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बीमारी के बहाने : अनुराग

देश के कर्णधार और जनता के भाग्‍यविधाता जेल की सलाखें देखते ही बीमार पड़ रहे हैं। कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। लेकिन बीमारी पर किसी का क्‍या वश-

अब यों तो कहने वाले कहते हैं कि बीमारी दुश्‍मन को भी न हो, परन्‍तु अब स्थिति बदल गई है। हर कोई अपने अन्‍दर बड़ी खतरनाक सी बीमारी होने का दावा कर रहा है।

वैसे देखा जाए तो बीमारी हमारी एक ऐसी दोस्‍त है जो ऐन मौके पर काम आकर मुसीबत से बचा लेती है। जब भी कोई झमेला हो और दुनिया जहान साथ छोड़ दे तब बीमारी ही मात्र सहारा है।

जबसे मैंने स्‍कूल जाना शुरू किया तब से लेकर अब तक खुद भी कितनी ही बार इसकी शरण में जा चुका हूँ। स्‍कूल के दिनों में होमवर्क पूरा न होने पर मार से बचने के लिये कह देता कि तबीयत ठीक नहीं है। मम्‍मी स्‍कूल नहीं भेजती। स्‍कूल में अध्‍यापक पूछते कि होमवर्क क्‍यों पूरा नहीं किया तो जवाब होता कि बीमार था। आज कर लूँगा। कॉलेज के दिनों में अपनी प्रिया को घुमाने के लिए घंटा गोल कर देता। यहाँ भी बीमारी ही साथ देती।

जैसे-तैसे पढ़ाई पूरी की। एक आफिस में नौकरी लग गई। प्रिया के साथ रोमांस चलता रहा। फिल्‍म देखने या घूमने का कार्यक्रम बनता तो मैं बीमार पड़ जाता, ‘‘सर, मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है। मुझे छुट्टी चाहिए।’’ मेरे लटके हुए चेहरे को देखकर बॉस के पास एप्लिकेशन पर हस्‍ताक्षर करने के सिवाय कोई और चारा नहीं रहता।

धीरे-धीरे घर वालों को हमारे प्रेम प्रसंग का पता चल गया। हमें अटूट बंधन में बांधने की तैयारी शुरू हो गई। मैंने पन्‍द्रह दिन की छुट्टी की अर्जी दी, परंतु मंजूर हुई दस दिन की। यहाँ भी मुझे बीमारी की शरण में जाना पड़ा। पन्‍द्रह दिन क्‍या, मैं पाँच दिन और छुट्टी काटकर आया। हम दोनों खूब घूमे। खूब मौज-मस्‍ती की। मैंने आते ही बीमारी का डॉक्‍टर का प्रमाण पत्र लाकर बॉस की मेज पर पटक दिया।

बीमारी के कारण ही जगह-जगह बडे़-बडे़ अस्‍पताल खुल रहे हैं। जिन्‍हें बनाने में लाखों मजदूर कार्य कर रहे हैं। अस्‍पताल में लाखों डॉक्‍टर, नर्स और अन्‍य कर्मचारी कार्यरत हैं। हजारों वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। बीमारी नहीं रहेगी तो करोड़ों लोग बर्बाद हो जाएंगे। नए-नए उपकरणों के अविष्‍कार एवं शोध कार्य के रूप में जो तकनीकी विकास हो रहा है, रुक जाएगा।

अरे, तुम सोच रहे हो कि बीमारी केवल गरीबों को सताती है। भई, बीमारी तो सबको समानता से देखती है। बीमारी के लिए न कोई नेता है न कोई जनता, न कोई ऊँच है न कोई नीच, जाति, धर्म का भी यहाँ जरा भी भेदभाव नहीं है। बीमारी समान रूप से सबका संकट मोचन करने के लिए तैयार है।

अब यदि देश के कर्णधार भी बीमारी का कवच पहन रहे हैं तो किसी को ऐतराज क्‍यों ! वे न्‍यायपालिका की पकड़ से या जेल जाने से बचने के लिए खुद को बीमार बता रहे हैं तो क्‍या बुरा कर रहे हैं ? और फिर बीमारी कब, किसको और कहाँ हो जाए, क्‍या कहा जा सकता है। इसलिए किन्‍तु–परन्‍तु के मायाजाल में मत फंसों, तुरन्‍त देश के कर्णधारों और जनता के भाग्‍यविधाताओं की सेवा में लग जाओ।

