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कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।

हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेमपाल शर्मा

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देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है। ‘विज्ञान और हम’ उनकी नई पुस्‍तक है। असल में, हर लेखक पहले स्थानीय होता है, उसके बाद ग्‍लोबल। अंग्रेजी में इसके लिए एक प्रचलित वाक्य है- लोकल इज ग्लोबल। ‘विज्ञान और हम’ में देवेन्द्र मेवाड़ी ने इसलि‍ए सबसे पहले अपने गाँव, बचपन की बातें बच्चों को बताई हैं, स्‍थानीय भाषा की सुगंध और स्वाद के साथ। स्थानीयता का यह स्पर्श एक अलग मिठास पैदा करता है। किताब और लेखन में चस्का ऐसी ही शुरुआत से पैदा होता है। साधारणीकरण का यह ढंग ही पाठकों में असाधारण पैठ बनाता है। विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के बीच ले जाने के लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती।

पता नहीं यह हमारी शिक्षा पद्धति का दोष हे या उस समाज का जो जीवन को सामान्‍य तर्क से समझने के बजाय उसे पढ़ाई के नाम पर इतना भारी-भरकम उबाऊ बना देता है कि विज्ञान की मोटी-मोटी डिग्रियों वाले भी विज्ञान की सामान्‍य समझ में शून्‍य होते हैं। क्‍या यह कोई अलग से पढ़ने-पढ़ाने, रटने की चीज है? क्‍या रोज आप आकाश में सौरमंडल नहीं देखते? दिन में सूरज उगते ही सारा आकाश चन्‍द्रमा सहित गायब। कितने किस्‍से, रोचक कहानियां गड़ी गई हैं कि‍ताब में। चंदा मामा और इन सितारों के आसपास सदियों से गांवों के किसानों का जीवन और समय का अंदाज इन्‍हीं तारों- हि‍न्नी पैना, सप्तश्री, ध्रुव और उपग्रह चांद के आकार से चलता रहा है। देवेन्द्र मेवाड़ी ने बड़ी सहजता से कोपर्निकस, गैलिलियो, उनकी खोजी दूरबीन आदि‍ के कि‍स्सों के सहारे पूरे सौरमंडल को समझाया है। क्या इस लेख को पढ़ने के बाद बच्चों को कोई चंदामामा की कहानी से गुमराह कर सकता है? शायद नहीं। हां, कविता कहानी में इनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी। विज्ञान और गल्प में यही अंतर है।

अगले लेख में मेवाड़ी जी आकाश से जमीन पर उतरते हैं। एक लंबे पत्र के माध्यम से पृथ्वी, पहाड़ और उसकी पूरी संरचना का एक-एक विवरण देते हैं। रोचकता को बनाए रखने के लिए एलियन भी वहां है, पृथ्वीवासियों को सलाह देते हुए कि कल-कारखाने के धुएं से पूरे वातावरण को बचाने की जरूरत है। बातों ही बातों में पत्र के माध्‍यम से कहना और प्रभावी बना देता है। इससे पत्र लिखने की शिक्षा तो बच्‍चों को मिलेगी ही।

आकाश, धरती के बाद मेवाड़ी जी बच्‍चों को समंदर की सैर कराते हैं- ‘समंदर के अंदर है अनोखी दुनिया’ लेख में। कम रहस्‍यमय नहीं है समन्‍दर। हालांकि कई बच्चों ने समुद्र साक्षात नहीं देखा होगा, लेकिन मीडिया की दुनिया ने क्‍या संभव नहीं बना दिया और शेष पूर्ति यह लेख करता है, एक-एक विवरण के साथ। मछुआरों के साहस, डार्विन ओर उनका जहाज बीगल, समुद्र में रहने वाले लाखों जीवों, वनस्‍पतियों की प्रजातियां। स्‍पंज प्रवाल से लेकर केकड़े, मछली जैलीफिश, व्‍हेल, डाल्फिन-समुद्र की इतनी बडी़ दुनिया। पढ़ते-पढ़ते बच्‍चों का कौतूहल आकाश छूने लगेगा। पूरी प्रमाणिक जानकारी भरा लेख।

‘क्यों तपती है इतनी धरती’ लेख तो देश के मौजूदा सूखे के संकट की याद दिला देता है। नंदू, शेफाली, गार्गी विक्रम, देवीदा की बातों से जो शिक्षा मिलेगी, वह भारी भरकम लेखों से नहीं मि‍ल सकती। ऐसे लेखों की सहजता बच्‍चों पर स्‍थायी असर छोड़ती है और यही विज्ञान लेखक देवेन्‍द्र मेवाड़ी का उद्देश्‍य है। हालांकि ऐसे लेखों की लंबाई कुछ कम होती तो और भी अच्‍छा होता। ‘कैसे कैसे मेघ,’ ‘लो आ गया वंसत’ बच्‍चों के लिए ऐसी ही जानकारि‍यों से भरपूर लेख हैं। पंछियों (पक्षियों) से बच्‍चों को विशेष लगाव होता है, गांव के बच्‍चों को और भी ज्‍यादा। आंगन में फुदकती तरह-तरह की चि‍डि़यों को कौन बच्‍चा भूल सकता है? गायब होती गौरया की चिंता, हम सबकी चिंता है। ‘उड़ गयी गौरियां’ (1 मई 2012) और ‘पेड़ों को प्रणाम’ (5 जून 2012) को लेख के बजाय ‘डायरी’ खंड में रखा जाना चाहिए। देवेन्‍द्र मेवाड़ी की एक और पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ बच्‍चों को बहुत सहज ढंग से अपनी दिनचर्या में घटित अनेक वैज्ञानिक बातों, निरीक्षणों और निष्‍कर्षों को लिखने का मौका देती है। अच्छी शिक्षा ऐसी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है।

बच्चों के जीवन में सैर सपाटा, यात्रा न हो तो मजा ही क्‍या। ‘फूलों की घाटी में’ और ‘बच्चों का वि‍ज्ञान और कवि का कबूतर’ यात्रा-कथा का आनंद देते हैं। ‘ताबीज’ और ‘पर्यावरण के प्रहरी’ जैसे दो छोटे नाटकों को शामिल करने से पुस्तक की उपयोगिता और बढ़ गई है। पुस्तक में तीन वैज्ञानि‍कों की जीवनी भी दी गई है।

ऐसी पुस्तकों को केवल विज्ञान के खांचों में रखना, उनके असर को सीमित करना है। यह पुस्तक बच्चों को उनके पूरे परिवेश से जोड़ती है और साथ ही शिक्षा और शिक्षण की विविध विधाओं– लेख, डायरी, यात्रा, नाटक, कविता और जीवनी से भी। शि‍क्षा का मूल मंत्र भी तो बच्चों को उनके परिवेश से जोड़कर शिक्षित करना है। पुस्तक में हरे जंगल का कवर तो मंत्रमुग्धकारी है ही।

(बालवाणी, नवम्बर-दि‍सम्बर, 2016 से साभार)

पुस्तक: विज्ञान और हम
लेखक : देवेन्द्र मेवाड़ी
कीमत:140, सजिल्द- 260/- रुपये
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजियाबाद-20014
Email- anuraglekhak@gmail.com

गंभीर सवालों में शिक्षा : प्रेमपाल शर्मा

suicide

कोटा और दूसरे शहरों में आत्महत्या की खबरों को हत्या कहना ज्यादा सही होगा। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी किसी खबर या घटना पर देश के पुरस्कृत लेखक, बुद्धिजीवियों, कलाकारों ने कभी कोई प्रतिक्रिया न दी, न देंगे। इससे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा क्या हो सकता है, जब बच्चे कुछ आरोपित सपनों को पूरा न कर पाने की हताशा में मां-बाप, समाज, दोस्तों की टेढ़ी, व्यंग्य भरी नजरों से भयभीत अपनी ही जान दे देते हैं। बरसों से यह हो रहा है। मगर इस साल तो अति ही हो गई है। अभी तक अकेले कोटा शहर में दो दर्जन आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। मान कर चलिए कि इससे कई गुना ज्यादा होंगे। दूसरे शहरों में भी और जिन्हें लोकलाज से छिपाया भी जाता रहता है। आखिर दोष किसका है? बच्चों का तो कतई नहीं। वे तो कच्चे मिट्टी हैं जैसा ढालोगे, पकाओगे वैसा ही वे बनेंगे। आत्महत्या से पहले छिपाकर छोड़ी गई पर्चियां दिल दहलाने वाली हैं। ‘यदि मम्मी सेलेक्शन नहीं हुआ तो किसी से नजरें नहीं मिला पाऊंगी। मैं चाहती थी कि आप मुझ पर गर्व करें।’ एक और पर्ची की इबारत, ‘मां मैं बहुत प्रेशर में था। पापा के पैसे भी बर्बाद हुए। मैं मजबूर हूं।’ कोई और देश होता तो पूरा समाज तंत्र सड़कों पर उतर आता।

बीस बरस पहले लंदन के नजदीक एक बच्चे की स्कूल में लाश मिली थी तो हफ्तों अखबारों में यह मौत सुर्खियों में रही थी। यहां पसरी चुप्पी बताती है कि हम सब इन आत्महत्याओं के दोषी हैं। उन्हें उकसाते हैं। दुनिया के सामने हमारे सारे बड़बोले राजनेता इस बात पर तो इतराते हैं कि दुनिया की सबसे नौजवान आबादी भारत में है, लेकिन क्या इन नौजवानों के सपनों को कोई जगह व्यवस्था दे पा रही है? न पढ़ने के लिए पर्याप्त मेडिकल कॉलेज, न अच्छे इंजीनियरिंग या दूसरे शोध संस्थान। आइआइटी जैसे संस्थान कुछ ब्रांड बन गए हैं, लेकिन चौदह लाख परीक्षा देने वाले और सीट मात्र दस हजार। वह भी पिछले कुछ वर्षो में बढ़ी हैं। फिर शेष कहां जाएंगे? दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा। बचे हुए कॉलेजों में फीस तो पूरी मगर न शिक्षक, न कोई पढ़ने की सुविधा। क्यों राज्य दर राज्य सरकारें इतनी नाकारा बन चुकी हैं जो इन कालेजों को ठीक नहीं कर सकतीं, स्कूल तक नहीं चला सकतीं। क्यों कोटा की इन आत्महत्याओं में नब्बे प्रतिशत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों से ही हैं? दबाव या अपराध मां-बाप का।

जब इंजीनियरिंग की डिग्री में पूछ सिर्फ आइआइटी, एनआइटी की बची है तो बच्चे के कानों पर स्कूल के दिनों से ही गूंजने लगते हैं ये शब्द। सपनों, महत्वाकांक्षाओं, गर्वीले भविष्य से धकेले जाते ये बच्चे पहुंच तो गए कोटा जैसे कोचिंग संस्थानों में, लेकिन क्या उस माहौल में रातों-रात फिट हो जाना इतना आसान है? ये मानवीय आत्माएं हैं, निर्जीव रोबोट नहीं। हर कोशिश के बावजूद हजारों बच्चे हताश, निराश, एकाकीपन के कुएं की तरफ बढ़ते जाते हैं।

