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रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

बीनू भटनागर की कवि‍तायें

14 सि‍तम्‍बर 1947 को बुलन्दशहर ( उत्‍तर प्रदेश) में जन्‍मी बीनू भटनागर के लेख, व्‍यंग्‍य, कवि‍तायें आदि‍ रचनाएं वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन कवि‍तायें-

पचास के उस पार

माना कि यौवन के वो क्षण,
खो गये कुछ उलझनों में,
मैं वही हूँ तुम वही हो,
फिर न क्यों,
जी लें वही उन्माद के क्षण।

तुम मेरे हो शांत सागर,
लक्ष्य मेरा,
मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली हूँ,
बाँहें फैला दो ज़रा मैं तो वही हूँ।
महसूस मुझको करा दो मैं नहीं हूँ।

तुम हो इक चट्टान हो संबल मेरा,
फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।
भूल जाओ बालों मे चाँदी के जो तार हैं
भूल जाओ कि हम पचास के उस पार हैं।
फिर से जी लो कुछ पल,
जो हथेली से फिसलकर,
रेत के ढेर में,
ओंस की बूँदों से खो गये हैं।
आज भी मेरे वो पल,
तुम पर उधार हैं।

ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा

दूर गगन पर एक सितारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा,
फिर भी लगता कितना प्यारा।

नीड़ पेड़ का रैन बसेरा,
पक्षी का आकाश है सारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

नदिया का बहता जलधारा,
प्यास बुझाता हरता पीड़ा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

फूलों का मुस्काता चेहरा,
उनपर मंडरता एक भँवरा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

सुर लय पर संगीत की धारा,
तन मन सबे प्रभु पर वारा,
वो तेरा भी है, और है मेरा।

ये मेरा है वह है तेरा,
कितना अर्थहीन ये नारा,
ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा।

नदिया

हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ़ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,
पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो
ये ही हैं कहानियाँ।

सुनीता की कवि‍तायें

12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे चकियाँ में जन्मीं डॉक्‍टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू. से पी-एच.डी. की  है। इनके  लेख–कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्थायी

अख़बारों के चंद पन्नों में सिमटी जिंदगियों में
ताजेपन सा कुछ भी नहीं
रात के पड़े खाने सुबह की तरह
रोते-बिलखते मासूम चेहरे पल के मेहमाँ
गाते-गुनगुनाते मुखड़े होंठो की चुभन
एक क्षण के पश्‍चात ढल जाते हैं रात्रि सरीखे
चंद चर्चाओं के बाज़ार क्षणिक गरम, तवे से
छपाक-छपाक की भड़ास क्षण में गायब
रेत पर गिरे बूंदों के अस्तित्व के मानिंद
बरखा-बहार और मधुवन की मधुर ध्वनि
धड़कनों में शोर मचाते खलबली अभी-अभी
करवट के साथ पन्ने पलटते दृश्य और दृष्टि बदले सभी
परिवर्तित परिवेश की पुकार सुनाई देती कभी-कभी
सुमधुर योजनाओं की ललकार दिखाई देती चहुओर
न रुकने वाली वक्त की सुइयाँ टीम-टीम कर लुप्त होतीं
एक चेहरा उभरता है प्रेयसी के जुल्फों में कैद
चितवन की चंचलता चहक उठती
नयेपन का अंदाज़ पलक झपकने के साथ
बुलबुले से अस्तित्ववि‍हीन हो जाता
खबरों की दुनिया में निरंतर गहमागहमी बनी रहती
निरुउत्तर प्रजा पल्लवित पुण्य बनी हुई
लेकिन भू धरा थमने के जगह डोलती रहती
थिरकती साँसों के लय पर वायु नृत्य करते
नटते, रिझते और रिझाते रम्भाने लगते
पात्र में रखे पानी सा मटमैला और फीका बन जाते
दिखने में धवल और स्वच्छ लगते
भागते, दौड़ते कल्पना के सागर में छलांग लगाते
छलकते आँसू रंगीन चित्रों के गुजरते ही सूख जाते
चिथड़े-चिथड़े सुख की तलाश में निकल पड़ते एक और लम्‍बी यात्रा पर
नंगे, खुले और खुरदरे पैरों के निशान जह-तह बिखरे पड़े
उनकी आवाज़ाही का कोई स्थायी प्रमाण नहीं
नर-शरीर की तरह अस्थायी, क्षणभंगुर और जुगनू की तरह
यहाँ सब कुछ सिमटा हुआ है बिखरे तौर पर
ढेर में तब्दील होते मलबा सा नहीं
बल्कि सपनों के कलेजे पर बिछे फूलों के कतारों की तरह
एक-एक कतरन से तैयार वस्त्र सा सुसज्जित, आकर्षक किन्तु अस्थायी

इस जिंदगी के बदले

इस जिंदगी के बदले
दो जून की रोटी नहीं मिली
सौदों के अम्बार मिले जिनकी वजह से नर्क के द्वार खुले
हँसते-खिलते गुलशन में
पतझड़ सदियों से बने हुए हैं

पगडंडियों से झुरमुट की तरह रौंद दिये गये
एक-एक करके चुने गए उम्मीद के दाने
भेड़-बकरियों में बाँट दिये गये
गर्दन जबह करके जबरदस्ती जुराबे बाँधी गई
कपड़े तार-तार कर दिये गये…!

इस जिंदगी के बदले
खपचालियाँ घोंप-घोंप कर मुरब्बे बना दिये गये
चीनी की जगह नमक रगड़ा गया
स्वाद लेकर चखने के स्थान पर
कसैले पान की तरह थूक दिये गये

खाने के लिये जूठन परोसे गये जैसे ज़ायकेदार छप्पन भोग
छटपटाहट होती रही लेकिन कोलाहल न बन सके
हवन कुण्ड में डाले गये घी की भाँति
धीरे-धीरे जलते हुए बदबू फैलाने लगे
गीली लकड़ी की तरह सुलग-सुलग कर

इस जिंदगी के बदले
मुझे बना दिया गया
आस्मा से गिरती हुई ओसें की बूंदें
पशुओं के आगे पड़े चारे के तिनके की भाँति
बिछा दिये गये अरमान के सारे उपागम

ठहरे हुए पानी के चारों-ओर
फैली हुई बजबजाती काई
जिसके चौमुहाने पर जैसे भिनभिनाती मख्खियाँ
मछली की सी तड़फाड़ाहट
उथल-पुथल करती नसें

इस जिंदगी के बदले
हमें दिये गये
बदलते विस्तर की तरह रोज़ एक नई सेज
उठाये-बिछाए जाते रहे
एक दिन से कई रातों तक
फैले बदबू से गहन घृणा के पात्र बनने तक

