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हंगल भारत-पाकिस्तान की साझी प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे: प्रणय कृष्ण

एके हंगल

रंगकर्मी-फिल्म अभिनेता एके हंगल के निधन पर जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि-

नई दिल्ली : मशहूर वामपंथी रंगकर्मी, स्वाधीनता सेनानी और फिल्मों के लोकप्रिय चरित्र अभिनेता एके हंगल का 95 वर्ष की उम्र में 26 अगस्त, 2012 को लम्‍बी बीमारी से बंबई में निधन हो गया। इंडियन पीपुल्स थियेटर(इप्टा) और प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से संबद्ध एके हंगल ने वामपंथ और मार्क्‍सवाद के प्रति अपनी आस्था को आजीवन बरकरार रखा। 1917 में जन्में हंगल के बचपन का ज्यादातर समय पेशावर में गुजरा। उनके परिवार में कई लोग अंग्रेजी राज में अफसर थे और वे चाहते थे कि एके हंगल भी अफसर ही बनें, लेकिन उन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता संघर्ष में लगाने का फैसला कर लिया था, उन्हें अंग्रेजों की गुलामी कबूल नहीं थी। आजादी की लड़ाई में वह जेल भी गये। बलराज साहनी, कैफी आजमी सरीखे अपने साथियों के साथ वह सांस्कृतिक परिवर्तन के संघर्ष में शामिल हुए। कराची में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव रहे। सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलनों और मजदूर आंदोलनों के साथ एक प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के बतौर उनका जुड़ाव रहा। वह भारत-पाकिस्तान की जनता की साझी प्रगतिशील सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे।

एके हंगल एक ऐसे संस्कृतिकर्मी थे, जिन्होंने नाटकों में काम करने के साथ-साथ आजीविका के लिए टेलरिंग का काम भी किया और इस पेशे में उन्होंने बहुतों को प्रशिक्षित भी किया। उन्होंने 18 साल की उम्र में नाटक करना शुरू कर दिया था, लेकिन फिल्मों में चालीस साल की उम्र में आये- तीसरी कसम में निभाई गई एक छोटी सी भूमिका के जरिए। उसके बाद उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया और भारतीय जनता के लिये वह ऐसे आत्मीय बुजुर्ग बन गये, जिनके द्वारा निभाए गये फिल्मी चरित्रों को लोग अपने जीवन का हिस्सा समझने लगे। उन्होंने अभिनय को यथार्थ की समझदारी से जोड़ा और छोटे से छोटे दृश्यों को भी यादगार बना दिया। हिन्‍दी फिल्मों में जब भी गरीब, लाचार उपेक्षित व्यक्तियों या समुदायों और बुजुर्ग लोगों की जिन्‍दगी के मार्मिक दृश्यों या प्रसंगों की चर्चा होगी, तब-तब एके हंगल का बेमिसाल अभिनय याद आयेगा। ‘बावर्ची’, ‘नमकहराम’, ‘शोले’, ‘शौकीन’, ‘अभिमान’, ‘गुड्डी’ आदि उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्में हैं। हिन्‍दी सिनेमा में अपराधियों और काले धन के हस्तक्षेप तथा आम जन जीवन की सच्चाइयों के गायब होने और एक भीषण आत्मकेंद्रित मध्यवर्ग की अभिरुचि के अनुरूप फिल्में बनाये जाने को लेकर वे काफी चिंतित रहते थे।

भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। लेकिन बहुप्रशंसित और सम्मानित इस अभिनेता के जीवन के आखिरी दौर में जबकि अपने ऑटोबायोग्राफी के लिये जरूरत के तहत वह अपने पुश्तैनी घर देखने गये थे और पाकिस्तानी डे फंक्शन के आमंत्रण को स्वीकार करके वहाँ चले गये तो साम्‍प्रदायिक-फाँसीवादी राजनीति के लिये कुख्यात शिवसेना के प्रमुख ने 1993 में देशद्रोह का आरोप लगाकर उनकी फिल्मों पर बैन लगा दिया था। उनकी फिल्मों को थियेटर्स से हटा दिया गया था। फिल्मों के पोस्टर फाड़े गये थे और एके हंगल के पुतले जलाए गये थे, फोन से धमकियाँ भी दी गई थीं। दो साल तक उनका बहिष्कार किया गया। उस वक्त उन्होंने कहा था कि वह स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, उन्हें किसी से कैरेक्टर सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है।

बेशक जनता का सम्मान और सर्टिफिकेट किसी भी संस्कृतिकर्मी के लिये बड़ा सम्मान और सर्टिफिकेट होता है और यह एके हंगल को मिला। वह भारत-पाकिस्तान दोनों देशों में प्रगतिशील-जनवादी मूल्यों और मनुष्य के अधिकार के लिए लड़ने वाले सारे संस्कृतिकर्मियों और आंदोलनकारियों के जीवित पुरखे थे। देश में बढ़ती पूँजीवादी अपसंस्कृति, श्रमविरोधी राजनीतिक संस्कृति, सामप्रदायिक-अंधराष्ट्रवादी विचारों के विरोध में गरीबों-बेबसों और मेहनतकशों की जिन्‍दगी की पीड़ा और आकांक्षा को अभिव्यक्ति देना तथा उनकी एकता को मजबूत करना ही एके हंगल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जन संस्कृति मंच उनके निधन पर गहरी शोक संवेदना जाहिर करते हुए उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेता है।

(प्रणय कृष्ण,  राष्ट्रीय महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी वि‍ज्ञप्‍ति‍)

कथाकार अरुण प्रकाश को जसम की श्रद्धांजलि

नई दि‍ल्‍ली : हिन्‍दी के वरिष्ठ कथाकार अरुण प्रकाश का 18 जून, 2012  को दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में लम्‍बी बीमारी के बाद निधन हो गया। बिहार के बेगूसराय में 22 फरवरी 1948 को जन्में अरुण प्रकाश अपने प्रगतिशील-जनवादी लेखन के लिये हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे। ‘भैया एक्सप्रेस’, ‘जल प्रांतर’, ‘मझधार किनारे’, ‘लाखों के बोल सहे’, ‘विषम राग’ और ‘स्वप्न घर’ जैसे कहानी संग्रहों के लेखक अरुण प्रकाश का उपन्यास ‘कोंपल  कथा’ और कविता संकलन ‘रात के बारे में’ भी चर्चित रहे। रोजगार के पलायन करने वाले बिहारी मजदूरों के जीवन संघर्ष पर केन्‍द्रि‍त उनकी कहानी ‘भैया एक्सप्रेस’ हो या उत्तर बिहार में बाढ़ की विभीषिका के बहाने पूरे समाज और व्यवस्था के अंतविर्रोधों और उसमें मौजूद द्वंद्वों को अभिव्यक्त करने वाली कहानी ‘जल प्रांतर’ हो, ये उनके प्रतिबद्ध लेखन की मिसाल हैं। उनकी रचनाओं में आम मेहनतकश लोगों के दुख-दर्द और समस्याओं को अभिव्यक्ति मिली।

सत्तर के तूफानी दशक में जिन नौजवान लेखकों ने साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बनाया, अरुण प्रकाश उनमें से एक थे। बिहार में नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय परिषद में भी रहे।

अरुण प्रकाश कुछ वर्षों तक अध्यापन और पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य करते रहे। उन्होंने अंग्रेजी से हिन्‍दी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद किया। वह ‘चंद्रकांता’ सहित कई धारावाहिकों, वृत्तचित्रों एवं टेलीफिल्मों से भी जुड़े रहे।

हाल के एक दशक में उन्होंने स्वयं को कथा समीक्षा और आलोचना के लिए समर्पित कर दिया था।  अरुण प्रकाश को हिन्दी  अकादमी का साहित्यकार सम्मान, रेणु पुरस्कार, दिनकर सम्मान, सुभाष चंद्र बोस कथा सम्मान और कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार से नवाजा जा चुका था।

हाल के दिनों में उन्होंने साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के कई अंकों का सम्‍पादन भी किया था। अरुण जी का असमय जाना हिन्दी साहित्य संसार की गहरी क्षति है। जन संस्कृति मंच की विनम्र श्रद्धांजलि!

(प्रणय कृष्ण, महासचिव जन संस्कृति मंच की ओर से जारी )

जिसने गजलों को जन प्रतिरोध का माध्‍यम बनाया : प्रणय कृष्‍ण

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में परसपुर के आटा ग्राम में 22 अक्टूबर, 1947 को जन्मे अवामी शायर अदम गोंडवी ( मूल नाम- रामनाथ सिंह)  ने 18 दिसम्‍बर, 2011 को  सुबह करीब पांच बजे पी. जी. आई, लखनऊ में अंतिम साँसे लीं। पिछले कुछ समय से वह लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे।  अदम गोंडवी ने अपनी ग़ज़लों को जन-प्रतिरोध का माध्यम बनाया। उन्होंने इस मिथक को अपने कवि-कर्म से ध्वस्त किया कि यदि समाज में बड़े जन-आन्दोलन नहीं हो रहे हों तो कविता में प्रतिरोध की ऊर्जा नहीं आ सकती। सच तो यह है कि उनकी ग़ज़लों ने बेहद अँधेरे समय में तब भी बदलाव और प्रतिरोध की ललकार को अभिव्यक्त किया जब संगठित प्रतिरोध की पहलकदमी समाज में बहुत क्षीण रही। जब-जब राजनीति की मुख्यधारा ने जनता से दगा किया, अदम ने अपने साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल साबित किया।

अदम गोंडवी  आजीविका के लिए  मुख्यतः  खेती-किसानी करते थे। उनकी शायरी को इंकलाबी तेवर निश्चय ही वाम आन्दोलनों के साथ उनकी पक्षधरता से प्राप्त हुआ था। अदम ने समय और समाज की भीषण  सच्चाइयों से,  उनकी स्थानीयता के पार्थिव अहसास के साक्षात्कार लायक बनाया ग़ज़लको। उनसे पहले ‘चमारों की गली’ में ग़ज़ल को कोई न ले जा सका था।

‘मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको’ जैसी लम्बी कविता न केवल उस ‘सरजूपार की मोनालिसा’ के साथ बलात्कार, बल्कि प्रतिरोध के संभावना को सूंघकर ठाकुरों द्वारा पुलिस के साथ मिलकर दलित बस्ती पर हमले की भयानकता की कथा कहती है। ग़ज़ल की भूमि को सीधे-सीधे राजनीतिक आलोचना और प्रतिरोध के काबिल बनाना उनकी ख़ास दक्षता थी-

जुल्फ- अंगडाई – तबस्सुम – चाँद – आईना -गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब
पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की किताब
इस सदी की तिश्नगी का ज़ख्म होंठों पर लिए
बेयक़ीनी के सफ़र में ज़िंदगी है इक अजाब

भुखमरी, गरीबी, सामंती और पुलिसिया दमन के साथ-साथ उत्तर भारत में राजनीति के माफियाकरण पर हाल के दौर में सबसे मारक कवितायेँ उन्होंने लिखीं।  उनकी अनेक पंक्तियाँ आम पढ़े-लिखे लोगों की ज़बान पर हैं-

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

उन्होंने साम्प्रदायिकता के उभार के अंधे और पागलपन भरे दौर में ग़ज़ल के ढाँचे में सवाल उठाने, बहस करने और समाज की इस प्रश्न पर समझ और विवेक को विकसित करने की कोशिश की-

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

इन सीधी अनुभवसिद्ध, ऐतिहासिक तर्क-प्रणाली में गुंथी पंक्तियों में आम जन को साम्प्रदायिकता से आगाह करने की ताकत बहुत से मोटे-मोटे उन ग्रंथों से ज़्यादा है जो सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने रचे। अदम ने सेकुलरवाद किसी विश्विद्यालय में नहीं सीखा था, बल्कि ज़िंदगी की पाठशाला और गंगा-जमुनी तहजीब के सहज संस्कारों से पाया था।

