Tag: pragatisheel lekhak sangh

प्रलेस का पन्द्रहवां राष्ट्रीय अधिवेशन 12 से

नई दिल्ली : प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन 12 अप्रैल, 2012  से दिल्ली में होने जा रहा है।  समूचे देश के विभिन्न प्रान्तों से अलग-अलग भाषाओं के लगभग 300 प्रतिनिधि लेखक इस अधिवेशन में  शरीक होंगे। 14 अप्रैल तक चलने वाला यह अधिवेशन दिल्ली विश्‍वविद्यालय के कांफ्रेंस सेंटर (आर्ट्स फैकल्टी के पास) में  आयोजित किया जा रहा है।

शीर्ष  आलोचक   डॉक्‍टर  नामवर  सिंह  की  अध्यक्षता  में  होने  जा  रहे  इस  अधिवेशन  का  उद्घाटन  आन्दोलनकारी   विचारक  डॉक्‍टर  असग़र  अली  इंजिनियर  के  हाथों  12  अप्रैल  सुबह  दस  बजे  किया  जायेगा। मुख्य  अतिथि  के  तौर  पर  डॉ.  इरफ़ान हबीब,  एजाज़  अहमद  शरीक  हो  रहे हैं।

प्रलेस  के कार्यकारी महासचिव डॉक्‍टर अली जावेद ने बताया कि प्रलेस के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित इस अधिवेशन में प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन में अपनी एकजुटता दर्शाने के लिये पाकिस्तान प्रगतिशील लेखक संघ, इजिप्शियन राइटर्स यूनियन के प्रतिनिधि अन्य देशों के तरक्की पसंद साहित्यकार भी भाग ले रहे हैं।

उल्लेखनीय है  कि‍  यह  सम्मलेन  फैज़ अहमद फैज़,  मजाज़,  शमशेर बहादुर सिंह,  केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन,  सुहैल अजीमाबादी,  अली सरदार जाफरी व  मंटो  जैसे  तरक्की पसंद साहित्यकारों  के  शताब्दीस्मरण  और  हाल  में  दिवंगत  हुये  प्रलेस  के  राष्ट्रीय  महासचिव  डॉक्‍टर  कमला  प्रसाद  के  स्मरण  को  समर्पित है।  अधिवेशन  में  फैज़  पर  एक  नाटक  तथा  मुशायरे  व कवि गोष्ठी का आयोजन भी किया जायेगा।

चन्द्रबली सिंह के रूप में प्रेरणा स्रोत खो दिया

नई दिल्ली : हिन्दी के सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, संगठनकर्ता और विश्व कविता के श्रेष्टतम अनुवादकों में शुमार कामरेड चन्द्रबली सिंह का 23 मई को  87 वर्ष की आयु में बनारस में निधन हो गया।  चन्द्रबली जी का जाना एक ऐसे कर्मठ वाम बुद्धिजीवी का जाना है जो मार्क्सवादी सांस्कृतिक आन्दोलन के हर हिस्से में बराबर  समादृत और प्रेरणा का स्रोत रह।
चन्द्रबली जी रामविलास शर्मा, त्रिलोचन शास्त्री  की पीढी़ से लेकर प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों की  युवतम पीढी़  के साथ चलने की कुव्वत रखते थे। वे जनवादी लेखक संघ के संस्‍थापक महासचिव और बाद में अध्यक्ष रहे।  उससे पहले तक वे प्रगतिशील लेखक संघ के महत्वपुर्ण स्तम्भ  थे। जन संस्‍कृति मंच के साथ उनके आत्‍मीय संबंध ताजिन्‍दगी रहे। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद राष्ट्रीय एकता अभियान के तहत सांस्कृतिक संगठनों के साझा अभियान की कमान बनारस में उन्हीं के हाथ थी और इस  दौर में उनके और  हमारे संगठन के  बीच जो आत्मीय रिश्ता  कायम हुआ, वह सदैव ही चलता रहा। उनके साक्षात्‍कार ‘समकालीन जनमत’ में प्रकाशित हुए। चन्‍द्रबली जी वाम सास्‍कृतिक आंदोलन के समन्‍वय के प्रखर समर्थक रहे।
चन्द्रबली जी ने मार्क्सवादी सांस्कृतिक  आन्दोलन के भीतर की बहसों के  उन्नत रूप और स्तर के लिए  हरदम ही संघर्ष किया। ‘नई चेतना’ 1951 में उनका लेख छपा था- ‘साहितय का संयुक्‍त मोर्चा’। ( बाद में वह ‘आलोचना का  जनपक्ष’ पुस्तक में संकलित भी हुआ। चन्‍द्रबली जी ने इस लेख में लिखा, ‘सबसे अधिक निर्लिप्त और उद्देश्यपूर्ण आलोचना आत्‍मालोचना कम्‍यूनिस्‍ट- लेखकों और आलोचकों की और से आनी चाहिए। उन्‍हें अपने भटकावों को स्‍वीकार करने में किसी प्रकार की झेंप या भीरुता नहीं दिखलानी चाहिए,  क्योंकि  जागरूक क्रांतिकारी की यह सबसे बड़ी पहचान है कि वह आम जनता को अपने साथ  लेकर चलता है और वह यह जानता है कि दूसरों की आलोचना के साथ-साथ जब तक वह  अपनी भी आलोचना नहीं करता, तब  तक वह न सिर्फ जनता को ही साथ न ले सकेगा, वरन स्वयं भी वह अपने लिए सही मार्ग का निर्धारण नहीं करा पाएगा। दूसरों की आलोचना में भी चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं,  क्योंकि चापलूसी उन्हें कुछ  समय तक धोखा दे सकती है,  किन्तु उन्हें सुधार नहीं सकती। मैत्रीपूर्ण आलोचना का यह अर्थ नहीं कि हम दूसरों की गलतियों को जानते हुए भी छिपाकर रखें। आत्‍मालोचना के स्‍तर और रूप की यही विशेषता- मार्क्‍सवादी आलोचना होनी चाहिए कि हम उसके सहारे आगे बढ़ सकें।’ आज से 60 साल पहले लिखे गए इस लेख में आपस में और मित्रों के साथ पालेमिक्स  के रूप,  स्तर और उद्देश्य  की जो प्रस्तावना  है, वह आज और भी ज़्यादा  प्रासंगिक है। उन्‍होंने अपने परम मित्र और साथी रामविलास शर्मा के साथ अपने लेखों में जो बहसें की हैं, वे स्वयं उनके बनाए निकष का प्रमाण हैं।
उनकी आलोचना की दोनों ही पुस्तकें ‘आलोचना का जनपक्ष’  तथा ‘लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य’  दस्तावेजी महत्त्व की हैं। इनमें हिंदी साहित्‍य और संस्‍कृति के प्रगतिशील अध्याय के तमाम उतार-चढ़ाव- बहसों और उप‍लब्धियों की झांकी ही नहीं मिलती,  बल्कि आज के संस्कृतिकर्मी  और अध्येता के लिए इनमें तमाम अंतर्दृष्टिपूर्ण सूत्र बिखरे पड़े हैं।
पाब्लो नेरूदा, नाजिम हिकमत, वाल्ट व्हिटमैन और एमिली डिकिन्सन की कविताओं के उनके अनुवाद उच्च  कोटि की काव्यात्मक संवेदना,  चयन दृष्टि और सांस्कृतिक अनुवाद के प्रमाण हैं। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ब्रेख्त, मायकोवस्की और तमाम अन्य कवियों के उनके अप्रकाशित अनुवाद और दूसरी  सामग्रियां जल्द ही प्रकाशित होंगी।
जन संस्कृति मंच  वाम सांस्कृतिक आन्दोलन की अनूठी शख्सियत साथी चन्द्रबली सिंह को लाल सलाम पेश  करता है और शोकसंतप्त परिजन,  मित्रों,  साथियों के प्रति हार्दिक संवेदना प्रकट करता है।
प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

कमला प्रसाद को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

नई दिल्ली :आज सुबह (25 मार्च) ही हम सब प्रो. कमला प्रसाद के असामयिक निधन का समाचार सुन अवसन्न रह गए। रक्त कैंसर यों तो भयानक मर्ज़  है, लेकिन फिर भी आज की तारीख में वह लाइलाज नहीं रह गया है। ऐसे में यह  उम्मीद तो बिलकुल  ही नहीं थी कि कमला जी को इतनी जल्दी खो देंगे। उन्हें चाहने वाले, मित्र, परिजन और सबसे बढ़कर प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन की यह भारी क्षति है। इतने लम्बे समय तक उस प्रगतिशील आंदोलन का बतौर महासचिव नेतृत्व करना जिसकी नींव सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद, मुल्कराज आनंद, फैज़ सरीखे अदीबों ने डाली थी, अपन आप में उनकी प्रतिबद्धता और संगठन क्षमता के बारे में बहुत कुछ  बयान करता है।
14 फरवरी, 1938 को सतना में जन्में कमला प्रसाद  ने 70 के दशक में ज्ञानरंजन के साथ मिलकर ‘पहल’ का सम्पादन किया, फिर 90 के दशक से  वे ‘प्रगतिशील वसुधा’ के मृत्युपर्यंत सम्पादक रहे। दोनों ही पत्रिकाओं के कई  अनमोल अंकों का श्रेय उन्हें जाता है। कमला प्रसाद जी ने  पिछली सदी के उस अंतिम दशक में भी प्रलेस का सजग नेतृत्व किया जब सोवियत विघटन हो चुका था और समाजवाद को पूरी दुनिया में अप्रासंगिक करार  देने की मुहिम चली हुई थी। उन दिनों दुनिया भर में कई तपे तपाए अदीब भी मार्क्सवाद का खेमा छोड़ अपनी राह ले रहे थे। ऐसे कठिन समय में प्रगतिशील आन्दोलन की मशाल थामें रहनेवाले कमला प्रसाद को आज अपने बीच न पाकर एक शून्य महसूस हो रहा है। कमला जी की अपनी मुख्य कार्यस्थली मध्य प्रदेश थी। मध्य प्रदेष कभी भी वाम आन्दोलन का मुख्य केंद्र नहीं रहा। ऐसी जगह नीचे से एक प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन को खडा करना मामूली बात न थी। ये कमला जी की सलाहियत थी कि ये काम भी अंजाम पा सका। निस्संदेह  हरिशंकर परसाई जैसे अग्रजों  का प्रोत्साहन और मुक्तिबोध जैसों की विरासत ने उनका रास्ता प्रशस्त किया, लेकिन यह आसान फिर भी न रहा होगा।
कमला जी को सबसे काम लेना आता था, अनावश्यक आरोपों का जवाब  देते  उन्हें शायद ही कभी देखा गया हो। जन  संस्कृति मंच के पिछले दो सम्मेलनों  में उनके विस्तृत सन्देश पढ़े गए और दोनों बार प्रलेस के प्रतिनिधियों को  हमारे आग्रह पर सम्मेलन संबोधित करने के लिए उन्होनें भेजा। वे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के बीच साझा कार्रवाइयों की  संभावना तलाशने के प्रति सदैव खुलापन  प्रदर्शित करते रहे और अनेक बार इस सिलसिले में हमारी उनसे बातें हुईं। इस वर्ष कई कार्यक्रमों के बारे में  मोटी रूपरेखा पर भी उनसे विचार विमर्ष हुआ था जो उनके अचानक बीमार पड़ने से  बाधित हुआ। संगठनकर्ता के सम्मुख उन्होंने अपनी आलोचकीय और वैदुषिक  क्षमता,  अकादमिक प्रशासन में अपनी दक्षता को उतनी तरजीह नहीं दी। लेकिन इन  रूपों में भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मध्यप्रदेश कला परिषद और केन्द्रीय हिंदी संस्थान जैसे शासकीय निकायों में काम करते हुए भी वे  लगातार प्रलेस के अपने सांगठनिक  दायित्व को ही प्राथमिकता में रखते रहे।  उनका स्नेहिल स्वभाव, सहज व्यवहार सभी को आकर्षित करता था। उनका जाना सिर्फ प्रलेस, उनके परिजनों और मित्रों के लिए  ही नहीं,  बल्कि समूचे वाम-लोकतांत्रिक  सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए भारी झटका है। जन संस्कृति मंच .प्रो. कमला प्रसाद को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित  करता है। हम  चाहेंगे कि वाम आन्दोलन की सर्वोत्तम परम्पराओं को विकसित करनेवाले संस्कृतिकर्मी इस शोक को शक्ति में बदलेंगे और उन तमाम कामों को मंजिल तक  पहुचाएँगे जिनके लिए कमला जी ने जीवन पर्यंत कर्मठतापूर्वक अपने दायित्व का  निर्वाह किया।
- प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

प्रगतिशील लेखक आन्दोलन: जड़ों की पहचान : शैलेश ज़ैदी

भारत में प्रगति‍शील लेखक संघ की स्‍थापना और उद्देश्‍य, हि‍न्‍दी-उर्दू लेखकों का नजरि‍या, प्रेमचन्‍द की भूमि‍का, संघ का महत्‍व और प्रगति‍शील लेखक आन्‍दोलन के अवसान का वि‍श्‍लेषण करता मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालय के पूर्व हिंदी वि‍भागाध्‍यक्ष प्रोफेसर शैलेश जैदी का आलेख-

पृष्ठभूमि

1917 की रूसी क्रांति और उस क्रांति की सफलता भारतीय जनमानस को साम्यवाद और जन सरकार का स्वप्न देखने के लिए प्रेरित करने लगी थी। इस प्रेरणा के लिए यहाँ के राजनीतिक वातावरण में एक चिंगारी और कुछ-कुछ सुलगती आग पहले से मौजूद थी। 1908 में तिलक की गिरफ्तारी के बाद मुम्बई की सूती मिलों के मजदूरों ने ऐसी शानदार हड़ताल की थी कि लेनिन ने उसका स्वागत करते हुए कहा था- “यह हड़ताल इस तथ्य का संकेत करती है कि भविष्य के इतिहास में सर्वहारा वर्ग की कितनी बड़ी भूमिका होगी।” और हुआ भी ऐसा ही। 1911-12 तक अकेले बंगाल के न्यायलय में दर्ज राजनीतिक मुक़दमों की संख्या पांच सौ से ऊपर थी। इसमें मजदूर वर्ग की भूमिका किसी से कम नहीं थी। फिर 1918 में विश्‍व युद्ध के समाप्त होते ही जहाँ एक ओर महात्मा गाँधी वाइसराय को बधाई की चिट्ठी भेज रहे थे,  वहीं दिसम्बर 1918 तक सम्पूर्ण देश मजदूर हड़ताल की लपेट में आ चुका था। जनवरी, 1919 की हड़ताल में सवा लाख मज़दूर शरीक हुए और 1920 ई  के पूर्वार्ध में दो सौ हड़तालें हुईं जिनमें पन्द्रह लाख मज़दूरों ने भाग लिया।
यह स्थिति केवल सूत मिलों में काम करने वाले मज़दूरों की ही नहीं थी। यह स्थिति उनकी भी थी जो साहित्य की मिलों में वैचारिकता के सूत से रचनाओं के वस्त्र बुन रहे थे और उन वस्त्रों में जनता की रुचि और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप डिज़ाइन डालना चाहते थे। ऐसे डिज़ाइन जिनमें आम इनसान की ज़िंदगी मुखर हो उठे। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि रूसी क्रांति ने इक़बाल को झंझोड़ा, प्रेमचंद को उकसाया और हसरत मोहानी को आंदोलित किया। इकबाल ने एक क्रांतिकारी स्वर अख्तियार करते हुए सम्पूर्ण देश के मजदूरों को एक जुट होने की प्रेरणा दी। प्रेमचंद ने बाल्शेविक सिद्धांतों के पक्षधर होने की घोषणा की। हसरत मोहानी ने कम्युनिस्ट विचारों का न केवल स्वागत किया, बल्कि उसकी सभाओं की अध्यक्षता भी की और कम्युनिस्ट कहलाने में गर्व महसूस किया।
महात्मा गांधी ने पूर्ण स्वाधीनता की दिशा में किए जाने वाले संघर्ष को कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में जब एक वर्ष के लिए मुल्तवी कर दिया तो एक खलबली मच गई। मजदूरों और किसानों ने कांग्रेस के निर्णय के विरुद्ध ज़बरदस्त प्रदर्शन किए। स्वतंत्र साम्यवादी प्रजातांत्रिक भारत के नारे लगाए और दो घंटे तक कांग्रेस के पंडाल को अपने अधिकार में लिये रहे। अंत में नरम दल को उनकी मांग पर विचार करना पड़ा और इसका फल यह निकला कि वर्ष 1929  के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण आज़ादी का प्रस्ताव पास किया गया। ध्यान देने की बात यह है कि पूर्ण आज़ादी का ऐसा ही एक प्रस्ताव कभी एक लेखक और रचनाकार हसरत मोहानी ने भी रखा था जो अनुकूल वातावरण न होने के कारण उस समय हास्यास्पद समझा गया था और बकौल प्रेमचंद “वे अपने गुरु (तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी का डंका बजाया जब कांग्रेस का गर्म-से-गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते काँपता था।”  सच तो यह है कि भारत के उर्दू लेखकों में इंक़लाब, बगावत और साम्यवाद की जो चेतना सिर उभार रही थी, हिन्दी लेखाकों में उसका लगभग अभाव था।
इसका एक कारण यह था कि खिलाफत आन्दोलन जिन दिनों उत्कर्ष पर था, खिलाफत कमेटी की एक बैठक में निर्णय लिया गया कि अपना प्रतिरोध प्रदर्शित करने की नीयत से मुसलमान बड़ी संख्या में भारत छोड़कर तुर्की, अफगानिस्तान, ताशकंद आदि देशों में चले जायें। फलस्वरूप बहुत से लोगों ने प्रवासी के रूप में रूस की सर्हदों के निकट शरण ली। इनमें से अनेक लोग साम्यवाद से प्रभावित हुए और उन्होंने इस हथियार का प्रयोग भारत की अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध करना ज़रूरी समझा। इन लोगों ने भारत लौटकर गुप्त रूप से साम्यवाद का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। अनेक लोग पकड़े गए और उनके विरुद्ध कम्युनिस्ट बगावत का सबसे पहला मुक़दमा रावलपिंडी में चला। आगे चलकर वर्ष 1923 में कुछ नवयुवकों को कम्युनिस्ट होने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया और कानपुर में मुक़दमा चलाकर उन्हें कड़े दंड दिए गए। कुछ अन्य समाजवादी विचारधारा के लोग मजदूरों के दल में इस प्रकार घुल-मिल गए कि उनका पहचानना कठिन हो गया। इस प्रकार कानून से सुरक्षित रहकर वे अपने विचारों को जनता के बीच फैलाने में सफल हुए। (प्रगतिशील लेखक संघ के प्रमुख पत्र ‘नया अदब’, जनवरी-मार्च 1940,  में प्रकाशित प्रो. एजाज़ हुसैन का आलेख).
साम्यवाद का प्रभाव तेज़ी से बढ़ता रहा। किंतु इसमें तीव्रता उस समय आई जब पंडित जवाहर लाल नेहरू रूस के हालात और समाजवादी विचारों का अध्ययन करके भारत लौटे। उन्होंने जिस वैज्ञानिक समाजवाद की आवश्यकता पर बल दिया उसकी ओर प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग विशेष रूप से आकृष्ट हुआ। हिंदू महासभा और हिंदू सोशल लीग ने पंडित जी के समाजवादी विचारों का कड़ा विरोध किया,  फिर भी कांग्रेस के भीतर सोशलिस्ट विचारधारा पनपती रही और वर्ष 1935  में कांग्रेस के नेतृत्व में ही एक दल ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ के नाम से बना। फिर 1936 के प्रारम्भ में कांग्रेस के ही संरक्षण में विद्यार्थियों के संगठन ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन’ की स्थापना हुई जिसके पहले सभापति मुहम्मद अली जिन्ना निर्वाचित हुए। यह संगठन अपने जन्मकाल से ही साम्यवादी दृष्टिकोण के प्रति आस्थावान था।
जहाँ राजनीतिक चिंतन क्षेत्र में तेज़ी के साथ समाजवादी विचारधारा अपना स्थान बना रही थी, वहीं साहित्य के क्षितिज पर ऐसे-ऐसे रंग स्पष्ट रूप से उभरने लगे थे जो प्रेमचंद के इस कथन की पुष्टि कर रहे थे कि ‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।”  1932 में कुछ नए युवक साहित्यकारों ने अपनी कहानियो का संग्रह ‘अंगारे’ प्रकाशित किया। फिर क्या था, इन्क़लाबी और प्रतिरोधी विचारों का एक तूफ़ान फट पड़ा। संग्रह ज़ब्त कर लिया गया और उसके लेखकों अर्थात सज्जाद ज़हीर, अहमद अली, रशीद जहाँ और महमूदुज्ज़फर में अभिव्यक्ति के नए माध्यमों को पा लेने की बेचैनी और बढ़ गई। इकबाल, हसरत मोहानी और मुहम्मद अली जौहर की काव्य रचनाओं की गूँज फ़िज़ा में पहले से मौजूद थी- ‘उटठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो’, ‘कब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीना,’ ‘जिसमें न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगी,’ ‘ जिसको तू ज़ेवर समझता है वही ज़ंजीर है, ” दहका हुआ है आतिशे-गुल से चमन तमाम।”  ‘अंगारे’ ने इस गूँज को अपने ढंग से नए शब्द दिए, यह और बात है कि इन शब्दों में अपरिपक्वता थी, जवानी का उबाल था और सरकशी के तेवर थे।
हिंदी में स्थिति इसके सर्वथा विपरीत थी। दिनकर, राम नरेश त्रिपाठी, निराला, प्रसाद, पन्त सभी नर्म दलीय नीति अपनाए हुए थे। हाँ, प्रेमचंद की प्रगतिशील चेतना इस स्थिति को देख कर भीतर ही भीतर छटपटा रही थी। 27 फरवरी, 1936 को उन्होंने उर्दू के प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक अख्तर हुसैन रायपूरी को लिखा था, “अगर बच गया तो ‘बीसवीं सदी’ नाम का रिसाला अपने लोगों के ख़यालात की इशाअत के लिए ज़रूर निकालूँगा। ‘हंस’ जिस लिटरेचर की इशाअत कर रहा था वह हमारा लिटरेचर नहीं है, वह तो भक्ति वाला महाजनी लिटरेचर है जो हिन्दी ज़बान में काफ़ी है। ” यही बात आगे चलकर अगस्त, 1936 में सार रूप में आनंद राव को लिखी गई, “अगर अच्छा हो गया तो यहाँ से अपना एक नया पत्र प्रगति‍शील लेखक संघ की विचारधारा के अनुसार निकालूँगा। रायपूरी वाली चिट्ठी में ‘अपने लोगों’ और ‘हमारा लिटरेचर’ जैसे शब्दों का भावार्थ राव वाली चिट्ठी से स्पष्ट हो जाता है।
अख्तर हुसैन रायपूरी 1935 में प्रकाशित ‘साहित्य और ज़िंदगी’ शीर्षक अपने लेख से प्रगतिशील लेखकों के बीच काफी चर्चा में आ चुके थे। उन्होंने इस आलेख में समयुगीन लेखकों को ज़बरदस्त चुनौती देते हुए लिखा था, “क्या तुम लेखक बनने की इच्छा रखते हो? तो अपने देश के दुखों और पीड़ाओं की कथा पर दृष्टि डालो और इसके बाद यदि तुम्हारा दिल खून नहीं हो जाता तो अपने कलम को फ़ेंक दो। उस कलम की उपयोगिता केवल यह है कि तुम्हारे चेतना-शून्य हृदय की अपवित्रता को उद्घाटि‍त करता रहे।”
प्रेमचंद हिन्दी के एक मात्र ऐसे लेखक थे जो प्रगतिशील विचारधारा के साथ एकस्वर थे।  कुछ लोग इस सन्दर्भ में निराला का नाम भी लेते हैं, किंतु जहाँ निराला ‘भिक्षु’ शीर्षक कविता में एक संक्रमणशील प्रभाव का संकेत करते हैं वहीं बकौल शिवदान सिंह चौहान, ‘‘अन्य अनेक रचनाओं में पुनरुत्थानवादी दृष्टिकोण की वकालत करते हुए मध्ययुगीन हिन्दुओं की अकर्मण्यता,  विश्वासघात और पुन्सत्वहीनता पर विलाप करते हैं।” कदाचित यही सब देख कर प्रेमचंद ने 18  मार्च, 1936 को बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखा था, “उर्दू वालों की साहित्यिक रुचि और अंतर्दृष्टि ज़्यादा अच्छी है। वे मूल्यांकन करना जानते हैं। उनके यहाँ कविता में वही संघर्ष मिलता है जो हमें जीवन में मिलता है। हिन्दी कविता अब भी व्यक्तिवादी और निरी भावुकतापूर्ण होती है। उसमें ज़िंदगी की हरकत नहीं है। वह ज़िंदगी को उजागर नहीं करती। वह बस हताश निराश बना देती है। मैं समझ नहीं पाता कि क्यों हमारे सब कवि निराशा के दर्शन में इस तरह अभिभूत हैं। उर्दू कवि दार्शनिक है, यथार्थवादी है और आशावादी है। आधे दर्जन कवि हथौड़ा मार-मार कर मुस्लिम जाति को समता और भ्रातृत्व और जनतंत्र के नए आदर्शों में ढाल रहे हैं। मुस्लिम कवि कम्युनिस्ट होता है, यहाँ तक कि इकबाल भी।”
एक बात निश्‍चि‍त है कि उर्दू के सारे कवि भले ही कम्युनिस्ट न होते हों, किंतु युवा पीढ़ी के वे सिरफिरे लेखक निश्‍चि‍त रूप से कम्युनिस्ट थे जो 1935 में लन्दन के ‘नॉनकिंग रेस्तरां’ में बैठे हुए एक प्रगतिशील संगठन की बुनियाद रखने के लिए उसका घोषणापत्र तैयार कर रहे थे। इन युवा लेखकों के नाम थे- सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद, ज्योति घोष, प्रमोद्सेन गुप्ता और मुहम्मद दीन तासीर और संगठन का नाम पड़ा- ‘इंडियन प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन’।  सज्जाद ज़हीर ने संगठन के अस्तित्व में आने के पूर्व की अपनी जिस मनःस्थिति का विवरण अपनी पुस्तक ‘यादें’ में दिया है, उसका कुछ अंश देखने योग्य है-
“हमको लंदन और पेरिस में जर्मनी से भागे, निकाले हुए मुसीबत के मारे लोग रोज़ मिलते थे। फ़ासिज़्म के अत्याचार की दर्द भरी कहानियाँ हर तरफ़ सुनाई पड़तीं। जर्मनी में स्वाधीनता प्रेमियों और कम्युनिस्टों को पूंजीवादियों के गुंडे तरह-तरह की शारीरिक यातनाएं पहुँचा रहे थे। वह भयानक तस्वीरें जिनमें जनता के प्रिय नेताओं की पीठ और कूल्हे कोड़ों के निशान से काले पड़े हुए दिखाई देते,  वह दहशतनाक घटनाएं जो समय-समय पर अखबारों में छपतीं,  उन सबने हमारे दिलो-दिमाग़ की आतंरिक शांति और संतोष को मिटा दिया था। फलस्वरूप हम धीरे-धीरे समाजवाद की ओर झुकते जा रहे थे। मार्क्स और दूसरे साम्यवादी लेखकों की पुस्तकें हमने बड़े ध्यान से पढ़ना शुरू कीं। जैसे-जैसे हम अपने अध्ययन को बढ़ाते, हमारे दिमाग़ रौशन होते और हमारे मन को शांति मिलती।”
संगठन के बनते ही उसकी पाक्षिक गोष्ठियाँ होने लगीं। एक गोष्ठी में डॉ. सुनीति कुमार चेटरजी ने भी भाग लिया। ज्योति घोष ने नज़रुल इस्लाम की इन्क़लाबी कविता पर लेख पढ़ा। मुल्कराज आनंद की कहानी ‘द ट्रोवर्स्ट’ और सज्जाद ज़हीर का नाटक ‘बीमार’ इन्हीं दिनों लिखा गया। अभी कुछ ही दिन बीते थे कि जुलाई, 1935 में ‘वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ़ द राइटर्स फार द डिफेन्स ऑफ़ कल्चर’ के नाम से हेनरी बार्बस में मैक्सिम गोर्की, रोमें रोलां, टामस मान इत्यादि ने विश्‍व के साहित्यकारों की एक कांग्रेस पेरिस में बुलाई। इस अवसर पर साहित्यकारों के नाम जो अपील प्रकाशित कराई गई उसका एक उद्धरण यहाँ देना अनुपयुक्त न होगा-
“लेखक मित्रो! हमारी क़लम,  हमारी कला,  हमारा ज्ञान उन शक्तियों के विरुद्ध रुकने न पाये जो मौत को निमंत्रण देती हैं, जो मानवता का गला घोटती हैं, जो रूपये के बल पर शासन करती हैं, और अंत में फ़ासिज़्म के विभिन्न रूप धारकर सामने आती हैं और अबोध जनता का खून चूसती हैं।”
लंदन के भारतीय युवा लेखक वैचारिक स्तर पर इस कांग्रेस से बहुत निकट से जुड़े हुए थे। सज्जाद ज़हीर, राल्फ फाक्स और लुई आर्गावां जैसे साहित्यकारों के सम्पर्क से बहुत कुछ सीख रहे थे। प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र में आर्गावां जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार के भी सुझाव सम्मिलित थे। फलस्वरूप इस घोषणा-पत्र की प्रतियाँ अनेक प्रगतिशील मित्रों को मुल्कराज आनंद, सज्जाद ज़हीर, के.एस. भट्ट, ज्योति घोष, एस. सिन्हा तथा एम्.डी. तासीर के साथ भारत भेजी गयीं। प्रेमचंद ने इस मेनिफेस्टो को ‘हंस’ के जनवरी, 1936 अंक में प्रकाशित किया।

