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बीनू भटनागर की कवि‍तायें

14 सि‍तम्‍बर 1947 को बुलन्दशहर ( उत्‍तर प्रदेश) में जन्‍मी बीनू भटनागर के लेख, व्‍यंग्‍य, कवि‍तायें आदि‍ रचनाएं वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन कवि‍तायें-

पचास के उस पार

माना कि यौवन के वो क्षण,
खो गये कुछ उलझनों में,
मैं वही हूँ तुम वही हो,
फिर न क्यों,
जी लें वही उन्माद के क्षण।

तुम मेरे हो शांत सागर,
लक्ष्य मेरा,
मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली हूँ,
बाँहें फैला दो ज़रा मैं तो वही हूँ।
महसूस मुझको करा दो मैं नहीं हूँ।

तुम हो इक चट्टान हो संबल मेरा,
फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।
भूल जाओ बालों मे चाँदी के जो तार हैं
भूल जाओ कि हम पचास के उस पार हैं।
फिर से जी लो कुछ पल,
जो हथेली से फिसलकर,
रेत के ढेर में,
ओंस की बूँदों से खो गये हैं।
आज भी मेरे वो पल,
तुम पर उधार हैं।

ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा

दूर गगन पर एक सितारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा,
फिर भी लगता कितना प्यारा।

नीड़ पेड़ का रैन बसेरा,
पक्षी का आकाश है सारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

नदिया का बहता जलधारा,
प्यास बुझाता हरता पीड़ा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

फूलों का मुस्काता चेहरा,
उनपर मंडरता एक भँवरा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

सुर लय पर संगीत की धारा,
तन मन सबे प्रभु पर वारा,
वो तेरा भी है, और है मेरा।

ये मेरा है वह है तेरा,
कितना अर्थहीन ये नारा,
ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा।

नदिया

हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ़ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,
पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो
ये ही हैं कहानियाँ।

भास्कर चौधुरी की छ: कवितायें

27 अगस्त, 1969 को रामानुजगंज, सरगुजा (छत्‍तीसगढ़.) में जन्‍में भास्कर चौधुरी का काव्‍य संग्रह ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ प्रकाशित हो चुका है। कविताओं के अलावा समीक्षा, संस्मरण आदि विधाओं में उनकी रचनाएं विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी छ: कवितायें-

ज़ेहादी

कहो यदि तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
खिल जाएँगे असंख्य फूल
जी उठेंगे खेत-खलिहान
खत्म हो जाएगी भुखमरी
साफ हो जाएगी दुनिया से सारी गन्दगी
ग़ायब हो जाएगी हवा से बदबू

कहो यदि तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
मिल जाएँगे पश्चिम और पूरब
उत्तर और दक्षिण
रेगिस्तानों में बारिश होगी कई दिनों तक
भर जाएँगे लबालब
मीठे जल से -
सूखे पोखर नदी और तालाब

यदि कहो तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
सुन्दनर हो जाएगी धरती
नारंगी के बागानों सी
हरी-भरी
धान के लहलहाते फसलों सी

तो लो
मैं प्रस्तुत हूँ
मरने के लिए
असमय
शामिल होने के लिए
उन हज़ारों हज़ार लोगों की भीड़ में
शामिल जिनमें नवजात शिशु
और अजन्में भी
बच्चे, जवान स्त्रियाँ और बूढ़े
जिनके पास बची नहीं होती साँसें
यह जानने के लिए
कि क्यों मारे गये वे
कसूर क्या था उनका
क्या बिगाड़ा था उन सबने
तुम्हारा
किसी का…

कहो यदि तुम !

फूल

फिर
फिर
झर जाते हैं फूल
फिर
फिर
खिलने के लिए.

इस सदी में दुःख

यह कैसा दुःख है
जो
रात के करवट बदलते ही
ग़ायब हो जाता है.

प्रेम

अड़सठ के पिता
साठ की माँ

माँ आती है
कहती है-
अकेले हैं तुम्हारे पिता
और लौट जाती है
तय समय से पहले
पिता के पास

पिता आते हैं तो
चिन्ता  करते हैं माँ के लिए
और लौट जाते हैं
तय समए से पहले
माँ के पास….

निठल्ले

देखते-देखते
दिन गुजर गए
शाम ढल गई
देखते-देखते
बूढ़ा हो गया मैं
देखते-देखते
कितनी बड़ी हो गई वह
देखते-देखते….