बेमज़ा भोजन की तरह
पटक दी जाती थाली सी
वदन माज दिए जाते
पेस्ट से घिसते दाँतों से
मशीन में काट दिये जाते चारे की तरह

इस जिंदगी के बदले
धब्बे लगी दीवार में तब्दील कर दिये जाते
एक नामुराद मुलाजिम की तरह
धकिया दिये जाते
घुटन के मकान में कैद किये जाते

परिंदे के पर काटकर उसे उड़ने पर मजबूर से किये जाते
हथेलियों पर अंगारे रख दिये जाते
बर्फ के टुकड़े मुख में घुसेड़ कर
आँखों में फूलों के सेज सजाये जाते
सिसकी अन्तःपुर में सुरक्षित रह जाती

इस जिंदगी के बदले
खुरपी पकड़ाकर बिराने में ठेल दिये जाते
उड़ती रेतों को पकड़ने की फरमाईश की जाती
घुमड़ते बादलों के झुर्रियों को गिनवाए जाते
एक बैल की तरह बलुहट में जोत दिये जाते

ताबूत में कैद लाश से जुगाली कराई जाती
पर्वत शिखरों पर जमें बर्फ के रेम्बों दिखाये जाते
अनसुनी कहानियों के किस्से दोहराते हुए
गरम तवे पर रोटी सेंकती उसे ठंडा लोहे में परिवर्तित कर दिये जाते
फिर घन पर घन बरसाए जाते
उसके सपाट होने तक

इस जिंदगी के बदले
नेत्रों पर चिलमन चढ़ा दिये गये
झूठे वादों के साथ दगा ही मिले
कुत्तों की तरह बोटी-बोटी नोचकर खाए
भूखे पेट पर रोलर चलाकर
जश्न मनाने की मन्नत मानी गई

धमकियों के दम पर धमनियाँ जब्त कर लिये गये
तपते रेत पर छोड़ दिये गये
महल की नींव रखने के लिये
इमारत के चारों पाए कूल्हों पर टिका दिये
भावी रिश्तों के नाम पर सब कुछ होता रहा

इस जिंदगी के बदले
खच्चर सरीखे लादी ढोते रहे
लगन कभी भी कम न हुई
चाहत के दिये जलते रहे
एक-एक दिन गुजरते गये उम्मीद बंधी रही

सुबह की किरण फूटते ही
हिम्मत की ताकत दुगुने दम से लग जाती
लेकिन बेड़ियों में कैद जिंदगी
अपने अंत की ओर बढ़ रही थी
उसे रोकना मुमकिन न था
हथौड़े की मार से जिस्‍म बेजान हो गये

इस जिंदगी के बदले
यातना के सागर में डुबो दिये गये
खारे पानी से गल गये
हड्डियों का ढ़ाँचा बरकारार रहा
युगों-युगों तक सिला की तरह

लहराते ख़्वाब खो गये
यादों के पट पलकों में खुल रहे हैं
चीनी-जल की तरह घुल गये
जीवन से इस कदर मोह बढ़ता रहा लेकिन उड़ान भरने की मनाही थी
वह आज भी बरौनियों में मसखारे से चिपके हैं

सूरज कुछ कहता

सूरज कुछ कहता है
सदा चुप-चुप रहता है
बंधनमुक्त विचरता है
स्नेहमग्न उलहना देता है।

धूप की तपिस तड़प रही है
अनजाने जख्म से जूझ रही है
कब मुक्त होंगें कर्तव्य से
पीड़ा की वेदना व्यथा सुना रही है।

नीरव में पड़े तन्हा खड़े हैं
दयार्द्र की उम्मीद से भरे हैं
मदांध मानव से गिला है
हम भी प्रेमातुर हेतु बने हैं।

यावज्जीवन के आमरण हैं
प्रतिक्षण के विवरण हैं
कष्टापन्न को सहते हैं
देशार्पण में लगे रहते हैं।

मार्गव्यय का लोभ नहीं है
सदाचार में तल्लीन हैं
व्यभिचार से रिश्ता नहीं है
भयमुक्त संचित नरोत्तम हैं।

नीलाम्बर के वासी हैं
पृथ्वीजन के पोषक हैं
शरणागत के दास हैं
कलाप्रवीण विद्यार्थी हैं।

धर्मविमुख नहीं करते हैं
पथभ्रष्ट के भी हमराही हैं
अँधेरे के दुश्मन हैं
उजाले के देवालय हैं।

पनचक्की से घुमरते हैं
देहलता से लिपटते हैं
नीलकमल से सुसज्जित हैं
पीताम्बर से चमकते हैं।

कनकलता से मिताई है
यहाँ न कोई महाजन है
नगरवास में रहता हूँ
शिलालेख सा अमिट हूँ।

सुनता न कोई आपबीती है
आनंदमग्न लोग स्नेहमग्न हैं
दर्द के रेखांकित से अंजान हैं
बीचोंबीच उभरे, जवाब खामोश हैं।

शोकाकुल करुणा से देखते हैं
मुँहमाँगा वरदान सहश्र पाते हैं
व्याकुल मन बेमतलब भटकते हैं
कर्मभूमि को मालगाड़ी सा ठेलते हैं।

गगन में हरफनमौला से फिरते हैं
पदच्युत का कोई भय नहीं है
देशनिकाला कभी नहीं हो सकता है
हम सृष्टि संचालन के पथगामी हैं।

कमलनयन में उम्मीद बन सजते हैं
पंचतत्व के उत्कृष्टतम स्वामी हैं
पर्णकुटी से महलों तक में रहते हैं
आशाओं के दीपक बन जलते हैं।

छटपटाहट

कहीं दूर से रौशनी आ रही थी
आसमान में बादलों के बीच तारें
मिट्टी के जर्रे-जर्रे में कसक थी
कमरे में बल्ब खमोशी के गीत गा रहे थे
वह दूर खड़ी कुकृत्य को देख रही थी
लब खामोश थे पलाश के पेड़ रो रहे थे
पत्तों की सरसराहट भय चित्र खींच रहे थे
बगल कमरे में लेटी माँ खाँस रही
पीड़ा, दर्द, कसक की आहटें हल्की-हल्की आ रही थीं
पेड़ों पर अपने घोसले में पंक्षी गहरी निद्रा में निमग्न थे
दरवाजे के कोने खड़ी शीतल छाया
अंदर के जलन से लपलपा रहे थे
अपनी गरज बाबली जबरदस्ती घसीटती रही
अफ़यूनी जुनूनी निर्णय से तन-वदन टूट रहा था
अफ़सोस, दिल गड्ढे में धँसता जा रहा था
स्त्री के समक्ष स्त्री का लूट लिया संसार
दम तोड़ दिए आह, सिसकी और लज्जता ने
नोटों की गड्डियाँ आँखों में लहरा रही थीं
नसों में दौड़ते खून पानी के शक्ल अख्तियार करते जा रहे थे
अय तेरी कुरबत, मनमाने सो कर ले
चक्कर काटती धरती घूम कर आ जायेगी दुबारा अपनी जगह
इस काया को छोड़ते ही एक नए छाया में अवतरित होते हुए
आस्मा में टिमटिमायेंगे
उड़ता गप्पा का उपहार देते हुए
कुछ गाँठे खोलते हुए चिंता की लकीरे घिर आईं
बादलों के आँचल न ढक सके
समाज के ताने में गूंथे व्यंगवाणों को।
(एक सच्ची घटना पर आधारित है।)

