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साम्राज्‍यवाद-विरोध, आलोचना और रामविलास शर्मा

नई दिल्‍ली : ‘रामविलास शर्मा एक विलुप्त प्रजाति के शख्स थे।राहुल सांस्कृत्यायन, वासुदेव शरण अग्रवाल और डीडी  कौशम्बी जैसे विश्‍वकोशीय ज्ञान रखने वाले भारतीय विद्वानों की प्रजाति के। लेकिन रामविलास जी का स्वधर्म आलोचना ही था। इतिहास और भाषा विज्ञान जैसे विषयों में रमने के कारण आलोचना की अनेक मूल्यवान संभावनाएं साकार न हो सकीं। ‘मित्र सम्‍वाद और गद्य की विलुप्त कला’ शीर्षक निबंध  में मैंने ऐसी ही एक सम्‍भावना की और संकेत किया था।’’ ये  बातें नामवर सिंह ने दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कही।

23, 24 और 25 नवम्बर को दिल्ली विश्‍वविद्यालय के  हिन्‍दी विभाग ने हिन्‍दी के ख्यातिलब्ध आलोचक रामविलास शर्मा की जन्मशती वर्ष में उनके कार्यों की विस्तृत विवेचना के लिये तीन दिनों का एक राष्ट्रीय सेमिनार ‘जन्मशती सम्‍वाद’ के नाम से आयोजित किया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से हिन्‍दी और अन्य अनुशासनों के विद्वानों ने भाग लिया।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गोपेश्‍वर सिंह के स्वागत भाषण से हुई। सत्र के संचालक आशुतोष कुमार ने बताया कि यह सेमिनार ज्ञानशास्त्रीय स्वतंत्रता के लिये किये गये रामविलासजी के  संघर्ष पर  केन्द्रित है। मुख्य अतिथि समकुलपति  विवेक सुनेजा  ने अपने वक्‍तव्‍य में विश्‍वविद्यालय के मानविकी विभागों की उपयोगिता की बात कही और जीवन में प्रेम के विलुप्त होते जाने की ओर इशारा किया जिसे लौटाने का काम साहित्य ही कर सकता है।

बीज भाषण देते हुए डॉ. निर्मला जैन ने कहा कि रामविलास जी की साधना के तीन मुख्य उद्देश्य थे– ज्ञान पर पश्‍च‍िम के एकाधिकार का खंडन, समाजवादी चेतना का प्रसार और प्रगति के लिए परम्परा के साथ  जीवंत सम्‍वाद। लेकिन मृत्यु के बाद मूलतत्ववादी के रूप में उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश की गयी।

सेमिनार के पहले सत्र का विषय था– ‘उपनिवेशवाद, नवजागरण और रामविलास शर्मा’। इसमें इतिहासकार हरबंश मुखिया, समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे, आलोचक  नंदकिशोर आचार्य ने विचार रखे। सत्र की अध्यक्षता डॉ. मैनेजर पांडे ने की।  हरबंश मुखिया ने मार्क्सवाद के विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते हुए उसके दक्षिणी अमेरिका में विकसित हो रहे नवीन स्वरूप की चर्चा भी की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उत्पादन की वृद्धि पर मार्क्सवाद की एक धारा का जोर है वह उचित नहीं है। उसका जोर अच्छे जीवन पर होना चाहिए जो दक्षिणी अमेरिकी देशों में दिया जा रहा है। रामविलास शर्मा के हवाले से उन्होंने बताया कि इतिहास लेखन की उनकी पद्धति स्तालिनवादी परम्परा की है, जो सुनिश्चित निष्कर्षों पर बल देती है।

अभय कुमार दुबे ने वक्तव्य की शुरूआत इसी बिंदू से की और तथ्यों का उल्लेख करते हुए इस मान्यता का खंडन किया। उन्होंने यह बताया कि रामविलास शर्मा के निष्कर्षों में कई परवर्ती इतिहासकारों के निष्कर्ष के बीज छिपे हैं। उनके समग्र लेखन की धुरी लोकजागरण है। उन्होंने अर्ली माडर्न के सूत्र दिये। उन्‍होंने कहा कि रामविलास शर्मा ने भारतीय मनीषा का गहन अध्ययन करके मार्क्सवाद का एक भारतीय संस्करण तैयार किया जिसमें उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन से अधिक सीखा बजाय कि उसके भाष्यकारों से।

नंदकिशोर आचार्य ने रामविलास  शर्मा के नवजागरण की अवधारणा की व्याख्या की और बताया कि विचारों और सांस्कृतिक सरंचानाओं को केवल आर्थिक परिवर्तनों के जरिए नहीं समझा जा सकता।

