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प्रेमचंद के बहाने समय-समाज को समझने की कोशि‍श  

रा.इ.का. टोटनौला में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया।

पि‍थौरागढ़ : प्रेमचंद जयंती तथा उसकी पूर्व संध्या पार उनको याद करते हुए जगह-जगह विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य प्रेमचंद के बहाने अपने समय और समाज को जानना-समझना और पढ़ने की संस्कृति को आगे बढ़ाना रहा। इस बार पिथौरागढ़ में आरम्भ स्टडी सर्किल, रचनात्मक शिक्षक मंडल और लोकतान्त्रिक साहित्य-संस्कृति मंच द्वारा प्रेमचंद जयंती को एक अलग अंदाज में मनाया गया। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर एक ‘कथा चौपाल’ का आयोजन किया गया। इसके न किसी को औपचारिक आमंत्रण पत्र दिए गए, न किसी को अध्यक्षता के लिए कहा गया और न ही कोई मुख्य वक्ता तय किया गया। कथा पाठ हुआ। उसके बाद उपस्थित लोगों ने बिना किसी औपचारिकता के कहानी को लेकर अपनी-अपनी बात रखी। गिर्दा के जनगीतों से कार्यक्रम की शुरुआत और समापन हुए। लोग उसके बात भी चर्चा-परिचर्चा करते हुए देखे गए।

कार्यक्रम का एक विहंगम शब्द-चित्र ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चन्द्र पाण्डेय ने अपने फेसबुक वाल पर कुछ यूँ खींचा है- बरसात का दिन, राम लीला फिल्ड,और मुंशी प्रेमचंद जयंती का पूर्व दिन शाम के साढ़े चार बजे के आसपास बरसात का रुक जाना और आरम्भ स्टडी सर्कल के कुछ युवा साथी अपने पोस्टरों और किताबों से भरे झोलों के साथ बाहर निकलते हैं। साथ में विनोद उप्रेती, राजीव जोशी, कमलेश उप्रेती, चिंतामणि जोशी, किशोर पाटनी, दिनेश भट्ट आदि का ओपन थियेटर की ओर आना पिथौरागढ़ के माहौल में आ रहे परिवर्तन की ओर इंगित कर रहा था। बस कुछ ही पलों में पोस्टर लहराने लगे और एक मेज पर सज गई थीं कुछ स्थूल और कुछ कृसकाय किताबें। अब तक कुछ भी तो नहीं था, दो-चार लोगों के सि‍वाय।लग रहा था कि‍ बस इतने ही लोग क्या बोलेंगे। क्या सुनेंगे। क्या विचार-विमर्श होगा। कुछ ही देर में महेश पुनेठा आदि का आना और सीढ़ियों पर बैठ जाना । एक-एक कर संख्या का बढ़ते जाना। और बिना औपचारिकता के आरम्भ के साथियों के संचालन में गिर्दा के जनगीत के साथ प्रेमचंद की दो बैलों की कथा का अभिनयात्मक वाचन । थोड़ी ही देर में शिक्षकों और छात्रों के समूह से सामने की सीढ़ियां भर गईं। थोड़ी दूर पर बैठे कुछ बच्चे पहले कुछ मजाकिया मूड में थे, कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ खुद को जोड़ने से रोक नहीं पाए। चुपचाप आए और पीछे बैठ गए और कहानी में लीन हो गए। तहसील परिसर की दीवार पर कुछ लोग जो ऐसे ही खड़े थे, दीवार के सहारे खड़े होकर हीरा और मोती की बातें ऐसे सुन रहे थे मानो अपने गांव की सैर में चले गए हों। बीच-बीच में बज रहीं मोबाइल की घण्टियों से ऐसा लग रहा था मानो थियेटर में पार्श्व संगीत चल रहा हो। करीब पौन घण्टे चली कहानी अब पूर्णता की ओर थी । आखिर कहानी पूरी हुई । युवा संचालक का बातचीत को आगे बढ़ाना । खुले मंच को अपने विचारों को साझा करने को कहना । किसी कहानी को कौन किस तरह किन कोणों से पढ़ता और समझता है, कितना अपने से और समाज से जोड़ पाता है, तत्कालीन समाज और समय और आज के परिपेक्ष्‍य में कहानी उपादेयता, पात्रों का गठन और उनकी उपयोगिता पर खुल कर चर्चा परिचर्चा हुई । खास बात यह थी की बोलने वालों में सबसे मुखर युवा और बच्चे थे । सभी ने यह माना कि यह खुली चर्चा शहर में पढ़ने और पढ़ाने की संस्कृति को विकसित करने के लिए एक सार्थक पहल है। यह लगातार होनी चाहिए। रचनात्मक शिक्षक मंडल का योगदान भी सराहनीय रहा। युवाओं को अगर सही मर्गदर्शन मिले तो शहर की फिजा बदल सकती है। युवाओं का यह जोश भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। अंत में फिर जनगीत के साथ एक खूबसूरत खुले मंच का विसर्जन। और उसके बाद किशोर पाटनी, राजीव जोशी, चिंतामणि जोशी की औपचारिक बातें। कुल मिलाकर एक खूबसूरत शाम ।अब बारिश शुरू हो चुकी थी ।

कार्यक्रम में पोस्‍टर रहे आकर्षण का केंद्र।

इस कार्यक्रम के बारे में डीडीहाट से शामिल होने आए शिक्षक साथी कमलेश उप्रेती ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि कुछ बेहतर करने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। लगन हो और नीयत साफ तो खुले आसमान के नीचे भी शानदार आयोजन हो सकता है। इसका उदाहरण है पिथौरागढ़ में कालेज में पढ़ने वाले युवाओं का एक रचनात्मक समूह ‘आरंभ स्टडी सर्कल’। कल महान भारतीय साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर कथा चौपाल का अनौपचारिक आयोजन इन जोशीले युवाओं द्वारा किया गया। साथ में एक बुक स्टॉल भी, जहां पर प्रेमचंद साहित्य के साथ वैज्ञानिक विषयों पर किताबें खरीदने के लिए उपलब्ध, कितना सुखद है यह सब हमारे पिथौरागढ़ में हो रहा है।
कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का वाचन नाटकीय संवाद शैली में किया गया तो आभास हुआ कि इस तरह सामूहिक वाचन से कथ्य के कितने सारे आयाम खुलते हैं!  दोस्तो, इस दौर में जब युवा राह चलते भी अपने स्मार्टफोन में घुसा रहता है, आपके किताब उठाकर सरेआम पचास लोगों को पढ़कर सुनाने के जज्बे को सलाम बनता है।

प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल रामनगर द्वारा एमपी इंटर कालेज में कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम के बारे में कार्यक्रम के संयोजक नवेंदु मठपाल अपनी फेसबुक पोस्ट पर बताते हैं कि 38 विद्यालयों के 700 से अधिक बच्चे, मौका था प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा एमपी इंटर कालेज में आयोजित कार्यक्रम का। ये बच्चे विगत एक महीने में 10 हजार बच्चों से विभिन्न तरीकों से कि‍ए गए सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए। बोर्ड सचिव श्री वीपी सिमल्टी जी ने बतौर मुख्य अतिथि अपने स्कूली दिनों को प्रेमचन्द की कहानियों के बहाने याद किया, तो बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद कुमाउंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल जी ने भी वक्तव्य रखा। ललिता बिनवाल स्मारक समिति के अध्यक्ष बिनवाल जी, वरिष्ठ चित्रकार सुरेश लाल जी, रंगकर्मी रामपाल जी, कवि असगर जी, संजय रिखडी जी के नेतृत्व में भोर संस्था की नौजवान टीम के साथियों, अनेक प्रधानाचार्यों एसपी मिश्रा जी, राय जी, दिग्विजय सिंह जी, पुष्पा बुधानि जी, नलनी श्रीवास्तव जी, नीना सन्धु जी, जीतपाल जी के नेतृत्व में रोवर्स, रेंजर्स की टीम समेत 50 से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं का रहा सक्रिय सहयोग। देघाट के शिक्षक साथी पाठक जी का विशेष धन्यवाद। बच्चों की एक टीम लेकर पहुंच गए।

अनौपचारि‍क कार्यक्रम में लोगों ने दि‍खाई खासी रुचि‍।

कार्यक्रम की शुरुआत भोर की टीम ने 1857 विद्रोह के प्रयाण गीत ‘हि‍म हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ एवं रामप्रसाद बिस्मिल के गीत ‘सरफरोशी की तमन्‍ना’ से हुई। प्रत्येक प्रतिभागी बच्चे को दिया गया- प्रेमचन्द साहित्य। आयोजक मण्डल द्वारा निकाली गई पुस्तिका ‘हमारी विरासत’ का भी विमोचन हुआ। कौन कहता है कि‍ बच्चे पढ़ना नही चाहते, शिक्षकों को तो सिर्फ वेतन और छुट्टी ही चाहिए। रचनात्मक मण्डल की टीम ने फिर गइस धारणा को गलत साबित किया।

गतवर्ष की भांति ही डॉ. डी.डी. पंत स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला बेरीनाग में प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर भव्य आयोजन किया गया। साथी कमलेश जोशी अपनी फेसबुक वॉल में बताते हैं कि  इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने प्रेमचंद की कहानियों पर पोस्टर बनाए, कहानियों का वाचन किया और नाटक किए। फ़िल्म ‘ईदगाह’ का प्रदर्शन भी किया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यहाँ एक बालिका द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का कुमाउंनी भाषा में किया अनुवाद काफी चर्चित रहा था।

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में भी कार्यक्रम आयोजि‍त हुए। इसके बारे में युवा लेखक बिपिन जोशी अपनी  फेसबुक वॉल पर कुछ इस तरह बताते हैं-  मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में कहानी वाचन एवम काव्य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद जी की मशहूर कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन किया गया । कहानी पर सारगर्भित चर्चा की गई । उक्त कार्यक्रम में शिक्षक साथियों सहित उत्तराखण्ड के लोक साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट, मोहन चन्द्र जोशी, चन्द्र शेखर बडशीला, ओम प्रकाश फुलारा, वरिष्ठ पत्रकार आनंद बिष्ट तथा जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शिक्षक नीरज पन्त ने मुंशी जी के साहित्य पर उनके जीवन पर प्रकाश डाला। मुंशी जी के बहाने दलित साहित्य और नारी साहित्य पर भी बातचीत की गई । कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन शिक्षक उमेश जोशी ने कि‍या।
कथा चर्चा के बाद कुमाउंनी लोक साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर मोहन जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार गोपाल दत्‍त भट्ट, ओमप्रकाश फुलारा ने अपनी रचनाओं का पाठ कि‍या।
साहित्य गोष्‍ठी को एक महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यक्रम बताते हुए डीईओ आकाश सारस्‍वत ने प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं की प्रसंगिकता पर विचार रखे।

कुमाउं  मंडल  के विभिन्न स्कूलों में भी प्रेमचंद जयंती अपने-अपने तरीके से मनाई गई।  रा.इ.का. देवलथल में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। दीवार पत्रिका ‘मनोभाव’ के प्रेमचंद विशेषांक का प्रधानाचार्य अनुज कुमार श्रीवास्तव ने लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि‍ प्रेमचंद का साहित्य हमें साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णताओं से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बच्चों द्वारा सम्पादित दीवार पत्रिका के इस विशेष अंक की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास अधिकाधिक होने चाहिए क्योंकि इससे बच्चों की रचनाशीलता और कल्पनाशीलता को नए आयाम मिलते हैं। इससे पूर्व कार्यक्रम का संचालन करते हुए दीवार पत्रिका के संपादक राहुल चन्द्र बड़ ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। शिक्षक रमेश चन्द्र भट्ट ने एक दि‍न पूर्व ‘प्रतिभा दिवस’ पर जूनियर कक्षाओं द्वारा तैयार की गई  दीवार पत्रिकाओं का बच्चों द्वारा समूहवार प्रस्तुतीकरण भी  किया गया।

इससे पूर्व प्रेमचंद जयंती पर कक्षावार निबंधों का पाठ किया गया। कक्षा-12 में उनके निबंध ‘प्राचीन और नवीन’ तथा कक्षा-10 में ‘आजादी की लडाई’ का वाचन किया गया। इन पर बच्चों ने लिखित रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी। कक्षा-9 के बच्चों के साथ प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों की चर्चा करते हुए उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। बच्चों को बताया गया कि कहानियां हमें केवल आनंद ही नहीं प्रदान करती हैं, बल्कि वे जिस कालखंड में रची गयी होती हैं, उस समय और समाज के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।जैसे- प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ते हुए वे आजादी की लडाई के बारे में तथा उस समय के समाज के बारे में बहुत कुछ जान और समझ सकते हैं। इससे हमारी भाषा भी मजबूत होती है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ साहित्य की पुस्तकें भी पढ़ी जानी चाहिए। न केवल खुद, बल्कि दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए पुस्तकालय खोलने के अभियान से जुड़ने की बच्चों से अपील की गई।  बच्चों ने लिखित रूप से संकल्प व्यक्त किया कि वे अपने-अपने गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित करने की कोशिश करेंगे। साथ ही वे प्रेमचंद की अगली जयंती तक उनकी अधिक से अधिक रचनाएँ पढ़ेंगे।

रा.इ.का. टोटनौला में शिक्षक-साहित्यकार चिंतामणि जोशी के मार्गदर्शन में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया। उन्‍होंने अपनी फेसबुक वाल लि‍खा है कि‍ आज मास का अंत था और चौथे वादन के बाद दीवार पत्रिका समूह द्वारा ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद विशेषांक के लोकार्पण व प्रेमचंद जयंती मानाने की योजना भी थी। सुबह विद्यालय पहुंचे तो रात भर के बाद भी बरसात जारी थी। बच्चे पिछले लगभग 15 दिनों से अपने ढंग से प्रेमचंद को जानने-समझने में लगे थे। इस माह दीवार पत्रिका के भी दो अंक तैयार कर चुके थे। विद्यालय में बृहद कक्ष है नहीं। तीसरे वादन तक भी मौसम नहीं खुला तो कक्षा 11अ के बच्चों ने अपनी कक्षा का फर्नीचर बगल के कक्ष में शिफ्ट कर कक्षा में दरिया बिछा दीं और शिक्षकों के लिए कुर्सियां डालकर प्रधानाचार्य जी को सूचित कर दिया कि कार्यक्रम होगा और कक्षा कक्ष में ही होगा। वाह! जहाँ चाह वहां राह।

