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गुम चोट : रेखा चमोली

रेखा चमोली

 नीलिमा हतप्रभ है। उसे समझ नहीं आ रहा, यह सब क्या हो रहा है। सीमा के पिताजी, मनोज की दादी, पडो़स के दिनेश चाचा और बाकि सारे लोग क्यों उसकी माँ पर इतना गुस्सा हो रहे हैं।

उसकी माँ तो चुपचाप अपना काम कर रही थी। वह भी बडी मैडम से पूछकर। सारे बच्चे मैडम के साथ कक्षा में काम कर रहे थे। अचानक बाहर शोर होने पर जब मैडम बाहर देखने आयीं तो वे सब भी पीछे-पीछे बाहर आ गये। बाहर आकर देखा, उनके गाँव के खूब सारे लोग बडी़ जोर-जोर की आवाज में बातें कर रहे हैं। उनकी बातों में अपनी माँ का नाम सुनकर वह पहले चौंकी, फिर घबरा गयी। शोर सुनकर उसकी माँ भी रसोईघर से बाहर आ गयी। सबने माँ को घेर लिया। वे सब माँ से बहुत नाराज थे। नीलिमा ने माँ की ओर देखा। माँ के चेहरे पर डर देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये। पिछले कई दिनों से जो अन्जाना डर उसे महसूस हो रहा था, उसके चलते उसे आज कुछ बुरा होने की आशंका होने लगी। वह दरवाजे का कोना थामकर चुपचाप एकटक माँ को देखने लगी। बडी़ मैडम ने लोगों से आराम से बैठकर बात करने को कहा, पर वे फिर भी शोर मचाते रहे।

‘‘मैडम जी, मेरे नातियों ने दो दिन से स्कूल में खाना नहीं खाया।’’ मनोज की दादी ने बडी़ मैडम से कहा।

‘‘क्यों ? क्यों नहीं खाया उन्होंने खाना?’’ बडी़ मैडम ने पूछा।

‘‘आपने जो नयी भोजनमाता लगायी है, उस कारण।’’

‘‘नयी भोजनमाता ने क्या खाना अच्छा नहीं बनाया या साफ-सफाई से नहीं बनाया।’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम तो सब समझती हो। यहाँ ये बच्चे इसके हाथ का बना खाना खाएँगे और घर आकर हमारे साथ खाना खाएँगे तो हमारा धर्मभ्रष्ट होगा कि नहीं। हम तो इन बच्चों का जूठा भी खाते हैं।’’ गोलू के दादाजी आगे आकर बोले, ‘‘हम जानते हैं, तुमने तो अपनी ड्यूटी निभानी ही थी, पर इन लोगों को तो विवेक होना चाहिये कि नहीं?’’

‘‘ये आप किस जमाने की बात कर रहे हैं?’’ नीरा मैडम बोलीं।

‘‘हम इसी जमाने की बात कर रहे हैं, मैडम जी। आप अभी के अभी नीलिमा की माँ को स्कूल से बाहर करो वरना ठीक नहीं होगा।’’ सीमा के पिताजी ने गुस्से से कहा।

‘‘हमने तो इसके घरवाले को पहले ही समझाने की कोशिश की थी, पर वो माना ही नहीं।’’पीछे से एक आवाज आयी।

बडी़ मैडम बार-बार आराम से बैठकर बात करने को कह रही थीं, पर लोग उनकी बात सुनने को राजी ही नहीं हो रहे थे। इतने में कुछ लोगों ने रसोई में जाकर खाना गिरा दिया और बाकि सामान भी इधर -उधर फेंक दिया। मनोज की दादी ने नीलिमा की माँ को रसोई के पास से खींचकर बाहर निकाला और जोर से धक्का दिया, जिससे वह नीचे गिर पडी़। नीलिमा दौड़कर माँ के पास गयी, तो मनोज की दादी ने ‘पीछे हट छोकडी़’ कहकर उसे दूर धकेल दिया।

नीलिमा रोने लगी। उसका छोटा भाई भी उसके पास आकर रोने लगा। मैडम और बाकि सारे लोगों की बातें सुनकर नीलिमा को ध्यान आया कि पिछले दो दिनों से उसकी माँ दूसरी भोजनमाता के साथ मिलकर स्कूल का खाना बना रही थी और पिछले दो दिनों से ही कुछ बच्चे स्कूल में खाना नहीं खा रहे थे। उन्हें मैडम ने डाँटा, जबरदस्ती खाना खाने बिठाया, लेकिन उन्होंने भूख नहीं है या मन नहीं कर रहा, कहकर खाना खाने से मना कर दिया। इस पर मैडम ने कहा कि कुछ दिनों में सब फिर से खाना खाने लगेंगे।

इन्होंने तो सारा खाना गिरा दिया। अब कहाँ से खाएँगे बच्चे खाना, नीलिमा सोचने लगी। अभी दो दिन पहले तक तो सब ठीक चल रहा था। उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को सुबह जगाती, उनका हाथ मुँह धुलाती, स्कूल के लिए तैयार करती और दोनों भाई-बहन चल पड़ते स्कूल की तरफ। जिस दिन माँ को जंगल या खेतों में काम करने जल्दी जाना होता, उस दिन उसके पिता या दादी उन्हें तैयार करते। कभी-कभी जब सब लोग जल्दी काम पर चले जाते तो पडो़स की दादी या बुआ उन्हें आवाज देकर जगाते। उस दिन नीलिमा खुद को ज्यादा जिम्मेदार महसूस करती। वह छोटे भाई को जगाती, उसका नित्यक्रम करवाकर, हाथ-मुँह धुलवाकर तैयार करती। माँ की रखी रोटी और गुड टोकरी में से निकालकर खुद भी खाती, भाई को भी खिलाती। अगर स्कूल के लिए देर हो रही होती तो गुड को रोटी के अन्दर रखकर भाई के हाथ में दे देती, जिसे वह रास्ते में खाते-खाते जाता। कभी-कभी उसका भाई उठने में बहुत नखरे दिखाता, तब उसका मन करता कि उसे दो थप्पड लगा दे, पर थप्पड लगाने से वह रोने लगता और बहुत देर में चुप होता। इसलिए वह उसे कोई-न-कोई बहाना बनाकर उठाती। रास्ते में उन्हें और भी बच्चे मिलते। सारे बच्चे गपियाते, बतियाते, धकियाते, मस्ती करते स्कूल की तरफ चल पड़ते। स्कूल पहुँचकर स्कूल की सफाई करते, प्रार्थना करते, कविता-कहानी कहते-सुनते, कक्षा में काम करते। मध्यान्तर होने पर सारे बच्चे आँगन में लाइन बनाकर बैठते। भोजनमाता राहुल की माँ सबको बारी-बारी से दाल-भात परोसती। सारे बच्चे खाना खाते, अपनी-अपनी थाली धोते और खेलते। शुरू-शुरू में कुछ बच्चे अपनी थाली उठाकर बाकि बच्चों से दूर जाकर बैठते थे। कुछ बच्चे रसोई में ही खाना खाते थे। नीरा मैडम ने सारे बच्चों को एक साथ बिठाकर भोजनमाता को खाना परोसने को कहा, तबसे सारे बच्चे एक साथ बैठकर ही खाना खाते हैं। उसने कई बार नीरा मैडम को यह कहते हुए सुना कि ‘यह सब स्कूल में नही चलेगा। दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गई और हम इन्हीं सब बातों में उलझे पडे़ हैं।’

कुछ दिनों पहले स्कूल में सारे अभिभावकों की एक बैठक हुई थी, जिसमें नीलिमा के पिताजी भी आए थे। उन्होंने घर आकर बताया कि स्कूल में एक और भोजनमाता की नियुक्‍त‍ि होने वाली है और नियमानुसार वह भोजनमाता अनुसूचित जाति की व बीपीएल कार्ड वाली ही होनी चाहिए। उन्होंने कल ही नीलिमा की माँ की अर्जी देने की बात घर में कही।

‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया। कैसे बनाएगी तेरी बुवारी(बहू) स्कूल में खाना। उसका बनाया खाना बामनों और ठाकुरों के बच्चे कैसे खाएँगे?’’ दादा जी ने कहा।

‘‘खाएँगे कैसे नहीं। मेरी बुवारी को क्या खाना बनाना नहीं आता? वैसे भी उसे कौन सा अकेले खाना बनाना है। जोशी भाभी जी तो हैं ही वहाँ।’’

