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मैं और मेरा रचना संसार : रमेश तैलंग

रमेश तैलंग

रमेश तैलंग

वयस्क एवं बालोपयोगी साहित्य की अनेक विधाओं में रचनारत रहने  के बावजूद मैं मूलतः कवि ही हूँ, और बच्चों के लिए लिखना हमेशा से  मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है, क्योंकि चैतन्य रूप से मैं यह मानता हूँ कि –

शुभ, सुंदर, जो कुछ भी प्रभु ने रचा हुआ है,
बच्चों की दुनिया में ही बस बचा हुआ है।

मध्यप्रदेश में एक छोटा-सा जिला है टीकमगढ़, जहाँ मेरा जन्म हुआ। दस्तावेजी तिथि दो जून 1946, पर माँ का कहना है कि वास्तविक  तिथि आषाढ़ शुक्ल दशमी विक्रम संवत 2004 तदनुसार 28 जून, 1947 है। ‘टीकम’ कृष्ण के अनेक नामों में से एक है और उन्हीं के नाम से बसाया गया टीकमगढ़, बुंदेलखंड अंचल का एक प्रमुख हिस्सा रहा है, जहां बुन्देली बोली एवं लोकसंस्कृति का विशिष्ट प्रभाव है। साहित्यिक संस्कारों की भी महत्वपूर्ण भूमि रहा है यह जनपद। भक्तिकालीन महाकवि केशवदास  की कर्मस्थली ओरछा भी यहीं स्थित है।

इसी जनपद का एक और रमणीय स्थान है– कुंडेश्‍वर; महादेव शिव और वाणासुर की पौराणिक कथाओं से जुडी़ पवित्र भूमि। अपने समय के प्रख्यात पत्रकार सर्वश्री बनारसीदास चतुर्वेदी, कृष्णलाल गुप्त, गाँधीवादी लेखक यशपाल जैन सभी का कुंडेश्‍वर से सघन आत्मीय सम्बन्ध रहा है। ‘मधुकर’ जैसी प्रख्यात पत्रिका प्रकाशित होती रही है यहाँ से, और लोकयात्री देवेन्द्र सत्यार्थी की यादगार कहानी ‘इकन्नी’ की तो वह  कथाभूमि ही है।

बहरहाल, इसी टीकमगढ़ में मेरी स्नातकीय स्तर तक शिक्षा-दीक्षा हुई और इसी टीकमगढ़ में मेरी बालकविता का पहला पुष्प भी खिला– 1965 के आस-पास बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका ‘पराग’ में मेरे ‘दो सांध्य गीत’ तथा ‘दो सुबह के गीत’ प्रकाशित हुए। डबल स्प्रेड पृष्ठों पर प्रख्यात छायाकार विद्यावृत की रंगीन पारदर्शियों के साथ। इनमें एक बालगीत की पृष्ठभूमि एक नन्ही-सी बच्ची की व्यस्त दिनचर्या का तोतली भाषा में चित्रण था-

‘अले, छुबह हो गई/आंगन बुहाल लूं/मम्मी के कमले की तीदें थमाल लूं/ कपले ये धूल भले/मैले हैं यहाँ पले/ताय भी बनाना है/पानी भी लाना है/पप्पू की छल्ट फटी/दो तांके दाल लूँ/कलना है दूध गलम /फिल लाऊं टोस्ट नलम/कल के ये पले हुए आलू उबाल लूँ/आ गया ‘पलाग’ नया/ताम छभी भूल गया/छम्पादक दादा के नये हालचाल लूँ/अले, छुबह हो गई।’

तोतली भाषा में बाल कविता लिखने का मेरा यह कोई अनन्य प्रयास नहीं था। आपको स्मरण होगी कि पंडित श्रीधर पाठक की यह क्लासिक बालकविता- ‘बाबा आज देल छे आये..ऊं..ऊं चिज्जी क्यूं न लाये..।’ मेरी बालकविता ‘अले, छुबह हो गई’ इसी परंपरा का हिस्सा मानी जा सकती है। पर मैं चाहूँ भी तो अब ऐसी बालकविता नहीं लिख सकता। ऐसा कभी-कभी ही होता है, जब आपकी कलम से अनायास ही कोई ऐसी रचना निकल जाती है, जो हिंदी बाल-साहित्य के प्रखर आलोचक डॉ. प्रकाश मनु के शब्दों में कहूँ, तो आपकी ‘सिग्नेचर ट्यून’ बन जाती है।

सन 1973 से लेकर सन 2001 यानी 28 वर्षों तक मैं हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह, नई दिल्ली में गैर-पत्रकार पदों पर कार्यरत रहा, जिस दौरान मैं स्नातकोत्तर पढ़ाई करने के साथ-साथ रचनारत भी रहा। यह मेरा सौभाग्य है कि कम मात्रा में लिखकर भी मेरी रचनाओं को देश की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में जगह मिलती रही, और उनसे मुझे एक बालसाहित्यकार के रूप में पहचान मिली। अब तक मेरे 8 बाल कविता संग्रह आ चुके हैं, जिनमें से कुछ पुरस्कृत हुए हैं। इन्हीं में से एक ‘मेरे प्रिय बाल गीत’ है, जिसे इस वर्ष साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी बालसाहित्य पुरस्कार के लिए चुना  गया है।

भारत की सर्वोच्च गरिमामयी साहित्यिक संस्था केंद्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत होना किसी भी रचनाकार के लिए हर्ष एवं गौरव का विषय होता है, और बिना किसी ‘मॉडेस्टी’ के कहूँ तो मुझे, मेरे परिजनों तथा प्रियजनों को भी इस उपलब्धि पर बहुत अधिक हर्ष हुआ है। हालांकि मुझे दिल्ली हिंदी अकादेमी तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र बाल साहित्य पुरस्कार सहित और भी अनेक पुरस्कार मिले हैं, पर यह अकेला ऐसा गरिमामय पुरस्कार है जो मेरी कृति पर अयाचित एवं अकस्मात् प्राप्त हुआ है।

पर पुरस्कार आपको सिर्फ हर्ष में ही सहभागी नहीं बनाते, वे हर्ष के साथ-साथ आपको एक महत जिम्मेदारी भी सौंपते हैं और वह जिम्मेदारी है– अपने सृजनात्मक अवदान में छोटी लकीर से बड़ी लकीर खींचने की जिम्मेदारी। मात्र पुरस्कृत होने से कोई कृति बड़ी या सर्वस्वीकृत नहीं हो जाती। सर्वस्वीकृत तो वह अपने पाठकों के बल पर ही होती है। पाठकों के अलावा थोड़ी-बहुत स्वीकृति या पहचान उसे समीक्षकों द्वारा भी मिल जाती है, बशर्ते कि उस कृति की समीक्षा करने वाले समीक्षक सही अर्थों में सम+ईक्षा से संपन्न हो।

विगत चालीस वर्षों के अपने साहित्यिक सफ़र पर नज़र डालूँ तो मुझे लगता है कि मैं सिर्फ कछुए की गति से ही आगे बढ़ा हूँ और मेरा साहित्यिक अवदान शून्य के बराबर है। लेकिन जिस तरह आत्ममुग्धता और आत्मदंभ आपको पथभृष्ट करते हैं, उसी तरह आत्महीनता भी आपको अवसाद से भर देती है। इसलिए मैं कोशिश करता हूँ कि इन दोनों अतियों से बच सकूं।

बालकविता में विषय, शिल्प और बिम्बों के स्तर पर मैंने कुछ प्रयोग करने का खतरा निरंतर मोल लिया है। हो सकता है कि बालकविता में बिम्बों की बात करना आपको अटपटा-सा लगे, क्योंकि अनेक सुधीजनों की दृष्टि में वह वयस्कों की कविता में ही शोभा देते हैं। पर क्षमा करें, थोड़ी-बहुत अराजकता मेरे स्वभाव में रही है, कम-से-कम बालकविता की रचना के क्षेत्र में। इसीलिये न तो मैंने अपनी बालकविताओं को वय के हिसाब से विभाजित करने का प्रयास किया है, और न ही उन्हें किसी विशेष साँचे में ढालने की कोशिश की है। कहीं वे शिशुओं के लिए उपयुक्त हैं तो कहीं किशोरों के लिए। विविधता की दृष्टि से मेरी बालकविताओं में आपको ‘एक चपाती’, ‘निक्का पैसा’, ‘सोनमछरिया’ जैसे कथागीत भी देखने को मिलेंगे, तो दूसरी और ‘टिन्नी जी’, ‘ढपलू जी’, या ‘छुटकू मटक गए’, जैसे नटखट गीत भी मिल जाएँगे। बच्चों के कार्यकलाप, उनकी शिकायतें, उनकी आकांक्षाएं अपनी बाल कविताओं में अभिव्यक्त करना मुझे सबसे ज्यादा प्रिय रहा है। माँ के मुंह से लोरी तो सभी सुनते हैं, पर बच्चे के मुंह से लोरी का सुनना आपको अजीब लग सकता है पर मैंने एक ऐसा प्रयास  किया है- ‘रात हो गई, तू भी सो जा/मेरे साथ किताब मेरी..बिछा दिया है बिस्तर तेरा, बस्ते के अन्दर देखो/लगा दिया है कलर बॉक्स का तकिया भी सुंदर देखो/मुंहफुल्ली, अब तो खुश हो जा, मेरे साथ किताब मेरी!’

मैं ढाबे का छोटू हूं’ या ‘पापा की तनख्वाह में घर भर के सपने’ जैसी बाल कविताओं में मैंने बाल-श्रम और अभिभावकों की आर्थिक मुश्किलों को विषय बनाया है। कहीं-कहीं पर्यावरण या प्रदूषण की चुनौतियों की बात भी आ गई है। कुल मिलाकर देखा जाय तो मैं बच्चों के संसार का जितना बड़ा वितान है, उसे समेटने की भरपूर कोशिश करता हूं और अब यह बाल-पाठकों तथा सुधी समीक्षकों के ऊपर निर्भर करता है कि उन्हें मेरी कोशिशों में कितनी सफलता नज़र आती है।

अच्छी बाल कविता क्या है, ऐसे सवाल जब बच्चे मुझसे पूछते हैं, तो मेरे पास सच पूछो तो कोई जवाब देते नहीं बनता। यह तो गूंगे का गुड है…स्वाद चखे जो बस वो ही जाने..पर सहजता की दृष्टि से मैंने उनके लिए कुछ पंक्तियां लिखीं– ‘आओ हम भी प्यारी-प्यारी कविता एक बनाएं/जोड़ें तुक, शब्दों की माला सुंदर एक सजाएं/नहीं चाहिए भारी-भरकम, नहीं चाहिए मोटी/हम छोटे-छोटे बच्चों की कविता भी हो छोटी/जिसे सीखना पड़े किसी से, क्या वह भी कविता है/जिसे स्वयं आ जाए गाना/वह अच्छी कविता है।’

विश्व के अनेक हिस्सों में युद्ध की विभीषिका तथा अनेक प्रकार से हो रहे  बालशोषण के चक्रव्यूह में फंसे बच्चों की पीडाएं मुझे अकसर विचलित करती हैं पर एक अदीब, एक लेखक, एक कवि अलख जगाने के अलावा कर भी क्या सकता है। बच्चों के मन की बात मैं अपने शब्दों में इस प्रकार ही कह सकता हूँ– ‘न तो बन्दूक की, न ही बारूद की, कल की दुनिया हमको चाहिए नए रंगरूप की/जिसमें न पाठ पढ़ाया जाए नफरत का/जिसमें न राज चलाया जाए दहशत का/जिसमें सच्चाई की जीत हो, और हार झूठ की।’

(साहित्‍य अकादमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार 2013 समारोह में दिए गए वक्‍तव्‍य का संपादित अंश )

रमेश तैलंग की गजलें

रमेश तैलंग

02 जून 1946 को टीकमगढ़, मध्‍य प्रदेश में जन्‍में रमेश तैलंग ने प्रचूर मात्रा में बाल साहि‍त्‍य लि‍खने के अलावा कई महत्‍वपूर्ण गजलें भी हिंदी साहि‍त्‍य को दी हैं। उनकी कुछ गजलें-

 1.

