
कथाकार प्रकाश मनु को उनके उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्य अकादेमी का हिंदी के लिए पहला बाल साहित्य पुरस्कार दिया जाएगा। उन्हें यह पुरस्कार 14 नवंबर को प्रदान किया जाएगा। उनसे युवा कथाकार उमेश कुमार की बातचीत के अंश-
चलिए, बचपन से ही शुरुआत करते हैं। आप अपने जन्म और प्रांरभिक तथा उच्च शिक्षा के बारे में कुछ बताएं? और यह भी बताएं कि जिंदगी के अब तक के सफर में आपने क्या खोया, क्या पाया?
मेरा जन्म शिकोहाबाद में हुआ। यह उत्तर प्रदेश में है, फिरोजाबाद के एकदम नजदीक। पहले शिकोहाबाद मैनपुरी जिले में आता था, आजकल फिरोजाबाद जिले में है। वही फिरोजाबाद जहां घर-घर चूडिय़ां बनती हैं और इसीलिए ‘सुहागनगरी’ भी जिसे बोलते हैं। शिकोहाबाद में बल्बों की बड़ी फैक्टरी है, जिसमें फिलिप्स, बजाज समेत बड़ी-बड़ी कंपनियों के बल्ब बनते हैं। इसके बावजूद शिकोहाबाद एकदम कस्बाई शहर है। जिसमें शहराती संस्कृति और गंवाई संस्कृति साथ-साथ चलती हैं।
गंवई संस्कृति के बावजूद शिकोहाबाद की प्रसिद्धि शुरू से इस रूप में रही कि वह शिक्षा में बहुत बढ़ा-चढ़ा शहर है। फिर मैं तो शायद किताबी कीड़ा ही था और बचपन से इस कदर पढऩे-लिखने का चस्का था कि अगर खाने-पीने का सामान लिफाफे या पुडिय़ा में आया तो उसे भी खोलकर पढ़ता था कि देखें, इसमें क्या लिखा है? और आज साठ वर्ष पूरे कर लेने पर भी वह नशा कहिए या पागलपन कहिए जरा भी कम नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी मैं दोस्तों से कहा करता हूं कि पढ़ते-पढ़ते मेरे प्राण निकल जाएं, इससे बेहतर मृत्यु की कल्पना मैं नहीं कर पाता। बचपन में पढ़ाई-लिखाई में काफी अच्छा था। इसीलिए घर वालों का सपना था कि मैं पढ़-लिखकर इंजीनियर बनूं। मेरे बड़े भाई साहब बल्बों की फैक्टरी हिंदी लैंप्स में बड़े पद पर थे। इंजीनियर थे। इसीलिए यह रास्ता मेरे लिए शायद सुगम होता। मां-बाप का भी यही सपना था। हैरानी की बात यह है कि माता-पिता एकदम अनपढ़ थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने में उनका उत्साह अनथक था।
बारहवीं के बाद इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। पर मैंने बहाना बनाया कि मुझे तो इलेक्ट्रोनिक्स चाहिए, जबकि यहां मुझे इलेक्ट्रिकल मिल रहा है तो मैं नहीं जाऊंगा। इसलिए कि इंजीनियर नहीं बनना चाहता था। मेरे भाई साहब इंजीनियर थे तो हमेशा बढिय़ा पेंट-कोट क्रीज में रहते थे। मुझे यह नागवार लगता था। मुझे ढीला-ढाला रहना पसंद था। तो सोचा प्रोफेसर हो जाऊंगा। प्रोफेसर तो ढीले-ढाले भी बढिय़ा लगते हैं। लेकिन फिर एम.एस-सी तक आते-आते लगा मेरा रास्ता तो कुछ और है। फिर हिंदी से एम.ए., पी.एच.डी। घर वाले कह रहे थे कि क्या पागल हो गए हो, हिंदी से एम.ए. क्यों करना चाहते हो? पर मैंने घर में अनशन किया। मां मेरे साथ थीं। और तब से जो रास्ता पाया आज भी दीवानों की तरह उसी रास्ते पर चला चल रहा हूं। शुरू के कुछ वर्ष प्राध्यापिकी में बीते फिर कोई तीन दशक पत्रकारिता में। लेकिन मेरे लिए तो जिंदगी का मतलब था लिखन…लिखना और बस लिखना। या कहिए पढऩा और लिखना। इसमें क्या पाया, क्या खोया इस बारे में मैंने कभी ज्यादा नहीं सोचा।
लेखन के प्रति कब और कैसे रुझान हुआ? शुरू में किस तरह की चीजें आपने लिखीं?
