Tag: sahitya academy

चंद्रकांत देवताले सहि‍त 24 साहि‍त्‍यकार साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त

chandrakant deotale

नई दिल्ली : देश की 24 भाषाओं में विशेष साहित्यिक योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकारों को 18 फरवरी 2013 को वर्ष 2013 के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्‍दी साहित्य में यह पुरस्कार प्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले को कविता-संग्रह ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ के लिये प्रदान किया गया। पुरस्कार विजेताओं में 12 कवि, छह कथाकार और चार उपन्यासकार शामिल थे। साथ ही मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार आत्मकथा और गुजराती में समालोचना के लिए दिया गया।

साहित्योत्सव-2013 के आगाज के मौके पर कमानी सभागार में आयोजित पुरस्कार समारोह में पुरस्कारों का वितरण साहित्य कला अकादमी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष विश्‍वनाथ प्रसाद ति‍वारी और अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध लेखक शिव के कुमार ने किया। मैथिली में लेखिका शेफालिका वर्मा को उनकी आत्मकथा ‘किस्त-किस्त जीवन’ के लिये सम्मानित किया गया तो गुजराती में समालोचना ‘साक्षीभास्य’ के लिए चंद्रकांत अमृतलाल टोपीवाला को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। पंजाब के दर्शन बुट्टर को उनकी कविता ‘महा कंबनी’ के लिए सम्मानित किया गया। मराठी कहानी परम्‍परा में स्वागत योग्य परिवर्तन का परिचायक कहानी-संग्रह ‘फिनिक्सच्या राखेतून उठला मोर’ के लिये जयंत पवार को पुरस्कृत किया गया। इनके अलावा उदय थुलुड़(नेपाली),  जयंत पवार(मराठी),  गौरहरि दास (ओड़िया),  गंगाधर हांसदा(संताली), स्व. इंदिरा वासवानी (सिंधी) और पी. सुब्बाराव (तेलुगु) को उनके कहानी संग्रह के लि‍ए पुरस्‍कार प्रदान कि‍या गया।

जीत थाइल (अंग्रेजी), बालकृष्ण भौरा (डोगरी),  गुणेश्‍वर मुसाहारी (बोडो),  एच.एस. शिवप्रकाश (कन्नड़),  मखनलाल कंवल (कश्मीरी),  काशिनाथ शांबा लोल्येकर (कोंकणी),  के सच्चिदानंदन (मलयालम),  आईदान सिंह भाटी (राजस्थानी)  और रामजी ठाकुर (संस्कृत) को उनके कवि‍ता संग्रह के लि‍ये सम्‍मानि‍त कि‍या गया।

सुब्रत मुखोपाध्याय (बांग्ला),  चंदना गोस्वामी (असमिया) , जोद्ध चन्द्र सनसम (मणिुपरी), डी सेल्वराज (तमिल) को उनके उपन्‍यास और  कृष्ण कुमार तूर (उर्दू) को गजल संग्रह के लि‍ये सम्‍मानि‍त कि‍या गया।

वि‍श्‍वनाथ प्रसाद ति‍वारी बने साहि‍त्‍य अकादमी अध्‍यक्ष

प्रसिद्ध कवि, आलोचक और लेखक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया है। इस पद के लिये  उनका चयन सर्वसम्मति से हुआ है। वह अकादमी के 12वें अध्यक्ष होंगे। ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी हिन्‍दी लेखक को यह सम्मान मिला हो।

अकादमी के पूर्व अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय के निधन के बाद विश्‍वनाथ  तिवारी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाल रहे थे। इनकी नियुक्ति  पाँच वर्ष के लिये है। उपाध्यक्ष पद के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ भाषा के लेखक चंद्रशेखर कंबार को निर्विरोध चुना गया।

मीडि‍या से जुडे़ तीन कथाकारों का कहानी-पाठ संपन्‍न

दिल्ली : साहित्य अकादमी में  12 जनवरी, 2012 को मीडिया से जुड़े तीन कथाकारों का कहानी-पाठ आयोजित किया गया। ‘साहित्य मंच’ के अंतर्गत हुये इस कार्यक्रम में एनडीटीवी से प्रियदर्शन, जनसत्ता से राकेश तिवारी और इंडिया न्यूज पत्रिका से जुडे़ अशोक मिश्र का कहानी-पाठ हुआ। प्रियदर्शन ने ‘हंस’ और‘कथन’ में प्रकाशित अपनी कहानियाँ ‘उठते क्यों नहीं कासिम भाई?’ और ‘घर चले गंगा जी?’ सुनाईं। पहली कहानी न्यूज चैनलों की कारस्तानियों से परेशान और संदिग्ध बनाये जा रहे मुस्लिमों के दर्द को उजागर करती है तो दूसरी कहानी में भूमण्डलीकरण के दौर में एक आम आदमी को रोजगार के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने होते हैं, को दर्शाया गया है। राकेश तिवारी ने एचआईवी/एड्स और उसके भय से तैयार किये विश्वव्यापी बाजार को अपनी कहानी ‘सुबह है और चश्मीश है’ से रूबरू कराया। अशोक मिश्र ने पाँच लघुकथायें और कहानी ‘गाँव की मौत’  प्रस्तुत की।

आलोचक ज्योतिष जोशी ने तीनों कहानीकारों की कहानियों का विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि कहानीकार को किसी साँचे में नहीं बांधना चाहिये। कहानीकार कहानीकार होता है वह चाहें किसी भी पेशे से जुड़ा हो। प्रियदर्शन की कहानियों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वे छोटी-छोटी चीजों पर भी तल्ख नज़र रखते हैं। उन्होंने एक नये संसार की कुंजी को खोजा है। राकेश तिवारी की कहानी को एक बड़े मुहावरे का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि इतने व्यापक विषय को विनोद के सहारे इतनी सहजता से पकड़ना उनकी कहानी को विलक्षण बनाता है। अशोक मिश्र को उन गाँवों के चरित्रों पर दुबारा गौर करने की जरूरत है, जिन्हें वे मोहवश प्रस्तुत कर रहे हैं। कहानीकार-कवि अशोक गुप्ता, वीरेन्द्र सक्सेना, सत्येन्द्र प्रकाश ने भी प्रस्तुत कहानियों पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए अकादेमी के उपसचिव  ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि इन तीनों कथाकारों की कहानियों से पत्रकार-कहानीकारों के प्रति बना यह मिथ टूटता है कि वे केवल बाह्य जगत की बात करते हैं, उन्होंने इन कहानियों के पात्रों के मनोजगत को बेहद बारीकी से प्रस्तुत किया।

कहानी-पाठ में कहानीकार/पत्रकार रमेश उपाध्याय, संजय कुंदन, नीला प्रसाद, महेश दर्पण, विमल कुमार, प्रताप सिंह आदि उपस्थित थे।

प्रस्तुति : अजय कुमार शर्मा

डॉ. देवसरे बाल साहि‍त्य पुरस्कार से सम्मानि‍त

डॉ. देवसरे को सम्मा‍नि‍त करते ब्रजेन्द्र त्रि‍पाठी। साथ में उनकी पत्नी वि‍भा देवसरे।

गाजि‍याबाद : हिन्‍दी में साहित्‍य अकादेमी का बाल साहित्‍य पुरस्‍कार-2011 वरिष्‍ठ बाल साहित्‍यकार डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे को उनके आजीवन योगदान के लिए 28 नवम्‍बर को उनके आवास (ब्रजविहार, गाजियाबाद) पर साहित्‍य अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्‍द्र त्रिपाठी के हाथों प्रदान किया गया। पुरस्‍कार के अंतर्गत 50,000 रुपये की राशि का चेक और प्रतीक चिह्न शामिल हैं। इसके पहले उन्‍होंने पुष्‍पगुच्‍छ और शॉल ओढ़ाकर डॉ. देवसरे का अभिनंदन किया। उन्‍होंने प्रशस्‍ति-पाठ करते हुए डॉ. देवसरे के अमूल्‍य योगदान को रेखांकित किया। इस अवसर पर उनके श्री शशांक, पुत्री शिप्रा, पत्‍नी विभा देवसरे तथा बालसाहित्‍य लेखक शांता ग्रोवर, मधुमालती जैन एवं देवेन्‍द्र कुमार देवेश (तीनों अकादेमी में कार्यरत) उपस्‍थित थे। ज्ञातव्‍य है कि अकादेमी के बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 24 भारतीय भाषाओं के लिए 14 नवंबर, 2011 को अकादेमी के अध्‍यक्ष सुनील गंगोपाध्‍याय के हाथों कोलकाता में समारोहपूर्वक प्रदान किए गए थे, जिसमें अस्‍वस्‍थता के कारण डॉ. देवसरे नहीं पहुँच पाए थे।

डॉ. देवसरे ने कहा कि साहित्‍य इतिहास के लोग अभी तक बाल साहित्‍य को साहित्‍य के इतिहास में सम्‍मिलित नहीं कर पाए, लेकिन अब निश्‍चित रूप से यह माना जाएगा कि बाल साहित्‍य साहित्‍य की एक ऐसी विधा है, जो निरंतर उन्‍नति कर रही है और अब वह ऐसे स्‍तर पर पहुँच गई है कि उसको इतिहास में भी महत्‍व मिलना चाहिए और मिलेगा, अवश्‍य मिलेगा। इस दिशा में काम भी हो रहा है और अच्‍छी बात यह है कि जो दृष्‍टिकोण है साहित्‍य अकादेमी का, वह नया है, आधुनिक है और वह समसामयिक है।

हरिकृष्‍ण देवसरे सहित 24 लेखकों को साहित्‍य अकादेमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार

नई दिल्‍ली : साहित्‍य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार-2011 की घोषणा कर दी गई है। हिन्‍दी के लिए इस बार हरिकृष्‍ण देवसरे को यह पुरस्‍कार उनके समग्र योगदान के प्रदान किया जाएगा। साहित्‍य अकादेमी की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार त्रिश्‍शूर में 16 अगस्त, 2011 को साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में विभिन्न भाषाओं के निर्णायक मण्डलों द्वारा चुनी गई 24 पुस्तकों को बाल साहित्य पुरस्कार के लिए अनुमोदित किया गया।

इस वर्ष बाल साहित्य पुरस्कार के लिए सात कविता-संग्रह, छह उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रह, एक लोक-कथा एवं नाटक तथा पाँच लेखकों को बाल साहित्य में दिए गए उनके समग्र योगदान हेतु चुना गया है।

भारतीय भाषाओं के नाम, उनके लेखकों और उनकी रचनाओं के नाम-

असमिया / सेउजिया धरनी (उपन्यास)/ बंदिता फूकन
बांग्‍ला / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / सेलेन घोष
बोडो / पुराणनि सल फिथिखा (भाग 1-2)(कहानी) / महेश्‍वर नार्ज्‍जारी
डोगरी / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / श्‍यामदत्त ‘पराग’
अंग्रेज़ी / द ग्रासहोपर’स रन (उपन्यास) / सिद्धार्थ शर्मा
गुजराती / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / (स्व.)रमेश पारिख
हिन्दी / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / हरिकृष्‍ण देवसरे
कन्नड / मुलुगादे ओरिगे वंडावरु (लघु-उपन्यास) / एन. डी’सूजा
कश्‍मीरी / नव केंसा मेंसा (कविता एवं कहानी) / गुलाम नबी आतश
कोंकणी / वर्स फुकट वचंक ना (उपन्यास)/ गजानन जोग
मैथिली / जकर नारि चतुर होइ (कहानी) / मायानाथ झा
मलयाम/रुथाक्कुट्टियम माशुम (विज्ञान-उपन्यास)/ के. पापूट्टि
मणिपुरी/ ताल तारेट (लोक-कथा एवं नाटक)/ के. शांतिबाला देवी
मराठी / बोक्या सातबंडे (भाग 4 एवं 5)(लघु-कहानी)/ दिलीप प्रभवलकर
नेपाली / बाल-सुमन (कविता-संग्रह)/ स्नेहलता राई
ओड़िया / बाल साहित्य में समग्र योगदान हेतु / महेश्‍वर मोहांति
पंजाबी / बूझो बच्चेयों मैं हाँ कौन? (भाग 1-3)(कविता)/ दर्शन सिंह आष्‍ट
राजस्थानी / सतोलियो (कहानी)/ हरीश बी. शर्मा
संस्कृत/कौमारम् (कविता)/अभिराज राजेंद्र मिश्र
संताली / सिंगार अखरा (कविता)/ नूहुम हेम्ब्रह्म
सिन्धी/ नयों निरालो जंगल (उपन्यास)/ हुंदराज बलवानी
तमिल / शोलक कोल्लइ बोम्मई (कविता) / एम.एल. थंगप्पा
तेलुगु/उग्गुपाल्लु (कहानी)/ एम. भूपाल रेड्डी
उर्दू/कुल्लियात-ए-आदिल (भाग 1)(कविता)/आदिल असीर देहलवी

प्रकाश मनु सहित 24 लेखकों को पहला बाल साहित्य पुरस्कार

नई दिल्ली : साहित्य अकादमी ने प्रकाश मनु,  तारानंद वियोगी, जसबीर भुल्लर, दमयंती जाड़ावत ‘चंचल’ और गुलाम हैदर सहित 24 भारतीय भाषाओं के लेखकों को प्रथम बाल साहित्य पुरस्कार से सम्‍मानित किया। समारोह का आयोजन बाल दिवस (14 नवंबर) पर रवींद्र भवन में किया था। दो दिन चले समारोह के दूसरे दिन सम्‍मानित लेखकों ने बाल साहित्‍य पर अपने विचारों और अनुभवों को साझा किया।

साहित्य अकादमी द्वारा स्थापित पहले बाल साहित्य पुरस्कार से हिन्दी में प्रकाश मनु, राजस्थानी में दमयंती जाडावत ‘चंचल’, संस्कृत में पद्म शास्त्री, उर्दू में गुलाम हैदर, मैथिली में तारानंद वियोगी, अंग्रेजी में मिनी श्रीनिवासन और पंजाबी में जसबीर भुल्लर को सम्‍मानित किया गया। इनके अलावा, बोडो में नबीन मल्लेबर, डोगरी में ज्ञानेश्‍वर, मणिपुरी में कोडबम उडबी ईबेयाईमा, मराठी में अनिल अचवट, उडिय़ा में पुण्यप्रभा देवी, सिन्धी में खीमन. यू. मूलाणी, तमिल में मा. कमलवेलन, तेलुगु में कलुवकोलनु सदानंद, कन्नड़ में बोलवार महमद कुंजि, कश्मीरी में एस. राजी, कोंकणी में प्रकाश पर्येकर, और मलयालम में सिप्पी पल्लिप्पुरम को यह पुरस्कार दिया गया। बाल साहित्य में योगदान के लिए असमिया में गगन चंद्र अधिकारी, बांग्ला में सरल डे, गुजराती में यशवन्त मेहता, नेपाली में नैन सिंह योन्‍जन और संताली में वयहा विश्‍वनाथ टुडु को यह पुरस्कार प्रदान किया गया।

पुरस्कार के रूप में लेखकों को 50 हजार रुपये और साहित्य अकादमी का प्रतीक चिह्न प्रदान किया गया।

पुरस्कार प्रदान करते हुए अकादमी के अध्यक्ष डा सुनील गंगोपाध्याय ने कहा कि बच्चा सिर्फ बच्चा होता है और उसका कोई देश या जाति नहीं होती। मानव अन्य जीवों से उच्च इसलिए है, क्योंकि उसमें सोचने, समझने और कल्पना की क्षमता होती है। उन्होंने कहा कि प्राचीनकाल में मौखिक रूप से बच्चों को कविता और कहानी सुनाई जाती थी। इसलिए बाल साहित्य का सृजन कम हुआ। कालांतर में बांग्ला साहित्य में रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे नामचीन रचनाकारों ने बाल साहित्य का सृजन किया और बांग्ला के लगभग हर लेखक ने बाल साहित्य का सृजन किया।

चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी की अध्यक्ष और प्रसिद्ध अभिनेत्री नंदिता दास ने कहा कि बच्चों के लिए लिखना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। बच्चों के दिमाग में उठने वाले सवालों को किस तरह लिखा जाए यह बेहद कठिन कार्य है।

कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष एस एस नूर ने दिया।

समारोह के दूसरे बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित लेखकों बाल साहित्‍य से जुड़ाव और रचनात्‍मकता पर विचार व्‍यक्‍त किए।

लक्ष्मण गायकवाड़- उठाईगीरी से लेखन का सफर : अनुराग

उठाइगीर जाति में जन्म लेने के कारण व्यवस्था की नजर में वह जन्म से ही अपराधी था। उसे यह भी नहीं पता कि मेरा जन्म कब हुआ? उसने जीवन की विद्रूपता को नजदीक से देखा। दु:खों से छुटकारा पाने के लिए उसने महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी की तरह ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश की। अंतत: उसे सही रास्ता मिला- जन संघर्ष का। और वह बिना लाभ-हानि का विचार किए उस पर चल पड़ा। उतार-चढ़ावों से भरी यह प्ररेणादायक दास्तां है साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त मराठी के चर्चित लक्ष्मण गायकवाड़ की-

लक्ष्मण गायकवाड़ का जन्म लातूर के धनेगांव में हुआ। घर पर घास-फूंस का छप्पर था। जमीन पर बैठकर रेंगते हुए ही उसके भीतर दाखिल हुआ जा सकता था। दादी तरसाबाई घर का खर्च चलाती थीं। दादा लिंगप्पा गायकवाड़ को दिन में दो बार पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगवानी पड़ती थी। इस कारण वह कोई काम नहीं कर सकते थे। लक्ष्मण के पिता को लोग उठाईगीर जाति का होने के कारण काम नहीं देते थे।

पुलिस पिटाई के डर से लिंगप्पा गायकवाड़ मुखबिर बन गए। बिरादरी के कई लोगों को पुलिस पकड़कर ले गई। बिरादरी के लोग उनके परिवार से खार खाने लगे। पंचायत ने लिंगप्पा को खत्म करने का निर्णय ले लिया। एक भयानक रात में झप्पर फाड़कर कुछ लोग अंदर आए। उन्होंने लिंगप्पा के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और कुल्हाड़ी से उनके टुकड़े कर दिए।

केस को पुलिस स्टेशन नहीं जाने दिया गया। बिरादरी के निर्णय के विरुद्ध कोई पुलिस में नहीं जा सकता था। घर की सारी जिम्मेदारी दादी के कंधों पर आ गई। वह कभी-कभी चोरी करते पकड़ी जातीं। पुलिस उन्हें दो-तीन महीने के लिए जेल में डाल देती। घर में फाके होने लगते। घर में जब कुछ न होता तो लक्ष्मण के पिता मार्तंड, मां घोंडाबाई तथा बड़ा भाई माणिकदास रात में खेतों की ओर निकल जाते। जवार के भुट्टे, मिर्च, बाजरा, फलियां चोरी कर लाते। भुट्टों के दाने निकालते, उन्हें कूटते और पकाकर खाते।

धीरे-धीरे माणिकदास चोरी करने में माहिर हो गया। वह ही घर चलाने लगा। मार्तंड तुतलाते और लंगड़ाते थे। इसलिए वह चोरी करने नहीं जाते थे। बहुत गिड़गिड़ाने के बाद गांव के एक किसान ने उन्हें बाग की रखवाली के लिए रख लिया। गांव में उठाईगीर समाज के किसी व्यक्ति को पहली नौकरी मिलने पर पूरा घर आनंदित हो उठा।

लक्ष्मण के पांच भाई और दो बहनें थीं। लक्ष्मण से बड़ा भाई हरचंदा था। वह बकरियां चराता था। हरचंदा को मिरगी के दौरे पड़ते थे। लक्ष्मण उसे संभालता था। पहनने के लिए चोरी की कमीजें और नेकर होते। किसी के लिए भी नए कपड़े नहीं लाए जाते थे।

एक दिन लातूर में दुकान से तेल का डिब्बा चुराते हुए भाई भगवान अण्णा पकड़ा गया। पुलिस पूछती और पीटती। पिटाई से घबराकर अण्णा ने नाम, गांव और घर का पता बता दिया। पुलिस उसे लेकर घर आयी। सभी सदस्यों को एक लाइन में खड़ाकर हंटर से मारने लगी। छोटे बच्चों और औरतों को भी नहीं छोड़ा। पुलिस की पिटाई देखकर लक्ष्मण का नेकर में पेशाब निकल गया। उसे लगा कि चोरी नहीं करनी चाहिए। मार्तंड की इच्छा थी कि कम से कम एक लड़का तो पढऩे जाए। उन्होंने छह साल के लक्ष्मण के हाथ में जेब काटने के लिए काम आने वाला ब्लेड न देकर स्लेट-पेंसिल दे दी।

स्कूल में लक्ष्मण को अजीब-अजीब सा लगता। कक्षा के सभी लड़के उसे कंकड़ों से मारते। कहते, ”उठाईगीरों का लक्ष्या स्कूल कैसे?’’

कुछ लड़के चिल्लाते, ”अरे, यह तो केकड़े खाने वाला है।’’ इन अपमानों के बावजूद वह स्कूल जाता रहा।

लक्ष्मण को स्कूल जाते हुए तीन-चार दिन हुए थे कि बिरादरी के कई बच्चों को दस्त और उल्टियां होने लगीं। लोगों ने मार्तंड को धमकाया कि लक्ष्या के स्कूल जाने की वजह से ही बीमारी हुई है। हमारी बिरादरी में आज तक कोई स्कूल नहीं गया। लक्ष्या को स्कूल से निकाल लें। अगर वह फिर स्कूल गया तो हम जात पंचायत बिठाएंगे और तुझे बहिष्कृत करेंगे। मार्तंड परेशान हो गए। उन्होंने लक्ष्मण का स्कूल जाना बंद करा दिया।

कुछ दिनों बाद स्कूल के एक शिक्षक कुलकर्णी ने कुछ लड़कों को भेजकर लक्ष्मण को स्कूल बुलवाया। इससे बिरादरी के लोग और चिढ़ गए। पंचायत बुलाई गई। निर्णय लिया गया कि या तो मार्तंड गांव छोड़ें अथवा लक्ष्या को स्कूल भेजना बंद करें। इसकी सूचना मार्तंड ने शिक्षक को दी। कुलकर्णी गुरुजी बस्ती में आए। उन्होंने लोगों को समझाया कि लक्ष्मण के स्कूल जाने से बीमारी नहीं फैली है। यदि ऐसा होता तो गांव के बहुत से बच्चे स्कूल जाते हैं, पूरे गांव में हैजा क्यों नहीं हुआ? उन्होंने डाक्टर को बुलवाकर सभी बच्चों को दवा दिलवाई। दो-तीन दिन में सबकी तबियत ठीक हो गई। लक्ष्मण फिर स्कूल जाने लगा।

घोंडाबाई ने दूध बेचना शुरू किया। इससे तकलीफें कुछ कम हुईं। दूध के पैसों से उन्होंने तीन-चार टिन खरीद लिए। घास-फूस की छत हटाकर टिन की चादरें बिछवा दीं।

कुछ दिनों बाद अचानक घोंडाबाई बीमार पड़ गईं। दूध बेचना बंद हो गया। कमाई बंद। मार्तंड ने बकरियां बेचकर कुछ दिन घर चलाया। घोंडाबाई को इलाज के लिए जावली ले जाया गया। वहां तबियत और खराब हो गई। पैसों के अभाव में लक्ष्मण को जावली नहीं ले जाया गया। वह अपनी मां के अंतिम दर्शन नहीं कर सका।

स्कूल में लक्ष्मण ही सबसे गंदा रहता। गुरुजी पिटाई करते। इस कारण वह रोज नहाने लगा। छुट्टी के दिन वह नदी पर जाता। पहले कमीज धोता। उसे सुखाता। कमीज सूखने के बाद नेकर निकालता। नंगा होकर उसे धोना चाहता, पर किनारे कई औरतें होतीं। संकोच होता। दूसरा नेकर था नहीं। धुली कमीज कमर पर बांधता और नेकर धोता। साबुन कभी मिलता नहीं था। नदी के निकट काली मिट्टी का खेत था। वह मिट्टी ही लक्ष्मण का साबुन थी।

लक्ष्मण दूसरी कक्षा में आ गया। किताब न होने के कारण गुरुजी ने उसकी पिटाई कर दी। मार्तंड अपने मालिक से कुछ एडवांस मांग लाए और लातूर से किताब, कापी और कलम लाकर दिए।

एक दिन मार्तंड चामले के बाग से घर आए। उन्होंने लक्ष्मण से पूछा, ”किताब-कापी ठीक से रक्खी है न। बता?’’ उन्होंने कापी देखी और चप्पल से लक्ष्मण को पीटने लगे। उसकी बात भी नहीं सुन रहे थे। वह पीटते-पीटते कहने लगे, ”कापी खराब क्यों कर दी!’’ बहुत पिटाई की। लक्ष्मण का चिल्लाना सुनकर भाई आया। उसने लक्ष्मण का पक्ष लिया। मार्तंड उसे भी गाली देने लगे, ”नई कापी खराब कर दी भड़ुवे ने। इस कापी के लिए मैंने मालिक से गिड़गिड़ाकर पैसे लिए थे। क्या इसलिए कि यह खराब कर दे?’’

भाई ने समझाया, ”कलम लिखने के लिए होती है। कापी पर ही लिखा जाता है।’’ लेकिन मार्तंड को विश्वास नहीं हुआ। भाई ने पड़ोस के लड़के को बुलाया। उसने बताया, तब विश्वास हुआ।

उन दिनों घर की हालत खस्ता थी। तीन-तीन, चार-चार दिन चूल्हा नहीं जलता। मार्तंड अपने मालिक चामले के यहां खा लेते। लक्ष्मण घर में सबसे छोटा था। इसलिए उसे अपने पास बुला लेते और मालिक से मिलने वाली रोटी में से आधी उसे दे देते और खुद अधभूखे रह जाते।

लक्ष्मण भूख से बेहाल हो जाता तो अमावस्या या पूर्णिमा के दिन श्मशान घाट चला जाता। आषाढ़-श्रावण में गांव के लोग खाने की चीजें और नारियल भूत-प्रेत बाधा के डर से अपने लाड़लों पर से उतार कर फेंक देते। लक्ष्मण वही खा लेता। इन हालात में किसी प्रकार उसने चौथी की परीक्षा पास की।

माणिकदास को पता चला कि सोलापुर में उठाईगीरों के लिए विद्यालय चलाया जाता है। वहां रहने और भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था है। उन्होंने लक्ष्मण को वहां भेजने का निश्‍चय कर लिया। लक्ष्मण शिवा व बापूशाह के साथ सोलापुर शामाराव मास्टर के घर गया। मास्टरजी ने उन्हें सोनगांव जाने के लिए कहा। वहां मास्टरजी के दामाद हेडमास्टर थे। उन्होंने उनका नाम पांचवी कक्षा में लिख लिया। शाम को भोजन मिला तो पता चला कि खाना हिसाब से मिलता है, भरपेट नहीं।

लक्ष्मण के दोनों साथी भूख से परेशान होकर स्कूल से भाग गए। लक्ष्मण बाभलगांव चला गया। वहां के हैड मास्टर से मिला। उन्होंने उसका नाम पांचवी में लिख लिया।

लक्ष्मण को पढऩे की आदत पड़ गई। उसने ‘गुलाब कैवाली का’ और ‘राधूमैना’ जैसी किताबें पढ़ीं। इतिहास और मराठी किताबें पढऩा उसे अच्छा लगता। इनके अलावा पाठ्य पुस्तकें पढऩे से लक्ष्मण की समझ बढऩे लगी। वह अपनी स्थिति पर सोचने लगा।

उसने कक्षा में गौतमबुद्ध और महावीर स्वामी के बारे में पढ़ा। उसे लगने लगा कि दु:खों से मुक्ति के लिए ज्ञान प्राप्त करना जरूरी है। वह स्कूल आते-जाते समय एकांत में किसी पेड़ के नीचे आंखें बंद करके बैठ जाता। बहुत देर तक बैठा रहता।

वह घर में अकेला रहता तो दीवार से सिर टकरा-टकराकर भगवान को याद करता कि हे भगवान! मुझे ज्ञान प्रदान कर। गरीबी से छुटकारा पाने का कोई उपाय बता। घंटों मंदिर के पास पेड़ के नीचे खामोश बैठता। मंदिर के चक्कर लगाता। पोथी-पुराण पढ़ता। चार-चार दिन भूखा रहता। मंदिर में प्रसाद चढ़ाने की बात कर भगवान को फुसलाता।

भाभियों के झगड़े बढऩे लगे। अलग रहने का फैसला हुआ। मार्तंड रखवाली करते थे। हरचंदा चोरी करता था। हरचंदा को साथ रखने के लिए तीनों भाई तैयार थे। पिता को संभालने के लिए भगवान अण्णा तैयार था। लक्ष्मण को साथ रखने के लिए कोई तैयार न था। तीनों भाइयों का कहना था कि हम अपने बाल-बच्चों को संभाले या इसको? इसे किताब-कापियां लाकर कौन देगा? अंत में संभा लक्ष्मण को साथ रखने के लिए तैयार हुआ। अन्य भाई किताब-कापियों के खर्चे को बांटने के लिए राजी हो गए।

लक्ष्मण की देखभाल का प्रश्‍न था। इसलिए वह बाभलगांव की बोर्डिंग में रहने लगा। छुट्टी के दिन धनेगांव जाता। पिता से मिलने चामले के बाग में जाता। वह सोचता कि पिता इतना बूढ़ा हो गया है, थक गया है, फिर भी नौकरी कर रहा है। मार्तंड कहते कि तू खूब पढ़। बड़ा आदमी बन।

लक्ष्मण को किताब-कापियों के लिए कोई पैसा नहीं दे रहा था। वह सोचने लगा कि अब नौकरी करनी चाहिए। वह संभा के पास लातूर चला गया। लातूर-नांदेड़ रोड पर गरीबों की बस्ती है। उसने वहां पाव (ब्रेड) बेचना शुरू कर दिया। बहुत दिनों यह काम किया। इस काम से अधिक मुनाफा नहीं हो रहा था। इसलिए वह केले बेचने लगा। इससे अच्छा मुनाफा होने लगा। बोर्डिंग छोडऩे से हैड मास्टर नाराज थे। लक्ष्मण स्कूल गया। उसने हैड मास्टर से कह दिया कि अब स्कूल नहीं पढ़ेगा। उसने स्कूल छोड़ दिया।

संभा सूत गिरनी में नौकरी करते थे। लक्ष्मण ने वहां नौकरी के लिए कोशिश की। लेकिन ‘तू छोटा है’ कहकर उसे भगा दिया। किसी ने दरख्वास्त में केशवराव सोनवणे से दस्तखत करवाने की सलाह दी। सोनवणे सहकारी मंत्री थे। लक्ष्मण उनसे दस्तखत करा लाया। स्पिनिंग मास्टर ने उसे रिंगफ्रेम में भेज दिया।

जब तक चाती पकड़कर धागा जोडऩा नहीं आता, वेतन नहीं मिलता था। कुछ दिन लक्ष्मण ने फोकट में काम किया। उसे धागा जोडऩे की सफलता 125 दिन बाद मिली। वेतन 60 रुपये मिलने लगा। वह मेहनत और लगन से तेजी से काम सीखने लगा। छह महीने में उसका वेतन पिचहत्तर रुपये हो गया।