जब कुछ नहीं बना तो हमने इतना कर दिया..

खाली हथेली पर दुआ का सिक्का धर दिया।

 

कब तक निभाते दुश्मनी हम वक्त से हर दिन

इस बार जब मिला वो तो बाँहों में भर लिया।

 

उस गाँव के बाशिंदों में अजीब रस्म है,

बच्ची के जन्म लेते ही गाते हैं मर्सिया।

 

बदली हुकूमतें मगर न किस्मतें बदलीं,

मुश्किलजदा लोगों को सबने दर बदर किया।

 

मुद्दा कोई हो, उसपे बोलना तो बहुत दूर,

संजीदा हो के सोचना भी बंद कर दिया।

 

2.

दुःख दर्द की मिठास को खारा नहीं बना.

खामोशी को ज़ुबान दे, नारा नहीं बना।

 

जिसने जमीन से लिया है खाद औ’ पानी

उस ख्वाब को फ़लक का सितारा नहीं बना।

 

वो बेज़ुबाँ है पर तेरी जागीर तो नहीं,

उसको, शिकार के लिए, चारा नहीं बना।

 

घुटने ही टेक दे जो सियासत के सामने,

अपने अदब को इतना बिचारा नहीं बना।

 

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं

जज़्बात को जादू का पिटारा नहीं बना।

 

इंसान की फितरत तो है शबनम की तरह ही,

अब उसको, जुल्म कर के, अंगारा नहीं बना।

 

3.

एक किताब पड़ी थी अलमारी में कई महीने से

मुद्दत बाद मिली तो रोई लिपट-लिपट कर सीने से।

 

कहा सुबकते हुए- ‘निर्दयी अब आए हो मिलने को

जब गाढ़े संबंधों के आवरण हो गए झीने से

 

और जरा देखो, कैसे बेनूर हो गए ये अक्षर

कभी चमकते थे जो अंगूठी में जड़े नगीने से

 

और याद है? जब आँखें भारी होते ही यहाँ-वहाँ

सो जाते तुम मुझे सिरहाने रखकर बडे करीने से

 

किस मुँह से अब अपना ये सर्वस्व सौंप दूँ फिर तुमको

धूल धूसरित देह पड़ी है लथपथ आज पसीने से।

 

4.

हो सके तो ज़िन्दगी को शायरी कर दे खुदा!

शायरी में ज़िन्दगी के रंग सब भर दे खुदा!

 

और कुछ चाहे भले ही दे, न दे, मर्ज़ी  तेरी

ज़िन्दगी  को जीने लायक तो मुकद्दर दे खुदा!

 

क्या करेंगे सिर्फ़ दीवारें, या छत लेकर यहाँ,

देना है तो एक मुकम्मल छोटा-सा घर दे खुदा!

 

दिल के हिस्से में छलकता एक दरिया डाल दे,

फिर समूचे जिस्म को चाहे तो संग कर दे खुदा!

 

चैन दिन का, रात की नींदें उड़ा कर ले गया,

खौफ की आँखों में भी थोड़ा-सा डर भर दे खुदा!

 

सर कलम करने को बैठे हैं यहाँ आमादा जो,

उनका बस एक बार ही सजदे में सर कर दे खुदा!

 

5.

उड़ने का हुनर आया जब हमें गुमां न था

हिस्से में परिंदों के कोई आसमां न था।

 

ऐसा नहीं कि ख्वाहिशें नहीं थी हमारी,

पर उनका सरपरस्त कोई मेहरबां न था।

 

एक ख्वाब क़त्ल करके, एक ख्वाब बचाते,

अपने जिगर में ऐसा बड़ा सूरमा न था।

 

तन्हा सफर में इसलिए तन्हा ही रह गए

थे रास्ते बहुत से, मगर कारवाँ न था।

 

परदेस गए बच्चे तो वहीं के हो गए

इस देस में हुनर तो था पर कद्रदाँ न था।

 

6.

यादों के खज़ाने में कितने लोग भरे हैं

बिछुड़े हैं जब से हर घड़ी बेचैन करे हैं।

 

तस्वीरों के अंदर भी वे जिंदा-से लगे हैं

और हम हैं कि उनके बिना जिंदा भी मरे हैं।

 

इस झूठे भरम में कि वे कल लौट आएं फिर

सीने पे कब से सब्र का एक बोझ धरे हैं।

 

एक ओर सियाही है तो एक ओर रोशनी,

अपने ही साये से ज्यों हर वक्त डरे हैं।

 

थमता नहीं सैलाब, आँधियों में मोह की

तर आस्तीं है, आँसुओं के मोती झरे हैं।

अचार: देवेन्‍द्र कुमार

कथाकार देवेन्द्र कुमार

कथाकार देवेन्‍द्र कुमार की कहानी और उस पर चर्चित कवि रमेश तैलंग की टिप्‍पणी-

नेपथ्य में सहजतापूर्वक खड़े हिंदी के सशक्त कथाकार देवेन्द्र कुमार की यूँ तो ‘दिलावर खड़ा है’, ‘कितने लाख असीम’, ‘चिड़िया’, ‘खेल’, ‘अचार’ जैसी  अनेक यादगार कहानियाँ हैं जो मुझे प्रिय हैं। पर ‘अचार’ इनमें अति- विशिष्ट है। इस कहानी का आरम्भ पति-पत्नी के बीच जिस  सहज संवादपटुता के साथ होता है, अंत उतनी ही मार्मिक वेदना के साथ घटित होता है।
शब्दों के मामले में देवेन्द्र सचमुच बहुत ही मितव्ययी हैं और कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा कहते हैं।
दूसरी विशिष्ट बात यह कि उनकी कहानियों में स्त्रियां, बच्चे, और पक्षी इतनी संवेदनशीलता के साथ उपस्थित होते हैं कि वे पाठक के हृदय में अपनी अनिवार्य  जगह बना लेते हैं।
‘अचार’ कहानी का बच्चा जहां एक ओर बाल श्रम की  मजबूरी  पर प्रश्नचिह्न लगता है वहीँ दूसरी ओर उस हादसे की ओर भी मार्मिकता के साथ इंगित करता है जो घटित तो एक हलकी-सी आवाज के साथ होता है पर उसकी अनुगूँज बहुत दूर तक सुनाई देती है- रमेश तैलंग

मैं अचार कभी नहीं खाऊंगा, यह कसम उठाने से भी अब छुटकारा मिलने वाला नहीं था। गर्मी की उमस भरी शाम भीड़-भाड़ भरे सब्जी बाजार में कैसी हो सकती है, इसे कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है।
वैसे गलती मेरी ही थी। पिछली शाम को भोजन करते हुए मैंने अचार मांग लिया। बस, आफत शुरू हो गई। पत्नी ने हठ ठान ली कि तुरंत बाजार जाकर आम लाने हैं और अचार डालना है।
‘‘तो ठीक है।’’ मैंने कहकर टालना चाहा था।
‘‘बाजार से कच्चे आम लाने होंगे।’’
‘‘हूँ।’’
अगली शाम दफ्तर से आया तो उन्होंने मेरे हाथ में एक बड़ा थैला और तौलिया थमा दिया।
‘‘यह तौलिया किसलिए। क्या हम नदी पर नहाने जा रहे हैं?’’ मैंने हँसकर बात को हल्का करना चाहा था।
‘‘आम खरीदकर धोना, पोंछना और फिर कटवाकर लाने होंगे। आम का अचार क्या ऐसे ही मिल जाएगा?’’ एक गंभीर स्वर आया।
कार्यक्रम बन चुका था। अब मेरे कंधों पर टिकाकर उस पर अमल होना था।
मैंने उमस और भीषण गर्मी की आड़ में छिपना चाहा लेकिन कुछ देर बाद मैं और वह बाजार की ओर बढ़ रहे थे।

सब्जी बाजार में सामान्य से अधिक यानी बेहद भीड़ थी। शायद लोग समझते थे, सब्जी वहाँ फ्री मिलती थी। संकरी सड़के के दोनों ओर फुटपाथों पर और उनसे पीछे सब्जियों के ढेर लगे थे। सब्जी वालों ने फुटपाथ से आगे बढ़कर सड़क पर काफी हिस्सा घेर रखा था। बची हुई संकरी सड़क-पट्टी पर ट्रैफिक पी.पी. करता रेंग रहा था। सब्जी बेचने वाले अलग-अलग सुरों में बोलियां बोल रहे थे। और मैं सब तरफ से धकियाता हुआ मेले में भटके हुए बच्चे की तरह चौंधियाई आंखों से देखता सोच रहा था- अचार! … कैसे पड़ेगा अचार!
‘‘भई, मैं नहीं रुक सकता। थोड़ी देर यहाँ रहा तो पागल हो जाऊंगा। अच्छा यही होगा कि हम बाजार से अचार का डिब्बा मंगवा लें।’’
‘‘जी नहीं, पता है बाजार का अचार कितना महंगा होता है। और फिर क्वालिटी का क्या भरोसा?’’  पत्नी ने जवाब देते हुए सब्जियों के टीलों के बीच कहीं-कहीं नजर आती कच्चे आमों की ढेरियों पर नजरें टिका दीं। एक तो उमस भरी गर्मी, ऊपर से गैस लालटेनों की चौंधरी भुकभुकाहट। मैंने कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहा, पर पत्नी तब तक एक सब्जी वाले से झुककर मोलभाव करने में व्यस्त हो गई थीं।
मैंने मन में कहा- ‘चलो, आम तो मिले।’
लेकिन नहीं…. शायद भाव ज्यादा थे या और कुछ गड़बड़ थी। मैंने पत्नी को दूसरे, तीसरे और फिर पता नहीं कौन से नंबर के ढेर की ओर झुकते, मोलभाव करते और फिर सिर हिलाकर आगे बढ़ते देखा। लगातार उनके पीछे चलना जरूरी था। अब हम सब्जी वाले के छोर तक जा पहुंचे थे। इससे आगे अंधेरा था।
अब मुझे मौका मिला, ‘‘कोई बात नहीं, हम फिर किसी दिन आ जाएंगे। अब हमें घर चलना चाहिए। आगे तो आम हैं नहीं।’’
‘‘नहीं, अभी हम दूसरी तरफ तो गए ही नहीं हैं। देखो-देखो, कैसे ढेर लगे हैं!’’ और फिर मेरे जवाब का इंतजार किए बिना वह सड़क को लांघकर दूसरी तरफ चली गईं और यहां भी वही सिलसिला दोहराया जाने लगा।
बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि हम कैसे क्या करेंगे। आम खरीदना, एक-एक आम को धोना, तौलिए से पोंछना और आम का कटवाकर घर पहुंचाना। बाजार में ठीक से खड़े रहने की तो गुंजाइश थी नहीं, फिर अचार के लिए इतना कुछ करना! कैसे… कैसे…!