बहुत छुटपन में मां जो कहानियां सुनाया करती थीं उनका मन पर बड़ा गहरा अक्स पड़ता था। कहीं न कहीं मन में लिखने का पहला बीज शायद तभी पड़ा होगा। फिर बड़ा हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में शामिल कविता, कहानियां ऐसी थीं जिनसे साहित्य की दुनिया का प्रथम द्वार खुला। उन दिनों हमारे यहां हिंदी की एक बड़ी अच्छी सहायक पुस्तक थी ‘भाषा भास्कर’ जिसे हमारे यहां के हिंदी के बड़े ही अनुरागी अध्यापक ने लिखा था। शास्त्री जी करके हम उन्हें जानते थे। उस पुस्तक में मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, प्रसाद, पंत, निराला की ऐसी सुंदर कविताएं उद्धृत की गई थीं कि मुझे याद है सुबह-सुबह उठकर मैं उन्हें दोहाराता था तो मन आनंद से भर उठता था। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ की ये पंक्तियां जिनमें कैकेई के पश्चात्ताप की गहरी छाया है, ‘यह सच है तो अब लौट चलो घर भैया, अपराधिन मैं हूं तात तुम्हारी मैया…!’ सबसे पहले इसी पुस्तक में पढऩे को मिलीं। और ये आज तक मुझे विचलित करती हैं। बालकृष्ण शर्मा नवीन की ‘लपक चाटते झूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को, उस दिन सोचा क्यों न लगा दूं, आज आग इस दुनिया भर को’ जैसी पंक्तियां पहले-पहल तभी पढऩे को मिलीं। और मुझे लगा कि साहित्य तो बहुत बड़ी चीज है। वह दिलों को मथ डालता है और हमारी सोच और व्यक्तित्व बदल सकता है। बस, तभी थोड़ा-थोड़ा लिखना शुरू हुआ। चीनी हमले के विरोध में कुछ पंक्तियां लिखी थीं, लेकिन कुछ आगे चलकर एक मजदूर कि जिंदगी या भिखारिन की दिवाली पर लिखी गई कविताएं शायद कुछ बेहतर थीं। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे बढ़ता गया, लिखने की नई-नई दिशाएं और रास्ते मिलते गए। शुरुआत कविताओं से ही हुई। मुक्त छंद कविताओं से। फिर कुछ गीत-मुक्तक लिखे गए, कहानियां लिखी गईं। लेकिन असली बदलाव आया जब मैंने मुक्तिबोध, रघुबीर सहाय और बाद के कवियों को पढ़ा तो लगा कि हां, अब रास्ता साफ हो रहा है। अब शायद मैं कुछ-कुछ समझ पा रहा हूं कि मुझे क्या लिखना है, किसके लिए लिखना और वह भीतर की कैसी तड़प है जो शब्दों में उतरना चाहती है? फिर तो कविताओं के साथ-साथ कहानियां और गद्य भी काफी लिखा गया। ‘यह जो दिल्ली’, ‘कथा-सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ सरीखे उपन्यास सामने आए। और अभी बहुत कुछ है जो भीतर चल रहा है। कह नहीं सकता कि वह कब किस शक्ल में सामने आए? बच्चों के लिए भी अभी बहुत कुछ लिखने का मन है। देखिए, कब हो पाता है।

प्रकाश मनु पत्नी डॉक्टर सुनीता के साथ
मूल नाम बदलकर आप प्रकाश मनु कब हुए? और इसकी जरूरत क्यों महसूस की आपने?