शरद तिवारी की कविताएं

युवा कवि शरद तिवारी की कविताएं

क्या होगा

एक पेड़ था
जिसकी डालियों पर
चिडियाएँ घोसले बनाती थीं
वहीं पर उनका बसेरा था
वहीं चहचहाती थीं
एक पेड की जटाएँ
धरा में धँसी थीं
उसके तले
कहते हैं किसी योगी ने
परमत्व पाया था
एक पेड़ था विशाल
जाने कहाँ से आया था
उसके तने को चीर
कभी किसी ने
एक सुन्‍दर घर बनाया था
उपलब्धि को सबने सराहा था
एक पेड़ था वह
जो आँधियों में टूटकर
किसी राहगीर के सिर पर गिरा था
वह भी पेड़ ही था
जिसकी शीतल छाया ने
पथिक का श्रम हरा था
सहारा बना था
पेड़ थे बहुत से और भी
जो अब भी हैं
नही भी हैं
जो सामानों में बदल गए हैं
जिनके फल हमने तोडे़ थे
बच्चे, बन्‍दर जिन पर चढे़ थे
जो कुल्हाडी़ की चोटें खा
धरा पर पडे़ थे
पतझड़ में जिनके पत्ते झडे़ थे
और फिर बहार आई थी
कथाएँ लिखी गईं
कवियों ने पोथियाँ सजाई थीं
यह सब हुआ था
और भी न जाने क्या-क्या हुआ था
और क्या-क्या होगा
रह गया था
यह सब कुछ सोचता-सा मैं
उस नन्हे बीज को
हथेली पर रखकर
उलटता-पुलटता
देखता हुआ।

योग

इस दृश्य से
अलग रहने की कोशिश में
रहता हूँ हरदम
सोचता हूँ विचरूँ
‘दृष्टा’ बनकर सतत्
बस
असंपृक्‍त
अपनी मौत को भी देखूँ
तमाशे की तरह
अलग खड़ा रहकर
शरीर क्या हैं ?
सिर्फ हाड़-माँस
भौतिक राशियों का पुंज
आँखें हैं
बस किसी लैंस की तरह
गले से निकली आ़वाज
मह़ज वोकल कॉर्ड की कम्‍पन ही तो है
ऐसी ही व्याख्या करता हूँ अक्सर
ताकि बना रहूँ
एक अंसग दृष्टा
पर जब भी कभी
कोई सुगठित सुसज्जित
हा़ड़ माँस का पिंड
जिसमें जडे़ हों
दो सुन्‍दर लैंस
सामने आ जाता है
और
वोकल कॉर्ड करती है
सुरीली कम्‍पन
यह दृष्टा
दृश्य में विलीन हो जाता है
ऐसे में फिर
योग कहाँ रह पाता है।

भेडि़या धसान

चलते चलते
देखा किसी ने पीछे मुड़कर
ज़रा गौर से
और चल दिया
देखा देखी देखा
कुछ इसी तरह
दूसरे ने भी
और चल पड़ा
तीसरा भी देखकर चलता हुआ
चलते हुए और भी कुछ लोगों ने
देखा जिस ओर
मैंने भी देखा
चलते-चलते
उसी ओर
कुछ भी न था जहाँ पर
गर था तो बस वही
भेडिया धसान
जो चल रहा है
ज़माने में
ज़ोरों पर
जिसके चलते
चलते हैं लोग
एक दूसरे को देखकर
बिना किसी तर्क के।

छुई मुई

छुई मुई
छूते ही मुई
सिमटी
मुरझा-सी गई
नाज़ुकी
ऩाज होता है जिसपे
तमाशा बन गई
उँगलियाँ उठीं सबकी
उसकी ही ओर
न चाहते हुए भी।

गरमी आ रही है

ट्यूब लाइट की फट्टी के पीछे से
बड़े दिनों बाद आज अचानक
हँसता-सा मुँह लिए
ख़ामोशी से गरदन लटकाए
लगातार झाँकती छिपकली
इशारा करती है
कि गरमी आ पहुँची है
ठसाठस भरी नगर बस के
सहयात्रियों के चढ़ते-उतरते
रगड़ खाकर गुज़रते समय
झटके से झोंके के साथ आने वाली
बदन की मंद-मंद बदबू भी
यही बतलाती है
कि गरमी आ पहुँची है
कुछ देर तेज रौ चलने पर
कहीं टुक बैठकर आराम करने पर
गालों पर चोरी से ढुलक आने वाली
नन्हीं-सी पसीने की एक-दो बूँदें भी
मानो कह जाती हैं
कि गरमी आ पहुँची है
रसोई की नाली के इर्दगिर्द
एक अरसे बाद
अजनबी से चहल क़दमी करते
कुछेक चींटे और कॉकरोच
आगाह कर जाते हैं कि कि गरमी आ पहुँची है
कैलेंडर की तेजी से बीत गई ठण्डी तारीखों के अलावा
वसंत की उन्मादी पवन के उन्हीं बासी इशारों के सिवा भी
और भी कई बातें बतलाती हैं
कि गरमी आ पहुँची है
ज़रा ग़ौर तो कीजिए।

आत्मश्‍लाघा

गम्‍भीरता
गहराई तक जाने वाली नज़र
वह विचारों की प्रौढ़ता
बुद्धि का वह पैनापन
हर एक बात की बुनियादी समझ
दक्षता, दृढ़ निश्‍चय और दबंगपन
अलावा इसके
और भी बहुत कुछ हैं मुझमें…
- जब-जब उस ऊँची आकांक्षा को
न पा सकने की कसक
मन में उपजती है
तब-तब
देने लगती है संबल
वहीं आत्‍मश्‍लाघा