भारत में प्रगतिशील लेखक संगठन की स्थापना

1935 के अंत तक लंदन से अपनी शिक्षा समाप्त करके सज्जाद ज़हीर भारत लौटे। यहाँ आने से पूर्व वे अलीगढ़ में डॉ. अशरफ,  इलाहबाद में अहमद अली,  मुम्बई में कन्हैया लाल मुंशी,  बनारस में प्रेमचंद,  कलकत्ता में प्रो. हीरन मुखर्जी और अमृतसर में रशीद जहाँ को मेनिफेस्टो की प्रतियाँ भेज चुके थे। इलाहबाद पहुँचने से पहले उन्होंने कन्हैयालाल मुंशी से इस विषय पर बात करना ज़रूरी समझा, किंतु थोडी देर की ही बातचीत में सज्जाद ज़हीर किस निर्णय पर पहुंचे स्वयं उन्हीं से सुनिए-
“हमें यह स्पष्ट हो गया कि कन्हैयालाल मुंशी का और हमारा दृष्टिकोण मूलतः भिन्न था। हम प्राचीन दौर के अंधविश्‍वासों और धार्मिक साम्प्रदायिकता के ज़हरीले प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे। इसलिए कि वे साम्राज्यवाद और जागीरदारी की सैद्धांतिक बुनियादें हैं। हम अपने अतीत की गौरवपूर्ण संस्कृति से उसका मानव प्रेम, उसकी यथार्थ प्रियता और उसका सौन्दर्य तत्व लेने के पक्ष में थे, जबकि कन्हैयालाल मुंशी सोमनाथ के खंडहरों को दुबारा खड़ा करने की कोशिश में थे।”
इलाहाबाद पहुंचकर सज्जाद ज़हीर अहमद अली से मिले जो विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रवक्ता थे। अहमद अली ने उन्हें प्रो. एजाज़ हुसैन,  रघुपति सहाय फिराक,  एहतिशाम हुसैन तथा विकार अजीम से मिलवाया। सबने सज्जाद ज़हीर का ज़बरदस्त समर्थन किया । शिवदान सिंह चौहान और नरेन्द्र शर्मा ने भी सहयोग का आश्‍वासन दिया। प्रो. ताराचंद और अमरनाथ झा से स्नेहपूर्ण प्रोत्साहन मिला। सौभाग्य से 12-14  जनवरी, 1936  को हिन्दुस्तानी एकेडमी का वार्षिक अधिवेशन हुआ। अनेक साहित्यकार यहाँ एकत्र हुए- सच्चिदानंद सिन्हा, डॉ. अब्दुल हक़, गंगा नाथ झा, जोश मलीहाबादी, प्रेमचंद, रशीद जहाँ, अब्दुस्सत्तार सिद्दीकी इत्यादि।
सज्जाद ज़हीर ने प्रेमचंद के साथ कुछ लोगों को अपने घर चाय पर आमंत्रित किया और प्रगतिशील संगठन के मेनिफेस्टो पर खुलकर बातचीत की। सभी ने मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर कर दिए। फिर क्या था, अहमद अली के घर को लेखक संगठन का कार्यालय बना दिया गया। पत्र-व्यव्हार की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। सज्जाद ज़हीर पंजाब के दौरे पर निकल पड़े। इस बीच अलीगढ़ में सज्जाद ज़हीर के मित्रों- डॉ. अशरफ,  अली सरदार जाफरी,  डॉ. अब्दुल अलीम, जाँनिसार अख्तर आदि ने स्थानीय प्रगतिशील लेखकों का एक जलसा ख्वाजा मंज़ूर अहमद के मकान पर फरवरी, 1936 में कर डाला। अलीगढ में उन दिनों साम्यवाद का बेहद ज़ोर था। वहां की अंजुमन के लगभग सभी सदस्य साम्यवादी थे और पार्टी के सक्रि‍य सदस्य भी।

प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन: लखनऊ 1936

देखते-देखते सम्पूर्ण देश में प्रगतिशील लेखक संगठन की शाखाएँ फैलने लगीं। किंतु संगठन के प्रति हिन्दी लेखकों के उत्साह में कोई गर्मी नहीं आई। 9-10 अप्रैल, 1936 को प्रेमचंद की अध्यक्षता में होने वाले लखनऊ अधिवेशन में हिन्दी लेखकों की कोई भूमिका नहीं थी। वे एक तटस्थ दर्शक मात्र थे। वह भी सभा में शामिल होकर नहीं, केवल घर बैठे-बैठे। रामविलास शर्मा और निराला दोनों ही उस समय लखनऊ में थे, किंतु सम्मेलन में कोई शरीक नहीं हुआ। प्रेमचंद, जैनेन्द्र को अपने साथ खींच ज़रूर ले गए, किंतु जैनेन्द्र की सोच संगठन की सोच से मेल नहीं खाती थी।  सज्जाद ज़हीर ने अपनी पुस्तक रोशनाई में जैनेन्द्र पर जो टिप्पणी की है वह देखने योग्य है। हाँ, प्रेमचंद का अध्यक्षीय भाषण जो उर्दू में लिखा और पढ़ा गया था आगे चलकर जब हिन्दी में रूपांतरित हुआ तो हिन्दी लेखकों की प्रेरणा का स्रोत अवश्य बन गया। लखनऊ अधिवेशन में कई आलेख पढ़े गए जिनमें अहमद अली,  रघुपति सहाय, मह्मूदुज्ज़फर और हीरन मुखर्जी के नाम उल्लेख्य हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और मद्रास के प्रतिनिधियों ने केवल भाषण दिए। प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण वक्तव्य हसरत मोहानी का था।
हसरत ने खुले शब्दों में साम्यवाद की वकालत करते हुए कहा, “हमारे साहित्य को स्वाधीनता आन्दोलन की सशक्त अभि‍व्‍यक्‍ति‍ करनी चाहिए और साम्राज्यवादी, अत्याचारी तथा आक्रामक पूंजीपतियों का विरोध करना चाहिए। उसे मजदूरों, किसानों और सम्पूर्ण पीड़ित जनता का पक्षधर होना चाहिए। उसमें जन सामान्य के दुःख-सुख, उनकी इच्छाओं-आकांक्षाओं को इस प्रकार व्यक्त करना चाहिए कि इससे उनकी इन्क़लाबी शक्तियों को बल मिले और वह एकजुट और संगठित होकर अपने संघर्ष को सफल बना सकें। केवल प्रगतिशीलता पर्याप्त नहीं है। नए साहित्य को समाजवाद और कम्युनिज्म का भी प्रचार करना चाहिए।”
अधिवेशन के दूसरे दिन संध्या की गोष्ठी में जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहर अली, इन्दुलाल याज्ञिक, कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि भी सम्मिलित हो गए थे। इस अवसर पर संगठन का एक संविधान भी स्वीकार किया गया और सज्जाद ज़हीर को संगठन का प्रधान मंत्री निर्वाचित किया गया।

विरोध के स्वर और संगठन का विस्तार

ब्रिटिश सरकार ने लखनऊ अधिवेशन में पारित प्रस्तावों को राजनीतिक ठहराया और लेखक संगठन के संकल्पों में खतरे की गंध महसूस की। कलकत्ता के अंग्रेज़ी अखबार ‘स्टेट्समैन’ ने संगठन के विरुद्ध जी भर कर ज़हर उगला। हिन्दी के लेखक वैसे भी किसी जोखिम में पड़ने से बचते थे । सरकार का कड़ा रुख देखकर और भी सतर्क हो गए। खतरों से दूर रहते हुए,  उपलब्धियों में यदि भागीदारी मिल जाय  तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।  स्थिति यह हो गई थी कि संगठन की छोटी-छोटी गोष्ठियों में भी खुफिया पुलिस के एजेंट जहाँ-तहाँ दिखाई दे जाते थे। प्रचार यह किया जा रहा था कि इस आन्दोलन के पीछे ‘कम्युनिस्ट इंटरनेशनल’ का हाथ है जो कुछ भारतीय कम्युनिस्ट छात्रों के माध्यम से यहाँ के बुद्धिजीवियों में अपना जाल बिछाना चाहता है। इन बातों का प्रभाव इस हद तक पड़ा कि इलाहाबाद की गोष्ठियाँ,  जो अमरनाथ झा के पुस्तकालय में होती थीं,  उनके संकेत पर वहां होना बंद हो गयीं। इतना ही नहीं, सज्जाद ज़हीर को अख़बार में यह भी बयान देना पड़ा कि संगठन के मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वालों में अमरनाथ झा का नाम भूल से छप गया है। फिर भी जो लोग संगठन के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, वे निरंतर सक्रिय रहे।
दिल्ली में संगठन की एक शाखा कायम हुई जिसके मंत्री अख्तर हुसैन रायपूरी घोषित किए गए। ’साकी’ के सम्पादक शाहिद अहमद ने ‘शाहजहाँ’ पत्रिका को संगठन की मुख्य आवाज़ बना दिया।  6 अगस्‍त, 1936 को दिल्ली शाखा ने गोर्की दिवस मनाया जिसमें डॉ  आबिद हुसैन, रामचंद्र वर्मा, अंसार नासिरी, लक्ष्मीचंद्र जैन, मुमताज़ हुसैन और शाहिद अहमद आदि ने भाग लिया। दिल्ली शाखा में पढ़े जाने वाले लेखों को पुस्तक रूप में भी प्रकाशित किया गया।
कानपुर शाखा की गोष्ठियाँ हसरत मोहानी की अध्यक्षता में निरंतर चलती रहीं। लाहौर में सूफी तबस्सुम, फैज़ अहमद फैज़ तथा प्रो. सोमनाथ क्रमशः मंत्री बने। पटना में प्रेमचंद के प्रभाव से जो शाखा अस्तित्व में आई उसके अध्यक्ष रामवृक्ष बेनीपुरी बनाये गए। 1 दिसम्बर, 1936 की प्रथम गोष्ठी में रघुवंश नारायण सिंह ने ‘हिन्दी साहित्य की ज़रूरतें’ शीर्षक लेख पढ़ा। संगठन के मंच से हिन्दी में पढ़ा जाने वाला यह पहला लेख था। कलकत्ता और आसाम में भी संगठन की अनेक शाखाएं बनीं। कलकत्ता के लोकप्रिय अख़बार ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’ में गोष्ठियों में दिये गए वक्तव्य मुख पृष्ठ पर छपते थे।  इस पत्र के संपादक सत्येन्द्रनाथ प्रगतिशील संगठन के सक्रिय सदस्य थे। 1 नवम्बर, 1936 को  लाहौर संगठन ने प्रेमचंद दिवस का आयोजन किया। इस अवसर पर आगा अब्दुलहमीद और इन्द्रनाथ मदान ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर अपने आलेख पढ़े। अंत में रशीद जहाँ ने प्रेमचंद के विशाल अद्भुत व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। फरवरी, 1937 तक लायलपूर और मुल्तान में भी संगठन की शाखाएँ स्थापित हो चुकी थीं।
वस्तुस्थिति यह थी कि जहाँ एक ओर प्रगतिशील लेखक संगठन की गतिविधियाँ ज़ोर पकड़ रही थीं, वहीं दूसरी ओर चूँकि कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबन्दी लगाई जा चुकी थी और प्रगतिशील लेखक संगठन साम्राज्य विरोधी माना जाने लगा था, अनेक ऐसे छात्र जो सरकारी मुक़ाबलों की परीक्षा में बैठ रहे थे, दूरदर्शिता से काम लेते हुए, संगठन की हवा के स्पर्श से भी बचने लगे। कुछ ऐसे लोग भी थे जो गोष्ठियों में तो आते थे, पर सदस्य बनना स्वीकार नहीं करते थे।  दबे-दबे स्वर में यह आवाज़ उठाई जाती थी कि प्रगतिशील संगठन एक साहित्यिक संस्था है, इसे राजनीति से अलग रहना चाहिए । यह रुझान अधिकतर हिन्दी लेखकों का था। वैसे भी बकौल रामबिलास शर्मा, “स्वाधीनता आन्दोलन के काल में जनता के जागरण में जो साहित्य की भूमिका है उसके प्रति हिन्दी में बहुत कुछ उपेक्षा का भाव रहा है।”  प्रेमचंद ने इस स्थिति को कुछ दूसरे ढंग से देखा था। उन्होंने 10 मई,  1936 के पत्र में सज्जाद ज़हीर को लिखा था, “हिन्दी वाले हीन-ग्रंथियों से मजबूर हैं। उनका कहीं ऐसा विचार तो नहीं है कि यह आन्दोलन उर्दू वालों ने उन्हें फंसाने के लिए चलाया है। अभी तक उनकी समझ में इसका मतलब ही नहीं आया है।” प्रेमचंद यह ‘मतलब’ बार-बार समझाने का प्रयास करते रहे और उन्होंने हिन्दी लेखकों की संस्था ‘हिन्दी लेखक संघ’ के सदस्यों का ध्यान भी प्रगतिशील लेखक संगठन के उद्देश्यों की ओर खींचना चाहा, किंतु उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। उर्दू लेखक जिस प्रकार पी. डब्ल्यू.ए. के बैनर के नीचे देश भर में अपने संगठन चला रहे थे, हिन्दी लेखक इस नाम से कतराने में ही अपनी भलाई देख रहे थे। प्रगतिवाद के सैद्धांतिक पक्ष पर उनमें बहसें ज़रूर होती थीं,  किंतु कार्य-क्षेत्र में उतर पाना उनके लिए सम्भव नहीं था। दूसरी ओर सज्जाद ज़हीर और उनके सहयोगियों को जिद थी कि जबतक उर्दू-हिन्दी लेखक एकजुट होकर काम नहीं करेंगे इस आन्दोलन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकेगी। उनका विश्‍वास था कि जिस आन्दोलन को प्रेमचंद,  डॉ. अब्दुल हक,  हसरत मोहानी, सरोजिनी नाइडू,  जोश मलीहाबादी, आचार्य नरेन्द्र देव, हीरन मुखर्जी,  डॉ.आबिद हुसैन जैसी जानी-मानी विभूतियों की सहानुभूति प्राप्त हो वह कभी शिथिल नहीं पड़ सकता।
उल्लेख्य बात यह थी कि प्रगतिशील लेखक संगठन के अधिकतर सक्रिय सदस्य कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, स्टूडेंट्स फेडरेशन, किसान सभा और मजदूर यूनियन में से किसी-न-किसी के सदस्य अवश्य थे। इसी बुनियाद पर संगठन के विरोधियों को जवाब देते हुए सज्जाद ज़हीर ने कहा था, “संगठन का मूल उद्देश्य प्रगतिशील साहित्य का सर्जन और प्रचार है, न कि राजनीतिक अमल। किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि प्रतिक्रियावादी शासकों की धमकियों और सख्तियों से डरकर प्रगतिशील साहित्यकार और उनका संगठन अपना स्वतंत्र राजनीतिक दृष्टिकोण रखना और उसे व्यक्त करना छोड़ दे या संगठन के ऐसे सदस्य जो राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता हैं और साहित्यकार होने के अतिरिक्त उनकी एक अन्य राजनीतिक हैसियत भी है, संगठन से अलग हो जाँयें?