मेरा पारिवारिक नाम है चंद्रप्रकाश विग। पर मुझे यह शुरू से ही ज्यादा पसंद नहीं है। मुझे लगता था चंद्रप्रकाश विग तो कोई दुनियादार आदमी हो सकता है, जो पढ़-लिख के अच्छे नंबर लाता है, नौकरी करता है या दो-चार पैसे कमाता है। लेकिन मेरे भीतर जो लिखने वाला शख्स है, वह चंद्रप्रकाश विग नहीं हो सकता। क्योंकि वह थोड़ा अलग और काफी गैर-दुनियादार किस्म का व्यक्ति है। तो शुरू से ही इस नाम को बदलने की कोशिशों में जुट गया। शुरू में जब मजदूरों के दर्द और शोषण की विद्रोही कविताएं ज्यादा लिख रहा था, तो मन में जाने कैसे ‘रुद्र’ की इमेज आई और मैं चंद्रप्रकाश विग से चंद्रप्रकाश रुद्र हो गया। कई वर्षों तक चंद्रप्रकाश रुद्र ही रहा। मेरी कई कविताएं इस नाम से छपीं। और एक संपादित पुस्तक ‘रोशनी के बीज’ जिसमे कुछ नए उभरते कवियों के साथ-साथ रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज कवियों की कविताएं भी थीं। बाद में जब रिसर्च के सिलसिले में कुरुक्षेत्र गया तो लिखने का मिजाज थोड़ा बदला, मेरा अपना मन भी। जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का मन पर गहरा असर था। तो उनके उथल-पुथल और द्वंद्व भरे नायक मनु में मुझे कुछ ऐसा नजर आया जो काफी कुछ मेरे जैसा था। मनु में सृष्टि के द्वंद्व की पीड़ा थी और अच्छे और बुरे का संगम भी। मनु मानो हर मनुष्य का रुपक है, जिसमें उसकी अच्छाइयों और बुराइयों में एक महाभारत निरंतर चलता है। मुझे यह मनु भा गया। और फिर चंद्रप्रकाश रुद्र का रुद्र गायब हुआ तो चंद्र भी हट गया। और मैं प्रकाश मनु हो गया। मुझे लगता था बहुत बड़े नाम की बजाय एक छोटा सा नाम अच्छा है। इसीलिए शायद मुझे प्रकाश मनु अच्छा लगा होगा। और आज तो मूल नाम की बजाय इसी नाम से पुकारा जाना मुझे अच्छा लगता है।
बचपन की कोई खट्ठी-मीठी याद?
बहुत सी यादें हैं, पर उनमें एक ऐसी है कि उसे आज तक भुला नहीं पाया। हुआ यह कि कक्षा नौ में हमें अंग्रेजी पढ़ाते थे राजनाथ सारस्वत। वे कैसे थे, यह बताना मुश्किल है। बस इतना बता सकता हूं कि उनके आगे अपने को अच्छे-अच्छे खां समझने वाले दादा किस्म के लड़के भी थर्राया करते थे। वे कक्षा में जिन बच्चों को बहुत प्यार करते थे और योग्य समझते थे, उनमें मैं भी था। पर एक बार मैं भी उनके गुस्से की चपेट में आ गया। हुआ यह कि एक बार उन्होंने कुछ होमवर्क दिया था। बीच में लंबी छुट्टियां आ गईं, तो उसे पूरा करना मुझे याद नहीं रहा। और सच तो यह है कि क्लास में किसी को वह याद नहीं रहा। उन्होंने पूरी क्लास को मुर्गा बनने की सजा दे दी। सारे मुर्गा बन गए, पर मैं नहीं बना। मेरा कहना था कि आप मुझे जितना भी चाहें मार लीजिए, पर मुर्गा मैं नहीं बनूंगा। इस हुक्मउदूली से वे कितना तिलमिलाए होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। गुस्से में उन्होंने कहा कि अगर मेरा कहना नहीं मानते हो, तो क्लास से निकल जाओ। पर मैं इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ। उनके दो पीरियड पड़ते थे और दोनों पीरियड में उस दिन पढ़ाई नहीं हुई। बस यही नाटक चलता रहा। और मैं न मुर्गा बना न क्लास से बाहर जाने के लिए तैयार हुआ। आखिर में उन्होंने कहा कि अच्छा, अगर सभी विद्यार्थी कह दें कि विग को छोड़ दो तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। उनका यह कहते ही एक साथ पुकार उठी, ”छोड़ दीजिए सर, छोड़ दीजिए!’’ और तब मैं छूटा। उस दिन की मेरी खुशी और रोमांच की आप कल्पना नहीं कर सकते। मैं मानो आकाश में सैर कर रहा था और लग रहा था कि मैं तो अर्जुन हूं, जिसने महाभारत जीत लिया है। आज भी इस घटना को याद करता हूं, तो मैं खुशी और रोमांच से भर जाता हूं।
आपने बड़ों के लिए काफी महत्वपूर्ण रचनाएं दी हैं। आपके ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा-सकर्स’ और ‘पापा के जाने के बाद’ उपन्यास बहुत प्रसिद्ध हुए। इसके बावजूद आपका रुझान बाल साहित्य की तरफ ज्यादा दिखाई देता है। ऐसा क्यों?