अपने अध्यक्षीय भाषण मे मैनेजर पांडेय ने चुटकी लेने वाले अंदाज में वक्ताओं के विचारों पर टिप्पणी प्रस्तुत की और उनकी मान्यताओं का खंडन भी किया। रामविलास शर्मा ने क्या नहीं किया, इसकी बजाय उन्होंने क्या किया इस पर बल देने की बात कही। उनकी आलोचना दृष्टि पर प्रेमचंद के प्रभाव को रेखांकित किया और कहा कि रामविलास शर्मा पर बात करते हुए वैचारिक और आलोचनात्मक किताबों के अलावा उनकी रचनात्मक किताबों को भी केन्द्र में रखना चाहिये। नवजागरण को उन्होंने एक विवादित अवधारण बताते हुए कहा कि कोई भी समाज तब जागेगा जब वह सोया हुआ हो और एक समय में एक समाज के सभी लोग सुप्त या सभी लोग जागृत नहीं हो सकते। इस सत्र का संचालन विभाग के प्राध्यापक राजेन्द्र गौतम ने किया और सत्र के अंत में डा. हरिमोहन शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन  किया।

दूसरा दिन : हिंदी आलोचना और रामविलास शर्मा’

सेमिनार के दूसरे दिन के पहले सत्र के विषय ‘हिन्‍दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ पर वक्तव्य की शुरुआत की बजरंग बिहारी तिवारी ने। रामविलास शर्मा के व्यापक लेखन और ‘भारतीय संस्कृति और हिन्‍दी प्रदेश’ किताब के हवाले से यह बताया कि रामविलास शर्मा के लेखन में दलित समर्थन की आवाज है। वह जहाँ सामंतवाद कहते हैं, वहाँ उनका आशय वर्णव्यवस्था होती है। साम्राज्यवाद से असली नुकसान देश की निम्न वर्गीय जनता का ही हुआ और इसे शर्मा जी स्पष्टतौर पर देख रहे थे। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में देश की आम जनता को काट दिया गया और उससे विदेशी शासकों को लाभ हुआ। इस तरह उन्‍होंने यह सिद्ध किया कि उनके चिंतन के केन्‍द्र में दलित भी थे।

कँवल भारती की अनुपस्थिति में  उनका पर्चा आशुतोष कुमार ने पढ़ा। उन्होंने कबीर के बिन्‍दु से रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि का मूल्याँकन किया और बताया कि  अपनी आलोचना में रामविलास शर्मा कबीर को बाहर करके और तुलसी को केन्द्र में रखके प्रच्छन्न हिन्दुत्ववाद की लाइन पकड़ रहे थे और ब्राह्मणवाद को ही पुख्ता कर रहे थे। कुछ साक्षात्कारों के हवाले से उन्होंने बताया कि रामविलास जी जाति प्रथा मिटाने का आधार वर्ग निर्माण को मानते हैं लेकिन समान वर्गों के बीच में जो विभेद हैं उसका आधार जाति है।

रोहिणी अग्रवाल ने स्त्री दृष्टि से रामविलास शर्मा की आलोचना का मूल्याँकन किया और बताया कि समाजवादी लक्ष्य की प्राप्ति में जो लेखक काम आ सकते थे उन्होंने उन्हें प्राथमिकता दी। इस तरह प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, वृंदावनलाल वर्मा उनकी प्राथमिकता में और अज्ञेय, जैनेंद्र बाहर रह गये। जैनेंद्र के उपन्यास ‘सुनीता’ की रामविलास जी की आलोचना के आधार पर  उन्होंने रामविलास शर्मा की आलोचना में एक आदर्श हिन्दू नारी के रूप में स्त्री की उपस्थिति को रेखाँकित किया।

शंभुनाथ ने कहा कि हर आलोचक का वैचारिक हिमांक होता है। देखने की चीज हिम नहीं प्रवाह है। रामविलास शर्मा की आलोचना में कथ्य, विचार और हृदय मिलकर बोलते हैं। आज जैसे-जैसे ज्ञान का समुद्र बढ़ रहा है वैसे-वैसे भावकूपता भी बढ़ रही है।  रचना की तरह आलोचना में भी खंडन होता है और साथ ही  पुनर्निर्माण भी। रामविलास शर्मा ने यूरोप केन्द्रित सोच, रुढि़वादिता और यांत्रिक भौतिकवाद का खंडन करते हुए ज्ञात इतिहास से अज्ञात  इतिहास की ओर छलांग लगाई  है। वह शुक्ल जी और द्विवेदी जी की तरह लोक की बात करते हैं। उनका जोर इस बात पर है कि आज भी भारत में नवजागरण की परियोजना अधूरी  है, जिसे पूरा करना है।