आखिर एक सब्जी वाले से दाम तय हुए।
वह तोलने को तैयार हुए तो पत्नी ने पूछा, ‘‘आमों को धोने का इंतजाम है?’’
सब्जीवाला फिर हँसा, ‘‘आप भी बहन जी! यहां इतनी देर से गला सूख रहा है। पीने के लिए तो पानी है नहीं और आप… जरा उधर देखिए, सब बहनजियां ऐसे ही आम कटवा रही हैं… देखिए… वहां उधर…।’’
संकेत की दिशा में देखा- अरे हां, वही तो, कुछ औरतों एक झुंड में खड़ी थीं। आवाजें आ रही थीं- ‘मेरे आम पहले काटो… ऐ सुना नहीं… हम… कब से खड़े हैं…!’
इसके साथ ही सरौते से खट-खट की आवाज भी आ रही थी। तो आम काटने वाला भी पास ही मौजूद है! लेकिन इससे पहले आमों को धोना, पोंछना…।
गुस्सा दिखाने का मौका मिला था, ‘‘अगर ऐसी ही बात थी तो हमें बाल्टी में पानी लेकर आना चाहिए था… या फिर आम घर ले चलो- वहीं सब कर लेंगे।’’ मैं चिड़चिड़ा रहा था।
‘‘बस, रहने दो। घर पर आम काटने का सरौता कहां है और फिर काटेगा कौन? आम की जगह उंगलियां काटेंगे। नहीं-नहीं, यहां इंतजाम है। एक लड़का काट रहा है।’’
‘‘लेकिन धोना… इसका इंतजाम…!’’ मैंने उनकी कमजोरी पकड़ ली थी।
‘हूं।‘ पत्नी ने चिंताकुल नजरों से इधर-उधर देखा। यह तो सचमुच मुश्किल हुई। लगा, शायद इसी बात से छुटकारा मिल जाए।
तभी एक आवाज सुनाई दी, ‘‘मैं धुलवा दूंगा आपके आम।’’
पतली, पिनपिनाती आवाज! मैंने घूमकर देखा- आठ-नौ बरस का एक छोकरा था। शायद वह हमारी नोक-झोंक में रस ले रहा था।
मुझे गुस्सा उतारने का पहला मौका मिला था, ‘‘धो देगा! धो दे फिर… कहां धोएगा?’’
‘‘यहीं धोऊंगा।’’ वह मेरी बात से हिला तक नहीं था।
‘‘पानी है?’’ पत्नी ने पूछा।
‘‘हां, है।’’
‘‘कहां है पानी?’’ मैंने इधर-उधर देखा। वह सरासर झूठ बोल रहा था।
‘‘वहां है, उधर…!’’ वह पता नहीं, कहां इशारा कर रहा था?
‘‘तो लेकर आ…!’’
‘‘आप जाना मत। मैं अभी लेकर आया पानी। फिर आम काट भी दूंगा। वहां सरौता भी हैं।’’ कहकर वह तुरंत भीड़ में गायब हो गया।
दुकानदार ने आम तोलकर एक तरफ डाल दिए। मैं आम थैले में भरने लगा तो पत्नी ने टोका-‘‘पहले धुलेंगे, फिर पोंछना होगा। अभी गड़बड़ मत करे।’’

हमें खड़े-खड़े काफी देर हो गई पर वह छोकरा पानी लेकर नहीं आया। मैं भड़ास निकालने का मौका तलाश रहा था, पर तभी वह आ गया। आवाज सुनाई दी, ‘‘आ गया पानी।’’
‘‘कहां है पानी?’’
उसके हाथ में प्लास्टिक की बड़ी थैली थी। उसमें भरे पारदर्शी पानी में रोशनियां चमक रही थीं।
‘‘इसमें कैसे धुलेंगे आम?’’
वह मुस्कराया, शायद मेरे अनाड़ीपन पर- ‘‘मैं थैली पकड़कर खड़ा रहूंगा। आप हाथ में एक-एक आम पकड़कर इसमें डुबाकर रगडऩा। आम धुल जाएंगे। फिर उन्हें कपड़े से पोंछकर थैले में रख लेना।’’
‘‘अगर आम डालने से थैली फट गई और पानी गिर गया तो…!’’
‘‘जैसे वह कह रहा है, वही ठीक है।’’ पत्नी ने मुझे अपनी बात पूरी नहीं करने दी। मैंने थैली में भरे पानी में एक आम सावधानी से डुबाया और उसे धोने लगा। छोकरा थैली भर पानी को हाथों से पकड़े सावधान मुद्रा में खड़ा था।
जब मैं आम को धोकर बाहर निकालता तो उसके चेहरे पर छींटे पड़तीं, लेकिन वह जैसे मूरत की तरह स्थिर खड़ा था। आंखें बिना झपके खुली हुईं, होंठ सख्ती से एक-दूसरे पर चिपके हुए। मैं आम धोकर पत्नी को थमाता, वह तौलिए से पोंछकर उसे टोकरी में डालती जातीं, जिसे सब्जी वाले ने बड़ी मेहरबानी करके हमें दे दिया था। लगा इस धोने-पोंछने के काम में कई घंटे बीत गए थे। हमारे अचार अभियान का एक दौर पूरा हो चला था। लेकिन अभी तो बहुत कुछ करना बाकी था।

‘‘मैं आम कटवा दूंगा, एक किलो के तीन रुपये लगेंगे।’’ लड़के ने कहा और थैली भर पानी जो आम धोने के बाद अपारदर्शी हो चुका था, सड़क पर फेंक दिया। छींटे उछले और सब्जी वाले की झापड़ उसके गाल पर पड़ा, ‘‘हरामी के… देखता नहीं…।’’
वह बिना गाल सहलाए चुप खड़ा रहा, फिर टोकरा सिर पर रखकर बोला, ‘‘मेरे पीछे आओ। मैं आम कटवा देता हूं।’’
इससे पहले कि मैं और पत्नी कुछ कह पाते वह पलक झपकते ही भीड़ में खो गया।
मैं पागल की तरह इधर-उधर देखने लगा। सड़क पर रेंगते ट्रैफिक के सब तरफ बेशुमार भीड़ में हम कहां खोजेंगे ? अगर वह न मिला तो ?
मुझे गुस्सा आ गया। मैंने दुकानदार से कहा, ‘‘वह कहां गया?’’
‘‘मैं क्या जानूं!… अच्छा, आप आमों के पैसे दीजिए और एक तरफ हो जाइए। दूसरे ग्राहकों को लेने दीजिए।’’ उसे लगा था कि इस चक्कर में हम उसके पैसे मारकर भागने की फिराक में थे।
मैंने पैसे दिए और पत्नी का हाथ पकड़कर आगे चला, ‘‘अब कहां खोजें उसे ?’’
पत्नी ने कुछ कहा नहीं। लड़का शायद आम लेकर रफूचक्कर हो चुका था। कैसे प्यार से आम धुलवाने का नाटक कर रहा था। कोई ठिकाना है इस दुनिया का!
‘‘तुम्हें उसका ध्यान रखना चाहिए था। जब वह आमों का टोकरा लेकर चला था तो उसके पीछे जाना चाहिए था।’’