इसका श्रेय तो सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका को ही जाता है। नंदन में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तब ही जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। और बाल साहित्य में अलग-अलग विधाओं की मेरी कोई पचास किताबें, जिनमें बच्चों के लिए लिखे गए उपन्यास, कविता-कहानियां और ज्ञान-विज्ञान की कहानियां भी हैं। मेरी कोशिश तो यही रही कि बच्चों के लिए जो भी लिखा जाए फिर चाहे वह ज्ञान-विज्ञान का साहित्य ही क्यों न हो, बड़ा रोचक और रसपूर्ण हो। इसी तरह कई वर्षों की मेहनत से हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखा। और अब समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लगभग पूरा हो चुका है। जो जल्दी ही आपको पढ़ने को मिलेगा।
आपने बच्चों के लिए प्रचुर मात्रा में लिखा है। हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में आपको क्या कहना है। क्या आप इस स्थिति से संतुष्ट है?
हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ बेहद साधारण रचनाओं का बड़ा ढेर है, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएं भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। सर्वेश्वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएं लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्व कविता में पांक्तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्र कुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी रोचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से दिग्गज कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि उस पर आप दया दिखाएं।

प्रकाश मनु साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी के साथ
बच्चों के लिए लिखते समय किन बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए?
मेरे खयाल से बच्चों के लिए लिखते समय बस एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम जो कुछ लिखें, बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं। एक लंबे अरसे से बच्चों के लिए लिखते हुए और ‘नंदन’ पत्रिका में कोई ढाई दशक गुजारने के बाद जो बात मैं समझ पाया, वह यह कि बच्चे उपदेशों से घृणा करते हैं। लिहाजा आप बच्चों के लिए जो कुछ भी लिखना चाहें या उन्हें कुछ भी बताना चाहें, अगर आप खेल-खेल में उन्हें नहीं बता पाते, तो वह निरर्थक और बेकार है। इसी तरह लीक पीटते रहने की बजाय कुछ नया लिखें, तो वही सार्थक है। इसके लिए ज्यादा अच्छा है कि अपने बचपन की दुनिया में जाएं। वहाँ हमेशा एक जादुई दुनिया आपका इंतजार कर रही होती है, जहां बहुत कुछ नया, हैरतअंगेज पर साथ ही साथ मानीखेज भी है।
भारतीय भाषाओं विशेष तौर से हिंदी में श्रेष्ठ बाल साहित्य का अभाव दिखाई देता है। ऐसा क्यों?
भाई, इस सवाल का जवाब मैं दे चुका हूँ। कम से कम हिंदी में मैं कह सकता हूं कि यहां अच्छे बाल साहित्य का कतई अभाव नहीं है। हाँ, उसके बारे में एक तो लोगों को पता कम है, फिर वह बच्चों तक उतना अधिक नहीं पहुंच पा रहा, जितना पहुंचना चाहिए था। यह मैं मानता हूं। इसके पीछे प्रकाशकों का रवैया भी जिम्मेदार है, जिन्हें अच्छे बाल साहित्य की समझ नहीं है और वे अच्छा-बुरा कुछ भी अंधाधुंध छापे जा रहे हैं और उसके प्रचार-प्रसार पर कानी कौड़ी भी खर्च नहीं करते। फिर हमारे मीडिया का रवैया भी कम दोषी नहीं है, जिसके कारण बाल साहित्य की अच्छी किताबों की चर्चा नहीं हो पाती। उनकी समीक्षा वगैरह का कोई मंच तो है ही नहीं। तो लोगों को पता कैसे लगेगा कि अच्छा क्या लिखा जा रहा है? इस चक्कर में अच्छा और बुरा गड्डमड्ड हो रहा है और लोग बगैर सोचे, बगैर पढ़े बाल साहित्य के बारे में कुछ फतवा जारी करने के गोरखधंधे में लगे हैं।
आप लंबे समय तक बच्चों की पत्रिका से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों की रुचि में किस तरह का बदलाव आ रहा है?
