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आइसक्रीम की कहानी : प्रकाश मनु

आइसक्रीम का नाम सुनते ही बच्‍चों ही नहीं, बड़ों के मुँह में भी पानी आ जाता है। आइसक्रीम की दि‍लचस्‍प कहानी बयां कर रहे हैं कथाकार प्रकाश मनु-

अगर आज बच्चों से उनकी सबसे प्रिय खाने की चीज के बारे में पूछा जाये, तो ज्यादातर बच्चों का जवाब होगा—आइसक्रीम! खाने-पीने की कोई शानदार पार्टी हो, या फिर कोई मेला या उत्सव, बच्चों की उत्सुक निगाहें सबसे पहले आइसक्रीम को ढूँढ़ती हैं। खाने-पीने को कुछ और मिले या न मिले, मगर आइसक्रीम जरूर चाहिए। और जी भरकर आइसक्रीम खाने के बाद भी उनकी तबीयत होती है—काश, थोड़ी-सी फलाँ आइसक्रीम या सॉफ्टी या चॉकबार और मिल जाती, तो मजा आ जाता! यों भी किसी को वैनिला और स्ट्राबरी पसंद है, तो किसी को कसारा, चॉकबार और केसर पिस्ता! और ऐसे बच्चे भी कम नहीं जो वैनिला या स्ट्राबरी खाते हुए मन-ही-मन खयालों में उड़ रहे होते हैं कि काश, इसके बाद कसारा या केसर पिस्ता और मिल जाती तो क्या कहने!

यों आइसक्रीम अब कोई दुर्लभ चीज नहीं रही। शायद ही कोई छोटा या बड़ा शहर या कसबा हो, जहाँ रोशनी में जगमगाता आइसक्रीम पार्लर या फिर लुभावने पोस्टरों से सजे, किस्म-किस्म की स्वादिष्ट आइसक्रीम बेचने वाले ठेले न हों! हालाँकि बच्चे अपनी इस पसंदीदा चीज को मजे से खाते हुए शायद ही कभी सोचते हों, कि यह आइसक्रीम जो आज इतनी असानी से मिल जाती है, कभी इतनी दुर्लभ थी कि बड़े-बड़े राजाओं के दरबारों या फिर धनी लोगों की पार्टियों में ही नजर आती थी। ज्यादातर लोग इस ‘ठंडी स्वादिष्ट मिठाई’ के लिये तरसते थे! और सच तो यह है कि आइसक्रीम की कहानी कोई सौ-दो सौ साल पहले की नहीं, बल्कि तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी है और इतिहास में अनेक महान हस्तियों के साथ, अनेक प्रसंगों में उसका जिक्र मिलता है।

शुरू में बगैर दूध के आइसक्रीम बनाने का चलन था। यह आइसक्रीम कभी ठोस रूप में होती तो कभी आधी जमी हुई। इसमें फलों का रस, चीनी और पानी का इस्तेमाल होता था। सदियों पहले चीन, तुर्की, भारत और एशिया के कई देशों में आइसक्रीम का प्रचलन था। उसके बाद यूरोपीय देशों में भी आइसक्रीम का प्रचलन हुआ और निरन्‍तर बढ़ता गया।

आइसक्रीम की कहानी का एक छोर ढाई हजार बरस पहले, विश्‍वविजयी सिकंदर से जुड़ता है। सिकंदर ने जब मिस्र को जीता, तो उसने जीत का जश्‍न मनाने के लिये ढेर सारी आइसक्रीम तैयार करने का आदेश दिया। हालाँकि यह आज की आइसक्रीम से अलग थी। सिकंदर के आदेश पर पंद्रह बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये। फिर उन्हें पहाड़ के ऊँचे शिखरों से लाई गई मुलायम, दूधिया बर्फ से भरने के लिये कहा गया, ताकि महान सिकंदर इस ठंडी मिठाई का भरपूर आनंद ले सके।

यों आइसक्रीम की कहानी आज से कोई ढाई हजार बरस पहले से शुरू होती है। कहा जा सकता है कि किसी न किसी रूप में तब आइसक्रीम या ऐसी ही कोई चीज एक स्वादिष्ट मिठाई के रूप में मौजूद थी। इसके बाद तो आइसक्रीम के होने के काफी पक्के प्रमाण मिलने लगते हैं। ईसा की पहली शताब्दी में रोम के शासक नीरो ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि पहाड़ों से बर्फ लाई जाये और उसे फलों के रस और शहद में मिलाकर यह ठंडी मिठाई तैयार की जाए!

इसके बाद सातवीं शताब्दी में चीन के राजा तांग ने बर्फ और दूध को मिलाकर आइसक्रीम बनाने का तरीका खोज निकाला। सारी दुनिया में स्वादिष्ट आइसक्रीम बनाने की कला को लेकर चीन का दूर-दूर तक नाम हो गया। तब चीन से आइसक्रीम यूरोप में पहुँची और तरह-तरह के रूपों में इटली और फ्रांस के राज दरबारों में पेश की जाने लगी।

कहा जाता है कि प्रसिद्ध विश्व-यात्री मार्को पोलो जब लंबे समय तक चीन में रहने के बाद इटली लौटा, तो अपने साथ-साथ आइसक्रीम तैयार करने की कला लेकर गया था। और इस तरह आइसक्रीम देखते ही देखते दुनिया के दूसरे देशों में जा पहुँची। कैथेरीन मेडिसी फ्रांस की रानी बनीं, तो उनके साथ आइसक्रीम बनाने की कला फ्रांस भी जा पहुँची। और फिर देखते ही देखते फ्रांस के राज दरबार और रईसों की पार्टियों में भी आइसक्रीम नई सज-धज के साथ सामने आने लगी।

आधुनिक काल में आइसक्रीम को लोकप्रियता दिलाने में अमेरिका का बड़ा हाथ है। अमेरिका में न सिर्फ आइसक्रीम बनाने की नई-नई विधियाँ खोजी गईं, बल्कि दावतों और पार्टियों में आइसक्रीम परोसने और मेलों में आइसक्रीम बेचने के नये-नये अंदाज सामने आने लगे। सन् 1750 में मैटीलैंड के गवर्नर ब्लैडन ने अपने मेहमानों को आइसक्रीम की दावत दी थी। अठारहवीं शताब्दी के आखिर में फिलिप लेजी नाम के लंदन के एक मिठाई बेचने वाले व्यापारी ने ‘न्यूयार्क’ अखबार में घोषणा की कि वह आइसक्रीम समेत किस्म-किस्म की मिठाइयाँ बेचने जा रहा है। उसकी इस घोषणा ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। अमेरिका में पहला आइसक्रीम पार्लर भी अठारहवीं शताब्दी में ही खुला और उसके बाद तो सचमुच आइसक्रीम की कहानी को पंख लग गये। सब ओर उसकी धूम मच गई। कहा जाता है कि अमेरिका की बड़ी हस्तियाँ, जिनमें जॉर्ज वाशिंगटन भी थे, आइसक्रीम के खासे शौकीन थे।

आइसक्रीम को यह नाम कैसे मिला? इसका श्रेय भी अमेरिका को ही जाता है। पहले इसे ‘आइस्ड क्रीम’ यानी ‘ठंडी की गई क्रीम’ कहा जाता था। पर बाद में धीरे-धीरे संक्षिप्त होकर इसका कहीं अधिक सुंदर और आकर्षक नाम ‘आइसक्रीम’ हो गया, जो अब पूरी दुनिया में फैल चुका है।

अब तक आइसक्रीम बनाने की नई से नई विधियाँ खोज ली गई थीं। जब पैडल से चलने वाला लकड़ी का फ्रीजर बना, तो इसके निर्माण में एकाएक तेजी आ गई। सन् 1832 में फिलेडेल्फिया के एक मिष्ठान्न निर्माता ऑगस्टस ने आइसक्रीम बनाने का एक नया तरीका खोजा। किन-किन चीजों को, किस अनुपात में मिलाने से स्वादिष्ट आइसक्रीम तैयार होती है, उसने यह खोज की। यह आइसक्रीम बहुत कुछ आज मिलने वाली आइसक्रीम जैसी थी।

नैन्सी जॉनसन नाम की इंग्लैंड की एक महिला ने सन् 1846 में हाथ से चलने वाले फ्रीजर की खोज की। इससे आइसक्रीम बनाने का सही, वैज्ञानिक तरीका खोज लिया गया, जो कमोबेश आज भी इस्तेमाल होता है। नैन्सी जॉनसन ने तो अपने आविष्कार को पेटेंट नहीं करवाया, पर आगे चलकर विलियम जी. चंच ने सन् 1848 में जॉनसन द्वारा निर्मित आइसक्रीम फ्रीजर को उसी के नाम के साथ पेटेंट करवाया।

इसके बाद आइसक्रीम के निर्माण में एक बड़ी छलाँग सन् 1851 में दिखाई दी। कारण यह था कि इसी वर्ष बाल्टीमोर के जेकब फसेल ने बड़ी मात्रा में आइसक्रीम तैयार करने का व्यापारिक संयंत्र कायम किया। जाहिर है, इसके साथ ही आइसक्रीम के निर्माण और प्रचार में आश्‍चर्यजनक तेजी आई। दूसरे व्यापारियों में भी इसी तरह के संयंत्र लगाकर आइसक्रीम बनाने की होड़ नजर आने लगी। इसे आइसक्रीम की विश्‍व-यात्रा का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं।

अब सभी का ध्यान आइसक्रीम को खूबसरत ढंग से सर्व करने की ओर गया और उसे परोसने के लिये आकर्षक, डिजायनदार कप तैयार करने की कोशिशे हुईं। आखिर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अल्फ्रेड एल. क्रेल ने खूबसूरत ढंग से आइसक्रीम ‘सर्व’ करने के लिए सुंदर डिजाइन वाले कप-प्लेट ईजाद किये, जिससे आइसक्रीम का पूरा आनंद लिया जाये। जाहिर है, अब तक आइसक्रीम का खूब प्रसार होने के साथ-साथ वह सभ्य समाज की पहचान भी बन चुकी थी।

इसके बाद फ्रिज या रेफ्रिजरेटरों की ईजाद और उनके घर-घर पहुँचने पर तो आइसक्रीम को जमाना एक साथ सस्ता और आसान भी हो गया। इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी तब मिली, जब आइसक्रीम जमाने का ऐसा फ्रीजर बना लिया गया, जो बिना रुके, लगातार काम करता था और व्यावसायिक रूप से सस्ता भी था। फिर तो आइसक्रीम की सब ओर दुंदुभी बजने लगी।

इसके बाद आइसक्रीम के नये-नये लुभावने रूप खोजे गये। इनमें सबसे लोकप्रिय हुआ आइसक्रीम कोन, क्योंकि यह बेहद सुविधाजनक था और मेले तथा उत्सवों में चलते-फिरते उसका आनंद लिया जा सकता था। सन 1904 में लुइस विश्‍व मेले में सबसे पहले ऐसे कोन देखे गये, जिनमें आइसक्रीम भरकर उन्हें चलते-फिरते खाया जा सकता था। कई व्यापारी अच्छे से अच्छे, सुंदर और कलात्मक कोन बनाकर उनमें आइसक्रीम पेश करने लगे, ताकि उनकी बिक्री बढ़े। इनमें लेबनान का एक व्यापारी अबे ड्रमर भी था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आइसक्रीम कोन बनाने की मशीन तैयार करने वाला पहला शख्स अबे ड्रमर ही था। यों आइसक्रीम कोन बनाने का इतिहास खासा लम्‍बा है और किसी एक को उसका श्रेय देना मुश्किल है। कई लोग इस दिशा में एक साथ सोच रहे थे, ताकि आइसक्रीम की लोकप्रियता से ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल किया जा सके। धातु के सुन्‍दर और आकर्षक कोन बनाने के साथ-साथ, कागज के कोन भी बनाए गये।

सन् 1904 में सेंट लुइस स्थान के चार्ल्‍स ई. मेचेंस के मन में ‘पेस्ट्री कोन’ बनाने का विचार आया और उसी ने पहला आइसक्रीम कोन बनाया। कहा जाता है कि इस साल सेंट लुइस विश्‍व मेले में कम से कम पचास जगहों पर ऐसे आइसक्रीम कोन मिल रहे थे। इससे पता चलता है कि एक ही समय में कई लोगों ने एक साथ आइसक्रीम का यह रूप खोजा था, जो आज भी खासा लोकप्रिय है। खासकर मेलों और उत्सवों का तो यह खास आकर्षण ही है और हलकी धूप वाले गुनगुने मौसम में, इसे टहलते हुए खाने का आनंद ही कुछ और है! बहरहाल, इतना तय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्‍भ में सेंट लुइस के विश्‍व मेले में कोन प्रसिद्ध हुए और एकाएक दुनिया भर में छा गये थे।

इसके बाद आइसक्रीम का युग आया। इसके आविष्कार की कहानी भी खासी रोचक है। इसे बनाने का विचार आयोवा के एक दुकानदार के मन में आया। यह सन् 1920 के आसपास की बात है। हुआ यह कि एक बच्चा उसके पास आइसक्रीम खरीदने आया। उसे यह तय करने में मुश्किल आ रही थी कि वह आइसक्रीम सेंडविच ले या फिर चॉकलेट बार? तब नेल्सन के मन में एक नया विचार आया। उसने एक आइसक्रीम बार खोज निकाली, जिसके ऊपर चाकलेट की हलकी सी परत थी। सन् 1934 में चाकलेट से मढ़ी हुई यह नये ढंग की, अनोखी आइसक्रीम बार खोज ली गई, जो आज भी ज्यादातर बच्चों की पहली पसंद है। और अब तो लोगों की जरूरतों के हिसाब से ऐसी आइसक्रीम भी खोज ली गई हैं, जिनमें चीनी नहीं है तथा जो कतई मोटापा नहीं बढ़ाती।

आइसक्रीम की लोकप्रियता बढऩे के साथ-साथ, तरह-तरह की आइसक्रीम खोजने की जो होड़ लग गई। सन् 1960 में रुबेन मैट्स ने एक अलग तरह की आइसक्रीम खोजकर उसे अनोखा नाम ‘हैगन डाज’ दिया। इसी समय लियो स्टीफेनस ने ‘डब बार’ खोजी। इससे भी मजेदार थी ‘गुड ह्यूअर आइसक्रीम बार’ की खोज। इसे बेचने का भी एक नायाब तरीका खोज निकाला गया। सफेद ट्रकों का एक खूबसूरत काफिला उन्हें बेचने के लिये निकला। इन ट्रकों पर मीठी ‘रुन-झुन, रुन-झुन’ करने वाली घंटियाँ लगी थीं और एक ही तरह की पोशाक वाले ड्राइवर बैठे थे, जो खरीदने वालों को अपने इस अनोखे रूप से चकित और आकर्षित करते थे। जाहिर है, इस आइसक्रीम का जैसा दिलचस्प नाम था, उसे बेचने का तरीका भी वैसा ही मनोरंजक था, जिसने सभी को लुभाया। कुछ इतिहासकार इसी को पहली आइसक्रीम बार मानते हैं।

बेशक आइसक्रीम आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है और उसने प्रसिद्धि की दौड़ में दुनिया की सारी स्वादिष्ट मिठाइयों को पीछे छोड़ दिया है। बड़े हों या बच्चे, सभी आइसक्रीम के दीवाने हैं—शायद इसलिए कि यह ऐसी लाजवाब चीज है, जिसे कितना ही खाओ, मन नहीं भरता! इसलिए आइसक्रीम की कहानी जो पिछले ढाई हजार सालों से चली आती है, उम्मीद है, अभी हजारों सालों तक मनुष्य के साथ-साथ यात्रा करेगी। उसके नये-नये लुभावने रूप सामने आएँगे तथा उसका स्वाद और आनंद कभी कम न होगा!

(‘अनोखी कहानि‍याँ ज्ञान-वि‍ज्ञान की’ से साभार)
सभी चि‍त्र : कीर्ति मि‍त्‍तल, कक्षा 11

त्रिलोचन.. .उर्फ त्रिलोचनजी के भाई! : प्रकाश मनु

हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख हस्ताक्षर कवि‍ त्रि‍लोचन पर कथाकार प्रकश मनु का संस्‍मरण-

त्रिलोचनजी से मुलाकात हुए कई महीने हो चुके थे। दोस्त चित्रकार हरिपाल त्यागी के साथ मैं यमुना विहार वाले उनके निवास पर मिलने गया था और उस लम्‍बी और अनोखी मुलाकात का पूरा हाल मैंने विस्तार से ‘पहल’ में लिखा भी था। यह अजब संजोग है कि ‘त्रिलोचनजी के भाई’ से मेरी एक गजब की मुलाकात भी हरिपाल त्यागी के साथ ही हुई— उनके घर में। बल्कि कहना चाहिए कि हरिपाल त्यागी ने ही प्रसन्नता से चहकते हुए उनसे मेरी मुलाकात कराई थी, ‘‘इनसे मिलिये, आप हैं त्रिलोचनजी के भाई।’’

मैं कुछ कौतूहल, कुछ विस्मय, कुछ झिझक के साथ ‘उनसे’ मिला। सफाचट दाढ़ी वाले कुछ श्याम वर्ण के थे वे सज्जन, जिन्हें त्रिलोचनजी का भाई बताया जा रहा था। मन में कहीं एक हल्की खुदबुद भी थी, ‘अच्छा, त्रिलोचनजी के कोई भाई भी हैं, मैं तो जानता ही न था। धन्य हैं चित्रकार श्री हरिपाल त्यागी, जिनकी वजह से उनसे मिल पा रहा हूँ।’

मेरे लिये यह एक आनंददायक दिन था और मैं उस एक और प्रसन्न दिन की स्मृतियों में खोया जा रहा था, जब त्रिलोचनजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मन ही मन दोनों की तुलना भी चल रही थी—त्रिलोचनजी के यहाँ सफेद दाढ़ी का लहलहाता जंगल था और त्रिलोचनजी के भाई पूरी तरह दाढ़ी मुँड़ाए हुए। जैसे अभी-अभी शेव करके आए हों। दोनों की शक्लें काफी कुछ मिलती हैं, लेकिन त्रिलोचनजी के भाई कुछ छोटी उम्र के लगते हैं। पाँच-सात साल तो जरूर छोटे होंगे त्रिलोचनजी से, या हो सकता है, दस-बारह साल छोटे हों।

दोनों के व्यक्तित्व की आधारभूत रेखाओं पर गौर करता हुआ, मैं मन ही मन हिसाब लगा रहा था।

त्रिलोचनजी से हुई पहली मुलाकात ने उनसे मिलकर बात करने की तेज इच्छा और अतृप्ति और बढ़ा दी थी। मैं त्रिलोचन जी से मिलने के लिए व्यग्र था। हरिपाल त्यागी यह जानते थे। लिहाजा उन्होंने अपने नये चित्र देखने के लिये सादतपुर निमंत्रित किया तो साथ ही जोड़ दिया, ‘‘इन दिनों अकसर त्रिलोचनजी भी घूमते-घामते आ जाते हैं, क्योंकि पास ही उनका निवास है। हो सकता है,  उनसे भी आप की मुलाकात हो जाये।’’ तो मैं त्रिलोचनजी से मिलने की एक अव्यक्त इच्छा लिये हुए ही सादतपुर आया था।

‘‘चलो त्रिलोचनजी न सही, उनके भाई से ही मुलाकात हो गई।’’ मैं मन ही मन मगन था।

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लेकिन त्रिलोचनजी के भाई से वह अद्भुत मुलाकात हुई किस ढब से—इसका जिक्र तो भूल ही गया। चलिए, अब बताता हूँ। वह रंगमंच, जिस पर त्रिलोचनजी के भाई ने प्रवेश किया था, कुछ यूँ था कि हरिपाल त्यागी के घर के आँगन में उनकी तमाम चित्रकृतियाँ कतार में लगी हुई थीं और उन पर त्यागीजी से मेरा गहन वार्तालाप चल रहा था। त्यागीजी ने एक-एक कर अपनी सारी नई चित्रकृतियों को बाहर ला-लाकर बाकायदा उनकी प्रदर्शनी-सी लगा दी थी और हम एक-एक चित्र पर घंटों माथापच्ची कर रहे थे। त्यागीजी एक-एक चित्र पर मेरी राय पूछते, फिर अपना ‘आइडिया’ बताते, फिर अपने-अपने रिफ्लेक्सेज पर जोर देते हुए हम एकबारगी बहस में उलझ जाते। इस तरह की पेचीदा स्थिति थी। याद पड़ता है, युवा कथाकार संजीव ठाकुर भी उस दिन साथ था और हम दोनों मिलकर त्यागीजी का एक लम्‍बा इंटरव्यू करने की फिराक में थे।

इस बीच ‘उन’ का आगमन हुआ था। वे, जो त्रिलोचनजी के भाई थे और बड़े अनौपचारिक ढंग से अचानक टहलते-टहलते रंगमंच में दाखिल हुए थे। कुछ देर वे चुपचाप त्यागीजी की वक्तृता सुनते रहे, फिर मेरी तरह वे भी ‘खेल’ में शामिल हो गये। यानी उन चित्रकृतियों पर अपनी राय बताने लगे और चित्रकार से उसके खास मंतव्य या आइडिया को लेकर बातचीत करने लगे। हरिपाल त्यागी, जैसी कि उनकी आदत है, हर चित्र पर हमें दिमाग लड़ाने और राय प्रकट करने की काफी खुली छूट दिये जा रहे थे। और हमारी बातों की कहीं ताईद करते, कहीं काटते भी जा रहे थे। उन्हें हक था, वे उस रंगमंच पर चित्रकला के ‘प्रथम पुरुष’ यानी सूत्रधार की हैसियत से विद्यमान जो थे।

मैंने देखा त्रिलोचनजी के भाई भी आहिस्ता-आहिस्ता, लेकिन बड़े उत्साह से अपनी टिप्पणियाँ दिये जा रहे हैं और कुछ इस ढंग से कि कला की उनकी गहरी समझ प्रकट होती थी।

‘‘अच्छा, चित्रकला में इनकी भी अच्छी रुचि है, ठीक त्रिलोचनजी की तरह।’’ मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ।

लेकिन अब एक दिक्कत आने लगी। उन चित्रकृतियों पर मेरी राय और त्रिलोचनजी के भाई की राय अकसर नहीं मिलती थी। मुझे चित्रों में तीखे कंट्रास्ट, कठोर आघात, परुषता और तीव्र गत्यात्मकता या शक्तिशाली रेखाएँ ज्यादा आकर्षित कर रही थीं, जबकि त्रिलोचनजी के भाई को शायद थिराई हुई रेखाएँ और प्रकृति के शांत चित्र ज्यादा भा रहे थे। बार-बार मैं बड़े हड़बडिय़ा उत्साह और कठोरता से उनकी बात काटकर अपनी बात आगे कर देता। वे चुपचाप सुन लेते या मुसकराकर रह जाते, लेकिन बात का जवाब नहीं देते थे।

मैं उनकी विनय को आसानी से अपनी जीत समझकर तना जा रहा था।

‘‘हम त्रिलोचनजी की इज्जत करते हैं तो क्या जरूरी है कि उनके भाई की भी हर बात माननी होगी?’’ मैंने अभिमान से भरकर सोचा और उनकी बातों को और अधिक तीखेपन से काटने लगा।

दो-तीन बार यह हुआ तो त्यागीजी चौंके। उन्होंने कोई ‘छिपा हुआ संकेत’ देना चाहा,  जिसे ग्रहण करने से मैंने पूरी बदतमीजी और उजड्डता से इनकार कर दिया और अपनी दबंगी और रोब बराबर कायम रखा। यहाँ तक कि त्रिलोचनजी के भाई ने मेरी ‘कलाभिरुचि’ की दो-एक बार दाद दी कि, ‘‘नहीं-नहीं, आप ही ठीक हैं।…मने मनुजी में कला की अच्छी समझ है।’’

मेरा गुब्बारा थोड़ा और फूल गया, लगभग फूटने की हद तक। इस बीच त्यागीजी ने सूचना दी कि कुछ युवाओं द्वारा पड़ोस की बस्ती में एक गम्‍भीर प्रयोगधर्मी नाटक किया जाने वाला है, जिसमें ‘दो शब्द’ त्रिलोचनजी के भाई कहेंगे और वही अध्यक्षता भी करेंगे। पता यह भी चला कि यों तो यह अध्यक्षता त्रिलोचनजी को करनी थी, पर वे आ नहीं सके, तो त्रिलोचनजी की जगह उनके भाई ही सही। मैंने मन ही मन झुँझलाहट महसूस की, ‘‘क्या त्रिलोचनजी के भाई उनके ‘डमी’ हैं जो उन्हें त्रिलोचनजी की जगह अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया जा रहा है? त्रिलोचनजी नहीं आ सके, तो क्या इन नाटक वालों को और कोई ढंग का आदमी नहीं मिला जो कला, संस्कृति, नाटक-वाटक की अच्छी समझ रखता हो!’’

खैर, इतने में मालूम पड़ा, भोजन तैयार है। समय पर नाटक देखने पहुँचना है तो जल्दी से भोजन कर लिया जाये। हम लोग भोजन के लिये बैठे, थालियाँ आईं तो भोजन के साथ-साथ चर्चा का विषय अब भी त्रिलोचनजी ही बने हुये थे। त्यागीजी सूचना देते हैं कि, ‘‘त्रिलोचनजी एक साथ बीस-पचीस तक रोटियाँ मजे में खा सकते हैं, और न खाएँ तो हफ्ता-हफ्ता भर बगैर अन्न के, सिर्फ पानी पी-पीकर काम चला लेंगे।’’ सुनकर मैं त्रिलोचनजी के भाई की ओर प्रतिक्रिया जानने की इच्छा से देखता हूँ। वे सरलता से मुसकराते हैं। इसका भाव यह है कि कुछ तो यह हकीकत है और कुछ लोग बढ़ा भी देते हैं जेबेदास्ताँ के लिये। ‘‘मने…त्यागीजी एकदम झूठ तो नहीं कह रहे।’’ त्रिलोचनजी के भाई हल्की-सी थाप लगा देते हैं, कुछ-कुछ शास्त्रीय अंदाज में।

सुनकर मैं हल्के-से चौंकाता हूँ, ‘‘मने…मने…मने…यह अंदाज तो एकदम त्रिलोचन वाला है। मने त्रिलोचनजी के भाई का साहित्य और कलाओं का ज्ञान ही नहीं, बात करने का अंदाज भी त्रिलोचनजी से एकदम मिलता है।’’

अब तो बात करने में मुझे मजा आने लगा। बात-बात पर मैं त्रिलोचनजी के भाई की प्रतिक्रियाएँ जान रहा हूँ और उन्हें चुपचाप मन में नोट करता जा रहा हूँ। साथ ही साथ एक दिलचस्प तुलना भी शुरू हो गई है—त्रिलोचनजी बनाम त्रिलोचनजी के भाई! ‘मने दोनों का बात करने का अंदाज किस कदर मिलता है—शक्ल भी। हाँ, त्रिलोचनजी के भाई काया में जरूर कुछ उन्नीस हैं। चेहरा भी कुछ ज्यादा कसा हुआ है, जरूर पाँच-सात साल छोटे होंगे।’

इस बीच बात चक्करदार रास्तों पर होते हुये न जाने कब, कैसे लोकसाधक और चिर लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी पर आ गई और फिर वहाँ से उछलकर ‘देवेंद्र सत्यार्थी : तीन पीढिय़ों का सफर’ ग्रंथ पर, जिसका सम्‍पादन मैंने संजीव ठाकुर के साथ मिलकर किया था।

अब त्रिलोचनजी के भाई उस पर विस्तार से अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, ‘‘मने…मनुजी, एक बात तय है। सत्यार्थीजी पर पुराने लोगों ने जिस गम्‍भीरता और तल्लीनता से लिखा है, नये लोगों के लेखों में वह बात नहीं। आपने जिन पुराने लेखों को शामिल कर लिया, किताब की जान असल में वही हैं।’’

सुनकर मैं चौंका, क्या त्रिलोचनजी के भाई भी इस कदर ‘पढ़ाकू’ आदमी हैं जो इतनी आधिकारिक टिप्पणी दिये जा रहे हैं, सो भी पुस्तक के सम्‍पादक के सामने! मेरा सम्‍पादकीय अहं थोड़ा चौड़ा हुआ। सोचा, ‘त्रिलोचनजी ने ‘इंडिया टुडे’ में उसकी समीक्षा लिखी थी, तो त्रिलोचनजी के भाई ने उन्हीं से लेकर थोड़ी उलट-पुलट ली होगी और अब ऐसे बन रहे हैं कि जैसे सर्वज्ञानी हों।’

अबके मैंने सीधे-सीधे पूछ लिया, ‘‘क्या आपने पढ़ी है यह पुस्तक?’’

