 9811577426, ईमेल- thegroup.jsm@gmail.com

सातवाँ गोरखपुर फि‍ल्‍म फेस्‍टि‍वल 23 से 26 तक

नई दि‍ल्‍ली : ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का 22वां और गोरखपुर का सातवाँ फिल्म फेस्टिवल 23 से 26 मार्च, 2012 तक आयोजि‍त कि‍या जायेगा। फेस्टिवल का उद्घाटन 23  मार्च को शाम 4.30 बजे निपाल क्लब के सर्वोदय हाल में होगा। इस सत्र में फेस्टिवल के खास मेहमान मशहूर अभिनेता रघुवीर यादव मुख्य वक्तव्य देंगे। निपाल क्लब सिविल लाइंस में गोरखपुर के आरटीओ आफिस के सामने है।

वि‍स्‍तृत जानकारी के लि‍ये सम्‍पर्क करें : संजय जोशी, संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा का राष्ट्रीय अभियान, जन संस्कृति मंच, मोबाइल नम्‍बर- 91-9811577426

वैकल्पिक माध्यम है प्रतिरोध का सिनेमा: संजय काक

सेमिनार में बोलते प्रसिद्ध फिल्मकार संजय काक।

दिल्ली: ‘सिनेमा ज्ञान का ऐसा माध्यम है, जिसके लिये दर्शकों का बहुत ज्ञानी या पढ़ा-लिखा होना आवश्यक नहीं है, बल्कि इसके जरिये कोई ज्ञान या तथ्य उन तक बड़ी सहजता से पहुँचाया जा सकता है। दृश्य माध्यमों से हमारे मन में भावनायें पैदा होती हैं, और भावनायें ही आदमी को कुछ करने के लिये प्रेरित करती हैं, खाली ज्ञान हमें कर्म के लिये प्रेरित नहीं करता। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ प्रतिरोध की चेतना को विकसित करने का प्रयास है। यह बहुत जरूरी और बड़ा अभियान है। इसके माध्यम से आम लोगों को जगाना संभव है।’ ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के दूसरे राष्ट्रीय कन्वेंशन की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने ये बातें कहीं। उन्‍होंने संजय काक की फिल्म ‘जश्ने आजादी’ का जिक्र करते हुए कहा कि मुख्यधारा की फिल्मों और टीवी काश्मीरी जनता के वाजिब प्रतिरोधों पर पर्दा डालती हैं या उन्हें गलत ढंग से पेश करती हैं, जबकि संजय काक की फिल्म काश्मीर की वास्तविकताओं से हमें रूबरू कराती है और लोकतंत्र और राष्ट्रवाद पर नये सिरे से विचार करने को बाध्य करती है। पिछले छह वर्षों से चल रहे ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान को और अधिक संगठित तरीके से संचालित करने के मकसद से 1 मार्च 2012 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक दिवसीय राष्ट्रीय कन्वेंशन आयोजित किया गया। संजय जोशी को इस अभियान का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया तथा राष्ट्रीय कमिटी बनाई गई, जिसमें विभिन्न राज्यों और शहरों के प्रतिनिधियों के अलावा कई चर्चित फिल्मकार भी शामिल हैं।

‘प्रतिरोध का सिनेमा: चुनौतियाँ और संभावनायें’ विषयक सेमिनार में प्रसिद्ध फिल्मकार संजय काक ने कहा कि जिन सचाइयों और मुद्दों के लिए मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं है, उसे दिखाने का वैकल्पिक माध्यम है ‘प्रतिरोध का सिनेमा’। जिस तरह बिना किसी बड़ी फंडिंग के सिर्फ जनता के सहयोग के बल पर यह अभियान चल रहा है, ऐसा दूसरा उदाहरण पूरे देश और दुनिया में नजर नहीं आता।  उन्‍होंने कि कभी जो न्यू सिनेमा था, वह सरकारी फाइनांस पर टिका हुआ था, पर उसमें वितरण और दर्शकों के साथ रिश्ते पर ध्यान नहीं दिया गया, जिसके कारण वह डूब गया। मेनस्ट्रीम फिल्में और दूरदर्शन के पैसे से भी जो जनपक्षीय फिल्में किसी दौर में बनी हैं, आज उसे भी दिखाने वाले चैनल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मेनस्ट्रीम खत्म हो रहा है, तो अल्टरनेटिव शुरू भी हो रहा है। किसी भी मुद्दे पर देश में क्या हो रहा है, यह अगर जानना हो तो आज मेनस्ट्रीम मीडिया के बजाये डाक्यूमेंटरी फिल्में देखनी पड़ती हैं। संजय काक ने कहा कि इमरजेंसी एक लैंडमार्क है। इमरजेंसी के बाद ही भारत में डाक्यूमेंटरी फिल्मों का विकास हुआ है। दिल्ली जैसी जगह में भी अगर डाक्यूमेंटरी फिल्मों की स्क्रीनिंग में बहुत लोग जमा हो रहे हैं तो इसकी वजह यह है कि ये बहसों को खड़ा कर रही हैं। दर्शकों के अलग-अलग वर्गों के साथ फिल्मकारों का जो प्रत्यक्ष रिश्ता है, वह फिल्म मेकिंग में विविधता भी पैदा कर रहा है।

प्रतिरोध के सिनेमा की अवधारणा पर बोलते हुए युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ के दर्शक मूक नहीं हैं, बल्कि वे सक्रिय दर्शक हैं। यह अभियान एक नये दर्शक वर्ग का भी निर्माण कर रहा है। यह संवादधर्मी सिनेमा है और आज के जनता के हर प्रतिरोध की अभिव्यक्ति इसका मकसद है। कन्वेंशन का संचालन संजय जोशी ने किया और अध्यक्षता सत्यनारायण व्यास ने की।

इस मौके पर प्रोफेसर मैनेजर पांडेय और संजय काक ने कथाकार मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ तथा जनपथ के नागार्जुन विशेषांक का लोकार्पण भी किया।

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के दूसरे राष्ट्रीय कन्वेंशन में उपस्‍थित श्रोतागण।

इसके पहले पूरे दिन पटना, बेगूसराय, गोरखपुर, नैनीताल, जबलपुर, इंदौर, आरा, लखनउ, भिलाई, दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद आदि शहरों से आए प्रतिनिधियों- अशोक चौधरी, मनोज कुमार सिंह, के.के. पांडेय, संतोष झा, अंकुर, पंकज स्वामी, भगवानस्वरूप कटियार, यशार्थ, विनोद पांडेय आदि ने प्रतिरोध के सिनेमा की अवधारणा पर विचार-विमर्श किया तथा प्रतिरोध के सिनेमा को आयोजित करने के अपने अनुभवों को साझा करते हुए भविष्य की योजनाएं बनाईं। आयोजनों से संबंधित वीडियो क्लीपिंग भी दिखाई गई।

प्रस्‍तुति : सुधीर सुमन, प्रतिरोध का सिनेमा अभियान की ओर से जारी

‘प्रति‍रोध का सि‍नेमा’ का कन्वेंशन 1 मार्च को

नई दि‍ल्ली : जन संस्कृति मंच (जसम) के फिल्म समूह ‘द ग्रुप’ की ओर से 2006 में गोरखपुर से शुरू हुआ ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का यह सिलसिला चार राज्यों के 12 केन्द्रों में नियमित हो चला है और जल्द ही इस अभियान से 10 और केन्द्रय जुड़ने वाले हैं। इस सक्रियता को व्यवस्थित करने हेतु पिछले वर्ष छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के मौके पर 24 मार्च, 2011 को ऐसे नये केन्द्रों का पहला राष्ट्रीय कन्वेंशन किया गया था।
1 मार्च, 2012 को गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, दींनदयाल उपाध्याय मार्ग, दिल्ली में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान का दूसरा राष्ट्रीय कन्वेंशन होने जा रहा है। इसका मकसद तमाम समूहों के बीच बेहतर तालमेल के अलावा इस अभियान की दिशा और दशा को परखने और जांचने का भी है।
कन्वेशन के दो सत्र होंगे।  पहला सत्र प्रतिनिधियों का होगा जो सुबह 11 से शाम 5.30 बजे तक चलेगा जिसमे निम्न बिन्दुओं पर चर्चा होगी-
एक: प्रतिरोध का सिनेमा की अवधारणा
दो: 2006 से अब तक प्रतिरोध का सिनेमा अभियान की यात्रा का संक्षि‍प्तल परिचय
तीन: प्रतिरोध का सिनेमा आयोजन कैसे करें
चार: अलग-अलग केन्द्रों के अपने अनुभव
पाँच: प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के लिये नियमित आमदनी का प्रबन्धर और केन्द्रों की ‘द ग्रुप’ के प्रति आर्थिक जिम्मेवारी
छह: वार्षिक कलेंडर का निर्माण
सात: ‘द ग्रुप’ के पदाधिकारियों का चुनाव
दूसरा सत्र शाम 6 से रात 8.30 बजे तक चलेगा और यह खुला सत्र होगा। इसमें ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जैसे तमाम सिने अभियानों को केन्द्रित कर ‘नये सिनेमा प्रयास : चुनौतियाँ, सवाल और उम्मीद’ का खुला सत्र होगा जिसमे शहर के महत्वपूर्ण फिल्मकारों के अलावा अभियान से जुड़े कवि-लेखक, चित्रकार, पत्रकार और एक्टिविस्ट अपनी बात रखेंगे। इस सत्र में पुराने केन्द्रों के प्रतिनिधि अपने अनुभव साझा करेंगे।
संजय जोशी, संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी अपील-
आप सभी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि प्रतिरोध एक सिनेमा अभियान अपनी शुरुआत से अब तक छोटे-छोटे सहयोग के बलबूते विकसित हुआ है जो इसकी सबसे ख़ास बात और पहचान भी है। आपसे हम अपील करते हैं कि इस बड़े और महत्वपूर्ण आयोजन को सफल बनाने के लिये हमारी आर्थिक मदद करें। आपकी मदद किसी भी रूप में हो सकती है। चाहे आयोजन के किसी खर्च में हिस्सेदारी बटाऐं, नकद सहयोग करें या स्मारिका के लिए विज्ञापन उपलब्ध करा दें। हमें पूरी उम्मीद है कि पहले की तरह इस बार भी हमें आपका सहयोग मिलेगा।
अपना व्यक्तिगत सहयोग आप चेक के जरिये हमें दे सकते हैं। चेक EXPRESSION के नाम से बनाकर मेरे ग़ाज़ियाबाद के पते पर भेज सकते हैं या सीधे हमारे खाते में डाल सकते हैं। खाते में सहयोग जमा करवाके हमें इत्तिला जरूर करें-
EXPRESSION प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के सबसे पहले केन्द्रह गोरखपुर की फ़िल्म सोसाइटी का नाम है।
Bank Account name : Expression
Bank account no. : 558802010007442
Branch : 26 Battalion PAC, Bichia, Gorakhpur
Bank : Union Bank of India
संजय जोशी का पता-
संयोजक, द ग्रुप, जन संस्कृति मंच
सी – 303 , जनसत्ता अपार्टमेन्ट
सेक्टर 9, वसुंधरा, ग़ाज़ियाबाद – 201012
फोन: +91-9811577426, +91-120-4108090

यथार्थ को सामने लाती है कला : शाजी एन. करुन

पटना : ‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्संबंध का दृश्य रूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है। चीजों, घटनाओं या परिस्थितियों और सही-गलत मूल्यों की गहरी समझदारी, बोध और ज्ञान से ही यह विवेक निर्मित होता है। हम जिस यथार्थ को देख सकते हैं या देखना चाहते हैं, कला उसे ही सामने रखती है।’ ये बातें प्रसिद्ध फ़िल्मकार शाजी एन करुन ने जसम-हिरावल द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित त्रिदिवसीय पटना फ़िल्मोत्सव- प्रतिरोध का सिनेमा का उद्घाटन अवसर पर कहीं। समारोह 4, 5 और दि‍संबर को आयोजि‍त कि‍या गया था।
उद्घाटन से पूर्व मीडियाकर्मियों से एक मुलाकात में फ़िल्मोत्सव के मुख्य अतिथि शाजी एन. करुन ने कहा कि सिनेमा हमारी स्मृतियों को उसके सामाजिक आशय के साथ दर्ज करता है। सिनेमा अपने आप में एक बड़ा दर्शन है। लेकिन हमारे यहां इसका सार्थक इस्तेमाल कम हो हो रहा है। हमारे देश में करीब 1000 फिल्में बनती हैं लेकिन दुनिया के फ़िल्म समारोहों में चीन, वियतनाम, कोरिया, मलेशिया और कई छोटे-छोटे देशों की फ़िल्में हमसे ज्यादा दिखाई पड़ती हैं, इसलिए कि वे उन देशों के जीवन यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं और उन्हें सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं बनाया जाता।
अपनी फ़िल्म कुट्टी स्रांक के लिए श्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय सम्मान पाने वाले शाजी एन. करुन ने कहा कि आस्कर अवार्ड वाली फ़िल्में पूरी दुनिया में दिखाई जाती हैं, जबकि नेशनल अवार्ड पाने वाली फ़िल्में इस देश में ही दिखाई नहीं जातीं। अब तक वे छह बड़ी फ़िल्में बना चुके हैं और उनके लिए यह पहला मौका है कि बिहार में जनता के प्रयासों से हो रहे फ़िल्मोत्सव में उनकी एक फ़िल्म दिखाई जा रही है। इस तरह के प्रयास राख में दबी हुई चिंगारी को सुलगाने की तरह हैं। शाजी ने कहा कि आर्थिक समृद्धि से भी कई गुना ज्यादा जरूरी सांस्कृतिक समृद्धि है। आज किसी भी आदमी को अपनी दस यादें बताने को कहा जाए तो वह कम से कम एक अच्छी फ़िल्म का नाम लेगा। लेकिन बालीवुड की मुनाफा वाली फ़िल्मों और टेलीविजन में जिस तरह के कार्यक्रमों की भीड़ है, उसके जरिए कोई सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हो सकता। आज जरूरत है कि सिनेमा को सामाजिक बदलाव के माध्यम के बतौर इस्तेमाल किया जाए।
प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने बताया कि यह आयोजन देश में इस तरह का 16वां आयोजन है, जो बगैर किसी बडे़ पूंजीपति, सरकार या कारपोरेट सेक्टर की मदद के हो रहा है। फ़िल्मोत्सव स्वागत समिति की अध्यक्ष ‘सबलोग’ की संपादक मीरा मिश्रा ने कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की जरूरत है। प्रतिरोध का सिनेमा इसी लक्ष्य से प्रेरित है।

उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा ने कहा कि बहुमत हमेशा लोकतंत्र का सूचक नहीं होता, कई बार वह लोकतंत्र का अपहरण करके भी आता है। कला की दुनिया जिन बारीक लोकतांत्रिक संवेदनाओं के पक्ष में खड़ी होती है,कई बार वह बड़ी उम्मीद को जन्म देती है। हमारे भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों को पैदा करने में विश्व और देश की क्लासिक फ़िल्मों ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस वक्त अंधेरा बहुत घना है। इस अंधेरे वक्त में जनभागीदारी वाले ऐसे आयोजन उजाले की तरह हैं। वास्तविक लोकतंत्र के लिए वामपंथ का जो संघर्ष है, उससे अलग करके इस आयोजन को नहीं देखा जा सकता।

इतिहास की प्रोफेसर डा. भारती एस कुमार ने शाजी एन. करुन को गुलदस्ता भेंट किया। डा. सत्यजीत ने फ़िल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र के आखिर में कवि गोरख पांडेय की स्मृति में लिखे गए दिनेश कुमार शुक्ल के गीत ‘जाग मेरे मन मछंदर’ को हिरावल के कलाकारों ने गाया। मंच पर अर्थशास्त्री प्रो. नवल किशोर चौधरी, अरुण कुमार सिंह, पत्रकार अग्निपुष्प और कथाकार अशोक भी मौजूद थे।
दूसरे सत्र में शाजी एन. करुन की फिल्म कुट्टी स्रांक दिखाई गई। यह केरल के एक ऐसे नाविक की कहानी है जिसके जीवन का एकमात्र शौक चिविट्टु नाटकम (म्यूजिकल ड्रामा) है। उसका काम और उसका गुस्सैल स्वभाव उसे एक जगह टिकने नहीं देता। मनुष्य के सच्चे व्यवहार और सच्चे प्रेम के लिए उसकी अंतहीन प्रवृत्ति का प्रतिनिधि है वह। उसकी मृत्यु के बाद उसकी प्रेमिकाओं के जरिए उसका व्यक्तित्व खुलता है। फ़िल्म प्रदर्शन के बाद शाजी एन. करुन के साथ दर्शकों का विचारोत्तेजक संवाद हुआ।

दूसरे दिन फ़िल्म प्रदर्शन की शुरुआत अपनी मौलिक कथा के लिए आस्कर अवार्ड से नवाजी गई फ्रांसीसी फ़िल्म ‘दी रेड बलून’ से हुई। लेखक और निर्देशक अल्बर्ट लामोरेस्सी की इस फ़िल्म में बेहद कम संवाद थे। इसमें पास्कल नाम के बच्चे और उसके लाल गुब्बारे की कहानी है। गुब्बारा पास्कल के स्व से जुड़ा हुआ है। उस गुब्बारे को पाने और नष्ट कर देने के लिए दूसरे बच्चे लगातार कोशिश करते हैं। इस फ़िल्म को देखना अपने आप में बच्चों की फैंटेसी की दुनिया में दाखिल होने की तरह था। दूसरी फ़िल्म संकल्प मेश्राम निर्देशित ‘छुटकन की महाभारत’ थी। इस फिल्म में जब गांव में नौटंकी आती है तो उससे प्रभावित छुटकन सपना देखता है कि शकुनी मामा और दुर्योधन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे राज्य पर अपना दावा छोड़ देते हैं।

फ़िल्मोत्सव के दूसरे दिन दिखाई गई दो फ़िल्में अलग-अलग संदर्भों में धर्म और मनुष्य के रिश्ते की पड़ताल करती प्रतीत हुईं। राजनीति धर्म को किस तरह बर्बर और हिंसक बनाती है यह नजर आया उड़ीसा के कंधमाल के आदिवासी ईसाइयों पर हिंदुत्ववादियों के बर्बर हमलों पर बनाई गई फ़िल्म ‘फ्राम हिंदू टू हिंदुत्व’ में। उड़ीसा सरकार के अनुसार इन हमलों में 38 लोगों की जान गई थी, 3 लापता हुए थे, 3226 घर तहस-नहस कर दिए गए थे और 195 चर्च और पूजा घरों को नष्ट कर दिया गया था। 25,122 लोगों को राहत कैंपों में शरण लेनी पड़ी और हजारों लोग जो उड़ीसा और भारत के अन्य इलाकों में पलायन कर गए, उनकी संख्या का कोई हिसाब नहीं है। बाबरी मस्जिद ध्वंस की पूर्व संध्या पर दिखाई गई इस फ़िल्म से न केवल कंधमाल के ईसाइयों की व्यथा का इजहार हुआ, बल्कि भाजपा-आरएसएस की सांप्रदायिक घृणा और हिंसा पर आधरित राजनीति का प्रतिवाद भी हुआ।