एक अनुमान के अनुसार मेडिकल, इंजीनियरों की कोचिंग ले रहे लगभग बीस प्रतिशत बच्चे पढ़ाई से हटकर इन व्यसनों की गिरफ्त में आ जाते हैं। दिन-रात वही गणित, भौतिक, रसायन के फॉर्मूले रटते-रटते मानसिक रोगी भी कई बच्चे हो चुके हैं।

यहां शिक्षाविद प्रोफेसर यशपाल की वर्ष 1992 की रिपोर्ट की बातें याद आती हैं। ‘जो बच्चे नहीं चुने जा पाते वे तो पूरी उम्र के लिए कुंठित होते ही हैं, चुने जाने वाले भी इस रटंत पद्वति के चलते बहुत अच्छा नहीं कर पाते। इसका हल पूरी शिक्षा व्यवस्था में ढूंढ़ना होगा और तुरंत। आइआइटी की परीक्षा में पिछले दस बरस में दसियों बार अनगिनत परिवर्तन किए गए हैं। कभी दो चरण कभी तीन, कभी आब्जेक्टिव पर जोर तो कभी 12वीं के नंबरों पर। शिक्षा व्यवस्था में जितने डॉक्टर उतनी तरह की दवाइयां, ऑपरेशन, सर्जरी। मंत्री या तो वे हैं जो हॉवर्ड और कैंब्रिज में पढ़े हैं या वे जो जाति, धर्म के आंकड़ों को ही बांच सकते हैं। आश्चर्य है कि ये दोनों ही पक्ष चुप्पी साधे हैं। नतीजा-न कोचिंग कम हुई, न दूर-दूर के गांवों, कस्बों से कोचिंग के मक्का-मदीना की तरफ बढ़ता पलायन। बढ़ती आत्महत्याओं से भी शिक्षा के नियंताओं के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, क्योंकि इससे वोटों की फसल पर कोई असर नहीं होगा।

गनीमत है कि इन्होंने इन आत्महत्याओं में जाति और धर्म की गिनती नहीं की। इससे भी बुरा पक्ष है देश के इन शीर्ष संस्थानों में पहुंचने वाले छात्रों की प्रतिभा पर प्रश्नचिन्ह। दुनिया भर से मिल रही रिपोर्ट बता रही है कि ये शीर्ष संस्थान लगातार पिछड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पहले एक वैज्ञानिक पत्रकार का कहना था कि आखिर क्या कारण है कि इन शीर्ष संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों में कल्पनाशीलता, अन्वेषण और रचनात्मकता निरंतर ह्रास पर है। पिछले वर्ष आइआइटी रुड़की में पहले ही वर्ष में सत्तर छात्रों का फेल होना क्या बताता है? अंग्रेजी का कहर तो है ही, रटंत शिक्षा की सीमाएं भी साफ हैं। फिर भी इनमें पहुंचने की उतावली या हताशा में आत्महत्याएं?

प्रतिस्पर्धा कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में वे बुनियादी परिवर्तन लाने होंगे जो बच्चों को इतना मजबूत बनाएं कि जीवन में किसी एक-दो परीक्षाओं में पास-फेल होना कोई मायने नहीं रखता। डार्विन, आइंस्टीन से लेकर प्रेमचंद, मंटो की वे जीवनियां पढ़ाई जाएं जिनसे ये जान सकें कि स्कूल या प्रतियोगिता में कुछ नंबरों के कम-ज्यादा होने से खास फर्क नहीं पड़ता। और बच्चों से ज्यादा जरूरी है उनके मां-बाप, स्कूल के टीचरों की मानसिकता को बदलना कि तुम अपने नकली सपनों की खातिर क्यों इन लाड़लों की कुर्बानी देने पर तुले हुए हो। दुनिया भर के शिक्षाविद उस शिक्षा के हिमायती रहे हैं जहां बच्चा मस्ती से पढ़े स्कूल आए, न कि स्कूल और इन कोचिंग संस्थानों की कैद में हताश हो। यूरोप, अमेरिका आदि ने शिक्षा व्यवस्था की इस चूहा दौड़ से बचने के लिए ठोस कदम उठाए हैं और इसका फायदा पूरे समाज को मिल रहा है। लेकिन हमारे यहां तो सामाजिक न्याय और विकास के नाम पर वे बातें जारी हैं जिन पर 15वीं सदी भी शरमा जाए।

सरकारी स्कू ल और सरकार : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अद्भुत फैसला सुनाया है कि तमाम राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों को अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाने होंगे। यदि यह आदेश कार्यान्वित हो गया तो देश की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं पूरी व्यवस्था का कायाकल्प हो जाएगा। ‘जाके पांव न फटी विवाई वो क्या जाने पीर पराई’ कोर्ट ने इसी मुहावरे को साकार करते हुए यह निर्णय दिया है। वरना स्कूलों में नकल हो तो सरकार की बला से। बच्चों के सिर पर छत न हो तो कोई असर नहीं। लड़कियों के लिए शौचालय न हो तो इनके चेहरे पर शिकन नहीं, क्योंकि उनके बच्चे तो अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और वहां से फुर्र से उड़ जाएंगे इंग्लैंड, अमेरिका। नेता और अफसर दोनों मौसेरे भाई हैं, कोर्ट की नजरों में। अच्छा हुआ कोर्ट ने दोनों को एक साथ पकड़ा है।

यहां पहले एक अनुभव। सरकार और सरकारी स्कूलों के खिलाफ गुस्से का ऐसा तीखा अनुभव मेरी कल्पना से बाहर था। दिल्ली में पटरी पर सब्जी बेचने वाले को मैंने सुझाव दिया कि वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिल कराए। उसका आक्रोशित प्रति प्रश्न था, ‘आपके बच्चे कहां पढ़ते हैं? आप तो सरकारी कर्मचारी हैं फिर सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते। क्या हम नहीं पढ़ा सकते अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में?’ खिसियाने के सिवाय मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। यह है सरकारी व्यवस्था का आलम। यानी जहां जितनी ज्यादा सरकार उतना ही निकम्मापन, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, मुकदमे, जातिवाद, अहंकार। सरकारी कर्मचारियों ने कभी अपनी खोल से बाहर झांकने की कोशिश ही नहीं की। क्यों करें जब सारी सुविधाओं के साथ, नौकरी की सुरक्षा है। तकनीक ने सारी सुविधा दी हैं। तुरंत टाइपिंग, फोटोकॉपी, ई-मेल लेकिन फाइलों की स्पीड और धीमी होती गई। सौ साल में पढ़ने-पढ़ाने के रंग-ढंग सुधरने के बजाय और बिगड़ गए हैं।

अच्छा हो यदि कोर्ट का यह आदेश दूसरे सरकारी कर्मचारियों के संदर्भ में सरकारी अस्पतालों पर भी लागू हो। क्या डॉक्टरों का काम सिर्फ मरीजों को निजी अस्पतालों की तरफ भेजने के लिए ही बचा है। हमारे कई दोस्तों का तर्क है कि सरकारी दक्षता में कोई कमी नहीं है। क्या वाकई? यदि ऐसा है तो फिर क्यों नहीं ये सब इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को मानते? फिर तो इस आदेश से इन सब की बांछें खिल जानी चाहिए। मुंह क्यों लटका रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ाना उन्हें सजा दिखाई दे रही है। आखिर इस दुर्गति तक तुम्हीं ने तो पहुंचाया है।

हर शाख की यही दास्तान है। कभी रेलवे के अपने चार सौ से ज्यादा स्कूल थे। एक से एक अच्छे। आज मुश्किल से सौ स्कूल बचे हैं और वे भी अंतिम सांस गिन रहे हैं। लाल बहादुर शास्त्री मुगलसराय के रेलवे स्कूल में पढ़े थे तो सैकड़ों रक्षा रेलवे के अफसर भी। मसूरी का मशहूर स्कूल ओकग्रोव 1888 में अंग्रेजी सरकार ने रेलवे के अफसरों के लिए बनाया था। आज शायद ही कोई रेल का अफसर वहां पढ़ाता हो अपने बच्चों को। काश! कोर्ट यह आदेश भी दे कि केंद्र सरकार समेत रेलवे के कर्मचारी भी अपने बच्चों को रेलवे के स्कूलों में ही पढ़ाएंगे तो ये भी रातों रात ठीक हो जाएंगे। आखिर ये शिक्षक और स्कूल भी तो उसी देश के हैं जिसके दिल्ली, मेट्रो, कोंकण रेलवे और बैंक के कर्मचारी। ये भी तो ठीक काम कर रहे हैं। व्यवस्था तभी सुधरेगी जब इसका क्रीमीलेयर सुधरेगा। इसमें सरकारी कर्मचारी और राजनेताओं की अच्छी तादाद है। दुनिया भर में राजा के रसोईयों को अपना बनाया हुआ खाना खुद खाना पड़ता है। हमारे यहां सरकारी कर्मचारी सिर्फ दूसरों के लिए ही बनाते हैं और फिर उतनी ही बेशर्मी से कह देते हैं कि ये शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। क्या कभी आम लोगों की समस्याओं को जानने-समझने की कोशिश उन्होंने की? वे हारकर महंगे स्कूल की तरफ उसी निराशा, गुस्से में जाते हैं जैसे दिल्ली का सब्जी वाला। क्या कभी किसी राजनीतिक पार्टी, ब्राव0161ाण सभा, दलित उद्धारक मंच, आयोग ने यह पूछा कि हमारी सरकार इतनी सुस्त गैर-जिम्मेदार क्यों? क्यों भूलते हो कि सरकार बचेगी तो देश बचेगा और उसी में हम सब। वरना सभी डूबने के कगार पर हैं। दुष्यंत कुमार की गजल की लाइन याद आ रही है- मौत की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं। आरक्षण, संसद, न्यायपालिका के प्रसंग में संविधान की दुहाई देने वालों से भी प्रश्न है कि क्या ऐसी असमान शिक्षा से संविधान की आत्मा का हनन नहीं होता? समान शिक्षा और अपनी भाषा के लिए हम सड़कों पर क्यों नहीं उतरते?