पता नहीं, अभी और क्या-क्या सुनना बाकी था। अब कुछ कहने को नहीं था। मैं पत्नी का हाथ थामे उस हुजूम में धक्के खाते, घिसटते हुए ट्रैफिक के बीच मेंढक की तरह फुदकते, बचते-बचते, खुद को कोसते हुए पूरी सड़क के कई चक्कर काट आया, पर वह छोकरा कहीं दिखाई न दिया।
यह सब पत्नी की आम धुलवाने की जिद के चलते हुए था और शायद अब उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हो गया था। वह चुपचाप मेरे पीछे-पीदे चलती जा रही थीं।
तभी आवाज आई, ‘‘बाबूजी…!’’
मैंने आवाज की दिशा में देखा- वही था। वही छोकरा, जो हमारे आम लेकर गुम हो गया था, सब्जी के ढेर के पीछे से हाथ हिलाकर हमें बुला रहा था। मन हुआ, दौड़कर गर्दन पकड़कर घसीट लाऊं। लेकिन यह संभव नहीं था। वह सब्जियों के ढेर के पीछे था। आगे कई औरतें खड़ी थीं। खट-कट, कट-खट की आवाजें आ रही थीं जैसे कुछ काटा जा रहा हो, पर दिखाई कुछ नहीं दे रहा था।
मैंने चिल्लाकर कहा, ‘‘कहां भाग गया था?… हम कब से ढूंढ रहे थे!’’
वह सब्जियों के ढेर के पीछे से निकलकर बाहर आया, ‘‘मैं तो आम लेकर यहीं आ गया था। यहीं तो काट रहा हूँ आम। पर आप ही पता नहीं कहां…!’’
‘‘अच्छा-अच्छा, ज्यादा बातें न बना- हमारे आम कहाँ हैं?’’
‘‘वो रहे आपके आम…।’’ उसने एक टोकरी की तरफ इशारा किया। देखकर तसल्ली हुई। हां, वही थे हमारे आम…।
‘‘तो अब तक काटे क्यों नहीं!’’
‘‘आपसे पूछकर ही तो काटता…। एक आम की कितनी फांकें काटनी हैं? आठ, बारह या सोलह!’’ उसने सफाई दी।
‘‘अभी टैम लगेगा पहले औरों के कटेंगे… और भाव होगा होगा रुपये किलो…!’’ सामने ढेर के पास बैठे दुकानदार ने सख्त आवाज में कहा, फिर छोकरे से कहा, ‘‘वहां क्या बिटर-बिटर कर रहा था। जल्दी से काट-पीटकर काम खत्म
कर…!’’
छोकरा फिर से सब्जियों के ढेर के पीछे जा पहुंचा। अब मैं उसे देख नहीं पा रहा था। और हमारे आम भी नजर नहीं आ रहे थे।
‘‘आप जरा हटकर खड़े हो जाइए… मैंने बताया न अभी टैम लगेगा। आपसे पहले भी कई लोग खड़े हैं।’’
मैंने देखा एक तरफ कुछ औरतें गोलबंद खड़ी थीं, आवाजें उभर रही थीं- ‘‘जल्दी…, देखो हमारे आम दूसरे आमों में मिल न जाएं।’’
अब प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। जैसे राक्षस की जान तोते में थी,  मैं आम में था। जब तक आम कटकर थैले में भरे जाकर घर नहीं पहुंच जाते, मेरी मुक्ति नहीं हो सकती थी।
भीड़ बढ़ती जा रही थी।
‘खट-कट… कट-खट’ की आवाजें लगातार आ रही थीं। पता नहीं छोकरा हमारे आम काट रहा था या… मैंने पुकारा, ‘‘ओ अरे…!’’
‘‘बाबूजी, आपने तो नाक में दम कर लिया!’’ सब्जी वाला गुर्राया, फिर पीछे मुड़कर चिल्लाया, ‘‘पीछे से उठकर बाहर आ… तेरी कट-कट ने तो मेरी दुकानदारी ही चौपट कर दी है।’’
उसने छोकरे का हाथ पकड़कर बाहर खींचा और सड़क पर धकेल दिया। साथ में सरौता और एक बोरा भी फेंके गए।
‘‘हमारे आम… हमारे आम…!’’ कई बेचैन आवाजें उभरीं।
‘‘आपके आम जरूर मिलेंगे…!’’ सब्जी वाले ने छाती पर हाथ मारकर एक औरत की तरफ सिर झुकाया।
छोकरा अब सड़क के बीचोंबीच अपना बोरा बिछाकर बैठ गया था। उसने सरौता टिका लिया था और फिर से आम काटने में जुट गया था। खट-कट-खट आम कट रहे थे, पर वे हमारे आम नहीं थे।
‘‘भई, हमारे आम काट दो।’’
लेकिन वह तो हमारी ओर देख ही नहीं रहा था। बस सिर झुकाए आम काटे जा रहा था। फिर उसके नीचे झुके मुंह से आवाज ऊपर आई, ‘‘बाबूजी, बस थोड़े-से रह गए हैं। फिर तसल्ली से काट दूंगा।’’
मैंने देखा, वह चारों ओर से घिरा हुआ था। भीड़ के बीच अंधेरे में बैठा आम काट रहा था, आवाजें आ रही थीं- कट-खट-खट-खट… पर वह खुद दिख नहीं रहा था।
लोगों से घिरी उस जगह में रोशनी नहीं पहुंचने दी जा रही थी। दुकानदार ने न जाने क्यों उसे वहां बिठा दिया था।
‘‘बारह फांकें काटो। नहीं-नहीं- सोलह करो। ये ज्यादा बड़ी हैं।’’
‘‘मैं सोलह कर देता हूं। उसकी आवाज किसी गहरे कुएं में से आ रही थी।’’
‘‘हां, सोलह ठीक हैं।’’
‘‘पैसे इधर… पैसे इधर…!’’ सब्जी वाले की आवाज गूंज उठी… ‘‘आम कटवाकर पैसे इधर दीजिए, नहीं तो हिसाब गड़बड़ हो जाएगा।’’
‘‘हिसाब… कैसा हिसाब…!’’
कट-खट… खट-कट… आम कट रहे थे। उसके चारों ओर अचार के आम कटवाने वालों की भीड़ थी, जैसे किसी बाजीगर के चारों ओर मजमा लगा हो।
कट-खट… खट!
‘‘जल्दी करो… हमें दूर जाना है। जल्दी…’’
कट-खट… खट-खट…!
‘‘जल्दी…!’’
और फिर उस कट-खट के बीच एक-दूसरी आवाज हुई थी, हल्की-सी सिसकारी…! हां, मैंने सुना था… सरौता आम पर नहीं पड़ा था।
बाजीगर का जादू टूट गया था। लोग लहर की तरह उछले थे, काई की तरह फट गए थे। वे अपने आम उठा रहे थे, आपस में छीनाझपटी कर रहे थे। उन्हें आम चाहिए थे।
लेकिन हमारे आम कहां थे? मुझे वे कहीं नजर नहीं आ रहे थे। शायद वे काटे ही नहीं गए थे। अब मैं वहां नहीं रुक सकता था। हां, वह आवाज, जो सरौते के आम पर गिरने की नहीं थी, मैंने सुनी थी।
सोम बाजार अपने पूरे निखार पर था। भीड़, रोशनी, होका, माल बिक रहा था लेकिन आम…? वे कहां कट रहे थे? हमारे आम… कौन काटेगा उन्हें… और अचार… मुझे कुछ पता नहीं था। मैं पत्नी का हाथ पकड़कर पीछे हट रहा
था- हमारे आम!

 

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बच्चों की दुनिया के अंग संग :अवध बिहारी पाठक

कवि रमेश तैलंग के बालगीतों में प्रयोगधर्मी विविधता है। उनके बालगीतों के संग्रह ‘मेरे प्रिय बालगीत’ पर वरिष्‍ठ कवि अवधबिहारी पाठक की आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी-