वह मरेगी नहीं

कितना छिपाने
दबाने और मारने की
कोशिश करोगे उसको
फिर भी
वह तुम्‍हारी देह के
हर सँकरे मोड़ पर
तुम्‍हारे भीतर
बसी ही रहेगी कमोबेश
चली जाएगी भले
थोड़ी देर के लिए
तुम्‍हारी खीझ मिटाने
तुम्‍हें खुश करने के लिए
पर भागेगी नहीं सदा के लिए
बद है वह, यानी बुरी है
तुम्‍हें नापसंद है
क्‍योंकि वह दिखावा नहीं
आडम्‍बर नहीं
इसलिए मारना चाहते हो उसे हर बार
हटाना चाहते हो अपने पास से
किसी खुशफहमी में रहने के लिए
पर सोच लो
वह मरेगी नहीं कभी भी
क्‍योंकि वह सच्‍चाई है
तुम्‍हारे तन की
जो मरेगी नहीं
तुम्‍हारे मरने के बाद भी
बल्कि प्रकट होगी
और भीषण रूप में
इसलिए खत्‍म करेंगे
लोग एक बार फिर तुम्‍हें
मरने के बाद भी
शायद उसके ही डर से
पर फिर भी तो रहेगी वह
उनके साथ
जो तुम्‍हें खत्‍म करके चले थे।

भास्कर चौधुरी की छ: कवितायें

27 अगस्त, 1969 को रामानुजगंज, सरगुजा (छत्‍तीसगढ़.) में जन्‍में भास्कर चौधुरी का काव्‍य संग्रह ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ प्रकाशित हो चुका है। कविताओं के अलावा समीक्षा, संस्मरण आदि विधाओं में उनकी रचनाएं विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी छ: कवितायें-

ज़ेहादी

कहो यदि तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
खिल जाएँगे असंख्य फूल
जी उठेंगे खेत-खलिहान
खत्म हो जाएगी भुखमरी
साफ हो जाएगी दुनिया से सारी गन्दगी
ग़ायब हो जाएगी हवा से बदबू

कहो यदि तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
मिल जाएँगे पश्चिम और पूरब
उत्तर और दक्षिण
रेगिस्तानों में बारिश होगी कई दिनों तक
भर जाएँगे लबालब
मीठे जल से -
सूखे पोखर नदी और तालाब

यदि कहो तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
सुन्दनर हो जाएगी धरती
नारंगी के बागानों सी
हरी-भरी
धान के लहलहाते फसलों सी

तो लो
मैं प्रस्तुत हूँ
मरने के लिए
असमय
शामिल होने के लिए
उन हज़ारों हज़ार लोगों की भीड़ में
शामिल जिनमें नवजात शिशु
और अजन्में भी
बच्चे, जवान स्त्रियाँ और बूढ़े
जिनके पास बची नहीं होती साँसें
यह जानने के लिए
कि क्यों मारे गये वे
कसूर क्या था उनका
क्या बिगाड़ा था उन सबने
तुम्हारा
किसी का…

कहो यदि तुम !

फूल

फिर
फिर
झर जाते हैं फूल
फिर
फिर
खिलने के लिए.

इस सदी में दुःख

यह कैसा दुःख है
जो
रात के करवट बदलते ही
ग़ायब हो जाता है.

प्रेम

अड़सठ के पिता
साठ की माँ

माँ आती है
कहती है-
अकेले हैं तुम्हारे पिता
और लौट जाती है
तय समय से पहले
पिता के पास

पिता आते हैं तो
चिन्ता  करते हैं माँ के लिए
और लौट जाते हैं
तय समए से पहले
माँ के पास….

निठल्ले

देखते-देखते
दिन गुजर गए
शाम ढल गई
देखते-देखते
बूढ़ा हो गया मैं
देखते-देखते
कितनी बड़ी हो गई वह
देखते-देखते….

दरअसल कुछ नहीं
बीतता देखते-देखते
बीतता है केवल उनके लिए
जो केवल देखते हैं -
निठल्ले !!

सुख

आसमान का सुख
बादलों से ढक जाने का

सुख प्रसव के बाद
नवजात को छूने का

पत्तों का सुख
पत्तों पर बारिश की बूदों के ठहरने का

सुख परिश्रम के बाद
गिलास भर ठंडा पानी पीने का

आम का सुख
पकने के बाद
ढेले की चोट से तोड़ जाने का

सुख
थोड़े में गुजारा करने का

सुख
सुख बांटने का !

पन्‍द्रह छोटी-छोटी कवितायें : जवाहर लाल गोयल

प्रसि‍द्ध लेखक-चित्रकार जवाहर गोयल की छोटी कवि‍तायें -

1-

घर में रहते हुये

दिन डूबने पर लगता

काश घर में होते

2-

कुछ पढा़ नहीं जाता पर

हाथ अपने से बढ़ता

लगता पढ रहे होते

3-

झरती गिरी थीं पत्तियाँ

धूल में बिखरती रहीं

यह अलग सच था

पेड़ हरा होता रहा

4-

तेज हवा में नबी घास

बिछ गयी जमीन पर

बारिश थमते ही तनी खडी

फिर झूम के लहरा रही

5-

केवल मेरा

यह गूंजन करता भौंरा

सारे दिन मौन कुतरता

6-

शाम में

आता याद

अंधेरे का इतिहास

7-

पत्तों पर गिरते पत्ते

धूल माटी डंठल

धरती की गहरी साँस

धीमे से उड़ती राख

8-

होता प्रतिदिन सबके साथ

पर कितना अकस्मात

कितना नूतन कितना विराट

कोई भी पहला अनुभव स्मृत

9-

पत्तों से पत्तों पर गिरती

बारिश की आवाज

रात में ढोल मजीरों का उल्लास

10-

सूखी कडी़ मिट्टी

खोदने पर

नीचे नर्म मिलती

11-

जंगल में घुस

बढ़ता दिन खुलता

सब कुछ पीछे कर

पेड़ों को ले आता निकट

12-

पाने का मन याने लालच

होने का मन याने सत्ता

नाद याने उन्मुक्त गूँजती रिक्तता

13-

यह मैं हूँ।

कहाँ?

यहाँ कुछ भी नही!