‘‘फालतू बात मत कर बेटा, शादी-ब्याह में तो तेरी बुवारी जाती नहीं खाना खाने कि वहाँ उसे सबसे बाद में खाना खाना पड़ता है। वो भी कोई दूसरा किनारे पर लाकर दे, तब। दाल-भात, हलवा-पूरी सब एक साथ मिलकर ‘कल्च्वाडी’ बन जाता है। अभी भी तेरी माँ ही जाती है, शादी-ब्याह में खाना लेने। तेरी बुवारी तो कहती है कि वैसे खाने से तो भूखा रहना ही ठीक है।’’

‘‘पिताजी, घर गाँव की बात और है, स्कूल में ऐसा कुछ नहीं होगा। सरकार चाहती है कि स्कूल में छोटा-बडा़, जात-पात का भेदभाव न रहे। बच्चों के मन में किसी तरह की हीनभावना न रहे, जिससे कि आने वाले समय में हमारे समाज से ये कुप्रथाएँ हमेशा के लिए खत्म हो जाएँ। इसलिए सरकार ने यह नियम निकाला है कि भोजनमाता अनुसूचित जाति की भी होनी चाहिए।’’

‘‘सरकार के चाहने से कुछ नहीं होता, बेटा। सरकार के चाहने से मदनू का बाप प्रधान बन गया तो बता, गाँव के कितने लोगों ने खाना खा लिया, उसके घर पर। अरे चार लोग उसके साथ बाहर कहीं चाय भी पीते हैं, तो अपना गिलास पहले ही अलग कर लेते हैं। बेटा क्यों पड़ रहा है इस चक्कर में, क्‍यों बैर ले रहा है सबसे, नी खाने देगा दो रोटी चैन से इस गाँव में।’’

‘‘पिताजी, क्या तुम यह चाहते हो कि जो दुर्व्‍यवहार  तुम्हारे-मेरे साथ हुआ, वो हमारे बच्चों के साथ भी हो। तुम भूल सकते हो, पर मैं वो दुत्कारना, हमारे साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करना, हमें अपना जडखरीद गुलाम समझना, वो सब नहीं भूल सकता। हम सब सहन करते रहे तो क्या हमारे बच्चे भी करेंगे, नहीं बिल्कुल नहीं। मैं मर जाऊॅगा, पर अर्जी वापस नहीं लूँगा।’’

‘‘लेकिन बेटा।’’

‘‘पिताजी! तुम चुप रहो, मैंने जो सोच लिया वो सोच लिया। किसी-न-किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी। देख लेंगे, जो होगा।’’

उसके पिता, दादाजी, दादी, चाचा, माँ सब देर तक जाने क्या-क्या बातें करते रहे। नीलिमा दादी की गोद में लेटे-लेटे सुनती रही। उसे भी ध्यान आया, पिछली बार जब वह दीपिका की बुआ की शादी में गयी थी, तो गुलाबजामुन देने वाले रविन्दर ने कैसे उसे डाँटा था और बाद में आने को कहा था। लेकिन जब सूरज और निशा ने गुलाबजामुन माँगें थे तो उन्हें कुछ भी नहीं कहा और गुलाबजामुन दे दिए थे। स्कूल में भी जब भोजनमाता बच्चों से पानी मॅगवाती तो उसे मना कर देती और डाँट देती। और उस दिन, जब पकड़न पकडा़ई खेलते-खेलते वह गरिमा के पीछे दौड़ते हुए उसकी रसोई तक पहुँच गयी थी, तो उसकी दादी ने उसको गाली देते हुए कैसे बाहर भेजा था। वह समझ नहीं पाती कि ऐसा उसी के साथ क्यों होता है, स्कूल में तो वह सारे बच्चों के साथ खेलती, पर घर आकर वे ही बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ खेलने लगते और उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। जब उनकी तरफ वाले नल पर पानी बन्द हो जाता तो वह बडे़ धारे पर पानी भरने जाती। वहाँ या तो उसकी बारी सबसे बाद में आती या फिर कोई महिला किनारे पर ही अपने बर्तन से उसका बर्तन भरकर उसे जाने को कहती। जबकि उसका मन पानी की मोटी धारा के नीचे भीगने, पानी पीने का हो रहा होता। कभी-कभी जब धारे पर कोई न होता, वह देर तक पानी से खेलती, हाथ-मुँह धोती, धारे के नरसिंह वाले मुँह पर प्यार से हाथ फेरती, इधर-उधर देखकर पता लगाना चाहती कि धारे के अंदर इतना पानी आता कहाँ से है। ऐसे में अगर ऊपर मोहल्ले से कोई पानी भरने आ जाता तो वह जल्दी से पानी भरकर लौट आती। पीछे से उसे सुनाई पड़ता, ‘‘सारा धारा गन्दा कर दिया।’’ वह जानती थी कि‍ वह आदमी पहले धारा खूब धोएगा फिर पानी भरेगा। वह सोचती- मैंने धारा कैसे गन्दा कर दिया। जब धारे के नीचे कपडे़ धोते हैं, नहाते हैं, बर्तन धोते हैं, तब तो धारा गन्दा नहीं होता! उसकी माँ तो कपडे़ धोने गधेरे पर ले जाती है। माँ कपडे़ धोती है और वह अपने भाई के साथ उन्हें पत्थरों पर सुखाने डालती है। बडा़ मजा आता है। गर्मियों में उनकी माँ उन्हें वहाँ नहला भी देती है।

कभी-कभी वह अपने भाई को लेकर ऊपर वाले मुहल्ले में खेलने जाती तो उसे वहाँ कोई-न-कोई ऐसा जरूर मिल जाता, जो बिना बात उनको वहाँ से डाँट कर भगा देता। वह घर आकर अपने पिता से उसकी शिकायत करती तो वह हँसकर उसकी बात टाल देते, पर वह देखती कि हँसने के बावजूद उसके पिता के चेहरे पर अजीब सा भाव आ जाता। उसके पिता दसवीं फेल थे और खच्चर चलाते हैं। उनकी बडी़ इच्छा है कि वह और उसका भाई खूब पढ़ें-लिखें और बडा़ आदमी बनें। वह कक्षा तीन में पढ़ती है और उसका भाई एक में। वह खूब मन लगाकर पढ़ती है। उसकी दोनों मैडम उससे बहुत प्यार करती हैं। जब भी स्कूल में कोई आता है, तो उसका नाम लेकर कुछ-न-कुछ बात जरूर करती हैं। उसे यह सब बडा़ अच्छा लगता है। उसे नीरा मैडम बहुत अच्छी लगती है। वह सारे बच्चों से प्यार से बात करती हैं। उनके साथ खेलती हैं और कभी-कभी उन्हें स्कूल के आसपास घूमाने भी लेकर जाती हैं। उसने सोचा है कि‍ वह भी बडी़ होकर मैडम बनेगी।

दूसरे दिन उसके पिता स्कूल में अर्जी दे आए। उसके बाद उनके घर में अक्सर उसके दादाजी और पिता में बहस होने लगी। उसके दादाजी बार-बार उसके पिता से अर्जी वापस लेने के लिए कहते, पर उसके पिता ने तो जैसे इस मामले में दादाजी की बात न मानने की कसम ही खा रखी थी। नीलिमा को अपने घर में छिडी़ इस बहस से इतना ही लेना-देना था कि खाना खाते समय अनचाहे ही उसे यह सब सुनना पड़ता था। एक बार उसने अपनी माँ से पूछा भी कि दादाजी उसको भोजनमाता क्यों नहीं बनना देना चाहते तो माँ ने ‘तेरे मतलब की बात नहीं है’ कहकर डपट दिया था। इसी तरह की बहस स्कूल में बडी़ मैडम और नीरा मैडम के बीच भी होती रहती। नीलिमा का ध्यान अपने आप इस बहस की तरफ चला जाता क्योंकि बहस के बीच में उसकी माँ को लेकर भी बातें होतीं। बडी़ मैडम नहीं चाहती थीं कि उसकी माँ भोजनमाता बने। इस पर नीरा मैडम कहती, ‘‘नियमानुसार जो ठीक है, वो ही होना चाहिए। हम जैसे पढे़-लिखे लोग सामाजिक कुरीतियों से नहीं लडे़ंगे, तो कौन लडे़गा।’’ बीच-बीच में और लोग भी स्कूल में आकर भोजनमाता बनने की बात करते। जब स्कूल में साहब आए तो बडी़ मैडम ने उनसे कहा, ‘‘आपने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया। मैं किस-किस को समझाऊँ।’’

‘‘मैडम, हम क्या करें। नौकरी करनी है तो सरकारी आदेशों का पालन करना ही होगा। वैसे भी आपके स्कूल में अनुसूचित जाति के बच्चे बहुत ज्यादा हैं।’’ साहब ने कहा था।