अमृतसर अधिवेशन

1937 की गर्मियों के प्रारम्भ में ‘पंजाब किसान सभा’ का वार्षिक जलसा अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में हुआ।  वहाँ सज्जाद ज़हीर और डॉ. अशरफ को भी आमंत्रित किया गया। अवसर का लाभ उठाकर प्रगतिशील लेखकों ने भी अपना एक सम्मेलन कर डाला। यह सम्मेलन किसान सभा के ही पंडाल में किया गया- किसानों के बीच धंसकर, उनकी साँसों को अपनी साँसों में शामिल करके।  इस सम्मेलन के समायोजन की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी फैज़ अहमद फैज़ की थी जो उन दिनों संगठन की अमृतसर शाखा के मंत्री थे। इस सम्मेलन में उर्दू और पंजाबी के जिन साहित्यकारों ने भाग लिया उनमें सज्जाद ज़हीर, डॉ.अशरफ, फैज़ अहमद फैज़ के अतिरिक्त चिराग हसन ‘हसरत’, टीकाराम ‘सुखन,’  डॉ. तासीर,  प्रो. संत सिंह,  फीरोज़ुद्दीन मंसूर, प्रो. रघुवंश कुमार और रघुपति चोपडा के नाम विशेष उल्लेख्य हैं।

इलाहाबाद अधिवेशन: 1937

सज्जाद ज़हीर देख रहे थे कि हिन्दी-उर्दू विवाद निरंतर ज़ोर पकड़ता जा रहा था और हिन्दी-उर्दू लेखकों के मध्य की दूरियां गहराती जा रही थीं। वे इस दूरी को कम करने के लिए बराबर प्रयत्नशील रहे। उनका विश्‍वास था कि जिस मंजिल की ओर प्रगतिशील लेखकों को बढ़ना है उसमें परस्पर सहयोग आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। इसी विश्‍वास के साथ उन्होंने हिन्दी-उर्दू लेखकों का एक मिला-जुला अधिवेशन 1937 में ही करने का निश्‍चय किया । परिस्थितियां प्रतिकूल होने के बावजूद सज्जाद ज़हीर को ऐसे सहयोगी मिलते गए जिन्होंने योजना को सफल बनाने की सशक्त भागीदारी निभाई।
श्रीमती श्याम कुमारी नेहरू के आश्‍वासन, प्रयास और भाग- दौड़ के फलस्वरूप 1937 का इलाहाबाद अधिवेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। श्रीमती नेहरू स्वदेशी अंजुमन की सेक्रेटरी थीं।  हिन्दी लेखकों को अधिक से अधिक जोड़ने के विचार से पाँच अध्यक्ष चुने गए जो अलग-अलग सत्रों का सफल संयोजन करा सकें। इस अधिवेशन में आचार्य नरेन्द्र देव का अध्यक्षीय वक्तव्य विशेष उल्लेख्य था। डॉ. अब्दुल हक का भाषण क्रांतिकारी और ठोस होते हुए भी अपना वह प्रभाव नहीं बना सका जिसकी अपेक्षा की जाती थी। कारण कदाचित यह था कि प्रगतिशील लेखकों का मन उनकी ओर से बहुत साफ नहीं था। पं. रामनरेश त्रिपाठी का अध्यक्षीय भाषण निष्प्राण और फुसफुसा था। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के छात्रों की बड़ी संख्या में उपस्थिति ने अधिवेशन में प्राण फूँक दिए थे।  हिन्दी के जिन लेखकों ने विभिन्न सत्रों में आलेख पढ़े उनमें शिवदान सिंह चौहान,  नरेन्द्र शर्मा,  रमेशचंद्र सिन्हा और ओमप्रकाश सिंघल के आलेख विशेष चर्चा में रहे। शिवदान सिंह चौहान के आलेख का शीर्षक था- ‘भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता’। यह आलेख आज भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

इलाहाबाद अधिवेशन: 1938

ठीक एक वर्ष बाद 1938 में उर्दू-हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों का दूसरा अधिवेशन स्वदेशी के नुमाइश पंडाल में हुआ। उन दिनों पं. विश्वम्भर नाथ पांडेय इलाहाबाद शाखा के मंत्री थे।  यह अधिवेशन 1937 की अपेक्षा कहीं अधिक सफल था।  विभिन्न विभागों के अध्यक्ष मंडल में जिन लोगों के नाम चयनित किए गए उनमें सुमित्रानंदन पन्त,  आनंद नरायन मुल्ला, जोश मलीहाबादी विशेष उल्लेख्य हैं।  मुख्य अतिथियों में पं. जवाहर लाल नेहरू,  बाबा साहब कालेकर तथा मैथिलीशरण गुप्त भी थे। इस अवसर पर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी प्रगतिशील लेखकों के नाम अपना एक संदेश भेजा था जिसे पढ़कर सुनाया गया।
हिन्दी/उर्दू लेखकों की भागीदारी में कुछ नए नाम भी जुड़े थे।  जैनेन्द्र, रामवृक्ष बेनीपुरी, अमृत राय, रमेशचंद्र सिन्हा,  सुरेन्द्र बालूपुरी,  नरेन्द्र शर्मा,  मजाज़ लखनवी,  अली सरदार जाफ़री, रघुपति सहाय फिराक, जोश मलीहाबादी,  डॉ.अब्दुल अलीम,  प्रो. एजाज़ हुसैन,  डॉ. अशरफ,  प्रो. एहतिशाम हुसैन, प्रो.विकार अजीम आदि सभी जाने-माने लेखक एक मंच पर एकत्र थे।
डॉ. अब्दुल अलीम के आलेख पर जमकर वाद-विवाद हुआ और कुछ कड़वाहटें भी पैदा हुईं।  डॉ. अलीम चाहते थे कि हिन्दी और उर्दू के लेखक रोमन लिपि स्वीकार कर लें। इस प्रसंग में अधिवेशन के कुछ निमंत्रण-पत्र और विज्ञापन भी रोमन लिपि में छपवाए गए थे।  काका कालेलकर की प्रतिक्रिया बहुत तीव्र थी उनहोंने आक्रोश भरे स्वर में कहा, “मैं प्रगतिशील लेखक संघ से सहानुभूति अवश्य रखता हूँ किंतु यदि लेखक संघ ने रोमन लिपि के प्रस्ताव को अपना लिया तो उस स्थिति में मैं पूरे आन्दोलन का विरोध करूंगा।” सज्जाद ज़हीर ने किसी प्रकार बीच-बचाव किया और उन्हें कहना पड़ा कि रोमन लिपि के सुझाव का संगठन की नीति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

पं. जवाहर लाल नेहरू का भाषण

प्रगतितिशील लेखकों के सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू का सम्मिलित होना, एक असाधारण घटना थी। किंतु इससे इतना संकेत तो मिलता ही है कि देश की राजनीति से जुड़े शिखर के नेता भी उनदिनों साहित्य की गतिविधियों में रूचि रखते थे और उसकी समृद्धि और प्रोत्साहन में अपनी भागीदारी के इच्छुक थे। उनमें साहित्यकारों के प्रति एक आदर भाव था।  पंडित नेहरू ने अपने भाषण में कहा, “कलाकार और साहित्यकार की एक अलग पहचान होती है और जिसमें यह पहचान नहीं है, मैं उसे कलाकार नहीं कह सकता। पर उसकी पृथक पहचान यदि ऐसी है कि वह समाज से अलग है और जो चीज़ें समाज को हिलाती हैं, उनसे प्रभावित नहीं होता,  तो उस साहित्यकार की कोई उपयोगिता नहीं है। यह पहचान यदि विकसित हो सकती है तो केवल समाज के समाजवादी ढाँचे में। यह कहना कि समाजवाद आकर हमारी पृथक पहचान को मिटा देगा, सर्वथा ग़लत है। आने वाले इंक़लाब के लिए देश को तैयार करना साहित्यकार की ज़िम्मेदारी है। आप जन-सामान्य कि समस्याओं का समाधान कीजिए, उनको रास्ता बताइये, लेकिन आपकी बात उनके दिल में उतर जानी चाहिए। प्रगतिशील लेखक संघ एक बड़ी ज़रूरत को पूरी करता है और उस से हमें बड़ी आशाएं हैं।”
पंडित नेहरू के भाषण का एक लाभ यह अवश्य हुआ कि वे लोग जो नेहरू जी के प्रति श्रद्धा रखते थे और प्रगतिशील सम्मेलनों में भाग लेने से कतराते थे, अब इस संस्था के लिए पर्याप्त नर्म पड़ गए।

रवीन्द्र नाथ टैगोर का संदेश

टैगोर ने अपना जो संदेश प्रगतिशील संगठन के पास भेजा वह इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि उसमें जहाँ एक ओर आत्मालोचन किया गया है, वहीं दूसरी ओर समय की आवश्यकताओं को समझने-समझाने का सोचा-समझा प्रयास भी मौजूद है। टैगोर ने संदेश में लिखा था, “… एकांत-प्रियता मेरा स्वभाव बन गया है, किंतु यह एक वास्तविकता है कि समाज से कटा हुआ साहित्यकार मानव-प्रकृति से परिचित नहीं हो सकता। समाज को जानने-पहचानने के लिए और उसके विकास मार्ग का पता देने के लिए ज़रूरी है कि हमारा हाथ समाज की नाड़ी पर हो और हम उसके दिल की धडकनों को सुनें… साहित्यकार का कर्तव्य यह होना चाहिए कि वह देश में नयी ज़िंदगी की रूह फूँके, जागरण और जोश के गीत गाये… देश,  समाज और साहित्य की भलाई की सौगंध जब तक हर व्यक्ति नहीं खायेगा,  उस समय तक संसार का भविष्य प्रकाशमय नहीं हो सकता। यदि तुम यह कहने के लिए तैयार हो,  तो तुम्हें अपनी दौलत खुले हाथों लुटानी होगी और फिर कहीं तुम इस योग्य हो सकोगे कि संसार से किसी पारिश्रमिक की आशा करो।”

द्वितीय अखिल भारतीय अधिवेशन: कोलकाता, 1938

कोलकाता अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष सुधेन्दुनाथ दत्त थे।  वह बंगाली प्रगतिशील मासिक ‘छाया’ के संपादक थे। कोलकाता का अखिल भारतीय अधिवेशन दिसम्बर, 1938 के अंत में संपन्न हुआ। अध्यक्षता के लिए मुल्कराज आनंद का नाम चुना गया।  अन्य सभासदों में हीरन मुखर्जी, प्रमथ बेनर्जी, बुद्धिदेव बोस, ताराशंकर बेनर्जी, मानिक बेनर्जी, अली सरदार जाफ़री, मजाज़ लखनवी, बलराज साहनी, डॉ. अब्दुल अलीम, रजिया सज्जाद ज़हीर, कृश्‍न चंदर, श्रीमती दमयंती के अतिरिक्त बिहार, आसाम, उडीसा और तमिलनाडु के साहित्यकारों के प्रतिनिधि थे। इस अधिवेशन में संगठन के संविधान में अपेक्षित परिवर्तन भी किए गये।  अंग्रेज़ी पत्रिका ‘न्यू इंडियन लिटरेचर’ के प्रकाशन की अनुमति भी प्राप्त की गई और उसके संपादन का दायित्व आनंद नरायन मुल्ला, डॉ. अब्दुल अलीम तथा अहमद अली को सौंपा गया। एक और बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि सज्जाद ज़हीर के स्थान पर डॉ. अब्दुल अलीम संगठन के नए मंत्री चुने गये।

फरीदाबाद सम्मेलन और अन्य गतिविधियाँ

प्रगतिशील लेखक संगठन के सक्रिय सदस्य और किसान कवि सैयद मुत्तलबी के सुझाव पर जून, 1938 में अपने ढंग का एक अदभुत सम्मेलन फरीदाबाद में किया गया। यह फरीदाबाद के देहाती कवियों का सम्मेलन था। इसमें सैयद मुत्तलबी ने मथुरा,  गुडगाँव, रोहतक और दिल्ली तथा उसके आस-पास के ऐसे ग्रामीण कवियों को एकत्र किया था, जो किसान आन्दोलन से जुड़े हुए थे। मथुरा के हकीम ब्रजलाल तथा दिल्ली के भालसिंह ने इस आयोजन को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया। विशेष महत्व की बात यह थी की इस सम्मेलन में कृषक कवियों द्वारा जो भी कविताएं पढ़ी गयीं, वे सब अपने विषय की दृष्टि से समकालीन राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों से जुड़ी हुई थीं।  अहमद अली ने इस सम्मेलन की एक विस्तृत रिपोर्ट अंग्रेज़ी में तैयार करके मद्रास के एक प्रगतिशील मासिक ‘न्यू एरा’ में छपवाई।  इस रिपोर्ट की एक विशेषता यह थी कि इसमें ग्रामीण रचनाओं के उद्धरण भी दिए गए थे। रजनी पामदत्त ने इसी के आधार पर अपनी पुस्तक ‘न्यू इंडिया’ के एक अध्याय का प्रारम्भ ग्रामीण कवि स्वातिकी शर्मा की एक रचना से किया था।
1938 में आनंद नरायन मुल्ला के लंदन से वापस आने पर सज्जाद ज़हीर और उनके साथियों को विशेष बल मिला।  प्रेमचंद, जयप्रकाश नारायण से बात करके सज्जाद ज़हीर के सामने अपनी यह इच्छा व्यक्त कर चुके थे कि संगठन की ओर से अंग्रेज़ी और उर्दू में पत्रिकाएँ निकाली जायें। प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण का अंग्रेज़ी अनुवाद संगठन का मेनिफेस्टो, प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन के प्रस्ताव और संगठन में पढे जाने वाले महत्वपूर्ण आलेखों को एकत्र करके केन्द्रीय आयोग ने जब ‘टूवर्ड्स प्रोग्रेसिव लिटरेचर’ शीर्षक पुस्तक सितम्बर, 1936 में प्रकाशित की, प्रेमचंद अपनी बीमारी की हालत में भी उसे देखकर, खुशी से उछल पड़े। अब प्रेमचंद नहीं थे, पर उनका आशीर्वाद प्रगतिशील लेखक संगठन के साथ था।
अप्रैल, 1939 में मुल्कराज आनंद के सम्पादन में ‘न्यू इंडियन लिटरेचर’ का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ। इलाहबाद लॉ जरनल प्रेस से प्रकाशित होने के कारण इसकी छपाई और सज्जा बड़ी सुंदर और आकर्षक थी। इस अंक में कुल चार आलेख थे। एक सुधेन्दुनाथ दत्त का, दूसरा डॉ. अब्दुल अलीम का, तीसरा मुल्कराज आनंद का और चौथा डी.पी. मुखर्जी का। डॉ.  आनंद का आलेख प्रगतिशील लेखक आन्दोलन के मूलभूत सिद्धांतों, रचनाकारों के दायित्व और समाजवाद की समझ से जुड़ा होने के कारण पर्याप्त महत्त्वपूर्ण था। इसके अतिरिक्त प्रेमचंद की विशेष चर्चित कहानी ‘कफ़न’ का अंग्रेज़ी अनुवाद, जिसे अहमद अली ने बड़ी लगन से किया था, इस अंक को और भी महत्त्वपूर्ण बना रहा था। इसी समय अर्थात अप्रैल, 1939 में ‘नया अदब’ उर्दू मासिक का पहला अंक भी प्रकाशित हुआ। इसके संपादक मंडल में सिब्ते हसन, अली सरदार जाफरी और मजाज़ लखनवी शामिल थे। बाद में जोश मलीहाबादी भी इस से जुड़ गए। काश प्रेमचंद यह सब कुछ अपनी आंखों से देख पाते।

तृतीय अखिल भारतीय अधिवेशन: दिल्ली, 1922

जून, 1941 में हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया. भारतीय जन-मानस पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। वैसे तो सामान्य जनता की चिंताएं कुछ कम नहीं थीं, किंतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों में विशेष खलबली थी। पार्टी के अधिकतर सदस्य गिरफ्तार किए जा चुके थे जिस से भावी योजनाओं का कोई स्वरूप स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। 1941 के अंत तक आते-आते ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में जब थोड़ा परिवर्तन किया और कांग्रेस के नेता जेलों से छोड़े जाने लगे, स्थितियां पहले की अपेक्षा अधिक साफ हुईं। मार्च, 1942 में, पूरे दो वर्ष बाद, सज्जाद ज़हीर जेल से बाहर आए । उन्हें संगठन की सोई हुई नाड़ी में फिर से प्राण फूंकने की आवश्यकता महसूस हुई।
सज्जाद ज़हीर के मार्गदर्शन में डॉ. अब्दुल अलीम, अली सरदार जाफरी, शिवदान सिंह चौहान, सिब्ते हसन और उनके अन्य मित्रों ने एकजुट होकर परिस्थितियों पर विचार किया और यह निश्‍चय पाया कि प्रगतिशील लेखकों का शीघ्र ही अखिल भारतीय अधिवेशन बुलाया जाये और युद्ध से उत्पन्न नई स्थितियों पर विचार करके, संगठन की एक नीति सुनि‍श्‍चि‍त की जाये। मार्च के अन्तिम सप्ताह में सज्जाद ज़हीर दिल्ली गए।  वहां मजाज़ लखनवी, हार्डिंग लाइब्रेरी में असिस्टेंट लाइबरेरियन थे।  उपेन्द्र नाथ अश्क,  कृश्‍न चंदर और सआदत हसन मंटो आकाशवाणी में काम कर रहे थे।  सरकारी मुलाज़मत में इन प्रगतिशील लेखकों को देख कर सज्जाद ज़हीर को ज़बरदस्त धक्का लगा। दिल्ली में सज्जाद ज़हीर की भेंट भदंत आनंद कौशल्यायन से भी हुई। निश्‍चय हुआ कि अधिवेशन दिल्ली में ही किया जाये।
संगठन का तीसरा अखिल भारतीय अधिवेशन अप्रैल, 1942 में दिल्ली के हार्डिंग हाल में संपन्न हुआ। इसमें अधिकतर उर्दू लेखक ही सम्मिलित हुए। शिवदान सिंह चौहान और आनंद कौशल्यायन की उपस्थिति के बावजूद हिन्दी के वे लेखक जिन्हें आज प्रगतिशील कहा और माना जाता है, संगठन से दूर ही दूर रहे। सच पूछा जाये तो इस अधिवेशन को किसी दृष्टि से भी सफल नहीं कहा जा सकता। हाँ, इसका इतना महत्त्व अवश्य है कि इसमें सर्व-सम्मति से युद्ध के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव में कहा गया कि “हम प्रगतिशील लेखकों की सहानुभूति एकता-प्रिय देशों के साथ है और हम अपने कलम और अपने प्रभाव को प्रजातांत्रिक प्रयासों की हिमायत के लिए इस्तेमाल करेंगे और देश को फासिज्म के खतरे से सतर्क करेंगे। हम ब्रिटिश सरकार के इस रवैये की कड़ी निंदा करते हैं कि ऐसी विकट स्थिति में भी वह हमारी मातृभूमि को स्वतंत्र करने के लिए तैयार नहीं है।”
स्टेट्समैन में इस अधिवेशन के प्रस्ताव का खूब प्रचार किया गया और वही अख़बार जो अभी कल तक प्रगतिशील लेखक संगठन का विरोधी था उसे अब सोवियत रूस और कम्युनिज्म की अच्छाइयाँ भी दिखाई देने लगी थीं। हवा का रुख बदल रहा था और ‘अंग्रेजो भारत छोडो’ की गूँज से दबे-दबे और दूर-दूर रहने वाले लेखकों का मन भी संगठन से जुड़ने के लिए भुर्भुराने लगा था।

चौथा अखिल भारतीय अधिवेशन: मुम्बई,1945

जून, 1942 में सज्जाद ज़हीर और अली सरदार जाफरी एक मार्क्सवादी साप्ताहिक के संपादन के लिए मुम्बई आ गए। वहां ख्वाजा अहमद अब्बास पहले से मौजूद थे। उनका आवास साहित्य- चर्चा का केन्द्र बन गया। हिन्दी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, और मलयालम भाषाओं के साहित्यकार एक स्थान पर एकत्र होकर वौचारिक आदान-प्रदान करने लगे। यह कार्य उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर में अभी तक सम्भव नहीं हो पाया था। तमाम प्रयास के बावजूद हिन्दी लेखक उर्दू लेखकों के साथ बैठकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वैचारिक आदान-प्रदान के लिए आमादा नहीं थे। मुम्बई की शाखा अन्य शाखाओं से हर दृष्टि से अलग थी। वहाँ मामा वरेरकर थे, वाकुलेश थे, नरेन्द्र शर्मा और नरेन्द्र सिन्हा थे, अख्तरुल ईमान और महेन्द्र नाथ थे, मजाज़ लखनवी और कृश्‍न चंदर थे, और कुछ ही समय बाद, जोश मलीहाबादी तथा साग़र निज़ामी भी इस जमावड़े का हिस्सा बन चुके थे। वहाँ की शाखा ने सुभद्राकुमारी चौहान, उदयशंकर, ई. एम्. फोस्टर और डी. पी. मुखर्जी के सम्मान में सभाएं आयोजित कीं, मुम्बई के मराठी मजदूरों की लोक-कविता ‘पवांड़ा’ की गोष्ठियों का आनंद लिया, जिसमें मजदूरों की स्थिति, उनके संघर्ष, मजदूर आन्दोलन और रूस की साम्यवादी सरकार की गतिविधियों का विवेचन किया गया था।
चौथे अखिल भारतीय अधिवेशन के अध्यक्ष मंडल के लिए जोश मलीहाबादी (उर्दू), पं. राहुल सांकृत्यायन (हिन्दी) सत्येन मजुमदार (बंगाली), एम्.ए. डांगे (मराठी), और पेचाइया (तेलुगू) के नाम चुने गए। डांगे का नाम प्रस्तावित होने पर सज्जाद ज़हीर को आश्‍चर्य हुआ। वह उन्हें एक सशक्त साम्यवादी नेता के रूप में जानते थे। वैसे भी उनकी गणना मजदूर आन्दोलन की नींव रखने वाले की हैसियत से की जाती थी। यह जानकर आश्‍चर्य का होना स्वाभाविक था कि वे मराठी भाषा के एक प्रसिद्ध साहित्यकार, विद्वान् एवं इतिहासज्ञ भी हैं। डांगे ने अपना अध्यक्षीय भाषण मराठी भाषा और साहित्य के विकास पर अंग्रेज़ी भाषा में दिया था। यह भाषण मुम्बई अधिवेशन की उपलब्धि था। बाद में यह एक पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित हुआ।
इस अधिवेशन में सबसे महत्त्वपूर्ण वह घोषणा-पत्र था जिसमें युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों के प्रकाश में देश के साहित्यकारों के कर्तव्य एवं दायित्व का सामान्य रूप से और प्रगतिशील लेखकों के कर्तव्यों का विशेष रूप से निर्धारण किया गया था और स्पष्ट रूप से यह कहा गया था कि इन परिस्थितियों में लेखकों को एक संयुक्त मोर्चा बनाना ज़रूरी है।  इस प्रकार यदि देखा जाये तो देश में संयुक्त मोर्चा बनाने का विचार भी साम्यवादी सोंच का ही नतीजा है।
इस अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि संगठन का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ से हटाकर मुम्बई कर दिया जाये। यह भी निश्‍चय पाया कि डॉ. अब्दुल अलीम के स्थान पर दुबारा सज्जाद ज़हीर संगठन के मंत्री का कार्य-भार संभालें।  ख्वाजा अहमद अब्बास को ज्वाइंट सेक्रेटरी बनाया गया।

दिल्ली शाखा की गतिविधियाँ, 1946

शमशेर सिंह नरूला जब दिल्ली शाखा के मंत्री चुने गए तो उनके प्रयास से वहां के प्रगतिशील लेखकों में एक नई ज़िंदगी का संचार हुआ। उन दिनों दिल्ली में फैज़ अहमद फैज़, डॉ. तासीर, शिवादन सिंह चौहान, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि अनेक उर्दू-हिन्दी साहित्यकार एकत्र थे। 1946  में सज्जाद ज़हीर के दिल्ली आने पर एक बड़ा जलसा आयोजित किया गया। इस समारोह की अध्यक्षता सर रज़ा अली ने की और इसमें प्रगतिशील आन्दोलन के विरोधियों को करारा जवाब दिया गया। हिन्दू-मुस्लिम तनाव के बावजूद दिल्ली के हिन्दी-उर्दू साहित्यकारों में वह दूरियां नहीं थीं जो उत्तर प्रदेश के हिन्दी लेखक उर्दू के प्रगतिशील लेखकों से बनाये हुए थे।

हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों का अधिवेशन: इलाहाबाद, 1947