मिल के टाइम कीपर पाटिल ने लक्ष्मण को नौकरी के साथ पढ़ाई करने की सलाह दी। वह बाभलगांव से टी.सी. ले आया और लातूर के शिवाजी हाई स्कूल में दाखिला ले लिया। उसने रात की पाली में ड्यूटी लगवा ली। वह रात बारह बजे मिल में चला जाता। सवेरे तक ड्यूटी करता। रात का बचा-खुचा जो भी होता, उसे खाकर साढ़े नौ बजे तक सो जाता। दस बजे स्कूल जाता। कक्षा में बहुत नींद आती। रातभर काम करने के कारण थकावट होती। शाम पांच बजे स्कूल से छुट्टी होती। घर जाता और खाना खाकर सो जाता। यही उसकी दिनचर्या बन गई।

एक दिन लक्ष्मण स्कूल से आ रहा था। उसे रास्ते में एक छोटा लड़का गोबर से भरा टोकरा सिर पर रखकर ले जाता मिला। धूप बहुत तेज थी। लक्ष्मण को बच्चे पर तरस आ गया। उसने बच्चे से पूछा कि तू टोकरी में इतना ज्यादा गोबर लेकर क्यों जा रहा है ? वह बच्चा बोला कि उसकी मां सौतेली है। जब तक वह हर दिन टोकरी भर कर गोबर के उपले बनाकर नहीं रखता, तब तक खाना नहीं देती। लक्ष्मण सोचने लगा कि मैं अपने को ही दु:खी समझता हूं, लेकिन मुझसे ज्यादा दु:खी और भी हैं। उसने टोकरी अपने सिर पर रख ली। किताबों का थैला उसे दे दिया। गांव के नजदीक तक लक्ष्मण टोकरी लाया। उसके कपड़ों में गोबर के दाग लग गए। उसे खुशी थी कि उसने कुछ देर तक के लिए बच्चे का बोझ हलका कर दिया। लेकिन इस बात का अफसोस भी हुआ कि बच्चे का बोझ सदा के लिए कम नहीं कर पाया।

लक्ष्मण के साथ पढऩे वाले बच्चों की जन्मतिथि 1956 में थी। उसकी उम्र प्राविडेंट फंड और इंश्योरेंस में 23.7.1956 लिखी जा चुकी थी। उसने यही जन्मतिथि लिखनी शुरू कर दी।

लक्ष्मण ने नौंवी की परीक्षा दी। नौकरी के कारण ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाया इसलिए फेल हो गया। उसने स्कूल छोड़ दिया। उसे पता चला कि औरंगाबाद की सूत मिल में भर्ती शुरू हुई है। दो सौ रुपये एडवांस दे रहे हैं। वेतन भी अधिक है। वह 1972 में औरंगाबाद चला गया। वहां दस रुपये रोज मजदूरी मिलने लगी।

एक बार मिल में रूस से लौटा एक व्यक्ति आया। उसने अपने भाषण में कहा कि रूस में मजदूर और मालिक एक हैं। वहां के लोग सुखी हैं। लक्ष्मण ने पूछा कि रूस में मजदूर और मालिक एक हैं, तब हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं है ? उस व्यक्ति ने कारण समझा दिया।

लातूर में संभा की नौकरी छूट गई थी। वह सब्जी बेचकर गुजारा कर रहा था। लक्ष्मण ने उसे औरंगाबाद बुला लिया और अपनी मिल में फिटर लगवा दिया। उसने जवाहर कालोनी में दो कमरे ले लिए। कुछ दिनों बाद भाभी, हरचंदा और लक्ष्मण के बीच झगड़े होने लगे। लक्ष्मण उदास रहने लगा। वह दस दिन की छुट्टी लेकर लातूर चला गया।

लक्ष्मण धनेगांव गया। पिता से मिला। मार्तंड ने कहा कि वह बूढ़ा हो गया है। अचानक किसी दिन मर जाएगा। तेरे से भेंट नहीं हो पाएगी। तू नजदीक आ जा। मालिक रोटियां ठीक से नहीं भेजता। लक्ष्मण को बहुत दु:ख हुआ कि वह पिता तक की देखभला नहीं कर सकता, फिर जिंदगी का मतलब ही क्या? उसने दोबारा लातूर मिल में नौकरी कर ली। वह औरंगाबाद गया। त्यागपत्र देकर बचा-खुचा वेतन ले लिया। हरचंदा को साथ ले आया। थोड़े दिन बाद पिता की नौकरी छुड़वाई और उन्हें भी ले आया।

लक्ष्मण का विवाह थेली गांव की छबू से हुआ। पत्नी के साथ उसकी दादी भी आई थी। एक कमरे में चार लोग रहने लगे। लक्ष्मण की हालत दिन-ब-दिन खराब होने लगी। मार्तंड फिर से नौकरी के लिए धनेगांव चले गए। हरचंदा की मिरगी या लक्ष्मण की जाति का किसी को पता चल जाता तो मकान बदलना पड़ता। लातूर में उसने उन्नीस बार मकान बदला।

लक्ष्मण ने मंझली भाभी की बहन से शादी नहीं की थी। वह पत्नी-पत्नी के बीच झगड़ा कराने लगी। वह छबू से लक्ष्मण के बारे में गलत और गंदी बातें कहती। दूसरी ओर लक्ष्मण से कहती कि तेरी पत्नी के चाल-चलन ठीक नहीं हैं। तूने बेकार ही उससे शादी की। इसी तरह की गलतफहमी में लक्ष्मण ने पत्नी को बहुत मारा।

दूसरे दिन लक्ष्मण ड्यूटी पर चला गया। भाभी ने छबू को भड़काया कि वह घर से भाग जाए। छबू का कोई रिश्तेदार लातूर में था। वह उसके घर चली गईं। भाभी ने इसकी सूचना लक्ष्मण को भिजवा दी। छबू का रिश्तेदार उसे वापस छोड़ गया। लक्ष्मण ने फिर से पत्नी की पिटाई की। दूसरे दिन छबू का भाई आया और उसे अपने साथ ले गया।

एक दिन मंझली भाभी के भाई ने लक्ष्मण को सारी बात बता दी। लक्ष्मण को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह ससुराल जाकर अपनी पत्नी को ले आया।

बारिश हो रही थी। हरचंदा कमरे को भीतर से बंदकर बैठ गया। लक्ष्मण ड्यूटी से बारह बजे आया। गरीबी और गुस्से के कारण उसने हरचंदा से कहा, ”जा, कहीं भी जा। मर। भीख मांग। पर यहां मत आ। कल अगर लातूर में दिखाई दिया तो पुलिस वालों को तुझे पकड़वा दूंगा। पुलिस जानती है कि तू उठाईगीर है। हरचंदा के कपड़े बांध दिए। कपड़ों की गठरी उसके हाथों में जबरदस्ती पकड़ा कर घर से निकाल दिया। हरचंदा चला गया। वह फिर कभी नहीं आया। लक्ष्मण बाद में पछताया। उसकी बहुत खोजबीन की, लेकिन कुछ पता नहीं चला।

लक्ष्मण पिता को लातूर ले आया। उसने आमदनी बढ़ाने के लिए घर में सब्जी की दुकान खोल ली। मार्तंड को तोलने की आदत नहीं थी। उन्हें वजन समझ में नहीं आता। नुकसान होने लगा। लक्ष्मण ने पत्नी से कहा कि वह पिता के साथ दुकान पर बैठे। वह कुछ ही दिनों में सारा हिसाब समझ गई। मुनाफा होने लगा।

मिल में मजदूरों का शोषण होता था। वेतन के साथ साल में केवल 15 अगस्त, 1 मई और 26 जनवरी की छुट्टी दी जाती थी। पिटाई तक होती थी। लक्ष्मण सोचने लगा कि संगठन होना चाहिए। संगठन बन जाएगा तो कर्मचारियों की मारपीट बंद हो जाएगी।

एक मई को कैंटीन में मजदूरों की बैठक हुई। लक्ष्मण ने मिल-जुलकर काम करने की बात कही। मैनेजर ने खुश होकर ग्यारह रुपये इनाम में दिए। सब उन्हें पहचानने लगे।

लक्ष्मण गायकवाड़ ने 15 अगस्त को मजदूरों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ भाषण देने का फैसला कर लिया। कार्यक्रम में दो हजार मजदूर थे। लक्ष्मण ने भाषण में मजदूरों पर हो रहे अत्याचारों की बात कही और मैनेजर से इन्हें बंद करने की अपील की। मैनेजर ने लक्ष्मण का भाषण बीच में रोकने की कोशिश की। सारे मजदूर चिल्लाने लगे- इसे बोलने दीजिए। तालियां बजती रहीं। सभी मजदूर लक्ष्मण की प्रशंसा करने लगे।

इस घटना के बाद जॉबर लक्ष्मण को परेशान करने लगे। उन पर जुर्माना किया जाता। इससे मजदूरों में खलबली मच गई।

मजदूरों के दो प्रतिनिधि डायरेक्टर के रूप में लिए गए। इनमें लक्ष्मण गायकवाड़ भी चुने गए। कुछ दिनों बाद उनकी समझ में आने लगा कि मिल को बहुत फायदा होता है, लेकिन मजदूरों को ठीक से वेतन नहीं मिलता। बोनस भी बहुत कम दिया जाता है। धीरे-धीरे सभी मजदूर इन बातों को लेकर सोचने लगे।

मजदूरों ने हड़ताल कर दी। हड़ताल को 15 दिन हो गए। चेयरमैन और मैनेजर ने कहा कि हड़ताल समाप्त कर दो। मांगें बाद में मान ली जाएंगी। मजदूर इससे सहमत नहीं हुए। हड़ताल जारी रही।

मालिक मजदूरों का शोषण किस तरह करते हैं? मजदूरों को किन हालातों से गुजरना पड़ता है ? इन्हें लेकर लक्ष्मण गायकवाड़ छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे। इन्हें वह मजदूरों को सुनाते। इन कविताओं से आंदोलन ने और जोर पकड़ लिया।

मिल प्रबंधन मांगें नहीं मान रहा था। लक्ष्मण ने पत्नी को मायके भेज दिया और आमरण अनशन पर बैठ गए। पहले दिन ग्यारह मजदूर सम्मिलित हुए। तीन दिन बीत गए। मजदूरों की हालत बिगडऩे लगी। लक्ष्मण को जबरदस्ती सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। अन्य मजदूर अनशन पर बैठे। मजदूरों के प्रतिनिधियों में शिवाजी पाटिल बहुत निडर था। उसने चेयरमैन और मैनेजर को धमकी दी कि एक भी मजदूर भाई को कुछ हो गया तो जिंदा नहीं छोड़ेंगे। हजारों मजदूर उन दोनों के घरों पर मोर्चा लेकर जाने लगे।

मजदूर जीत गए। हड़ताल के दिनों का वेतन नहीं मिलेगा, इसके अलावा सभी मांगें मान ली गईं।

संगठन के लिए चंदा इकट्ठा किया गया था। इस कारण प्रतिनिधियों में गलतफहमी होने लगी। लक्ष्मण गायकवाड़ आंदोलन के सिलसिले में वकील भगवान राव देशपांडे से मिले थे। देशपांडे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। वह लक्ष्मण को पुस्तकें देने लगे।

लक्ष्मण ने गोर्की की ‘मां’, मार्क्‍स, लेनिन, एंगेल्स, सोवियत संघ का घोषणा पत्र, फुले आदि की किताबें पढ़ीं। इससे उनकी दृष्टि विकसित होने लगी। वह मजदूरों से संबंधित सभी कायदे-कानून मराठी में पढऩे लगे।

लक्ष्मण के विरोध के बावजूद गणेश उत्सव मनाया गया। उन्हें जिस बात की आशंका थी वही हुआ। हिसाब नहीं मिला। मजदूरों में गलतफहमियां बढऩे लगीं। मैनेजमेंट ने इसका लाभ उठाया और झूठे आरोप लगाकर लक्ष्मण तथा एक अन्य प्रतिनिधि जगताप को अस्थायी रूप से काम से निकाल दिया। उन्हें काम पर नहीं लिया जा रहा था। उन्होंने मजदूरों से हड़ताल करने के लिए कहा। अस्सी प्रतिशत मजदूरों ने ही हड़ताल की।

एक दिन मिल के गेट के सामने लक्ष्मण गायकवाड़ भाषण देने के लिए खड़े थे। पुलिस ने बिना किसी कारण लाठीचार्ज कर दिया। सैकड़ों मजदूर घायल हो गए। लक्ष्मण सहित 40 मजदूरों पर फौजदारी का झूठा मुकदमा दर्ज किया गया।

मजदूर काम पर जाने लगे। हड़ताल वापस लेनी पड़ी। मैनेजर ने सौ मजदूरों को काम से निकाल दिया। पूणे के इंडस्ट्रीज कोर्ट में मजदूरों ने मिल के विरुद्ध केस कर दिया। पूणे जाने के लिए पैसे नहीं थे। लक्ष्मण हर बार अनुपस्थित रहे। इस कारण मैनेजमेंट के पक्ष में निर्णय हुआ।

लक्ष्मण ने बोनस मिलने पर जमीन खरीद कर उस पर परचून की दुकान खोल ली थी। उसे छबू चलाती थीं। लक्ष्मण ने नटराज टॉकिज के सामने टपरी में चाय बनाकर बेचना शुरू कर दिया। सवेरे से रात आठ बजे तक काम करने के बाद मुश्किल से दस-पंद्रह रुपये कमा पाते। बाद में होटल का काम छोड़ दिया। सब्जी की दुकान खोल ली।

संभा औरंगाबाद में सूत मिल में नौकरी कर रहा था। लक्ष्मण वहां नौकरी के लिए गए। मैनेजमेंट को पता चला कि इसी ने लातूर में हड़ताल करवाई थी। उन्हें नौकरी नहीं दी। वह वापस आ गए।

दुकान से खर्चा चल नहीं रहा था। वह मिर्च पाउडर और अन्य चीजें बेचने लगे। बाद में सूखी मछलियां गली-गली बेचीं। कुछ दिन नमकीन, मुंगफलियां भी बेचीं।

लक्ष्मण गायकवाड़ के घर के सामने एन.बी. शेख गुरुजी रहते थे। उनकी सलाह पर उन्होंने ‘पाथरूट समाज संस्था’ की स्थापना की। संस्था के काम से इधर-उधर जाते। ऐसे कामों के लिए पैसा दुकान से ही लेते, इस कारण नुकसान होने लगा।

मार्तंड बीमार हो गए। दो समय ठीक से भोजन न मिलने और दवा का सही प्रबंध न होने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।

घर में तीन ही लोग थे। कई बार भूखा सोना पड़ता। बेटी को दूध पिलाने के लिए भी पैसे नहीं होते। इन्हीं दिनों लोकसभा के चुनाव आ गए। माणिकराव सोनवणे प्रत्याशी थे। लक्ष्मण ने उनके लिए प्रचार किया। लक्ष्मण गायकवाड़ की कई छोटे-बड़े नेताओं से जान-पहचान हो गई। सोनवणे के दामाद जी.एस. पाटिल ने लक्ष्मण को नगर परिषद में चपरासी की नौकरी दिलवा दी। परिषद के स्कूल में शिक्षिका से अनबन होने पर उन्होंने बदली करवा ली। उनकी नाके पर ड्यूटी लगी।

