
उठाइगीर जाति में जन्म लेने के कारण व्यवस्था की नजर में वह जन्म से ही अपराधी था। उसे यह भी नहीं पता कि मेरा जन्म कब हुआ? उसने जीवन की विद्रूपता को नजदीक से देखा। दु:खों से छुटकारा पाने के लिए उसने महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी की तरह ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश की। अंतत: उसे सही रास्ता मिला- जन संघर्ष का। और वह बिना लाभ-हानि का विचार किए उस पर चल पड़ा। उतार-चढ़ावों से भरी यह प्ररेणादायक दास्तां है साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मराठी के चर्चित लक्ष्मण गायकवाड़ की-
लक्ष्मण गायकवाड़ का जन्म लातूर के धनेगांव में हुआ। घर पर घास-फूंस का छप्पर था। जमीन पर बैठकर रेंगते हुए ही उसके भीतर दाखिल हुआ जा सकता था। दादी तरसाबाई घर का खर्च चलाती थीं। दादा लिंगप्पा गायकवाड़ को दिन में दो बार पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगवानी पड़ती थी। इस कारण वह कोई काम नहीं कर सकते थे। लक्ष्मण के पिता को लोग उठाईगीर जाति का होने के कारण काम नहीं देते थे।
पुलिस पिटाई के डर से लिंगप्पा गायकवाड़ मुखबिर बन गए। बिरादरी के कई लोगों को पुलिस पकड़कर ले गई। बिरादरी के लोग उनके परिवार से खार खाने लगे। पंचायत ने लिंगप्पा को खत्म करने का निर्णय ले लिया। एक भयानक रात में झप्पर फाड़कर कुछ लोग अंदर आए। उन्होंने लिंगप्पा के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और कुल्हाड़ी से उनके टुकड़े कर दिए।
केस को पुलिस स्टेशन नहीं जाने दिया गया। बिरादरी के निर्णय के विरुद्ध कोई पुलिस में नहीं जा सकता था। घर की सारी जिम्मेदारी दादी के कंधों पर आ गई। वह कभी-कभी चोरी करते पकड़ी जातीं। पुलिस उन्हें दो-तीन महीने के लिए जेल में डाल देती। घर में फाके होने लगते। घर में जब कुछ न होता तो लक्ष्मण के पिता मार्तंड, मां घोंडाबाई तथा बड़ा भाई माणिकदास रात में खेतों की ओर निकल जाते। जवार के भुट्टे, मिर्च, बाजरा, फलियां चोरी कर लाते। भुट्टों के दाने निकालते, उन्हें कूटते और पकाकर खाते।
धीरे-धीरे माणिकदास चोरी करने में माहिर हो गया। वह ही घर चलाने लगा। मार्तंड तुतलाते और लंगड़ाते थे। इसलिए वह चोरी करने नहीं जाते थे। बहुत गिड़गिड़ाने के बाद गांव के एक किसान ने उन्हें बाग की रखवाली के लिए रख लिया। गांव में उठाईगीर समाज के किसी व्यक्ति को पहली नौकरी मिलने पर पूरा घर आनंदित हो उठा।
लक्ष्मण के पांच भाई और दो बहनें थीं। लक्ष्मण से बड़ा भाई हरचंदा था। वह बकरियां चराता था। हरचंदा को मिरगी के दौरे पड़ते थे। लक्ष्मण उसे संभालता था। पहनने के लिए चोरी की कमीजें और नेकर होते। किसी के लिए भी नए कपड़े नहीं लाए जाते थे।
एक दिन लातूर में दुकान से तेल का डिब्बा चुराते हुए भाई भगवान अण्णा पकड़ा गया। पुलिस पूछती और पीटती। पिटाई से घबराकर अण्णा ने नाम, गांव और घर का पता बता दिया। पुलिस उसे लेकर घर आयी। सभी सदस्यों को एक लाइन में खड़ाकर हंटर से मारने लगी। छोटे बच्चों और औरतों को भी नहीं छोड़ा। पुलिस की पिटाई देखकर लक्ष्मण का नेकर में पेशाब निकल गया। उसे लगा कि चोरी नहीं करनी चाहिए। मार्तंड की इच्छा थी कि कम से कम एक लड़का तो पढऩे जाए। उन्होंने छह साल के लक्ष्मण के हाथ में जेब काटने के लिए काम आने वाला ब्लेड न देकर स्लेट-पेंसिल दे दी।
स्कूल में लक्ष्मण को अजीब-अजीब सा लगता। कक्षा के सभी लड़के उसे कंकड़ों से मारते। कहते, ”उठाईगीरों का लक्ष्या स्कूल कैसे?’’