देश विभाजन के पूर्व से हिन्दी-उर्दू भाषा समस्या को लेकर हिन्दी-उर्दू लेखकों के मध्य जो असहमतियां थीं, वे देश की स्वाधीनता के बाद खुलकर सामने आ गयीं। राहुल जी और सज्जाद ज़हीर के मध्य जो मत-वैभिन्य था, उसमें वैचारिक संकीर्णता नहीं थी। किंतु हिन्दी के वे लेखक जो स्वाधीनता से पूर्व, संगठन से कभी नहीं जुड़े थे, अब अपनी एक विशेष भूमिका के साथ प्रगतीशील मंच पर दिखायी दिए। उनकी अलगाववादी मनोवृत्ति ने उर्दू लेखकों को पूरी तरह काटकर हिन्दी लेखकों का पृथक अधिवेशन इलाहाबाद में 1947 के अंत में करने का निश्‍चय किया। संगठन की पृष्ठभूमि अभी तक इस प्रकार के किसी भी अलगाववादी नज़रिए की सख्त विरोधी थी। इलाहाबाद अधिवेशन में सज्जाद ज़हीर को प्रगतिशील लेखक संगठन का प्रधान-मंत्री होने के रिश्ते से आमंत्रित किया गया। अली सरदार जाफरी भी सज्जाद ज़हीर के साथ, न बुलाए जाने के बावजूद चले आए। इलाहबाद में होने के कारण फिराक गोरखपुरी भी सम्मिलित हो गए। इस प्रकार उर्दू के तीन लेखक तो इस अधिवेशन में आ ही गए।
अधिवेशन में सम्मिलित हिन्दी लेखकों में राहुल सांकृत्यायन और अज्ञेय के अतिरिक्त सुमित्रानंदन पन्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामबिलास शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, अमृत राय, नरेन्द्र शर्मा और प्रकाशचन्द्र गुप्त के नाम विशेष उल्लेख्य हैं। राहुल सांकृत्यायन 1938 से ही प्रगतिशील लेखक संगठन से जुड़े हुए थे और उनका व्यक्तित्व सभी के लिए आदरणीय था। अन्य हिन्दी लेखकों में प्रकाशचन्द्र गुप्त यद्यपि संगठन के अधिवेशनों में इस से पहले सम्मिलित नहीं हुए थे, किंतु स्तालिनग्राद का महायुद्ध (1944), जनता अजेय है (1945) जैसी पुस्तकें प्रकाशित करके वे समाजवाद के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता पहले ही व्यक्त कर चुके थे। अमृत राय और नरेन्द्र शर्मा का जुड़ाव लेखक संगठन के साथ पुराना था। किंतु निराला या रामबिलास या पन्त का समाजवादी नज़रिये से लगाव पहली बार दिखायी दे रहा था। यही स्थिति शिवमंगल सिंह सुमन की भी थी। शिवदान सिंह चौहान को या तो इस अधिवेशन में बुलाया नहीं गया था या वे किन्हीं कारणों से नहीं आ पाये,  किंतु, अधिवेशन में उनकी अनुपस्थिति खटकती अवश्य है और आयोजकों की नीयत पर हल्का सा प्रश्न-चिह्न भी लगा देती है।
प्रगतिशील हिन्दी लेखकों के इस अधिवेशन का उदघाटन पं. अमरनाथ झा ने किया। ध्यान रहे की 1936 में अमरनाथ झा ने संगठन से अपना हाथ पूरी तरह खींच लिया था और सज्जाद ज़हीर को उनके दबाव में यह स्पष्टीकरण भी देना पड़ा था की संगठन के मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वालों में उनका नाम भूल से छप गया है। इस अधिवेशन में केवल दो सत्र संपन्न हुए। एक सत्र की अध्यक्षता राहुल सांकृत्यायन ने की और दूसरे सत्र के अध्यक्ष अज्ञेय थे। राहुल जी की अध्यक्षता में हिन्दी-उर्दू विवाद प्रबल रूप से सामने आया। अज्ञेय ने प्रस्ताव रखा कि सम्पूर्ण देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा हिन्दी घोषित की जाये। सज्जाद ज़हीर का विचार था कि हिन्दी और उर्दू को एक-दूसरे से निकट लाने का प्रयास जारी रहे और जबतक नागरी-लिपि को सभी स्वीकार न कर लें, एकमात्र हिन्दी और नागरी की बात न की जाये। रामबिलास शर्मा, फिराक गोरखपुरी, प्रकाशचन्द्र गुप्त, अली सरदार जाफरी और अमृत राय आदि का विचार था कि इस अधिवेशन में इस प्रस्ताव पर कोई निर्णय न लिया जाये। इस निर्णय को अखिल भारतीय अधिवेशन के लिए छोड़ दिया जाये। अंत में हुआ भी यही, किंतु इस से मनमुटाव को बढावा मिला।

उत्तर-प्रदेश के हिन्दी उर्दू लेखकों का अधिवेशन, 1949

हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों के अधिवेशन में भाषा-विवाद को लेकर जो हलकी सी दरारें आ गई थीं, उनका भरा जाना ज़रूरी था। इससे पहले कि पांचवां अखिल भारतीय अधिवेशन आयोजित किया जाये, यह निश्‍चय पाया कि उत्तर प्रदेश के हिन्दी-उर्दू लेखकों का एक मिला-जुला अधिवेशन कर लिया जाये।फलस्वरूप अप्रैल, 1949  में यह अधिवेशन संपन्न हुआ। इसमें रामवि‍लास शर्मा, डॉ. अब्दुल अलीम,  प्रकाशचन्द्र गुप्त, आले अहमद सुरूर,  शिवदान सिंह चौहान, एहतिशाम हुसैन, मजरूह सुल्तानपूरी, नरोत्तम नागर, साहिर लुधियानवी, शील और मुमताज़ हुसैन आदि ने भाग लिया। सज्जाद ज़हीर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर 1948 में पाकिस्तान जा चुके थे ताकि वहां पार्टी को संगठित और व्यवस्थित कर सकें। भाषा के सम्बन्ध में इस अधिवेशन ने सर्व-सम्मति से जो प्रस्ताव पारित किया उसके कुछ अंश यहाँ देना आवश्यक जान पड़ता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य हिन्दी-उर्दू लेखकों को एक बड़े लक्ष्य के लिए जोड़ना और निकट लाना था। प्रस्ताव इस प्रकार था -
“उत्तर-प्रदेश के प्रगतिशील लेखकों की यह सभा घोषणा करती है कि प्रत्येक भाषा को स्वतंत्र और बेरोक-टोक तरक्की करने का अधिकार होना चाहिए। यह सभा किसी भी भाषा के बोलने वालों पर एक सरकारी भाषा के लादे जाने का विरोध करती है।
“हमारा विचार है कि हिन्दी और उर्दू भाषाएँ मूल रूप से एक हैं और जनता की बोल-चाल की ज़बान को आधार मानकर वह जीवित हैं। उत्तर-प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर जिस प्रकार उर्दू को कुचला जा रहा है,  उससे भाषा की एकता कायम नहीं हो सकती, बल्कि इसका उद्देश्य जनता में फूट डालना और अंधी राष्ट्रीयता की प्रवृत्ति पैदा करना है।”

पांचवां अखिल भारतीय अधिवेशन: भीमड़ी, 1949

मई, 1949 में भीमड़ी (मुम्बई) में होने वाले पांचवें अखिल भारतीय अधिवेशन का एक विशेष महत्त्व है। बदली हुई परिस्थितियों में संगठन ने महसूस किया कि 1936  का घोषणा-पत्र कई दृष्टियों से अपर्याप्त है। अब आवश्यक हो गया है कि एक नया घोषणा-पत्र तैयार किया जाये। इस अधिवेशन में रामवि‍लास शर्मा को नया मंत्री चुना गया और सर्व सम्मति से एक नया घोषणा-पत्र पास किया गया। यहाँ इस घोषणा-पत्र के कुछ अंश प्रस्तुत करना असंगत न होगा-
“भारत का पूंजीपति वर्ग राष्ट्रीय आन्दोलन के समय में भी साम्राज्य से समझौता करने के प्रयास में लगा हुआ था। अब खुल्लमखुल्ला उसका साथी और दोस्त बन गया। इसका प्रमाण यह है कि भारत सरकार ने बरतानवी कामनवेल्थ में रहने का निर्णय लिया है। यह निर्णय भारतीय जनता की इच्छा के विरुद्ध है।… पिछली लड़ाई समाप्त हुए अभी बहुत समय नहीं बीता कि एक बार फासिज्म को नीचा दिखाने के बाद फिर विश्‍व की आम जनता को तीसरे महायुद्ध की नयी तैयारी में लगाया जा रहा है।… बरतानवी और अमरीकी पूंजीवादी देश जो अपने लाभ को न केवल बनाए रखना बल्कि बढा़ना चाहते हैं, इस षड्यंत्र में लगे हैं कि डालर और एटमबम से दुनिया को गुलाम बनाये रखें।… हजारों आदमी जिनमें मज़दूर, किसान, साहित्यकार और कला शिल्पी सभी शामिल हैं,  भारतीय जेलों में तरह-तरह के कष्ट झेल रहे हैं, उन लोगों को जेल भेजने से पहले औपचारिक रूप से अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी नहीं समझी जाती।… प्रगतिशील साहित्यकार अतीत की संस्कृति और साहित्य के सच्चे वारिस हैं और वे मानव सभ्यता की श्रेष्ठ परम्पराओं को लेकर आगे बढते हैं। समाज के ऐतिहासिक विकास के परिदृश्य में वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को आलोचनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करते हैं।…’
‘प्रगतिशील साहित्यकार जानते हैं कि शोषक और शोषित में समझौता नहीं हो सकता। और इस दिशा में सत्य और अहिंसा की बात करना एक ऐसा परदा है जिसके पीछे पूंजीवादी लूट-खसोट को छिपाने का प्रयास किया जाता है।…’
‘अगर हम पिछले बीस वर्षों के साहित्य पर दृष्टि डालें तो बड़े गर्वपूर्वक कह सकते हैं कि औरों की तुलना में प्रगतिशील लेखक ही थे जिन्होंने अपने साहित्य में स्वाधीनता आन्दोलन के नए मोड़ों को प्रस्तुत किया, फासिस्ट शक्तियों का जमकर विरोध किया,  सोवियत यूनियन की जनता के साथ अपनी मैत्री की अभिव्यक्ति की,  जापानी फासिज्म के विरुद्ध लड़ती हुई चीनी जनता से मैत्री के रिश्ते जोड़े,… अकाल के ज़माने में बंगाल के लिए सम्पूर्ण देश के लोगों को एकस्वर किया। ये प्रगतिशील लेखक ही हैं जिन्होंने जन एकता और शांति का झंडा बुलंद किया,  जनसाहित्य और जन संस्कृति का भविष्य प्रगतिशील लेखकों के हाथ में है, यह सिद्ध करना उनका कर्तव्य है।”

उत्तरी भारत के लेखकों का अधिवेशन: दिल्ली, 1950

तीसरे महायुद्ध का आतंक कच्चे धागे से बंधी नंगी तलवार की तरह सिर पर लटक रहा था। प्रत्येक चिंतनशील साहित्यकार वि‍श्‍वशांति के प्रश्‍न को लेकर पर्याप्त गंभीर था। फलस्वरूप दिल्ली, राजस्थान और पंजाब के प्रगतिशील लेखकों ने वि‍श्‍वशांति प्रसंग पर विमर्श के लिए अधिवेशन के आयोजन की आवश्यकता महसूस की। यह आयोजन जुलाई, 1950 में दिल्ली में संपन्न हुआ। इसमें लेखकों से अपील की गई कि “तीसरे महायुद्ध की तैयारियां, हमारी संस्कृति के लिए खतरे का संकेत हैं। युद्ध के प्रचार का सम्बन्ध जातिगत ऊंच-नीच, साम्प्रदायिक-वैमनस्य और जातीय घृणा से है। हम सब एकजुट होकर प्रेमचंद का झंडा ऊंचा करें और प्रत्येक ऐसे हाथ को मरोड़ दें, जो हमारे कलम को छूना भी चाहता हो।”
अधिवेशन का स्वागत भाषण जनता थियेटर के श्यामलाल ने दिया जो उन दिनों टाइम्स आफ इंडिया के संपादक थे और अध्यक्षता राजेन्द्र सिंह बेदी ने की। केन्द्रीय संगठन के मंत्री की हैसियत से डॉ. रामविलास शर्मा ने अपील के पक्ष में भाषण दिया। डॉ.  शर्मा ने कहा कि “आज संसार में कोई ईमानदार श्रेष्ठ साहित्यकार ऐसा नहीं है जो युद्ध और शांति के मामले में अपनी गैर-प्रतिबद्धता की घोषणा करे।” उन्होंने कहा कि “महादेवी जी ने बंगाल के अकाल पर छपी सामग्री को संपादित करते हुए लिखा था कि जिस साहित्यकार के मन में मानवता का दर्द नहीं पैदा हुआ, उसका कलम सोने का होते हुए भी राख है। हमें स्वीकार करना चाहिए कि आज शांति का प्रश्‍न सम्पूर्ण मानवता का प्रश्‍न है।”
इस अवसर पर सोवियत रूस के साहित्यकारों (कान्सीटन समानोफ़, तर्सूनज़ादे, सिब्ते मकानोफ़, और एलेकज़ेनडर विन्सकी) ने भी संगठन के मंत्री के नाम एक चिट्ठी भेजी थी जिसमें लिखा था कि “संसार की सभी प्रगतिशील ताक़तों के लिए अनिवार्य हो गया है कि वे अपने दलों को सशक्त बनाएं और व्यावहारिक रूप से शांति की इच्छा से साम्राज्यवादियों को चेतावनी दें। इस चिट्ठी में भारत के प्रगतिशील लेखकों के साथ रूसी लेखकों ने अपने भरपूर सहयोग का भी आश्‍वासन दिया था।

इलाहबाद अधिवेशन, 1952

डॉ. रामविलास शर्मा के प्रयास से अप्रैल, 1952  में हिन्दी-उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का एक सम्मेलन इलाहाबाद में संपन्न हुआ जिसमें रांगेय राघव, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय,  अमृत राय, एहतिशाम हुसैन,  धर्मवीर भारती,  डॉ.  अब्दुल अलीम,  प्रकाशचन्द्र गुप्त,  रघुपति सहाय फिराक,  अली सरदार जाफरी इत्यादि सम्मिलित थे। इसमें डॉ. रामविलास शर्मा ने कुछ एक प्रगतिशील लेखकों की कड़ी आलोचना की और एक उपदेशात्मक रुख अख्तियार किया जिससे संघ में दरारें पड़ने की संभावनाएं बढ़ गयीं। वैसे भी हिन्दी के प्रगतिशील लेखक रामविलास शर्मा के रवैये से संतुष्ट नहीं थे।

छठा अखिल भारतीय अधिवेशन: दिल्ली, 1953

भीमड़ी अधिवेशन में जो मेनिफेस्टो पास हुआ था उस से प्रगतिशील लेखकों के बीच जन्मा असंतोष गहराता जा रहा था। इसलिए यह निश्‍चय पाया की छठे अखिल भारतीय अधिवेशन में एक नया मेनिफेस्टो तैयार किया जाये। रामविलास शर्मा और अली सरदार जाफरी ने अन्य मित्रों के सहयोग से इसकी रूपरेखा तैयार की जिसे इस अधिवेशन में बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर लिया गया। रामविलास शर्मा के विरुद्ध हिन्दी लेखकों का जो असंतोष दबा-दबा सा था, इस अधिवेशन में उसकी गंध बहुत साफ महसूस की गई। कुछ लेखकों का विचार था कि‍ रामविलास शर्मा संगठन को चलाने में पूरी तरह असफल रहे। अमृत राय और मुक्तिबोध रामविलास के रवैये को पहले ही मानव विरोधी घोषित कर चुके थे। डॉ. शर्मा ने इस अधिवेशन में जो रिपोर्ट प्रस्तुत की,  उसे भी उपदेशात्मक कहा गया।  इसका भी संकेत किया गया की संगठन पार्टी के हाथों में कठपुतली बन कर रह गया है। किंतु इन तमाम विरोधों के बावजूद, उर्दू तथा अन्य भाषाओं के लेखकों के बीच रामविलास की छवि किसी कोण से भी धूमिल नहीं हुई थी।  इस अधिवेशन में डॉ.  रामविलास शर्मा के स्थान पर कृश्‍न चंदर को नया मंत्री चुना गया।

प्रगतिशील लेखक आन्दोलन का अवसान

अपने प्रारम्भ काल से ही जिस आन्दोलन की जड़ें जनता में गहराई तक पैठी हुई थीं,  वह लेखकों की आपसी बौद्धिक पैतरेबाजी के कारण 1954  तक खोखला हो चुका था। किसी को उसमें कुत्सित समाजशास्त्र की झलक दीखने लगी थी,  कोई उसे कोरी नारेबाजी समझता था।  किसी ने किसी के लेखन में ‘परशुराम के कुल्हाडे’ का चित्र देखना प्रारम्भ कर दिया तो कहीं इसमें संकीर्ण मतवादी प्रवंचना को जन्म देने वाली प्रवृत्ति रेखांकित की गई। कृश्‍न चंदर के मंत्री होने के बाद संगठन की गतिविधियाँ पूरी तरह शिथिल पड़ गयीं। स्वयं कृश्‍न चंदर एक तिजारती साहित्यकार होकर रह गए थे।  कुछ अन्य प्रगतिशील लेखकों में भी तिजारती मनोवृत्ति ज़ोर पकड़ने लगी थी।  इलाहाबाद में परिमल समूह के लेखक युगीन राजनीति से अपना दामन बचाए रखना चाहते थे और साहित्यकारों के बीच इस समूह की ताक़त निरंतर बढ़ रही थी। इसकी गोष्ठियों में प्रगतिशील लेखकों का सक्रिय दिखाई देना, प्रगतिशील लेखक संगठन के अवसान का स्पष्ट संकेत था।  नामवर सिंह और सुमित्रानंदन पन्त की बात तो फिर भी समझ में आती है, किंतु प्रकाशचन्द्र गुप्त जैसा साम्यवादी लेखक इन गोष्ठियों को सशक्त बना रहा था, यह देख कर आश्‍चर्य अवश्य होता है।
1953-54 में  काशी में भी ‘साहित्यिक संघ’ की गोष्ठियाँ ज़ोर पकड़ने लगी थीं। इस संघ के नाम से ही स्पष्ट है कि इसे प्रगतिशील लेखक संघ का बदल स्वीकार कर लिया गया था। इस संघ के बहस-मुबाहासों में शिवदान सिंह चौहान,  प्रकाशचन्द्र गुप्त,  हजारी प्रसाद द्विवेदी, नलिन,  त्रिलोचन,  अमृत राय,  नेमिचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, धर्मवीर भारती और केदारनाथ अग्रवाल जैसे रचनाकर्मियों की विशेष भूमिकाएं थीं।
1954 में सज्जाद ज़हीर जब पाकिस्तान से लौटे,  उन्हें संगठन का यह बिखराव देख कर दुःख हुआ। फिर भी उन्होंने अपने आप को इप्टा (इंडियन पीपिल्स थिएट्रिकल एसोसिएशन), ए.आई.पी. डबल्यू (इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन) और ऐफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन जैसे वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलनों से जोड़े रखा। सच पूछा जाये तो प्रगतिशील लेखक संगठन का सम्पूर्ण अस्तित्त्व ही सज्जाद ज़हीर के एकल व्यक्तित्त्व पर टिका हुआ था। यदि वे पाकिस्तान न गए होते तो प्रगतिशील संगठन का बिखराव इतनी आसानी से सम्भव न हो पाता।