सहिष्णु कहलाने वाले हिंदू धर्म के स्वघोषित ठेकेदारों के हिंसक कुकृत्य के बिल्कुल ही विपरीत पश्चिम बंगाल के मुस्लिम फकीरों पर केंद्रित अमिताभ चक्रवर्ती निर्देशित फ़िल्म ‘बिशार ब्लूज’ में धर्म का एक लोकतांत्रिक और मानवीय चेहरा नजर आया। ये मुस्लिम फकीर- अल्लाह, मोहम्मद, कुरान, पैगंबर- सबको मानते हैं। लेकिन इनके बीच के रिश्ते को लेकर उनकी स्वतंत्र व्याख्या है। इन फकीरों के मुताबिक खुद को जानना ही खुदा को जानना है।
पहाड़ को काटकर राह बना देने वाले धुन के पक्के दशरथ मांझी पर बनाई गई फ़िल्म ‘दी मैन हू मूव्ड दी मांउटेन’ फ़िल्मोत्सव का आकर्षण थी। युवा निर्देशक कुमुद रंजन ने एक तरह से उस आस्था को अपने समय के एक जीवित संदर्भ के साथ दस्तावेजीकृत किया है कि मनुष्य अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकता है। जिस ताकत की पूंजी और सुविधाओं पर काबिज वर्ग हमेशा अपनी प्रभुता के मद में उपेक्षा करता है या उपहास उड़ाता है, गरीब और पिछड़े हुए समाज और बिहार राज्य में अंतर्निहित उस ताकत के प्रतीक थे बाबा दशरथ मांझी। अकारण नहीं है कि इस फ़िल्म के निर्देशक को बाबा दशरथ मांझी से मिलकर कबीर से मिलने का अहसास हुआ।
सुमित पुरोहित निर्देशित फिल्म ‘आई वोक अप वन मार्निंग एंड फाउंड माईसेल्फ फेमस’ पूंजी की संस्कृति द्वारा मनुष्य को बर्बर और आदमखोर बनाए जाने की नृशंस प्रक्रिया को न केवल दर्ज करने, बल्कि उसका प्रतिरोध का भी एक प्रयास लगी। सुमित पुरोहित ने कालेज में अपने जूनियर दीपंकर की आत्महत्या और उस आत्महत्या को हैंडी-कैमरे में शूट करने वाले उसके बैचमेट अमिताभ पांडेय और उस दृश्य को बेचने वाली मीडिया के प्रसंग को अपनी फ़िल्म का विषय बनाया है। अमिताभ चूंकि शक्तिशाली घराने से ताल्लुक रखता था, जिसके कारण इस मामले को दबाने की कोशिश की गई, लेकिन चार वर्ष बाद सुमित और अन्य छात्रों ने उन तथ्यों को सामने लाने का फैसला किया, जिसकी प्रक्रिया में यह फ़िल्म भी बनी। इस फ़िल्म के सन्दर्भ में सबसे चौंकाने वाला तथ्य फ़िल्म के आख्रिर में स्क्रीन पर लिखे वक्तव्यों से पता चलता है। डाक्यूमेंटरी जैसे सरंचना वाली यह फ़िल्म वास्तव में एक कपोल कल्पना थी जिसका मकसद टी वी के सबकुछ देख लेने और कैद कर लेने पर अपनी टिप्पणी करना था.
अपने अस्तित्व की रक्षा के नाम पर सुविधाओं के भीषण होड़ में लगा पूरा समाज, खासकर मध्यवर्ग क्यों संवेदनहीन होता जा रहा है, क्यों वह मूल्यहीन और अमानवीय हो रहा है, युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन निर्देशित नाटक ‘समझौता’ ने इसका जवाब तलाशने को प्रेरित किया। आहुती नाट्य एकाडमी, बेगूसराय की इस नाट्य प्रस्तुति में मानवेंद्र त्रिपाठी ने अविस्मरणीय एकल अभिनय किया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित इस नाटक में मूल कहानी के भीतर एक रूपक चलता है सर्कस का, जहां मनुष्य ही शेर और रीछ बने हुए हैं। पशु की भूमिका में रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत ही यातनापूर्ण और अपमानजनक है, जिसके खिलाफ एक आत्मसंघर्ष नायक के भीतर चलता है। नायक को लगता है कि उसकी सर्विस और सर्कस में कोई फर्क नहीं है। नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार ने किया था। संगीत परिकल्पना संजय उपाध्याय की थी। संगीत संयोजन अवधेश पासवान का था और गायन में भैरव, चंदन वत्स, आशुतोष कुमार, मोहित मोहन, पंकज गौतम थे। मुक्तिबोध की इस कहानी के बारे में परिचय सुधीर सुमन ने दिया।

फ़िल्मोत्सव के समापन के रोज दर्शकों ने चार महिला फ़िल्मकारों की फ़िल्मों का अवलोकन किया। महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर प्रदर्शित ये फ़िल्में समाज की सचेतन महिला दृष्टि के गहरे सरोकारों की बानगी थीं।
अनुपमा श्रीनिवासन निर्देशित फ़िल्म ‘आई वंडर’ राजस्थान, सिक्किम और तमिलनाडु के ग्रामीण बच्चों के स्कूल, घर और उनकी जिंदगी को केंद्र में रखकर बनाई गई है। फ़िल्म ने कई गंभीर सवाल खड़े किए, जैसे कि इन बच्चों के लिए स्कूल का मतलब क्या है? बच्चे स्कूल में और उसके बाहर आखिर सीख क्या रहे हैं? इन बच्चों के रोजमर्रा के अनुभवों के जरिए इस फ़िल्म ने दर्शकों को यह सोचने के लिए बाध्य किया कि शिक्षा है क्या और उसे कैसी होनी चाहिए। अनुपमा से दर्शकों ने शिक्षा पद्धति को लेकर कई सवाल किए।
दीपा भाटिया निर्देशित फ़िल्म ‘नीरो’ज गेस्ट’ किसानों की आत्महत्याओं पर केंद्रित थी। दीपा ने सुदूर गांव के गरीब-मेहनतकश किसानों से लेकर बड़े-बड़े सेमिनारों में बोलते देश के मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ को अपने कैमरे में उतारा है। पिछले 10 सालों में लगभग 2 लाख किसानों की आत्महत्या के वजहों की शिनाख्त करती यह फिल्म एक जरूरी राजनीतिक हस्तक्षेप की तरह लगी।
पूना फिल्म इंस्टिट्यूट से फ़िल्म संपादन में प्रशिक्षित बेला नेगी की पहली फ़िल्म ‘दाएं या बाएं’ में ग्रामीण संस्कृति पर पड़ते बाजारवाद के प्रभावों को चित्रित किया गया था। पूंजीवादी-बाजारवादी संस्कृति ने जिन प्रलोभनों और जरूरतों को पैदा किया है, उनको बड़े ही मनोरंजक अंदाज में इस फ़िल्म ने निरर्थक साबित किया।
‘दी अदर सांग’ भारतीय शास्त्रीय संगीत और गायिकी की उस परंपरा को बड़ी खूबसूरती से दस्तावेजीकृत करने वाली फ़िल्म थी, जिसको उन ठुमरी गायिकाओं ने समृद्ध बनाया था, जो पेशे से तवायफ थीं। फ़िल्म निर्देशिका सबा दीवान ने तीन साल तक तवायफों की जीवन शैली और उनकी कला पर गहन शोध करके यह फ़िल्म बनाई है। इस फ़िल्म ने दर्शकों को रसूलनबाई समेत कई मशहूर ठुमरी गायिकाओं के जीवन और गायिकी से तो रूबरू करवाया ही, लागत करेजवा में चोट गीत के मूल वर्जन ‘लागत जोबनवा में चोट’ के जरिए शास्त्रीय गायिकी में अभिजात्य और सामान्य के बीच के सौंदर्यबोध और मूल्य संबधी द्वंद्व को भी चिह्नित किया। अभिजात्य हिंदू शास्त्रीय संगीत परंपरा के बरअक्स इन गायिकाओं की परंपरा को जनगायिकी की परंपरा के बतौर देखने के अतिरिक्त इस फिल्म में व्यक्त महिलावादी नजरिया भी इसकी खासियत थी। लोगों ने बेहद मंत्रमुग्ध होकर इस फ़िल्म को देखा।

म्यूजिक वीडियो जिन सामाजिक प्रवृत्तियों और वैचारिक या व्यावसायिक आग्रहों से बनते रहे हैं, तरुण भारतीय और के. मार्क स्वेर द्वारा तैयार किये गए म्यूजिक वीडियो के संकलन ‘हम देखेंगे’ उसको समझने की एक कोशिश थी।

जसम, बिहार के राज्य सचिव संतोष झा ने कलाकारों और दर्शकों से अपील की कि वे जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों, उसकी लोकतांत्रिक आकांक्षा और उसके बेहद जरूरी प्रतिरोधों को दर्ज करें और 10-15 मिनट के लघु फ़िल्म के रूप में निर्मित करके अगस्त, 2011 तक फेस्टिवल के संयोजक के पास भेज दें, जो फ़िल्में चुनी जाएंगी, उनका प्रदर्शन अगले फ़िल्म फेस्टिवल में किया जाएगा। समापन वक्तव्य कवि आलोकधन्वा ने दिया।

फ़िल्म फेस्टिवल में गोरखपुर फ़िल्म सोसाइटी और समकालीन जनमत की ओर से किताबों, कविता पोस्टरों और फ़िल्मों की डीवीडी का स्टाल भी लगाया गया था। प्रेक्षागृह के बाहर राधिका-अर्जुन द्वारा बनाए गए कविता पोस्टर लगाए गए थे, जो फ़िल्मोत्सव का आकर्षण थे। इस अवसर पर शताब्दी वर्ष वाले कवियों की कविताओं पर आधारित सारे छोटे पोस्टर पटना के साहित्य-संस्कृतिप्रेमियों ने खरीद लिए। किताबों और फ़िल्मों की डीवीडी की भी अच्छी मांग देखी गई। आयोजन का संचालन संतोष झा और संजय जोशी ने किया। उनके साथ विभिन्न फ़िल्मों और निर्देशकों का परिचय डा. भारती एस. कुमार, के.के. पांडेय और सुमन कुमार ने दिया।

लेखक परिवर्तन नहीं कर सकता : अमरकांत

अपनी कहानियों में निम्‍न मध्‍यम वर्ग के काइंयापन को प्रमुखता से चित्रित करने वाले हिंदी के वरिष्‍ठ कथाकार अमरकांत का जन्‍म 1 जुलाई, 1925 को बलिया में हुआ। वह आज भी लेखन में सक्रिय हैं। डॉक्‍टर प्रेम कुमार ने उनके साथ एक दिन बिताकर उनके बचपन की शरारतों से लेकर रचना और जीवन के उतार-चढाव को को जाना-समझा-

एल.आई.जी. फ्लैट का वह छोटा-सा कमरा। छत, दीवारें, फर्श, खिड़कियां, जंगले, लटका झूल-सा रहा  नाममात्र का वह परदा, लकड़ी का सामान्य सा सोफा, एक बेड- सबकुछ उम्रदराज, वृद्ध-वृद्ध सा। इधर-उधर रखी कुछ पत्रिकाएं और दो-तीन पुस्तकें। साफ मालूम हो रहा है कि यह कमरा जरूरत के मुताबिक ड्राइंग रूम भी हो जाता है और डायनिंग-रूम भी। अमरकांतजी के लिए तो यह स्टडी-रूम भी है और स्लीपिंग-रूम भी। सबकुछ एकदम सहज-साधारण-आम आदमी के घर जैसा। एक हद तक तो आम आदमी के आम घर से भी साधारण सा। नीले चौखानेवाला तहमद, कुरता और सामने से खुली एक ऊनी जर्सी पहने सोफे की कुर्सी पर बैठे अमरकांतजी। चेहरे पर उत्साहित-सी चमक, स्फूर्ति भरी दमक। आवाज में तेज-तेज एक खास तरह की धमक, ठनक भी।

बात लेखन के शुरुआती दिनों के जिक्र से शुरू हुई है। प्रश्‍न के बाद कुछ पल की चुप्पी और फिर सोचने, पुराना कुछ याद करने की सी मुद्रा। वह आगरावाली उम्र को याद कर रहे थे- ‘मेरे लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई। तब ऐसा था कि पत्रकार बनना है, हिंदी के लिए कुछ करना है। ‘सैनिक’ आगरा से निकलता था, उसमें गया मैं। एक साल ट्रेनिंग के रूप में रहा, फिर कन्फर्म हुआ। आगरा में तीन साल रहना हुआ। वहां जो भी खट्टे-मीठे अनुभव हुए, वे तो हुए ही, पर मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत वहीं से हुई। वहीं सुअवसर मिला प्रगतिशील लेखक संघ के कुछ लोगों के संपर्क-सामीप्य में आने का।… नहीं, हमारा कोई पूर्व संपर्क नहीं था वहां। हमारे एक मित्र थे- विश्वनाथ भटेले, वही ले गए थे हमें प्रगतिशील लेख संघ में। हमारे परिचय में उन्होंने वहां कहा- गजल गाते हैं ये। तब वहां रामविलास शर्मा थे, धीरेंद्र अस्थाना, राजेंद्र यादव, राजेंद्र रघुवंशी आदि कुछ लोग कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर भी थे। बैठकों में कभी पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, रावीजी भी आते थे। रांगेय राघव उन बैठकों में नहीं आते थे। बहुत सुंदर- आर्यन ब्यूटी जिसे कहते हैं- उस तरह के थे रांगेय राघव। रामविलासजी से तब उनका मतभेद चल रहा था। उनके पास भी हमें विश्वनाथ भटेले ही ले गए थे।

‘दयाल बाग की तरफ घूमने निकल जाते थे हम लोग उनके साथ। बर्कले सिगरेट पीते थे, हमें भी पिलाते थे। खड़े होकर लिखते थे। जब हम उनसे मिले थे, एक साथ छह उपन्यास लिख रहे थे वे। एक-एक वाक्य, पैराग्राफ प्लान कर लेते थे सबका एक साथ।

‘फिर इलाहाबाद का जीवन। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ समूह का एक अखबार था- ‘अमृत पत्रिका’। उसमें अपाइंटमेंट मिल गया तो मैं इलाहाबाद आ गया। इलाहाबाद राजनीति, शिक्षा एवं साहित्य का केंद्र था। इलाहाबाद में कुछ लिखा तो नहीं मैंने, पर दबाव बहुत झेले। जिस अखबार में काम करता था, वहां वेतन को लेकर मालिकों से संघर्ष हो गया। हड़ताल का नोटिस दे दिया गया था। उन सारी एक्टीविटीज में भाग लेना होता। तब पत्रकारों में यूनिटी थी। हिंदी भाषा के प्रति प्रतिबद्ध, थोड़े वेतन में गुजारा। पेपर कैसे लोकप्रिय हो, प्रसार संख्या कैसे बढ़े- यह सबकी चिंता होती थी। आंदोलन शुरू होते ही वातावरण तनावपूर्ण हो गया। उत्पीडऩ शुरू हुआ, लोग निकाले जाने लगे। साहित्य के मोर्चे पर प्रगतिशील लेखक संघ तथा ‘परिमल’ नाम की साहित्यिक संस्थाएं थीं। इनमें विचार की टकराहटें होती रहती थीं। प्रलेस में प्रकाशचंद्र गुप्त, भैरवप्रसाद गुप्त, शमशेर, अमृतराय, दुष्यंत, कमलेश्वर भाई आदि थे और परिमल में धर्मवीर भारती, विजय देव नारायण साही, केशव प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि थे। वर्ष 1954 में मैं बीमार पड़ गया। बी.पी. की शिकायत हुई, फिर हर्ट ट्रबल। शाम की ड्यूटी में अचानक पेन। सांस लेने में तकलीफ। मित्र ने घर पहुंचाया। उस समय इन बीमारियों के बारे में इतनी जागरुकता नहीं थी। नौकरी छोडऩी पड़ी। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में रहा तो स्वस्थ हुआ।‘

अमरकांतजी से मैंने उनके नाम-परिवर्तन के बारे में जानना चाहा है। शांत सी एक हंसी धीमी चाल चलकर उनके होंठों तक आई और धाईं छूने जितनी जल्दी के साथ वापस लौट गई- ‘मैं तब श्रीराम वर्मा था। अमरकांत मेरा पेन-नेम है। 1953 में बदला। मेरी पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ 1953 में ‘कल्पना’ में छपी थी। तभी पेन-नेम ‘अमरकांत’ कर लिया।‘

पहली रचना के छपने की उस खुशी के अहसास का अब कितना कुछ याद रहा है आपको?

‘पहली रचना के छपने की खुशी? देखिए, रचनाओं के छपने की खुशी तो होती है, पर हम उछल जाएं, ऐसा तो नहीं है। मैं जब लिखता हूं तो संदेह में रहता हूं कि कैसी बनी? जब दूसरे लोग बताते हैं तो लगता है कि ठीक बनी। अब तो आदत कुछ ऐसी बन गई है कि खुशी हमारे अंदर अधिक देर तक नहीं रह पाती। बीमारी की वजह से हम बहुत इंडल्ज करना एवॉइड करते हैं। बहुत सी रचनाओं को मैं फिर लिखना चाहता था। जैसे ‘जिंदगी और जोंक’ को दोबारा लिखना चाहता था। असंतोष था। उसी समय अचानक राजेंद्र यादव घर पहुंचे। कहानी हाथ से छीन ली। बहुत फटकारा- ‘ये क्या कर रहे हो? दूसरी कहानी लिखो।‘ लेखक अपनी रचनाओं के बारे में कभी संतुष्ट नहीं होता। तारीफों से खुश होता है, पर विश्वास नहीं होता कि क्या बनी। क्योंकि रचना से अलगाव हो जाता है। हां, तो रचना छप जाए, खुशी तब भी होती है, पर उसका असली मजा तब है जब दूसरा तारीफ करे, उसे स्वीकार करे। मेरे साथ यही होता है। शायद औरों के साथ भी ऐसा होता होगा। लेकिन तारीफ से भी क्या? अपनी रचना जमाने के साथ चलती और विकसित होती है। नए-नए आलोचक नए-नए दृष्टिकोणों से उसकी व्याख्या करते हैं।‘

और अब वे अपनी कुछ चर्चित कहानियों के रचने के क्षणों, आधारों, प्र्रेरणाओं को याद कर सुना-समझा रहे हैं- ‘हमारे छोटे भाई तब इंजीनियर थे आजमगढ़ में। उन्होंने कहा कि थोड़े दिन हमारे यहां रहकर आराम कीजिए। बीमारी के बाद हम सपरिवार उनके यहां रहने चले गए। ‘कहानी’ से पत्र आया कि ‘55 के विशेषांक के लिए कहानी भेजिए। तब मैंने उन्हीं के लिए लिखी थी ‘दोपहर का भोजन’। देर नहीं लगी। असल चीज है फॉर्म। फॉर्म पता है तो तुरंत समझ आ जाता है सब। यदि प्लॉट पता है, पर फॉर्म पता नहीं है तो कई बार लिखकर काटना पड़ता है। फॉर्म कभी पकड़ में आता है, कभी नहीं आता है। समझ नहीं आता कि इस रियलिटी को कैसे प्रेजेंट करें। हर रियलिटी हर फॉर्म में एक्सप्रेस नहीं हो सकती। तो तुरंत लिख गई थी वह- एक सिटिंग में। ‘डिप्टी कलेक्टरी’ अपने एक अन्य भाई के जीवन पर लिखी थी। ‘दोपहर का भोजन’ लिखने के बाद आजमगढ़ से हम बलिया आ गए। वहां हमारी मां थीं, पिताजी थे। पिताजी वकालत करते थे। उम्र भी हो गई थी उनकी। परिवार का बोझा था। किराए का मकान था, वह भी अच्छा नहीं था। नहीं, बलिया के नहीं, हम बलिया के एक गांव ‘नगरा’ के रहनेवाले हैं। नगरा का एक टोला है- भगमलपुर। तो हम बलिया आ गए। धीरे-धीरे स्ट्रेंग्थ गेन कर रहे थे। पत्रकार की नौकरी छूट ही चुकी थी और कोई एक्टीविटी नहीं थी। रेलवे स्टेशन से ‘कहानी’ पत्रिका मंगवा लेता था। एक अंक में अखिल भारतीय प्रतियोगिता के बारे में छपा था। पहले सोचा कि बेकार है इस बारे में सोचना। फिर योजना बनी तीन कहानी लिखने की। जो सर्वोत्तम निकले, उसे प्रतियोगिता में भेज दिया जाए। पहली कहानी ‘जिंदगी और जोंक’ उठाई। सोचा, बहुत मेहनत नहीं करेंगे। थोड़ा-थोड़ा रोज लिखेंगे। अधिक स्ट्रेन नहीं ले सकते थे। रोज थोड़ा-थोड़ा लिखते। आपने पढ़ी है वो कहानी? रजुआ- वो करेक्टर है उसमें। बलिया में ही देखा था उसे हमने। हमारे वाले मुहल्ले का ही था। करीब दस एक दिन लगे होंगे- वह कंपलीट हो गई। इसके पूरा होते ही दूसरी उठा ली। एक दिन की भी देर नहीं की। ये भी हमारे परिवार की थी। भाई लॉ करके बलिया आ गए थे। बलिया जैसे छोटे शहर में रहकर उनका बिना सुविधा, अपने बूते आई.ए.एस. में बैठना। सिंपिलीसिटी के मास्टर थे वे। जटिल से जटिल चीजों को सिंपिलीफाई कर देते। कुछ विषयों में टॉपर। लिखित में नंबर अच्छे आते, पर इंटरव्यू…। इंटरव्यू का जब कॉल आता था तो जैसे ताजी हवा का आना, स्वप्न, आशा का वह उत्साह, पिता की आशाएं, प्रतीक्षा- आप ‘डिप्टी कलक्टरी’ में देख सकते हैं। तीसरी भी लिखी, पर वो नियंत्रण के बाहर हो गई, लंबी हो गई। फाड़कर फेंक दी। नहीं शीर्षक तो अब याद नहीं।