‘हर रात/लौटता हूं/रेंगता रेंगता/उसी गली में/जहां मुस्कुराता है एक
बच्चा/हर शाम/मुझे पंख देने के लिए- राजकुमार केसवानी (‘बाकी बचें जो’ से)
बीसवीं सदी के अर्धशतक तक साहित्य सृजन, पठन पाठन आदमी की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बना रहा, परंतु उसके बाद का समय साहित्य के पठन-पाठन भी बड़ी दर्दनाक तस्वीर खींचता है। लेखन में उदात्तता आई,  परंतु पढऩे वालों का अकाल पड़ गया, क्योंकि साहित्य में इन दिनों बाजारवाद की बड़ी जोरदार धमक है। अर्थ जहां जिंदगी का लक्ष्‍य बन जाए, वहां बाल साहित्‍य और बाल संवेदना कैसे जिंदा रहे।  परिणामत: उसकी भी उपेक्षा हुई, किंतु ऐसी जटिल परिस्थिति में भी बाल साहित्‍य लिखा जा रहा है  तो यह प्रयत्न उत्साहवर्धक है और नई संभावनाओं से लैस भी, क्योंकि बकौल राजकुमार केसवानी बच्चे समाज की जिंदगी को उड़ान भरने की ताकत देते हैं। मेरे देखने में रमेश तैलंग की पुस्‍तक ‘मेरे प्रिय बाल गीत’ अभी-अभी आई है, जो बाल सहित्‍य लेखन में एक अद्भुत प्रयत्न है। यूं रमेश तैलंग बाल साहित्य लेखन के अप्रतिम स्तंभ है।  उनका योगदान इस क्षेत्र में बहुत चर्चित रहा है, सम्मानित पुरस्‍कृत भी।
जाहिर है, बच्चों की दुनिया उनकी अपनी दुनिया होती है- सभी प्रकार के काइयांपन से कोसों दूर, वहां सब कुछ नैसर्गिक है, कवि का मन और विचार चेतना बच्चों की दुनिया में बहुत गहरे डूब कर एकाकार हो गई। फलत: बच्‍चों की दुनिया का हर पहलू सोच-विचार, आचार, मान-अपमान, स्वाभिमान, प्यार, दुलार, धिक्कार और हकों की मांग भी शामिल है बच्चों की इस गीत दुनिया में। मनुष्य की ‘चतुराई का शिल्प’ नहीं उसके स्थान पर शुद्ध नैसर्गिक मन की हलचल मूर्त हुई है जो तैलंग जी के संवेदना पक्ष को उजागर करती है।
यहां रचना के कन्टेंट की बात कहना भी जरूरी-सा लगता है। पुस्‍तक में 163 बालगीत हैं जो छोटे, मझोले, बड़े सभी आकार हैं। ये गीत वस्‍तुत: बालक के मन पर आई  उस मनोवैज्ञानिक स्थिति की व्याख्या है, जो बालक अपने समग्र परिवेश के प्रति व्यक्त करता है। कवि इतना समर्थ है बाल मनोविज्ञान को पढऩे में कि बालक की बात काल्पनिक हो या यथार्थ लेखक ने हर उस विचार-लहर को पकड़ा है, जहां उसके क्रियाकलाप उसके अंतर्मन के गंभीर विचार प्रस्ताव बन जाते हैं, वे रोचक हैं, त्रासक भी और चैलेंजिंग भी। हर बाल गीत की अपनी एक जमीन है और उसमें बच्चे के उस मोहक क्षण का वर्णन है, जहां बच्चा निपट अकेला खड़ा होकर अपने परिवेश को रूपायित करता है। फलत: उनमें बाल जीवन का आल्हाद भी है और विडम्‍बनाएं भी। सभी कविताओं में निहित कवि भी व्यंजना को प्रस्तुत करने में विस्तार मय है अस्तु बिल्कुल जीवंत रूपकों का दर्जा यहां इष्ट है। यथा।
बाल श्रमिक हमारे देश की दुखती रग है। हजार कानून बने, परंतु बाल श्रमिकों का शोषण अब भी जारी है। उन्हें अपने शिक्षा के अधिकार की जानकारी भी शासन नहीं दे सका। बाल श्रमिकों के माता-पिता पेट की आग की गिरफ्त में पड़कर बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। ‘भोलू’ नामक कविता में बाल श्रमिक भोलू का साथी उसे स्कूल जाने को प्रेरित करता है तो भोलू उत्तर देता है कि ठीक है मैं पढऩे जाऊंगा, परंतु ‘अच्छा पढऩे की तनख्वाह क्या दोगे ?’ (पृष्‍ठ-34)  कवि यहां उन बच्चों का हाहाकार उकेर सका, जो पेट की खातिर अपने हर क्रियाकलाप को केवल पैसे से तोलते हैं। ‘ मैं ढाबे का छोटू हूँ’ कविता होटलों में देर रात तक काम करने वाले बच्चों की पीड़ा को साकार कर सकी है- ‘देर रात में सोता हूँ/कप और प्याली धोता हूँ/रोते-रोते हँसता हूँ/हँसते- हँसते रोता हूँ।’ यहाँ बाल श्रमिक की लाचारी साकार हो उठी है जिसकी चिंता न समाज को है और न शासन को। कवि यहां एक भयंकर सच को व्यक्त कर गया कि शायद कविता के बहाने ही सही, किसी का ध्यान इस तरफ जाए और कुछ कारगर उपाय हों।
हमारे देश में प्रांतों की विविधता से विविधवर्णी संस्कृति का मेल हमें घरों में भी दिखाई देता है। ‘घर है छोटा देश हमारा’  कविता में घर में विभिन्न प्रांतों की उन मां,  चाची,  भरजाई का जिक्र है जो अलग होकर भी खानपान,  आचार-विचार के स्‍तर पर सामान्‍जस्‍य बैठाकर घर चलाती हैं- ‘छोटे से घर में हिलमिलकर सारे करें गुजारा।’ (पृष्‍ठ 46)। जैसा कथन देश प्रेम और एकता की प्रेरणा देता है।
‘पापा की तनख्वाह’ और ‘महंगे खिलौने’  कविताएं बच्चों के मुंह से कही गई बाजार में व्याप्त महंगाई की कहानी हैं,  जहां खिलौनों के अभाव में उनका बचपन छीज रहा है। बच्चा अबोध है, परंतु भीतर से कितना जागरूक कि उसके पापा ‘चिंटू का बस्ता/मिंटी की गुडिय़ा/अम्‍मा की साड़ी/दादी को पुडिय़ा’ (पृ0 64)। बाजार से उधार लाए हैं। इसका घाटा अगले महीने खर्च कम करके झेलना पड़ेगा। यहां कवि मझोले पगारधारी लोगों के बच्चों की तकलीफ को ठीक से प्रस्तुत कर गया है। आगे का दृश्य और भी मोहक है। बच्चा भले ही छोटा है, परंतु बाजार की उठक-पटक से अनजाना नहीं है। एक अन्‍य कविता ‘महंगे खिलौने’ में बच्‍चा कहता है-  ‘छोटे हैं, फिर भी हम इतना समझते/ कैसे गृहस्थी के खर्चे है चलते/जिद की जो हमने तो पापा जी अपने/न चाहते भी उधारी करेंगे/रहने दो, रहने दो ये महंगे खिलौने/ जेब पर अपनी ये भारी पड़ेंगे,’ (पृष्‍ठ 137)। अर्थ ने कितना समझदार बना डाला है बच्‍चों को कि वे अपना बचपन भी इस महंगाई के सामने समर्पित, नहीं सरेंडर कर देते हैं। कवि की दृष्टि यहां गहरी होकर भीतर तक हिला जाती है, बच्चों की बेबसी से।
विज्ञान की दौड़ और शहरीकरण की बीमारी के चलते आज के बच्चों का प्रकृति से निकट का वास्ता लगभग टूट ही गया है। कवि ने बच्चों के दर्द की बखूबी पकड़ा है- ‘पेड, फूल, फल पड़े ढूंढने/ हमको रोज किताबों में/हरियाली रह जाय विंधकर/सिर्फ हमारे ख्वाबों में/ ऐसा जीवन नहीं चाहिए (पृष्‍ठ 163)। चिडिय़ों की कमी से भी चिंतित है बच्चा- ‘क्या उसको/बढ़ती आबादी के दानव ने मार दिया?’ (पृष्‍ठ 76)। कविता ‘पंछी बोल रहे है’ में अपील है- ‘पंछी, पेड़, जानवर, जंगल/बचे रहे तो होगा मंगल’ (पृष्‍ठ 90)। कवि यहां समग्र पर्यावरण के प्रति बच्चों की वाणी में चौकस है। विश्व में भले ही कंप्यूटर की तूती बोले, पर धरती से जुड़ा़ बच्चा, उसे ‘दुनिया का कूड़ा’ (पृष्‍ठ 163) मानता है। बच्चे तन और मन दोनों स्तरों पर फुर्ती चाहते हैं, किंतु मशीनीकरण से फुर्ती तो आई परंतु ‘मन बूढ़ा हो गया’। उल्‍लास  रहित बच्‍चे ईमेल के पक्षधर नहीं- ‘ऐसी त्वरित गति किस काम की जिसमें ‘पोस्टकार्ड हो गया फिसड्डी और चिट्ठी-पत्री फेल हो रही हो’(पृष्‍ठ 146)। पत्र अपने प्रिय के पास पहुंचकर मन में जो एक अजीब सिहरन पैदा करते थे, वो फोन-ईमेल ने छीन ली। अब ‘मेल मिलाप हो गया जल्दी, पर खतरों का है ये खेल’ उन वैयक्तिक विडंबनाओं की ओर संकेत है जो उसे सहज न रख कर तनावयुक्त ही करते है, मुक्त नहीं। फोन कर संवादों में अब वह गर्माहट कहां? बड़ा प्रश्न है, ‘फ्रिज है रईसों के घर भी निशानी/ पर भैया, अमृत है मटके का पानी’ (पृष्‍ठ 126)। कविता में सप्रमाण मटके की उपयोगिता दिखी जो आधुनिक साधनों को नकारती है।
बच्चों भी प्रकृति में तर्क और जिज्ञासा सदैव से रहते आए हैं। ‘डॉक्टर अंकल’ कविता में डॉक्‍टर भी बच्‍चे के तर्क से पराजित होता दिखा। इसी तरह काली बकरी द्वारा दिया गया दूध सफेद, और हरे रंग की मेहंदी की पत्‍ती का रचाव लाल रंग का कैसे?  हवा की मुट्ठी में न आना ऐसे स्थल है कविताओं के जिनमें बच्चों की प्रश्नाकुलता मूर्तिमान हुई है। यहां एक तथ्य ओर भी उल्‍लेखनीय है कि प्रत्येक कविता के साथ उसके भाव को चित्र में मूर्तिमान किया गया है। इससे कवि के मूल काव्य विम्ब योजना तक पहुंचने में सुविधा होती है।
पुस्तक फ्लेप पर उल्‍लेख है कि बाल गीतों का वय के अनुसार शिशु काल और किशोर गीतों जैसा कोई तकनीकी वर्गीकरण नहीं है। पर यह बात मेरे गले नहीं उतरी क्‍योंकि ‘धत् तेरे की अपनी किस्मत में तो बोतल का दूध लिखा है’ जैसी कविताएं शुद्धत: शिशु भाव पर केन्द्रित  हैं। इसी प्रकार ‘पापा ! घोड़ा बनो’, ‘ढपलूजी रोए आँ… ऊँ’, ‘मैं त्‍या छतमुत तुतलाता हूं’ जैसी कविताएं बाल वय की एवं इसी तरह, ‘ऐसा जीवन नहीं चाहिए’ और ‘दूध वाले भैया’ आदि गीत किशोर मन की अभिव्‍यक्तियां हैं। अस्‍तु वर्गीकरण साफ है।
कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है। भाषा और भाव का कथनों में अद्भुत मेल है। तत्ता, म्हारा, थारा, गप्प, गुइयां जैसे विभिन्न बोलियों के शब्‍द कथ्‍य को प्रभावी बना सके हैं।
सामाजिक फलक पर बच्चों को देखें तो इस अर्थ युग में सामाजिक जीवन में बच्चे बोझ की ही अनुभूति देते हैं और यदि बोझ नहीं तो किनारे पर तो अवश्य ही कहे जायेंगे। वह यूं कि अभिजात्य वर्ग के सभी भौतिक सुविधाओं से लैस बच्चे मां-बाप के सानिध्य को तरसते हैं क्योंकि माता-पिता के पास उनसे बोलने-बताने का समय ही नहीं, मध्यवर्ग के बच्चे महंगाई और उच्च वर्ग की नकल न कर पाने से कुंठित और निम्न वर्ग के बच्चे सीमित साधनों और अभावों के कारण माता-पिता का दुलार नहीं पाते। इस प्रकार से बचपन तो साफतौर पर ठगा ही जा रहा है क्योंकि मातृ-पितृ स्‍नेह के जो दो पल बच्‍चे को मिलने चाहिए, उनसे बच्‍चे वंचित हैं और ऐसे में तैलंग जी द्वारा  लिखित बाल गीत मन में गुदगुदी तो पैदा करते ही हैं, जो एक बड़ी बात है आज के वक्त में। कुल मिला कर कहा जाए तो निराश होने की बात नहीं है। राष्ट्रकवि दिनकर ने समाजवाद के पक्ष में गर्जना की थी, ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ की टोन पर तैलांग जी ‘सड़कें खाली करो कि बच्चे आते हैं’ की घोषणा करते हैं तो एक आशा बंधती है कि आगामी कल बच्चों का होगा, जिन पर भविष्य का भार है। पुस्तक बाल साहित्याकाश मैं एक सितारा बन कर चमकेगी इसी आशा के साथ और कवि के लिए सतत लेखन की शुभकामनाओं के साथ।

पुस्‍तक: मेरे प्रिय बालगीत (संग्रह, 2010), पृष्‍ठ: 180, मूल्‍य:250 रुपये  प्रकाशक : कृतिका बुक्‍स, 19 रामनगर एक्‍स्‍टेंशन-2, निकट पुरानी अनारकली का गुरुद्वारा, दिल्‍ली-110051

रमेश तैलंग की बाल कविताओं से संबंधित लिंक-

-रमेश तैलंग के बालगीत

-रमेश तैलंग की शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से कुछ बालगीत

रमेश तैलंग के बाल गीत

रमेश तैलंग के शीघ्र प्रकाश्य बाल-गीत संग्रह ‘काठ का घोड़ा टिम्मक टूँसे कुछ नये मनोरंजक बाल-गीत-

माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर, तारों की हर गली
माँ की गोदी में हम घूम आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

पंछियों की तरह पंख अपने न थे,
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे,
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन, हर तपन भूल आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

दूसरों के लिए सारा संसार था,
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके
धनिया महके
अम्माँ की रसोई में।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा,
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में।

आटा-बेसन, चकला-बेलन
घूम रहे हैं बतियाते,
राग-रसोई बने प्यार से
ही, सबको ये समझाते,
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में।

थाली- कडुछी और कटोरी
को सूझी देखो मस्ती,
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती,
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।

समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यू अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई !

दद्दू को आई तो दादी को आई,
जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई!

लगा छूत का रोग जैसे सभी को
मुँह खोले बैठे हैं सारे तभी तो,
करे कोई कितनी भी क्यों न हँसाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

छुपाए न छुपती, रूकाए न रूकती,
बिना बात छाने लगी सब पे सुस्ती,
हमने तो चुटकी भी चट-चट बजाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

हद हो गई अब, दवा कोई देना,
जम्हाई को आ कर भगा कोई देना,
न फिर से हमें घर में दे ये दिखाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप

पिछली गली में झमाझम पानी
अगली गली में है सुरमई धूप
बारिश के मौसम के हैं कई रूप।

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओल,
बिसना की मोसी का सूखा है सूप।

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गड़बड़ घोटाला
चुन्नू के घर में निकल गए छाते
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप।

बारिश के मौसम के हैं कई रूप ।

वाह, मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-मूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।
 
 
 
 

बाल साहि‍त्य पर हर माह लि‍खेंगे रमेश तैलंग

नई दि‍ल्ली : सुप्रसि‍द्ध साहि‍त्यकार रमेश तैलंग ‘लेखक मंच’ के लि‍ए हर महीने प्रकाशि‍त हुए बाल साहि‍त्य पर आलेख लि‍खेंगे। लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कि‍ वह बाल साहि‍त्य से संबंधि‍त नवीनतम प्रकाशि‍त अपनी पुस्तक की दो प्रति‍यां नि‍म्‍न पतों में से कि‍सी पर भी भि‍जवाने का अनुग्रह करें ताकि‍ उनका आवश्‍यकता अनुसार उपयोग कि‍या जा सके।
1. श्री रमेश तैलंग, ए-369 गणेश नगर नंबर-2, शकरपुर, दिल्ली -110092,
ईमेल : rameshtailang@yahoo.com
2. अनुराग, 433, नीति‍खंड- तृतीय, इन्‍दि‍रापुरम, गाजि‍याबाद-201014, उत्‍तर प्रदेश
ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

