चर्चित व्यंग्यकार और गजलकार संजय ग्रोवर की नज्म़-
जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूँ
जो तोल के बोलूँ तो कुछ भी न बोलूँ
ये तहज़ीब की बन ज़ुंबाँ बोलते हैं
ये बनके तेरे मेहरबाँ बोलते हैं
ये ईमान पर, बेईमाँ बोलते हैं
जिन्हें नाज़ है उनके ……
ये चाहें तो तुझको तुझीसे लड़ा दें
तेरे घर में घुसकर वो बेघर बना दें
ये साज़िश करें और मुकद्दर बता दें
जिन्हें नाज़ है उनके ……
ये बढ़ते हुए माफ़िया ज़िंदगी के
ये रटते हुए, काफ़िया ज़िंदगी के
ये बन जाते हैं रहनुमाँ ज़िंदगी के
जिन्हें नाज़ है उनके ……
कोई टोपियों से कबूतर निकाले
क़िताबों से कोई है अक्षर निकाले
कोई जादूगर कफ्न से सर निकाले
जिन्हें नाज़ है उनके ……
अदू औरतों के, चले दोस्त बनकर
निशाना ये उनपर लगाएंगे छुपकर
उन्हीं के ये, हमदर्द कंधे पे रखकर
जिन्हें नाज़ है उनके ……
ये माँ बहन बेटी की माला जपे हैं
दिखे है जो औरत, ये सर नोंच ले हैं
ये उसपर हँसे हैं कि ख़ुदपर हँसे हैं
जिन्हें नाज़ है उनके ……
वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूँढती है
वो मज़हब ही में अपना सब ढूँढती है
वो तब ढूँढती थी न अब ढूँढती है
जिन्हें नाज़ है उनके…..
इसे जिस धरम ने कहीं का न छोड़ा
उसे इसने अपना सबब मान छोड़ा
इस औरत ने ख़ुदको कहीं का न छोड़ा
जिन्हें नाज़ है उनके…..




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