‘’डिप्टी कलक्टरी’ कहानी पुरस्कृत भी हो गई। ‘जिंदगी और जोंक’ का यह हुआ कि अश्कजी उन दिनों ‘संकेत’ नाम से हिंदी में एक साहित्य संकलन निकाल रहे थे। शुरू में कमलेश्वर और मार्कंडेय उससे सहायक संपादक के रूप में जुड़े थे। बाद में कुछ हुआ कि वे अलग हो गए। तो कमलेश्वर ने कहानी भेजने का पत्र लिखा। मैंने ‘जिंदगी और जोंक’ भेज दी। अश्कजी को बहुत पसंद आई। उस संकलन में तब के सभी लेखक छपे थे। मोहन राकेश, शेखर जोशी, राजेंद्र यादव की ‘जहां लक्ष्मी कैद है’, नागार्जुन का ‘वरुणा के बेटे’, परसाई भी थे, ड्रामा भी था, कविताएं भी थीं। ‘कहानी’ का वह विशेषांक महत्वपूर्ण था। बहुत चर्चा हुई। हिंदी क्षेत्र के चारों ओर के पत्र। कहानी के साथ भैरवजी ने अपनी टिप्पणी में एक लाइन यह भी जोड़ दी थी कि इस रचना का लेखक बेकार है और नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। आप देखिए, उसे पढ़कर कितने लोगों ने मुझे नौकरी के लिए पत्र लिखे। यह भी देखिए कि तब कितना असर होता था इन चीजों का। ‘56 के शुरू में ‘कहानी’ का वह अंक और उसके थोड़े बाद ही ‘संकेत’ का अंक। कहानी के पक्ष में एक अभूतपूर्व माहौल। अकल्पनीय। लोग घोषित कर चुके थे कि कहानी की संभावना अब खत्म। कविता के युग की घोषणा हो चुकी थी। ठीक है कि कहानी व्यक्तिवाद, दार्शनिकता या प्रगतिशील राजनीतिक भावुकता में खो गई थी- पर उस दौर में कहानी को वातावरण, वह स्थान मिला कि आज उसकी इतनी पूछ है। नए तेवर, नई भाषा, नए शिल्प के साथ जीवन और समाज को केंद्र में रखकर नई संभावनाएं तब उभरकर आई थीं। कई तरह के लोग लिख रहे थे तब।

‘तो बलिया में दो और आजमगढ़ में एक यानी तीन कहानियां लिखीं हमने उस कठिन दौर में। एक उपन्यास भी लिखा- ‘सूखा पत्ता’।‘ उनका हाथ मेरे कंधे पर आ टिका है- ‘नहीं पढ़ा हो तो पढ़ लीजिए। पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र का जो कच्चापन होता है- वय संधि कहिए उसे, उस पर है। तीन छोटे-छोटे खंड हैं। उसमें एक प्रेमकथा भी है। बाद में हम इलाहाबाद आ गए। ‘दैनिक भारत’ निकलता था तब वहां से। पुराने पत्र में जाने का सवाल नहीं था। वहां वैसे भी ट्रबल चल रहा था। सो ‘दैनिक भारत’ में आ गया। जब से तबीयत खराब हुई, रात में लिखना बंद कर दिया था।‘ और अब तब के इलाहाबाद में बीते कुछ दिन उन्हें याद आ गए हैं- ‘उस जमाने में साहित्य का केंद्र था इलाहाबाद। वैचारिक कहिए या साहित्यिक- विवाद भी यहां खूब थे। भारती, साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी और अन्य अनेक लोग थे। ‘परिमल’ थी, उससे जुड़े लोग थे। उनके मार्गदर्शक अज्ञेयजी थे। प्रयोगवाद के रूप में आंदोलन पहले आया, फिर नई कविता चली। उधर से प्रगतिशील लेखन का विरोध होता ही था। वैचारिक स्तर पर प्रेमचंद पर निशाना साधा जाता था और इधर से व्यक्तिवाद आदि पर। नोक-झोंक चलती रहती, दोनों ओर से गोष्ठियां और सम्मेलन होते रहते। सभी उनमें भाग लेते। आज ऐसा नहीं है। ‘परिमल’ में भारती सबसे आगे रहते थे। साही प्रबुद्ध व्यक्ति थे। गहराई से सोचनेवाले, चिंतक किस्म के थे। तब गतिविधियां बहुत होती थीं- परिमलवालों की भी, प्रगतिशीलों की भी।

‘…नहीं, इंस्पायर होकर नहीं लिखा। बड़ी तकलीफों में लिखा है हमने। आर्थिक समस्याएं बहुत थीं। कोई खास तनख्वाह नहीं थी। शादी हो गई थी। दो बच्चे भी थे। उपन्यास लिखने पड़ते थे। ‘काले उजले दिन’, ‘पराई डाल का पंछी’- हां, बाद में यह ‘सुखजीवी’ करके छपा। इंस्पायर होकर तो पहला उपन्यास ही लिखा- ‘सूखा पत्ता’। श्रीपत राय (कहानी) की नौकरी तक कुछ कहानियां हमने लिखी थीं। मेरा खयाल है, शायद ‘59 में सभी लोग वहां से निकाल दिए गए थे पंद्रह-पंद्रह दिन का नोटिस देकर। मैं संन्यासी, भैरवजी…। उसके बाद ‘अमृत पत्रिका’ में हमारे एक पुराने साथी थे कस्तूरचंद, उन्हें मेरी बेकारी का पता चला तो उन्होंने लिखा कि तुम यहां आ जाओ। वह एक संस्था थी- मैं वहां चला गया। कैंपस में मकान मिला, मजा आया वहां। पर बदमगजी कहां पैदा हो गई, हम नहीं जानते। संभव है, मैंने थोड़ी आलोचना कर दी होगी। आप जानते हैं कि यदि आप व्यवस्था में रहते हैं तो हाथ-पैर बचाकर रहिए। पर लेखक का यह है कि वह ऐसे समय में वाचाल हो जाता है। छह महीने बाद नौकरी का रिन्यूअल होना था, पर हमसे कह दिया गया कि खेद है, आपका रिन्यूअल नहीं हो पाएगा। हमारे लिए तो यह मरण हो गया। सब चीजें कच्ची थीं। बच्चे छोटे थे। उन्हीं दिनों बाद में ‘पराई डाल का पंछी’ लिखा। एडवांस जो मिला, ले लिया। वहां से लखनऊ आ गया। नौकरी कोई थी नहीं, कोई फिक्सड डिपोजिट नहीं, इन्कम नहीं। हवा में थे हम।‘  अजीब-सी, खाली-खाली सी एक खास तरह की हंसी।

‘…तब सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना भी हमारे वाले मुहल्ले राजेंद्र नगर में ही रहते थे। हम लड़ते भी थे, पर एक-दूसरे के काम भी आते थे। वे मेरी बेकारी को लेकर चिंतित थे। आप देखिए कि एक साल तक उन्होंने हर महीने हमें रेडियो के तीन कार्यक्रम दिए। एक कार्यक्रम का पारिश्रमिक तीस रुपये। महीने के नब्बे रुपये हुए। सन् 60 की बात है, तब मकान का किराया था पचास रुपए। कहानी आप रोज तो लिख नहीं सकते, सो और भी कुछ लिख-लिखा लिया। ‘ग्राम्या’ के लिए ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखवाया। श्रीकांतजी ‘कृति’ निकालते थे, उसके लिए लिखा। ‘ग्राम्या’ में तब जो लिखा, वह ‘ग्रामसेविका’ उपन्यास में आया। लस्टम-पस्टम चलता रहा सब। ‘मूस’ भी वहीं लिखी। वह ‘नई कहानी’ में छपी और चर्चित हुई। सर्वेश्‍वर से बहसें अकसर प्रेमचंद को लेकर होतीं। वे कहते- प्रेमचंद का साहित्य नखासगंज का साहित्य है। मैं पूछता- तुम्हारा क्या हजरतगंज का है? खूब नोक-झोंक चलती। इलाहाबाद में भारती से हमारा यह सब चलता रहता था। बहसें होतीं, पर संबंध थे। मैंने वहां से एक स्केच टाइप, थोड़ी ह्यूमरस टाइप एक चीज भेजी- वह ‘धर्मयुग’ में छपी। भारती ने लिखा कि हमें एक महीने में इस तरह की तीन रचनाएं दीजिए। चाहता तो कर सकता था, पर उस ऑफर को मैं नहीं कर सका। बड़ी बाध्यताएं थीं, बहुत संकट थे, मैं कर नहीं पाया, हालांकि उससे मेरा हित होता।‘

अब लखनऊ के उस स्वर्णकाल को याद किया जा रहा है- ‘तब तीन महान उपन्यासकार लखनऊ में रहते थे- नागरजी, भगवतीचरण वर्मा और यशपालजी। इस उपन्यासकारत्रयी पर लखनऊ को गर्व था। श्रीलालजी वहीं पोस्टेड थे, सर्वेश्वर थे, कुंवर नारायण थे। हजरतगंज तब घूमने के लिए एक अच्छी जगह थी। कॉफी हाउस होता था तब वहां, बहुत से लोग आते थे। डिस्कस करते थे। यशपालजी आते थे, पर सात बजे वहां से उठ लेते थे। उस डिसकशंस का वे कहानियों में उपयोग कर लेते थे। श्रीलालजी अंग्रेजी-संस्कृत में कुछ-न-कुछ सूक्ति छोड़ते रहते थे। पढ़े-लिखे विज्ञ हैं वे। अफसर भी थे तब। मजा आता था सुनकर। मैं दोस्तों में श्रोता ही रहा हूं। ज्यादा बोलता नहीं हूं। यूं कभी-कभी बस मजाक भर कर लिया। दूसरों को सम्मान देने की हमेशा मैंने कोशिश की है। स्वयं को सदैव छोटा समझकर ही चला। वह मेरा ही संकोच था कि मैं इन तीन ख्यात लेखकों में से केवल नागरजी के ही निकट पहुंचा।‘ कुछ याद करने की सी खास मुद्रा में रुककर सोचा गया है- ‘एक बार शुक्लजी की कार में बैठकर हम नागरजी के यहां गए। देखा- वे बैठकर सिलबट्टे पर भांग घिस रहे हैं। नागरजी जिद पर आ गए कि तुम भी भांग पीओ। मैंने बहुत कहा कि मैं परहेज से रहता हूं, कभी-कभी सिगरेट पीता हूं, पर भांग या शराब नहीं पीता। वे नहीं माने, थोड़ी-सी पिला दी। उन दोनों ने ठाठ से पी। साइकोलॉजिकल ही रहा होगा कुछ मेरे साथ कि मेरी तबीयत कुछ गड़बड़ हुई।‘ अल्प सा एक विराम फिर आया। जरा देर बाद चहक भरे से फिर बोले, ‘एक रोचक घटना याद आ रही है इस समय, सर्वेश्‍वरजी के अज्ञेयजी से निकट के संबंध थे। सर्वेश्‍वर पहले ए.जी. ऑफिस में थे। ‘परिमल’ में वे थे ही और अज्ञेयजी के कारण ही ‘दिनमान’ में गए। अज्ञेयजी उनके यहां आए हुए थे। नौकर बुलवाने के सिलसिले में मुझे सर्वेश्वरजी की पत्नी से बात करनी थी, इसलिए मैं उनके घर गया। अंदर देखा- उस हॉलनुमा कमरे में अज्ञेयजी चारपाई पर बैठे थे। उनसे पहले मिलना-देखना तो हुआ था, पर बातचीत नहीं हुई थी। वे चिंतनमग्न बैठे थे। मैं बराबर के कमरे में सर्वेश्वर की पत्नी से बात करके चला आया। सर्वेश्‍वर की पत्‍नी ने कहा भी कि ये अज्ञेयजी हैं। शायद संकोच था। दूसरे दिन सर्वेश्‍वर इस बात पर बहुत बिगड़ा। मैंने सफाई दी- ‘पता नहीं उन्होंने मेरा क्या कुछ पढ़ा होगा या नहीं? मैं कैसे इंट्रोड्यूस करता खुद को?’  वह चिल्लाने लगा- ‘वो एक-एक नए लड़के को जानते हैं। सबको पढ़ते हैं।‘ एक दिन सर्वेश्‍वर ने ही कहा कि तुम पंतजी से जाकर क्यों नहीं कहते। वे सरकार के सलाहकार हैं। मैं गया, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। तब तक वे सलाहकार नहीं रह गए थे। फिर स्थितियां इतने अंतिम छोर पर पहुंच गईं कि लखनऊ में रहना मुश्किल हो गया। जो कुछ थोड़ा सामान था, उसके साथ लद-फदकर हम लखीमपुर खीरी पहुंच गए। तब हमारे भाई वहां ज्यूडीशियल अफसर थे। वे वहां राजा की कोठी के एक पोर्शन में रहते थे। राजा के एक भाई थे। उन्हें हमने देखा भी, उनके बारे में सुना भी। बाद में उन्हीं पर केंद्रित एक कहानी लिखी- ‘आकाश-पक्षी’।

‘उसी बीच भैरवजी ने लिखा कि वहां कहां पड़े हो, यहां इलाहाबाद आ जाओ। इलाहाबाद से जब गए थे तो श्रमिक बस्ती में हमारा एक क्वार्टर था। तब दस रुपये किराया था उसका। एक खास मित्र के कहने पर वह क्वार्टर हमने किसी को दे दिया था। देते समय सोचा नहीं था कि लौटना पड़ेगा। दुर्योग कि लौटना पड़ा। उस व्यक्ति का परिवार बस चुका था वहां। उससे कुछ नहीं कहा और खुद कुछ दिन ए.जी. ऑफिस के भाटियाजी के यहां रहा। भैरवजी दिल्ली गए तो उन्होंने शेखर जोशी को अपने घर में रहने को कहा। जोशी भैरवजी के यहां लूकरगंज चला गया और मैं जोशीवाले घर में जा पहुंचा। मेरी कहानियों के साथ वही- 20/5, करेला बाग कॉलोनी वाला ही पता छपता था। ग्रैंड आदमी है जोशी। आप देखिए कि भैरवजी को दिल्ली से जल्दी ही वापस आना पड़ा। और यह देखिए कि शेखर मुझसे कुछ कहने नहीं आए। उनका वह घर जिसमें मैं था, सस्ता था, पर उन्होंने एक दूसरा महंगा मकान ढूंढ़ लिया वहीं लूकरगंज में। मुझसे कुछ नहीं कहा, ताकि मुझे दिक्कत न हो। मैं यहां मित्रों के सहारे ही रहा हूं। ‘60 के अंत में आया था और ‘80 के अंत तक रहा वहां, करेला बाग कॉलोनी में। ‘65 तक स्वतंत्र लेखन की स्थिति रही। अप्रैल ‘65 में माया प्रेस ज्वाइन किया। माया प्रेस से पहले हमने अश्कजी का काम किया था। बच्चों के लिए काफी कुछ लिखवाया था उन्होंने तब हमसे।‘

कुछ ऐसा याद आया है कि देर तक हंसे हैं। हंसी के साथ ‘सर्वसेवा संघ’ में काम करने के दिनों की बात शुरू हो गई है- ‘सर्वोदयी नेता सिद्धराज ढड्ढा से पहले दो-एक बार मुलाकात हो चुकी थी। उनका कार्यालय बनारस में था। वे अपने प्रकाशन पेपर बैक में लाना चाहते थे। सबकुछ की तैयारी मेरे जिम्मे थी। तनख्वाह ढाई सौ रुपये। नीचे जमीन पर बैठते थे सब। पूजा-पाठवाली चौकी जैसी मेज- लंबाई में बैठे हैं सब, पीठ पीछे मसनद, दीवार का सहारा। दो-तीन दिन काम किया। शाम को वहां चाय का इंटरवल होता था। सारे कर्मचारी एक कमरे में होते। इतने स्कैंडल्स- भ्रष्टाचार, सेक्स की इतनी बातें। उफ, सर्वोदयी लोगों का उस तरह स्कैंडल्स में रस लेना। दो-तीन दिन मैं बैठा। अजीब, विचित्र हालत- घड़ी की सुई घुमाई जाती, कोई समय से नहीं आता था। दस बजे वहां पहुंचनेवाला केवल मैं होता था। आखिर होली पर ही मैं इलाहाबाद आ गया। मार्कंडेय ने कहा कि ‘मित्र प्रकाशन’ में जगह खाली है, जाकर मिलो। भैरवजी ने फिर लिखा कि कैसे लोगों के बीच पड़े हो, यहां आ जाओ। ‘65 से 95 तक- तीस साल रहा हूं मित्र प्रेस में। जब ज्वाइन किया तो कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा था। चेक्स डिसओन हो रहे थे।‘ चेहरे पर तृप्ति भरा गर्वीला-सा एक उल्लास है- ‘बाद में इतना डेवलपमेंट… कि क्या कहें… सब देखा।‘

‘…प्रगतिशील लेखक संघ में तब डिवीजन हो गया था। वह उतना सक्रिय नहीं था, जनवादी लेखक संघ बन गया था। पर मैंने ओरिजनल संस्था में रहना उचित समझा। कारण? यही कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी में टूट हुई है तो उसके लिए साहित्यिक संगठन क्यों टूटे। तब हमारे दिन-रात के साथ- मामूली साथ नहीं रहे थे वे- छोड़कर दूसरी ओर चले गए। देखते-देखते सब क्या कुछ हुआ।‘ लंबी-गहरी सांस ली है।

एकदम चुप, गंभीर हो गए हैं। पहली बार हम लोगों के बीच खामोशी का इतना लंबा ठहराव हुआ है। भावुक-सा कुछ जैसे उफनकर बाहर आना चाह रहा हो और उसके ढके रखने की कोशिश में होठ हैं कि ढक्कन की तरह उठ-गिर रहे हैं। आहिस्ता-आहिस्ता। ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ मिलने से जुड़े कुछ संदर्भ-क्षण याद आना शुरू हुए हैं- ‘मैं प्रगतिशील था, पर कम्युनिस्ट नहीं था। फिर भी मुझे 1984 में पुरस्कार मिला। नामवर के कारण मिला। अनएक्सपेक्टिडली मिला। अचानक सुबह-सुबह लंबा-सा एक तार घर आया पुरस्कार मिलने का। और आप देखिए कि एक घंटे बाद मालूम हुआ कि इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई…। चारों तरफ तहलका- 31 अक्टूबर, 1984 बड़ा शॉक लगा। बेहद दु:खद घटना थी वह। किसी को नहीं बताई हमने पुरस्कार मिलने की बात। घर पर कह दिया कि किसी को मत बताना। दफ्तर में मित्रों को भी तब बताया जब स्टेट मोर्निंग खत्म हो गई थी। रूस अगले साल जुलाई 85 में गया… 15 दिन वहां रहा।‘

अचानक तब अमरकांतजी की बीमारी के एक खास दौर की यादें दौड़ी चली आई हैं- ‘सोवियत लैंड से आकर 1986-87 में हम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बेहद दर्द रहता था। रीढ़ की टी.बी. बताई थी। ये छोटेवाले पुत्र थे साथ। हां, दूसरे पुत्र अरुण वद़र्धन- ‘नवभारत’ में हैं, उनकी पत्नी कुमुद शर्मा यूनीवर्सिटी में पढ़ाती हैं। साहित्यकारों ने तो तब जो किया सो किया ही, पर दफ्तर, पत्रकारों और सरकार ने भी सपोर्ट किया। पत्रकारों के सहयोग का ही परिणाम था कि तब के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह घर देखने आए और पचास हजार का अनुदान घोषित किया। डॉक्टर हर सप्ताह आते थे, पर एक पैसा फीस का नहीं लिया। बाद में प्रेस मालिक ने भी किया। करीब डेढ़ साल तक मैं माया प्रेस नहीं गया, पर तनख्वाह तो मिलती ही रही। इंक्रीमेंट भी देते रहे, और भी हेल्प की। मैं एक तरह से तब सारे समाज से कटा हुआ था, पर बहुत मदद मिली। इससे आपको मॉरल ताकत मिलती है और फिर ‘88 के अंत में मैंने री-ज्वाइन किया अपनी ड्यूटी पर। यस, ऐज ज्वाइंट एडीटर…।‘

चाय पीते-पीते बताया जा रहा था- ‘चाय बस सवेरे और शाम को। सुबह दो कप, शाम को एक। कोई आ जाए तो बीच में पी लेते हैं, वैसे नहीं। अब देखिए, आपके साथ हम पी ही रहे हैं। नहीं, टहलने नहीं जा पते। पैर में तकलीफ है… ट्रैफिक सेंस नहीं है लोगों में… कमरे में टहल लेते हैं बस।‘