दरअसल कुछ नहीं
बीतता देखते-देखते
बीतता है केवल उनके लिए
जो केवल देखते हैं -
निठल्ले !!

सुख

आसमान का सुख
बादलों से ढक जाने का

सुख प्रसव के बाद
नवजात को छूने का

पत्तों का सुख
पत्तों पर बारिश की बूदों के ठहरने का

सुख परिश्रम के बाद
गिलास भर ठंडा पानी पीने का

आम का सुख
पकने के बाद
ढेले की चोट से तोड़ जाने का

सुख
थोड़े में गुजारा करने का

सुख
सुख बांटने का !

पन्‍द्रह छोटी-छोटी कवितायें : जवाहर लाल गोयल

प्रसि‍द्ध लेखक-चित्रकार जवाहर गोयल की छोटी कवि‍तायें -

1-

घर में रहते हुये

दिन डूबने पर लगता

काश घर में होते

2-

कुछ पढा़ नहीं जाता पर

हाथ अपने से बढ़ता

लगता पढ रहे होते

3-

झरती गिरी थीं पत्तियाँ

धूल में बिखरती रहीं

यह अलग सच था

पेड़ हरा होता रहा

4-

तेज हवा में नबी घास

बिछ गयी जमीन पर

बारिश थमते ही तनी खडी

फिर झूम के लहरा रही

5-

केवल मेरा

यह गूंजन करता भौंरा

सारे दिन मौन कुतरता

6-

शाम में

आता याद

अंधेरे का इतिहास

7-

पत्तों पर गिरते पत्ते

धूल माटी डंठल

धरती की गहरी साँस

धीमे से उड़ती राख

8-

होता प्रतिदिन सबके साथ

पर कितना अकस्मात

कितना नूतन कितना विराट

कोई भी पहला अनुभव स्मृत

9-

पत्तों से पत्तों पर गिरती

बारिश की आवाज

रात में ढोल मजीरों का उल्लास

10-

सूखी कडी़ मिट्टी

खोदने पर

नीचे नर्म मिलती

11-

जंगल में घुस

बढ़ता दिन खुलता

सब कुछ पीछे कर

पेड़ों को ले आता निकट

12-

पाने का मन याने लालच

होने का मन याने सत्ता

नाद याने उन्मुक्त गूँजती रिक्तता

13-

यह मैं हूँ।

कहाँ?

यहाँ कुछ भी नही!

केवल तुम्हें पाता मैं।

14-

अनुभव नहीं

ज्ञान नही

केवल क्षितिज सी मुस्कान

घंटी के स्वर

कम्पन्न

थमता मन

थिरता समय

15-

शब्द जमा हों और बहें

ढलान पर धारा में पारदर्शी

निथरते सूखते दाग छोड़ते

सोखे जाते विलीन होते

वत्सल धरा बनते

 

नित्यानंद गायेन की तीन कवितायें

20 अगस्त 1981 को शिखरबाली, पश्‍चिम बंगाल में जन्‍में नित्यानंद गायेन की कवितायें और लेख सर्वनाम, अक्षरपर्व,  कृति ओर, समयांतर, समकालीन तीसरी दुनिया, जनसत्ता, हिंदी मिलाप  आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। उनका काव्‍य संग्रह ‘आपने हिस्से का प्रेम’ भी प्रकाशित हो चुका है। फिलहाल हैदराबाद के एक निजी संस्थान में अध्यापन व स्वतंत्र लेखन। उनकी तीन कवितायें-

आज़ाद कब हुआ मैं ?

15 अगस्त
सन् 1947 से
अबतक
आज़ाद कहाँ हो पाया मैं
अभी तक घिरा हुआ हूँ
भूख-शोषण
और धर्म की गुलामी में
किन्तु सुना है मैंने
कई बार-
हम आज़ाद हो चुके हैं
उन्हें कहते हुए
कुछ तो सच्चाई होगी
उनकी बातों में
वे शायद सच में आज़ाद हैं
तभी तो लूट रहे हैं
जी भर कर
उन्हें लूटने की आज़ादी है
मेरी आज़ादी के नाम पर
मिली है मुझे
गरीबी, शोषण, अशिक्षा
और कुछ आरक्षण का वादा
एक सरकारी कागज़ पर
उन्हें मालूम था
मुझे पढना नही आता .