दीवार पत्रिका संपादक मंडल ने मध्यांतर के बाद विद्यार्थियों को बिना बैग के छोटे से कक्ष में बिठा दिया। मुख्य संपादक कविता कापड़ी ने आवश्यक निर्देशों के बाद प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की कि नवांकुर का लोकार्पण, आलेख-कविताओं-कहानियों का वाचन, समीक्षा, प्रेमचंद के बहाने पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर संवाद होगा और गणित अध्यापिका नीता अन्ना को बच्चों की ओर से विदाई भी दी जाएगी। कविता 100 बच्चों के भीतर स्व-अनुशासन रोपित कर चुकी थी।

प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा जी के साथ श्रीमती अन्ना, पूनम, स्वाति व दीवार पत्रिका टीम ने नवांकुर का लोकार्पण किया। प्रधानाचार्य ने दीवार पत्रिका के महत्व को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मानते हुए बच्चों की खूब प्रशंसा की। छात्रा बबीता पाण्डेय ने स्वरचित कुमाउंनी कविता में प्रेमचंद की जीवनी और रचना संसार को व्यक्त किया। कमलेश पाण्डेय ने स्वरचित ‘प्रेमचंद जिन्होंने साहित्य में यथार्थ को निरूपित किया’ तथा आकांक्षा ने ‘प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री पक्ष’ आलेख का वाचन किया। तनुजा कापड़ी ने स्वरचित कहानी ‘शेरा की वापसी’ का पाठ कर सभी की संवेदना को झकझोरा। हिंदी शिक्षक राजेन्द्र बिष्ट, प्रकाश राम व विज्ञानं शिक्षक संतोष पन्त ने बच्चों को प्रेमचंद के विस्तृत रचना संसार की सैर कराई। मैंने प्रेमचंद के सम्बन्ध में बच्चों के प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के समाधान का प्रयास किया। उन्हें प्रेरित किया कि अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत विकसित कर कैसे वे बेहतर इन्सान बन सकते हैं।

बागेश्वर जनपद के गरुड़ विकासखंड में स्थित राजकीय जूनियर हाईस्कूल रौल्याना में नवाचारी शिक्षक साथी नीरज पन्त के निर्देशन में  प्रेमचंद की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ और ‘पूस की रात’ का वाचन किया एवं कहानी के तत्वों पर चर्चा की।  ग्राम प्रधान मदन गिरी की अध्यक्षता में विविध कार्यक्रम हुए।

क्रि‍एटि‍व उत्‍तराखंड द्वारा रुद्रपुर में संचालित सृजन पुस्‍तकालय में भी प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍या गया। इस अवसर पर प्रेमचंद की जीवन पर प्रकाश डाला गया और ईदगाह और दो बैलों की कहानी का वाचन कि‍या गया। इसके साथ कवि‍ता पाठ भी हुआ।

राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा पालगेट टि‍हरी गढ़वाल में आयोजि‍त कार्यक्रम में दो बैलों की कहानी और कई अन्‍य कहानि‍यों का वाचन और चर्चा हुई। साथ ही प्रेमचंद की भाषा, जीवन दर्शन और सामाजि‍क सरोकारों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का संचालन मोहन चौहान ने कि‍या।

राजकीय प्राथमि‍क वि‍द्यालय नवीन चौरसौ बागेश्‍वर में प्रेमचंद जयंती पर बच्चों ने दीवार पत्रिका ‘मन की बात’ तैयार की। मुख्य का आकर्षण प्रेमचंद की कहानियों का वाचन, जीवन परिचय, स्वरचित कहानी पाठ और चित्रांकन रहा। कार्यक्रम प्रधानाध्‍यापि‍का रीता जोशी की देखरेख में संपन्‍न हुआ।

प्रेमचंद जयंती पर आयोजि‍त कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में बच्‍चों की भागेदारी बहुत कुछ कहती है।

प्रस्‍तुति‍ : महेश चन्द्र पुनेठा

विज्ञान केन्द्रों में प्रेमचंद

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चों को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

नई दि‍ल्ली : 31 जुलाई 2016 को कथाकार मुंशी प्रेमचंद की 136वीं जयंती को पहली बार प्रथम विज्ञान केन्द्रों में मनाया गया। पांच केन्द्रों इलाहाबाद, झाल्डा, मसूदा, रालेगांव और सालिपुर में इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए गए। इनमें मुख्यतौर पर सत्यजीत रे द्वारा निर्मित फीचर फिल्म सद्गति व पूस की रात दिखाई गई। बच्चों ने कहानियों का पाठ किया, चित्र बनाए, उनकी प्रदर्शनी लगाई गई और नाटक भी किए। हालांकि यह ऐसा पहला मौका था, जब विज्ञान केन्द्रों को इस तरह का कोई आयोजन कि‍या गया, लेकिन सभी ने पूरे उत्‍साह से कार्यक्रमों में भाग लि‍या। वि‍शेष रूप से बच्‍चे बढ़चढ़कर आयोजन का हि‍स्‍सा बने। इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता यह है कि‍ इससे विज्ञान के साथ-साथ समाज के प्रति भी बच्चों के सकारात्मक नजरिये को विकसित किया जा सकता है। केंद्रों की कार्यक्रम की रि‍पोर्ट-

झाल्दा कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर पर किया गया, जिसमें 43 बच्चों की भागेदारी रही। सभी बच्चों को सत्यभान व केशब ने दो कहानियां पढ़कर सुनाईं। उन पर बात की और उन कहानियों पर चित्र बनाने के लिए कहा। सभी ने चित्र बनाए। बच्चों ने खुद जज करके कुछ बेहतरीन चित्रों को चुना, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए इनाम भी दिए गए। बाकी सभी बच्चों को सांत्वना पुरस्कार दिए गए। बिजली न होने के कारण फिल्म का शो नहीं हो पाया।

सालिपुर  कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर में किया गया, जिसमे 12 बच्चों ने हिस्सा लिया। कई बच्चे प्रेमचंद के बारे में नहीं जानते थे। उन्‍हें प्रेमचंद के जीवन और रचनाकर्म के बारे में बताया गया। सद्गति फिल्म दिखाई गई।

मसूदा मसूदा ब्लॉक में दो जगह बाल विज्ञान खोजशाला मसूदा व बाल विज्ञानं खोजशाला नगर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। दोनों जगह कुल 62 (56 बच्चे, 5 अभिभावक व 1 अध्यापक) लोगों ने भागेदारी की। प्रेमचंद की तीन कहानियां पढ़ी गईं। उन पर चर्चा की गई व बच्चों ने चित्र बनाए। इसके अलावा दोनों ही जगह सद्गति फिल्म के शो हुए।

इलाहाबादयहाँ दो जगहों पर कार्यक्रम हुए। पहला कार्यक्रम श्रीमती लखपती देवी जूनियर हाई स्कूल बिरौली बेरुवा कौशाम्बी में हुआ। यहां कुल 127 लोगों ने भागीदारी की। दूसरा कार्यक्रम साइंस सेंटर पर हुआ, जिसमे कुल 27 लोगों की भागीदारी रही। मुंशी जी की कथा और उपन्यास के गँवई परिवेश से जुड़े पात्रों को 22 बच्चों ने अपनी  चित्रकारी से प्रदर्शित किया। इतना ही नहीं बच्चों ने प्रेमचंद की कहानी- ईदगाह, पूस की रात, घास वाली और बलि‍दान आदि कहानियां सुनाईं। इसके अलावा लोगों को सत्यजीत राय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सद्गति एवं पूस की रात’ भी दिखाई गई।

रालेगांव कार्यक्रम का आयोजन ब्रह्मगुप्‍त साइंस सेंटर रालेगांव, बाल विज्ञान शोधिका डोंगरखरडा और बाल विज्ञान शोधिका हिंगनघाट तीन जगह किया गया। इनमें कुल 35 बच्चों की भागीदारी रही।  मुंशी प्रेमचंद के बारे में बच्चों को जानकारी दी गई जिस के आधार पर बच्चों ने चित्र बनाए।

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।

खेल : प्रेमचंद

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तीसरा पहर हो गया था। किसान अपने खेतों में पहुँच चुके थे। दरख्तों के साये झुक चले थे। ईख के हरे-भरे खेतों में जगह-जगह सारस आ बैठे थे। फिर भी धूप तेज थी और हवा गरम। बच्चे अभी तक लू के खौफ से घरों से न निकलने पाए थे कि यकायक एक झोंपड़े का दरवाजा खुला और एक चार-पाँच साल के लड़के ने दरवाजे से झाँका। झोंपड़े के सामने नीम के साये में एक बुढिय़ा बैठी अपनी कमजोर आँखों पर जोर डाल-डालकर एक टोकरी बुन रही थी। बच्चे को देखते ही उसने पुकारा, ”कहाँ जाते हो,  फुन्दन? जाकर अन्दर सोओ, धूप बहुत कड़ी है। अभी तो सब लड़के सो रहे हैं।”

फुन्दन ने ठनककर कहा, ”अम्मा तो खेत गोडऩे गईं। मुझे अकेले घर में डर लगता हैं।”

बुढिय़ा गाँव भर के बच्चों की दादी थी, जिसका काम बच्चों की आजादी में बाधक बनना था। गढिय़ा के किनारे अमियाँ गिरी हुई थीं, लेकिन कोई बच्चा उधर नहीं जा सकता, गढिय़ा में गिर पड़ेगा। बेरों का दरख्त लाल और पीले बेरों से लदा हुआ हैं। कोई लड़का उस पर चढ़ नहीं सकता, फिसल पड़ेगा। तालाब में कितना साफ पानी भरा हुआ है, मछलियाँ उसमें फुदक रही हैं, कमल खिले हुए हैं, पर कोई लड़का तालाब के किनारे नहीं जा सकता, डूब जाएगा। इसलिए बच्चे उसकी सूरत से विमुख अप्रसन्न थे। उसकी आँखें बचाकर सरक जाने की युक्तियाँ सोचा करते थे। मगर बुढिय़ा अपने अस्सी वर्ष के तजुर्बे से उनकी हर एक हरकत को ताड़ जाती थी और कोई-न-कोई उपाय कर ही लेती थी।

बुढिय़ा ने डाँटा, ”मैं तो बैठी हूँ। डर किस बात का है? जा सो रह, नहीं तो उठती हूँ।”

लड़के ने दरवाजे के बाहर जाकर कहा, ”अब तो निकलने की बेला हो गई।”

”अभी से निकल के कहाँ जाओगे? ”

”कहीं नहीं जाता हूँ, दादी।”

वह दस कदम और आगे बढ़ा। दादी ने टोकरी और सूजा रख दिया और उठना ही चाहती थी कि फुन्दन ने छलाँग मारी और फिर सौ गज के फासले पर था। बुढिय़ा ने अब सख्ती से काम न चलते देखकर नरमी से पुकारा, ”अभी कहीं मत जा बेटा।”

फुन्दन ने वहीं खड़े-खड़े कहा, ”जतीन को देखने जाते हैं।” और भागता हुआ गाँव के बाहर निकल गया।

जतीन एक खोमचेवाले का नाम था। इधर कुछ दिनों से उसने गाँव का चक्कर लगाना शुरू किया था। हर रोज शाम को जरूर आ जाता। गाँव में पैसों की जगह अनाज मिल जाता था और अनाज असल कीमत से कुछ ज्यादा होता था। किसानों का अंदाज हमेशा दानशीलता की ओर उन्मुख होता है। इसीलिए जतीन करीब के कस्बे से तीन-चार मील का फासला तय करके आता था। उसके खोंमचे में मीठे ओर नमकीन सेव, तिल या रामदाने के लडडू, कुछ बताशे और खुटिटयाँ, कुछ पट्टी होती थीं। उस पर एक मैला-सा फटा-पुराना कपड़ा होता था, मगर गाँव के बच्चों के लिए वह अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल था, जिसे खड़े होकर देखने के लिए सारे बच्चे बेताब रहते थे। इनकी बालोचित प्रसन्नता, तत्परता में यह एक दिलचस्पं इजाफा हो गया था । सब-के-सब तीसरे पहर ही से जतीन का इंतजार करने लगने लगते थे हालाँकि ऐसे खुशनसीब लड़के कम थे, जिन्हें इससे कोई लाभ पहुँचता हो। मगर खोंमचे के निकट जमा होकर थाल पर ढके कपड़े को आहिस्ता से उठते और उन नेमतों की रानियों की तरह अपनी-अपनी जगह संकोच से बैठे देखना स्वयं में बेहद खुशनुमा था। हालाँकि जतीन का आना हर एक घर में कुहराम मचा देता था। और आध घंटे सारे गाँव में हंगामा-सा उपस्थित हो जाता था, मगर बच्चे इसका स्वागत करने को अधीर रहते थे। यह जानते हुए भी कि जतीन का आगमन उनके लिए हँसी का नहीं, रोने का मैाका है। सब-के-सब बड़ी बेसब्री से उसके इंतजार में रहते थे, क्योंकि मिठाइयों के दर्शन से चाहे जबान संतुष्ट न हो, पर मन की तसल्ली जरूर होती थी। फुन्दन भी इन्हीं गरीब लड़कों में था। और लड़के मिठाइयाँ खाते थे, वह सिर्फ भूखी निगाहों से देखता था। रोने और रुठने, बालसुलभ मिन्नत और खुशामद, एक से भी उसकी उद्देश्य-पूर्ति न होती थी, गोया नाकामी ही उसकी तकदीर में लिखी हो। मगर इन नाकामियों के बावजूद उसका हौसला पस्त न होता था।

आज फुन्दन दोपहर को न सोया। जतीन ने आज कच्ची गरी और इमरतियाँ लाने का जिक्र किया था। यह खबर लड़कों की उस दुनिया में किसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना से कम न थी। सुबह से ही जतीन की तरफ मन लगा हुआ था। फिर ऐसी आँखों मे नींद कहाँ से आती?