चाय के बाद सिलसिला फिर से शुरू करने के लिए मैंने पूछा था- कुछ अन्य रचनाओं और रचनाकारों ने भी तो आपके लेखन को प्रभावित किया होगा? बिना एक पल की देर लगाए वे कहने लगे, ‘प्रभाव तो पड़ता है। प्रेमचंद को तो बाद में पढ़ा। शरत को पढ़ा, उनका प्रभाव रहा। करुणा-दया ने प्रभावित किया। उनकी कई रचनाएं पढ़ीं। रवींद्रनाथ टैगोर की छोटी-छोटी कहानियां बहुत पसंद आईं। जैसे- ‘वापसी’, ‘काबुलीवाला’। ‘वापसी’ बहुत अच्छी कहानी है। ‘कफन’, ‘पूस की रात’, और अन्य बहुत-सी मारवेलस कहानियां हैं प्रेमंचद की। जैनेंद्र का ‘त्यागपत्र’ जब पढ़ा तो बहुत अच्छा प्रभाव हुआ। यंगमेंस का जो प्रभाव होता है, वह ‘इफ एंड बट्स’ में नहीं होता। ‘शेखर एक जीवनी’ का अच्छा असर पड़ा। ‘संन्यासी’ को पढ़ा। एक हसरत होती थी कि हम भी ऐसा लिखें। यह भावना आती कि मैं ऐसा लिख सकता। सोचता था कि मैं स्थूल नहीं, सूक्ष्म लिखूंगा। यशपालजी की भी कुछ कहानियां थीं, लेकिन उनमें से कुछ शॉक भी करती हैं। ‘ज्ञानदान’ है जैसे। वैचारिक है वो, पर… ये सब शुरुआती है। फिर अचानक बाहर की कहानियां पढ़ने को मिलीं। गोर्की, टॉल्सटॉय, दोस्तोवस्की आदि को पढ़ा। ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ा। अच्छा लगा- जीवन को समझने की समझ मिली। चेखव की कहानियां थोड़ा बाद में मिलीं। बलिया में था, तब जो मिल गया सो ठीक। ‘सैनिक’ में जाने के बाद कुछ मिला, कुछ खरीदा; पर वो शुरुआती दौर था। उम्र के अनुसार चीजें बदलती जाती हैं। जिस पीरियड में यह सब पढ़ा, हम आंदोलन में बिजी थे। फुरसत नहीं मिलती थी, घूमते-दौड़ते पढ़ते थे। उस समय के इंप्रेशंस अलग तरह के हैं- ताजगी भरे। अपने को उसी तरह का हीरो समझने की भावना। हर पीरियड का अलग इंप्रेशन। आज मैं जो पढ़ता हूं, उसी तरह की चीजें चाहिए…।‘

अब चर्चा के केंद्र में नई कहानी, उसको लेकर गांव-शहर को केंद्र में रखकर चली-चलाई गई बहसें और उस दौर की कहानियों का प्रदेय जैसे कुछ विषय आते जा रहे थे- ‘उस दौर में गांव-शहर की कहानियों का विवाद चला था। उसी दौर में मार्कंडेय, रेणु, शिवप्रसाद सिंह, केशव प्रसाद वर्मा, भैरवप्रसाद गुप्त आदि गांव के कहानीकार थे। ये सब गांव के लोग थे। मेरी समझ से यह बहस वर्चस्व की थी। यह तो है ही कि गांव एक व्यापक चीज है, हिंदुस्तान का रिप्रेजेंटेटिव है। अधिसंख्य जनता गांव में रहती है। इसलिए उस पर लिखना क्रेडिट की बात तो है ही। आप शहर की बात करें तो वहां ऊपर का चिकनापन है, भीतर छल है। आज तो और भी ज्यादा है। तो गांव पर अच्छा लिखना- जैसे प्रेमचंद, रेणु ने लिखा, क्रेडिट की बात तो है ही। शहर की नई संवेदना, नई चीजों और वहां के नए मूल्यों को केंद्र बनाकर राकेश, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव आदि ने लिखा। ‘मैला आंचल’ के साथ आंचलिकता की भी बात चली। मटियानीजी भी अंचल की बात करने लगे। तब इन सब में यह चला कि नया कौन है? नवीनता कहां है? गांव को नया नहीं माना गया, जबकि शहर का यथार्थ, संवेदना, शिल्प- सबकुछ नया माना गया। राकेश अपनी बातों को इसी तरह प्रस्तुत करते थे। खूब बहसें चलीं। यहां इलाहाबाद में भी- ‘परिमल’ में नहीं, पर लेखकों में चलीं। उन बहसों में ही यह तथ्य उभरकर आया कि ‘परिंदे’ नई कहानी के दौर की पहली कहानी है। इसे लेकर खूब विवाद चला। राकेश ने कहा कि ‘परिंदें’ भावुकता से भरी कहानी है…। नहीं, इन बहसों में हम कभी नहीं पड़े, न कभी लिखा। बाद में लिखा। ‘तद्भव’  के लेख को आप पढ़ें। मैं तो पहले से भी और अब भी कहता हूं कि निर्मल बहुत महत्वपूर्ण कहानीकार हैं- पर यह कहना कि वह पहली कहानी है अथवा कोई और या वो- तो ये कोई खास चीज नहीं है। गांव के तो और भी लेखक थे, पर शहरवाले ये तीन- राकेश, कमलेश्‍वर, यादव। भारती भी कुछ दिनों को उनके साथ आ गए थे। बाद में उन्होंने कुछ अच्छी कहानियां लिखीं, पर वे बहस में नहीं थे। और यहां इस प्र.ले. संघ में तो आलोचना ही होती थी उनकी।… मैला आंचल… हां, वो संस्करण जो रेणु ने छापा था, ‘57-58 में पढ़ होगा। पता नहीं किसने दिया, कैसे मिला- बलिया में पढ़ा था। पढ़कर अभिभूत हो गया था तब।

‘क्यों नहीं? उस दौर में परिवर्तन हुए- नवलेखन में तो हुए ही। आजादी के बाद के लेखन में चीजें पहले की तरह तो नहीं ही रहीं। वह जो बौद्धकता थी- चाहे वह क्रांतिकारी बौद्धिकता हो या कलावादी अथवा फ्रायडीयन- वे लोग अपनी चीजों को जीवन से साबित नहीं कर पाए, इसलिए दार्शनिकता से करते थे। हां, जैसे ‘दादा कामरेड’ या ‘सुनीता’ है- ये सब जीवन का टुकड़ा मालूम नहीं होता, बस थोपा जैसा कुछ अनुभव होता है। प्रगतिशील क्रांतिकारिता भी बौद्धिक अधिक थी। तब मध्य वर्गीय बौद्धिकता थी। जीवन को करीब से छूना, स्पर्श करना, विश्‍लेषण करना नहीं था। ये नहीं कि पहली सारी चीजें लुप्त हो गईं, पर उस रूप में नहीं रहीं। आजादी से पहले के जो साहित्यकार थे, वे राष्ट्रीय महत्व या प्राचीन गौरव का बयान करते थे। उसमें भावुकता-बौद्धिकता का होना जरूरी था। यह चेतना छायावाद से आई। साहित्य के विकास का एक पीरियड होता है। ‘दुलाईवाली’ कब लिखी गई? जब लिखी गई तब कच्ची थी। फिर धीरे-धीरे वह पकती गई। गुलामी के काल में जो भावुकता थी, प्रेमचंद ने- शुरू में नहीं, बाद में- उसे बचाया। लेखक और समय भी प्रगति तो करता ही है। तो तब जो नवलेखन था, वह बदला हुआ था। राकेश ने अगर ‘मलबे का मालिक’ लिखी तो वह पहले नहीं, आजदी के बाद ही लिखी जा सकती थी। घटनाएं आपको परिपक्व करती हैं। उस स्थिति में आप घटना पर परिपक्व ढंग से सोचते हैं। तब एक तो यह हुआ कि आप गुलामी से मुक्त हुए। दूसरा यह कि जिन्हें हम हीरो समझते थे, वे वैसे सिद्ध नहीं हुए। यहां भी आप परिपक्व होते हैं। ऐसे में दो ही चीजें हैं- या तो हम उनके पीछे चलें या फिर ठीक सोचें तो उन्हें चेक करें। साहित्यकार संवेदनात्मक रूप से चीजों को पेश करता है, वह राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं करता- कर नहीं सकता। वैसे भी रचना पहुंचती ही कहां है जनता तक! कुछ खास लोग ही पढ़ते हैं उन्हें। परिवर्तन तो राजनीति से होता है। रचनाएं तो चलती रहती हैं, संवेदनाओं का निर्माण-परिष्कार करती रहती हैं। काल बीत जाता है, समय बीत जाता है, लोग रचनाओं से विचार- आधुनिक विचार भी- प्राप्त करते रहते हैं। बिलकुल- जैसे कालिदास, तुलसी, शेक्सपियर की रचनाएं चल रही हैं आज तक।

‘तो- तब परिवर्तन तो हुआ। भाषा, शिल्प में ढीलापन और भावुकता गायब हुई। जीवन को देखने की दृष्टि भी बदलती। नहीं, नई कहानी नाम से कोई कहानी शुरू नहीं हुई। तब शहर, कस्बे या गांव की जो भी कहानी हुई, उसे नई कहानी नाम दे दिया गया। जैसे नई कविता की शुरुआत प्रयोगवाद से हुई, वैसा कुछ कहनी के साथ नहीं था। कविता, कला के जो पश्चिमी आंदोलन थे, उनका अधिकतर प्रभाव कविता पर पड़ा। कहानी पर वैसा प्रभाव नहीं था। बाद में बहसें जरूर हुईं। पहले की अपेक्षा रचनाओं में जो ताजगी, नयापन, नया परिवर्तन आप देखते हैं, उस आधार पर आप यह नाम दे भी सकते हैं। तब हुए नवलेखन की कुछ चीजों को लेकर आप यह कह सकते हैं। पर तब बहस इस दिशा में चल पड़ी कि कौन पहली? तो वह गलत दिशा में चली गई। उसके बाद ‘60 की पीढ़ी- और फिर पता नहीं किस-किस नाम से साहित्य में यह सब चलता रहता है।

‘नहीं, मुझे ऐसा तो कुछ नहीं लगता था तब, लगने का कोई सवाल नहीं। हमारे भी विचार हैं और आपके भी हैं। क्या होता है इससे कि हमें नया या कोई अन्य प्रकार का कहानीकार कह दिया? हम उसमें भी खुश। रचनाकार को हम ऐसे किसी खंभे से बांधकर नहीं रख सकते- और न ही इस तरह बांध देना चाहिए उसे। मैंने न कभी क्लेम किया, न कहा कि मैं नया कहानीकार हूं। रचना या रचनाकार को ऐसे किसी एक पीरियड में सीमित कर देना उचित नहीं। ऐसा किया तो अंत तक उसके बारे में आप वही कहते रहेंगे।‘

स्वर में आवेश युक्त उत्तेजना आ मिली- ‘ऐतिहासिक रूप से ठीक था यह कहना कि नई कहानी का यह काल और लेखक थे…पर…महीप सिंह क्या अंत तक संचेतनावाले ही थे या फिर समांतर…? आदमी एक पीरियड में रहता है, पर विकास भी करता है। किसी एक परंपरा के हैं तो विकास भी करता है। प्रेमचंद की परंपरा का होने का मतलब प्रेमचंद का पिछलगुआ होना नहीं है। जैनेंद्र प्रेमचंद के उत्तराधिकारी हैं- यह कहे जाने का आखिर अर्थ क्या निकलते हैं आप?  आप बताएं, रामविलास जी प्रयोगवादी तार सप्तक के कवि थे- तो उन्हें नई कविता का कवि नहीं मान सकते…? एक जमाने में कुंवर नारायण बीटनिक आंदोलन से बहुत प्रभावित थे, बाद में उन्होंने कहा कि मैं कबीर से प्रभावित हूं। आप बताइए कि किस कुंवर नारायण को मानें? सर्वेश्‍वर दिल्ली जाने के बाद कितने परिवर्तित हुए? और रघुवीर सहाय का सोचें- किसे मानें हम? मैंने एक कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ लिखी और एक ‘हत्यारे’ – दोनों का फर्क देखें। लेखक एक पीरियड में रहता भी है और उसका अतिक्रमण भी करता है। पीरियड की एक सीमा भी होती है और लेखक उसे तोड़ता भी है। तो संवदेनाओं में चेंज होता रहता है- सब में होता है। जागरूक है तो चेंज होगा ही। समय बहुत महत्वपूर्ण चीज है। वह चीजों को, व्यक्तियों को- सबको बदल देता है। बड़े-बड़े तानाशाहों, शासकों, लेखकों सबको धूल में मिला देता है। उनका कृतित्व ही रह जाता है। आपको पता है- तब यह खूब कहा गया कि कहानी मर गई, विश्‍व भर में इसकी संभवानाएं समाप्त। उस तरह की संभावना में नई कहानी के आंदोलन ने वह जमीन तोड़ी, हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाया। कोई आज गुलेरीजी, अज्ञेयजी या नवीनजी का ही छाता लगाकर चले तो क्या यह ठीक है? ठीक हैं, वे सब अपने समय के महत्वपूर्ण लोग थे, पर आज तो स्थितियां बदल गई हैं। लोग बदलते हैं, वेशभूषा में बदलाव आते हैं, अविष्कार होते हैं। हर युग में चीजें बदलती रहती हैं।‘

कुछ क्षण को आए उस आवेश ने उनके चेहरे की रंगत में थोड़ा सा बदलाव ला दिया। उस आवेश से मुक्ति पाने में भी उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। एक जगह चाचाजी का जिक्र करते-करते यकायक रुके- जैसे कोई उल्लसित कर देनेवाली बात याद आई है। लंबी सी हंसी के साथ बोले-  ’पता नहीं, तब आप पैदा भी हुए थे या नहीं- हम अलीगढ़ गए थे। हां, नौकरी के लिए। वहां एक मिल थी कपड़े की। वहां के तांगे, सुबह आठ से शाम छह तक की वह शिफ्ट, एक-एक महीने बाद शिफ्ट के परिवर्तन की वह सूचना। अच्छा सा एक मेस था। खाना भी अच्छा मिलता था वहां- पर मन नहीं लगा, तीन दिन में चले आए।‘

खाना मेज पर लग चुका है। उनके नाती ने गिलास-प्लेट्स लाने में खूब भाग-दौड़ के साथ अपनी मम्मी का सहयोग किया है। हम लोगों ने खाना शुरू कर दिया है। अब भी वे अनथके, अनवरत कुछ-न-कुछ बताते-सुनाते जा रहे हैं- ‘हां, हम खाना यूं ही हाथ में प्लेट लेकर खाते हैं। तभी से, जब से रीढ़ की हड्डी की ये प्राब्लम हुई।‘ मेरे खाने पर पूरा ध्‍यान है उन्हें- ‘देखो बेटा, मेरा अनुमान सही निकला… चावल उतने चाव से नहीं खाएंगे ये।… नहीं, आप और कुछ लीजिए…संकोच मत कीजिए।…नहीं हम दोपहर को नहीं सोते, शाम को ही लेटते हैं। दोपहर में कभी-कभी ही लेटते हैं।‘

खाने के बाद चर्चा उनके संपादन काल के कुछ खट्टे-मीठ अनुभवों से शुरू हुई। उस चर्चा के बीच ही मैंने अमरकांतजी के शांत-चुप रहने के स्वभाव के बारे में एक-दो प्रश्‍न किए थे। साथ ही साहित्यकारों के बीच चलते रहने वाले आरोप-प्रत्यारोपों, उठा-पटक, खींच-तान आदि के कारणों-परिणामों के बारे में उनकी राय जाननी चाही थी। बड़े सरल-निर्मल भाव से वे कह रहे थे- ‘स्वभाव का सवाल नहीं- पर ऐसा भी नहीं कि आप छेड़ेंगे तो हम जवाब नहीं देंगे। वैसे यह देखिए कि लड़ाइयां कहां होती हैं- दो महात्माओं में, दो औरतों में, दो कुत्तों में, दो विद्वानों में- यानी समानताओं में।‘ कहकर देर तक हंसे हैं। फिर गंभीर होकर कहा जा रहा है- ‘हम आज के थोड़े ही हैं- 1925 का जन्म है। पुराने हुए हम लोग- जबरदस्ती हैं अब यहां। हम चाहते हैं कि लेखक बिरादरी में उदारता हो। कभी-कभी लोग चीजों को समझने में अन्याय कर देते हैं। हम जानते हैं कि आप क्या हैं, पर हम चाहते हैं कि आप भी तो समझें कि हम क्या हैं? जनतांत्रिकता, संवाद, विचार की जो बात है, वह कम अहम नहीं है। मित्र रोज बदलने की चीज नहीं है। किसी कारण उनके विचार बदल भी गए तो उन्हें बदल नहीं देना हमें। विचार तो जमाने के साथ बदल भी जाते हैं, देखने का दृष्टिïकोण भी बदल जाता है। फिर भी यह नहीं कि जमाना बदला तो मित्र भी बदल दें हम। आप मुझे देखिए- मैं मुख्य रूप से राजनीति से होकर आया। राष्ट्रीय आंदोलन से होकर निकले हैं, इसलिए गांधी, नेहरू, लोहिया, जेपी, नरेंद्र देव जैसे लोगों का बहुत प्रभाव रहा। अगर कोई मुझे अपनी धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता समझाना चाहे तो मैं नहीं समझूंगा। मैं वह जानता हूं, मैंने वह सब तब वहां देखा है। मैं एंटी हिंदू, मुस्लिम या सिख हो जाऊं, यह नहीं होगा। ऐसा कहने-समझने वाले को समझना चाहिए। कोई हमें समझाए कि कायस्थ हो तो कायस्थवाद पर चलो, तो यह संभव नहीं है। आप हमसे ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं?  हम यदि आपका सम्मान करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह आपके राजनीतिक विचार का सम्मान है। हमारा जुड़ाव इस राष्ट्रीय से, जनता से है। हम किसी का अपमान नहीं करते, दूसरों के गुणों का सम्मान करते हैं। नहीं, अब नहीं राजनीति में। तब सक्रिय राजनीति में था। खद्दर पहनता था, आंदोलनों में शामिल रहा। इस पर गर्व नहीं कर रहा हूं। तीसमारी नहीं है यह, फर्ज था। उस समय बहुत से नौजवान इस रास्ते पर थे। जो हो सका, बहुत था। हां, जब आगरे में था, तब राजनीति से अलग हो गया था। हां, कारण था उसका।… हम साहित्य की राजनीति में कितना, किस तरह, किसलिए जाएं? पुरस्कार के लिए, पद या सम्मान के लिए? आप हमसे क्या आशा करते हैं? इस उम्र में भी हम यही तमन्ना रखते हैं कि लिखें। यह गर्वोक्ति नहीं है कि हमने धीरे-धीरे ही सही, पर लिखा। ‘42 के आंदोलन पर लिखने की पहले भी तमन्ना थी, पर फुरसत नहीं मिली। अब लिखा- देखिए, इतना मोटा। उन दिनों पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं। पैरेलैटिक हो गई थीं। आपने पढ़ा है? नहीं पढ़ा तो कभी छू तो लीजिए उसे।… अभी सोचा है, एक और बड़े उपन्यास पर लिखें। इच्छा रहती है कि लिखूं। उस बीमारी की अवस्था में भी तय किया था कि सबको लिखूं मैं। सोचता हूं, जो भी कहे, सबको लिखूं। कोशिश करता हूं। ‘इन्हीं हथियारों से’ जब लिखा तब से बेहतर हो गए हैं हम। अब बैठकर भी लिख सकते हैं।‘