‘‘हाँ, और क्या!’’ त्रिलोचनजी के भाई सरलता से जवाब देते हैं, ‘‘पढक़र ही तो लिखी है समीक्षा इंडिया टुडे में। मैंने एक-एक शब्द पढ़ा है आपकी पुस्तक का।…मने मनुजी, बगैर पढ़े तो मैं कभी नहीं लिखता।’’

‘‘ऐं! लेकिन वह तो आपने नहीं, वह…वह तो त्रिलोचनजी ने…’’

जाने कैसे मुड़े-तुड़े शब्द मेरे होंठों से निकले और मैं कुछ और कह पाता, इससे पहले ही त्यागीजी का जगविख्यात ठहाका किसी बम के धमाके की तरह पैदा हुआ और कमरे के फर्श से उठकर छत तक फैल गया, जिसमें त्रिलोचनजी के भाई—सॉरी त्रिलोचनजी का थोड़ा मंद लेकिन प्रसन्न हास्य भी शामिल हो चुका था। और तो और, ‘बुद्धूपने’ से भरा मेरा निरा झेंपू ठहाका भी उसमें घुल-मिल चुका था।

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गजब! क्या गजब नाटक हुआ मेरे साथ, अब इसका अंदाजा हो रहा है। इतने में बगल की रसोई से निकलकर शीलाजी बाहर आ गईं। त्यागीजी के बच्चे किसी चमत्कार भरे जादू से खिल-खिल करते हुए मेरे इर्द-गिर्द उपस्थित हो गये। और अब मेरे भोंदूपने पर सार्वजनिक रूप से तरस खाया जा रहा था और हँसी की ऐसी प्रसन्न धाराएँ-अंतर्धाराएँ बह रही थीं, जिनमें त्रिलोचन सबसे अधिक रस ले-लेकर आनंद लूटे जा रहे थे।

ऐसे क्षण जिनमें त्रिलोचनजी की दुर्गम शास्त्रीय व्याख्याओं और विद्वत्ता का बोझ एकबारगी बह गया है और अभी-अभी पतंग लूटकर आये शरारती बच्चे का अक्स उनके चेहरे पर कहीं ज्यादा साफ नजर आता है।

अलबत्ता, वह तिलिस्म जिसे हरिपाल त्यागी ने इतनी देर में मेरे और त्रिलोचनजी के बीच में किसी काँच की दीवार की तरह खड़ा कर दिया था, झन्न से टूटकर बिखर जाता है और अब त्रिलोचनजी बड़ी स्नेहिल निगाहों से मुझे देखते, बल्कि अपने स्नेह से नहलाने लगते हैं और ‘त्रिलोचनजी के भाई’ का जो चमत्कारी बिम्‍ब इतनी देर में बना था, वह देखते-देखते शून्य में बिला गया। अब समझ में आया, जिन्हें त्रिलोचनजी का भाई मैं समझ रहा था, वह कला, साहित्य और शास्त्र में इतनी गहरी रुचि और इतना ज्यादा दखल क्यों रखते थे और उनका बात करने का अंदाज त्रिलोचनजी से कदर मिलता क्यों था? और क्यों ‘दाढ़ीदार’ त्रिलोचनजी की जगह सफाचट चेहरेवाले ‘त्रिलोचनजी के भाई’ नाटक की अध्यक्षता करने जा रहे थे!

‘‘इस दाढ़ी ने सचमुच मुझे बहुत छकाया।’’ मैं भुनभुनाकर कहता हूँ। त्रिलोचनजी उस पर स्नेहपूर्ण थाप लगा देते हैं, ‘‘मने…ऐसा तो बहुतों के साथ हुआ है मनुजी, सिर्फ आपके साथ नहीं।’’

‘‘लेकिन दाढ़ी कटवाकर आप पाँच-सात साल छोटे जरूर लगने लग जाते हैं।’’ मैंने अपनी राय प्रकट की।

‘‘अजी, कहिए जवान, एकदम जवान! दाढ़ी कटते ही यह जादू।’’ हरिपाल त्यागी अब छेड़छाड़ पर उतर आये हैं और पूछते हैं, ‘‘सच-सच बताइए त्रिलोचनजी, अब आपने नाई से कहा दाढ़ी साफ करने के लिये तो वह डरा, झिझका या चौंका नहीं, आसानी से तैयार हो गया?’’ फिर वह मासूम चेहरा बनाकर पूछते हैं, ‘‘अच्छा त्रिलोचनजी, इस दाढ़ी काटने के पैसे आपने दिये नाई को, या बदले में नाई से ही…? आखिर ऐसे शुभ्र, स्वच्छ बाल! कोई धूप में तो ये सफेद हुये नहीं हैं।’’

कुछ देर में उन्होंने आखिरी छक्का लगाया, ‘‘रहने दीजिए त्रिलोचनजी, क्यों नाटक का उद्घाटन करने जा रहे हैं? वहाँ लोग कहेंगे, हमने तो त्रिलोचनजी को बुलाया था, यह उनकी जगह कौन सज्जन आ गये।…जब मनुजी ही नहीं पहचान पाये, तो वहाँ भला कौन पहचानेगा?’’

जवाब में त्रिलोचनजी की मंद हँसी का झरना झरता रहा और मैं झेंपा-झेंपा-सा उसमें नहाता रहा। मन ही मन मुझे गुस्सा आ रहा था, मैं इस कदर बेवकूफ बन कैसे गया?

साथ ही मुझे ताज्जुब भी हो रहा था कि किस तरह मुझे जान-बूझकर और कितनी सफाई से बुद्धू बनाया जा रहा था और इस ‘खेल’  में जो हरिपाल त्यागी का रचा हुआ था, त्रिलोचन किस तरह खुद-ब-खुद शामिल हो गये और दोनों मिल-जुलकर मुझे हक्का-बक्का और परेशान करने पर तुले थे।

बहरहाल, त्यागीजी के उस ‘जादुई’ खेल की बदौलत ही समझिए, उस पूरे दिन त्रिलोचनजी की भाई की छाया से मैं मुक्त नहीं हो पाया।

4

हालाँकि खाना खाकर जब हम नाटक देखने जा रहे थे, त्रिलोचनजी के भाई, सॉरी त्रिलोचनजी, से मेरी खूब घुटकर बातें हुईं। पूरे रास्ते भर मेरा हाथ थामे हुये वे मुझे राह पर के पेड़ों, फूलों और मौसमों की भरपूर रसात्मक जानकारी देते रहे। अशोक के पेड़ की चर्चा हुई तो सुंदरियों के पाद-प्रहार से उसके फूल उठने की कहानी भी कही गई, जिसका आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘अशोक के फूल’ में वर्णन किया है।

‘‘असली अशोक का पेड़ आजकल मिलता कहाँ है! उलटे लहरीली पत्तियों वाले एक निफूले पेड़ को अशोक कहकर इसका मजाक उड़ाया जाता है।’’ मैंने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सन्‍दर्भ देकर कहा। उत्तर में त्रिलोचनजी ने जो कहा, उसे सुनकर मैं चकित रह गया था, ‘‘हाँ, यह तो ठीक है कि अशोक के असली पेड़ ज्यादा नहीं मिलते, लेकिन वे बिलकुल नहीं है, ऐसा तो नहीं है। मने कुछ पेड़ तो मनुजी खुद मैंने देखे हैं।’’ और असली अशोक के पेड़ उन्होंने कहाँ-कहाँ देखे, त्रिलोचनजी इसका पूरे विस्तार और तल्लीनता से वर्णन करने लगते हैं।

‘‘लेकिन हजारीप्रसाद द्विवेदी तो लिखते हैं, असली अशोक का पेड़ तो अब गायब हो गया है। वह सभ्यता ही खत्म…!’’

मैं उनकी विद्वत्ता के ‘महासिंधु’ में शंका का एक क्षुद्र तिनका छोड़ देता हूँ।

‘‘हो सकता है, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनको देखा ही न हो…या लिखते वक्त उन्हें ध्यान न रहा हो। लेकिन हैं वे असली अशोक ही, जिनका जिक्र मैंने किया है।’’ त्रिलोचनजी आचार्य द्विवेदी की विद्वत्ता से आतंकित हुए बगैर दृढ़ता से अपनी बात पर टिके हैं और अब विस्तार से अशोक के फूलों के बारे में बता रहे हैं कि  वे कैसे आकार-प्रकार और किन-किन रंगों के होते हैं।

और फिर सिर्फ अशोक ही नहीं, मुझे अच्छी तरह याद है, पूरे रास्ते भर वे फूलों, पेड़ों और वनस्पतियों के बारे में मेरा विपुल ज्ञानवर्धन करते रहे। मजे की बात यह है कि इस प्रसंग में ठेठ ग्रामीण कहावतों और लोककथाओं से लेकर कालिदास, भवभूति और वाल्मीकि तक इस सहज भाव से आ-जा रहे थे कि लगता था, ये सभी उनके खूब अच्छी तरह देखे हुये घर हैं और ग्रामीण कवियों और वाल्मीकि, कालिदास की सहजानुभूति में कोई खास फर्क नहीं है। वे एक ही परम्‍परा की अलग-अलग स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्तियाँ हैं।

पूरे रास्ते वे प्रेम से मेरा हाथ पकड़े रहे थे और बार-बार कंधे पर धौल जमा देते थे।

आज याद करता हूँ तो त्रिलोचनजी की वह अकुंठ मस्ती और वह अहेतुक प्यार मुझे किसी आशीर्वचन का-सा लगता है। हालाँकि उसमें कोई दिखावटी बड़प्पन कतई न था।

त्रिलोचनजी से पहली मुलाकात में मैं ज्यादा खुल नहीं पाया था जिसका शुरू-शुरू में हल्का-सा मलाल मुझे था और जिसका जिक्र भी उन पर लिखे एक लेख में मैंने किया था। तब क्या जानता था कि अगली ही मुलाकात में वे मुझसे इस कदर घुल-मिल जाएँगे कि मैं उनके प्रेम में नहा उठूँगा।

5

बहरहाल, थोड़ी देर में हम नाटकस्थली पर पहुँचे, तो पता चला कि नाटक अभी-अभी शुरू हो चुका है। हम लोग थोड़ा विलम्‍ब से पहुँचते हैं, इसलिए बगैर ज्यादा व्यवधान पैदा किये एक तरफ बैठ गये और थोड़ी देर में नाटक ने हमें अपनी गिरफ्त में ले लिया।

नाटक काफी अच्छा था। वह एक प्रयोगधर्मी और दुस्साहसी नाटक था जिसमें दर्शकों और कलाकारों के बीच का फर्क पूरी तरह मिट जाता है। दर्शकों के बीच से एक-एक कर लोग उठकर जाते हैं और नाटक को अपने अपने हिसाब से ‘चलाने’ लग जाते हैं। शुरू में लोग भीड़ के इस हस्तक्षेप या भगदड़ से परेशान हुये, फिर समझ में आया, यह नाटक की एक शैली है। नाटक में आज के बद्धिजीवियों पर जमकर कटाक्ष किया गया था। उसमें जितने भी बुद्धिजीवी पात्र हैं, उनकी लगातार आपस में खींचातानी, टाँग खिंचाई, झगड़े-झंझट, असहमतियाँ अंतर्विरोध, आलोचना-प्रत्यालोचना कुछ इस कदर चलती रहती हैं कि पूरे माहौल में एक-दूसरे के प्रति अविश्‍वास और टूटन है। सभी एक-दूसरे का मजाक बना रहे हैं और जो कला या मीडिया जितना शक्तिशाली है, वह दूसरे को नीचा दिखाने में उतना ही क्रूर और निर्मम है। फिर एकाएक शोर मचता है, ‘अखबार…अखबार…अखबार!’ देखते ही देखते सब पात्र फ्रीज हो गये हैं और पूरे परिदृश्य में सिर्फ उड़ते-उछलते और हड़बड़ाते हुये अखबार और उनके ताजा समाचार हैं। पार्श्‍व से सूत्रधार की कुछ-कुछ क्रूरता से भरी आवाज आती है, ‘‘अब कविता, कहानी और साहित्य का अंत हो चुका है। आज का असली साहित्य तो अखबार ही है।’’

लीजिए, अब मध्यांतर। मैं हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक और सादतपुर के बहुत-से मित्र त्रिलोचनजी को घेरकर बैठे हैं और छेड़छाड़ का मजा ले रहे हैं, ‘‘लीजिये त्रिलोचनजी, आपकी कविता तो गई। अब उसका कोई मतलब नहीं रह गया है। अखबार की रिपोर्ट है आज का असली साहित्य। आपकी कविता-वविता झूठ…!’’

‘कविता-वविता झूठ, अपन से कुश्ती लड़ लो।’ मुझे एक तुक्कड़ कवि की लाइन याद आ जाती है, जिसे बचपन का मेरा कवि-मित्र अनिल उदित बड़े नाटकीय अंदाज में सुनाया करता था। मैं शरारतन यह लाइन हवा में उछालता हूँ। एक सम्मिलित ठहाका।

जवाब में त्रिलोचनजी मंद-मंद मुसकराते हैं। एक अकुंठ, प्रसन्न हँसी के साथ छेड़-छाड़ का आनंद ले रहे हैं।

मध्यांतर खत्म। अब त्रिलोचनजी को आमंत्रित किया जा रहा है कि वे अध्यक्ष के रूप में नाटक पर ‘दो शब्द’ कहें। बाद का आधा नाटक उनके भाषण के बाद होगा।

त्रिलोचनजी सहजता से उठ खड़े हुए। सीधी, तनी हुई पीठ। चेहरे पर तपा हुआ, खुरदुरा आत्मविश्‍वास।

‘‘अब आपके बोलने के लिए क्या रहा? कविता-वविता झूठ…!’’ भीड़ में से एक चहकता हुआ स्वर उठा है। लगता है, नाटक का असर लोगों पर हावी है।

‘‘अब बोलिए, इसी का जवाब दीजिए। आज तो अखबार का ही बोलबाला है।’’ भीड़ में से एक दूसरा खिलंदड़ा स्वर। शायद हरिपाल त्यागी हैं।

त्रिलोचनजी उसी तरह हँसते हैं—एक शांत, निश्छल हँसी जिसमें गर्व नहीं, विद्वत्ता का बोझ नहीं, चोट करने की तेजी और घात-प्रतिघात नहीं, एक निष्कवच सादगी है।

‘दूर से देखने पर उनकी हँसी एक झेंपभरी हँसी लग सकती है।’ मुझे लगा।

‘‘अब आये चक्कर में…!’’ मेरे आसपास फुसफुस हो रही है।

‘‘ऐसा है, आप लोग नाटक का आनंद ले रहे हैं,  इसलिए मैं ज्यादा देर तो लूँगा नहीं। आपके धैर्य की परीक्षा नहीं लेना चाहता।’’ त्रिलोचनजी धीरे से शुरू करते हैं, ‘‘लेकिन यह जो अखबार वाला मुद्दा है, इसका जवाब देना तो भाई, जरूरी है।’’ वे हँसकर कहते हैं, ‘‘ऐसे बहुत-से पाठक हैं मेरी कविताओं के, जो कविताएँ पढ़कर पत्र लिखते हैं या अपनी राय बताते हैं। उनमें ऐसे बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने मेरी एक-एक कविता को दस-दस, बीस-बीस बार पढ़ा है और मिलने पर कहते हैं कि ‘अभी तो जी नहीं भरा। अभी इसे और पढऩा चाहते हैं। इसलिए कि हम जितनी बार इन कविताओं को पढ़ते हैं, उतनी बार इनमें से नये-नये अर्थ झाँकते हैं।’ जबकि अखबार आज पढ़ा तो कल बासी हो जाता है। फिर कोई उसे उठाकर देखना भी नहीं चाहता। कल्पना कीजिए, आप एक कमरे में बंद हैं और आपके हाथ में कविताओं की एक किताब है। इसके अलावा कमरे में कोई और चीज पढऩे लायक नहीं है। तो महीने भर भी अगर आपको उस कमरे में अकेले बंद रखा जाये, तो तीस बार आप उस किताब को पढ़ सकते हैं, फिर भी ऊबेंगे नहीं। लेकिन अगर उसकी जगह एक अखबार है और वही अगर आपको तीस दिन पढऩा पड़े, तो मेरा खयाल है, आप जरूर पागल हो जाएँगे। (हँसी)…मने अखबार सिर्फ एक बार पढ़ा जा सकता है, मगर कविता जितनी बार पढ़ेंगे, नया अर्थ देगी। बल्कि मेरा तो कहना है, कविता हजार, दस हजार, लाख बार पढ़ी जाये, तो भी पुरानी नहीं होती। कालिदास, वाल्मीकि और तुलसी हमें आज भी आनंद देते हैं। इसलिए अखबार और कविता की कोई तुलना नहीं हो सकती। अखबार कभी भी कविता की जगह नहीं ले सकता, यानी पत्रकारिता हमेशा साहित्य के पीछे-पीछे चलेगी। जो लोग यह समझते हैं कि साहित्य को उससे कोई खतरा है या पत्रकारिता साहित्य को खा जाएगी, वे मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं!’’

कहकर त्रिलोचनजी बैठे तो सारा हाल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूँज उठा। त्रिलोचनजी ने बगैर किसी उत्तेजना या अहंकार के, मंद-मंद मुसकराते हुए इतने आहिस्ता से अपनी बातें कहीं और साहित्य-विरोधी तर्कों को इस कदर धराशायी कर दिया कि मैं भौचक! त्रिलोचनजी के उस्तादाना फन ने मुझे मोह लिया। बातें इस ढंग से भी कही जा सकती हैं और ‘शत्रु’ को इस ढंग से भी ‘पटरा’ किया जा सकता है, मैं इससे पहले जानता ही न था।

और मजे की बात यह है कि त्रिलोचनजी ने जो कुछ भी कहा, कुछ इस अंदाज में कहा कि उससे नाटक की ‘लय’ खंडित नहीं होती, बल्कि वह नाटक का एक हिस्सा ही लगता है। वह विजेता के दर्प से नहीं, एक ‘कालचेता’ के गम्‍भीर अंतर्ज्ञान और अंतर्मंथन के साथ अपनी बात कह रहे थे।

इसका सबूत यह है कि ‘मध्यांतर’ के बाद जब नाटक फिर से शुरू हुआ और अखबार वाले बुद्धिजीवी यानी पत्रकार के तर्कों का जवाब जब लेखकनुमा पात्र को देना था, तो उसने अपने तयशुदा संवादों को छोडक़र हू-ब-बू त्रिलोचनजी के शब्द दोहरा दिये।

नाटक में एक और नाटक!

यह नाटक का जबरदस्त नाटकीय या ‘उत्कर्ष क्षण’ था, जब सारा हाल पहले से बढक़र तालियों की गडग़ड़ाहट से भर गया था।

6

नाटक खत्म होने पर लौटे तो सभी की जुबान पर त्रिलोचनजी की वक्तृता की तारीफ ही थी।

बहुत-से दर्शक सादतपुर के ही थे, इसलिये लौटे तो त्रिलोचनजी के इर्द-गिर्द, ‘बतकही’ करते लौटने वालों का पूरा एक जुलूस था। लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर हम सादतपुर पहुँचे, जहाँ त्रिलोचनजी ने हमसे विदा ली। उन्हें यमुना विहार जाना था, जहाँ अपने बेटे के साथ वे उन दिनों रह रहे थे।

मुझे उस क्षण की अनुभूति आज भी ठीक-ठीक याद है। मुझे लग रहा था, मैं त्रिलोचनजी के साथ-साथ ‘त्रिलोचनजी के भाई’ को भी प्रणाम कर रहा हूँ। बल्कि उसी क्षण मेरे भीतर यह बात कौंधी थी कि असल में त्रिलोचनजी में ‘दो’ व्यक्तित्व हैं। वे कहीं आपस में मिलते हैं तो कहीं टकराते भी हैं। जब वे ‘दाढ़ीदार’ होते हैं तो त्रिलोचन होते हैं और जब बगैर दाढ़ी के तो त्रिलोचनजी के भाई!

हरिपाल त्यागी ने तो अपनी सदाबहार तबीयत से एक हल्का-सा मजाक किया था, पर वह मजाक अजब ढंग से मेरे लिये हकीकत बन गया। उस दिन मैं घर लौटने पर देर रात तक सोचता रहा था, त्रिलोचनजी की दाढ़ी न रहने पर उनमें क्या कुछ बदल जाता है? और कोई चार साल बाद यह लेख लिखते समय भी मैं उसी सवाल पर अटका हूँ और जवाब अभी तक नहीं मिला।

मुझे याद है, विदा के समय चलते-चलते त्यागीजी ने फिर चुहल की थी, ‘‘आज तो मनुजी को खूब छकाया।’’ और इस बार त्रिलोचनजी के साथ-साथ उपस्थित समूह ने भी इस ‘विचित्र वृत्तांत’ का पूरा रस लिया।

अचानक हरिपाल त्यागी का कटाक्ष फिर त्रिलोचन की ओर मुड़ गया था, ‘‘आपको कब लगता है त्रिलोचनजी, कि अब दाढ़ी कटवा लेनी चाहिये।’’

‘‘यह तो नहीं पता, पर जिस दिन भी लगता है, नाई की दुकान पर जाकर बैठ जाता हूँ और,’’ त्रिलोचनजी नहले पर दहला जमाते हैं, ‘‘इसकी भी क्या परवाह की जाये। दाढ़ी तो आनी-जानी है।’’

और उनका शुभ्र ठहाका उनके साँवले चेहरे के साथ-साथ आसपास के पूरे परिवेश को एक उजास से भर देता है।

सत्यार्थीजी को उनके अनेक प्यार करने वाले मित्र-शुभचिंतक ‘दाढ़ीदार शिशु’ कहकर संबोधित करते हैं। त्रिलोचनजी में भी बचपना सत्यार्थीजी से कम तो नहीं, मैं मन ही मन हिसाब लगाता हूँ। इसीलिये नहले पर दहला लगाते हुए भी उनके मन में जवाबी चोट करने की इच्छा नहीं, एक निर्मल आनंद ही होता है। इसी ‘निर्मल आनंद’ के बूते त्रिलोचनजी कवि हैं, तो साथ ही साथ नाटककार भी। वे तमाम अनलिखे नाटकों के नाटककार लगते हैं। उनके निकटस्थ मित्र और परिचित जानते हैं कि बतकही के बीच में उनका ‘शरारती’ अंदाज उन्हें कभी भी किसी भी क्षण एक उस्तादाना फन वाले नाटककार में बदल सकता है।

लिहाजा उस दिन विदा लेते हुये त्रिलोचनजी के साथ-साथ उनके ‘नाटककार’ को भी मैंने प्रणाम किया था, जिसे मैं कभी न जान पाता, अगर ‘त्रिलोचनजी के भाई’ से त्यागीजी ने मेरी मुलाकात न करवाई होती।

7

उसके बाद सादतपुर में त्यागीजी के घर पर ही त्रिलोचनजी से तमाम मुलाकातों की तमाम-तमाम मनोरंजक और आश्‍चर्यजनक स्मृतियाँ आज तक मेरे मन में ताजा हैं।

उनसे दूसरी या तीसरी मुलाकात में ही मैंने जान लिया था कि त्रिलोचनजी पहली बार जरूर कुछ ज्यादा खुलते नहीं हैं, लेकिन फिर जल्दी ही वे आपसे कुछ ऐसा अपनापा साध लेते हैं और फिर इतने खुलेपन से बगैर किन्‍तु-परन्‍तु के इतना बेधडक़ होकर बोलते हैं कि आश्‍चर्य होता है। उनसे बातचीत का एक मजा यह भी है कि जल्दी ही बातों के सारे सूत्र वे अपने हाथ में ले लेते हैं और एक विषय की ‘उठान’ पर वे आ जाएँ, तो उसमें से खुद-ब-खुद अनेक विषय, प्रसंग और व्यक्तित्व निकलते चले जाते हैं और त्रिलोचन को आप एक साथ तमाम वेगवान हवाओं के घोड़े पर सवार देख सकते हैं। वे एक साथ कई दिशाओं में बह जाना चाहते हैं—समय को लगभग पूरी तरह संक्रमित करते हुये। इसीलिए त्रिलोचनजी के साथ बैठकर समय का कुछ पता नहीं चलता।

मुझे याद है, एक बार विष्णुचंद्र शर्मा के यहाँ उनसे मुलाकात हुई। कोई प्रसंग छिड़ जाने पर बनारस की यादों की लडिय़ों पर लडिय़ाँ उन दोनों कवि-मित्रों की बातें में ऐसे झलमलाकर प्रकट हो रही थीं और त्रिलोचनजी इतने सजीव ढंग से रस ले-लेकर वे विगत प्रसंग सुना जा रहे थे कि लगता था, वर्तमान से निकलकर मैं इतिहास के उन बेछोर फैले हुए बरामदों में चला आया हूँ, जहाँ मिठास में पगे दिन और पानी पर तैरती सुनहली संध्याएँ होती हैं और बातों के ओर-छोर कभी नहीं मिलते।

शायद इसीलिये त्रिलोचनजी को पढऩा या सुनना एक ऐसे महाकाव्य को पढऩा है, जिसके कुछ नये पन्ने हर बार चकित करते हुये आँखों के आगे से गुजर जाते हैं।

यों हमारी बातों में साहित्य-चर्चा के अलावा त्रिलोचनजी की घुमक्कड़ी के अनेक सुख-दुख भरे अनुभव, उनके अतीत के तमाम आत्मकथात्मक प्रसंगों की दास्तानें भी शामिल होती थीं, जिनमें एक ‘यवनिका पतन’ के बाद फिर एक नया युग सामने खड़ा नजर आता है और त्रिलोचनजी की यात्रा ‘अबाध’ लगती है तथा उनका व्यक्तित्व ‘अजेय’। काशी नगरी प्रचारिणी सभा, बनारस और धूमिल को लेकर त्रिलोचनजी के संस्मरण तथा अपने समकालीन लेखकों पर उनकी बेबाक टिप्पणियाँ तो होती ही थीं। इसके अलावा भाषा पर उनकी आधिकारिक शास्त्रीय चर्चा और ग्रामीण तथा देशज शब्दों के सही-सही अर्थ या भंगिमाओं या अर्थ-छटाओं के लिये उनका मोह जरूर उझक-उझककर सामने आता था। और इस सबके अलावा एक ‘तिलिस्म’ वहाँ हर बार कुछ और मोहक होकर आता था, जिसे तीन या चार शब्दों का एक प्यारा-सा नाम मैंने दे रखा है, ‘त्रिलोचनजी के भाई।’

इस ‘गड़बड़’ प्रसंग को मेरे लिये और ज्यादा प्रिय बना दिया था त्रिलोचनजी की स्निग्ध हँसी ने, जिससे हरिपाल त्यागी का गढ़ा हुआ यह तिलिस्म हर बार कुछ अधिक मोहक और रंगीन और मीठा हो जाता था। एक ऐसा प्रसंग, जिसके बाद मैं त्रिलोचनजी को अपने बहुत निकट महसूस करने लगा था और उनकी अंतरंगता का ‘सेक’ महसूस करने के साथ-साथ उनसे थोड़ी-बहुत छेड़छाड़ का अधिकार भी मैंने ले लिया था।

अलबत्ता, इस प्रसंग के चलने पर हर बार त्रिलोचनजी और हरिपाल त्यागी का जो सम्मिलित ठहाका मुझे सुनने को मिलता था और मुझे झेंपकर हर बार जिस तरह ठहाके में शामिल हो जाना पड़ता था, अब भी उसके ‘आनंद संगीत’, बल्कि ‘आनंद लीला’ से मैं मुक्त नहीं हो पाया। यही वह ‘रसात्मक भूमि’ है जहाँ त्रिलोचनजी की सरलता उन्हें तमाम दूसरे प्रगतिवादी कवियों से अलग खड़ा कर देती है और उनके वाद को ‘वाद’ कम, ‘प्रगति’ अधिक बना देती है। वही अब भी इस प्रसंग को लिखते समय मुझे गाढ़े-गाढ़े काव्य-रस में भिगोए दे रही है।

एक लम्‍बी और कष्टकर बीमारी का दुख झेलकर त्रिलोचन गये। पर मुझे सरीखे बहुत-से लेखक-पाठकों के दिलों में वे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे।

धरती की सरलता से निर्मित काव्य-देह में उनकी उपस्थिति और धडक़न अब भी महसूस होती है। ठीक वैसे ही, जैसी तब महसूस होती थी जब त्रिलोचन थे। तो त्रिलोचन अब गए कहाँ? फिर भी एक शून्य है जो पाटने में नहीं आता और भीतर गहरी अकुलाहट-सी है।

एक-दूसरे को तिर्यक काटते संशयों और हताशा के इस बुरे दौर में त्रिलोचन के होने के मानी क्या थे और कैसे उनकी सरलता देखते-देखते अनायास हमारे पूरे व्यक्तित्व पर नक्श हो जाती थी, शायद अब मैं थोड़ा-थोड़ा जान पाया हूँ। बहुत खोकर ही शायद यह अहसास होता है कि हमने क्या खो दिया है। इक्कीसवीं सदी में मुझे लगता है, हमें प्रगति ही नहीं, प्रकृति और प्रेम को भी नये सिरे से सीखने की शुरुआत करनी होगी। तब त्रिलोचन और उनकी सीधी-सरल लगती गुरुतर कविता के मानी हमें और ज्यादा साफ समझ में आएँगे।

(‘यादों का कारवाँ’ से साभार)
चि‍त्र: श्‍याम सुशील

भूख : बेकरार

बेकरार साहब पानीपत में एक बड़ी स्पिनिंग मिल के मैनेजर थे,  लेकि‍न फक्कड़ी अंदाज। मि‍ल मालिक से लेकर मजदूर तक हर कोई उऩ्हें प्यार करता था। उनकी नायाब कवि‍ता ‘भूख’ और उस पर कथाकार प्रकाश मनु की टि‍प्‍पणी-

बेकरार साहब आज नहीं हैं, पर उन्होंने आज के निर्मम सच को कहने वाली जैसी जलती हुई कविताएँ लिखी हैं, वैसी कविताएँ आज बहुत कम पढ़ने को मिलती हैं। इनमें ‘भूख’ तो लाजवाब कविता है जिसे पढ़ते ही बेकरार साहब का आविष्ट चेहरा आँखों के आगे आ जाता है। ‘भूख’ कविता को खुद बेकरार साहब के मुँह से सुनना एक अलग अनुभव था। मुझे याद है, जब मैंने सिरसा के प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में भीष्म साहनी जी को, जिनकी अध्यक्षता में यह सम्मेलन हुआ था, यह कविता सुनवाई  तो वे अवाक-से रह गये थे। फिर बोले, ‘‘वाकई बहुत पावरफुल कविता है!’’ बेकरार साहब पानीपत के थे और सारा पानीपत इस फक्कड़ और अलमस्त कवि को बहुत प्यार करता था। आज बेकरार साहब नहीं हैं, पर यह कविता आज भी हमें उस विलक्षण और खुरदरे कवि की याद दिला देती है-

क्या यह त्रासदी नहीं है–
कि मेरी भाषा के विशाल शब्दकोश में
भूख का कोई पर्यायवाची नहीं है।
और मेरा यह कहना
कि मैं भूखा हूँ
इतना भी संप्रेषित नहीं कर पाता
जितना मेरा यह कहना
कि तुहारे पाँव के नीचे साँप है
या तुम्हारे मकान में आग लग गई है!