लगभग तीन वर्ष पहले तमिलनाडु के एक नौजवान कलक्टर ने लीक से हटकर एक आदर्श प्रस्तुत किया था। अपनी चार वर्षीय बेटी के दाखिले के लिए वह आम जनता की तरह सरकारी स्कूल की लाइन में लगे थे। किसी ने पहचान लिया और जैसा कि स्वाभाविक था अफरा-तफरी मच गई। कलक्टर साहब का जवाब था- ‘मैं ऐसे ही सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं। मेरे बच्चे भी आम नागरिक की तरह वहीं पढ़ेंगे।’ बताते हैं कि इस घटना के बाद न केवल उस स्कूल, बल्कि तमिलनाडु के अन्य स्कूलों में आश्चर्यजनक सुधार हुए हैं। क्या हंिदूी पट्टी और दूसरे राज्यों में भी बिना कोर्ट के आदेश के कोई ऐसा उदाहरण बनेगा?
निजीकरण की आंधी का सबसे बुरा असर शिक्षा पर पड़ा है। बीस बरस पहले 80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूलों में थे। आज केवल 50 प्रतिशत रह गए हैं। इसलिए सरकारी अफसर, नेता और निजी स्कूलों का प्रबंधन हाई कोर्ट के आदेश को हर हाल में चुनौती देंगे। समान शिक्षा के सभी पैरोकारों को राष्ट्रीय स्तर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के पक्ष में तुरंत गोलबंद और सक्रिय होने की जरूरत है।

उच्च शिक्षा की भाषा : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharmaभला हो इस देश के अखबारों का जिन्होंने यह खबर मुख्य पृष्ठ पर छापी कि देश के एक प्रमुख शिक्षण संस्थान आइआइटी, रुड़की में पहले वर्ष में 72 छात्र फेल हो गए हैं। कोर्ट-कचहरी में मुकदमेबाजी के बाद संस्थान ने एक और मौका देने का तो फैसला कर लिया है, लेकिन कुछ प्रश्नों का जवाब पूरी शिक्षा व्यवस्था और राजनीति नहीं दे पा रही। अखबारों से छनकर जो तथ्य आ रहे हैं, उनसे साफ जाहिर है कि पढ़ाई का अंग्रेजी माहौल इनकी असफलता का सबसे प्रमुख कारण है। इस खबर पर विशेषकर अंग्रेजी मीडिया क्यों चुप रहा? फिर जब संसद चल रही हो तो वहां इस पर बहस क्यों नहीं उठी? कहां गए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी भाषा राज्यों की आवाजें? हिंदी को सबसे ज्यादा धोखा दे रहे हैं, तो हिंदी प्रांत। रुड़की आज भले ही उत्तराखंड में हो, कल तक उत्तर प्रदेश में ही था। क्या इस घटना पर इन राज्यों की विधानसभाओं में बात उठेगी? भाषा के मुद्दे पर तो कतई नहीं उठेगी। बहिष्कार होगा तो फेल हुए छात्रों की जाति के मुद्दे पर जो पूरे विमर्श को ही न केवल पटरी से उतार देगा, बल्कि उसे विरूपित भी कर देगा। दिल्ली के एम्स के मामले में भी यही हुआ था। पांच बरस पहले डॉक्टरी पढ़ रहे अनिल मीणा ने आत्महत्या के साथ यह पत्र छोड़ा था कि मुझे अंग्रेजी न आने की वजह से कुछ भी समझ में नहीं आता। यहां का पूरा माहौल अंग्रेजीदॉ है। मैं आखिर क्या करूं? भारतीय राजनीति ने शिक्षा के इतने संवेदनशील मुद्दे को भी जाति की भेंट चढ़ा दिया।

शायद ही दुनिया के किसी देश में ऐसी मेधावी पीढ़ी ऐसे मसलों पर मजबूर होकर आत्महत्या की तरफ बढ़ती हो। तीन साल पहले लखनऊ की एक छात्र ने भी अंग्रेजी न जानने के कारण ऐसा ही कदम उठाया था। फेल हुए ये अधिकांश छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। बारहवीं तक विज्ञान, गणित, सभी उस कुछ हिंदी माध्यम में पढ़ा, जो उनके लिए संभव थी। मेहनत और प्रतिभा के बूते आइआइटी में चुने गए। वे सब एक स्वर से कह रहे हैं कि आइआइटी में हमारी सबसे बड़ी समस्या सिर्फ अंग्रेजी है। प्रोफेसर अंग्रेजी में पढ़ाते हैं, किताबें अमेरिकी लेखकों की। हमारे आसपास के ज्यादातर बच्चे सिर्फ अंग्रेजी में प्रश्न करते और बोलते हैं। ऐसे माहौल में हम प्रश्न पूछने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते। धीरे-धीरे क्लास में आने का भी मन नहीं करता। नतीजा यह हुआ कि पिछड़ते चले गए। रुड़की का संस्थान बाकी देश के अन्य संस्थाओं की तरह कितने भी तर्क दे कि इनकी मदद से लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं, सीनियर छात्रों में से कुछ मेंटर के रूप में मदद करते हैं या कि अंग्रेजी सिखाने के विशेष इंतजाम किए गए हैं, लेकिन ये ज्यादातर बातें थोथी और कागजी हैं। सिर्फ भाषा की ही बात की जाए तो जो बच्चे सीमित सुविधाओं में अपनी भाषा में पढ़कर यहां तक पहुंचे हैं, उनसे रातों-रात आप ऐसी फर्राटेदार अंग्रेजी की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं और क्यों? क्या कोई भी दो-चार महीनों में अंग्रेजी सीख सकता है? हमारे संस्थानों को तुरंत अंग्रेजी के इस माहौल को बदलने की जरूरत है वरना देश की सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं का गला घोंटने में देर नहीं लगेगी।

कुछ कदम तुरंत उठाने की जरूरत है और यहां हम दक्षिण के तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों से भी सीख सकते हैं। पहले वर्ष में ऐसी सभी संस्थानों में अंग्रेजी और प्रांतीय भाषा पर विशेष ध्यान दिया जाए। भाषा ज्ञान सिर्फ साहित्य पढ़ने के लिए आवश्यक नहीं होता। गणित, भौतिकी, इंजीनियरिंग जैसे विषयों को भी तो किसी-न-किसी भाषा के माध्यम से ही पढ़ना, समझना होता है। इसलिए दोनों भाषाओं की समझ से इन छात्रों की रचनात्मकता बेहतर निखर कर आएगी। दुर्भाग्य से देश के सभी संस्थानों में भाषा शिक्षण को दूसरे-तीसरे दर्जे का भी महत्व नहीं मिल रहा और इसीलिए यह हमारी शिक्षा व्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष बन रहा है। सारी रचनात्मकता, अन्वेषण समझ को चौपट करता हुआ। पिछले दिनों लगातार इस बात को रेखांकित किया जाता रहा है कि हमारे इन उच्च संस्थानों के छात्र देश, समाज और उनकी समस्याओं से कटे हुए हैं। कौन जिम्मेदार हैं? आपके कॉलेज, स्कूल की भाषा ही उसे धीरे-धीरे दूर कर देती है। केवल देश की भाषा की इन प्रतिभाओं को उन समस्याओं और उनके समाधान से जोड़ेगी जिनके लिए ये करोड़ों के संस्थान बनाए गए हैं। कम-से-कम विदेशों की तरफ भागने और इनकी अंग्रेजी के लिए तो भारत की गरीब जनता टैक्स नहीं दे रही। शिक्षा, भाषा की उपेक्षा से ये प्रश्न इतना जटिल रूप ले चुके हैं कि संस्थान अंग्रेजी पढ़ाए या इंजीनियरिंग? हमारे शिक्षण संस्थानों के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। एक तरफ क्लास में क्षमता से अधिक संख्या, प्रयोगशालाओं की कमी, लगभग सभी प्रमुख संस्थानों में पचास प्रतिशत फैकल्टी की कमी और ऊपर से रोज-रोज बढ़ते राजनीतिक दबाव। क्या यह अचानक है कि संस्थानों को सक्षम प्रोफेसर नहीं मिल रहे। क्यों वह नई पीढ़ी जो आइआइटी में पढ़ने, दाखिले को तो जमीन-आसमान एक कर देती है, वहां उसे शिक्षक बनना मंजूर नहीं है। प्रोफेसरों की तनख्वाह इतनी कम भी नहीं है। कौन इन्हें देश से भाग जाने के पंख लगा रहा है?

भाषा के मसले पर केंद्र की नई सरकार ने उम्मीद जगाई है। देश की सर्वोच्च नौकरियों में जाने के लिए सिविल सेवा परीक्षा में जिस अंग्रेजी ने 2011 में भारतीय भाषाओं के देश के गरीबों को लगभग बाहर कर दिया था, 2014 के परिणाम भारतीय भाषाओं के पक्ष में गए हैं। हिंदी लेखकों, प्राध्यापकों और नौकरशाहों की चुप्पी के बावजूद छात्रों का पिछले वर्ष का आंदोलन बेकार नहीं गया, लेकिन अभी उसे कई मंजिलें पार करनी हैं। शिक्षण संस्थानों में अपनी भाषा में पढ़ाई की शुरुआत इसमें सबसे लंबी छलांग होगी।

नई शुरुआत : प्रेमपाल शर्मा

Delhi budget

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इस वर्ष के बजट में जहां केन्‍द्र सरकार ने स्वास्थ्य पर आवंटन को घटाकर कुल जीडीपी के 0.3 प्रतिशत पर पहुंचा दिया हो, वहां आप सरकार द्वारा अपने पहले ही बजट में स्वास्थ्य पर 30 प्रतिशत का आंवटन महत्त्वपूर्ण है। यह किसी से छिपा नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है। असल में एक के बाद एक केन्‍द्र सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के हवाले करने में जुटी हैं। विडंबना यह है कि जब राज्य सरकार अपना बजट प्रस्तुत कर रही थी, तो केन्‍द्र सरकार द्वारा नियंत्रित दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ऐसी बहुमंजिला रिहाइशी मकानों की  घोषणा कर रहा था जिनमें उच्च वर्ग के लिए ‘पेंट हाउसों का प्रावधान होगा। आखिर करोड़ों रुपए के इन फ्लैटों को खरीदेगा कौन? ये आम जनता के किस काम के होंगे?