आकर्षित कर रहीं हैं नई बाल-पुस्तकें : रमेश तैलंग

वर्ष 2010 में प्रकाशि‍त बाल साहि‍त्‍य पर सुप्रसि‍द्ध कवि‍ रमेश तैलंग का आलेख-

हर वर्ष की तरह, इस वर्ष भी सैंकड़ों बहुरंगी बाल पुस्तकों ने हिंदी बाल-साहित्य को अपनी नव्यता एवं भव्यता के साथ समृद्ध किया है। चाहे विषयों की विविधता हो या सामग्री की उत्कृष्टता, चित्रों की साज-सज्जा हो या मुद्रण की कुशालता, हर दृष्टि से हिंदी की बाल-पुस्तकें अब अंग्रेजी बाल-पुस्तकों के बरक्स विश्‍वस्तरीय मानदंडों को छू रही हैं। पर, जैसा कि हर बार लगता है, पुस्तकों की कीमत पर एक हद तक नियंत्रण होना अवश्‍य लाजमी है। यदि 48 पृष्ठों की पुस्तक के लिए आपको 150 रुपये खर्च करने पड़ें तो कम से कम हिंदी बाल-पाठकों की जेब पर यह भारी ही पड़ता है।

लेकिन इस बहस में पड़ेंगे तो हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। अतएव हियां की बातें हियनै छोड़ो अब आगे का सुनो हवाल… की डोर पकड़ें तो,  हाल-फ़िलहाल पचास के लगभग नई बाल-पुस्तकें मेरे सामने हैं और उनमें बहुत सी ऐसी हैं जो विस्तृत चर्चा की हक़दार हैं। पर हर पत्रिका की अपनी पृष्ठ-सीमा होती है और इस सीमा के चलते यदि इन बाल पुस्तकों पर मैं परिचयात्मक टिप्पणी ही कर सकूं तो आशा है सहृदय पाठक-लेखक-प्रकाशक अन्यथा नहीं लेंगे।

तो सबसे पहले दो बाल-उपन्यास, जो मुझे हाल ही में मिले हैं। पहला है डॉ. श्री निवास वत्स का गुल्लू और एक सतरंगी ( किताबघर, दिल्ली) और दूसरा है राजीव सक्सेना का मैं ईशान ( बाल शिक्षा पुस्तक संस्थान, दिल्ली)।

श्रीनिवास वत्स एक सक्षम बाल कथाकार हैं और काफी समय से बाल-साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। मां का सपना के बाद गुल्लू और एक सतरंगी उनका नया बाल-उपन्यास आया है जिसका मुख्य पात्र यूं तो गुल्लू नाम का बालक है पर उपन्यास की पूरी कथा और घटनाएं सतरंगी नाम के एक अद्भुत पक्षी के चारों ओर घूमती हैं। यह पक्षी मनुष्य की भाषा समझ और बोल सकता है इसीलिए गुल्लू और सतरंगी की युगल-कथा पाठकों को अंत तक बांधे रखती है। 159 पृष्ठों में फैले इस उपन्यास का अभी पहला खंड ही प्रकाशिात हुआ है जो आगे जारी रहेगा। देखना यह है कि आगे के खंड एक श्रंखला के रूप में कितने लोकप्रिय होते हैं। वैसे लेखक ने इसे किसी भारतीय भाषा में लिखा गया प्रथम वृहद् बाल एवं किशोरोपयोगी उपन्यास माना है।

दूसरा उपन्यास- ‘मैं ईशान’ राजीव सक्सेना का प्रयोगात्मक बाल-उपन्यास है। उपन्यास क्या है, ईशान नाम के एक बालक की आत्मकथा है जिसमें उसी की जुबानी उसकी शैतानियां, उसकी उपलब्धियां, उसकी कमजोरियां, और उसकी परेशानियां बखानी गई हैं। संभव है, इसे पढ़ते समय ईशान के रूप में बाल-पाठक अपना स्वयं का चेहरा तलाशने लगें क्योंकि बच्चे तो सभी जगह लगभग एक से ही होते हैं।

कथा-साहित्य के फलक पर ही आगे नजर डालें तो मदन बुक हाउस, नई दिल्ली द्वारा आरंभ की गई मेरी प्रिय बाल कहानियां श्रंखला में पांच सुपरिचित लेखकों की कहानियों के संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। ये लेखक हैं- मनोहर वर्मा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र,  देवेन्द्र कुमार, भगवती प्रसाद द्विवेदी एवं प्रकाशा मनु। इससे पूर्व डॉ. श्रीप्रसाद की प्रिय कहानियों का संग्रह भी यहां से प्रकाशिात हो चुका है। मेरी समझ में ऐसे संग्रहों का महत्व इसलिए अधिक है कि इनमें लेखकों के शुरुआती दौर से लेकर अब तक की लिखी गई प्रतिनिधि कहानियों का संपूर्ण परिदृशय एक जगह पर मिल जाता है।

इन संग्रहों की यादगार कहानियों में मनोहर वर्मा की नन्हा जासूस, मां का विश्‍वास, चाल पर चाल, लीना और उसका बस्ता, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की समुद्र खारा हो गया, एक छोटा राजपूत, टप-टप मोती, साहसी शोभा, भगवती प्रसाद द्विवेदी की फिसलन, भटकाव, गलती का अहसास, छोटा कद-बड़ा पद, देवेन्द्र कुमार की बाबा की छड़ी, मास्टर जी, डाक्टर रिक्शा, पुराना दोस्त, धूप और छाया, प्रकाश मनु की गुलगुल का चांद, आईं-माईं आईं-माईं मां की आंखें, मैं जीत गया पापा के नाम लिए जा सकते हैं।

भगवती प्रसाद द्विवेदी ने फिसलन और भटकाव जैसी कहानियों में किशोरावस्था के ऐसे अनछुए बिंदुओं (योनाकर्षण एवं फिल्मी दुनिया के मायाजाल) को छुआ है जिन्हें बाल-साहित्य में ‘टेबू’ समझ कर छोड़ दिया जाता है।

ऐसा ही एक और कहानी संग्रह डॉ. नागेश पाण्डेय संजय का यस सर-नो सर (लहर प्रकाशन, इलाहाबाद ) है जिसमें उनकी 14 किशोरोपयोगी कहानियां संकलित हैं। नागेश पांडेय ने लीक से हटकर कहानियां/कविताएं लिखी हैं। यही कारण है कि उनकी बाल-कहानियां आधुनिक संदर्भों से जुड़कर पाठकों को बहुत कुछ नया देती हैं।

यहां मैं डॉ. सुनीता के बाल-कहानी संग्रह ‘दादी की मुस्कान’ ( सदाचार प्रकाशन, दिल्ली) की चर्चा भी करना चाहूंगा जिसमें उनकी छोटी-बड़ी 21 मनभावन कहानियां संकलित हैं। गौर से देखें तो सुनीता की कहानियों में जगह-जगह एक गंवई सुगंध या कहें,  एक अनगढ़ सौंदर्य देखने को मिलता है। सुनीता देवेन्द्र सत्यार्थी की तरह अपनी कहानियों में पत्र-शौली, यात्रा-कथा, सामाजिक, ऐतिहासिक जीवन-प्रसंग तथा पारिवारिक संबंधों की जानी-पहचानी मिठास…. सभी कुछ रचाए-बसाए चलती हैं जो पाठकों को एक अलग ही तरह का सुख देता है।

मेरी प्रिय बाल कहानियां के अलावा धुनी बाल-साहित्य लेखक और चिंतक प्रकाश मनु के इधर और भी अनेक कहानी संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। यथा- रंग बिरंगी हास्य कथाएं ( शशांक पब्लिकेशन्स, दिल्ली), तेनालीराम की चतुराई के किस्से, बच्चों की 51 हास्य कथाएं, ज्ञान विज्ञान की आशचर्यजनक कहानियां ( तीनों के प्रकाशक डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली ), अद्भुत कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( कैटरपिलर पब्लिशर्स, दिल्ली), जंगल की कहानियां, ( स्टेप वाई स्टेप पब्लिशर्स, दिल्ली),  चुनमुन की अजब-अनोखी कहानियां ( एवरेस्ट पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  सुनो कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( ग्लोरियस पब्लिशर्स, दिल्ली),  रोचक कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( बुक क्राफ्ट पब्लिशर्स, दिल्ली)  । ज़ाहिर है कि प्रकाश मनु न केवल अपने लेखन में गति और नियंत्रण बनाए हुए हैं, बल्कि समकालीन बाल-साहित्य के समूचे परिदृश्‍य पर भी एक पैनी नजर रखे हुए हैं। मैं नहीं जानता, इतने विविध और महत्वपूर्ण बाल कहानी-संग्रह एक साथ एक ही वर्ष में किसी और लेखक के प्रकाशित हुए हैं।

जाने-माने कथाकार अमर गोस्वामी  की 51 बाल कहानियों का एक नया संग्रह ‘किस्सों का गुलदस्ता’ (चेतना प्रकाशन, दिल्ली) भी इधर आया है जिसमें बाज की सीख, घमंडी गुलाब, चुनमुन चींटे की सैर, लौट के बुद्धु के अलावा उनकी मशहूर बाल कहानी शोरसिंह का चशमा भी शामिल है। पाठक इन सभी कहानियों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

लोक-परक, पौराणिक एवं प्रेरक बाल-कथा साहित्य के अंतर्गत आनंद कुमार की ‘जीवन की झांकिया, ( ट्रांसग्लोबल पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  मनमोहन सरल एवं योगेन्द्र कुमार लल्ला द्वारा संपादित भारतीय गौरव की कहानियां, ( बुक ट्री पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली),  हरिमोहन लाल श्रीवास्तव तथा ब्रजभूषण गोस्वामी द्वारा संपादित मूर्ख की सूझ, विष्णु दत्त ‘विकल’ की इंसान बनो, दो खंडों में प्रकाशिात राज बहादुर सिंह की चरित्र निर्माण की कहानियां (सभी के प्रकाशाक एम.एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली),  सावित्री देवी वर्मा रचित इन्सान कभी नहीं हारा,  प्यारे लाल की गंगा तेली, ( दोनों के प्रकाशक-सावित्री प्रकाशन, दिल्ली), राम स्वरूप कौशल की पाप का फल, ( स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली )  तथा डॉ. रामस्वरूप वशिष्ठ की एक अभिमानी राजा (ओरिएंट क्राफ्ट पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली)  के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं।

कथा-साहित्य की तरह ही बाल कविताएं भी अपनी सहजता, मधुरता और सामूहिक गेयता के कारण हमेशा से बच्चों को प्रिय रही हैं।

यह हर्ष की बात है कि इस वर्ष हमारे समय के पुरोधा बालकवि डॉ. श्रीप्रसाद के तीन संग्रह क्रमश: मेरे प्रिय शिशु गीत ( हिमाचल बुक सेंटर, दिल्ली), मेरी प्रिय बाल कविताएं ( विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)   और मेरी प्रिय गीत पहेलियां ( सुधा बुक मार्ट, दिल्ली),   एक साथ प्रकाशिात हुए हैं। इन काव्य-संग्रहों में श्रीप्रसाद जी की लंबी बाल-काव्य यात्रा का विस्तृत परिदृश्य अपनी पूरी वैविध्यता के साथ देखा जा सकता है। श्रीप्रसाद जी के अलावा डॉ. प्रकाशा मनु के भी 101 शिशु गीत इधर चेतना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुए हैं जिनका मजा नन्हे-मुन्ने़ पाठक ले सकते हैं।