कुछ लड़के चिल्लाते, ”अरे, यह तो केकड़े खाने वाला है।’’ इन अपमानों के बावजूद वह स्कूल जाता रहा।
लक्ष्मण को स्कूल जाते हुए तीन-चार दिन हुए थे कि बिरादरी के कई बच्चों को दस्त और उल्टियां होने लगीं। लोगों ने मार्तंड को धमकाया कि लक्ष्या के स्कूल जाने की वजह से ही बीमारी हुई है। हमारी बिरादरी में आज तक कोई स्कूल नहीं गया। लक्ष्या को स्कूल से निकाल लें। अगर वह फिर स्कूल गया तो हम जात पंचायत बिठाएंगे और तुझे बहिष्कृत करेंगे। मार्तंड परेशान हो गए। उन्होंने लक्ष्मण का स्कूल जाना बंद करा दिया।
कुछ दिनों बाद स्कूल के एक शिक्षक कुलकर्णी ने कुछ लड़कों को भेजकर लक्ष्मण को स्कूल बुलवाया। इससे बिरादरी के लोग और चिढ़ गए। पंचायत बुलाई गई। निर्णय लिया गया कि या तो मार्तंड गांव छोड़ें अथवा लक्ष्या को स्कूल भेजना बंद करें। इसकी सूचना मार्तंड ने शिक्षक को दी। कुलकर्णी गुरुजी बस्ती में आए। उन्होंने लोगों को समझाया कि लक्ष्मण के स्कूल जाने से बीमारी नहीं फैली है। यदि ऐसा होता तो गांव के बहुत से बच्चे स्कूल जाते हैं, पूरे गांव में हैजा क्यों नहीं हुआ? उन्होंने डाक्टर को बुलवाकर सभी बच्चों को दवा दिलवाई। दो-तीन दिन में सबकी तबियत ठीक हो गई। लक्ष्मण फिर स्कूल जाने लगा।
घोंडाबाई ने दूध बेचना शुरू किया। इससे तकलीफें कुछ कम हुईं। दूध के पैसों से उन्होंने तीन-चार टिन खरीद लिए। घास-फूस की छत हटाकर टिन की चादरें बिछवा दीं।
कुछ दिनों बाद अचानक घोंडाबाई बीमार पड़ गईं। दूध बेचना बंद हो गया। कमाई बंद। मार्तंड ने बकरियां बेचकर कुछ दिन घर चलाया। घोंडाबाई को इलाज के लिए जावली ले जाया गया। वहां तबियत और खराब हो गई। पैसों के अभाव में लक्ष्मण को जावली नहीं ले जाया गया। वह अपनी मां के अंतिम दर्शन नहीं कर सका।
स्कूल में लक्ष्मण ही सबसे गंदा रहता। गुरुजी पिटाई करते। इस कारण वह रोज नहाने लगा। छुट्टी के दिन वह नदी पर जाता। पहले कमीज धोता। उसे सुखाता। कमीज सूखने के बाद नेकर निकालता। नंगा होकर उसे धोना चाहता, पर किनारे कई औरतें होतीं। संकोच होता। दूसरा नेकर था नहीं। धुली कमीज कमर पर बांधता और नेकर धोता। साबुन कभी मिलता नहीं था। नदी के निकट काली मिट्टी का खेत था। वह मिट्टी ही लक्ष्मण का साबुन थी।
लक्ष्मण दूसरी कक्षा में आ गया। किताब न होने के कारण गुरुजी ने उसकी पिटाई कर दी। मार्तंड अपने मालिक से कुछ एडवांस मांग लाए और लातूर से किताब, कापी और कलम लाकर दिए।
एक दिन मार्तंड चामले के बाग से घर आए। उन्होंने लक्ष्मण से पूछा, ”किताब-कापी ठीक से रक्खी है न। बता?’’ उन्होंने कापी देखी और चप्पल से लक्ष्मण को पीटने लगे। उसकी बात भी नहीं सुन रहे थे। वह पीटते-पीटते कहने लगे, ”कापी खराब क्यों कर दी!’’ बहुत पिटाई की। लक्ष्मण का चिल्लाना सुनकर भाई आया। उसने लक्ष्मण का पक्ष लिया। मार्तंड उसे भी गाली देने लगे, ”नई कापी खराब कर दी भड़ुवे ने। इस कापी के लिए मैंने मालिक से गिड़गिड़ाकर पैसे लिए थे। क्या इसलिए कि यह खराब कर दे?’’