केवल तुम्हें पाता मैं।

14-

अनुभव नहीं

ज्ञान नही

केवल क्षितिज सी मुस्कान

घंटी के स्वर

कम्पन्न

थमता मन

थिरता समय

15-

शब्द जमा हों और बहें

ढलान पर धारा में पारदर्शी

निथरते सूखते दाग छोड़ते

सोखे जाते विलीन होते

वत्सल धरा बनते

 

संतोष अलेक्स की कवितायें

युवा मलयालम कवि संतोष अलेक्स का जन्म 1971  में केरल के तिरूवल्ला में हुआ। उनकी कविताओं का हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु एवं ओडिया भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इन कविताओं का अनुवाद स्‍वयं कवि द्वारा किया गया है-

सीमा

चावल की खेती करने
जगह ढूंढते-ढूंढते
सीमा पर पहुँचा
इस पार व उस पार
एक ही सूर्य-चाँद
बारिश
हवा
तूफान
बाडा जानता है नफरत के बीज बोनेवाले को
शतरंज के मोहरे-सा
घोडा़, हाथी, रथ
सिपाही आगे बढ़ने लगे
राजा की मृत्यु नहीं होती
हारे या जीते
वह राजा ही है
बस,
सीमा पर अंतिम मौत
मेरी हो!

दूरी

हाथ दुखने पर
मैंने
आँख व आँसू के बीच की दूरी को नापा
फिर
पर व फड़फड़ाहट
पृथ्वी व मरूद्वीप
धुँआ व आग
वस्तु व परछाई
लहर व समुंदर के बीच की दूरी
को नापा
लेकिन
हाथ व दर्द की दूरी को
नाप न सका!

सीधा

पहाडी पर स्थित
पेड़ की टहनी पर खडे़ होकर
उसने सम्‍बोधित किया
सच बतलाने के लिए प्रेरित करनेवाले
रावुण्णी मास्टर
कठिनाइयों से जूझने का साहस दिलानेवाली
बहन
मिलकर बांटने को उत्साहित
भाई
दया भरी माँ
इस दुनिया में मुझे
सीधे खड़ा रहना है

गले में डाले फंदे के संग
नीचे की ओर कूदकर
वह सीधा ही खड़ा रहा !

सुबह

सुबह ने आकर मुझे चुम्बित किया तो
मैं उठकर बरामदे में पहुंचा
आराम कुर्सी में बैठ कर
बीती रात को रचे षड्यंत्रों को याद करने  की काशिश की
इस बीच गाय ने रंभाया
और सारे षड्यंत्र उसमें विलीन हो गए
जिसे पुन: याद नहीं कर सका

प्रेम गीत

हमारे
प्यार से
सहपाठी ईर्ष्‍या करते थे

आम प्रेमियों की तरह
हमने
कुछ नहीं किया

इसलिए
आज भी हम
प्यार करते हैं
उसका अपना परिवार है
मेरा अपना

भला

यीशु और सुकरात
भले लोग थे

फिर भी
मारे गए

मुझे भला नहीं
बनना

गर्मियां

गर्मियों का मतलब
शहर से गांव लौटना होता है

वहां जाने-अनजाने संबंधियों के संग
खेतों में अहातों में खेलता फिरा
तालाब में डुबकियां लगाईं
जामुन और इमलियों के पेडों पर चढ़ा
इस तरह बीत गए कितने ही दिन
पर रिश्तों की कीमत जानी जब
शहर लौटने का समय हो चुका था

 

 

नित्यानंद गायेन की तीन कवितायें

20 अगस्त 1981 को शिखरबाली, पश्‍चिम बंगाल में जन्‍में नित्यानंद गायेन की कवितायें और लेख सर्वनाम, अक्षरपर्व,  कृति ओर, समयांतर, समकालीन तीसरी दुनिया, जनसत्ता, हिंदी मिलाप  आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। उनका काव्‍य संग्रह ‘आपने हिस्से का प्रेम’ भी प्रकाशित हो चुका है। फिलहाल हैदराबाद के एक निजी संस्थान में अध्यापन व स्वतंत्र लेखन। उनकी तीन कवितायें-

आज़ाद कब हुआ मैं ?

15 अगस्त
सन् 1947 से
अबतक
आज़ाद कहाँ हो पाया मैं
अभी तक घिरा हुआ हूँ
भूख-शोषण
और धर्म की गुलामी में
किन्तु सुना है मैंने
कई बार-
हम आज़ाद हो चुके हैं
उन्हें कहते हुए
कुछ तो सच्चाई होगी
उनकी बातों में
वे शायद सच में आज़ाद हैं
तभी तो लूट रहे हैं
जी भर कर
उन्हें लूटने की आज़ादी है
मेरी आज़ादी के नाम पर
मिली है मुझे
गरीबी, शोषण, अशिक्षा
और कुछ आरक्षण का वादा
एक सरकारी कागज़ पर
उन्हें मालूम था
मुझे पढना नही आता .

वह खोद रहा है जमीन

पिछले कई वर्षों से
या कहिये सदियों से
वह खोद रहा है ज़मीन
इस उम्मीद से कि-
एक दिन निकलेगा पानी
और वह बोयेगा धान अपने छोटे से खेत में
और बचा लेगा
अपने परिवार को
भूख से
अचानक एकदिन
चीख उठी धरती-
मुझे माफ़ कर देना मेरे पुत्र
अब कुछ नहीं बचा मेरे गर्भ में
मैं लूट चुकी हूँ
सब कुछ बिक चुका है मेरा
अब मैं खुद प्यासी हूँ

मेरा बजूद

मैं नही चाहता
मरने के बाद
अपनी चर्चा तुम्हारी
किसी महफिल में
जीते जी थोड़ा मिल जाये
वही बहुत है
आधी उम्र तो
बीत चुकी  है
जीने की  लड़ाई में
बस मान लो इतना
कि मैं भी इन्सान हूँ
यही बहुत है
यही मेरा वज़ूद है

कविता को मिले नए स्वर

नई दिल्ली : कवि और कविता से कविताप्रेमी हिंदी समाज का सीधा संपर्क-संवाद बढ़े इस उद्देश्य से इंडिया हैबिटैट सेंटर में 15 जुलाई, 2011 की शाम को ‘कवि के साथ’ का आयोजन किया गया। इसमें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने अपने नए कविता संग्रह ‘हाशिये के बाहर’ से कुछ कविताएं सुनाईं। युवा कवि अरुण देव ने ‘रक्‍त बीज’, ‘सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं’, ‘लालटेन’, ‘लय का भीगा कंठ’, ‘छल’, ‘शास्त्रार्थ’ आदि तथा अनुज लुगुन ने ‘ग्लोब’, ‘महुवाई गंध’, ‘अनायास’ आदि कविताएं सुनाईं। कार्यक्रम के आरंभ में ‘आज का समय और हिंदी कविता’ विषय पर आलोचक आशुतोष कुमार ने संक्षिप्त टिप्पणी की। उन्होंने कविता के तेवर में आ रहे बदलाव को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का एक सत्र कवियों के साथ सीधे संवाद का था, लेकिन श्रोताओं के अनुरोध पर इसमें भी काव्य पाठ किया गया।
कार्यक्रम की परिकल्पना करने वाले सत्यानंद निरुपम ने बताया कि इंडिया हैबिटेट सेंटर की योजना ‘कवि के साथ’ को हर दो माह में आयोजित करने की है। इसमें पुराने, युवा और नए कवि एक मंच पर काव्य  पाठ करेंगे। कविताओं के पाठ के साथ उन पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि इस बार कवियों से सीधे संवाद के सत्र को श्रोताओं के अनुरोध पर स्थगित कर दिया गया था, लेकिन आने वाले कार्यक्रमों में इस अनिवार्य किया जाएगा।