निश्‍चि‍त रूप से
मैं उस भूख की बात नहीं करता
जो तुम्हें नाश्ते और दोपहर के भोजन
के बीच लगती है।
मैं तो उस भूख की बात करता हूँ
जो रोज आधी ही मिट पाती है
और दूसरे दिन की भूख से जुड़ जाती है
चिपका देती है तुम्हारे चेहरे पर
कोई याचक मुद्रा
तोड़ देती है हमारा मेरुदंड
उम्र की रफ्तार बढ़ा देती है।
छोड़ देती है बस इतना पौरुष बाकी
कि हम पत्नी को डाँट सकें
या पैदा कर सकें एक और अपने जैसा!
वरना हर बात में नामर्द बना देती है
सीमाविहीन सभ्य।

यह अर्ध-भूखापन
मौत और जिन्‍दगी के बीच
कहीं जीने की दारुण पीड़ा
एक सुलगता एहसास,
बोलकर कहने से
बन जाता है रुदन मात्र
और रोना नहीं है समस्या का समाधान,
आप कुछ समझे श्रीमान!
किसलिये है बोलने की आजादी का विधान?

भूख और भोजन के बीच आते हैं
भाग्य, भाषा, भगवान और भाषण
भ्रांतियाँ, भांड और भद्रपुरुष
सबके सब एक झुनझुना हमारे हाथों में थमा देते हैं
ताकि हम झनकाते रहें,
और बना देते हैं एक सेफ्टी वाल्व
ताकि भाप संपीड़ित न हो पाये
एक शक्ति न बनने पाये
इंजन की तरह,
वरना हम नई सभ्यता में चले जाएँगे
और इन लोगों के काम नहीं आएँगे!

फिर भूखे को भिखारी बनाकर
भीख देने वाली
इस गौरवशाली सभ्यता का क्या होगा?
भूखे सौन्‍दर्य को नंगे नाच और अनिच्छित सहवास के बाद
भोजन देने वाली इस महान संस्कृति का क्या होगा!

उनकी भी समस्याएँ हैं
बात को एकतरफा मत सोचो,
भीख कम है तो सूर्य-नमस्कार करो
वो चाहते हैं कहीं कुछ न उठे –
कोई सिर, कोई हाथ कोई नारा!

(प्रकाशमनु-वार्ता.ब्‍लॉगस्‍पॉट.इन से साभार)
चि‍त्र: चित्‍तप्रसाद

एक बहुत प्यारे और संवेदनशील लेखक का जाना : प्रकाश मनु

वरि‍ष्‍ठ कथाकार द्रोणवीर कोहली का 24 जनवरी, 2012 को देहांत हो गया। कथाकार प्रकाश मनु का आलेख-

निराले अंदाज वाले लाजवाब कथाकार द्रोणवीर कोहली (1932-2012) का जाना हिन्‍दी साहित्य से जुड़े सभी लेखकों और पाठकों को उदास कर देने वाली खबर है। वह इतने प्यारे, खरे लेखक और खरे इनसान थे कि हमारे दौर के प्राय: हर पीढ़ी के लेखक के पास उनके एक से एक अछूते संस्मरण और यादें होंगी। सन् 1932 में रावलपिंडी के निकट एक गाँव में जन्‍में द्रोणवीर कोहली ने ‘टप्पर गाड़ी’, ‘चौखट’, ‘तकसीम’, ‘वाह कैंप’ और ‘नानी’ सरीखे उपन्यास और एक से बढ़कर एक कहानियाँ लिखीं। बड़े अद्भुत वैचारिक लेख भी। उनकी डायरी, संस्मरण, रिपोर्ताज और यहाँ तक कि अनुवाद में भी ऐसा अनोखा रस था कि जो कुछ भी वह लिखते, उनमें उनकी मुस्‍कराती हुई निर्मल आँखें और सचेत शख्सियत दूर से नजर आ जाती थी। वह उन बिरले लेखकों में से थे जिनके लेखों, कहानियों और उपन्यासों पर उनका नाम न हो, तो भी हमें पहचानने में जरा भी देर न लगती थी कि भाषा का यह प्यारा और निराला अंदाज तो द्रोणवीर कोहली का ही हो सकता है। ‘आजकल’ के सम्‍पादन में भी उन्होंने बेशक यही मिसाल कायम की। हिन्‍दी के कई पीढ़ियों के जाने-माने और ऊर्जावान लेखकों को जोड़कर उन्होंने ‘आजकल’ को फिर से समकालीन दौर की, एक धड़कती हुई जीवंत और सतेज पत्रिका बनाया। एक ऐसी पत्रिका जो अपनी परम्‍परागत गरिमा को बनाये रखकर भी, समकालीन दौर की नई सम्‍वेदना और हलचलों से जुड़ती है, और कुछ अलग अंदाज में कीर्ति-शिखर रचती हुई हिन्‍दी साहित्य की प्रतिनिधि पत्रिका साबित होती है।

यों द्रोणवीर कोहली का उपन्यासकार रूप मेरे खयाल से उनकी सृजन-यात्रा में सबसे ऊँचा शिखर और मयार बनाता है। वह सही मानी में हमारे दिलों में पैठ करने वाले बड़े उपन्यासकार थे। ऐसे उपन्यासकार, जो हर बार किसी नई जमीन पर उपन्यास लिखते हैं और जिस परिदृश्य को उठाते हैं उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल करके तथा पूरी तरह डूबकर लिखते हैं। उनके बारे में जब भी सोचो, हमेशा एक खरे लेखक की तसवीर आँख के आगे बनती नजर आती है। शायद इसीलिए कोहली जी के उपन्यासकार की सबसे बड़ी खासियत बताने के लिये कहा जाये तो मुझे एक क्षण भी नहीं लगेगा। यह निस्संदेह उनकी विश्‍वसनीयता है, जिसके कारण उनके उपन्यास हमें अपने आसपास की दुनिया और खुद अपने भीतर के विचार-संसार या सोच में हस्तक्षेप करते लगते हैं। मुझे याद है, उनके उपन्यास ‘वाह कैंप’ की खासी चर्चा हुई थी। ‘वाह कैंप’ को विभाजन के दौर पर लिखा गया हिन्‍दी का एक महत्वपूर्ण दस्तावेजी उपन्यास बताते हुए मैंने लेख लिखा, तो उन्हें स्वाभाविक प्रसन्नता हुई थी। उन्होंने बताया कि उनके अपने विस्थापित जीवन के बहुत-से मार्मिक और बेधक प्रसंग इस उपन्यास में नत्थी हो गये हैं। यों एक तरह से ‘वाह कैंप’ उनका आत्मकथात्मक उपन्यास ही है। बेशक विभाजन के काले दिनों पर लिखा गया यह एक करुण और यादगार उपन्यास है, जिसकी तुलना ‘झूठा सच’ और ‘तमस’ जैसे सदी के बड़े और कालजयी उपन्यासों से की जा सकती है। यह ‘झूठा सच’ और ‘तमस’ जैसे बड़े उपन्यासों की परम्‍परा को आगे बढ़ाने वाली एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है और इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यह उपन्यास एक किशोर की आँखों से देखे गये महाभारत की शक्ल में उस जमाने का कच्चा चिट्ठा हमारी आँख के आगे रख देता है। हालाँकि द्रोणवीर कोहली के उपन्यासकार का ‘विजन’ इतना बड़ा और साफ है कि जब वह इन कारुणिक प्रसंगों को लिख रहे होते हैं, तो इतिहास के लहू सने पृष्ठ तो सामने आते हैं, मगर वे नफरत नहीं, एक बड़ी त्रासदी की करुणा और कसक ही उभारते हैं।

‘वाह कैंप’ के बाद लिखा गया ‘नानी’ कोहली जी का एकदम अलग मिजाज का उपन्यास है। और दो भिन्न संस्कृतियों, बल्कि दो ध्रुवांतों को टकराव और झंझावत के बीच आ फँसे, जिस ‘काल फलक’ पर उन्होंने उस उपन्यास की रचना की है, जाहिर है, वह गहरी उत्सुकता तो मन में जगाता ही है। मोटे शब्दों में ‘नानी’ उपन्यास एक हिन्‍दुस्तानी नानी की कहानी है जो पराई दुनिया में जाकर उसकी भूल-भुलैया में ऐसा फँसती है कि अकसर चक्कर पर चक्कर खाती और छोटे-बड़े  सुख-दुखों की कारा में फँसकर कई बार तो बेतरह वेदना और पीड़ा से कराहती नजर आती है। हालाँकि अमरीका की बेशुमार पैसे और समृद्धि से लदी-फदी इस चमकदार दुनिया के तिलिस्म में वह गई खुद थी। कहा जा सकता है कि नानी यानी सरस्वती के इर्द-गिर्द मोह और ममता के जो कोमल तंतु हैं, वे ही जाने-अनजाने उसे वहाँ ले जाने के लिए बाध्य करते हैं। शुरू-शुरू में एक नई दुनिया में पाँव रखने का सुख और रोमांच भी है। फिर अमरीका के साथ भूमण्‍डलीकरण की जोर-शोर की आँधी और जिस तरह का महिमा वर्णन और गौरवान्विति जुड़ गई है, उससे अमरीका जाना शुरू-शुरू में उन्हें शायद कुछ-कुछ ‘सपनीला’ भी लगा हो। किसी सपने के पूरे होने जैसा अनुभव। भारत जैसे गरीब देश की आँख से अमरीका शायद ऐसा ही लगता है।

लेकिन नानी को अमरीका ले जाने वाली मुख्य बात यह नहीं थी। मुख्य बात यह थी कि बेटी चेतना और दामाद श्याम रतन वहाँ थे और एक छोटी-सी दोहती तुला वहाँ थी, जिसकी शरारतें किसी को भी मुग्ध करने के लिये काफी हैं। और इससे भी बढ़कर तो यह कि बेटी और दामाद जो दोनों ही अमरीका में डॉक्टर हैं—के दाम्‍पत्य जीवन में यह एक नये आने वाले मेहमान की तैयारी का समय है। अमरीका में पैसे और समृद्धि की अंधी दौड़ चाहे जितनी हो, लेकिन यह समय किसी की दंपति के लिये सबसे अधिक नाजुक है। ज्यादातर तो पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हैं। इसलिए प्रसव के कुछ ही समय बाद अबोध शिशु को ‘नैनी’ या परिचारिका के भरोसे छोड़कर जाना होता है। ऐसे ही समय वहाँ बसे भारतीयों को अपने देश और जड़ों की याद आती है और भारतीय जीवन की सहजता और ममता भी।

तो ममता के वे कोमल और बारीक डोरे ही थे, जो नानी यानी सरस्वती को चुपके से बाँधकर हजारों मील दूर एक पराई जमीन की कारा में ले आये। वह आ तो गई, लेकिन जीवन भर साथ रहे अपने भारतीय संस्कारों और जीवन शैली का क्या करे? रातों-रात भला कैसे बदल जायें वे। और उस सब को कैसे स्वीकार कर ले, जो उसके सहज जीवन प्रवाह का हिस्सा कभी था ही नहीं। लिहाजा नानी अलग जमीन ही नहीं, बल्कि एक अलग तरह की संस्कृति और बेगानेपन की कारा में अनचाहे ही जा पड़ती है, जहाँ वह चाहे लाख छटपटाती, दुखी और अपमानित होती रहती हो, लेकिन एक निश्‍चि‍त अवधि से पहले छूट नहीं पाती। उसका हर दिन कारा में एक और दिन काटने की तरह है। तुला को सँभालने के साथ-साथ नवागत शिशु ऋषि को सँभालना, दोनों को नहलाना-धुलाना, सफाई, दिन में कई-कई बार डायपर बदलने का काम, फिर उन्हें दूध पिलाना, हारी-बीमारी की चिंता करना और ऊपर से तुला की अटपटी जिदें। इस सबमें कई बार सरस्वती निढाल हो जाती है। उसके बूढ़े शरीर में अब भला इतनी जान भी कहाँ! ऊपर से जब-तब दामाद की झिड़कियाँ और तीखे कटाक्ष सुनने को मिलते हैं—यहाँ तक कि बेटी भी पति की ही भाषा बोलने लगती है। और सरस्वती को यह समझ में नहीं आता कि वह यहाँ आई किसलिये थी! लेकिन मोह-ममता का बंधन ऐसा है कि चाहे कितनी ही परेशानियाँ हों, लेकिन जब तक ऋषि कुछ बड़ा न हो जाये, अपना फर्ज अधूरा छोडक़र और बेटी की परेशानियों से छूटकर भला वह कैसे भारत लौट जाये?

यह दीगर बात है कि रोज-रोज ये सारे फर्ज पूरे करते हुए भी वह एक-एक दिन गिनती है कि कब वह उस जेलखाने से छूटेगी, जहाँ वह अपनी सहजता ही खो बैठी है। उसका मन बुझ गया है और बेटी और दामाद की झिड़कियाँ खा-खाकर वह इस घर में नानी कम, नैनी या परिचारिका ही अधिक बनकर रह गई है। बार-बार छुटकारा पाने की चाह के बावजूद सरस्वती उपन्यास के अंत में ही उस कैदखाने से छूट पाती है। छूटते वक्‍त फिर से भारत लौटते हुये उसकी जो मन:स्थिति थी, उसका वर्णन तो मुश्किल, बहुत मुश्किल है। बस उसकी कुछ करुण उक्तियों और आहों से ही उसका अंदाजा लगाया जा सकता है, जिसमें वह बार-बार अपने पति दीनदयाल से कटती है कि ‘मैं अब वह नहीं रही, मैं अब कुछ नहीं रही। मेरे भीतर बहुत-कुछ टूट गया है।’ या कि उसका बार-बार सोचना कि ‘मैं अब पहले जैसी कभी न हो पाऊँगी।’ यह भारतीय संस्कृति की सहज गरिमा में बड़ी हुई एक भारतीय स्त्री का पराई धरती पर जाकर अपनी ही बेटी और दामाद के घर में बार-बार टोके जाने और फटकारें खा-खाकर श्रीहीन हो जाना है। इसीलिये पति दीनदयाल जब मजाक में पूछते हैं कि क्या वह दुबारा यहाँ आना पसंद करेगी, तो सरस्वती जैसे कानों को हाथ लगाकर अकुलाकर कहती है, ‘नहीं, कभी नहीं।’

देखा जाये तो ‘नानी’ एक कथाहीन उपन्यास है, जिसमें अगर कोई कहानी है, तो वह महज यह कि अपने फर्ज या कर्तव्य के पाश में फँसी हुई नानी कितना कुछ सहती है। मगर फिर भी कठोर होकर एक बार भी वह ममता के इन कच्चे धागों को तोड़ती नहीं। यह नानी यानी सरस्वती की हिन्‍दुस्तानियत या भारतीयता है। इतना सहना कि वह तप लगे, कोई हिन्‍दुस्तानी स्त्री ही कर सकती है, पश्‍चि‍मी जीवन शैली और संस्कारों वाली स्त्री नहीं। लेकिन इस फर्ज को पूरा करने के पीछे सरस्वती जैसी एक प्रबुद्ध, संस्कारशील और सम्मानित स्त्री ने कितना कुछ खोया—कोई साढ़े तीन सौ पन्नों में फैला ‘नानी’ उपन्यास कुल मिलाकर इसी का एक विस्तृत ब्योरा पेश करता लगता है। इसे पढ़कर अच्छी तरह समझ में आ जाता है कि उम्र, बुजुर्गियत या रिश्तों का जो सम्मान यहाँ अब भी बाकी है, वैसा पश्‍चि‍मी देशों में नहीं है। इसीलिये सरस्वती ने एक छोटी बच्ची की तरह अपनी ही बेटी और दामाद से कितनी ‘सीख’ ली और ‘पाठ ठीक से याद न होने की सजा’ के एवज में कितने तीखे कटाक्ष, व्यंग्यपूर्ण उलाहने और झिड़कियाँ खाईं, उन्हें ‘नानी’  उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है। यहाँ तक कि सरस्वती के पति दीनदयाल जो पत्नी के आग्रह और चिट्ठी डालने पर खुद भी आकर इस कारा में पड़ गये हैं, कभी-कभी पत्नी की यह हालत और लाचारी देखकर बुरी तरह द्रवित हो उठते हैं। वे उसकी मदद चाहे अधिक न कर पाते हों, लेकिन सरस्वती के दुखों को सुन-सुनकर और थोड़ा धीरज बँधाते हुये वह उसके मन के बोझ को थोड़ा हल्का जरूर कर देते हैं। कहना न होगा कि  ऋषि और तुला की छोटी-छोटी शरारतें और खिलंदड़ापन ही है जिसके कारण नाना-नानी खुद को एक मीठी कारा में पाते हैं। यह न होता, तो यह मीठी कारा, मीठी तो होती ही नहीं, बल्कि एक जलते हुए जंगल की तरह उन्हें बस दिन-रात तपाती और बेधती ही रहती।

द्रोणवीर कोहली का यह बड़ा औपन्यासिक कौशल ही कहा जायेगा कि उनका ‘नानी’ उपन्यास बिना कुछ कहे, बड़े अनायास ढंग से समझा जाता है कि एक धनी और आत्मतृप्त देश का नरक क्या हो सकता है! यह ठीक है कि वहाँ पैसा लगभग बरस रहा है। हर कोई व्यस्तता की अंधी दौड़ में है। लेकिन उतना ही यह भी ठीक है कि किसी को रुककर सोचने की फुरसत नहीं है और कहीं चैन नहीं है। लोग एक नपी-तुली जिन्‍दगी के नपे-तुले सुख के इस कदर आदी होते जा रहे हैं कि जीवन का भीतरी उल्लास और स्फूर्ति गायब हो गई है। अगर धन की कमी एक तरह से तबाह करती है तो धन की अंधाधुंध बारिश दूसरी तरह से। चेतना और श्याम रतन के एक नीरस और बेस्वाद दांपत्य जीवन को इसी सन्‍दर्भ में समझा जा सकता है। वे हर वक्त थके और चिड़चिड़े-से नजर आते हैं और उनके लिये खुशी कोई बाहरी चीज है, जिसे वे शॉपिंग आदि के जरिये पा लेना चाहते हैं। मगर काश, वे जान पाते कि खुशी कोई ऐसी चीज नहीं जो पैसे से खरीदी जा सके। उसके लिये मन का मुक्त बहना जरूरी होता है। जबकि चेतना और श्याम रतन का जीवन इतना बँधा हुआ है कि वहाँ उनकी आदत या नपे-तुले ढंग से अलग कहा गया कोई एक छोटा-सा वाक्य, कोई एक छोटी-सी टिप्पणी या कोई हल्का-सा मजाक भी उन्हें खामखा खीज और रोष से भर देता है। और बार-बार उनके मुँह पर यही शब्द आते हैं कि इस बात को कहने की क्या जरूरत थी और बार-बार सरस्वती से यही ताकीद करते हैं कि वह अजनबियों से न मिले, न बातें करे। क्योंकि अजनबियों से बात करना और बगैर जरूरत बात करना यहाँ असभ्यता है। यहाँ तक कि किसी मेहमान के आने पर उससे चाय या खाने-पीने के लिये पूछ लेना भी असभ्यता है। समझ में आना मुश्किल है कि यह कैसी सभ्यता है जिसमें जीवन के सभी साज, कार्य-व्यापार खारिज हैं। इस माहौल में अगर सरस्वती और दीनदयाल जी लगातार घुटन महसूस कर रहे हैं तो यह बेसबब नहीं। दामाद श्याम रतन की कटूक्तियाँ और बात, बिना बात हिन्‍दुस्तान को लेकर की गई अशालीन और कठोर टिप्पणियाँ इस नरक को लगातार खौलाती रहती हैं। इससे सरस्वती और दीनदयाल जी की कभी-कभी तो यह हालत होती है कि वे बच्चों की तरह डरे-सहमे से नजर आते हैं। फुसफुसाकर एक-दूसरे से अपने मन की बात कहते हैं। और कभी-कभी तो अकेले में अपने साथ किये गये अपमानजनक व्यवहार को याद करके रो लेते हैं। दीनदयाल और सरस्वती दोनों उच्च शिक्षित हैं और दीनदयाल तो हिन्‍दुस्तान में एक बड़े अधिकारी रहे हैं। सरस्वती भी एक अच्छे स्कूल की सम्मानित प्रिंसिपल रह चुकी हैं। फिर अमरीका की सभ्यता की यह कौन-सी सदाशयता है जो इनकी गरिमा को चूस जाती है। कोहली जी बड़े मार्मिक ढंग से ये सवाल नानी उपन्यास के जरिये उठाते हैं। हालाँकि इनके कोई बने-बनाये रेडीमेड जवाब न देकर वे पाठकों के दिलों में एक गहरी कसमकश छोड़ देते हैं।

और जाहिर है, ये अमरीका जाकर अवांछित स्थतियों के चक्रव्यूह में फँसे एक संवेदनशील शख्स के सवाल ही नहीं हैं, बल्कि ये एक ऐसे सचेत लेखक के भी सवाल हैं, जो चाहे-अनचाहे अपने मुल्क में ग्लोबलाइजेशन और नई विश्व संस्कृति के नाम पर घुसे चले आते अमरीका को भी पहचान रहा है। और यहाँ परंपरागत हिंदुस्तानी नानी की लाचारी भरी त्रासद कथा एक अलग ध्रुव पर भी मार करती जान पड़ती है।

यों देखा जाये तो कोहली जी का यह अंदाज उनके उपन्यासों ही नहीं, कहानियों, लेखों, रिपोर्ताज समेत साहित्य की हर विधा में नजर आता है। वह अपने जीवन के बड़ी शिद्दत से महसूस किये गये किसी छोटे-से प्रसंग से शुरू करते हैं और फिर चीजें फैलती हैं तो वे पूरे जमाने को अपनी जद में ले लेती हैं।

कोहली जी के कथाकार रूप की भी यही खासियत है। उन्होंने बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं, पर वे इतनी मार्मिक कहानियाँ हैं कि एक बार पढ़ने के बाद उन्हें भुलाना मुश्किल है। प्रभाकर श्रोत्रिय ‘वागर्थ’ के सम्‍पादक थे तो उन्होंने मुझे कोहली जी की कहानियों पर एक विस्तृत टीप लिखने के लिए कहा था और उसके लिये अलग-अलग पत्रिकाओं में छपी कहानियों के प्रिंट कोहली जी ने कृपापूर्वक उपलब्ध करवा दिये थे। तब तक मैंने उऩकी कोई कहानी नहीं पढ़ी थी, पर एक साथ उनकी कोई दर्जन भर कहानियाँ पढ़ते हुए मैं जैसे अवाक सा रह गया। ये वे कहानियाँ थीं जिनमें कोहली जी के संघर्ष और गर्दिश के दिनों की बहुत तप्त उसांसों भरी छायाएँ थीं और साठ के दशक के साहित्यिक-सामाजिक उथलपुथल के बहुत सच्चे और प्रामाणिक बिम्‍ब उनमें मौजूद थे। उनका वह कथा-संचयन शायद अब छप गया है, पर मेरी आँखों के सामने तो वे पन्ने ही तैर रहे हैं जिनमें कहानियों की शक्ल में एक समूचा दौर अपनी करुणा, गुस्से और विद्रोही तेवर के साथ मौजूद है, और बीच-बीच में खुद कोहली जी की आत्मकथात्मक छवियाँ घुल-मिल सी गई हैं।

हालाँकि कोहली जी बड़ों के साथ-साथ बच्चों के भी उतने ही प्यारे और लाजवाब लेखक थे जिनकी लिखी बाल कहानियों और उपन्यासों में अनोखा रस था और बच्चे खूब ललककर उन्हें पढ़ते थे। इसी तरह वर्षों तक ‘बाल भारती’ के सम्‍पादक के रूप में उन्होंने बाल पाठकों के मन में ऐसी छाप छोड़ी कि उनके समय के ‘बाल भारती’ के अंक आज भी मानो हाथ उठाकर पढऩे के लिये बुलाते जान पड़ते हैं। उनके समय के बाल पाठक आज भले ही बड़े हो गये हों, पर आज भी वे बड़ी शिद्दत से कोहली जी के समय में छपी एक से एक सुंदर और अलमस्त किस्सागोई से भरपूर कहानियों को याद करते हैं जिनकी प्रस्तुति और रेखांकन भी बड़ा खूबसूरत होता था। पिछले दिनों ‘बाल भारती’ की चुनिंदा कहानियों के संचयन के लिये पुरानी फाइलें पलटते हुए मैंने महसूस किया कि पत्रिका के उस दौर के अंक, जब द्रोणवीर कोहली ने इसका संपादन किया था, एकदम अलग से पहचान में आते हैं। अपने सम्‍पादन-काल में उन्होंने न सिर्फ हिन्‍दी साहित्य के शीर्ष कथाकारों को बाल साहित्य से जोड़ा, बल्कि उनसे ऐसी रचनाएँ भी लिखवा लीं, जो खुद में एक इतिहास बन गईं। बच्चों और बाल साहित्य के प्रति कोहली जी के समर्पण की यह अनोखी मिसाल है।

फिर बच्चों के लिए लिखे गये कोहली जी के ‘टप्पर गाड़ी’ और ‘करामाती कद्दू’  उपन्यासों की तो खासी धूम मची रही है। इन उपन्यासों में कथा-प्रवाह और कौतुक ऐसा जबरदस्त था कि बच्चे मानो साँस रोककर इन्हें पढ़ जाना चाहते थे। और सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़े भी। कोहली जी ने निश्‍चि‍त रूप से इन उपन्यासों को खुद बच्चा बनकर लिखा होगा। इसलिये बच्चे तो इनका आनन्‍द लेते ही हैं, बड़े भी इन्हें पढ़ते हुए एक शरारती हँसी के साथ अपने बचपन के खिलंदड़े दिनों में पहुँच जाते हैं।

सचमुच कोहली जी के ये अद्भुत उपन्यास हैं जिन्हें छपे हुए बरसों हो गये, मगर आज भी उन्हें उसी शिद्दत से याद किया जाता है। कोहली जी अतिशय विनम्रतावश अपने बाल उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ को मौलिक उपन्यास न मानकर विदेशी कृतियों से प्रभावित मानते थे। सम्‍भव है, ऐसी कोई हलकी छाया वहाँ रही हो, पर उनकी शैली का जादू और अंदाजेबयाँ ऐसा है कि ‘करामाती कद्दू’ एक मौलिक बाल उपन्यास का-सा रस-आनन्‍द देता है। इसी तरह ‘टप्पर गाड़ी’ तक्षशिला की पृष्ठभूमि पर लिखा गया विलक्षण बाल उपन्यास है, जिसमें इतिहास और मिथक की आँखमिचौनी-सी है। इसमें हड़प्पा काल में मिलने वाली बैलगाड़ी की कथा बड़े अद्भुत रूप में सामने आती है, जिसमें प्राचीन और नई किस्सागोई का मिला-जुला रस है। कोहली जी ने इसे बच्चों के लिए इतने चुस्त कलेवर में और नाटकीयता के साथ लिखा है कि यह एक अविस्मरणीय उपन्यास बन गया है। बड़े से बड़े साहित्यकार भी द्रोणवीर कोहली के ‘टप्पर गाड़ी’ का बड़े आदर से जिक्र करते मिल जाते हैं। ऐसा सम्मान शायद ही हिन्‍दी के किसी और बाल उपन्यास को नसीब हुआ हो।