सत्ता संभालते ही चौतरफा विवादों से घिरी दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने इस नगर-राज्य की जनता को एक ऐतिहासिक बजट दिया है। वैकल्पिक राजनीति का पहला कदम। इसे आप का पहला बजट ही कहा जाएगा। पिछले कार्यकाल के 49 दिनों में भी इसने शिक्षा, भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जो शुरुआत की थी, उसमें भी इस नई पार्टी की सोच पूरी तरह स्पष्ट थी।

देखा जाए तो उसी का असर था कि दिल्ली की जनता ने इस नई पार्टी पर यकीन किया और देश की दोनों बड़ी पार्टियों को धूल चटाते हुए इसे ऐतिहासिक जीत दिलाई। वैकल्पिक राजनीति की जिन बातों ने पूरे देश और विशेषकर नौजवान मेधावी मेहनती पीढ़ी का ध्यान खींचा था, उनमें प्रमुख थी- भ्रष्टाचार से मुक्ति, शिक्षा और अन्य महत्त्वपूर्ण मसलों पर जनभागीदारी या हस्तक्षेप। यह बजट आप के घोषणापत्र के अनुरूप ही कहा जा सकता है, विशेषकर दिल्ली की मुख्य समस्याओं शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर।

पहले शिक्षा : आप के घोषणापत्र में शिक्षा सबसे ऊपर रही है। 2013 के चुनाव पूर्व के संकल्प पत्र (घोषणा पत्र नहीं) में पांच साल में पांच सौ सरकारी स्कूल खोलने का संकल्‍प था। यानी कि हर वर्ष सौ स्कूल। वर्ष 2014 के चुनावों में भी उसे फिर दोहराया गया। पार्टी की ईमानदार कोशिश देखिए कि पहले ही बजट में सौ की बजाय दो सौ छत्तीस नए स्कूल खोले जाएंगे। कि‍तना सही सार्थक कदम है। पार्टी जनता के लगातार संपर्क में है विशेषकर गरीबों के। दिल्ली की अस्सी प्रतिशत जनता झुग्गी-झोपडिय़ों, अनियमित कॉलोनियों में रहती है, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। दिल्ली के अमीरों को सस्ती नौकरानियां, नौकर, मजदूर तो चाहिए, लेकिन उन्हें (गरीबों) कोई सुविधा देना बर्दाश्त नहीं है। देश का हर महानगर इसका गवाह है। ऐसे परिदृश्य में देश की भावी पीढ़ी को शिक्षित बनाना शासन की पहली जिम्मेदारी है। आप ने इसीलिए शिक्षा पर खास जोर दिया है। बजट में शिक्षा पर दोगुने से भी ज्यादा आवंटन है। कुल बजट का 24 प्रतिशत। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर भी खास जोर दिया जाएगा। शुरुआत में स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाकर और इनमें खेल आदि की सुविधाएं देकर। स्कूलों की संख्या बढ़ते ही जिन सरकारी स्कूलों में एक-एक कक्षा में सौ से भी अधिक बच्चे होते हैं, उनमें भी सुधार आएगा। यदि बजट की घोषणा के अनुरूप बीस हजार शिक्षकों की भर्ती होती है तो स्तर सुधरते ही दिल्ली में निजी स्कूलों की मनमानी खुद ही समाप्त हो जाएगी।

वैसे, आप सरकार ने निजी स्कूलों पर लगाम लगाने के लिए कई कदम उठाए हैं- जैसे दाखिले के फार्म को सस्ता करना, डोनेशन पर प्रतिबंध और दंड की व्यवस्था तथा दाखिले में पारदर्शिता। देखना यह है कि भ्रष्ट जंग के आगे इसमें कितनी सफलता मिलती है।

निजी स्कूलों में गरीब तबके के दाखिले के लिए जो पच्चीस प्रतिशत का प्रावधान किया गया था, उसकी गड़बडिय़ां हमारे नीति नियंताओं की आंख खोलने के लिए पर्याप्त हैं। जाने-माने शिक्षाविद प्रोफेसर अनिल सदगोपाल शुरू से ही इसके खिलाफ कहते रहे हैं। बच्चों के स्क्‍ूली स्तर पर ये विभाजन देश की नई पीढ़ी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। ऐसे आरक्षण ने ‘समान शिक्षा के पूरे सपने को धीरे-धीरे खंडित किया है। न उन गरीबों का भला हुआ, न शिक्षा के स्तर में अंतर आया। आप सरकार को आने वाले वर्षों में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाकर ऐसे आरक्षणों की समीक्षा करनी चाहिए।

बाहरी दिल्ली में नए आईटीआई बनाना और मौजूदा में सीटें बढ़ाना भी एक अच्छा कदम है। कालेज, विश्वविद्यालय स्तर पर भी बजट में कुछ होना चाहिए, विशेषकर दिल्ली विश्वविद्यालय में सतत चलते विवादों के मद्देनजर। तीन वर्षीय पाठ्यक्रम का मसला जरूर सुलझ गया है, लेकिन क्रडिट सिस्टम अभी भी विवादित है। आप के बजट में कालेजों में दाखिले की नीति पर भी गौर करने की जरूरत है। दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग अस्सी कॉलेज हैं। इस वर्ष के आंकड़ों पर ध्यान दें तो एक सीट के लिए लगभग दस आवेदन आए हैं। हर नौजवान का हक है, देश के अच्छे संस्थानों में पढऩा। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर-पूर्व के कॉलेजों, विश्वविद्यालयों की तबाही का असर दिल्ली पर पड़ रहा है। समस्या के समाधान की तरफ तुरंत एक कदम यह हो सकता है कि सभी कॉलेजों और स्कूलों में दो या तीन पारियां शुरू की जाएं। अभी भी कुछ कालेजों में हैं ही। वैसे भी जब पुणे, नागपुर और दूसरे शहरों तथा कोचिंग संस्थानों में यह संभव है तो विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए दिल्ली में क्यों नहीं है। समस्या बड़ी है तो समाधान भी अलग किस्‍म के खोजे जा सकते हैं। शोध, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं, सांस्कृतिक केंद्रों आदि पर इन कॉलेजों में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

शिक्षा अपनी भाषा-माध्यम में हो इसे स्कूल और कॉलेज दोनों स्तर पर लागू करने की जरूरत है। पता नहीं ‘स्वराज’ की बार-बार दुहाई देने के बावजूद इस पक्ष पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और मुख्यमंत्री केजरीवाल का ध्यान क्यों नहीं गया। आम आदमी को जरूरत से ज्यादा विदेशी भाषा से भी मुक्ति चाहिए।

देश भर में बड़े शहरों में परिवहन की समस्या विकराल होती जा रही है। दिल्ली महानगर इस मामले में सबसे आगे है। बजट में दिल्लीवासियों के लिए आने-जाने यानी परिवहन व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग डेढ़ गुना बजट आवंटित है। परिवहन पर (20 प्रतिशत) शिक्षा (24 प्रतिशत) के बाद सबसे ज्यादा खर्च प्रस्तावित है। बसों की संख्या तो बढ़ेगी ही उसमें सुरक्षा के लिए मार्शल की तैनाती भी राजधानी में कानून व्यवस्था को देखते हुए अच्छा कदम है।

लेकिन दिल्ली में आने-जाने की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कुछ मूलभूत कदम उठाने की जरूरत है। परिवहन की समस्या के साथ ही पर्यावरण की समस्या भी जुड़ी है। दिल्ली देश का ऐसा शहर है, जहां सबसे ज्यादा निजी गाडिय़ां हैं। देखना यह होगा कि इन पर कैसे लगाम लगाई जाए। अगर यह नहीं होगा तो ज्यादा बसों का लाना भी निरर्थक साबित होगा। सवाल है कि‍ अगर सडक़ें निजी गाडिय़ों से भरी होंगी तो सार्वजनिक बसें चलेंगी कहां। इसके लिए जो कदम उठाए जा सकते हैं, उनमें सबसे पहले है मेट्रो और बस सेवाओं का रात देर तक चलाया जाना, उसी तरह जिस तरह मुंबई में महानगरीय रेलें चौबीस घंटे में सिर्फ दो घंटे के लिए बंद होती हैं। इससे सडक़ों पर शाम को पहुंचने का दबाव नहीं रहेगा। मेट्रो के विस्तार के साथ ही उसमें यात्रियों की भीड़ को सीमित रखने के लिए गाडिय़ों की संख्या में वृद्धि जरूरी है। अभी होता यह है कि मेट्रो को चलाने के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारक लाभ है, जो किसी भी सार्वजनिक सेवा का आधार न तो हो सकता है और न ही होना चाहिए। इससे निजी गाडिय़ां चलाने का दबाव नहीं रहेगा और वायु के अलावा ध्वनि प्रदूषण भी कम होगा। बीआरटी व्यवस्था अगर अहमदाबाद में चल सकती है तो दिल्ली में क्यों नहीं चल सकती। निजी गाडिय़ों को सीमित करने और सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा देने का यह एक महत्त्वपूर्ण तरीका है।

दिल्ली की यातायात व्यवस्था को सुधारने का एक बड़ा तरीका यह है कि निजी गाडिय़ों को सम और विषम संख्याओं के आधार पर ही चलने देना। इससे सडक़ पर गाडिय़ों की संख्या आधी हो जाएगी। गाडिय़ों, विशेष कर निजी गाडिय़ों की संख्या को सीमित रखने के और भी दूरगामी उपाय ढूंढे जाने चाहिए।

जहां दिल्ली में प्रवेश करने वाले डीजल के वाहनों पर टैक्स बढ़ाया गया है, वहां डीजल की कार या व्यक्तिगत वाहनों को क्यों मुक्त रखा गया है। कार और विशेषकर बड़ी और लग्जरी कारों पर और टैक्स बढ़ाने की जरूरत है। टीवी व मनोरंजन पर कर बढ़ाना एक उचित कदम है।

बजट का तीसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए अधिक राशि का आंवटन है। इस वर्ष कुल बजट का 17 प्रतिशत अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निर्धारित किया गया है। इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। दिल्ली जो कि देश की राजधानी है, उसमें स्वास्थ्य की क्या दशा है इसे इसी माह हुई डॉक्टरों की हड़ताल से समझा जा सकता है। इस हड़ताल में डॉक्टरों की मूलत: मांग यह थी कि हस्पतालों में दवाएं, पट्टियां आदि जरूरी चीजों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाया जाए। इसी तरह वे अस्पतालों में संरचनागत व अन्य सुविधाओं की भी मांग कर रहे थे।

राज्य सकार ने इस बजट में लगभग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तीस प्रतिशत वृद्धि करके एक मिसाल कायम की है। यह बात इसलिए भी ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार के बजट में कुल सकल घरेलू आय का सिर्फ 0.3 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित किया गया है। मोदी सरकार ने स्वास्थ्य की मद में इस बार लगभग 25 प्रतिशत की कमी की है। इसके पीछे मंशा सरकार की अपनी जिम्मेदारी से बचने के अलावा स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी और कॉरपोरेट पूंजी को बढ़ावा देना है, जो कि सिर्फ उसकी सेवा करता है, जिसके पास पैसा हो।

पिछली सभी सरकारें शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य को नजरअंदाज करती रही हैं। बजट में सरकार ने तीन नए अस्पताल तो खोलने की घोषणा की है। ग्यारह अस्पतालों में चार हजार नए बिस्तर भी जोड़े जाएंगे। सबसे अच्छा प्रस्ताव पांच सौ मोहल्ला क्लीनिक खोलने का है। ये ऐसे महत्त्वपूर्ण कदम हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और गरीबों को निजी अस्पतालों द्वारा लूटे जाने से भी बचाएंगे।