बस इतना ही। मेरा सिर दर्द हो रहा है…

 

एक विनम्र राजसी व्यक्‍त‍ित्‍व : शेखर जोशी

आज के राजनेताओं के जीने के शाही अंदाज और बड़बोलेपन को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कभी बेहद विन्रम और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले राजनेता भी होते थे। ऐसे ही एक राजनेता थे, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द। वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी का संस्मरण-

राजनीति के शीर्षस्थ महापुरुषों से आत्मीय परिचय कभी नहीं रहा था। पारिवारिक स्तर पर ‘प्रीमियर सैप- पं. गोविन्द वल्लभ पन्तजी का यदा-कदा जिक्र होता, लेकिन लखनऊ या नैनीताल जाकर उनके दर्शन का सौभाग्य कभी नहीं मिला। हमारे निकटस्थ समाजसेवी और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी पंडित हरीकृष्ण पाण्डेजी थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब कुछ व्यवस्थित हो पाए तो उन्होंने अल्मोड़ा- कौसानी मोटरमार्ग पर रणमण (रनबन) में अपने औषधालय की स्थापना की। वन्देमातरम् का संक्षिप्त रूप ‘बंदे’उनका प्रिय अभिवादन शब्द था। श्‍वेत खादी परिधान में ऊनी पंखी लपेटे औषधालय में सुगन्धित औषधियों के बीच हमेशा चार-छह आदमियों से घिरे हुए उन्हें देखना बहुत प्रीतिकर लगता था। पिताजी का उनसे गहरा भाईचारा था। पिताजी से ही जाना था कि कुली बेगार आंदोलन से लेकर सन् 42 के आन्दोलन तक पाण्डेजी ने कुमाऊँ की जनता को जागृत करने के लिए कितना संघर्ष किया, कुर्बानी दी और उनके परिवारजनों ने कैसी यातनाएँ सही थीं। लेकिन पाण्डेजी के प्रफुल्लित चेहरे और सौम्य व्यवहार से उनके भूमिगत जीवन के कष्टों, कारावास की यातनाओं को कोई आभास नहीं मिलता था। वास्तविक सेनानी की तरह उन्होंने इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को सहज स्वीकार किया था। अल्मोड़ा और बरेली जेलों में रहते हुए पाण्डेजी न केवल प्रदेश के प्रायः सभी शीर्षस्थ नेताओं के सम्पर्क में आए वरन उनके प्रीतिभाजन भी बन गए थे।

संभवतः ऐसी ही आत्मियता के कारण उस बार बाबू सम्पूर्णानन्दजी ने अपनी कौसानी यात्रा से लौटते हुए रणमण के औषधालय में पाण्डेजी का आतिथ्य स्वीकार किया था।

यह सन् 1947 की गर्मियों की बात है। मेरा अनुमान है तब सम्पूर्णानन्दजी उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षामंत्री थे। उस घटना के एक दिन पूर्व में पाण्डेजी के औषधालय में पहुँचा था। मेरा रणमण जाना अकारण नहीं था। यह प्रसंग मेरा अपनी प्रारंभिक पाठशाला के लगाव से जुड़ा हुआ है। शायद यह केवल मेरा ही अनुभव नहीं है कि हम ग्रामिण अंचल के लोग जीवनभर अपनी प्रारंभिक शाला से जितनी आत्मीयता से जुड़े रहते हैं उतना अन्य किसी संस्था से नहीं जुड़ पाते। हमारी स्मृतियों में कलम-दवात-पाटी का वह प्रथम साक्षात्कार अपने श्रद्धास्पद गुरु, प्रिय सहपाठियों और विद्यालय की सामान्य इमारत और पेड़-पौधों के साथ हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित रह जाता है। मेरा सौभाग्य था कि मेरे गुरुजनों ने भी मुझे उस पाठशाला से और गहरे जुड़ने के अवसर दिए। संभवतः मेरी कलात्मक रुचि ने उन्हें प्रभावित किया था। इस कारण उनका आग्रह रहता कि मैं प्रतिवर्ष गर्मियों की छुट्टियों में अन्य प्रदेश से घर आने पर अपनी शाला के लिए कोई चित्र या अलंकरण बनाया करूँ। यह मेरे लिए विशेष गर्व का विषय हुआ करता और प्रतिवर्ष मेरा यह प्रयास रहता कि किसी नए विषय पर अपनी कलम कूँची आजमाऊँ और अपनी भेंट शाला में प्रस्तुत करूँ।

