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बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं: प्रकाश मनु

कथाकार प्रकाश मनु को उनके उपन्‍यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्‍य अकादेमी का हिंदी के लि‍ए पहला बाल साहित्‍य पुरस्‍कार दिया जाएगा। उन्‍हें यह पुरस्‍कार 14 नवंबर को प्रदान किया जाएगा। उनसे युवा कथाकार उमेश कुमार की बातचीत के अंश-

चलिए, बचपन से ही शुरुआत करते हैं। आप अपने जन्म और प्रांरभिक तथा उच्च शिक्षा के बारे में कुछ बताएं? और यह भी बताएं कि जिंदगी के अब तक के सफर में आपने क्या खोया, क्या पाया?

मेरा जन्म शिकोहाबाद में हुआ। यह उत्तर प्रदेश में है, फिरोजाबाद के एकदम नजदीक। पहले शिकोहाबाद मैनपुरी जिले में आता था, आजकल फिरोजाबाद जिले में है। वही फिरोजाबाद जहां घर-घर चूडिय़ां बनती हैं और इसीलिए ‘सुहागनगरी’ भी जिसे बोलते हैं। शिकोहाबाद में बल्बों की बड़ी फैक्टरी है, जिसमें फिलिप्स, बजाज समेत बड़ी-बड़ी कंपनियों के बल्ब बनते हैं। इसके बावजूद शिकोहाबाद एकदम कस्बाई शहर है। जिसमें शहराती संस्कृति और गंवाई संस्कृति साथ-साथ चलती हैं।

गंवई संस्कृति के बावजूद शिकोहाबाद की प्रसिद्धि शुरू से इस रूप में रही कि वह शिक्षा में बहुत बढ़ा-चढ़ा शहर है। फिर मैं तो शायद किताबी कीड़ा ही था और बचपन से इस कदर पढऩे-लिखने का चस्का था कि अगर खाने-पीने का सामान लिफाफे या पुडिय़ा में आया तो उसे भी खोलकर पढ़ता था कि देखें, इसमें क्या लिखा है? और आज साठ वर्ष पूरे कर लेने पर भी वह नशा कहिए या पागलपन कहिए जरा भी कम नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी मैं दोस्तों से कहा करता हूं कि पढ़ते-पढ़ते मेरे प्राण निकल जाएं, इससे बेहतर मृत्यु की कल्पना मैं नहीं कर पाता। बचपन में पढ़ाई-लिखाई में काफी अच्छा था। इसीलिए घर वालों का सपना था कि मैं पढ़-लिखकर इंजीनियर बनूं। मेरे बड़े भाई साहब बल्बों की फैक्टरी हिंदी लैंप्स में बड़े पद पर थे। इंजीनियर थे। इसीलिए यह रास्ता मेरे लिए शायद सुगम होता। मां-बाप का भी यही सपना था। हैरानी की बात यह है कि माता-पिता एकदम अनपढ़ थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने में उनका उत्साह अनथक था।

बारहवीं के बाद इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। पर मैंने बहाना बनाया कि मुझे तो इलेक्ट्रोनिक्स चाहिए, जबकि यहां मुझे इलेक्ट्रिकल मिल रहा है तो मैं नहीं जाऊंगा। इसलिए कि इंजीनियर नहीं बनना चाहता था। मेरे भाई साहब इंजीनियर थे तो हमेशा बढिय़ा पेंट-कोट क्रीज में रहते थे। मुझे यह नागवार लगता था। मुझे ढीला-ढाला रहना पसंद था। तो सोचा प्रोफेसर हो जाऊंगा। प्रोफेसर तो ढीले-ढाले भी बढिय़ा लगते हैं। लेकिन फिर एम.एस-सी तक आते-आते लगा मेरा रास्ता तो कुछ और है। फिर हिंदी से एम.ए., पी.एच.डी। घर वाले कह रहे थे कि क्या पागल हो गए हो, हिंदी से एम.ए. क्यों करना चाहते हो? पर मैंने घर में अनशन किया। मां मेरे साथ थीं। और तब से जो रास्ता पाया आज भी दीवानों की तरह उसी रास्ते पर चला चल रहा हूं। शुरू के कुछ वर्ष प्राध्यापिकी में बीते फिर कोई तीन दशक पत्रकारिता में। लेकिन मेरे लिए तो जिंदगी का मतलब था लिखन…लिखना और बस लिखना। या कहिए पढऩा और लिखना। इसमें क्या पाया, क्या खोया इस बारे में मैंने कभी ज्यादा नहीं सोचा।

लेखन के प्रति कब और कैसे रुझान हुआ? शुरू में किस तरह की चीजें आपने लिखीं?

बहुत छुटपन में मां जो कहानियां सुनाया करती थीं उनका मन पर बड़ा गहरा अक्स पड़ता था। कहीं न कहीं मन में लिखने का पहला बीज शायद तभी पड़ा होगा। फिर बड़ा हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में शामिल कविता, कहानियां ऐसी थीं जिनसे साहित्य की दुनिया का प्रथम द्वार खुला। उन दिनों हमारे यहां हिंदी की एक बड़ी अच्छी सहायक पुस्तक थी ‘भाषा भास्कर’ जिसे हमारे यहां के हिंदी के बड़े ही अनुरागी अध्यापक ने लिखा था। शास्त्री जी करके हम उन्हें जानते थे। उस पुस्तक में मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, प्रसाद, पंत, निराला की ऐसी सुंदर कविताएं उद्धृत की गई थीं कि मुझे याद है सुबह-सुबह उठकर मैं उन्हें दोहाराता था  तो मन आनंद से भर उठता था। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ की ये पंक्तियां जिनमें कैकेई के पश्‍चात्ताप की गहरी छाया है, ‘यह सच है तो अब लौट चलो घर भैया, अपराधिन मैं हूं तात तुम्हारी मैया…!’ सबसे पहले इसी पुस्तक में पढऩे को मिलीं। और ये आज तक मुझे विचलित करती हैं। बालकृष्ण शर्मा नवीन की ‘लपक चाटते झूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को, उस दिन सोचा क्यों न लगा दूं, आज आग इस दुनिया भर को’ जैसी पंक्तियां पहले-पहल तभी पढऩे को मिलीं। और मुझे लगा कि साहित्य तो बहुत बड़ी चीज है। वह दिलों को मथ डालता है और हमारी सोच और व्यक्तित्व बदल सकता है। बस, तभी थोड़ा-थोड़ा लिखना शुरू हुआ। चीनी हमले के विरोध में कुछ पंक्तियां लिखी थीं, लेकिन कुछ आगे चलकर एक मजदूर कि जिंदगी या भिखारिन की दिवाली पर लिखी गई कविताएं शायद कुछ बेहतर थीं। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे बढ़ता गया, लिखने की नई-नई दिशाएं और रास्ते मिलते गए। शुरुआत कविताओं से ही हुई। मुक्त छंद कविताओं से। फिर कुछ गीत-मुक्तक लिखे गए, कहानियां लिखी गईं। लेकिन असली बदलाव आया जब मैंने मुक्तिबोध, रघुबीर सहाय और बाद के कवियों को पढ़ा तो लगा कि हां, अब रास्ता साफ हो रहा है। अब शायद मैं कुछ-कुछ समझ पा रहा हूं कि मुझे क्या लिखना है, किसके लिए लिखना और वह भीतर की कैसी तड़प है जो शब्दों में उतरना चाहती है? फिर तो कविताओं के साथ-साथ कहानियां और गद्य भी काफी लिखा गया। ‘यह जो दिल्ली’, ‘कथा-सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ सरीखे उपन्यास सामने आए। और अभी बहुत कुछ है जो भीतर चल रहा है। कह नहीं सकता कि वह कब किस शक्ल में सामने आए? बच्चों के लिए भी अभी बहुत कुछ लिखने का मन है। देखिए, कब हो पाता है।

प्रकाश मनु पत्नी डॉक्टर सुनीता के साथ

मूल नाम बदलकर आप प्रकाश मनु कब हुए? और इसकी जरूरत क्यों महसूस की आपने?