वैकल्पिक राजनीति के बुनियादी कर्तव्य अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन की दिशा तो दुरस्त है, देखना यह है कि इनका कार्यान्वयन कितनी सक्षमता से होता है। क्योंकि छह दशक की हर अच्छी योजना को हमारी जातिवादी भ्रष्ट नौकरशाही और राजनीति के गठजोड़ ने हर बार फेल कर दिया है। अब तो इसमें मुनाफाखोर कारपोरेट जगत भी शामिल है। ऐसे खतरे आम आदमी की सत्ता पर भी लगातार मंडरा रहे हैं।

अनुशासन में शासन : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

दर्द है कि हर रोज रिसने के बावजूद कम नहीं हो रहा। दफ्तर खुलते ही दिल्‍ली स्थित केंद्र के सरकारी कर्मचारी आह भर-भरकर पुराने दिनों को याद करते हैं। क्‍या वो जमाना था, जब कभी भी आओ कभी भी जाओ और कहाँ ये नौ बजे के दफ्तर में नौ से पहले पहुँचना वरना छुट्टी कटेगी और तनख्‍वाह भी। पुराने बाबू बताते हैं कि ऐसा समय पालन तो केंद्र सरकार के कार्यालयों में कभी नहीं देखा गया। सार्वजनिक वेबसाइट पर उपलब्‍ध आँकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। जहाँ भी बायोमेट्रिक मशीने लग गई हैं, पिचानवे प्रतिशत कर्मचारी समय पर दफ्तर पहुँच रहे हैं। उन्‍हें मेट्रो की लाइन और दफ्तर की सीढि़यों पर भागते और हॉंफते हुए देखा जा सकता है। अब न बच्‍चों के स्‍कूल का बहाना, न मनमर्जी पड़ोसी को अस्‍पताल में जाकर देखने का नाटक। जो सरकारी कर्मचारी सुबह नौ बजे के दफ्तर में दस बजे अपने घर के आसपास की सड़कों को अपने कुत्‍तों को घुमाते हुए गंदगी फैला रहे होते थे, वे सब रास्‍ते पर आ गये हैं। बड़े साहबों की बड़ी-बड़ी गाडि़याँ साफ करने वाले सफाई कर्मचारी तक तनाव में आ गये हैं। कहते हैं कि अच्‍छे दिन क्‍या आए हर साहब कहता है कि सुबह आठ बजे तक गाड़ी साफ हो जानी चाहिए। लेकिन आँखों ही आँखों में शरारत दिखाता हुआ यह कहने से भी नहीं चूकता कि अब पता चलेगा, जब समय पर दफ्तर पहुँचना पड़ेगा। ‘एक देश लेकिन कानून अलग-अलग। आपको तनख्‍वाह भी ज्‍यादा मिले और समय पर भी नहीं पहुँचना। यह कहाँ का न्‍याय है।’

लेकिन इस सबकी नौबत आई क्‍यों? हर व्‍यवस्था के कुछ नियम कानून होते हैं जिसमें समय की पाबंदी भी एक महत्‍वपूर्ण बात है। जब सरकार तनख्‍वाह पूरी देती है, आपकी सुख-सुविधाओं का पूरा ध्‍यान रखती है, आपके लिए अस्‍पताल हैं, स्‍कूल हैं, घूमने की आजादी और छठे वेतन आयोग के बाद तो यह भी नहीं कह सकते कि आपका शोषण हो रहा है तो फिर लापरवाही, कामचोरी, खून में कैसे आई? क्‍या सरकारी कर्मचारी ने कभी सोचा कि उसी के घर में जो बैंक में नौकरी कर रहा है, वह समय पर पहुँचता है और कई घंटे ज्‍यादा काम करता है। जो प्राइवेट नौकरी में हैं, वे देसी फैक्‍ट्री हो या विदेशी कम्‍पनी उसे कभी देर से दफ्तर पहुँचते नहीं देखा और इन सबको तनख्‍वाह भी केन्‍द्र सरकार के कर्मचारी से कम ही मिलती है, तो यदि अब दफ्तर में समय पर पहुँचना भी पड़ रहा है तो यह हाय-हाय क्‍यों? क्‍या इस देश की व्‍यवस्‍था के डूबने का एकमात्र कारण केन्‍द्र, राज्‍य सरकार के कर्मचारियों में एक लापरवाही का भाव जिम्‍मेदार नहीं है? आप कोई भी संस्‍था देख लीजिए। सरकारी स्‍कूल क्‍यों डूबे? आप पाएँगे कि पचास फीसदी शिक्षक या तो गायब हैं या किसी बहाने छुट्टी पर हैं। विश्‍वविद्यालयों का तो कहना ही क्‍या। वहाँ तो उपस्थिति दर्ज कराने की भी आजादी नहीं है और न विश्‍वविद्यालयी अनुशासन में कोई ऐसा हिसाब-किताब रखा जाता कि आप कब आए और कब गये। विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर कहते हैं कि हम तो चौबीसों घंटे ड्यूटी पर होते हैं, क्‍योंकि हम उन बातों को सोचते और पढ़ते रहते हैं, जो हमें विश्‍वविद्यालय में पढ़ानी हैं। क्‍या खूबसूरत जवाब है। फिर जे.एन.यू., दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसरों से कोई पूछे कि अपने ज्ञान को कभी कुछ शोध पत्रों में भी छपवाएं। कम से कम दिल्‍ली में तो यह नहीं दिखता। दशकों से ऐसा चल रहा है और नतीजा वही हुआ जो होना था। सरकारी स्‍कूल भी डूबे और विश्‍वविद्यालय भी। पिछले कई वर्षों से हमारे ज्‍यादातर शिक्षण संस्‍थान गुणवत्‍ता के नाम पर और नीचे ही गिर रहे हैं।

बहरहाल सरकार के इस कदम की तारीफ की जानी चाहिए। क्‍योंकि लोकतंत्र का तकाजा है कि सरकारी संस्‍थाएँ लोक की उम्‍मीदों पर खरी उतरें। कल्‍पना कीजिएगा कि आप अपने किसी परिचित को लेकर अस्‍पताल पहुँचते हैं और अगर डॉक्‍टर और नर्स न हों, अस्‍पताल में गंदगी फैली हुई हो तो क्‍या आप बर्दास्‍त कर पाएँगे? आप जो टैक्‍स सरकार को देते हैं आप तुरंत उसका हिसाब मागेंगे। आप बैंक में जाएँ और ताला बंद मिले तो क्‍या माथा नहीं पीट लेंगे। राज्‍य का पहला काम जनता के प्रति जवाबदेही होना है और ऐसे कदमों से सरकारी कर्मचारी की जवाबदेही बढ़ेगी। आज यदि केन्‍द्र सरकार में ऐसा हो रहा है और जो निरंतर सफलता की तरफ बढ़ रहा है, तो निश्चित रूप से कल मेरठ, आगरा, पटना, इलाहाबाद की सभी संस्‍थाएँ वे चाहे अस्‍पताल हों या जिलाधीश का कार्यालय या थाना कोतवाली, पटवारी, सेल्‍स टैक्‍स, बिजली सभी पर इसका असर होगा। देशभक्ति सिर्फ सीमाओं पर लड़ने या ललकारने, हुँकारने का नाम नहीं है। पूरी निष्‍ठा से अपना काम करना भी सबसे बड़ी देशभक्ति और समय की जरूरत है।

नयी व्‍यवस्‍था में यदि कोई कमी है तो यह कि समय पर पहुँचे तो पहुँचे कैसे। केंद्रीय सचिवालय के मेट्रो स्‍टेशन पर शाम को एक-एक घंटे तक मेट्रो का इंतजार करना पड़ रहा है। क्‍योंकि ऐसा कभी सोचा ही नहीं गया कि एक साथ हजारों लोग दफ्तर छोड़ेंगे। ये तो गनीमत है कि दिल्‍ली मेट्रो की वजह से यह समय पालन संभव भी हो पाया वरना त्राहि-त्राहि मच जाती। दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं पर दोहरी मार पड़ी है। हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था में उन्‍हें घर पर भी सब कुछ देखना पड़ रहा है और दफ्तर में मिली पुरानी रियायत भी गायब। अब तो वे खुद कह रही हैं कि चाइल्‍ड केयर लीव हमें भले ही न दो लेकिन आने-जाने के लिए या तो सरकार ऐसी व्‍यवस्‍था करे कि हम समय पर पहुँच पाएँ या हमें कुछ छूट मिलनी चाहिए।

लेकिन सरकारी कर्मचारी के दुख का अंत नजर नहीं आ रहा। इस हफ्ते रिटायरमेंट की उम्र साठ से अट्ठावन की खबर ने उन्हें और मायूस कर दिया है। कहाँ तो वे बासठ की उम्र के सपने ले रहे थे और कहाँ वक्‍त से पहले जाना हो सकता है। हालाँकि नये समय के पालन को देखते हुए पहली बार सरकारी कर्मचारी स्‍वैच्छिक अवकाश उर्फ वी.आर. की सोच रहे हैं।

सी-सैट और अनुवाद की भाषा: प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के विवाद की जड़ मेंअनुवाद की खामियां विशेष रूप से उजागर हुई हैं। जिस परीक्षा के माध्यम से आप देश की सबसे बड़ी नौकरी के लिए लाखों मेधावी नौजवानों के बीच से चुनाव कर रहे हो और उसका परचा ऐसी भाषा में आए जिसे न हिंदी वाले समझ पाएं न अंगरेजी वाले, तो इसे देश का दुर्भाग्य नहीं मानें तो क्या मानें। आजादी के तुरंत बाद के दशकों में एक अधिनियम के तहत यह फैसला किया गया कि अंगरेजी अगले पंद्रह वर्षों तक चलती रहेगी और इन वर्षों में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में ऐसा साहित्य अनूदित किया जाएगा या मौलिक रूप से लिखा जाएगा, जिससे कि उसके बाद भारतीय भाषाओं में काम किया जा सके। लेकिन हुआ उलटा।

शुरू के दो-तीन दशक तक तो राजभाषा और अनुवाद के काम में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वे लोग भी लगे जो जाने-माने साहित्यकार थे, जैसे बच्चन, दिनकर, बालकृष्ण राव, अज्ञेय आदि। खुद प्रेमचंद ने अंगरेजी की कई किताबों के अनुवाद किए जिनमें जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ भी शामिल है। अनुवाद को इन सभी ने उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जितना कि मौलिक लेखन को, और यही कारण है कि उन दिनों के किसी अनुवाद को पढ़ कर कभी लगता नहीं कि आप मूल कृति पढ़ रहे हैं या अनुवाद।