फुन्दन ने बाग में पहुँचकर सोचा- क्या अभी सबेरा हैं? इस वक्त तो जतीन आ जाता था, मगर नहीं, अभी सबेर है। चून्नू, सोहन और कल्लू एक भी तो नहीं उठे। जतीन सड़क पर पहुँच गया होगा। इमरतियाँ जरूर लाएगा, लाल और चिकनी होंगी। एक बार न जान कब… ‘हाँ’, दशहरे के मेले में एक इमरती खाई थी। कितनी मजेदार थी! उस जायके को याद करके उसके मुँह में पानी भर आया। लालसा और भी तेज हो गई। वह बाग के आगे निकल गया। अब सड़क तक समतल मैदान था, लेकिन जतीन का कहीं पता न था।

कुछ देर तक फुन्दन गाँव के निकास पर खड़ा जतीन की राह देखता रहा। उसके दिल में एक गुदगुदी उठी- आज मैं सबसे पहले जतीन को पुकारूँगा। मैं जतीन के साथ-साथ गाँव में पहुंचूंगा। तब लोग कितना चकराएँगे। इस ख्याल ने उसकी बेसब्री में और इजाफा कर दिया। वह तालियाँ बजा-बजाकर दिल-ही-दिल में चहकता हुआ सड़क की ओर चला।

संयोग से उसी वक्त गेंदा आ गया। यह गाँव का पंचायती कुत्ता था, चौकीदार का चौकीदार, खिलौने का खिलौना। नित्य नियमानुसार तीसरे पहर का गश्त लगाने निकला था। इसी वक्त साँड और बैल खेतों में घुसते थे। यहाँ पहुँचा तो फुन्दन को देखकर रुक गया और दुम हिलाकर गोया पूछा- तुम आज यहाँ क्यों आए? फुन्दन ने उसके सिर पर थपकियाँ दीं, मगर गेंदा को ज्यादा बातचीत करने की फुरसत न थी। वह आगे बढ़ा तो फुन्दन भी उसके पीछे दौड़ा। अब उसके दिल में एक ताजा उमंग पैदा हा रही थी। वह अकेला न था। उसका दोस्त भी साथ था। वह अब कच्ची सड़क पर जतीन का स्वागत करना चाहता था। सड़क पर पहुँचकर उसने दूर तक निगाह दौड़ाई। जतीन का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। कई बार उसे भ्रम हुआ, वहाँ जतीन आ रहा है, मगर एक लम्हें में उसका भ्रम टूट गया। सड़क पर दर्शनीय दिलचस्प चीजों की कमी न थी। बैलगाडिय़ों की कतारें थीं। कभी-कभी एक्के और पैर-गाडिय़ाँ भी निकल जाती थीं। एक बार एक ऊँट भी नजर आया, जिसके पीछे वह कई सौ कदम तालियाँ बजाता गया, मगर इन दिलचस्पियों में वह लालसा किसी मीनार की तरह खड़ी थी।

सड़क के किनारे आमने-सामने दो दरख्त खड़े थे। उनमें आम के दरख्त भी थे। इस लालसा में उसे आमों पर निशाना मारने का एक दिलचस्प खेल हाथ आया, मगर आँखें जतीन के लिए ठीक रास्ते पर लगी थीं। यह बात क्या है, आज वह आ क्यों नहीं रहा है?

धीरे-धीरे साया लम्बा होता गया। धूप किसी थके हुए मुसाफिर की तरह पाँव फैलाकर सोती हुई मालूम हुई। अब तक जतीन के आने की उम्मीद रही। उम्मीद में वक्त चला जाता था। मायूसी में वह गोया घुटने तोड़कर बैठ गया। फुन्दन की आँखों से निराशा के आँसू बहने लगे। हिचकियाँ बँध गईं। जतीन कितना बेरहम है! रोज आप ही दौड़ा आता था। आज जब मैं दौड़ा आया तो घर बैठ रहा। कल आएगा तो गाँव में घुसने न दूँगा। उसकी बालोचित आरजुएँ अपने सारे उत्साह के साथ उसके दिल को मथने लगीं।

सहसा उसे जमीन पर एक टूटा हुआ झब्बा नजर आया। इस निराशा और असफलता के आलम में बचपन की नैसर्गिक निश्चिंतता ने दु:ख दूर करने का सामान पैदा कर दिया। कुछ पत्तियाँ चुनकर झब्बे में बिछाईं। उसमें कुछ बजरियाँ और कंकड़ चुनकर रखे। अपना कुरता उतारकर उसको ढाँका और उसे सिर पर रखकर गाँव की और चला। अब वह जतीन को ढूँढऩे वाला लड़का न था, खुद जतीन था। वही अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल सिर पर रखे उसी तरह अर्थहीन आवाज लगाता हुआ, रफ्तार भी वही, बात करने का ढंग भी वही। जतीन के आगे-आगे चलकर क्या उसे वह खुशी हो सकती थी, जो इस वक्त जतीन बनकर हो रही थी, वह हवा में उड़ा जा रहा था- मृगतृष्णा में हकीकत का मजा लेता हुआ, नकल में असल की सूरत देखता हुआ। खुशी के कारण से किस कदर निस्पृह है। इसकी चाल कितनी मस्तानी थी। गुरूर से उसका सिर कितना उठा हुआ था!

यथार्थत: उसके बालोचित चेहरे पर ऐसी स्वाभाविकता थी कि क्या मजाल कि जरा भी हँसी आ जाए। इस शान से वह गाँव में दाखिल हुआ। लड़कों ने उसकी आवाज सुनी, ”रेबड़ी कड़ाकेदार!” और सब-के-सब दौड़े आन-की-आन में। फुन्दन उत्सुक सूरतों से घिरा हुआ है, उसी तरह जैसे जतीन घिर जाया करता था। किसी ने न पूछा, ‘यह क्या स्वाँग हैं?’ दिल ने दिल की बात समझी। मिठाइयों की खरीद होने लगी। ठीकरों के पैसे थे, कंकड़ और बजरियों की मिठाई। इस खेल में लुत्फ कहीं ज्यादा था। भौतिकता में आध्यात्मिकता का अंदाज कहाँ, मुसर्रत कहाँ, उडऩे का अनुभव कहाँ!

मुन्नू ने एक ठीकरा देकर कहा, ”जतीन, एक पैसे की खुट्टियाँ दे दो।”

जतीन ने एक पत्ते में तीन-चार कंकड़ रखकर दे दिए।

खुट्टियों में इतनी मिठास, इतना स्वाद कब हासिल हुआ था!

(लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त पुस्तक ‘प्रेमचंद : बच्चों की कहानि‍यां’ से साभार)

जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा : ओमा शर्मा

ओमा शर्मा

ओमा शर्मा

इसे एक पहेली ही माना जाना चाहिए कि स्मृति पर इधर पड़ते उत्तरोत्तर निर्मम प्रहारों के चलते जब सुबह तय की गई कोई जरूरी बात शाम तक मलिन और पस्त हालत में बच जाने पर राहत और हैरानी देने लगी है तब, प्रेमचन्द की ‘ईदगाह’ कहानी के तन्तु 34-35 वर्ष बाद कैसे जेहन में बचे पड़े रह गए हैं? कक्षा सात या आठ की बात रही होगी। कोर्स में ‘ईदगाह’ थी। तब हमें न तो कविता, कहानी से कोई वास्ता होता था न उसके लेखक से। खेती-क्यारी करने के बीच पढ़ाई ऐसा जरूरी व्यवधान थी, जिसमें खेती-क्यारी से मुक्ति की संभावनाएं छिपी थीं। परीक्षा में ज्यादा नहीं, ठीक-ठाक नम्बर मिल जाएं। बाकी लेखक या उसके सरोकारों से किसी को क्या वास्ता? होते होंगे किसी परलोक के जीव, जो पहले तो लिखते हैं और फिर अपने लिखे से दूसरों पर बोझ चढ़ाते हैं। पता नहीं किस परम्परा के तहत लेखक की लघु जीवनी सी रटनी होती थी… आपका जन्म सन अलाँ-फलाँ को अलाने प्रदेश के फलाने गाँव में हुआ, आपकी शिक्षा बीए-सीए तक हुई, आपकी प्रमुख कृतियों के नाम हैं… आपकी रचनाओं में तत्कालीन समाज की झांकी प्रस्तुत होती है। सन इतने में आपका निधन हो गया…।

सारी विद्या चौखटेबद्ध और रटंत।

इसी सब के बीच जब प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ पढ़ी तो पहली बार ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जो पढ़ाई से सरासर अनपेक्षित था। नाम और परिवेश ही तो कुछ अलग थे वर्ना सब कुछ कितना अपना-अपना सा था। हिन्दू बहुल हमारे गाँव में मुस्लिम परिवार चार-छह ही थे, मगर दूसरे भूमिहीनों की तरह पूरी तरह श्रम पर आश्रित और इतर समाज में घुले-मिले। विनय और शील की प्रतिमूर्ति। लिबास और चेहरे-मोहरे से थोड़ा मुसलमान होने का शक पनपे अन्यथा जुबान में भी वैसा जायका नहीं था। गाँव में मस्जिद नहीं थी इसलिए ईद के रोज तीन कोस दूर बसे कस्बे ‘पहासू’ जाना पड़ता था। उसके सिमाने पर अजल से तैनात एक भव्य, भक्क सफेद मस्जिद गाँव से ही दिखती थी। इसी के बरक्स तो लगा कि ईदगाह हमारे गाँव के, हमारे साथ खेलते-कूदते अकबर, वजीरा, बशीरा या अहमद खाँ की कहानी है। यूँ हमारे गाँव में बृहस्पतिवार के दिन साप्ताहिक हाट लगती थी, जिसमें हम बच्चों को पड़ाके (गोल-गप्पे), चाट-पकौड़ों के साथ प्लास्टिक के खिलौने देखने-परखने को मिल जाते थे, मगर कस्बे के लाव-लश्कर, तड़क-भड़क और भीड-भड़क्के के मुकाबले वह सब नितान्त फीका और दोयम था। एक अकिंचन परिवार के प्रसंग से शुरू होकर ‘ईदगाह’ उसी कस्बे की रंगत में गो उंगली पकड़कर हामिद के साथ मुझे सैर कराने ले गई… रास्ते में आम और लीचियों के पेड़, यह अदालत है, यह कॉलेज, हलवाइयों की दुकानें, पुलिस लाइन… हरेक का स्पर्शरेखिक संदर्भ देकर कहानी अपने उदात्‍त मकाम की तरफ इस सहजता से आगे बढ़ती है मानों उसे अपने पाठकों पर पूरा यकीन हो कि उसके संदर्भों को वे अपनी तरह से जज्ब करने को स्वतंत्र रहेंगे। कुछ हद तक कहें तो यहाँ बात ईद या ईदगाह की नहीं है; वह तो जैसे एक माध्यम है, ग्रामीण कस्बाई समाज के संदर्भों को उकेरते हुए एक मूलभूत मानवीय रचना को पैबस्त करने का। ईद यानी उत्सव।

कोई तीज-त्योहार निम्न-मध्य वर्गीय समाज में कितनी उत्सवधर्मिता के साथ प्रवेश करता है, उसकी कितनी बाह्य और आन्तरिक छटाएं होती हैं, यह हम कहानी पढ़ते हुए लगातार महसूस करते रहे। ‘सालभर का त्योहार है’ जैसे जुमले-फलसफे की अहमियत अन्यत्र नहीं समझी जा सकती है। उसी के साथ अमीना का मन जब बेसबब आ धमकी ‘निगोड़ी ईद’ से ‘मांगे के भरोसे’ के साथ दो-चार होता है तो वह सारा परिवेश अपनी उसी शालीन क्रूरता के साथ पेश हो उठता है, जिससे हमारा गाँव-समाज किसी महामारी की तरह आज भी पीड़ित है। आज की स्थितियों के उलट उस कैश-स्टार्व्ड दौर में मेरा मन हामिद के साथ एकमएक होते हुए उन तमाम बाल-सुलभ लालसाओं और प्रतिबंधित आकर्षणों से मुक्त नहीं हो पाता था, जिसके संदर्भों के विपर्यास के बतौर कहानी आकार लेती है। आपातकाल से जरा पहले के उस वक्त में एक या डेढ़ रुपये (जो पचास वर्ष पूर्व हामिद के तीन पैसे ही बनते) के सहारे पूरे बाजार का सर्वश्रेष्ठ निगल डालने की हसरत कितने असमंजसों और ग्लानियों का झूला-नट बनती होती थी, उसे याद करके आज हंसी और कंपकंपी एक साथ छूटती है। दस पैसा के तो खांगो पड़ाके, पच्चीस पैसा में मिलंगी दो केला की गैर (‘गैर’ आज कौन कहता है ?) पचास पैसे को कलाकन्द, पच्चीस पैसा की गुब्बारे वाली पीपनी, गाँव में हिंडोला कहां आवे है सो एक चड्डू तो… और एक चिलकने का चश्मा।

ठहरो ठहरो मियां, बजट बिगड़ रहा है।
क्या करूं, किसे छोड़ूं ?
चलो, केला केन्सिल।
नहीं, नहीं एक तो ले लूं।

मगर वह नामुराद एक केला के पंद्रह पैसे ऐंठता है। साढ़े बारह बनते हैं, भाई तू तेरह ले ले। खैर कोई बात नहीं, अपन के पास कभी ढेर सारे पैसे हुए न तो दोनों टैम केले ही खाया करूंगा। तंगहाली में ये जुबान मरी कितनी चुगली करती है। रेवड़ी भी चाहिए, गुलाब-जामुन और सोहन हलवा भी। बाल-मन के कितने भीतर तक घुसा है, यह तिकौनी मूंछों वाला लेखक। हामिद से चिमटा जरूर खरीदवा लिया है, मगर इतने सजे-धजे बाजार में लार तो उसकी जरूर टपकी होगी। लिखा ही तो नहीं है बाकी जो पंक्तियों के बीच से झांक रहा है, वह कुछ कम बयान कर रहा है।

कक्षा में जब कहानी खत्म हुई तो मास्साब ने पूछा – कहानी का शीर्षक ‘ईदगाह’ क्यों है ? ये क्या बात हुई मास्साब। लेखक को यही शीर्षक अच्छा लगा इसलिए। नहीं। यह ईदगाह में आकर ईद मनाते लोगों के बारे में है, इसलिए। नहीं, यह हमारे भीतर ईदगाह सी पाक और मजबूत भावनाओं के बारे में है, जो तमाम अकिंचन और विषम परिस्थितियों के बीचोंबीच रहकर भी अपना वजूद नहीं खोने देती है। कभी मरती नहीं है, हारती नहीं है। यही हैं प्रेमचंद। अमीचन्द- मास्साब बिल्कुल सही कह रहे हैं सतपाल। अरे सतपाल, एक बात कहूँ। ये जो लेखक है ना प्रेमचंद, इनकी शक्ल गाँव के हमारे बाबूलाल ताऊ से एकदम मिलती है। कसम से।

किताबों की दुनिया में जीवन के अक्स निहारती उस कच्ची उम्र में बाबूलाल ताऊ की भूमिका अपनी जगह बनाती जा रही थी। हमारे जीते जी मानो सदियों से वे एकसा, खरहरा जीवन और जीवनचर्या पहने चले आ रहे थे… कमर में कमान सा झुकाव, बिवाइयाँ जड़े चपटे निष्ठुर पैर, खिचड़ी बेगरी दाढ़ी और चलते समय बाजुओं का बैक-लॉक। बोली में हतकाय-हतकाय यानी इसलिए के आदतन बेशुमार प्रयोग के बावजूद बाबा आदम के समय से चले आ रहे उनके किस्सों में हमें भरपूर कथारस और रोमांच मिल जाया करता था।