मेरा पारिवारिक नाम है चंद्रप्रकाश विग। पर मुझे यह शुरू से ही ज्यादा पसंद नहीं है। मुझे लगता था चंद्रप्रकाश विग तो कोई दुनियादार आदमी हो सकता है, जो पढ़-लिख के अच्छे नंबर लाता है, नौकरी करता है या दो-चार पैसे कमाता है। लेकिन मेरे भीतर जो लिखने वाला शख्स है, वह चंद्रप्रकाश विग नहीं हो सकता। क्योंकि वह थोड़ा अलग और काफी गैर-दुनियादार किस्म का व्यक्ति है। तो शुरू से ही इस नाम को बदलने की कोशिशों में जुट गया। शुरू में जब मजदूरों के दर्द और शोषण की विद्रोही कविताएं ज्यादा लिख रहा था, तो मन में जाने कैसे ‘रुद्र’ की इमेज आई और मैं चंद्रप्रकाश विग से चंद्रप्रकाश रुद्र हो गया। कई वर्षों तक चंद्रप्रकाश रुद्र ही रहा। मेरी कई कविताएं इस नाम से छपीं। और एक संपादित पुस्तक ‘रोशनी के बीज’ जिसमे कुछ नए उभरते कवियों के साथ-साथ रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज कवियों की कविताएं भी थीं। बाद में जब रिसर्च के सिलसिले में कुरुक्षेत्र गया तो लिखने का मिजाज थोड़ा बदला, मेरा अपना मन भी। जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का मन पर गहरा असर था। तो उनके उथल-पुथल और द्वंद्व भरे नायक मनु में मुझे कुछ ऐसा नजर आया जो काफी कुछ मेरे जैसा था। मनु में सृष्टि के द्वंद्व की पीड़ा थी और अच्छे और बुरे का संगम भी। मनु मानो हर मनुष्य का रुपक है, जिसमें उसकी अच्छाइयों और बुराइयों में एक महाभारत निरंतर चलता है। मुझे यह मनु भा गया। और फिर चंद्रप्रकाश रुद्र का रुद्र गायब हुआ तो चंद्र भी हट गया। और मैं प्रकाश मनु हो गया। मुझे लगता था बहुत बड़े नाम की बजाय एक छोटा सा नाम अच्छा है। इसीलिए शायद मुझे प्रकाश मनु अच्छा लगा होगा। और आज तो मूल नाम की बजाय इसी नाम से पुकारा जाना मुझे अच्छा लगता है।

बचपन की कोई खट्ठी-मीठी याद?

बहुत सी यादें हैं, पर उनमें एक ऐसी है कि उसे आज तक भुला नहीं पाया। हुआ यह कि कक्षा नौ में हमें अंग्रेजी पढ़ाते थे राजनाथ सारस्वत। वे कैसे थे, यह बताना मुश्किल है। बस इतना बता सकता हूं कि उनके आगे अपने को अच्छे-अच्छे खां समझने वाले दादा किस्म के लड़के भी थर्राया करते थे। वे कक्षा में जिन बच्चों को बहुत प्यार करते थे और योग्य समझते थे, उनमें मैं भी था। पर एक बार मैं भी उनके गुस्से की चपेट में आ गया। हुआ यह कि एक बार उन्होंने कुछ होमवर्क दिया था। बीच में लंबी छुट्टियां आ गईं, तो उसे पूरा करना मुझे याद नहीं रहा। और सच तो यह है कि क्लास में किसी को वह याद नहीं रहा। उन्होंने पूरी क्लास को मुर्गा बनने की सजा दे दी। सारे मुर्गा बन गए, पर मैं नहीं बना। मेरा कहना था कि आप मुझे जितना भी चाहें मार लीजिए, पर मुर्गा मैं नहीं बनूंगा। इस हुक्मउदूली से वे कितना तिलमिलाए होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। गुस्से में उन्होंने कहा कि अगर मेरा कहना नहीं मानते हो, तो क्लास से निकल जाओ। पर मैं इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ। उनके दो पीरियड पड़ते थे और दोनों पीरियड में उस दिन पढ़ाई नहीं हुई। बस यही नाटक चलता रहा। और मैं न मुर्गा बना न क्लास से बाहर जाने के लिए तैयार हुआ। आखिर में उन्होंने कहा कि अच्छा, अगर सभी विद्यार्थी कह दें कि विग को छोड़ दो  तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। उनका यह कहते ही एक साथ पुकार उठी, ”छोड़ दीजिए सर, छोड़ दीजिए!’’ और तब मैं छूटा। उस दिन की मेरी खुशी और रोमांच की आप कल्पना नहीं कर सकते। मैं मानो आकाश में सैर कर रहा था और लग रहा था कि मैं तो अर्जुन हूं, जिसने महाभारत जीत लिया है। आज भी इस घटना को याद करता हूं, तो मैं खुशी और रोमांच से भर जाता हूं।

आपने बड़ों के लिए काफी महत्वपूर्ण रचनाएं दी हैं। आपके यह जो दिल्ली है’, ‘कथा-सकर्स’ और पापा के जाने के बाद’ उपन्यास बहुत प्रसिद्ध हुए। इसके बावजूद आपका रुझान बाल साहित्य की तरफ ज्यादा दिखाई देता है। ऐसा क्यों?

इसका श्रेय तो सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका को ही जाता है। नंदन में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तब ही जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। और बाल साहित्य में अलग-अलग विधाओं की मेरी कोई पचास किताबें, जिनमें बच्चों के लिए लिखे गए उपन्यास, कविता-कहानियां और ज्ञान-विज्ञान की कहानियां भी हैं। मेरी कोशिश तो यही रही कि बच्चों के लिए जो भी लिखा जाए फिर चाहे वह ज्ञान-विज्ञान का साहित्य ही क्यों न हो, बड़ा रोचक और रसपूर्ण हो। इसी तरह कई वर्षों की मेहनत से हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखा। और अब समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लगभग पूरा हो चुका है। जो जल्दी ही आपको पढ़ने को मिलेगा।

आपने बच्चों के लिए प्रचुर मात्रा में लिखा है। हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में आपको क्या कहना है। क्या आप इस स्थिति से संतुष्ट है?

हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ बेहद साधारण रचनाओं का बड़ा ढेर है, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएं भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। सर्वेश्‍वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएं लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्‍व कविता में पांक्‍तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्र कुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी रोचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से दिग्गज कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई,  प्रभाकर माचवे,  भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि उस पर आप दया दिखाएं।

प्रकाश मनु साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी के साथ

बच्चों के लिए लिखते समय किन बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए?

मेरे खयाल से बच्चों के लिए लिखते समय बस एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम जो कुछ लिखें, बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं। एक लंबे अरसे से बच्चों के लिए लिखते हुए और ‘नंदन’ पत्रिका में कोई ढाई दशक गुजारने के बाद जो बात मैं समझ पाया, वह यह कि बच्चे उपदेशों से घृणा करते हैं। लिहाजा आप बच्चों के लिए जो कुछ भी लिखना चाहें या उन्हें कुछ भी बताना चाहें, अगर आप खेल-खेल में उन्हें नहीं बता पाते, तो वह निरर्थक और बेकार है। इसी तरह लीक पीटते रहने की बजाय कुछ नया लिखें, तो वही सार्थक है। इसके लिए ज्यादा अच्छा है कि अपने बचपन की दुनिया में जाएं। वहाँ हमेशा एक जादुई दुनिया आपका इंतजार कर रही होती है, जहां बहुत कुछ नया, हैरतअंगेज पर साथ ही साथ मानीखेज भी है।

भारतीय भाषाओं विशेष तौर से हिंदी में श्रेष्ठ बाल साहित्य का अभाव दिखाई देता है। ऐसा क्यों?

भाई, इस सवाल का जवाब मैं दे चुका हूँ। कम से कम हिंदी में मैं कह सकता हूं कि यहां अच्छे बाल साहित्य का कतई अभाव नहीं है। हाँ, उसके बारे में एक तो लोगों को पता कम है, फिर वह बच्चों तक उतना अधिक नहीं पहुंच पा रहा, जितना पहुंचना चाहिए था। यह मैं मानता हूं। इसके पीछे प्रकाशकों का रवैया भी जिम्मेदार है, जिन्हें अच्छे बाल साहित्य की समझ नहीं है और वे अच्छा-बुरा कुछ भी अंधाधुंध छापे जा रहे हैं और उसके प्रचार-प्रसार पर कानी कौड़ी भी खर्च नहीं करते। फिर हमारे मीडिया का रवैया भी कम दोषी नहीं है, जिसके कारण बाल साहित्य की अच्छी किताबों की चर्चा नहीं हो पाती। उनकी समीक्षा वगैरह का कोई मंच तो है ही नहीं। तो लोगों को पता कैसे लगेगा कि अच्छा क्या लिखा जा रहा है? इस चक्कर में अच्छा और बुरा गड्डमड्ड हो रहा है और लोग बगैर सोचे, बगैर पढ़े बाल साहित्य के बारे में कुछ फतवा जारी करने के गोरखधंधे में लगे हैं।

आप लंबे समय तक बच्चों की पत्रिका से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों की रुचि में किस तरह का बदलाव आ रहा है?

सबसे पहली बात तो यह कि आज का बच्चा पहले की तुलना में कहीं अधिक सचेत बच्चा है। पहले बच्चों में जो इनोसेंस या अबोधता थी, इधर के बच्चे में वह थोड़ी कम है, पर उसमें आसपास की दुनिया को देखने और सोचने-समझने की दृष्टि कहीं अधिक विकसित है। इस कारण बच्चा ऐसी चीजों में अधिक रुचि लेता है, जिसमें मनोरंजक ढंग से अच्छी और उपयोगी जानकारी दी गई हो। इसी तरह राजा-रानी की कोरी कल्पना की कहानियों की बजाय आज के बच्चे को ऐसी कहानियाँ कहीं अधिक रुचती हैं जिनमें उस जैसा ही कोई छोटा बच्चा केंद्र में हो और उसकी किसी छोटी-बड़ी मुश्किल पर कहानी गढ़ी गई हो। हाँ, कुछ लोग कहते हैं कि आज के बच्चे की दुनिया बदल गई है, इसलिए उसे फंतासी या परीकथाएं नहीं, सिर्फ यथार्थ की कहानियाँ देनी चाहिए पढऩे को। पर मेरा अनुभव है कि बच्चे को जादू या फंतासी अच्छी लगती है और किसी भी विषय पर लिखी गई ऐसी जादुई कहानियाँ, जो खुद में एक नया और ताजा विचार भी लिए हों, बच्चे को बहुत लुभाती हैं। उससे उसे रिलीफ भी मिलता है और अपनी समस्या से निकलने का रास्ता भी। हालांकि बच्चों के लिए यथार्थ पर कहानियां भी जरूर लिखी जानी चाहिए, पर वे सार्थक तभी होंगी जब उनमें किस्सागोई और कथा-रस हो।

अकसर कहा जाता है कि इस तकनीकी युग में बचपन खो सा गया है। बच्चा जन्म लेते ही जल्दी से जल्दी प्रौढ़ हो जाना चाहता है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?

हाँ, यह बात तो ठीक है कि आज का बच्चा जल्दी से जल्दी प्रौढ़ बन रहा है और बचपन खो सा गया है। पर बच्चा प्रौढ़ बनना नहीं चाहता, बच्चे को प्रौढ़ बनाया जा रहा है। कहना चाहिए कि उससे जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टंगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके उसका बचपन उससे छीना जा रहा है। बल्कि सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। इसकी क्या सजा हो, मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता, पर यह बेशक बहुत बड़ा और अक्षम्य गुनाह है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएं पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं कांप उठता हूं।

आप अपनी जो आत्मकथा लिख रहे हैं, उसके कुछ अंश पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। लगता है, आत्मकथा में आप शिक्षा जगत और बचपन को विशेष तौर से फोकस कर रहे हैं। इसकी कोई खास वजह?