भाई ने समझाया, ”कलम लिखने के लिए होती है। कापी पर ही लिखा जाता है।’’ लेकिन मार्तंड को विश्वास नहीं हुआ। भाई ने पड़ोस के लड़के को बुलाया। उसने बताया, तब विश्वास हुआ।
उन दिनों घर की हालत खस्ता थी। तीन-तीन, चार-चार दिन चूल्हा नहीं जलता। मार्तंड अपने मालिक चामले के यहां खा लेते। लक्ष्मण घर में सबसे छोटा था। इसलिए उसे अपने पास बुला लेते और मालिक से मिलने वाली रोटी में से आधी उसे दे देते और खुद अधभूखे रह जाते।
लक्ष्मण भूख से बेहाल हो जाता तो अमावस्या या पूर्णिमा के दिन श्मशान घाट चला जाता। आषाढ़-श्रावण में गांव के लोग खाने की चीजें और नारियल भूत-प्रेत बाधा के डर से अपने लाड़लों पर से उतार कर फेंक देते। लक्ष्मण वही खा लेता। इन हालात में किसी प्रकार उसने चौथी की परीक्षा पास की।
माणिकदास को पता चला कि सोलापुर में उठाईगीरों के लिए विद्यालय चलाया जाता है। वहां रहने और भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था है। उन्होंने लक्ष्मण को वहां भेजने का निश्चय कर लिया। लक्ष्मण शिवा व बापूशाह के साथ सोलापुर शामाराव मास्टर के घर गया। मास्टरजी ने उन्हें सोनगांव जाने के लिए कहा। वहां मास्टरजी के दामाद हेडमास्टर थे। उन्होंने उनका नाम पांचवी कक्षा में लिख लिया। शाम को भोजन मिला तो पता चला कि खाना हिसाब से मिलता है, भरपेट नहीं।
लक्ष्मण के दोनों साथी भूख से परेशान होकर स्कूल से भाग गए। लक्ष्मण बाभलगांव चला गया। वहां के हैड मास्टर से मिला। उन्होंने उसका नाम पांचवी में लिख लिया।
लक्ष्मण को पढऩे की आदत पड़ गई। उसने ‘गुलाब कैवाली का’ और ‘राधूमैना’ जैसी किताबें पढ़ीं। इतिहास और मराठी किताबें पढऩा उसे अच्छा लगता। इनके अलावा पाठ्य पुस्तकें पढऩे से लक्ष्मण की समझ बढऩे लगी। वह अपनी स्थिति पर सोचने लगा।
उसने कक्षा में गौतमबुद्ध और महावीर स्वामी के बारे में पढ़ा। उसे लगने लगा कि दु:खों से मुक्ति के लिए ज्ञान प्राप्त करना जरूरी है। वह स्कूल आते-जाते समय एकांत में किसी पेड़ के नीचे आंखें बंद करके बैठ जाता। बहुत देर तक बैठा रहता।
वह घर में अकेला रहता तो दीवार से सिर टकरा-टकराकर भगवान को याद करता कि हे भगवान! मुझे ज्ञान प्रदान कर। गरीबी से छुटकारा पाने का कोई उपाय बता। घंटों मंदिर के पास पेड़ के नीचे खामोश बैठता। मंदिर के चक्कर लगाता। पोथी-पुराण पढ़ता। चार-चार दिन भूखा रहता। मंदिर में प्रसाद चढ़ाने की बात कर भगवान को फुसलाता।
भाभियों के झगड़े बढऩे लगे। अलग रहने का फैसला हुआ। मार्तंड रखवाली करते थे। हरचंदा चोरी करता था। हरचंदा को साथ रखने के लिए तीनों भाई तैयार थे। पिता को संभालने के लिए भगवान अण्णा तैयार था। लक्ष्मण को साथ रखने के लिए कोई तैयार न था। तीनों भाइयों का कहना था कि हम अपने बाल-बच्चों को संभाले या इसको? इसे किताब-कापियां लाकर कौन देगा? अंत में संभा लक्ष्मण को साथ रखने के लिए तैयार हुआ। अन्य भाई किताब-कापियों के खर्चे को बांटने के लिए राजी हो गए।
लक्ष्मण की देखभाल का प्रश्न था। इसलिए वह बाभलगांव की बोर्डिंग में रहने लगा। छुट्टी के दिन धनेगांव जाता। पिता से मिलने चामले के बाग में जाता। वह सोचता कि पिता इतना बूढ़ा हो गया है, थक गया है, फिर भी नौकरी कर रहा है। मार्तंड कहते कि तू खूब पढ़। बड़ा आदमी बन।
लक्ष्मण को किताब-कापियों के लिए कोई पैसा नहीं दे रहा था। वह सोचने लगा कि अब नौकरी करनी चाहिए। वह संभा के पास लातूर चला गया। लातूर-नांदेड़ रोड पर गरीबों की बस्ती है। उसने वहां पाव (ब्रेड) बेचना शुरू कर दिया। बहुत दिनों यह काम किया। इस काम से अधिक मुनाफा नहीं हो रहा था। इसलिए वह केले बेचने लगा। इससे अच्छा मुनाफा होने लगा। बोर्डिंग छोडऩे से हैड मास्टर नाराज थे। लक्ष्मण स्कूल गया। उसने हैड मास्टर से कह दिया कि अब स्कूल नहीं पढ़ेगा। उसने स्कूल छोड़ दिया।