एक रोज उन्होंने हीरा-मोती नाम के दो बैलों की कथा छेड़ दी… कि कैसे वे मन-ही-मन एक-दूसरे की बात समझ जाते थे, अपने मालिक (झूरी) से कितना प्यार करते थे, कैसे उन्होंने किसी दूसरे (गया) के घर पानी-सानी ग्रहण करने से इन्कार कर दिया, कैसे एक बिजार (सांड) के साथ संगठित होकर लड़े, कैसे सींग मार-मारकर मवेशी खाने की दीवार में छेद करके छोटे जानवारों को मुक्ति दिलाई और कैसे वे वापस अपने ठीये पर लौट आए। रवायती अन्दाज के बावजूद लगा कि ताऊ ने इस बार कुछ अलग और ज्यादा अपनी-सी कहानी सुनाई है। फितरत मासूमियत और तेवर के स्तर पर यह कहानी दो बैलों की है या दो बच्चों की ? या अभावों-पराभवों के बीच उम्र गुजारते उन तमाम निरीह असंख्यों की जिन्हें नियति और मूल्यों पर भरोसा है, मगर जिनका वजूद हीरा-मोती जैसे बेजुबानों सा है। जिन्दगी जिन्हें दर रोज के हिसाब से दुलत्ती जड़ती है और जिसे किस्मत का लेखा समझकर वे कबूल करते चलते हैं। यह निराशावादी नहीं, जीवन को उसके नग्न यथास्वरूप में स्वीकार करने का फलसफा है। ‘पड़ने दो मार, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहां तक बचेंगे’ यह मानो हीरा नहीं मास्टर हीरालाल कह रहे हैं, जो विवाह के सात वर्ष बाद विधुर हो गए और कुछ वर्ष बाद जब दूसरा विवाह किया तो पहले विवाह से उत्पन्न बड़ा लड़का घर छोड़कर भाग गया। मालकिन की लड़की से उन्हें हमदर्दी है कि कहीं खूंटे से भगा देने के इल्जाम में सौतेली माँ से न पिटे। लड़ाई में जब सांड बेदम होकर गिर पड़ा तो मोती उसे और मारना चाहता है मगर हीरा की बात कि ‘गिरे हुए बैरी पर सींग नहीं चलाना चाहिए’ ग्रामीण और महाभारतीय संस्कारों के आगोश में वॉइस ऑफ सेनिटी की तरह फैसलाकुन हो जाती है। ग्लोबलाइजेशन और उससे जुड़ी सांस्कृतिकता से कोसों पहले के उस साठोत्तरी काल और अपने लड़कपन के उस दौर में श्वेत-श्याम मानसिकताओं के पहलुओं को रेखांकित-दर्ज करती इस कहानी में बाद में पता लगा लेखकीय आदर्शवादी यथार्थ चाहे भले हो, मगर मिथकीय पात्रों के बावजूद यह कहानी के उस सर्वप्रमुख गुण यानी पाठकीय कौतूहल की भरपूर आपूर्ति करती जा रही थी, जो इन दिनों लिखी जा रही अनेक कहानियों में पुरानी शुष्क गांठ की तरह अटकता है। कहानी की शुरूआत में गधे और सीधेपन को लेकर जरूर संक्षिप्त आख्यान सा है, मगर वह इंजैक्शन लगाने से पूर्व स्प्रिट से त्वचा को तैयार किए जाने जैसा ही है। और भाषा तो ऐसी कि बच्चा पढ़े तो सरपट समझता जाए और बूढ़ा पढ़े तो उसके काम का भी खूब असला निकले। खुदरा वादों-विवादों की किस दौर में कमी रही है, लेकिन अपने रचे-उठाए पात्रों और उनकी स्थितियों को लेकर कहानीकार की निष्ठा अडिग तरह से पवित्र और सम्पन्न खड़ी दिखती है।

आदर्शोन्मुखी नैतिकता की चौतरफा मंडराती हवा में दूसरी शक्ति कदाचित फिर भी नहीं होती कि खेत-खलिहान और ढोर-डंगरों को सानी-पानी देने के बीच मिले अवकाश में पाठ्यक्रम के अलावा कुछ और पढ़ने को विवश हो जाते (मानस का गुटका और ‘कल्याण’ के अंक इसकी चौकसी में तैनात थे) बशर्ते कि उस ‘पढ़ाई’ में आनन्द का इतना स्वभावगत पुट न होता कि प्रेमचन्द नाम के महाशय की जो कहानी जब जहां मिल जाए, मैं उसे निगल डालने को लालायित रहता। ‘पंच-परमेश्वर’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘पूस की रात’, ‘दूध का दाम’, ‘मंत्र’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी अनेक कहानियाँ उस सिलसिले में चिन दी गईं।

उपन्यास जरूर देर से पढ़े, लेकिन कोर्स में कोई था ही नहीं और लाइब्रेरी जैसी चिड़िया तो दूर-दूर तक नहीं थी।

प्रेमचन्द की कहानियों को लेकर एक आदिम अतृप्ति भाव तो अलबत्ता आज भी बना हुआ है।

 

प्रेमचंद के बहाने

premchand

31 जुलाई को कालजयी कथाकार प्रेमचंद का जन्‍मदि‍न है। आज जि‍स तरह से साम्प्रदायि‍कता, जाति‍वाद, अमानवीयता, सामाजि‍क असमानता, संवेदनहीनता बढ़ रही है, ऐसे में प्रेमचंद हमें रास्ता दि‍खा सकते हैं। सरल, सहज और मानवीय सरोकारों से परि‍पूर्ण लेखन के कारण आज भी प्रेमचंद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

हमारी योजना है कि‍ प्रेमचंद जयंती पर पठन–पाठन को लेकर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाएं। जैसे— उनकी कहानि‍यां का पाठ हो, मंचन हो और उन पर चर्चा हो। पुस्तक मेले, पोस्टर प्रदर्शनी, काव्य पाठ जैसे आयोजन भी कि‍ए जाएं। यह जरूरी है कि‍ इन कार्यक्रमों में बच्चों की सक्रि‍य भागेदारी हो।

इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाने इसलि‍ए जरूरी हैं कि‍ अच्छा साहि‍त्य बच्चों में रचनाशीलता का वि‍कास करता है। आज रवीन्द्रनाथ टैगोर देश और दुनि‍या में जाने जाते हैं, तो इसका श्रेय रवीन्द्र जयंती के अवसर पर ऐसे साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों को ही जाता है। न केवल प्रेमचंद, बल्कि अन्य साहि‍त्यकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और दूसरे महापुरुषों की जयंती पर इस तरह के आयोजन कि‍ए जाएं। इसका फायदा आने वाली पीढ़ी को भी मि‍लेगा।

संचार माध्यमों की दूसरी प्राथमि‍कताओं, कैरि‍यर की आपाधापी और समाज में गैर–साहि‍त्यि‍क माहौल के कारण बडे और बच्चे सभी साहि‍त्य से दूर होते जा रहे हैं। यह बेहद भयानक स्थि‍ति‍ है।

दोस्तो, अनुरोध है कि‍ आप सभी अपने–अपने स्तर पर इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त करें। देशभर के अलावा वि‍देशों में रह रहे साथी भी इसमें सहयोग दें। अगर सार्वजनि‍क स्तर पर कोई कार्यक्रम नहीं कर पा रहे हैं, तो कम–से–कम अपने आसपास के बच्चों या अपने परि‍जनों के साथ बैठकर प्रेमचंद की कि‍सी कहानी का पाठ या उनके जीवन प्रसंग की चर्चा तो कर ही सकते हैं।

लेखक मंच के लि‍ए आपके कार्यक्रम की रि‍पोर्ट का इंतजार रहेगा।

धन्यवाद सहि‍त
अनुराग
9871344533
anuraglekhak@gmail.com

मेरे आदर्श- प्रेमचंद : प्रेमपाल शर्मा

Premchand
मैं प्रेमचंद साहित्य का न तो विशेषज्ञ हूँ और न ही समीक्षक, आलोचक, प्राध्यापक, जो प्रेमचंद की रचनाओं में ऐसा आकाश-कुसुम खोज लाए, जिससे अभी तक आप परिचित न हों, लेकिन एक छोटे-मोटे पाठक, लेखक के रूप में (वैसे, प्रेमचंद की मूर्ति के आगे मुझे अपने लिए लेखक शब्द लिखने में भी संकोच होता है) मेरे लिए वह एक ऐसे प्रेरणा स्रोत हैं, जिनसे मैं न केवल साहित्य में बल्कि जीवन के हर कदम पर प्रेरणा लेता हूँ ।100 वर्ष के बाद भी यदि वह लेखक या उसका साहित्य इस रूप में प्रभावित करता है तो समकालीन कथा साहित्य में प्रेमचंद की प्रासंगिकता के एक नहीं सैंकड़ों बिंदु हैं, जो मुझे झकझोरते हैं ।

मैं बचपन से लेकर कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने तक 22 वर्ष की उम्र तक गाँव में रहा। बी.एस.सी. के दिनों में भी गाँव से ही 11-12 किलोमीटर आना-जाना होता था। कभी साइकिल तो कभी बस। यहाँ मेरा मतलब अपनी आत्मकथा सुनाना नहीं। मैं जो कहना चाहता हूँ, वो यह है कि जब आप गाँव में रहे होते हैं तो एक ऐसा लेखक जिसका एक-एक शब्द गाँव के किसान, मज़दूर, महाजन के ऐसे कुछ आख्यानों से भरा हुआ हो तो आपको बार-बार अपना अक्स उसमें झलकता दिखाई पड़ता है। प्रेमचंद के यहाँ ग्रामीण बोली है, पग-पग पर मुहावरे, लोकोक्तियाँ हैं। कथा बढ़ती ही इन्हीं के सहारे है । इसलिए सबसे ज्या दा पढ़े भी जाते हैं प्रेमचंद। जनता को अपना जीवन उसमें दिखाई देता है । यूँ शहर और महानगर में रहने वाले लोग भी और वे भी जो एकाध-बार नानी, दादी के गाँव पिकनिक पर जाते हैं, प्रेमचंद के उतने ही मुरीद होते हैं, लेकिन ‘पूस की रात’ में हलकू किसान का सर्दी में ठिठुरते हुए जबरा कुत्ते के साथ सोने का एहसास उसी तीव्रता के साथ वही कर सकता है, जिसने खुद पूस की सर्दी में रातें काटी हों।30 साल पहले उस कहानी को पढ़ते हुए और आज भी लगता था कि जबरा कुत्ता हलकू का नहीं मेरा झब्बू कुत्ता है, जो बिल्कुल उसी अंदाज़ में मेरे साथ रात में खेतों पर पानी लगाने में साथ-साथ होता था । ‘पूस की रात’ में नील गाय खेत को तबाह कर जाती है । मुझे याद आता है वो वाकया जब कभी-कभार आने वाले भेडि़ए के डर से झब्बू भौंकता-भौंकता अचानक डर से कूँ-कूँ करता हुआ मेरी चारपाई के नीचे आ छिपता था । ‘दो बैलों की कथा’ मानो मेरे ही बैलों की कथा है । जुलाई, 2005 में दुनिया के परदे पर हैरी पॉटर का छठा संस्करण रिलीज़ हुआ था। भारत में पहले ही दिन एक लाख प्रतियां बिक गई थीं। पश्चि़‍म की यही कार्य-प्रणाली है । आप इसे षड्यंत्र कहें या अंग्रेज़ी संस्कृ।ति का वर्चस्व । अंग्रेज़ी साम्राज्य या संस्कृति हर दो-चार साल में ऐसे तमाशे करती रहती है, जिसमें तीसरी दुनिया विशेषकर पूर्व कॉलोनियल राष्ट्र अपनी पूरी जनता को झोंक देते हैं । विदेशी न्यूज़ चैनलों के बाद तो सारी लगाम उनके पास है। पहले जुरासिक पार्क या एनाकोंडा था तो उसके बाद ग्लैडियेटर जैसी ही कुछ फिल्में। अंग्रेज़ी प्रबंधन गुरुओं की कुछ ‘हल्ला्-बोल’ किताबें भी उसी का हिस्सा हैं । यानी‍ कि बच्‍चों से लेकर बूढ़े तक, संगीत से लेकर फिल्म तक, सभी के लिए मूर्ख बनाने को कुछ न कुछ। इसी के नशे में तो कभी-कभी यह सुनने को मिलता है, हिन्दी में क्या है, न पॉटर, न पिज्जा। प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ में क्या किसी भी हैरी पॉटर से कम आकर्षण है? मुझे लगता है कि मेरी पीढ़ी ने ‘दो बैलों की कथा’ को घर-घर तक न पहुँचा कर प्रेमचंद की विरासत का अपमान किया है। तभी ये पीढ़ी प्रेमचंद की बजाए हैरी पॉटर खरीद रही है । खुद मेरे बच्चों को किसी ने गिफ्ट दी थी, वो आज भी रखी है। खुशी है कि मेरे बच्चों ने उसे सूँघ कर एक तरफ रख दिया है। अंग्रेज़ी भाषा हो या कोई भी दूसरी विदेशी भाषा, बच्चों की अपनी निजी फैंटेसी में मुश्किल से ही प्रवेश कर पाती हैं ।

‘दो बैलों की कथा’ सिर्फ बैलों की कथा नहीं। आप याद कीजिए, उसमें मानवीयता है, करुणा है। उसमें आजादी की प्रतिध्वनियाँ हैं। अपने मालिक के प्रति जो प्रेम है, ऐसा मानवीकरण दुनिया के साहित्य में बिरले ही मिलेगा। मोती बदला लेना चाहता है, उस मालिक से जो उसे झूरी के यहाँ से जबरदस्ती ले आया है, लेकिन उसके मन में तुरंत ख्याल आता है, इससे तो वो बालिका अनाथ हो जाएगी, जो उसे रोटी खिलाती है। अपने समय की सच्चाई को एक बड़ा लेखक कितने प्रतीकों से कहता है । इस कथा के इतने आयाम हैं कि दर्जनों पृष्ठि भरे जा सकते हैं। ‘ईदगाह’ कहानी को याद कीजिए- मैं जब भी दशहरे के मेले में गया, चिमटा तो मैं कभी नहीं खरीद पाया लेकिन हर बार चिमटे वाले की दुकान में ज़रूर गया था। दफ्तर में फाइलों को निपटाते वक्त ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुझे ‘पंच परमेश्वेर’ की याद न आई हो। किसी के लिए कोई अवाँछित सिफ़ारिश या लोभ देता है, पंच परमेश्वर तुरंत आपके अंदर प्रवेश कर जाता है। लोग कहते हैं कि साहित्य से कुछ नहीं होता, लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सिर्फ ऐसा साहित्य ही मनुष्यी को बदलता है और एक मनुष्य को बदलना पूरे समाज को बदलना है क्योंकि यह श्रृंखला पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे साहित्य से ही आगे बढ़ सकती है।