कोई खास वजह नहीं, सिवाय इसके कि हर शख्स की तरह मुझे भी अपना बचपन खासा फेसिनेट करता है। जब-जब मुश्किलों में पड़ता हूं, आहत और कमजोर महसूस करता हूं, तो जिन चीजों से मुझे ताकत मिलती है, उनमें बचपन भी है जो एक साथ जादुई रहस्यों और बड़ी संभावनाओं से भरा है। मैं जब बड़े लेखकों से मिलता हूं या उनकी रचनाओं के निकट जाता हूं तो मुझे गंगास्नान की अनुभूति होती है। इसी तरह जब बचपन की दुनिया में झांकता और गोते लगाता हूं, तब भी मुझे गंगास्नान की ही अनुभूति होती है। वैसे आत्मकथा में बचपन पर इतना फोकस क्यों है, इसका भी एक रोचक किस्सा है। हुआ यह कि एक वरिष्ठ लेखक जो मेरे परिवार की व्यावसायिक पृष्ठभूमि से भी परिचित थे, एक बार मिले तो उन्होंने एक सवाल पूछ लिया। वह सवाल यह था कि भई प्रकाश मनु, तुम ऐसे परिवार में जन्म लेकर लेखक कैसे हो गए? सवाल सुनकर मैं बड़ी देर तक चुप रहा। फिर कहा, इसका जवाब तो बड़ा लंबा हो जाएगा। और सच पूछिए, तो यह आत्मकथा उन लेखक मित्र के उसी सवाल का लंबा जवाब है। और चूंकि मेरे लेखक होने के रहस्य की कुंजी शायद मेरे लज्जालु और आत्मलीन बचपन में ही कहीं छिपी है, इसलिए आत्मकथा में भी उसी पर फोकस है। इसी तरह बचपन से ही घोर पढ़ाकू रहा और शायद अब भी हूँ। पहले साइंस से और फिर हिंदी से मास्टर की डिग्री लेने के अलावा पी-एचडी भी की। तो शिक्षा जगत से गहरा वास्ता तो होना ही था। बाद में प्राध्यापक होने पर पढ़ाया भी। तो इस सब के रिफ्लेक्स आत्मकथा में हैं। हां, जीवन का एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता करते बीता, तो उसकी छायाएँ भी जगह-जगह इस आत्मकथा में पडऩी ही थीं और वे पड़ीं। पर यह प्रसंग यहां रहने ही दें, तो बेहतर है। क्योंकि पत्रकारिता में जो कुछ आज देखता हूं, उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो मुझे बहुत दुखी और संतप्त करता है।

हाल ही में आपके ‘ठुनठुनिया’ बाल उपन्यास को साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है, इस बारे में आपकी प्रतिक्रिया क्या है।

मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या कहूं? हां, अच्छा तो लगा ही, बल्कि कहना चाहिए कि एक सुखद आश्‍चर्य सा हुआ। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें, उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हां, आसपास के कुछ बच्चे हैं, जो कभी-कभी मेरी किताबें पढऩे के लिए ले जाते हैं। उनमें से एक बच्चा यह उपन्यास भी ले गया। जब वह इसे लौटाने के लिए आया, तो उसकी उत्साह से भरी लेकिन टूटी-बिखरी सी प्रतिक्रिया और आंखों में चमक, यही बस मुझे याद रह गई। …मोटे तौर से बच्चों के लिए लिखने वाला कोई भी लेखक वर्तमान अनुत्साही माहौल में ऐसी ही दो-चार निधियां संभालकर रख लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। पर उस उपन्यास में कुछ है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और उस पर लोगों का ध्यान गया, इससे खुशी तो होती ही है। पर मेरा कहना है कि हिंदी में बच्चों के लिए लिखी गई एक से एक अच्छी, सार्थक और बड़ी रचनाएं हैं, जिन्हें सामान्य रचनाओं की एक बड़ी भीड़ से अलगाना जरूरी है। इस पुरस्कार के साथ-साथ अच्छे आलोचना ग्रंथों से यह काम हो सकता है और होना चाहिए। इसके बाद शायद हिंदी बाल साहित्य के आगे जो भ्रम का अंधेरा है, वह छंटे और बाल साहित्य की सही तस्वीर लोगों के सामने आए। फिर बाल साहित्य का महत्व समझ में आएगा, तो उसे बच्चों के नजदीक ले जाने की जिम्मेदारी भी लोग समझेंगे।

आपका बाल उपन्यास ‘ठुनठुनिया’ का जो पात्र है वह बड़ा ही मजेदार है। उसके बारे में कुछ बताएं?

आपने ठीक कहा, ठुनठुनिया वाकई बड़ा मजेदार पात्र है और कहना चाहिए कि मुझे भी बहुत पसंद है। इसलिए कि उसका परिवेश थोड़ा गंवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ है। लेकिन वह परिस्थितियों से हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हंसी की फुरफुरिया फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में वह हार नहीं मानता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे नहीं सही मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आंखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा इसलिए उसकी पढ़ाई बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिल को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है इसीलिए चाहे गरीब खिलौने वाला, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला या फिर गांव का जमींदार हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की मां तो इतनी ग्रेट लेडी है और अपने बच्चे पर इस तरह प्यार निसार करती है कि कहना होगा कि वह बड़ी गरीब लेकिन ग्रेट मां है। इसी मां का प्यार यहां-वहां भटकने के बाद उस घर खींच लाता है। वह जिंदगी में आगे बढ़ता है मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भूत दुनिया रच डालता है। जिसमें कला-संगीत, नाटक और हंसी खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूं तो मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।

मुझमें नेहरू भी बोलता है, माओ भी : सुरजीत पातर

पंजाबी के वरिष्ठ कवि सुरजीत पातर को हाल ही में सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया। साहित्य अकादेमी सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित पातर का जन्म 1944 में जालंधर, पंजाब के एक गांव में हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ प्रकाशित हुआ। अपनी कविताओं में साफगोई और बेबाकी के लिए प्रसिद्ध पातर की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनसे युवा पत्रकार संजीव माथुर की बातचीत के अंश-

