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स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गोसाँई

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से था। उसके पिता माली का काम करते थे। माँ घरों में काम करती थी।

स्कूल में उच्च मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे पढ़ते थे तथा स्कूल की फीस भी बहुत ज्यादा थी। यह फीस उस नए बच्‍चे के परि‍वार के सामर्थ्य से बाहर थी। लिहाजा स्कूल संचालिका ने दाखिला देने से इन्‍कार कर दिया। लेकिन उनके बहुत आग्रह पर दयालुता दिखाते हुए स्कूल संचालिका ने बहुत मामूली फीस पर स्कूल में दाखिला दे दिया।

साथी अध्यापिकाओं ने उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के प्रति अपना विरोध जताया। उन सबका मानना था कि इतने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बच्चा यदि स्कूल में प्रवेश पाता है, तो स्कूल की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। आखिर एक घंटे सभी अध्यापिकाओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद उस बच्चे को मेरी कक्षा में भेज दि‍या गया।

नयी चमचमाती यूनिफार्म, स्कूल बैग, किताब-कॉपी जब बच्चे को स्कूल से मिली, तो उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठीं। आमतौर पर छोटे बच्चे शुरुआती दिनों में स्कूल आने पर रोते है, लेकिन वह बच्चा बहुत खुश था। नयी किताब, कॉपी, पेंसिल और इन सबसे बढ़कर स्कूल में खेलने के लिए रखे गए तरह-तरह के खिलौने- गुड्डे-गुड़िया, टेडीबेयर, ब्लॉक्स आदि को देखकर वह अपने को एक अलग दुनिया में पाता। उसके हावभाव उसकी इस प्रसन्नता को प्रकट करते। मेरी कक्षा में लकड़ी की गोल मेज थी। उसके चारों ओर लकड़ी की छोटी कुर्सियां लगाई गई थीं। सारे बच्चे इन्हीं कुर्सियों में बैठकर चित्रों में कलरिंग, विभिन्न फलों, सब्जियों के चित्रों की कटिंग, पेस्टिंग आदि कॉपियों में करते थे। वह बच्चा इन क्रियाकलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। मेरे हाथों में रंग-बिरंगे चित्रों की किताबें देखकर जोर से चिल्लाकर कहता, ‘‘मैम, अब हम कलरिंग करेंगे।’’

कुछ अध्यापिकाओं ने मुझे यह सुझाव भी दिया कि इस बच्चे को अन्य बच्चों से अलग बैठाया करो, क्योंकि इसकी भाषा, बोलचाल अन्य बच्चों की भाषा की तुलना में खड़ी बोली में है। उनका यह सुझाव मैंने सिरे से ख़ारिज कर दिया। वह बच्चा सभी बच्चों के साथ बैठता तथा सभी बच्चे मिलजुल कर खेलते।

उस बच्चे को स्कूल आते हुए कुछ ही दिन हुए थे। स्कूल की छुट्टी होने पर आया ने जब उसका बस्ता उठाया तो उसे वह बहुत भारी लगा। बस्ता खोलकर देखा तो उसके अंदर स्कूल के खिलौने रखे थे। उसने शोर मचा दि‍या कि‍ बच्चे ने खिलौने चोरी कर बस्ते में रख लिए हैं। स्कूल हेड ने बच्चे को डांटा। अन्य अध्यापिकाओं ने भी अपना मत रखा कि‍  निम्न वर्गीय बच्चों को स्कूल में रखोगे तो ऐसे ही होगा। दाखिला दिया ही क्यों? एक अध्यापिका बोल पड़ी, ‘‘देखा है- कभी कोई और बच्चा स्कूल की कोई चीज या खिलौना इस तरह बैग में छुपाकर घर ले गया हो? इसलिए पहले ही चेताया था कि‍ इस बच्चे को स्कूल में एडमिशन मत दो।”

बच्चे को स्कूल संचालिका के कमरे में ले जाया गया। स्कूल संचालिका ने बच्चे की माँ को फ़ोन कर स्कूल आने को कहा तथा बच्चे को अपने कमरे में बैठा दिया। मुझे यह सब अटपटा लग रहा था। मैंने स्कूल संचालिका से कहा कि‍ हमें बच्चे को स्कूल से नहीं निकालना चाहिए। एक बार उससे पूछना चाहिए। वह बच्चा मेरी ही कक्षा का था। इसलि‍ए मैं उसे अपने साथ कक्षा में ले आयी। बाकी बच्चे घर जा चुके थे। मैंने बच्चे को अपने पास बैठाया। वह सहमा हुआ था। मैंने बहुत प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आपने मैम से बि‍ना पूछे खिलौने क्यों लिए?” वह चुप रहा। दो-तीन बार पूछने पर उसने जवाब दिया, “मैम, मेरी छोटी बहन है। हमारे घर में एक भी खिलौना नहीं है। मैं उसे दिखाना चाहता था। मैं कल ये खिलौने वापस ले आता।’’ यह कहते हुए उसके आँखों में आंसू थे।