अरुण देव की कुछ कविताएं-

रक्त बीज

जैसे कोई अभिशप्त मंत्र जुड़ गया हो मेरे नाभिनाल से
हर पल अभिषेक करता हुआ मेरी आत्मा का
मेरी हर कोशिका से प्रतिध्वनित है उसका ही नाद
उसकी थरथराहट की लपट से जल रहीं हैं मेरी आँखें

इस धरा के सारे फल मेरे लिए
काट लूँ धरती की सारी लकड़ी
निकाल लूँ एक ही बार में सारा कोयला
और भर दूँ धुएं से दसों दिशाओं को

मेरी थाली भरी है
कहीं टहनी पर लटके किसी घोसलें के अजन्मे शिशु के स्वाद से
अब चुभता नहीं किसी लुप्तप्राय मछली का कोई कांटा
मेरे समय को

मेरी इच्छा के जहरीले नागों की फुत्कार से
नीला पड़ गया है आकाश
जहां दम तोड़ कर गिरती है
पक्षिओं की कोई-न-कोई प्रजाति रोज

गुनगुनाता हूँ मोहक क्रूरता के छंद
झूमता हूँ निर्मम सौंदर्य के सामूहिक नृत्य में
भर दी है मैंने सभ्यता की वह नदी शोर और चमक से
जो कभी नदी की ही तरह निर्मल थी
अब तो वहाँ भाषा का फूला हुआ शव है
किसी संस्कृति के बासी फूल

नमालूम आवाज में रो रहा है कोई वाद्ययंत्र

मेरे रक्त बीज हर जगह एक जैसे
एक ही तरह बोलते हुए
खाते और गाते और एक ही तरह सोचते हुए
देखो उनकी आँखों में देखो मेरा अमरत्व।

 

सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अयोध्या के पास फैज़ से आबाद इस नगर की एक गली में
तब रहती थीं कुछ खुदमुख्तार औरतें
अदब और तहजीब की किसी पुरानी दरी पर बैठीं
स्त्री-पुरूष के आकर्षण के फीके उत्सव में मटमैली होती हुईं
रोज-ब-रोज

उस गली पर और उन जैसी तमाम गलिओं पर
जो हर नगर में सितारों की तरह सजती थीं
और चमकती थीं ख्वाबों में कभी
बीसवीं शताब्दी का कुहासा कुछ इस तरह उतरा
कि टूट कर बिखर गये उमराव जान के घुंघरू
बुझ चले कजरी, ठुमरी दादरा के रौशन चराग
जहां से अब रह-रह आती
बेगम अख्तर की उदास कर देने वाली आवाज़

यह वह समय था जब
दिग्विजय के लिए निकले रथ के उड़ते धूल से
ढक गए थे राम
दसो दिशाओं से रह-रह उठता विषम हूहू
और बाज़ार के लिए सब कुछ हो गया था कारोबार

बाज़ार के रास्ते में आ रही थी यह गली

दोपहर की चिलचिलाती धूप में
उस दिन कुछ लोग आ खड़े हुए
सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाई
हिल रही थीं सारी पुरानी इमारतें

बेनूर खिड़किओं पर लटके उदास परदों के पीछे
सिर जोड़े खड़ी थीं स्त्रियां
अवांछित, अपमानित और असहाय

ये स्त्रियां अपनी- अपनी मिथिला में
कभी देखती थीं अपने राम के सपने
किसी विद्यापति ने इनके लिए भी लिखी थीं पदावलियां
जिसे जब-तब ये आज भी गुनगुनाने बैठ जाती हैं

उन्हें खदेड़ने के लिए देखते-देखते निकल आए बनैले सींग
छुपे दांत और पुराने नाख़ून

उन पर गिरने लगे अपशब्द के पत्थर
हालांकि उनका होना ही अब एक गाली थी
गुम चोट के तो कितने निशान थे वहां

जयघोष में कौन सुनता यह आर्तनाद
शोर में यह चीख

यह अलग तरह की क्रूरता थी
देह से तो वे कब की बेदखल थीं
उन्हें तो दिशाएं तक न पहचानतीं थीं

रात के परिश्रम से श्रीहीन श्लथ देह की झुकी आत्माएं
रह-रह देखती अयोध्या की ओर

वे तमतमाए चहरे
रात की पीली रौशनी में कितनी चाह से देखते थे उन्हें

इन्ही स्त्रिओं ने न जाने कितनी बार
मुक्त किया था उन्हें उनकी ही अंधी वासना से

अब यह स्त्री-पुरूष का आदिम खेल न रहा
कि स्त्री अपने आकर्षण से संतुलित कर ले पुरूष की शक्ति

बगल में बह रहे सरयू ने देखी
सदिओं बाद फिर एक वनवास

इनके जनक थे
बदकिस्मती से रावण भी थे सबके

पर इनके लिए कोई युद्ध नहीं लड़ा गया
राज-नीति के बाहर अगर कही होते राम तो क्या करते।

लालटेन

अभी भी वह बची है
इसी धरती पर

अँधेरे के पास विनम्र बैठी
बतिया रही हो धीरे-धीरे

सयंम की आग में जैसे कोई युवा भिक्षुणी

कांच के पीछे उसकी लौ मुस्काती
बाहर हँसता रहता उसका प्रकाश
जरूरत भर की नैतिकता से बंधा

ओस की बूंदों में जैसे चमक रहा हो
नक्षत्रों से झरता आलोक

अक्सर अँधेरे को अँधेरे के बाहर कहा गया
अँधेरे का सम्मान कोई लालटेन से सीखे
अगर मंद न कर दिया जाए उसे थोड़ी देर में
वह ढक लेती खुद को अपनी ही राख से

सिर्फ चाहने भर से वह रौशन न होती
थोड़ी तैयारी है उसकी
शाम से ही संवरती
भौंए तराशी जातीं
धुल-पुछ कर साफ होना होता है
कि तन में मन भी चमके

और जब तक दोनों में एका न हो
उजाला हँसता नहीं
कुछ घुटता है और चिनक जाता है कहीं
भभक कर बुझ जाती है लौ