कोहली जी का ‘डाक बाबू का पार्सल’ और ‘हार न माने वीर’ भी बडे सुंदर बाल उपन्यास हैं। ‘डाक बाबू का पार्सल’ में डाक बाबू की मानवीय सम्‍वेदना छल-छल कर रही है, तो ‘हार न माने वीर’ मन में साहस, वीरता और रोमांच पैदा करने वाला बाल उपन्यास है जिसकी मूल कथा यूनानी मिथक कथाओं के बीच से निकली है।

इसी तरह द्रोणवीर कोहली ने बच्चों के लिये एकदम अलग अंदाज में किस्सागोई से भरपूर कहानियाँ लिखीं। ‘बाल भारती’ के एकदम शुरू के अंकों में ही कोहली जी की कहानियाँ नजर आने लगती हैं। शुरू में उन्होंने लोककथाएँ अधिक लिखीं, पर बाद में चलकर वे आधुनिक परिवेश की उन कहानियों की ओर आये जिनमें बच्चा और बच्चे का मन अधिक खुलकर सामने आता है। पर लिखने का अंदाज उनका हमेशा वही रहा, जिसमें बात कहने की सूझ और किस्सागोई भरपूर होती थी। इसलिये कोहली जी की बाल कहानियाँ ऐसी विनोदपूर्ण बाँकी अभिव्यक्ति लिये हुए हैं कि एक बार पढक़र उन्हें कभी भूला नहीं जा सकता। फिर उनकी कई ऐसी कहानियाँ याद आती हैं, जिनमें पशु-पक्षियों और खासकर नन्हे परिंदों की चह-चह करती उपस्थिति मन में गहरे बस जाती है। ऐसी ही एक छोटी चिड़िया की बड़ी मजेदार कहानी उन्होंने बाल भारती के लिये लिखी थी, जिसमें कथा के बीच में एक पंजाबी लोकगीत की पंक्तियाँ भी गुँथी हुई थीं, ‘टाली मेरे बचड़े, लक टुनूँ-टुनूँ…!’ और उस छोटी-सी कहानी को पढ़ते हुए मानो पूरा पंजाब और पंजाब की लोक संस्कृति की सुवास मन में उतर जाती है। इसी तरह ‘नंदन’ में उनकी एक बड़ी ही सुंदर और भावपूर्ण कहानी छपी थी जिसमें एक चिड़िया के घोंसले और उसके नन्हे बच्चे का किस्सा है।

कोहली के व्यक्तित्व और साहित्य दोनों में एक बड़ी गहरी-गहरी-सी करुणा या मर्मस्पर्शी संवेदना है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘वाह कैंप’ का किशोर नायक इसीलिये हमें कभी नहीं भूलता, जो देश के बँटवारे के समय परिवारी जनों के साथ पाकिस्तान से आया तो उसकी पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, हँसता-खेलता बचपन भी मानो वहीं छूट गया। और यहाँ आने के बाद आर्थिक परेशानियों से जूझते परिवार की मदद के लिये छोटी उम्र में ही उसे जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाना पड़ा और तरह-तरह के काम करने पड़े। कोहली जी के ‘वाह कैंप’ उपन्यास में यह वर्णन आँखों को गीला कर देता है, क्योंकि इसमें खुद उनके निजी जीवन के अक्स हैं। कोहली जी ने एक से एक सुंदर कृतियाँ साहित्य-जगत को दी हैं, पर उनमें बड़ों के लिए लिखा गया ‘वाह कैंप’ और बच्चों के लिए लिखा गया ‘टप्पर गाड़ी’ सचमुच बेजोड़ हैं।

और ‘बाल भारती’ के सम्‍पादन के दौरान उन्होंने बच्चों की पत्रिका के सम्‍पादन की जो मिसाल कायम की, उससे आज भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। कुछ अरसा पहले बाल साहित्य के एक सेमिनार में उन्होंने अपने लेखन के शुरुआती दिनों का एक मर्मस्पर्शी संस्मरण सुनाया था। उन्होंने बाल पत्रिका ‘मनमोहन’ के सम्‍पादक को एक कहानी छपने भेजी थी, साथ में एक निजी तकलीफों से भरा पत्र भी था। इस पर ‘मनमोहन’ के सम्‍पादक ने उन्हें हर अंक के लिये एक कहानी जरूर भेजने के आग्रह के साथ इतना भावपूर्ण पत्र लिखा कि द्रोणवीर कोहली की आँखें भीग गईं और उसी दिन से उनके लेखक बनने की कहानी भी मानो शुरू हो गई। बाद में जब खुद कोहली जी सम्‍पादक बने, तो उनके सामने आदर्श तरुणाई के दौर के उन्हीं विनम्र और सरल सम्‍पादक का था, जिन्होंने गर्दिश के दिनों में उन्हें हिम्मत, हौसला और प्यार दिया था।

कोहली जी सचमुच बच्चों के दोस्त लेखक और दोस्त संपादक थे जिन्होंने साबित कर दिया कि बच्चों के लिये लिखने की पहली शर्त है, बच्चे और बचपन से दोस्ती, और जब वह हो जाती है तो रास्ते खुद-ब-खुद निकलते जाते हैं। द्रोणवीर कोहली आज नहीं हैं, पर उनकी मीठी उत्फुल्ल हँसी और बेलाग बातें आज भी हमें राह दिखा रही हैं। लगता है, वह हमसे कहीं दूर नहीं गये, हमारे आसपास ही हैं। यों भी बच्चों और जिन्‍दगी को इतनी शिद्दत से प्यार करने वाला लेखक भला इस धरती से दूर जा ही कहाँ सकता है।

वह झिझकती हुई अनौपचारिक मुलाकात : प्रकाश मनु

रघुवीर सहाय

‘दूसरा सप्तक’ के प्रमुख कवि‍ और साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त रघुवीर सहाय (9 दिसम्बर, 1929 – 30 दिसम्बर,1990) पर कथाकार प्रकाश मनु का संस्‍मरण-

‘देखिए, सबका अपना-अपना जीवन है, अपने विश्‍वास—यही सत्य है जीवन का! जीवन का कोई सत्य अन्‍ति‍म सत्य नहीं है, इसलिए यह जीवन अब तक टिका हुआ है और इसीलिये हमारे रचने के भी कुछ मानी हैं!’’

‘‘कविता भाषा के जरिये उसी सत्य की खोज है जो आत्म का होने के साथ-साथ, बल्कि इसीलिये पर का भी है। शायद इसीलिये कविता भाषा में जीना है, भाषा के साथ जीना है। कवि-कर्म इसीलिये आदमी को परिभाषित करना,  नये आदमी को बनाना भी है।”

एक भूरा-सा सँवलाया पहाड़ है, ऊपर से देखने पर कुछ-कुछ सूखा, चटियल, जिसके होंठ मैंने अभी-अभी हिलते देखे हैं।

पहाड़ सूखा भले हो, मगर भीतर उसके ‘पानी के संस्मरण’ हैं। शायद इसीलिये जब से उससे मिलकर आया हूँ, मैं भीतर से कुछ बदल-सा गया हूँ। चीजें अब ज्यादा साफ नजर आती हैं।

‘‘सबका अपना-अपना जीवन, अपने-अपने विश्‍वास हैं, अपने विश्‍वासों पर विश्‍वास!’’ मैं एक अजीब-सी लय में बुदबुदाने लगता हूँ, ‘‘वह कितना पुख्ता है, कितना सहज, इससे आप आँकिए लेखक को!’’

लेखक का जीवन, कवि का जीवन!

कवि का जीवन, कवि का…!

कुछ शब्द भीतर टुनटुनाए। उनकी गूँज तेज-तेजतर होती जा रही है और अब वे कुछ पंक्तियों की शक्ल में ढल गये हैं, ‘‘प्रिय पाठक, ये मेरे बच्चे हैं, कोई प्रतीक नहीं और इस कविता में मैं हूँ मैं, कोई रूपक नहीं।’’

‘‘मैं अपनी एक मूर्ति बनाता और एक ढहाता हूँ और आप कहते हैं कि कविता की है…!’’

‘‘लोकतंत्र—मोटे, बहुत मोटे तौर पर लोकतंत्र ने हमें इनसान की शानदार जिन्‍दगी और कुत्ते की मौत के बीच चाँप लिया है।’’

कुहासा अब छँट रहा है।

वह भूरा-सा सँवलाया पहाड़ अब धीरे-धीरे मनुष्याकृति में बदलता है। परिचित रेखाएँ—सख्त, कड़ी मुद्रा। फिर देखते ही देखते वह पिघलने लगता है—अरे, रघुवीर सहाय!

2

याद आ गई वह मुलाकात…!

याद भी क्या अजब बला है। अब जबकि वह नहीं हैं, अभी-अभी आँखों के आगे न जाने कहाँ से चला आया वह इतना सख्त आदमी। सख्त और कडिय़ल। चेहरे पर रेखाओं का ऐसा जाल, जैसे पत्थर पर पड़ जाती हैं लकीरें!

बाईस बरस! पूरे बाईस बरस हो गये उस मुलाकात को। उसके बाद भी दो-तीन दफा मिलना हुआ, पर वह मुलाकात! वह पहली मुलाकात कभी फीकी नहीं पड़ी, उसके रंग कभी धुँधलाए नहीं, ‘‘एक रंग होता है नीला और एक वह…!’’

गरमियाँ थीं, जून की गरम लू वाली दोपहर।

इतवार को ऐसी ही एक दोपहर में जब कपड़ों के भीतर जिस्म जलते हैं और चौतरफा सन्नाटा बज रहा होता है, मैं प्रेस एन्क्लेव यानी सहायजी के घर का पता पूछता-पूछता उनके पास पहुँचा था। दिल्ली के भूगोल से तब तो और भी कम परिचय था। यों अब भी कहाँ जान पाया हूँ!

मेरे हाथ में किताब थी, कविताओं की अपनी ताजी छपी किताब- ‘कविता और कविता के बीच’। मेरे मित्र देवेंद्र कुमार के साथ छपा साझा कविता-संकलन जो मैं अपने प्रिय लेखक को भेंट करना चाहता था। इंडो-बलगेरियन लिटरेरी क्लब ने उस पर एक गोष्ठी का आयोजन किया था जिसकी अध्यक्षता सहायजी को करनी थी। उन तक पुस्तक पहुँचाने का जिम्मा मेरा। सोचा था, इसी बहाने शायद उस कद्दावर लेखक से मुलाकात हो जाएगी, जिससे भीतर ही भीतर न जाने कितनी मुलाकातें हो चुकी थीं।

सुबह निकला था और बड़ी मुश्किलों-झंझटों से दो-चार होते हुये करीब-करीब बदहवास हालत में दोपहर तक पहुँचा था। और फिर वह मेरी पुरानी आदत, बगैर फोन…! जाने कब, कैसे मेरे दिमाग में बैठ गया है कि फोन करके होने वाली मुलाकातें ‘प्रायोजित’ होती हैं। तो सौ झंझट मंजूर हैं, मगर फोन नहीं।

भरी दोपहरी। धूप सीधी सिर पर गिर रही है—आग!

मैं पसीने-पसीने नीचे सडक़ पर खड़ा हूँ और ऊपर आँख किये नम्‍बर पहचान रहा हूँ, यही नम्‍बर लिखा था न डायरी में?

डायरी खोलता हूँ, बंद करता हूँ और सीढिय़ाँ चढ़ता हूँ।

सोच रहा हूँ—नहीं, नहीं, इस समय किसी भले आदमी को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं है। बस, किताब देकर चला जाऊँगा।

दरवाजा खुलने पर जो युवती बाहर आई—शायद उनकी बेटी, उसे मैं किताब सौंपता हूँ। फिर ‘‘कृपया रघुवीर सहायजी को दे दीजिएगा!’’ कहकर जल्दी से सीढिय़ों की ओर कदम बढ़ाता हूँ।

‘‘क्या आप उनसे मिलना चाहेंगे?’’ सवाल मुझसे पूछा गया है।

अब मैं असमंजस में हूँ—कैसे कहूँ कि उनसे मिलना तो मेरे लिए सपना है। अपने प्रिय लेखक से कौन नहीं मिलना चाहेगा?

‘‘हाँ…नहीं, पर वे शायद व्यस्त होंगे। आप पूछ लीजिए उनसे।’’ घबराहट में मेरे मुँह से ऐसी भाषा निकलती है जिसका व्याकरण से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।

मैं सीढिय़ों से नीचे की ओर निगाह गड़ाए खड़ा हूँ कि शायद ऐसा ही कोई जवाब आएगा और मैं झट चल पड़ूँगा। मेरे मन में कहीं न कहीं एक अक्खड़ छवि भी है रघुवीर सहाय की, एक साथ समाजवादी और एक स्नॉब आदमी। दोनों में से किसी से मेरा सीधा परिचय नहीं। एक को कविताओं से जानता हूँ, दूसरे को सुनी-सुनाई बातों से।

‘‘वे बुला रहे हैं…!’’

हाँ, यही मुझसे कहा गया है—वे बुला रहे हैं, वे…! और अगले ही क्षण मैं अपने प्रिय कवि के आगे था। वह कवि, जिसका काव्य-संसार मेरे लिए एक बीहड़ जंगल था। और वह जंगल मेरे लिए जीने की अनिवार्यता था। मैं उसमें घूमता, भटकता, साँस लेता था। सारे-सारे दिन वे मेरे साथ, मेरे भीतर उपस्थित रहते थे और सालों-साल हो गये थे हमें साथ-साथ रहते हुये। उनकी कविताओं से मुझे जीवन की खुराक मिलती थी, बल्कि जीने की तमीज मैंने उनसे सीखी।

वे मेरी कविताओं की किताब उलट-पलट रहे हैं। कभी शुरू से, कभी बीच-बीच से कुछ देखते हैं, फिर पलटते हैं, आगे बढ़ जाते हैं। फिर रुककर कुछ देखने लगते हैं। इस बीच मैं चोरी-चोरी कभी उनके चेहरे को, जिस पर एक हल्की-सी थकान साफ नजर आती है और कभी कमरे को देख जाता हूँ। कमरा क्या है, एक छोटा-सा केबिन, ढेर-ढेर किताबों से लबालब। लिखने की कुर्सी-मेज को छोडक़र बहुत कम जगह बची रहती है जिस पर पीछे की तरफ पैसेज-सा है, एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए वहीं से गुजरना पड़ता है।

उन्होंने किताब एक ओर रख दी है, ‘‘मैं इसे पढ़ूँगा, फिर बात करेंगे कभी!’’ अब वे पूछ रहे हैं मेरे बारे में और बात वहाँ-वहाँ जा रही है, जहाँ का मैंने कभी सोचा ही नहीं था। मेरा ‘साइक्लॉजीकल फीवर’ कि जाने वे कैसे होंगे, उनसे कैसे बात करूँगा, अब गायब हो गया है। और मैं उनसे बात कर रहा हूँ, जैसे उम्र में बड़े अपने किसी दोस्त से बात कर रहा हूँ, अपने बड़े भाई से बात कर रहा हूँ। उससे जो उम्र और अनुभव दोनों में मुझसे बड़ा है और इस राह पर मुझसे पहले कई दफा आ-जा चुका है।

मैं बाल पत्रिका ‘नंदन’ में हूँ, यह पता चला तो सहायजी बाल साहित्य की चर्चा छेड़ देते हैं। पूछते हैं, ‘‘आप लिखते हैं बच्चों के लिए…?’’

‘‘जी, थोड़ा-सा। ज्यादातर कविताएँ।’’

मेरी बात सुनकर लगा, विचारों की एक दुनिया उनके भीतर बन रही है। फिर वे उससे निकले। गजब की मासूमियत के साथ कहते हैं, ‘‘मैं चाहकर भी कभी नहीं लिख सका बच्चों के लिये। मुझे बड़ा कठिन लगता है, हालाँकि इच्छा बराबर रहती है। पता नहीं, आप लोग कैसे लिख लेते हैं?’’

फिर याद करने लगते हैं, ‘‘एक जमाना था, बड़ों के लिये लिखने वाले सब लेखकों ने बच्चों के लिए लिखा। बांग्ला में आज भी यह परम्‍परा मिल जाएगी, लेकिन हिन्‍दी में…?’’ हल्का विषाद-सा उतर आया उनके चेहरे पर।

‘‘एक कारण शायद यह भी हो कि हिन्‍दी में बाल साहित्य का मौजूदा तालाब गँदला है। ज्यादातर छोटी प्रतिभा के लोग हैं और वे ऐसी आपाधापी मचाए रखते हैं कि कोई बड़ा लेखक इधर आए ही नहीं।’’ मैं थोड़ी तिक्‍तता से कहता हूँ।

‘‘शायद आप ठीक कह रहे हैं। इसीलिये बाल साहित्य से विरक्ति होती है। लोग कुछ भी लिख देते हैं, अनुवाद में तो और भी गड़बड़ है।’’ और सहायजी अपने कुछ कड़वे अनुभव सुनाने लगते हैं। फिर पूछते हैं, ‘‘आप बाल पत्रिका में कैसे?’’

‘‘इसलिये कि हमारे यहाँ ज्यादातर लोग ‘मिसफिट’ हैं और चुनने का अधिकार ज्यादातर लोगों के पास नहीं है।’’

अपने बारे में बताते-बताते मैं एकाएक दस वर्ष पीछे के एक निजी ‘महासमर’ में कूद जाता हूँ, ‘‘आपकी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ ने एक तरह से मुझे आत्महत्या से बचाया था सहायजी।’’

‘‘क्यों, क्यों…कैसे?’’ वह एकाएक असहज हो उठे।

मैं कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में रिसर्च के दिनों के अपने हालात के बारे में बताता हूँ जब एक ओर कविता थी यानी कविता को शिद्दत से जीने की खुद्दारी, दूसरी ओर हैड का ‘गणित’, तीसरी ओर अंतरजातीय विवाह की अपनी भीषण मुश्किलें। ‘‘और मैंने—मैं जो कि दिन भर किताबें पढऩे वाला एक विचित्र एकांतिक जीव था, आखिर घबराकर आत्महत्या करने का फैसला कर लिया था। लगता था, मौत सामने खड़ी है, बुला रही है। बस, ब्रह्मसरोवर में कूदूँगा और खत्म—सब खत्म! और तब मुक्तिबोध और धूमिल के साथ-साथ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताएँ थीं जिन्होंने मुझे आत्महत्या से बचाया। हालात सहते जाने की बजाय उन पर चोट करना सिखाया!

‘‘आपकी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ से कविता का एक नया संस्कार, कविता की एक नई दुनिया मेरे भीतर बनी। मैं, जो छायावादी किस्म की चीज हुआ करता था और उसी के चलते मैं साहित्य में आया था, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ से वह दुनिया टुकड़े-टुकड़े हो गई! एक तरह से अच्छा हुआ, इसलिए कि जहाँ वह रोमानी किस्म की कविता मेरी तकलीफों में मेरा साथ छोड़ गई—नाकाफी साबित हुई, वहाँ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ ने मुझे बुरे से बुरे हालात में जीने का दर्शन दिया।’’

फिर मैं उस अनुभव के बारे में बताने लगता हूँ, जिसके बारे में सोचकर अब मैं खुद चकित रह जाता हूँ, ‘‘आपकी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ किताब एक मित्र से लेकर पढ़ी थी, उस पर कीमत शायद पाँच रुपये पड़ी थी। मैं खरीदना चाहता था, तब एक दूसरा एडीशन आ गया था। उसका साइज बदल गया था और अक्षर भी शायद छोटे हो गये थे जो मुझे प्रिय नहीं थे। अकेली किताब प्रकाशक से माँगने की भी समस्या थी। लिहाजा मैंने पूरी किताब हाथ से लिखी। नहीं, पूरी नहीं, इसलिये कि मैंने और मेरी एक दोस्त ने, जो बाद में मेरी पत्नी बनी—उसे मिलकर लिखा था, भूमिका तक। पूरी किताब जस की तस हमने खुद तैयार कर ली। वह हस्तलिखित प्रति अब भी मेरे पास होगी। और यही नहीं, मुझे पूरी-पूरी कविताएँ याद थीं ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की। मैं अकेले में उन्हें दोहराया करता था और विस्थितियों के खिलाफ खड़ा होने के लिये खुद को तैयार कर रहा था। फिर ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ आया तो उसकी भी तमाम कविताएँ मुझे अच्छी लगीं, याद भी हो गईं, पर उसके साथ वह रिश्ता नहीं बना जो ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ के साथ था। या फिर जो ‘सीढिय़ों पर धूप’ में की कविताओं के साथ था…खासकर उसकी पिता वाली कविता मुझे अद्भुत लगती है।’’

सहायजी गंभीर हैं, चकित भी। जैसे जो कुछ मैं कह रहा हूँ, उसकी लेखकीय सन्‍दर्भ में व्याख्या करने की कोशिश कर रहे हों।

फिर मैं उस दौर की अपनी मन:स्थिति के बारे में बताने लगता हूँ, ‘‘मैंने आपको शायद बताया था कि मैं उन दिनों प्रेम में था जब आपसे मुलाकात हुई थी, माने आपकी कविताओं में मुलाकात हुई थी। और सहायजी, हम दोनों ने साथ-साथ पढ़ी थीं ये कविताएँ। हम रिसर्च रूम के बाहर किसी पेड़ के नीचे बैठ जाते और ये कविताएँ पढ़ते और एक-दूसरे को सुनाते या डिस्कस करते। यानी इन कविताओं को पढक़र किया गया ‘प्रेम’। जाहिर है, हम बहुत सादे, बहुत सीधे, बहुत लड़ाकू थे, आपकी सपाटबयानी की तरह।’’

3

हँसते हैं सहायजी। उन्हें हँसता देखकर मेरा हौसला थोड़ा बढ़ता है और मैं आगे बढक़र थोड़ी छूट लेने की कोशिश करता हूँ, ‘‘उन दिनों आपकी कविता पढ़ी थी एक रंग होता है नीला…’’

पर बात अधूरी ही छूट गई क्योंकि इस बीच एक और कोशिश पास से गुजर रहे एक किशोर की शुरू हो जाती है जो मुझे उनके घर-परिवार का ही कोई आत्मीय सदस्य लग रहा है, ‘‘तो यह तय रहा न अंकल? परसों…!’’

‘‘हाँ-हाँ, परसों!’’

‘‘आप भूल तो नहीं जाएँगे?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘नहीं-नहीं, आप भूल जाएँगे।’’

‘‘नहीं, मैं कोशिश करूँगा, बल्कि तय है…’’

वे उस बच्चे को जो कुछ पूछ रहा था, आश्वस्त करके मेरी ओर मुड़ते हैं, ‘‘आप…आप कुछ कह रहे थे?’’

‘‘हाँ, मैं कह रहा था कि…’’ मेरी अटपटाती लय फिर शुरू हो जाती है, ‘‘उन दिनों आपकी कविता पढ़ी थी, ‘एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरे जिस्म पर नीला होता है…’ तो बड़ा मजा आता था। उसके अर्थ खुलते थे बिलकुल अपनी तरह के। बिलकुल निजी बिम्‍बों का एक संसार मेरे भीतर बनता था। और वह दुनिया…वह दुनिया मैं आपको बताता हूँ, ‘नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग’ वाली प्रसादमय दुनिया से आगे, मीलों आगे की चीज थी।’’

बताते-बताते मैं शायद कुछ ज्यादा भावुक हो गया हूँ, ‘‘मैं कैसे बताऊँ आपको कि मेरे भीतर एक दुनिया एक और दुनिया को पछाड़ रही थी। कैसे बताऊँ कि यह कविता मैं उन दिनों पढ़ता था तो सोचता था कि यह कविता तो मैंने लिखी है, रघुवीर सहाय की कैसे हो सकती है यह कविता? क्योंकि इस कविता को जो मानी मैंने दिये हैं—मेरी प्रेमिका का जो ‘नीलापन’ और अनंत भगिमाएँ जुड़ गई हैं इसके साथ, वे उनको यानी रघुवीर सहाय को कैसे हो सकती हैं?…उनके लिये तो यह सब बिलकुल अज्ञात होगा। तो यह कविता उनकी कैसे हो सकती है?’’ कहते-कहते मुझे हँसी आ गई।

इस पर सहायजी भी खुलकर हँसते हैं तो मैं नोट करता हूँ, यह हँसी बहुत स्वादभरी, बहुत रंगभरी, बहुत अर्थभरी, बहुत अपनत्व भरी है।

इतने में श्रीमती सहाय पास से गुजरीं तो सहायजी परिचय कराते हैं, ‘‘आप…प्रकाश मनु। नई किताब आई है इनकी।’’

मैं हाथ जोडक़र नमस्कार करता हूँ।

‘‘आप कुछ लेंगे? ठंडा या गरम…?’’ सहायजी मेरी ओर देखकर पूछ रहे हैं।

‘‘चाय ले लूँगा।’’ मैं संकोच के साथ कहता हूँ।

‘‘मैं भी चाय पी लूँगा।’’ श्रीमती सहाय की ओर देखकर एक सादा घरेलू मुस्‍कान के साथ वे कहते हैं और उनके जाने के बाद मेरी और मुड़ते हैं। आँखों में गहरी चमक है, मुस्‍कराती हुई चमक, ‘‘ऐसा ही होता है। आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। हर पाठक जो कविता को पढ़ता है और सचमुच कविता के अपने संसार, कवि के अपने रचना-क्षण से जुडक़र कविता को पढ़ता है, वह उसे एक नया अर्थ देता है। ऐसा अर्थ जो बहुत बार लेखक को भी अज्ञात होता है। यहाँ कविता कवि को उलाँघ जाती है, कवि से बड़ी हो जाती है, इसलिए कि वह कवि के अनुभव-संसार से निकलकर आपके अनुभव-संसार से जुड़ गई।’’

कहने के बाद सहायजी चुपचाप कुछ सोच रहे हैं। मैं कल्पना करता हूँ, उनके भीतर भी कोई और दुनिया बन रही होगी इसी तरह। वह दुनिया जिसमें एक लेखक के अलावा पाठक के तौर पर उनका अनुभव भी शामिल रहा होगा।

पर मेरे भीतर अब भी बहुत कुछ है, जो बाहर आने के लिए बेचैन है।

‘‘इसके अलावा सहायजी, जो बात उन दिनों आपकी कविताओं को पढ़ते हुए तीव्रता से महसूस हुई, वह आपको बताता हूँ। पहली दफा…मैं नहीं जानता कि इस बात को कैसे कहूँ, पहली दफा मैंने जाना कि कविताओं में लोग भी हो सकते हैं, या आ-जा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे आपकी दुनिया में, दिल-दिमाग में…!’’