नीलि‍मा को पता था कि‍ वह और उसका भाई भी अनुसूचित जाति के बच्चे हैं क्योंकि उन्हें छात्रवृत्ति मिलती है। एक बार गरिमा ने पंचगारे खेलते हुए जल्दी आउट होने पर उसे गाली भी दी थी, ‘‘तुम्हें तो छात्रवृत्ति भी मिलती है। फिर भी तुम गरीब हो! भिखमंगे कहीं के!’’ उसकी क्या गलती, अगर गरिमा को छात्रवृत्ति नहीं मिलती तो। वो भी बन जाए अनुसूचित जाति की। उसके पिताजी तो कागज बना कर लाए थे। मैडम को दिया था। ये अनुसूचित जाति क्या होता है, हम क्यों हैं अनुसूचित जाति के, सारे बच्चे अनुसूचित जाति के क्यों नहीं हैं, फिर सबको छात्रवृत्ति मिलती, गरिमा भी मुझसे नाराज नहीं होती। वह जाने क्या-क्या सोचती। जब माँ से कुछ पूछती तो माँ कहती, बडी़ होकर समझ जाएगी। उसे अपने बडे़ होने का इन्तजार होता।

कुछ भी हो नीलिमा और उसका भाई दोनों बहुत खुश थे। अब उनकी माँ भी रोज उनके स्कूल आएगी। जब वह स्कूल में उनको खाना देगी तो क्या के शर्माएँगे। दोनों भाई-बहन जाने क्या-क्या सोचते। नीलिमा सोचती- अगर उनको स्कूल में कोई बच्चा तंग करेगा तो वह उसकी शिकायत अपनी माँ से कर देगी। राहुल कितनी तडी मारता है, अपनी माँ की और उसकी माँ सब बच्चों को डाँटती रहती है। जैसे कि हमारी मैडम होगी हुँअ।

नीलिमा की माँ उठो! लो पानी पी लो। नीरा मैडम की आवाज से उसका ध्यान टूटा। नीरा मैडम उसकी माँ को उठाती हैं। उसकी माँ के नाक से खून निकल रहा है, जिसको वह अपने धोती के पल्लू से साफ करने की कोशिश कर रही है। रसोई घर के बाहर दाल-भात गिरा पडा़ है। बच्चों की थालियाँ इधर-उधर बिखरी हैं। नीलिमा अपनी माँ के पास जाना चाहती है, पर जा नहीं पा रही। उसका भाई उससे चिपक कर खडा़ रो रहा है। अचानक नीलिमा ने अपने भाई का हाथ पकडा़, अपना व उसका बस्ता उठाया और दौड़ पडी़ अपने घर की ओर। वह जल्द से जल्द अपने पिता के पास पहुँच जाना चाहती थी।

गणित की कक्षा के कुछ अनुभव : रेखा चमोली

रेखा चमोली

रेखा चमोली

गणितीय अवधारणाओ को सही-सही समझने के लिए आवश्यक है कि बच्चे अंकों, संख्याओं व संबोधों को मूर्त रूप में ज्यादा-से-ज्यादा देख-समझ पाएं। अपने पिछले शैक्षिक अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकती हूं कि कई बार मैंने यह सोचकर कि गणितीय संबोधों को मूर्त रूप में दिखाने या सवाल हल करने में समय की फिजूलखर्ची होगी, अपना पूरा कौशल व श्रम सिर्फ श्यामपट-चाक, कापी-पैंसिल या किताब तक ही सीमित रखा, लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ कि इस तरीके से कक्षा के सभी बच्चों को अवधारणा समझ में आ गयी। इसमें बच्चों के सीखने की गति पूर्वज्ञान और अनुभव अमूर्त चिंतन की दक्षता आदि कारक तो शामिल थे ही, पर गणित जैसे अमूर्त विकास की नींव कैसी बनी थी अर्थात शुरुआत किस तरह से हुई थी, बहुत बडा़ कारक था। शिक्षण में जैसे-जैसे अनुभव बढ़ते गए मेरी इस विचार में दृढ़ता बढती गयी कि गणितीय अवधारणाओं की स्पष्ट व मजबूत समझ बनाने के लिए प्रारंभिक कक्षाओं में स्थूल वस्तुओं का उपयोग व उनके बारे में बातचीत ही पक्की नींव का कार्य करती है। यहां पर मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगी कि भाषा की कक्षा में किया गया मूल कार्य अर्थात समझकर पढ़ना-लिखना व स्वयं की कल्पना से चीजों को समझकर व्यक्त कर पाना (मौखिक, लिखित दोनों तरीकों से) किसी भी अन्य विषय को समझने की पहली कड़ी है। मेरे विद्यालय के संबंध में मैं भाषा का प्रयोग हिन्दी भाषा के लिए कर रही हॅूं।

कई बार हम गणित को सिर्फ अंकों व चिन्हों का खेल समझने की भूल कर लेते हैं, और इन्हीं प्रक्रियाओं का लगातार अभ्यास करवाते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि जैसे ही अभ्यास कार्य में कमी आती हे, सवालों को हल करने में होने वाली गलतियां बढ़ती जाती हैं। और कई बार यह भी होता है कि सवाल बच्चों के सिर के ऊपर से गुजर जाता है और हम ठगे से रह जाते हैं कि हम ने तो बहुत मेहनत से इन सवालों पर पर्याप्त अभ्यास कार्य करवाया था फिर बच्चे ये सवाल हल क्यों नहीं कर पा रहे ? हमारे प्राथमिक विद्यालयों में दुर्भाग्यवश विभिन्न कारणों से सवालों का गणितीय रूप में अर्थात संख्याओं व चिन्हों के आधार पर ही ज्यादातर अभ्यास कार्य करवाए जाते हैं। परिणामस्वरूप कई बार विभिन्न गणितीय अवधारणाएं किसी श्रृंखला (चेन) की तरह आगे नहीं बढ़ती, बल्कि यहां-वहां बिखरी दिखाई पड़ती हैं। वे एक दूसरे से सह सम्बन्ध स्थापित करती नहीं दिखाई पड़तीं। बच्चे जोड़, घटाना, गुणा, भाग व अन्य अवधारणाओं को एक-दूसरे से जुड़ता हुआ न देखकर अलग-अलग व सवाल हल करने के जटिल व कठिन स्तरों के रूप में देखते हैं। कक्षा में बच्चों की प्रक्रिया ‘कितना कठिन सवाल है यह’, के रूप में व्यक्त होती है।

शिक्षिका के रूप में कार्य करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि लगातार सीखने-समझने की संभावना बनी रहती है। अपने पिछले 12 वर्षों के कुछ शैक्षिक अनुभवों को मैं आपके साथ साझा करना चाहती हूं, जिन्होंने गणितीय संबंधों को समझने में मेरी मदद की।

बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृति का विकास करना- विभिन्न शोधों के आधार पर यह बात साबित हुई है कि 7-11 वर्ष के अन्तराल में बच्चों में रचनात्मकता का विकास होता है। इससे पहले बच्चा अपने पूर्व अनुभवों अर्थात अपनी भावनाओं, कल्पनाओं व भाषा के उपयोग से चीजों व घटनाओं को समझाना प्रारम्भ कर चुका होता है। अब वह अपनी इन्हीं दक्षताओं के आधार पर सीखता हुआ नवीन ज्ञान का सृजन करता है। इस उम्र में एक सृजनाकार के रूप में विकसित होता है। यदि उसे उपयुक्त वातावरण मिले तो वह अपनी इस दक्षता का उच्चतम विकास कर पाने में सक्षम होता है। लगभग इसी उम्र के बच्चे प्राथमिक विद्यालय में होते हैं। बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति का विकास हो सके, इसके लिए मैंने बहुत सी गतिविधियों का उपयोग किया। उदाहरण स्वरूप समग्र भाषा शिक्षण पद्धति अपनाना, जिसमें भाषा सीखने के लिये अक्षरों के बजाय चित्रों, शब्दों व वाक्यों से शुरुआत की जाती है। विभिन्न अभ्यास कार्य करवाना। जैसे- किसी चित्र या विषय पर बच्चों से बातचीत करना, बातचीत के मुख्य बिन्दु लिखना व पढ़ना,  ढेर सारी कहानियां,  कविताएं बच्चों के साथ मिलकर पढ़ना। उन्हें अपनी मौलिक कविता-कहानी लिखने को प्रेरित करना, पुस्तकालय का भरपूर उपयोग करना,  पुस्तकालय का उपयोग पाठ्यपुस्तकों के साथ करना,  बच्चों के मौलिक लेखन को आपस में साझा करने के लिए प्रार्थना सभा में स्थान देना, उनकी रचनाओं से दीवार पत्रिका, बाल पत्रिका बनाना,  उसको डिस्प्ले करना व बच्चों को उसे पढ़ने को प्रेरित करना। बच्चों के मौलिक लेखन को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उदाहरण के लि‍ए चकमक, बाल प्रहरी आदि में प्रकाशन हेतु भेजना, बच्चों की पढ़ी व लिखी सामाग्री पर उनसे बात करना आदि प्रमुख रही।

