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हम इच्छाधारी

हम सब इच्छाधारी हैं। इस धरती में कदम रखते ही हमारी इच्छाएं भी जन्म ले लेती हैं। और फिर जिदंगीभर हम उन्हें पूरा करने में ही लगे रहते हैं। एक पूरी होती है तो रक्तबीज की तरह कई जन्म ले लेती हैं। इच्छाएं ब्रह्म हैं। इनका न आदि है और न अंत।
राजनीति के अखाडे़ को ही ले लें। कार्यकर्ता की इच्छा रहती है कि वह स्थानीय स्तर का पदाधिकारी बन जाए। बन जाता है तो प्रदेश या देश स्तर की इच्छा जन्म ले लेती है। यह भी पूरा हो जाती है तो जन प्रतिनिधि बनने की इच्छा पनपने लगती है। फिर केंद्र में मंत्री पद दिखाई देने लगता है। इसमें कामयाबी मिल जाती है तो बड़ा बंगला, फार्म हाउस, बड़ी गाड़ियां, स्विस बैंक में खाता, बच्चों की विदेश में पढ़ाई जैसी नाना प्रकार की इच्छाएं जन्म ले लेती हैं। इनके लिए वह घोटाले करता है। विकास कार्यों के लिए जो निधि मिलती है, उसमें कमीशन खाता है। इसमें उसका कोई कसूर नहीं है। सब इच्छाएं करवाती हैं। इसके बावजूद इच्छाएं पूरी नहीं होतीं। वह अगली बार, उससे अगली बार यानी अंतत काल तक मंत्री बने रहना चाहता है। प्रधानमंत्री बनने के कोई चांस न हों तो भी कब्र में पैर में लटकाए भी इसकी इच्छा रखता है।
पूंजीपति की इच्छाएं भी कम नहीं होतीं। वह जितना ज्यादा मुनाफा कमाता है, उतनी ही उसकी इच्छाएं बढ़ती जाती हैं। दुनिया भर की सुख-सुविधाएं जुटाकर भी उसकी इच्छाएं कम नहीं होतीं। इसलिए वह कर्मचारियों का शोषण करता है। कम से कम वेतन पर अधिक से अधिक काम करना चाहता है। भ्रष्ट नेताओं को और भ्रष्ट करता है। मैंने आज तक किसी पूंजीपति को यह कहते नहीं सुना कि मैंने बहुत कमा लिया। अब मेरी इच्छाएं पूरी हो गई हैं, भले ही दुनिया का नंबरवन पूंजीपति ही क्यों न हो।
साधु-संत जिन्हें इच्छा विजयी माना जाता था, आज वह सबसे आगे हैं। आश्रमों और मठों को लेकर तो विवाद होते ही रहते थे, अब लड़की भगाने और हत्या करने में भी पीछे नहीं हैं। धन और नारी की इच्छा में वह दलाली करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। एक बाबा की इच्छा तो इतनी बढ़ गई है कि उसने राजनीतिक पार्टी बनाने की ही घोषणा कर दी है।
क्रिकेटर खेल के ही इतना कमाता हैं, फिर भी क्या उनकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। फैशन शो में कैटवॉक करने से लेकर रियल्टी शो में डांस तक कर रहे हैं। विज्ञापनों से अनाप-शनाप कमा रहे हैं। आईपीएल के लिए भेड़-बकरियों की तरह उनकी बोली लगाई जा रही है। वे लाखों-करोड़ों में बिक रहे हैं। इसे देखकर आदिम युग का दृश्य साकार हो जाता है, जब गुलामों की खरीद-फरोख्त की जाती थी।
पौराणिक कथाओं के इच्छाधारी नाग के बारे में पढ़ा था। वह कोई भी रूप रख सकाता था। पहले मुझे इससे पर यकीन नहीं होता था, लेकिन अब विश्वास करने लगा हूं। नेता, क्रिकेटर, पूंजीपति, अफसर, मंत्री, बाबा आदि के रूप में इच्छाधारी है। उसने लोगों को धोखा देने के लिए केवल रूप बदला हुआ है।
शिवमूरत द्विवेदी उर्फ स्वामी भीमानंद उर्फ इच्छाधारी बाबा ने भी जो कुछ किया अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया। इसमें उसका क्या दोष है? एक मामूली से इनसान की इच्छाएं बढ़ती गईं और वह हर तरीके से पैसा कमाने लगा। क्या एक सिक्युरिटी गार्ड के यहां तक पहुंचने में इच्छाधारी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों का हाथ नहीं है?
मैं भी इच्छाधारी हूं। मेरी भी इच्छाएं अंतत हैं। एक पूरी करता हूं, तुरंत उससे बड़ी इच्छा जन्म ले लेती है। इसलिए मैं तो इच्छाधारी बाबा की शरण में जा रहा हूं।