शिशु गीतों की बात चली है तो संदर्भवश मैं यहां यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि अंग्रेजी में रेन रेन गो अवे,  ब बा ब्लेकशीप, हिकरी-डिकरी,  जैसे बहुत से ऐसे नरसरी राइम्स हैं जिनके पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक, सामाजिक घटना जुड़ी है। जिज्ञासु पाठक यदि चाहें तो,  इन घटनाओं का संक्षिप्त ब्‍योरा www.rhymes.org.uk वेबसाइट पर देख सकते है। हिंदी शिशु गीतों, खासकर जो लोक में प्रचलित हैं, में ऐसे संदर्भों को ढूंढना श्रम-साध्य होने के बावजूद रोचक होगा। क्योंकि कोई भी लेखक या शिशु गीत रचयिता अपने समय से कटकर कुछ नहीं रच सकता।

इस वर्ष जिन अन्य बाल-कविता संग्रहों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है उनमें डॉ. शकुंतला कालरा का हंसते-महकते फूल ( चेतना प्रकाशन, दिल्ली ),   डॉ. बलजीत सिंह का गाओ गीत सुनाओ गीत, डा. शंभुनाथ तिवारी का धरती पर चांद  ( दोनों के प्रकाशक हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर), प्रत्यूष गुलेरी का बाल गीत ( नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली),   डॉ. आर.पी. सारस्वत के दो संग्रह- नानी का गांव और चटोरी चिड़िया ( दोनों के प्रकाशक नीरजा स्मृति‍ बाल साहित्य न्यास, सहारनपुर),    राजा चौरसिया का अपने हाथ सफलता है ( बाल वाटिका प्रकाशन, भीलवाड़़ा), अजय गुप्त का जंगल में मोबाइल ( श्री गांधी पुस्तकालय प्रकाशन, शाहजहांपुर ), चक्रधर नलिन का विज्ञान कविताएं( लहर प्रकाशन, इलाहाबाद),   और गया प्रसाद श्रीवास्तव श्रीष का वीथिका ( कवि निलय,  रायबरेली) प्रमुख हैं।

डॉ. आर पी सारस्वत अपेक्षाकृत नए बाल कवि हैं पर उनकी बाल-कविता चटोरी चिड़िया की गेयता और उसका चलबुलापन सचमुच चकित करता है। सच कहूं तो बाल-कविता के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं जिनमें सबसे बड़ी चुनौती लोकलय एवं पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता को बचाए रखने की है।

कवि‍ता के बाद नाटक विधा की बात करें तो बाल नाटकों की इधर दो किताबें मुझे मिली हैं। ये हैं डॉ. प्रकाश पुरोहित की ‘तीन बाल नाटक’ ( राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर) तथा भगवती प्रसाद द्विवेदी की आदमी की खोज ( कृतिका बुक्स इंटरनेशनल, इलाहाबाद),  जिसमें उनके सात बाल एकांकी संग्रहीत हैं।

अन्य विधाओं में मनोहर वर्मा की भारतीय जयन्तियां एवं दिवस ( साहित्य भारती, दिल्ली) महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें लेखक ने भारतीय महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय के साथ उनकी जयंतियां मनाने का सही तरीका तथा आवश्‍यक उपदानों का रोचक ढंग से वर्णन किया है। जिन पाठकों को महापुरूषों के प्रेरणादयी वचनों के संग्रह में रुचि है उन्हें गंगाप्रसाद शर्मा की पुस्तक 1001 अनमोल वचन (स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली) सहेजने योग्य लग सकती है। इनके अलावा, जैसा कि सब जानते हैं,  हर वर्ष भारत के कुछ बच्चों को उनके साहस और वीरता भरे कारनामों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है। रजनीकांत शुक्ल ने ऐसे ही राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित सोलह बहादुर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं जो छोटे-बड़े सभी पाठकों को प्रेरणादायी एवं रोमांचकारी लगेंगी।

आध्यात्मिक गुरु, चिंतक एवं वक्ता ओशो ने एक बार कहा था कि जब हम ईश्‍वर से बात कर रहे होते हैं तो वह प्रार्थना कहलाती है और जब हम ईश्‍वर की बात सुन रहे होते हैं तो वह साधना बन जाती हैं। सच कुछ भी हो पर यह तो मानना पड़ेगा कि प्रार्थना हर मनुष्य को आंतरिक शक्ति प्रदान करती है और शायद यही कारण है कि लगभग हर घर, संस्थान, विद्यालय में अलग-अलग समय पर प्रार्थनाएं गाई जाती हैं। ऐसी ही शक्तिदायी प्रार्थनाओं और राष्ट्रीय वंदनाओं का एक रुचिकर संग्रह शान्ति कुमार स्याल का विनय हमारी सुन लीजिए (विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)  है जिसमें एक सौ के लगभग प्रार्थनाएं संग्रहीत हैं।

बाल-साहित्य में रुचि रखने वाले बहुत से पाठकों को साहित्यकारों के बचपन और उनके जीवन के बारे में भी जानने की उत्सुकता रहती है। इस संदर्भ में दो पुस्तकों का उल्लेख मैं यहां करना चाहूंगा। पहली पुस्तक है बचपन भास्कर का (साहित्य भारती,  दिल्ली) जिसमें प्रख्यात साहित्यकार रामदरश मिश्र के बचपन के प्रसंग हैं और दूसरी पुस्तक है ‘वह अभी सफ़र में हैं’ ( प्रवाल प्रकाशन, गाजियाबाद) जिसमें जाने-माने बाल-साहित्यकार योगेन्द्र दत्त शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर मार्मिक लेख हैं। ज्ञातव्य है कि योगेन्द्र दत्त शर्मा के दो बालगीत संग्रह आए दिन छुट्टी के और अब आएगा मजा पहले ही काफी चर्चित हो चुके हैं।

और अंत में चलते-चलते प्रकाशान विभाग नयी दिल्ली से प्रकाशित देवेन्द्र मेवाड़ी की पुस्तक- विज्ञान बारहमासा का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें लेखक ने प्रकृति से जुड़े अनेक सवालों के जवाब सीधे, सरल और सटीक ढंग से दिए हैं। निस्संदेह, देवेन्द्र मेवाड़ी की यह पुस्तक विज्ञान पर लिखी गई महत्वपूर्ण बाल पुस्तकों में अपना यथोचित स्थान बनाएगी।

(आजकल, नवंबर, 2010 में प्रकाशि‍त आलेख के संपादि‍त अंश)

माँ-बेटे के कोमलतम रिश्ते की विरल अनुभूतियों का बयान : रमेश तैलंग

साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित कथाकार प्रकाश मनु के बाल उपन्‍यास एक था ठुनठुनिया का अवलोकन कर रहे हैं चर्चित लेखक रमेश तैलंग-

कथा-पुरुष देवेन्द्र सत्यार्थी अक्सर कहा करते थे कि पाठक (आलोचक) को किसी भी कृति का मूल्याँकन लेखक की ज़मीन पर बैठ कर करना चाहिए। सत्यार्थीजी की यह उक्‍ति‍ मुझे इसलिए भी याद आ रही है कि ‘एक था ठुनठुनिया’ को पढ़ते हुए मैं कई बार कई जगह पर फिसला हूँ। शायद यही कारण है कि रचना कई बार पुनर्पाठ की अनिवार्यतः माँग करती है।

सरसरी तौर पर देखें तो एक था ठुनठुनिया एक पितृहीन पाँच साल के बच्चे की साधारण-सी कथा है जो अपनी चंचलता और विनोदप्रियता से अपनी माँ के साथ-साथ पूरे गांव वालों का प्रिय बन जाता है और किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते अपनी सूझ-बूझ, कला-प्रवीणता और मेहनत से एक दिन अपनी माँ का सहारा बनकर सफलता की ऊँचाइयाँ हासिल करता है। पर इस साधारण-सी दिखने वाली कथा में कई असाधारण बिंदु गुंफित हैं।

मसलन, पहला बिंदु तो ठुनठुनिया की माँ के ममता भरे उस सपने से जुड़ा है जिसमें वह ठुनठुनिया के बड़े तथा सक्षम होने पर परिवार के भरण-पोषण की समस्या का निदान खोज रही है। पुत्रजन्म के एक साल बाद ही पति का देहावसान किसी भी माँ के लिए बज्राधात से कम नहीं होता खासकर उस गरीब परिवार में जहाँ जीवनयापन का अर्थ सतत संघर्ष के सिवा कुछ और नहीं है- ‘‘बस यही तो मेरा सहारा है, नहीं तो भला किसके लिए जी रही हूँ मैं। ……अब जरूर मेरे कष्ट भरे दिन कट जाएँगे।…… मेरा तो यही अकेला बेटा है ….. लाड़ला! इसी के सहारे शायद बुढ़ापा पार हो जाए।’’

दूसरा बिंदु,  ठुनठुनिया की माँ के मन में पल रहे उस अज्ञात डर का है जो उसे सदैव इस आशंका से आतंकित किए रहता है कि उसका इकलोता बेटा और एकमात्र सहारा ठुनठुनिया अगर किसी कारणवश उससे दूर चला गया तो उसका क्या होगा। क्या वह उसका वियोग सह पाएगी? और एक दिन जब मानिक लाल कठपुतली वाले के साथ ठुनठुनिया सचमुच गाँव छोड़ कर चला जाता है और काफी दिनों तक माँ की सुध नहीं लेता तो माँ का यही डर प्रत्यक्ष हो कर उसके सामने आ खड़ा होता है। पूर्वअध्यापक अयोध्याप्रसाद जब ठुनठुनिया को अपने साथ लेकर गाँव लौटते हैं तो कई दिनों से बीमार पड़ी माँ का अकुलाता हृदय ठुनठुनिया के सामने उपालंभ भरे स्वर में फट पड़ता है- ‘‘बेटा ठुनठुनिया, तूने अपनी माँ का अच्छा ख्याल रखा। कहा करता था-‘माँ, माँ, तुझे मैं कोई कष्ट न होने दूँगा। पर देख, तूने क्या किया?’’