इन गतिविधियों को करने का परिणाम यह रहा कि बच्चों ने जो पढ़ा-लिखा, उन्हें उसके बार में ठीक-ठीक पता था। पढ़ना-लिखना उनके लिए मशीनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि अनुभव जनित प्रक्रिया बनी, इससे उनमें स्वयं पढ़ने-लिखने की आदत का विकास हुआ।

बातचीत व कहानियों से गणितीय संबोध सिखाने की शुरुआत- कक्षा 1 व 2 के बच्चों को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से गणितीय संक्रियाएं को सिखाना प्रारम्भ किया। चूंकि छोटे बच्चों के लिए प्रत्येक वस्तु एक पात्र होती है, वे आसानी से कहानी को छोटे-छोटे पत्थरों (कंकड़ों या मनकों) की घटती-बढ़ती संख्या या कागज के रुपये, पैसे को खेलने से जोड़ पाए। 1 से शुरू कर 10, 20 या 100, 200 कंकड़ों या मनकों की पंक्ति बनाना, उन्हें उंगली लगाकर गिनना, विभिन्न आकृतियों पर कंकड सजाना व उन्हें गिनना, 5-5, 10-10 की पंक्तियां या ढेर बनाना, चीजों को बांटना या ज्यादा कम करना, जैसे खेलों ने बच्चों को संबोधों का सह सम्बन्ध या अन्तर करना सिखाया। इस दौराना हुई बातचीत ने उन्हें सीखे हुए को सुदृढ़ बनाने में मदद की। इसी के साथ शुरू हुई कापी पर अंकों को लिखने व चिन्हों के साथ संक्रियाओं को हल करने की शुरुआत। अब बच्चे कहानी के साथ खेल रहे थे और अपनी बातचीत को अपनी कापी पर गणितीय रूप में लिख भी रहे थे। किसी आकृति पर कंकड़ या मनके सजाते हुए या एक लम्बी पंक्ति बनाते हुए जब वे गिनने की प्रक्रिया कर रहे थे, तो देख पा रहे थे कि 5 से 15 तक पहुंचने के लिए कितने अंक और बढ़ाने पड़ते हैं। 8 या 15 के बीच कितना अंतर होता है।

इसी प्रकार बातचीत करते हुए जोड़, घटाना, गुणा व भाग की संक्रियाओं को हल करने की शुरुआत हुई, जो पहले वस्तुओं के प्रयोग के साथ फिर कापी पर अंकों व चिन्हों के प्रयोग के रूप में साथ-साथ चली। इससे बच्चे किसी संक्रिया को मूर्त रूप से भी देख पाए और अमूर्त के रूप में भी समझने की ओर आगे बढे़।

उदाहरण 1 – तुम्हारे पापा ने तुम्हें दो टाफी दी, दो टाफी भैया ने दी। बताओ- तुम्हारे पास कितनी टाफी हुई या मां ने तुम्हें दो चाकलेट दी, तुम्हारे पास 5 चाकलेट हो जाएं, इसके लि‍ए मां को तुम्हें कितनी चाकलेट और देनी होगी?

जब कक्षा 1, 2 या आवश्यकता पढ़ने पर बड़े बच्चों के साथ भी कंकड़ों के माध्यम से इस तरह की बातचीत की जाती है कि ये पांच कंकड़ों की पंक्ति है। इनको क्रम में लगाने से ये पत्थर पांचवां पत्थर है। दूसरी ओर से गिनने पर ये वाला पत्थर पांचवां पत्थर है और ये सब मिलाकर 5 हैं, तो बच्चे को बहुत सारी चीजें एक साथ समझ आती हैं। क्रम से बढ़ना, एक के बाद एक कम या ज्यादा होना, पांच या पांचवें में अन्तर पता चलना आदि।

उदाहरण-2– तुम्हारे घर में 5 मेहमान आए हैं, तुम्हें प्रत्येक मेहमान को 2-2 आम देने हैं। बताओ तुम्हें कितने आम चाहिए या तुम्हारे पास 15 आम हैं। इन्हें तुम्हें अपने 5 मेहमानों में बांटना है। बताओ- प्रत्येक को कितने आम्‍ मिलेंगे या अगर तुम्हें प्रत्येक को 4-4 आम देने हों तो तुम्हें कितने आम और चाहिए?

तुम्हारे पास 4 सेब थे। तुमने दो अपने भाई को दे दिए, तो तुम्हारे पास कितने सेब बचे। हम बड़ों की दृष्टि से ये सवाल बहुत सरल लगते हैं, पर बच्चा जब इन सवालों का हल कंकड़ों व अपने दोस्तों की मदद से निकाल रहा होता है तो मूर्त रूप से अभिनय करता हुआ, गिनता व बांटता हुआ अपने मस्तिष्क में संख्याओं की छबि बनाता चलता है। गणितीय चिन्ह व संख्याएं आत्मसात करता चलता है। इस तरह से की गई गणित की शुरुआत बच्चों की समझ को पुख्ता करती है, और उनमें स्थायी ज्ञान का निर्माण करती है।

मैजिक कार्ड्स का उपयोग करना- स्थानीय मान की समझ बनाने के लिए इकाई से लेकर करोड़ तक की संख्या के कार्ड बहुत मदद करते हैं। संख्याएं बनाते हुए जब बच्चे 100 और 5 के कार्ड को मिलाकर 105 बनाते हैं तो वे अंकों की जगह को समझते हैं, वहीं संख्याएं बनाते हुए तब तक संख्याएं सही नहीं बनती जब तक कि सभी कार्ड सही जगह पर एक-दूसरे के उपर ना रखे हों। कार्ड जमा करके संख्याएं बनाने के खेल में बहुत-सी अन्य गतिविधियां करवाई जा सकती हैं।

क. अलग-अलग संख्याएं बनाना व उनमें सबसे बड़ी व सबसे छोटी संख्या पहचानना।

ख. कार्ड की मदद से स्थान बदल-बदल कर नयी-नयी संख्याएं बनाना।

. आरोही व अवरोही क्रम में लगाना।

घ. सबसे बड़ी संख्या से सबसे छोटी संख्या घटाना।

ड. अलग अलग बच्चों के पास अलग-अलग संख्या कार्ड हैं, जो संख्या श्यामपटृ पर लिखी है, या मैंने बोली है, वह संख्या मिलकर बनाना। उदाहरण- 5326 बनाने के लिये, वे बच्चे आगे आएंगे जिनके पास 5000, 300, 20 व 6 के कार्ड होगे।

इसी तरह के कार्ड बनाने की आवश्यकता तब लगी, जब कुछ बच्चों ने एक सौ तीन को 103 की बजाए 1003 लिखा।

कई बार कक्षा 4 व 5 के कुछ बच्चे भी उन संख्याओं को लिखने में गलतियां कर देते हैं, जिनमें किसी स्थान पर शून्य भी होता है। ऐसे में समझ आता है कि स्थानीय मान की समझ बनाने के लिए इस अंक का मान हजार है और इसका इकाई है और ये दोनों मिलकर 60001 बना रहे हैं, कहने से काम नहीं चलता। शुरू में बच्चों को कार्ड या रंगबिरंगे मनकों से समझने की आवश्यकता होती है। जब बच्चे खुद कार्ड बनाकर या मनके चुनकर संख्याएं बनाते हैं तो वे उनके स्थान के मान को समझ रहे होते हैं।

जिन बच्चों के साथ कक्षा 1, 2 में अवधारणों के ठीक तरह से काम हुआ होता है, वे ही बच्चे कक्षा 3,4,5 की दक्षताओं पर काम कर पाते हैं। कक्षा 3,4,5 में पाठ्यक्रम के अनुसार काम शुरू करने के लिए बेस तैयार होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि अब संक्रियाएं थोड़ी बड़ी व जटिल होती जाती हैं। ऐसे में पूर्व में बनी समझ अगर स्पष्ट नहीं है, तो नवीन अवधारणाओं को समझने में बाधाएं आती हैं।

गणित क्रम व पैटर्न का खेल है। इसमें संबोध एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। बिना पहला स्टेप पूरा किए सीधे दूसरे या तीसरे स्टेप पर नहीं जा सकते।

संख्या ढूंढो़ सवाल बनाओ-

कक्षा 3,4,5 को स्वयं सवाल बनाकर लाने को कहने पर पता चला कि बच्चे जानबूझकर छोटी संख्याओं से सवाल बना रहे हैं? बड़े बच्चे भी भले ही 7,8 अंकों की संख्या लिख रहे हैं, पर वे अंकों को 4,5 से बड़ा नहीं लिख रहे। इससे ये बात समझ में आई कि बच्चों में बड़ी संख्या या हासिल लेने के लिए डर है। उन्हें डर है कि‍ कहीं उनका सवाल गलत न हो जाए। एक दिन जब कक्षा 3 में जोड़ के कुछ सवाल श्यामपट पर लिख रही थी, तो कुछ बच्चे पूछने लगे कि हासिल वाले सवाल हैं या बिना हासिल वाले। बच्चों को हासिल वाले सवालों से इतना डर क्यों लगता है?