संभा सूत गिरनी में नौकरी करते थे। लक्ष्मण ने वहां नौकरी के लिए कोशिश की। लेकिन ‘तू छोटा है’ कहकर उसे भगा दिया। किसी ने दरख्वास्त में केशवराव सोनवणे से दस्तखत करवाने की सलाह दी। सोनवणे सहकारी मंत्री थे। लक्ष्मण उनसे दस्तखत करा लाया। स्पिनिंग मास्टर ने उसे रिंगफ्रेम में भेज दिया।
जब तक चाती पकड़कर धागा जोडऩा नहीं आता, वेतन नहीं मिलता था। कुछ दिन लक्ष्मण ने फोकट में काम किया। उसे धागा जोडऩे की सफलता 125 दिन बाद मिली। वेतन 60 रुपये मिलने लगा। वह मेहनत और लगन से तेजी से काम सीखने लगा। छह महीने में उसका वेतन पिचहत्तर रुपये हो गया।
मिल के टाइम कीपर पाटिल ने लक्ष्मण को नौकरी के साथ पढ़ाई करने की सलाह दी। वह बाभलगांव से टी.सी. ले आया और लातूर के शिवाजी हाई स्कूल में दाखिला ले लिया। उसने रात की पाली में ड्यूटी लगवा ली। वह रात बारह बजे मिल में चला जाता। सवेरे तक ड्यूटी करता। रात का बचा-खुचा जो भी होता, उसे खाकर साढ़े नौ बजे तक सो जाता। दस बजे स्कूल जाता। कक्षा में बहुत नींद आती। रातभर काम करने के कारण थकावट होती। शाम पांच बजे स्कूल से छुट्टी होती। घर जाता और खाना खाकर सो जाता। यही उसकी दिनचर्या बन गई।
एक दिन लक्ष्मण स्कूल से आ रहा था। उसे रास्ते में एक छोटा लड़का गोबर से भरा टोकरा सिर पर रखकर ले जाता मिला। धूप बहुत तेज थी। लक्ष्मण को बच्चे पर तरस आ गया। उसने बच्चे से पूछा कि तू टोकरी में इतना ज्यादा गोबर लेकर क्यों जा रहा है ? वह बच्चा बोला कि उसकी मां सौतेली है। जब तक वह हर दिन टोकरी भर कर गोबर के उपले बनाकर नहीं रखता, तब तक खाना नहीं देती। लक्ष्मण सोचने लगा कि मैं अपने को ही दु:खी समझता हूं, लेकिन मुझसे ज्यादा दु:खी और भी हैं। उसने टोकरी अपने सिर पर रख ली। किताबों का थैला उसे दे दिया। गांव के नजदीक तक लक्ष्मण टोकरी लाया। उसके कपड़ों में गोबर के दाग लग गए। उसे खुशी थी कि उसने कुछ देर तक के लिए बच्चे का बोझ हलका कर दिया। लेकिन इस बात का अफसोस भी हुआ कि बच्चे का बोझ सदा के लिए कम नहीं कर पाया।
लक्ष्मण के साथ पढऩे वाले बच्चों की जन्मतिथि 1956 में थी। उसकी उम्र प्राविडेंट फंड और इंश्योरेंस में 23.7.1956 लिखी जा चुकी थी। उसने यही जन्मतिथि लिखनी शुरू कर दी।
लक्ष्मण ने नौंवी की परीक्षा दी। नौकरी के कारण ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाया इसलिए फेल हो गया। उसने स्कूल छोड़ दिया। उसे पता चला कि औरंगाबाद की सूत मिल में भर्ती शुरू हुई है। दो सौ रुपये एडवांस दे रहे हैं। वेतन भी अधिक है। वह 1972 में औरंगाबाद चला गया। वहां दस रुपये रोज मजदूरी मिलने लगी।
एक बार मिल में रूस से लौटा एक व्यक्ति आया। उसने अपने भाषण में कहा कि रूस में मजदूर और मालिक एक हैं। वहां के लोग सुखी हैं। लक्ष्मण ने पूछा कि रूस में मजदूर और मालिक एक हैं, तब हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं है ? उस व्यक्ति ने कारण समझा दिया।
लातूर में संभा की नौकरी छूट गई थी। वह सब्जी बेचकर गुजारा कर रहा था। लक्ष्मण ने उसे औरंगाबाद बुला लिया और अपनी मिल में फिटर लगवा दिया। उसने जवाहर कालोनी में दो कमरे ले लिए। कुछ दिनों बाद भाभी, हरचंदा और लक्ष्मण के बीच झगड़े होने लगे। लक्ष्मण उदास रहने लगा। वह दस दिन की छुट्टी लेकर लातूर चला गया।
लक्ष्मण धनेगांव गया। पिता से मिला। मार्तंड ने कहा कि वह बूढ़ा हो गया है। अचानक किसी दिन मर जाएगा। तेरे से भेंट नहीं हो पाएगी। तू नजदीक आ जा। मालिक रोटियां ठीक से नहीं भेजता। लक्ष्मण को बहुत दु:ख हुआ कि वह पिता तक की देखभला नहीं कर सकता, फिर जिंदगी का मतलब ही क्या? उसने दोबारा लातूर मिल में नौकरी कर ली। वह औरंगाबाद गया। त्यागपत्र देकर बचा-खुचा वेतन ले लिया। हरचंदा को साथ ले आया। थोड़े दिन बाद पिता की नौकरी छुड़वाई और उन्हें भी ले आया।