तीसरा बिंदु शैशव और किशोरावस्था के बीच झूलते ठुनठुनिया के उस निश्छल, विनोदप्रिय एवं निर्भीक स्वभाव का है जिसके तहत वह अपने गाँव गुलजारपुर के भारीभरकम सेहत वाले जमींदार गजराज बाबू को हाथी पर सवार देखकर विनोद करता है- ‘‘माँ! माँ! देखो, हाथी के ऊपर हाथी…, देखो माँ,  हाथी के ऊपर हाथी।’’ ठुनठुनिया के विनोदी एवं निर्भीक स्वभाव का वहाँ भी परिचय मिलता है जहाँ वह भालू का मुखौटा लगा कर रात को रामदीन काका सहित बहुत से गाँव वालों को पहले डराता है और कुछ दिनों बाद गाँव के ही एक उत्सव में भालू नाच दिखाने के बाद इस रहस्य का पर्दा भी खोल देता है,  बिना इस भय के कि उसकी इस शरारत के लिए उसे सजा भी मिल सकती है। यह और बात है कि उसे सजा तो नहीं मिलती, गजराज बाबू द्वारा गुलजारपुर के रत्न का खिताब अवश्य मिल जाता है।

यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि आमतौर पर बहुत से बच्चों में पढ़ाई से हट कर कंचे खेलने, पतंग उड़ाने, पेंच लड़ाने या कुछ ऐसा कर गुजरने की इच्छा बलवती होती है जो दूसरे न कर सके। ठुनठुनिया इसका अपवाद नहीं। वह भी इन सभी कामों में अपनी महारत सिद्ध करना चाहता है और ऐसा कर भी लेता है । यही नहीं उसकी एक दबी हुई इच्छा यह भी है कि वह पढ़ाई की जगह खिलौने बनाकर या कठपुतली का नाच दिखा कर अपने तथा अपनी माँ के लिए खूब पैसा कमाए। उसकी यही इच्छा उसे पहले रग्घु काका के खिलौने बनाने तथा बाद में मानिक लाल के कठपुतली नचाने की कला के प्रति आकर्षित करती है और अचानक माँ से दूर एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ थोड़ा पैसा और शोहरत तो है पर वह माँ नहीं है जिसकी जिंदगी का हर पल उसी के सहारे टिका हुआ है।

स्कूली शिक्षा से विचलन और कम से कम समय में येन-केन प्रकारेण ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह अंकुरण के बाद पल्लवित होती आज की नई पीढ़ी को किस तरह उनके सही लक्ष्‍य तथा अपने प्रियजनों से दूर भटका रही है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण ठुनठुनिया के चरित्र में देखने को मिलता है।

पर वो कहते हैं न कि अंत भला सो सब भला।

अपने पूर्व अध्यापक अयोध्या प्रसाद के साथ जब ठुनठुनिया आगरा से वापस अपने गाँव गुलजारपुर लौटता है तो उसके जीवन की राह ही बदल जाती है। अब वह दोबारा स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ाई में पूरी तरह जुट जाता है और हाईस्‍कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। पढ़ाई के साथ-साथ उसकी क्रियात्मक कलाओं में अभिरुचि तथा प्रवीणता उसे एक दिन कपड़ा फैक्टरी के मालिक कुमार साहब तक पहुँचा देती है जो इंटर पास करने के बाद ठुनठुनिया को उसकी कुशलता तथा विश्वास पात्रता के चलते अपने डिजाइनिंग विभाग में असिस्टेंट मेनेजर की नौकरी दे देते हैं। इस तरह ठुनठुनिया जहाँ अपनी मां गोमती का वर्षों से पाला हुआ सपना पूरा करता है, वहीं गोमती अपने बेटे के लिए उसके अनुरूप बहू भी ढूंढ़ लेती है।

एक था ठुनठुनिया का एक और बेहद मनोरंजक प्रसंग वह है जहाँ ठुनठुनिया अपने दोस्तों के उपहास से तंग आकर अपनी माँ के सामने अपना नाम बदलने की पेशकश रखता है। उत्तर में जब माँ उसे शहर जा कर कोई नया नाम खोज लेने के लिए कहती है तो ठुनठुनिया की कशमकश देखते बनती है। जब वह अशर्फीलाल को भीख माँगते, हरिश्चंद्र को जेब काटते और छदामीमल को सेठ की जिंदगी जीते हुए देखता है तो उसको समझ आ जाती है कि उसे और किसी दूसरे नाम की जरूरत नहीं, वह तो ठुनठुनिया ही भला।

आह वे फुंदने वाले प्रसंग को पढ़कर मुझे राम नरेश त्रिपाठी की कहानी सात पूंछों वाला चूहा स्मरण हो आई। लोक में ऐसी कथाएं अनेक रूपों में प्रचलित होकर लेखकों को प्रेरित करती है जहाँ कहीं-कहीं साम्य भी नजर आ जाता है।

एक था ठुनठुनिया की एक प्रमुख विशेषता है प्रकाश मनु की बाल-सुलभ चुलबुली भाषा और कथा कहने का खिलंदड़ा अंदाज जो उन्हें कथा लेखक से कहीं ज्यादा कुशल कथावाचक के रूप में स्थापित करते हैं।

पुस्तक- एक था ठुनठुनिया (2007),  पृष्ठ-95
प्रकाशक- शब्दकलश,  एस-55 प्रताप नगर, दिल्ली-110007
मूल्य- 100 रुपये

रमेश तैलंग के बालगीत

2 जून, 1946 को टीकमगढ़ में जन्‍में चर्चित लेखक रमेश तैलंग की बाल साहि‍त्‍य में अलग पहचान है। वि‍षय,  भाषा और शि‍ल्प की वि‍वि‍धता उनके बाल गीतों की वि‍शि‍ष्‍टता है-

सर्दी की धूप

थोड़ी-सी सर्दी क्‍या पड़ने लगी।
धूप बड़ी छुट्टि‍यॉं करने लगी।
मौसम पर कुहरे का रंग चढ़ गया,
दादी के घुटने का दर्द बढ़ गया,
छाती भी घरर-घरर करने लगी।
अम्‍मॉं के ऊनी कपडे़ रो रहे,
सूरज दादा मुँह ढक के सो रहे,
चाय की खपत घर में बढ़ने लगी।
दॉंत अचानक कँपकँपाने लगे,
बाथरूम में पापा गाने लगे,
हीटर की कि‍स्‍मत बदलने लगी।

गुस्‍सा

सममुच बहुत बुरा है गुस्‍सा।
गुस्‍से में सब उल्‍टा-पुल्‍टा।
गुस्‍से में है तोड़ा-फोड़ी।
गुस्‍से में है नाक-सि‍कोड़ी।
गुस्‍से में है मारा-मारी।
गुस्‍सा है गड़बड़ बीमारी।
जब आए तब चलता कर दो।
हँसकर मुँह में हलुवा भर दो।

धूप

लि‍ए हाथ में फूल छड़ी।
आंगन में धूप खड़ी।
झरने जैसी झरती है।
आंख-मि‍चौली करती है।
पर्वत पर चढ़ जाती है।
सागर पर इठलाती है।
दि‍न भर शोर मचाती है।
शाम ढले सो जाती है।

भोलू

भोलू से पूछा मैंने-
‘स्‍कूल नहीं क्‍यों जाते ?’
भोलू बोला- ‘हम ढाबे पर
करते काम, कमाते।’
भोलू से पूछा मैंने-
‘क्‍या अनपढ़ बने रहोगे ?’
भोलू बोला- ‘अच्‍छा, पढ़ने की
तनख्‍वाह क्‍या दोगे ?’

मुनि‍या तू शैतान बड़ी

मुझे चि‍ढ़ाकर पूछा करते
मुझसे मेरे दादाजी-
‘बोलो, तुमको कौन है प्‍यार
मम्‍मीजी या पापाजी ?’
क्‍या जवाब दूँ सोच-सोचकर
होती मुझको हैरानी,
मम्‍मी की मैं रानी बेटी
पापा की बि‍टि‍या रानी।
मैं कह देती- ‘मम्‍मी प्‍यारी,
प्‍यारे-प्‍यारे पापाजी,
मम्‍मी-पापा से भी प्‍यारे
लेकि‍न मेरे दादाजी।’
दादाजी के होंठों पर तब
आ जाती मुस्‍कान बड़ी,
कान पकड़कर मेरा कहते-
‘मुनि‍या तू शैतान बड़ी।’

ऐसा क्‍यों होता है ?

अपनी बकरी काली
फि‍र भी देती दूध सफेद
नहीं समझ में आया अब तक
क्‍या है इसका भेद ?
पत्‍ती होती हरी, हथेली पर
रचती है लाल,
जाने कैसी करती मेंहदी
जादू-भरा कमाल ?
मुट्ठी में हर चीज पकड़ लो
हवा न पकड़ी जाती,
जाने ऐसा क्‍यों होती है
मैं ये समझ न पाती।
मम्‍मी से पूछो तो कहती-
खा मत यहाँ दि‍माग’
पापा कहते- ‘जा मम्‍मी के
पास चली जा भाग।

छुट्टी हों

छुट्टी हों छ: दि‍न ही
एक दि‍न पढ़ाई।
आए फि‍र बड़ा मजा भाई !
टीचर के आते ही
टन-टन घंटी बजे,
काम करो न करो
अपनी मर्जी चले,
देनी न पड़े रोज-रोज ही सफाई।
आए फि‍र बड़ा मजा भाई !
इम्‍तहान में टूटे
नि‍यम फेल करने का,
भूलों के सौ नबंर
जीरो हो रटने का,
नकल पर इनाम मि‍ले,
अकल पर पि‍टाई।
आए फि‍र बड़ा मजा भाई !

साल पुराने

साल पुराने जा रे जा
कपडे़ नये पहनकर आ।
झगड़ा-कुट्टी, माथा फुट्टी,
नये साल में सबकी छुट्टी,
रोनी-धोनी दूर भगा।
हँसी-हँसी फि‍र वापस ला।
वैर की बातें, झूठ की बातें,
टूट की बातें, फूट की बातें,
अब न हमको याद दि‍ला।
हँसी-खुशी फि‍र मेल मि‍ला।
साल पुराने जा रे जा।
कपडे़ नये पहनकर आ।

हँसा कीजि‍ए

रोज हर बात पर न कुढ़ा कीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।
फालतू की ये मनहूसि‍यत छोड़ि‍ए,
जो रुलाए कि‍सी को वो लत छोड़ि‍ए,
चुटकुले कुछ सुनाया-सुना कीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।
क्‍या पता कल हँसी के भी पैसे लगें,
चि‍ड़चि‍ड़े बच्‍चे बूढ़ों जैसे लगें।
मुस्‍कराहट को झटपट बुला लीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।
काम धंधे लगे ही रहेंगे यहॉं,
लोग हैं ढेर बातें कहेंगे यहाँ,
आप बस अपने मन को मना लीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।

टि‍न्‍नीजी !

टि‍न्‍नीजी ! ओ टि‍न्‍नीजी !
ये लो एक चवन्‍नी जी।
बज्‍जी से प्‍यारा-प्‍यारा
लाला छोटा गुब्‍बारा।
ऊपर उसे उड़ाएँगे,
आसमान पहुँचाएँगे।
टि‍न्‍नीजी ! ओ टि‍न्‍नीजी !
ये लो एक चवन्‍नीजी।
बज्‍जी से ताजी-ताजी
लाना पालक की भाजी।
घर पर उसे पकाएँगे,
साथ बैठकर खाएंगे !
टि‍न्‍नीजी ! ओ टि‍न्‍नीजी !
ये लो एक चवन्‍नीजी।
जल्‍दी से बज्‍जी जाना,
एक डुगडुगी ले आना।
डुग-डुग उसे बजाएँगे,
मि‍लकर गाने गाएँ
(मेरे प्रि‍य बालगीत से साभार )
चि‍त्रांकन- भूमि‍का बुडाकोटी, कक्षा- 4