आज जब अदम नहीं हैं तो बरबस याद आता है कि कैसे उनके कविता संग्रह बहुत बाद तक भी प्रतापगढ़ जैसे छोटे शहरों से ही छपते रहे, कैसे उन्होंने अपनी मकबूलियत को कभी भुनाया नहीं और कैसे जीवन के आखिरी दिनों में भी उनके परिवार के पास इलाज लायक पैसे नहीं थे। उनका जाना उत्तर भारत की जनता की क्षति है, उन तमाम कार्यकर्ताओं की क्षति है जो उनकी गजलों को गाकर अपने कार्यक्रम शुरू करते थे और एक अलग ही आवेग और भरोसा पाते थे, ज़ुल्म से टकराने का हौसला पाते थे, बदलाव के यकीन पुख्ता होता था। इस भीषण भूमंडलीकृत समय में जब वित्तीय पूंजी के नंगे नाच का नेतृत्व सत्ताधारी दलों के माफिया और गुंडे कर रहे हों, जब कारपोरेट लूट में सरकार का साझा हो, तब ऐसे में आम लोगों की ज़िंदगी की तकलीफों से उठने वाली प्रतिरोध की भरोसे की आवाज़ का खामोश होना बेहद दुखद है, अदम गोंडवी को जन संस्कृति मंच अपना सलाम पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा जारी)

वाम-लोकतांत्रिक संस्कृति और जनपक्षधर मीडिया के लिए भारी क्षति: प्रणय कृष्ण

कुबेर दत्त

नई दिल्ली : प्रसिद्ध कवि, फिल्मकार, चित्रकार और दूरदर्शन के पूर्व चीफ प्रोड्यूसर कुबेर दत्त का 3 अक्‍टूबर को निगमबोध घाट पर अंतिम संस्कार हुआ और उनकी अस्थियाँ गढ़मुक्तेश्वर में गंगा में विसर्जित की गईं। इस अवसर पर उनकी बेटी पूर्वा धन श्री, दामाद राजन, उनके बड़े भाई रवि दत्त और छोटे भाई सोमदत्त समेत उनका सारा परिवार मौजूद था।

02 अक्टूबर को दोपहर बाद उनकी पत्नी प्रसिद्ध नृत्यांगना और दूरदर्शन अर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त जब दिल्ली पहुँची, तो उन्होंने पाया कि वह जीवित नहीं हैं। सुबह किसी वक्त नींद में ही उन्होंने आखिरी साँस ली होगी।

उनके निधन से साहित्य-संस्कृति और मीडिया की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि जबर्दस्त कलात्मक ऊर्जा, वैचारिक आवेग और गहरी संवेदनशीलता से भरे कुबेर दत्त, जिन्होंने अभिव्यक्ति के लिए कई बार जोखिम उठाए, साहित्य-राजनीति की सत्ताओं से टकराव मोल लिया, वह इस कदर चुपचाप हमारे बीच से चले जाएंगे। साहित्य-संस्कृति की दुनिया में सक्रिय हर पीढ़ी के लोगों से उनके गहरे संवेदनात्मक संबंध थे। 3 अक्‍टूबर को मयूर विहार फेज-1 से जब उनकी आखिरी यात्रा की शुरुआत हुई तब हँस के संपादक राजेंद्र यादव भी वहाँ मौजूद थे। उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए निगमबोध घाट पर दिल्ली के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और मीडियाकर्मियों उमड़ पड़े। उन्हें अपना अंतिम सलाम करने विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद, चंचल चौहान, मंगलेश डबराल और प्रणय कृष्ण समेत तीनों वामपंथी लेखक संगठनों के पदाधिकारी और सदस्य वहाँ पहुँचे। वरिष्ठ आलोचक विष्णुचंद्र शर्मा, कवि रामकुमार कृषक, प्रसिद्ध लेखक वीरेंद्र कुमार वर्णवाल, वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु, गजलकार शेरजंग सिंह गर्ग, कवि इब्बार रब्बी, कथाकार महेश दर्पण, साहित्य अकादमी के पूर्व मानद निदेशक दिनेश मिश्र, ‘कथन’ के संपादक रमेश उपाध्याय, कवि विष्णु नागर, कवि पंकज सिंह, कथाकार पंकज बिष्ट, ‘उद्भावना’ के संपादक अजेय कुमार, कवि मदन कश्यप, कवि कृष्ण कल्पित, कवि उद्भ्रांत, कवयित्री निर्मला गर्ग, चित्रकार अशोक भौमिक, आलोचक गोपाल प्रधान, कवि-फिल्मकार देवी प्रसाद मिश्र, कवि रमेश आजाद, बली सिंह, धनंजय सिंह, रामनारायण स्वामी, सतीश सागर, सोमेश्वर, श्याम निर्मम, रमेश प्रजापति, पत्रकार उर्मिलेश, भाषा सिंह, मृत्युंजय प्रभाकर, उपेंद्र स्वामी, दूरदर्शन के पूर्व प्रोड्यूसर शरद दत्त, दूरदर्शन के पूर्व डीजी शशि कपूर, आकाशवाणी के डायरेक्टर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, राजेशखर ब्यास, भारतेंदु मिश्र, गोपाल गुप्ता, पीएन सिंह, बलदेव बंशी, महेंद्र महर्षि, योगराज टंडन, योग बत्रा, श्याम शर्मा, डीएन शर्मा, अमरनाथ अमर, विवेकानंद और कुबेर दत्त के अभिन्न सहयोगी श्याम सुशील समेत दिल्ली के अनेक साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और मीडियाकर्मी वहां मौजूद थे।

जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कुबेर दत्त के शोकसंतप्त परिजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि कुबेर जी का निधन वामपंथी-लोकतांत्रिक सांस्कृतिक धारा और जनपक्षधर मीडिया की दुनिया के लिए भारी क्षति है। प्रगतिशील-जनसांस्कृतिक मूल्यों के लिए कार्यरत अधिकांश लोगों के साथ उनके बहुत अंतरंग रिश्ते थे। काल काल अपात, केरल प्रवास, कविता की रंगशाला, धरती ने कहा फिर… और अंतिम शीर्षक नामक कविता पुस्तकों में हमारे समय की जटिलता, गहरा संकट, खौफ और उससे मुक्ति की जो बेचैनी है, वह पाठकों को बेहद बेचैन करती है। गहरी आत्मीयता से भरे उनके संस्मरण कभी भुलाए नहीं जा सकते। 1973 में  प्रोड्यूसर की हैसियत से उन्होंने दूरदर्शन में अपने सफर की शुरुआत की थी, बाद में वे चीफ प्रोड्यूसर भी हुए, डीडी भारती की जिम्मेवारी भी संभाली। फिलहाल वह डीडी भारती में सलाहकार थे। अभी भी हर हफ्ते डीडी भारती से उनके द्वारा तैयार ‘किताब की दुनिया’ और ‘सृजन’ कार्यक्रम प्रसारित होते थे। वह दूरदर्शन की ओर से नागार्जुन, शमशेर, अज्ञेय और केदारनाथ अग्रवाल के जन्म के सौ साल पूरे होने पर प्रकाशित होने वाली पुस्तक और डीवीडी के संपादन के कार्य में लगे हुए थे। दूरदर्शन में उनके द्वारा हजारों महत्वपूर्ण फीचर तैयार किए गए। अपने दौर की अनेक सांस्कृतिक-साहित्यिक सक्रियताओं को उन्होंने दस्तावेजीकृत किया है, जो हमारी सांस्कृतिक थाती है। उनके द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले कार्यक्रम ‘जनवाणी’ ने निःसंदेह दूरदर्शन को एक गंभीर और लोकप्रिय मीडिया बनाने में अहम भूमिका निभाई।

प्रणय कृष्ण ने कहा कि वह एक अच्छे चित्रकार भी थे, कई लघु पत्रिकाओं ने उनके चित्रों से अपने आवरण भी बनाए। संगीत की भी उन्हें गहरी समझ थी। रिटायर्ड होने के बाद भी कला-संस्कृति की गतिविधियों पर लिखने का उनका सिलसिला जारी था। वह भारत में बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रयासरत तमाम लोगों के साथी थे। स्वामी विवेकानंद और क्रांतिकारी हंसराज रहबर से वह बहुत प्रभावित थे। मार्क्‍सवाद  में उनकी गहरी आस्था थी और वह तमाम वामपंथी दलों की एकता के पक्षधर थे। अपनी परंपरा के साकारात्मक मूल्यों से मार्क्‍सवाद को उन्होंने हमेशा जोड़कर देखा।

7 अक्टूबर को कवि कुबेर दत्त और रंगकर्मी गुरुशरण सिंह की स्मृति में शाम 5:30 बजे जन संस्कृति मंच की ओर से गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक शोकसभा रखी गई है।

कुबेर दत्त: एक संक्षिप्त परिचय

1 जनवरी 1949- 02 अक्टूबर 2011
गांव- बिटावदा, जिला- मुजफ्फरनगर, उ.प्र.
शिक्षा-एम.ए. हिंदी, पत्रकारिता में डिप्लोमा, फिल्म टीवी इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे से दूरदर्शन प्रोड्यूसर के रूप में प्रशिक्षित
प्रकाशित कृतियां- काल काल अपात, केरल प्रवास, कविता की रंगशाला, धरती ने कहा फिर…(कविता संग्रह)
मीडिया- 1973 से दूरदर्शन में प्रोड्यूसर, स.के.नि, अधिशासी निर्माता और मुख्य निर्माता के पद पर कार्यरत।
दूरदर्शन में हजारों फीचर्स का निर्माण।
अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक-कला संबंधी कार्यक्रमों का निर्देशन।
चित्रकला में विशेष रुचि। हजारों पेंटिंग बनाईं। फिलहाल डीडी भारती के सलाहकार थे।
सार्क लेखक सम्मान, रूस और रेडियो प्राग द्वारा मीडिया पुरस्कार, सिने गोवर्स सोसाइटी आॅफ इंडिया द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ टीवी प्रोड्यूसर’ सम्मान समेत कई पुरस्कार ओर सम्मान।

(जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

क्रांतिकारी नाट्यकर्मी गुरुशरण सिंह को जसम की श्रद्धांजलि‍

संस्कृति की दुनिया में शहीद भगत सिंह की विरासत के वाहक पंजाब के विख्यात रंगकर्मी गुरुशरण सिंह नहीं रहे। वह उम्र के 82 साल पूरे कर चुके थे।

भगत सिंह उनके सबसे बड़े प्रेरण-स्रोत थे और उनके जीवन और सन्देश को वह लगातार अपने नाटकों में जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते रहे। यह भी अजब संयोग है क़ि उनका निधन 28 सितम्बर को हुआ जो शहीद-ए-आज़म का जन्मदिवस है। चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ और दोपहर बाद उनकी अंत्येष्टि संपन्न हुई। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक और संस्कृतिकर्मी शामिल थे। शोक सभा इतवार को होगी। परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं।

महज 16 साल की उम्र में गुरुशरण सिंह ने कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और ता-उम्र कम्यूनिस्ट उसूलों पर कायम रहे। फोन पर जन संस्कृति मंच के साथियों से बात करते हुए गुरुशरण जी की बड़ी बेटी ने गर्व के साथ कहा क़ि उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहेगा क़ि उनके पिता ने कभी भी किसी सरकार के साथ कोई समझौता नहीं किया, अपने उसूलों से कभी पीछे नहीं हटे।

रसायन शास्त्र से एम्.एस.सी. करने के उपरांत वह पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में रिसर्च आफिसर के पद पर नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाखड़ा नांगल बाँध और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहीं काम करते हुए उन्होंने 1956 से अपनी क्रांतिकारी नाट्य-यात्रा शुरू की। जब वह नाटक करते तो उसमें बेटियों सहित उनका पूरा परिवार भाग लेता। देश-विदेश में उन्होंने हज़ारों प्रस्तुतियां कीं। बगैर साजो-सामान के जनता के बीच गावों, मुहल्लों, चौराहों और सड़कों पर मामूली संसाधनों के साथ नाटक करना उनकी नाट्य-शैली का अभिन्न अंग था। सामंती शोषण, पूंजीवादी लूट और दमन तथा साम्राज्यवाद के विरोध में जन-जागरण इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता। तमाम समसामयिक घटनाओं के सन्दर्भ भी मूलतः इन्हीं केन्द्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उनके नाटकों में नियोजित रहते थे।