वह अलंकार नहीं थी कभी भी
न अहंकार, न ऐठ, न अति
कि चुकानी पड़े कीमत और फिर जाए मति।
उसे तो रहना ही है।

 

लय का भीगा कंठ

कह रहा था मैं कुछ
ठीक उसी तरह जैसे बांसुरी के इक छोर पर कहती है हवा
और जो देर तक गूंजता रहता है
मन की बावड़ी में
जिसकी सीढ़ी पर बैठे-बैठे
भीग जाती हैं आँखें

यह किसका रुदन है
कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप

न जाने क्या कहा हवा ने
और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने
जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख

जो इस धरती का है
किसी दरवेश, फकीर, संत का है
कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर
विलाप करते उस क्रौंच का है
जो रो रहा है तबसे
जब अर्थ तक पहुचने के लिए
शब्दों के पुल तक न थे
और तभी से भीगा है
लय का कंठ

और जिसे कहने की कोशिश  में रूँध जाता है मेरा गला।

 

छल

अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं

अगर मैंने कहा होता
तुम मुझे अच्छी लगती हो
तो शायद वह समझती कि उसे अच्छी बनी रहने के लिए
बने रहना होगा मेरे अनुकूल
और यह तो अच्छी होने की अच्छी-खासी सज़ा है

मित्र अगर कहूँ
तो वह घनिष्ठता कहाँ
जो एक स्त्री-पुरूष के शुरूआती आकर्षण में होती है
दायित्वविहीन इस संज्ञा से जब चाहूँ जा सकता हूँ बाहर
और यह हिंसा अंततः किसी स्त्री पर ही गिरेगी

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है…
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वह कहेगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता…

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

 

शास्त्रार्थ

लाओत्सु के दरवाजे पर
कृतज्ञता से भरे हुए कन्फूशियस की पदचापें थीं
लाओत्सु को यह सुगंध दूर से ही मिलने लगी थी
कहा जाता है लाओत्सु अस्सी वर्ष का गूढ़ अनुभव
और सम्मोहक करुणा लेकर पैदा हुए थे
तो कन्फूशियस ने सीधे चलते हुए
पा ली थी सहजता
यह ईसा के 600 वर्ष पूर्व की पृथ्वी थी
जब किसी दार्शनिक से मिलने
उतना ही महान दार्शनिक चला आता था

शाम घिर आयी थी
दोनों बैठे रहे एक-दूसरे के सम्मुख
बाहर हरी दूब पर हंस रहा था चन्द्रमा
अंदर दिये की लौ में निर्वाण की शीतलता थी

इस शास्त्रार्थ में शब्दों के जाल नहीं थे
जिसमे अक्सर फँस जाता था सत्य
न विजय की इच्छा थी
न पराजय का डर
सत्य की समझ का कोई अकेला भाष्य भी
किसी के पास नहीं था
एक विनम्र मौन से भर गया था वह कक्ष
जहाँ वे बैठे रहे
ऐसे ही देर रात तक नि:शब्द

सत्य झर रहा था
पतझर में जैसे पीले पत्ते बेआवाज।

 

अनुज लुगुन की कुछ कविताएं-

ग्लोब

मेरे हाथ में कलम थी
और सामने विश्व का मानचित्र
मैं उसमें महान दार्शनिकों
और लेखकों की पंक्तियाँ ढूँढ़ने लगा
जिसे मैं गा सकूँ
लेकिन मुझे दिखायी दी
क्रूर शासकों द्वारा खींची गई लकीरें
उस पार के इंसानी ख़ून से
इस पार की लकीर, और
इस पार के इंसानी  ख़ून से
उस पार की लकीर।

मानचित्र की तमाम टेढ़ी-मेंढ़ी
रेखाओं को मिलाकर भी
मैं ढूंढ नही पाया
एक आदमी का चेहरा उभरने वाली रेखा
मेरी गर्दन ग्लोब की तरह ही झुक गई
और मैं रोने लगा।

तमाम सुनी-सुनाई, बताई
तर्कों को दरकिनार करते हुए
आज मैंने जाना
ग्लोब झुकी हुई क्यों है।

 

महुवाई गंध

(कामगरों एंव मजदूरों की ओर से उनकी पत्नियों के नाम भेजा गया प्रेम-संदेश )

ओ मेरी सुरमई पत्नी!
तुम्हारे बालों से झरते है महुए।

तुम्हारे बालों की महुवाई गंध
मुझे ले आती है
अपने गाँव में, और
शहर के धुल-गर्दों के बीच
मेरे बदन से पसीने का टपटपाना
तुम्हे ले जाता है
महुए के छांव में
ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारी सखियॉं तुमसे झगड़ती हैं कि
महुवाई गंध महुए में है।

मुझे तुम्हारे बालों में
आती है महुवाई गंध
और तुम्हें
मेरे पसीनों में
ओ मेरी महुवाई पत्नी !
सखियों का बुरा न मानना
वे सब जानती हैं कि
महुवाई गंध हमारे प्रेम में है।

 

अनायास

अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
शिलापट पर अंकित शब्दों-सा
हृदय में टंकित
संगीत के मधुर सुरों-सा
अनायास ही गुनगुना देता हूँ
तुम्हारा नाम ।

अनायास ही मेघों-सी
उमड़ आती हँ स्मृतियाँ
टपकने लगती हैं बून्दें
ठहरा हुआ मैं
अनायास ही नदी बन जाता हूँ
और तटों पर झुकी
कँटीली डालियों को भी चूम लेता हूँ
रास्ते के चट्टानों से मुस्कुरा लेता हूँ।

शब्दों के हेर -फेर से
कुछ भी लिखा जा सकता है
कोई भी कुछ भी बना सकता है
मगर तुम्हारे दो शब्दों से
निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
अंकुरित हो उठते हैं सूखे बीज
और अनायास ही स्मरण हो आता है
लोकगीत के प्रेमियों का किस्सा ।
अनायास ही स्मरण हो उठता है
लोकगीत के प्रेमियों का किस्सा
किसी राजा के दरबार का कारीगर
जिसका हुनर ताज तो बना सकता है
लेकिन फफोले पड़े उसके हाथ
अंधेरे में ही पत्नी की लटों को तराशते हैं
अनायास ही स्मरण हो आता है
उस कारीगर का चेहरा
जिस पर लिखी होती हैं सैकड़ों कविताएँ
जिसके शब्द, भाव और अर्थ
आँखों में छुपे होते हैं
जिसके लिए उसकी पत्नी आँचल पसार देती है
कीमती हैं उसके लिए
उसके आँसू
उसके हाथों बनाए ताज से
मोतियों की तरह
अनायास ही उन्हे
वह चुन लेती है।

अनायास ही स्मरण हो उठते हैं
सैकड़ों हुनरमन्द हाथ
जिनकी हथेलियों पर कुछ नहीं लिखा होता है
प्रियतमा के नाम के सिवाय।
अनायास ही उमड़ आते हो तुम
तुम्हारा नाम
जिससे निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
जिससे सुलगती है चूल्हे की आग
तवे पर इठलाती है रोटी
जिससे अनायास ही बदल जाते हैं मौसम ।

अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
अनायास ही गुनगुना देता हूँ
संगीत के सुरों-सा
सब कुछ अनायास
जैसे अपनी धुरी पर नाचती है पृथ्वी
और उससे होते
रात और दिन
दिन और रात
अनायास
सब कुछ….