व्यक्ति के रूप में आज के हालात पर आप कैसा महसूस करते हैं? प्रश्न करते समय कल्पना नहीं की थी कि इस एक सवाल के उत्तर में इतने मनो-मलाल की बातों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। अन्य अनेक प्रश्नों के जवाबों को सम्माहित करते हुए अमरकांतजी देर तक लगातार बोलते जा रहे थे-  ’व्यक्ति के स्तर पर मेरे सोचने-महसूस करने का क्या मतलब है आपका? व्यक्ति से क्या मतलब है? राष्ट्रीय की बात करेंगे आप तो व्यक्ति का अर्थ क्या है? सदियों के इतिहास में मानव ने जो प्रगति की है- उसके सारे संस्कार किसी-न-किसी रूप में आप में हैं। आप कहें कि आधुनिक हैं तो आधुनिक कोई हवा में लटकी चीज नहीं है। जो है, सब जमीन पर है। मूल्य-विचार जो भी हैं- आपकी वह जमीन है, आप उस पर खड़े हैं। आप उसमें परिवर्तन भी करना चाहते हैं। मेरी ही नहीं, हर व्यक्ति की करीब-करीब इसी प्रकार की एक स्थिति है। कभी ऐसा भी था कि इनसान नंगा रहता था, उसके पास भाषा नहीं थी, न कोई मूल्य ही था। यहां तक कि आज के सेंस में जो सामाजिकता है, वह भी नहीं थी। तो मानव-मूल्य भी एक्वायर्ड हैं, उन्हें आदमी ने अर्जित किया है। तो आज जो हैं… इतनी यात्रा करके आए हैं। इसमें बहुत सारी चीजें आती हैं। एक जमाने में ये बहुत सारे धर्म यहां नहीं थे। अनीश्वरवाद भी फैला था। मातृसत्तात्मक समाज था, जिसमें स्त्री प्रमुख थी। तो आप देखिए कि इस यात्रा में, यहां तक आने में कितनी जय-परायज भी हैं। बाद में होता यह है कि कुछ मूल्य बचे रह जाते हैं, कुछ व्यर्थ हो जाते हैं। बचे रह गए मूल्यों को लेकर आप प्रगति की यात्रा आगे बढ़ाते हैं। इतिहास के बहुत से अंश किसे मालूम हैं? आज की स्थिति में हम जहां पहुंच रहे हैं- तो केवल हमारा सवाल नहीं है, औरों का भी, सभी का है कि पूरे विश्व के बारे में आप क्या और कैसे सोचते हैं। आप केवल व्यक्ति नहीं हैं, केवल सीमित नहीं हैं। यदि लेखक कहता है कि हम व्यक्तिवादी हैं…व्यक्ति स्वातंत्र्य… मतलब क्या है इसका? व्यक्ति की भी परिभाषाएं परिवर्तित हुईं। पूंजीवाद आया तो व्यक्ति आया। पहले कहा गया कि व्यक्ति धर्म था, सामंत था। पर जब पूंजीवाद आया तो कारखानेवाला सामंत से भी अधिक शक्तिशाली हो गया। तब व्यक्ति स्वातंत्र्य का दर्शन आया। कंसेप्ट यह था कि शासन व्यक्ति के बारे मे कम-से-कम हस्तक्षेप करे। धीरे-धीरे इसकी भी सीमाएं स्पष्ट होने लगीं। फिर वह परिभाषित होने लगा ओर साम्यवाद तक आया। यह क्या ठीक है कि विचारधारा ही लेखन का पर्याय हो जाए? ये तो सभी मानने लगे हैं कि विचारधारा लेखन का पर्याय नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन ने यह दिखाया कि स्वार्थ, सांप्रदायिकता आदि से विघटन होता है, जबकि मेल-मिलाप से समाज जुड़ता है। सोचनेवाले तो आप ही हैं- आप चाहें तो समाज को विघटित कर दें या आप कोशिश करें कि लोग मिल-जुलकर रहें।

‘राजनीति का अर्थ हम यही जानते हैं कि सेवा, जनता की भागीदारी, स्वावलंबन, स्वदेशी, शक्तिशाली बनना है, पर शक्ति दूसरों को बांटना है। शक्ति की सार्थकता उसके व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उपयोग में नहीं है। उसका लाभ दूसरों को देने में है। देना, बांटना, उदारता- यही शक्ति की सार्थकता है। स्वयं को लाभ पहुंचाने पर पर उसका मतलब हो जाता है तानाशाही। शक्ति के लिए आप सिद्धांत बदल दीजिए- जैसा बहुत लोग करते भी हैं- तब तो बात अलग है, पर आज का आदमी देश और समाज के बारे में जरूर सोचेगा। मैं नहीं सोचता कि कोई आदमी अपने समाज के कटा है। तो अब आप ही बताइएं कि हम व्यक्ति के रूप में क्या सोचें? व्यक्ति अकेला नहीं चल सकता। वन में तपस्या करता है, तब भी समाज के बारे सोचता है। यदि आप समाज-विचार की कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते तो फिर सबसे प्यार, यश, प्रतिष्ठा क्यों चाहते हैं? लेखन में इन्हीं चीजों पर विचार करने के बाद ही तो लिखते हैं। इन चीजों से टकराहट होगी ही। उसका आपसे, आपके मित्रों से मतलब भी होगा ही। लेखक जो भी लिखता है, वह उसकी क्षमता, सामर्थ्‍य, उसकी दृष्टि आदि चीजों पर ही निर्भर करता है। यदि वह सामाजिक सच्चाइयों का सामना नहीं करता तो उसके सामने कठिनाइयां तो आएंगी ही। जब वह व्यक्ति के रूप में भी सोचता है, तब भी, मैं नहीं सोचता, कि वह कटे रूप में सोचता है। उसके साथ हमेशा देश, समाज सब है। वह स्वीकार न भी करे तब भी उसके साथ बहुत से संस्कार, विचार, अनुभव हैं। उनसे वह गुजरा है। उसे वे सताते भी हैं। भावनाओं, संवेदनाओं और भाषा के द्वारा जब लेखक अपने अनुभवों को पेश करता है, तब वह इतना सरल काम नहीं है। व्यक्ति की तरह समाज में भी अंतर्विरोध होते हैं। व्यक्ति यदि कुछ बनना चाहता है तो उसे अंदर की बहुत सी प्रवृत्तियों को अवरोध-विरोध करना पड़ता है, तब वह बनेगा। यदि वह कुछ समझना चाहता है, तब भी यही होता है। समाज में अशिक्षा, पिछड़ापन जैसे न जाने कितने अंतर्विरोध हैं। अंतर्विरोध के बीच कैसे रास्ता बनाया जाए, यह समस्या व्यक्ति, लेखक, राजनीतिज्ञ, समाज-  सभी के समाने रहती है। अंतर्विरोध को जाने-समझे बिना आप रचना में वह चीज उभार ही नहीं सकते, जो उभरनी चाहिए। रचना सपाट को जाएगी।

भ्रष्‍ट और अवमूल्यन के इस दौर में साहित्य तथा परिवर्तन को लेकर आप किस तरह सोचते हैं?

‘राजनीति में भ्रष्टचार आदि…। नागरिक के रूप में इन चीजों को लेकर हम भी दुखी होते हैं। बहुत सी चीजों में खुद भी दबे हैं, कुछ उन्हीं चीजों से गुजरते भी हैं, पर इसका सुधार राजनीति ही कर सकती है। आज के समय में वही प्रभावी है। पर हर तरह की राजनीति थोडे ही कर पाएगी यह सब। जब गांधी, लेनिन, माओ जैसे चिंतक, सोचने-विचारनेवाले लोग होते है, तब परिवर्तन होते हैं। परिवर्तन आपके चाहने या भाषण देने से तो नहीं होगा। उसके लिए भारी संगठन करना पड़ता है, समय की सच्चाइयों को जान-समझकर देखना पड़ता है कि वह सब कैसे होगा। यह सब बिना त्याग के तो होगा नहीं। आपने देखा है कि नहीं, आजकल नेता मोटे होते जा रहे हैं। इसलिए कि सक्रियता नहीं है। मोटर है, गोश्त है, शराब है- पर उस तरह की सक्रियता नहीं है नहीं है तो नहीं है। यह हर पार्टी के साथ है। पहलेवाला जमाना अब नहीं है। कोई पार्टी उस तरह अब ठीक नहीं है। लेखक के नाते…? बदलाव? हम एक बात कहते हैं कि हम परिवर्तन थोड़े ही कर सकते हैं। गाली देकर या आलोचना करके हम क्या कर लेंगे? लेखक जो लिखता है उसका तत्काल तो असर पड़ता नहीं है। वह तो संवेदनाएं-भावनाएं बदलने-बनाने का काम करता है। कबीर, तुलसी जैसे कुछ लोग बच जाते हैं, बाद में कुछ रचनाएं बच जाती हैं। समय लगता है। साहित्य में मनुष्य की तुच्छताएं, ग्रेटनेस, जय-पराजय, उसके विचारों, भावनाओं, संस्कृति आदि सारी चीजों से मतलब रहता है। अगर आपने अपने समय के मुनष्य का चित्रण कर दिया तो वह चित्रण जीवित रहता है। जो चीजें दोषों, विकृतियों, गिरावटों के बीच मनुष्य को आगे बढ़ाने, मिलाने, संषर्घ करने का महत्व देती है, बढ़ाती है, वे चीजें हांट करती हैं, आगे चलती हैं ओर हर युग में प्रासंगिक भी होती हैं। महात्माजी ने क्या किया- पचपन करोड़ का पाकिस्तान का जो शेयर था, वह दिलवा दिया, आंदोलन किया- बस यही तो… और उनकी हत्या कर दी गई। इतनी बड़ी ऐतिहासिक शक्ति, मानवता का प्रतिरूप, एक महामानव। चाहा कि लोग एक साथ रहें, लड़कर नष्ट न हो जाएं। देश की एकता के लिए जान दी। इस तरह की कितनी घटनाएं हैं दुनिया में? तब बताइए कि व्यक्ति के रूप में हम क्या सोचें?… हम सोचते हैं कि लिखकर बहुत तीर मार लिया, पर स्थिति है असंख्य लोग अशिक्षित हैं। प्रेमचंद की रचनाएं उनके जमाने में या आज भी कितने किसानों ने पढ़ी होंगी? ड्रामा करने को दिखा दें, पर पढ़ी कितनों ने हैं? परिवर्तन एक लंबी प्रक्रिया है, चलती रहती है।‘

लगा कि बहुत दिनों का दबा-भरा कुछ बाहर आ गया है एक साथ। बोझिल-से हो चले उन कुछ पलों को खिसकाने-हटाने के इरादे से ही मैंने अमरकांतजी से उनके सर्वाधिक महत्वपूर्ण संबंध और बेहतरीन-सी उनकी किसी पसंद के बारे में जानना चाहा था- ‘ऐसा कोई एकाकी संबंध नहीं है। मुझे मित्र पसंद हैं, मित्रता पसंद है- एक जमाने में हमारे बहुत मित्र थे। नहीं, कोई विशेष किस्म जरूरी नहीं। साधारण आदमी भी हमारे मित्र हैं। पसंद करते हैं, बहुत पसंद करते हैं- क्या मतलब? मां, पिता, भाई को कह सकते हैं- पर पसंद तो अलगाव का संबंध है। यह कहकर आप अपने को ऊंचाई दे रहे हैं। इससे कोई चीज व्यक्त नहीं होती। पंसद करना व्यावहारिक शब्द हैं, उसमें आदान-प्रदान है। बहुत हुआ तो आप ऐसा कुछ, कुछ समय के लिए जवानी में कर लेंगे। एक औरत को पसंद कर लेंगे, पर वह सब स्थायी नहीं होता। वे जीवन फानी है- जो जवानी में पसंद, वो बुढ़ापे में विकृति। भाई से जुड़ाव था। राजनीति की बात करें तो बड़े उद्देश्य के लिए जनसेवा, लोगों के सुख-दुख से जुडऩा अच्छा लगता था। हमारे पसंद करने का क्या मतलब? कोई विद्वान है, उसे हम पसंद करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि हम उसका, उसके विचारों को विरोध नहीं कर सकते। राजेंद्र दोस्त रहे, पर उनके दोषों को हम क्यों स्वीकार करें? रिश्ता एकांगी ही हो, यह संभव नहीं। उसे प्यार भी नहीं कह सकते। जैसे गांधी का था कि ‘हर अच्छा सिद्धांत बिना व्यवहार के कीड़ा लगा मीठा फल है।‘ आप में कार्य रूप में परिणत करने की कला यदि नहीं है तो स्‍थायित्‍व संभव नहीं। आप किसी को पसंद कर लें, प्यार कर लें, एक समय तक रद कर लें- सवाल यह है कि वह कसौटी पर कितना टिक सकता है?…जीवन का यह जो खेल है- उसमें पसंद शब्द द्वारा ही यदि आप जानना चाहें तो मुश्किल है। वैसे यह कि मुझे हरी पत्ती पंसद है… सूर्योदय…इनका रंग…सबकुछ बदल जाता है, उसकी परिभाषाएं बदलती रहती हैं। आप यदि जागरूक हैं तो रिश्ते की वास्तविकता को समझते हैं। शुरू में हर रिश्ता अच्छा लगता है। पर इसका कुछ अर्थ नहीं। आपको बहुत सी गलत बातें कोई क्यों पसंद करे? अब जैसे माता है- उसने इतना दिया है कि आप उसका दूसरा रूप सोच ही नहीं सकते। भले ही आज लोग मां की हत्या भी कर देते हैं- फिर भी उसका स्थान कोई ले नहीं सकता। उसको पसंद करना क्या है? हलका शब्द है। फूल पंसद है, पर उसके लिए जान तो नहीं दे सकते। रिश्तों में प्यार …पसंद? उसकी परीक्षा संकट में होती है। यहां यह एक व्यावहारिक पक्ष है।‘

5.45 हो चले थे। हिचकती-सी एक दृष्टि से मैंने अमरकांतजी के चेहरे पर थकान के चिह्न ढूंढने चाहे थे। मैं कुछ कहूं, उससे पहले ही सुनाई दिया- ‘पूछिए आप, जो पूछना है। आपको परेशान करनेवाली जो बात हो, पूछ लीजिए। लिबर्टी है आपको, कुछ भी पूछ लीजिए।‘ एकदम से कुछ नहीं सूझा तो मैंने उनसे उनके बचपन की कुछ शरारतों को याद करने का आग्रह किया। शरारत की बात पर पहले खूब हंसे, फिर बोले, ‘हां, बचपन में मैं शरारती था।‘ अचानक कुछ ध्यान आया है- रुके हैं। अंदर आवाज लगाकर नाती से टीवी पर आ रहे क्रिकेट मैच का स्कोर के बारे में जानना चाहा है। मैच की बात खत्म हुई तो मैंने खेलों के प्रति लगाव के बारे में भी जानने की चाहत व्यक्त की। अब क्रिकेट मैच से उन्होंने स्वयं को अलग कर लिया है- ‘खेलकूद से बहुत लगाव था। इंटर मे हॉकी, फुटबाल, वॉलीबॉल की तो कॉलेज टीम में भी था। ये दो खराब आदतें थीं बचपन में- जैसे लंगी लगा देना… हां, छोटे भाई या नौकर को लगा देते थे…और नाक मल देना। पता नहीं क्या लगता था कि छोटे भाइयों की नाक मल देता था। शरारत बहुत सी हैं, पर ये दो जान लें आप। हां, मार भी खाता था मैं। पिताजी मारते नहीं थे। मां मारती थीं। उनका मारना मालूम नहीं होता था। खेल- ऐसा शौक कि यूनीवर्सिटी में या शहर में कोई भी टूर्नामेंट होता, मैं देखने जरूर जाता था। नहीं, अब नहीं जा पाऊंगा।‘ एकदम खुश, कुछ उत्तेजित से दिखे हैं- ‘एक बार क्या हुआ कि लूकरगंज में फुटबॉल का टूर्नामेंट था। मैं देखने गया। इंटरवल में देखा कि बगल में रेणुजी भी खड़े हैं…। टेनिस खेला नहीं, पर देखते-देखते चीजें जान गया हूं। क्रिकेट का तो पूछना ही नहीं…। अब आंखें काम नहीं करतीं, सो टीवी पर भी नहीं देखता। पर पहले जब घर में रेडियो भी नहीं आया था तो बाहर खड़े होकर सुनता था। खेल मुझे बहुत पसंद हैं। अखबार का खेल पेज आज भी डिटेल में पढऩा चाहता हूं।…फिल्म? नहीं, अब नहीं देख पाता। एक जमाने में बहुत देखता था। अच्छी फिल्म मिले तो शौक है, पर अब अच्छी फिल्म मिलती नहीं। अंग्रेजी-हिंदी बहुत फिल्में देखीं। जिन दिनों पत्रकार था, जितने चाहे सिनेमा के पास मिल जाते थे। आगरा में यह परंपरा थी सिनेमाघर वाले प्रेस शो करते थे, पत्रकारों को सम्मान से बुलाते थे। आगरा कैंटवाले सिनेमाघर में अंग्रेजी फिल्में लगती थीं। साइकिल पर कभी अकेले, कभी किसी को साथ लेकर देखने पहुंच जाते थे। बहुत सी अच्छी फिल्में वहां देखीं। ठीक है कि आजकल डांस करना ज्यादा सीचा चुके हैं, पर केवल वहीं तो फिल्म नहीं है। फिल्म में तो पूरा जीवन होना चाहिए।‘

वो क्षण, वो घटना जब आप बहुत रोए हों?

पलकें हांफने जितनी तेजी से उठ-गिर रही हैं। उनकी उस तेजी ने जैसे भौंहों के सफेद, घने बालों तक को हिला-कंपा दिया है। अब आंखें बंद हैं- ‘या तो डेथ पर रोता हूं, और तो रोने का जो समय आता है, रो नहीं पाता। पिताजी की डेथ पर था भी नहीं, बाद में गया रो नहीं पाया। माताजी, भाई राधेश्याम, अपनी पत्नी और चाचाजी- इनकी डेथ पर रोया। बहुत रोना क्या होता है? रोया। रोना बहुत आसान नहीं है। रोना वह होता है, जब आप रोक न पाएं । स्वाभाविक ढंग से, जैसे बच्चा रोता है, रुलाई आती है। वैसे तो हर संवेदनशील स्थिति में मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं, पर अचानक यूं ही कि जब आप रोक न सकें। सोचते जाते हैं कि नहीं रोऊंगा, आंसू नहीं आएंगे, पर…। इंदिरा गांधी बहुत साहसी थीं, पर संजय गांधी की मौत पर हमने उनका रोना देखा था। इतनी साहसी महिला भी रोक नहीं पाई…।‘

अपमानित महसूस करने से जुड़ी कोई याद?

‘अरे, यह कहां? यह बहुत नाजूक चीज है। इसका क्या कहूं? अपमानित होने का मतलब- दफ्तर में आप काम कर रहे हैं, आपके बॉस ने डांट दिया- तो यह कोई अपमान नहीं है। आपके काम का हिस्सा है यह। अपमान वहां होता है जहां इनसानियत, या जो तकाजे हैं- रिश्तों का उल्लंघन कर देते हैं। जैसे दोस्त हो कोई, उससे आशा करें हम, वह वो न करे। तब एक अपमान-सा मालूम होता है। या फिर आपका कोई सीनियर या बॉस उस रिश्ते का उल्लंघन करके व्यवहार करे और जहां आप शालीनता, नेचर या अन्य वजह से जवाब भी न दे सकें- तो आप अपमानित महसूस करते हैं। तब प्रतिरोध की भावना भी आ सकती है। अपमान तो मिलते रहते हैं जीवन में। इतने लंबे जीवन में कई अवसर आए होंगे- लेकिन इस पर बहुत एक्सप्लेन नहीं करना चाहता हूं। हां, मित्रों से, बॉस से भी आए हैं। कोई उपेक्षा कर दे, मुझे बुरा नहीं लगता, सबसे आशा भी नहीं करता। सबसे करनी भी नहीं चाहिए। बहुत से किस्से हैं- पर उन्हें मैंने अपमान के रूप में लिया ही नहीं। जीवन जीने के सबके अपने तरीके हैं।‘

खुशी या सम्मान का कोई एक क्षण?

‘अरे यार, आप भी क्या..? सम्मानित- तो क्या- समझ नहीं आता। पुरस्कार वगैरह में क्या सम्मानित होना? मुझे थोड़ा-बहुत सम्मान मिला है- अगर हुआ है तो मैं उसके महत्व को समझता हूं। सम्मान का कोई अर्थ नहीं है। कोई काम पूरा हो जाए तो ठीक लगता है। सम्मान से मैं अभिभूत नहीं होता। लोग स्नेह में आकर सम्मान देते हैं। भले ही रचना पढ़ें या न पढ़ें, पर सम्मान हो गया। एक अनजान जैनुइन पाठक जब आपको ऐसा लिख देता है, जो दूसरे लोग कह-देख न पाए हों तो सम्मान की भावना आती है। हां, एक कहानी है मेरी…वो नाम…भूल रहा हूं- अरे गोलू(नाती), वो संग्रह तो ले आओ। संपूर्ण कहानियों का पहला भाग। हां, याद आ गई- ‘गगन बिहारी’-  बहुत लोग इसे एप्रीशिएट कर पाए या न कर पाए- पर एक पाठक ने जिस तरह एप्रीशिएट किया- तब एक बड़े आह्लाद और सम्मान की भावना पैदा हुई। ये सब तो होता है- क्षणिक कुछ होता है। बुरा नहीं लगता, अच्छा लगता है। पर ऐसा नहीं होता कि मनाने या सेलीब्रेट करने लगें। हमारे जीवन में ऐसे अवसर कम आए हैं।‘

अपनी कुछ खराबियां?