क्या आप लफ्जों की सूफीयाना इबादत करते हैं?
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण
किया।
एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है।
पर आप को पढ़ते हुए कहीं-कहीं महसूस होता है कि अंधेरे दौरों से पैदा हुई उदासी की वजह भी दरगाह की तलाश को विवश कर रही है?
 नहीं ऐसा नहीं है। मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओं तो दुख छोटे पड़ जाएंगे।
माना जाता है कि सातवें दशक में उभरी पंजाबी कविता ने साहित्य में दो ऐसे नाम दर्ज कराए जिनके बिना भारतीय कविता के आधुनिक परिदृश्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। ये नाम है पाश और पातर। पाश की कविता पर माक्र्सवाद का साफ प्रभाव है, आप किस विचार या लेखक से प्रभावित महसूस करते हैं?
मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है कि -
मुझमें से नेहरू भी बोलता है,  माओ भी
कृष्ण भी बोलता है,  कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
पर जो दौर आपकी काव्य रचना की शुरुआत का है, वही वक्त वामपंथ में उथल-पुथल का दौर था। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला जहां आप छात्र थे वह नक्सलवादी गतिविधियों का केंद्र था। आपके के कई मित्र पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन में सक्रिय थे। इस माहौल का आप पर क्या असर पड़ा?
जैसे मैंने पहले कहा कि मैं किसी राजनैतिक समूह का कार्यकर्ता तो नहीं था। इसीलिए नक्सलवाद के राजनीतिक पक्ष के बारे में तो आपको मेरी कविताओं में सीधे कोई नारा शायद न मिले, पर यह भी सच है कि इस विचार के मानवीय पक्ष- जैसे नवयुवकों की त्याग भावना, विचार के आधार पर मर-मिटने का जज्बा व गहरे और उष्म मानवीय संबंधों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है। इस प्रभाव को आप मेरे सौंदर्यबोध में पा सकते हैं। इस दौर में एक दोस्त था रुपोश, जिसने माक्र्सवाद से परिचय करने में अहम भूमिका निभायी। पर मेरी पीएसयू के साथियों से लगातार हिंसा व लेखकीय स्वतंत्रता को लेकर बहस चलती रहती थी। इसके बावजूद मेरी सहानुभूति
उनके साथ थी। चौक शहीदां में उसका आखिरी भाषण में मैंने साफ कहा है कि -
चलो यह चौक छोडें
किसी चौरस्ते पर पहुंचे
और वहां जाकर फिर दुविधा में पड़ें
यहां दुविधा में पड़ना फिर लौटकर कोख में पड़ना है
तुम्हें मैं क्या बताऊं कीमती दोस्तों
तुम तो जानते हो
कि जिस चौक में
अपने हंसमुख हमउम्रों का खून बह जाए
फिर वह चौक चौरास्ता नहीं रहता,
जिन चौकों में अभी हमउम्रों का खून बहाना है
वे आगे हैं।
वैसे मैं अपनी कविता और जीवन में कभी ऊंचे पैडिस्टियल से बात नहीं करता। मैं आम के बीच में ही खुद को सहज महसूस करता हूं। मैंने ये भी लिखा है कि – मेरा जी करता है कि जंगल में छिपे गोरिल्ले से कहूं, ये लो मेरी कविताएं जलाकर आग सेंक लो।
इमरजेंसी और पंजाब में आंतक का एक पूरा दौर आपने देखा है। कैसे देखते हैं इन दोनों अंधेरे दौरों को?
 इमरजेंसी पर मैंने कहा था कि कुछ कहा तो अंधेरा सहन कैसे करेगा, चुप रहा तो शमांदान क्या कहेंगे। जीत की मौत इस रात हो गई, तो मेरे यार मेरा इस तरह जीना सहन कैसे करेंगे। बुढ़ी जादूगरनी भी इमरजेंसी और सत्ता के दमनकारी पक्षों का सूक्ष्म व्यंग्य के साथ पर्दाफाश करती है। इमरजेंसी या आतंकवाद हमारे लोकतांत्रिक समाज पर धब्बा है। यह दौर कवि और कविता के लिए सर्वाधिक घातक थे।
आंतकवाद पर तो मैंने बिरख अर्ज करें में काफी कुछ कहा है। कुछ कविताओं जैसे कि
मातम,
हिंसा,
खौफ,
बेबसी
और अन्याय -
यें हैं आजकल नाम मेरे दरियाओं के।
या फिर एक लरजता नीर था को मैंने पाश को समर्पित किया है। एक दरिया को भी आप इसी संदर्भ में पढ़ सकते हैं। इसी संदर्भ में मैंने लिखा था – इस अदालत में बंदे वृक्ष हो गए, फैसले सुनते-सुनते सूख गए । इन्हें कहो कि ये अब अपने उजड़े घरों को लौट जाएं। ये कब तक यहां खड़े रहेंगे।
साहित्य का राजनीति से कैसा रिश्ता होना चाहिए?
बेशक प्रतिरोध की राजनीति साहित्य के फोकस में होनी चाहिए। व्यंग्य इसमें एक कारगर औजार हो सकता है। जैसे कि मैंने गहरे क्रंदनों को क्या मापना में कहा है कि जद तक उह लाशां गिणदें आपा वोटां गिणिए (जब तक वह लाशों को गिनते हैं आप वोटों को गिने)। सुलगता जंगल में भी आप इसकी झलक देख सकते हैं। साहित्य और लेखक की अपने वक्तों के प्रति एक जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह इसको साफ साफ देखें और दिखाएं। ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे या न चाहें राजनीति या अपने माहौल से उदासीन होकर की गई साहित्य की रचना कमजोर होती है। उसमें मानवीय उष्मा की गरिमा नहीं होती है। साहित्य या रचना में हमारी मैं भी सिर्फ हमारी मैं नहीं होती है वह कवि खुद ही नहीं होता है।
क्या रचना की रचना एक निजी मामला नहीं है?
 देखिए, कवि या लेखक की मैं भी उसने खुद नहीं बनाई होती है। वह भी समाज से उसने पाई है। इसीलिए रचना एक हद ही निजी होती है, पर उसके बावजूद वह होती एक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा ही है।
वैश्वीकरण का हमारे समाज पर क्या असर पड़ा है?
 वैश्वीकरण के प्रक्रिया ने सरकार की संकल्पना को कमजोर किया है। आज हमारी सरकारे बस लॉ एंड ऑर्डर का थाना भर बन कर रह गई हैं। शिक्षा और सेहत की जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए। पर कानूनों के बावजूद सरकारें इसे लागू करने से बच रही हैं। वह इसे किसी और के कंधे पर डालना चाह रही हैं। शिक्षा की तो एक लहर चलनी चाहिए। शिक्षा में असमानता खत्म होनी चाहिए। इसी असमानता के कारण गांवों के बच्चे अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं ले पाते हैं। सेहत के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा और सेहत सबकी पहुंच में हो और यह करने की जिम्मेदारी सरकार की है, न की बाजार की। वैश्वीकरण ने सरकार को इस
जिम्मेदारी से आजाद करने में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है। इसके अलावा वैश्वीकरण की बयार ने हमारे मानवीय संबंधों को भी खासा प्रभावित किया है। माइग्रेट लेबर का सवाल एक बड़ा सवाल है। मेरी कविता आया नंदकिशोर में इस दर्द को
समझने की कोशिश आपको दिखाई देगी।
आपने शिरोमणि अवार्ड क्यों ठुकराया था?
मेरा मानना है कि पुरस्कारों में राजनीतिज्ञों का दखल नहीं होना चाहिए। इस पुरस्कार देने की प्रक्रिया में राजनीतिज्ञों का खासा दखल था। यह मुझे गवारा नहीं था सो मैंने यह पुरस्कार ठुकरा दिया।
कैसे रचते हैं अपनी कविताएं?
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।
आजकल रचनात्मक व्यस्ताएं क्या हैं?
आजकल भाषा पर और उसके विज्ञान पर ध्यान दे रहा हूं। भाषावैज्ञानिकों ने यह काम छोड़ रखा है। मां बोली यानि मातृ-भाषा पंजाबी के विकास पर काम कर रहा हूं। यात्रा संस्मरण लिखने की भी योजना है। शीर्षक होगा सूरज मंदिर दां पौडियां।
अपने घर- परिवार के बारे में कुछ बताएं?
मेरा बचपन खुशहाल नहीं था। काम करने के लिए पिता हरभजन सिंह पूर्वी अफ्रीका चले गए । घर में चार बड़ी बहनें और मां हरभजन कौर के साथ खासे संघर्ष के दिन बिताए। पिता मां की मृत्यु पर नहीं आ सके। इसका दर्द जीवन भर रहेगा। कवि नहीं होता तो गायक होता। मेरी पत्नी भूपिंदर ने हमेशा साथ निबाहया है। दो बेटे हैं अंकुर और मनराज। बडे़ की शादी हो गई है।
नए लेखकों को कुछ राय?
देखों मैं अपनी कविता में भी उपदेश देने से बचता हूं। इसीलिए सिर्फ कुछ मशविरे हैं। जैसे फैशन की पीछे नहीं भागो। मन में गहरा झांक कर देखों। लेखन में एक कंटीनियूटी होनी चाहिए। परम्परा और वर्तमान का संजीदा भान व ज्ञान होना चाहिए। जैसे बे्रख्त के बारे तो आज बहुत सों को पता होता पर बुल्लेशाह या वारिस के बारे में भी मालूम होना चाहिए। स्टाइल पर जोर न हो। परिवेश से जुड़े। निरंतरता और बदलाव की समझ हो। सोचना चाहिए कि लोग हमसे दूर क्यों हो रहे हैं। मैं अक्सर युवा साथियों से कहता हूं- वो लोग जा रहे हैं आज की कविता से दूर, तो हजूर होगा इसमें भी आपका कुछ कसूर।