प्रकृति, धरती का आभार प्रकट करते उत्‍सव : रजनी गुसाईं

रजनी गुसाईं

भारतवर्ष को एक देश नहीं, बल्‍कि‍ महादेश कहकर सम्बोधित किया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा, जाति-धर्म की जितनी विविधताएं भारत में देखने को मिलती हैं, उतनी विश्‍व में किसी भी देश में ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेंगी। भारत की संस्कृति में विभिन्न धर्मों, जातियों, संस्कृतियों का समावेश है। यही कारण है कि भारत में पूरे वर्ष पर्व, त्योहारों का मेला लगा रहता हैं। भारत की गौरवशाली समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत में प्रकृति, कृषि, ऋतुओं, नदियों से जुड़े व्रत, त्योहार मनाने की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही हैं! भारत में लोक उत्सव और प्रकृति का चोली-दामन का साथ हैं। कई प्रमुख त्योहार प्रकृति, ऋतुओं तथा कृषि से सीधे जुड़े हुए हैं। खेती किसानी से जुड़े भारत में जो प्रमुख त्योहार हैं, वे लोहिड़ी, मकर सक्रांति, पोंगल, बैसाखी, बिहु हैं, जोकि भारत के विभिन्न प्रांतो में अपने-अपने रीतिरिवाजों के साथ हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। फसल बुवाई, कटाई के समय इन लोकोत्सव को मनाने का ध्येय एक ही हैं- प्रकृति, धरती का आभार प्रकट करना जिसकी गोद से अन्न उपजता है। जिससे धरती के सभी प्राणियों का पेट भरता है। इन अवसरों पर नदियों में स्नान करने तथा सूर्य को अर्ध्य देने की परम्परा भी है। नदी जिसके जल से खेतों का सींचा जाता है। सूर्य जिसके कारण पृथ्वी का ऋतु चक्र बदलता है। धूप, गर्मी, वर्षा सूर्य से ही प्राप्त होती है, जिसके कारण खेतों में फसलें लहलहाती हैं। भारतीय समाज में कृषि से जुड़े इन उत्सवों का विशेष महत्व हैं।

बात लोक से जुड़े उत्सवों, प्रकृति, जल की हो और भारत के आदिवासी समाज के उत्सवों का उल्लेख नहीं हो इसकी कल्पना भी असम्भव है। क्योंकि आज भी भारत में आदिवासी समाज का अस्तित्व विद्यमान है, जो प्रकृति के निकट रहकर अपनी लोक संस्कृति को सहेजे हुए है। यह समाज जंगल  को ही अपना घर मानता है। और जंगल ही इन का ईश्वर होता है। झारखण्ड के आदिवासी लोक उत्सव में प्रकृति से जुड़ा एक ऐसा ही त्योहार प्रमुखता से मनाया जाता हैं- ‘सरहुल’। सरहुल वसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है। जब पेड़-पौधों में नए अंकुर फूटने लगते हैं। साल के पेड़ की शाखों पर नए फूल खिलने लगते हैं। यह गाँव के देवता की पूजा है, जिन्हे इन जनजातियों का रक्षक माना जाता है। देवता की पूजा साल के फूलों से ही की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद ग्रामीणों में प्रसाद वितरित किया जाता हैं जिसे ‘हड़िया’ कहा जाता है, जोकि चावल का बना होता है। पूरा गाँव गायन और नृत्य के साथ सरहुल का त्योहार मनाता है। झारखण्ड के अन्य त्योहार जैसे करम, जावा, तुशु हैं। प्रकृति प्रेमी तथा जल जंगल जमीन को ही अपनी अमूल्य सम्पत्ति मानने वाली आदिवासी जनजाति के ये त्योहार कृषि, उर्वरता से ही जुड़े हैं।

आश्विन और कार्तिक माह को पर्वों का माह भी कहते हैं, क्योंकि इस दौरान कई बड़े पर्व आते हैं जो समूचे भारतवर्ष में प्रमुखता से मनाए जाते हैं। उमस भरी गर्मी, वर्षा ऋतु विदा लेती है। शरद ऋतु का आगमन होता है। जिसका आरम्भ शारदीय नवरात्र के साथ होता है! नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में उत्तर भारत में जहां जगह जगह हिन्दू पौराणिक कथा पर आधारित रामलीला का मंचन होता ह, जिसमे भगवान श्री राम के जीवन से जुडी़ घटनाओं का मंचन किया जाता है। वहीं बंगाल तथा असम में इसे दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है। जगह-जगह माँ दुर्गा का भव्य पंडाल बनाकर शक्ति की प्रतीक, महिसासुर नामक असुर का वध करने वाली देवी दुर्गा की आराधना की जाती है। लोग नए वस्त्र धारण कर पंडाल में देवी दुर्गा की आराधना के लिए पहुंचते हैं। पंडाल में मेले जैसा दृश्य होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है।