बड़े-बड़े अधिकारी नगर पालिका में घपले करते। लक्ष्मण गायकवाड़ सोचते कि हमारे लोग तो भूख के मारे चोरी करते हैं, उन्हें चोर कह कर सजा दी जाती है। ये लोग तो दिन दहाड़े चोरी करते हैं, लेकिन इन्हें कोई सजा नहीं होती। कुछ दिनों बाद उन्हें नाके के बड़े अधिकारी के कार्यालय में भेज दिया गया। घंटी बजते ही भागना पड़ता। उन्हें ऐसी जिंदगी से घृणा होने लगी। नौकरी छोड़ दी।

एक दिन लक्ष्मण गायकवाड़ कवठा गए। यह जगह उस्मानाबाद जिले में है। वहां प्राध्यापक बी.एल. गायकवाड़ और अपने साढ़ू डी.एस. गायकवाड़ से मिले। समाज को संगठित करने और बच्चों को चोरियां सिखाने के बदले स्कूल में भर्ती करने का निर्णय लिया गया। सन् 1978 में विमुक्त जनजातियों का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया। इसके बाद से लक्ष्मण गायकवाड़ विमुक्त जनजातियों, दलितों, शोषितों और पीडि़तों की स्थिति में बदलाव लाने के लिए प्रयत्नशील है। इसके लिए उन्हें गुंडों व पुलिस की पिटाई भी झेलनी पड़ीं, लेकिन वह अपने रास्ते पर अडिग हैं।

उनके कुछ प्रोफेसर मित्रों ने सलाह दी कि आप इतना बड़ा आंदोलन कर रहे हो। आपको यह सब लिखना चाहिए। इससे विमुक्त जनजातियों की समस्या आम लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। उन्होंने दलित साहित्य की किताबें, जैसे दया पवार की आत्मकथा ‘बलूत’ (अछूत), ‘यादों के पंछी’, फुले व अंबेडकर की रचनाएं पढ़ीं। आण्णा भाऊ साठे के देहांत के संबंध में लिखी किताब पढ़कर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तय किया कि मैं भी ऐसा कुछ लिखूं। भूख और काम से लिखने की प्रेरणा मिलती गई। वह संगठन के काम से महीने में बीस-पच्चीस दिन बाहर रहते। बाहर अकेले रहने से लिखने का समय मिल जाता। उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने ‘उचल्या’ (उठाईगीर) पूरी की। मराठी के चर्चित लेखक शरणकुमार लिंबाले और दया पवार के सहयोग से यह आत्मकथा श्री विद्या प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुई। इसका विमोचन प्रसिद्ध विचारक लक्ष्मण शास्त्री जोशी और पत्रकार माधव गडकरीजी ने किया। इसके प्रकाशित होते ही मराठी में खलबली मच गई। विमुक्त जनजातियों के  सवाल महाराष्ट में जोर-शोर से उठने लगे।

उचल्या के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। लोग उनके घर आकर बधाई देने लगे। मान-सम्मान करने के लिए जगह-जगह से बुलावा आने लगा। सम्मान के रूप में पचास से अधिक शाल प्राप्त हुए। एक सम्मान समारोह में उन्होंने कहा कि यह कैसे समाज है? बचपन में जाड़े के मौसम में मुझे ठंड लगती थी तो मैं शाल चुराया करता था। मैं पढ़-लिखकर बड़ा हुआ। जरूरत के लिए मैं कैसे शाल चुराया करता था, किताब में मैंने इस बात का जिक्र किया तो लोग मुझे नारियल, पुष्पमाला और शाल देने लगे। मैं इतने शालों का क्या करूंगा? मुझे शाल देना बंद कीजिए। तब से लोगों ने शाल देना बंद कर दिया।

इसी दौरान महाराष्ट सरकार ने लक्ष्मण गायकवाड़ को एक लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की। पांच-छह लाख खानाबदोश आदिवासी घुमंतों लोगों के शोलापुर  के अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पुरस्कार प्रदान किया।

दूसरे दिन वह घर आए। अनके भाई, भाभी और जाति-बिरादरी के चालीस-पचास लोग आए। उन्हें लगा कि बधाई देने या शाल मांगने आए हैं। लेकिन बात दूसरी ही निकली। बिरादरी के कुछ लोग कहने लगे कि आपने ‘उचल्या’ किताब में जाति-बिरादरी की गुप्त बातें लिखकर उन्हें सरकार को बेचा है। इसलिए सरकार ने आपको एक लाख रुपये दिए हैं। इस किताब में हमारा भी नाम है। हम क्या काम करते हैं, यह भी इसमें लिखा है। हमारे चोरी के सभी तरीके सरकार को बताने से हमारा धंधा चौपट हो गया है। एक लाख में हमें भी हिस्सा दो। उनके भाई-भाभी कहने लगे कि किताब के हर पन्ने पर हमारा जिक्र है। इसलिए सबसे ज्यादा हक हमारा बनता है। एक लाख रुपये में से हमें हिस्सा नहीं दिया तो हम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। एक दिन उनके घर पर पत्थरबाजी कर दी। उन्हें पुलिस की मदद लेनी पड़ी।

लक्ष्मण गायकवाड़ को ‘महाराष्ट गौरव सम्मान’ प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हाथों मिला है, यह समाचार महाराष्ट के सभी समाचार पत्रों में मोटे-मोटे अक्षरों में छपा। लक्ष्मण गायकवाड़ के भाई और बिरादरी के लोग पुरस्कार में हक जताने के लिए कोर्ट चले गए। यह समाचार भी कुछ दिनों बाद समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपा।

उन्हें भाई-भाभी और बिरादरी के लोग बहुत परेशान करने लगे। उनका बड़ा भाई कहने लगा कि हमारी जाति-बिरादरी में रिवाज है कि जब कभी शिकार करते हैं या चोरी करके अनाज लाते हैं तो उसका घर में बराबर-बराबर बंटवारा होता है। किताब लिखकर तुम्हें जो पैसा मिला है, उसमें हमारा भी हक बनता है। अगर तुम पैसा देने से इनकार करोगे तो तुम्हें जात-बिरादरी की पंचायत से बाहर कर देंगे। उन्हें इस तरह की धमकियां मिलने लगीं।

एक दिन उनके भाई-भाभी और बहन बिरादरी के लोगों को फुसलाकर मुंबई ले आए। जिस दिन उपराष्टरपति शंकरदयाल शर्मा के हाथों उनका सम्मान होना था, उस दिन उपराष्टरपति के रास्ते वे लोग झंडे और लक्ष्मण गायकवाड़ के खिलाफ नारे वाली तख्तियां लेकर खड़े हो गए। वे कहने लगे कि उपराष्टपतिजी, क्या आप अपनी जाति-बिरादरी का अपमान सहन कर सकते हैं? लक्ष्मण गायकवाड़ ने किताब में हमारे बारे में लिखकर हमारा अपमान किया है। उसे पुरस्कार देकर सम्मानित मत कीजिए। लक्ष्मण गायकवाड़ इस कार्यक्रम में शरीक नहीं हुए।

इन सब परेशानियों से छुटकार पाने के लिए वह मुंबई शहर में आकर बस गए। यहां आकर संगठन के माध्यम से लोगों की मदद करने लगे। बाद में उनके भाई-भाभी, बहन और जाति-बिरादरी वालों को पछतावा हुआ। वह लोग मिलने आए।

लक्ष्मण गायकवाड़ को साहित्य अकादेमी की ओर से चीन जाने का अवसर मिला। उस समय पासपोर्ट मैट्रिक के सर्टिफिकेट से बनवाया। उसमें जन्मतिथि लिखी गई 23 जुलाई 1952। साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेते समय आत्म परिचय में जन्मतिथि 1956 थी। उनके सी.ए. मित्र ने सलाह दी कि पासपोर्ट की तारीख को सही मानना होगा। तब से उन्होंने जन्मतिथि 23 जुलाई 1952 लिखनी शुरू कर दी।

उनकी सात किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

आदिवासी क्रांतिकारी उमाजी नाईक को 1832 में अंग्रेजों ने पुणे में फांसी लगा दी थी। वह इनके जीवन पर आधारित किताब लिख रहे हैं।

भारत की आजादी की लड़ाई लडऩे वाले आदिवासियों को 1871 में अंग्रेजों ने जन्म से अपराधी घोषित कर देश की 52 जेलों में परिवार के साथ कैद कर दिया था। सोलापुर, हुबली, हैदराबाद, अंबरनाथ, पुणे, झाबवा, दिल्ली आदि जगहों में कैद किया गया। लक्ष्मण गायकवाड़ इन सभी जगहों पर जाकर अध्ययन कर भारत के हर राज्य में आदिवासियों की स्थिति पर एक बड़ी किताब लिखने की महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य कर रहे हैं। इनके साथ जनसंघर्ष भी जारी है।

बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं: प्रकाश मनु

कथाकार प्रकाश मनु को उनके उपन्‍यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्‍य अकादेमी का हिंदी के लि‍ए पहला बाल साहित्‍य पुरस्‍कार दिया जाएगा। उन्‍हें यह पुरस्‍कार 14 नवंबर को प्रदान किया जाएगा। उनसे युवा कथाकार उमेश कुमार की बातचीत के अंश-

चलिए, बचपन से ही शुरुआत करते हैं। आप अपने जन्म और प्रांरभिक तथा उच्च शिक्षा के बारे में कुछ बताएं? और यह भी बताएं कि जिंदगी के अब तक के सफर में आपने क्या खोया, क्या पाया?

मेरा जन्म शिकोहाबाद में हुआ। यह उत्तर प्रदेश में है, फिरोजाबाद के एकदम नजदीक। पहले शिकोहाबाद मैनपुरी जिले में आता था, आजकल फिरोजाबाद जिले में है। वही फिरोजाबाद जहां घर-घर चूडिय़ां बनती हैं और इसीलिए ‘सुहागनगरी’ भी जिसे बोलते हैं। शिकोहाबाद में बल्बों की बड़ी फैक्टरी है, जिसमें फिलिप्स, बजाज समेत बड़ी-बड़ी कंपनियों के बल्ब बनते हैं। इसके बावजूद शिकोहाबाद एकदम कस्बाई शहर है। जिसमें शहराती संस्कृति और गंवाई संस्कृति साथ-साथ चलती हैं।

गंवई संस्कृति के बावजूद शिकोहाबाद की प्रसिद्धि शुरू से इस रूप में रही कि वह शिक्षा में बहुत बढ़ा-चढ़ा शहर है। फिर मैं तो शायद किताबी कीड़ा ही था और बचपन से इस कदर पढऩे-लिखने का चस्का था कि अगर खाने-पीने का सामान लिफाफे या पुडिय़ा में आया तो उसे भी खोलकर पढ़ता था कि देखें, इसमें क्या लिखा है? और आज साठ वर्ष पूरे कर लेने पर भी वह नशा कहिए या पागलपन कहिए जरा भी कम नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी मैं दोस्तों से कहा करता हूं कि पढ़ते-पढ़ते मेरे प्राण निकल जाएं, इससे बेहतर मृत्यु की कल्पना मैं नहीं कर पाता। बचपन में पढ़ाई-लिखाई में काफी अच्छा था। इसीलिए घर वालों का सपना था कि मैं पढ़-लिखकर इंजीनियर बनूं। मेरे बड़े भाई साहब बल्बों की फैक्टरी हिंदी लैंप्स में बड़े पद पर थे। इंजीनियर थे। इसीलिए यह रास्ता मेरे लिए शायद सुगम होता। मां-बाप का भी यही सपना था। हैरानी की बात यह है कि माता-पिता एकदम अनपढ़ थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने में उनका उत्साह अनथक था।

बारहवीं के बाद इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। पर मैंने बहाना बनाया कि मुझे तो इलेक्ट्रोनिक्स चाहिए, जबकि यहां मुझे इलेक्ट्रिकल मिल रहा है तो मैं नहीं जाऊंगा। इसलिए कि इंजीनियर नहीं बनना चाहता था। मेरे भाई साहब इंजीनियर थे तो हमेशा बढिय़ा पेंट-कोट क्रीज में रहते थे। मुझे यह नागवार लगता था। मुझे ढीला-ढाला रहना पसंद था। तो सोचा प्रोफेसर हो जाऊंगा। प्रोफेसर तो ढीले-ढाले भी बढिय़ा लगते हैं। लेकिन फिर एम.एस-सी तक आते-आते लगा मेरा रास्ता तो कुछ और है। फिर हिंदी से एम.ए., पी.एच.डी। घर वाले कह रहे थे कि क्या पागल हो गए हो, हिंदी से एम.ए. क्यों करना चाहते हो? पर मैंने घर में अनशन किया। मां मेरे साथ थीं। और तब से जो रास्ता पाया आज भी दीवानों की तरह उसी रास्ते पर चला चल रहा हूं। शुरू के कुछ वर्ष प्राध्यापिकी में बीते फिर कोई तीन दशक पत्रकारिता में। लेकिन मेरे लिए तो जिंदगी का मतलब था लिखन…लिखना और बस लिखना। या कहिए पढऩा और लिखना। इसमें क्या पाया, क्या खोया इस बारे में मैंने कभी ज्यादा नहीं सोचा।

लेखन के प्रति कब और कैसे रुझान हुआ? शुरू में किस तरह की चीजें आपने लिखीं?

बहुत छुटपन में मां जो कहानियां सुनाया करती थीं उनका मन पर बड़ा गहरा अक्स पड़ता था। कहीं न कहीं मन में लिखने का पहला बीज शायद तभी पड़ा होगा। फिर बड़ा हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में शामिल कविता, कहानियां ऐसी थीं जिनसे साहित्य की दुनिया का प्रथम द्वार खुला। उन दिनों हमारे यहां हिंदी की एक बड़ी अच्छी सहायक पुस्तक थी ‘भाषा भास्कर’ जिसे हमारे यहां के हिंदी के बड़े ही अनुरागी अध्यापक ने लिखा था। शास्त्री जी करके हम उन्हें जानते थे। उस पुस्तक में मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, प्रसाद, पंत, निराला की ऐसी सुंदर कविताएं उद्धृत की गई थीं कि मुझे याद है सुबह-सुबह उठकर मैं उन्हें दोहाराता था  तो मन आनंद से भर उठता था। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ की ये पंक्तियां जिनमें कैकेई के पश्‍चात्ताप की गहरी छाया है, ‘यह सच है तो अब लौट चलो घर भैया, अपराधिन मैं हूं तात तुम्हारी मैया…!’ सबसे पहले इसी पुस्तक में पढऩे को मिलीं। और ये आज तक मुझे विचलित करती हैं। बालकृष्ण शर्मा नवीन की ‘लपक चाटते झूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को, उस दिन सोचा क्यों न लगा दूं, आज आग इस दुनिया भर को’ जैसी पंक्तियां पहले-पहल तभी पढऩे को मिलीं। और मुझे लगा कि साहित्य तो बहुत बड़ी चीज है। वह दिलों को मथ डालता है और हमारी सोच और व्यक्तित्व बदल सकता है। बस, तभी थोड़ा-थोड़ा लिखना शुरू हुआ। चीनी हमले के विरोध में कुछ पंक्तियां लिखी थीं, लेकिन कुछ आगे चलकर एक मजदूर कि जिंदगी या भिखारिन की दिवाली पर लिखी गई कविताएं शायद कुछ बेहतर थीं। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे बढ़ता गया, लिखने की नई-नई दिशाएं और रास्ते मिलते गए। शुरुआत कविताओं से ही हुई। मुक्त छंद कविताओं से। फिर कुछ गीत-मुक्तक लिखे गए, कहानियां लिखी गईं। लेकिन असली बदलाव आया जब मैंने मुक्तिबोध, रघुबीर सहाय और बाद के कवियों को पढ़ा तो लगा कि हां, अब रास्ता साफ हो रहा है। अब शायद मैं कुछ-कुछ समझ पा रहा हूं कि मुझे क्या लिखना है, किसके लिए लिखना और वह भीतर की कैसी तड़प है जो शब्दों में उतरना चाहती है? फिर तो कविताओं के साथ-साथ कहानियां और गद्य भी काफी लिखा गया। ‘यह जो दिल्ली’, ‘कथा-सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ सरीखे उपन्यास सामने आए। और अभी बहुत कुछ है जो भीतर चल रहा है। कह नहीं सकता कि वह कब किस शक्ल में सामने आए? बच्चों के लिए भी अभी बहुत कुछ लिखने का मन है। देखिए, कब हो पाता है।

प्रकाश मनु पत्नी डॉक्टर सुनीता के साथ

मूल नाम बदलकर आप प्रकाश मनु कब हुए? और इसकी जरूरत क्यों महसूस की आपने?