सबसे पहली बात तो यह कि आज का बच्चा पहले की तुलना में कहीं अधिक सचेत बच्चा है। पहले बच्चों में जो इनोसेंस या अबोधता थी, इधर के बच्चे में वह थोड़ी कम है, पर उसमें आसपास की दुनिया को देखने और सोचने-समझने की दृष्टि कहीं अधिक विकसित है। इस कारण बच्चा ऐसी चीजों में अधिक रुचि लेता है, जिसमें मनोरंजक ढंग से अच्छी और उपयोगी जानकारी दी गई हो। इसी तरह राजा-रानी की कोरी कल्पना की कहानियों की बजाय आज के बच्चे को ऐसी कहानियाँ कहीं अधिक रुचती हैं जिनमें उस जैसा ही कोई छोटा बच्चा केंद्र में हो और उसकी किसी छोटी-बड़ी मुश्किल पर कहानी गढ़ी गई हो। हाँ, कुछ लोग कहते हैं कि आज के बच्चे की दुनिया बदल गई है, इसलिए उसे फंतासी या परीकथाएं नहीं, सिर्फ यथार्थ की कहानियाँ देनी चाहिए पढऩे को। पर मेरा अनुभव है कि बच्चे को जादू या फंतासी अच्छी लगती है और किसी भी विषय पर लिखी गई ऐसी जादुई कहानियाँ, जो खुद में एक नया और ताजा विचार भी लिए हों, बच्चे को बहुत लुभाती हैं। उससे उसे रिलीफ भी मिलता है और अपनी समस्या से निकलने का रास्ता भी। हालांकि बच्चों के लिए यथार्थ पर कहानियां भी जरूर लिखी जानी चाहिए, पर वे सार्थक तभी होंगी जब उनमें किस्सागोई और कथा-रस हो।
अकसर कहा जाता है कि इस तकनीकी युग में बचपन खो सा गया है। बच्चा जन्म लेते ही जल्दी से जल्दी प्रौढ़ हो जाना चाहता है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?
हाँ, यह बात तो ठीक है कि आज का बच्चा जल्दी से जल्दी प्रौढ़ बन रहा है और बचपन खो सा गया है। पर बच्चा प्रौढ़ बनना नहीं चाहता, बच्चे को प्रौढ़ बनाया जा रहा है। कहना चाहिए कि उससे जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टंगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके उसका बचपन उससे छीना जा रहा है। बल्कि सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। इसकी क्या सजा हो, मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता, पर यह बेशक बहुत बड़ा और अक्षम्य गुनाह है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएं पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं कांप उठता हूं।
आप अपनी जो आत्मकथा लिख रहे हैं, उसके कुछ अंश पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। लगता है, आत्मकथा में आप शिक्षा जगत और बचपन को विशेष तौर से फोकस कर रहे हैं। इसकी कोई खास वजह?
कोई खास वजह नहीं, सिवाय इसके कि हर शख्स की तरह मुझे भी अपना बचपन खासा फेसिनेट करता है। जब-जब मुश्किलों में पड़ता हूं, आहत और कमजोर महसूस करता हूं, तो जिन चीजों से मुझे ताकत मिलती है, उनमें बचपन भी है जो एक साथ जादुई रहस्यों और बड़ी संभावनाओं से भरा है। मैं जब बड़े लेखकों से मिलता हूं या उनकी रचनाओं के निकट जाता हूं तो मुझे गंगास्नान की अनुभूति होती है। इसी तरह जब बचपन की दुनिया में झांकता और गोते लगाता हूं, तब भी मुझे गंगास्नान की ही अनुभूति होती है। वैसे आत्मकथा में बचपन पर इतना फोकस क्यों है, इसका भी एक रोचक किस्सा है। हुआ यह कि एक वरिष्ठ लेखक जो मेरे परिवार की व्यावसायिक पृष्ठभूमि से भी परिचित थे, एक बार मिले तो उन्होंने एक सवाल पूछ लिया। वह सवाल यह था कि भई प्रकाश मनु, तुम ऐसे परिवार में जन्म लेकर लेखक कैसे हो गए? सवाल सुनकर मैं बड़ी देर तक चुप रहा। फिर कहा, इसका जवाब तो बड़ा लंबा हो जाएगा। और सच पूछिए, तो यह आत्मकथा उन लेखक मित्र के उसी सवाल का लंबा जवाब है। और चूंकि मेरे लेखक होने के रहस्य की कुंजी शायद मेरे लज्जालु और आत्मलीन बचपन में ही कहीं छिपी है, इसलिए आत्मकथा में भी उसी पर फोकस है। इसी तरह बचपन से ही घोर पढ़ाकू रहा और शायद अब भी हूँ। पहले साइंस से और फिर हिंदी से मास्टर की डिग्री लेने के अलावा पी-एचडी भी की। तो शिक्षा जगत से गहरा वास्ता तो होना ही था। बाद में प्राध्यापक होने पर पढ़ाया भी। तो इस सब के रिफ्लेक्स आत्मकथा में हैं। हां, जीवन का एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता करते बीता, तो उसकी छायाएँ भी जगह-जगह इस आत्मकथा में पडऩी ही थीं और वे पड़ीं। पर यह प्रसंग यहां रहने ही दें, तो बेहतर है। क्योंकि पत्रकारिता में जो कुछ आज देखता हूं, उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो मुझे बहुत दुखी और संतप्त करता है।