उस बार किसी पत्रिका में एक रोचक कैलेंडर देखकर मैंने उसकी रंगबिरंगी अनुकृति तैयार की थी। अपनी भेंट को अधिक प्रभावकारी और टिकाऊ बनाने की इच्छा से मैं अपनी उस कलाकृति को फ्रेम में मढ़वाना चाहता था। गाँव में यह सुविधा सहज संभव नहीं थी। पिताजी ने मेरा मंतव्य जानकर मुझे सुझाव दिया कि औषधालय के गोदाम से प्लाइवुड का टुकड़ा लेकर मैं वहीं बढ़ई से उसे फ्रेम करवा लूँ।

पाण्डेजी मेरी गतिविधियों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने जिज्ञासा की तो मैंने अपनी चपलता में फ्रेम लग चुकने पर उन्हें अपनी कलाकृति दिखाने का वचन दिया। बढ़र्इ ने उस कलाकृति को चौखटे में बाँधकर अपनी कारीगरी से निश्‍चय ही उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि कर दी थी। मैंने सगर्व पाण्डेजी के सम्मुख अपना कृतित्व प्रदर्शित किया और उन्हें उसकी बारीकियाँ समझायीं तो पाण्डेजी ने स्नेह से मुझे चपतियाते हुए साधुवाद दिया। फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो, वह बोले, ‘कल मंत्रीजी आ रहे हैं। उनके जलपान की व्यवस्था करनी है। तुम लोग शहरी बालक ठहरे, सलीके से कर लोगे। बसन्त, तारी को लेकर सुबह आ जाना। इस तस्वीर को आज यहीं रहने दो कल ले जाना।

मैं पाण्डेजी का आशय नहीं समझ पाया था लेकिन तब भी अपनी कलाकृति को वहीं रखकर घर चला आया। दूसरे दिन हम लोग प्रातःकाल ही मंत्रीजी को देखने की उत्सुकता में औषधालय पहुँच गए। मंत्रीजी के स्वागत की सामान्य तैयारियाँ हो रहीं थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षों में मंत्रियों, सांसदों को लेकर आज की-सी आपाधापी, चापलूसी और मुंह दिखौवल नहीं होती थी। ग्रामांचल के थोड़े बहुत सामाजिक लोग ही वहाँ उपस्थित थे। सड़क के मोड़ के उस पार जब किसी मोटरगाड़ी का हार्न सुनाई देता तो सबकी उत्सुक निगाहें उस ओर उठ जातीं। सुबह के समय गरुड़-सोमेश्‍वर से अल्मोड़ा-रानीखेत-काठगोदाम को आने वाली गाड़ियों का क्रम चालू था और हरबार वह उत्सुकता जन्म लेती और फिर भीड़ में निराशा छा जाती।

किंचित् प्रतीक्षा के बाद अंततः मंत्रीजी की लम्बी कार आ पहुँची। पीछे-पीछे और भी दो-तीन छोटी गाड़ियों का काफिल था।

किसी राजसी व्यक्ति को देखने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं स्वीकार करता हूँ कि मंत्रीजी की जैसी भव्य कल्पना मैंने मन ही मन कर रखी थी प्रत्यक्षतः उन्हें वैसा न पाकर मैं निराश ही हुआ था। श्यामवर्ण, दीर्घकेशी सम्पूर्णानन्दजी सहजभाव से कार से उतरकर पाण्डेजी से स्नेहपूर्ण मिले। उनके साथ पारिवारिक महिलाएँ भी थीं लेकिन राजसी आभा से प्रभावित करने योग्य कोई व्यक्तित्व मुझे दिखाई नहीं दिया।

हम लोग चाय-नाश्ते की व्यवस्था में व्यस्त हो गए। बैठक में क्या कुछ वार्तालाप होता रहा इससे हम अनभिज्ञ ही रहे। संभवतः बीते दिनों के संस्मरण दुहराये गए हों, पुराने साथियों को याद किया गया हो या स्थानीय समस्याओं पर चर्चा हुई हो।