विश्‍लेषण और निष्कर्ष

प्रेमचंद ने 1936 में जब प्रगतिशील लेखक संगठन के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की  तो संगठन पर चोट करते हुए नरोत्तम नागर ने लिखा था, ”इस संगठन की अध्यक्षता तो युवा पीढ़ी के ही किसी व्यक्ति को करनी चाहिए थी।” सज्जाद ज़हीर के नाम अपनी चिट्ठी में प्रेमचंद ने इस टि‍प्‍पणी का सन्दर्भ देते हुए लिखा था, “उस अहमक को ये नहीं मालूम के यहाँ वही जवान है, जिसमें प्रोग्रेसिव रूह हो। जिसमें ऐसी रूह नहीं, वह जवान होकर भी बूढा़ है।” इस वाक्य में जवान होना ज़िंदगी को प्रतीकयित करता है। उस ज़िंदगी को जिसकी आत्मा प्रगतिशीलता के झरनों में धुली हुई हो। यानी प्रगतिशीलता प्रेमचंद की दृष्टि में बौद्धिक व्यायाम से नहीं जन्म लेती। मार्क्स के दार्शनिक सिद्धांतों की जानकारी यदि अंतस में प्रवेश न करे और आत्मा के साथ अंतरंग होकर संस्कारों में न घुल-मिल जाये  तो प्रगतिशीलता का बाह्य धरातल अर्थहीन होगा। यहाँ जानकारी से आगे बढ़कर उस समझ की आवश्यकता है जो प्रतिबद्धता को जन्म देती है। प्रगतिशीलता किसी पादरी का चोगा नहीं है जिसे पहनकर उपदेश दिये जाएँ। यह प्रगतिशीलता एक पूरी ट्रेनिंग है जो संस्कारों के भीतर से फूटती है।सांस्कृतिक विरासत के ऐतिहासिक विकास को आम जनता की पृष्ठभूमि में रख कर देखने और परखने से पल्लवित होती है। प्रेमचंद ने अन्य हिन्दी लेखकों की भांति प्रगतिशीलता को ओढा नहीं था। इसे अपने समूचे रक्त में घोल लिया था।
हिन्दी के अधिकांश तथाकथित प्रगतिशील लेखक, संगठन के केन्द्रीय आयोजकों से जुड़ना नहीं चाहते थे। शायद जुड़ भी नहीं सकते थे। बात कुछ कड़वी हो सकती है, किंतु सच्चाई यही है कि जिसे आन्दोलन की समझ कहते हैं, वह हिन्दी लेखकों में एक सिरे से थी ही नहीं। हालांकि प्रेमचंद ने इस ‘समझ’ को उनके बीच पहुंचाने के प्रयास में कोई कमी नहीं की। जिस आन्दोलन की जड़ें मजदूरों और किसानों के बीच हों, उसकी समझ पैदा करने के लिए ज़रूरी है कि मजदूरों-किसानों के साथ जुड़ाव पैदा किया जाये। केवल सैद्धांतिक स्तर पर नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी। जब ऐसा नहीं किया जायेगा तो वही होगा जो बालकृष्ण शर्मा नवीन के साथ हुआ। “तुम जिनको कीडा समझे थे वो तो मानव निकले यारो।” कहने वाले नवीन प्रगितिशीलाता की दौड़ में ‘अपलक’ तक आते-आते भहराकर गिर पड़े। सुमित्रानंदन पन्त भी चले तो बहुत ज़ोर-शोर से,  पर आगे चलकर अरविंद के दर्शन में समाधित हो गए।
मार्क्सवाद के दार्शानिक सिद्धांतों का अध्ययन करने वालों की कमी न हिन्दी में पहले थी और न अब है, पर मार्क्सवाद के ज़मीनी विकास की पकड़ उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए।  इसलिए जहाँ तक सिद्धांत के विवेचन का प्रश्‍न है हिन्दी के प्रगतिशील आलोचकों ने अपनी समझ का भरपूर सुबूत दिया। हाँ, रचना के स्तर पर बच्चन को छोड़कर लगभग सभी कवियों ने प्रगतिशीलता की आत्मा को समझ कर उसका निर्वाह करने का प्रयास नहीं किया। शिवदान सिंह चौहान ने कदाचित इसीलिए 1954 में लिखा था, “मार्क्सवाद के दार्शनिक सिद्धांतों को पद्यबद्ध कर के मार्क्सवादी (प्रगतिवादी) कविता तो तैयार की जा सकती है, लेकिन तब उसे न काव्य की संज्ञा दी जा सकती है न साहित्य के इतिहास में कोई अलग स्थान ही।”
प्रगतिशील लेखक आन्दोलन का फलक बहुत व्यापक था किंतु इस व्यापकता को समझने के लिए संकल्प की पारदर्शिता अपेक्षित थी। ऐसी पारदर्शिता जो समाजवादी आन्दोलन से बहुत पहले भारतेंदु हरिश्‍चन्‍द्र और अल्ताफ हुसैन हाली में थी। उनके सामने एक सामाजिक-सांस्कृतिक लक्ष्य था जिसके लिए वे पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। हिन्दी में इस परम्परा का विकास नहीं हो पाया। प्रेमचंद उर्दू की परम्परा से आए थे, जहाँ संघर्ष का पहिया थमा नहीं था। फलस्वरूप वह अपने युग के सभी हिन्दी लेखकों से अलग खड़े थे और पहले क्या, आज भी अलग दिखायी देते हैं।शायद इसी लिए प्रगतिशीलता की बैसाखी लगाने वाले बार-बार प्रेमचंद का नाम दुहराते हैं। देश की स्वाधीनता से पूर्व, हमारे लेखकों के पास एक साथ जुड़ने के लिए एक कामन प्लेटफार्म था, पर स्वाधीनता के बाद वह अलगाववादी बीज जो दबे-दबे से थे, अँखुआ फोड़कर सिर उभारने लगे और ‘अपनी ढपली अपना राग’ की स्थिति पैदा हो गई।
साहित्य और कला को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की बात पर लोग चौंकते हैं और कुछ नासमझ अपनी रचनाओं को सचमुच बंदूक की गोली के रूप इस्तेमाल करने और उसका वही प्रभाव देखने का स्वप्न बुन लेते हैं।प्रगतिशीलता के दौर में भी ऐसा हुआ और आज भी ऐसा हो रहा है। रोचक बात ये है कि मित्रों से उसकी खूब-खूब व्याख्याएं भी कराई जा रही है। ऐसे रचनाकारों को यह समझना अभी शेष है कि साहित्य का कोई भी हथियार भयाक्रांत करने के लिए नहीं होता। वह शत्रु सत्ता की आक्रामक शक्तियों और उसके कुचक्रों के विरुद्ध व्यावहारिक स्तर पर युद्धरत व्यक्तियों और समूहों में उत्साह जगाये रखता है और अन्य समझदार लोगों की सोई हुई चेतना को जगाकर संघर्ष के इस मोरचे पर एकजुट होने के लिए प्रेरित करता है। ’पार्टी समझ’ शब्द को रूढ़ अर्थों में ग्रहण करके नारेबाजी तो की जा सकती है किंतु यह नारेबाजी हथियार साबित होने के बजाय धीरे-धीरे उबाऊ बनकर घातक सिद्ध होती है। प्रगतिशील आन्दोलन के दौर में ऐसा ही हुआ।
प्रगतिशीलता की जिसके पास ज़रा भी समझ होती है वह ‘हिन्दी जाति’ का अलगाववादी स्वप्न नहीं देखता, वह जागो फिर एक बार जैसी केसरिया कवितायेँ नहीं लिखता,  वह शैव दर्शन की गुत्थियाँ सुलझाने नहीं बैठता, वह ब्राह्मणवादी, ठाकुर्वादी या भाई-भतीजवादी बनकर आलोचना की पीठ पर गद्दीनशीन नहीं होता। वह इच्छानुरूप कुछ नुस्खे तैयार करके ‘नुस्खावादी आलोचना’ को बढावा नहीं देता। वह वस्तु और रूप के अंतर्संबंधों को व्याख्यायित करते समय लकड़ी के पटरों की तरह पानी में ऊपर-ऊपर नहीं तैरता। वह सामने खड़ी चुनौतियों को मस्लेहत के तराजू पर नहीं तौलता। वह काव्य मूल्यों तथा जीवन मूल्यों की आकांक्षित एकतानता को उद्घाटित करने से गुरेज़ नहीं करता। सच तो यह है कि जो रचना की बुनियादी ज़रूरतों और उसकी अपनी अंतरंग स्वायत्तता को खुले ह्रदय से स्वीकार नहीं कर सकता, वह प्रगतिशील बुजुर्गों की कमाई को जोड़-तोड़ से हथियाकर उसके ब्याज से अपने कैरियर की इमारत भले ही खडी कर ले, उसकी प्रगतिशीलता सदैव संदिग्ध रहेगी।
डॉ. शिव कुमार मिश्र ने एक स्थल पर लिखा है, “रचनाकार हों या आलोचक, जब वे अराजक हो उठाते हैं, अपने कर्म से जुड़ी अपेक्षाओं के दायरे से बाहर जाने की कोशिश करने लगते हैं, उनका कर्म आहत होता है, अपनी साख खो देता है। आज आवश्यकता है यह रेखांकित करने की, कि कौन कौन अपनी साख खो चुका है या खोता जा रहा है। ज़ाहिर है कि वह साख जिसकी बुनियाद टेढी और भुसभुसी होगी, उसे अधिक दिन तो निश्‍चि‍त  रूप से नहीं टिकना है। कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह ने एक जगह कहा था, “आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय माहौल में कुछ ग़लत और अराजक तत्त्वों का एक मोर्चा खड़ा होता जा रहा है, जो क्रांतिकारी तत्वों के संगठन और विकास के प्रमाणों के लिए नहीं, विघटन और विलोपन की ओर ढकेलते जाने की गैर-क्रांतिकारी हरकतों के कारण क्रांतिकारी बना हुआ है।” बात तो अच्छी है पर खुल कर नहीं कही गई है। और यह खुल कर न कहना भी एक ख़ास चरित्र का परिचायक है।
देखने की बात यह है कि जिस प्रकार प्रगतिवादी युग में पुनरूत्थानवाद की अधोगामी प्रवृत्ति से लैस, अनेक लेखक प्रगतिशीलता का मुखौटा ओढ़कर प्रगतिवादी दस्ते में खड़े हो गए, ठीक उसी प्रकार वे लोग जो प्रगतिशीलता के चेहरे पर जब तक प्रतिष्ठा की चमक देखते रहे, उसके साथ जुड़े रहे और जब यह दीप्ति धीमी पड़ गई और उसकी सार्थकता पर संदेह होने लगा तो प्रगति का मुखौटा उतारकर जनवादी मुखौटे में अपनी सार्थकता साबित करने बैठ गए। ज़रूरत बार-बार मुखौटा बदलने की नहीं है। ज़रूरत है एक संयुक्त मंच पर आकर अपना आत्मालोचन करने की और जब तक ऐसा नहीं होगा प्रगतिशील लेखक आन्दोलन की जड़ों की पहचान अधूरी रह जायेगी।

(यह आलेख प्रोफेसर जैदी के ब्‍लॉग युग-वि‍मर्श से साभार लि‍या गया है।)

 

लेखक परिवर्तन नहीं कर सकता : अमरकांत

अपनी कहानियों में निम्‍न मध्‍यम वर्ग के काइंयापन को प्रमुखता से चित्रित करने वाले हिंदी के वरिष्‍ठ कथाकार अमरकांत का जन्‍म 1 जुलाई, 1925 को बलिया में हुआ। वह आज भी लेखन में सक्रिय हैं। डॉक्‍टर प्रेम कुमार ने उनके साथ एक दिन बिताकर उनके बचपन की शरारतों से लेकर रचना और जीवन के उतार-चढाव को को जाना-समझा-

एल.आई.जी. फ्लैट का वह छोटा-सा कमरा। छत, दीवारें, फर्श, खिड़कियां, जंगले, लटका झूल-सा रहा  नाममात्र का वह परदा, लकड़ी का सामान्य सा सोफा, एक बेड- सबकुछ उम्रदराज, वृद्ध-वृद्ध सा। इधर-उधर रखी कुछ पत्रिकाएं और दो-तीन पुस्तकें। साफ मालूम हो रहा है कि यह कमरा जरूरत के मुताबिक ड्राइंग रूम भी हो जाता है और डायनिंग-रूम भी। अमरकांतजी के लिए तो यह स्टडी-रूम भी है और स्लीपिंग-रूम भी। सबकुछ एकदम सहज-साधारण-आम आदमी के घर जैसा। एक हद तक तो आम आदमी के आम घर से भी साधारण सा। नीले चौखानेवाला तहमद, कुरता और सामने से खुली एक ऊनी जर्सी पहने सोफे की कुर्सी पर बैठे अमरकांतजी। चेहरे पर उत्साहित-सी चमक, स्फूर्ति भरी दमक। आवाज में तेज-तेज एक खास तरह की धमक, ठनक भी।

बात लेखन के शुरुआती दिनों के जिक्र से शुरू हुई है। प्रश्‍न के बाद कुछ पल की चुप्पी और फिर सोचने, पुराना कुछ याद करने की सी मुद्रा। वह आगरावाली उम्र को याद कर रहे थे- ‘मेरे लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई। तब ऐसा था कि पत्रकार बनना है, हिंदी के लिए कुछ करना है। ‘सैनिक’ आगरा से निकलता था, उसमें गया मैं। एक साल ट्रेनिंग के रूप में रहा, फिर कन्फर्म हुआ। आगरा में तीन साल रहना हुआ। वहां जो भी खट्टे-मीठे अनुभव हुए, वे तो हुए ही, पर मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत वहीं से हुई। वहीं सुअवसर मिला प्रगतिशील लेखक संघ के कुछ लोगों के संपर्क-सामीप्य में आने का।… नहीं, हमारा कोई पूर्व संपर्क नहीं था वहां। हमारे एक मित्र थे- विश्वनाथ भटेले, वही ले गए थे हमें प्रगतिशील लेख संघ में। हमारे परिचय में उन्होंने वहां कहा- गजल गाते हैं ये। तब वहां रामविलास शर्मा थे, धीरेंद्र अस्थाना, राजेंद्र यादव, राजेंद्र रघुवंशी आदि कुछ लोग कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर भी थे। बैठकों में कभी पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, रावीजी भी आते थे। रांगेय राघव उन बैठकों में नहीं आते थे। बहुत सुंदर- आर्यन ब्यूटी जिसे कहते हैं- उस तरह के थे रांगेय राघव। रामविलासजी से तब उनका मतभेद चल रहा था। उनके पास भी हमें विश्वनाथ भटेले ही ले गए थे।

‘दयाल बाग की तरफ घूमने निकल जाते थे हम लोग उनके साथ। बर्कले सिगरेट पीते थे, हमें भी पिलाते थे। खड़े होकर लिखते थे। जब हम उनसे मिले थे, एक साथ छह उपन्यास लिख रहे थे वे। एक-एक वाक्य, पैराग्राफ प्लान कर लेते थे सबका एक साथ।

‘फिर इलाहाबाद का जीवन। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ समूह का एक अखबार था- ‘अमृत पत्रिका’। उसमें अपाइंटमेंट मिल गया तो मैं इलाहाबाद आ गया। इलाहाबाद राजनीति, शिक्षा एवं साहित्य का केंद्र था। इलाहाबाद में कुछ लिखा तो नहीं मैंने, पर दबाव बहुत झेले। जिस अखबार में काम करता था, वहां वेतन को लेकर मालिकों से संघर्ष हो गया। हड़ताल का नोटिस दे दिया गया था। उन सारी एक्टीविटीज में भाग लेना होता। तब पत्रकारों में यूनिटी थी। हिंदी भाषा के प्रति प्रतिबद्ध, थोड़े वेतन में गुजारा। पेपर कैसे लोकप्रिय हो, प्रसार संख्या कैसे बढ़े- यह सबकी चिंता होती थी। आंदोलन शुरू होते ही वातावरण तनावपूर्ण हो गया। उत्पीडऩ शुरू हुआ, लोग निकाले जाने लगे। साहित्य के मोर्चे पर प्रगतिशील लेखक संघ तथा ‘परिमल’ नाम की साहित्यिक संस्थाएं थीं। इनमें विचार की टकराहटें होती रहती थीं। प्रलेस में प्रकाशचंद्र गुप्त, भैरवप्रसाद गुप्त, शमशेर, अमृतराय, दुष्यंत, कमलेश्वर भाई आदि थे और परिमल में धर्मवीर भारती, विजय देव नारायण साही, केशव प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि थे। वर्ष 1954 में मैं बीमार पड़ गया। बी.पी. की शिकायत हुई, फिर हर्ट ट्रबल। शाम की ड्यूटी में अचानक पेन। सांस लेने में तकलीफ। मित्र ने घर पहुंचाया। उस समय इन बीमारियों के बारे में इतनी जागरुकता नहीं थी। नौकरी छोडऩी पड़ी। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में रहा तो स्वस्थ हुआ।‘

अमरकांतजी से मैंने उनके नाम-परिवर्तन के बारे में जानना चाहा है। शांत सी एक हंसी धीमी चाल चलकर उनके होंठों तक आई और धाईं छूने जितनी जल्दी के साथ वापस लौट गई- ‘मैं तब श्रीराम वर्मा था। अमरकांत मेरा पेन-नेम है। 1953 में बदला। मेरी पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ 1953 में ‘कल्पना’ में छपी थी। तभी पेन-नेम ‘अमरकांत’ कर लिया।‘

पहली रचना के छपने की उस खुशी के अहसास का अब कितना कुछ याद रहा है आपको?

‘पहली रचना के छपने की खुशी? देखिए, रचनाओं के छपने की खुशी तो होती है, पर हम उछल जाएं, ऐसा तो नहीं है। मैं जब लिखता हूं तो संदेह में रहता हूं कि कैसी बनी? जब दूसरे लोग बताते हैं तो लगता है कि ठीक बनी। अब तो आदत कुछ ऐसी बन गई है कि खुशी हमारे अंदर अधिक देर तक नहीं रह पाती। बीमारी की वजह से हम बहुत इंडल्ज करना एवॉइड करते हैं। बहुत सी रचनाओं को मैं फिर लिखना चाहता था। जैसे ‘जिंदगी और जोंक’ को दोबारा लिखना चाहता था। असंतोष था। उसी समय अचानक राजेंद्र यादव घर पहुंचे। कहानी हाथ से छीन ली। बहुत फटकारा- ‘ये क्या कर रहे हो? दूसरी कहानी लिखो।‘ लेखक अपनी रचनाओं के बारे में कभी संतुष्ट नहीं होता। तारीफों से खुश होता है, पर विश्वास नहीं होता कि क्या बनी। क्योंकि रचना से अलगाव हो जाता है। हां, तो रचना छप जाए, खुशी तब भी होती है, पर उसका असली मजा तब है जब दूसरा तारीफ करे, उसे स्वीकार करे। मेरे साथ यही होता है। शायद औरों के साथ भी ऐसा होता होगा। लेकिन तारीफ से भी क्या? अपनी रचना जमाने के साथ चलती और विकसित होती है। नए-नए आलोचक नए-नए दृष्टिकोणों से उसकी व्याख्या करते हैं।‘

और अब वे अपनी कुछ चर्चित कहानियों के रचने के क्षणों, आधारों, प्र्रेरणाओं को याद कर सुना-समझा रहे हैं- ‘हमारे छोटे भाई तब इंजीनियर थे आजमगढ़ में। उन्होंने कहा कि थोड़े दिन हमारे यहां रहकर आराम कीजिए। बीमारी के बाद हम सपरिवार उनके यहां रहने चले गए। ‘कहानी’ से पत्र आया कि ‘55 के विशेषांक के लिए कहानी भेजिए। तब मैंने उन्हीं के लिए लिखी थी ‘दोपहर का भोजन’। देर नहीं लगी। असल चीज है फॉर्म। फॉर्म पता है तो तुरंत समझ आ जाता है सब। यदि प्लॉट पता है, पर फॉर्म पता नहीं है तो कई बार लिखकर काटना पड़ता है। फॉर्म कभी पकड़ में आता है, कभी नहीं आता है। समझ नहीं आता कि इस रियलिटी को कैसे प्रेजेंट करें। हर रियलिटी हर फॉर्म में एक्सप्रेस नहीं हो सकती। तो तुरंत लिख गई थी वह- एक सिटिंग में। ‘डिप्टी कलेक्टरी’ अपने एक अन्य भाई के जीवन पर लिखी थी। ‘दोपहर का भोजन’ लिखने के बाद आजमगढ़ से हम बलिया आ गए। वहां हमारी मां थीं, पिताजी थे। पिताजी वकालत करते थे। उम्र भी हो गई थी उनकी। परिवार का बोझा था। किराए का मकान था, वह भी अच्छा नहीं था। नहीं, बलिया के नहीं, हम बलिया के एक गांव ‘नगरा’ के रहनेवाले हैं। नगरा का एक टोला है- भगमलपुर। तो हम बलिया आ गए। धीरे-धीरे स्ट्रेंग्थ गेन कर रहे थे। पत्रकार की नौकरी छूट ही चुकी थी और कोई एक्टीविटी नहीं थी। रेलवे स्टेशन से ‘कहानी’ पत्रिका मंगवा लेता था। एक अंक में अखिल भारतीय प्रतियोगिता के बारे में छपा था। पहले सोचा कि बेकार है इस बारे में सोचना। फिर योजना बनी तीन कहानी लिखने की। जो सर्वोत्तम निकले, उसे प्रतियोगिता में भेज दिया जाए। पहली कहानी ‘जिंदगी और जोंक’ उठाई। सोचा, बहुत मेहनत नहीं करेंगे। थोड़ा-थोड़ा रोज लिखेंगे। अधिक स्ट्रेन नहीं ले सकते थे। रोज थोड़ा-थोड़ा लिखते। आपने पढ़ी है वो कहानी? रजुआ- वो करेक्टर है उसमें। बलिया में ही देखा था उसे हमने। हमारे वाले मुहल्ले का ही था। करीब दस एक दिन लगे होंगे- वह कंपलीट हो गई। इसके पूरा होते ही दूसरी उठा ली। एक दिन की भी देर नहीं की। ये भी हमारे परिवार की थी। भाई लॉ करके बलिया आ गए थे। बलिया जैसे छोटे शहर में रहकर उनका बिना सुविधा, अपने बूते आई.ए.एस. में बैठना। सिंपिलीसिटी के मास्टर थे वे। जटिल से जटिल चीजों को सिंपिलीफाई कर देते। कुछ विषयों में टॉपर। लिखित में नंबर अच्छे आते, पर इंटरव्यू…। इंटरव्यू का जब कॉल आता था तो जैसे ताजी हवा का आना, स्वप्न, आशा का वह उत्साह, पिता की आशाएं, प्रतीक्षा- आप ‘डिप्टी कलक्टरी’ में देख सकते हैं। तीसरी भी लिखी, पर वो नियंत्रण के बाहर हो गई, लंबी हो गई। फाड़कर फेंक दी। नहीं शीर्षक तो अब याद नहीं।

‘’डिप्टी कलक्टरी’ कहानी पुरस्कृत भी हो गई। ‘जिंदगी और जोंक’ का यह हुआ कि अश्कजी उन दिनों ‘संकेत’ नाम से हिंदी में एक साहित्य संकलन निकाल रहे थे। शुरू में कमलेश्वर और मार्कंडेय उससे सहायक संपादक के रूप में जुड़े थे। बाद में कुछ हुआ कि वे अलग हो गए। तो कमलेश्वर ने कहानी भेजने का पत्र लिखा। मैंने ‘जिंदगी और जोंक’ भेज दी। अश्कजी को बहुत पसंद आई। उस संकलन में तब के सभी लेखक छपे थे। मोहन राकेश, शेखर जोशी, राजेंद्र यादव की ‘जहां लक्ष्मी कैद है’, नागार्जुन का ‘वरुणा के बेटे’, परसाई भी थे, ड्रामा भी था, कविताएं भी थीं। ‘कहानी’ का वह विशेषांक महत्वपूर्ण था। बहुत चर्चा हुई। हिंदी क्षेत्र के चारों ओर के पत्र। कहानी के साथ भैरवजी ने अपनी टिप्पणी में एक लाइन यह भी जोड़ दी थी कि इस रचना का लेखक बेकार है और नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। आप देखिए, उसे पढ़कर कितने लोगों ने मुझे नौकरी के लिए पत्र लिखे। यह भी देखिए कि तब कितना असर होता था इन चीजों का। ‘56 के शुरू में ‘कहानी’ का वह अंक और उसके थोड़े बाद ही ‘संकेत’ का अंक। कहानी के पक्ष में एक अभूतपूर्व माहौल। अकल्पनीय। लोग घोषित कर चुके थे कि कहानी की संभावना अब खत्म। कविता के युग की घोषणा हो चुकी थी। ठीक है कि कहानी व्यक्तिवाद, दार्शनिकता या प्रगतिशील राजनीतिक भावुकता में खो गई थी- पर उस दौर में कहानी को वातावरण, वह स्थान मिला कि आज उसकी इतनी पूछ है। नए तेवर, नई भाषा, नए शिल्प के साथ जीवन और समाज को केंद्र में रखकर नई संभावनाएं तब उभरकर आई थीं। कई तरह के लोग लिख रहे थे तब।

‘तो बलिया में दो और आजमगढ़ में एक यानी तीन कहानियां लिखीं हमने उस कठिन दौर में। एक उपन्यास भी लिखा- ‘सूखा पत्ता’।‘ उनका हाथ मेरे कंधे पर आ टिका है- ‘नहीं पढ़ा हो तो पढ़ लीजिए। पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र का जो कच्चापन होता है- वय संधि कहिए उसे, उस पर है। तीन छोटे-छोटे खंड हैं। उसमें एक प्रेमकथा भी है। बाद में हम इलाहाबाद आ गए। ‘दैनिक भारत’ निकलता था तब वहां से। पुराने पत्र में जाने का सवाल नहीं था। वहां वैसे भी ट्रबल चल रहा था। सो ‘दैनिक भारत’ में आ गया। जब से तबीयत खराब हुई, रात में लिखना बंद कर दिया था।‘ और अब तब के इलाहाबाद में बीते कुछ दिन उन्हें याद आ गए हैं- ‘उस जमाने में साहित्य का केंद्र था इलाहाबाद। वैचारिक कहिए या साहित्यिक- विवाद भी यहां खूब थे। भारती, साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी और अन्य अनेक लोग थे। ‘परिमल’ थी, उससे जुड़े लोग थे। उनके मार्गदर्शक अज्ञेयजी थे। प्रयोगवाद के रूप में आंदोलन पहले आया, फिर नई कविता चली। उधर से प्रगतिशील लेखन का विरोध होता ही था। वैचारिक स्तर पर प्रेमचंद पर निशाना साधा जाता था और इधर से व्यक्तिवाद आदि पर। नोक-झोंक चलती रहती, दोनों ओर से गोष्ठियां और सम्मेलन होते रहते। सभी उनमें भाग लेते। आज ऐसा नहीं है। ‘परिमल’ में भारती सबसे आगे रहते थे। साही प्रबुद्ध व्यक्ति थे। गहराई से सोचनेवाले, चिंतक किस्म के थे। तब गतिविधियां बहुत होती थीं- परिमलवालों की भी, प्रगतिशीलों की भी।