मैं जैसे अपने पाठकीय अनुभव को पूरी तरह कह डालने के लिए अकुला रहा हूँ, ‘‘मुझे अब भी याद है वह कविता—शायद ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ ही है शीर्षक उसका, जहाँ सत्ता के रोज-रोज के आतंक की काली छाया के बीच में छुटकी चली आती है अपना एक छोटा-सा सवाल लेकर कि क्या मामी को दो बार लिख सकते हैं कि आपकी याद आती है? इस एक सवाल ने कविता का अर्थ ही बदल दिया। उसमें एक अजब तरह की निजता आ गई जिसमें हमारी दुनिया का होना छिपा है। और एक और कविता में आपके बच्चे बिलकुल आपके बच्चों की तरह आते हैं और महसूस होते हैं, ‘‘छुओ इन्हें, छुओ…प्रिय पाठक, ये मेरे बच्चे हैं/कोई प्रतीक नहीं।’’

बोलते-बोलते मेरा स्वर अजीब ढंग से करुणाद्र हो आया है, ‘‘मैंने शायद हजार बार इन लाइनों को दोहराया होगा—हजार बार। मैं असल में समीक्षा-वमीक्षा की भाषा नहीं जानता। मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि ये लाइनें हैं जो मेरे भीतर से मरते दम तक नहीं जाएँगी।’’

रघुवीर सहाय इतने गम्‍भीर हैं, इतने जैसे मेरे सामने कोई व्यक्ति नहीं, कोई पहाड़ बैठा है। वे मेरी सारी गतियों को खुद में समेटकर स्थिर हैं, अचल समाधि। फिर अचानक पहाड़ के होंठ हिलते हैं और वह बोलने लगता है, ‘‘लेकिन…आपने ठीक समझा। यह कवि के रचना-क्षण के करीब जाकर उसे समझना है, लेकिन यह संवेदनशीलता—एक नई तरह की संवेदनशीलता, यूनिवर्सिटी के आचार्यों में नहीं है, ज्यादातर आलोचकों में भी नहीं है। यहाँ तक कि नामवर जी भी मेरी बहुत-सी कविताओं को नहीं समझ पाये। वे मेरे मित्र हैं, फिर भी कह रहा हूँ—और विश्‍वविद्यालयों के आचार्य तो कविता की व्याख्या करके उसकी सरासर हत्या ही करते हैं। मसलन मेरी एक कविता है जिसमें किसी पेड़ के पत्ते गिरने के जिक्र के साथ ‘पेड़ रच रहा होगा…’ पंक्ति आती है, तो इसमें पेड़ को पहले तो प्रतीक बनाना और फिर इसे रचना-प्रक्रिया के बिम्‍ब के रूप में देखना, यानी एक तरह से कविता की खींचतान करके उसे बिलकुल निरानंद कर दिया गया है। जबकि मेरे जेहन में तो पेड़ का मतलब पेड़ है। उसका रचना सचमुच पेड़ का रचना है और उसका अपना अर्थ, अपना सौंदर्य है।’’ कह लेने के बाद वह भूरा, अनगढ़ पहाड़ चुप है जिस पर घने पेड़ हैं, जंगली हवाएँ और एक अजब रूखापन। पानी जो भी हो, वह कहीं भीतर होगा जिसकी बूँदें, कभी-कभी हल्की बौछारें भी शब्दों में छलछला आती हैं।

4

चाय आ जाती है। वही बच्चा जो अपनी किसी समस्या से सहायजी को उलझाने की कोशिश कर रहा था, चाय रख गया है।

चाय का कप उठाते-उठाते मैं एक क्षण में अगले सवाल के लिए खुद को तैयार कर लेता हूँ और एक चौकन्नी पूछताछ शुरू कर देता हूँ—यह सावधानी बरतते हुए कि वे कहीं ‘हर्ट’ न हों।

‘‘सहायजी, आपकी बाद की कविताएँ—खासकर ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ के बाद जो संग्रह आये, उनके बारे में मुझे कुछ कहना है। ये कविताएँ दुखी आदमी के साथ, लड़ते हुये आदमी के साथ खड़ी नहीं हो पातीं, तो इसकी वजह क्या है?’’

‘‘आपको ऐसा लगा?’’ चाय पीते-पीते उनके माथे पर सलवटें नजर आईं। वे कुछ सोचने लगे हैं।

‘‘जी।’’ अपने संकोच से मुक्त होकर मैंने कहा, ‘‘लगता है, ये भीतरी गणित में ज्यादा उलझ गई हैं। भीतर के उलझाव, भीतर की गाँठें, अस्पष्ट प्रश्‍न और बुद्धिजीवी दिक्कतें—यही सब ज्यादा है। मुझे तो कम से कम यही लगा है, आपके पाठक के तौर पर। बीच-बीच में साफ लाइनें आती हैं जिनमें बड़ा दर्द, बड़ी समस्याएँ हैं, अनुभूति-विस्तार है, मगर यह सब कहीं-कहीं। ज्यादातर तो गोल-मोल है, एक छोटा दर्द उठाकर दूर तक उसकी चीरफाड़ है जैसा अज्ञेय के यहाँ हुआ करता था या दूसरे कलावादियों के यहाँ!’’

कहते-कहते मैं सीधा प्रश्‍न कर बैठता हूँ, ‘‘सहायजी, अच्छा, आपको ऐसा लगता नहीं कि आप कहीं उलझ गये हैं?’’

सहायजी के चेहरे पर एक सख्त-सा भाव आता है, जिसे खेल-खेल में वे जज्ब कर जाते हैं और अब वे सहज हैं, ‘‘आपकी बात शायद मैं समझ रहा हूँ। ‘आत्महत्‍या के विरुद्ध’ की जिन कविताओं की आप तारीफ कर रहे हैं, वे आपकी तरह मुझे भी पसंद हैं, बेहद पसंद हैं। पर इसका यह मतलब नहीं कि मैं उन्हें रिपीट करना शुरू कर दूँ—यानी वैसी ही एक और कविता बनाऊँ। यह कविता तो होगी नहीं, एक भौंडी चीज होगी…यानी ज्यादा से ज्यादा पहले वाली कविता की पैरोडी! तो मैं उसे बनाऊँ क्यों और आप उसे पढ़ेंगे किसलिये? मेरी बात शायद आपकी समझ में आ गई होगी।’’

‘‘निश्‍चि‍त रूप से, निश्‍चि‍त रूप से मैं समझ गया आपकी बात सहायजी। पर मैं कुछ और कहना चाहता हूँ।’’ मैं साहस बटोकर कहता हूँ, ‘‘शायद मैं अपनी बात आपको समझा नहीं सका। देखिए, ऐसा है सहायजी, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ जब आपका संग्रह आया था, तब जो लड़ाइयाँ थीं समाज के हर स्तर पर, राजनीति का भदेसपना, क्रूरताएँ, गरीबी, शोषण आदि—तो संग्रह आने के बाद वे नहीं रहीं, ऐसा तो नहीं। बल्कि कई चीजें तो और उग्र हुई हैं, पहले से ज्यादा। अब हम ये जो लड़ाइयाँ हैं—आगे की लड़ाइयाँ, इनकी छोडक़र कहीं और जा बैठें तो इसे क्या कहेंगे? एक लेखक का काम तो यह नहीं हो सकता।’’

‘‘आप इसे दूसरी तरह से देखिए’’, सहायजी बगैर तैश में आये जवाब देते हैं, ‘‘एक लेखक के अनुभवों का, चेतना और सम्‍वेदना का लगातार विस्तार होता है—अगर वह सच में लेखक है, और यह जो विकास है किसी न किसी तरह से उसकी रचनाओं में भी आता है। क्या आपको यह विकास मेरी काव्य-यात्रा में दिखाई नहीं पड़ता?’’

चाय खत्म हो चुकी है—क्या अब मुझे उठना चाहिए? पर मैं अभी थोड़ा और बहसने के मूड में हूँ। इसलिए कुछ ज्यादा साफगोई से काम लेते हुए कहता हूँ, ‘‘मैं नहीं जानता कि इसे ठीक-ठीक विकास कहेंगे या कुछ और? मैं…सिर्फ एक बात आपके पाठक के तौर पर जो आपको बेहद-बेहद प्यार करता है, जानता हूँ—कि वे रघुवीर सहाय तो कहीं खो-से गये हैं जिन्हें मैंने आज के पूरे शोषण-तंत्र के खिलाफ, दोनों हाथों से और पूरे हौसले से लड़ते हुये देखा था। मैं नहीं जानता सहायजी कि और लोगों ने आपको इस बारे में कुछ कहा या नहीं—क्योंकि हिन्‍दी में साफ बात कहने का रिवाज नहीं है, निरी गिरोहबंदियाँ, तुमुलनाद और मुँहदेखी ही ज्यादा है। लोग शायद सच कहना नहीं चाहते। जो महसूस करते हैं, बार-बार महसूस करते हैं, वह तक नहीं कहते। तो एक पाठक की राय, एक बहुत साधारण पाठक की राय भी कहीं दर्ज कर ले आप।’’

मैंने इतनी देर में पहली बार उन्हें इस कदर खुश पाया है। इस पर फिर वही खिली हुई मुसकराहट, ‘‘ठीक है, मैंने दर्ज कर ली, लेकिन आप भी कहीं दर्ज करें मेरी बात!’’

‘‘क्या…?’’ मुझे इस खेल में मजा आ रहा है।

‘‘वह यह कि मैं चुका नहीं हूँ—और मैं चुकूँगा भी नहीं क्योंकि कवि का जीवन जीना मैंने बन्‍द नहीं किया। दूसरे शब्दों में, मैं चूँकि कवि का जीवन जी रहा हूँ, तो जो लिखूँगा, वह कविता होगी।’’

‘‘कवि का जीवन…?’’ मैं जोर देता हूँ। दरअसल मैं अकुला रहा हूँ—ऐसा क्या है जो उनके होंठों पर आते-जाते भीतर गुम हुआ जा रहा है। मेरे भीतर छोटी-छोटी घंटियाँ टुनटुना रही हैं। क्या पता था कि बरसों बाद भी यह प्रभाव जस का तस मेरे भीतर बना रहेगा और उनकी गूँजें मुझे बार-बार इसी चटियल पहाड़ की ओर खींच ले जाएँगी।

‘‘मैं फिर कभी इसके बारे में आप से चर्चा करूँगा, अगली मुलाकात के लिये इसे रखिए।’’ रघुवीर सहायजी यहीं ‘खेल’ खत्म करना चाहते हैं। एक प्यारी-सी कोशिश। जैसे बचपन में हम किसी को खासा पिदाने के बाद गिल्ली-डंडा लेकर निकल भागते थे!

‘‘नहीं, मैं इतनी आसानी से टल नहीं सकता। अब तो…आपने इतनी उत्सुकता पैदा कर दी।’’ मैं कल्पना में एक छोटा, जिद्दी बच्चा बन गया हूँ और सहायजी के कंधों पर लटक गया हूँ कि चिज्जी दें तो मानूँगा!

अब वे ‘चिज्जी’ लेकर आगे-आगे भाग रहे हैं, मैं पीछे-पीछे। वे आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे! यह खेल मेरी कल्पना में देर तक चलता है और मुझे सुख और रोमांच से भर जाता है।

आखिर वे मान जाते हैं। राज खुलने की तैयारी। मैं साँस रोककर उनके शब्दों को पीने के लिए व्यग्र हूँ।

‘‘देखो भाई मनु,’’ कहने के बाद एक क्षण, सिर्फ एक क्षण के लिये वे अपने भीतर एक डुबकी लेते हैं और बाहर आते हैं। उनके स्वर में जो गम्‍भीरता है, वह भाषा को रस्सी की तरह बँट रही हैं, ‘‘असल में…होता यह है कि लिखते-लिखते एक सीमा के बाद लेखक में चालाकियाँ आ जाती हैं। लेखन के गुर…और आप कह सकते हैं, ढंग वह सीख जाता है। उसे चीजों को शक्ल देकर कविता या कविता जैसा बनाना आ जाता है, तो यह अहंकार भी साथ-साथ उसके भीतर आता है कि अब मुझे जीवन में कदम-कदम पर इतना जूझने, तकलीफें सहने, विद्रोह और छटपटाहट की जरूरत क्या है? कविता तो मैं विद्रोह की इसके बगैर भी लिख ही सकता हूँ—केवल अभ्यास से, कोरे अभ्यास से! तो जहाँ विस्थितियों के खिलाफ खड़े होने की, सख्त प्रतिक्रिया की जरूरत होगी, वहाँ वह चुप रहेगा। जहाँ व्यक्तिगत जीवन में ईमानदारी की बात होगी, वहाँ से वह खिसकेगा और अपने तर्क गढ़ लेगा, सुविधापूर्ण जीवन जीने के। यानी कुल मिलाकर अन्याय के खिलाफ उसकी लड़ाई कविता में तो होगी, जीवन में नहीं। जीवन में तो यही नजरिया उसका बनेगा कि आखिर क्या फर्क पड़ता है अगर अन्याय के खिलाफ लडऩे वालों में मैं शामिल न हुआ तो? और तो बहुत-से हैं ही…!’’

सहायजी रुककर मुझ पर दृष्टि गड़ा देते हैं, ‘‘आप समझ रहे हैं न!’’

‘‘हाँ।’’ मैं धीरे से फुसफुसाता हूँ। मैं जैसे जादू के प्रभाव में हूँ। शब्दों का जादू!

‘‘तो यह होता है! इस तरह धीरे-धीरे आप सिमटते जाते हैं कविता में ओर जीवन से कटते जाते हैं। आप सोचते हैं कि आप सिर्फ उस समय सम्‍वेदनशील रहें जब कविता लिख रहे हों, बाकी समय ठुल और ठस और दुनियादार रहें बाकी लोगों की तरह तो बुरा क्या है? इसे कवि के जीवन का चुकना कह सकते हैं। और अगर आप उम्र भर अपने जीन की छोटी-बड़ी घटनाओं में भी वही सम्‍वेदनशीलता दिखाएँगे जो आपकी कविताओं में है, वैसी ही प्रतिक्रियाएँ आपकी होंगी जैसी आपकी कविताओं में हैं और उसी जिम्मेदारी और जुझारूपन से आप जीवन जिएँगे, तो यह मेरा मानना है कि कवि का जीवन है। किसी के कवि होने का मतलब असल में यह कवि का जीवन जीना ही है।’’ कहने के साथ-साथ वह हौले से थाप लगा देते हैं, ‘‘मैं समझता हूँ, मैंने अभी कवि का जीवन जीना बंद नहीं किया, इसलिये मैं इतनी आसानी से मरूँगा नहीं।’’

अब वे मेरी ओर देखते हैं—एक ऐसे गुरु की भाँति जिसने अपनी सबसे बड़ी और ‘गोपन’ सिद्धि अपने शिष्य को दे दी हो। मैं आश्‍वस्त हूँ और मुस्‍करा रहा हूँ। मेरी मुस्‍कराहट ने शायद उन्हें भी आश्‍वस्त किया होगा। उनके चेहरे पर अब हल्कापन है और मुझे यह अच्छा लगता है।

उनकी कविताओं के प्रूफ पास ही मेज पर पड़े हैं। कई बार मेरी आँखें वहाँ से टकराकर लौट आई हैं।

‘‘आपके शायद नए कविता-संग्रह की तैयारी…?’’

‘‘हाँ।’’ वे प्रूफ उठाकर पढऩे लगते हैं। होंठ फिर उसी तरह हिल रहे हैं, जैसे किसी बड़े कवि के हिलते हैं जिसकी कविताएँ अपने समय का सच होती हैं।

‘‘मेरी इच्छा है सहायजी, आप कुछ कविताएँ मुझे सुनाएँ। मेरा यह सौभाग्य होगा।’’ अब मैं सहायजी से नहीं, अपने बड़े भाई से कह रहा हूँ।

”अच्छा, लेकिन एक सुनाऊँगा सिर्फ एक।’’ जिद क्या सहायजी नहीं कर सकते?

‘‘अच्छा, ठीक!’’

और वे सुनाना शुरू कर देते हैं।

मैं कविता सुन रहा हूँ, मगर शब्दों से अधिक उनका सुनाने का ढंग, उनकी आवाज, उनका चेहरा, उनकी चमकती हुई आँखें मेरे भीतर खुबती चली जाती हैं।

वे सुना रहे हैं और कसकर मुझे देख रहे हैं, मेरे चेहरे के छोटे से छोटे एक्सप्रेशन को जैसे जज्ब कर लेना चाहते हों। मैं बोल नहीं रहा, तो जैसे मेरे होंठों की अस्फुट ध्वनियों के अलावा मेरे चेहरे पर आता यही खिंचाव उन्हें मेरी प्रतिक्रिया समझने में मदद दे रहा है।

मेरा कविता में इस कदर डूबा होना शायद उन्हें अच्छा लगा हो, इसलिए वे एक और कविता सुनाते हैं। फिर एक और…!

मुझे भीष्म की प्रतिज्ञा का टूटना अच्छा लग रहा है। उन्होंने तो सिर्फ एक कविता सुनाने के लिए कहा था न! फिर मैं उनसे सीढिय़ों पर धूप में की ‘शक्ति दो, बल दो, हे पिता/…पैरों में कुली की-सी चाल छटपटाय…’ कविता पढऩे का आग्रह करता हूँ, ‘‘यह मुझे बहुत प्रिय है।’’

सहायजी एक स्निग्ध दृष्टि मुझ पर डालते हैं। जैसे कह रहे हों, ‘यह तो मुझे भी इतनी ही प्रिय है!’ और पास ही रैक में रखा संग्रह उठाकर पढऩा शुरू कर देते हैं। एक सादी, लेकिन गहरी आत्मीयता से लिपटी लय।

कविता पूरी होते ही मैं किसी कृपण की तरह जो कुछ मिला, उसे झोली में समेटकर उठ खड़ा होता हूँ, ‘‘अब चलूँगा।’’

यह क्षण मेरे जीवन के सबसे समृद्ध, भरे-पूरे क्षणों में से एक है। मैं आँधियों में हरहराते पेड़ जैसा था और आँधियाँ गुजर जाने के बाद पेड़ पर जो खरोंचें छूट जाती हैं, जो सहनशक्ति और भराव आता है, उसे कैसे कहूँ? और वे, ‘‘आप कैसे जाएँगे?’’ पूछने के बाद खुद-ब-खुद बताना शुरू कर देते हैं कि मैं कैसे बस टर्मिनल तक पहुँच सकता हूँ और वहाँ से किस-किस नम्‍बर की बस मिल जाएगी।

मैं हाथ जोडक़र वापस मुड़ता हूँ और सीढिय़ाँ उतरने लगता हूँ।

5

ताज्जुब है, पिछले दिनों ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की हाथ से लिखी प्रति उठाकर पलट रहा था तो अचानक लगा, इसमें गुजरे हुए दिनों के दुख-पीड़ाओं और स्मृतियों की गंध के साथ-साथ एक और गंध आकर शामिल हो गई है—उस मुलाकात की गंध! और इस दुनिया के भीतर एक छोटी, मगर जीवंत दुनिया जो मैंने बना रखी थी, जहाँ सोते-जागते, चलते-फिरते कविता की पंक्तियाँ मेरा पीछा करती थीं, उस दुनिया के तमाम-तमाम अनकहे बिम्‍बों में एक बिम्‍ब आकर और जुड़ गया है। एक भूरे-सँवलाए, चटियल पहाड़ वाला बिम्‍ब, जिसमें बाहरी रूखेपन के भीतर बहुत कुछ लहर-लहर बह रहा है। और वहाँ पेड़ बहुत हैं, रंग और हरियाली भी। और उसके साथ ही वह पूरी मुलाकात याद आ जाती है, वह रोमांच…वही कशिश!

अचानक मेरे होंठों पर रघुवीर सहाय की कविता की लाइनें चली आती हैं। वह कविता जो एक समय था, मेरे खून में रच-बस गई थी और अब भी वह कहीं न कहीं खून की लय में ताल देती है—

एक रंग होता है नीला
और एक वह जो तेरे जिस्म पर नीला होता है
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है
और कोई एक रंग जो उस पर पड़ा हुआ है

कंधों पर पड़े इस रंग की याद में खोया नहीं कि अनचाहा दृश्य एकाएक पलटता है और सहायजी अपनी ‘सपाटबयानी’ के मायने बताते नजर आते हैं। कुछ ऐसे कि सपाटबयानी के भीतर की अकुलाहट उसे चीरती हुई बाहर आ जाती है और कविता ‘हाथ की छटपटाहट’ बन जाती है—

न सही यह कविता

न सही यह कविता
यह मेरे हाथ की छटपटाहट सही
यह कि मैं घोर उजाले में खोजता हूँ
आग
जबकि हर अभिव्यक्ति
व्यक्ति नहीं
अभिव्यक्ति
जली हुई लकड़ी है न कोयला न राख।

लग रहा था, रघुवीर सहाय के दो विरोधी—नहीं, विरोधी लगते मूड्स हैं ये, और रघुवीर सहाय इनके बीच कहीं हैं।

नहीं-नहीं, रघुवीर सहाय को पाना इतना आसान नहीं। इसलिए कि हर बार वे आपकी बनाई हुई हदों को फलाँग जाते हैं, किसी भी बड़े कवि की तरह। किसी भी भाषा में हर दौर में ऐसे कुछ ही कवि होते हैं जो एक मूर्ति बनाते, एक ढहाते हैं। और जो सिर्फ ‘ढहाते’ हैं या जो सिर्फ बनाए चले जाने का भ्रम पाले बैठे हैं, उनका तो कहना ही क्या!

6

इस मुलाकात के बाद की भी तमाम स्मृतियाँ हैं। ‘कविता और कविता के बीच’ पर हुई उस गोष्ठी की भी, जिसमें रघुवीर सहाय इस कविता-संग्रह से शुरू करके आज की कविता की मुश्किलों और एक ईमानदार कवि के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में खुलकर और पूरे तरन्नुम में बोले थे। साहित्य अकादेमी में हुई कवि-गोष्ठी की भी याद है जिसमें सहायजी के अलावा गिरिजाकुमार माथुर, विष्णु खरे, कन्हैयालाल नंदन, गोपीचंद नारंग, अमृता प्रीतम वगैरह शामिल थे और जिस पर एक अप्रत्याशित रूप से कठोर टिप्पणी उन्होंने जनसत्ता के ‘अर्थात’ कॉलम में लिखी थी, ‘कृपया चुप रहिए।’ अंतिम याद उनकी मृत्यु से सिर्फ चार-पाँच दिन पहले की है। मैंने ‘अर्थात’ की उनकी एक टिप्पणी, जो प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’ के बारे में थी—के बारे में पूछा था। और उन्होंने ‘जनसत्ता’ में सुरेश शर्मा से मिलने के लिये कहा था, ‘‘वह जरूर आपकी मदद कर देंगे। पर वे ‘जनसत्ता’ छोडक़र कहीं और जॉइन करने वाले हैं। आप जल्दी कीजिए, जल्दी!’’

उनकी आवाज में एक आसामान्य किस्म का उतावलापन था, जो पहले जब भी मिला या सुना, कतई नजर नहीं आया था। और उसके चार या पाँच रोज बाद ही, उनके निधन का समाचार आया तो उस ‘जल्दी कीजिए, जल्दी…!’ का एक बिलकुल ही दूसरा अर्थ समझ में आया। उस समय जब उनका स्वर सुनकर चौंका था, तब नहीं दिखा था कि वे जल्दी, बहुत जल्दी सब कुछ पीछे छोडक़र चले जाने वाले हैं।

रघुवीर सहाय हमारे युग के उन थोड़े-से लेखकों में से थे जिन्होंने सत्ता के आगे ‘हें-हें’ करने वाले लेखकों से अलग लेखक की इमेज बनाने की चिन्‍ता में जीवन-भर संघर्ष किया। सत्ताप्रिय ‘गद्गदायमान’ लेखकों की भीड़ में वह ‘एक भयानक बात कहकर बैठ जाने वाले’ लेखक थे। शायद इसीलिए उन्होंने प्यार नहीं, नफरत को भी एक रचनात्मक अर्थ दिया, ‘‘एक मेरी मुश्किल है जनता जिससे मुझे नफरत है, सच्ची और निस्संग!’’ हालाँकि यह नफरत ऐसी है जिस पर सौ प्यार न्योछावर हैं।

उन्होंने इसी दुनिया के बीच लेखक की एक दुनिया बनाने की चिन्‍ता की और शायद इसीलिए, वे उन लोगों में से थे जिनके बारे में बिना शक कहा जा सकता है कि उनका जीना-मरना, बोलना, चलना, फिरना कुछ भी साहित्य से अलग नहीं था। और आखिर में, जैसी कि उनकी प्रतिज्ञा थी, वह मरे भी इसी दुनिया में, इसी दुनिया के लिये! और मुझे याद आते हैं उनके शब्द—

‘‘…सबसे मुश्किल और एक ही सही रास्ता है कि मैं सब सेनाओं में लड़ूँ—किसी में ढाल सहित, किसी में निष्कवच होकर—मगर अपने को अन्‍त में मरने सिर्फ अपने मोर्चे पर दूँ—अपनी भाषा के, शिल्प के और उस दोतरफा जिम्मेदारी के मोर्चे पर जिसे साहित्य कहते हैं।…भाइयो, अगर हम अपनी दुनिया में जूझते-जूझते जिन्‍दा नहीं रह सकते तो कम से कम इतना करें, जब मरना पड़े तो उसी में मरने की कोशिश करें।’’

आज भी जब कभी किसी नैतिक संकट या सृजन की मुश्किल में पड़ता हूँ, अपने ‘सेनानायक’ के ये शब्द अँधेरे को चीरती रोशनी की शहतीर की तरह याद आते हैं। बहुत…बहुत याद आते हैं।

(हाल ही में प्रकाशित संस्मरणों की पुस्तक ‘यादों का कारवाँ’ से साभार। प्रकाशक: शान्‍ति‍ पुस्‍तक मन्‍दि‍र, 71 ब्‍लॉक-के, लाल क्‍वार्टर, कृष्‍णा नगर, दि‍ल्‍ली-91)

नये साल पर प्रकाश मनु के दो गीत

 

नये साल के अवसर पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रकाश मनु के दो गीत-

नये साल क्या-क्या लाओगे?

नये साल क्या-क्या लाओगे?
प्यारा-प्यारा नया कलेंडर
ताजा दिन, ताजी-सी शाम,
चिडिय़ाघर की सैर, और फिर
हल्ला-गुल्ला मार तमाम।
हलुआ, पूड़ी, बरफी, चमचम
से मुँह मीठा करवाओगे?

मीठी-मीठी एक बाँसुरी
नयी कहानी, नयी किताब,
मीठी-मीठी अपने शामें
हँसता जैसे सुर्ख गुलाब।
खुशबू का एक झोंका बनकर
सबके मन को बहलाओगे?

या बुखार पढऩे का सब दिन
कागज-पतर रँगवाओगे,
टीचर जी की डाँट-डपट
मम्मी की झिडक़ी बन जाओगे।
खेलकूद के, शैतानी के
सारे करतब भुलवाओगे?

झगड़ा-टंटा रस्ता चलते
जाने कैसे-कैसे झंझट,
बिना बात की ऐंचातानी
बिना बात की सबसे खटपट।
गया साल सच, बहुत बुरा था,
उसकी चोटें सहलाओगे?

नया कलेंडर

पापा, नए साल पर लाना,
बढिय़ा सा
एक नया कलेंडर!

बैठक में जो टँगा हुआ है
हुआ कलेंडर बहुत पुराना,
उस पर मैंने कभी लिखा था
कालू-भालू वाला गाना।
मम्मी ने भी लिखा उसी पर
शायद राशन का हिसाब है,
इसीलिए बिगड़ा-बिगड़ा सा
जैसे डब्बू की किताब है!

नया कलेंडर लाना जिस पर
फूल बने हो
सुंदर-सुंदर!

फूलों पर उड़ती हो तितली
उसे पकडऩे डब्बू भागा,
आसमान में नया उजाला
सूरज भी हो जागा-जागा।
ऐसा नया कलेंडर जिसमें
गाना गाये मुनमुन दीदी,
सुनकर के पेड़ों पर बैठी,
चिडिय़ा चहके चीं-चीं, चीं-चीं!

नई सुबह आएगी पापा
उस नन्ही
चिडिय़ा-सी फुर-फुर!