एक और मशहूर कहानी है- ‘मंत्र’, यदि मैं सच्चाई बयान करूँ तो यह कहानी मुझे हर सफ़ेदपोश, अमीर के प्रति इस पूर्वाग्रह से भर देती है कि एक अमीर एक गरीब से बेहतर इंसान कभी भी नहीं हो सकता। ‘मंत्र’ कहानी में उस बूढ़े का बेटा मर जाता है क्योंकि डॉक्टर साहब गोल्फ खेलने जा रहे हैं और देखने से मना कर देते हैं, लेकिन जब उन्हीं डॉक्टर के इकलौते बेटे को साँप डस लेता है और यही बुजुर्ग भगत, जो साँप का जहर उतारना जानते हैं, सुनते हैं तो चुपचाप बिना बुढि़या को बताए कशमकश में वहाँ पहुँचते हैं और जहर को उतार देते हैं और बिना किसी को बताए या पुरस्कार का इंतजार किए चुपचाप खिसक लेते हैं। मेरी ‘वर्ग दृष्टि’ अगर कुछ है तो ‘मंत्र’ जैसी कहानियों की देन है, जिससे मुझे लगता है कि हर अमीर अपनी सर्वश्रेष्ठ मानवीयता में भी उतना मानवीय नहीं हो सकता, जितना कि गरीब, फटेहाल। ज़रा ‘बड़े भाई साहब’ कहानी को याद करें, क्या मौजूदा स्थिति में बड़े भाई साहब का काम माँ-बाप, पड़ोसी, छोटे-बड़े भाई-बहन मिलकर नहीं कर रहे हैं ? क्या हमारे मौजूदा समसामयिक लेखन में उसकी ऐसी तीव्र अभिव्यीक्ति कहीं सुनने को मिलती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सभी ने ऐसी व्यवस्था के साथ समझौता कर लिया है? ‘जुलूस’ कहानी मुझे याद है। कहानी पढ़ते-पढ़ते आँखें डबडबा जाती हैं। कितनों का नाम लिया जाए! पूरी तीन सौ से अधिक कहानियाँ, इतने बड़े-बड़े 5-6 उपन्यास, नाटक, कहानी- परिमाण और गुणवत्ता दोनों में इतनी विराटता।

यह तो रही उनके लेखन में अपनी जिंदगी के अक्‍स देखने की कुछ मोटी-मोटी बातें। उनके जीवन पर गौर करें तो पाते हैं कि यह शख्स शुरू से ही सामाजिक रूप से कितना सचेत और सक्रिय था। विधवाओं के प्रति क्रूरता हिन्दी साहित्य से लेकर बंगला साहित्‍य सभी में चित्रित की गई है। प्रेमचंद ने सचेतन रूप से एक विधवा शिवरानी देवी से शादी की। 1913 में आर्य समाज के सुधार आंदोलन में शिरकत की। स्वतंत्रता आंदोलन पिछली सदी की शुरुआत में ही परवान चढ़ने लगा था। उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ देशभक्ति की कहानियों से भरा पड़ा है, जिसे जब्त् कर लिया गया । 1921 में जब गाँधी जी गोरखपुर पहुँचे और असहयोग आंदोलन में सहयोग देने के लिए छात्रों/शिक्षकों और सभी देशवासियों से स्कूल-कॉलेज छोड़ने की अपील की तो 1921 में प्रेमचंद सरकारी नौकरी से बाहर आ गए। बाहर आने के बाद उन्होंने खादी बनाने के करघा का कारखाना लगाया। यानी‍ कि जो उनकी लेखनी में है, वह उनके जीवन में भी है। यदि इसे मेरी गाँधी जी और प्रेमचंद के प्रति अंध-भक्ति न माना जाए तो कथनी और करनी का जितना कम अंतर गाँधी जी में है तो उनके चेले प्रेमचंद में भी उतना ही है । ‘ठाकुर का कुआं’ या ‘मोटे राम शास्त्री का सत्याग्रह’ या दूसरी कहानियों में जिन रूढि़यों, अंधविश्वासों, जातिवाद का वे विरोध करते हैं, उनके जीवन में भी वह उतना ही है । 1928 में बेटी कमला का विवाह किया लेकिन कन्यादान करने को तैयार नहीं हुए। कहना था, ‘जानवरों का दान किया जाता है, बेटी का नहीं’। साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर चतुरसेन शास्त्री की पुस्तक ‘इस्लाम का विष वृक्ष’ प्रकाशित हुई । प्रेमचंद ने तुरंत इसके खिलाफ लिखा कि यह साम्प्रदायिकता को बढ़ाने वाली पुस्तक हो सकती है। आगे चलकर जब मुहम्म्द इक़बाल ने पाकिस्तान का नारा दिया तो उन्होंने उसका भी विरोध किया। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘रंगभूमि’ में ईसाई साम्प्रदायिकता के विरोध का भी वर्णन है।

मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्ति ही इतना खरा स्टैंड ले सकता है । ऐसे कितने ही बिम्ब मेरे दिमाग में घूम रहे हैं । एक शख्सं है, जो आजादी की लड़ाई में भी साथ है, उपन्यास भी लिख रहा है, पत्रिकाएं भी निकाल रहा है जैसे– ‘मर्यादा’, ‘माधुरी’ और 1930 में ‘हंस’। यही कारण था कि‍ 1936 में उनकी पहल पर ही भारतीय साहित्य परिषद के पहले अधिवेशन में गांधी, नेहरू, राजागोपालाचार्य, पुरुषोत्तम दास टंडन, राजेंद्र प्रसाद, बालकृष्ण शर्मा नवीन सभी उपस्थित थे। पहली बार खुलकर हिन्दुस्तांनी भाषा की वकालत की । न उर्दू, फारसी और न संस्कृतनिष्ठ हिन्दी। क्या आप सबको नहीं लगता कि हिन्दुस्तानी ही आज के अंग्रेज़ी माहौल को चुनौती दे सकती है? यह उनकी राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक स्वीकृति और हैसियत का परिणाम था कि जब जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ हिन्दी में निकलवाई तो उसके अनुवादक के रूप में प्रेमचंद को चुना और 1931 में प्रकाशित इस पुस्तिक में नेहरू जी ने प्रेमचंद के प्रति बाक़ायदा आभार व्यक्त किया है।

‘सोज़े वतन’ को अंग्रेज़ी सरकार ने ज़ब्त कर लिया था, इस चेतावनी के साथ कि मुगलों का राज होता तो दोनों हाथ काट लिए जाते । यानी‍ कि भविष्य में भी ऐसा न लिखने के लिए सख्त चेतावनी। लेकिन क्या प्रेमचंद जी रुके ? हमारी पीढ़ी तो जार-जार रो-रोकर कई ऑडिटोरियम और सभागारों को भर देती। लेकिन इस लेखक ने धनपतराय नाम के बजाए प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया, अपने शस्त्र बदले, मैदान नहीं छोड़ा, उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में भी। उनके योगदान का हिन्दी साहित्य खुद गवाह है । यह किसी भी पीढ़ी के लिए कम प्रेरणादायक नहीं कि वो ऐसा लिखे, जिससे सत्ता डरे। कम से कम आज़ाद भारत के लेखन में बहुत कम ऐसे लेखक हैं, जो सत्ता् को सीधे-सीधे चुनौती दे सके । यहाँ मुझे अंग्रेज़ी के जाने-माने पत्रकार, लेखक और राजनीतिज्ञ राजमोहन गांधी के भाषण का वह वाक्य याद आता है, जो उन्होंने साहित्‍य अकादमी के सभागार में कई साल पहले दि‍या था। शीर्षक था ‘शत्रुता में एकता’। राजमोहन गांधी का कहना है, इस देश का इतिहास ही यह है कि जब उसका शत्रु सामने रहता है, तो उसे मारने, हटाने के लिए हम सभी एकजुट हो जाते हैं लेकिन उसको मारने के बाद, शत्रु को खत्म करने के बाद, क्या करेंगे ऐसा खाँचा या साँचा हम लोग बनाकर नहीं रखते। सन सैंतालीस में अंग्रेज़ों को भगाकर आज़ादी तो ले ली, आज़ादी के बाद क्या करेंगे, इसके बारे में वे बहुत साफ़ नहीं थे ।1977 में भी यही हुआ। मैं अपनी बात पर लौट कर आता हूँ । आजादी के बाद असमान भूमि वितरण, जमींदारी प्रथा, अंधविश्वास, जाति प्रथा, शिक्षा, सामाजिक समानता- क्या ये कम बड़ी चुनौतियाँ थीं ? ज्यादातर भारतीय आज भी उतने ही गरीब हैं, उतने ही जातिवाद में उलझे हैं, जितने कि प्रेमचंद के समय में थे। उतनी ही शैक्षिक अव्यवस्थां से गुजर रहे हैं, जितने कि प्रेमचंद का भारत। समसामयिक कथा साहित्य में इन समस्या़ओं को और भी गंभीरता और मिशन के साथ लाने की ज़रूरत है।

लेकिन कभी-कभी तो उलटे प्रेमचंद पर भी जातिवादी आरोप लगाए जाते हैं । इन आरोपों की भी एक सधी हुई राजनीति है। उन राजनेताओं की जिनके हाथ प्रेमचंद जैसे लेखकों की पुस्तीकों को जलाते हुए नहीं काँपते ।शिक्षा शास्त्री कृष्ण कुमार के शब्दों का सहारा लूँ तो आज की ज्यादा पढ़ी हुई पीढ़ी जितनी सांप्रदायिक है, उतनी गरीब, बिना पढ़ी हुई नहीं? इसका कारण है उनको पढ़ाया जाने वाला वो इतिहास जो दोनों देशों में एक पक्षधरता के साथ पढ़ाया जा रहा है। मुझे लगता है कि प्रेमचंद साक्षात कबीर हैं। आजादी के बाद हरिशंकर परसाई के अलावा मुझे तो कोई दूसरा याद नहीं पड़ता। ‘कफ़न’ में चमार शब्द का इस्तेमाल उस गरीब की स्थिति का बखान है। रंगभूमि में प्रेमचंद का एक वाक्य देखिए, ‘शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं, उन्हीं में एक गरीब और अंधा चमार है, जिसे लोग सूरदास कहते हैं।’ पूरी समग्रता में समझने की ज़रूरत है, यहाँ प्रेमचंद को उनकी निष्ठा के प्रति शक कोई मूर्ख ही कर सकता है। समाज के इस वर्ग के प्रति उनकी करुणा और सहानुभूति का नाम ही प्रेमचंद है। मैं किसी के प्रति पूजाभाव में यकीन नहीं रखता। दरअसल पूजाभाव ही हमारे समाज को यथास्थिति में रखने के लिए एक बहुत बड़ा कारण है। यूरोप में रेनेसाँ से पहले पूजाभाव रहा, लेकिन उसके बाद जो धर्म, परंपरा, समाज के प्रति वैज्ञानिक संशय, संदेह बढ़ा, उसी से यूरोप वैज्ञानिक उपलब्धियों की तरफ बढ़ता जाता है और हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अमेरिका, यूरोप भागने के लिए, कभी-कभी पनडुब्बियों के पेंदे में छिपकर भी। हमें असहमति ज़ाहिर करने का पूरा हक है, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि के साथ, एक संयम के साथ। इस देश को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र/लोकतंत्र कहा जाता है तो क्या यही लोकतंत्र की निशानी है ? यह नहीं कि असहमति की रस्सी से आप प्रेमचंद को भी फाँसी पर लटका दें।

जब अमेरिका की याद आई है और अमेरिका भागने की, तो इस संबंध में प्रेमचंद की जीवनी भी टटोली जाए। आप सबने प्रेमचंद की जीवनी पढ़ी होगी ‘कलम का सिपाही- प्रेमचंद’। उनके बेटे अमृतराय की लिखी हुई। मुझे इसे पढ़ते हुए अनुभव हुआ कि प्रेमचंद की जीवनी उनके बेटे को ही क्यों लिखनी पड़ी। क्या उनकी जीवनी सात-आठ राज्यों में फैली हिन्दी भाषा का कोई और लेखक नहीं लिख सकता था ? और यदि ऐसा होता तो वाकई यह प्रेमचंद के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धां‍जलि होती। कुछ छोटे-मोटे प्रयास हुए हैं लेकिन इतना अच्छा काम नहीं हुआ, जितना अमृतराय ने किया है। दुनिया भर के साहित्य में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जिन पर सौ, दो सौ, चार सौ साल बाद भी जीवनी लिखी गई हैं। यहां तक कि कई बार दूसरी भाषा के लेखकों द्वारा भी लिखी गई हैं। हाल ही में स्टीफन स्वाइग की ‘वो गुज़रा ज़माना’ (हिन्दी अनुवाद: ओमा शर्मा) पढ़ते वक्त लगा कि स्टीफन ने अपनी लेखनी से महत्वपूर्ण काम तो जीवनी लिखने का किया है । टॉलस्टॉ्य, बालज़ाक, दोस्तोवस्की की जीवनियाँ जर्मन लेखक स्टीफन स्वाइग ने लिखी हैं । खुद महात्मा गाँधी पर जितनी अच्छी जीवनियां विदेशियों ने लिखी हैं, उतनी हमने नहीं। गाँधी पर 1905 के आसपास पहली बायोग्राफी एक विदेशी ने लिखी थी।

हाँ तो, मैं ‘कलम के सिपाही’ की बात कर रहा था। यहाँ एक लेखक है, जिसका नाम है प्रेमचंद। रात-दिन अपनी लेखनी को छोड़कर शांति निकेतन तक भी जाने में जिसकी रुचि नहीं है । मन कर रहा है कि ‘कलम का सिपाही’ के कुछ पृष्ठ आपके सामने रखूँ- “बनारसी दास चतुर्वेदी ने प्रेमचंद को उलझाने के ख्याल से तुलसी जयंती के साथ नत्थी करना चाहा, मगर प्रेमचंद उससे भी निकल भागे (पृष्ठ 570 -71)। “जहाँ तक तुलसी जयंती की बात है, मैं इस काम के लिए सबसे कम योग्य हूँ । एक ऐसे समारोह का सभापतित्व करना, जिसमें मुझे कभी कोई रुचि नहीं रही, बिल्कुल मज़ाक की बात होगी। मुझे बड़ा डर लगता है। सच तो यह है कि मैंने रामायण आद्योपांत पढ़ी भी नहीं। यह एक लज्जा की बात है, मगर सच बात है।”