‘…नहीं, इंस्पायर होकर नहीं लिखा। बड़ी तकलीफों में लिखा है हमने। आर्थिक समस्याएं बहुत थीं। कोई खास तनख्वाह नहीं थी। शादी हो गई थी। दो बच्चे भी थे। उपन्यास लिखने पड़ते थे। ‘काले उजले दिन’, ‘पराई डाल का पंछी’- हां, बाद में यह ‘सुखजीवी’ करके छपा। इंस्पायर होकर तो पहला उपन्यास ही लिखा- ‘सूखा पत्ता’। श्रीपत राय (कहानी) की नौकरी तक कुछ कहानियां हमने लिखी थीं। मेरा खयाल है, शायद ‘59 में सभी लोग वहां से निकाल दिए गए थे पंद्रह-पंद्रह दिन का नोटिस देकर। मैं संन्यासी, भैरवजी…। उसके बाद ‘अमृत पत्रिका’ में हमारे एक पुराने साथी थे कस्तूरचंद, उन्हें मेरी बेकारी का पता चला तो उन्होंने लिखा कि तुम यहां आ जाओ। वह एक संस्था थी- मैं वहां चला गया। कैंपस में मकान मिला, मजा आया वहां। पर बदमगजी कहां पैदा हो गई, हम नहीं जानते। संभव है, मैंने थोड़ी आलोचना कर दी होगी। आप जानते हैं कि यदि आप व्यवस्था में रहते हैं तो हाथ-पैर बचाकर रहिए। पर लेखक का यह है कि वह ऐसे समय में वाचाल हो जाता है। छह महीने बाद नौकरी का रिन्यूअल होना था, पर हमसे कह दिया गया कि खेद है, आपका रिन्यूअल नहीं हो पाएगा। हमारे लिए तो यह मरण हो गया। सब चीजें कच्ची थीं। बच्चे छोटे थे। उन्हीं दिनों बाद में ‘पराई डाल का पंछी’ लिखा। एडवांस जो मिला, ले लिया। वहां से लखनऊ आ गया। नौकरी कोई थी नहीं, कोई फिक्सड डिपोजिट नहीं, इन्कम नहीं। हवा में थे हम।‘  अजीब-सी, खाली-खाली सी एक खास तरह की हंसी।

‘…तब सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना भी हमारे वाले मुहल्ले राजेंद्र नगर में ही रहते थे। हम लड़ते भी थे, पर एक-दूसरे के काम भी आते थे। वे मेरी बेकारी को लेकर चिंतित थे। आप देखिए कि एक साल तक उन्होंने हर महीने हमें रेडियो के तीन कार्यक्रम दिए। एक कार्यक्रम का पारिश्रमिक तीस रुपये। महीने के नब्बे रुपये हुए। सन् 60 की बात है, तब मकान का किराया था पचास रुपए। कहानी आप रोज तो लिख नहीं सकते, सो और भी कुछ लिख-लिखा लिया। ‘ग्राम्या’ के लिए ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखवाया। श्रीकांतजी ‘कृति’ निकालते थे, उसके लिए लिखा। ‘ग्राम्या’ में तब जो लिखा, वह ‘ग्रामसेविका’ उपन्यास में आया। लस्टम-पस्टम चलता रहा सब। ‘मूस’ भी वहीं लिखी। वह ‘नई कहानी’ में छपी और चर्चित हुई। सर्वेश्‍वर से बहसें अकसर प्रेमचंद को लेकर होतीं। वे कहते- प्रेमचंद का साहित्य नखासगंज का साहित्य है। मैं पूछता- तुम्हारा क्या हजरतगंज का है? खूब नोक-झोंक चलती। इलाहाबाद में भारती से हमारा यह सब चलता रहता था। बहसें होतीं, पर संबंध थे। मैंने वहां से एक स्केच टाइप, थोड़ी ह्यूमरस टाइप एक चीज भेजी- वह ‘धर्मयुग’ में छपी। भारती ने लिखा कि हमें एक महीने में इस तरह की तीन रचनाएं दीजिए। चाहता तो कर सकता था, पर उस ऑफर को मैं नहीं कर सका। बड़ी बाध्यताएं थीं, बहुत संकट थे, मैं कर नहीं पाया, हालांकि उससे मेरा हित होता।‘

अब लखनऊ के उस स्वर्णकाल को याद किया जा रहा है- ‘तब तीन महान उपन्यासकार लखनऊ में रहते थे- नागरजी, भगवतीचरण वर्मा और यशपालजी। इस उपन्यासकारत्रयी पर लखनऊ को गर्व था। श्रीलालजी वहीं पोस्टेड थे, सर्वेश्वर थे, कुंवर नारायण थे। हजरतगंज तब घूमने के लिए एक अच्छी जगह थी। कॉफी हाउस होता था तब वहां, बहुत से लोग आते थे। डिस्कस करते थे। यशपालजी आते थे, पर सात बजे वहां से उठ लेते थे। उस डिसकशंस का वे कहानियों में उपयोग कर लेते थे। श्रीलालजी अंग्रेजी-संस्कृत में कुछ-न-कुछ सूक्ति छोड़ते रहते थे। पढ़े-लिखे विज्ञ हैं वे। अफसर भी थे तब। मजा आता था सुनकर। मैं दोस्तों में श्रोता ही रहा हूं। ज्यादा बोलता नहीं हूं। यूं कभी-कभी बस मजाक भर कर लिया। दूसरों को सम्मान देने की हमेशा मैंने कोशिश की है। स्वयं को सदैव छोटा समझकर ही चला। वह मेरा ही संकोच था कि मैं इन तीन ख्यात लेखकों में से केवल नागरजी के ही निकट पहुंचा।‘ कुछ याद करने की सी खास मुद्रा में रुककर सोचा गया है- ‘एक बार शुक्लजी की कार में बैठकर हम नागरजी के यहां गए। देखा- वे बैठकर सिलबट्टे पर भांग घिस रहे हैं। नागरजी जिद पर आ गए कि तुम भी भांग पीओ। मैंने बहुत कहा कि मैं परहेज से रहता हूं, कभी-कभी सिगरेट पीता हूं, पर भांग या शराब नहीं पीता। वे नहीं माने, थोड़ी-सी पिला दी। उन दोनों ने ठाठ से पी। साइकोलॉजिकल ही रहा होगा कुछ मेरे साथ कि मेरी तबीयत कुछ गड़बड़ हुई।‘ अल्प सा एक विराम फिर आया। जरा देर बाद चहक भरे से फिर बोले, ‘एक रोचक घटना याद आ रही है इस समय, सर्वेश्‍वरजी के अज्ञेयजी से निकट के संबंध थे। सर्वेश्‍वर पहले ए.जी. ऑफिस में थे। ‘परिमल’ में वे थे ही और अज्ञेयजी के कारण ही ‘दिनमान’ में गए। अज्ञेयजी उनके यहां आए हुए थे। नौकर बुलवाने के सिलसिले में मुझे सर्वेश्वरजी की पत्नी से बात करनी थी, इसलिए मैं उनके घर गया। अंदर देखा- उस हॉलनुमा कमरे में अज्ञेयजी चारपाई पर बैठे थे। उनसे पहले मिलना-देखना तो हुआ था, पर बातचीत नहीं हुई थी। वे चिंतनमग्न बैठे थे। मैं बराबर के कमरे में सर्वेश्वर की पत्नी से बात करके चला आया। सर्वेश्‍वर की पत्‍नी ने कहा भी कि ये अज्ञेयजी हैं। शायद संकोच था। दूसरे दिन सर्वेश्‍वर इस बात पर बहुत बिगड़ा। मैंने सफाई दी- ‘पता नहीं उन्होंने मेरा क्या कुछ पढ़ा होगा या नहीं? मैं कैसे इंट्रोड्यूस करता खुद को?’  वह चिल्लाने लगा- ‘वो एक-एक नए लड़के को जानते हैं। सबको पढ़ते हैं।‘ एक दिन सर्वेश्‍वर ने ही कहा कि तुम पंतजी से जाकर क्यों नहीं कहते। वे सरकार के सलाहकार हैं। मैं गया, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। तब तक वे सलाहकार नहीं रह गए थे। फिर स्थितियां इतने अंतिम छोर पर पहुंच गईं कि लखनऊ में रहना मुश्किल हो गया। जो कुछ थोड़ा सामान था, उसके साथ लद-फदकर हम लखीमपुर खीरी पहुंच गए। तब हमारे भाई वहां ज्यूडीशियल अफसर थे। वे वहां राजा की कोठी के एक पोर्शन में रहते थे। राजा के एक भाई थे। उन्हें हमने देखा भी, उनके बारे में सुना भी। बाद में उन्हीं पर केंद्रित एक कहानी लिखी- ‘आकाश-पक्षी’।

‘उसी बीच भैरवजी ने लिखा कि वहां कहां पड़े हो, यहां इलाहाबाद आ जाओ। इलाहाबाद से जब गए थे तो श्रमिक बस्ती में हमारा एक क्वार्टर था। तब दस रुपये किराया था उसका। एक खास मित्र के कहने पर वह क्वार्टर हमने किसी को दे दिया था। देते समय सोचा नहीं था कि लौटना पड़ेगा। दुर्योग कि लौटना पड़ा। उस व्यक्ति का परिवार बस चुका था वहां। उससे कुछ नहीं कहा और खुद कुछ दिन ए.जी. ऑफिस के भाटियाजी के यहां रहा। भैरवजी दिल्ली गए तो उन्होंने शेखर जोशी को अपने घर में रहने को कहा। जोशी भैरवजी के यहां लूकरगंज चला गया और मैं जोशीवाले घर में जा पहुंचा। मेरी कहानियों के साथ वही- 20/5, करेला बाग कॉलोनी वाला ही पता छपता था। ग्रैंड आदमी है जोशी। आप देखिए कि भैरवजी को दिल्ली से जल्दी ही वापस आना पड़ा। और यह देखिए कि शेखर मुझसे कुछ कहने नहीं आए। उनका वह घर जिसमें मैं था, सस्ता था, पर उन्होंने एक दूसरा महंगा मकान ढूंढ़ लिया वहीं लूकरगंज में। मुझसे कुछ नहीं कहा, ताकि मुझे दिक्कत न हो। मैं यहां मित्रों के सहारे ही रहा हूं। ‘60 के अंत में आया था और ‘80 के अंत तक रहा वहां, करेला बाग कॉलोनी में। ‘65 तक स्वतंत्र लेखन की स्थिति रही। अप्रैल ‘65 में माया प्रेस ज्वाइन किया। माया प्रेस से पहले हमने अश्कजी का काम किया था। बच्चों के लिए काफी कुछ लिखवाया था उन्होंने तब हमसे।‘

कुछ ऐसा याद आया है कि देर तक हंसे हैं। हंसी के साथ ‘सर्वसेवा संघ’ में काम करने के दिनों की बात शुरू हो गई है- ‘सर्वोदयी नेता सिद्धराज ढड्ढा से पहले दो-एक बार मुलाकात हो चुकी थी। उनका कार्यालय बनारस में था। वे अपने प्रकाशन पेपर बैक में लाना चाहते थे। सबकुछ की तैयारी मेरे जिम्मे थी। तनख्वाह ढाई सौ रुपये। नीचे जमीन पर बैठते थे सब। पूजा-पाठवाली चौकी जैसी मेज- लंबाई में बैठे हैं सब, पीठ पीछे मसनद, दीवार का सहारा। दो-तीन दिन काम किया। शाम को वहां चाय का इंटरवल होता था। सारे कर्मचारी एक कमरे में होते। इतने स्कैंडल्स- भ्रष्टाचार, सेक्स की इतनी बातें। उफ, सर्वोदयी लोगों का उस तरह स्कैंडल्स में रस लेना। दो-तीन दिन मैं बैठा। अजीब, विचित्र हालत- घड़ी की सुई घुमाई जाती, कोई समय से नहीं आता था। दस बजे वहां पहुंचनेवाला केवल मैं होता था। आखिर होली पर ही मैं इलाहाबाद आ गया। मार्कंडेय ने कहा कि ‘मित्र प्रकाशन’ में जगह खाली है, जाकर मिलो। भैरवजी ने फिर लिखा कि कैसे लोगों के बीच पड़े हो, यहां आ जाओ। ‘65 से 95 तक- तीस साल रहा हूं मित्र प्रेस में। जब ज्वाइन किया तो कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा था। चेक्स डिसओन हो रहे थे।‘ चेहरे पर तृप्ति भरा गर्वीला-सा एक उल्लास है- ‘बाद में इतना डेवलपमेंट… कि क्या कहें… सब देखा।‘

‘…प्रगतिशील लेखक संघ में तब डिवीजन हो गया था। वह उतना सक्रिय नहीं था, जनवादी लेखक संघ बन गया था। पर मैंने ओरिजनल संस्था में रहना उचित समझा। कारण? यही कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी में टूट हुई है तो उसके लिए साहित्यिक संगठन क्यों टूटे। तब हमारे दिन-रात के साथ- मामूली साथ नहीं रहे थे वे- छोड़कर दूसरी ओर चले गए। देखते-देखते सब क्या कुछ हुआ।‘ लंबी-गहरी सांस ली है।

एकदम चुप, गंभीर हो गए हैं। पहली बार हम लोगों के बीच खामोशी का इतना लंबा ठहराव हुआ है। भावुक-सा कुछ जैसे उफनकर बाहर आना चाह रहा हो और उसके ढके रखने की कोशिश में होठ हैं कि ढक्कन की तरह उठ-गिर रहे हैं। आहिस्ता-आहिस्ता। ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ मिलने से जुड़े कुछ संदर्भ-क्षण याद आना शुरू हुए हैं- ‘मैं प्रगतिशील था, पर कम्युनिस्ट नहीं था। फिर भी मुझे 1984 में पुरस्कार मिला। नामवर के कारण मिला। अनएक्सपेक्टिडली मिला। अचानक सुबह-सुबह लंबा-सा एक तार घर आया पुरस्कार मिलने का। और आप देखिए कि एक घंटे बाद मालूम हुआ कि इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई…। चारों तरफ तहलका- 31 अक्टूबर, 1984 बड़ा शॉक लगा। बेहद दु:खद घटना थी वह। किसी को नहीं बताई हमने पुरस्कार मिलने की बात। घर पर कह दिया कि किसी को मत बताना। दफ्तर में मित्रों को भी तब बताया जब स्टेट मोर्निंग खत्म हो गई थी। रूस अगले साल जुलाई 85 में गया… 15 दिन वहां रहा।‘

अचानक तब अमरकांतजी की बीमारी के एक खास दौर की यादें दौड़ी चली आई हैं- ‘सोवियत लैंड से आकर 1986-87 में हम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बेहद दर्द रहता था। रीढ़ की टी.बी. बताई थी। ये छोटेवाले पुत्र थे साथ। हां, दूसरे पुत्र अरुण वद़र्धन- ‘नवभारत’ में हैं, उनकी पत्नी कुमुद शर्मा यूनीवर्सिटी में पढ़ाती हैं। साहित्यकारों ने तो तब जो किया सो किया ही, पर दफ्तर, पत्रकारों और सरकार ने भी सपोर्ट किया। पत्रकारों के सहयोग का ही परिणाम था कि तब के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह घर देखने आए और पचास हजार का अनुदान घोषित किया। डॉक्टर हर सप्ताह आते थे, पर एक पैसा फीस का नहीं लिया। बाद में प्रेस मालिक ने भी किया। करीब डेढ़ साल तक मैं माया प्रेस नहीं गया, पर तनख्वाह तो मिलती ही रही। इंक्रीमेंट भी देते रहे, और भी हेल्प की। मैं एक तरह से तब सारे समाज से कटा हुआ था, पर बहुत मदद मिली। इससे आपको मॉरल ताकत मिलती है और फिर ‘88 के अंत में मैंने री-ज्वाइन किया अपनी ड्यूटी पर। यस, ऐज ज्वाइंट एडीटर…।‘

चाय पीते-पीते बताया जा रहा था- ‘चाय बस सवेरे और शाम को। सुबह दो कप, शाम को एक। कोई आ जाए तो बीच में पी लेते हैं, वैसे नहीं। अब देखिए, आपके साथ हम पी ही रहे हैं। नहीं, टहलने नहीं जा पते। पैर में तकलीफ है… ट्रैफिक सेंस नहीं है लोगों में… कमरे में टहल लेते हैं बस।‘

चाय के बाद सिलसिला फिर से शुरू करने के लिए मैंने पूछा था- कुछ अन्य रचनाओं और रचनाकारों ने भी तो आपके लेखन को प्रभावित किया होगा? बिना एक पल की देर लगाए वे कहने लगे, ‘प्रभाव तो पड़ता है। प्रेमचंद को तो बाद में पढ़ा। शरत को पढ़ा, उनका प्रभाव रहा। करुणा-दया ने प्रभावित किया। उनकी कई रचनाएं पढ़ीं। रवींद्रनाथ टैगोर की छोटी-छोटी कहानियां बहुत पसंद आईं। जैसे- ‘वापसी’, ‘काबुलीवाला’। ‘वापसी’ बहुत अच्छी कहानी है। ‘कफन’, ‘पूस की रात’, और अन्य बहुत-सी मारवेलस कहानियां हैं प्रेमंचद की। जैनेंद्र का ‘त्यागपत्र’ जब पढ़ा तो बहुत अच्छा प्रभाव हुआ। यंगमेंस का जो प्रभाव होता है, वह ‘इफ एंड बट्स’ में नहीं होता। ‘शेखर एक जीवनी’ का अच्छा असर पड़ा। ‘संन्यासी’ को पढ़ा। एक हसरत होती थी कि हम भी ऐसा लिखें। यह भावना आती कि मैं ऐसा लिख सकता। सोचता था कि मैं स्थूल नहीं, सूक्ष्म लिखूंगा। यशपालजी की भी कुछ कहानियां थीं, लेकिन उनमें से कुछ शॉक भी करती हैं। ‘ज्ञानदान’ है जैसे। वैचारिक है वो, पर… ये सब शुरुआती है। फिर अचानक बाहर की कहानियां पढ़ने को मिलीं। गोर्की, टॉल्सटॉय, दोस्तोवस्की आदि को पढ़ा। ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ा। अच्छा लगा- जीवन को समझने की समझ मिली। चेखव की कहानियां थोड़ा बाद में मिलीं। बलिया में था, तब जो मिल गया सो ठीक। ‘सैनिक’ में जाने के बाद कुछ मिला, कुछ खरीदा; पर वो शुरुआती दौर था। उम्र के अनुसार चीजें बदलती जाती हैं। जिस पीरियड में यह सब पढ़ा, हम आंदोलन में बिजी थे। फुरसत नहीं मिलती थी, घूमते-दौड़ते पढ़ते थे। उस समय के इंप्रेशंस अलग तरह के हैं- ताजगी भरे। अपने को उसी तरह का हीरो समझने की भावना। हर पीरियड का अलग इंप्रेशन। आज मैं जो पढ़ता हूं, उसी तरह की चीजें चाहिए…।‘

अब चर्चा के केंद्र में नई कहानी, उसको लेकर गांव-शहर को केंद्र में रखकर चली-चलाई गई बहसें और उस दौर की कहानियों का प्रदेय जैसे कुछ विषय आते जा रहे थे- ‘उस दौर में गांव-शहर की कहानियों का विवाद चला था। उसी दौर में मार्कंडेय, रेणु, शिवप्रसाद सिंह, केशव प्रसाद वर्मा, भैरवप्रसाद गुप्त आदि गांव के कहानीकार थे। ये सब गांव के लोग थे। मेरी समझ से यह बहस वर्चस्व की थी। यह तो है ही कि गांव एक व्यापक चीज है, हिंदुस्तान का रिप्रेजेंटेटिव है। अधिसंख्य जनता गांव में रहती है। इसलिए उस पर लिखना क्रेडिट की बात तो है ही। आप शहर की बात करें तो वहां ऊपर का चिकनापन है, भीतर छल है। आज तो और भी ज्यादा है। तो गांव पर अच्छा लिखना- जैसे प्रेमचंद, रेणु ने लिखा, क्रेडिट की बात तो है ही। शहर की नई संवेदना, नई चीजों और वहां के नए मूल्यों को केंद्र बनाकर राकेश, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव आदि ने लिखा। ‘मैला आंचल’ के साथ आंचलिकता की भी बात चली। मटियानीजी भी अंचल की बात करने लगे। तब इन सब में यह चला कि नया कौन है? नवीनता कहां है? गांव को नया नहीं माना गया, जबकि शहर का यथार्थ, संवेदना, शिल्प- सबकुछ नया माना गया। राकेश अपनी बातों को इसी तरह प्रस्तुत करते थे। खूब बहसें चलीं। यहां इलाहाबाद में भी- ‘परिमल’ में नहीं, पर लेखकों में चलीं। उन बहसों में ही यह तथ्य उभरकर आया कि ‘परिंदे’ नई कहानी के दौर की पहली कहानी है। इसे लेकर खूब विवाद चला। राकेश ने कहा कि ‘परिंदें’ भावुकता से भरी कहानी है…। नहीं, इन बहसों में हम कभी नहीं पड़े, न कभी लिखा। बाद में लिखा। ‘तद्भव’  के लेख को आप पढ़ें। मैं तो पहले से भी और अब भी कहता हूं कि निर्मल बहुत महत्वपूर्ण कहानीकार हैं- पर यह कहना कि वह पहली कहानी है अथवा कोई और या वो- तो ये कोई खास चीज नहीं है। गांव के तो और भी लेखक थे, पर शहरवाले ये तीन- राकेश, कमलेश्‍वर, यादव। भारती भी कुछ दिनों को उनके साथ आ गए थे। बाद में उन्होंने कुछ अच्छी कहानियां लिखीं, पर वे बहस में नहीं थे। और यहां इस प्र.ले. संघ में तो आलोचना ही होती थी उनकी।… मैला आंचल… हां, वो संस्करण जो रेणु ने छापा था, ‘57-58 में पढ़ होगा। पता नहीं किसने दिया, कैसे मिला- बलिया में पढ़ा था। पढ़कर अभिभूत हो गया था तब।

‘क्यों नहीं? उस दौर में परिवर्तन हुए- नवलेखन में तो हुए ही। आजादी के बाद के लेखन में चीजें पहले की तरह तो नहीं ही रहीं। वह जो बौद्धकता थी- चाहे वह क्रांतिकारी बौद्धिकता हो या कलावादी अथवा फ्रायडीयन- वे लोग अपनी चीजों को जीवन से साबित नहीं कर पाए, इसलिए दार्शनिकता से करते थे। हां, जैसे ‘दादा कामरेड’ या ‘सुनीता’ है- ये सब जीवन का टुकड़ा मालूम नहीं होता, बस थोपा जैसा कुछ अनुभव होता है। प्रगतिशील क्रांतिकारिता भी बौद्धिक अधिक थी। तब मध्य वर्गीय बौद्धिकता थी। जीवन को करीब से छूना, स्पर्श करना, विश्‍लेषण करना नहीं था। ये नहीं कि पहली सारी चीजें लुप्त हो गईं, पर उस रूप में नहीं रहीं। आजादी से पहले के जो साहित्यकार थे, वे राष्ट्रीय महत्व या प्राचीन गौरव का बयान करते थे। उसमें भावुकता-बौद्धिकता का होना जरूरी था। यह चेतना छायावाद से आई। साहित्य के विकास का एक पीरियड होता है। ‘दुलाईवाली’ कब लिखी गई? जब लिखी गई तब कच्ची थी। फिर धीरे-धीरे वह पकती गई। गुलामी के काल में जो भावुकता थी, प्रेमचंद ने- शुरू में नहीं, बाद में- उसे बचाया। लेखक और समय भी प्रगति तो करता ही है। तो तब जो नवलेखन था, वह बदला हुआ था। राकेश ने अगर ‘मलबे का मालिक’ लिखी तो वह पहले नहीं, आजदी के बाद ही लिखी जा सकती थी। घटनाएं आपको परिपक्व करती हैं। उस स्थिति में आप घटना पर परिपक्व ढंग से सोचते हैं। तब एक तो यह हुआ कि आप गुलामी से मुक्त हुए। दूसरा यह कि जिन्हें हम हीरो समझते थे, वे वैसे सिद्ध नहीं हुए। यहां भी आप परिपक्व होते हैं। ऐसे में दो ही चीजें हैं- या तो हम उनके पीछे चलें या फिर ठीक सोचें तो उन्हें चेक करें। साहित्यकार संवेदनात्मक रूप से चीजों को पेश करता है, वह राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं करता- कर नहीं सकता। वैसे भी रचना पहुंचती ही कहां है जनता तक! कुछ खास लोग ही पढ़ते हैं उन्हें। परिवर्तन तो राजनीति से होता है। रचनाएं तो चलती रहती हैं, संवेदनाओं का निर्माण-परिष्कार करती रहती हैं। काल बीत जाता है, समय बीत जाता है, लोग रचनाओं से विचार- आधुनिक विचार भी- प्राप्त करते रहते हैं। बिलकुल- जैसे कालिदास, तुलसी, शेक्सपियर की रचनाएं चल रही हैं आज तक।