एक और समस्या कक्षा 4 व 5 के कुछ बच्चों के साथ आई, जब मैंने उन्हें दो अलग-अलग संख्याओं को देकर घटाने का इबारती प्रश्न बनाने को कहा तो कुछ बच्चे बड़ी व छोटी संख्या में अन्तर नहीं कर पाए। उन्हें समझ नहीं आया कि किस संख्या को पहले लिखें और किस को बाद में। उन्होनें बिना समझे पहली संख्या को पहले लिखकर उससे दूसरी संख्या को घटाने का प्रयास किया व जहां तक संख्या घटी उसे घटाकर छोड़ दिया।

उदाहरण- 2468-8392= 076

एक और समस्या आई, जब चार पांच अलग-अलग संख्या देकर जोड़ने के सवाल में कुछ बच्चों ने संख्याओं को गलत लगाकर जोड़ दिया और ये ध्यान भी नहीं दिया कि इतनी बड़ी संख्या में उत्तर कैसे आ सकता है? उदारण 20, 402, 7, 27, 3205 को जोड़ना।

-20+402+7+27+(…)+ 3205+18925

जब बच्चे कक्षा 4,5 में इस तरह की गलतियां करते हैं तो यह बहुत ही खीझ और गुस्सा दिलाने वाली घटना होती है। लगता है इतनी छोटी-छोटी बातें बच्चे क्यों समझ नहीं पा रहे।

हालांकि एक बार ध्यान दिलाने पर बच्चों को अपनी गलती का तुरंत पता चल जाता है, पर कुछ दिनों बाद पुनरावृति‍ करने पर कुछ बच्चों के साथ फिर से ऐसी समस्याएं आती हैं। ऐसे में पूरी कक्षा को एक साथ लेकर किसी नई अवधारणा पर काम करना मुश्किल होता है।

वे क्या कारण होते होंगे, जिनसे बच्चे संख्याओं व संक्रियाओं को समझ नहीं पाते, उन्हें संख्याओं से खेलने का मन नहीं करता, उनका ध्यान उनके बड़े आकार या मान की तरफ नहीं जाता ? जब मैंने इस दिशा में सोचना शुरू किया तो पाया कि स्थानीय मान की समझ न होने के अलावा इसका एक प्रमुख कारण बच्चों में संख्याओं का उपयोग करने हेतु कोई उत्साह नहीं होना भी है, वो उत्साह जो उन्हें कहानी या कविता की किसी किताब को पढ़ने में आता है। वो उत्सुकता जो उन्हें पुस्तकालय में जाने की होती है, गणित की किताब देखते ही भय में क्यों बदल जाती है?

अपने आसपास देखकर मुझे कुछ संख्या बताओ पूछने पर जब बच्चों ने दो -चार संख्याएं ही बताई तो मुझे घोर निराशा हुई। बच्चे क्यों नहीं संख्याओं को खोज पा रहे। बच्चों का ध्यान संख्या की ओर आकर्षित करने के लिए मैंने अगले कुछ दिन व्यावहारिक अभ्यास करने का निश्चय किया। दरअसल, गणित की मुख्य समस्या यही है, किताबी संक्रियाओं को व्यवहार में न उतार पाना।

हमने अपने काम की शुरुआत संख्या ढूंढ़ने से की और चीजों को गिनना शुरू किया। जैसे- हमारे विद्यालय में कितने कमरे हैं, तुम्हारी कक्षा में कितने चार्ट लगे हैं, कक्षा में कितनी लड़कियां और कितने लड़के हैं? क्यारी में फूलों के कितने पौधे लगे हैं? आदि।

पहले दिन बच्चों ने सिर्फ संख्याएं खोजीं। विद्यालय में भी और घर में भी।

दूसरे दिन कक्षा में संख्याओं को और विस्तार से खोजा गया। आपस में बातचीत कर संख्याएं ढूंढी़ गईं, जिसके लिए कुछ बिन्दू बनाए। जैसे- तुम्हारी उम्र कितनी है, तुम कितने भाई-बहन हो, तुम्हारे दोस्त की उम्र कितनी है। मैंने बच्चों से कहा वे दो-दो के जोड़े में एक-दूसरे से ऐसे सवाल पूछें जिनसे उन्हें संख्याएं मिलें।

आज घर से संख्याएं ढूढ़ने के लिए भी कुछ प्रश्न बनाए।

जैसे- तुम्हारे घर में कितने सदस्य हैं, उनमें महिलाएं कितनी हैं और पुरुष कितने हैं, बड़े कितने, बच्चे कितने? कौन कहां तक पढ़ा लिखा है, उनकी उम्र कितनी है आदि।

बच्चे घर से ये सारी जानकारि‍यां एकत्रित कर के लाए।

जब हमारे पास बहुत सारी संख्याएं एकत्रित हो गईं, तो इनसे सवाल बनाने की प्रक्रिया शुरू की। कुछ सवालों के उदाहरण स्वयं बच्चों को दिए व उन्हें नए सवाल बनाने को प्रेरित किया। अब बच्चों के पास संख्याएं थीं और उन संख्याओं से सवाल बनाने थे। बच्चों को इसमें मजा आया। वे सवालों के पैटर्न पहचानने लगे, संक्रियाओं का आपसी सम्बन्ध पहचान झटपट नए सवाल बनाने लगे। उनमें एक-दूसरे से ज्यादा सवाल बनाने की होड़ होने लगी। साथ ही एक-दूसरे के बारे में जानने की उत्सुकता होने लगी। गणित उन्हें अपने स्वयं के जीवन व घर में आसपास नजर आने लगा। सवाल तैरने लगे। बच्चों ने अपनी घर परिवार में एकत्रित हुई संख्याओं पर 25-30 सवाल बनाए।

जैसे- तुम्हारी मां की उम्र कितनी है?

तुम्हारी उम्र कितनी है?

तुम्हारी मां और तुम्हारी उम्र में कितना अंतर है?

विद्यालय व घर से सवाल बनाना शुरू करके हमने अपने आसपास संख्याएं एकत्रित की। कुछ बच्चों के साथ मिलकर मैंने कुछ टहनियां एकत्रित की। बच्चों ने उन टहनियों पर लगे पत्तों की संख्या गिनी व उन पर सवाल बनाए।

जैसे- सबसे ज्यादा पत्ते किस टहनी पर लगे हैं? सारी टहनियों को मिलाकर कितने पत्ते हैं?

अभी मैं यह सोच ही रही थी कि क्या यह तरीका काम करेगा ? बच्चों का गणित की कक्षा में मन लगेगा। उनका संख्याओं के प्रति उत्साह जागेगा कि बच्चे स्वयं अपनी वस्तुओं व आसपास की चीजों पर सवाल बनाकर दिखाने लगे। जैसे- गणित की किताब में 187 पेज हैं, हिन्दी की किताब में 144 पेज हैं। बताओ किसके पेज ज्यादा हैं? और कितने ? दोनों किताबों के पेज मिलाकर कितने पेज हैं? अगर इसमें संस्कृत की किताब के पेज भी मिला दिए जाएं तो कुल कितने पेज हो जाएगें?  इस तरह के सवालों को हल करने के बाद मैंने बच्चों का ध्यान सवाल बनाने के कुछ पैटर्न की तरफ दिलाया, जिससे हम स्वयं उन सवालों को बना सकें व अभ्यास कर सकें।

जैसे- घटाने के बड़े सवाल बनाना, जिनमें बार-बार हासिल लेनी पड़े, कैसे बनाएंगे ?इसी के साथ बच्चों से दुबारा हासिल की अवधारणा व आवश्यकता पर भी बात की। उन्हें संख्या कार्ड बनाना सिखाया, बच्चों ने इकाई से लेकर करोड़ तक की संख्या के कार्ड स्वयं बनाए व उनसे खूब खेला।