तीन महीने बाद फिर किसी प्रसंग में शांति निकेतन का निमंत्रण मिला। वह भी निष्फल हुआ और 18 मार्च, 1936 को मुंशी जी ने चतुर्वेदी जी को लिखा-

“मैं शांति निकेतन न जा सका। मेरे लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं है। वे लोग मुझसे विद्वतापूर्ण व्याख्यान की आशा करेंगे, और वह मेरे बस का रोग नहीं। मैं कोई विद्वान आदमी नहीं हूँ । तो भी अगर वह लोग मुझे पहले से आमंत्रित करें तो मैं आने का प्रयत्न करूँगा। तार से दी गई एक मिनट की सूचना पर मैं तैयारी नहीं कर सकता।”

एक रोज़ उन्होंने पत्नी से कहा, “इच्छा होती है कि नौकरी छोड़-छाड़कर कहीं एकांत में बैठकर लिखता-पढ़ता। क्या करूँ, मेरा दुर्भाग्य है कि मेरे पास थोड़ी-सी जमीन भी नहीं। अपने खाने भर का गल्ला पैदा कर लेता और चुपचाप एकांत में बैठकर साहित्य की सेवा करता ।”

कितना साम्या है गाँधी जी और प्रेमचंद के इन विचारों और जीवन में। महात्मा गाँधी को अमेरिका जाने के कितने आमंत्रण मिले लेकिन हर बार वह उसे उतनी ही विनम्रता से मना करते रहे क्योंकि उनका कुरुक्षेत्र, रणक्षेत्र, युद्धक्षेत्र जो भी कहो तो यहीं इस देश में था। यहाँ से भागने का नहीं । इसके विपरीत जब अपने दर्जनों दोस्तों को अमेरिका, फ्राँस की तरफ दौड़ते देखता हूँ तो अफसोस होता है। दिल्ली‍ विश्वविद्यालय के जाने-माने प्रोफेसर जो अमेरिकी विरोध में लिखते-लिखते ही इन पदों पर पहुँचे, अगले दिन पता लगता है कि वो अमेरिका चले गए और ज्यादा अफ़सोस तब होता है, जब उन्होंने न आने का मन बना लिया है। देश-भक्ति का राग अलापना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात है। लेकिन कर्म और जीवन में कुछ तो साम्य रखना चाहिए।

अगर उनकी लेखकीय जिंदगी जाननी हो तो इस पुस्तक के पृष्ठ 345 से 347 ज़रूर पढ़ें । कुछ लाइनें उद्धृत करने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा हूँ- “दूसरी किसी चीज़ में न तो उन्हें मज़ा मिलता था और न उसके लिए उनके पास वक्त ही था। जैनेन्द्र को बड़ी हैरानी हुई थी, जब मुंशी जी ने सन 31 की अपनी दिल्ली-यात्रा के समय उनको बतलाया था कि अपनी जिंदगी में पहली बार वह दिल्‍ली आए हैं। इक्यावन-बावन साल की उम्र में पहली बार उन्होंने दिल्ली का मुँह देखा। और फिर उतनी ही हैरानी जैनेंद्र को यह जानकर हुई थी कि उस प्रवास के वह सात दिन उनकी जिंदगी के पहले सात दिन हैं (बीमारी के दिनों के अलावा) जबकि उन्होंने कुछ नहीं लिखा।”

ऊपर से देखने पर भले लगे लेकिन दोनों दो अलग चीजें नहीं, एक ही चीज़ के दो पहलू हैं। या तो घूम फिर ही लो या काम ही कर लो। कुछ लोग दोनों को एक साथ निभा ले जाते हैं। मुंशी जी उनमें नहीं थे, न स्वभाव से और न अपनी सांसारिक स्थिति से, लिहाज़ा उन्होंने ख़ामोशी से एक कोने में बैठकर बराबर और अनथक काम करने की जिंदगी ही अपने लिए चुन ली थी और जिंदगी शुरू करते समय ही चुन ली थी, जिससे फिर कभी इधर-उधर नहीं हुए। जैसा कि उसी ख़त में उन्होंने इंद्रनाथ मदान को लिखा था-

“मैं रोमॉ रोलां के समान, नियमित रूप से काम करने में विश्वास करता हूँ ।”

तो यह था हमारे हिन्दी साहित्य के अब तक के सबसे बड़े लेखक का जीवन। न केवल अमेरिका बल्कि किसी भी समझौते के लिए हमारी समकालीन पीढ़ी तैयार है। वह पुरस्कार हो या किसी भी तरह अमेरिका, इंग्लैंड जाना। कहीं भी एक दिन के लिए भी जाने के लिए हर समझौता करने के लिए तैयार। कभी-कभी तो लगता है कि ऐसी पीढ़ी को क्या प्रेमचंद को याद करने का अधिकार है? बड़े से बड़े बुजुर्ग सम्मा़नीय लेखक भी पुरस्कारों की लाइन में खड़े होकर बधिया होने को तैयार हैं । एक बार प्रसिद्ध कथाकार संजीव घर आए हुए थे । उन्होंने एक लेखक की पुरस्का़र लिप्सा की दास्ताँ बयान की। लेखक मुख्यमंत्री के घर पहुँचे, एक साहित्यिक दलाल के साथ । मुख्यमंत्री कभी बाथरूम में, कभी टॉयलेट में। घंटे दो-घंटे बाद गमछे में बाहर आते हैं और पूछते हैं क्या चाहिए? लेखक और दलाल मिनमिनाते हैं। पूछते हैं 5 हजार चलेगा ? वे और गिड़गिड़ाते हैं और राशि 11 हजार कर दी जाती है। यह रोज़ हो रहा है।

साहित्य अकादमी के भवन का नाम रवींद्र भवन है। वहीं पास में एक और गली लेखक सफ़दर हाशमी के नाम से भी है। लेकिन पूरी दिल्ली में प्रेमचंद के नाम से शायद ही कोई मार्ग या भवन होगा। होना चाहिए, लेकिन यह कहाँ हो, इस पर सोचने की जरूरत है। मंडी हाउस की एक सड़क का नाम कोपरनिकस मार्ग है ।यदि मैं गलत नहीं हूँ तो यह कोपरनिकस वही हो सकते हैं, जिन्होंने गैलिलियों से पहले खगोल विज्ञान में प्रसिद्धि पाई- लगभग चार सौ साल पहले। अच्छा हो इसी का नाम प्रेमचंद मार्ग कर दिया जाए। साहित्य संस्कृति के सूचक भवन साहित्य अकादमी, श्रीराम सेंटर, नेशनल स्कूंल ऑफ ड्रामा, दूरदर्शन भवन और कई थिएटर सभागार यहाँ हैं। एक सुझाव यह भी हो सकता है कि प्रेमचंद 1931 में दरियागंज में प्रसिद्ध उपन्यासकार जैनेन्द्र के यहां रुके थे। उसके आस-पास भी कोई मार्ग खोजा जा सकता है। स्मारक बनाना कोई प्रेमचंद पर अहसान नहीं है। नई पीढ़ी को हिन्दी और प्रेमचंद की विरासत से जोड़ना है। दरियागंज के पास राजघाट भी है। महात्मा गांधी जी का प्रेमचंद के ऊपर असर सर्वविदित है। क्यों न राजघाट को जोड़ने वाली सड़क का नाम प्रेमचंद मार्ग रख दिया जाए। मेरी जानकारी में प्रेमचंद परिवार की ही और जानी-मानी लेखिका सारा राय जरूर प्रेमचंद मेमोरियल स्कूल चलाती हैं। वरना हर स्कूल ‘हार्वर्ड एकेडमी’ के नाम से ही चलता है।

मैं फिर से दोहराना चाहूँगा कि न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पन्ने के ऊपर प्रेमचंद मेरे आदर्श हैं।

प्रेमचंद की सामाजिक चिंताएँ : शैलेन्द्र चौहान

प्रेमचंद

प्रेमचंद


कवि‍, आलोचक शैलेन्द्र चौहान का जन्म 21 दि‍संबर, 1954 को खरगोन में हुआ। उनके कविता संग्रह ‘नौ रुपये बीस पैसे के लिए’, ‘श्वेतपत्र’ ‘कितने प्रकाश वर्ष’ और ‘ईश्वर की चौखट पर’, कहानी संग्रह ‘नहीं यह कोई कहानी नहीं’ और संस्मरणात्मक उपन्यास ‘पाँव जमीन पर’ प्रकाशि‍त हो चुके हैं। वह अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका ‘धरती’ का संपादन कर रहे हैं। प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई) के अवसर पर उनका लेख-

प्रेमचंद ने सन 1936 में अपने लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखा है कि ‘मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है । बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का था जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं । इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं, जरा भी रू -रियायत नहीं। उसका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाए।’ इस उद्धरण से यह स्पष्ट है कि प्रेमचंद की मूल सामाजिक चिंताएँ क्या थीं ।

वह भली-भाँति समझ गये थे कि एक बड़े वर्ग यानी बहुजन समाज की बदहाली के जिम्मेदार, उन पर शासन करने वाले, उनका शोषण करने वाले, कुछ थोड़े से पूँजीपति, जमींदार, व्यवसायी ही नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में शामिल (सेवक/ नौकर) उच्चवर्णीय निम्न-मध्यवर्ग /मध्यवर्ग भी उतना ही दोषी था। किसान, मजदूर, दलित वर्ग न केवल शोषित और ख़स्ताहाल था बल्कि नितांत असहाय और नियति का दास बना हुआ जी रहा था। दोनों वर्गों की इतनी साफ-साफ पहचान प्रेमचंद से पहले हिन्दी साहित्य में किसी ने भी नहीं की थी। एक ओर साम्राज्यवादी अंग्रेजी शिकंजा था तो दूसरी ओर सामंतवादी शोषण की पराकाष्ठा थी। एक तरफ अंग्रेजों के आधिपत्य से देश को मुक्तत कराने के लिए आंदोलन था, दूसरी ओर जमींदारों और पूँजीपतियों के विरोध में कोई विरोध मुखर रूप नहीं ले पा रहा था। अधिकांश मध्यवर्ग अंग्रेजी शासन का समर्थक था क्योंकि उसे वहाँ सुख-सुविधाएँ, कुछ अधिकार और मिथ्या अहंकार प्रदर्शन से आत्म गौरव का अनुभव होता था।

प्रेमचंद ने अपने एक लेख में (असहयोग आंदोलन और गाँधीजी के प्रभाव में) सन 1921 में ‘स्वराज की पोषक और विरोधी व्यवस्थाओं’ के तहत लिखा था कि ‘शिक्षित समुदाय सदैव शासन का आश्रित रहता है। उसी के हाथों शासन कार्य का संपादन होता है। अतएव उसका स्वार्थ इसी में है कि शासन सुदृढ़ रहे और वह स्वयं शासन के स्वेच्छाचार (दमन, निरंकुशता और अराजकता) में भाग लेता रहे। इतिहास में ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं है जब शिक्षित वर्ग ने राष्ट्र और देश को अपने स्वार्थ पर बलिदान दे दिया है। यह समुदाय विभीषणों और भगवान दासों से भरा हुआ है। प्रत्येक जाति का उद्धार सदैव कृषक या श्रमजीवियों द्वारा हुआ है।’ यह निष्कर्ष आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। प्रेमचन्द ने ‘ज़माना’ में 1919 में एक लेख लिखा था जिसमें कहा था कि इस देश में 90 प्रतिशत किसान हैं, और किसान सभा नहीं है। 1925 मे किसान सभा बनी। सामान्यत: यह माना जाता है कि मध्य वर्ग की किसी भी आंदोलन, क्रांति और विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

मध्यवर्ग का एक हिस्सा शासन का पैरोकार और दूसरा हिस्सा आंदोलनों की आवश्यकता का हिमायती होता है। यह दूसरा हिस्सा वैचारिक परिस्थितियों का निर्माण करने में तो अपनी भूमिका का निर्वाह करता है पर आंदोलन की शुरुआत की जिम्मेदारी से वह सदैव बचता रहता है। वह आंदोलन के उग्र और सर्वव्यापी होने पर ही उसमें सक्रिय हिस्सेदारी करता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस वर्ग की उदासीनता से तो प्रेमचंद क्षुब्ध थे ही, साथ ही समाज में व्याप्त अंधविश्वास, प्रपंच, सामंती शोषण, वर्ग और वर्ण भेद के वीभत्स और कुत्सित रूप के प्रति भी इस वर्ग की उदासीनता एवं तटस्थता से भी वह नाखुश थे। प्रेमचंद का जन्म पराधीन भारत की पृष्ठभूमि में हुआ था जहाँ स्वयं उनको तथा उनके परिवार को अर्थाभाव की विकट स्थितियों से गुजरने के लिए विवश होना पड़ा था। वहीं धार्मिक और सामाजिक रूढ़िग्रस्तता ने जनमानस को विचारशून्य बना रखा था (यहाँ विचारशून्यता से तात्पर्य शोषण और असमानता की परिस्थियों के प्रति विरोध न करने से है)। इसी असहायता, यथास्थिति और असमानता की जनव्याप्ति की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रेमचंद की विचारशील प्रकृति को इस व्यवस्था के विरोध की प्रेरणा प्राप्त हुई।

‘किसानों की बदहाल जिंदगी में बदलाव से ही मुल्क की सूरत बदलेगी। उनका आकलन है कि अंग्रेजी राज्य में गरीबों, मजदूरों और किसानों की दशा जितनी खराब है और होती जा रही है, उतना समाज के किसी अंग की नहीं। राष्ट्रीयता या स्वराज्य उनके लिए विशाल किसान जागरण का स्वप्न है, जिसके जरिये भेदभाव और शोषण से मुक्त समाज बनेगा।’ उन्हीं के शब्दों में- हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो वर्णों की गंध तक नहीं होगी। वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा। प्रेमचंद ने अच्छी तरह समझ लिया था भारत में सबसे खराब हालत कृषकों और श्रमिकों की ही है। एक ओर ज़मींदारी शोषण है तो दूसरी ओर पूँजीपति, उद्योगपति हैं, बीच में सूदख़ोर महाजन हैं।

लेकिन यदि यहीं तक उन्होंने अपनी समझदारी का विकास किया होता तो शायद उनकी समझ और दृष्टि भारतीय समाज के चितेरे के रूप में अधूरी ही रहती। उन्होंने भारतीय जन-जीवन में सदियों से व्याप्त अमानवीय जाति प्रथा की ओर भी पूरा ध्यान दिया। इसलिए उनकी अनेक कहानियाँ वर्णव्यवस्था के अमानुषिक कार्यव्यापार का बड़ी स्पष्टता से खुलासा करती हैं। ठाकुर का कुआँ, सद्गपति, सवा सेर गेहूँ, गुल्ली डन्डा, कफन उनकी ऐसी प्रतिनिधि कहानियाँ हैं, इस सामाजिक विसंगति को पूरी ईमानदारी से उजागर करती हैं। ‘ठाकुर का कुआँ’ में जोखू चमार को ज्वर का ताप अवश कर देता है ।