जलपान समाप्त हो चुकने पर अचानक मेरी पुकार हुई। मैं चौंक पड़ा। लेकिन पाण्डेजी के आदेश की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। ससंकोच मैं बैठक में उपस्थित हुआ तो पाण्डेजी को सम्पूर्णानन्दजी से मेरा परिचय कराते हुए सुना, ‘यह बालक हमारे मित्र जोशीजी के चिरंजीव हैं। बहुत मेधावी हैं। इसी वर्ष राजपूताना से मैट्रिक की परीक्षा दी है। अब आगे इन्जिनियरिंग में जाना चाहते हैं। इनके लिए किसी प्रकार की छात्रावृत्ति की व्यवस्था हो सकती तो इनकी इच्छा पूरी हो जाती।’

फिर जैसे पाण्डेजी को कुछ याद आया हो, उन्होंने मुझे आदेश दिया, ‘वह चित्र जो तुम कल दिखा रहे थे, उसे लेकर तो आओ।’

अपनी कलाकृति को दूसरे कमरे से ले आने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं था। मैं निरीह भाव से अपनी कृति को लेकर उपस्थित हो गया।

पाण्डेजी ने फिर अतिशयोक्ति की, ‘बहुत मेधावी बालक है, यह अद्भुत चीज बनाई है इन्होंने।’

फिर आदेश हुआ, ‘हाँ, हाँ भाई, बताओ। कल तुमने मुझे कुछ बताया था कि इस तालिका से गणना करके कैसे पिछले सौ वर्ष के दिन-वार निकाल लेते हो।’

वह कैलेंडर यदि मेरी मौलिक सूझबूझ का परिणाम होता तो शायद मुझे वैसी घबराहट नहीं हुई होती। उधार ली हुई प्रतिभा और ऊपर से पाण्डेजी द्वारा अपनी अयाचित प्रशंसा सुनकर मैं असहज हो गया था। लेकिन सम्पूर्णानन्दजी ने बालसुलभ उत्सुकता से गणना की विधि के बारे में अपनी ओर से जिज्ञासा कर मेरा उत्साह बढ़ा दिया, ‘अच्छा, यह बताइए 15 अगस्त, 1947 को क्या वार था।’

मैंने गणना कर वार बताया तो सम्पूर्णानन्दजी ने सहर्ष उसकी पुष्टि की। फिर ऐसी ही किसी महत्त्वपूर्ण तिथि के बारे में जिज्ञासा हुई और मैंने गणना कर सही उत्तर दे दिया।

सम्पूर्णानन्दजी ने अपने व्यवहार से ऐसा प्रदर्शित किया जैसे मैंने कोई अनोखी विधि का आविष्कार कर उन्हें आश्‍चर्य में डाल दिया हो।

मुझे प्रोत्साहित करने के लिए ही जैसे उन्होंने अपनी कन्याओं को संबोधित कर कहा, ‘आप लोग देख रही हैं, कैसा अद़्भुत कैलेंडर इन्होंने बनाया है।’

पाण्डेजी ने मुझे संकेत किया कि मैं वह कलाकृति मंत्रीजी को उपहार स्वरूप भेंट कर दूँ। आज सोचता हूँ वह कितनी साधारण-सी वस्तु थी जिसे पाण्डेजी के आदेश पर मैंने सम्पूर्णानन्दजी को भेंट किया था। लेकिन उसका बड़प्पन था कि उन्होंने उसे एक अमूल्य निधि की भाँति हार्दिक स्वीकार के साथ ग्रहण किया और अपने किसी सहयोगी को उसे कार में सहेज कर रखने का आदेश भी तत्काल दे दिया।

वर्षों बाद, ज्ञान होने पर, सम्पूर्णानन्दजी के कृतित्व और विराट व्यक्तित्व का परिचय मिला। और तब यह सोचकर मुझे आश्‍चर्य होता है कि इतिहास, दर्शन, ज्योतिष और खगोलशास्त्र के महान मनीषी ने उस दिन रणमण में सड़क किनारे पाण्डेजी के औषधालय के छोटे से कक्ष में अपनी विनम्रता का कैसा परिचय दिया था।