बच्चों ने अपनी चीजों,  स्कूल,  घर व आसपास खूब सारे पैटर्न ढूंढे़। संख्याओं से तरह-तरह के पैटर्न बनाए। बच्चों को सवाल करने अच्छा लगे, उनका आत्मविश्वास बढे़ इसके लिए उनसे कक्षा 1, 2, 3 व कक्षा 5 से 1, 2 , 3 व 4 की गणित की किताब से सवाल हल करवाए। बच्चों ने यह गतिविधि दो तरह से की। वे सवाल जिनका हल उन्होंने मौखिक रूप से निकाला और वे सवाल जिन्हें कापी पर हल करना पडा़। इन सवालों को हल करते हुए उन्होंने यह भी जाना कि वे कितने तरह के सवाल हल कर पा रहे हैं और उन्हें कहां परेशानी हो रही है। बच्चों का संकोच खत्म हुआ। वे यह कहकर सवाल दिखाने आए कि मुझे इतने तरह के सवाल करने आ गए हैं, पर यहां पर कठिनाई आ रही है। जिन बच्चों ने जल्दी-जल्दी काम किया, उन्होंने बाकि बच्चों की मदद की। इस तरह काम करने से सारी समस्याएं तो खत्म नहीं हुई, पर गणित की कक्षा का माहौल जरूर बदल गया। बच्चों में सवालों का हल खोजने की इच्छा जगी। मेरा भी खुद पर आत्मविश्वास बढा़।

ये बात सही है कि गणित में हम प्रत्येक चीज को स्थूल रूप में नहीं दिखा सकते, हमें कल्पना करना व अमूर्त में देखना, महसूस करना आना चाहिए। पर इस अमूर्तता को बच्चे अच्छी तरह समझ पाएं इसके लिए प्रारम्भिक कक्षाओं में खासतौर पर कक्षा 1 व 2 में बच्चों के साथ ढेर सारी बातचीत बहुत जरूरी होती है। सिर्फ गणितीय तरीकों से जिन बच्चों के साथ सवालों को हल करने का अभ्यास करवाया जाता है, वे इबारती प्रश्न हल करते हुए गलतियां करने लगते हैं, क्योंकि वे संबोधों को समझ नहीं पाते। उन्हें पता नहीं चलता कि इस सवाल में किस संक्रिया का उपयोग करना है?

अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे गणित में रुचि लें तो हमें उन्हें संख्याओं से खेलना सीखाना होगा, उन्हें संख्याएं देखने, खोजने के लिए प्रेरित करना होगा।

इसमें कोई शंका नहीं कि हमारे अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में दो शिक्षक होते है। कहीं-कहीं तो एक ही शिक्षक के भरोसे पूरा विद्यालय होता है। तब इस तरह से गतिविधियों को कराने हेतु पर्याप्त समय नहीं रहता, पर हमें इसी समय व संसाधनों में से कुछ तरीके निकालने होंगे।

मेरे साथ अक्सर होता है कि इन गतिविधियों में काफी समय लग जाता है। लगता है कि अब क्या होगा, क्या बाकी का पाठ्यक्रम समय पर सिखा पॉंऊगी? पर आश्चर्यजनक रूप से इन गतिविधियों के बाद बच्चों के काम करने की गति व उत्साह बढ़ जाता है  और हम पाठ्यक्रम के अनुसार दी गई संक्रियाएं पूरी कर पाते हैं।

शिक्षक होने के लिए बहुत जरूरी है कि निरन्तर सीखने-सिखाने की लौ मन में जगी रहे। आज मैंने क्या सीखा और अपने बच्चों को क्या सिखा पाई। ये बात रोज काम खत्म होने पर मन में उठनी चाहिए। एक बेचैनी बनी रहनी चाहिए कि बच्चे वे दक्षताऐं हासिल क्यों नहीं कर पा रहें, जिनके लिए मैं इतना प्रयास कर रही हूं। क्या बच्चों में कमियां हैं ? क्या मुझे मेरे तरीके बदलने चाहिए? तभी कुछ बात बन सकती है। अपनी पिछले 12 वर्षों के शिक्षण कार्य में मैंने बच्चों के साथ बहुत कुछ सीखा है। ये सीखना जारी है।

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

प्रति संसार की रचना : महेश चंद्र पुनेठा

युवा कवियित्री रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्‍मान’ से सम्‍मानित किया गया है। कवि महेश चंद्र पुनेठा द्वारा लिखी गई उनके कविता संग्रह ‘पेड़ बनी स्‍त्री’ की भूमिका-

स्त्री मन की उधेड़बुन, बेचैनी, झुँझलाहट, खीज, आशा-आकांशा को जितनी गहराई और प्रमाणिकता से एक स्त्री की रचनाओं में जाना और महसूस किया जा सकता है शायद और कहीं नहीं। रचना में एक स्त्री अपने मन को पूरी तरह से उडे़ल कर रख देती है। स्त्री के विद्रोही मन की ऊँचाई और प्रेमी मन की गहराई का असली भान उसकी रचना में ही होता है। उसके लिये वास्तविक संसार में वह जो सम्‍भव नहीं उसे अपने कविता-संसार में सम्‍भव कर दिखाती है। एक ऐसे प्रति संसार की रचना करती है जो उसे पसंद है। रेखा की प्रस्तुत संग्रह की कविताएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ये कविताएं जितना एक स्त्री जीवन के बाह्य पक्ष के बारे में बताती हैं उससे ज्यादा उसके मन के बारे में। एक स्त्री अपने आसपास को किस तरह देखती है और आसपास की तमाम चीजें और घटनाएं उसके मन पर कैसा प्रभाव डालती हैं, यह इन कविताओं में दृष्टिगोचर होता है। इनके यहाँ प्रेम और विद्रोह दोनों है। वह अंधविश्‍वासों और रूढि़यों से मुठभेड़ करती हैं। चीजों को उसी रूप में नहीं स्वीकारती हैं जैसी पहले से चली आ रही हैं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल करते हुए जो उन्हें तर्क संगत लगता है उसे स्वीकार करती हैं। स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान के साथ होने वाला कोई भी खिलवाड़ उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

रेखा में अपनी बात को बेवाक रूप से कहने का साहस भी है और दृढ़ता भी। उनमें सामंती मूल्यों के प्रति गहरा आक्रोश है। वह उन्हें तोड़ना चाहती हैं। पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के साथ होने वाले हर छल-छद्म से वह परिचित हैं। उसको अपनी कविताओं में निर्ममता से उघाड़ती हैं। ‘स्त्री पूजा’ के प्रपंच को वह अच्छी तरह जानती और समझती हैं इसलिए उसकी कोई परवाह नहीं करती हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि स्त्री पूजा उसको सम्मान देने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान की खुशफहमी पैदा कर उसका मनमाफिक उपयोग करने की चालाक कोशिश है। महिमामंडित कर चुप कराने का षड्यंत्र है ताकि उसके भीतर किसी तरह का विद्रोह पैदा न होने पाए। उसको यह खुशफहमी रहे कि कोई बात नहीं, भले कितने ही दुःख-दर्द सहन करने पड़ें पर उसका सम्मान तो कायम है। लाज, प्रेम, दया,  क्षमा, त्याग, विनयशीलता, आज्ञाकारिता, समर्पण को स्त्री के गहने क्यों बताए गये हैं, इसको भी वह अच्छी तरह समझती हैं। वह मानती हैं कि जब स्त्री समाज के बनाए सामंती नियम-कानूनों और मूल्यों के बोझ से बाहर निकलेगी तभी सही अर्थों में उसकी मुक्ति सम्‍भव है।

रेखा की कविताओं में जगह-जगह स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा पंख फड़फड़ाती हुई दिखाई देती है। उनकी स्त्री लकीरों से बाहर निकलकर अपना मनचाहा संसार रचना चाहती है, भले ही व्यवस्था को लकीर से बाहर जाना पसंद नहीं है। उनके यहाँ ‘उड़ान’ बीज शब्द के रूप में आता है जो मुक्ति का प्रतीक है। यह अच्छी बात है कि उनकी स्त्री के भीतर तमाम परेशानियों और जाल-जंजालों के बावजूद भी मुक्ति की आकांक्षा मरती नहीं है। वह उड़ना चाहती है। अपने पंखों को हमेशा तोलती रहती है। परिस्थितियों के सामने झुकती नहीं है बल्कि उससे टकराना चाहती है। उठ खड़ी होती है। निर्भीक होकर अपनी सहमति-असहमति व्यक्त करती है यह जानते हुए भी कि औरत की हर लड़ाई में उसकी देह को ही उसका दुश्मन बना दिया जाता है। फिर भी उनकी इच्छा है कि बेटियाँ खूब नाचें-गाएं, खेलें-कूदें जिससे गूँज उठें दसों-दिशाएं।