‘तो- तब परिवर्तन तो हुआ। भाषा, शिल्प में ढीलापन और भावुकता गायब हुई। जीवन को देखने की दृष्टि भी बदलती। नहीं, नई कहानी नाम से कोई कहानी शुरू नहीं हुई। तब शहर, कस्बे या गांव की जो भी कहानी हुई, उसे नई कहानी नाम दे दिया गया। जैसे नई कविता की शुरुआत प्रयोगवाद से हुई, वैसा कुछ कहनी के साथ नहीं था। कविता, कला के जो पश्चिमी आंदोलन थे, उनका अधिकतर प्रभाव कविता पर पड़ा। कहानी पर वैसा प्रभाव नहीं था। बाद में बहसें जरूर हुईं। पहले की अपेक्षा रचनाओं में जो ताजगी, नयापन, नया परिवर्तन आप देखते हैं, उस आधार पर आप यह नाम दे भी सकते हैं। तब हुए नवलेखन की कुछ चीजों को लेकर आप यह कह सकते हैं। पर तब बहस इस दिशा में चल पड़ी कि कौन पहली? तो वह गलत दिशा में चली गई। उसके बाद ‘60 की पीढ़ी- और फिर पता नहीं किस-किस नाम से साहित्य में यह सब चलता रहता है।

‘नहीं, मुझे ऐसा तो कुछ नहीं लगता था तब, लगने का कोई सवाल नहीं। हमारे भी विचार हैं और आपके भी हैं। क्या होता है इससे कि हमें नया या कोई अन्य प्रकार का कहानीकार कह दिया? हम उसमें भी खुश। रचनाकार को हम ऐसे किसी खंभे से बांधकर नहीं रख सकते- और न ही इस तरह बांध देना चाहिए उसे। मैंने न कभी क्लेम किया, न कहा कि मैं नया कहानीकार हूं। रचना या रचनाकार को ऐसे किसी एक पीरियड में सीमित कर देना उचित नहीं। ऐसा किया तो अंत तक उसके बारे में आप वही कहते रहेंगे।‘

स्वर में आवेश युक्त उत्तेजना आ मिली- ‘ऐतिहासिक रूप से ठीक था यह कहना कि नई कहानी का यह काल और लेखक थे…पर…महीप सिंह क्या अंत तक संचेतनावाले ही थे या फिर समांतर…? आदमी एक पीरियड में रहता है, पर विकास भी करता है। किसी एक परंपरा के हैं तो विकास भी करता है। प्रेमचंद की परंपरा का होने का मतलब प्रेमचंद का पिछलगुआ होना नहीं है। जैनेंद्र प्रेमचंद के उत्तराधिकारी हैं- यह कहे जाने का आखिर अर्थ क्या निकलते हैं आप?  आप बताएं, रामविलास जी प्रयोगवादी तार सप्तक के कवि थे- तो उन्हें नई कविता का कवि नहीं मान सकते…? एक जमाने में कुंवर नारायण बीटनिक आंदोलन से बहुत प्रभावित थे, बाद में उन्होंने कहा कि मैं कबीर से प्रभावित हूं। आप बताइए कि किस कुंवर नारायण को मानें? सर्वेश्‍वर दिल्ली जाने के बाद कितने परिवर्तित हुए? और रघुवीर सहाय का सोचें- किसे मानें हम? मैंने एक कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ लिखी और एक ‘हत्यारे’ – दोनों का फर्क देखें। लेखक एक पीरियड में रहता भी है और उसका अतिक्रमण भी करता है। पीरियड की एक सीमा भी होती है और लेखक उसे तोड़ता भी है। तो संवदेनाओं में चेंज होता रहता है- सब में होता है। जागरूक है तो चेंज होगा ही। समय बहुत महत्वपूर्ण चीज है। वह चीजों को, व्यक्तियों को- सबको बदल देता है। बड़े-बड़े तानाशाहों, शासकों, लेखकों सबको धूल में मिला देता है। उनका कृतित्व ही रह जाता है। आपको पता है- तब यह खूब कहा गया कि कहानी मर गई, विश्‍व भर में इसकी संभवानाएं समाप्त। उस तरह की संभावना में नई कहानी के आंदोलन ने वह जमीन तोड़ी, हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाया। कोई आज गुलेरीजी, अज्ञेयजी या नवीनजी का ही छाता लगाकर चले तो क्या यह ठीक है? ठीक हैं, वे सब अपने समय के महत्वपूर्ण लोग थे, पर आज तो स्थितियां बदल गई हैं। लोग बदलते हैं, वेशभूषा में बदलाव आते हैं, अविष्कार होते हैं। हर युग में चीजें बदलती रहती हैं।‘

कुछ क्षण को आए उस आवेश ने उनके चेहरे की रंगत में थोड़ा सा बदलाव ला दिया। उस आवेश से मुक्ति पाने में भी उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। एक जगह चाचाजी का जिक्र करते-करते यकायक रुके- जैसे कोई उल्लसित कर देनेवाली बात याद आई है। लंबी सी हंसी के साथ बोले-  ’पता नहीं, तब आप पैदा भी हुए थे या नहीं- हम अलीगढ़ गए थे। हां, नौकरी के लिए। वहां एक मिल थी कपड़े की। वहां के तांगे, सुबह आठ से शाम छह तक की वह शिफ्ट, एक-एक महीने बाद शिफ्ट के परिवर्तन की वह सूचना। अच्छा सा एक मेस था। खाना भी अच्छा मिलता था वहां- पर मन नहीं लगा, तीन दिन में चले आए।‘

खाना मेज पर लग चुका है। उनके नाती ने गिलास-प्लेट्स लाने में खूब भाग-दौड़ के साथ अपनी मम्मी का सहयोग किया है। हम लोगों ने खाना शुरू कर दिया है। अब भी वे अनथके, अनवरत कुछ-न-कुछ बताते-सुनाते जा रहे हैं- ‘हां, हम खाना यूं ही हाथ में प्लेट लेकर खाते हैं। तभी से, जब से रीढ़ की हड्डी की ये प्राब्लम हुई।‘ मेरे खाने पर पूरा ध्‍यान है उन्हें- ‘देखो बेटा, मेरा अनुमान सही निकला… चावल उतने चाव से नहीं खाएंगे ये।… नहीं, आप और कुछ लीजिए…संकोच मत कीजिए।…नहीं हम दोपहर को नहीं सोते, शाम को ही लेटते हैं। दोपहर में कभी-कभी ही लेटते हैं।‘

खाने के बाद चर्चा उनके संपादन काल के कुछ खट्टे-मीठ अनुभवों से शुरू हुई। उस चर्चा के बीच ही मैंने अमरकांतजी के शांत-चुप रहने के स्वभाव के बारे में एक-दो प्रश्‍न किए थे। साथ ही साहित्यकारों के बीच चलते रहने वाले आरोप-प्रत्यारोपों, उठा-पटक, खींच-तान आदि के कारणों-परिणामों के बारे में उनकी राय जाननी चाही थी। बड़े सरल-निर्मल भाव से वे कह रहे थे- ‘स्वभाव का सवाल नहीं- पर ऐसा भी नहीं कि आप छेड़ेंगे तो हम जवाब नहीं देंगे। वैसे यह देखिए कि लड़ाइयां कहां होती हैं- दो महात्माओं में, दो औरतों में, दो कुत्तों में, दो विद्वानों में- यानी समानताओं में।‘ कहकर देर तक हंसे हैं। फिर गंभीर होकर कहा जा रहा है- ‘हम आज के थोड़े ही हैं- 1925 का जन्म है। पुराने हुए हम लोग- जबरदस्ती हैं अब यहां। हम चाहते हैं कि लेखक बिरादरी में उदारता हो। कभी-कभी लोग चीजों को समझने में अन्याय कर देते हैं। हम जानते हैं कि आप क्या हैं, पर हम चाहते हैं कि आप भी तो समझें कि हम क्या हैं? जनतांत्रिकता, संवाद, विचार की जो बात है, वह कम अहम नहीं है। मित्र रोज बदलने की चीज नहीं है। किसी कारण उनके विचार बदल भी गए तो उन्हें बदल नहीं देना हमें। विचार तो जमाने के साथ बदल भी जाते हैं, देखने का दृष्टिïकोण भी बदल जाता है। फिर भी यह नहीं कि जमाना बदला तो मित्र भी बदल दें हम। आप मुझे देखिए- मैं मुख्य रूप से राजनीति से होकर आया। राष्ट्रीय आंदोलन से होकर निकले हैं, इसलिए गांधी, नेहरू, लोहिया, जेपी, नरेंद्र देव जैसे लोगों का बहुत प्रभाव रहा। अगर कोई मुझे अपनी धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता समझाना चाहे तो मैं नहीं समझूंगा। मैं वह जानता हूं, मैंने वह सब तब वहां देखा है। मैं एंटी हिंदू, मुस्लिम या सिख हो जाऊं, यह नहीं होगा। ऐसा कहने-समझने वाले को समझना चाहिए। कोई हमें समझाए कि कायस्थ हो तो कायस्थवाद पर चलो, तो यह संभव नहीं है। आप हमसे ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं?  हम यदि आपका सम्मान करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह आपके राजनीतिक विचार का सम्मान है। हमारा जुड़ाव इस राष्ट्रीय से, जनता से है। हम किसी का अपमान नहीं करते, दूसरों के गुणों का सम्मान करते हैं। नहीं, अब नहीं राजनीति में। तब सक्रिय राजनीति में था। खद्दर पहनता था, आंदोलनों में शामिल रहा। इस पर गर्व नहीं कर रहा हूं। तीसमारी नहीं है यह, फर्ज था। उस समय बहुत से नौजवान इस रास्ते पर थे। जो हो सका, बहुत था। हां, जब आगरे में था, तब राजनीति से अलग हो गया था। हां, कारण था उसका।… हम साहित्य की राजनीति में कितना, किस तरह, किसलिए जाएं? पुरस्कार के लिए, पद या सम्मान के लिए? आप हमसे क्या आशा करते हैं? इस उम्र में भी हम यही तमन्ना रखते हैं कि लिखें। यह गर्वोक्ति नहीं है कि हमने धीरे-धीरे ही सही, पर लिखा। ‘42 के आंदोलन पर लिखने की पहले भी तमन्ना थी, पर फुरसत नहीं मिली। अब लिखा- देखिए, इतना मोटा। उन दिनों पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं। पैरेलैटिक हो गई थीं। आपने पढ़ा है? नहीं पढ़ा तो कभी छू तो लीजिए उसे।… अभी सोचा है, एक और बड़े उपन्यास पर लिखें। इच्छा रहती है कि लिखूं। उस बीमारी की अवस्था में भी तय किया था कि सबको लिखूं मैं। सोचता हूं, जो भी कहे, सबको लिखूं। कोशिश करता हूं। ‘इन्हीं हथियारों से’ जब लिखा तब से बेहतर हो गए हैं हम। अब बैठकर भी लिख सकते हैं।‘

व्यक्ति के रूप में आज के हालात पर आप कैसा महसूस करते हैं? प्रश्न करते समय कल्पना नहीं की थी कि इस एक सवाल के उत्तर में इतने मनो-मलाल की बातों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। अन्य अनेक प्रश्नों के जवाबों को सम्माहित करते हुए अमरकांतजी देर तक लगातार बोलते जा रहे थे-  ’व्यक्ति के स्तर पर मेरे सोचने-महसूस करने का क्या मतलब है आपका? व्यक्ति से क्या मतलब है? राष्ट्रीय की बात करेंगे आप तो व्यक्ति का अर्थ क्या है? सदियों के इतिहास में मानव ने जो प्रगति की है- उसके सारे संस्कार किसी-न-किसी रूप में आप में हैं। आप कहें कि आधुनिक हैं तो आधुनिक कोई हवा में लटकी चीज नहीं है। जो है, सब जमीन पर है। मूल्य-विचार जो भी हैं- आपकी वह जमीन है, आप उस पर खड़े हैं। आप उसमें परिवर्तन भी करना चाहते हैं। मेरी ही नहीं, हर व्यक्ति की करीब-करीब इसी प्रकार की एक स्थिति है। कभी ऐसा भी था कि इनसान नंगा रहता था, उसके पास भाषा नहीं थी, न कोई मूल्य ही था। यहां तक कि आज के सेंस में जो सामाजिकता है, वह भी नहीं थी। तो मानव-मूल्य भी एक्वायर्ड हैं, उन्हें आदमी ने अर्जित किया है। तो आज जो हैं… इतनी यात्रा करके आए हैं। इसमें बहुत सारी चीजें आती हैं। एक जमाने में ये बहुत सारे धर्म यहां नहीं थे। अनीश्वरवाद भी फैला था। मातृसत्तात्मक समाज था, जिसमें स्त्री प्रमुख थी। तो आप देखिए कि इस यात्रा में, यहां तक आने में कितनी जय-परायज भी हैं। बाद में होता यह है कि कुछ मूल्य बचे रह जाते हैं, कुछ व्यर्थ हो जाते हैं। बचे रह गए मूल्यों को लेकर आप प्रगति की यात्रा आगे बढ़ाते हैं। इतिहास के बहुत से अंश किसे मालूम हैं? आज की स्थिति में हम जहां पहुंच रहे हैं- तो केवल हमारा सवाल नहीं है, औरों का भी, सभी का है कि पूरे विश्व के बारे में आप क्या और कैसे सोचते हैं। आप केवल व्यक्ति नहीं हैं, केवल सीमित नहीं हैं। यदि लेखक कहता है कि हम व्यक्तिवादी हैं…व्यक्ति स्वातंत्र्य… मतलब क्या है इसका? व्यक्ति की भी परिभाषाएं परिवर्तित हुईं। पूंजीवाद आया तो व्यक्ति आया। पहले कहा गया कि व्यक्ति धर्म था, सामंत था। पर जब पूंजीवाद आया तो कारखानेवाला सामंत से भी अधिक शक्तिशाली हो गया। तब व्यक्ति स्वातंत्र्य का दर्शन आया। कंसेप्ट यह था कि शासन व्यक्ति के बारे मे कम-से-कम हस्तक्षेप करे। धीरे-धीरे इसकी भी सीमाएं स्पष्ट होने लगीं। फिर वह परिभाषित होने लगा ओर साम्यवाद तक आया। यह क्या ठीक है कि विचारधारा ही लेखन का पर्याय हो जाए? ये तो सभी मानने लगे हैं कि विचारधारा लेखन का पर्याय नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन ने यह दिखाया कि स्वार्थ, सांप्रदायिकता आदि से विघटन होता है, जबकि मेल-मिलाप से समाज जुड़ता है। सोचनेवाले तो आप ही हैं- आप चाहें तो समाज को विघटित कर दें या आप कोशिश करें कि लोग मिल-जुलकर रहें।

‘राजनीति का अर्थ हम यही जानते हैं कि सेवा, जनता की भागीदारी, स्वावलंबन, स्वदेशी, शक्तिशाली बनना है, पर शक्ति दूसरों को बांटना है। शक्ति की सार्थकता उसके व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उपयोग में नहीं है। उसका लाभ दूसरों को देने में है। देना, बांटना, उदारता- यही शक्ति की सार्थकता है। स्वयं को लाभ पहुंचाने पर पर उसका मतलब हो जाता है तानाशाही। शक्ति के लिए आप सिद्धांत बदल दीजिए- जैसा बहुत लोग करते भी हैं- तब तो बात अलग है, पर आज का आदमी देश और समाज के बारे में जरूर सोचेगा। मैं नहीं सोचता कि कोई आदमी अपने समाज के कटा है। तो अब आप ही बताइएं कि हम व्यक्ति के रूप में क्या सोचें? व्यक्ति अकेला नहीं चल सकता। वन में तपस्या करता है, तब भी समाज के बारे सोचता है। यदि आप समाज-विचार की कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते तो फिर सबसे प्यार, यश, प्रतिष्ठा क्यों चाहते हैं? लेखन में इन्हीं चीजों पर विचार करने के बाद ही तो लिखते हैं। इन चीजों से टकराहट होगी ही। उसका आपसे, आपके मित्रों से मतलब भी होगा ही। लेखक जो भी लिखता है, वह उसकी क्षमता, सामर्थ्‍य, उसकी दृष्टि आदि चीजों पर ही निर्भर करता है। यदि वह सामाजिक सच्चाइयों का सामना नहीं करता तो उसके सामने कठिनाइयां तो आएंगी ही। जब वह व्यक्ति के रूप में भी सोचता है, तब भी, मैं नहीं सोचता, कि वह कटे रूप में सोचता है। उसके साथ हमेशा देश, समाज सब है। वह स्वीकार न भी करे तब भी उसके साथ बहुत से संस्कार, विचार, अनुभव हैं। उनसे वह गुजरा है। उसे वे सताते भी हैं। भावनाओं, संवेदनाओं और भाषा के द्वारा जब लेखक अपने अनुभवों को पेश करता है, तब वह इतना सरल काम नहीं है। व्यक्ति की तरह समाज में भी अंतर्विरोध होते हैं। व्यक्ति यदि कुछ बनना चाहता है तो उसे अंदर की बहुत सी प्रवृत्तियों को अवरोध-विरोध करना पड़ता है, तब वह बनेगा। यदि वह कुछ समझना चाहता है, तब भी यही होता है। समाज में अशिक्षा, पिछड़ापन जैसे न जाने कितने अंतर्विरोध हैं। अंतर्विरोध के बीच कैसे रास्ता बनाया जाए, यह समस्या व्यक्ति, लेखक, राजनीतिज्ञ, समाज-  सभी के समाने रहती है। अंतर्विरोध को जाने-समझे बिना आप रचना में वह चीज उभार ही नहीं सकते, जो उभरनी चाहिए। रचना सपाट को जाएगी।

भ्रष्‍ट और अवमूल्यन के इस दौर में साहित्य तथा परिवर्तन को लेकर आप किस तरह सोचते हैं?

‘राजनीति में भ्रष्टचार आदि…। नागरिक के रूप में इन चीजों को लेकर हम भी दुखी होते हैं। बहुत सी चीजों में खुद भी दबे हैं, कुछ उन्हीं चीजों से गुजरते भी हैं, पर इसका सुधार राजनीति ही कर सकती है। आज के समय में वही प्रभावी है। पर हर तरह की राजनीति थोडे ही कर पाएगी यह सब। जब गांधी, लेनिन, माओ जैसे चिंतक, सोचने-विचारनेवाले लोग होते है, तब परिवर्तन होते हैं। परिवर्तन आपके चाहने या भाषण देने से तो नहीं होगा। उसके लिए भारी संगठन करना पड़ता है, समय की सच्चाइयों को जान-समझकर देखना पड़ता है कि वह सब कैसे होगा। यह सब बिना त्याग के तो होगा नहीं। आपने देखा है कि नहीं, आजकल नेता मोटे होते जा रहे हैं। इसलिए कि सक्रियता नहीं है। मोटर है, गोश्त है, शराब है- पर उस तरह की सक्रियता नहीं है नहीं है तो नहीं है। यह हर पार्टी के साथ है। पहलेवाला जमाना अब नहीं है। कोई पार्टी उस तरह अब ठीक नहीं है। लेखक के नाते…? बदलाव? हम एक बात कहते हैं कि हम परिवर्तन थोड़े ही कर सकते हैं। गाली देकर या आलोचना करके हम क्या कर लेंगे? लेखक जो लिखता है उसका तत्काल तो असर पड़ता नहीं है। वह तो संवेदनाएं-भावनाएं बदलने-बनाने का काम करता है। कबीर, तुलसी जैसे कुछ लोग बच जाते हैं, बाद में कुछ रचनाएं बच जाती हैं। समय लगता है। साहित्य में मनुष्य की तुच्छताएं, ग्रेटनेस, जय-पराजय, उसके विचारों, भावनाओं, संस्कृति आदि सारी चीजों से मतलब रहता है। अगर आपने अपने समय के मुनष्य का चित्रण कर दिया तो वह चित्रण जीवित रहता है। जो चीजें दोषों, विकृतियों, गिरावटों के बीच मनुष्य को आगे बढ़ाने, मिलाने, संषर्घ करने का महत्व देती है, बढ़ाती है, वे चीजें हांट करती हैं, आगे चलती हैं ओर हर युग में प्रासंगिक भी होती हैं। महात्माजी ने क्या किया- पचपन करोड़ का पाकिस्तान का जो शेयर था, वह दिलवा दिया, आंदोलन किया- बस यही तो… और उनकी हत्या कर दी गई। इतनी बड़ी ऐतिहासिक शक्ति, मानवता का प्रतिरूप, एक महामानव। चाहा कि लोग एक साथ रहें, लड़कर नष्ट न हो जाएं। देश की एकता के लिए जान दी। इस तरह की कितनी घटनाएं हैं दुनिया में? तब बताइए कि व्यक्ति के रूप में हम क्या सोचें?… हम सोचते हैं कि लिखकर बहुत तीर मार लिया, पर स्थिति है असंख्य लोग अशिक्षित हैं। प्रेमचंद की रचनाएं उनके जमाने में या आज भी कितने किसानों ने पढ़ी होंगी? ड्रामा करने को दिखा दें, पर पढ़ी कितनों ने हैं? परिवर्तन एक लंबी प्रक्रिया है, चलती रहती है।‘

लगा कि बहुत दिनों का दबा-भरा कुछ बाहर आ गया है एक साथ। बोझिल-से हो चले उन कुछ पलों को खिसकाने-हटाने के इरादे से ही मैंने अमरकांतजी से उनके सर्वाधिक महत्वपूर्ण संबंध और बेहतरीन-सी उनकी किसी पसंद के बारे में जानना चाहा था- ‘ऐसा कोई एकाकी संबंध नहीं है। मुझे मित्र पसंद हैं, मित्रता पसंद है- एक जमाने में हमारे बहुत मित्र थे। नहीं, कोई विशेष किस्म जरूरी नहीं। साधारण आदमी भी हमारे मित्र हैं। पसंद करते हैं, बहुत पसंद करते हैं- क्या मतलब? मां, पिता, भाई को कह सकते हैं- पर पसंद तो अलगाव का संबंध है। यह कहकर आप अपने को ऊंचाई दे रहे हैं। इससे कोई चीज व्यक्त नहीं होती। पंसद करना व्यावहारिक शब्द हैं, उसमें आदान-प्रदान है। बहुत हुआ तो आप ऐसा कुछ, कुछ समय के लिए जवानी में कर लेंगे। एक औरत को पसंद कर लेंगे, पर वह सब स्थायी नहीं होता। वे जीवन फानी है- जो जवानी में पसंद, वो बुढ़ापे में विकृति। भाई से जुड़ाव था। राजनीति की बात करें तो बड़े उद्देश्य के लिए जनसेवा, लोगों के सुख-दुख से जुडऩा अच्छा लगता था। हमारे पसंद करने का क्या मतलब? कोई विद्वान है, उसे हम पसंद करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि हम उसका, उसके विचारों को विरोध नहीं कर सकते। राजेंद्र दोस्त रहे, पर उनके दोषों को हम क्यों स्वीकार करें? रिश्ता एकांगी ही हो, यह संभव नहीं। उसे प्यार भी नहीं कह सकते। जैसे गांधी का था कि ‘हर अच्छा सिद्धांत बिना व्यवहार के कीड़ा लगा मीठा फल है।‘ आप में कार्य रूप में परिणत करने की कला यदि नहीं है तो स्‍थायित्‍व संभव नहीं। आप किसी को पसंद कर लें, प्यार कर लें, एक समय तक रद कर लें- सवाल यह है कि वह कसौटी पर कितना टिक सकता है?…जीवन का यह जो खेल है- उसमें पसंद शब्द द्वारा ही यदि आप जानना चाहें तो मुश्किल है। वैसे यह कि मुझे हरी पत्ती पंसद है… सूर्योदय…इनका रंग…सबकुछ बदल जाता है, उसकी परिभाषाएं बदलती रहती हैं। आप यदि जागरूक हैं तो रिश्ते की वास्तविकता को समझते हैं। शुरू में हर रिश्ता अच्छा लगता है। पर इसका कुछ अर्थ नहीं। आपको बहुत सी गलत बातें कोई क्यों पसंद करे? अब जैसे माता है- उसने इतना दिया है कि आप उसका दूसरा रूप सोच ही नहीं सकते। भले ही आज लोग मां की हत्या भी कर देते हैं- फिर भी उसका स्थान कोई ले नहीं सकता। उसको पसंद करना क्या है? हलका शब्द है। फूल पंसद है, पर उसके लिए जान तो नहीं दे सकते। रिश्तों में प्यार …पसंद? उसकी परीक्षा संकट में होती है। यहां यह एक व्यावहारिक पक्ष है।‘