लक्ष्मण का विवाह थेली गांव की छबू से हुआ। पत्नी के साथ उसकी दादी भी आई थी। एक कमरे में चार लोग रहने लगे। लक्ष्मण की हालत दिन-ब-दिन खराब होने लगी। मार्तंड फिर से नौकरी के लिए धनेगांव चले गए। हरचंदा की मिरगी या लक्ष्मण की जाति का किसी को पता चल जाता तो मकान बदलना पड़ता। लातूर में उसने उन्नीस बार मकान बदला।
लक्ष्मण ने मंझली भाभी की बहन से शादी नहीं की थी। वह पत्नी-पत्नी के बीच झगड़ा कराने लगी। वह छबू से लक्ष्मण के बारे में गलत और गंदी बातें कहती। दूसरी ओर लक्ष्मण से कहती कि तेरी पत्नी के चाल-चलन ठीक नहीं हैं। तूने बेकार ही उससे शादी की। इसी तरह की गलतफहमी में लक्ष्मण ने पत्नी को बहुत मारा।
दूसरे दिन लक्ष्मण ड्यूटी पर चला गया। भाभी ने छबू को भड़काया कि वह घर से भाग जाए। छबू का कोई रिश्तेदार लातूर में था। वह उसके घर चली गईं। भाभी ने इसकी सूचना लक्ष्मण को भिजवा दी। छबू का रिश्तेदार उसे वापस छोड़ गया। लक्ष्मण ने फिर से पत्नी की पिटाई की। दूसरे दिन छबू का भाई आया और उसे अपने साथ ले गया।
एक दिन मंझली भाभी के भाई ने लक्ष्मण को सारी बात बता दी। लक्ष्मण को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह ससुराल जाकर अपनी पत्नी को ले आया।
बारिश हो रही थी। हरचंदा कमरे को भीतर से बंदकर बैठ गया। लक्ष्मण ड्यूटी से बारह बजे आया। गरीबी और गुस्से के कारण उसने हरचंदा से कहा, ”जा, कहीं भी जा। मर। भीख मांग। पर यहां मत आ। कल अगर लातूर में दिखाई दिया तो पुलिस वालों को तुझे पकड़वा दूंगा। पुलिस जानती है कि तू उठाईगीर है। हरचंदा के कपड़े बांध दिए। कपड़ों की गठरी उसके हाथों में जबरदस्ती पकड़ा कर घर से निकाल दिया। हरचंदा चला गया। वह फिर कभी नहीं आया। लक्ष्मण बाद में पछताया। उसकी बहुत खोजबीन की, लेकिन कुछ पता नहीं चला।
लक्ष्मण पिता को लातूर ले आया। उसने आमदनी बढ़ाने के लिए घर में सब्जी की दुकान खोल ली। मार्तंड को तोलने की आदत नहीं थी। उन्हें वजन समझ में नहीं आता। नुकसान होने लगा। लक्ष्मण ने पत्नी से कहा कि वह पिता के साथ दुकान पर बैठे। वह कुछ ही दिनों में सारा हिसाब समझ गई। मुनाफा होने लगा।
मिल में मजदूरों का शोषण होता था। वेतन के साथ साल में केवल 15 अगस्त, 1 मई और 26 जनवरी की छुट्टी दी जाती थी। पिटाई तक होती थी। लक्ष्मण सोचने लगा कि संगठन होना चाहिए। संगठन बन जाएगा तो कर्मचारियों की मारपीट बंद हो जाएगी।
एक मई को कैंटीन में मजदूरों की बैठक हुई। लक्ष्मण ने मिल-जुलकर काम करने की बात कही। मैनेजर ने खुश होकर ग्यारह रुपये इनाम में दिए। सब उन्हें पहचानने लगे।
लक्ष्मण गायकवाड़ ने 15 अगस्त को मजदूरों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ भाषण देने का फैसला कर लिया। कार्यक्रम में दो हजार मजदूर थे। लक्ष्मण ने भाषण में मजदूरों पर हो रहे अत्याचारों की बात कही और मैनेजर से इन्हें बंद करने की अपील की। मैनेजर ने लक्ष्मण का भाषण बीच में रोकने की कोशिश की। सारे मजदूर चिल्लाने लगे- इसे बोलने दीजिए। तालियां बजती रहीं। सभी मजदूर लक्ष्मण की प्रशंसा करने लगे।
इस घटना के बाद जॉबर लक्ष्मण को परेशान करने लगे। उन पर जुर्माना किया जाता। इससे मजदूरों में खलबली मच गई।
मजदूरों के दो प्रतिनिधि डायरेक्टर के रूप में लिए गए। इनमें लक्ष्मण गायकवाड़ भी चुने गए। कुछ दिनों बाद उनकी समझ में आने लगा कि मिल को बहुत फायदा होता है, लेकिन मजदूरों को ठीक से वेतन नहीं मिलता। बोनस भी बहुत कम दिया जाता है। धीरे-धीरे सभी मजदूर इन बातों को लेकर सोचने लगे।
मजदूरों ने हड़ताल कर दी। हड़ताल को 15 दिन हो गए। चेयरमैन और मैनेजर ने कहा कि हड़ताल समाप्त कर दो। मांगें बाद में मान ली जाएंगी। मजदूर इससे सहमत नहीं हुए। हड़ताल जारी रही।