खेल में खेल : अनुराग

राष्ट्रमंडल खेलों में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर मैं हर भारतीय की तरह चिंतित था। मैं गुमसुम बैठा देश के कर्णधारों के गिरते स्तर के बारे में सोच रहा था। चौधरी साहब आ गए। मेरे कंधे को हिलाया तो भ्रष्टाचार की दुनिया से बाहर निकल आया।
वह मुस्काराए, ”बरखुद्दार क्या सोच रहे हो?”
मैं मुस्काराया, ”राजनेता असली खिलाड़ी हैं। वे खेलों में भी खेल कर रहे हैं। उन्हें न मैदान की जरूरत है और न ही प्रैक्टिस की। जन्मजात खिलाड़ी हैं।”
चौधरी साहब ने जोरदार ठहाका लगाया, ”तुम में यही कमी है कि अपने दिमाग से नहीं सोचते। जो पढ़-सुन लेते हो, उसी पर खून सुखाने लगते हो। राष्ट्रमंडल खेलों ने तो नेताओं-अफसरों की आत्मा को जगा दिया है। इसी का नतीजा है कि उनमें ईमानदारी बढ़ी है।”
मैंने रोष में कहा, ”बाजार में 20 से 40 हजार रुपये में मिलने वाली ट्रेडमिल को करीब 10 लाख रुपये के किराए पर लिया गया है, और वह भी मात्र 45 दिनों के लिए। 460 रुपये में मिलनेवाला साबुन का डिस्पेंसर 3397 रुपये में, 75 रुपये का प्लग प्वाइंट 1219 रुपये में, 111 रुपये का डस्टबिन 1167 रुपये में, 1800 रुपये का पेडेस्टल फैन 4412 रुपये में किराए पर लिया गया है। यह तो नमूने भर हैं। नियुक्तियों से लेकर हर किसी में घोटाला रहा है और आपको ईमानदारी दिखाई दे रही है?”
वह दृढ़ता से बोले, ”बिल्कुल। हमारे देश में सब काम कागजों में करने का रिवाज है। कागजों में तालाब बनते हैं, उनके लिए पैसा लिया जाता है। फिर उन्हें भरने के लिए पैसा लिया जाता है। हवा में फसलें उगाई जाती हैं और कट जाती है। पशुओं का चारा नेताओं-अफसरों के पेट में चला जाता है, वे कोलतार पी जाते हैं और डकार भी नहीं लेते। विकास की योजाएं कागजों में बनती हैं और खुशहाली आ जाती है। अब तुम ही बताओ, राष्ट्रमंडल खेलों में कहां भ्रष्टाचार हो रहा है। सामान खरीदा तो गया है, किराए पर भी लिया गया है। ऐसा तो नहीं हुआ कि लिया ही नहीं गया हो? नियुक्तियां भी वास्तव में हुई हैं। छोटी दुकान में जो चीज दो रुपये में मिलती है, वही बड़ी दुकान में चार की मिलती है। राष्टï्रमंडल खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा सवाल है। और गिल साहब, सही कह रहे हैं कि बारात दरवाजे पर आ गई है। जिन लोगों ने बहन-बेटी की शादी की है, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि कितनी ही कांट-छांट करो, लेकिन बजट बढ़ ही जाता है। और जब बारात दरवाजे पर आ जाती है तो पैसे का मुंह नहीं देखा जाता, बल्कि इज्जत बचाई जाती है। इसलिए इन सबको को न देखो, न सुना और न कहो। नेताओं-अफसरों की नियत पर शक मत करो। बस खेलों की कामयाबी की सोचो।”
मेरा रोष कम नहीं हुआ, ”लेकिन यदि सारा काम समय पर पूरा हो जाता तो कम पैसे में ही सारा काम हो जाता।”
चौधरी साहब ने कहा, ”हम किसी को शाम छह बजे मिलने का समय देते हैं तो साढ़े छह बजे तक पहुंचते हैं कि वह टाइम से नहीं आएगा। दूसरा भी सोचता है कि वह टाइम से नहीं आएगा और साढ़े छह बजे तक पहुंचता है। समय की पाबंदी तो हमारे संस्कार में ही नहीं है। काम को लेट करना तो हमारी आदत है। पेपरों की तैयारी हम पूरे साल नहीं करते, बल्कि ऐन टाइम पर कुंजी और नोट्स से रट्टा लगाकर पास होते हैं। इसलिए खेलों की तैयारी की लेटलतीफी में किसी का कोई दोष नहीं है। देखते रहो खेल शुरू होने से पहले सब काम खत्म हो जाएगा।”
मैं तो चौधरी साहब से सहमत हो गया हूं। और आप…।