नित्यानंद तिवारी ने कहा कि  ‘ज्ञानशास्त्रीय स्वतंत्रता के लिए अंतरानुशासनिक सम्‍वाद’ रामविलास जी की कुल साधना को प्रकट करने वाला मुहावरा है। इसे उन्होंने  सेमीनार के निमंत्रणपत्र से उद्धृत किया।  उन्होंने कहा कि साहित्य और   समाज का सम्बन्ध  जितने  परिभाषित रूप में रामविलास शर्मा में है उतना न शुक्ल में है न द्विवेदी जी में। उनकी आलोचना में रहस्यवादी गुंजलक की सम्‍भावना नहीं है। उनकी आलोचना यथार्थ को नये ढंग से देखने का तरीका बताती है। रामविलास शर्मा ने पीढियों के विवेक को जाग्रत किया है। अध्यक्षीय भाषण में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने सवाल पैदा होने को और वक्ताओं के बीच असहमति भरे सम्‍वाद को सेमिनार की उपलब्धि माना। हिन्दी का पाठक शर्मा जी को आत्मीयता और कृतज्ञता के साथ पढ़ता है। उन्होंने साम्राज्यवाद को सौंदर्यवाद का पर्याय बताया। वह विवाद के लिये संतुलन की परवाह नहीं करते। उनको पढ़ते हुए उनके नेपथ्य को भी याद रखने की जरूरत है जिसके बीच उन्होंने अपना लेखन किया। करुणा की अनुभूति और त्रासदी का  बोध  उनकी आलोचना की खास उपलब्धियां हैं।

सत्र का संचालन अल्पना मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन मुकेश गर्ग ने किया। भोजनावकाश के बाद के सत्र की अध्यक्षता भगवान सिंह ने की और वक्तव्य दिलीप सिंह, रवींद्र गर्गेश और कृष्णदत्त शर्मा ने दिया। वक्‍ताओं ने रामविलास शर्मा के भाषा और समाज के विश्‍लेषण और उसके महत्त्व को रेखाँकित किया। कृष्णदत्त शर्मा ने उनके गद्य की साफ़गोई की ओर इशारा किया। दिलीप सिंह ने समय से आगे की उनकी उपलब्धि की ओर रेखाँकित किया और कहा कि जिस समय रामविलास शर्मा ने भाषा और समाज के सम्‍बन्‍धों को विश्‍लेषित किया, उस समय पश्‍च‍िम में भी किसी चिंतक ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था। रवीन्द्र गर्गेश ने रामविलास शर्मा को उद्धृत करते हुए विभिन्न भाषाओं के सम्‍बन्‍धों के विश्‍लेषण की पद्धति की ओर ध्यान दिलाया। सत्र का संचालन कुमुद शर्मा ने और धन्यवाद दिया पूरनचंद टंडन ने।

तीसरा दिन- ‘ज्ञान मीमांसा’

तीसरे दिन दोनों सत्रों का विषय था ‘ज्ञान मीमांसा और रामविलास शर्मा’। पहले सत्र की शुरुआत वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर के वक्तव्य से हुई। उन्होंने ज्ञान मीमांसा की शाब्दिक व्याख्या से शुरुआत करते हुए इस बात पर जोर दिया कि शासक वर्ग की कोशिश होती है कि जनता वैसी बातों को भूल जाए जो असुविधाजनक है। वह अपने हित में काम आने वाली ज्ञान का निर्माण करता है। ज्ञान की इस पद्धति को चुनौती देनी चाहिये। राजेन्द्र कुमार ने कहा कि रामविलास शर्मा का अन्य अनुशासनों में जाना साहित्य के स्वधर्म का ही विस्तार है। साहित्य के लिये कोई अनुशासन परधर्म नहीं है। उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा वर्तमान की समस्या को इतिहास और परम्‍परा के आलोक में देखते हैं। उनका सारा लेखन एक सांस्कृतिक अभियान है। जिसके कई आयाम हैं, कई धाराएं हैं लेकिन पुकार एक है जो भारतेन्दु से शुरू होकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला से होते हुए शर्मा जी तक आती है। यह पुकार भारत के स्वत्व की पुकार है। रामविलास शर्मा सच्चे अर्थों में जनता के आलोचक हैं और उनके निष्कर्ष उत्तर नहीं हैं, प्रश्‍न हैं।

रवि श्रीवास्तव ने कहा कि रामविलास शर्मा के सन्‍दर्भ में ज्ञान मीमांसा का सवाल इतिहास और परम्‍परा की आलोचना का सवाल है। संग्रह और ज्ञान का विवेक शुक्ल जी के बाद सबसे अधिक रामविलास जी में ही मिलता है। रामविलास शर्मा पर बातचीत करते हुए हमें उनके रचना कर्म में छिपे उन संकेतों को भी पहचानना चाहिये जो संकीर्णता के राष्ट्रवादी अभियान को लाभ पहुँचाते हैं।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए मुरली मनोहर सिंह ने कहा कि रामविलास शर्मा के समस्त लेखन कर्म की धुरी भारत में जनवादी क्रांति के लिये तैयारी करना, सांगठनिक कार्य करना और वैचारिक संघर्ष करना है। चीजों को टुकड़ों में देखने की प्रवृति छोड़ देनी चाहिए और साथ ही जनता और बुद्धिजीवियों के बीच जो दूरी बढ़ रही है, उसे भी कम करना चाहिए। रामविलास शर्मा की आलोचना में ज्ञान के अन्य अनुशासनों की आवाजाही को भी देखना चाहिए। और वर्तमान के सवालों से आलोचना को जोड़ना चाहिए। रामविलास शर्मा की ज्ञान मीमांसा, परम्‍परा की सकारात्मकता की निरंतरता और उसके पहलुओं को आत्मसात करने की लिये उनका विश्‍लेषण करती है। इसके तीन सूत्र हैं गतिमानता, सापेक्षता और अंतर्विरोध। सत्र का संचालन डा. प्रेम सिंह ने किया।