(कादम्बिनी से साभार)

साहित्य-कला के साथ दिल्ली सरकार का खेल

कला और साहित्य के करोड़ों के बजट को राष्ट्रमंडल खेलों की भट्ठी में झोंक देने के निर्णय ने एक बार फिर दिल्ली सरकार की मनमानी और साहित्य व कला के प्रति उसके नजरिये की पोल खोल दी है। सरकार ने छह अकादमियों और कला परिषद के बजट में 15 करोड़ से ज्यादा की कटौती कर दी है।
दिल्ली सरकार को यहीं तसल्ली नहीं हुई। उसने हिंदी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, सिंधी और मैथिली-भोजपुरी अकादमियों तथा कला परिषद को पत्र भेजकर तमाम कार्यक्रम स्थगित करने का निर्देश दिया है। अकादमियों को केवल 20-20 लाख दिए जाएंगे, वे भी इस शर्त के साथ कि इन्हें राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में ही खर्च किया जाएगा। कार्यक्रम और आयोजन स्थल भी सरकार तय करेगी।
दिल्ली सरकार ऐसा कारनामा पहली बार नहीं कर रही है। वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को लेकर हुआ विवाद जगजाहिर है। एक कांग्रेसी नेता के कहने पर उन्हें शलाका सम्मान नहीं दिया गया। इसके विरोध में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी शलाका सम्मान ठुकरा दिया। उनके अलावा छह और रचनाकारों ने हिंदी अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। लेखकों के विरोध के बावजूद पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इसका आयोजन किसी सभागार में न कर दिल्ली सरकार के सचिवालय में किया गया। हिटलरी रुख अपनाते हुए पत्रकारों तक को एंट्री नहीं दी गई। किसी सम्मानित लेखक को एक मिनट भी बोलने का भी मौका नहीं दिया गया। इस तरह का अभूतपूर्व साहित्यिक समारोह संभवत: पहली बार हुआ। यह भी शायद पहली बार हुआ कि किसी अकादमी के मुख्य पुरस्कार सहित कई और पुरस्कार ठुकरा दिए जाने के बाद भी समारोह आयोजित किया गया हो।
दिल्ली की मुख्यमंत्री छह अकादमियों की अध्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक कार्य करने पड़ते हैं। वे सभाओं, बैठकों, उद्घाटन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहती हैं। साहित्य-कला जैसे तुच्छ विषयों के लिए उनके पास समय कहां! ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने साहित्य सृजन किया हो या वह भाषाविद् हों या कला-साहित्य के क्षेत्र में उनका किसी भी रूप में कोई योगदान रहा हो। ऐसे में वह अकादमियों में सक्रिय भूमिका कैसे निभा सकती हैं? क्या एक व्यक्ति का छह अकादमियों का अध्यक्ष बनना व्यवहारिक है? यह तो एक नजीर है। कमोवेश यह स्थिति सभी राज्यों की है। फिर क्यों न अकादमियां राज्य सरकार के शिकंजे से मुक्त की जाएं। उसमें पदाधिकारी रचनाकारों हों और उन्हीं के द्वारा चुने जाएं।
डॉक्टरों की संस्था डॉक्टर चलाते हैं, उद्योगपतियों की संस्था उद्योगपति चलाते हैं। यानी संस्था जिसकी होती है, उसी से जुड़े लोग उसे संचालित करते हैं। फिर रचनाकारों और कलाकारों की संस्थाएं राजनेता क्यों चलाएंगे?
असल में सरकारें साहित्य व कला अकादमियों को अपना भोंपू बनाकर रखना चाहती हैं। उनकी मंशा रहती है कि ऐसे लेखकों-कलाकारों को सम्मानित किया जाए, जो उनकी गलत-शलत नीतियों का समर्थन करें और विरोध में एक शब्द न बोलें? चुनाव में प्रचार भी करें तो सोने-पे-सुहागा। यह तभी संभव है जब अकादमियों पर उनकी पकड़ हो।
एक वजह यह भी है कि राजनेताओं की सोच सामंती है। वह कुर्सी मिलने पर खुद को जनसेवक नहीं, राजा समझते हैं। उसी की तर्ज पर पुरस्कार व सम्मान बांटने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इससे उनके दंभ की तुष्टि होती है।
आजकल की जोड़तोड़ की सिद्धांतहीन राजनीति की उपज अधिकतर नेता रीढ़विहीन हैं। ये अंदर से खोखले, वैचारिक रूप से दिवालिया और मूल्यहीन हैं। ये इतने कमजोर हैं कि वैचारिक आलोचना भी इन्हें भयभीत कर देती है। इन्हें स्तुति गान ही अच्छा लगता है। यह तभी संभव है, जब इनके हाथ में प्रलोभन देने की ताकत हो। इसलिए राज्य सरकारों से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वे स्वेच्छा से अकादमियों को अपने चुंगल से मुक्त कर देंगी।
रचनाकार और कलाकार निजी स्वार्थों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर उन अकादमियों और कला परिषदों में कोई पद ग्रहण नहीं करें, जो राज्य सरकारों के अधीन हैं। इनसे मिलने वाले पुरस्कारों और सम्मानों को भी ठुकरा दें। तभी राज्य सरकारों पर दबाव बनेगा और वे इस दिशा में कदम उठाएंगी।
संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का कहना है कि सरकारों का साहित्य व कला का एजेंडा केवल मुखौटा है ताकि कोई यह न कह सके कि सरकार कला विरोधी है। इनके लिए कला-साहित्य का प्रोत्साहन केवल रस्म अदायगी है। सरकार का मकसद केवल राजनीति करना, वोट बैंक बढ़ाना ओर यह देखना है कि पैसा कहां से कमाया जा सकता है।
आज तक प्रेमचंद का स्मारक नहीं बनाया जा सका है। सरकारी पत्रिकाओं की हालत खराब है। वे स्तरहीन हैं और उनमें पठनीय सामग्री नहीं होती।
हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कला, साहित्य, संस्कृति नहीं है। वे खुद को कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी साबित करने के लए आयोजन करती हैं, लेकिन भयभीत भी रहती हैं कि कोई सरकार के खिलाफ न बोल दे। इसलिए सम्मानित साहित्यकारों को बोलने का मौका भी नहीं दिया जाता। उनका सम्मान केवल विज्ञापन के लिए करती हैं।
अकादमियों को सरकारों के चुगंल से मुक्ति मिलनी चाहिए।