गुरुशरण सिंह ने जनता के रंगमंच, आन्दोलनकारी और प्रयोगधर्मी थियेटर, ग्रामीण रंगमंच का पंजाब में उसी तरह विकास किया जैसा क़ि बादल सरकार ने बंगाल में। यह एक अखिल भारतीय प्रक्रिया थी जो देश में आमूलचूल बदलाव के लिए चल रहे जन-संघर्षों के साथ संस्कृतिकर्मियों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर चलने के संकल्प से उपजी थी। जिस तरह बादल सरकार मूल कर्मभूमि बंगाल होने के बावजूद कभी बंगाल तक सीमित नहीं रहे, वैसे ही गुरुशरण सिंह भी कभी पंजाब तक महदूद नहीं रहे। यही कारण था क़ि प्रधानतः हिंदी-उर्दू क्षेत्र के संगठन जन संस्कृति मंच के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वह दिल्ली में अक्टूबर 1985 में सम्पन्न हुए उसके स्थापना सम्मलेन में संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए। क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय महासचिव चुने गए।

गुरुशरण सिंह और अवतार सिंह ‘पाश’ ऐसे क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मी थे जिन्होनें 1980 के दशक में अलगाववादी आन्दोलन में सुलगते पंजाब में पूरी निर्भीकता के साथ गाँव- गाँव जाकर भगत सिंह के सपनों, भारतीय क्रान्ति की जरूरत, समाजवाद की ज़रूरत, सामंती शोषण और साम्राज्यवाद के विरोध की आवाज़ को बुलंद किया। ‘पाश’ इसी प्रक्रिया में शहीद हुए।

गुरुशरण जी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका से भी कभी गुरेज़ नहीं किया। ‘पंजाब लोक सभ्याचार मंच’ और ‘इंकलाबी मंच, पंजाब’ के तो वे संस्थापक ही थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे। भाकपा (माले) के बहुत करीबी हमदर्द रहे और लगातार उसके कार्यक्रमों में सरगर्मी से शिरकत करते रहे। वह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी महज कलाकार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और समर्पित संस्कृतिकर्मी की भूमिका में रहे। अपने अभिन्न मित्र बलराज साहनी की याद में उन्होनें ‘बलराज साहनी यादगार प्रकाशन’ की स्थापना कर सैकड़ों छोटी-बड़ी किताबों का प्रकाशन किया जिनकी कीमत बहुत ही कम हुआ करती थी। इन किताबों को वह अक्सर खुद अपने झोले से निकाल कर बेचा भी करते थे। उनके लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं था।

लम्बे समय से बीमार रहने के बावजूद गुरुशरण जी सदैव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सजग और अपने उद्देश्यों के लिए सचेष्ट रहे। पंजाबी और हिन्दी में उनके ढेरों नाटक जनता की स्मृति में अमर रहेंगे। ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ या ‘जन्गीराम की हवेली’ जैसे उनके नाटक हिन्दी दर्शक भी कभी भूल नहीं सकते।

वह अपने सम्पूर्ण जीवन और संस्कृति-कर्म में जनवादी, खुशहाल और आज़ाद भारत के जिस सपने को साकार करने के लिए जूझते रहे, उसे ज़िंदा रखने और पूरा करने का संकल्प दोहराते हुए हम अपनी सांस्कृतिक धारा के जुझारू प्रतीक कामरेड गुरुशरण सिंह को जन संस्कृति मंच की और से लाल सलाम पेश करते हैं।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

अमरकांत होने का अर्थ : प्रणय कृष्‍ण

कथाकार अमरकांत को मि‍ले ज्ञानपीठ पुरस्‍कार के बहाने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की वि‍शेषताओं को रेखांकि‍त करता युवा आलोचक और जसम के महासचि‍व प्रणय कृष्‍ण का आलेख-

सादगी बड़ी कठिन साधना है। अमरकांत का व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों ही इसका प्रमाण हैं। अमरकांत के जीवन संघर्ष को कोई अलग से न जाने, तो उनके सहज, आत्मीय और स्नेहिल व्यवहार से शायद ही कभी समझ पाए कि‍ इस सहजता को कितने अभावों, बीमारियों, उपेक्षाओं और दगाबाजियों के बीच साधा गया है। आत्मसम्मान हो तो आत्मसम्मोहन, आत्मश्लाघा और आत्मप्रदर्शन की ज़रूरत नहीं पड़ती। मुझे लगता है कि‍ 16 साल की उम्र में बलिया के जिस बालक ने कॉलेज छोड़ जे. पी.- लोहिया- नरेन्द्र देव के नेतृत्व वाले ‘भारत छोडो़ आन्दोलन’ में कूद पड़ने का निर्णय लिया था, वह बालक अभी भी अमरकांत में ज़िन्‍दा है।

जिस रचनाकार की 2-3 कहानियाँ भी दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष उसे खडा़ करने में समर्थ हैं, (‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी ‘, ज़िन्दगी और जोंक’ या कोई चाहे तो अन्य कहानियाँ भी चुन सकता है), उसे उपेक्षा की मार पड़ती ही रही। ये उनके छोटे बेटे अरविन्द और बहू रीता का ही बूता था कि अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी छोड़ उन्होंने हिन्दी समाज के इस अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा है।

अमरकांत भारतीय जीवन की वि‍दूपताओं, उसकी घृणास्‍पद तफसीलों में बगैर कि‍सी अमूर्तन का सहारा लिए अपनी ठेठ निगाह जितनी देर तक टिका सकते हैं, उतना शायद ही कोई अन्य प्रेमचंदोत्तर कथाकार कर पाया हो।  उनका कथाकार भीषण रूप से अमानवीय होती  गयी  स्वातंत्र्योत्तर भारत  की परिस्थितियों के बीच बगैर भावुक हुए, बगैर किसी हाहाकार का हिस्सा बने पशुवत जीवन जीने को अभिशप्त किरदारों के भीतर भी इंसानियत की चमक को उभार देता  है। अमरकांत  साबित कर देते हैं  कि इसके लिए किन्ही बड़े आदर्शों का चक्कर  लगाना ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन खुद ऐसा ही है। जीवन से ज़्यादा विश्वसनीय कुछ और नहीं। ‘ज़िंदगी और जोंक’ का रजुआ एक असंभव सा पात्र है लेकि‍न पूरी तरह विश्वसनीय। हम आप भी रजुआ को जीवन में देखे हुए हैं, लेकिन उसके जीवन और चरित्र की जटिलताओं में जब हम अमरकांत की लेखनी की मार्फत प्रवेश करते हैं, तब हमारे सामने एक असंभव सा जीवन प्रत्यक्ष होता है, मानवता के सीमान्त पर बसर की जा रही ज़िंदगी  सहसा हमारे बोध में दाखिल होती है। विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है कि अमरकांत ‘कफ़न’ की परम्परा के रचनाकार हैं। ‘ज़िंदगी और जोंक’ के रजुआ का ‘करुण काइयांपन’ घीसू-माधो के काइयांपन की ही तरह उसकी असहायता की उपज है। यह कहानी उस अर्द्ध औपनिवेशिक और मज़बूत सामंती अवशेषों वाले भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट है जिसने गरीब आदमी को पशुता के स्तर पर जीने को मजबूर कर रखा है, जिसका ज़िंदा बचा रहना ही उसकी उपलब्धि है, जिसकी जिजीविषा ने ही उसे थेथर बना दिया है, जिसका इस समाज में होना ही व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी है और उसकी अमानवीयता का सूचकांक भी।

अमरकांत विडम्बनाओं और विसंगतियों को जिस भेदक व्यंग्य के साथ प्रकट करते हैं, वह दुर्लभ है। वह जिस बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के कथाकार हैं, उसकी जटिल टकराहटों में निर्मित किरदारों और जीवन व्यापार को वह ऐसी सहजता से पेश करते हैं कि कोई धोखा खा जाए। पशु-बिम्बों में अंकित अनगिनत मानवीय भंगिमाएँ, कहानियों की निरायास प्रतीकात्मकता, माहौल को सीधे संवेद्य बनाने वाली बिलकुल सामान्य जीवन-व्यवहार से ली गईं नित नूतन उपमाएं, जनपदीय मुहावरों और कथन-भंगिमाओं से भरी, सहज और खरी चलती हुई ज़बान, अद्भुत सामाजिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई से बुने गए तमाम दमित तबकों से खड़े किए गए उनके अविस्मर्णीय चरित्र, समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक उनके कथाकार की विशेषता है। रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू , ‘इन्हीं हथियारों से’ की  बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, ‘हत्यारे ‘ कहानी के दो नौजवान, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मर्णीय और विश्वसनीय किरदारों के ज़रिए अमरकांत ने हमारे समाज की विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह सरलता के जटिल सौन्दर्यशास्त्र का प्रतिमान है। उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के नव- साम्राज्यवादी दौर में भी अमरकांत के यथार्थवाद को विकल्पहीनता कभी क्षतिग्रस्त न कर सकी। इसका प्रमाण है 2003 में प्रकाशित उनका  उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ जो सन् 1942 के ‘भारत छोडो आन्दोलन’ की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है।

प्रगतिशील आन्दोलन के 75वें साल में अमरकांत को यह सम्मान मिलना एक सुखद संयोग है। ज्ञानपीठ से सम्मानित हिंदी के अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों का प्रगतिशील आन्दोलन से वैसा जीवन भर का सम्बन्ध नहीं रहा जैसा की अमरकांत का। अमरकांत को जितने सम्मान, पुरस्कार मिले हैं, उनकी कुल राशि से ज़्यादा उनके जैसे व्यापक रूप  से पढ़े जाने वाले लेखक की रायल्टी बनती थी, जिसे  देना उनके प्रकाशकों को गवारा न हुआ। पिछले 15 सालों से हमने अमरकांत को कम से कम तीन किराये के मकानों में देखा है। दो कमरों से ज़्यादा का घर शायद ही उन्हें मयस्सर हुआ हो।

‘इन्ही हथियारों से’ का एक अदना-सा पात्र कहता है, ‘‘बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धान्त सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धान्त,जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं।’’ अमरकांत का जीवन और रचना-कर्म खुद इस की तस्दीक करता है। काश ! हिन्दी के प्रतिष्ठान चलाने लोग अमरकांत होने के इस अर्थ को समझ पाते।

यह जनता की जीत है : प्रणय कृष्‍ण

जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उठी बहसों पर एक श्रृंखला लिखी है। इस लेखमाला की दो कडि़यां दी जा चुकी हैं। इस श्रृंखला का तीसरा और अंतिम लेख-

“It is not enough to be electors only. It is necessary to be law-makers; otherwise those who can be law-makers will be the masters of those who can only be electors. ” – Dr. Ambedkar

( महज मतदाता होना पर्याप्त नहीं . कानून -निर्माता होना ज़रूरी है, अन्यथा जो लोग कानून-निर्माता हो सकते हैं, वे उन लोगों के मालिक बन बैठेंगे जो कि महज चुननेवाले हो सकते हैं.”- डा. अम्बेडकर)