मेरा पारिवारिक नाम है चंद्रप्रकाश विग। पर मुझे यह शुरू से ही ज्यादा पसंद नहीं है। मुझे लगता था चंद्रप्रकाश विग तो कोई दुनियादार आदमी हो सकता है, जो पढ़-लिख के अच्छे नंबर लाता है, नौकरी करता है या दो-चार पैसे कमाता है। लेकिन मेरे भीतर जो लिखने वाला शख्स है, वह चंद्रप्रकाश विग नहीं हो सकता। क्योंकि वह थोड़ा अलग और काफी गैर-दुनियादार किस्म का व्यक्ति है। तो शुरू से ही इस नाम को बदलने की कोशिशों में जुट गया। शुरू में जब मजदूरों के दर्द और शोषण की विद्रोही कविताएं ज्यादा लिख रहा था, तो मन में जाने कैसे ‘रुद्र’ की इमेज आई और मैं चंद्रप्रकाश विग से चंद्रप्रकाश रुद्र हो गया। कई वर्षों तक चंद्रप्रकाश रुद्र ही रहा। मेरी कई कविताएं इस नाम से छपीं। और एक संपादित पुस्तक ‘रोशनी के बीज’ जिसमे कुछ नए उभरते कवियों के साथ-साथ रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज कवियों की कविताएं भी थीं। बाद में जब रिसर्च के सिलसिले में कुरुक्षेत्र गया तो लिखने का मिजाज थोड़ा बदला, मेरा अपना मन भी। जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का मन पर गहरा असर था। तो उनके उथल-पुथल और द्वंद्व भरे नायक मनु में मुझे कुछ ऐसा नजर आया जो काफी कुछ मेरे जैसा था। मनु में सृष्टि के द्वंद्व की पीड़ा थी और अच्छे और बुरे का संगम भी। मनु मानो हर मनुष्य का रुपक है, जिसमें उसकी अच्छाइयों और बुराइयों में एक महाभारत निरंतर चलता है। मुझे यह मनु भा गया। और फिर चंद्रप्रकाश रुद्र का रुद्र गायब हुआ तो चंद्र भी हट गया। और मैं प्रकाश मनु हो गया। मुझे लगता था बहुत बड़े नाम की बजाय एक छोटा सा नाम अच्छा है। इसीलिए शायद मुझे प्रकाश मनु अच्छा लगा होगा। और आज तो मूल नाम की बजाय इसी नाम से पुकारा जाना मुझे अच्छा लगता है।

बचपन की कोई खट्ठी-मीठी याद?

बहुत सी यादें हैं, पर उनमें एक ऐसी है कि उसे आज तक भुला नहीं पाया। हुआ यह कि कक्षा नौ में हमें अंग्रेजी पढ़ाते थे राजनाथ सारस्वत। वे कैसे थे, यह बताना मुश्किल है। बस इतना बता सकता हूं कि उनके आगे अपने को अच्छे-अच्छे खां समझने वाले दादा किस्म के लड़के भी थर्राया करते थे। वे कक्षा में जिन बच्चों को बहुत प्यार करते थे और योग्य समझते थे, उनमें मैं भी था। पर एक बार मैं भी उनके गुस्से की चपेट में आ गया। हुआ यह कि एक बार उन्होंने कुछ होमवर्क दिया था। बीच में लंबी छुट्टियां आ गईं, तो उसे पूरा करना मुझे याद नहीं रहा। और सच तो यह है कि क्लास में किसी को वह याद नहीं रहा। उन्होंने पूरी क्लास को मुर्गा बनने की सजा दे दी। सारे मुर्गा बन गए, पर मैं नहीं बना। मेरा कहना था कि आप मुझे जितना भी चाहें मार लीजिए, पर मुर्गा मैं नहीं बनूंगा। इस हुक्मउदूली से वे कितना तिलमिलाए होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। गुस्से में उन्होंने कहा कि अगर मेरा कहना नहीं मानते हो, तो क्लास से निकल जाओ। पर मैं इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ। उनके दो पीरियड पड़ते थे और दोनों पीरियड में उस दिन पढ़ाई नहीं हुई। बस यही नाटक चलता रहा। और मैं न मुर्गा बना न क्लास से बाहर जाने के लिए तैयार हुआ। आखिर में उन्होंने कहा कि अच्छा, अगर सभी विद्यार्थी कह दें कि विग को छोड़ दो  तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। उनका यह कहते ही एक साथ पुकार उठी, ”छोड़ दीजिए सर, छोड़ दीजिए!’’ और तब मैं छूटा। उस दिन की मेरी खुशी और रोमांच की आप कल्पना नहीं कर सकते। मैं मानो आकाश में सैर कर रहा था और लग रहा था कि मैं तो अर्जुन हूं, जिसने महाभारत जीत लिया है। आज भी इस घटना को याद करता हूं, तो मैं खुशी और रोमांच से भर जाता हूं।

आपने बड़ों के लिए काफी महत्वपूर्ण रचनाएं दी हैं। आपके यह जो दिल्ली है’, ‘कथा-सकर्स’ और पापा के जाने के बाद’ उपन्यास बहुत प्रसिद्ध हुए। इसके बावजूद आपका रुझान बाल साहित्य की तरफ ज्यादा दिखाई देता है। ऐसा क्यों?

इसका श्रेय तो सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका को ही जाता है। नंदन में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तब ही जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। और बाल साहित्य में अलग-अलग विधाओं की मेरी कोई पचास किताबें, जिनमें बच्चों के लिए लिखे गए उपन्यास, कविता-कहानियां और ज्ञान-विज्ञान की कहानियां भी हैं। मेरी कोशिश तो यही रही कि बच्चों के लिए जो भी लिखा जाए फिर चाहे वह ज्ञान-विज्ञान का साहित्य ही क्यों न हो, बड़ा रोचक और रसपूर्ण हो। इसी तरह कई वर्षों की मेहनत से हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखा। और अब समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लगभग पूरा हो चुका है। जो जल्दी ही आपको पढ़ने को मिलेगा।

आपने बच्चों के लिए प्रचुर मात्रा में लिखा है। हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में आपको क्या कहना है। क्या आप इस स्थिति से संतुष्ट है?

हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ बेहद साधारण रचनाओं का बड़ा ढेर है, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएं भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। सर्वेश्‍वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएं लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्‍व कविता में पांक्‍तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्र कुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी रोचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से दिग्गज कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई,  प्रभाकर माचवे,  भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि उस पर आप दया दिखाएं।

प्रकाश मनु साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी के साथ

बच्चों के लिए लिखते समय किन बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए?

मेरे खयाल से बच्चों के लिए लिखते समय बस एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम जो कुछ लिखें, बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं। एक लंबे अरसे से बच्चों के लिए लिखते हुए और ‘नंदन’ पत्रिका में कोई ढाई दशक गुजारने के बाद जो बात मैं समझ पाया, वह यह कि बच्चे उपदेशों से घृणा करते हैं। लिहाजा आप बच्चों के लिए जो कुछ भी लिखना चाहें या उन्हें कुछ भी बताना चाहें, अगर आप खेल-खेल में उन्हें नहीं बता पाते, तो वह निरर्थक और बेकार है। इसी तरह लीक पीटते रहने की बजाय कुछ नया लिखें, तो वही सार्थक है। इसके लिए ज्यादा अच्छा है कि अपने बचपन की दुनिया में जाएं। वहाँ हमेशा एक जादुई दुनिया आपका इंतजार कर रही होती है, जहां बहुत कुछ नया, हैरतअंगेज पर साथ ही साथ मानीखेज भी है।

भारतीय भाषाओं विशेष तौर से हिंदी में श्रेष्ठ बाल साहित्य का अभाव दिखाई देता है। ऐसा क्यों?

भाई, इस सवाल का जवाब मैं दे चुका हूँ। कम से कम हिंदी में मैं कह सकता हूं कि यहां अच्छे बाल साहित्य का कतई अभाव नहीं है। हाँ, उसके बारे में एक तो लोगों को पता कम है, फिर वह बच्चों तक उतना अधिक नहीं पहुंच पा रहा, जितना पहुंचना चाहिए था। यह मैं मानता हूं। इसके पीछे प्रकाशकों का रवैया भी जिम्मेदार है, जिन्हें अच्छे बाल साहित्य की समझ नहीं है और वे अच्छा-बुरा कुछ भी अंधाधुंध छापे जा रहे हैं और उसके प्रचार-प्रसार पर कानी कौड़ी भी खर्च नहीं करते। फिर हमारे मीडिया का रवैया भी कम दोषी नहीं है, जिसके कारण बाल साहित्य की अच्छी किताबों की चर्चा नहीं हो पाती। उनकी समीक्षा वगैरह का कोई मंच तो है ही नहीं। तो लोगों को पता कैसे लगेगा कि अच्छा क्या लिखा जा रहा है? इस चक्कर में अच्छा और बुरा गड्डमड्ड हो रहा है और लोग बगैर सोचे, बगैर पढ़े बाल साहित्य के बारे में कुछ फतवा जारी करने के गोरखधंधे में लगे हैं।

आप लंबे समय तक बच्चों की पत्रिका से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों की रुचि में किस तरह का बदलाव आ रहा है?

सबसे पहली बात तो यह कि आज का बच्चा पहले की तुलना में कहीं अधिक सचेत बच्चा है। पहले बच्चों में जो इनोसेंस या अबोधता थी, इधर के बच्चे में वह थोड़ी कम है, पर उसमें आसपास की दुनिया को देखने और सोचने-समझने की दृष्टि कहीं अधिक विकसित है। इस कारण बच्चा ऐसी चीजों में अधिक रुचि लेता है, जिसमें मनोरंजक ढंग से अच्छी और उपयोगी जानकारी दी गई हो। इसी तरह राजा-रानी की कोरी कल्पना की कहानियों की बजाय आज के बच्चे को ऐसी कहानियाँ कहीं अधिक रुचती हैं जिनमें उस जैसा ही कोई छोटा बच्चा केंद्र में हो और उसकी किसी छोटी-बड़ी मुश्किल पर कहानी गढ़ी गई हो। हाँ, कुछ लोग कहते हैं कि आज के बच्चे की दुनिया बदल गई है, इसलिए उसे फंतासी या परीकथाएं नहीं, सिर्फ यथार्थ की कहानियाँ देनी चाहिए पढऩे को। पर मेरा अनुभव है कि बच्चे को जादू या फंतासी अच्छी लगती है और किसी भी विषय पर लिखी गई ऐसी जादुई कहानियाँ, जो खुद में एक नया और ताजा विचार भी लिए हों, बच्चे को बहुत लुभाती हैं। उससे उसे रिलीफ भी मिलता है और अपनी समस्या से निकलने का रास्ता भी। हालांकि बच्चों के लिए यथार्थ पर कहानियां भी जरूर लिखी जानी चाहिए, पर वे सार्थक तभी होंगी जब उनमें किस्सागोई और कथा-रस हो।

अकसर कहा जाता है कि इस तकनीकी युग में बचपन खो सा गया है। बच्चा जन्म लेते ही जल्दी से जल्दी प्रौढ़ हो जाना चाहता है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?

हाँ, यह बात तो ठीक है कि आज का बच्चा जल्दी से जल्दी प्रौढ़ बन रहा है और बचपन खो सा गया है। पर बच्चा प्रौढ़ बनना नहीं चाहता, बच्चे को प्रौढ़ बनाया जा रहा है। कहना चाहिए कि उससे जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टंगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके उसका बचपन उससे छीना जा रहा है। बल्कि सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। इसकी क्या सजा हो, मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता, पर यह बेशक बहुत बड़ा और अक्षम्य गुनाह है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएं पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं कांप उठता हूं।

आप अपनी जो आत्मकथा लिख रहे हैं, उसके कुछ अंश पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। लगता है, आत्मकथा में आप शिक्षा जगत और बचपन को विशेष तौर से फोकस कर रहे हैं। इसकी कोई खास वजह?

कोई खास वजह नहीं, सिवाय इसके कि हर शख्स की तरह मुझे भी अपना बचपन खासा फेसिनेट करता है। जब-जब मुश्किलों में पड़ता हूं, आहत और कमजोर महसूस करता हूं, तो जिन चीजों से मुझे ताकत मिलती है, उनमें बचपन भी है जो एक साथ जादुई रहस्यों और बड़ी संभावनाओं से भरा है। मैं जब बड़े लेखकों से मिलता हूं या उनकी रचनाओं के निकट जाता हूं तो मुझे गंगास्नान की अनुभूति होती है। इसी तरह जब बचपन की दुनिया में झांकता और गोते लगाता हूं, तब भी मुझे गंगास्नान की ही अनुभूति होती है। वैसे आत्मकथा में बचपन पर इतना फोकस क्यों है, इसका भी एक रोचक किस्सा है। हुआ यह कि एक वरिष्ठ लेखक जो मेरे परिवार की व्यावसायिक पृष्ठभूमि से भी परिचित थे, एक बार मिले तो उन्होंने एक सवाल पूछ लिया। वह सवाल यह था कि भई प्रकाश मनु, तुम ऐसे परिवार में जन्म लेकर लेखक कैसे हो गए? सवाल सुनकर मैं बड़ी देर तक चुप रहा। फिर कहा, इसका जवाब तो बड़ा लंबा हो जाएगा। और सच पूछिए, तो यह आत्मकथा उन लेखक मित्र के उसी सवाल का लंबा जवाब है। और चूंकि मेरे लेखक होने के रहस्य की कुंजी शायद मेरे लज्जालु और आत्मलीन बचपन में ही कहीं छिपी है, इसलिए आत्मकथा में भी उसी पर फोकस है। इसी तरह बचपन से ही घोर पढ़ाकू रहा और शायद अब भी हूँ। पहले साइंस से और फिर हिंदी से मास्टर की डिग्री लेने के अलावा पी-एचडी भी की। तो शिक्षा जगत से गहरा वास्ता तो होना ही था। बाद में प्राध्यापक होने पर पढ़ाया भी। तो इस सब के रिफ्लेक्स आत्मकथा में हैं। हां, जीवन का एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता करते बीता, तो उसकी छायाएँ भी जगह-जगह इस आत्मकथा में पडऩी ही थीं और वे पड़ीं। पर यह प्रसंग यहां रहने ही दें, तो बेहतर है। क्योंकि पत्रकारिता में जो कुछ आज देखता हूं, उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो मुझे बहुत दुखी और संतप्त करता है।

हाल ही में आपके ‘ठुनठुनिया’ बाल उपन्यास को साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है, इस बारे में आपकी प्रतिक्रिया क्या है।

मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या कहूं? हां, अच्छा तो लगा ही, बल्कि कहना चाहिए कि एक सुखद आश्‍चर्य सा हुआ। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें, उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हां, आसपास के कुछ बच्चे हैं, जो कभी-कभी मेरी किताबें पढऩे के लिए ले जाते हैं। उनमें से एक बच्चा यह उपन्यास भी ले गया। जब वह इसे लौटाने के लिए आया, तो उसकी उत्साह से भरी लेकिन टूटी-बिखरी सी प्रतिक्रिया और आंखों में चमक, यही बस मुझे याद रह गई। …मोटे तौर से बच्चों के लिए लिखने वाला कोई भी लेखक वर्तमान अनुत्साही माहौल में ऐसी ही दो-चार निधियां संभालकर रख लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। पर उस उपन्यास में कुछ है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और उस पर लोगों का ध्यान गया, इससे खुशी तो होती ही है। पर मेरा कहना है कि हिंदी में बच्चों के लिए लिखी गई एक से एक अच्छी, सार्थक और बड़ी रचनाएं हैं, जिन्हें सामान्य रचनाओं की एक बड़ी भीड़ से अलगाना जरूरी है। इस पुरस्कार के साथ-साथ अच्छे आलोचना ग्रंथों से यह काम हो सकता है और होना चाहिए। इसके बाद शायद हिंदी बाल साहित्य के आगे जो भ्रम का अंधेरा है, वह छंटे और बाल साहित्य की सही तस्वीर लोगों के सामने आए। फिर बाल साहित्य का महत्व समझ में आएगा, तो उसे बच्चों के नजदीक ले जाने की जिम्मेदारी भी लोग समझेंगे।

आपका बाल उपन्यास ‘ठुनठुनिया’ का जो पात्र है वह बड़ा ही मजेदार है। उसके बारे में कुछ बताएं?