समय की सच्चाई की तलाश करें नए लेखक: मार्कण्डेय

प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण परिवेश को पुनर्स्थापित करने वालों में मार्कण्डेय प्रमुख कथाकार हैं। वह दोबार कैंसर की चपेट में आ गए हैं। इन दिनों इलाज के लिए दिल्ली आए हुए हैं। उन्हें बोलने में दिक्कत हो रही है। इसके बावजूद उन्होंने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को साझा किया और लेखन से जुड़ी योजनाओं के बारे में बताया। उनसे बातचीत के अंश-         

जब आपने लिखना शुरू किया, उस दौरान ग्रामीण परिवेश की कहानियां नहीं लिखी जा रही थीं। प्रेमचंद के बाद अंतराल आ गया था। इसे शिवप्रसाद सिंह और आपने खत्म किया। पाठकों की कैसी प्रतिक्रिया रही?
पाठकों ने बहुत प्रसन्नता से अपनाया और तुरंत ही ‘कल्पना’ में कहानियां छपने लगीं। उन्होंने कुछ ज्यादा पैसे मुझे देने शुरू किए और कहा कि आप लगातार हमारे लिए लिखिए। मैं 1951-52 में एमए का छात्र था। उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि हमारे यहां जो कहानियां छपी हैं, उनका संकलन छापना चाहते हैं।  ‘पान फूल’ उन्होंने, नवहिंद पब्लिकेशन छापा। इसकी चर्चा खूब हुई। उस दिनों इलाहाबाद में साहित्यकारों के दो गुट थे। एक परिमल और दूसरा प्रगतिशील लेखक संघ। मैं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा था। परिमल वाले भी उन कहानियों की तारीफ करते थे। प्रगतिशील संघ ने तो उसे हाथों हाथ लिया।
उन दिनों प्रगतिशील लेखक संघ में विचारधारा का वर्चस्व था। रामविलास शर्मा इसके कट्टर समर्थकों में से थे। आपकी पीढ़ी ने साहित्य में वैचारिक कट्टरता के खिलाफ लिखा। पुरानी पीढ़ी को क्या आप इस बात के लिए मना पाए कि साहित्य में कट्टरवाद नहीं चलेगा?
कई गोष्ठियों में चर्चा हुई और ‘प्रतिबद्धता’ उसके लिए सही शब्द है। यह तय हुआ कि प्रतिबद्धता आवश्यक नहीं है। जरूरी है संवेदना और अपने समय का सत्य। अगर वह कहानी में आ रहा है तो कहानी प्रगतिशील है। उसी को लेकर चारों ओर चर्चा होने लगी। ‘नई कहानी’ आंदोलन शुरू हो गया। उसमें कमलेश्वर, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, राजेंद्र यादव आदि बहुत से लेखक आ गए। ये सब नई कहानियों के लेखक हैं। पूरे देश में नई कहानियां चर्चा का विषय बन गईं।
अब हुआ यह कि भैरवप्रसाद गुप्त, जो विचारधारा के मामले में कट्टर थे, उन्होंने इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली ‘नई कहानियां’ को काफी प्रोत्साहित किया। भीष्म साहनी, अमरकांत आदि की कहानियां प्रकाशित कीं। धीरे-धीरे ये लेखक भी लाइम लाइट में आ गए। इनके बारे में चर्चा होने लगी। प्रतिबद्धता का सूत्र वहीं से टूट गया।
आपने साहित्यिक पत्रिका ‘कल्पना’ में ‘साहित्यधारा’ कॉलम भी लिखा। इस बारे में बताएं।
‘कल्पना’ वालों ने मुझे एक स्तंभ लिखने के लिए कहा। लिखा-पढ़ी में तय हुआ कि वह नाम का खुलासा नहीं करेंगे और न ही मैं बताउंगा कि कौन लिखता है। स्तंभ का नाम ’साहित्यधारा’ था और मैं चक्रधर के नाम से लिखता था। जब ‘कल्पना’ आती थी, लोग पहले ’साहित्यधारा’ पढ़ते थे। परिमल वाले भी और प्रगतिशील वाले भी, सब लोग उसमें देखते थे कि मेरी रचना का उल्लेख है या नहीं। नतीजा यह हुआ कि स्तंभ बहुत पापुलर हो गया।
प्रभाकर माचवे नागपुर में रहते थे। उन्होंने बहुत भद्दी टिप्पणी हिंदी के बारे में लिखी। चक्रधर ने उसकी आलोचना की कि हिंदी की कमाई खाने वाले, हिंदी की रोटी पर जीने वाले, हिंदी के बारे में इस तरह की बातें करते हैं। प्रभाकर माचवे इससे बहुत नाखुश हुए। उन्होंने ‘कल्पना’ वालों से पूछा कि यह स्तंभ कौन लिखता है? प्रभाकर माचवे ने बद्रीविशाल पित्ती को बाध्य कर दिया कि वह नाम का खुलासा करें। उन्होंने बता दिया। मैंने उन्हें लिख दिया कि अब मैं नहीं लिखूंगा, क्योंकि नाम डिसक्लोज न करने का हमारे-आपके
बीच का समझौता टूट गया। मैंने स्तंभ लिखना बंद कर दिया। स्तंभ लिखने के 200 रुपये मिलते थे। उन दिनों 200 रुपये का बड़ा महत्व था।
आप जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में से हैं। इसकी स्थापना कैसे हुई?
उस समय बीटी रणदिवे बहुत बड़े नेता थे। प्रगतिशील लेखक संघ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन था। जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बनी तो हम लोगों ने तय किया कि अलग संगठन बनाना है। जगह-जगह पंद्रह-सोलह मीटिंग हुईं। कलकता में भी मीटिंग हुई। रणदिवे बहुत सख्त आदमी थे। एक लड़के ने पूछा कि प्रेम कहानियों के बारे में आपकी क्या राय है? उन्होंने इसके उत्तर में एक घंटे भाषण दिया। परिमल वालों की भी तारीफ की, जो मार्क्सवादियों के अगेनस्ट थे।
सर्वेष्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय की तारीफ की क्योंकि चीन का आक्रमण हुआ था तो रणदिवे कलकता अंडरग्राउंड हो गए थे। हमारे मित्र की बहन उनकी कांटैक्ट थी। वह ही खाने-पीने, रहने की व्यवस्था कराती थी। वह बताती थीं कि इस तरह की रचनाएं अब वह पसंद नहीं करते, जिनमें प्रतिबद्धता जरूरी है। उन्होंने उदाहरण दिया कि परिमल वालों में कई अच्छे लेखक हैं। धर्मवीर भारती, सर्वेष्वर दयाल सक्सेना आदि उन्हीं में थे।
हम सबको दिल्ली बुलाया गया। चंद्रबली सिंह और भैरवप्रसाद गुप्त पार्टी के सदस्य थे। मैं पार्टी का सदस्य नहीं था। ये लोग तैयार होकर मीटिंग के लिए चले गए और मुझसे कहा कि तुम आराम से आना। मैं नहीं समझ पाया कि मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?