चित्रांकन  : प्रगति त्‍यागी

हिंदी बाल साहित्य की 20 सर्वश्रेष्ठ किताबें : प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

हिंदी में भी बहुत महत्‍वपूर्ण बाल साहित्‍य लिखा गया है। इस खजाने से बीस मोतियों को चुना है प्रसिद्ध लेखक प्रकाश मनु ने-

1

किताब : कुत्ते की कहानी (उपन्यास)
लेखक : प्रेमचंद
प्रकाशक : संदर्भ प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 70 रुपये

हिंदी बाल उपन्यास का यह बड़ा सौभाग्य है कि उसकी नींव रखने का श्रेय उपन्यास सम्राट प्रेमचंद को जाता है। प्रेमचंद की रचना ‘कुत्ते की कहानी’ हिंदी का पहला बाल उपन्यास है। ‘कुत्ते की कहानी’ की भूमिका में प्रेमचंद ने बाल पाठकों को संबोधित करते हुए लिखा है, ‘तुम देखोगे कि यह कुत्ता बाहर से कुत्ता होकर भी भीतर से तुम्हारे ही जैसा बालक है, जिसमें वही प्रेम और सेवा तथा साहस और सच्चाई है, जो तुम्हें इतनी प्रिय है।’ गली में भटकने वाले इस मामूली कुत्ते कल्लू की हिम्मत और बहादुरी की वजह से एक अंग्रेज साहब का ध्यान उस पर गया और देखते ही देखते वह उनका प्यारा और दुलारा दोस्त बन जाता है, जो संकट के समय उनकी जान बचाता है। कई बड़े और हैरतअंगेज कारनामों के बाद, अब उसे साहबों की तरह टेबल पर खाना मिलता है। नौकर-चाकर हमेशा सेवा करने और टहलाने के लिए मौजूद हैं। पर कल्लू सुखी नहीं है। वह महसूस करता है कि अब उसके पास सारे सुख हैं, लेकिन गले में गुलामी का पट्टा बंधा हुआ है और गुलामी से बड़ा कोई दु:ख नहीं है। यह एक दस्तावेजी उपन्यास है जिसमें प्रेमचंद की कलम का जादू मोह लेता है।

2

किताब : बजरंगी-नौरंगी (उपन्यास)
लेखक : अमृतलाल नागर
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 15 रुपये

हिंदी के दिग्गज उपन्यासकार अमृतलाल नागर का ‘बजरंगी-नौरंगी’ एक लाजवाब और जिंदादिली से भरपूर उपन्यास है, जिसमें नागरजी की किस्सागोई का जाना-पहचाना अंदाज अपने पूरे रंग में नजर आता है। असल में बजरंगी और नौरंगी के रूप में उन्होंने जिन पात्रों को लिया है, वे हैं भी बड़े गजब के। बजरंगी और नौरंगी दोनों भाई हैं और दोनों में ऐसी-ऐसी खासियतें हैं कि अपनी-अपनी जगह दोनों ही बेजोड़ हैं। इनमें बजरंगी तो बड़े लहीम-शहीम और ऐसे आदमकद किस्म के पहलवान हैं कि चारों ओर उनके नाम की दुंदुभी बजती है। उपन्यास में बजरंगी पहलवान मायावी किले वाले जादूगर को पछाडऩे निकलते हैं, जिसने सबको आफत में डाल रखा है। वह मायावी राजा इतनी रहस्यमय शक्तियों से पूर्ण है कि उससे लड़ते-लड़ते बजरंगी पहलवान भी विचित्र मुसीबतों में फंस गए तो आखिर उन्हें छोटे भाई नौरंगी को याद करना पड़ा। फिर दोनों प्यारे भाई बजरंगी और नौरंगी मिलकर उस रहस्यमय राजा की रहस्यमयी शक्तियों की काट करते हुए किस तरह उसे पछाड़ते हैं और उस किले में गुलामों की-सी जिंदगी जी रहे लोगों को मुक्ति दिलाते हैं, यह उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है। उपन्यास इतनी जानदार भाषा-शैली में लिखा गया है तथा बजरंगी और नौरंगी के चरित्र इतने गजब के हैं कि हिंदी के बाल उपन्यासों में ‘बजरंगी-नौरंगी’ की धज कुछ अलग ही नजर आती है।

3

किताब : पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल (कहानी)
लेखक : विष्णु प्रभाकर
प्रकाशक : प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली
मूल्य : 42 रुपये

‘पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल’ में हिंदी के दिग्गज साहित्य विष्णु प्रभाकर की बच्चों के लिए लिखी गई बारह चुस्त-चपल कहानियाँ शामिल हैं। इनमें ‘पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल’ और ‘दक्खन गए गजनंदनलाल’ एकदम निराली हैं। इन्हें पढ़ते हुए कभी हँसी की फुरफुरी छूट निकलती है तो कभी भीतर कोई गहरा एहसास बस जाता है, जो हमें जिंदादिली से जीने की ताकत देता है। इन कहानियों का नायक गजनंदनलाल है ही ऐसा, जो शरीर से भारी-भरकम होते हुए भी तेज बुद्धि का और बड़ा हरफनमौला है। यों संग्रह की हर कहानी में कुछ ऐसा है जिसमें एक बड़े कथाकार की मंजी हुई लेखनी का स्पर्श मन को मुग्ध करता है।

4

किताब : गीत भारती (कविता)
लेखक : सोहनलाल द्विवेदी
प्रकाशक : प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली
मूल्य : 20 रुपये

सोहनलाल द्विवेदी हिंदी बाल कविता के भगीरथों में से हैं जिन्होंने बाल कविता को हर बच्चे की जुबान तक पहुँचाया। ‘गीत भारती’ में द्विवेदी जी की चुनी हुई बीस सुंदर और अनूठी बाल कवितायें हैं जिनमें बड़ी विविधता और रस है। खासकर ‘अगर कहीं मैं पैसा होता’, ‘सपने में’, ‘नीम का पेड़’, ‘घर की याद’ ऐसी कविताएँ हैं जिनमें बहुत थोड़े शब्दों में जीवन की गहरी बातें उड़ेल दी गई हैं। इसीलिए ये ऐसी निराली और बेमिसाल कविताएँ हैं जिनसे बचपन में दोस्ती हो जाए तो ये जीवन भर साथ चलती हैं, कभी गुदगुदाती तो कभी राह दिखाती हैं।

5

किताब : आटे-बाटे सैर सपाटे (कविता)
लेखक : कन्हैयालाल मत्त
प्रकाशक : सुयोग्य प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 125 रुपये

कन्हैयालाल मत्त की निराले अंदाज की बाल कविताओं की लंबे अरसे तक धूम रही है, जिनमें अजब सी मस्ती और फक्कड़ता है। बच्चे आज भी उनकी कविताओं के दीवाने हैं। ‘आटे-बाटे सैर-सपाटे’ मत्त जी की बाल कविताओं का प्रतिनिधि संकलन हैं, जिसमें उनकी 51 चुनिंदा कवितायें हैं। इनमें ‘चल भई काके’, ‘जाड़े का गीत’, ‘चिडिय़ा रानी किधर चली’, ‘आटे-बाटे सैर सपाटे’, ‘चांद का सफर’, ‘पर्वत और गिलहरी’ तथा ‘तोतली बुढिय़ा’ जैसी मजेदार कवितायें हैं जिनमें गजब की लयात्मकता के साथ-साथ बात कहने का अलमस्त अंदाज और हास्य-विनोद की फुहारें बच्चों को खूब रिझाती हैं।

6

किताब : बतूता का जूता (कविता)
लेखक : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 20 रुपये

‘बतूता का जूता’ हिंदी के मूर्धन्य कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की बच्चों के लिए लिखी गई ऐसी कविताओं का संग्रह है जिन्होंने बाल कविता को नया मोड़ दिया। इस छोटी-सी पुस्तक में सर्वेश्वर की अठारह बाल कवितायें हैं, जो अपने समय में खूब चर्चित हुई थीं और आज भी उनका वही जादू बरकरार है। इनमें कई कवितायें तो ऐसी हैं जिन्हें गर्व से विश्व की किसी भी समर्थ भाषा की अच्छी से अच्छी बाल कविता के समकक्ष रखा जा सकता है। ‘इब्नबतूता पहन के जूता/निकल पड़े तूफान में,/थोड़ी हवा नाक में घुस गई/घुस गई थोड़ी नाक में…!’ जैसी पंक्तियों में जादुई लयकारी ऐसी है कि खुद ब खुद हमारा मन उनके साथ थिरकने लगता है।

7

किताब : तीनों बंदर महाधुरंधर (कविता)
लेखक : डॉ. शेरजंग गर्ग
प्रकाशक : आत्माराम एंड संस, दिल्ली
मूल्य : 75 रुपये

‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ बच्चों के लिए लिखी गई डॉ. शेरजंग गर्ग की चुनिंदा इक्यावन कविताओं का संग्रह है। इस अनूठे संग्रह में डॉ. गर्ग की सबसे सुंदर और चर्चित कवितायें एक जगह आ गई हैं। ऐसी कवितायें जो अपनी चुस्ती और निराले जादू के कारण भारत के लगभग हर भाग में पहुँची है और हर बच्चे ने जिन्हें पसंद किया। ये ऐसी कवितायें हैं जिन्हें पढ़कर एक समूची पीढ़ी अब युवा हो गई है, पर इन कविताओं का जादू अब भी उतरा नहीं है। एक ओर इस पुस्तक में भोलेपन की मस्ती से भरे सुंदर और छबीले शिशुगीत शामिल हैं, तो दूसरी ओर ‘तीनों बंदर महा धुरंधर’ और ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’  जैसी कवितायें, जिनमें खेल-खेल में बड़ी बातें सिखाई गई हैं। खूबसूरत ढंग से छपा यह ऐसा संग्रह है जिसे पढऩे का सुख किसी दुर्लभ उपहार को पा लेने जैसा है।

8

किताब : मेरे प्रिय शिशुगीत (कविता)
लेखक : डॉ. श्रीप्रसाद
प्रकाशन : हिमाचल बुक सेंटर, दिल्ली
मूल्य : 250 रुपये

हिंदी में बढिय़ा शिशुगीत लिखने वालों में डॉ. श्रीप्रसाद शीर्ष पर हैं। अपने चुस्त नटखट शिशुगीतों के लिए चर्चित रहे डॉ. श्रीप्रसाद के चुने हुए सुंदर शिशुगीतों का संकलन ‘मेरे प्रिय शिशुगीत’ एक सुखद विस्मय की तरह हैं। ‘मेरे प्रिय शिशुगीत’ में डॉ. श्रीप्रसाद के रंग-रंग के ढेरों शिशुगीत हैं। इनमें ‘भूखा मुझे उठाया है’, ‘दही-बड़ा’, ‘बड़ी बुआ’, ‘लड्डमल पेड़ा सरदार’ जैसे तमाम बढिय़ा खिलदंड़े शिशुगीत भी हैं, जिनके जिक्र के बगैर हिंदी शिशुगीत की चर्चा हो ही नहीं सकती। पुस्तक में ज्यादातर ऐसे शिशुगीत हैं जिनके साथ बच्चे खिलखिलाते हैं और कुछ सीखते भी हैं। बेहद खूबसूरत और सुरुचिपूर्ण ढंग से छपी यह किताब एक मानक की तरह हैं।

9

किताब : सूरज का रथ (कविता)
लेखक : बालस्वरूप राही
प्रकाशक : मेधा बुक्स, दिल्ली
मूल्य : 25 रुपये

एक दौर था जब बालस्वरूप राही की कविताएँ हर बच्चे के होंठों पर नाचती थीं। आज भी उनका वही जादू बरकरार है। यहाँ तक कि बड़े भी उनके रस से भीगते और रीझते हैं। ‘सूरज का रथ’ में राही जी की लीक से अलग हटकर लिखी गई इक्कीस बाल कविताएं हैं जिनमें नई सूझ, नए रंग और कुछ नया ही जादू है। खासकर ‘सूरज का रथ’ इस पुस्तक की ऐसी बेजोड़ कविता है जो सही मायने में अजब, गजब और यादगार है। यों ‘रंग जमाया टीवी ने’, ‘चूहे को निमंत्रण’, ‘लाल किला’, ‘चलती है लू’ समेत संग्रह की हर कविता ऐसी है जिसे पढ़कर बच्चे झूम उठते हैं।

10

किताब : कमलेश्वर के बाल नाटक (नाटक)
लेखक : कमलेश्वर
प्रकाशक : प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये

कमलेश्वर के बाल नाटकों का अपना अलग रंग है, जो बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी लुभाता है। ‘पैसों का पेड़’ में उनके समूचे बाल नाटक एक साथ पढऩे को मिल जाते हैं। कमलेश्वर के ये नाटक खेल-खेल में बड़ी बात कहते हैं और बच्चों को सही मायने में समझदार बनाते हैं। ‘पिटारा’, ‘जेबखर्च’, ‘झूठी दीवारें’, ‘डॉक्टर की बीमारी’ नाटक एकदम नए ढंग के हैं और कथ्य, भाषा और अंदाज में बहुत कुछ पुराना तोड़ और छोड़कर बाल नाटकों की एक नई राह बनाने की कोशिश के साथ लिखे गए हैं। खासकर ‘पिटारा’ नाटक इसलिए आकर्षित करता है, क्योंकि ऊपर से हलके-फुलके लगते इस नाटक में बहुत कुछ गंभीर भर दिया गया है। ‘झूठी दीवारें’ में देश की सांस्कृतिक विविधता की मनोरंजक तस्वीर है। हालाँकि पुस्तक का सबसे प्रभावशाली और लाजवाब नाटक है ‘पैसों का पेड़’ जो एक साथ मनोरंजक और प्रेरक भी है। हिंदी में बच्चों के लिए लिखे गए इतने सहज, सफल नाटक कम ही हैं।

11

किताब : गणित देश और अन्य नाटक (नाटक)
लेखक : रेखा जैन
प्रकाशक : रत्नसागर, दिल्ली
मूल्य : 29.90 रुपये

रेखा जैन की गिनती हिंदी के उन सिरमौर नाट्यकर्मियों में की जाती है जिन्होंने बच्चों के साथ खेल-खेल में नाटक लिखे और उन्हें उतने ही अनौपचारिक लेकिन अनूठे अंदाज में पेश किया। उनका पूरा जीवन बाल नाटकों के लिए समर्पित रहा। ‘गणित देश और अन्य नाटक’ में रेखा जी के अलग-अलग रंग और शेड्स के छह बहुचर्चित नाटक है, जिनमें ‘गणित देश’ का तो जवाब ही नहीं। ज्यादातर बच्चे गणित से डरते हैं। पर गणित से डरने वाले उन बच्चों के लिए ऐसा खिलंदड़ा नाटक भी बुना जा सकता है, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। इसी तरह ‘माल्यांग की कूची’ में कल्पना और मानवीय करुणा का अनोखा मेल है। ‘स्वाधीनता संग्राम’ में आजादी की लड़ाई की पूरी कहानी एक छोटे से मर्मस्पर्शी नाटक में समेट दी गई है तो ‘रामायण प्रसंग’ में रामकथा को एक सुंदर और रसपूर्ण नाटक की शक्ल में ढाला गया है। रेखा जी के नाटकों का यह ऐसा संग्रह है बच्चे जिसे खोज-खोजकर पढऩा और मंचित करना चाहेंगे।

12

किताब : दूसरे ग्रहों के गुप्तचर (उपन्यास)
लेखक : हरिकृष्ण देवसरे
प्रकाशक : शकुन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 30 रुपये

‘दूसरे ग्रहों के गुप्तचर’ हरिकृष्ण देवसरे का कमाल का जासूसी बाल उपन्यास है, जिसमें वैज्ञानिक फंतासी बहुत करीने से बुनी गई है। उपन्यास का कथा-विन्यास और दृश्य गजब के हैं जो खासी रहस्यात्मकता की सृष्टि करते हैं। उपन्यास की कथा कुल मिलाकर यह है कि किसी दूसरे ग्रह के लोग, जो विज्ञान में यहाँ से काफी ज्यादा उन्नत हैं, जासूसी करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। वे यहाँ एक भव्य होटल स्थापित करते हैं, जो लोगों के लिए किसी आश्चर्यलोक से कम नहीं है। पूरे होटल में आर्डर लेने, खाने-पीने की चीजें लाने, सफाई करने या फिर पैसे लेने के लिए कोई आदमी नहीं है। सारे काम रोबोटों के जरिये होता है। उपन्यास में दो किशोर दोस्त राकेश और राजेश इसका रहस्य जानने के लिए निकलते हैं, तो एक के बाद एक कौतुकपूर्ण घटनायें घटने लगती हैं। देवसरे जी के इस उपन्यास में वैज्ञानिक फंतासी का इतना कमाल का इस्तेमाल हुआ है कि इसे साँस रोककर पढऩा पड़ता है।

13

किताब : घडिय़ों की हड़ताल (उपन्यास)
लेखक : रमेश थानवी
प्रकाशक : एनसीईआरटी, नई दिल्ली
मूल्य : 40 रुपये

रमेश थानवी का उपन्यास ‘घडिय़ों की हड़ताल’ सही मायने में एक प्रयोगधर्मी उपन्यास है, जिसमें हमारा समय और सच्चाइयाँ खुलकर सामने आती हैं। उपन्यास की कथा बहुत संक्षिप्त-सी है। पर उसे इस जिंदादिली से कहा गया है कि ‘घडिय़ों की हड़ताल’ इधर के बाल उपन्यासों में एक यादगार उपन्यास बन गया है। उपन्यास की शुरुआत में ही घडिय़ों की इस अनोखी हड़ताल का जिक्र है जिससे सब जगह हड़कंप मच जाता है और सारे काम रुक जाते है। लोग हैरान होकर देखते हैं कि अरे, यह क्या? घड़ी की सूइयाँ तो आगे बढ़ ही नहीं रहीं! बमुश्किल घडिय़ों की यह हड़ताल खत्म होती है, जिसने जीवन के पहियों की गति को ही रोक दिया था और पूरा देश जैसे थम सा गया था। रमेश थानवी का यह बच्चों के लिए लिखा गया अकेला उपन्यास है, पर यह बेशक बच्चों के मन में अपनी गहरी छाप छोड़ता है।

14

किताब : भोलू और गोलू (उपन्यास)
लेखक : पंकज बिष्ट
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
मूल्य : 14.5 रुपये

पंकज बिष्ट के बाल उपन्यास ‘भोलू और गोलू’  में सर्कस में काम करनेवाले एक भालू के बच्चे भोलू और महावत के बच्चे गोलू की दोस्ती है। बड़ी ही प्यारी दोस्ती, जिससे दोनों को ही बड़ी खुशी मिलती है। खासकर भोलू तो गोलू से दोस्ती से पहले एकदम उदास और अनमना रहता है। इतना कि गोलू उसके निकट आया तो उसे देखकर उलटे खीज गया और उसे सबक सिखाने पर उतारू हो गया। पर आखिर भोलू ने गोलू के दिल के प्यार को पहचाना। फिर तो उसके जीवन में एक नया उत्साह और उमंग भर जाती है। सर्कस में अपनी बारी आने पर ऐसे-ऐसे कमाल के खेल वह दिखाता है कि क्या कहें! अंत में यह गोलू की कोशिशों का ही नतीजा है कि भोलू सर्कस से छूटकर जंगल में जा पहुँचता है। उस जंगल में जो सचमुच उसका अपना और बड़ा घर है। वहाँ अपनी मस्ती से जीते हुए भोलू कितना खुश है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं!

15

किताब : मैली मुंबई के छोक्रा लोग (उपन्यास)
लेखक : हरीश तवारी
प्रकाशक : ग्रंथ सदन, दिल्ली
मूल्य : 100 रुपये

हरीश तिवारी का ‘मैली मुंबई के छोक्रा लोग’ हिंदी बाल उपन्यासों के इतिहास में बहुत कुछ नया जोडऩेवाला एक अद्भुत बाल उपन्यास है, जिसमें मुंबई की जिंदगी के सच्चे अक्स हैं। ‘मैली मुंबई के छोक्रा लोग’ उपन्यास का नायक रोज-रोज दुख और अपमान के धक्के खाता झोंपड़पट्टी का एक लड़का है, जिसके भीतर आखिर पढऩे और कुछ कर दिखाने की लौ पैदा हो जाती है। कल की रोटी तक का ठिकाना नहीं है, लेकिन जिद बेमिसाल है। किताबों के लिए उसका प्यार बढ़ता ही जाता है। और आखिर जब वह अपने जीवन की इस कठिन परीक्षा से गुजरकर, अपनी प्रतिभा की धाक जमा लेता है, तो लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं। उपन्यास में मुंबई के शोषण और अभावग्रस्त जीवन की बड़ी मार्मिक शक्लें हैं, जो मन पर गहरा असर डालती है।

16

किताब : चिडिय़ा और चिमनी (उपन्यास)
लेखक : देवेंद्र कुमार
प्रकाशक : आकाशदीप पब्लिकेशंस, दिल्ली
मूल्य : 50 रुपये

देवेंद्र का सबसे सशक्त उपन्यास है ‘चिडिय़ा और चिमनी’, जो आज की पर्यावरण की समस्या को इतनी संजीदगी से उठाता है कि उससे बाल उपन्यास को एक नई शक्ति ही नहीं, बल्कि एक अलग पहचान और अर्थवत्ता भी मिल जाती है। ‘चिडिय़ा और चिमनी’ में एक फैक्ट्री है, जिसकी चिमनी से रात-दिन काला धुआँ निकलता रहता है। यह धुआँ इतना खराब और प्रदूषणकारी है कि इससे चिडिय़ा का गला खराब हो जाता है और खाँसी के कारण उसकी हालत लगातार बिगड़ती जाती है। नन्ही चिडिय़ा की यह हालत हाथी दादा से देखी नहीं जाती। आखिर जंगल के सारे जानवर मिलकर उस फैक्ट्री को घेर लेते हैं और चिमनी को तोड़ देना चाहते हैं। मगर फिर समझ में आया कि फैक्ट्री के बंद हो जाने पर सैकड़ों मजदूर बेरोजगार हो जाएँगे। तब एक बढिय़ा तरकीब निकली, जिससे चिडिय़ा और हाथी दादा ही नहीं, जंगल के सभी जानवर खुश हैं। बाल उपन्यास होते हुए भी ‘चिडिय़ा और चिमनी’ की रेंज बड़ी है।

17

किताब : शेरसिंह का चश्मा (कहानी)
लेखक : अमर गोस्वामी
प्रकाशक : वैभवशाली, दिल्ली
मूल्य : 25 रुपये

अमर गोस्वामी की खासी चुस्त-दुरुस्त बाल कथाओं की एक अलग पहचान है, जिनमें हास्य के मनोरम छींटे हैं। ‘शेरसिंह का चश्मा’ उनकी ऐसी ही मजेदार बाल कहानियों का सुंदर और पठनीय संग्रह है। इसमें ‘शेरसिंह का चश्मा’, ‘खुशबू की ताकत’, ‘सुपर पावर से टक्कर’ जैसी कहानियों में शिष्ट हास्य के बड़े सुंदर नमूने हैं। इनमें ‘शेरसिंह का चश्मा’ तो अद्भुत हास्य-कथा है। जंगल के राजा शेर को बुढ़ापे के कारण कुछ कम दिखाई देने लगा। नजर कमजोर हो जाने के कारण वे खरगोश को चूहेराम समझ लेते हैं, ढेंचूराम को डंपी कुत्ता और लाली बंदर को गिलहरी। मगर लाली बंदर आखिर उनके लिए चश्मा ढूँढ़ लाया और शेर के लिए सही नंबर का चश्मा लाने में क्या-क्या कमाल हुए, यह इस बड़ी ही नाटकीय कहानी ‘शेरसिंह का चश्मा’ को पढ़कर जाना जा सकता है। ‘खुशबू की ताकत’ में फूल को नाचीज समझकर हँसने वाले घमंडी हाथी की कैसी दुर्गति होती है, इसे अमर गोस्वामी ने एक मीठी हास्य-कथा में ढालकर सामने रखा है।

18

किताब : शिब्बू पहलवान (उपन्यास)
लेखक : क्षमा शर्मा
प्रकाशक : ईशान प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 16 रुपये

क्षमा शर्मा ने बच्चों के लिए खूब लिखा है और खूब रमकर लिखा है। उनके बाल उपन्यासों का अलग ही रंग है। ‘शिब्बू पहलवान’ क्षमा शर्मा का खासा दिलचस्प उपन्यास है, जिसके नायक हैं शिब्बू पहलवान। लेकिन शिब्बू पहलवान सिर्फ पहलवान ही नहीं, वे और भी बहुत कुछ हैं। उपन्यास में शिब्बू पहलवान की बहादुरी और पहलवानी दावँ-पेच के अलावा उनकी दयालुता, सरलता, खुद्दारी और स्वाभिमान की भी एक से बढ़कर एक ऐसी झाँकियाँ हैं, जो मोह लेती हैं। बलवान वे इतने बड़े हैं कि जहाँ भी वे दंगल में जाते हैं, पहला इनाम जीतकर लाते हैं। पर दिल इतना कोमल कि किसी का भी दु:ख-दर्द देख नहीं पाते और उसकी मदद के लिए जी-जान से जुट जाते हैं। उपन्यास का अंत खासा रोमांचक है और देर तक मन पर उसकी छाप बनी रहती है। बेशक शिब्बू पहलवान ऐसा उपन्यास है कि एक बार पढऩे के बाद भुलाया नहीं जा सकता।

19

किताब : एक सौ एक कविताएं (कविता)
लेखक : दिविक रमेश
प्रकाशक : मेट्रिक्स पब्लिशर्स, दिल्ली
मूल्य : 200 रुपये

दिविक रमेश उन कवियों में से हैं जिन्होंने बच्चों के लिए बिल्कुल अलग काट की कवितायें लिखी हैं। पिछले कोई तीन दशकों में लिखी गई उनकी कविताओं में से चुनी हुई एक सौ एक कविताएँ इस पुस्तक में शामिल हैं, जिनमें दिविक की कविता का हर रंग और अंदाज है। यही नहीं, पुस्तक में बहुत-सी कवितायें चकित करती हैं कि अच्छा, बच्चों के लिए भी यह सब कहा जा सकता है और इतनी सहजता से कहा जा सकता है! खासकर ‘घर’, ‘जी करता जोकर बन जाऊँ’, ‘थकता तो होगा ही सूरज’, ‘अगर पेड़ भी चलते होते’, ‘सुंदर माँ का सुंदर गाना’,  ऐसी कवितायें हैं जिनमें बच्चे रमते भी हैं और जिनके जरियें नई दुनिया की नई हकीकतों से भी परिचित होते हैं।

20

किताब : लड्डू मोती चूर के (कविता)
लेखक : रमेश तैलंग
प्रकाशक : ग्लोरियस पब्लिशर्स, नई दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये

‘लड्डू मोतीचूर के’ रमेश तैलंग के एक सौ एक शिशु गीतों का अद्भुत गुलदस्ता है। सभी बालगीत ऐसे कि आप पढ़ते जायें और मंद-मंद मुसकराते जाएँ। सभी में बच्चों की दुनिया की कोई अलग शक्ल, अलग बात है। पर साथ ही एक मीठी गुदगुदी भी है, जिससे ये गीत पढ़ते ही हर बच्चे की जबान पर नाचने लगते हैं। रमेश तैलंग एक छोटे से बालगीत में बहुत कुछ कह देने की कला में माहिर हैं। इस संग्रह में शामिल ‘डुगडुग डंडा डोली’, ‘पानी पीने आई चूं-चूं’, ‘निक्का पैसा’, ‘गिरस्थी’, ‘हँसा कीजिए’, ‘लड्डू मोतीचूर के’ और ‘पापा की तनख्वाह’ में पढ़कर तो लगने लगता है कि रमेश तैलंग ने बाल मन का कोना-कोना छान लिया है।

होली के रंग कवि‍ताओं के संग

रंगों के त्‍यौहार होली पर भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैया लाल मत्त, घमंडी लाल अग्रवाल, प्रकाश मनु, योगेन्द्र दत्त शर्मा, गोपीचंद श्रीनागर, नागेश पाण्डेय ‘संजय’, देवेन्द्र कुमार और रमेश तैलंग की कवि‍ताएं-
 

फागुन की खुशियाँ मनाएं : भवानी प्रसाद मिश्र

 
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरणें हैं कंचन समेट, लो;
आज कोयल बहन हो गई बावली
उसकी कुहू में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
 
आज अपनी तरह फूल हंसकर जगे,
आज आमों में भोंरों के गुच्छे लगे,
आज भोरों के दल हो गए बावले
उनकी गुनगुन में अपनी लड़ी गीत की हम मिलाएं।
आज नाची किरण, आज डोली हवा!
आज फूलों के कानों में बोली हवा
उसका सन्देश फूलों से पूछें, चलो
और कुहू करें गुनगुनाएं।
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएं
 
 

रंगों का धूम-धड़क्का : प्रकाश मनु

 
फिर रंगों का धूम-धड़क्का, होली आई रे,
बोलीं काकी, बोले कक्का—होली आई रे!
मौसम की यह मस्त ठिठोली, होली आई रे,
निकल पड़ी बच्चों की टोली, होली आई रे!
 
लाल, हरे गुब्बारों जैसी शक्लें तो देखो—
लंगूरों ने धूम मचाई, होली आई रे!
मस्ती से हम झूम रहे हैं, होली आई रे,
गली-गली में घूम रहे हैं, होली आई रे!
 
छूट न जाए कोई भाई, होली आई रे,
कह दो सबसे—होली आई, होली आई रे!
मत बैठो जी, घर के अंदर, होली आई रे,
रंग-अबीर उड़ाओ भर-भर, होली आई रे!
 
जी भरकर गुलाल बरसाओ, होली आई रे,
इंद्रधनुष भू पर लहराओ, होली आई रे!!
फिर गुझियों पर डालो डाका, होली आई रे,
हँसतीं काकी, हँसते काका—होली आई रे!
 
 

हाथी दादा की होली: प्रकाश मनु

 
जंगल में भी मस्ती लाया
होली का त्योहार,
हाथी दादा लेकर आए
थोड़ा रंग उधार।
 
रंग घोल पानी में बोले—
वाह, हुई यह बात,
पिचकारी की जगह सूँड़ तो
अपनी है सौगात!
 
भरी बालटी लिए झूमते
जंगल आए घूम,
जिस-जिस पर बौछार पड़ी
वह उठा खुशी में झूम!
 
झूम-झूमकर सबने ऐसे
प्यारे गाने गाए,
दादा बोले—ऐसी होली
तो हर दिन ही आए!
 
 

जमा रंग का मेला : कन्हैया लाल मत्त

 
जंगल का कानून तोड़कर जमा रंग का मेला!
भंग चढ़ा कर लगा झूमने बब्‍बर शेर अलबेला!
 
गीदड़ जी ने टाक लगाकर एक कुमकुमा मारा!
हाथी जी ने पिचकारी से छोड़ दिया फब्बारा!
 
गदर्भ जी ने ग़ज़ल सुनाई कौवे ने कब्बाली!
ढपली लेकर भालो नाचा, बजी जोर की ताली!
 
खेला फाग लोमड़ी जी ने, भर गुलाल की झोली!
मस्तों की महफ़िल दो दिन तक, रही मनाती होली!
 
 

होली का त्यौहार : घमंडी लाल अग्रवाल

 
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
रंग-बिरंगी पोशाकें अब मुखड़े बे-पहचान,
भरा हुआ उन्माद हृदय में अधरों पर मुस्कान,
मस्त महीना फागुन वाला लुटा रहा है प्यार!
 