दूसरे सत्र में कृष्णदत्त पालीवाल ने कहा कि  अंतवाद के इस जमाने में कहा गया कि समस्त ज्ञान रदी की टोकड़ी में फेंक देने लायक है। बस एक ही ज्ञान बचा हुआ है पूँजीवाद। रामविलास शर्मा ने स्थापित मार्क्सवादी विचार से आगे बढ़ते हुए प्रतिपादित किया  कि हमारी बुनियादी समस्या किसान की समस्या है।

प्रणय कृष्ण ने पालीवाल की अवधारणाओं का प्रतिवाद किया। उन्‍होंने कहा कि मार्क्सवाद गतिमान और विकासशील  है, उसका कोई भी संस्‍करण अंतिम नहीं है।  मार्क्सवादियों की कोशिश संकीर्ण  विशेषज्ञताओं की जगह  बहुआयामी संवेदनशीलता को स्थापित करने की ओर रही है।   मार्क्स के मुताबिक़ समाजवाद  मनुष्य के  वास्तविक इतिहास की शुरुआत है , उसके पहले का सब कुछ  प्राक- इतिहास है। डॉ. संजीव ने कहा कि रामविलास शर्मा का मार्क्सवाद हिन्‍दी का विजेता और प्रतिष्ठित मार्क्सवाद है जिसके प्रभाव में हिन्‍दी के विमर्श जगत से सभी विरोधी विचारों को बाहर कर दिया गया है जिसमें रांगेय राघव और मुक्तिबोध भी शामिल हैं। रामविलास शर्मा परम्‍परा पर गौरव करना सीखाने वाला और उसकी फ़ांको को ढंक देने वाला विराट आख्यान रचते हैं। उनका प्रशस्ति गायन मूलतः हिन्‍दी प्रदेश और हिन्‍दी के लिए गौरव सामग्री देने का प्रयास है जिसमें देशभक्ति समस्त अंतर्विरोधों को ढंक लेती है और यह ठीक नहीं है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए असद ज़ैदी ने कहा कि रामविलास शर्मा ने कोई अंतिम बात नहीं कही। वह मार्क्सवादी आंदोलन की उपज थे लेकिन ऐसी बातें भी कह गये जिससे दक्षिणोन्मुखी धारा भी उन्हें ऋषि परम्‍परा में रखती है। रामविलास की विराटतर होती प्रतिमा को एक नज़र में देख लेना मुश्किल है। कट्टरताओं, संकीर्णताओं से युक्त होने के साथ उनका विषयगत वैविध्य एक चुनौती और भय पैदा करता है। रामविलास शर्मा पर बात करते हुए हमें यह भी याद रखना चाहिए कि साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए वह उन्हीं उपकरणों को इस्तेमाल करने लगते हैं जो साम्राज्य की उपज है। और इसीलिये पीछे के समाज में उदाहरण देखे जाने लगते हैं। यह प्रवृति ठीक नहीं है। सत्र का संचालन मंजु मुकुल ने किया और धन्यवाद दिया श्योराज सिंह बेचैन ने।

इसके बाद के सत्र में रामविलास शर्मा के पुत्र विजयमोहन शर्मा ने उन पर एक फ़िल्म दिखाई। समापन सत्र में राजेंद्र यादव की अध्यक्षता में राजेंद्र कुमार और रामेश्‍वर राय ने तीन दिनों के बहसों और विमर्शों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। संगोष्ठी रपट आशुतोष कुमार ने प्रस्तुत की।

प्रस्‍तुति: अमितेश, हिन्‍दी विभाग, दिल्ली विश्‍वविद्यालय

‘साम्राज्यवाद-विरोध, आलोचना और रामविलास शर्मा’ पर सेमिनार 23 से

नई दिल्‍ली : आलोचक रामविलास शर्मा की जन्‍मशती के अवसर पर 23, 24 और 25 नवम्बर को कांफ्रेंस सेंटर(वनस्‍पति विभाग के सामने), उत्‍तर परिसर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में ‘साम्राज्यवाद-विरोध, आलोचना और रामविलास शर्मा’ विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है।

सेमिनार 23 नवम्‍बर को दोपहर दोपहर 2 बजे शुरू होगा। इस सत्र की अध्यक्षता नामवर सिंह करेंगे। बीज वक्‍तव्‍य निर्मला जैन का होगा और अशोक वाजपेयी विशिष्‍ट अतिथि होंगे। मुख्‍य अतिथि होंगे दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के समकुलपति विवेक सुनेजा।