मालिक मजदूरों का शोषण किस तरह करते हैं? मजदूरों को किन हालातों से गुजरना पड़ता है ? इन्हें लेकर लक्ष्मण गायकवाड़ छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे। इन्हें वह मजदूरों को सुनाते। इन कविताओं से आंदोलन ने और जोर पकड़ लिया।
मिल प्रबंधन मांगें नहीं मान रहा था। लक्ष्मण ने पत्नी को मायके भेज दिया और आमरण अनशन पर बैठ गए। पहले दिन ग्यारह मजदूर सम्मिलित हुए। तीन दिन बीत गए। मजदूरों की हालत बिगडऩे लगी। लक्ष्मण को जबरदस्ती सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। अन्य मजदूर अनशन पर बैठे। मजदूरों के प्रतिनिधियों में शिवाजी पाटिल बहुत निडर था। उसने चेयरमैन और मैनेजर को धमकी दी कि एक भी मजदूर भाई को कुछ हो गया तो जिंदा नहीं छोड़ेंगे। हजारों मजदूर उन दोनों के घरों पर मोर्चा लेकर जाने लगे।
मजदूर जीत गए। हड़ताल के दिनों का वेतन नहीं मिलेगा, इसके अलावा सभी मांगें मान ली गईं।
संगठन के लिए चंदा इकट्ठा किया गया था। इस कारण प्रतिनिधियों में गलतफहमी होने लगी। लक्ष्मण गायकवाड़ आंदोलन के सिलसिले में वकील भगवान राव देशपांडे से मिले थे। देशपांडे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। वह लक्ष्मण को पुस्तकें देने लगे।
लक्ष्मण ने गोर्की की ‘मां’, मार्क्स, लेनिन, एंगेल्स, सोवियत संघ का घोषणा पत्र, फुले आदि की किताबें पढ़ीं। इससे उनकी दृष्टि विकसित होने लगी। वह मजदूरों से संबंधित सभी कायदे-कानून मराठी में पढऩे लगे।
लक्ष्मण के विरोध के बावजूद गणेश उत्सव मनाया गया। उन्हें जिस बात की आशंका थी वही हुआ। हिसाब नहीं मिला। मजदूरों में गलतफहमियां बढऩे लगीं। मैनेजमेंट ने इसका लाभ उठाया और झूठे आरोप लगाकर लक्ष्मण तथा एक अन्य प्रतिनिधि जगताप को अस्थायी रूप से काम से निकाल दिया। उन्हें काम पर नहीं लिया जा रहा था। उन्होंने मजदूरों से हड़ताल करने के लिए कहा। अस्सी प्रतिशत मजदूरों ने ही हड़ताल की।
एक दिन मिल के गेट के सामने लक्ष्मण गायकवाड़ भाषण देने के लिए खड़े थे। पुलिस ने बिना किसी कारण लाठीचार्ज कर दिया। सैकड़ों मजदूर घायल हो गए। लक्ष्मण सहित 40 मजदूरों पर फौजदारी का झूठा मुकदमा दर्ज किया गया।
मजदूर काम पर जाने लगे। हड़ताल वापस लेनी पड़ी। मैनेजर ने सौ मजदूरों को काम से निकाल दिया। पूणे के इंडस्ट्रीज कोर्ट में मजदूरों ने मिल के विरुद्ध केस कर दिया। पूणे जाने के लिए पैसे नहीं थे। लक्ष्मण हर बार अनुपस्थित रहे। इस कारण मैनेजमेंट के पक्ष में निर्णय हुआ।
लक्ष्मण ने बोनस मिलने पर जमीन खरीद कर उस पर परचून की दुकान खोल ली थी। उसे छबू चलाती थीं। लक्ष्मण ने नटराज टॉकिज के सामने टपरी में चाय बनाकर बेचना शुरू कर दिया। सवेरे से रात आठ बजे तक काम करने के बाद मुश्किल से दस-पंद्रह रुपये कमा पाते। बाद में होटल का काम छोड़ दिया। सब्जी की दुकान खोल ली।
संभा औरंगाबाद में सूत मिल में नौकरी कर रहा था। लक्ष्मण वहां नौकरी के लिए गए। मैनेजमेंट को पता चला कि इसी ने लातूर में हड़ताल करवाई थी। उन्हें नौकरी नहीं दी। वह वापस आ गए।
दुकान से खर्चा चल नहीं रहा था। वह मिर्च पाउडर और अन्य चीजें बेचने लगे। बाद में सूखी मछलियां गली-गली बेचीं। कुछ दिन नमकीन, मुंगफलियां भी बेचीं।
लक्ष्मण गायकवाड़ के घर के सामने एन.बी. शेख गुरुजी रहते थे। उनकी सलाह पर उन्होंने ‘पाथरूट समाज संस्था’ की स्थापना की। संस्था के काम से इधर-उधर जाते। ऐसे कामों के लिए पैसा दुकान से ही लेते, इस कारण नुकसान होने लगा।
मार्तंड बीमार हो गए। दो समय ठीक से भोजन न मिलने और दवा का सही प्रबंध न होने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।