अन्ना ने अनशन तोड़ दिया… चुननेवालों ने कानून-निर्माताओं को बता दिया कि न तो वे सदा के लिए महज चुननेवाले बने रहेंगे और न ही कानून-निर्माताओं को अपना मालिक बनने देंगे। सिटिज़न  चार्टर, प्रदेशों  में  लोकायुक्त  की  नियुक्ति  का  प्रावधान  और  निचली  ब्यूरोक्रेसी  की  जांच, निरीक्षण और सज़ा को लोकपाल के दायरे में लाने की बात सिद्धांत रूप में संसद ने मानकर एक हद तक अपनी इज़्ज़त बचाई है। वोट अगर 184 के तहत होता तो इनके लिए इज़्ज़त बचाना और भी  मुश्किल होता। साफ़ पता चल जाता कि  कौन कहाँ है। क्रास-वोटिंग भी होती। शायद खरीद-फ़रोख्त भी। यह जीत सबसे ज़्यादा देश भर में  कस्बों और  गली-मोहल्लों में आबाद उन निम्नमध्यवर्ग और गरीब लोगों की है, अन्ना जिन  सबकी  आवाज़ बन गए, जिनके जुलूसों और नारों तक मीडिया की पहुँच नहीं थी  और  जिन्हें  इसकी  रत्ती  भर   परवाह  भी  नहीं  थी, जिन्हें  जाति-धर्म  के  नाम  पर  बरगलाया  न जा सका। शासकों को जनता ने मजबूर किया है कि सिर्फ़ विश्व-बैंक और अमेरिका के निर्देश में यहाँ कानून नहीं बनेंगे, बल्कि जनादेश से भी बन कर रहेंगे।
ये निश्चय ही जनता की जीत है। आंदोलन जब सांसदों को घेरने तक पहुँचा ऒर जेल भरो की तैयारी हो गई तो सारी ही पार्टियों को यह समझ में आया कि उनकी समवेत हार हो सकती है। इस आंदोलन का फ़ायदा न भाजपा उठा सकती थी, न कांग्रेस। कांग्रेस-भाजपा नूरा-कुश्ती तक नहीं कर पाए संसद में, जैसा कि वे न्यूक्लियर डील के सवाल पर कर ले गए थे। आगे हर किसी के सामने अनिश्चय की दीवार खडी़ थी, खुद आंदोलन के नेताओं के सामने भी। अभी भी संसदीय समिति के सामने संसद की भावना रखी जाने के बाद वह क्या करेगी, कहा नहीं जा सकता। ये बडे़ घाघ लोग हैं। फ़िर भी धमकी, चरित्र-हनन, दमन, छल-छंद, आंदोलन को तोडने का हर संभव प्रयास कर लेने के बाद ये हार गए। अन्ना भी कह रहे हैं कि लडाई में अभी पूरी जीत नहीं हुई है। यही सही बात है। आंदोलन का एक चरण पूरा हुआ।

आन्दोलन के कुछ दृश्य

1. 22 अगस्त, मानस विहार कालोनी, लखनऊ

हर दिन इस नई बस रही कलोनी में काम पर आए मज़दूरों के यहाँ से अन्ना के समर्थन में जुलूस निकलता है। सर पर गांधी टोपी पहने 5 साल का एक नन्हा हज़ारे अपनी माँ से ज़िद कर रहा है, मैं जुलूस के साथ जाऊंगा।

2. 24 अगस्त, भावनगर, गुजरात

भावनगर के स्कूल-कालेजों के 700 छात्र आइसा- इंकलाबी नौजवान सभा के आह्वान पर भ्रष्‍टाचार-विरोधी मार्च निकालते हैं। बडी तादाद में लड़कियां भी हैं। लाठीचार्ज ही नहीं, पुलिस बदसलूकी भी करती है। गिरफ़्तार किए गए चार छात्र नेता (दो लड़के और दो लड़कियां) जमानत लेने की जगह जेल जाना पसंद करते हैं। वे जेल से ही अपना वक्तव्य जारी करते हैं- “जब मोदी फ़र्ज़ी एनकाउन्टर और साम्प्रदायिक हिंसा में अपनी सरकार की भूमिका पर पर्दा डालने के लिए ईमानदार पुलिस अधिकारियों को दण्डित करता है, तो क्या यह भ्रष्टाचार नहीं?”. अगले दिन पूरे शहर के छात्र-छात्राएं थाना घेर लेते हैं। थानेदार माफ़ी मांगता है, छात्र बिना शर्त रिहा किए जाते हैं। मोदी द्वारा अन्ना के समर्थन का स्वांग तार-तार हो जाता है।

3. 24 अगस्त, द्वारका, सेक्टर-10, नई दिल्ली

एक अध्यापिका 17-18 साल के एक रिक्शाचालक के रिक्शे पर सवार होती हैं। बातचीत चल पड़ती है। रिक्शाचालक हरदोई का नौजवान है। कानपुर में स्कूल में पढ़ रहा था कि पिता की मौत  हो गई। नाम है मुख्तार सिंह (नाम से कहा नहीं जा सकता कि जाति क्या है)। मरते वक्त पिता ने पढा़ई जारी रखने के लिए कहा था। चाचा ने पैसे  देने से मना कर दिया। अब वह दिल्ली में रिक्शा खींचता है। मुख्तार सिंह इंटर के बाद बी. एड. करके स्कूल टीचर बनना चाहता है क्योंकि उसके मुताबिक यह पेशा सबसे अच्छा है जिसमें ज्ञान लिया ऒर दिया जाता है। अब मुख्तार ने प्राइवेट दाखिला लिया है। अध्यापिका पूछती है, “तुम दिन भर रिक्शा खींचते हो, तो पढते कब हो?” मुख्तार कहता है, ” मैडम, हर दिन शाम घर पहुँच कर मैं रोता हूँ, लेकिन सोचता हूँ कि अकेले में ही तो कष्ट नहीं उठा रहा हूँ। अब देखिए, अन्ना हज़ारे को, इस उम्र में भी कितना लड़ रहे हैं।” अध्यापिका का अगला सवाल है, “क्या रामलीला मॆदान गए थे?” “नहीं। हमें तो रोज़ कमाना है, रोज़ खाना है। चाह कर भी जा नही जा सके,” मुख्तार ने कहा।

4. 25 अगस्त, सलोरी, इलाहाबाद

यह इलाहाबाद का वह इलाका है जहाँ सबसे ज़्यादा छात्र रहते हैं। छोटे-छोटे कमरों में 2-2, 3-3 और कभी-कभी 4-4 छात्र। यहाँ रहना अपेक्षाकृत सस्ता है। ज़्यादातर छात्र अपना खाना खुद बनाते हैं, उन्हीं छोटे कमरों में। कई तो अपना राशन भी गाँव से ही लाते हैं। समझा जा सकता है कि ये किस तबके के छात्र हैं। जिस दिन अन्ना गिरफ़्तार हुए, इसी इलाके से लगभग एक हजार का जुलूस निकला। यह इस आन्दोलन का इलाहाबाद में आयोजित पहला जुलूस था। यों तो इलाहाबाद बहुत बडा़ शहर नहीं है, लेकिन सिविल लाइंस, हाई कोर्ट में फ़ंसी मीडिया की आंखें सलोरी तक नहीं पहुँच पाईं, तब भी नहीं जब यह जुलूस पांच किलोमीटर चलकर विश्वविद्यालय परिसर में 1942 के शहीद लाल पद्मधर की मूर्ति तक पहुँच गया।

यही आज भी होना तय था। मुझे भी सम्बोधित करना था। रामायन राम, सुनील मौर्य आदि छात्र नेता दिनभर इलाके में थे। वरिष्ठ छात्र राजेंद्र यादव सभा का संचालन कर रहे थे और बता रहे थे कि माध्यमिक शिक्षा परिषद, उच्चतर शिक्षा आयोग आदि में अध्यापक के पदों पर सामान्य, ओ.बी.सी. और अनु. जाति/जनजाति के अभ्यर्थियों के लिए अलग-अलग घूस के रेट्स क्या-क्या हैं। ये हर छात्र को यों भी मालूम है, जनरल नालेज की तरह। जे.एन.यू. छात्रसंघ के निवर्तमान अध्यक्ष संदीप सिंह ने भ्रष्टाचार और नई आर्थिक नीतियों के  अंतर्संबंध पर सारगर्भित भाषण दिया। मेरे बोलने के बाद ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ का एक गगनभेदी नारा किसी ने उठाया और आंधी-तूफ़ान की तरह लगभग एक हज़ार की संख्या में नौजवान  बढ़ चले परिसर की ओर, लाल पद्मधर के शहादत स्थल की ओर।

ऐसे हज़ारों दृष्य इस आन्दोलन के हैं, होंगे। हमें अपनी ओर से इनकी व्याख्या नहीं करनी। मत भूलिए कि चाहे कारपोरेट लूट हो या मंत्रियों, अफ़सरों द्वारा सरकारी खज़ानों में जमा जनता की गाढी़ कमाई की लूट हो, यह पूंजी का आदिम संचय है। भ्रष्टाचार के स्रोतों पर रोक लगाना पूंजी के आदिम संचय पर चोट करना है। इसी से इस पूंजीवादी लोकतंत्र के साझीदार सभी अपनी अपनी जाति-धर्म की जनता को इस आंदोलन से विरत करने में जुट चले। अगडा-पिछडा़-दलित-अल्पसंख्यक की शासक जमातों के नुमाइंदे संसद में एक साथ थे। उनकी वर्गीय एकजुटता देखने लायक थी। दूसरी ओर इन सभी तबकों के निम्नमध्यवर्गीय और गरीब लोग लगातार आंदोलन से आकर्षित हो रहे थे। लम्बे समय बाद जातिगत ऒर धर्मगत सामुदायिक चेतना में वर्गीय आधार पर दरारें दिखाई पडीं। अनेक दलों की गति सांप- छछूंदर की हुई। कभी समर्थन, कभी विरोध का नाटक चलता रहा। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने जनाधार को इस आंदोलन में जाने से रोकने की ताकत रखते हैं या नहीं। हर दिन  कैलकुलेशन बदल रहे थे। जब उन्हें लगा कि वे उन्हें नहीं रोक पा रहे हैं तो समर्थन का नाटक करते और जैसे ही थोडा आत्मविश्वास आता कि रोक सकते हैं, तो पलटी मार जाते। लेकिन जहाँ चुनाव महज गणित से जीते जा सकते हैं, वहीं आंदोलन जिस तरह का रसायन तैयार  करते हैं, उनमें गणित करनेवालों को अक्सर ही हतप्रभ रह जाना पडता है। एक उदाहरण देखें। मनरेगा, बी.पी.एल. कार्ड और गरीबों के लिए दूसरी तमाम योजनाओं में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में गरीब लोग उतरेंगे ही, चाहे वे दलित हों, अति पिछडे हों, अल्पसंख्यक हों या अन्य। कोई मायावती, कोई लालू इसे नहीं रोक सकते, भले ही इस तबके का वोट वे विकल्प के अभाव में पा जाते हों या आगे भी पाते रहें।

प्रतीकों  की  राजनीति  में  भी इस  आंदोलन  को  फ़ंसाने  की कई  कोशिशें  हुईं। झण्डे, बैनर, नारों के विद्वतापूर्ण  विश्लेषणों से  निष्कर्ष निकाले गए। अब  आंदोलन  के नेताओं को  भी इस आंदोलन की कमज़ोरियों, सीमाओं  और  ताकत का विश्लेषण  करना होगा और ऐसी  राजनीतिक ताकतों को भी जो देश में आमूल बदलाव चाहती हैं। उम्मीद यह भी जगी है कि रोज़गार का मौलिक अधिकार, महिला आरक्षण बिल, चुने  हुए प्रतिनिधियों को  वापस बुलाने  का  अधिकार, नकारात्मक वोट देने का अधिकार, खास सेक्टरों के राष्ट्रीयकरण के कानून बनवाने तथा सेज़, न्यूक्लियर-डील, ए.एफ़.एस. पी.ए. जैसे दमनकारी कानूनों को रद कराने के बडे़ आंदोलन यह देश आगामी समय में देखेगा।

 

 

अन्ना और संसद : प्रणय कृष्ण

जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उठी बहसों पर एक श्रृंखला लिख रहे हैं। प्रस्तुत है इस लेखमाला की दो कडि़यां-

“जिसे आप पार्लियामेंटों की माता” कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कडे हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर-दबाव डालनेवाला कोई न हो, तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक  एसिक्वथ है, तो कल वालफर होगा तो परसों कोई तीसरा।”                                                                                            -हिंद स्वराज (1909) में गांधी