पिछले बीस-तीस वर्षों से ऐसा अनुवाद सामने आ रहा है कि उसे पढ़ने के बजाय आप मूल भाषा में पढ़ना बेहतर समझते हैं। सरकार द्वारा जारी परिपत्रों में तो बार-बार यह कहा ही जाता है कि जहां भी समझने में शक-शुबहा हो, अंगरेजी को प्रामाणिक माना जाए। नतीजा धीरे-धीरे यह हुआ कि सरकारी अनुवाद इतनी लापरवाही से होने लगा जिसका प्रमाण हाल ही में सी-सैट की परीक्षा से उजागर हुआ है, जहां ‘कॉनफिडेंस बिल्डिंग’ का अनुवाद ‘विश्वास भवन’ और ‘लैंड रिफॉर्म’ का ‘आर्थिक सुधार’ किया गया है। और जो भाषा इस्तेमाल की गई है उसे गूगल या कंप्यूटर भले ही समझ ले, कोई हाड़मांस का आदमी नहीं समझ सकता। यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण इसलिए हो जाता है कि जब आप परीक्षा भवन में बैठे होते हैं तो आपके पास अटकलें लगाने या मूल प्रश्न से भटकने का समय नहीं होता। संघ लोक सेवा आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने बातचीत के बाद जब यह समस्या स्वीकार करते हुए कहा कि आखिर अच्छे अनुवादक कहां से लाएं तो लगा कि इस समस्या पर पूरे समाज और सरकार को विचार करने की जरूरत है।

सबसे पहली खामी तो शायद अनुवादक या हिंदी अधिकारी की भर्ती प्रक्रिया की है। भर्ती-नियम कहते हैं कि हिंदी अधिकारी या अनुवादक बनने के लिए हिंदी, संस्कृत या अंगरेजी भाषा में एमए होना चाहिए और डिग्री स्तर पर दूसरी भाषा। बात ऊपर से देखने पर ठीक लगती है, लेकिन सारा कबाड़ा इसी नीति ने किया है। कम से कम हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालयों से जिन्होंने हिंदी में एमए किया है वे सूर, कबीर, तुलसीदास, जायसी को तो जानते-समझते हैं, भाषाओं, बदलते विश्व के आधुनिक ज्ञान, मुहावरों को नहीं समझते, जिनमें रोजाना के जीवन, राजनीति और समाज की जटिलताएं झलकती हैं। इसके दोषी वे नहीं हैं, बल्कि वह पाठ्यक्रम है जिसकी इतिहास, राजनीति शास्त्र, भूगोल या विज्ञान के विषयों में कभी आवाजाही रही ही नहीं।

बेरोजगारी के इस दौर में भी जितनी आसानी से प्रवेश हिंदी अधिकारी या अनुवादक की नौकरी में होता है, उतनी आसानी से देश की किसी दूसरी नौकरी में नहीं। नौकरी में आने के बाद इन्हें फिर शायद ही अच्छे अनुवाद या सरल भाषा में अपनी बात कहने का कोई विधिवत शिक्षण-प्रशिक्षण नियमित अंतराल से दिया जाता हो। इसीलिए आपने अधिकतर मामलों में देखा होगा कि इनके अनुवाद की भाषा कठिन, बोझिल, ज्यादातर मामलों में संस्कृत के शब्दों से लदी हुई या ऐसी टकसाली होती है जिसका बोलचाल की भाषा से दूर-दूर तक कोई संबंध ही नहीं होता।

उर्दू या बोलचाल की हिंदुस्तानी से दूरी भी इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाती है। पुरानी पीढ़ी के संस्कृत के मारे प्रशिक्षक राजभाषा के नाम पर ऐसा करने पर इनकी और पीठ थपथपाते हैं। इस कमी को पूरा किया जा सकता है बशर्ते कि आप लगातार उस साहित्य और पत्रिकाओं के संपर्क में रहें। पिछले कई दशकों के अनुभव के बाद कहा जा सकता है कि सरकार के हिंदी विभागों में काम करने वाले ज्यादातर कर्मचारी नौकरी में आने के बाद पढ़ने-लिखने से शायद ही कोई संबंध रखते हों और यही कारण है कि धीरे-धीरे उनके पास शब्द भंडार और सरल शब्दों का क्षय होता जाता है।

सवाल उठता है कि आखिर वे हिंदी की किताब क्यों पढ़ें और क्यों अपनी भाषा को सरल, बोधगम्य, पठनीय बनाएं? पहले तो उनको सरकारी मशीनरी का हर विभाग देखता ही ऐसे नजरिए से है कि जैसे वे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हों। जिन सरकारी बाबुओं को दूर-दूर तक अंगरेजी नहीं आती वे भी हिंदी विभाग में काम करने वालों को एक अस्पृश्य नजरिए से देखते हैं।

यानी ऐसा विभाग जो खुशामद करते हुए काम कराता हो, सितंबर के महीने में जो उपहार बांट कर भीड़ जुटाता हो- क्या उसके आला अफसरों ने भी इस ओर कभी ध्यान दिया, कभी अनुवाद को बेहतर करने की सोची। और क्या दिल्ली के सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले ये तथाकथित अंगरेजीदां छोटे-छोटे काम, आवेदनों के जवाब, टिप्पणी आदि हिंदी में नहीं कर सकते? साठ वर्ष के बाद या राजभाषा अधिनियम की पंद्रह वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद क्या हमें हिंदी में काम करने के योग्य नहीं हो जाना चाहिए था?

इसीलिए एक शीघ्र उपाय अनुवादकों की गुणवत्ता बेहतर करने का यह है कि उनकी भर्ती के नियम बदले जाएं। हिंदी अनुवादकों की भर्ती एक परीक्षा के माध्यम से होती है और जब प्रतियोगी परीक्षा ले ही रहे हैं तो उसमें किसी भी विषय में डिग्री या स्नातकोत्तर ही पर्याप्त माना जाए,किसी भाषा विशेष में स्नातक या स्नातकोत्तर होना नहीं। क्या सिविल सेवा परीक्षा समेत कर्मचारी चयन आयोग, बैंक आदि की ज्यादातर परीक्षाओं में केवल ग्रेजुएट डिग्री पर्याप्त नहीं मानी जाती? इससे भाषा-ज्ञान रखने वाले वे भी चुने जा सकते हैं जिन्होंने हिंदी माध्यम से राजनीति शास्त्र, इतिहास या विज्ञान विषयक कोई भी पढ़ाई पूरी की है। इसका उलटा भी कि अंगरेजी माध्यम से पढ़े जाने वाले वे नौजवान भी इसमें चुने जा सकते हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी रही हो। भाषाओं से इतर योग्यता रखने वालों को विषयों का बेहतर ज्ञान होने के कारण अनुवाद में वे गलतियां नहीं आएंगी, जो संघ लोक सेवा आयोग की सीसैट परीक्षा से उजागर हुई हैं।

दूसरे भारतीय भाषा भाषी हिंदी अनुवादकों में शामिल हो पाएं तो सबसे अच्छा रहे। उन्हें परीक्षा में रियायत देकर भी राजभाषा विभागों में नौकरी देनी चाहिए। इससे वह पाप भी धुलेगा, जो हिंदी भाषियों ने त्रिभाषा सूत्र को धोखा देकर दक्षिण की कोई भाषा न सीख कर किया है। क्या भारतीय भाषाओं की एकता राष्ट्रीय एकता के समतुल्य नहीं है।

अनुवाद की चक्कियों के बीच पिसते राजभाषा हिंदी के कर्मचारियों को शायद ही कभी समकालीन साहित्य पढ़ने की फुरसत मिलती हो। एक पुस्तक चयन समिति के दौरान कुछ विवाद बढ़ने पर एक हिंदी अधिकारी ने सफाई दी ‘मुझे क्या पता कौन-सी किताब अच्छी है या बुरी। मैंने तो पिछले पंद्रह साल से कोई नई किताब नहीं पढ़ी। अनुवाद से फुरसत मिले तब न।’ आश्चर्यजनक पक्ष यह है कि ऐसे अधिकारी न पढ़ने के बावजूद आखिर पुस्तक चयन समिति में क्यों बने रहना चाहते हैं?

एक और अधिकारी का दर्द उभर कर सामने आया। पहले तो अनुवाद से फुरसत नहीं मिलती, उसके बाद संसदीय समितियों के साठ-सत्तर पेजों के ब्योरे, फॉर्म, अनुलग्नक, प्रपत्र। कितने कंप्यूटर खरीदे गए, उसमें कितने द्विभाषी थे? कितने कर्मचारी हैं, कितनों को प्रबोध, प्रवीण का ज्ञान है, कितने पत्र ‘क’ क्षेत्र को गए, कितने ‘ख’ क्षेत्र को और कितने विज्ञापन अंगरेजी में गए, कितने दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में? और फिर उन्हें लगातार यह डर रहता है कि संसदीय समिति इन आंकड़ों को जोड़ कर देखने पर कोई गलती न निकाल दे। यानी कि उन्हें राजभाषा का गणित और समितियों को खुश रखने का बीजगणित तो सिखाया जाता है, भाषा को सहज, लोकप्रिय बनाने का बुनियादी पक्ष नहीं।

कुछ व्यक्तिगत अनुभवों का जिक्र करना भी जरूरी लगता है। वर्ष 1979 की सिविल सेवा परीक्षा समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के क्रम में मैंने एक बैंक में एक हिंदी अधिकारी पद के लिए भी आवेदन कर दिया, और लिखित में पास भी हो गया। साक्षात्कार के समय उन्होंने पेच लगाया कि आप हिंदी में स्नातकोत्तर तो हैं, लेकिन बीए में आपके पास विज्ञान था- न हिंदी थी न अंगरेजी। मैंने समझाने की कोशिश भी की कि बीएससी अंगरेजी माध्यम में था, जिसे अंगरेजी के एक विषय से बेहतर नहीं तो बराबर माना जा सकता है। लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि उनके भर्ती-नियमों में यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि कितना किसी को अनुवाद और भाषा का कितना ज्ञान है, महत्त्वपूर्ण यह है कि आवेदक ने उन विषयों में डिग्री ली है या नहीं।

एक दशक पहले मंत्रालय में निदेशक, राजभाषा के पद पर प्रतिनियुक्ति से आवेदन मांगे गए थे। एक आवेदनकर्ता विज्ञान और हिंदी दोनों में स्नातकोत्तर था। लेकिन उसे साक्षात्कार के लिए इसलिए नहीं बुलाया गया कि डिग्री स्तर के विषयों में हिंदी या अंगरेजी का उल्लेख नहीं है। क्या अंगरेजी माध्यम से विज्ञान पढ़ना अंगरेजी विषय की पूर्ति नहीं करता? इन नियमों में अपेक्षित परिवर्तन किया जाए तो विज्ञान या हिंदीतर दूसरे विषयों को पढ़ कर आने वाले मौजूदा अनुवादकों से कहीं अच्छे साबित होंगे।