घर में तीन ही लोग थे। कई बार भूखा सोना पड़ता। बेटी को दूध पिलाने के लिए भी पैसे नहीं होते। इन्हीं दिनों लोकसभा के चुनाव आ गए। माणिकराव सोनवणे प्रत्याशी थे। लक्ष्मण ने उनके लिए प्रचार किया। लक्ष्मण गायकवाड़ की कई छोटे-बड़े नेताओं से जान-पहचान हो गई। सोनवणे के दामाद जी.एस. पाटिल ने लक्ष्मण को नगर परिषद में चपरासी की नौकरी दिलवा दी। परिषद के स्कूल में शिक्षिका से अनबन होने पर उन्होंने बदली करवा ली। उनकी नाके पर ड्यूटी लगी।
बड़े-बड़े अधिकारी नगर पालिका में घपले करते। लक्ष्मण गायकवाड़ सोचते कि हमारे लोग तो भूख के मारे चोरी करते हैं, उन्हें चोर कह कर सजा दी जाती है। ये लोग तो दिन दहाड़े चोरी करते हैं, लेकिन इन्हें कोई सजा नहीं होती। कुछ दिनों बाद उन्हें नाके के बड़े अधिकारी के कार्यालय में भेज दिया गया। घंटी बजते ही भागना पड़ता। उन्हें ऐसी जिंदगी से घृणा होने लगी। नौकरी छोड़ दी।
एक दिन लक्ष्मण गायकवाड़ कवठा गए। यह जगह उस्मानाबाद जिले में है। वहां प्राध्यापक बी.एल. गायकवाड़ और अपने साढ़ू डी.एस. गायकवाड़ से मिले। समाज को संगठित करने और बच्चों को चोरियां सिखाने के बदले स्कूल में भर्ती करने का निर्णय लिया गया। सन् 1978 में विमुक्त जनजातियों का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया। इसके बाद से लक्ष्मण गायकवाड़ विमुक्त जनजातियों, दलितों, शोषितों और पीडि़तों की स्थिति में बदलाव लाने के लिए प्रयत्नशील है। इसके लिए उन्हें गुंडों व पुलिस की पिटाई भी झेलनी पड़ीं, लेकिन वह अपने रास्ते पर अडिग हैं।
उनके कुछ प्रोफेसर मित्रों ने सलाह दी कि आप इतना बड़ा आंदोलन कर रहे हो। आपको यह सब लिखना चाहिए। इससे विमुक्त जनजातियों की समस्या आम लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। उन्होंने दलित साहित्य की किताबें, जैसे दया पवार की आत्मकथा ‘बलूत’ (अछूत), ‘यादों के पंछी’, फुले व अंबेडकर की रचनाएं पढ़ीं। आण्णा भाऊ साठे के देहांत के संबंध में लिखी किताब पढ़कर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तय किया कि मैं भी ऐसा कुछ लिखूं। भूख और काम से लिखने की प्रेरणा मिलती गई। वह संगठन के काम से महीने में बीस-पच्चीस दिन बाहर रहते। बाहर अकेले रहने से लिखने का समय मिल जाता। उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने ‘उचल्या’ (उठाईगीर) पूरी की। मराठी के चर्चित लेखक शरणकुमार लिंबाले और दया पवार के सहयोग से यह आत्मकथा श्री विद्या प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुई। इसका विमोचन प्रसिद्ध विचारक लक्ष्मण शास्त्री जोशी और पत्रकार माधव गडकरीजी ने किया। इसके प्रकाशित होते ही मराठी में खलबली मच गई। विमुक्त जनजातियों के सवाल महाराष्ट में जोर-शोर से उठने लगे।
‘उचल्या’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। लोग उनके घर आकर बधाई देने लगे। मान-सम्मान करने के लिए जगह-जगह से बुलावा आने लगा। सम्मान के रूप में पचास से अधिक शाल प्राप्त हुए। एक सम्मान समारोह में उन्होंने कहा कि यह कैसे समाज है? बचपन में जाड़े के मौसम में मुझे ठंड लगती थी तो मैं शाल चुराया करता था। मैं पढ़-लिखकर बड़ा हुआ। जरूरत के लिए मैं कैसे शाल चुराया करता था, किताब में मैंने इस बात का जिक्र किया तो लोग मुझे नारियल, पुष्पमाला और शाल देने लगे। मैं इतने शालों का क्या करूंगा? मुझे शाल देना बंद कीजिए। तब से लोगों ने शाल देना बंद कर दिया।
इसी दौरान महाराष्ट सरकार ने लक्ष्मण गायकवाड़ को एक लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की। पांच-छह लाख खानाबदोश आदिवासी घुमंतों लोगों के शोलापुर के अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पुरस्कार प्रदान किया।