रामलीला का समापन रावण का पुतला जलाकर विजयदशमी के दिन जिसे दशहरा भी कहते हैं, होता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम ने इसी दिन लंका नरेश रावण नाम के असुर का वध किया था। शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे विजयादशमी कहते हैं। भारतीय लोक समाज में ये त्योहार बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माने जाते हैं।

भारत का सबसे बड़ा पर्व दीपावली भी कार्तिक माह में मनाया जाता है। इस त्योहार को घर की साफ़-सफाई, रंग-रोगन से भी जोड़ा जाता है। क्योंकि देवी लक्ष्मी की पूजा दीपावली पर की जाती है। देवी लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि दीपावली की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती है। वह साफ़ सुथरे घर में ही अपना आशीर्वाद बरसाती हैं तथा गंदगी से दूर रहती हैं! यही कारण हैं कि दीपावली पर लोग घर की साफ-सफाई प्रमुखता से करते हैं। वैसा इसका वैज्ञानिक या तकनीकी कारण यह भी है कि‍ दीपावली वर्षा ऋतु के बाद आती है, जब शरद ऋतु का आगमन होता है। वर्षा के कारण घर में आई सीलन, काई, सीलन की महक दूर भगाने कि लिए भी यह समय घर की अंदरुनी सफाई के लिए उपयुक्‍त होता है। दीपावली मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। हजारों वर्ष पहले अयोध्या के राजा राम चौदह वर्ष का वनवास काट कर अपनी नगरी अयोध्या लौटे थे। अपने राजा राम के आने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को दीप प्रज्‍जलि‍त कर सजाया था कार्तिक अमावस्या की। अँधेरी रात में अयोध्या नगरी दीपों के प्रकाश से झिलमिला उठी थी। आज भी लोग दीपावली के दिन अपने घरों को फूलों की साज सज्जा के साथ साथ बिजली के रंगीन बल्बों, दीयों से सजाते हैं। इसलिए दीपावली को प्रकाश का उत्सव भी कहते हैं।

सूर्य की उपासना से ही जुड़ा बिहार का मुख्य पर्व छठ पूजा कार्तिक माह में ही मनाया जाता है। चार दिन तक चलने वाला यह उत्सव कठोर व्रत नियम के साथ आरम्भ होता है, जोकि व्रत के चौथे दिन नदी के घाट पर उगते सूर्य को अर्ध्य देकर समाप्त होता है। इन चार दिनों तक घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। घर की महिलायें सूर्य उपासना, छठ मैया से जुड़े लोकगीत गाती हैं। इस पर्व को मनाने का भी मूल ध्येय सूर्य भगवान का आभार प्रकट करना है, जिसके कारण हमें अन्न जल प्राप्त होता है।

भारत में उत्सव मनाने की इस बहुरंगी छटा में सभी संस्कृतियों का सम्मिश्रण है। ये उत्सव जीवन में आनंद और उल्लास लाते हैं। साथ ही देश को एक धागे में भी पिरोते हैं और भारत भूमि के सदियों पुराने संदेश ‘वसुदेव कुटुम्बकमद्ध’ यानी सारा विश्‍व एक परिवार है, की धारणा को और मजबूत करते है।

एक बादल एक बूँद एक नाव  : रजनी गुसाईं

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गड-गड-गरड़… आकाश में बादल गरज रहे थे। चमकती धूप गायब हो गई थी। काले बादलों ने सूरज को ढक दिया था। दोपहर में ही अँधेरा छा गया। “मम्मी, लगता है, बारिश होने वाली है। बड़ा मजा आएगा।” नन्हीं हिमी ने अपना होमवर्क करते हुए कहा।

“पता नहीं ये बादल कब बरसेंगे! इतनी देर से तो बस गरज ही रहे हैं! यह उमस भरी गर्मी और बिजली भी चली गई हैं।” मम्मी हाथ का पंखा हिलाते हुए बोली और किचन में चली गई।

हिमी पहली तीन में पढ़ती हैं और अपने मम्‍मी–पापा के साथ बहुमंजिला इमारत की पंद्रहवी मंजिल के फ्लैट में रहती है। हिमी ने अपने कमरे की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका कमरे में ठंडक भर गया। हिमी खिड़की के पास खड़ी हो गई। उसने बाहर झांककर देखा। आकाश में बादल-ही-बादल दि‍खाई दे रहे थे। वे हवा के झोंको से इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। तभी हिमी की खिड़की के पास से एक बड़ा-सा काला बादल गुजरा। हिमी उसे आवाज लगाते हुए बोली, “सुनो बादल राजा, बस गरज ही रहे हो! बरसोगे कब?”