आपने ठीक कहा, ठुनठुनिया वाकई बड़ा मजेदार पात्र है और कहना चाहिए कि मुझे भी बहुत पसंद है। इसलिए कि उसका परिवेश थोड़ा गंवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ है। लेकिन वह परिस्थितियों से हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हंसी की फुरफुरिया फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में वह हार नहीं मानता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे नहीं सही मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आंखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा इसलिए उसकी पढ़ाई बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिल को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है इसीलिए चाहे गरीब खिलौने वाला, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला या फिर गांव का जमींदार हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की मां तो इतनी ग्रेट लेडी है और अपने बच्चे पर इस तरह प्यार निसार करती है कि कहना होगा कि वह बड़ी गरीब लेकिन ग्रेट मां है। इसी मां का प्यार यहां-वहां भटकने के बाद उस घर खींच लाता है। वह जिंदगी में आगे बढ़ता है मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भूत दुनिया रच डालता है। जिसमें कला-संगीत, नाटक और हंसी खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूं तो मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।

मुझमें नेहरू भी बोलता है, माओ भी : सुरजीत पातर

पंजाबी के वरिष्ठ कवि सुरजीत पातर को हाल ही में सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया। साहित्य अकादेमी सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित पातर का जन्म 1944 में जालंधर, पंजाब के एक गांव में हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ प्रकाशित हुआ। अपनी कविताओं में साफगोई और बेबाकी के लिए प्रसिद्ध पातर की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनसे युवा पत्रकार संजीव माथुर की बातचीत के अंश-

क्या आप लफ्जों की सूफीयाना इबादत करते हैं?
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण
किया।
एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है।
पर आप को पढ़ते हुए कहीं-कहीं महसूस होता है कि अंधेरे दौरों से पैदा हुई उदासी की वजह भी दरगाह की तलाश को विवश कर रही है?
 नहीं ऐसा नहीं है। मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओं तो दुख छोटे पड़ जाएंगे।
माना जाता है कि सातवें दशक में उभरी पंजाबी कविता ने साहित्य में दो ऐसे नाम दर्ज कराए जिनके बिना भारतीय कविता के आधुनिक परिदृश्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। ये नाम है पाश और पातर। पाश की कविता पर माक्र्सवाद का साफ प्रभाव है, आप किस विचार या लेखक से प्रभावित महसूस करते हैं?
मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है कि –
मुझमें से नेहरू भी बोलता है,  माओ भी
कृष्ण भी बोलता है,  कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
पर जो दौर आपकी काव्य रचना की शुरुआत का है, वही वक्त वामपंथ में उथल-पुथल का दौर था। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला जहां आप छात्र थे वह नक्सलवादी गतिविधियों का केंद्र था। आपके के कई मित्र पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन में सक्रिय थे। इस माहौल का आप पर क्या असर पड़ा?
जैसे मैंने पहले कहा कि मैं किसी राजनैतिक समूह का कार्यकर्ता तो नहीं था। इसीलिए नक्सलवाद के राजनीतिक पक्ष के बारे में तो आपको मेरी कविताओं में सीधे कोई नारा शायद न मिले, पर यह भी सच है कि इस विचार के मानवीय पक्ष- जैसे नवयुवकों की त्याग भावना, विचार के आधार पर मर-मिटने का जज्बा व गहरे और उष्म मानवीय संबंधों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है। इस प्रभाव को आप मेरे सौंदर्यबोध में पा सकते हैं। इस दौर में एक दोस्त था रुपोश, जिसने माक्र्सवाद से परिचय करने में अहम भूमिका निभायी। पर मेरी पीएसयू के साथियों से लगातार हिंसा व लेखकीय स्वतंत्रता को लेकर बहस चलती रहती थी। इसके बावजूद मेरी सहानुभूति
उनके साथ थी। चौक शहीदां में उसका आखिरी भाषण में मैंने साफ कहा है कि –
चलो यह चौक छोडें
किसी चौरस्ते पर पहुंचे
और वहां जाकर फिर दुविधा में पड़ें
यहां दुविधा में पड़ना फिर लौटकर कोख में पड़ना है
तुम्हें मैं क्या बताऊं कीमती दोस्तों
तुम तो जानते हो
कि जिस चौक में
अपने हंसमुख हमउम्रों का खून बह जाए
फिर वह चौक चौरास्ता नहीं रहता,
जिन चौकों में अभी हमउम्रों का खून बहाना है
वे आगे हैं।
वैसे मैं अपनी कविता और जीवन में कभी ऊंचे पैडिस्टियल से बात नहीं करता। मैं आम के बीच में ही खुद को सहज महसूस करता हूं। मैंने ये भी लिखा है कि – मेरा जी करता है कि जंगल में छिपे गोरिल्ले से कहूं, ये लो मेरी कविताएं जलाकर आग सेंक लो।
इमरजेंसी और पंजाब में आंतक का एक पूरा दौर आपने देखा है। कैसे देखते हैं इन दोनों अंधेरे दौरों को?
 इमरजेंसी पर मैंने कहा था कि कुछ कहा तो अंधेरा सहन कैसे करेगा, चुप रहा तो शमांदान क्या कहेंगे। जीत की मौत इस रात हो गई, तो मेरे यार मेरा इस तरह जीना सहन कैसे करेंगे। बुढ़ी जादूगरनी भी इमरजेंसी और सत्ता के दमनकारी पक्षों का सूक्ष्म व्यंग्य के साथ पर्दाफाश करती है। इमरजेंसी या आतंकवाद हमारे लोकतांत्रिक समाज पर धब्बा है। यह दौर कवि और कविता के लिए सर्वाधिक घातक थे।
आंतकवाद पर तो मैंने बिरख अर्ज करें में काफी कुछ कहा है। कुछ कविताओं जैसे कि
मातम,
हिंसा,
खौफ,
बेबसी
और अन्याय –
यें हैं आजकल नाम मेरे दरियाओं के।
या फिर एक लरजता नीर था को मैंने पाश को समर्पित किया है। एक दरिया को भी आप इसी संदर्भ में पढ़ सकते हैं। इसी संदर्भ में मैंने लिखा था – इस अदालत में बंदे वृक्ष हो गए, फैसले सुनते-सुनते सूख गए । इन्हें कहो कि ये अब अपने उजड़े घरों को लौट जाएं। ये कब तक यहां खड़े रहेंगे।
साहित्य का राजनीति से कैसा रिश्ता होना चाहिए?
बेशक प्रतिरोध की राजनीति साहित्य के फोकस में होनी चाहिए। व्यंग्य इसमें एक कारगर औजार हो सकता है। जैसे कि मैंने गहरे क्रंदनों को क्या मापना में कहा है कि जद तक उह लाशां गिणदें आपा वोटां गिणिए (जब तक वह लाशों को गिनते हैं आप वोटों को गिने)। सुलगता जंगल में भी आप इसकी झलक देख सकते हैं। साहित्य और लेखक की अपने वक्तों के प्रति एक जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह इसको साफ साफ देखें और दिखाएं। ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे या न चाहें राजनीति या अपने माहौल से उदासीन होकर की गई साहित्य की रचना कमजोर होती है। उसमें मानवीय उष्मा की गरिमा नहीं होती है। साहित्य या रचना में हमारी मैं भी सिर्फ हमारी मैं नहीं होती है वह कवि खुद ही नहीं होता है।
क्या रचना की रचना एक निजी मामला नहीं है?
 देखिए, कवि या लेखक की मैं भी उसने खुद नहीं बनाई होती है। वह भी समाज से उसने पाई है। इसीलिए रचना एक हद ही निजी होती है, पर उसके बावजूद वह होती एक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा ही है।
वैश्वीकरण का हमारे समाज पर क्या असर पड़ा है?
 वैश्वीकरण के प्रक्रिया ने सरकार की संकल्पना को कमजोर किया है। आज हमारी सरकारे बस लॉ एंड ऑर्डर का थाना भर बन कर रह गई हैं। शिक्षा और सेहत की जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए। पर कानूनों के बावजूद सरकारें इसे लागू करने से बच रही हैं। वह इसे किसी और के कंधे पर डालना चाह रही हैं। शिक्षा की तो एक लहर चलनी चाहिए। शिक्षा में असमानता खत्म होनी चाहिए। इसी असमानता के कारण गांवों के बच्चे अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं ले पाते हैं। सेहत के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा और सेहत सबकी पहुंच में हो और यह करने की जिम्मेदारी सरकार की है, न की बाजार की। वैश्वीकरण ने सरकार को इस
जिम्मेदारी से आजाद करने में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है। इसके अलावा वैश्वीकरण की बयार ने हमारे मानवीय संबंधों को भी खासा प्रभावित किया है। माइग्रेट लेबर का सवाल एक बड़ा सवाल है। मेरी कविता आया नंदकिशोर में इस दर्द को
समझने की कोशिश आपको दिखाई देगी।
आपने शिरोमणि अवार्ड क्यों ठुकराया था?
मेरा मानना है कि पुरस्कारों में राजनीतिज्ञों का दखल नहीं होना चाहिए। इस पुरस्कार देने की प्रक्रिया में राजनीतिज्ञों का खासा दखल था। यह मुझे गवारा नहीं था सो मैंने यह पुरस्कार ठुकरा दिया।
कैसे रचते हैं अपनी कविताएं?
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।
आजकल रचनात्मक व्यस्ताएं क्या हैं?
आजकल भाषा पर और उसके विज्ञान पर ध्यान दे रहा हूं। भाषावैज्ञानिकों ने यह काम छोड़ रखा है। मां बोली यानि मातृ-भाषा पंजाबी के विकास पर काम कर रहा हूं। यात्रा संस्मरण लिखने की भी योजना है। शीर्षक होगा सूरज मंदिर दां पौडियां।
अपने घर- परिवार के बारे में कुछ बताएं?
मेरा बचपन खुशहाल नहीं था। काम करने के लिए पिता हरभजन सिंह पूर्वी अफ्रीका चले गए । घर में चार बड़ी बहनें और मां हरभजन कौर के साथ खासे संघर्ष के दिन बिताए। पिता मां की मृत्यु पर नहीं आ सके। इसका दर्द जीवन भर रहेगा। कवि नहीं होता तो गायक होता। मेरी पत्नी भूपिंदर ने हमेशा साथ निबाहया है। दो बेटे हैं अंकुर और मनराज। बडे़ की शादी हो गई है।
नए लेखकों को कुछ राय?
देखों मैं अपनी कविता में भी उपदेश देने से बचता हूं। इसीलिए सिर्फ कुछ मशविरे हैं। जैसे फैशन की पीछे नहीं भागो। मन में गहरा झांक कर देखों। लेखन में एक कंटीनियूटी होनी चाहिए। परम्परा और वर्तमान का संजीदा भान व ज्ञान होना चाहिए। जैसे बे्रख्त के बारे तो आज बहुत सों को पता होता पर बुल्लेशाह या वारिस के बारे में भी मालूम होना चाहिए। स्टाइल पर जोर न हो। परिवेश से जुड़े। निरंतरता और बदलाव की समझ हो। सोचना चाहिए कि लोग हमसे दूर क्यों हो रहे हैं। मैं अक्सर युवा साथियों से कहता हूं- वो लोग जा रहे हैं आज की कविता से दूर, तो हजूर होगा इसमें भी आपका कुछ कसूर।

(कादम्बिनी से साभार)

कोविलन : नक्षत्र हुआ अस्त

कोविलन

मलायलम के वरिष्ठ लेखक कोविलन का 2 जून को निधन हो गया। वह प्रयोगधर्मी रचनाकार थे। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार (दो बार) आदि कई पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया। उनके अभावग्रस्त बचपन, जीवन संघर्षों और लेखक के तौर पर उनके विकास पर अधारित आलेख-