प्रकृति के विभिन्न उपादान इन कविताओं में बार-बार आते हैं। प्रकृति का आलंबन लेकर अपने दुःख-दर्द, हर्ष-उल्लास और आशा-आकांशा को व्यक्त करने का औरत का बहुत पुराना तरीका इन कविताओं में भी परिलक्षित होता है। सूरज, पेड़, बादल, बारिश, नदी, पहाड़, धूप, फूल-पत्ती आदि इन कविताओं में बहुत आते हैं। यह कवियित्री की प्रकृति से निकटता को बताती है। यहाँ इन सबका मानवीकरण कर दिया है। कवियित्री इनसे बतियाती है। अपने दुःख-दर्द उनको सुनाती है। स्त्री के दुःख इतने अधिक हैं कि फिर भी खत्म नहीं होते।

रेखा की कविताओं में प्रेम की गहरी एवं विलक्षण अनुभूति के दर्शन होते हैं। एक ऐसी परिस्थिति में जबकि घर-बाहर के काम के बोझ से दबी औरत के पास ‘प्यार-व्यार’ की बातों के लिए समय तक नहीं है उसमें रेखा का प्रेम कविताएं लिखना प्रीतकर लगता है। तमाम व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी प्रेम के प्रति सम्मान का भाव है। उनकी कविताओं में आया प्रेम फिल्मी प्रेम नहीं, बल्कि जीवन का सबसे उद्दात भाव है जो मजबूती से थामे रखता है। जिसकी नमी, तरलता, हरापन बचाए रखती है आदमी होने के अहसास को। उनके लिए प्रेम मनुष्य होने का पर्याय है। वह मानती हैं कि प्रेम करना किसी लड़की के लिये  हथेली में गुलाब उगाने जैसा है जिसकी मीठी चुभन को तो छुपाया जा सकता है पर खुशबू को नहीं। प्रेम के सामने सामंती और पूँजीवादी मूल्यों के चलते आने वाले खतरों से भी रेखा वाकिफ हैं। ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं पर वह व्यंग्य करती हैं कि ये सब घटनाएं उस देश में होती हैं जिसमें ‘राधा-कृष्ण’ की पूजा की जाती है। वह स्त्रियों को सलाह देती हैं- तुम जरूर करना प्रेम/पर ऐसा नहीं कि/जिससे प्रेम करना उसी में/ढूँढने लगना/आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप। अर्थात अपनी अस्मिता को बचाए रखना। वह इसके खिलाफ दिखती हैं कि प्रेम में अपने अस्तित्व को ही मिटा दिया जाय जैसे नदी सागर में मिलकर मिटा डालती है क्योंकि जब स्त्री बचे रहेगी तभी दुनिया का अस्तित्व भी बचा रहेगा। यह स्त्री अस्मिता के प्रति उनकी अतिरिक्त सजगता ही कही जाएगी।

इन कविताओं में ग्वाले, घसियारिनें, स्कूली बच्चे, खेतों में खरपतावार हटा-हटाकर थक गई बहू-बेटियाँ, दूर शहर गए आदमी के इंतजार में बैठी पहाड़ी स्त्री, सड़क किनारे खेलते नंग धड़ंग बच्चे, भीख मांगती मांएं भी दिखाई देते हैं। अपने आसपास की केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि उसके बीच रह रहे श्रम करते लोगों पर भी रेखा का ध्यान बराबर जाता है। यह उनके अपने लोक और श्रम से संपृक्ति का प्रमाण है।

रेखा की कविताओं की खासियत है कि वह किसी बात को उलझाती नहीं हैं। भाषा के खेल के द्वारा कोई चमत्मकार पैदा करने की कोशिश नहीं करती हैं। बोलचाल के उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जो उनके पास सहजता से उपलब्ध हैं। बिम्‍बों में अपनी बात कहती हैं पर उनके लिये भी कहीं दूर नहीं जाती हैं बस अपने आसपास से ही उठाती हैं। अपनी कोमल भावनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों को अपनी कल्पनाशीलता से एक नया और मोहक रूप प्रदान कर देती हैं। उनकी बालसुलभ कल्पनाएं बहुत भाती हैं। प्रेम कविताओं में तो मानो उनकी कल्पनाशीलता को नये पंख लग जाते हैं।

रेखा की कविताएं पहाड़ी झरने की तरह हैं जो एक ओर देखने वाले को भीतर-बाहर से भिगोती हैं तो दूसरी ओर कठोर से कठोर चट्टानी भूमि को भी तोड़ केनन में बदल डालती हैं। फिर केनन पानी से लबालब भरकर हर पल तरंगायित होता रहता है। उसके छींटे आसपास फैलकर सभी को नम कर देते हैं। इन कविताओं को पढ़ने के बाद पाठक वह नहीं रह जाता है जो उससे पहले होता है। लगातार एक झरना उसके भीतर प्रवाहित होते रहता है। रेखा अपनी अद्भुत कल्पनाओं से उसे गुदगुदाते हुए एक नए लोक में ले जाती हैं जहाँ पहुँचते-पहुँचते उनके तीखे प्रश्‍न फिर उसे वास्तविक लोक में लौटा ला उससे जिरह करने लगते हैं। पाठक सोचने-विचारने को मजबूर हो जाता है और उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाशने लगता है। तब उसे लगता है कि उसकी नजर जहाँ सब कुछ ठीक-ठाक देख रही थी वह वैसी नहीं है। चीजें बहुत गड़बड़ हैं। उनको सही करने की जरूरत है। इस तरह ये कविताएं हमें सचेत करती हैं। इन कविताओं को धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है।

किताब : पेड बनी स्‍त्री (कविता संग्रह)
कवियित्री : रेखा चमोली
मूल्‍य : 100 रुपये
प्रकाशक: बिनसर पब्लिकेशन कंपनी, 8 प्रथम तल 4, डिस्पेंसरी रोड देहरादून-248001

‘पेड़ बनी स्‍त्री’ से रेखा चमोली की कुछ कविताएं

कविता खुद में झाँकने को मजबूर करती है : रेखा चमोली

रेखा चमोली

मैं जिस जगह रहती हूँ वह एक छोटा सा सीमांत पहाड़ी जिला (उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड) है जो चीन की सीमा से लगा है। गंगा यहीं से निकलती है। एक तीर्थस्थल के रूप में इसका बहुत अधिक महत्व है। यहाँ का जनजीवन बहुत कठिन है। सर्दियों में जहां अत्यधिक ठंड पड़ने से पूरा क्षेत्र प्रभावित रहता है, वहीं बरसात में चार महीने की घनघोर बारिश से सारे रास्ते, सड़कें टूट जाने से यातायात अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसी साल जुलाई में बादल फटने से आई बाढ़ में पूरा शहर लगभग दो माह तक बुरी तरह प्रभावित रहा। बहुत अधिक जनहानि हुई और आगे भी जाने कितने वर्ष इसको ठीक होने में लगेंगे। पहाड़ों से पलायन निरन्तर जारी है। घर-गाँव में बचे हैं तो सिर्फ बूढ़े,  महिलायें और बच्चे। वे ही पुरुष गाँव में हैं जो रोजगार की तलाश में बाहर नहीं जा पाये। खेती-किसानी मौसम की मेहरबानी पर ही टिकी हुई है।

नदियों पर बाँध बनाने की होड़ ने पहाड़ को जगह-जगह से छलनी कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों से लगता है कभी न खत्म होने वाले निर्माण कार्यों के बीच ये अस्त-व्यस्त जनजीवन कभी पटरी पर आ भी पायेगा या नहीं।

महिलायें पहाड़ की रीढ़ हैं। घर, खेत, जंगल, जानवर सब इनके भरोसे हैं। अलसुबह से शुरू हुई इनकी दिनचर्या देर रात तक बेहद व्यस्त रहती है। बच्चे भी माँओ की यथासम्‍भव मदद करते रहते हैं। जंगल लगातार कम होने से पशुओं का चारा और लकड़ी लेने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है।

साहित्यिक दृष्टि से यह एक अनजाना-अनपहचाना स्थान है। इस छोटे से स्थान में आज भी पत्र-पत्रिकाओं की मात्र दो दुकाने हैं जहाँ साहित्यिक पत्रिकाएं मुश्किल से ही मिल पाती हैं। ऐसे में, अगर मैं वर्षों तक जिला पुस्तकालय की मोटी-मोटी किताबें बिना किसी दिशा या प्रयोजन के मात्र स्वांतः सुखाय पढ़ती रही तो कोई आश्चर्य नहीं। पर इन किताबों ने मुझे बहुत कुछ दिया। शायद इन्हीं किताबों का असर रहा होगा जिसने मुझे विद्रोही और सम्‍वेदनशील बनाया।