बहुत खराबियां हैं। कमजोरियां हैं, उनसे कॉशस रहता हूं। व्यावहारिक नहीं हूं, यह बड़ी भारी कमी है। उन मोर्च पर काफी पिटा हूं। यह भी कि जिस तरह नियमित ढंग से मेहनत करनी चाहिए, मैं नहीं कर पाता हूं। अपनी फीलिंग दूसरे को कन्वे नहीं कर पता। भीतर-भीतर रह जाता है वह सब। पर इसका दूसरों पर ताप या अभिशाप हो, ऐसा भी नहीं है। शारीरिक रूप से पहले से ही कई कमियां रही हैं। डायवर्टिड एनर्जीज हैं। एकोन्मुख एकाग्रता पूरी तरह बढ़ पाना संभव नहीं हुआ। जो करना चाहता था, उसमें इस चीज ने बाधा पहुंचाई। उसके लिए मैं रेस्पांसिबल हूं, कोई और नहीं। चाहता था, एनर्जी एक ही चीज में लगे, पर नहीं लगी। काल्पनिकता- कल्पना में उडऩा-व्यवहार में कुछ नहीं किया तो आपका डायवर्जन तो हो गया।‘

और आपकी शक्ति, पूंजी, ताकत?

‘ताकत यही रही कि मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया है और एक रास्ते पर लगाने की कोशिश की है। अनियंत्रित भावनाओं को नियंत्रित करने की मैंने कोशिश की है, वही मेरी ताकत है। भावनाएं- दुख की, सुख की या और कैसी भी हों- उनमें जब आप अपने को नियंत्रित करेंगे, तभी कुछ कर सकेंगे। सारे विरोधाभासों के बीच से तटस्थ होकर वास्तविकता को देखने की जब एक आदत पड़ जाएगी, तभी आप कुछ कर पाएंगे। दूसरों के साथ क्या होता है, मैं नहीं जानता, पर मेरे साथ ऐसा है। यह न कर पाता तो मैं उड़ ही गया होता। इसमें मेरी वे बीमारियां, जो बार-बार पटकती रही हैं, उनमें स्वयं को नियंत्रित कर कुछ करते रहना- इसे आप ताकत कह सकते हैं, जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष या जीवन के प्रति आस्था कह सकते हैं। आस्था तभी बची रहती है, जब आप नियंत्रित कर पाते हैं अपनी भावनाओं को। मैं इंडल्ज नहीं कर सकता। मेरे पिताजी की शिक्षा थी कि कभी शराब न पीना- पर मैं भी यह जानता हूं कि मैं अधिक शराब पी नहीं सकता। ऐसे ही अत्यधिक उत्साह, अत्यधिक भावनाएं मुझे असमर्थ बना देती हैं। इसलिए मैं किसी चीज पर रिएक्ट नहीं करता। गलत की बात मैं नहीं कर रहा हूं- वैसे गलत हैं भी नहीं- रिश्ते जो अच्छे हैं, कायम हैं। इसमें उनका भी सहयोग है, पर मैं टूटन, बिखराव एफोर्ड नहीं कर सकता। यह मेरी नेचर में भी नहीं है। आप मुझे बहुत मालामाल कर दें, बहुत प्रताडि़त कर दें- हमारी ताकत भावनाओं में उद्वेलित हो जाने या हर चीज पर परेशाना हो जाने में नहीं है। काम करना है तो आपको तटस्थ बनकर रहना पड़ता है। हमारे लिए यह जरूरी है। इसलिए बहुत सी चीजें हमसे नहीं हो पातीं। जो मिल जाता है, बहुत है। जो कर लेता हूं, उसे उपलब्धि मानता हूं। यह स्थिति आज नहीं, पहले से ही है। पहली कहानी आई, तो खुशी हुई, वास्तविक खुशी हुई। तुरंत बाद में यह सोचा कि एक कहानी लिखकर कितना खुश हो सकते हैं? यह तो अभी पहली कृति है, अभी तो हमें बहुत कुछ करना है। इससे अभी क्या मिला? बस वह भावना स्वत: तिरोहित हो जाती है। यह जान-बूझकर नहीं होता, यह प्रक्रिया चलती रहती है। वह उपलब्धि इसलिए लगती है कि हमने एक चीज लिखी, लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं, आपको, आपकी चीज को लोग समझ रहे हैं- इससे ताकत तो मिलती है। पर उसली ताकत वही है कि आप अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके कितना कुछ कर सकते हैं। हार्ट अटैक हुआ यह भावना थी कि मैं कुछ कर न सका। उस बीमारी से बचने के लिए सदैव प्रयासरत रहा। यह हमारी ताकत बन गई- इसलिए कुछ लिख सका। हालांकि भावनाओं में ताकत होती है, पर भावनाओं से दूर बने रहना मेरी ताकत बन गया। मेल-जोल की बातें, दूसरों के सुख-दुख से जुडऩा, व्यक्तिगत भावनाओं से अलग रहकर दूसरों से, समाज से उन्हें जोड़कर देखना- ये ताकत रही है।‘

अब अगला उपन्यास?

‘उपन्यास- एकदम बहुत जल्दी शुरू करने वाले हैं। वह ‘इन्हीं हथियारों से’ जितना बड़ा तो नहीं होगा। सोचता हूं- डिमाई आकार में, चार सौ पेज तक का होना चाहिए। सोचा कि निजी जीवन के जो अनुभव हैं, उन पर लिखूं। कैसे होगा? सोचता हूं, सारी शक्ति लगा देनी चाहिए। उम्र काफी हो गई है- अब शक्ति, क्षमताएं…। उसकी तस्वीर पूरी साफ है। एक दूसरा उपन्यास पत्रकारिता जीवन पर है। कुछ शुरू किया था। ‘प्रभात खबर’ में ‘खबर का सूरज’ करके उसका एक चैप्टर छपा था- उसे लूंगा। यह दूसरी प्राथमिकता है। ऐसा नहीं है कि उसमें इतिहास ही होगा, उसमें हमारी पत्नी भी रहेंगी, हम होंगे, पर कल्पना भी होगी। पर पहली प्राथमिकता तो वो है- जीवन का निचोड़ होगा उसमें- क्या देना है, क्या कहना है- मोटा खाका तो बना लेते हैं, पर लिखते समय अनेक ऐसी दबी चीजें आती हैं, जो एक्सप्लेनेशन मांगती हैं- तभी देखें कि क्या हो।‘

बाहर-भीतर की रोशनी ने रात होने की सूचना दे दी थी। मैं चलने को हुआ ही था कि सुनाई दिया- ‘एकाध और तीर निकाल लीजिए। कोई प्रश्‍न-जिज्ञासा रह न जाए। आप इतनी दूर से आए हैं।‘ तुरंत क्या पूछूं, कुछ तय नहीं कर पाया। हड़बड़ाहट में यूं ही पूछ लिया- ‘क्या कुछ चीजों-बातों का अफसोस या मलाल भी किया है आपने इन दिनों?’ थोड़ी देर चुप रहे। बोले तो कहा, ‘हाइपोथेटिकल है ये भी।‘  ऐसा कुछ याद न आने की बात की। और फिर जैसे मेरा मन रखने को शुरू किया है- ‘अपने बारे में एक यह कि ऐसा आदमी था जिसकी कल्पनाएं बहुत थीं, पर क्षमताएं भी जानता था। एक जमाने मैं बहुत बड़ा राजनीतिक व्यक्ति बनना चाहता था। दूसरा- संगीतकार बनना चाहता था- सुविधाएं नहीं मिलीं। और लेखक बनने का- वह बाद की भावना है। बाद में इच्छा हुई। जेल से छूटकर आए हमारे अनेक साथियों ने जो रूप दिखाए, उससे राजनीति से वितृष्णा हो गई। बचा साहित्यकार होना- तो शरत की कहानियां पढ़कर कुछ प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया। रोमांटिक लेखन था वह। पच्चीस साल की उम्र में, सन् 1950 के करीब पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ लिख पाया। कांशस रूप से साहित्य की ओर आने का प्रयास किया हो, ऐसा नहीं था।  साहित्य जगत से संपर्क भी नहीं था। वह सब आगरा जाकर हुआ। पत्रकारिता, राजी-रोटी, साहित्य आदि की दृष्टि से आगरा ने बहुत दिया। वह मेरी जिंदगी का महत्वपूर्ण शहर है। और बहुत सी चीजें हैं, जिन्हें नहीं कर पाए- पत्नी की बहत सी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाए। दुख तो नहीं कहूंगा इन्हें- पर ये बातें हैं जो मन में रहती हैं। वो इच्छाएं क्या थीं पत्नी की? ये बताना नहीं चाहता, पर मन में रहती हैं।‘

अपनी पत्‍नी के साथ्‍ा अमरकांत

पत्नी की मृत्यु- उनके न रहने को इन दिनों आप कैसे और कितना याद करते हैं?

दोनों हथेलियां सटकर जुड़ गई हैं। समान नामवाली अंगुलियां एक-दूसरे से लिपट-चिपट गई हैं। बंद आंखें बहुत धीमे-धीमे खुली हैं। सिर ऐसे हिला जैसे इनकार किया हो। फिर ‘नहीं, नहीं’ सुनाई दी। होंठ कई बार भिंचे-फड़कते-से दिखे हैं। लिपटी-सोई-सी अंगुलियों से अबोला कुछ इंगित किया है। और अब मुश्किल से सुनी जा सकनेवाली आवाज में कहना शुरू हुआ है- ‘जीवन चल ही रहा था। पत्नी भी बीमार रही थीं। उस फ्रंट पर भी जीवन गड़बड़ था। बीमारी को उन्होंने हंसते-हंसते, बहुत बाहदुरी से काटा…अब? अब तो उनकी डेथ हो गई…।‘ ऐसी खामोशी, ऐसा सन्नाटा कि सुई के रिगने की आवाज भी सुनी जा सके। सहसा माथे पर से चलकर एक प्रकाश-किरण उनके होंठों पर आकर रुकी- ‘बहुत से कथानक, बहुत सी बातें मुझे उन्हीं से प्राप्त हुईं। आपको बताऊं? जब ‘इन्हीं हथियारों से’ लिखा तो मुझे शहीदों की टोली…’ वाला वह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा था। यह गीत उन दिनों जुलूसों में गाया जाता था। गोलियां भी चलती थीं उन जुलूसों पर, लाठियां भी चलती थीं- ये जिक्र है उसमें। पत्नी डेथ बेड पर थीं। मैंने पूछा- क्या है वह गीत? ‘शहीदों की टोली निकली, सर पर बांधे कफनियां हूं…’ ये पहली लाइन है उसकी। उस समय इतना ही बता पाईं- ‘अंग्रेजों का छक्का छूटा, शेखी मिल गई धूल भाई। शेखी मिल गई धूल… कलेजे बिच गोली निकली… सर पर बांधे कफनियां हूं….।‘ देर तक व्याख्या की गई है। अंगुलियां, आंखे सब जैसे आजादी के उस दौर की वीरता, शौर्य और बलिदान को प्रतिबिंबित कर रही हैं, उस दौर पर गर्व कर रही हैं। और अब अपने रोने को रोकती-छिपती-सी आंखें, होंठों पर झिलमिल थिरकती-सी एक हंसी भी और कृतज्ञता के शब्द भी- ‘उस एक ही साल में दो लोगों की मृत्यु। एक तो मेरे भाई राधेश्याम की मृत्यु अगस्त में, एकदम अप्रत्याशित- और उसी साल नवंबर में इनकी- मेरी पत्नी की मृत्यु। ये ऐसे लोग थे- जिन्हें पसंद-वसंद तो क्या कहें- प्रिय थे। इनसे लेखन में, व्यक्तिगत जीवन में लिया-ही लिया था। भाई से ही हमने यह ग्रहण किया था कि सिंपिलीसिटी में कितनी शक्ति है। उनके बिना वास्तविकता की अभिव्यक्ति बहुत कठिन है। पत्नी का क्या कहूं? पत्नी तो पत्नी है। मेरी पत्नी में जीवन के प्रति बेहद उत्साह था। उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। वह हार मानने वाली नहीं थीं। कठिन-से-कठिन परिस्थति में भी हंसती रहने वाली। और सबसे साहस के साथ जिंदगी जीने के लिए कहने वाली।…नहीं, इन चीजों का हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते। इन्हें आप अवर्णित ही रहने दें। भाई भी पूरा एक किस्सा हैं- कभी संस्मरण लिखूंगा। बहुत सी चीजें लिखीं नहीं जा सकतीं। बड़ा मुश्किल, कठिन है। विस्तार दें तो चीजें बिखर जाती हैं।‘ अमरकांत जी जैसे कद के साहित्यकार का यह कथन उनकी भावनाओं को बड़ी सहज खूबसूरती के साथ व्यक्त कर गया था। भावनाओं के आवेग को थामते-नियंत्रित से करते अमरकांतजी कह रहे थे- ‘अब और क्या कहूं? इतना रचा-बसा है जीवन में वह सब कि कुछ नहीं एक्सप्लने किया जा सकता। ये तो जीवन के हिस्से हैं। हर एक की जिंदगी में आते हैं। जैसे हम समझते हैं, दूसरे उस तरह समझ भी नहीं सकते। जब जैसे भीष्मजी ओर उनकी पत्नी शीलाजी का संबंध था, दूसरे क्या समझेंगे वह सब? उनकी एक रचना से हमें यह लगा कि पत्नी की मृत्यु के बाद कैसा शौक लगा होगा भीष्मजी को।‘

उनके पुत्र और पुत्रवधू गेट पर विदा करने आए थे। ऐसे जैसे कोई अपने परिवार के अत्यंत निकट, आत्मीय व्यक्ति को विदा कर रहा हो। अध-खुले गेट के पास खड़े-खड़े देर तक बातें होती रही थीं। पुत्रवधू का मन टटोना चाहा तो सुनने को मिला, ‘शादी से पहले तो उतना नहीं, पर बाद में पढ़ा है। हां, गर्व होता है। अब तो लगता है कि यहां इस घर में होना बड़ी बात है।‘ मन-ही-मन मैंने भी दोहराया, ‘हां, इस घर में होना बड़ी बात है।‘

 

जहाँ मौत भी एक गिनती है : संजय जोशी

इंसेफेलाईटिस यानी जापानी बुखार गोरखपुर के आसपास के इलाकों के हजारों बच्चों को लील चुका है। वर्षों से चल रही इस महामारी को रोक पाने में सरकार नाकाम है। सरकारी कार्यप्रणाली का वीभत्स नमूना यह है कि इस साल टीकाकरण इसलिए नहीं हो पाया क्‍यों‍क‍ि टीके रखे-रखे खराब हो गए। द ग्रुप, जन संस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसायटी की टीम इस मुद्दे को बार-बार उठा रही है। हाल ही मैं टीम दोबारा प्रभावित क्षेत्र में गई। इस पर तैयार फिल्म को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा। द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी की रिपोर्ट-
2010 के मई महीने में हम कैमरा टीम के साथ गोरखपुर के आसपास के इलाकों में जापानी बुखार से हुई मौतों की कहानी दर्ज कर रहे थे। जून बीतते-बीतते बारिश का पानी फिर से गोरखपुर के आस-पड़ोस में जमने लगा। एक बार फिर से मस्तिष्क बुखार ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। 1978 से चली आ रही इस बीमारी से यूपी के सरकारी अस्पतालों में अब तक 12 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी अस्पतालों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों की सीमित पहुंच के आधार पर कहा जा सकता है कि दिमागी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या सरकारी अस्पतालों में मौतों से कई गुना अधिक होगी। हजारों बच्चों की मौत के बावजूद सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना पायी है। सरकारी उदासीनता और लापरवाही अपनी गुणात्मक मूर्खताओं के नित नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सरकार 27 वर्ष बाद इंसेफेलाईटिस के एक रूप जापानी इंसेफेलाईटिस के टीकाकरण का फैसला कर पाई, लेकिन चार वर्ष तक टीकाकरण करने के बाद इस वर्ष इसलिए टीकाकरण नहीं हो सका क्योंकि टीके रखे-रखे खराब हो गए।
जून में अखबारों से खबर मिली कि जापानी बुखार से बचाव के लिए जो टीके आये थे, वे प्रशीतन (ठण्ड) की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खराब हो गए और इस कारण टीकों का पूरा बैच निरस्त कर दिया गया। मतलब यह कि जापानी बुखार के विषाणुओं से बचने का इस बरस कोई रास्ता न था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री  अनंत कुमार मिश्र ने भी बचकाना बयान दे डाला कि हमने ग्रामीण इलाकों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुविधा सम्पन्न बना दिया है इसलिए बेवजह जिला अस्पतालों में आने का कोई मतलब नहीं है। इसी आपाधापी में अगस्त का महीना  बीत गया और बुखार के विषाणुओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। सितम्बर से एक बार फिर मौत की खबरें आनी शुरू हो गयीं। ये अलग बात है कि बच्चों की मौतों की रोज-रोज आने वाली खबरें अभी न्यूज रूम की टीआरपी नीति की नजर में न चढ़ने के कारण अदृष्य पेजों पर हाशिये  पर पड़ी थीं। ऐसे समय में हम भी अपनी कहानी में मौतों को दर्ज करने 8 सितम्बर की सुबह गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज पहुंचे। मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में जगह-जगह मरीजों के परिवार वाले व्यस्त रेल प्लेटफार्म की तरह यहां-वहां ठुंसे पड़े थे। कैमरामेन पंकज ने वार्ड का मुआयना किया और ट्राईपोड़ रख कर फ्रेम बनाने लगा। मई में इसी वार्ड में मस्तिष्क बुखार के इक्का-दुक्का मरीज थे। अब पंकज के हर फ्रेम में कई मासूम बच्चों के चेहरे कैद हो रहे थे। हर बेड पर कम से कम दो-तीन बच्चे और उनका पस्त पड़ा परिवार किसी तरह अटा पड़ा था। हर मां-बाप यही पूछ रहा था कि क्या हुआ उसके बच्चे को ? जूनियर डाक्टर जानता है कि इस बार तो टीका भी नहीं लगा है। इसलिए कमोबेश हर बच्चे को यहां से चुपचाप विदा लेनी है। वह भी बार-बार सिर्फ यही कह रहा था कि मस्तिष्क ज्वर है। इसका निदान कैसे होगा, यह किसी के मस्तिष्क में नहीं था। सारे मस्तिष्क जैसे एक क्रूर होनी को घटते हुए देखने के आदी हो चले थे। अस्पताल की दवाओं और गंदगी की बदबू की तरह बच्चों की मौतें साल दर साल घटने वाली एक रूढ़ि में तब्दील हो चुकी  थी। वार्ड में भीड़ न हो इस समझ से मैं गलियारे की बेंच पर बैठ गया। बगल में बैठी नौजवान मुस्लिम महिला ने सुबकते हुए मुझसे पेन और कागज मांगा। उस पर उसने किसी का मोबाइल नम्बर लिखा। उसका डेढ़ साल का बेटा भी मस्तिष्क बुखार से पीड़ित वार्ड में भरती था। उसके कई हफ्ते बीमारी को समझने में और अपने गाँव-कस्बे में ठोकर खाने में बीत गए।
काश ! मेरे पास कोई जादू होता और मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्र जी से पूछता यह बेचारी किस अस्पताल में जाए। अनंत मिश्र जैसों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में  दाखिल नहीं होंगे और न ही उनके घर तक मच्छर पहुंच सकेंगे।
तभी एक महिला अपनी 12 साल की अचेत बिटिया मधुमिता को गोद में उठाये बदहवास गैलरी में आती दिखाई दी। कुशीनगर के बड़गाँव टोला की उर्मिला और शारदा प्रसाद की बेटी मधुमिता को 15 अगस्त से दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। गाँव और कस्बे में इधर-उधर चक्कर काटने में ही इस परिवार के चार-पांच हजार रुपये खर्च हो गए। मधुमिता का मामा, जो पुलिस की वर्दी में था पहले उत्तेजना और हताशा में सरकार को कोसने लगा, फिर अचानक उसे अपनी वर्दी और नौकरी का खयाल आया तो लगभग बेचारगी में हमसे वीडियो रिकार्डिंग्स को डिलीट करने की मिन्नत करने लगा। मधुमिता को उसका भाई अंशु और पिता दोनों हाथों से उठाकर डाक्टर के केबिन में ले गए। बाहर रह गई उसकी माँ उर्मिला। रोते-रोते उर्मिला ने बताया कि कैसे इस बीमारी ने पूरे परिवार को सड़क पर खड़ा कर दिया है। रक्षाबंधन से शुरू हुए दौरे बंद होने का नाम नही ले रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने अपनी बिटिया को टीके लगवाये थे- लाचारी से भरा न सुनने को मिला।
मै फिर उस मुस्लिम महिला के बगल में जा बैठा। अभी तक उसका फोन नहीं आया था, लेकिन वार्ड की भयावहता से वह अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य का लेकर परेशान थी। इस वजह से वह रो-रोकर हलकान हुए जा रही थी। स्वास्थ्य मंत्री के दावे को चुनौती देने के लिए न्यूज एजेंसी एएनआई की टीम भी वार्ड के बीचों बीच मय ट्राईपौड और कैमरा माइकों में टीवी कंपनियों की नाम वाली तिकोननुमा लकड़ी के पट्टों के साथ तैयार थी। एजेंसी के रिपोर्टर कम कैमरामैन की दुविधा थी कि उन्हें कोई भी डाक्टर आधिकारिक वक्तव्य नहीं दे रहा था। इसके समाधान के लिए उन्होंने हमारे सहयोग के लिए आये गोरखपुर के पूर्व छात्र नेता एवं पत्रकार अशोक चौधरी को घेर लिया। अशोक चौधरी कुछ बोलते कि वार्ड के दूसरे कोने से गगन भेदती चीत्कारों ने हम सबको हिला दिया। यह वार्ड के एक कमरे के बाहर से उठी आवाजें थीं। उस समय ढाई साल के एक बच्चे की मौत की पुष्टि हुई थी। ये चीत्कारें उसी के परिवार की थीं।
बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में 8 सितम्बर की दुपहर 12 बजे हर दूसरा बच्चा इसी बीमारी का शिकार था। उस वार्ड में हर परिवार अपने ऊपर मंडरा रही मौत से आशंकित था। हम वार्ड के बाहर खड़े थे। बीच बगल के गलियारे से उस नन्हे शिशु के माँ-बाप, दादी, मौसी, चाची का समवेत क्रंदन हमारे ऑडियो चैनलों में रिकॉर्ड हो रहा था। थोड़ी देर बाद उस परिवार का मुखिया, संभवत उस नन्हे शिशु का दादा घुंघराले बालों वाले प्यारे शिशु को तेजी से लेकर बाहर निकला। शिशु को देखने के बाद उस परिवार का क्रंदन वार्ड की छतों को भेदता हुआ सबके भीतर तक घुसकर बेचैन कर रहा था। जब दादा ने बच्चे को पिता को सौंपा तो तब मृत देह की झूली हुई गति से ही समझ में आया कि ये घुंघराले बाल और सलोनी सूरत जल्द ही स्मृति बन कर रह जाएंगे। बदहवास कदमों से उस परिवार ने अपने नन्हे की अंतिम यात्रा एपिडेमिक वार्ड से शुरू की। उस नन्हे शिशु का सलोना चेहरा पूरे वार्ड को गहरी खामोशी और अवसाद में डुबा चुका था। हमने भी अपना ट्राईपौड समेटा और इमरजेंसी वार्ड के पास आ गए; तभी उसी तीव्रता वाली चीखों का शोर हैडफोन के जरिये मेरे कानों तक पहुंचा। दाहिनी तरफ नजर घुमाई तो वही मुस्लिम महिला दहाड़ माकर छाती पीट रही थी, जिसने आधा घंटा पहले मुझे वार्ड के गलियार में किसी परिचित का नम्बर लिखने के लिए पेन और कागज मांगा था। हमारे फ्रेम के क्लोज अप में उसका आंसुओं से भरा चेहरा और हेडफोन पर- अरे कोई मोर बेटवा के जिया दे…का करुण आर्तनाद था।
राघव दास मेडिकल कालेज, गोरखपुर में अपनी फिल्म के लिए मौत की कहानी दर्ज करते हुए हमें सिर्फ 30 मिनट बीते थे और हम दो मौतों को देख चुके थे। अब उस आधी मौत के बारे में पता करने का हौसला मुझ में नहीं बचा था, जो कुशीनगर के बड़गाँव  से आयी उर्मिला अपनी 12 साल की लगभग विकलांग हो चुकी मधुमिता को बचाने में घरबार बेचकर कर्ज में डूबकर हासिल कर चुकी थी।
हम मेडिकल कालेज से लौट रहे हैं। गाड़ी गोरखपुर की भीड़ वाली सड़कों और बरसाती पानी के जमाव के बीच रास्ता बनाते हुए जा रही है। रेलवे स्टेषन पहुंचते एक पत्रकार दोस्त का मैसेज मिला- सिक्स डाइड टूडे इन बीआडी मेडिकल कालेज।
(जनसत्ता, 19 सितम्बर रविवारीय मैगजीन से साभार)