दूसरे दिन वह घर आए। अनके भाई, भाभी और जाति-बिरादरी के चालीस-पचास लोग आए। उन्हें लगा कि बधाई देने या शाल मांगने आए हैं। लेकिन बात दूसरी ही निकली। बिरादरी के कुछ लोग कहने लगे कि आपने ‘उचल्या’ किताब में जाति-बिरादरी की गुप्त बातें लिखकर उन्हें सरकार को बेचा है। इसलिए सरकार ने आपको एक लाख रुपये दिए हैं। इस किताब में हमारा भी नाम है। हम क्या काम करते हैं, यह भी इसमें लिखा है। हमारे चोरी के सभी तरीके सरकार को बताने से हमारा धंधा चौपट हो गया है। एक लाख में हमें भी हिस्सा दो। उनके भाई-भाभी कहने लगे कि किताब के हर पन्ने पर हमारा जिक्र है। इसलिए सबसे ज्यादा हक हमारा बनता है। एक लाख रुपये में से हमें हिस्सा नहीं दिया तो हम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। एक दिन उनके घर पर पत्थरबाजी कर दी। उन्हें पुलिस की मदद लेनी पड़ी।
लक्ष्मण गायकवाड़ को ‘महाराष्ट गौरव सम्मान’ प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हाथों मिला है, यह समाचार महाराष्ट के सभी समाचार पत्रों में मोटे-मोटे अक्षरों में छपा। लक्ष्मण गायकवाड़ के भाई और बिरादरी के लोग पुरस्कार में हक जताने के लिए कोर्ट चले गए। यह समाचार भी कुछ दिनों बाद समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपा।
उन्हें भाई-भाभी और बिरादरी के लोग बहुत परेशान करने लगे। उनका बड़ा भाई कहने लगा कि हमारी जाति-बिरादरी में रिवाज है कि जब कभी शिकार करते हैं या चोरी करके अनाज लाते हैं तो उसका घर में बराबर-बराबर बंटवारा होता है। किताब लिखकर तुम्हें जो पैसा मिला है, उसमें हमारा भी हक बनता है। अगर तुम पैसा देने से इनकार करोगे तो तुम्हें जात-बिरादरी की पंचायत से बाहर कर देंगे। उन्हें इस तरह की धमकियां मिलने लगीं।
एक दिन उनके भाई-भाभी और बहन बिरादरी के लोगों को फुसलाकर मुंबई ले आए। जिस दिन उपराष्टरपति शंकरदयाल शर्मा के हाथों उनका सम्मान होना था, उस दिन उपराष्टरपति के रास्ते वे लोग झंडे और लक्ष्मण गायकवाड़ के खिलाफ नारे वाली तख्तियां लेकर खड़े हो गए। वे कहने लगे कि उपराष्टपतिजी, क्या आप अपनी जाति-बिरादरी का अपमान सहन कर सकते हैं? लक्ष्मण गायकवाड़ ने किताब में हमारे बारे में लिखकर हमारा अपमान किया है। उसे पुरस्कार देकर सम्मानित मत कीजिए। लक्ष्मण गायकवाड़ इस कार्यक्रम में शरीक नहीं हुए।
इन सब परेशानियों से छुटकार पाने के लिए वह मुंबई शहर में आकर बस गए। यहां आकर संगठन के माध्यम से लोगों की मदद करने लगे। बाद में उनके भाई-भाभी, बहन और जाति-बिरादरी वालों को पछतावा हुआ। वह लोग मिलने आए।
लक्ष्मण गायकवाड़ को साहित्य अकादेमी की ओर से चीन जाने का अवसर मिला। उस समय पासपोर्ट मैट्रिक के सर्टिफिकेट से बनवाया। उसमें जन्मतिथि लिखी गई 23 जुलाई 1952। साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेते समय आत्म परिचय में जन्मतिथि 1956 थी। उनके सी.ए. मित्र ने सलाह दी कि पासपोर्ट की तारीख को सही मानना होगा। तब से उन्होंने जन्मतिथि 23 जुलाई 1952 लिखनी शुरू कर दी।
उनकी सात किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।
आदिवासी क्रांतिकारी उमाजी नाईक को 1832 में अंग्रेजों ने पुणे में फांसी लगा दी थी। वह इनके जीवन पर आधारित किताब लिख रहे हैं।
भारत की आजादी की लड़ाई लडऩे वाले आदिवासियों को 1871 में अंग्रेजों ने जन्म से अपराधी घोषित कर देश की 52 जेलों में परिवार के साथ कैद कर दिया था। सोलापुर, हुबली, हैदराबाद, अंबरनाथ, पुणे, झाबवा, दिल्ली आदि जगहों में कैद किया गया। लक्ष्मण गायकवाड़ इन सभी जगहों पर जाकर अध्ययन कर भारत के हर राज्य में आदिवासियों की स्थिति पर एक बड़ी किताब लिखने की महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य कर रहे हैं। इनके साथ जनसंघर्ष भी जारी है।
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