आखिरी बात कि अनुवाद के सहारे कब तक? कम से कम दिल्ली स्थित केंद्र सरकार के पंचानबे प्रतिशत कर्मचारी-अधिकारी हिंदी जानते हैं। संसदीय समितियां भी यहीं हैं और राजभाषा के सर्वोच्च कार्यालय भी। क्यों ये अपनी बात फाइलों पर अपनी भाषा में कहने में हिचकते हैं। इसकी शुरुआत शीर्ष अधिकारियों से करनी होगी। हिंदी माध्यम से चुने गए अधिकारियों का तो यह थोड़ा-बहुत नैतिक दायित्व बनता ही है कि जिस भाषा के बूते वे इन प्रतिष्ठित सेवाओं में आए हैं, उसमें कुछ काम भी किया जाए और राजभाषा विभाग का बोझ कुछ हल्का करें। पर कई बार ये दूसरों से बेहतर अंगरेजी लिखने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। इसका प्रमाण मिला दक्षिण भारत के एक सरकारी कार्यालय में। हिंदी प्रेमी दक्षिण भारतीयों का कहना था कि यहां उत्तर प्रदेश, बिहार से बड़ी संख्या में अधिकारी तैनात हैं। हम चाहते थे कि इनके साथ रह कर हमारी हिंदी ठीक हो जाएगी, क्योंकि हमें भी दिल्ली या दूसरे हिंदी क्षेत्रों में जाना होता है। उन्होंने अफसोस के साथ बताया कि उत्तर के ये अधिकारी तो अंगरेजी सुधारने में लगे रहते हैं।

सीसैट विवाद ने अनुवाद की खामियों की ओर पूरे देश का ध्यान खींचा है, लेकिन अगर हम इस समस्या का समाधान चाहते हैं तो हमें भर्ती-नियमों और योग्यता आदि के प्रावधानों में तुरंत बदलाव करने होंगे। जहां तक स्थायी समाधान का प्रश्न है, जब तक स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा अपनी भाषाओं में नहीं दी जाएगी, इस समस्या का पूरा हल संभव नहीं होगा।

विज्ञान दिवस का आइना : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

विज्ञान दिवस (28 फरवरी) पर प्रेमपाल शर्मा का आलेख-  

हर वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है, इस प्रति‍ज्ञा को दोहराते हुए कि राष्ट्र के विकास के लिए विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना क्‍यों जरूरी है। यों हिन्दी दिवस, मातृभाषा दिवस, शिक्षा दिवस, शिक्षक दिवस, सद्भावना दिवस सभी एक राष्ट्रीय स्तर पर रीति में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन नरेन्द्र दाभोलकर की स्मृति में भारत सरकार के विज्ञान प्रसार आदि संगठनों द्वारा आई.आई.टी. दिल्ली में 21-22 फरवरी को आयोजित परिसंवाद थोड़ा लीक से हटकर था। अंधविश्ववास और जादू-टोने के खिलाफ लड़ाई में अगस्त 2013 में शहीद हुए नरेन्द्र दाभोलकर के बेटे हामिद दाभोलकर के साथ सभी ने मिलकर संकल्प लिया कि जो कानून महाराष्ट्र में काला जादू और अंधविश्वास के खिलाफ बना है, उसे पूरे राष्ट्र के ‎लिए भी बनाया जाएगा ।

लेकिन हम ऐसे संकल्प कब तक दोहराते रहेंगे? महाराष्ट्र में अंधविश्‍वास के खिलाफ कानून बने तीन महीने हो चुके हैं, और अब तक लगभग चालीस व्यक्तियों के खिलाफ इस कानून के तहत मुकदमे दर्ज हो चुके हैं । यानी एक संदेश फैल रहा है कि धर्म, जादू-टोने के बहाने आप गरीब जनता का शोषण नहीं कर सकते। लेकिन नरेन्द्र दाभोलकर की शहादत और पूरे राष्ट्र को आधुनिक बनाने वाले ऐसे कानून की जरूरत के बावजूद अभी तक दिल्ली क्यों सोई हुई है और क्यों देश के दूसरे राज्य? क्या 28 फरवरी को दिवस मनाने की खानापूरी पर्याप्त है ? क्या यह इस देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु का अपमान नहीं है, जिनके लिए वैज्ञानिक चेतना रोजाना की जरूरत में शामिल था  और जिसे वे भूख और गरीबी के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार मानते थे। ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में वे बार-बार वैज्ञानिक चेतना की बात करते हैं । कहा जाता है कि 1947 के बाद आजाद हुए लगभग अस्सी देशों में भारत अकेला ऐसा देश है जिसने वैज्ञानिक चेतना को अपने संविधान में शामिल किया । लेकिन जमीन पर तो उस चेतना को आने में अभी मीलों चलना है ।

स्मृतियों में सत्‍तर के दशक की मेरे बचपन की रील तैर रही है । गणेसी लाल पंडित आए दिन सामने वाले घर में बैठे रहते थे। कभी एक बच्चे का हाथ देखते हुए तो कभी दूसरे की पत्री या जन्मकुंडली । वाकई उनके पास ऐसा बहुत काम था। कई बार तो लोगों को इंतजार करना पड़ता, पंडित जी से जन्म पत्री दिखाने को । चमकदार रेशमी कुर्ता, गले में गमछा, चारों तरफ भगतों की भीड़ यानी मौज-ही-मौज। चालीस साल बाद वो बूढ़े जरूर हो गये हैं, लेकिन धंधा उतना ही चमक रहा है। अब तो उसमें भगवती जागरण और सत्संग भी जुड़ गये हैं। अलीगढ़ के एक और गांव में जाना हुआ तो वे बताने लगे कि सोलह गांवों का एक समूह है, जिसमें बारी-बारी से हर शनिवार, रविवार को जागरण होता है और खाना-पीना भी। खाना-पीना कौन करता है  ? यह पूछने पर उन्होंने बताया कि दिल्ली और अन्‍य शहरों में रहनेवाले वे पढ़े-लिखे लोग जो खूब कमाते हैं । वो कमाई रिश्वत या दलाली की । मैं नाराज हुआ तो कहने लगे कि खाली बैठे और क्या करें ? इन सत्संगों में इलाहाबाद, बनारस तक के पं‎ड़ितों को ये बुला लेते हैं और बदले में ये वहां जाते हैं। कभी-कभी भारतीय विश्वविद्यालयों के फरवरी, मार्च में होने वाले सेमिनारों की सी याद दिलाते ।

पिछले पांच-दस वर्षों से वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के आयोजनों में कभी-कभी शिरकत करता रहा हूं । हर सेमिनार नेहरू जी के बाजे से ही शुरु होता है और भगवान बुद्ध, कोपरनिक्स, गैलिलियो का नाम लेते हुए नेहरू जी पर ही खत्म। ऐसे ही एक आयोजन में मद्रास आई.आई.टी. के सदानन्द मेनन ने बताया कि वैज्ञानिक चेतना की बढ़ने के बजाय उलटी गिनती शुरू हो गई है। उन्होंने तमिलनाडु के उदाहरण देकर अपनी बात रखी कि द्रविड़ आंदोलन, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ था और पिछले 45 वर्षों से बारी-बारी से द्रविड़ राजनीतिक पार्टियां सत्ता में हैं । पश्चिम बंगाल के तैंतीस वर्षीय वामपंथी शासन से भी ज्यादा । लेकिन मूर्ति पूजा, दैवीय चमत्कार, टोटके, अंधविश्वासों में कोई कमी नहीं आई, बल्कि और बढ़े ही होंगे।  वे मद्रास में बढ़ते जातिवाद से बेहद दु:खी थे । उन्होंने बताया कि चैन्ने आई.आई.टी. की कक्षाओं में बच्चे जातियों के झुंड में बैठते हैं, एक-दसरे का मखोल उड़ाते। क्‍या एम्‍स., जे.एन.यू. सहित लखनऊ, पटना, इलाहाबाद की स्थिति भिन्‍न है? काश ! वैज्ञानिक चेतना बढ़ी होती तो जाति, धर्म की दीवारें कभी की ढह चुकी होतीं। क्या हिन्दू-मुस्लिम, सिख, आदिवासी, दलित, ठाकुर, ब्राह्मण का जीनोम अलग है? क्या इसे खाप पंचायतों को बताने की जरूरत नहीं है ? वे किस नस्लीय शुद्धता की बात करते हैं ? क्या यह इतने अच्छे स्पष्ट वैज्ञानिक संविधान के बावजूद सत्ता और उसकी राजनीति की विफलता नहीं है ? जहां अभी भी लाखों लोग काला जादू, गण्डे-ताबीज के बहाने शोषण के‎ शिकार हो रहे हैं ।

कुछ और रीलें तैर रही हैं। मेरी उम्र रही होगी सात-आठ साल। बड़े भाई को शायद मोतीझरा निकला था। सुबह-शाम एक झाड़-फूंक वाला आता । पता नहीं कैसे बचे। मेरी आंख में मां न जाने किसी ऐसे ही झोलाछाप डॉक्टर की दवा डालती थी, जिसे डालते ही मैं घंटों तड़पता रहता था और आखिर मैंने वो शीशी फेंक दी। मेरी उम्र का मेरा ही सहपाठी कुंवर पाल जामुन के पेड़ से गिरा, टांग टूट गई। गांव के पहलवान ने खपच्‍चा लगा दिया। महीनों बिस्तर पर पड़ा रहा पढ़ाई छूट गई। बच तो गया लेकिन शरीर आज भी टेड़ा-मेड़ा है। वे कहते हैं तो क्या करें ? कौन डॉक्टर है यहां ? और कौन-सा अस्पताल? झाड़ फूंक वाले खपच्‍चा लगाने वाले पहलवान मिल तो जाते हैं। क्या हमने इन पंडित जी, मुल्ला जी, हकीमों का कोई विकल्प इस गरीब जनता को दिया है ?

चालीस वर्ष बाद पिछले हफ्ते फिर गॉंव में था । पड़ोसी रामवीर अपनी पुत्रवधु का इलाज कराकर शायद उज्जैन या इंदौर से लौटा था। हालचाल पूछने पर वह पु‎ड़िया में रखे कुछ पत्थरों को दिखाता है कि ये मंत्र से निकालकर दिए हैं बाबा ने। एक और पड़ोसी श्यामवीर एक और बाबा के कब्जे में है । हर सोमवार को उसके आश्रम की तरफ दौड़ते और बच्चों को भी साथ ले जाते । उत्तर भारत का तो हर घर इन बाबाओं के चंगुल में हैं । प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नर्लीकर का कहना है कि शहरी मध्यवर्ग में तो ज्योतिष, बाबावाद, अंधविश्वास पचास सालों में और पचास गुना बढ़ा है । इसका प्रमाण है कि पहले तो भी शादियां एक पंडित की सलाह से हो जाती थीं, अब तो कंप्यूटर, पंडित, नाड़ी, ग्रह, नक्षत्र तक सब न मिल जाएं, तब तक वे कोई काम नहीं करते । ऊपर से वास्तु और दूसरे प्रपंच ।

ऐसे में क्या हमें विज्ञान दिवस मनाने का हक भी है ?