हिमी की आवाज सुनकर काला बादल रुक गया। वह बहुत उदास लग रहा था। वह बोला “मेरा मन बरसने को नहीं करता।” बादल के अंदर बैठी नन्हीं-नन्हीं बूँदें भी बादल की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाती हुई बोलीं “हमें भी रिमझिम-रिमझिम बारिश बनकर नहीं बरसना।”

हिमी को उनकी बातें सुनकर आश्‍चर्य हुआ। अपनी आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए वह बोली, “लेकिन तुम लोग धरती पर बरसना क्यों नहीं चाहते?”

काला बादल बोला “पहले जब में बरसता था तो बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर आ जाते थे। गलियों में, घरों की छतों में बारिश में भीगते थे। धमाचौकड़ी मचाते थे।”

नन्ही बूँदें बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, “हम जब बरसती थीं, तो हमारे पानी में बच्चे पैरों से छप-छपकर खेलते थे! रुके हुए पानी में कागज की रंग-बिरंगी नाव बनाकर तैराते थे। बच्चों की यह चुलबुली शरारतें देखकर बड़ा मजा आता था। लेकिन अब वो बात नहीं हैं।” कहते-कहते नन्हीं बूँदें उदास हो गईं।

काला बादल बोला, “अब बच्चे बारिश में घर से बाहर नहीं निकलते। बच्चों की शरारतों के बिना हमें भी बरसना अच्छा नहीं लगता।”

काले बादल और बूंदों की बात सुनकर हिमी सोच में पड़ गई। फिर धीरे से बोली, “ओ काले बादल सुन। हम बच्चे बारिश में भीगना चाहते हैं। खेलना चाहते हैं, लेकिन मम्मी-पापा हमें खेलने नहीं देते। वे कहते हैं, ‘बारिश में भीगने से जुखाम हो जाएगा। बीमार पड़ जाओगे।”

हिमी की बात सुनकर अब काला बादल सोच में पड़ गया।

“हिमी, हिमी उठो। होमवर्क करते-करते ही सो गई।” हिमी को नींद से जगाते हुए मम्मी बोली।

मम्मी की आवाज सुनकर हिमी एकदम से उठकर बैठ गई। आँखों को मींचते हुए बोली, “मम्मी, काला बादल कहाँ गया?”

“कैसा काला बादल? हिमी लगता हैं, तुमने कोई सपना देखा होगा।” कहते हुए मम्मी कमरे से बाहर चली गई!

हिमी ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश हो रही थी। हिमी ने मम्मी को आवाज लगाई, “मम्मी मुझे कागज की नाव तैरानी है।”

मम्मी कमरे में आई! हँसते हुए बोली, “यहाँ कागज की नाव कहाँ तैराओगी?”

“मम्मी नीचे सोसाइटी के कंपाउंड में चलते हैं। वहां पानी भर गया है।” हिमी जिद करने लगी। आखिर मम्मी को हिमी की जिद के आगे झुकना पड़ा, “ठीक हैं चलते हैं, लेकिन ज्यादा देर बारिश में नहीं भीगना।” मम्मी ने हिमी से कहा। यह सुनकर ख़ुशी से उछलते हुए हिमी ने टेबल के नीचे से पुराना अखबार निकाला और मम्मी के साथ बैठकर जल्दी-जल्दी नाव बनाने लगी। नाव बनकर तैयार थी। इसके बाद दोनों सोसाइटी के कंपाउंड में आ गए! हिमी पानी में छपाक-छपाक करते हुए बारिश में भीगने लगी। कागज की नाव उसने बारिश के बहते पानी में छोड़ दी। नाव पानी में डगमग-डगमग करते हुए आगे बढ़ने लगी। यह देखकर हिमी ख़ुशी से उछलते हुए ताली बजाने लगी। हिमी को बारिश के पानी में खेलते देख सोसाइटी में रहने वाले दूसरे बच्चे भी कागज की नाव लेकर कंपाउंड में आ गए। अब बारिश के पानी में कागज की बहुत सारी नाव तैरने लगीं। नन्हीं-नन्हीं बूँदें रिमझिम-रिमझिम बरस रही थीं। सारे बच्चे पानी में छपाक-छपाक करते और ख़ुशी से चिल्लाते। हिमी आसमान की तरफ देखकर बोली, “ओ बादल राजा, ओ नन्हीं बूंदों, अब तो खुश हो।”

उसकी सहेली दि‍व्या ने पूछा, “हि‍मी कि‍ससे बात कर रही हो।”

“कि‍सी से नहीं।” कहकर हि‍मी मुस्‍कराई और पानी में छप-छप करने लगी।