कोविलन का जन्म अछूत समझी जाने वाली ईजवा जाति में 9 जुलाई, 1923 को तत्कालीन कोचीन राज्य (वर्तमान में केरल) में कंडानिसरी के एक किसान परिवार में हुआ।
उसके दादाजी का नाम शंकु था। वह बटाई पर नारियल, सुपारी, काजू आदि की खेती करते थे। परिवार का लालन-पोषण बहुत अच्छे ढंग से हो रहा था। चेचक की महामारी में उनकी मृत्यु हो गई। उस समय कोविलन के पिता वट्टमपराम्बिल वेलप्पन की उम्र आठ साल थी। परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया। खेत मालिक को केवल पैसे से काम था। खेत में काम हो या न हो इससे उसे कोई मतलब नहीं था। पैसे नहीं मिलने पर उसने खेत वापस ले लिए। दादी मजदूरी कर परिवार की देखभाल करने लगी।
इन विषम परिस्थितियों में भी वेलप्पन स्कूल जाते रहे। स्कूल में सभी बच्चे दोपहर को भोजन करने के लिए जाते थे। वेलप्पन स्कूल में ही बैठे रहते थे। एक दिन गुरुजी ने पूछा कि तुम खाना खाने क्यों नहीं जाते? वेलप्पन ने कोई जवाब नहीं दिया। गुरुजी ने दोबारा पूछा। वेलप्पन को सार्वजनिक रूप से, यहां तक गुरुजी के सामने यह कहने में शर्म आई कि घर में खाने के लिए नहीं है। इसलिए मैं घर नहीं जाता। अगले दिन से उन्होंने स्कूल जाना ही छोड़ दिया।
वेलप्पन तेरह-चौदह साल की उम्र से मजदूरी करने लगे। वह बड़े हो गए तो उन्होंने छह-सात एकड़ जमीन बटाई पर ले ली। यह पहाड़ वाला इलाका था इसलिए जमीन सस्ते में मिल गई। उन्होंने चार-पांच एकड़ पर काजू के पौधे लगाए। उन दिनों कोई काजू खाना पसंद नहीं करता था इसलिए बहुत सस्ता बिकता था। काजू का तेल नाव की लकड़ी पर लगाने के काम आता था। इससे लकड़ी की मजबूती बढ़ जाती है। इसके लिए बड़ा बिजनेसमैन ही काजू खरीदता था इसलिए काजू की खेती से कोई विशेष कमाई नहीं हो पाती थी। जैसे-तैसे परिवार का गुजारा हो रहा था।
वेलप्पन पढ़ नहीं पाए थे, लेकिन पढऩे के प्रति उनकी ललक कम नहीं हुई। बड़े होने पर वह पौराणिक और धार्मिक किताबें रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, कंब रामायण आदि खरीदकर पढ़ते थे। वह रामायण के चयनित भाग रोज पढ़ा करते थे। कोविलन को अपने पास बिठा लेते और अपने साथ रामायण के प्रसंगों का पाठ करने के लिए कहते। दु:ख भरे भाग का ही वह अधिक चयन करते थे। जटायु प्रसंग पढ़ते समय वह रोते थे। रावण का अत्याचार वह सह नहीं पाते। सीता और मंदोदरी विलाप जैसे प्रसंग पढ़ते हुए वे भाव-विभोर हो जाते थे। जब वे रोते तो कोविलन भी रोता। उसे रोता देख, वे नाराज हो जाते। अन्य धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों का भी नियमित पाठ करते थे। इसका प्रभाव कोविलन के चरित्र पर पड़ा। धीरे-धीरे उसका रुझान साहित्य की ओर होने लगा।
वेलप्पन ने तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए कोविलन को पढऩे के लिए भेजा। उसने चौथी पास की। बाद में आर्थिक समस्या बढ़ जाने पर उसे स्कूल जाने से रोक दिया। गुरुजी और कोविलन के साथ के लड़कों ने कहा कि इसे आगे पढ़ाओ। फीस के लिए पैसे नहीं थे। कोविलन ने मोंटसरी स्कूल में दाखिला ले लिया। वहां फीस नहीं ली जाती थी। स्कूल में एक गुरुजी थे। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वह अंग्रेजी प्रेम से पढ़ाते थे। उन्होंने कोविलन को कक्षा छह, सात और आठ में अंग्रेजी पढ़ाई। इस वजह से उसकी अंग्रेजी में बहुत अच्छी पकड़ हो गई। वेलप्पन हाई स्कूल करवाना चाहते थे। लेकिन फीस के लिए पैसे की समस्या फिर खड़ी हो गई। कोविलन ने साहित्यदीपिका संस्कृत कॉलेज, पावरट्टी में एडमीशन ले लिया क्योंकि यहां फीस कम लगती थी। यहां लेखक के रूप में उसकी प्रतिभा उजागर हुई।
प्राइमरी में पढ़ते समय कुंजय्यप्पन गुरुजी ने उसे प्रोत्साहित किया था। उन्होंने कुमारनाशान की कविताएं पढऩे के लिए दीं। काव्य कृति ‘लीला’ पढऩे के लिए दी। इसकी बातें कोविलन की समझ में नहीं आईं। काव्य कृति ‘नलिनी’ पढऩे को दी। इसकी कुछ बातें कोविलन की समझ में आईं।
वलियाक्किल कुमारन गुरुजी ने भी कोविलन को प्रोत्साहित किया। वे मलयालम पढ़ाते थे। वे कुमारनाशान की काव्य कृति ‘नलिनी’ शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ाते थे। उसका भाव स्पष्ट करते थे।
कोविलन ने कुछ कविताएं लिखीं। उन्हें सुधारने के लिए अध्यापकों को दीं। कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि वे प्रभावशाली नहीं थीं। एम.पी. शंकुण्णि नायर गुरुजी ने कहा कि तुम्हारी कविताओं में 120 पंक्तियां हैं। कोविलन की समझ में आया कि इनमें काव्यात्मकता का अभाव है। उसने यह विधा छोड़ दी।
के.पी. नारायण पिषारड़ी गुरुजी ने उसकी रचनाएं पढ़ कर सुझाव दिया कि अगर तुम्हें उपन्यास में दिलचस्पी है तो पहले महाभारत पढ़ो। इसका मतलब कोविलन की समझ में नहीं आया। उसके मन में विचार उठता कि महाभारत उपन्यास का नमूना कैसे हो सकता है? बड़े होने पर कोविलन की समझ में यह बात आई कि जीवन के सारे प्रसंगों और आदर्शों का वर्णन महाभारत में मिलता है। पिषारड़ी गुरुजी का उपदेश उसके लिए बहुत प्रेरक था।
कोविलन ने कुछ विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों के अनुवाद पढ़े। दास्तयेवस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ तथा विक्तर ह्यूगो के उपन्यास ‘लेस मिसरेबिल’ के अनुवाद भी पढ़े। इन उपन्यासों का उसके मन में गहरा असर पड़ा। मानवीयता का महत्व उसकी समझ में आने लगा।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी को जेल हो गई। कोविलन ने सोचा कि जब अंग्रेजों ने गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया है तो मैं कॉलेज क्यों जाऊं? उसने कॉलेज में ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। सभी विद्यार्थी कक्षाओं से बाहर आ गए। सबने मिलकर रैली निकाली। प्रधानाचार्य ने कोविलन को कॉलेज से निकाल दिया। उसने पिताजी को यह बात नहीं बताई। प्रधानाचार्य ने इस संबंध में घर पत्र भेजा तो उन्हें इस बात का पता चला। उन्होंने डंडी से कोविलन की खूब पिटाई कर दी। वह रोया नहीं। चुपचाप मार सहता रहा।
वह रोज खाना खाकर सुबह-सुबह घर से निकल जाता और सारा दिन घूमता रहता। इस दौरान उसका एक नई दुनिया से सामना हुआ। उसने समाज की विषमताओं और विद्रूपताओं को नजदीक से देखा। उसने देखा कि कितनी गरीबी है, भीषण तंगियों में लोग जी रहे हैं, सार्वजनिक रास्तों में अछूत नहीं जा सकते। ऐसे रास्तों से गुजरने पर एक-दो बार सवर्ण जाति के लोग उसे मारने के लिए आए। उसने भागकर अपनी जान बचाई। जीवन की इन विषम परिस्थितियों को लेकर उन्होंने उपन्यास लिखा- ‘ताकन्र्ना हृदयंगल’। इस समय उनकी आयु 19 वर्ष थी।
मां के देहांत के बाद छोटी बहन घर की देखभाल कर रही थी। एक दिन कोविलन रात को घर आए। काफी देर हो गई। उन्हें खाने के लिए नहीं बुलाया गया। उन्हें जोर की भूख लगी थी। उन्होंने बहन से पूछा कि खाने के लिए क्यों नहीं बुलाया जा रहा है? बहन ने बताया कि खाने के लिए कुछ नहीं है। बाजरे की कंजी बना रही हूं। कोविलन ने पूछा कि क्या पिताजी ने भी बाजरे की कंजी खाई है? बहन ने ‘हां’ में जवाब दिया।
कोविलन ने अगले दिन सुबह घर से सोने का एक आभूषण चुरा लिया। उन्होंने उसे बाजार में बेच दिया। वह फौज में भर्ती होने के लिए चल दिए। वह सोचने लगे कि पिताजी कड़ी मेहनत करते हैं। इसके बाद भी उन्हें बाजरे की कंजी खानी पड़ती है। मैं बीस साल का जवान हूं। मुझे कुछ करना चाहिए। वह 1943 में रॉयल इंडियन नेवी में भर्ती हो गए।
द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। उनकी ट्रेनिंग वरसोवा, मुंबई हुई। ट्रेनिंग के बाद उनकी नियुक्ति एंटी सबमेरीन डिटेक्टर ऑपरेटर के पद पर हो गई। जहाज के कैप्टन गुरचरण सिंह गिल थे। उन्होंने एंग्लो इंडियन लड़की से शादी की थी। उस समय इस तरह के विवाह को बुरा माना जाता था। सामाजिक बहिष्कार किया जाता था। वह शादी के बाद अपने गांव पंजाब नहीं गए। वह मुंबई में ही बस गए। कैप्टन गुरचरण सिंह गिल कोविलन को बहुत प्यार करते थे। वह उन्हें बेटा कहकर बुलाते थे।
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो गया। उन दिनों कोविलन छुट्टी पर थे। छुट्टी से वापस आए। उन्हें यात्री जहाज पर भेज दिया गया। जहाज सिंगापुर पहुंचा। उसने हार्बर से थोड़ा पहले लंगर डाल दिया। जहाज में कहा गया कि जो बाहर जाना चाहता है, जा सकता है। कोविलन के साथ जहाज में बहुत से यात्री और काम करने वाले थे। कई यात्री ऊपर डेक पर गए। कुछ देर बाद वह वापस आ गए। कोविलन ने उनसे पूछा कि क्यों वापस आ गए? उन्होंने बताया कि यात्री नहीं जा सकते। कोविलन चाय पीने के लिए डेक पर चले गए। वहां उन्हें साथ काम करने वाला ब्रिटिश आपरेटर मिला। उन्होंने उसका निशान देखकर पूछा, ”हेलो चार्ली, आप कहां जा रहे हैं?”
”मैं आजादी के लिए जा रहा हूं।” साथी आपरेटर ने जवाब दिया।
उन्होंने चाय नहीं पी। उन्होंने लिबर्टी वाले कपड़े पहने और एप्लीकेशन लिखी- रिक्वेस्टिड लिबर्टी। एप्लीकेशन अपने अधिकारी को दे दी। उन्हें तुरंत बुलाया गया। आदेश हुआ, ”तुम नहीं जा सकते।”
कोविलन ने पूछा, ”मैं क्यों नहीं जा सकता?”
अधिकारी ने गुस्से में कहा, ”हू यू टू टॉक अबाउट रॉयल सेलर्स?”
कोविलन ने जवाब दिया, ”आई एम एन इंडियन सेलर।”
उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तुरंत कोर्ट बैठी। उनसे पूछा गया,”तुम कौन हो?” उन्होंने जवाब दिया, ”मैं भारतीय यात्री हूं। ब्रिटिश जहाज में यात्री की तरह आया हूं। मेरे चरित्र के बारे में मेरे कमांडिंग आफिसर और साथियों से पूछो।” तब अधिकारी थोड़ा नरम पड़े। कोविलन को चौदह दिन की सजा हुई। रोज एक घंटे राइफल हाथों पर ऊपर उठाकर दौड़ लगाना।
वह जहाज के डेक पर आगे-पीछे राइफल उठाकर दौड़ लगाने लगे। वह भागते-भागते थक गए। उन्होंने सोचा कि यह तो मुझे मार डालेंगे। वह नीचे आए। अपने साथी से ब्लेड मांगा। और बाएं हाथ के अंगूठे के नीचे से हथेली काट दी। तौलिया बांध लिया। पूरा तौलिया खून से लथपथ हो गया। थोड़ी देर बाद आवाज लगी, ”नंबर-11, पनिशमेंट वाला फॉलन।”
कोविलन डेक पर चले गए। उनके हाथ में बड़ा झाड़ू दे दिया कि सफाई करो। उन्होंने दाएं हाथ में झाड़ू ले लिया। बायां हाथ पीछे कर लिया। कमांडिंग आफिसर ने कहा कि दोनों हाथ से काम करो। कोविलन ने बायां हाथ दिखा दिया। आफिसर ने देखा कि इसने तो बहुत हाथ काट लिया है। आफिसर ने उन्हें सिक बेग में भेज दिया। कोविलन का एक पंजाबी दोस्त था। उसने यह बात पूरे जहाज में फैला दी। कोविलन ने कहा कि देखो भई, मैं किट बैग में कुछ ढूंढ़ रहा था। ब्लेड से हाथ कट गया। वह दोस्त शरारात से मुस्कुराया, ”अच्छा, ऐसा है।” उसने बताया कि यदि डाक्टर लिखकर दे दे तो उसे सजा से छुटकारा मिल सकता है। कोविलन ने डाक्टर से लिखवा लिया। उन्हें सजा से छुटकारा मिल गया।
इस घटना के छह-सात दिन बाद उनका जहाज इस यात्री जहाज के बराबर में आकर लगा। उसने लंगर डाल लिया। कोविलन को ऑर्डर हुआ। वह अपने जहाज में आ गए। जहाज में कैप्टन, एक्जीक्यूटिव आफिसर आदि सभी बदल गए थे। नया कैप्टन लैफ्टिनेंट चोपड़ा था। वह साढ़े छह फिट लंबा गंभीर जवान था। वह दूसरे जहाज में गेस्ट बनकर गया। उसे सारी बात बता दी गई। कैप्टन चोपड़ा ने कोविलन से कहा, ”तुम इतना बदमाश हो। मैं तुम्हें ठीक करूंगा।”
जहाज में सब लेफ्टिनेंट चेपरफीड थे। कोविलन ने उनसे कहा,  ”वल्र्ड वार खत्म हो गया है। अब मुझे छुटकारा मिलना चाहिए।”
चेपरफीड ने पूछा, ”क्यों?”
कोविलन ने कहा, ”मैं पढऩा चाहता हूं।”
चेपरफीड ने रिलीज करने के लिए उन्हें मुंबई भेज दिया। नौसैनिक विद्रोह हुआ। वह वारसोवा में थे। वह रोज वारसोवा से बॉम्बे फोर्ट जाकर सारी जानकारी यूनिट को दिया करते। उनका बस यही काम था। नौसैनिक विद्रोह समाप्त हो गया। उन्हें रिलीज कर दिया गया।
घर आते समय कोविलन के पास थोड़ा पैसा था। उन्होंने सारा पैसा पिताजी को दे दिया। उनसे कहा, ”मैं अपना उपन्यास प्रकाशित कराना चाहता हूं। मुझे 250 रुपये दे दीजिए।” उन्होंने 250 रुपये दे दिए।
कोविलन ने अपने पैसों से उपन्यास प्रकाशित कराया। उन्होंने 100 प्रतियां लीं और बेचने के लिए जिला मुख्यालय त्रिचूर चल दिए। बस में उन्हें प्रसिद्ध कवि पुन्नकुन्नम्म दामोदरन मिले। उनसे बातचीत हुई।
दामोदरन ने पूछा, ”क्या तुम जोसफ मुण्डश्शेरी को जानते हो?”
कोविलन ने कहा, ”मैं नहीं जानता। मैंने केवल उनका नाम सुना है।”
दामोदरन ने सलाह दी, ”आपको उनसे मिलना चाहिए।”
कोविलन ने दो प्रतियां, एक उन्हें तथा दूसरी जोसफ मुण्डश्शेरी के लिए दीं। उन्होंने कोविलन को मुण्डश्शेरी का पता बता दिया।
उसी शाम कोविलन मुण्डश्शेरी से मिलने गए। उन्होंने पूछा कि क्या-क्या पढ़ा है? कोविलन ने बता दिया। उन्होंने कहा कि तुम्हें अभी और पढऩा चाहिए।
जोसफ मुण्डश्शेरी खुद कुछ नहीं लिखते थे। वह बोलकर लिखवाते थे। कोविलन उनके कॉपी राइटर हो गए। मुण्डश्शेरी ‘मंगलोदयम्’ पत्रिका निकालते थे। अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित विशेष सामग्री का मलयालम में अनुवाद कर ‘मंगलोदयम्’ में नियमित प्रकाशन किया जाता था। इस कॉलम के लिए अनुवाद भी कोविलन करते थे। मुण्डश्शेरी अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित विशेष सामग्री पर निशान लगाकर कोविलन को दे देते थे।
कोविलन को पंद्रह रुपये महीने मिलते थे। इनसे गुजारा नहीं हो पाता था। कई दिन भूखा रहना पड़ता। इससे वह कमजोर हो गए।
मुण्डश्शेरी के पास काम करने से कोविलन को फायदा यह हुआ कि उनकी वायकोम मुहम्मद बशीर, सी.जे. थामस आदि महत्वपूर्ण रचनाकारों से मुलाकात हुई। उन्हें साहित्य क्या है? कहानी कैसे लिखी जाती है? आदि के बारे में मूलभूत जानकारी मिली। उनका आत्मविश्वास बढ़ा। ‘मंगलोदयम्’ में उनकी कहानियां प्रकाशित हुईं। इन कहानियों का शिल्प नए ढंग का था।
कोविलन ने प्राइवेट परीक्षा देकर सैकेंडरी स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट (एस.एस.एल.सी.) की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। उन्होंने सोचा कि आगे पढऩा चाहिए। वह जोसफ मुण्डश्शेरी से छुट्टी लेकर घर आ गए।
कोविलन ने टीचर ट्रेनिंग कोर्स करने का निश्चय किया। उन्होंने एप्लीकेशन दे दी। उनका सलेक्शन हो गया। यह जून-जुलाई 1948 की बात है। स्कूल त्रिचूर के पास था। कोविलन ने स्कूल जाकर देखा। नोटिस बोर्ड पर उनका भी नाम लिखा था। उन्होंने पिताजी को बताया। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। वेल्लपन ने कहा कि जो चाहे करो, मेरे पास पैसा नहीं है। कोविलन ने गांव के आयुर्वेदिक चिकित्सक से 75 रुपये उधार लिए और त्रिचूर चले गए। वहां जाकर रहने, खाने-पीने का इंतजाम किया। स्कूल गए तो हैरान रह गए। उनका नाम लाल स्याही से कटा हुआ था। उन्होंने आफिस में जाकर इसका कारण पूछा। उन्हें बताया गया कि शिक्षा मंत्री ने आदेश दिया है कि जिनको पढ़ाने का अनुभव नहीं है, वह कोर्स नहीं कर सकते। कोविलन ने सोचा कि शिक्षा मंत्री का कोई भाई-बंध ट्रेनिंग जाना चाहता है। उसे सीट दिलाने के लिए ही उसका नाम काटा गया है। इसके अलावा कोई और कारण नहीं हो सकता।
कोविलन ने 75 रुपये उधार लिए हुए थे। उनके सामने समस्या खड़ी हो गई कि अब क्या करूं? हालांकि आयुर्वेदिक चिकित्सक उन्हें बहुत प्यार करते थे। उन्होंने पैसों के लिए नहीं कहा। कोविलन ने बाद में दो किश्तों में उनके पैसे लौटाए।
वह घर आकर एक छोटा उपन्यास ‘तरवाड़’ लिखने लगे। वेलप्पन की उम्र 70 साल थी। उनके पेट में दर्द रहता था। चैन्ने में उनका ऑप्रेशन करवाया था, लेकिन दर्द ठीक नहीं हुआ। वे लेटे हुए थे। कोविलन उपन्यास की फाइनल कॉपी लिख रहे थे।
वेल्लपन ने पूछा, ”क्या कर रहे हो?”
कोविलन ने जवाब दिया, ”उपन्यास लिख रहा हूं।”
उन्होंने अगला सवाल किया, ”तुम कैसे जिओगे? मुझे बताओ, कैसे जिओगे?”
इस सवाल का जवाब कोविलन के पास नहीं था। वह चुप रहे। उन्होंने पूरा उपन्यास नीचे फेंक दिया। घर के सामने छोटा-सा पहाड़ था। वह उसके ऊपर चले गए। एक पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। उन्होंने तय किया कि पिताजी बूढ़े हो गए हैं। बीमार रहते हैं। एक मिनट भी गवाएं बिना, उनकी सहायता करनी चाहिए।
1948 में कबिलाइयों ने भारत पर आक्रमण किया था। सेना में बड़ी संख्या में जवान भर्ती किए जा रहे थे। कोविलन ऐरनाकुलम् (कोच्ची) जाकर सेना में भर्ती हो गए। वह सिग्नल कोर में गए। ट्रेड टेस्ट हुआ। उनका रेडियो मैकेनिक की ट्रेनिंग के लिए सलेक्शन हो गया। करीब एक साल ट्रेनिंग हुई। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें लखनऊ भेज दिया गया। वहां एक किलोवाट का ट्रांसमीटर था। एक साल बहुत मेहनत की। सारा काम सीख लिया। इस दौरान साहित्य में कुछ नहीं पढ़ा और न ही लिखा। जो पढ़ा, केवल ट्रांसमीटर के बारे में।
लखनऊ से उन्हें ट्रांसमीटर मैकेनिक बनाकर मेरठ भेज दिया। यहां रहते हुए उन्होंने बहुत-सी लघु कहानियां लिखीं। फौजी जीवन से संबंधित सबसे अच्छी कहानियां इसी दौर में लिखीं। जोसफ मुण्डश्शेरी और सी.जे. थामस से पत्र-व्यवहार चलता रहा। सी.जे. थामस कहानियां छपवाने के लिए कई पत्रिकाएं भेजते थे। कोविलन का मूल नाम वट्टमपराम्बिल वेलप्पन अय्यप्पन है। वह अभी तक इसी नाम से लिख रहे थे। सी.जे. थामस ने कहा कि तुम्हारा नाम वी.वी. अय्यप्पन पारंपरिक है। कोई उपनाम रखो। अपनी कहानियां ‘मातृभूमि” के लिए भेजो। कोविलन एक दिन तक इस बारे में सोचते रहे। उन्होंने अपना यह नाम तय किया। कोवलन मलयालम के एक श्रेष्ठ उपन्यास चीलापाडीकर्म* का पात्र है। उन्हें कोवलन बोलने और सुनने में अच्छा नहीं लगा। उन्होंने इसमें थोड़ा परिवर्तन कर कोविलन रख लिया।
वह अपना काम पूरे ध्यान से करते थे। उनके कार्यकाल में कभी ट्रांसमिशन फेल नहीं हुआ। एक ट्रांसमीटर के खराब होने पर दूसरे को चालू कर उसे रिपेयर कर लेते थे। कई लोग उनसे जलते थे। उनकी चुगली करते थे। इससे उन्हें दु:ख होता था। उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता था। इसके चलते उन्हें हवलदार देवदानम् को मारना पड़ा। वह उन्हें बिना मतलब के तंग करता था।
वहां अमेरिकन ट्रांसमीटर लगा था। आजादी से पहले अंग्रेज इसे चलाते थे। एक-दो साल पहले ही भारतीयों को काम सिखाया गया था। वह हवलदार पहले बैच का था, लेकिन काम नहीं जानता था।
कोविलन ने दो-तीन बार हवलदार मेजर से उसकी शिकायत की, ”यदि यह मुझे तंग करेगा तो मैं इसे मारूंगा।”
हवलदार मेजर ने कहा, ”चाहे तुम कुछ भी करो। लेकिन ध्यान रखना कि कोई गवाह न हो। आगे मैं देख लूंगा।”
कोविलन ने हवलदार को ऐसी जगह और ऐसे समय मारा, जब वहां कोई नहीं था। उसने कोविलन की शिकायत कर दी।
हवलदार मेजर ने पूछा, ”मारते हुए किसी ने देखा? कोई गवाह है?”
हवलदार ने कहा, ”नहीं।”
हवलदार मेजर ने जवाब दिया, ”तब मैं कुछ नहीं कर सकता।”
एक दिन कोविलन कपड़े लेने धोबी घाट गए। हवलदार ने देख लिया। उसने कमांडिंग आफिसर से शिकायत कर दी। वह वहां नया-नया आया था और कोविलन के बारे में कुछ नहीं जानता था। असल में धोबी घाट में फौजियों को जाने की मनाही थी। लेकिन सभी फौजी कपड़े लेने के लिए अकसर जाते रहते थे। इसलिए कोविलन भी चले गए। हवलदार को बदला लेने का मौका मिल गया। कमांडिंग आफिसर ने कोविलन को चार्जशीट दे दी। उन्हें सजा मिली।
लखनऊ में कोविलन की कंपनी को पता चला कि उन्हें तंग किया जा रहा है तो उन्हें वापस बुला लिया। किसी ने कोई पूछताछ नहीं की। थोड़े दिन बाद उन्हें रांची भेज दिया गया। वहां वह क्लास-टू मैकेनिक बन गए। वहां ट्रेनिंग करने के बाद उन्हें हेड क्वार्टर आर्मड डिविजन सिग्नल रेजीमेंट में झांसी भेज दिया।
झांसी में मैंटिनेंस सेक्शन में उनकी पोस्टिंग हुई। वह बालीवाल खेलते थे। खेलते हुए उनके पैर में फै्रक्चर हो गया। प्लास्टर हुआ। उन्हें तीन सप्ताह के लिए बैरक में भेज दिया गया। वह हर समय चारपाई पर लेटे रहते। उन्होंने बैरक की लाइफ को अच्छी तरह से देखा। उन्होंने अनुभव किया कि कोई भी व्यक्ति संपूर्ण नहीं है। कुछ-न-कुछ माइनस यानी कोई-न-कोई कमी होती है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने एक साल के अंदर ‘ए माइनस बी’ उपन्यास लिखा।
कोविलन को पैर ठीक होने पर सैकेंड फील्ड आर्टिलरी सिग्नल सेक्शन में भेज दिया गया। वहां रहते हुए उन्हें फौजी अधिकारियों के पारिवारिक जीवन को देखने-समझने का मौका मिला। बहुत-सी त्रासद घटनाएं देखीं। जैसे- उनके साथ बलभद्र प्रसाद काम करता था। वह ईमानदार था। गाड़ी में पेट्रोल भरते वक्त वह धांधली नहीं करता था। आर्टिलरी के लोग पेट्रोल देते समय धांधली करते थे। गलत वाउचर देने के लिए वे बलभद्र प्रसाद को मजबूर करते थे। जाली वाउचरों पर दस्तखत न करने के कारण उन्होंने उसको बहुत मारा-पीटा। बाद में बलभद्र प्रसाद पागल हो गया। आखिर मेडिकल तौर पर अनफिट कहकर उसको फौज से वापस भेज दिया। इन सबके आधार पर उन्होंने ‘एषमेडांगल’ (फौजी पत्नियां) उपन्यास लिखा।
कोविलन का अभी तक का अधिकांश लेखन फौजी जीवन के अनुभवों पर आधारित था। पत्रिकाओं के पत्र वाले स्तंभ में पाठक शिकायत करने लगे कि यह कौन है, जो फौजी-फौजी के बारे में लिखता है। कैसी भाषा लिखता है कि इसमें हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्द भी इस्तेमाल करता है। कोविलन ने तय किया कि अब फौजी जीवन के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा।
सन् 1962 में चीन का आक्रमण हुआ। उस समय कोविलन सेवनटिन माउंटेन डिवीजन की 64वीं ब्रिगेड में थे। उनको भूटान बॉर्डर पर भेजा गया। सिक्किम हिमालय में वह चार साल रहे। वहां कंचनजंगा को नजदीक से देखा। उन्होंने बचपन में पुराणों का अध्ययन किया था। महाभारत और रामायण के बाद कुमारसंभव को भी पढ़ा था। वहां हिमालय के महत्व का वर्णन मिलता है। उस समय उन्हें ये बातें काल्पनिक और बेबुनियाद लगती थीं। कंचनजंगा की पर्वत शृंखलाएं देखीं तो उनका दृष्टिïकोण बदल गया। पुराणों का मोहक प्रकृति वर्णन सही प्रतीत हुआ। कंचनजंगा के सौंदर्य को देखकर वह विस्मय से अभिभूत हो गए। स्नान के बाद आती पार्वती का रूप आंखों के सामने आया तो उन्हें अपनी बेटी की याद आई। बाद में उन्हें गंगटोक-नाथुला जाने का अवसर मिला। उधर के जो अनुभव हुए उन्हें लेकर उन्होंने बाद में दो उपन्यास ‘ताषवराकल’ (घाटियां) और ‘हिमालयम्’ लिखे और फौजी अनुभवों पर न लिखने की उनकी प्रतिज्ञा भंग हो गई।
कोविलन एक साल तक आई.आई.टी. कानपुर परिसर में एन.सी.सी. के इंस्ट्रक्टर रहे। वहां ‘ताषवराकल’ का पहला ड्राफ्ट लिखा। वहां से वह सेवानिवृत हुए। इसके लिए उन्हें सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर भेजा गया। 1 जून, 1968 को वह घर आ गए। घर आकर ‘ताषवराकल’ की प्रेस कॉपी बनाई।
घर आने के बाद उन्होंने ग्रामीण जीवन पर आधारित उपन्यास ‘थोट्टंगल’ लिखा। इस उपन्यास के लिए उन्हें 1972 में केरल साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। बाद में ‘हिमालयम्’ उपन्यास लिखा।
देश में इमरजेंसी लगी। उन्हें एक बड़े कवि ने बताया कि बचकर रहना, हमारे और तुम्हारे पीछे भी पुलिस लगी है।
आई.आई.टी. कानपुर में एन.सी.सी. इंस्ट्रक्टर के रूप में काम करते हुए जो अनुभव हुए थे, उनके आधार पर ‘भरतन’ उपन्यास लिखा। इसका नायक भरतन एक ऐतिहासिक रूपक है, जो स्वातंत्र्योत्तर भारत के सामाजिक, राजनीतिक यथार्थ का चित्रण करता है। यह उपन्यास आपातकाल के दौरान 1976 में प्रकाशित हुआ।
कोविलन के पेट में दर्द हुआ। इसके लिए उन्हें आपे्रशन कराना पड़ा। इन अनुभवों को लेकर उन्होंने ‘जनमंथरंगल’ उपन्यास लिखा। इनके अलावा उन्होंने बहुत-सी कहानियां और उपन्यास लिखे। कोविलन प्रयोगधर्मी लेखक हैं। उन्होंने किसी मॉडल का अनुकरण नहीं किया। चाहे वह दूसरों द्वारा स्थापित हो या अपने द्वारा। इस रचनात्मक अनुशासन के कारण उनका लेखन अद्वितीय है।
उनकी 26 से अधिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें दस कहानी संग्रह, बारह उपन्यास, एक नाटक और तीन विविध लेखन से संबंधित कृतियां शामिल हैं। उनके उपन्यास ‘तोट्टंगल’ पर आधारित धारावाहिक केरल दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। कुछ कहानियां भी छोटे परदे के लिए रूपांतरित की गईं।
कोविलन का कहना था कि जीवन में जो कटु अनुभव हुए, उनसे मन थका नहीं। मुसीबतों का मुकाबला करना था। मेरे जीवन को उन कष्टदायक अनुभवों ने बर्बाद नहीं किया। बाद में मैंने उन पर बहुत सोच-विचार किया। वे मेरे लिए मार्गदर्शक बन गए। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए इससे ही मुझे प्रेरणा मिली।