हाल ही में आपके ‘ठुनठुनिया’ बाल उपन्यास को साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है, इस बारे में आपकी प्रतिक्रिया क्या है।
मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या कहूं? हां, अच्छा तो लगा ही, बल्कि कहना चाहिए कि एक सुखद आश्चर्य सा हुआ। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें, उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हां, आसपास के कुछ बच्चे हैं, जो कभी-कभी मेरी किताबें पढऩे के लिए ले जाते हैं। उनमें से एक बच्चा यह उपन्यास भी ले गया। जब वह इसे लौटाने के लिए आया, तो उसकी उत्साह से भरी लेकिन टूटी-बिखरी सी प्रतिक्रिया और आंखों में चमक, यही बस मुझे याद रह गई। …मोटे तौर से बच्चों के लिए लिखने वाला कोई भी लेखक वर्तमान अनुत्साही माहौल में ऐसी ही दो-चार निधियां संभालकर रख लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। पर उस उपन्यास में कुछ है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और उस पर लोगों का ध्यान गया, इससे खुशी तो होती ही है। पर मेरा कहना है कि हिंदी में बच्चों के लिए लिखी गई एक से एक अच्छी, सार्थक और बड़ी रचनाएं हैं, जिन्हें सामान्य रचनाओं की एक बड़ी भीड़ से अलगाना जरूरी है। इस पुरस्कार के साथ-साथ अच्छे आलोचना ग्रंथों से यह काम हो सकता है और होना चाहिए। इसके बाद शायद हिंदी बाल साहित्य के आगे जो भ्रम का अंधेरा है, वह छंटे और बाल साहित्य की सही तस्वीर लोगों के सामने आए। फिर बाल साहित्य का महत्व समझ में आएगा, तो उसे बच्चों के नजदीक ले जाने की जिम्मेदारी भी लोग समझेंगे।
आपका बाल उपन्यास ‘ठुनठुनिया’ का जो पात्र है वह बड़ा ही मजेदार है। उसके बारे में कुछ बताएं?
आपने ठीक कहा, ठुनठुनिया वाकई बड़ा मजेदार पात्र है और कहना चाहिए कि मुझे भी बहुत पसंद है। इसलिए कि उसका परिवेश थोड़ा गंवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ है। लेकिन वह परिस्थितियों से हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हंसी की फुरफुरिया फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में वह हार नहीं मानता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे नहीं सही मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आंखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा इसलिए उसकी पढ़ाई बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिल को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है इसीलिए चाहे गरीब खिलौने वाला, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला या फिर गांव का जमींदार हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की मां तो इतनी ग्रेट लेडी है और अपने बच्चे पर इस तरह प्यार निसार करती है कि कहना होगा कि वह बड़ी गरीब लेकिन ग्रेट मां है। इसी मां का प्यार यहां-वहां भटकने के बाद उस घर खींच लाता है। वह जिंदगी में आगे बढ़ता है मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भूत दुनिया रच डालता है। जिसमें कला-संगीत, नाटक और हंसी खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूं तो मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।



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