शाम चार बजे पहला सत्र शुरू होगा। इसका विषय है- ‘उपनिवेशवाद , नवजागरण और रामविलास शर्मा’।  इसकी अध्‍यक्षता हरवंश मुखिया करेंगे। मैनेजर पांडेय, नन्‍दकिशोर आचार्य और अभय कुमार दुबे इस विषय पर विचार रखेंगे।

24 नवम्‍बर को सुबह दस बजे पहला सत्र ‘हिन्‍दी आलोचना और रामविलास शर्मा’ होगा। इसकी अध्‍यक्षता विश्‍वनाथ त्रिपाठी  करेंगे। नित्यानंद तिवारी , शम्‍भुनाथ, कँवल भारती और रोहिणी अग्रवाल इस विषय पर अपने विचार रखेंगे।

दोपहर दो बजे दूसरे सत्र का विषय ‘भाषा , समाज और रामविलास शर्मा’ होगा। इसकी अध्‍यक्षता भगवान सिंह करेंगे। दिलीप सिंह , कृष्‍णदत्‍त शर्मा और रवीन्‍द्र गर्गेश वक्‍तव्‍य देंगे। ,

25 नवम्‍बर को सुबह दस बजे पहले सत्र का विषय होगा ‘ज्ञान-मीमांसा और रामविलास शर्मा’। इसकी अध्‍यक्षता मुरली मनोहर प्रसाद सिंह  करेंगे। राजेन्द्र कुमार , असद जैदी और रवि श्रीवास्तव इस विषय पर विचार रखेंगे।

दोपहर दो बजे दूसरे सत्र का विषय भी होगा ‘ज्ञान-मीमांसा और रामविलास शर्मा’। इसकी अध्‍यक्षता खगेन्द्र ठाकुर करेंगे। विजय बहादुर सिंह , कृष्णदत्त पालीवाल , प्रणय कृष्‍ण का वक्‍तव्‍य होगा।

शाम चार बजे समापन सत्र होगा। इसकी अध्‍यक्षत राजेन्‍द्र यादव करेंगे। इस अवसर विजय मोहन शर्मा की विशिष्‍ट उपस्थिति होगी। संवाद समाहार राजेन्‍द्र कुमार और रामेश्‍वर राय करेंगे। संगोष्‍ठी रपट आशुतोष कुमार पेश करेंगे औ धन्‍यवाद ज्ञापन गोपेश्‍वर सिंह देंगे।

रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि : गोपाल प्रधान

रामविलास शर्मा

आलोचक रामवि‍लास शर्मा की आलोचना के रूपगत सौंदर्य को उजागर करता युवा लेखक-आलोचक गोपाल प्रधान का लेख-

चूँकि हिन्‍दी आलोचना जगत में व्यवस्थित रूप से यह अभियान चलाया गया है कि रामविलास शर्मा की आलोचना साहित्य के रूपगत सौंदर्य को उजागर नहीं कर पाती इसलिए इस पर्चे में हमारी कोशिश उनके इसी पक्ष को उद्घाटित करने की होगी । उनका लेखन इतना विपुल है कि सारा तो छान पाना सम्‍भव नहीं लेकिन उनके महत्वपूर्ण लेखन का जायजा लेते हुए यह बताने की कोशिश की जाएगी कि गद्य और कविता दोनों ही की परीक्षा करते हुए किस तरह उनकी नजर हमेशा साहित्य के सौंदर्य को देखने/दिखाने की चेष्टा करती थी ।

साहित्य के कलात्मक सौंदर्य की स्वतंत्र छानबीन के लिये उन्होंने कला को विचारधारा से अलग माना । ‘आस्था और सौंदर्य’ में लिखा- ‘कला का संबंध विचारों के साथ मनुष्य के इंद्रियबोध और उसके भावों से भी है।—साहित्य भी शुद्ध विचारधारा का रूप नहीं है, उसका भावों और इंद्रियबोध से घनिष्ठ संबंध है। इससे स्पष्ट है कि ललित कलाओं को विचारधारा के रूपों में गिनना सही नहीं है।’ आप इस मान्यता के मार्क्सवादी या गैर मार्क्सवादी होने को लेकर बहस कर सकते हैं लेकिन इस मान्यता पर भी थोड़ा गहराई से विचार करना चाहिये । व्यावहारिक नजर से यह सिद्ध है कि भक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन के साहित्य को ही वी सम्‍पूर्णत: विपक्ष मानते हुए उसके भीतर के अंतर्विरोधों पर जोर देने से इनकार करते हैं । अगर मान लें कि साहित्य विचारधारा का अंग है तो भी जरूरी नहीं कि किसी युग का समूचा साहित्य शासक वर्ग के विचारों से प्रभावित हो क्योंकि मार्क्स भी प्रभुत्वशाली विचार को ही शासक वर्ग का विचार मानते हैं । एक और बात है कि मार्क्स के अनुसार पुराने समाज में नये समाज के तत्व पैदा हो जाते हैं । सवाल है कि इसमें साहित्य कहाँ रहता है ? क्या वह नये समाज के तत्व के निशान लिये रहता है ? इसका उत्तर मार्क्स की एक और धारणा के आधार पर देना उचित होगा । मार्क्स का कहना है कि बुनियादी ढाँचे के विरोधों के प्रति लोग ऊपरी ढाँचे के क्षेत्र में सचेत होते हैं और वहीं इसे निपटाते हैं । तो क्या पुराने समाज के प्रति विरोध प्रधानत: विचारधारा और साहित्य की दुनिया में दिखाई देगा ? और इस आधार पर भक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति रामविलास जी की मान्यता की कोई जगह बनती है ? वह जिस तरह का कार्यभार अपने लिये तय करते हैं उसमें थोड़ा गम्‍भीरता से विचार करने की माँग नाजायज नहीं होगी ।