जब मैं पहुंचा तो देखा कि मीटिंग चल रही है। रणदिवे ने सरला माहेष्वरी से कहा कि मार्कण्डेयजी आ रहे हैं। तुम उन्हें लेकर जाओ और सामने के किसी होटल में चाय-वाय पिलवाओ। रोके रहो काफी देर। अब हम मीटिंग कन्क्लूड करने वाले हैं। नियम होता है कि कार्ड होल्डर मेंबर ही मीटिंग में बुलाए जाते हैं। सब तय हो गया, तब सरलाजी मुझे लेकर पहुंची। हम लोग बैठे रहे। कम्युनिस्ट पार्टी के कम्यून में चाय-नाष्ता, खाना-पीना सब मिलता है। खाने-पीने, रहने की व्यवस्था पार्टी करती है। अपने बर्तन खुद धोकर रखने पड़ते हैं। ज्योति बसु, नंबूरदीपाद आदि सब अपने बर्तन धोते थे। आज भी यह प्रचलन बरकार है।
मैं संस्थापक सदस्य चुना गया। नियम होता है कि मान लीजिए आप तख्त पर बैठे हैं तो आपके पीछे दूसरे लोग बैठे रहते हैं; वे कार्ड होल्डर होते हैं। जिस किसी का नाम आप बुलाना चाहते हैं, वे बाधा पहुंचाते हैं कि उनका नाम न बुलाया जाए। सुधीश पचौरी बड़-बड़ कर बोल रहे थे। वह भैरवप्रसाद गुप्त की बहुत निंदा कर रहे थे। बीटी ने उन्हें डांटा, क्या लिखा है तुमने। क्या किया है तुमने। ऐसे आदमी से तुम बात कर रहे हो, जिसके आठ उपन्यास छप चुके हैं। नतीजा यह है कि उनकी सचिव बनने की कामना पूरी नहीं हो पाई। इस तरह जनवादी लेखक संघ की संस्थापक टोली में मैं शमिल हो गया।
रचनाकार के लिए लेखक संगठन की क्या उपयोगिता है?
जब सब मिलकर बातें करते हैं तो उसमें से कई नई बातें निकलती हैं। इसलिए रचनाकार के लिए लेखक संगठन बहुत जरूरी हैं। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ की मीटिंग होती थी। उनमें विचार-विमर्श और कई मुद्दों पर बहस होती थी। इनसे कई नई बातें निकलती थीं, जो आज नहीं हो रहा है।
क्या आज की तारीख में लेखक संगठनों की भूमिका से आप संतुष्ट हैं?
नहीं। लेखकों में बहुत बिखराव है। इस बात की बहुत जरूरत है कि रचनाकार अपने समय को, अपनी सच्चाई को तलाश करें। उदाहरण के तौर पर होरी को ही ले लें। उसका नाम लेने पर समस्त किसान समुदाय का खयाल आ जाता है। उस टाइप को खोजना बहुत कठिन है। नतीजा यह है कि आज नया लेखक आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह व्यक्तिगत रूप से कोई उत्तर नए सवालों का नहीं दे पा रहा है।
आपने कोई नौकरी नहीं की। आप मसीजीवी रहे और ‘नया साहित्य प्रकाशन’ की शुरुआत की। किताबों की बिक्री कैसे करते थे?
मैं किताब छापता था, लेकिन डिस्ट्रीब्यूशन नहीं करता था। किताब लोक भारती प्रकाशन वाले बेचेते थे। चालीस प्रतिशत वह रखते थे और बाकी साठ हमें देते थे।
आप कुशल संपादक माने जाते हैं। ‘कथा’ इसका प्रमाण है। आपने ‘माया’ का महाविशेषांक भी संपादित किया था, जो काफी लोकप्रिय हुआ। आपकी संपादकीय दृष्टि क्या है।
‘माया’ में कहानी पर लेख लिख रहा था। उन्होंने कहा कि विशेषांक निकाल दीजिए। विशेषांक निकला। उसमें लेख तो थे ही, नए लेखकों मसलन रविंद्र कालिया आदि की रचनाएं भी छापी। वह विशेषांक बहुत बिका। माया प्रेस वालों को लगा कि यह बहुत अच्छा हुआ। फिर एक और विशेषांक उनके लिए निकाला। वह था महाकुंभ विशेषांक। उसमें देश की राजनीति, लेखन और विभिन्न समस्याओं पर लेख दिए गए थे।                मैंने रचनाकार के चयन में पार्टी को आधार नहीं बनाया। जैसे- नेमिचंद जैन भी हमारे संपादकत्व में लिखते थे, रविंद्र कालिया भी लिखते थे। इन दोनों का संबंध जनवादी लेखक संघ से नहीं था, लेकिन मैं निडर-निष्पक्ष होकर सभी रचनाएं लेता था। यहां तक कि मैंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता गोलवरकर को भी आमंत्रित किया। विशेषांक में जो शीर्षक बना धर्म, उसमें सुमित्रानंदन पंत, संपूर्णानंद, गोलवरकर आदि ने लिखा।
मैं बेहिचक अच्छे लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करने में दिलचस्पी लेता था और सभी को पत्रिका में एक मंच देने की कोशिश करता था। आज भी ‘कथा’ पाइंटिड मैगजीन है। जो कोई नहीं करता, वह हम करते हैं। हम ‘पूर्व संपादकीय’ नाम से स्तंभ चलाते हैं। नए अंक में मीरा ‘पूर्व संपादकीय’ में आ रही हैं। अब मीरा का क्या संबंध है कम्युनिज्म या जनवादी लेखक संघ से।
नव लेखन के बारे में आपका क्या नजरिया है?
वे एक लेखन के दौर में शामिल हैं। ऐसा नहीं लगता किसी में कि वह भारतीय स्वीकृति प्राप्त कर सकें।
आपकी अगली योजनाएं क्या हैं?
कई उपन्यास थोड़े-थोड़े लिखे हुए हैं। उन्हें पूरा करना चाहता हूं। जैसे, ‘अग्निबीज’ का दूसरा पार्ट लिखना चाहता हूं। ‘फादर पॉल’ नाम का एक छोटा उपन्यास लिखना चाहता हूं। फादर पॉल ब्रिटिश काल में चीफ पादरी थे, उनके ऊपर मैंने काम शुरू किया था। एक-दो अंक में सामग्री छपी भी थी, लेकिन वह रुका हुआ है। ‘बवंडर’ नाम का महाक्रांतिकारी उपन्यास लिखना चाहता हूं। इसका एक-दो अध्याय लिख चुका हूं।
एक दौर था, जब इलाहाबाद में साहित्यकारों का मिलना-जुलना होता था। दिल्ली में भी काफी हाउस साहित्यकारों का अड्डा रहा करता था। अब न यहां काफी हाउस रहे और न ही इलाहाबाद की वे बैठकें होती हैं। इसकी क्या वजह मानते हैं?
इसका कारण बाजारवाद है। अपनी-अपनी सीमाओं में ग्रस्त हैं लोग। उनके पास फुर्सत नहीं है बैठने की, बहस-चर्चा करने की। कुछ फाउंड करने की, कुछ नया करने की तमन्ना नहीं है। व्यक्तिगत अनुभवों में ही वे सीमित हैं। हमारा समाज क्या है, उसके क्या संदर्भ हैं और उन संदर्भों में उनकी क्या बात बनती है, वह काम नहीं कर पा रहे हैं। बस सीमित अनुभव वाली रचनाएं आ रही हैं।