साहित्य अकादेमी का कारपोरेटाइजेशन

केंद्रीय साहित्य अकादेमी और कोरिया की मल्टीनेशनल कंपनी सैंमसंग इंडिया के बीच हुई जुगलबंदी से लेखकों में आक्रोश है। अकादेमी साहित्य का गठन 12 मार्च, 1954 को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। अकादेमी के इतिहास में पहली बार कोई मल्टीनेशनल कंपनी पुरस्कार प्रायोजित कर रही है। सैंमसंग इंडिया ने आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को पुरस्कार देने की घोषणा की है। प्रत्येक वर्ष आठ भारतीय भाषाओं को चुना जाएगा। इस तरह से प्रत्येक भाषा का तीन साल बाद नंबर आएगा। इस वर्ष बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु और बोडो भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा रहा है। पुरस्कार कोरियाकी प्रथम महिला द्वारा पंच सितारा होटल ओबेराय में 25 जनवरी को दिया जाएगा। यह पुरस्कार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में दिया जा रहा है। आयोजन साहित्य अकादेमी के बैनर के नीचे हो रहा है, यही विवाद की जड़ है। कई लेखकों ने समारोह के बहिष्कार का मन बना लिया है। उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक भी हैं। सुप्रसद्धि साहित्यकार नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडेय, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी आदि इस पुरस्कार का विरोध कर चुके हैं। Read more