वह खोद रहा है जमीन

पिछले कई वर्षों से
या कहिये सदियों से
वह खोद रहा है ज़मीन
इस उम्मीद से कि-
एक दिन निकलेगा पानी
और वह बोयेगा धान अपने छोटे से खेत में
और बचा लेगा
अपने परिवार को
भूख से
अचानक एकदिन
चीख उठी धरती-
मुझे माफ़ कर देना मेरे पुत्र
अब कुछ नहीं बचा मेरे गर्भ में
मैं लूट चुकी हूँ
सब कुछ बिक चुका है मेरा
अब मैं खुद प्यासी हूँ

मेरा बजूद

मैं नही चाहता
मरने के बाद
अपनी चर्चा तुम्हारी
किसी महफिल में
जीते जी थोड़ा मिल जाये
वही बहुत है
आधी उम्र तो
बीत चुकी  है
जीने की  लड़ाई में
बस मान लो इतना
कि मैं भी इन्सान हूँ
यही बहुत है
यही मेरा वज़ूद है

सहिरा तंगल की कविताएं

केरल के पालघाट जिले में जन्‍मीं युवा मलयालम कवयित्री के दो काव्य संग्रह एवं एक उपन्यास प्रकाशित हो चुका है । कविता के लिए ‘अरेबिया साहित्य पुरस्कार’ एवं ‘केरल सरकार का एमेरजिंग राइटर’ पुरस्कार से सम्मानित सहिर तंगल की इन कविताओं का अनुवाद बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्‍स ने किया है-

पुल

बारूदों के गोदाम में
आग लगी
सपनों से तू उसे जला डाला

समुद्र से थम न सका
आसमान से ढक न सका
मैं चकित होकर खडी़ हूँ

केवल उस तरफ जा पानेवाला पुल
दूर भाग निकलने पर भी
पीछा करती आंखें

तेरा रूदन
गज़ल बन हरेक कोने में
पीछा करती हैं

कौन देख रहा है ?

कौन किसे देख रहा है ?
दिन रात को देख रहा है ?

आंख मन को ?
मोर पंख इंद्रधनुष को?

शहद की बूंद होंठ की लालिमा को ?
उंगलियॉं स्पर्श को ?

तेरा प्यार
कविता की करूणा को ?

किसे देख रहे हो
कौन देख रहा है ?

जून

यहां पर जून का महीना नहीं है
इंतजार भी नहीं है
कांटेदार पौधे में कांटे नहीं हैं
ऊंट प्यास का संचय नहीं करता
दौड़कर घुस न पाने जैसा
किसी प्रकार की यात्रा संभव नहीं हो रही
मेरे दिन अंधे के
हाथ का कलेंडर बन रहा है
जुलाई के पहले वे मिट रहे हैं

मेरा जून
खो गया है मेरे लिए

गहरा समुदंर

वह चीज किस समुंदर में
खो गई ?
बिना कोई निशानी छोड़

मां जब बच्चे से
गुस्सा करती है तो
उसकी एक आंख में गुस्सा व
दूसरे में आंसू होता है

कौन सा नाविक
इस रास्ते से आएगा ?

मेरा मन एवं
तेरा झांकना
कितनी गहराई में है ?

बागबान

कविता के मंच में
कविता की खोज में भटकनेवाला कवि

गाने के अंत में
दिल को खोजनेवाला राग

तैयार किए हुए गीत को कसने के लिए
वीणा के टूटे तारों को सहलाती उंगलियाँ

तेरी जरूरत है कहते हुए सुबकने पर
गजलों को सुलाकर मंच से
उतरता हुआ गायक

हरी चादर में फूलों को सुलाता
बागबान

भीमसेन त्यागी की कविताएं

कथाकार भीमसेन त्यागी प्रफुल्ल मुद्रा में पत्नी बाला त्यागी के साथ

कथाकार भीमसेन त्यागी का 19 सितंबर को जन्मदिवस है। अजीब इत्तेफाक है कि इसी दिन उनकी पुण्यतिथि भी है। उन्होंने बहुत अच्छे गीत और कविताएं लिखी हैं, लेकिन यह बात उनके निकटतम मित्रों में से भी बहुत कम लोग जानते हैं। उनकी कुछ कविताएं और गीत-

स्वागत गीत

प्राण  लगा  चंदा  की  बेंदी औ  तारों की वरमाला ले
 रात  चांदनी-सी  तुम आई!
 मन  होता  अपनी  कमजोरी  जाहिर कर दूं
 अपने  पापों  की  सब  सूची सम्मुख धर दूं
 लेकिन  तेरे  स्वप्न-जाल  की डोर  न टूटे
 सुख  का  यह साम्राज्य न  इतनी जल्दी छूटे
दुख कह देने का सुख पाऊं या सुख हरने का दुख पाऊं
 सोच-सोच  चेतना  गंवाई!