वहीं चमार टोले में जो कुआँ है उसमें कोई जानवर गिर कर मर गया है। उस कुएँ का पानी पीना किसी तरह निरापद नहीं है। अत: पीने के लिए स्वच्छ पानी की आवश्यकता है। अब साफ पानी सिर्फ ठाकुर के कुएँ से ही मिल सकता है, लेकिन चमार वहाँ नहीं जा सकते। वर्णधर्म के अनुसार वे अश्पृश्य तो थे ही उनकी छाया तक अपवित्र मानी जाती थी। अत: जोखू की पत्नी को रात के अंधेरे में चुपके से पानी ले आने का दुस्साहस सँजोना पड़ता है। पर ठाकुर की आवाज मात्र से ही वह भयभीत हो जाती है और अपना बरतन कुएँ में ही छोड़ कर भाग खड़ी होती है। घर लौटकर देखती है कि जोखू वही गंदा पानी पी रहा है। एक तरफ घोर अमानुषिकता है तो दूसरी तरफ त्रासद निस्सहायता है। ऐसा जोखू के निर्धन होने के कारण नहीं वरना अछूत होने के कारण है क्योंकि एक निर्धन सवर्ण को उस ठाकुर के कुएँ से पानी भरने से वंचित तो नहीं ही किया जा सकता था और चाहे जितना अत्याचार या शोषण उसका किया जाता रहा हो।

‘सद्‍गति’ कहानी में दुखी यों तो चमार जाति का है पर अपनी बेटी के ब्याह का शुभ मुहूर्त वह पंडित से निकलवाने पहुँच जाता है। बावजूद भूखे पेट होने के वह पंडित के आदेशानुसार श्रम करता है और अंतत: लकड़ी चीरता हुआ मर जाता है। उसकी लाश के साथ पंडित परिवार का व्यवहार क्रूरता की चरम स्थिति वाला होता है। वह उसे घिसटवा कर फिंकवा देता है। ‘सवा सेर गेहूँ’ में पंडित सूदखोर है। शंकर आजन्म उस पंडित का सूद नहीं चुका पाता। ‘कफन’ के घीसू और माधव भी दलित हैं और व्यवस्था के दुचक्र ने उन्हें जिस मोड़ पर पहुँचा दिया है वह भी अमानवीय ही है। ‘गुल्ली डन्डा’ का गया भी अपनी स्थिति से बाहर निकल पाने में असमर्थ होता है।

‘गोदान’ का होरी, महतो है और राय साहब, पंडित दातादीन और महाजन के शोषण का शिकार होता है। होरी के मर जाने पर गोदान के बहाने पंडित दातादीन होरी की पत्नी धनिया की जमा पूँजी ‘सवा रुपये’ भी हड़प लेता है। यहाँ हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि एक ओर प्रेमचंद की कहानियों में अद्वितीय ‘पूस की रात’, ’पंच परमेश्वर’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘नमक का दरोगा’ जैसी कहानियाँ हैं एवं ‘निर्मला’, प्रेमाश्रम’, ‘कायाकल्प’ और ‘गबन’ जैसे सामाजिक कुरीतियों और नारी शोषण पर आधारित उपन्यास हैं। वहीं ‘गोदान’ में उनकी वर्णचेतना, वर्गचेतना तक विस्तृत होती है। ‘गबन’ उपन्यास के अविस्मरणीय चरित्र देवीदीन खटीक, जिसके दो बेटे स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए थे, को आनेवाले राज्य के शासक वर्ग और उसके हाकिम-हुक्कामों के बारे में तगड़ा संशय है- ‘अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे । पहले अपना उद्धार कर लो, गरीबों को लूट कर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है… सच बताओ, तब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है ? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाठ बनाये घूमोगे । इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा ? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा… तुम दिन में पाँच बेर खाना चाहते हो और वह भी बढ़िया माल । गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता । उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है ? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो गरीबों को पीस कर पी जाओगे ।’

सन 1933 में संयुक्त प्रान्त के गर्वनर मालकम हेली ने कहा था कि- ‘जहाँ तक भारत की मनोवृत्ति का हमें परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिये कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिये जवाबदेह हो।’ प्रेमचन्द ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा कि- ‘जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुज़रा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।’ प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्या को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की।

‘प्रेमचंद घर में’ का तेलुगु में अनुवाद

सभी मानवीय सम्‍बन्‍धों में पति-पत्नी का सम्‍बन्‍ध अत्‍यंत घनिष्ट है और अत्यधिक समय तक उनका साथ बना रहता  है। पति की मृत्यु के बाद उनके साथ बिताए जीवन के बारे में ईमानदारी से लिखने का चलन भारतीय साहित्य में कम ही देखने को मिलता है। ‘प्रेमचंद घर में’ में शिवरानी देवी ने यह करके दिखाया।वार्तालाप के माध्यम से अधिक और स्वगत-कथन के रूप में कई जगह उन्होंने जो भी लिखा उन बातों से न केवल प्रेमचंद के महान व्यक्‍ति‍त्‍व का, बल्कि लेखिका की विलक्षण प्रतिभा का भी परिचय मिलता है। कभी-कभी आगे रहकर उन्होंने प्रेमचंद का मार्गदर्शन भी किया था, ऐसे कई उदहारण इस पुस्तक में मिल जाते हैं। शिवरानी देवी की सूझ-बूझ और निडर व्यक्तित्व उभर आता है।

प्रेमचंद से अपरिचित तेलुगु साहित्य प्रेमी विरले ही होंगे। प्रेमचंद घर में पति, पिता के रूप में कैसे थे और शिवरानी देवी और प्रेमचंद का सम्बन्ध कितना विशिष्ट था, यह जानने के लिए सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये।

मूल पुस्तक में दि‍ये गये प्रोफेसर प्रबोध कुमार (प्रेमचंद के नाती) और स्वयं शिवरानी देवी के कुछ शब्दों को भी अनुवाद में लिया गया है।(शिवरानी देवी का पूरा वक्‍तव्‍य और प्रबोध कुमार के, ‘मेरी नानी अम्मा’ से कुछ अंश)।

प्रेमचंद में कहीं भी पुरुष होने का अहंकार नहीं था। वह पत्नी की बहुत इज्ज़त करते थे। उनकी सलाह बात-बात पर लेते थे। अगर किसी विषय में मतभेद रहा भी तो बड़े प्यार से समझाते थे। पत्नी से उन्हें बेहद प्यार था। शि‍वरानी देवी बहुत स्वाभिमानी थीं और प्रेमचंद को प्राणों से भी अधिक मानती थीं। प्रेमचंद की ज़िंदगी और मौत से जूझने वाले समय का उन्होंने ऐसा जीवंत वर्णन किया है कि  पढ़ने वालों  का कलेजा मुँह को आ जाता है। प्रेमचंद के बारे में, उनकी रचनाओं के बारे में, साहित्यिक व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पर शिवरानी देवी की किताब में इन सब बातों  के साथ-साथ बहुत ही अन्तरंग बातें, जो केवल एक पत्नी को ही मालूम होती हैं, उनका ज़िक्र भी किया गया है। पति-पत्नी के बीच सम्‍बन्‍ध कितने सुन्दर, गहरे और प्यार से भरे हो सकते हैं, यह जानने के लिये भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

इस पुस्‍तक का तेलुगु में अनुवाद शांता सुंदरी ने कि‍या है। इसका शीर्षक तेलुगु में ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’ (इम्ट्लो मतलब ‘घर में’) है। पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने से पहले यह धारावाहिक के रूप में ‘भूमिका’ नामक मासिक पत्रिका में, जनवरी 2009 से जुलाई 2012 तक प्रकाशित हुई। पहली क़िस्त के बाद ही कइयों ने इसे बहुत पसंद किया। प्रेमचंद की केवल रचनाओं से परिचित पाठकों को उनके व्यक्तित्व के अन्दर झाँककर उन्हें अच्छी तरह समझाने का अवसर मिला। प्रसिद्ध कवि‍ वरवर राव ने अनुवादक शांता सुंदरी को दो-तीन बार फोन करके बताया की कुछ अंशों को पढ़कर उनकी आँखें नाम हो गयीं। तेलुगु के अग्रणी लेखकों ने इसे पुस्तक रूप में देखने की इच्छा ज़ाहिर की और इसे सम्‍भव बनाया ,हैदराबाद बुक ट्रस्ट की गीता रामास्वामी ने।

पुस्‍तक: ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’
मूल लेखि‍का : शि‍वरानी देवी
अनुवाद : शांता सुंदरी
कुल पन्ने : 274
मूल्य : 120 रुपये
प्रथम संस्करण : सितम्बर, 2012
प्रकाशक : हैदराबाद बुक ट्रस्ट,
प्लाट नंबर 85, बालाजी नगर,
गुडीमलकापुर, हैदराबाद- 500006

प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक : भीमसेन त्‍यागी

प्रेमचंद (31 जुलाई, 1880 - 8 अक्टू्बर, 1936)

कथाकार और संपादक भीमसेन त्‍यागी का यह संपादकीय ‘भारतीय लेखक’ (जनवरी-मार्च, 2006) में प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद की प्रासंगिकता और उनके साहित्‍य की विशेषताओं को समझने में यह सहायक है

प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल पुराना है। अपने जीवन काल में ही वह और उनका साहित्य विवादों के घेरे में आ गए थे और उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्र चिह्न लगने शुरू हो गए थे। ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे कई यश पीडि़त लोगों ने विवाद खड़े किए। तब से यह सिलसिला आज तक जारी है।

इस सवाल के कई चेहरे हैं। प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?  हैं तो क्यों? किस हद तक? और नहीं तो क्यों नहीं?

प्रेमचंद के देहावसान के बाद उनके विरोध की नदी में बाढ़ आ गई। उस समय जो लेखक सृजनरत थे, उनमें से किसी का भी कद प्रेमचंद के निकट नहीं पहुंचता था। उस शिखर व्यक्तित्व के सामने खड़े रह सकने का एक ही विकल्प था यदि वे प्रेमचंद की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकते तो उन्हें घसीट कर छोटा बना दें!

प्रेमचंद के परवर्ती उन लेखकों में प्रमुख थे जैनेंद्र कुमार और सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय। इन दोनों और इनकी शिष्य परंपरा के अन्य लेखकों तथा समीक्षकों ने कभी अप्रत्यक्ष तो कभी प्रत्यक्ष आरोप लगाये कि प्रेमचंद कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा से ज्यादा उन्हें समाज सुधारक माना जा सकता है। उनका लेखन तात्कालिक समस्याओं पर आधारित है। उसमें स्थायित्व नहीं, शाश्वतता नहीं। ऐसा लेखन अल्पजीवी होता है। समस्याओं के समाधान के साथ-साथ अप्रासंगिक हो जाता है।

प्रेमचंद नियोजित ढंग से लिखते थे। हर बड़ी रचना का आरंभ करने से पहले उसका विस्तृत प्रारूप तैयार करते थे। जैनेंद्र ने उनकी इस रचना प्रक्रिया पर भी टिप्पणी की- इस प्रकार की सायास चेष्टा से श्रेष्ठ साहित्य नहीं लिखा जा सकता। श्रेष्ठ साहित्य तो सहज तथा स्वत: स्फूर्त होता है!

एक तरफ प्रेमचंद के परवर्ती लेखक समीक्षक उनके खिलाफ जिहाद करके उनका कद छोटा करने की कोशिश कर रहे थे और दूसरी तरफ उनकी सहज तथा आत्मीय रचनाएं विशाल पाठक समूह के गले का हार बनती जा रही थीं। परवर्ती लेखक तथा समीक्षक प्रेमचंद को खारिज करते रहे और पाठक स्वीकार करते गए। अंतत: साहित्य का निर्णायक और सृजेता का असली माई-बाप तो पाठक ही है। उनकी प्रासंगिकता पर बार-बार प्रश्रचिह्न लगाया जाना, स्वयं उनकी प्रासंगिकता का प्रमाण है। जो लेखक सचमुच प्रासंगिक नहीं बन पाता या नहीं रह जाता, समय उसे बिना किसी शोर शराबे के इतिहास के कूड़ेदान में ढकेल देता है। आज कोई यह सवाल नहीं उठाता कि जैनेंद्र प्रासंगिक हैं या नहीं ? अज्ञेय प्रासंगिक हैं या नहीं? इलाचंद्र जोशी प्रासंगिक हैं या नहीं? भगवती चरण वर्मा प्रासंगिक हैं या नहीं? मोहन राकेश प्रासंगिक हैं या नहीं? और इन सबके साथ चलने वाली समीक्षकों की कतार प्रासंगिक है या नहीं? सवाल उठता है तो सिर्फ एक प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?