डफली ने धुन छेड़ी प्यारी, भरें कुलांचें ढोल,
मायूसी का हुआ आज तो सचमुच बिस्तर गोल,
भेदभाव का नाम मिटा दें, महक उठे संसार!
आया हँसता रंग-रंगीला होली का त्यौहार!
 
 

सतरंगी बौछारें लेकर : योगेन्द्र दत्त शर्मा

 
सतरंगी बौछारें लेकर
इन्द्रधनुष की धरें लेकर
मस्ती की हमजोली आई,
रंग जमाती होली आई!
 
पिचकारी हो या गुब्बारा,
सबसे छूट रहा फुब्बारा,
आसमान में चित्र खींचती
कैसी आज रंगोली आई!
 
टेसू और गुलाब लगाये,
मस्त-मलंगों के दल आये
नई तरंगों पर लहराती,
उनके संग ठिठोली आई!
रंग जमाती होली आई!
 
 

होली के दो शिशुगीत : गोपीचंद श्रीनागर

 
कोयल ने गाया
गाया रे गाना!
होली में भैया
भाभी संग आना!
……………
मैना ने छेड़ी
छेड़ी शहनाई!
होली भी खेली
खिलाई मिठाई!
 
 

जब आएगी होली : नागेश पाण्डेय ‘संजय’

 
नन्ही-मुन्नी तिन्नी बिटिया,
दादीजी से बोली-
“खूब रंग खेलूंगी जमकर,
जब आएगी होली!
 
मम्मी जी से गुझिया लूंगी,
खाऊंगी मैं दादी!
उसमें से तुमको भी दूँगी,
मैं आधी की आधी!”
 
 

होली के  दिन: देवेन्द्र कुमार

 
होली के दिन बेरंग पानी
ना भाई ना!
 
जंगल घिस कर हरा निकालें
आसमान का नीला डालें
धूसर, पीला और मटमैला
धरती का हर रंग मिला लें
 
अब गन्दा पानी नहलाएं
फिर होगी सतरंगी होली!
हाँ भाई हाँ!
 
काली, पीली, भर भर डाली
मिर्च सभी ने मन भर खाली
मुंह जलता है पानी गायब
मां, अब सब कुछ शरबत कर दे
मटके सारे नदियाँ भर दे
 
जो आये मीठा हो जाए
तब होगी खटमिट्ठी  होली!
हाँ भाई हाँ!
 
 

होली का गीत : रमेश तैलंग

 
मुखडे़ ने रँगे हों तो
होली कि‍स काम की ?
रंगों के बि‍ना है, भैया !
होली बस नाम की।
 
चाहे हो अबीर भैया,
चाहे वो गुलाल हो,
मजा है तभी जब भैया,
मुखड़ा ये लाल हो,
 
बंदरों के बि‍ना कैसी
जय सि‍या-राम की ?
 
रंग चढ़े टेसू का या
कि‍सी और फूल का,
माथे लगे टीका लेकि‍न
गलि‍यों की धूल का,
 
धूल के बि‍ना ना मने
होली घनश्‍याम की।
 
 
 
 

कोई सोचे कि साहित्य खत्म हो जाएगा तो बेवकूफी है : रामवि‍लास शर्मा

प्रख्यात आलोचक डा. रामविलास शर्मा को 1991 में व्‍यास सम्‍मान प्रदान कि‍या था। इस अवसर पर कथाकार प्रकाश मनु ने उनसे अंतरंग बातचीत की थी-

डॉ. रामविलास शर्मा (1912-2000) हिंदी आलोचना के शीर्षपुरुष थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने और उसे सामाजिक विकास की चेतना और पक्षधरता से जोडऩे वालों में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उनका जीवन एक आलोचक की निरंतर विकास और संघर्ष-यात्रा का पर्याय कहा जा सकता है और एक कडिय़ल आलोचक और चिंतक का आदर्श उनमें देखा जा सकता है। निराला पर उनका काम किसी रचनाकार को संपूर्णता से थाहने के लिहाज से आज भी हमें उतना ही बड़ा, उतना ही चुनौतीभरा लगता है—करीब-करीब अतुलनीय! यह रामविलास जी के काम करने के ढंग और प्रकृति को बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। निराला की तरह उन्हें भी एक साथ कई मोरचों पर लडऩा पड़ा। साथ ही परंपरा की पहचान के लिए विचार और भाषा की जड़ों तक जाने का गंभीर काम उन्होंने किया। और भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान का तो अभी तक मूल्यांकन होना बाकी है। उन्होंने एक साथ दस आलोचकों के बराबर काम कर दिखाया और बड़े ही चुपचाप, इसलिए कि उनके यहाँ दिखावा या ‘पोस्चर’ सबसे कम है—और पश्‍चि‍म से चार अक्षर उधार लेकर उछलने वाली कलाबाजी तो बिलकुल नहीं है। उनके आग्रह कभी-कभी दुराग्रह भले ही लगते रहे हों, पर वे उन आलोचकों की तरह नहीं थे जो सुबह कुछ कहते हैं, शाम को कुछ और! आलोचना में इस तरह की हलकी नेतागिरी की जगह रामविलास जी ने अलग रहकर चुपचाप ठोस काम करना बेहतर समझा और उम्र के आखिरी चरण में भी किसी जवान आदमी के जोश के साथ अपने काम में जुटे रहे।

उन्हें व्यास सम्मान दिए जाने के अवसर पर उनके जीवन और कामों को लेकर लंबी बातचीत करने का मन था। मैं उनसे मिलने गया, तो वे अपनी छड़ी लिए घूमने जाने के लिए करीब-करीब तैयार थे। मैंने साथ चलने की इच्छा प्रकट की, तो वे खुशी से राजी हो गए। पूरे रास्ते वह प्रफुल्ल उत्साह के साथ बतियाते, तेज-तेज चलते रहे (वैसे भी पुराने दिनों और मित्रों की याद उनके चेहरे पर जैसी मुलायमियत भरी मुसकराहट ले आती है, उसे देख पाना खुद में एक अनुभव है।) और लौटे तो फिर वैसे ही बातचीत के लिए तैयार! एक आलोचक के सुदीर्घ जीवन के अनुभवों और मुश्किलों से शुरू हुई यह बातचीत करीब-करीब बहस की शक्ल लेती हुई प्रगतिशील आंदोलन के उतार-चढ़ाव, नई कविता के आत्मसंघर्ष, हिंदी-उर्दू के झगड़े और भाषा की समस्याओं तक को अपनी गिरफ्त में लेती है और रामविलास जी के व्यक्‍ति‍गत जीवन के संवेदनों को बार-बार छू जाती है। बीच में दो-एक बार वह उत्तेजित भी हुए, पर ज्यादातर उनकी मुद्रा ‘बड़े भाई’ की तरी शांत व्याख्याकार की रही। बीच-बीच में अतीत में लौटने का सुख उनकी आँखों में चमक भर जाता।

करीब ढाई घंटे बाद जब मैं उठा, तो चेहरे पर उतर आई हलकी थकान के बावजूद उनका उत्साह चकित कर देने वाला था! अलबत्ता बीच में चाय पीते समय मैंने देखा, प्याला उठाते समय उनके हाथ काँपते हैं। और एकाएक कडिय़ल आलोचक के रूप में उनकी लंबी संघर्ष-यात्रा मेरी आँखों के आगे घूम गई।

यहाँ अनेक मोड़ों और पड़ावों से गुजरी इस लंबी, विचारोत्तेजक बातचीत के कुछ अंश दिए जा रहे हैं-

डॉक्टर साहब, एक लेखकखासकर आलोचक के रूप में लंबी यात्रा तय की है आपने। तो क्या आप बताएँगे कि एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या हैऔर सबसे बड़ी तकलीफ क्या है?

(हँसते हुए) भई, मुझे तो आलोचना में मजा आता है। अलबत्ता तकलीफ दूसरों को हो सकती है। बेहतर होता, अगर आप पूछते कि मजा क्या आता है आलोचना में…?

ठीक है, यही बताइए…!

आलोचना में जो सबसे बड़ा काम हम करते हैं, वह है किसी साहित्यिक कृति या अनेक साहित्यिक कृतियों और प्रवृत्तियों के आपसी संबंधों को पहचानना। कभी-कभी यह एक लेखक और उसकी युग के दूसरे लेखकों के बीच होता है और कभी अनेक युगों के लेखकों के बीच। अब उदाहरण दूँ आपको! तुलसी और निराला तो एक युग के नहीं हैं, लेकिन तुलसी और निराला में जब मैं साम्य देख लेता हूँ तो मुझे खूब मजा आता है। इसी तरह महावीरप्रसाद द्विवेदी और निराला को लोक एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं, पर मैंने खोज की तो पता चला कि ऐसा नहीं है। निराला तो महावीरप्रसाद द्विवेदी की परंपरा का ही विकास कर रहे हैं, उनके सच्चे उत्तराधिकारी हैं…

लेकिन कहा तो यह जाता है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी ने जूही की कली सरस्वती के मंदिर से लौटा दी थी…

(दृढ़ता के साथ) नहीं, यह ठीक नहीं है…!

तो क्या यह बात गलत प्रचारित है कि द्विवेदी जी मुक्त छंद से चिढ़ते थे, इसलिए जूही की कली उन्होंने लौटा दी थी…?

बिलकुल। इसलिए कि अगर ऐसा होता तो निराला ‘अनामिका’ में महावीरप्रसाद द्विवेदी के लिए ऐसे सम्मानसूचक शब्द न लिखते! और फिर द्विवेदी जी ने निराला की मुक्त छंद में लिखी कविताओं की प्रशंसा की थी…

और डॉक्टर साहब, एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?

सारी सामग्री की समेटकर, उसे व्यवस्थित करके, विश्‍लेषि‍त करके सही निष्कर्ष तक ले जाना! इसमें काफी समय और भारी परिश्रम लगता है।

आपकी आलोचना-पद्धति पर आरोप भी लगते रहे कि उसमें लचीलापन कम है, कट्टरता है। कुछ न उसे कठमुल्लापन कहा! आपने खुद भी शायद कहीं लिखा है कि आप इस मारधाड़ वाली आलोचना से ऊब गए हैं और अब कुछ और करना चाहते हैं।

मारधाड़ वाली आलोचना मैंने नहीं कहा, मेरे मित्र अमृतलाल नागर ने एक दफा कहा था। मुझसे छोटे थे, पर अकसर बड़ों जैसी बात कहते थे, बेबाक राय देते थे।

उन दिनों मैं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा हुआ था। तो प्रगतिशील साहित्य पर जो आक्रमण होते, उनका मैं जवाब दिया करता था। वैसे भी अगर कोई रचना मुझे लगता कि सामाजिक विकास की चेतना में रुकावट खड़ी करने वाली है, तो मैं उस पर जमकर प्रहार करता! उसे देखकर उन्हीं दिनों नागर जी ने लिखा था, ”क्या हर कुत्ता जो तुम्हारे घर आकर भौंकता है, उसे देखकर तुम लाठी लेकर मारने दौड़ोगे? तब तो तुम्हारी बहुत सी ताकत इसी में जाया हो जाएगी। कोई ठोस काम क्यों नहीं करते?’’ तो मैंने फिर इस तरह की चीजें छोड़ दीं सन् 52 में। ऐसा लेखन सन् 43 से 52 तक ही ज्यादा मिलेगा, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का नेता था। उसके बाद यह कम, बहुत कम हो गया। ऐसा नहीं कि मैंने आरोपों के जवाब नहीं दिए। जहाँ बहुत जरूरी लगा, वहाँ दिए भी। जैने ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ में कहीं-कहीं बहुत सख्ती से नामवर सिंह की खबर ली है। लेकिन अब यह नहीं है कि मैं हर किसी के बारे में लिखूँ- या यही देखता रहूँ कि कौन मेरे खिलाफ लिख रहा है…

तो आप मानते हैं कि एक दौर था, जब आपकी आलोचना में कट्टरता ज्यादा थी…?

ज्यादा थी, लेकिन वह समय की जरूरत भी थी। वैसे लोग भूल जाते हैं कि मैंने मारा है तो मार खाई भी खूब है। अब इस बात का क्या किया जाए कि मेरा लिखा तो लोगों को याद रहता है, जबकि दूसरों का लिखा वे भूल जाते हैं! (हँसते हैं)

आपको शायद याद नहीं, रांगेय राघव ने मेरी तीखी आलोचना की थी, यशपाल ने, पंत जी ने भी! मैंने सन् 48 में लिखा था पंत जी पर, जब वह ‘ग्राम्य’ की जमीन को छोड़कर स्वर्णशिखरों पर चढ़ाई करने लगे थे…

किस पत्र में?  ‘हंस में क्या…?

जी हाँ, ‘हंस’ में। वही हमारा मुखपत्र था। और फिर पंत जी ने भी उसका जवाब दिया था। एक बार मिले तो उन्होंने खुद बताया, ”रामविलास जी, मैंने आपकी बातों का जवाब दिया है अपनी पुस्तक की भूमिका में।’’

कई बार ऐसा नहीं लगता कि ऐसी आलोचना व्यक्तिगत उठापटक में खर्च हो जाती है और साहित्य या साहित्यिक चेतना के विकास में इससे कोई मदद नहीं मिलती?

देखिए, कोई रचना मेरे सामने हो तो सबसे पहले मैं यह देखूँगा कि उसके पीछे लेखक की दृष्टि क्या है। वह सामाजिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है या उसमें रोड़े खड़े करती है। इस लिहाज से उपयोगी हुई तो मैं उसकी विशेषताएँ बताऊँगा और अगर समाज को अस्वस्थ करने वाली चीज हुई तो मैं पूरे जोर से उस पर आक्रमण करूँगा। और उसमें दो-एक खासियतें भी हों तो उनकी चर्चा की मुझे जरूरत नहीं लगती। जैसे अगर मान लीजिए, आज कोई नायिका-भेद की कविता लिखे और उसमें सुंदर-सुंदर शब्द, कल्पनाएँ ले आए तो आज जमाना तो है नहीं नायिका-भेद का, इसलिए उसमें कैसी कलात्मक खासियतें हैं, यह चर्चा करने की मैं जरूरत नहीं समझता।

नहीं, मैं एक और बात कह रहा था। जैसे निराला की आप चर्चा करते हैं निराला का साहित्य साधना में तो बड़ी सहानुभूति से उनकी तकलीफों और संघर्षों को देखते हैं और यह भी कि उनके साहित्य में ये चीजें कैसे आती हैं, लेकिन मुक्तिबोध को देखते हैं तो यह सहानुभूति गायब हो जाती है। आप उनके संघर्षों को भूल जाते हैं और कमजोरियों को फैला-फैलाकर दिखाने लगते हैं।

देखिए, मुक्तिबोध शुरू में ऐसे नहीं थे, बाद में चलकर हुए। सन् 46 के आसपास! और सिर्फ वही नहीं, पूरा का पूरा दृश्य ही बदल रहा था उन दिनों। वे तमाम लोग जो घोषित मार्क्‍सवादी थे, वे अब टूटने, झुकने लगे थे। सन् 46 के आसपास एक बड़ा बदलाव आपको दिखाई देगा। उसमें अज्ञेय ही नहीं, भारतभूषण अग्रवाल, नेमिचंद जैन, मुक्तिबोध, दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन सब बदले नजर आएँगे। यह मोटे तौर से अमरीकी प्रभाव था जो अस्तित्ववाद की शक्ल में समाने आया था। अस्तित्ववाद को अमरीका हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा था हमारे मनोबल को तोडऩे के लिए। इसी समय भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचंद्र जैन जैसे घोषित मार्क्‍सवादी रातोंरात बदल गए। बालकृष्ण शर्मा नवीन संघर्ष पथ छोड़कर ‘क्वासि’ लिखने लग गए। पूरे देश में कम्युनिस्टों की धरपकड़ हो रही थी और पंत ‘स्वर्ण किरण’ और ‘स्वर्णधूलि’ लिख रहे थे।

पर यह जरूरी तो नहीं कि अस्तित्ववाद अमरीकी हथियार ही हो! वह एक विचारधारा है और किसी भी विचारधारा की सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन यह आप कैसे कहते हैं कि…?

भई, देखना तो यह होगा कि किस चीज पर कौन जोर दे रहा है और किस मकसद से? अमरीका इनका पूरा समर्थन कर रहा था और भारत में मार्क्‍सवाद की जगह अस्तित्ववाद नजर आए, इसमें उसकी पूरी दिलचस्पी थी। और अज्ञेय पूरी तरह अमेरिकी गिरफ्त में थे ही। उनके आसपास धर्मवीर भारती, सर्वेश्‍वरदयाल सक्सेना, लक्ष्मीकांत वर्मा, ये सारे जो लोहियावादी घिर आए थे, इन्हीं को लेकर उन्होंने प्रयोगवाद चलाया और आगे चलकर नई कविता भी! दोनों में बुनियादी रूप में ज्यादा फर्क नहीं था और अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक सब उसमें शामिल थे।

लेकिन आप अज्ञेय और मुक्तिबोध को एक साथ कैसे रख सकते हैं? अज्ञेय ने इतने समझौते किए और मुक्तिबोध जीवन भर अपने आप से झगड़ते रहे—’ब्रह्मराक्षस’ जैसा आत्मसंघर्ष और कहाँ है?

लेकिन एक बात में दोनों समान हैं—विघटन और अवसाद।

यों देखें डॉ. साहब, तो अवसाद तो छायावाद में भी है, बल्कि यों कहें कि विषाद और नैराश्य उसकी मूल वृत्ति है।

विषाद है, लेकिन उससे उबरकर उल्लास की ओर जाने वाला भाव भी है।

तो क्या छायावाद में कम पलायन है। वे तो एक दूसरी दुनिया ही बसा लेते हैं जिसका कहीं अस्तित्व नहीं है, भागकर वहाँ छिप जाते हैं?

(खीजकर) भई, पीड़ा है, लेकिन संघर्ष भी तो साथ ही चलता है। निराला के यहाँ है यह संघर्ष।

निराला को छोड़ दें डॉक्टर साहब, क्योंकि छायावाद में उनकी स्थिति ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ है। बाकी महादेवी, प्रसाद, पंत के यहाँ कहाँ है संघर्ष?

भई, आपको पता नहीं, प्रसाद ने केवल रोमानी कविताएँ ही नहीं लिखीं, कुछ आशा जगाने वाली कविताएँ भी हैं। उनके नाटकों में संघर्ष है।

लेकिन डॉक्टर साहब, कविता की ही बात करें तो?

कुछ कविताएँ उनकी हैं, महादेवी के यहाँ भी मिल जाएगा ‘जाग तुझको दूर जाना…’

एक बात बताएँ डॉक्टर साहब, इनमें वह समय कहाँ है जिसमें ये लिखी जा रही थींगुलामी की पीड़ा, आम आदमी की यातनाएँ, विवशता, दारिद्र्य, यह सब कहाँ है महादेवी के गीतों में! वे तो सौ साल पहले लिखी जाती या बाद में, ऐसी ही होतीं…!

तकलीफें हैं, लेकिन इस बारे में मेरी और आपकी दृष्टि में फर्क है शायद…

और जो छायावाद का पलायन है, ‘ले चल मुझे भुलावा देकर…’ यह शराब पीकर गम भुलाना नहीं है क्या?

यह फिर भी बेहतर है क्योंकि इसमें पीड़ा से दूर जाने की इच्छा तो है, पीड़ा को मूल्य तो नहीं बना दिया गया नई कविता की तरह?

यानी पीड़ा का चित्रण और पीड़ा को मूल्य बना देना, इसमें बारीक सा अंतर है। वह समझाएँगे आप?

बारीक सा नहीं, काफी बड़ा अंतर है।

तो वह पता कैसे चले? कसौटी क्या होगी उसकी?

बताया न, कोई रचना कुल मिलाकर सामाजिक चेतना को आगे बढ़ाती है या नहीं, इस आधार पर हम निर्णय करेंगे।

डॉक्टर साहब, आलोचना में क्यों कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्तिगत संबंध रचना के मूल्यांकन में प्रभाव डालें। मसलन निराला को आप निकट से जानते हैं तो आपने उन पर जो लिखा, उसमें उनके व्यक्तित्व की एक-एक रेखा बोलती है, लेकिन उन्हीं स्थितियों से गुजरे और भी लोग थे और भी बड़े लेखक, वे आपको नजर नहीं आए?

अगर आपका यह कहना है कि मैं व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर निर्णय करता हूँ तो यह सही नहीं है। मैं इसका खंडन करता हूँ। निराला जी को मैं जानता था, इसीलिए उन पर ऐसा लिखा हो, यह जरूरी नहीं। न जानता होता तो भी यही लिखता। इसी तरह तुलसीदास से तो मैं कभी नहीं मिला, लेकिन उन्हें मैं बड़ा कवि मानता हूँ। निराला से भी बड़ा। रांगेय राघव, यशपाल मेरे निकट थे, लेकिन उन पर मैंने बहुत तीखी आलोचनाएँ लिखीं। यशपाल पर लिखा लेख तो मैं उन्हें दिखाने ले गया था। उन्हें सुनाया भी और उन्हें खूब बुरा लगा, लेकिन मैंने वह कभी छपने नहीं दिया। वह आज तक नहीं छपा। हाँ, मैंने उन्हें बता दिया कि तुम्हारे बारे में मेरी राय क्या है। तो मैं इस बात का खंडन करता हूँ कि व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर मैं रचना को अच्छी-बुरी ठहाराता हूँ।

नहीं, मैं सायास प्रभाव की बात नहीं कर रहा, लेकिन किसी से किसी कारण सहानुभूति है तो उसका गुप्त प्रभाव पड़ता होगा। जैसे निराला की हीनताओं और विभाजित व्यक्तित्व की आप सहानुभूति से परख करते हैं और कविता में चमरौधा जूता आपको दुस्साहसिक प्रयोग लगता है, लेकिन मुक्तिबोध की परेशानियाँ, यहाँ तक कि बीड़ी की तलब पर आप व्यंग्य करते हैं। ऐसे ही साही हैं। आप जैसा साबित करना है, वैसे कुटेशंस ढूँढ़ लेते हैं। तो यह कैसे होता है कि…?

(थोड़ा उत्तेजित होकर…) इस पर बहस करें तो मेरा ख्याल है सारा समय इसी में चला जाएगा। बेहतर है कि हम लोग कविता के अलावा किसी और विषय पर आएँ।

डॉक्टर साहब, हमारे विश्वविद्यालय हिंदी साहित्य में क्या कुछ बना या बिगाड़ रहे हैं, इस पर कुछ कहेंगे?

देखिए, हमारे समय में तो विश्वविद्यालयों में रामचंद्र शुक्ल, श्यामसुंदर दास जैसे लोग होते थे जो अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान थे। आजकल तो पता नहीं। मैं लगभग बीस वर्षों से साहित्य से कटा हुआ हूँ। ज्यादा पढ़ नहीं पा रहा।

विश्वविद्यालयों में जो हिंदी पढ़ाई जाती है, वह इतनी कृत्रिम और आडंबर भरी है, बोलचाल की भाषा से इतनी दूर है कि ताज्जुब होता है कि अगर यह हिंदी है तो वह क्या है! यह स्थिति क्या परेशान करने वाली नहीं है?

अगर ऐसा है, तब तो ठीक नहीं है। इतना फर्क बोलने और लिखने की भाषा में होना नहीं चाहिए। मराठी में बंगला में ऐसा फर्क आपको नहीं मिलेगा।

अपने देश में हिंदी और उर्दू का झगड़ा खामखा बना और बढ़ा दिया गया है और कुछ लोग इसे लगातार उकसाते हैं, जबकि आम आदमी के सामने यह मुश्किल नहीं है। वह जो भाषा बोलता है, उसमें हिंदी, उर्दू दोनों सहज ही मिल जाती हैं। तो इस झगड़े का क्या हो जो हम पर खामखा थोप दिया गया है?

मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। हिंदी-उर्दू में तो उतना फासला भी नहीं है जितना हिंदी और उसकी बोलियों में है। और विरोध तो कतई नहीं है! दोनों ने क्रिया-पद मिलते हैं जबकि हिंदी और भोजपुरी या हिंदी और मैथिली के क्रिया-पद एक नहीं हैं। मुझे लगता है, उर्दू का जो भी साहित्य है, वह सारा देवनागरी लिपि में आए, यह जरूरी है। और फिर आप जैसे लोगों को इस क्षेत्र में खूब काम करना चाहिए। गाँव-गाँव कस्बे-कस्बे में जाकर लोगों को यह बात बतानी चाहिए कि सच्चाई क्या है।

लेकिन डॉक्टर साहब, जब तक राजनीति इस मामले में जहर घोलती रहेगी, तब तक ये रचनात्मक काम कुछ सफल होंगे? यकीन है आपको?

तो राजनीतिक प्रोपगैंडा का राजनीतिक तौर से ही मुकाबला किया जाना चाहिए।

राजनीतिक यानी…समझाएँगे!

देखिए, प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ मुस्लिम कवियों की बड़ी अटूट परपंरा है। लोगों को उसके बारे में बताया ही नहीं जाता। अगर ये सारी बातें सामने आएँ तो लोगों का नजरिया बदल सकता है। नवयुवकों को इस काम के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह इस क्षेत्र में काम करने वालों को वजीफे दे। इससे बेरोजगारी मिटेगी और देश के निर्माण में कुछ ठोस काम होगा जिसका असर अगले बीस वर्षों में दिखाई देगा।

लेकिन डॉक्टर साहब, पूरी दुनिया में जो उथल-पुथल पिछले कुछ वषों में हुई है, उसके बारे में क्या सोचते हैं आप? लगता नहीं कि सोवियत संघ के पतन से पूरी दुनिया में समाजवादी आंदोलन को धक्का पहुँचा है?

समाजवादी देश ही नहीं, जो पूंजीवादी देश अपना स्वतंत्र विकास करना चाहते हैं, उन्हें भी धक्का पहुँचा है। यह अमरीकी साम्राज्यवाद की बहुत बड़ी विजय है।…अच्छा, मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। बगैर विदेशी कर्ज के आप काम चला सकते हैं कि नहीं चला सकते? मेरा दावा है कि चला सकते हैं। वही हालत सोवियत संघ में थी। जब उसने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीतीं, तब तो कर्ज नहीं लिया। फिर अब कर्ज लेने की क्या जरूरत थी?… फिर जो कर्ज देगा, वह अपनी शर्तें भी रखेगा और मनवाएगा। आपकी स्वतंत्रता फिर कहाँ रही? सिर्फ पिछलग्गू बन सकते हैं आप!

हमारे देश में आम आदमी के लिए जीने के रास्ते लगातार तंग होते जा रहे हैं। विषमता बढ़ी है और लोगों का यह विश्वास बुरी तरह हिला है कि सच्चाई और ईमानदारी से भी कुछ पाया जा सकता है। तो अब रास्ता क्या हो?

यही कि लोगों को संगठित होकर अपनी आवाज उठानी होगी। उसमें पढ़े-लिखे, अनपढ़, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर सब शामिल हों। और केवल भारत में ही क्यों? सभी देश मिलकर हल खोजें। बल्कि अब तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान और पूरे एशिया भर के लोग भी इसी तरह इकट्ठे हो सकते हैं और दुनिया का नक्शा बदलते देर नहीं लगेगी…

आपके खयाल से अकादमियाँ और साहित्यिक संस्थाएँ कुछ भला कर रही हैं साहित्य का…या कर सकती हैं?

ज्यादातर तो अकादमियाँ हों या यूनिवर्सिटियाँ, सभी रिपीट कर रही हैं कुछ कामों को…दोहराव बहुत ज्यादा है, जैसे-तैसे लीक पीट दी जती है। उदाहरण के लिए शोध को लीजिए, उन्हीं घिसे-पिटे विषयों पर घिसे-पिटे ढंग से होते हैं। कोई समझ में नहीं आता कि अकादमियाँ कर क्या रही हैं? नई से नई योजनाएँ बनाकर काम हो, तो बहुत सारा काम हो सकता है। अकादमियाँ मिलकर तय करें कि भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए वे क्या कर सकती हैं। एक अकादमी तमिल सिखाने की व्यवस्था करे, दूसरी तेलुगु, मलयालम। इससे आप देखेंगे कि एक वातावरण बनेगा, दूरियाँ कम होंगी और एक मजबूत देश की छवि बनेगी।…

साहित्यिक पुरस्कारों के पक्ष और विपक्ष में काफी कहा जाता है। आपके खयाल से सही भूमिका क्या हो सकती है पुरस्कारों की?