गांधी के उपरोक्त उद्धरण को यहाँ रखते हुए इसे न तो  मैं सार्वकालिक सत्य की तरह उद्धृत कर रहा हूं, न अपनी और से कुछ कहने के लिए, बल्कि इंग्‍लैंड की तब की बुर्जुआ पार्लियामेंट के  बारे में गांधी के विचारों को ही आज के, बिलकुल अभी के  हालात को समझने के  लिए रख रहा हूं।

अभी भी प्रधानमंत्री इस बात पर डटे हुए हैं कि अन्ना का आन्दोलन संसद की अवमानना करता है और इसीलिए अलोकतांत्रिक है। दरअसल लोकरहित संसद महज तंत्र है और इस तंत्र को  चलानेवाले (मंत्रिमंडल) के सदस्य तब से लोक को गाली दे रहे हैं, जब से अन्ना का पहला अनशन जंतर-मंतर पर शुरू  हुआ। लोकतंत्र और संविधान की चिंता  में दुबले हो रहे कुछ अन्य दल जैसे कि राजद और  सपा ने भी अपने सांसदों रघुवंश प्रसाद और मोहन सिंह के ज़रिए तब यही रुख अख्तियार कर रखा था। संसद  की  रक्षा में तब कुछ वाम नेताओं के लेख भी आए थे, जबकि संसद को जनांदोलन  से ऊपर रखने को मार्क्सवादी शब्दावली में  ‘संसदीय बौनापन’ कहा जाता है। यदि भाकपा (माले) जैसे वामदल और उससे जुडे़ संगठनों को छोड़ दें जिन्होंने जंतर-मंतर वाले अन्ना के अनशन के  साथ ही इस मुद्दे पर आन्दोलन का रुख अख्तियार कर लिया तो अन्य वामदलों ने जिनकी संसद में अभी भी अच्छी संख्या है, ‘वेट एंड वाच’ का रुख अपनाया। कर्नाटक और अन्यत्र तथा केंद्र में अपने पिछले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में फंसी भाजपा ने अन्ना के आन्दोलन के समानांतर रामदेव को खड़ाकर जनाक्रोश को अपने फायदे में भुनाने की भरपूर कोशिश की। संघ का नेटवर्क रामदेव के लिए लगा। लेकिन कांग्रेसियों ने खेले-खाए रामदेव को उन्हीं के जाल में फंसा दिया। योग के  नाम पर सत्ताधारी दल से जमीन और तमाम दूसरे फायदे उठाने वाले रामदेव का  हश्र होना  भी यही था।

बहरहाल आज स्थिति बदली हुई है। लोकपाल बिल पर सिविल सोसाईटी से किये हर वादे से मुकरने के बाद सरकार ने पूरी मुहिम चलाई क़ि अन्ना हठधर्मी हैं, संविधान और संसद को नहीं मानते। टीआरपी केन्द्रित मीडिया भले ही इस उभार को परिलक्षित कर रहा हो लेकिन अगर बड़े अंगरेजी अखबारों के हाल-हाल तक के सम्पादकीय पढ़िए तो लगभग सभी ने कांग्रेसी लाइन का समर्थन किया। किसी ने पलटकर यह पूछना गवारा न किया क़ि क्या जनता का एकमात्र अधिकार वोट देना है? जनता के अंतर्विरोधों को साधकर तमाम करोडपति भ्रष्ट और कारपोरेट दलाल मनमोहन सिंह, चिदंबरम, सिब्बल, शौरी, प्रमोद महाजन, मोंटेक आदि विश्व बैंक और अमरीका निर्देशित विश्व व्यवस्था के हिमायती अगर संसद को छा लें तो जनता को क्या करना चाहिए?

क्या वोट पाने के बाद सांसदों को कुछ भी करने का अधिकार है? क्या संसद में उनके कारनामों पर जनता का कोई नियंत्रण होना चाहिए या नहीं? यदि होना चाहिए तो उसके तरीके क्या हों? क्यों न जनादेश की अवहेलना करने वालों को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता के पास हो? यदि यह अधिकार कम्युनिस्ट शासन द्वारा वेनेजुएला की जनता के लिए लाये गए संवैधानिक सुधारों में शामिल है, तो भारत जैसे कथित रूप से ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ में जनता को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों ‘किसी को भी वोट न देने’ या ‘विरोध में वोट देने’ का विकल्प मतपत्र में नहीं दिया जा सकता? लेकिन मीडिया बैरनों को ये सारे सवाल सत्ताधारियों से पूछना गवारा न था।

एक मोर्चा यह खोला गया क़ि जैसे जेपी आन्दोलन से संघ को फ़ायदा हुआ, वैसे ही अन्ना के आन्दोलन से भी होगा। अब मुश्किल यह है क़ि जिस बौद्धिक वर्ग में यह सब ग्राह्य हो सकता था, उसके पास नेहरू-गोविंदबल्लभ पन्त से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस और संघ परिवार के बीच तमाम आपसी दुरभिसंधियों का डाक्युमेंटेड  इतिहास है। जेपी आन्दोलन से संघ को जो वैधता मिली हो, लेकिन आज़ादी के बाद संघ को समय-समय पर जितनी मजबूती प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कांग्रेस ने पहुंचाई है, उतनी किसी और ने नहीं। उसके पूरे इतिहास के खुलासे  की न यहाँ जगह है और न जरूरत। बहरहाल शबनम हाशमी और अरुणा राय जैसे सिविल सोसाईटीबाज़, जिनका एक्टिविज्म कांग्रेसी सहायता के बगैर एक कदम भी नहीं चलता, ‘संघ के हव्वे’ पर खेल गए। मुँहफट कांग्रेसियों ने अन्ना के आन्दोलन को संघ से लेकर  माओवाद तक से जोड़ा, लेकिन उन्हें इतनी बड़ी जनता नहीं दिखी, जो इतनी सारी वैचारिक बातें नहीं जानती। वह एक बात जानती है क़ि सरकार पूरी तरह भ्रष्ट  है और अन्ना पूरी तरह उससे मुक्त।

अभी कल तक कुछ चैनलों के संवाददाता अन्ना के समर्थन में आये सामान्य लोगों से पूछ रहे थे क़ि वे जन लोकपाल बिल और सरकारी बिल में क्या अंतर जानते हैं? बहुत से लोगों को नहीं पता था, लेकिन उन्हें इतना पता था क़ि अन्ना सही हैं और सरकार भ्रष्ट। जनता का जनरल नालेज टेस्ट कर रहे इन संवाददाताओं के जनरल नालेज की हालत यह थी क़ि वे यहाँ तक कह रहे थे क़ि आन्दोलन अभी तक मेट्रो केन्द्रों तक ही सीमित है। उन्हें सिर्फ प्रादेशिक राजधानियों में ही अन्ना का समर्थन दिख रहा था। देवरिया, बलिया, आरा, गोरखपुर, ग्वालियर, बस्ती, सीवान, हजारीबाग, मदुरै, कटक, बर्दमान, गीरिडीह, सोनभद्र से लेकर लेह-लद्दाख और हज़ारों कस्बों और छोटे कस्बों में निम्न मध्यवर्ग के बहुलांश में इनको परिवर्तन की तड़प नहीं दिख रही।

जबसे नयी आर्थिक नीतियाँ शुरू हुईं, तबसे भारत की शासक पार्टियों ने विभाजनकारी, भावनात्मक और उन्मादी मुद्दों को सामने लाकर बुनियादी सवालों को दबा दिया। इस आन्दोलन में भी जाति और धर्मं के आधार पर लोगों को आन्दोलन से दूर रखने की कोशिशे तेज हैं। बहुतेरी जातियों के कथित नेता और बुद्धिजीवी चैनलों में बिठाये जा रहे हैं ताकि वे अपनी जाति और समुदाय को इस आन्दोलन से अलग कर सकें। राशिद अल्वी का बयान खासतौर पर बेहूदा है क्योंकि वह साम्राज्यवाद विरोधी ज़ज्बे को साम्प्रदायिक नज़र से समझता है। अल्वी, जो कभी बसपा में थे और ज़ातीतौर पर शायद उतने बुरे आदमी नहीं समझे जाते, उन्हें कांग्रेसियों ने  यह समझाकर रणभूमि में भेजा कि अमेरिका से  अगर किसी तरह इस आन्दोलन का संबंध जोड़ दिया जाए तो मुसलमान तो जरूर ही भड़क जायेंगे। अमेरिका जो हर मुल्क की अंदरूनी हालत पर टिप्पणी करके अपने वर्चस्व और हितों की हिफाजत करता है, उसने अन्ना के आन्दोलन पर सकारात्मक टिप्पणी करके इसका आधार भी मुहैय्या करा दिया। जबकि अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है।

आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं। पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे। अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे  थे एक चैनल पर। यह वही चंद्रभान जी हैं  जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है। यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था। अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस ‘महान’ प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा है?  वफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है। अगर किसी दलित को भ्रमित भी होना होगा तो वह मायावती से भ्रमित होगा या चंद्रभान जी से ?

आज का मध्यवर्ग और खासकर निम्न मध्य वर्ग आज़ादी के पहले वाला महज सवर्ण मध्यवर्ग नहीं रह गया है। अगर यह आन्दोलन आशीष नंदी जैसे अत्तरवादियों की निगाह में महज मध्यवर्गीय है, तो इसमें पिछड़े और दलित समुदाय का मध्यवर्गीय हिस्सा भी अवश्य शामिल है। पिछले अनशन में मुझे इसीलिये रिपब्लिकन पार्टी, वाल्मीकि समाज आदि के बैनर और मंच जंतर-मंतर पर देख ज़रा भी अचरज नहीं हुआ था। अब जबकि लालू, मुलायम और मायावती भी अन्ना की गिरफ्तारी के बाद लोकतांत्रिक हो उठे हैं, तो इस आन्दोलन को तोड़ने के जातीय कार्ड की भी सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं।

बे अंदाज़ कांग्रेसियों ने अन्ना को अपशब्द और भ्रष्ट तक कहा. हत्या का मंसूबा रखने वाले जब देख लेते हैं  कि वे हत्या नहीं कर पा रहे, तो ‘चरित्र हत्या’ पर उतरते हैं। शैला मसूद की भाजपाई सरकार के अधीन हत्या की जा सकती थी, तो उनकी हत्या कर दी गई। अन्ना की हत्या नहीं की जा सकती थी, सो उनकी चरित्र हत्या की कोशिश की गई। अब राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसियों को अन्ना के आन्दोलन के पीछे अमेरिकी हाथ दिखाई दे रहा है। कभी इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस अपने हर विरोधी को ‘सीआईए एजेंट’ की पदवी से नवाज़ा करती थी। राशिद अल्वी भूल गए हैं कि अमेरिकी हाथ वाला नुस्खा पुराना है, और अब दुनिया ही नहीं बदल गई है, बल्कि उनकी पूरी सरकार ही देश में अमेरिकी हितों की सबसे बड़ी रखवाल है। तवलीन सिंह आदि दक्षिणपंथी इस चिंता में परेशान हैं कि अन्ना खुद और उनके  सहयोगी क्यों भ्रष्टाचार को साम्राज्य्परस्त आर्थिक नीतियों से जोड़ रहे हैं?

गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा था- “अगर पार्लियामेंट बाँझ न हो तो इस तरह  होना चाहिए। लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेंबर चुन कर भेजते हैं… ऐसी पार्लियामेंट को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, न दबाव की। उस पार्लियामेंट का काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए। लेकिन इसके उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेंट के मेंबर दिखावटी और स्वार्थी पाए जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के  कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम करती है। जो काम आज किया उसे कल रद करना पड़ता है। आज तक एक ही चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं, या बैठे-बैठे झपकियाँ लेते हैं। उस पार के मेंबर इतने जोरों से चिल्लाते है कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे ‘दुनिया की बातूनी’ जैसा नाम दिया है…. अगर कोई मेंबर इसमें अपवादस्वरूप निकल आये तो उसकी कमबख्ती ही समझिये। जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए। ब्रिटिश पार्लियामेंट महज प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। यह विचार मेरे खुद के हैं, ऐसा आप न माने…. एक मेंबर ने तो यहाँ तक कहा है कि पार्लियामेंट धर्मनिष्ठ आदमी के लायक नहीं रही….. आज सात सौ बरस के बाद भी पार्लियामेंट बच्चा ही हो तब वह बड़ी कब होगी।”

 

लेखमाला की दूसरी किस्‍त-

अन्‍ना, अरुंधति और देश

आज अन्ना के अनशन का आठवाँ दिन है। उनकी तबियत बिगड़ी है। प्रधानमंत्री का ख़त अन्ना को पहुँचा है। अब वे जन लोकपाल को संसदीय समिति के सामने रखने को तैयार हैं। प्रणव मुखर्जी से अन्ना की टीम की वार्ता चल रही है। सोनिया-राहुल आदि के हस्तक्षेप का एक स्वांग घट रहा है जिसमें कांग्रेस, चिदंबरम, सिब्बल  आदि से भिन्न आवाज में बोलते हुए गांधी परिवार के बहाने संकट से उबरने की कोशिश कर रही है। आखिर उसे भी चिंता है क़ि जिस जन लोकपाल के प्रावधानों के खिलाफ कांग्रेस और भाजपा दोनों का रवैया एक है, उस पर चले जनांदोलन का फायदा कहीं भाजपा को न मिल जाये। ऐसे में कांग्रेस ने सोनिया-राहुल को इस तरह सामने रखा है मानो वे नैतिकता के उच्च आसन से इसका समाधान कर देंगे और सारी गड़बड़ मानो सोनिया की अनुपस्थिति के कारण हुई। इस कांग्रेसी रणनीति से संभव है क़ि कोई समझौता हो जाए और कांग्रेस, भाजपा को पटखनी दे फिर से अपनी साख बचाने में कामयाब हो जाये। फिर भी अभी यह स्पष्ट नहीं है क़ि संसदीय समिति अंतिम रूप से किस किस्म के प्रारूप को हरी झंडी देगी, कब यह बिल सदन में पारित कराने के लिए पेश होगा और अंततः जो पारित होगा, वह क्या होगा? कुल मिलाकर इस आन्दोलन का परिणाम अभी भी अनिर्णीत है। यदि जन लोकपाल बिल अपने मूलरूप में पारित होता है तो यह आन्दोलन की विजय है अन्यथा अनेक  बड़े आंदोलनों की तरह इसका भी अंत समझौते या दमन में हो जाना असंभव नहीं है। आन्दोलन का हस्र जो भी हो, उसने जनता की ताकत, बड़े राष्ट्रीय सवालों पर जन उभार की संभावना और जरूरत तथा आगे के दिनों में भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ विराट आन्दोलनों की उम्मीदों को जगा दिया है।

रालेगाँव सिद्धि से पिछले अनशन तक एक दूसरे अन्ना का आविष्कार हो चुका था और पहले अनशन से दूसरे के बीच  एक अलग ही अन्ना सामने हैं। ये जन आकांक्षाओं की लहरों और आवर्तों से पैदा हुए अन्ना हैं। ये वही अन्ना नहीं हैं. वे अब चाहकर भी पुराने अन्ना नहीं बन सकते। जन कार्यवाहियों के काल प्रवाह से छूटे  हुए कुछ बुद्धिजीवी अन्ना और इस आन्दोलन को अतीत की  छवियों में देखना चाहते हैं। अन्ना गांधी सचमुच नहीं हैं। गांधी एक संपन्न, विदेश-पलट  बैरिस्टर से शुरू कर लोक की स्वाधीनता की आकांक्षाओं के जरिये महात्मा के नए अवतार में ढाल दिए गए। हर जगह की लोक चेतना ने उन्हें अपनी छवि में बार-बार गढ़ा- महात्मा से चेथरिया पीर तक। अन्ना सेना में ड्राइवर थे। उन्हें अपने वर्ग अनुभव के साथ गांधी के विचार मिले। इन विचारों की जो अच्छाइयां-बुराइयाँ थीं, वे उनके साथ रहीं। अन्ना जयप्रकाश भी नहीं हैं। जयप्रकाश गरीब घर में जरूर पैदा हुए थे लेकिन उन्होंने अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। ये अन्ना को नसीब नहीं हुई। रामलीला मैदान में अन्ना ने यह चिंता व्यक्त की क़ि किसान और मजदूर अभी इस आन्दोलन में नहीं आये हैं। उनका आह्वान करते हुए उन्होंने कहा- “आप के आये बगैर यह लड़ाई अधूरी है।” जेपी आन्दोलन में ये शक्तियां सचमुच पूरी तरह नहीं आ सकी थीं। बाबा नागार्जुन ने 1978 में लिखा था-

जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा
जीत हुई पटना में, दिल्ली में हारा
क्या करता आखिर, बूढा़ बेचारा
तरुणों ने साथ दिया, सयानों ने मारा
जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा

लिया नहीं संग्रामी श्रमिकों का सहारा
किसानों ने यह सब संशय में निहारा
छू न सकी उनको प्रवचन की धारा
सेठों ने थमाया हमदर्दी का दुधारा
क्या करता आखिर बूढा बेचारा

कूएं से निकल आया बाघ हत्यारा
फंस गया उलटे हमदर्द बंजारा
उतरा नहीं बाघिन के गुस्से का पारा
दे न पाया हिंसा का उत्तर करारा
क्या करता आखिर बूढा़ बेचारा

जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा
मध्यवर्गीय तरुणों ने निष्ठा से निहारा
शिखरमुखी दल नायक पा गए सहारा
बाघिन के मांद में जा फंसा बिचारा
गुफा में बंद है शराफत का मारा

अन्ना ने यह कविता शायद ही पढी हो लेकिन इस आन्दोलन में किसान-मजदूरों के आये बगैर अधूरे रह जाने की उनकी बात यह बताती है क़ि उन्हें खुद भी जनांदोलनों के पिछले इतिहास और खुद उनके द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन की कमियों-कमजोरियों का एहसास है। अन्ना सचमुच यदि गांधी और जेपी (उनकी महानता के बावजूद) की नियति को ही प्राप्त होंगे तो यह कोई अच्छी बात न होगी।

सरकार ने महाराष्ट्र के टाप ब्यूरोक्रेट सारंगी और इंदौर के धर्मगुरु भैय्यू जी महराज को अन्ना के पास इसलिए भेजा था क़ि अन्ना को उनके थिंक टैंक से अलग कर दिया जाये। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे भी बिचौलिया बनने के लिए तैयार बैठे थे। ये लोग उस अन्ना की खोज में निकले थे जो राजनीतिक रूप से अपरिपक्व थे, जो कुछ का कुछ बोल जाया करते थे, और गुमराह भी किये जा सकते थे। शायद भैय्यू जी आदि को वह अन्ना प्राप्त नहीं हुए, जो अपनी सरलता में गुमराह होकर अपने प्रमुख सहयोगियों का साथ छोड़ कोई मनमाना फैसला कर डालें। लोकपाल बिल के लिए बनी संसदीय समिति में लालू जी जैसे लोग भी हैं। अब यह संसदीय समिति डाईलाग के दरवाजे खोले खड़ी है। कांग्रेस सांसद प्रवीण ऐरम ने उसके विचारार्थ जन लोकपाल का मसौदा भेज दिया था। भाजपा के वरुण गांधी जन लोकपाल का प्राइवेट मेंबर बिल लाने को उद्धत थे। कुल मिलाकर कांग्रेस-भाजपा दोनों बड़ी पार्टियां जो जन लोकपाल के खिलाफ हैं, जनता के तेवर भांप अपने एक-एक सांसद के माध्यम से यह सन्देश देकर लोगों में भ्रम पैदा करना चाहती थीं कि वे जनता के साथ हैं। एक तरफ सारंगी, भैय्यू जी, शिंदे, ऐरन और वरुण गांधी आदि द्वारा आन्दोलन को तोड़ने या फिर अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के प्रयास था, तो दूसरी ओर  तमाम भ्रष्टाचारी दल और नेताओं द्वारा आन्दोलन में घुसपैठ तथा आन्दोलन में जा रहे अपने जनाधार को मनाने-फुसलाने-बहकाने की कोशिशें तेज थीं। मुलायम और मायावती द्वारा अन्ना का समर्थन न केवल इस प्रवृत्ति को दिखलाता है बल्कि इस भय को भी क़ि जनाक्रोश भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश महज यूपीए के खिलाफ जाकर नहीं रुक जाएगा। उसकी आँच से ये लोग भी झुलस सकते हैं।

अरुणा राय, जो कांग्रेस आलाकमान की नजदीकी हैं, एक और लोकपाल बिल लेकर आयी हैं। उनका कहना है क़ि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में इस शर्त पर लाया जाये क़ि उस पर कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजामंदी जरूरी हो। शुरू से ही कांग्रेस का यह प्रयास रहा है क़ि जन लोकपाल के विरुद्ध वह न्यायपालिका को अपने पक्ष में खींच लाये, क्योंकि जन लोकपाल में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को भी लोकपाल के अधीन माना गया है। बहरहाल, संसद न्यायपालिका को लोकपाल से बचा ले और न्यायपालिका संसद और प्रधानमंत्री को लोकपाल से बचा ले, इस लेन-देन का पूर्वाभ्यास लम्बे समय से चल रहा है। ‘ज्युडीशियल स्टैंडर्ट्स एंड एकाउंटेबिलिटी  बिल’ जिसे पारित किया जाना है, उसके बहाने अरुणा राय लोकपाल के दायरे से न्यायपालिका को अलग रखने का प्रस्ताव करते हुए प्रधानमंत्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सहमति का एक लेन-देन भरा पैकेज तैयार कर लाई हैं। ज्युडीशियल कमीशन के सवाल पर संसदीय वाम दलों सहित वे नौ पार्टियां भी सहमत हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया है। भाजपा इस मुद्दे पर अभी भी चुप है। अब तक वह प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के विरुद्ध कांग्रेस जैसी ही पोजीशन लेती रही है। शायद उसे अभी भी यह लोभ है क़ि अगला प्रधानमंत्री उसका होगा। वह न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में लाने के सवाल पर अपने पिछले नकारात्मक रवैय्ये पर किसी पुनर्विचार का संकेत नहीं दे रही। इसीलिये अन्ना के सहयोगियों ने भाजपा से अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की है।

अरुणा राय ने जन लोकपाल के दायरे से भ्रष्टाचार के निचले और जमीनी मुद्दों को अलग कर सेन्ट्रल विजिलेंस कमीशन के अधीन लाये जाने का प्रस्ताव किया है। सवाल यह है क़ि क्या सीवीसी के चयन की प्रक्रिया और भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने का उसका अधिकार कानूनी संशोधन के जरिये वैसा ही प्रभावी बनाया जाएगा, जैसा क़ि जन लोकपाल बिल में है? अरुणा राय ने जन लोकपाल बिल को संसद और न्यायपालिका से ऊपर एक सुपर पुलिसमैन की भूमिका निभाने वाली संस्था के रूप में उसके संविधान विरोधी होने की निंदा की है। उनके अनुसार जन लोकपाल के लिए खुद एक विराट मशीनरी की जरूरत होगी और इतनी विराट मशीनरी को चलाने वाले जो बहुत सारे लोग होंगें, वे सभी खुद भ्रष्टाचार से मुक्त होंगें, इसकी गारंटी नहीं की जा सकती। आश्चर्य है क़ि बहन अरुंधति राय ने  भी लगभग ऐसे ही विचार व्यक्त किये हैं। उनके हाल के एक लेख में अन्ना के आन्दोलन के विरोध में अब तक जो कुछ भी कहा जा रहा था, उस सबको एक साथ  उपस्थित किया गया है।