पूरे देश के लिए ‘अंधविश्‍वास निर्मूलन कानून’ बनाने की मांग

कार्यक्रम को संबोधित करते प्रेमपाल शर्मा। साथ में (बाएं से) प्रेम सिंह, सुबोध महंती और देवेंद्र मेवाड़ी।

कार्यक्रम को संबोधित करते प्रेमपाल शर्मा। साथ में (बाएं से) प्रेम सिंह, सुबोध महंती और देवेंद्र मेवाड़ी।

नई दिल्‍ली : ‘डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने पहली लड़ाई जाति के खिलाफ शुरू की थी। अंधविश्‍वास निर्मूलन के उनके अभियान में अमोल पालेकर और श्रीराम लागू जैसे लोग भी शामिल थे। वे पिछले कई वर्षों से महाराष्ट्र में अंधविश्‍वास विरोधी कानून बनवाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उस कानून के मसौदे में 29 बार संशोधन किया गया, पर उनके जीते जी वह कानून पास नहीं हो पाया। जब उनकी हत्या हुई, तब संसद चल रही थी, पर किसी ने सांसद ने इसके खिलाफ कुछ नहीं कहा। तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना के मामले में हमारा समाज पीछे गया है। कर्मकांड, अंधविश्‍वास, अंधश्रद्धा, पाखंड हावी है। जनता को जिस तरह गुमराह किया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक है। इस खतरे के खिलाफ संघर्ष करना उन सबका बड़ा दायित्व है, जो वैज्ञानिक चेतना संपन्न समाज चाहते हैं। बकौल पाश बीच का रास्ता नहीं होता। आज अंधविश्‍वास के कारोबार के खिलाफ कानून महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए जरूरी है।’ लेखक प्रेमपाल शर्मा ने गांधी शांति प्रतिष्ठान और मैत्री स्टडी सर्किल की ओर से 30 अगस्त को डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की स्मृति में आयोजित संगोष्ठी में ये विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी की शुरुआत में डॉ. दाभोलकर की स्मृति में एक मिनट का मौन रखा गया।

चर्चित विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने कहा कि विज्ञान के नाम पर जो पैसे खर्च हो रहे हैं,  उसका कितना सार्थक इस्तेमाल हो रहा है, इसके बारे में भी विचार करना चाहिए। इतने खर्च के बाद भी हम एक भी गांव या कस्बा ऐसा नहीं बना पाए हैं, जो ग्रहण, पशुबली और डायन जैसे अंधविश्‍वास से मुक्‍त हो। लोग लगभग ऐसी दशा में धकेल दिए गए हैं, जहां वे अपनी जिंदगी की हर उपलब्धि का श्रेय बाबाओं को दे रहे हैं।

वरिष्ठ वैज्ञानिक सुबोध मोहंती ने कहा कि वे डॉ. दाभोलकर के वैचारिक सहयात्री भी रहे। समझ में नहीं आता कि उनकी हत्या की निंदा किस भाषा में की जाए। जब गैलिलियो ने कहा था कि सूर्य घूम रहा है, तब भी उनका जबर्दस्त विरोध हुआ था। लेकिन आज वही सही हैं। अंधविश्‍वास और अवैज्ञानिकता फैलाने वाले आज तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन अंधविश्‍वास निर्मूलन के लिए इसका इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है। जबकि यह जरूरी है कि चमत्कार और अंधविश्‍वास के खिलाफ शुरू से ही स्कूलों में पढ़ाई हो। विज्ञान की पढ़ाई के बाद भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं पैदा हो जाता। हमें समाज में प्रश्‍न और तर्क करने के सिलसिले को बढ़ाना हो। वैज्ञानिक चेतना के निर्माण के संघर्ष में सभी वर्गों की भागीदार बनाना होगा। जनस्वास्थ्य के मोर्चे पर काम करना होगा, क्योंकि स्वास्थ्य के चक्कर में भी बहुत सारे लोग ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फंस जाते हैं।

गांधी एवं स्मृति दर्शन समिति की निदेशक मणिमाला ने कहा कि शोषण पर टिकी हर व्यवस्था अंधविश्‍वास पर टिकी होती है, सांप्रदायिक लोग अक्सर धार्मिक नहीं होते। बेरोजगारी और अस्वस्थता भी लोगों को अंधश्रद्धा के चंगुल में फंसाती है, उनसे अलगाव में रहकर हम लड़ाई को नहीं जीत सकते। गांधी जी खुद को सनातनी हिंदू कहते थे, पर कभी मंदिर नहीं गए, गए भी तो एक बार वाल्मीकि मंदिर गए।

सेवानिवृत प्रोफेसर जे.सी. खुराना ने कहा कि हमें धार्मिक सुधार चाहिए, धार्मिक नेता नहीं चाहिए। हमारे राजनीतिक नेतृत्व में बहुत गड़बडि़यां हैं, वे खुद ही अंधविश्‍वास से ग्रस्त होते हैं। आज अगर राजनीतिक नेतृत्व में गड़बड़ न होता, तो आसाराम जैसे किसी बाबा की हिम्मत नहीं होती कि वह पांच घंटे तक पुलिस का इंतजार करवाए। हमें आज अल्ट्रा रेशनल, अल्ट्रा मॉडर्न, अल्ट्रा सांइटिफिक समझ के लिए संघर्ष करना होगा।

समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि आजादी के दौरान भारतीय समाज के जो नेता थे, वे रेशनल नहीं थे, पर वक्‍त की जरूरत ने उन्हें सोशलिस्ट और समानतावादी बना रखा था। आजादी के बाद जिस तरह से अंधविश्‍वास के खिलाफ संघर्ष होना चाहिए था, नहीं हुआ। इसकी बुनियादी वजह धर्म है, जिसके साथ एक वर्ग के हित जुड़े होते हैं, जिसके लिए वह रूढि़वाद, असमानता को बढ़ावा देता है। सांप्रदायिकता और धर्म को अलगा कर नहीं देखा जाना चाहिए। सांप्रदायिकता के मूल में धर्म है। आज सत्ता की लड़ाई में धर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है। नवउदारवाद के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सारे क्षेत्रों में जो असुरक्षा बढ़ी है, उसने में अंधविश्‍वास के कारोबार के बढ़ने में अपनी भूमिका अदा की है।

कार्यक्रम में विचार व्यक्‍त करते सुधीर सुमन।

कार्यक्रम में विचार व्यक्‍त करते सुधीर सुमन।

सुधीर सुमन ने कहा कि इस देश में व्यक्तिगत तौर पर नास्तिक होकर जीना कोई मुश्किल नहीं है, लेकिन जब हम शोषण, उत्पीड़न और भेदभाव पर आधारित सामाजिक या आर्थिक संबंधों को बदलने की कोशिश करते हैं, तब अंधविश्‍वास की संरक्षक सत्ताएं हमसे सीधे टकराती हैं। कोई भी अभियान जनता से दूर रहकर संचालित नहीं किया जा सकता। जनता अगर अपनी असुरक्षाओं और कठिनाइयों के कारण किसी ईश्वर या बाबा के शरण में जाती है, तो हमें उन वजहों पर भी विचार करना होगा, जो उसे उस ओर धकेलते हैं। हमें उन कारणों और स्थितियों को भी बदलने के लिए कठिन संघर्ष का हिस्सा बनना होगा, बल्कि जनता में जो धार्मिक सहिष्णुता और एक भिन्न किस्म की जो तर्कशीलता और आधुनिकता है, उसकी भी पहचान करनी होगी। मीडिया जिस तरह अवैज्ञानिक चीजों को प्रचारित प्रसारित करती है, उस पर भी सख्ती से अंकुश लगना चाहिए। ज्यादा खतरा उनसे है जो अंधविश्‍वास और अंधश्रद्धा के कारोबार के जरिए भक्तों के एक संगठित सांप्रदायिक गिरोह का निर्माण कर रहे हैं और खतरा उस राजनीति से है जो इसे संरक्षण देती है और प्रोत्साहित करती है। हमारे समय की समस्या यह है कि इस तरह के गिरोह ज्यादा संगठित हैं, पर जो खुद को वैज्ञानिक चेतना संपन्न समझते हैं, वे बिखरे हुए हैं, डॉ. दाभोलकर की हत्या ने इस जरूरत को सामने ला दिया है कि वे संगठित हों।

कवि राजेंद्र नटखट ने कहा कि हम पलायन करके नहीं बच सकते। धर्म और ईश्वर के नाम पर जनता को ठगने का जो कारोबार चल रहा है उसका जवाब देना होगा।

कवि श्याम सुशील ने कहा कि साहित्यकारों को अपनी भूमिका बढ़ानी होगी। खासकर बच्चों के लिए ऐसी पत्रिकाएं निकालनी होंगी, जिनमें अंधविश्‍वास विरोधी सामग्री हो।

अनुराग ने भी कहा कि किताबें लड़ाई का साधन हैं, लेखकों को अंधविश्‍वासविरोधी विचारों के साथ जनता के बीच जाना होगा। उपेंद्र सत्यार्थी ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा को दुरुस्त करना बेहद जरूरी है, क्योंकि उस दौर में हमारा जो सामाजीकरण होता है, वह पूरे जीवन को प्रभावित करता है।

पत्रकार तेजपाल सिंह ने बताया कि किस तरह ज्योतिष के नाम पर फर्जी धंधा होता है, कि किस तरह भविष्यफल बताने वाली किताब लिखने के लिए एक प्रकाशक ने उन्हें पचास हजार रुपये दिए, और उस वक्त पैसे की बेहद जरूरत के कारण उन्होंने वह काम किया।

संगोष्ठी का संचालन करते हुए डॉ. प्रेम सिंह ने कहा कि हमें तमाम राज्य सरकारों और संसद से यह मांग करनी चाहिए कि वह पूरे देश के लिए अंधविश्‍वासविरोधी कानून बनाएं। निःस्वार्थ भाव से अंधविश्‍वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले डॉ. दाभोलकर जैसे योद्धा की मौत बेकार न हो और आगे से ऐसा न हो, हमें यह तय करना होगा।

हमें एक रेशनल सोसाइटी बनाना होगा। मीडिया में अंधविश्‍वास का जो कारोबार चल रहा है, उस पर अंकुश लगाने के लिए भी संघर्ष करना होगा। वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्ष मानसिकता वाले तमाम लोगों के बीच संवाद को तेज करना होगा।

पूरे देश के लिए ‘अंधविश्वास निर्मूलन कानून’ बनाया जाए, इसके लिए संघर्ष चलाने का प्रस्ताव भी इस संगोष्ठी में लिया गया।