पुरस्कार लेखक की साहित्य-साधना का सम्मान करने के लिए हो, इसमें तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन अकसर होता यह है कि पुरस्कार बड़ा होता है उसके साथ जुड़ी हुई बड़ी राशि से। जितनी बड़ी राशि, उतना बड़ा पुरस्कार…! मैं कई बार कल्पना करता हूँ कि क्या दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, लेखक मिलकर कोई ऐसी बॉडी नहीं बना सकते जो अच्छे वैज्ञानिकों, लेखकों को सिर्फ सर्टिफिकेट दे। क्या यह सर्टिफिकेट बड़े से बड़े पुरस्कार से कम होगा? और कुछ नहीं तो कम से कम हम भारत में तो यह कर सकते हैं।…वैसे में चाहता हूँ, कुछ समय के लिए अकादमियाँ, साहित्यिक संस्थाएँ, के.के. बिड़ला फाउंडेशन भी पुरस्कार देना बंद कर दे और जो पुरस्कार की राशि हो, वह हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगाई जाए। साक्षर लोग ज्यादा होंगे तो साहित्य के पाठकों की भी कमी नहीं रहेगी।

प्रगतिशील आंदोलन की विफलता के लिए आप किन कारणों को जिम्मेदार समझते हैं?

नहीं, विफल कहाँ? नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ये सब लिख तो रहे हैं।

नहीं, मैं इधर की पीढ़ी की बात कर रहा हूँ। नागार्जुन, केदार के बाद वाली…?

वह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि मैं आजकल पढ़ नहीं पा रहा हूँ। साहित्य से कुछ दूर चला आया हूँ। मेरी कुछ योजनाएँ हैं, उन्हीं पर काम में जुटा हूँ।

अच्छा, यह जो समीक्षकों का विचार है कि प्रगतिशील आंदोलन तो आगे नहीं चला, लेकिन नई कविता की एक धारा ने ही प्रगतिशील कविता की भूमिका निभाई, इस बारे में आपका क्या कहना है?

नहीं, यह ठीक नहीं। नई कविता पूरी तरह प्रगतिवाद के विरोध में खड़ी थी।

बहुत से प्रगतिशील लेखक इसलिए भी प्रगतिवादी आंदोलन से कट गए कि उसमें सपाटता बहुत आ गई थी और अंतर्विरोधों पर खुलकर बहस नहीं होती थी। क्या आपको नहीं लगता ऐसा?

आप मुझे बताइए, किस दौर में साहित्य ऐसा लिख गया जिसमें सपाटता बिलकुल न हो। अगर कमियाँ हैं, अंतर्विरोध है तो उनको दूर कीजिए। यह तो नहीं कि आप खुद दूर आ गए। मैं जब प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय था तो ऐसे बहुत से मामलों पर मैंने बहसें चलाईं। भाषा को लेकर लंबी बहस चली। मैं कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा-नीति से असहमत था और जो कुछ लिखता था वह कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र में छपा करता था। आप इससे अंदाजा लगाइए हमारी स्वतंद्धता का।

एक और बात! यह जो प्रतिशीलता का एक संकुचित अर्थ बन गया है कि उसमें मजदूर-किसान और क्रांति के गाने गाए जाएँगे, इससे भी लोग बिदके होंगे! क्योंकि लोग वास्तविक जीवन में तो इनके निकट थे नहीं, तो बड़ी बनावटी रचनाएँ आतीं थी। साठोत्तरी लघु पत्रिकाओं का मुझे पता है। उनमें बहुतेरी लाल क्रांति का परचम फहराती थीं। वे कविता-कहानियाँ कहाँ गईं, आज पता नहीं चलता?

प्रगतिशील की यह परिभाषा गलत है और ऐसी बातें विरोधियों ने हमें बदनाम करने के लिए उड़ाई हैं। हाँ, इतना जरूर है कि हमें आम जनता के निकट आना होगा। उनकी मुश्किलें समझकर उनसे जुड़कर लिखें।

केदारनाथ अग्रवाल ने अपनी प्रगतिशीलता को पार्टीवाद से अलग घोषित कियाकि यानी पार्टीवाद या पार्टी दखल से वे भी परेशान हैं?

लेकिन पार्टी तो कभी नहीं कहती कि यह लिखो वह लिखो, कहेगा तो कोई लेखक ही न?

तो भी एक तरह का सेंसरशिप तो लगता है?

देखिए, पार्टी क्या है—एक तरह की विचारधारा है और विचाराधारा का प्रभाव तो होगा ही। जैसे गाँधी जी की विचारधारा का प्रभाव था, वैसे ही कम्युनिस्ट विचारधारा का। लेकिन विचारधारा से तो कोई लेखक मैच्योर ही बनता है।

लेकिन यह सेंसरशिप स्वत:स्फूर्त रचना में बाधक भी तो बनती है?

मेरा मानना है कि कोई रचना पूरी तरह स्वत:स्‍फूर्त नहीं होती। लेकिन इतनी तो जरूर होती है कि अगर हम यह सोचकर बैठ जाएँ कि अच्छी रचना ही लिखनी है तो वह नहीं लिखी जाती और कभी वह ऐसे ही बन जाती है।

तब भी लेखक कुछ शब्दों को चुनता है, कुछ को रिजेक्ट करता है—यानी वह अपना आलोचक खुद होता है। इस रूप में रचना स्वत:स्फूर्त कभी नहीं होती।

अच्छाअब एक अलग तरह का सवाल! जो आलोचना आप लिखते हैं या आपके लिखे पर जो आलोचना होती है, उससे कई बार क्षोभ और गुस्सा भी तो आता होगा। उससे आपके व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन पर भी कोई प्रभाव पड़ता है?

नहीं, मुझ पर तो कभी नहीं। जिन पर मैंने लिखा, उनका कह नहीं सकता। (हँसी)

कई बार आलोचना सिर्फ दूसरों की कमजोरियाँ तलाशने का धँधा बन जाती है। इसे एकांगी आलोचना नहीं कहेंगे?

कवि‍ता के नए प्रतिमान पर लिखे गए लेखों में आपने नामवर के अंतर्विरोधों को खोला है, लेकिन उनकी तारीफ में एक शब्द भी नहीं है?

‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिह कुल मिलाकर प्रगतिवाद के विरोध में खड़े हैं, इसीलिए इतनी सख्त आलोचना की जरूरत पड़ी।

इस तरह की आलोचना से आपने काफी दुश्मन भी बना लिए होंगे?

नहीं, मेरे मन में तो ऐसी कोई बात नहीं है। हाँ, लोगों ने वैसा किया हो, तो कह नहीं सकता। वैसे तो मेरा खयाल है ऐसा नहीं हुआ। नामवर सिंह पर मैंने सबसे सख्त लिखा है, पर हम लोग खूब अच्छे मित्र हैं और सम्मान करते हैं एक-दूसरे का। रांगेय राघव को मुझ पर कुछ लिखना होता था तो किताबें मुझसे ही माँगकर ले जाते थे और आपको शायद मालूम हो, मेरी बहुत कटु आलोचना की है उन्होंने। भगवतीचरण वर्मा के ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ पर मैंने बहुत तीखा लेख लिखा था, हालाँकि हम मित्र थे, बाद में भी रहे।…उस उपन्यास के जवाब में रांगेय राघव ने ‘सीधा सादा रास्ता’ लिखा तो मेरे घर आए। बोले—मैं आपके लेख को भूमिका के रूप में देना चाहता हूँ। मैंने कहा, ठीक है खुशी से छापो।

अपने जीवन-संघर्ष के किसी कमजोर क्षण में मार्क्‍सवाद से क्या कभी मोहभंग नहीं हुआ आपका?

देखिए, मार्क्‍सवाद सिखाता है कि हर चीज पर डाउट करो। तो मैं मार्क्‍सवाद को भी आलोचनात्मक नजरिए से देखता हूँ। मैं यह नहीं मानता कि मार्क्‍स कोई गलती नहीं कर सकता।

इतने लंबे आलोचक जीवन में आपने तमाम लोगों पर तमाम तरह की चीजें लिखीं। क्या आपको कभी कनफेस करने की भी जरूरत पड़ी?

यह तो काल्पनिक प्रश्न हुआ, उदाहरण देकर बताए।

वहीं पंत जी वाला लेख, जिसमें लघु-लघु की गिनती होता है या वे लेख जिन्हें नागर जी ने मारधाड़ वाले लेख कहा ?

सच तो यह है मेरे पास समय नहीं, नहीं तो मैं तो और लिखूँ! पंत जी ने ‘स्वर्ण किरण’, ‘स्वर्णधूलि’ वाले ढोंग का विरोध करना जरूरी था। एक बात बताऊँ आपको, पंत जी आध्यात्मवादी कभी थे ही नहीं। यह अध्यात्म सिर्फ उन्होंने ओढ़ रखा था। निराला जी से प्रतिद्वंद्विता…

आपका मतलब है, पंत जी आतंकित थे निराला जी से?

इनके संबंध बड़े अद्भुत थे। निराला बहुत प्यार करते थे पंत जी से। उन्हें अच्छा कवि भी मानते थे। पंत मन ही मन आतंकित थे निराला जी से। समझते थे कि वह बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन यह बात स्वीकार कभी नहीं करते थे।

क्या आपको लगता है, निराला से मिलने के बाद आपमें एक व्यक्तित्वांतर हुआ। यानी उनसे न मिले होते तो ठीक-ठीक ऐसे न होते…?

लेखक तो मैं तब भी होता। एक तो घर का माहौल ऐसा था कि सभी भाई खूब पढ़ते थे, रुचि लेते थे। खुद पिता जी ने अभावों में रहते हुए भी कई भाषाएँ सीखी थीं। हमें भी प्रोत्साहन देते। फिर संयोग से अध्यापक भी अच्छे मिले जो खूब स्नेह करते थे। जब मैं सोलह वर्ष का था, मेरा एक निबंध मेरे अध्यापक ने कक्षा में पढ़कर सुनाया और खूब तारीफ की थी। फिर बी.ए. में पढ़ता था, तब भी ऐसा ही हुआ। तो मुझे लगता था, लेखक तो मैं हो सकता हूँ। निराला जी से भेंट बहुत बाद में हुई, जब मैं इलाहाबाद में एम.ए. का छात्र था…

उसे भेंट की याद है आपको? तब क्या निराला बिलकुल स्वस्थ थे?

हाँ, मैं ‘परिमल’ खरीद रहा था कि कहीं से घूमते-फिरते वह आ गए। मेरे हाथ में ‘परिमल’ देखकर बोले, इसमें कुछ अतुकांत कविताएँ हैं जो आपको शायद ज्यादा पसंदन आएँ। मैंने कहा, वही तो मुझे ज्यादा पसंद हैं। सुनकर निराला को आश्‍चर्य हुआ था। उनकी आँखों में प्रसन्नताभरी चमक मैंने देखी…

तब के निराला तो बिलकुल देवपुरुषों जैसे थे। उस समय निराला अपने चरम थे, कहीं कोई असामान्यता नहीं! कविताएँ सुनाने का खूब शौक था, लेकिन अपनी नहीं, दूसरों की। सैकड़ों कविताएँ उन्हें याद थीं, पार्क में रात देर तक बैठकर सुनाया करते थे। रवींद्रनाथ टैगोर की कितनी ही कविताएँ मैंने शब्दश: उनसे सुनी हैं।

बाद में आप आलोचना से कटकर भाषा विज्ञान की ओर आए। आपको क्या लगता है, कौन से सवाल, कौन सी चुनौतियाँ थीं जो आपको इधर खींच लाईं?

एक तो मैंने जब से होश सँभाला, यही सुनता आया हूँ कि एक थे आर्य, एक थे द्रविड़। आर्य अक्रांता थे, द्रविड़ों को खदेड़ा था। आज भी आर्य भारत अलग है, द्रविड़ भारत अलग। तो मैं सोचा करता था, क्या यह वाकई ऐसा है? क्या आर्य सचमुच बाहर से आए थे? दूसरे, यह कहा जाता था कि हिंदी में तो इतनी बोलियाँ हैं और सब एक-दूसरे से जुदा-जुदा तो हिंदी एक भाषा कैसे रही? देश एक कहाँ है…? मुझे लगा कि इन प्रश्‍नों को सुलझाया जाए। हिंदी बोलने वाले हम इतने सारे लोग हैं। भाषा-संबंधी देन भी हमारी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन कुछ गलतफहमियों के सहारे उन्हें नकारा जाता था और हममें हीनता पैदा की जाती है। मैंने पहले तो यही देखा कि क्या आर्य वाकई बाहर से आए थे? मैंने पाया—और इसे सभी भाषाविज्ञानी मानते हैं, कोई विवाद नहीं इसमें—कि सघोष महाप्राण ध्वनियाँ (जैसे घ, भ इत्यादि) केवल हिंदी, संस्कृत में हैं। तो अगर ये आर्य कहीं बाहर से आए होते तो दूसरी भाषाओं में भी ये ध्वनियाँ होनी चाहिए, लेकिन नहीं मिलीं—संसार की किसी भी और भाषा में नहीं। अब सवाल यह है कि हमारी भाषा में सुरक्षित कैसे रहीं, कहाँ से आईं? तो बहुत सारी बातें जिन्हें भाषाविज्ञानी अब तक रूढि़ की तरह ढोते चले आए थे, मैंने नए सिरे से परखा…और जैसे-जैसे आगे बढ़ा, मुझे मजा भी बहुत आया। जिन दिनों के.एम. मुंशी संस्थान में था, मैंने सोचा अवसर का लाभ उठाया( जाए। उन दिनों भाषा विज्ञान के बारे में जमकर अध्ययन किया।

आपकी किताब घर की बात पढ़कर अच्छा लगा, थोड़ा खेद भी हुआ। भाषा की इतनी बढिय़ा अर्थ-छवियाँ बिखरी पड़ी हैं वहाँ कि लगा, आप बहुत अच्छे उपन्यासकार हो सकते थे। पर आपको भारी भरकम आलोचक ने उसे दबा दिया।

(हँसकर) मैंने बिलकुल शुरू में एक उपन्यास लिखा था, ‘चार दिन’। अब भी उपन्यास लिखने का इरादा खत्म नहीं हुआ। उम्मीद रखिए…

अपने साहित्यिक मित्रों के बारे में कुछ बताइए? सुना है, खूब छेड़छाड़, शरारतें होती थीं नागर जी के साथ?

निराला जी के यहाँ ही भेंट हुई थी नागर जी से। हमसे छोटे थे चार साल, लेकिन बातें बड़ों जैसी समझदारी की करते थे। हम कहते, ”हम बड़े हैं, आप कहा करो, क्या ‘तुम…’, ‘तुम’ करते हो?’’ तो जवाब मिला, ”आप हमसे नहीं बोला जाएगा। नरेंद्र शर्मा को बोल सकते हैं पर तुमसे नहीं!’’ आपको बताया है कि उन्होंने ही मुझे मारधाड़ वाली आलोचना से रोका था। बैसवाड़ा के न होते हुए भी इतनी बढिय़ा बैसवाड़ी वह बोल लेते थे कि ताज्जुब होता था। उनके उपन्यासों में—खासकर संवादों में बैसवाड़ी के कुछ बहुत ही बढिय़ा प्रयोग मिलते हैं। अभी उनकी ग्रंथावली पर लिखने के लिए मैं उनके उपन्यास दुबारा पढ़ रहा था तो उनमें एक-दो जगह ठेठ गाँव के मुहावरे इतने बढिय़ा ढंग से आए हैं कि मैं कुछ देर तक किताब दूर रखकर हँसता ही रहा कि शहर का यह आदमी जान कैसे गया इन्हें?

केदारनाथ अग्रवाल से भी लंबी मित्रता है। हमसे बड़े हैं, मगर चार साल नहीं, एक साल। बहुत लंबा पत्र-व्यवहार है उनसे, अभी पीछे छपा भी है। इनकी कविताएँ बहुत आकर्षित करती हैं मुझे। लेकिन गद्य और भी गजब का है। मुझे लगा, इस गद्य की ताकत लोगों को बतानी चाहिए। लोग अब देख रहे हैं, खुद समझ रहे हैं कि क्या कुछ है इन पत्रों में।

और नागार्जुन?

नागार्जुन से भी मित्रता है, पर उनसे लंबा पत्र-व्यवहार नहीं हुआ।

केदार और नागार्जुन के व्यक्तित्व की जाहिर है, अलग-अलग रेखाएँ आपको खींचती होंगी! क्या फर्क लगा आपको उनमें?

केदार के यहाँ संवेदनाशीलता बहुत है, सौंदर्यानुभूति उनकी बहुत सजग, बहुत तीव्र है, इसलिए उनके प्रकृति चित्रण का जवाब नहीं। ऐसे दृश्यों की सुंदरता देखकर आप मुग्ध हो जाएँगे लेकिन व्यंग्य केदार के यहाँ बहुत नीचे हैं। नागार्जुन के यहाँ व्यंग्य नंबर एक पर हैं, बहुत उम्दा हैं, लेकिन सौंदर्य चित्रण देखें तो तीसरे-चौथे नंबर पर। केदार के मुकाबले बहुत हलके पड़ते हैं।

प्रगतिवाद में केदार जी की चर्चा सबसे कम हुई है। बड़े प्रगतिवादी आलोचक हलके टोन में उनकी चर्चा करके छोड़ देते हैं, ऐसा क्यों?

आप ठीक कह रहे हैं। मैंने तो इस पर बकायदा लिखा है कि केदार जी की उपेक्षा हुई है और यह गलत है।

हिंदी साहित्य का मौजूदा दृश्य कुछ-कुछ निराश पैदा करने वाला नहीं लगता आपको? किताब पाठकों से दूर चली गई। एक तो पाठक कम हैं, फिर किताबें महंगी भी बहुत हैं।

लेकिन आप जरा जाकर पता लगाइए, प्रकाशक तो बढ़े हैं और उनकी हालत देखें तो लेखक तो वहीं का वहीं है और प्रकाशक कहाँ से कहाँ पहुँच गए! किताबें बिकती नहीं, तो कैसे होता ऐसे?

सरकारी खरीद की ओर भागते हैं सभी। किताबें बोरों में बंद हो जाती हैं, पाठकों तक नहीं आतीं…

यह तब भी होता था। प्रकाशक इसी चीज के पीछे भागता था। पाठक को संस्कार देने काकाम उसने नहीं किया और आज भी ऐसा ही है। पर दूसरी भाषाओं में ऐसा नहीं है, बंगला में देखें, मराठों में देखें! कुछ वर्ष पहले अखबारी कागज पर छपा हुआ माइकेल मधुसूदन दत्त का काव्य बहुत सस्ते में खरीदा था मैंने!…उन लोगों की पुस्तकें सजिल्द कम होती हैं। किताब लाइब्रेरी की बजाय पाठकों तक पहुँचे यह ज्यादा है। हमारे यहाँ उलटा है। अमरीकी प्रभाव ज्यादा है। किताब की साज-सज्जा बढिय़ा होगी, लेकिन दाम इतना रखेंगे कि कोई खरीद ही नहीं सकता।

क्या मीडिया का दबाव भी साहित्य की इस दुर्गति के लिए जिम्मेदार हैखासकर टी.वी.?

देखिए, साहित्य का तो एक तरह का नशा है, जिसे एक बार लग गया उसे लग गया। फिर आसानी से छूट नहीं सकता। दूरदर्शन ने आपके पाठक छीने नहीं, वह तो नए दर्शक पैदा कर रहा है। जिसे किताबें पढऩी होंगी, वह किताबें ही पढ़ेगा। मैं खुद बहुत कम देखता हूँ टीवी। इसकी बजाय तो मुझे संगीत सुनना अच्छा लगता है और वह मैं सुनता हूँ ट्रांजिस्टर से।

लेकिन जिस तरह लेखक ललचाते हुए दूरदर्शन की ओर भाग रहे हैं, फिर वहाँ चाहे उनका अपमान हो, कहानियों में दूरदर्शनी सीरियलों जैसा जो कामचलाऊपन आ रहा है और लोगों को लगने लगा है कि दूरदर्शन में तो इतने दर्शक हैं, वे किस स्तर के हैं इससे फर्क नहीं पड़तातो एक क्रेज तो बना ही है कि…

यह सब बहुत थोड़े समय के लिए होता है, चला जाता है। कोई सोचे कि इससे साहित्य खत्म हो जाएगा, तो यह बेवकूफी है!…साहित्य इतनी हलकी चीज नहीं।

आज साहित्य में इतने कटघरे और गुटबंदियाँ हैं कि नया लेखक जिधर भी जाए, अपने सामने काँटेदार बाड़ देखता है। यह हालत कैसे बदले?

नए लेखकों को चाहिए कि वे अलग से या मिलकर इस काँटेदार बाड़ को तोड़ें। आगे बढऩे वालों को कोई रोक सका है भला।

आजकल आप क्या विशेष कर रहे हैं?…किस तरह की योजना?

मैं ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान पर एक तरह का शोध कार्य कर रहा हूँ। एशिया और ऋग्वेद से संबंधित पुस्तक आशा है, जल्दी ही आएगी। ऋग्वेद कई दृष्टियों से मुझे महत्वपूर्ण लगा है, खासकर भाषा-संबंधी अध्ययन और प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति, जीवन शैली, शिल्प और विकास की अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं की खोज के लिए।

और ज्यादातर समय इसी में जाता होगा?

काफी एकांत है यहाँ…स्थान थोड़ा दूर भी है, इसलिए कभी-कभार ही कोई आता है मिलने। लिखने-पढऩे के लिए काफी समय मिल जाता है।

कहते-कहते मुसकरा देते हैं रामविलास जी। मैं देवेंद्र सत्यार्थी पर लिखी गई किताब ‘तीन पीढिय़ों का सफर’ उन्हें भेंट करता हूँ और बताता हूँ, ”आज ही सत्यार्थी जी मिले थे। कह रहे थे—कोई कितना ही मना करें, पुरस्कार के लिए कहीं एक लालच तो होता ही है मन में। रामविलास जी से मामले में हम सबसे आगे हैं। और उन्होंने बताया कि एक किताब उन्होंने समर्पित की थी आपको, ‘उठाइए लाठी आलोचक जी’ इस ललकार के साथ…’’

रामविलास जी हँस पड़ते हैं, ”और वह किताब आज तक मुझे नहीं मिली। उनसे कहिएगा—मुझे क्यों नहीं भेजी वह किताब?’’

मैं आलोचना के इस शिखर पुरुष को प्रणाम कर लौट पड़ता हूँ।

फूलों की घाटी में एक दिन : प्रकाश मनु

वसंत ऋतु में खूबसूरत फूलों की घाटी में जाने का अवसर घर बैठे मि‍ल जाए तो मजा ही आ जाए। आइए, राजा हक्कू शाह के साथ सैर पर चलते हैं-
अगले दिन राजा हक्कू शाह अपने प्रमुख दरबारियों और सहायकों के साथ फूलों की घाटी देखने गए, तो शेर राजा बब्बू भी उनके साथ थे। राजा हक्कू शाह ने फूलों की घाटी के बारे में तरह-तरह की कहानियाँ सुनी थीं।
उन्होंने चलते-चलते रास्ते में शेर राजा बब्बू से पूछा तो उन्होंने कहा, ”आपने ठीक सुना है महाराज! वास्तव में फूलों की घाटी है ही इतनी सुंदर कि इसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। हम लोगों ने भी अपने पुरखों से सुना है कि यह फूलों की घाटी हजारों साल पुरानी है और इसकी सुंदर ऐसी ही अछूती है। सुना है कि पहले धरती पर वनदेवता रहा करते थे, तो उनका यही निवास था। उन्होंने अपने घर को मानो फूलों का घर बना लिया था और वही फूलों का घर यानी फूलों की घाटी मातुंगा जंगल का गौरव है और सारी धरती से यात्री और सैलानी यहाँ घूमने के लिए आते हैं।’’
सुनकर राजा हक्कू शाह मुस्कराते हुए बोले, ”अच्छा, तब तो इस फूलों की घाटी को देखकर मैं भी अपने आपको थोड़ा धन्य कर लूँ।’’
बातें करते-करते थोड़ी ही देर में वे मालिनी नदी के किनारे पर फैली फूलों की घाटी के प्रवेश-द्वार पर आ गए। सुगंधित हवा के झकोरों ने जैसे दूर ही घोषणा कर दी कि यही है फूलों की घाटी, यही!
राजा ने कुछ सोचते हुए कहा, ”हवाओं में कमल की सुगंध भी महसूस होती है। क्या यहाँ पास ही कमल सरोवर भी है?’’
शेर राजा बब्बू ने कहा, ”हाँ महाराज, आपने ठीक सोचा। फूलों की घाटी के बीच एक विशाल तालाब है, जहाँ कमल ही कमल खिलते हैं। एक नजर में वहाँ हजारों कमल नजर आते हैं। वे पानी में इस तरह सिर उठाए हँसते-मुस्कराते नजर आते हैं मानो प्रकृति का स्वागत-गीत गा रहे हों।’’
राजा हक्कू शाह अपनी मंडली और शेर राजा बब्बू के साथ फूलों की घाटी में आगे बढ़े, तो वहाँ चारों तरफ रंग-रंग के फूलों की ऐसी बहार नजर आई कि वे चकरा गए। बार-बार वे बब्बू राजा से पूछते, ”आपको इनके नाम पता हैं?’’ और बब्बू राजा मुस्कराते हुए जब उन फूलों के नाम और विशेषताएँ बता देते तो राजा हक्कू शाह का चेहरा खिल उठता।
फिर चारों ओर मधुर आवाजों के साथ-साथ उड़ते-फुदकते रंग-रंग के पक्षी भी फूलों की घाटी की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। राजा हक्कू शाह कुछ और आगे आ गए, तो सामने दिखाई दिया ‘हाथी द्वार’  जहाँ सात हाथियों ने आगे बढ़कर अपनी सूँड़ में पकड़ी हुई फूलों की मालाएँ राजा हक्कू शाह को पहनाईं।
कुछ आगे गए तो हृदय द्वार आया। यह फूलों की घाटी का सबसे अछूता हिस्सा था। यहाँ ऐसे अनोखे फूल थे कि राजा हक्कू शाह ने उनकी पहले कभी झलक तक नहीं देखी थी, उनके बारे में कभी सुना भी नहीं था। फूलों की घाटी का सबसे सुंदर दृश्य यहाँ नजर आ रहा था। तभी फूलों का मुकुट पहने हुए एक व्यक्ति आगे बढ़ा और राजा को तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूलों से बना अद्भुत गुलदस्ता भेंट किया। राजा हक्कू शाह हैरान। उन्हें लगा, कहीं यह वनदेवता तो नहीं? पर बब्बू राजा ने बताया, ”यह रामलु काका हैं। बचपन से ही हम इन्हें देखते आ रहे हैं। यहीं रहते हैं। फूलों की दुनिया का आनंद लेते हैं और इन्हें एक-एक फूल के बारे में पता है।’’
राजा हक्कू शाह कुछ आगे गए तो कमल सरोवर नजर आया, जिसमें हल्के गुलाबी रंगों के फूलों की ऐसी अपार छवियाँ नजर आईं कि राजा को लगा, पैर यहाँ से हिलना ही नहीं चाहते। पास ही श्वेात कुमुदनी के फूल थे। राजा कुछ और आगे गए, तो फूलों के सात द्वार आए, जहाँ सुंदर पुष्पित लताएँ खुद-ब-खुद प्रवेश-द्वार जैसी बन गई थीं।
राजा बब्बू शाह को लगा, जैसे बस वे हमेशा-हमेशा के लिए यहीं रह जाएँ, यहाँ से कहीं और न जाएँ। उन्हें थोड़ी सी लज्जा भी आई। सारी दुनिया उन्हें घुम्मी घुम्मा राज्य का राजा कहती है जिसकी शान मातुंगा जंगल की वजह से ही है। और मातुंगा जंगल उनकी राजधानी टमटमपुर से कोई ज्यादा दूर भी नहीं है। फिर भी उन्होंने आज तक कभी इसे पास आकर फुर्सत से देखा ही नहीं।
उन्होंने बब्बू राजा से मन की बात कही, तो वे हँसकर बोले, ”कोई बात नहीं महाराज, पर अब आपकी आँखों से सारी दुनिया इसे देखेगी।’’
राजा हक्कू शाह के साथ-साथ कमालदास भी चल रहा था। राजा ने कमालदास से कहा, ”सुनो कमालदास, तुम मातुंगा जंगल पर जल्दी ही एक किताब लिखो। अद्वितीय होनी चाहिए वह किताब। उसमें यहाँ का रोचक वर्णन हो और यहाँ के सुंदर दृश्यों के लाजवाब फोटो भी।’’
कमालदास ने हँसकर कहा, ”ठीक है महाराज। यहाँ से लौटते ही, मैं इसी काम में जुट जाऊँगा।’’
राजा हक्कू शाह फूलों की घाटी से लौटे तो बार-बार एक ही बात कह रहे थे हमें यूनेस्को में इस फूलों की घाटी का विवरण भेजना चाहिए। कमालदास की किताब पूरी हो तो उसे भी साथ ही भेज देंगे। मातुंगा जंगल को और सुंदर बनाने के लिए हम कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे, ताकि दुनिया का सरताज बने हमारा प्यारा मातुंगा जंगल!
(मातुंगा जंगल की 51 अचरज भरी कहानियाँ से साभार)