अरुंधति राय का कहना है क़ि मूल बात सामाजिक ढाँचे की है और उसमें निहित आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक विषमताओं की। बात सही है लेकिन तमाम कानूनी संशोधनों के जरिये जनता को अधिकार दिलाने की लड़ाई इस लक्ष्य की पूरक है, उसके खिलाफ नहीं। अरुंधति ने इस आन्दोलन के कुछ कर्ता-धर्ताओं पर भी टिप्पणी की है। उनका कहना है क़ि केजरीवाल आदि एनजीओ चलाने वाले लोग जो करोड़ों की विदेशी सहायती प्राप्त करते हैं, उन्होंने लोकपाल के दायरे से  एनजीओ को बचाने के लिए और सारा दोष सरकार पर मढने के लिए जन लोकपाल का जंजाल तैयार किया है। अब सांसत यह है क़ि जो लाखों की संख्या में देश के तमाम हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, क्या वे सब केजरीवाल और एनजीओ को बचाने के लिए उतर पड़े हैं? रही एनजीओ की बात तो वर्ल्ड सोशल फोरम से लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों में ईराक युद्ध और नव उदारवाद आदि तमाम मसलों पर सिविल सोसाईटी के जो भी आन्दोलन हाल के वर्षों में चले हैं, उनमें एनजीओ की विराट शिरकत रही है। क्या इन आन्दोलनों में बहन अरुंधति शामिल नहीं हुईं? क्या इनमें शरीक होने से उन्होंने इसलिए इनकार कर दिया क़ि इनमें एनजीओ भी शरीक हैं? जाहिर है क़ि नहीं किया और मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार उन्होंने ठीक किया। इसमें कोई संदेह नहीं क़ि एनजीओ स्वयं नव उदारवादी विश्व व्यवस्था से जन्मी संस्थाएं हैं। इनकी फंडिंग के स्रोत भी पूंजी के गढ़ों में मौजूद हैं। इनका उपयोग भी प्रायः आमूल-चूल बदलाव को रोकने में किया जाता है। इनकी फंडिंग की कड़ी जांच हो, यह भी जरूरी है। लेकिन किसी भी व्यापक जनांदोलन में इनके शरीक होने मात्र से हम सभी जो इनके आलोचक हैं,  वे शरीक न हों तो यह आम जनता की ओर पीठ देना ही कहलायेगा। बहन अरुंधति का लेख पुरानी कांस्पिरेसी थियरी का नया संस्करण है। कुछ जरूरी बातें उन्होंने ऐसी अवश्य उठायी है, जो विचारणीय हैं। लेकिन देश भर में चल रहे तमाम जनांदोलनों को चाहे वह जैतापुर का हो, विस्थापन के खिलाफ हो, खनन माफिया और भू-अधिग्रहण के खिलाफ हो, पास्को जैसी मल्टीनेशनल के खिलाफ हो या इरोम शर्मिला का अनशन हो- इन सभी को अन्ना के आन्दोलन के बरक्स खड़ा कर यह कहना क़ि अन्ना का आन्दोलन मीडिया-कारपोरेट-एनजीओ गठजोड़ की करतूत है, और वास्तविक आन्दोलन नहीं है, जनांदोलनों की प्रकृति के बारे में एक कमजर्फ दृष्टिकोण को दिखलाता है। अन्ना के आन्दोलन में अच्छी खासी तादात में वे लोग भी शरीक हैं, जो इन सभी आन्दोलनों में शरीक रहे हैं। किसी व्यक्ति का नाम ही लेना हो (दलों को छोड़ दिया जाए तो) तो मेधा पाटेकर का नाम ही काफी है। मेधा अन्ना के भी आन्दोलन में हैं, और अरुंधति भी मेधा के आन्दोलन में शरीक रही हैं।

अरुंधति ने अन्ना हजारे के ग्राम स्वराज की धारणा की भी आलोचना की है और यह आरोप भी लगाया है क़ि अन्ना पचीस वर्षों से अपने गाँव रालेगाँव-सिद्धि के ग्राम निकाय के प्रधान बने हुए हैं। वहाँ चुनाव नहीं होता, लिहाजा अन्ना स्वयं गांधी जी की विकेंद्रीकरण  की धारणा के विरुद्ध केन्द्रीकरण के प्रतीक हैं। अरुंधति की पद्धति विचार से व्यक्ति की आलोचना तक  पहुंचने की है। अन्ना तानाशाह हैं और विकेंद्रीकरण के खिलाफ, ऐसा मुझे तो नहीं लगता, लेकिन ऐसी आलोचना का हक़ अरुंधति को अवश्य है। अरुंधति ने मीडिया द्वारा इस पूरे आन्दोलन को भारी कवरेज देने और तिहाड़ में अन्ना की तमाम सरकारी आवभगत को भी कांस्पिरेसी थियरी के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है। यह सच है क़ि मीडिया तमाम जनांदोलनों की पूरी उपेक्षा करता है। जंतर-मंतर पर जब अन्ना अनशन कर रहे थे तब मेधा पाटेकर ने भी कहा था क़ि उनकी बड़ी-बड़ी रैलियों को मीडिया ने नजरअंदाज किया। हमें खुद भी अनुभव है क़ि दिल्ली में लाल झंडे की ताकतों की एक-एक लाख से ऊपर की रैलियों को मीडिया षड्यंत्रपूर्वक दबा गया। ऐसे में इस आन्दोलन को इतना कवरेज देने के पीछे मीडिया की मंशा पर शक तो जरूर किया जा सकता है, लेकिन इसका भी ठीकरा आन्दोलन के सर पर फोड़ देने का कोई औचित्य नहीं समझ में आता है। सच तो यह है क़ि मीडिया ने इस आन्दोलन में शरीक गरीबों, शहरी निम्न मध्यमवर्ग, दलित और अल्पसंख्यकों के चेहरे गायब कर दिए हैं। उसने इस आन्दोलन की मुखालफत करने वालों को काफी जगह बख्शी हुई है। तमाम अखबारों के सम्पादकीय संसद की सर्वोच्चता के तर्क से व्यवस्था के बचाव में अन्ना को उपदेश देते रहे हैं। इसलिए यह कहना क़ि मीडिया आंदोलन का समर्थन कर रहा है, भ्रांतिपूर्ण है। मीडिया कितना भी ताकतवर हो गया हो, अभी वह जनांदोलन चलाने के काबिल नहीं हुआ है। ज्यादा सही बात यह है क़ि जो आन्दोलन सरकार और विपक्ष दोनों को किसी हद तह झुका ले जाने में कामयाब हुआ है, उसकी अवहेलना कारपोरेट मीडिया के लिए भी संभव नहीं है। अन्यथा वह अपनी जो भी गलत-सही विश्वसनीयता है, वह खो देगा।

अरुंधति ने ‘वन्दे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’, ‘अन्ना इज इंडिया एंड इंडिया इज अन्ना’ और ‘जय हिंद’ जैसे नारों को लक्ष्य कर आन्दोलन पर सवर्ण और आरक्षण विरोधी राष्ट्रवाद का आरोप जड़ा है। सचमुच अगर ऐसा ही होता तो मुलायम और मायावती को क्रमशः अपने पिछड़ा और दलित जनाधार को बचाने के लिए तथा भ्रष्टाचार विरोधी जनाक्रोश से बचने के लिए आन्दोलन का समर्थन न करना पड़ता। यह सच है क़ि इन दोनों ने आन्दोलन का समर्थन इस कारण भी किया है क़ि  भले ही वे केंद्र में यूपीए का समर्थन कर रहे हों, उत्तर प्रदेश में उन्हें एक दूसरे से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस से भी लड़ना है। लिहाजा समर्थन के पीछे कांग्रेस विरोधी लहर का फ़ायदा उठाने का भी एक मकसद जरूर है। अब इसका क्या कीजिएगा क़ि जंतर मंतर पर अन्ना के पिछले अनशन के समय आरक्षण विरोधी यूथ फार इक्वालिटी के लोग भी दिखे और वाल्मीकि समाज, रिपब्लिकन पार्टी, नोनिया समाज आदि भी अपने-अपने बैनरों के साथ दिखे। इस आन्दोलन में सर्वाधिक दलित महाराष्ट्र से शामिल हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठ कर आये बड़े-बड़े लोग भी दिखे और चाय का ढाबा चलाने वाले तथा ऑटो रिक्शा चालक भी।

प्रकारांतर से अरुंधति ने नारों के माध्यम से आन्दोलन  में संघ की भूमिका को भी देखा है। मुश्किल यह है क़ि इन नारों को लगाने वाले तबके ज्यादा वोकल हैं और मीडिया के लिए अधिक ग्राह्य। इनसे अलग नारों और लोगों की आन्दोलन में कोई कमी नहीं। आन्दोलन के गैर-दलीय चरित्र के चलते ही लाल झंडे की ताकतों को इसी सवाल पर अपनी अलग रैलियाँ, अपनी पहचान के साथ निकालनी पड़ रही हैं। संघ को छिप कर खेलना है क्योंकि भाजपा खुद जन लोकपाल के खिलाफ रही है और अब तक पुनर्विचार के संकेत नहीं दे रही है। ऐसे में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश को भुनाने के लिए संघ आन्दोलन में घुसपैठ कर रहा है जबकि भाजपा जन लोकपाल पर कांग्रेस के ही स्टैंड पर खड़ी है। यानी संघ-भाजपा का उद्देश्य यह है क़ि वह जन लोकपाल पर कोई कमिटमेंट भी न दे लेकिन आन्दोलन का अपने फायदे में इस्तेमाल कर ले जाए। दूसरे शब्दों में ‘चित हम जीते, पट तुम हारे’। संघ क्यों नहीं अपनी पहचान के साथ स्वतन्त्र रूप से इस सवाल पर रैलियाँ निकाल रहा है, जैसा क़ि लाल झंडे की ताकतें कर रही हैं? संघ को अपनी पहचान आन्दोलन के पीछे छिपानी इसलिए पड़ रही है क्योंकि वह अपने राजनैतिक विंग भाजपा को संकट में नहीं डाल सकता। लेकिन किसी राष्ट्रव्यापी, गैर-दलीय, विचार-बहुल आन्दोलन में संघ अगर घुसपैठ करता है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा भला कोई भी राजनीति करने वाला क्यों नहीं करेगा! जिन्हें इस आन्दोलन के संघ द्वारा अपहरण की चिंता है, वे खुद क्यों किनारे बैठ कर तूफ़ान के गुजरने का इंतज़ार करते हुए ‘तटस्थ बौद्धिक वस्तुपरक वैज्ञानिक विश्लेषण’ में लगे हुए हैं? आपके वैज्ञानिक विश्लेषण से भविष्य की पीढियां लाभान्वित हो सकती हैं, लेकिन जनता की वर्तमान आकांक्षाओं की लहरों और आवर्तों पर इनका प्रभाव तभी पड़ सकता है, जब आप भी लहर में कूदें। तट पर बैठकर यानी तटस्थ रहकर सिर्फ उपदेश न दें। आन्दोलन की लहर को संघ की ओर न जाने देकर रेडिकल परिवर्तन की ओर ले जाने का रास्ता भी आन्दोलन के भीतर से ही जाता है। तटस्थ विश्लेषण बाद में भी हो सकते हैं। लेकिन यदि कोई यह माने ही बैठा हो क़ि आन्दोलन एक षड्यंत्र है जिसे संघ अथवा कांग्रेस, कारपोरेट घरानों, एनजीओ या मीडिया ने रचा है  तो फिर उसे समझाने का क्या उपाय है? ऐसे लोग किसी नजूमी की तरह आन्दोलन क्या, हरेक चीज का अतीत-वर्तमान-भविष्य जानते हैं। वे त्रिकालदर्शी हैं और आन्दोलन ख़त्म होने के बाद अपनी पीठ भी ठोंक सकते हैं क़ि ‘देखो, हम जो कह रहे थे वही हुआ न!’