नवकी बीमारी ने बुझाए लाखों चिराग : संजय जोशी

स्वतंत्र फिल्मकार और गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल व जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस यानी नवकी बीमारी की चपेट में आए पूर्वांचल के इलाके में शूटिंग के लिए गए। सरकार अस्पतालों में ही 2005 से अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। बीमारी की मार से पीडि़त परिवारों के दुखों को उन्होंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया। उनके संवदेनशील मन ने व्यवस्था और काइंयापन पर कई सवाल खड़े किए-

मई 2010 के पहले सप्ताह में हम गोरखपुर और आसपास के कस्बों में वीडियो कैमरा टीम के साथ घूम रहे थे। मकसद था इंसेफेलाइटिस के मरीजों और उनके परिवारों की कहानी को दर्ज करना।
यह बीमारी जिसे अभी भी पूर्वांचल के इस इलाके में नवकी बीमारी के नाम से ही जाना जाता है, 1978 में आई। कारण था धान के खेतों में पनपा मच्छर जो कि सूअर के बाड़ों में भी पनपता था। बारिश का मौसम खत्म होते-होते सितंबर से गोरखपुर और आसपास के शहरों में एक अजीब बदहवासी छा जाती है। प्राय: रोज किसी न किसी गांव और कस्बों से लोग अपने बच्चों को लेकर अस्पताल की तरफ भागते हैं। इस बीमारी के ज्यादातर शिकार बच्चे होते हैं। शुरूआत के दो दिन तक तो बीमारी का पता ही नहीं चलता फिर अचानक बुखार का तेज होना, आवाज का चले जाना और लकवा मारना किसी बुरे अंदेशे की इत्तला देता है। प्राय: अस्पताल तक आते-आते बच्चा या तो दम तोड़ देता है या फिर गंभीर रूप से जिंदगी भर के लिए विकलांग हो जाता है। सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। गोरखपुर के एक पत्रकार के मुताबिक यह नुकसान 20 प्रतिशत ही है क्योंकि सरकारी अस्पताल 20 फीसदी से ज्यादा मरीजों को नहीं देख सकते। फिर तो यह समझिए कि पिछले तीस साल में अब तक तकरीबन एक लाख लोग मर चुके हैं। एक लाख लोगों के मरने के बावजूद यह बीमारी अभी भी राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं पा सकी है और न ही राष्ट्रीय चिंता का। पिछले बरस ही स्वाइन फ्लू को लेकर जिस तरह से हायतौबा मचाया गया, उससे तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पूर्वांचल में गरीबों के बच्चों की मौत भी काफी नहीं है। इसके बारे में गंभीरता से सोचने के लिए, जबकि स्वाइन फ्लू से मुश्किल से मरे आठ-दस लोगों के लिए सारा अमला ज्यादा चिंतित है। शायद मसला गरीब और अमीर होने का भी हैै। हमारी टीम भी इन्हीं सब सवालों की खोज में निकली थी।

होलिया में विकलांगता का अभिशाप

हमारी टैक्सी कैमरा टाइपौड और साउंड उपकरणों के से लदी गोरखपुर से 25 किलोमीटर दूर पिपराइच की तरफ जा रही थी। हमें पिपराइच से सटे दलितों की अधिसंख्या वाले होलिया गांव पहुंचना था। वर्ष 2005 में जापानी इंसेफेलाइटिस महामारी की तरह फैली। तब इस गांव से सर्वाधिक लोग बीमारी की चपेट में आए। गोरखपुर में बच्चों के डाक्टर आरएन सिंह ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट नीप (नेशनल इंसेफेलाइटिस इरेडिक्शन प्रोग्राम) की शुरुआत इसी गांव से की थी। नीप की वजह से गांव में जापानी बुखार से संबंधित सूचना वाला एक बड़ा बोर्ड नजर आया। कैमरामैन के मुफीद फ्रेम के लिए यह बोर्ड बहुत काम का था। कैमरामैन ने गांव को दर्शाने के लिए बोर्ड के साथ धीमा पैन किया।
होलिया गांव हमारे मैग्नेटिक टैप में दर्ज हो गया। डॉ. आरएन सिंह के सहयोगी डॉ. लाल बहादुर सिंह पड़ोसी कस्बे पिपराइच से हमारी मदद के लिए आ गए थे। हम कहानी की तलाश में थे। डॉ. सिंह ने बताया कि हमने इस बीमारी से लोगों को परिचित कराने के लिए स्कूल से प्रयोग शुरू किया है। कैमरामैन, साउंड रिकार्डिस्ट और मै अब कुछ अच्छे दृश्य और साउंड एम्बीयंस मिलने की उम्मीद में उत्साहित थे। हमारी सफेद एयरकंडीशंड इंडिगो कार जल्दी ही नई लोकेशन पर पहुंच गई। स्कूल की प्रार्थना खत्म हो चली थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में व्यस्त थे, लेकिन महान फिल्म टोली के लिए हर चरित्र का रीटेक संभव था। डॉ. सिंह के मित्र को समस्या बताई। तुरंत ही कक्षाओं को रोककर फिर से प्रार्थना की रीटेक की तैयारी शुरू की गई। कैमरामैन ने प्रार्थना सभा के सामने टाइपौड जमाया। प्रार्थना पढऩे वाली मुख्य लड़की की कमीज में रेडियो माइक लगा दिया गया। हवा में तैरता सांउड रिकार्डिस्ट का गन माइक और बूम राड गरीब बच्चों को भविष्य में डींग हांकने का मौका दे रहे थे। प्रार्थना की सभा के बाद मास्टर जी ने बच्चों को बताया कि जापानी बुखार से कैसे बचा जाता है। जल्द ही कट-कट की आवाजें आईं। हम यह भूल गए थे कि मुख्य भाषण मास्टर जी का है। इसलिए अबकी बार रोडियो माइक मास्टर जी की कमीज में टांगा गया और फिर से प्रार्थना सभा का रीटेक हुआ। कुछ बच्चे प्रार्थना की लाइनों से इतर बूम राड में लगे माइक की गति को अपनी आंखों से पकडऩे को बेचैन थे। प्रार्थना के गीतों और राष्ट्रगान की औपचारिकता के बाद मास्टर जी ने स्वच्छता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने बड़े-बूढों को शौच खुले में नहीं, बल्कि शौचालय में करना चाहिए के बारे में समझाना चाहिए। मास्टर जी शायद यह जानते थे कि बिना शौचालय हुए भी भाषण में तो यह कहा ही जा सकता है कि शौच, शौचालयों में करना चाहिए। नीप ने तो सिर्फ शौचालय में ही शौच करना चाहिए, बताने का जिम्मा लिया है। अब गांव में किसी के पास शौचालय बनाने की सामथ्र्य नहीं है तो वह क्या करें! होलिया में जापानी बुखार का टीकाकरण हुआ है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीकाकरण इस बुखार से बचाव का एकमात्र उपाय है। यह भी कि टीका कम से कम तीन नहीं तो दो बार तो जरूर लगना चाहिए। होलिया में 2005 के बाद दूसरे गांवों की तरह एक ही बार टीका लगा है। लेकिन हमारी फिल्म के दृश्य में होलिया के मास्टर साहब के यह पूछने पर कि किसे-किसे टीका लगा है, सभी बच्चे हाथ ऊपर खड़ा कर देते हैं। आडियो चैनल में यह भी दर्ज होता है। यह एक आडियो विजुअल सत्य है, जिसे हमने दर्ज कर लिया और शायद अपनी सुविधानुसार इसे इसी तरह इस्तेमाल भी कर लेंगे। और यदि हम नहीं करेंगे तो कोई और टीम कर ही लेगी।
प्रार्थना सभा के दृश्य के बाद हमें वापस गांव में आना था। अपनी फिल्म को अब विभिन्न केस स्टडी के माध्यम से आगे बढ़ाना था। फिल्म टीम डॉ. सिंह के मार्ग निर्देशन में होलिया गांव के ठाकुर टो्ला में रामसमुझ सिंह का मकान खोज रही थी। रामसमुझ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी पत्नी कुसुम देवी और बेटा मनोज घर चलाते हैं। 2005 के वक्त रामसमुझ की बेटी संजू 13 वर्ष की थी। बीमारी ने संजू की आवाज छीन ली और दिमाग भी। कैमरामैन ने फ्रेम बनाया। फ्रेम में सबसे बाएं बैठी संजू पूरी बातचीत में बुत बनी रही। यह पूछने पर कि आगे चलकर क्या बनना चाहती है तो उसका आवाज खींचकर डा-क्-ट-र कहना बीमारी के विद्रूप चेहरे को बखूबी समझा रहा था। विद्ररूपताएं सिर्फ संजू की विकलांगता से ही नहीं उपजी थीं। थोथी संवेदनओं ने भी कुछ कम इजाफा नहीं किया था। पड़ोस के किसी सम्पन्न जमींदार ने संजू की पढ़ाई-लिखाई और शादी ब्याह का जिम्मा भी लिया था। इस बात को कई लोगों ने कैमरे पर दर्ज हो जाने की नीयत से सुनाया। किसी विकलांग बच्चे पर इतना कुछ करने की मंशा सिर्फ  ढोंग नहीं तो क्या था।
संजू के बनिस्पत पासवान टोला की गीता और ओम प्रकाश का बेटा शैलेश जीवन के ज्यादा करीब थे। शैलेश 2005 में बीमारी के समय चार वर्ष का था। इस बीमारी ने उसकी आवाज को छीन लिया है और हाथ-पैर भी सामान्य नहीं रह पाए हैं। नाम पूछने पर बहुत मुश्किल से वह समय लगाकर खींचकर शै…ले…ष  बोलता है। गनीमत है कि उसका दिमाग एकदम दुरूस्त है। जब हम पासवान टोला पहुंचे तब शैलेष हम उम्र बच्चों के साथ बागीचे में खेलने गया था। शैलेष की मां गीता पासवान घर चलाती हैं और उनके पति होलिया से 25 किलोमीटर दूर गोरखपुर में चाय का ठेला लगाकर घर का खर्च जुगाड़ता है। ठाकुर टोले की कुसुम देवी की तरह उनके पास बेटे की बीमारी से लडऩे के लिए जमीन का सहारा भी नहीं हैं। पासवान टोले की सभी परिवारों के पास जमीन बीघे में न होकर क_े में है। कैमरा मैन ने शैलेष के आने के इंतजार में माहौल दर्ज करने के लिए महिलाओं के समूह को अपने फ्रेम में समेटना शुरू किया। 1930 में इसी होलिया गांव से बमुश्किल 45 किमी दूरी पर सरदार नगर में मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल तीन औरतों को अपने कैनवास में उतार रही थीं। पासवान टोले की ये औरतें अमृता शेरगिल की तीन औरतों जैसी ही मजबूत दिख रही थीं। किसी के पति सूरत तो किसी के पति मुंबई कमाने गए हैं। जिस आंगन में बैठकर हम उनसे बातचीत कर रहे थे वह पुरुषों की परछाई से मुक्त था। बातचीत शैलेष की बीमारी और उससे लडऩे के किस्सों तक ही महदूर थीं। जो इस दौरान हमारे मैग्नेटिक टेप में दर्ज न हो सका, वह था पासवान टोले की औरतों का अकेलापन। शैलेष के आने के बाद माहौल थोड़ा अलग हुआ। शैलेष की विकलांगता उसकी आंखों से दिखती शरारत पर भारी नहीं पड़ रही थी। हमारे अनुरोध पर शैलेष एक बार फिर बागीचे में अपने दोस्तों के साथ खेलने चला गया। कबड्डी की धमाचौकड़ी में शैलेष को छोड़कर हम होलिया गांव से बाहर निकल रहे थे।