स्वाध्याय का यह संस्कार मुझे अपनी माँ से मिला जो आज भी अमिट हैं। समय के साथ उसकी छाप गहरी होती गई। मेरी माँ बहुत मेहनती व साहसी महिला हैं। वह नौकरी करतीं, घर परिवार सम्‍भालतीं और जब तमाम तरह की जिम्मेदारियों से निपट कर सोने जातीं तो कोई न कोई किताब उनके पास होती। वह बहुत सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं। शायद इसीलिए मैं भी ऐसी बन पाई।

स्वाध्याय के साथ ही साहित्यक पत्र-पत्रिकाओं ने मेरे सोचने,  लिखने को काफी प्रभावित किया है। ‘कृति ओर’, ‘कथन’, ‘वागर्थ’, ‘सूत्र’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘उत्तरा’, ‘सर्वनाम’, ‘लोकगंगा’ जैसी पत्र-पत्रिकाएं पढ़कर लगा मेरे जैसे सोचने वाले बहुत से लोग इस दुनिया में हैं, जो चुपचाप अपना काम कर रहे हैं।

‘अपने-अपने राम’, ‘कोई तो’, ‘माँ’, ‘असली इंसान’, ‘तरूणाई का तराना’, ‘पहला अध्यापक’, ‘स्त्री उपेक्षिता’, ‘अन्या से अनन्या’, जैसी अनगिनत किताबों ने दुनिया को समझने के आयाम दिये। इन किताबों को पढ़ने के बाद मेरा खुद पर विश्वास बढ़ा, चीजों को जैसे हैं वैसे देखने के बजाय उनको नये अवलोकनों, तर्कों, संदर्भों के साथ जोड़कर देखना सीखा। नार्गाजुन, केदारनाथ अग्रवाल, विजेन्द्र, महाश्वेता देवी, चन्द्रकांत देवताले जैसे जमीन से जुड़े रचनाकारों ने मुझे हमेशा प्रेरित किया।

हमारे समाज में महिलायें आज भी एक अलग प्रजाति मानी जाती हैं। शिक्षा-संस्कृति और समाज में तमाम परिवर्तनों के बावजूद उनकी स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया। वे घर की चार दीवारी से बाहर तो अवश्य आ गई हैं, पर सामाजिक-वर्जनाओं की दीवार से अभी तक बाहर नहीं निकल पाई हैं । आज भी उनके पास अपने जीवन के बारे में जरूरी निर्णय लेने की आजादी नहीं है। वे महिलायें जो पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं, परम्पराओं पर सवाल खड़े करती हैं, आलोचनाओं के निशाने पर आ जाती हैं। उनके अस्तित्व और स्वाभिमान पर चोट कर उनको दीन-हीन बनाने का प्रयास आज भी जारी है। घर-परिवार और समाज में अपने लिये उन्होंने जो थोड़ी सी टिकाऊ जमीन बनाई है वो उनके अदम्य जीवन शक्ति का परिणाम है। साहित्य ने हमेशा उनकी इस जीवन शक्ति को बढ़ाने और उसके बारे में समझ बनाने का काम किया है। मेरे जीवन में भी साहित्य की यही भूमिका रही।

जहाँ तक अपनी कविता की बात है- मेरी कविता उनकी कविता है जो सदा से हाशिये पर धकेले गये हैं। जिनके साथ हुए अमानवीय व्यवहार को ईश्वर की मर्जी, कर्मों का फल या ऐसा ही होता आया है मानकर सहज स्वीकार किया जाता है। भले ही वे कभी इन कविताओं को न पढ़ पायें, उनको पता भी न चले कि वे मेरी कविताओं के विषय हैं, फिर किसी कविता का विषय हो जाने से उन्हें क्या मिल जायेगा। बावजूद इसके मेरा विश्वास है कि इन टूटी-फूटी कविताओं की आवाजें अपना कुछ न कुछ असर तो दिखायेंगी। ये मानकर ही लिखती आई हूँ कवितायें। मेरा मानना है कि जीवन के अनुभवों और यथार्थ से उपजी जीवन जैसी कवितायें ही सच्ची कवितायें हैं। मेरी कविताओं में दुख, निराशा, अपमान,  हिंसा और असमानता की बाते हैं क्योंकि इन सब चीजों का अस्तित्व दुनिया में है। तब और ज्यादा है जब महिलायें या वंचित वर्ग परम्पराओं और व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करके हल निकालने का प्रयास करते हैं। अच्छा सुंदर तो सबकुछ यथास्थिति स्वीकार करने में ही है। परिवर्तन की आहटों में, निर्माण की प्रक्रिया में उथलपुथल तो होगी ही। पीड़ा बिना कब नवनिर्माण होता है। मेरे लिए कविता ऑक्सीजन की तरह है। तो आत्मसम्मान और आत्मसंतोष के साथ अपने अस्तित्व की पहचान, अपनी आत्मा के प्रति जवाबदेही भी है। अगर मेरी कविता समानता, प्रेम, बराबरी, शांति और सम्मान से भरी दुनिया के निर्माण में रत्तीभर भी सहयोग कर पाती है तो मैं मानूँगी मेरा कविता कर्म सार्थक है। मात्र यश प्राप्ति के लिए कवि बनना मुझे मंजूर नहीं है।

कविता मेरी ताकत है। मुझे खुद में झाँकने को मजबूर करती है। मुझे खुद में सुधार लाने को उकसाती है। मुझे और अधिक मानवीय तथा संवेदनशील बनाती है। पर साथ ही मैं यह भी कहना चाहूँगी कि कवि भी आखिर एक मनुष्य है। इसी दुनिया में रहने वाला। दुनियादारी निभाता। अपने बाल-बच्चों के अस्तित्व की रक्षा करता। स्वाभाविक है कई बार परिस्थितियों के आगे बेबस भी हो जाता है। ऐसा मेरे साथ भी होता है पर मैं उससे टूटने के बजाय दुबारा डटकर खड़ी होने का पूरा प्रयास करती हूँ। दुबारा खड़े होने की यह ताकत मुझे कविता से ही मिलती है।

(युवा कवियित्री रेखा चमोली द्वारा ‘सूत्र सम्‍मान’ के दौरान दिया गया वक्‍तव्‍य)

रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली को 2012 का ‘सूत्र सम्मान’

नई दि‍ल्‍ली : साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन सूत्र’ द्वारा दिया जाने वाला ठा. पूरन सिंह स्मृति ‘सूत्र सम्मान’ इस वर्ष उत्तराखंड के जोशियाड़ा, उत्तरकाशी में रहने वाली युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली को प्रदान किया जायेगा। ज्ञात हो की बस्तर के लोक कवि स्व. ठा .पूरन सिंह की स्मृति में दिया जाने वाला ‘सूत्र सम्मान’ प्रतिवर्ष देश के किसी ऐसे युवा कवि /कवियत्री को प्रदान किया जाता है जो अपने जनपद और जन से जुड़कर निरंतर अपनी सृजनात्मकता और काव्य वैशिष्ट्य, काव्य सहजता से देश की युवा कविता को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में 8 नवम्बर 1979 को जन्म लेने वाली युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली की कवितायें अपनी मिट्टी से उपजती हैं और स्त्री संसार के विविध जीवन को एक नया आकार देती हैं। रेखा की कविताओं में जनपदीयता की निश्‍चल अनुगुँजें हैं जो उनकी कविताओ को और महत्वपूर्ण बनाती हैं। बी.एस.सी.,एम.ए, प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा रेखा ने उत्तरकाशी में ग्रहण की है। इधर अपने पहले कविता संग्रह ‘पेड़ बनी स्त्री’  से समग्र रूप से पहचानी गयी रेखा चमोली की कवितायें ‘कृतिओर’, ‘कथन’, ‘वागर्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘सर्वनाम’, ‘समकालीन सूत्र’, ‘बया’, ‘लोकगंगा’ और ‘उत्तरा’ जैसी चर्चित पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर रेखांकित की गयी हैं । अध्यापन कार्य से जुडी़  रेखा चमोली कविता लेखन के साथ-साथ उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार व पाठ्य पुस्तक निर्माण और शैक्षिक राज्य स्तरीय कार्यशालाओं में लगातार सक्रिय हैं।

उल्लेखनीय है कि‍ 1997 से शुरू किये गये ‘सूत्र सम्मान’ से अब तक देश के चर्चित युवा कवि अशोक शाह, प्रताप राव कदम, नासिर अहमद सिकंदर, रजत कृष्ण, संजीव बक्शी, एकांत श्रीवास्तव, अग्नि शेखर, महेश पुनेठा, विमलेश त्रिपाठी आदि‍ को सम्मानित किया जा चूका है।

युवा कवियि‍त्री रेखा चमोली को दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में छत्तीसगढ़ में आयोजित एक विशिष्‍ट साहित्यिक आयोजन में  ‘सूत्र सम्मान-12’ प्रदान किया जायेगा।