अन्ना का यह आह्वान क़ि जनता अपने सांसदों को घेरे, बेहद रचनात्मक है। उत्तर प्रदेश में इस आन्दोलन की धार को कांग्रेस ही नहीं, बल्कि मुलायम और मायावती के भीषण भ्रष्टाचार की ओर मोड़ा जाना चाहिए। यही छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा के विरुद्ध किया जाना चाहिए। कांग्रेस शासित प्रदेश तो स्वभावतः इसके निशाने पर हैं। बिहार में इसे लालू और नितीश, दोनों के विरुद्ध निर्देशित किया जाना चाहिए। ग्रामीण गरीबों, शहरी गरीबों, छात्र-छात्राओं, संगठित मजदूरों और आदिवासियों के बीच सक्रिय संगठनों को अपने-अपने हिसाब से अपने-अपने सेक्टर में हो रहे भ्रष्टाचार पर स्वतन्त्र रूप से केन्द्रित करना चाहिए। बौद्धिकों को भविष्यवक्ता और नजूमी बनने से बाज आना चाहिए, अन्यथा वे अपनी विश्वसनीयता ही खोएंगे।

 

चन्द्रबली सिंह के रूप में प्रेरणा स्रोत खो दिया

नई दिल्ली : हिन्दी के सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, संगठनकर्ता और विश्व कविता के श्रेष्टतम अनुवादकों में शुमार कामरेड चन्द्रबली सिंह का 23 मई को  87 वर्ष की आयु में बनारस में निधन हो गया।  चन्द्रबली जी का जाना एक ऐसे कर्मठ वाम बुद्धिजीवी का जाना है जो मार्क्सवादी सांस्कृतिक आन्दोलन के हर हिस्से में बराबर  समादृत और प्रेरणा का स्रोत रह।
चन्द्रबली जी रामविलास शर्मा, त्रिलोचन शास्त्री  की पीढी़ से लेकर प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों की  युवतम पीढी़  के साथ चलने की कुव्वत रखते थे। वे जनवादी लेखक संघ के संस्‍थापक महासचिव और बाद में अध्यक्ष रहे।  उससे पहले तक वे प्रगतिशील लेखक संघ के महत्वपुर्ण स्तम्भ  थे। जन संस्‍कृति मंच के साथ उनके आत्‍मीय संबंध ताजिन्‍दगी रहे। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद राष्ट्रीय एकता अभियान के तहत सांस्कृतिक संगठनों के साझा अभियान की कमान बनारस में उन्हीं के हाथ थी और इस  दौर में उनके और  हमारे संगठन के  बीच जो आत्मीय रिश्ता  कायम हुआ, वह सदैव ही चलता रहा। उनके साक्षात्‍कार ‘समकालीन जनमत’ में प्रकाशित हुए। चन्‍द्रबली जी वाम सास्‍कृतिक आंदोलन के समन्‍वय के प्रखर समर्थक रहे।
चन्द्रबली जी ने मार्क्सवादी सांस्कृतिक  आन्दोलन के भीतर की बहसों के  उन्नत रूप और स्तर के लिए  हरदम ही संघर्ष किया। ‘नई चेतना’ 1951 में उनका लेख छपा था- ‘साहितय का संयुक्‍त मोर्चा’। ( बाद में वह ‘आलोचना का  जनपक्ष’ पुस्तक में संकलित भी हुआ। चन्‍द्रबली जी ने इस लेख में लिखा, ‘सबसे अधिक निर्लिप्त और उद्देश्यपूर्ण आलोचना आत्‍मालोचना कम्‍यूनिस्‍ट- लेखकों और आलोचकों की और से आनी चाहिए। उन्‍हें अपने भटकावों को स्‍वीकार करने में किसी प्रकार की झेंप या भीरुता नहीं दिखलानी चाहिए,  क्योंकि  जागरूक क्रांतिकारी की यह सबसे बड़ी पहचान है कि वह आम जनता को अपने साथ  लेकर चलता है और वह यह जानता है कि दूसरों की आलोचना के साथ-साथ जब तक वह  अपनी भी आलोचना नहीं करता, तब  तक वह न सिर्फ जनता को ही साथ न ले सकेगा, वरन स्वयं भी वह अपने लिए सही मार्ग का निर्धारण नहीं करा पाएगा। दूसरों की आलोचना में भी चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं,  क्योंकि चापलूसी उन्हें कुछ  समय तक धोखा दे सकती है,  किन्तु उन्हें सुधार नहीं सकती। मैत्रीपूर्ण आलोचना का यह अर्थ नहीं कि हम दूसरों की गलतियों को जानते हुए भी छिपाकर रखें। आत्‍मालोचना के स्‍तर और रूप की यही विशेषता- मार्क्‍सवादी आलोचना होनी चाहिए कि हम उसके सहारे आगे बढ़ सकें।’ आज से 60 साल पहले लिखे गए इस लेख में आपस में और मित्रों के साथ पालेमिक्स  के रूप,  स्तर और उद्देश्य  की जो प्रस्तावना  है, वह आज और भी ज़्यादा  प्रासंगिक है। उन्‍होंने अपने परम मित्र और साथी रामविलास शर्मा के साथ अपने लेखों में जो बहसें की हैं, वे स्वयं उनके बनाए निकष का प्रमाण हैं।
उनकी आलोचना की दोनों ही पुस्तकें ‘आलोचना का जनपक्ष’  तथा ‘लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य’  दस्तावेजी महत्त्व की हैं। इनमें हिंदी साहित्‍य और संस्‍कृति के प्रगतिशील अध्याय के तमाम उतार-चढ़ाव- बहसों और उप‍लब्धियों की झांकी ही नहीं मिलती,  बल्कि आज के संस्कृतिकर्मी  और अध्येता के लिए इनमें तमाम अंतर्दृष्टिपूर्ण सूत्र बिखरे पड़े हैं।
पाब्लो नेरूदा, नाजिम हिकमत, वाल्ट व्हिटमैन और एमिली डिकिन्सन की कविताओं के उनके अनुवाद उच्च  कोटि की काव्यात्मक संवेदना,  चयन दृष्टि और सांस्कृतिक अनुवाद के प्रमाण हैं। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ब्रेख्त, मायकोवस्की और तमाम अन्य कवियों के उनके अप्रकाशित अनुवाद और दूसरी  सामग्रियां जल्द ही प्रकाशित होंगी।
जन संस्कृति मंच  वाम सांस्कृतिक आन्दोलन की अनूठी शख्सियत साथी चन्द्रबली सिंह को लाल सलाम पेश  करता है और शोकसंतप्त परिजन,  मित्रों,  साथियों के प्रति हार्दिक संवेदना प्रकट करता है।
– प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

मेहनतकश जनता के महान नाट्यकर्मी का अवसान

13 मई को वरिष्‍ठ नाट्यकर्मी बादल सरकार का निधन हो गया। उन्‍को जन संस्‍कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि-

पिछले साल 14 जुलाई, 2010 को जब बादल दा 85 के हुए थे, हममें से बहुत से  साथियों ने  लिख कर और उन्हें सन्देश भेजकर जन्मदिन की बधाई के साथ  यह  आकांक्षा प्रकट की थी कि वह और लम्बे समय तक हमारे बीच रहें, लेकिन 13 मई, 2011 को वह हम सबसे अलविदा कह गए। भारतीय रंगमंच के  क्रांतिकारी, जनपक्षधर  और अनूठे रंगकर्मी बादल दा को जन संस्कृति मंच लाल सलाम पेश  करता है।  उनके उस लम्बे, जद्दोजहद  भरे सफर को  सलाम पेश  करता है, जो 13 मई  को अपने अंतिम मुकाम को पहुंचा । लेकिन हमारे संकल्प,  हमारी स्मृति  और सबसे बढ़कर  हमारे कर्म में बादल दा का सफ़र कभी विराम नहीं लेगा। क्या उन्होंने ही नहीं लिखा था, ‘और विश्वास  रखो, रास्ते में विश्वास  रखो। अंतहीन रास्ता, कोई मंदिर नहीं हमारे लिए। कोइ भगवान नहीं, सिर्फ रास्ता। अंतहीन रास्ता।’
जनता का हर बड़ा उभार अपने सपनों और विचारों को विस्तार देने के लिए अपना थियेटर माँगता है। बादल दा का थियेटर का सफ़र नक्सलबाड़ी  को पूर्वाशित करता-सा शुरू हुआ, जैसे कि मुक्तिबोध की ये अमर पंक्तियाँ जो आनेवाले कुछेक वर्षों में ही विप्लव की आहट को  कला की अपनी ही अद्वितीय घ्राण-शक्ति से  सूंघ लेती हैं-
‘अंधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया,
महसूस होता है कि वह, बेनाम
बेमालूम  दर्रों के इलाकों में
( सच्‍चाई के सुनहरे तेज़ अक्सों के धुंधलके में )
मुहैय्या कर रहा  लश्कर
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प्धर्मा चेतना का रक्ताप्लावित स्वर
हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट हो कर विकट हो जाएगा।
नक्सलबाड़ी के महान विप्लव ने जनता के बुद्धिजीवियों से मांग की कि वे जन-कला की क्रांतिकारी भूमिका के लिए आगे आएं।  सिविल इंजीनियर और  टाउन  प्लॉनर  के पेशे  से अपने वयस्क सकर्मक जीवन की शुरुआत  करने वाले बादल दा जनता की चेतना के  क्रांतिकारी दिशा में बदलाव के  किए तैयार करने के  अनिवार्य उपक्रम के  रूप में नाटक और रंगमंच को  विकसित करनेवाले अद्वितीय रंगकर्मी के रूप में इस भूमिका के  लिए समर्पित हो गए। ‘थर्ड थियेटर’ की  ईजाद के साथ उन्होंने  जनता और  रंगमंच,  दर्शक और कलाकार की  दूरी को  एक झटके  से तोड़  दिया। नाटक अब हर कहीं हो सकता था। मंच सज्जा, वेषभूषा और  रंगमंच के  लिए हर तरीके  की विशेष ज़रूरत को उन्होंने  गैर-अनिवार्य बना दिया। आधुनिक नाटक गली, मुहल्लों, चट्टी-चौराहों, गांव-जवार तक यदि पहुंच सका तो  यह बादल दा जैसे महान रंगकर्मी की भारी सफलता थी। 1967 में स्थापित ‘शताब्दी’  थियेटर संस्था के  ज़रिए उन्होंने  बंगाल के  गावों में  घूम-घूम कर राज्य आतंक और गुंडा वाहिनियों के हमलों का खतरा उठाते हुए जनाक्रोश को  उभारनेवाले  व्यवस्था-विरोधी  नाटक किए। उनके  नाटको  में नक्सलबाडी किसान विद्रोह का ताप था।
हमारे आन्दोलन  के नाट्यकर्मियों ने   खासतौर पर 1980 के दशक में बादल दा से प्रेरणा  और प्रोत्साहन प्राप्त किया। वे  इनके बुलावे पर इलाहाबाद और  हिंदी क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में भी बार-बार आये,  नाटक किए, कार्यशालाएं   कीं, नवयुवक  रंगकर्मियों  के साथ-साथ रहे, खाए, बैठे  और उन्हें  सिखाया।  जब मध्य बिहार के क्रांतिकारी किसान संघर्षों के इलाकों में युवानीति और हमारे दूसरे नाट्य-दलों पर सामंतों के हमले होते तो साथियों को जनता के समर्थन से  जो बल मिलता सो मिलता ही, साथ ही यह भरोसा और प्रेरणा भी मन को बल प्रदान करती कि बादल सरकार जैसे  अद्वितीय कलाकार बंगाल में  यही कुछ झेल कर जनता को जगाते आए हैं।
एबम इंद्रजीत, बाकी इतिहास, प्रलाप, त्रिंगशा शताब्दी, पगला घोडा, शेष  नाइ, सगीना महतो, जुलूस, भोमा, बासी खबर और  स्पार्टाकस (अनूदित) जैसे उनके  नाटक भारतीय थियेटर को  विशिष्ट  पहचान तो  देते ही हैं, लेकिन उससे भी बडी़ बात यह है कि बादल दा के  नाटक किसान,  मजदूर, आदिवासी, युवा, बुद्धिजीवी, स्त्री, दलित आदि समुदाय के संघर्षरत लोगों के  साथी हैं, उनके  सृजन और संघर्ष में  आज ही नहीं, कल भी मददगार होंगे, उनके  सपनॉ के  भारत के  हमसफर होंगे।
( प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)