इससे सिद्ध है कि साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के प्रति उनकी निष्ठा संदेह से परे है । वह विभिन्न रचनाकारों के मूल्याँकन में उनकी प्रतिबद्धता के साथ ही निरंतर उनके सौष्ठव को भी उजागर करते चलते हैं । कविता के सौंदर्य की पहचान के उपकरण आपको अनेक आलोचकों के लेखन में मिल जाएँगे लेकिन गद्य के सौंदर्य को उद्घाटित करने वाले जितने उपादान रामविलास जी ने मुहैया कराए उतने किसी अन्य आलोचक के यहाँ दुर्लभ हैं । प्रेमचंद पर लिखते हुए सब कुछ के बावजूद उन्होंने लक्षित किया कि ‘सेवासदन’ की कलात्मक ऊँचाई दोबारा कभी प्रेमचंद नहीं छू सके ।

अपने प्रिय कवि तुलसी की विशेषता को चिन्हित करते हुए उनकी सामाजिक चिंता की बात तो करते हैं लेकिन उनकी चौपाइयों की कलात्मक खूबी को रेखांकित करना भी नहीं भूलते। ‘परम्‍परा का मूल्याँकन’ में संकलित लेख ‘संत साहित्य के अध्ययन की समस्याएँ’ में लिखते हैं, ‘चौपाई हिन्‍दी का छोटा सा सीधा सादा छंद है जिसे ठाट बाट का कोई गुमान नहीं । इसमें भी यति परिवर्तन करके, स्वरों के उतार-चढ़ाव से तुलसी ने विविध और विचित्र ध्वनि सौंदर्य पैदा किया ।’ उदाहरण के बतौर तीन तरह की चौपाइयों की गिनती भी की-

‘सीधी गति यह है:
तदपि कही गुरु बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥

दूसरी गति- उदात्त भाव व्यंजना के लिये- यह है:
बुध विश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष विभंजनि॥

अंत में लघु गुरु देकर तीसरी तरह की गति:
मंत्र महामनि विषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥’

आमतौर पर वह रीतिकालीन कविता के विरोधी हैं लेकिन कला के प्रति उनका मोह इन कवियों की प्रशंसा के लिये भी बाध्य कर देता है । इसी संग्रह के लेख ‘रीतिकालीन काव्य-परम्‍परा’ में लिखते हैं, ‘इन कवियों से आधुनिक हिन्‍दी कवि जो बात सबसे ज्यादा सीख सकते हैं, वह है शब्द-चयन और शब्द-योजना ।—तत्सम शब्दों की तुलना में यहाँ तद्भव रूपों पर जोर है ।’ फिर इसकी व्याख्या करते हुए बतलाया, ‘सबसे महत्व की बात यह है कि तत्सम रूप किस ढंग से अपनाने चाहिए, यह हम इन कवियों से सीख सकते हैं ।’ सारत: ‘विवेक के साथ चित्रमयता और शब्द-योजना का अध्ययन करने से हिन्‍दी कवियों को लाभ होगा ।’ रीतिकालीन कविता की इस विशेषता की पहचान अपने समय के प्रति जिम्मेदार हुए बगैर नहीं की जा सकती थी ।