 नए-नए नित स्वप्न जुगाना तो अपन में बात बड़ी है
 इन सपनों के ऊपर ही तो संसृति की मीनार खड़ी है
 लेकिन महल रहे जो कल तक औ, अब गिरकर टूट चुके हैं
 याद कभी उनकी कर लेना पाप नहीं जो छूट चुके हैं
 मैंने मुड़कर देखा ही है अपने पिछले जीवन-पथ को
 तुम क्यों पगली-सी भरमाई!

 भला-बुरा जैसा जो कुछ कर कह आए हम
 सुख-दुख हर्ष-विषाद सभी जो सह आए हम
 भला यही अब उसको भूलें खुद को जानें
 आगे  जो  कुछ  करना  है उसको पहचानें
बहुत बार सोचा था मन ने, लेकिन कांप गया यह उस दिन
 जब उदासियां तुम पर छाईं!

गीत दर्द का होगा गाया

आज सांझ से ही ऐसा लगता है
जैसे चांद सलोना
बाद युगों के नभ में आया!

मेरा मन कुछ घबराया-घबराया-सा  है
लेकिन  घबराने  जैसी कुछ बात नहीं है
खिली  हुई  है यहां चांदनी पीली-पीली
नभ में काली रात नहीं है
काली  रात नहीं लेकिन लगता है मुझको
जैसे लखकर यह जहरीला चांद गगन में
तुमने  कोई  गीत  दर्द  का  होगा गाया!

आकर्षण की मदिरा पी तारों की टोली
नभ के आंगन में मस्ती से नाच रही है
आया  बासंती  बयार  का  पहला झोंका
सरिता नए प्यार की गीता बांच रही है
सरिता नए प्यार की गीता बांच रही औ
हम-तुम कितनी दूर सुनयने?
आज सोच यह, मेरा मन भर-भरकर आया!

विष के बदले चंदन बेच दिया

अब काया का मोह नहीं, यह चाहे जिस वन में भटके
पापों के व्यापारी को जब, मन का कंगन बेच दिया

अनचाहे सुख का जीवन, कितनी हसीन लाचारी था
क्या कह दूं, किससे कह दूं, यह सागर कितना खारी था
मत आंजो तुम आंख, मांग में मत सुहाग सिंदूर भरो
निर्जनता के बदले बांहों का मृदु बंधन बेच दिया

अपमानों का गदला पानी पी जीवन की बेल बढ़ी
और इसे था गर्व कि कितने-कितने ऊंचे शिखर चढ़ी
लेकिन क्षमा करो, मुझको मुरझाने दो, मिट जाने दो
दुख की पूंजी के बदले में सुख का क्रंदन बेच दिया

क्षण-क्षण पल-पल पर कड़वी दुविधा ने डेरा डाला था
मैं मकड़ी था और मुझे घेरे खुद मेरा जाला था
ऐसी हूक उठी मन में, रग-रग में ऐसा दर्द जगा
मैंने अभिशापों के बदले युग का वंदन बेच दिया

जिसको जीवन कहा मौत के घर की वह पगडंडी थी
आईं सांसें चार एक से एक अधिक ही ठंडी थी
और आज जब छोर पांव के नीचे सोच रहा हूं मैं
अब चलना कैसा जब विष के बदले चंदन बेच दिया

दे रहे तुम कसम

हम  सुनाते  रहे
तुम  छुपाते  रहे
  पीर फिर भी तुम्हारी
      मगर जान ली!

हारते  तुम  गए
जीतते  हम  गए
 जीत फिर भी तुम्हारी
       मगर मान ली!

दे रहे तुम कसम
है  पुरानी  रसम
 बात फिर भी तुम्हारी
       मगर मान ली!

शांति के कबूतर

विश्व शांति सम्मेलन में
उड़ाए गए कबूतर
उन्होंने शांति का संदेश
युद्ध के हैवानों तक पहुंचाया
और जब
वे लौटकर आए
तो कर दिए गए जिबह
पकाए गए देग में
शांति के पुजारियों ने
मनाया जश्न
छककर लिया महाभोज का मज़्ाा
कबूतर का मांस लजीज़्ा होता है
और
शांतिदूत कबूतर का मांस
कुछ ज्यादा ही लजीज्