5.45 हो चले थे। हिचकती-सी एक दृष्टि से मैंने अमरकांतजी के चेहरे पर थकान के चिह्न ढूंढने चाहे थे। मैं कुछ कहूं, उससे पहले ही सुनाई दिया- ‘पूछिए आप, जो पूछना है। आपको परेशान करनेवाली जो बात हो, पूछ लीजिए। लिबर्टी है आपको, कुछ भी पूछ लीजिए।‘ एकदम से कुछ नहीं सूझा तो मैंने उनसे उनके बचपन की कुछ शरारतों को याद करने का आग्रह किया। शरारत की बात पर पहले खूब हंसे, फिर बोले, ‘हां, बचपन में मैं शरारती था।‘ अचानक कुछ ध्यान आया है- रुके हैं। अंदर आवाज लगाकर नाती से टीवी पर आ रहे क्रिकेट मैच का स्कोर के बारे में जानना चाहा है। मैच की बात खत्म हुई तो मैंने खेलों के प्रति लगाव के बारे में भी जानने की चाहत व्यक्त की। अब क्रिकेट मैच से उन्होंने स्वयं को अलग कर लिया है- ‘खेलकूद से बहुत लगाव था। इंटर मे हॉकी, फुटबाल, वॉलीबॉल की तो कॉलेज टीम में भी था। ये दो खराब आदतें थीं बचपन में- जैसे लंगी लगा देना… हां, छोटे भाई या नौकर को लगा देते थे…और नाक मल देना। पता नहीं क्या लगता था कि छोटे भाइयों की नाक मल देता था। शरारत बहुत सी हैं, पर ये दो जान लें आप। हां, मार भी खाता था मैं। पिताजी मारते नहीं थे। मां मारती थीं। उनका मारना मालूम नहीं होता था। खेल- ऐसा शौक कि यूनीवर्सिटी में या शहर में कोई भी टूर्नामेंट होता, मैं देखने जरूर जाता था। नहीं, अब नहीं जा पाऊंगा।‘ एकदम खुश, कुछ उत्तेजित से दिखे हैं- ‘एक बार क्या हुआ कि लूकरगंज में फुटबॉल का टूर्नामेंट था। मैं देखने गया। इंटरवल में देखा कि बगल में रेणुजी भी खड़े हैं…। टेनिस खेला नहीं, पर देखते-देखते चीजें जान गया हूं। क्रिकेट का तो पूछना ही नहीं…। अब आंखें काम नहीं करतीं, सो टीवी पर भी नहीं देखता। पर पहले जब घर में रेडियो भी नहीं आया था तो बाहर खड़े होकर सुनता था। खेल मुझे बहुत पसंद हैं। अखबार का खेल पेज आज भी डिटेल में पढऩा चाहता हूं।…फिल्म? नहीं, अब नहीं देख पाता। एक जमाने में बहुत देखता था। अच्छी फिल्म मिले तो शौक है, पर अब अच्छी फिल्म मिलती नहीं। अंग्रेजी-हिंदी बहुत फिल्में देखीं। जिन दिनों पत्रकार था, जितने चाहे सिनेमा के पास मिल जाते थे। आगरा में यह परंपरा थी सिनेमाघर वाले प्रेस शो करते थे, पत्रकारों को सम्मान से बुलाते थे। आगरा कैंटवाले सिनेमाघर में अंग्रेजी फिल्में लगती थीं। साइकिल पर कभी अकेले, कभी किसी को साथ लेकर देखने पहुंच जाते थे। बहुत सी अच्छी फिल्में वहां देखीं। ठीक है कि आजकल डांस करना ज्यादा सीचा चुके हैं, पर केवल वहीं तो फिल्म नहीं है। फिल्म में तो पूरा जीवन होना चाहिए।‘

वो क्षण, वो घटना जब आप बहुत रोए हों?

पलकें हांफने जितनी तेजी से उठ-गिर रही हैं। उनकी उस तेजी ने जैसे भौंहों के सफेद, घने बालों तक को हिला-कंपा दिया है। अब आंखें बंद हैं- ‘या तो डेथ पर रोता हूं, और तो रोने का जो समय आता है, रो नहीं पाता। पिताजी की डेथ पर था भी नहीं, बाद में गया रो नहीं पाया। माताजी, भाई राधेश्याम, अपनी पत्नी और चाचाजी- इनकी डेथ पर रोया। बहुत रोना क्या होता है? रोया। रोना बहुत आसान नहीं है। रोना वह होता है, जब आप रोक न पाएं । स्वाभाविक ढंग से, जैसे बच्चा रोता है, रुलाई आती है। वैसे तो हर संवेदनशील स्थिति में मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं, पर अचानक यूं ही कि जब आप रोक न सकें। सोचते जाते हैं कि नहीं रोऊंगा, आंसू नहीं आएंगे, पर…। इंदिरा गांधी बहुत साहसी थीं, पर संजय गांधी की मौत पर हमने उनका रोना देखा था। इतनी साहसी महिला भी रोक नहीं पाई…।‘

अपमानित महसूस करने से जुड़ी कोई याद?

‘अरे, यह कहां? यह बहुत नाजूक चीज है। इसका क्या कहूं? अपमानित होने का मतलब- दफ्तर में आप काम कर रहे हैं, आपके बॉस ने डांट दिया- तो यह कोई अपमान नहीं है। आपके काम का हिस्सा है यह। अपमान वहां होता है जहां इनसानियत, या जो तकाजे हैं- रिश्तों का उल्लंघन कर देते हैं। जैसे दोस्त हो कोई, उससे आशा करें हम, वह वो न करे। तब एक अपमान-सा मालूम होता है। या फिर आपका कोई सीनियर या बॉस उस रिश्ते का उल्लंघन करके व्यवहार करे और जहां आप शालीनता, नेचर या अन्य वजह से जवाब भी न दे सकें- तो आप अपमानित महसूस करते हैं। तब प्रतिरोध की भावना भी आ सकती है। अपमान तो मिलते रहते हैं जीवन में। इतने लंबे जीवन में कई अवसर आए होंगे- लेकिन इस पर बहुत एक्सप्लेन नहीं करना चाहता हूं। हां, मित्रों से, बॉस से भी आए हैं। कोई उपेक्षा कर दे, मुझे बुरा नहीं लगता, सबसे आशा भी नहीं करता। सबसे करनी भी नहीं चाहिए। बहुत से किस्से हैं- पर उन्हें मैंने अपमान के रूप में लिया ही नहीं। जीवन जीने के सबके अपने तरीके हैं।‘

खुशी या सम्मान का कोई एक क्षण?

‘अरे यार, आप भी क्या..? सम्मानित- तो क्या- समझ नहीं आता। पुरस्कार वगैरह में क्या सम्मानित होना? मुझे थोड़ा-बहुत सम्मान मिला है- अगर हुआ है तो मैं उसके महत्व को समझता हूं। सम्मान का कोई अर्थ नहीं है। कोई काम पूरा हो जाए तो ठीक लगता है। सम्मान से मैं अभिभूत नहीं होता। लोग स्नेह में आकर सम्मान देते हैं। भले ही रचना पढ़ें या न पढ़ें, पर सम्मान हो गया। एक अनजान जैनुइन पाठक जब आपको ऐसा लिख देता है, जो दूसरे लोग कह-देख न पाए हों तो सम्मान की भावना आती है। हां, एक कहानी है मेरी…वो नाम…भूल रहा हूं- अरे गोलू(नाती), वो संग्रह तो ले आओ। संपूर्ण कहानियों का पहला भाग। हां, याद आ गई- ‘गगन बिहारी’-  बहुत लोग इसे एप्रीशिएट कर पाए या न कर पाए- पर एक पाठक ने जिस तरह एप्रीशिएट किया- तब एक बड़े आह्लाद और सम्मान की भावना पैदा हुई। ये सब तो होता है- क्षणिक कुछ होता है। बुरा नहीं लगता, अच्छा लगता है। पर ऐसा नहीं होता कि मनाने या सेलीब्रेट करने लगें। हमारे जीवन में ऐसे अवसर कम आए हैं।‘

अपनी कुछ खराबियां?

बहुत खराबियां हैं। कमजोरियां हैं, उनसे कॉशस रहता हूं। व्यावहारिक नहीं हूं, यह बड़ी भारी कमी है। उन मोर्च पर काफी पिटा हूं। यह भी कि जिस तरह नियमित ढंग से मेहनत करनी चाहिए, मैं नहीं कर पाता हूं। अपनी फीलिंग दूसरे को कन्वे नहीं कर पता। भीतर-भीतर रह जाता है वह सब। पर इसका दूसरों पर ताप या अभिशाप हो, ऐसा भी नहीं है। शारीरिक रूप से पहले से ही कई कमियां रही हैं। डायवर्टिड एनर्जीज हैं। एकोन्मुख एकाग्रता पूरी तरह बढ़ पाना संभव नहीं हुआ। जो करना चाहता था, उसमें इस चीज ने बाधा पहुंचाई। उसके लिए मैं रेस्पांसिबल हूं, कोई और नहीं। चाहता था, एनर्जी एक ही चीज में लगे, पर नहीं लगी। काल्पनिकता- कल्पना में उडऩा-व्यवहार में कुछ नहीं किया तो आपका डायवर्जन तो हो गया।‘

और आपकी शक्ति, पूंजी, ताकत?

‘ताकत यही रही कि मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया है और एक रास्ते पर लगाने की कोशिश की है। अनियंत्रित भावनाओं को नियंत्रित करने की मैंने कोशिश की है, वही मेरी ताकत है। भावनाएं- दुख की, सुख की या और कैसी भी हों- उनमें जब आप अपने को नियंत्रित करेंगे, तभी कुछ कर सकेंगे। सारे विरोधाभासों के बीच से तटस्थ होकर वास्तविकता को देखने की जब एक आदत पड़ जाएगी, तभी आप कुछ कर पाएंगे। दूसरों के साथ क्या होता है, मैं नहीं जानता, पर मेरे साथ ऐसा है। यह न कर पाता तो मैं उड़ ही गया होता। इसमें मेरी वे बीमारियां, जो बार-बार पटकती रही हैं, उनमें स्वयं को नियंत्रित कर कुछ करते रहना- इसे आप ताकत कह सकते हैं, जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष या जीवन के प्रति आस्था कह सकते हैं। आस्था तभी बची रहती है, जब आप नियंत्रित कर पाते हैं अपनी भावनाओं को। मैं इंडल्ज नहीं कर सकता। मेरे पिताजी की शिक्षा थी कि कभी शराब न पीना- पर मैं भी यह जानता हूं कि मैं अधिक शराब पी नहीं सकता। ऐसे ही अत्यधिक उत्साह, अत्यधिक भावनाएं मुझे असमर्थ बना देती हैं। इसलिए मैं किसी चीज पर रिएक्ट नहीं करता। गलत की बात मैं नहीं कर रहा हूं- वैसे गलत हैं भी नहीं- रिश्ते जो अच्छे हैं, कायम हैं। इसमें उनका भी सहयोग है, पर मैं टूटन, बिखराव एफोर्ड नहीं कर सकता। यह मेरी नेचर में भी नहीं है। आप मुझे बहुत मालामाल कर दें, बहुत प्रताडि़त कर दें- हमारी ताकत भावनाओं में उद्वेलित हो जाने या हर चीज पर परेशाना हो जाने में नहीं है। काम करना है तो आपको तटस्थ बनकर रहना पड़ता है। हमारे लिए यह जरूरी है। इसलिए बहुत सी चीजें हमसे नहीं हो पातीं। जो मिल जाता है, बहुत है। जो कर लेता हूं, उसे उपलब्धि मानता हूं। यह स्थिति आज नहीं, पहले से ही है। पहली कहानी आई, तो खुशी हुई, वास्तविक खुशी हुई। तुरंत बाद में यह सोचा कि एक कहानी लिखकर कितना खुश हो सकते हैं? यह तो अभी पहली कृति है, अभी तो हमें बहुत कुछ करना है। इससे अभी क्या मिला? बस वह भावना स्वत: तिरोहित हो जाती है। यह जान-बूझकर नहीं होता, यह प्रक्रिया चलती रहती है। वह उपलब्धि इसलिए लगती है कि हमने एक चीज लिखी, लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं, आपको, आपकी चीज को लोग समझ रहे हैं- इससे ताकत तो मिलती है। पर उसली ताकत वही है कि आप अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके कितना कुछ कर सकते हैं। हार्ट अटैक हुआ यह भावना थी कि मैं कुछ कर न सका। उस बीमारी से बचने के लिए सदैव प्रयासरत रहा। यह हमारी ताकत बन गई- इसलिए कुछ लिख सका। हालांकि भावनाओं में ताकत होती है, पर भावनाओं से दूर बने रहना मेरी ताकत बन गया। मेल-जोल की बातें, दूसरों के सुख-दुख से जुडऩा, व्यक्तिगत भावनाओं से अलग रहकर दूसरों से, समाज से उन्हें जोड़कर देखना- ये ताकत रही है।‘

अब अगला उपन्यास?

‘उपन्यास- एकदम बहुत जल्दी शुरू करने वाले हैं। वह ‘इन्हीं हथियारों से’ जितना बड़ा तो नहीं होगा। सोचता हूं- डिमाई आकार में, चार सौ पेज तक का होना चाहिए। सोचा कि निजी जीवन के जो अनुभव हैं, उन पर लिखूं। कैसे होगा? सोचता हूं, सारी शक्ति लगा देनी चाहिए। उम्र काफी हो गई है- अब शक्ति, क्षमताएं…। उसकी तस्वीर पूरी साफ है। एक दूसरा उपन्यास पत्रकारिता जीवन पर है। कुछ शुरू किया था। ‘प्रभात खबर’ में ‘खबर का सूरज’ करके उसका एक चैप्टर छपा था- उसे लूंगा। यह दूसरी प्राथमिकता है। ऐसा नहीं है कि उसमें इतिहास ही होगा, उसमें हमारी पत्नी भी रहेंगी, हम होंगे, पर कल्पना भी होगी। पर पहली प्राथमिकता तो वो है- जीवन का निचोड़ होगा उसमें- क्या देना है, क्या कहना है- मोटा खाका तो बना लेते हैं, पर लिखते समय अनेक ऐसी दबी चीजें आती हैं, जो एक्सप्लेनेशन मांगती हैं- तभी देखें कि क्या हो।‘

बाहर-भीतर की रोशनी ने रात होने की सूचना दे दी थी। मैं चलने को हुआ ही था कि सुनाई दिया- ‘एकाध और तीर निकाल लीजिए। कोई प्रश्‍न-जिज्ञासा रह न जाए। आप इतनी दूर से आए हैं।‘ तुरंत क्या पूछूं, कुछ तय नहीं कर पाया। हड़बड़ाहट में यूं ही पूछ लिया- ‘क्या कुछ चीजों-बातों का अफसोस या मलाल भी किया है आपने इन दिनों?’ थोड़ी देर चुप रहे। बोले तो कहा, ‘हाइपोथेटिकल है ये भी।‘  ऐसा कुछ याद न आने की बात की। और फिर जैसे मेरा मन रखने को शुरू किया है- ‘अपने बारे में एक यह कि ऐसा आदमी था जिसकी कल्पनाएं बहुत थीं, पर क्षमताएं भी जानता था। एक जमाने मैं बहुत बड़ा राजनीतिक व्यक्ति बनना चाहता था। दूसरा- संगीतकार बनना चाहता था- सुविधाएं नहीं मिलीं। और लेखक बनने का- वह बाद की भावना है। बाद में इच्छा हुई। जेल से छूटकर आए हमारे अनेक साथियों ने जो रूप दिखाए, उससे राजनीति से वितृष्णा हो गई। बचा साहित्यकार होना- तो शरत की कहानियां पढ़कर कुछ प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया। रोमांटिक लेखन था वह। पच्चीस साल की उम्र में, सन् 1950 के करीब पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ लिख पाया। कांशस रूप से साहित्य की ओर आने का प्रयास किया हो, ऐसा नहीं था।  साहित्य जगत से संपर्क भी नहीं था। वह सब आगरा जाकर हुआ। पत्रकारिता, राजी-रोटी, साहित्य आदि की दृष्टि से आगरा ने बहुत दिया। वह मेरी जिंदगी का महत्वपूर्ण शहर है। और बहुत सी चीजें हैं, जिन्हें नहीं कर पाए- पत्नी की बहत सी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाए। दुख तो नहीं कहूंगा इन्हें- पर ये बातें हैं जो मन में रहती हैं। वो इच्छाएं क्या थीं पत्नी की? ये बताना नहीं चाहता, पर मन में रहती हैं।‘

अपनी पत्‍नी के साथ्‍ा अमरकांत

पत्नी की मृत्यु- उनके न रहने को इन दिनों आप कैसे और कितना याद करते हैं?

दोनों हथेलियां सटकर जुड़ गई हैं। समान नामवाली अंगुलियां एक-दूसरे से लिपट-चिपट गई हैं। बंद आंखें बहुत धीमे-धीमे खुली हैं। सिर ऐसे हिला जैसे इनकार किया हो। फिर ‘नहीं, नहीं’ सुनाई दी। होंठ कई बार भिंचे-फड़कते-से दिखे हैं। लिपटी-सोई-सी अंगुलियों से अबोला कुछ इंगित किया है। और अब मुश्किल से सुनी जा सकनेवाली आवाज में कहना शुरू हुआ है- ‘जीवन चल ही रहा था। पत्नी भी बीमार रही थीं। उस फ्रंट पर भी जीवन गड़बड़ था। बीमारी को उन्होंने हंसते-हंसते, बहुत बाहदुरी से काटा…अब? अब तो उनकी डेथ हो गई…।‘ ऐसी खामोशी, ऐसा सन्नाटा कि सुई के रिगने की आवाज भी सुनी जा सके। सहसा माथे पर से चलकर एक प्रकाश-किरण उनके होंठों पर आकर रुकी- ‘बहुत से कथानक, बहुत सी बातें मुझे उन्हीं से प्राप्त हुईं। आपको बताऊं? जब ‘इन्हीं हथियारों से’ लिखा तो मुझे शहीदों की टोली…’ वाला वह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा था। यह गीत उन दिनों जुलूसों में गाया जाता था। गोलियां भी चलती थीं उन जुलूसों पर, लाठियां भी चलती थीं- ये जिक्र है उसमें। पत्नी डेथ बेड पर थीं। मैंने पूछा- क्या है वह गीत? ‘शहीदों की टोली निकली, सर पर बांधे कफनियां हूं…’ ये पहली लाइन है उसकी। उस समय इतना ही बता पाईं- ‘अंग्रेजों का छक्का छूटा, शेखी मिल गई धूल भाई। शेखी मिल गई धूल… कलेजे बिच गोली निकली… सर पर बांधे कफनियां हूं….।‘ देर तक व्याख्या की गई है। अंगुलियां, आंखे सब जैसे आजादी के उस दौर की वीरता, शौर्य और बलिदान को प्रतिबिंबित कर रही हैं, उस दौर पर गर्व कर रही हैं। और अब अपने रोने को रोकती-छिपती-सी आंखें, होंठों पर झिलमिल थिरकती-सी एक हंसी भी और कृतज्ञता के शब्द भी- ‘उस एक ही साल में दो लोगों की मृत्यु। एक तो मेरे भाई राधेश्याम की मृत्यु अगस्त में, एकदम अप्रत्याशित- और उसी साल नवंबर में इनकी- मेरी पत्नी की मृत्यु। ये ऐसे लोग थे- जिन्हें पसंद-वसंद तो क्या कहें- प्रिय थे। इनसे लेखन में, व्यक्तिगत जीवन में लिया-ही लिया था। भाई से ही हमने यह ग्रहण किया था कि सिंपिलीसिटी में कितनी शक्ति है। उनके बिना वास्तविकता की अभिव्यक्ति बहुत कठिन है। पत्नी का क्या कहूं? पत्नी तो पत्नी है। मेरी पत्नी में जीवन के प्रति बेहद उत्साह था। उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। वह हार मानने वाली नहीं थीं। कठिन-से-कठिन परिस्थति में भी हंसती रहने वाली। और सबसे साहस के साथ जिंदगी जीने के लिए कहने वाली।…नहीं, इन चीजों का हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते। इन्हें आप अवर्णित ही रहने दें। भाई भी पूरा एक किस्सा हैं- कभी संस्मरण लिखूंगा। बहुत सी चीजें लिखीं नहीं जा सकतीं। बड़ा मुश्किल, कठिन है। विस्तार दें तो चीजें बिखर जाती हैं।‘ अमरकांत जी जैसे कद के साहित्यकार का यह कथन उनकी भावनाओं को बड़ी सहज खूबसूरती के साथ व्यक्त कर गया था। भावनाओं के आवेग को थामते-नियंत्रित से करते अमरकांतजी कह रहे थे- ‘अब और क्या कहूं? इतना रचा-बसा है जीवन में वह सब कि कुछ नहीं एक्सप्लने किया जा सकता। ये तो जीवन के हिस्से हैं। हर एक की जिंदगी में आते हैं। जैसे हम समझते हैं, दूसरे उस तरह समझ भी नहीं सकते। जब जैसे भीष्मजी ओर उनकी पत्नी शीलाजी का संबंध था, दूसरे क्या समझेंगे वह सब? उनकी एक रचना से हमें यह लगा कि पत्नी की मृत्यु के बाद कैसा शौक लगा होगा भीष्मजी को।‘

उनके पुत्र और पुत्रवधू गेट पर विदा करने आए थे। ऐसे जैसे कोई अपने परिवार के अत्यंत निकट, आत्मीय व्यक्ति को विदा कर रहा हो। अध-खुले गेट के पास खड़े-खड़े देर तक बातें होती रही थीं। पुत्रवधू का मन टटोना चाहा तो सुनने को मिला, ‘शादी से पहले तो उतना नहीं, पर बाद में पढ़ा है। हां, गर्व होता है। अब तो लगता है कि यहां इस घर में होना बड़ी बात है।‘ मन-ही-मन मैंने भी दोहराया, ‘हां, इस घर में होना बड़ी बात है।‘