गद्य के सिलसिले में उनका लेख ‘शैलीकार बालमुकुंद गुप्त’ महत्वपूर्ण है । गद्य में वह किन विशेषताओं को आकर्षक मानते थे इसका पता इस निबंध से चलता है । लिखा है, ‘वे (बाल मुकुंद गुप्त) शब्दों के अनुपम पारखी थे । हिन्‍दी के साधारण शब्द उनके वाक्यों में नयी अभिव्यंजना शक्ति से दीप्त हो उठते थे ।’ इसके अलावा, ‘उनके वाक्यों में सहज बाँकपन रहता है । उपमान ढूँढ़ने में उन्हें श्रम नहीं करना पड़ता । व्यंग्यपूर्ण गद्य में उनके उपमान विरोधी पक्ष को परम हास्यास्पद बना देते हैं ।’ इस शैली का उपयोग भी उनके दिमाग में रहता है । गुलाम भारत में उनकी भूमिका की निशानदेही करते हुए रामविलास जी लिखते हैं, ‘अपने व्यंग्य शरों से उन्होंने प्रतापी ब्रिटिश राज्य का आतंक छिन्न-भिन्न कर दिया । साम्राज्यवादियों के तर्कजाल की तमाम असंगतियाँ उन्होंने जनता के सामने प्रकट कर दीं । अपनी निर्भीकता से उन्होंने दूसरों में यह मनोबल उत्पन्न किया कि वे भी अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध बोलें ।’ अपने प्रिय कवि निराला पर लिखे लेख ‘निराला-अपराजेय व्यक्तित्व’ में कला को साहित्यकार के जीवन से जोड़ते हुए लिखा, ‘—आप इस समस्या पर भी विचार करें कि महिषादल की नौकरी करते हुए, सम्‍पादकों-साहित्याचार्यों, तत्कालीन महाकवियों से श्रद्धा-संबंध कायम रखते हुए निराला अपनी कला के प्रति किस हद तक सच्चे रह सकते थे ।’ साफ है कि कला को वह किन्हीं खास सामाजिक स्थितियों का मुखापेक्षी मानते हैं ।

लेकिन कला के प्रति इस सावधानी के बावजूद उसके स्थान के बारे में कोई भ्रम उनके लेखन में नहीं है । ‘साहित्य में लोकजीवन की प्रतिष्ठा और जयशंकर प्रसाद’ में प्रसाद जी के बहाने अपने ही विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं, ‘प्रसाद जी के लिये साहित्य सोद्देश्य है, इसीलिए साहित्य में मूल वस्तु अनुभूति है, न कि अभिव्यक्ति ।—साहित्य अभिव्यंजनामात्र नहीं है; इसकी श्रेष्ठता मूलत: बात कहने के ढंग में नहीं वरन बात में है । भाषा और विचारों का संबंध रूप और विषयवस्तु का है ।’ इस उद्धरण से दो बातें स्पष्ट होती हैं । एक तो यह कि रामचंद्र शुक्ल का अभिव्यंजनावाद का विरोध छायावादी कवियों के साथ किया गया था । दूसरे इसी से जयशंकर प्रसाद की कविता की परिभाषा ‘कविता आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है’ का भी अर्थ खुलता है ।

‘प्रेमचंद’ निबंध में मानो गद्य की खूबसूरती संबंधी इसी मान्यता का उदाहरण देते हुए वह ‘कर्मभूमि’ से एक अंश उद्धृत करते हैं, ‘अंधेरा हो गया था । आतंक ने सारे गाँव को पिशाच की भाँति छाप दिया था । लोग शोक से मौन, और आतंक के भार से दबे, मरनेवालों की लाशें उठा रहे थे । किसी के मुँह से रोने की आवाज न निकलती थी । जख्म ताजा था, इसलिए टीस न थी।’ इसके बाद टिप्पणी करते हैं, ‘प्रेमचंद की चित्रण शक्ति यहाँ अपनी चरम सीमा को पहुँची हुई है । थोड़े से शब्द, जैसे विष में बुझे हुए, हृदय में घाव कर देते हैं । शब्दों में चित्राँकन की अद्भुत क्षमता है और जो चित्र आँका जाता है, वह अपने भाव गाम्‍भीर्य में अपूर्व है ।’ संक्षेप में यह कि विचार को भी साहित्य की दुनिया में कलात्मक रूप से आना होगा ।

इस लेख में अधिकांश उद्धरण उनकी पुस्तक ‘परम्‍परा का मूल्याँकन’ से दिये गये हैं ।

नि‍राला जयंती पर कवि‍तायें

हिंदी साहि‍त्य के प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला की जयंती वसंत पंचमी को मनायी जाती है। इस अवसर पर उन पर लि‍खी लेखक/कवि‍ शमशेर, राजेंद्र कुमार, भवानीप्रसाद मि‍श्र, नागार्जुन, शेखर जोशी और रामवि‍लास शर्मा की कवि‍ताएं-

निराला के प्रति : शमशेर

भूलकर जब राह- जब-जब राह भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम को आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वा स बन मेरे लिए-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि ! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते ‘शक्ति औ’ कवि के मिलन का हास मंगलमय,
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कठस्वर में तुम्हारे कवि,
एक ऋतुओं के विहँसते सूर्य !
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह !
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
सधना स्वर से
शांत-शीतलतम।
हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि:
जानता क्या मैं-
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(और विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !

दृष्टि-दान : राजेंद्र कुमार

जहां-जहां हम देख सके
आपनी आँखें
तुमको,
देखा, तुम हो
दिखलाते वहाँ-वहाँ, दुख की
दिपती आँखें,
ऐंठीले सुख की –
जिन्हें देख-छिपती आँखें;
यह दृष्टि तुम्हारी ही है दुख को मिली
दिख गई खुद की ताकत
उसे, अनेक मोर्चों पर-
हार-हार
जिन पर हम सबको
बार-बार डटना ही है
छंटना ही है, वह कोहरा-घना-
दृष्टि को छेंक रहा है जो
यों दृष्टि तुम्हारी मिली
हमारी मिली
वह दृष्टि तुम्हारी
मिली
दिख सकी हमें जुही की कली
‘विजन बन वल्लारी पर … सुहाग-भरी
स्नेह-स्पप्न-मग्न… अमल-
कोमल तनु तरुणी…’
नहीं तो रह जाती वह
किसी नायिका के जूडे़ में खुँसी,
किसी नायक के गले-पड़ी
माला में गुँथी…
कहाँ वह होती यों सप्राण
कि होती उसकी खुद भी
कोई अपनी प्रेम-कथा उन्मुक्त!
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
दिख सकी हमें- तोड़ती पत्थर
वह- ‘जो मार खा रोई नहीं’
रह जाती जो अनदिखी
अन्यथा
इलाहाबाद के पथ पर
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
राम पा गये जिं‍दगी में आने की राह
नहीं तो
भटक रहे होते पुराण के पन्नों पर प्रेतात्म…,
आ रमे हमारे बीच
ठीक हम जैसों
की फि‍क्रों में हुए शरीक
‘अन्याय जिधर हैं, उधर शक्ति’-
यह प्रश्न
विकटता में अपनी
पहले से भी कुछ और विकट है आज,
वह आवाज़-
‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ कहां
गुम हुई,
खोजते हमें निकलना है,
नहीं हम दृष्टि-हीन
फिर हमें प्रमाण पात्रता का देना होगा
फिर शक्ति करेगी हमें
और, हम ही होंगे-
हाँ,  हम ही-पुरुषोत्तम नवीन
(‘आदर्श’, कलकत्ता, 1965 में प्रकाशि‍त)

लफ्फा़ज़ मैं बनाम निराला : भवानी प्रसाद मिश्र

लाख शब्दों के बराबर है
एक तस्वीर !
मेरे मन में है एक ऐसी झांकी
जो मेरे शब्दों ने कभी नहीं आँकी
शायद इसीलिए
कि, हो नही पाता मेरे किए
लाख शब्दों का कुछ-
न उपन्यास
न महाकाव्य !
तो क्या कूँची उठा लूँ
रंग दूँ रंगों में निराला को ?
आदमियों में उस सबसे आला को?
किन्तु हाय,
उसे मैंने सिवा तस्वीरों के
देखा भी तो नहीं है ?
कैसे खीचूँ, कैसे बनाऊँ उसे
मेरे पास मौलिक कोई
रेखा भी तो नहीं है ?
उधार रेखाएँ कैसे लूँ
इसके-उसके मन की !
मेरे मन पर तो छाप
उसकी शब्दों वाली है
जो अतीव शक्तिशाली है-
‘राम की शक्ति पूजा’
‘सरोज-स्मृति’
यहाँ तक कि ‘जूही की कली’
अपने भीतर की हर गली
इन्हीं से देखी है प्रकाशित मैंने,
और जहाँ रवि न पहुँचे
उसे वहाँ पहुँचने वाला कवि माना है,
फिर भी कह सकता हूँ क्या
कि मैंने निराला को जाना है ?
सच कहो तो बिना जाने ही
किसी वजह से अभिभूत होकर
मैंने उसे
इतना बड़ा मान लिया है-
कि अपनी अक्ल की धरती पर
उस आसमान का
चंदोबा तान लिया है
और अब तारे गिन रहा हूँ
उस व्यक्ति से मिलने की प्रतीक्षा में
न लिखूंगा हरफ, न बनाऊंगा तस्वी्र !
क्यों कि‍ हरफ असम्भव है,  तस्वीर उधार
और मैं हूँ आदत से लाचार-
श्रम नहीं करूँगा
यहाँ तक
कि निराला को ठीक-ठीक जानने में
डरूँगा, बगलें झाँकूँगा,
कान में कहता हूँ तुमसे
मुझ से अब मत कहना
मैं क्या खाकर
उसकी तस्वीर आँकूँगा !

निराला के नाम पर : नागार्जुन

बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न  तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।
क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे श्रृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !
राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !
रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ,  मुख से न फूटा वचन ?
क्षेपकों की बाढ़ आयी, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, वेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

संगम स्मृति : शेखर जोशी

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती।
इन्दीवर की कथा रही:
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।
ओ महाप्राण !
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती !
किन्तु न रीती !

कवि : रामविलास शर्मा

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अब कहां यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाटवाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
घूसर संध्या में कवि उदास है बीतराग !
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण,- ज्योति का सहस्नार।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिये लेख,
गाते हैं वन के विहग ज्योति का गीत एक।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।
इन वन्य जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छंट गया तीक्ष्‍ण बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि घूसर प्रकाश।
उस वज्र हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिये विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।
कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक  कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।