सेमरी महेशपुर- जहां पांच घरों में छह मौते हुईं

गोरखपुर से कुशीनगर जाते हुए सड़कों पर विकास का नया मॉडल पसरा पड़ा है। कुशीनगर जहां महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था, में एक बहुराष्ट्रीय संस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से मैत्रेय प्रोजेक्ट स्थापति करने जा रही है। इस प्रोजेक्ट में कुशीनगर के आस-पास के किसानों को उजाड़ा जाएगा। बुद्ध की 500 फीट उंची प्रतिमा उजाड़े गए किसानों के खेत में खड़ी होगी। आत्मिक शांति और ऐशोआराम के लिए दुनियाभर के बौद्ध मतावलंबी कुशीनगर पधारेंगे। इसी कारण गोरखपुर से कुशीनगर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा कर फोर लेन का बनाया जा रहा है। सुकरौली इसी राजमार्ग पर एक उंघता हुआ कस्बा है, जिसकी नींद विकास के इस मॉडल ने तोड़ दी है। सुकरौली से एक रास्ता सेमरी महेशपुर जाता है। होलिया में हम विकलांग बच्चों और उनके परिजनों से मिले थे। सेमरी में हमें जापानी बुखार से हुई मौतों वाले घरों में जाना था। पहला घर जवाहिर और दुर्गावती का था। उनका दस बरस का बेटा तारकेश्वर 2005 में नवकी बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसके जाने से दुर्गावती की दुनिया ही उजड़ गई। मायूसी से उसे याद करते हुए कहती है- अभी होता तो गबरू जवान होता। कैमरामैन ने एडिटिंग की सुविधा के लिए दुर्गावती को दुबारा से अपनी चाय की दुकान पर बैठा लिया है। जब अंगीठी जलाने का उपक्रम चल रहा है और दुर्गावती के प्रोफाइल वाले शाट दर्ज किए जा रहे हैं। फ्रेम में दुकान की अंगीठी में लगी आग से मनमाफिक वार्म टोन मिल रही थी। दुर्गावती के दिल में लगी आग को बुझाने का तरीका हमारे कैमरे में नहीं था। दुर्गावती के घर के पास ही मुश्किल से 50 मीटर की दूरी पर तारकेश्वर का दोस्त जितेंद्र रहता था। 13 बरस का जितेंद्र, उदयभान और सावित्री की आंखों का तारा था। 2005 की बरसात में उसे यह बुखार आया और फिर दो-तीन दिन बाद उसने असर दिखाना शुरू किया। जैसे-तैसे करके यादव दंपति उसे सुकरौली ले गए, लेकिन तब तक सब कुछ पलट गया था। 2005 की महामारी के भेंट जितेंद्र भी चढ़ा। दुर्गावती के घर से निकलते ही हमें याद आया कि तारकेश्वर की कोई तस्वीर हमारी बातचीत के दौरान नहीं उतारी गई। इसलिए जितेंद्र के घर बातचीत पूरी होते-होते हमने उसकी तस्वीर मांग ली। तस्वीर मांगना जैसे पुराने जख्मों को फिर से हरा करना था। पहली बार हमें पता चला कि फिल्म के लिए जरूरी होते हुए भी मृत बच्चे की तस्वीर रखने का चलन ग्रामीणों में नहीं है। उनका कहना सही था कि इससे पुरानी यादें धूमिल पड़ती हैं। इसलिए बच्चों की स्मृति पूरी तरह से नष्ट करना ही अपने दुख को कम करने का एक आसान उपाय है। लालचियों की तरह हम तस्वीर की जुगत में लगे रहे। गुमसुम सावित्री ने मन मारकर कहीं कोने में दुबकी अपने दुलारे जितेंद्र की एक पासपोर्ट साइज की तस्वीर हमें दे दी। एडिटिंग के समय किसी भावनात्मक उभार की उम्मीद के साथ वह तस्वीर मेरे पर्स का एक जरूरी हिस्सा बन गई।
जवान बेटे की मौत वाले घर से कैसे विदा लेते हैं, यह किसी फिल्म स्कूल में सिखाया नहीं जाता। जितनी तेजी और उत्साह से हम यादव दंपति के आंगन में घुसे थे, उतने ही चुपचाप वहां से विदा हो लिए। अब मौत के उत्सव को और देर बनाए रखना किसी के बस में नहीं था। उस आंगन में सिर्फ सावित्री का शून्य में टंगा चेहरा और उदयभान की अपने बेटे की आत्मा को खोजती आंखें हमारा पीछा कर रही थीं। टैक शाट की तरह इसे दर्ज करने की कूव्वत न हमारे लेंस में थी और न मैग्नेटिक टेप में।
गुड्डू शर्मा का घर खोजने समय रास्ते में गांव के प्रधान रामाश्रय सिंह मिल गए। रामाश्रय 2005 से सेमरी महेशपुर के प्रधान हैं। पहली बार उनकी पत्नी ग्राम प्रधान बनी थीं और अपनी पत्नी के कार्यकाल को भी वह अपना ही समझकर गिनते हैं। पहले कैमरा, बूम राड और हैडफोन से अक्रांत टीवी क्रू को देखकर सरकारी भाषा में बतियाते रहे। थोड़ी देर बाद मान की बातें बताने लगे। उन्होंने ईमानदारी से स्वीकारा कि कैसे ऊपर से नीचे तक विकास के लिए आए रुपए का बंटवारा होता है। यह कहने को मजबूर हुए कि महामारी से लडऩे की सभी तैयारियां हवा में हैं। शरमाते और हंसते हुए स्वीकारा कि वह भी विकास की गति से मालामाल हो रहे हैं।
गुड्डू शर्मा तीसेक की उम्र के हैं और मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। बिना पलस्तर की दीवारें उनकी आंशिक बेरोजगारी को सहज ही व्यक्त कर रही थी। वर्ष 2005 में उनकी और पत्नी सुनीता की गोद में तीन साल का खूबसूरत बेटा सत्यम था। नवकी बीमारी ने यहां भी कहर बरपाया और सत्यम बचाया न जा सका। हमारे अनुरोध करने पर एक ग्रुप फोटो मिल गया, जिसमें सत्यम अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ हाथ में गुलदस्ता लिए हुए है। घने काले घुंघराले वालों बाला सत्यम ऐसा लग रहा था कि मानो तुरंत ही तस्वीर से बाहर निकलकर हमारे साथ खेलने लगेगा।
मा-बाप के हाथ से छिटककर तस्वीर अब उनके दूसरे बेटे सियम के हाथ में आ गई। अब सियम फिर से हमें तस्वीर में दिख रहे भाई-बहनों के बारे में बता रहा था। फ्रेम से परे सत्यम की मां सुनीता किसी तरह अपने आंसुओं को रोके थी। एकदम अंधेरे में सत्यम की बुआ अपने बिछुड़ गए भतीजे की याद में खो गई थी। मौत की याद में सब कुछ शांत था। हमारा कैमरा अपने पैन से सब कुछ को धीमे-धीमे मैग्नेटिक टेप में दर्ज कर रहा था। गुड्डू-सुनीता के पांच बरस के दूसरे बेटे सियम को भी गुजर गए भाई की तरह टीका नहीं लगा है। मै अचानक इस आशंका से घिर गया कि क्या इस परिवार का दूसरा गुलदस्ता भी टूट जाएगा? यह पूछने का साहस मेरे पास नहीं था क्योंकि फिल्म टीम टीका न लगने के कारण हुई मौतों की यादों को बखूबी दर्ज कर सकती हैं लेकिन हमारे बूम राड से कोई टीका नहीं लगाया जा सकता।
सियम के काले घुंघराले बालों और शोख चेहरे की याद के साथ हम रामजी गुप्ता के आम के पेड़ के नीचे जमा हो रहे थे। इसी पेड़ के नीचे से 5 सितंबर, 2005 को उनकी प्यारी पोती ज्योति की आखिरी यात्रा निकली। लकड़ी के तख्ते पर ज्योति की दादी रामरती और मां बादामी बैठे थे, हमारे सवालों के जवाब के लिए। मां का आडियो लेवल काफी नीचा था। जैसे ही ज्योति के बारे में रामरती ने बताना शुरू किया बादामी ने हस्तक्षेप कर अपनी बेटी की यादों को रखना शुरू कर दिया। बेटी की याद ने उसके आडियो लेवल को दुरूस्त कर दिया था। वही सब कुछ ज्योति के साथ हुआ जो दूसरे बच्चों के साथ हुआ। एक दिन अच्छी-भली स्कूल से लौटी ज्योति ने पेट दर्द की शिकायत की। फिर बुखार और दूसरे लक्षण। गोरखपुर के महंगे प्राइवेट नर्सिंग होम में इलाज कराने के बाद जो हाथ में आया, वह था डेथ सर्टिफिकेट। हम पता नहीं क्यों इसी डेथ सर्टिफिकेट को तस्वीरें भी विभिन्न कोणों से कैद करते रहे। शायद कहानी को और ज्यादा प्रमाणिक बनाने के लिए या यूं ही सब कुछ दर्ज कर लेने की नीयत से। सभी लोगों की तरह यहां के लोग भी अब किसी पर दोष मढऩे के लिए तैयार नहीं थे। जवाब वही कि जब जान ही नहीं बची तो हायतौबा करने से क्या? बातों-बातों में पता चला कि ज्योति की स्मृति शादी के एक वीडियो कैसेट में मौजूद है। जल्दी ही किसी को भेजा गया, उस वीडियो कैसेट की खोज में। इस बीच समय काटने की गरज से गुप्ता परिवार ने दही-चूड़ा के नाश्ते का अनुरोध किया। सुबह से धूप में घूम रहा कैमरा टीम ने सहज ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रामजी गुप्ता के दालान में कैमरा टीम दही-चूड़ा जीम रही थी। दही गांव के शुद्ध घी को औंटाकर जमाई गई थी और चूड़ा स्थानीय चावल से ही तैयार किया गया था। दही-चूड़ा के बड़े ग्रास के साथ ज्योति की स्मृति हम सबको मृत्यु भोज का आस्वाद करा रही थी और शायद इसी वजह से खूब औंटाए गए दूध का दही मीठा न होकर कसैला प्रतीत हो रहा था।
इस कसैले मृत्यु भोज को अभी और कसीला होना था भल्लन के घर पर। सेमरी महेशपुर से एक किलोमीटर दूर पश्चिम पर स्थिति अति दलित डोम लोगों का बरवा टोला है। 45 वर्ष के भल्लन और 40 की बरफी आठ बच्चों के जनक हैं। 2005 से पहले तक भुल्लन सुअर भी पालते थे। सुअर पालन न सिर्फ  उनके लिए नकदी का इंतजाम करता, बल्कि परिवार को पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध कराता। 2005 का जापानी बुखार सुअरबाड़े को लील गया। इस तो भल्लन और बरफी किसी तरह बर्दाश्त कर गए, लेकिन छह महीने के छोटू और तीन बरस की सोनी की याद को भुलाना बहुत मुश्किल था। पतली नीली प्लास्टिक शीट से बने टैंट में किसी तरह का गुजर-बसर कर रहे भल्लन परिवार के लिए अपने बच्चों को नवकी बीमारी से बचा पाना बहुत मुश्किल था। वे भी दूसरे लोगों की तरह नजदीकी अस्पताल की ओर दौड़े, लेकिन सबसे छोटे छोटू और सात भाइयों की चंपा सोनी को वे न बचा सके। बिना छत वाले घर की जिस चौखट पर बैठकर वे टेलीविजन इंटरव्यू दे रहे थे, जिसमें उनका एक लड़का पूरी तरह से नेमा दिख रहा है, देखकर कोई पूछ ही सकता है कि रत्नगर्भा बरफी अपने बचे हुए छह रत्नों को कैसे बचा पाएगी? हमारी विवशता थी कि अशिक्षित भल्लन परिवार ने अपनी नासमझी में हमें सरकारी नुमाइंदा समझ लिया था। वे बार-बच्चों की मृत्यु का मुआवजा न मिलने की शिकायत करते रहे। हमने भल्लन और बरफी को झूठा दिलासा देकर वहां से विदा ली। वे शायद यह समझ रहे थे कि हमारी रिकार्डिंग से उन्हें मुआवजा मिल जाएगा, जबकि सचाई यह थी कि पैसे की कमी के कारण उनके बच्चे सरकारी अस्पताल की चौखट तक पहुंचकर दर्ज न हुए थे। इसलिए मर कर भी वे सरकारी दस्तावेजों में मरे नहीं थे।

हमारी रिकार्डिंग से क्या किसी परिवार का भला होगा? क्या सरकार ऐसी चुप्प और गमगीन बातचीत से उद्वेलित हो पाएगी जिसमें मौत का हाहाकार नहीं बल्कि सिर्फ यादें और सूनापन हैं? पता नही। कैमरे के पैन और उसमें सब कुछ समेट लेने का कौशल, बूम राड और गन माइक का सटीकपन और दुखद स्मृतियों की पुनरावृत्तियां कुछ और बदल सकेंगी तो निश्चय ही बरफी जैसे तमाम रत्नगर्भाओं के रत्न पूर्वांचल के काम आ सकेंगे।

(समकालीन जनमत, जून,  2010 से साभार)

विष्णु प्रभाकर के साथ फोटोग्राफी

विष्णु प्रभाकर

 यशस्वी साहित्यकार और आवारा मसीहा के रचियता विष्णु प्रभाकर की पहली पुण्यतिथि(11 अप्रैल) पर
उनके सहज और कर्मठ व्यक्तित्व को याद कर रहे हैं युवा निर्माता-निर्देशक

संजय जोशी

सितंबर, 2003 का कोई दिन। विष्णु प्रभाकर जी को फोन मिलाया। थोड़ी देर बाद धीमी आवाज आईं, कहिए, क्या काम है? कैसे याद किया? मैंने अपना मकसद बताया तो सहज ही तैयार हो गए। ज्यादा पूछताछ नहीं की कि कहां से पैसा मिला है, क्या प्रोजक्ट है, जैसा कि आमतौर पर दिल्ली वाले किसी काम के बारे में बात करते हुए पूछते हैं। इतना जरूर कहा कि मैं सुबह एक घंटा टहलने जाता हूं। इसलिए आप 7-7.15 बजे आएंगे तो घर पर मिलूंगा। दो-चार रोज बाद कैमरा बैग लादे में सुबह सात बजे उनके पीतमपुरा के मकान पर पहुंच गया।
विष्णुजी आंगन में आरामकुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। स्टूल पर चाय का गिलास, ट्रांजिस्टर और एक-दो जरूरी चीजें थीं। मेरी पहली मुलाकात थी। शुरू से ही वह अनौपचारिक हो गए। मैंने कैमरा निकाला और फ्रेम बनाकर क्लिक करने लगा। मेरे पास बहुत अच्छा टेलीफोटो लेंस नहीं था। क्लॉजअप के लिए नार्मल लेंस को ही ऑब्जेक्ट के पास ले जाना पड़ता। इसलिए मेरा नार्मल लेंस विष्णुजी के चेहरे के बहुत नजदीक रहने लगा। वे बिना किसी परेशानी या झुंझलाहट के प्रेम से तस्वीरें खिंचवाते रहे।
मुझे थोड़ा ताज्जुब भी हो रहा था कि आज पहली बार, फोटो खिंचवाने वाला व्यक्ति फोटो के खिंचने के उद्देश्य को लेकर एकदम निर्लिप्त दिख रहा है। मैं भी सहज हो चला था। विष्णुजी मेरे अनुरोध पर तरह-तरह से पोज दे रहे थे। कभी दरवाजे पर तिरछे बैठे हुए अपने नाम की पट्टिका के साथ, कभी आंगन में बनी छोटी क्यारी में पौधों की टहनी को पकड़े हुए, कभी पेड़ों को पानी डालते हुए तो आकाश को निहराते हुए कैमरामैन के लिए मुफीद लो एंगल फ्रेम करते हुए।
उन्होंने बताया कि यह मकान कैसे बनवाया। कैसे-कैसे पुरस्कार मिले और कैसे-कैसे उस राशि से मकान खड़ा होता गया। फिर मकान पर कब्जे और उसे छुड़ाने का किस्सा। उनकी बातचीत में कहीं भी मैं-मैं नहीं था और न ही बुढ़ापे की सनक का प्रभाव।
अब विष्णुजी स्टडी में बैठे थे। टेबिललैम्प और छोटी स्टूलनुमा मेज के साथ। मुझे लगातार अच्छे और सहज फ्रेम मिल रहे थे। मेरी सारी आशंका निर्मूल साबित हो रही थी। नौ बजते-बजते फोटोग्राफी का क्रम पूरा हो गया। थोड़ी देर बाद विष्णुजी को भी काम से जुटना था। दस बजे से उनके पास दो लोग आते थे। ये उनके टाइपिस्ट कम सहायक थे, जो उनकी चिट्ठियों से लेकर साहित्य लेखन तक में मदद करते थे।
मैंने विदा लेने से पहले मोहन सिंह प्लेस के कॉफी हाउस में एक फोटो सेशन करने की इच्छा जतायी। उन्होंने उसी सहज और निर्लिप्त भाव से जवाब दिया कि अगर कोई उन्हें यहां से ले जाए और छोड़ दे तो कोई आपत्ति नहीं है। जल्द ही दोबारा मुलाकात करने का बात कर में वापस लौट गया।
विष्णुजी के साथ शीघ्र ही कॉफी हाउस में फोटो सेशन करने का विचार उत्साहित करने लगा। सबसे बड़ी दिक्कत उनको ले आने और वापिस पहुंचाने के लिए टैक्सी का प्रबंध करने की थी। बेरोजगारी के समय बिना किसी आर्थिक मदद के फोटोग्राफी करना ही पहाड़ जैसा था, उस पर टैक्सी का भी प्रबंध करना। एक बंगाली मित्र प्रदीप दास, जो नाटक देखने और खेलने के दीवाने हैं, ने तुरंत समस्या का समाधान कर दिया। तय हुआ कि दशहरे के बाद किसी इतवार को वह अपनी मारुति से विष्णु जी को काफी हाउस ले जाएंगे। दूल्हा तैयार, घोड़ी भी तैयार, लेकिन बिन बाराती बारात कैसी? अब विष्णुजी की कॉफी हाउस मंडली को जुटाने का काम था। सभी बिना किसी नखरे के तैयार हो गए।

प्रदीप की कार एक-दो दिन से आवाज कर रही थी। इस कारण वह थोड़ा आशंकित थे। फिर भी हिम्मत करके अक्तूबर की एक सुबह हम लोग विष्णुजी के घर पर  ठीक 18 मिनट देरी से पहुंचे। यह इसलिए कि उन्होंने पहली बात यही कही कि 18 मिनट ज्यादा हो गए। कॉफी हाउस हमें 12 बजे पहुंचना था। वहां हम समय से पहुंच गए। विष्णुजी और मुझे छोड़कर प्रदीप गाड़ी पार्क करने चले गए। मेरे साथ दुविधा यह थी कि विष्णुजी को अकेले कैसे छोड़ दूं और अगर छोड़ता नहीं हूं तो उनका कॉफी हाउस की बिल्डिंग से प्रवेश करता हुआ  टॉप एंगिल शॉट कैसे खींच सकूंगा। इसी पेशोपेश में था कि उनकी कॉफी हाउस मंडली के एक सदस्य डॉ. राम किशोर द्विवेदी सड़क पर  मिल गए। दोनों बहुत दिनों बाद मिल रहे थे इसलिए बहुत खुश थे और मैं इसलिए क्योंकि टॉप एंगिल फ्रेम क्लिक कर सकूंगा। मैंने विष्णुजी को डॉ.  द्विवेदी के हवाले किया और तेजी से ऊपर पहुंच गया। कॉफी हाउस के आंगन में कांतिमोहन और पंकज बिष्ट पहले से ही बैठे थे। मैंने कॉफी हाउस की मुंडेर पर चढ़कर फ्रेम क्लिक किए। थोड़ी देर में हरिपाल त्यागी, भीमेसन त्यागी, केवल गोस्वामी, डॉ. आनंद प्रकाश, क्षितिज शर्मा भी आ गए। बहुत दिनों बाद कॉफी हाउस की मेज पर विष्णुजी की मंडली जुटी थी। न सिर्फ विष्णुजी और उनकी मित्र मंडली खुश दिख रही थी, बल्कि कॉफी हाउस के बैरे भी खुश थे कि इतने दिनों बाद उनके अपने विष्णुजी दिखाई दिए। दो-एक बैरे विष्णुजी से काफी देर तक कुशलक्षेम पूछते रहे। कॉफी की चुस्कियों के साथ ठहाकों को दौर भी चलता रहा। किसी ने विष्णुजी से पूछा कि इन दिनों क्या लिख रहे हैं। उन्होंने सहज भाव से कहा कि दो-चार बरस और जीवित रहा तो उपन्यास पूरा कर लूंगा। मित्र मंडली ने इस बात को आगे यह कहकर बढ़ाया कि अभी आप जापानी महिला की तरह कम से कम 105 बरस जिएंगे और तब तक एक और उपन्यास हम लोगों को पढऩे को मिलेगा। वाक्य पूरा होने से पहले ही उस सुंदर दोपहरी में कॉफी हाउस मंडली का ठहाका घुल गया। विष्णुजी बूढ़े बौद्ध भिक्षु की तरह मंद-मंद मुस्कराते रहे। कॉफी का एक दौर और चला। कॉफी के खत्म होने के बावजूद ठहाके लगाने का क्रम नहीं टूटा।
वापस चलने का वक्त आया। सब लोग विष्णुजी को छोडऩे नीचे सड़क तक आए। ऐसा लग रहा था, मानों विष्णुजी कॉफी हाउस के कर्मचारी हों और आज उनकी विदाई हो रही हो। एक ग्रुप फोटो के बाद सब लोग अपने-अपने घरों को निकल गए। हम लोग पीतमपुरा जाने के लिए कार में सवार थे।

कार स्टार्ट होते ही कॉफी हाउस के पुराने दिनों की चर्चा छिड़ गई। वह कॉफी हाउस की चर्चा छिडऩे मात्र से ही गजब उत्साह में आ गए। बताते रहे है कि आज का मोहन सिंह पैलेस का कॉफी हाउस कहां-कहां से घुमकर यहां आया। वह हाउस के दशकों पुरानी यादों में से एक से एक मजेदार किस्से सुनाने लगे। अपने जमाने को याद करते हुए संतोष के साथ कह रह थे कि पुराने लिखने वाले नए लोगों को बहुत हिम्मत बंधाते थे। रास्ता दिखाते थे। आजकल जैसी मारामारी  नहीं थी। कॉफी हाउस खाने-पीने की नहीं, बल्कि विचार-विमर्श की जीवंत जगह थी। बहस करते-करते कई बार हाथापाई की नौबत भी आ जाती, लेकिन जब घर जाते थे तो सारे शिकवे  खत्म। उर्दू के मशहूर शायर नरेश कुमार शाद को बहुत शिद्दत से याद करते रहे, भई, पीता खूब था, शायरी भी खूब करता था। एक बार इतना पी लिया कि बैरों ने कॉफी हाउस से बाहर कर दिया। फिर मैंने उनको समझाया, वह बहुत बड़ा शायर है। अंदर ले आओ। नहीं तो बहुत बदनामी होगी। वे मेरी बात मान गए और शाद को अंदर ले आए। विष्णुजी उदास हो गए कि हिंदी, उर्दू और पंजाबी तीनों भाषाओं के साहित्यकार आते थे। पहले पंजाबी वालों ने आना छोड़ा, फिर उर्दू वालों ने और अब हिंदी वाले भी कम हो गए हैं।
कॉफी हाउस का यह क्रम प्रीतमपुरा आने पर टूट गया। विष्णुजी कुछ थके हुए लग रहे थे। गाड़ी में देर तक बैठने के कारण साइटिका परेशान कर रहा था। मैंने और प्रदीप ने बारी-बारी से उनके साथ तस्वीरें खींचवाई। फिर इस वायदे के साथ कि जल्द ही इनको उनको दिखाने आएंगे, विदा ली।
प्रदीप की मारुति सारी आशंकाओं के बावजूद अभी भी ठीक चल रही थी। आज का दिन वाकई अच्छा बीता। प्रदीप को जरूर असंतोष था कि वह चाहकर भी विष्णु जी से आवारा मसीहा से जुड़े सवाल नहीं पूछ सके। इस उम्मीद के साथ कि अगली बार सिर्फ आवारा मसीहा के किस्सों पर ही बात करेंगे, हमारी गाड़ी भीड़ में रास्ता बनाती चली जा रही थी।