प्रेमचंद बड़े लेखक थे। और बड़प्पन अपने साथ उदारता लाता है। प्रेमचंद ने कभी अपने विरोधियों को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं दिया, बल्कि उनके प्रति स्नेहभाव बनाये रखा। जैनेंद्र अपनी कूट शैली में प्रेमचंद का विरोध कर रहे थे और प्रेमचंद ने जैनेंद्र के बारे में घोषणा कर की थी कि वह भारत के भावी गोर्की हैं। लेकिन समय बहुत क्रूर है। वह सबको छान देता है। प्रेमचंद की उदारताजनित भविष्यवाणी जैनेंद्र के किसी काम न आयी। अंतत: समय ने सिद्ध कर दिया कि यदि भारत के गोर्की कोई है तो केवल प्रेमचंद।

प्रश्र किसी एक लेखक की व्यक्तिगत कुंठा अथवा वैमनस्य का नहीं। यह अंतर चेतना के सूक्ष्म धरातल पर होता है। वर्ग विभाजित समाज में हर वर्ग अपनी वाणी को मुखरित करने के लिए अनायास अपने लेखक तैयार कर लेता है। या यों कहें कि लेखक का मानसिक परिवेश जिस वर्ग से जुड़ा होता है, वह अपने लेखन के माध्यम से सहज रूप से उसी वर्ग का हित साधन करता है।

मोटे तौर पर समाज में दो वर्ग हैं। एक सुविधाभोगी अथवा सुविधाकामी वर्ग है, जो अपने लिए अधिकतम सुविधाएं जुटाना चाहता है और इस नेक काम के लिए वृहत्तर समाज को खाद की तरह इस्तेमाल करता है। इस वर्ग के लिए साहित्य दिमागी अय्याशी का मयखाना होता है। इसके लेखक अपने समय के समाज से कटे हुए एकांतभोगी और अंतर्मुख होते हैं। वे अ’छी खासी सुखद स्थितियों में भी दुख खोजते रहते हैं। उनका रचना संसार स्वयं उनके भीतर की कुंठा तथा आत्मश्लाधा पीडि़त दंभ तक सीमित रहता है। अपने समय के समाज से उनका विशेष सरोकार नहीं होता है। सरोकार होता है तो सिर्फ इतना कि वे उस समाज को कैसे इस्तेमाल कर सकें। समाज उनके लिए वह दीवार होता है, जिस पर वे अपनी आत्ममुग्ध तस्वीर टांग सकें।

इसके विपरीत समाज का दूसरा वर्ग सुविधा वंचित और जीवन-स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत होता है। कबीर ने कहा है- ‘सुखिया सब संसार है खावै और सोबै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै।’ समाज का पहला वर्ग और उसके प्रतिनिधि लेखक सुखिया संसार है और दूसरा वर्ग तथा उसके लेखक दुखिया दास कबीर। प्रेमचंद कबीर की इसी औघड़ परंपरा के लेखक थे। उनका रचना संसार समाज के इस छोर से उस छोर तक फैला था। उस समाज के सारे दुख उनके अपने दुख थे। उनके भीतर न जाने कितने होरी और घीसू कुलबुला रहे थे। प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य इस दुख से साक्षात्कार का साहित्य है। साक्षात्कार के अतिरिक्त उस दुख के कारणों की गहरी खोजबीन समाज के विभिन्न वर्गों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अंतर्संबधों की परख और उन्हें बेहतर बना सकने की ललक- ये सब प्रेमचंद की चिंता का विषय थे। वह शाश्वतता के पीछे न भाग कर सार्थक साहित्य के सृजन के पक्षधर थे। शाश्वतता सायास नहीं जुटायी जा सकती। समय की कसौटी पर कसा जाकर ही साहित्य शाश्वत होता है। उपरोक्त दोनों धाराएं आधुनिक हिंदी साहित्य में आरंभ से चली आ रही हैं। पहली धारा के लेखक प्रसाद,  जैनेंद्र,  अज्ञेय,  भगवतीचरण वर्मा,  निर्मल वर्मा,  प्रियंवद आदि हैं तो दूसरी धारा के प्रतिनिधि लेखक हैं- प्रेमचंद, यथपाल, निराला, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत,  भीष्म साहनी,  शेखर जोशी,  संजीव आदि। प्रेमचंद की परंपरा के इन लेखकों ने साहित्य को नये तेवर और नई पहचान दी है।

प्रेमचंद की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर विकासमान रहे। ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे सुधारवादी उपन्यासों से शुरू करके ‘गोदान’ जैसे यथार्थवादी, कालजयी उपन्यास तक पहुंचे। इसी तरह कहानियों में ‘नमक का दरोगा’ जैसी आदर्शवादी कहानियों से शुरू करके ‘नशा’, ‘पूस की रात’, ‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ तक का लंबा सफर तय किया।

इसके विपरीत जो शाश्वत साहित्य को सृजन का दंभ भरते रहे, वे अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर अधोगति को प्राप्त होते रहे। जैनेंद्र तमाम कोशिशों के बावजूद ‘त्यागपत्र’ को नहीं लांघ सके, अज्ञेय का शिखर ‘शेखर’ बन कर रह गया और भगवतीचरण वर्मा ‘चित्रलेखा’ के मोहपाश में ऐसे बंधे कि उससे बेहतर सृजन के लिए मुक्त नहीं हो सके।

प्रेमचंद का देहावसान 1936 में हुआ। उसके बाद के 18 वर्ष लेखकों तथा समीक्षकों द्वारा प्रेमचंद की घोर उपेक्षा के वर्ष थे। ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास की विस्फोटक घटना था। इसने संपूर्ण साहित्य परिदृश्य को बदल दिया। कुंठित तथा दमित व्यक्ति-मन की रचनाएं पृष्ठभूमि में चली गयीं और सामाजिक यथार्थ अपनी संपूर्ण गरिमा के साथ चर्चा के केंद्र में आ गया। यह वह बिंदु था, जहां से प्रेमचंद की प्रासंगिकता की खोज एक नये कोण से आरंभ हुई। उसके पश्चात प्रेमचंद परंपरा के लेखक निरंतर अपने समय के जलते हुए सवालों से जूझते रहे और उन्हें साहित्य में अभिव्‍यक्‍त करते रहे।

प्रेमचंद आम आदमी के लेखक थे और आम आदमी की तरह ही जीते थे। उनकी अपेक्षा दाल-रोटी और तोला भर घी तक सीमित थी। उनकी सादगी में ही महानता थी। ऐसा नहीं कि प्रेमचंद के जीवन में ऐसे अवसर नहीं आये कि वे सुविधाओं का भरपूर उपयोग कर सकें। लेकिन उन्होंने उन अवसरों की तरफ से आंख फेर ली। प्रेमचंद फिल्में लिखने के लिए मुंबई आये तो अच्‍छा-खासा कमा रहे थे। लेकिन मायानगरी का व्यावसायिक माहौल उन्हें रास नहीं आया। वह वापस बनारस लौट आये और अपने लेखन में रत हो गये।

एक तरफ प्रेमचंद की यह जीवन शैली थी और दूसरी तरफ आज का अदना से अदना लेखक वे सब सुविधाएं प्राप्त करना चाहता है, जो अमरीकी लेखक को सुलभ है।

प्रेमचंद साहित्य में ऐसे कौन से तत्व हैं,  जो उसे कालजयी और आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं? इस प्रश्र के मूल तक पहुंचने के लिए उन तत्वों की परख करनी होगी, जो किसी भी साहित्य को कालजयी बनाते हैं। पहला तत्व है- अपने समय की सही पहचान और उसे कलात्मक ढंग से वाणी देना। विश्व के सभी महान लेखक अपने समय के प्रति सचेत रहे। उन्होंने अपनी जनता के दुख-सुख को समझा और उसे कलात्मक अभिव्यक्ति दी। उनके समय को समझने के लिए इतिहास के शुष्क पन्ने उतनी मदद नहीं करते, जितनी कि उन महान लेखकों का साहित्य। वह साहित्य एक परंपरा के रूप में विकसित होता है और आने वाली पीढिय़ों को बीते समय से सबक लेकर अपने जीवन को ढालने और तराशने में मदद करता है। वह साहित्य शताब्दियों तक प्रासंगिक बना रहता है। इसी कारण वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, शेक्सपियर, टाल्सटाय, लू-शुन जैसे महान लेखक आज भी प्रासंगिक हैं। भारत में इस शताब्दी में वह काम जितने प्रभावी ढंग से प्रेमचंद ने किया, उतने प्रभावी ढंग से संभवत: और कोई लेखक नहीं कर सका।

दूसरा तत्व है- लेखक का समकालीन विश्व साहित्य से निकटता स्थापित करना और अपनी रचनाशीलता को उसके समकक्ष ले जाने में समर्थ होना। प्रेमचंद अपने समय के विश्वस्तरीय लेखकों का सूक्ष्य अध्ययन करते थे और इसी माध्यम से उनके साथ पारिवारिक ऊष्मा अनुभव करते थे। वह सबसे अधिक मक्सिम गोर्की से प्रभावित थे। गोर्की की मृत्यु के समाचार से वह विह्वल हो उठे थे।

उन दिनों प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार थे। उनकी पत्नी शिवरानी देवी ‘प्रेमचंद घर में’ लिखती हैं: ‘‘गोर्की की मौत पर ‘आज’ आफिस में मीटिंग होने वाली थी।… उन दिनों मुझे भी रात को नींद नहीं आती थी। मेरी आंख खुली तो देखा कि आप जमीन पर बैठे कुछ लिख रहे हैं। मैं बोली-आप क्या कर रहे हैं?’

‘बोले-कुछ नहीं।‘

‘मैं बोली- नहीं, कुछ तो जरूर लिख रहे हैं।‘

‘आप बोले- नींद नहीं आती तो क्या करूं? भाषण तो लिखना ही पड़ता।‘

‘मैं बोली- जब तबियत ठीक नहीं तो भाषण कैसे लिखा जाएगा?’

‘आप बोले- जरूरी है। बिना लिखे काम नहीं चलेगा…’

‘मैंने देखा कि लिखते समय उनकी आंखों में आंसू थे।‘

‘सुबह हुई। दूसरे दिन मीटिंग में जाने को तैयार हुए तो बोली- आप चल तो सकते नहीं। फिजूल में जा रहे हैं।‘

‘आप बोले- तांगे पर जाना है। पैदल तो जा नहीं रहा हूं।‘

‘मैंने उनके साथ में बड़े लड़के को भेज दिया। नीचे तक खुद पहुंचाने आयी। मैं डर रही थी कि कहीं जीने पर से ये गिर न जाएं।‘

‘जब वे वहां से लौटे तो मैं फिर दरवाजे पर मिली। वे ऊपर चढऩे लगे तो उनके पैर लडख़ड़ा गये। ऊपर आने पर चारपायी पर लेट गये… जब वे कुछ सुस्ता लिये, तब बोले- मैं वहां खड़ा न हो सका, भाषण पढऩा तो दूर रहा। एक और महाशय से भाषण पढ़वाया।‘

‘मैं बोली- मेरा कहा आप मानें तब न।‘

‘आप बोले- गोर्की के मरने से मुझे बहुत दुख हुआ। गोर्की की जगह लेने वाला कोई नहीं रहा।‘

‘गोर्की के मरने की चर्चा वे कई दिनों तक करते रहे। जब-जब गोर्की के विषय में बाते करते, तब तब उनके हृदय में एक प्रकार का दर्द-सा उठता दिखायी पड़ता… वही उनका अंतिम भाषण था… कौन जानता था कि दो महीने भी बीतने नहीं पायेंगे कि वह खुद चले जाएंगे…।‘

प्रेमचंद गोर्की से कभी नहीं मिले थे। लेकिन उनकी रचनाओं के माध्यम से ही इतना गहरा भावनात्मक जुड़ाव अनुभव करते थे, जितना निकट आत्मीय जानों से होता है। गोर्की के न रहने पर वह मर्मांतक पीड़ा से ग्रस्त हो गये। यह पीड़ा गोर्की के माध्यम से विश्व के उन असंख्य पीडि़त तथा दमित नागरिकों के प्रति भी थी, जिनके लिए गोर्की और स्वयं प्रेमचंद जिये और मरे।

किसी लेखक के महान और कालजयी होने की परख का तीसरा बिंदु- उसकी भविष्य में झांक सकने की क्षमता।

प्रेमचंद की एक कहानी का पात्र कहता है- स्वराज्य के आने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि जॉन की जगह गोविंद गद्दी पर बैठ जाए। जब तक पूरी व्यवस्था को न बदला जाए, आम लोगों का भला नहीं होगा।

इस पात्र के मुंह से प्रेमचंद का भविष्यद्रष्‍टा बोल रहा है। उन्होंने अपने वैज्ञानिक चिंतन के आधार पर भविष्य दर्शन कर लिया था। आखिर हुआ क्या? आजादी के नाम पर जॉन की जगह गोविंद और फिर उसके वंशज गद्दी पर बैठते गये लेकिन आम लोगों का भला नहीं हो सका। प्रेमचंद की यह भविष्य दृष्टि  उनकी दूसरी रचनाओं में भी मौजूद है। और यह दृष्टि ही उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं।

वर्तमान संदर्भ में प्रेमचंद की प्रासंगिकता को समझने के लिए आज के राजनीतिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक गणित को गहराई से समझना होगा। आज का विश्व समाज मुख्य रूप से साम्राज्यवाद की गिरफ्त में है। सोवियत रूस के पतन के पश्चात अमेरिका एकमात्र महाशक्ति रह गया है और इस अवसर का लाभ उठाकर वह समूचे विश्व में शोषण की कुटिल नीतियों का जाल फैला रहा है। कुछ संपन्न राष्ट्र उसके सहभागी हैं और अधिकांश देश खास तौर से तीसरी दुनिया के देश इस शोषण के शिकार। बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशनें स्थानीय उद्योगों को चौपट कर रही हैं और आटोमेशन के कारण बेरोजगारी की दर भयानक रूप से बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से गरीबी और भुखमरी बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुएं समाज के एक सीमित वर्ग के लिए सुरक्षित हो गयी हैं। समाज का शेष बहुसंख्यक वर्ग उन वस्तुओं के सपने देखने और फिर सपनों के टूटने की पीड़ा झेलने के लिए अभिशप्त है।

टीवी चैनलों के माध्यम से अमेरिकी साम्राज्यवाद सीधे हमारे घरों में घुस आया है और उसकी जारज संताने भ्रष्टाचार, अपराध तथा अपसंस्कृति, खुलकर नंगा नाच रही हैं। आधुनिकता तथा उत्‍तर आधुनिकता के इस घटाटोय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता खोजना एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं।

साम्राज्यवादी शोषण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल का बीज महाजनी सभ्यता में है। उसी महाजनी सम्यता में, जिसके वास्तविक रूप को सबसे पहले प्रेमचंद ने पहचाना। यहां प्रेमचंद का भविष्य–द्रष्‍टा फिर सामने आता है। स्वतंत्रता के दो-तीन दशक पूर्व ही उन्होंने देश की भावी दिशा को पहचान लिया था।

तीसरी दुनिया के देशों में जिनमें भारत भी एक है साम्राज्यवादी नीतियों के साथ-साथ सामंती मूल्य भी अपनी जकड़ बनाये हुए हैं। हम अर्धउपनिवेशी तथा अर्धसामंती स्थितियों में जी रहे हैं। प्रेमचंद ने इन दोनों समाजविरोधी शक्तियों को ठीक समय पर पहचान लिया था। उनका साहित्य इन दोनों महाशक्तियों के विरोध का साहित्य है।

प्रेमचंद के समय से अब तक गंगा में बहुत सा पानी बह गया है। जमाने ने रह-रहकर करवटें बदली हैं। लेकिन ये सब करवटें ऊपरी सतह पर, कायिक स्तर पर थीं। आत्मिक स्तर पर, सांस्कारिक स्तर पर देश उन्हीं मूल्यों से निर्देशित होता रहा। शहरों में और किसी हद तक गांवों में भी जो चमक-दमक नजर आती है, वह केवल ऊपरी पालिश है, भीतर वही शोषण का शिकंजा कसा है। आदमी जब-जब इस शिकंजे को ढीला करना चाहेगा, शोषण से मुक्त समाज की रचना करना चाहेगा तो उसे लौट कर प्रेमचंद के पास जाना होगा। प्रेमचंद की यह विशेषता ही उन्हें अत्याधुनिक तथा प्रासंगिक बनाती है।