गरीबों और अपवंचितों का स्‍वर : शेफालिका

नागार्जुन, धूमिल जैसे जनकवियों की परम्‍परा के कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के पहले कविता संग्रह ‘नयी खेती’ पर शोध छात्रा और युवा लेखिका शेफालिका की समीक्षा-

रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ नए अंदाज नए तेवर के कवि हैं । ‘नयी खेती’ इनका पहला काव्य संग्रह है। यह बात बहुत अद्भुत है कि आज के समय में जहाँ कुछ ऐसे भी लिखनेवाले हैं, जिन्हें लिखने कि बेचैनी से पहले छप जाने की टीस सताती रहती है, नाक में दम किये रहतीं, वहीं विद्रोही छपने-छपवाने और लिखने-लिखवाने की कुश्ती से बेफिक्र हैं। विद्रोही ने कविता का बस पाठ किया, जगह-जगह- ढाबा, कैंटीन, जन-आन्दोलन, सड़कों पर कवितायें बस कहते रहे। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) के विद्यार्थियों ने बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें छपने-छपवाने और कविताओं को जमा करने के लिए तैयार किया। दरअसल विद्रोही पर बात करना न केवल उनकी कविता पर बात करना है,  बल्कि उन कविताओं पर बात करना है जो कविता के मायने को सार्थक बनाती हैं। न छपकर भी जिस तरीके से जेएनयू में तीन दशकों तक हरेक पीढ़ी के दिमाग में कुछ पंक्तियों को टंकित कर दिया है, वे किसी भी ‘इरेजर’ या ‘बैकस्पेस से मिटनेवाली नहीं हैं। न छपकर भी बी.बी.सी. से लेकर स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री और विदेशों में भी सुने जाने वाला यह इंसान विरोध दर्ज करने की मिसाल है।

इस पुस्तक में कविताओं के साथ बिरहा गीत, गजलें और नज्म भी हैं। बिरहा गीत अवधी में हैं। इसके अलावा सभी हिंदी में हैं।

इस पुस्तक की पहली कविता ‘जन-गण-मन’  में कवि भारतीय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। कवि इस कविता में मौत की बात करता है और वह मौत इस चरमराई हुई व्यवस्था, झूठे वादों-दावों की है- ‘मैं भी मरूँगा/और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा/मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा’। कवि अपनी मृत्यु की बात भी करता है, मगर वह पतझर में नहीं बसंत में मरना चाहता है। जब हर तरफ हरियाली हो, सबका पेट भरा हो, भूख से किसी की मौत न हो रही हो- ‘फिर मैं मरूं- आराम से, उधर चलकर बसंत ऋतु में/जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है।’ बसंत ऋतु की यह चाह उनकी सकारात्मकता को सामने लाता है।

इस संग्रह की बड़ी ख़ासियत इसकी गेयता है। आम इस्तेमाल, बोलचाल के शब्द हैं। अधिकांश कवितायेँ राजनीतिक हैं। एक कविता है ‘नूर मियां!’ कविता में दादी की आँखों का, नूर मियां के सुरमे का तो बखान है ही, साथ ही साथ भारत-पाकिस्तान के विभाजन के ऊपर भी संकेत है- ‘क्यों चले गए पाकिस्तान, नूर मियां?/कहते हैं कि नूर मियां के कोई था नहीं/तब क्या हम कोई नहीं होते थे नूर मियां के?/नूर मियां क्यों चले गए पाकिस्तान?/बिना हमको बताये ?।’ ‘नूर मियां!’ और ‘नानी’ दम भर में पढ़ी जाने वाली कवितायें हैं। लगता है, कवि अपने बचपन की कहानी सुना रहा है । इसी कहानी के माध्यम से वह राजनीतिक सवाल सामने रखता है।

‘धोबन का पता’,  ‘कन्हई कहार’, ‘भुखाली हलवाहशीर्षक कवितायें साधारण और आम-सी लग सकती हैं, लेकिन ‘धोबन का पता’  की जड़ें राजा रघु और उनकी प्रजाओं तक है, वहीं ‘भुखाली हलवाह’ वर्तमान व्यवस्था में फंसा हुआ है। जहाँ पूंजीवादी व्यवस्था उसे सबकुछ से महरूम रखती है और अर्द्धसामंती व्यवस्था उसे जी हुजूरी से मुक्त नहीं होने देती। कविता की चंद पक्तियां- ‘बिना सुरती के सबेरे कुछ होता ही नहीं/नहीं होता सुरती खाने के बाद भी/क्योंकि सबेरे कुछ होने के लिए/सोने के पहले भी कुछ होना चाहिए।’

संग्रह की कविताओं में वर्तमान व्यवस्था के प्रति विद्रोह, पुरानी बातों की चीर-फाड़, अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ गुस्सा, पूंजीवादी और सामंती ताकतों के खिलाफ आवाज है। लंबी कविताओं में एक अन्य कविता है- ‘कथा देश की…’। तमाम तरह के दंगों से लेकर हिंसा के व्यापारियों की बात की गयी है। दंगों के सरताज अमरीका की दादागिरी विश्वभर में फैली हुई है। भारतीय लोकतंत्र के आका भी उसके इशारे पर देश को झोंकने को तैयार बैठे हैं। राजनेता की सलाह होती है कि हम तो बुत बने ही हैं तुम भी कठपुतली हो जाओ ताकि खेल और आसान हो जाए। हमारे देश के लम्‍पट राजनीतिक/जनता को झांसा दे रहे हैं कि/बगावत मत करो/हिंदुस्तान सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने वाला है/जनता कहती है/ भाड़ में जाये सुरक्षा परिषद! हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे। यह कविता कई परतों के साथ पूरी होती है।

विद्रोही की लंबी कविता पढ़ते हुए मैंने पाया कि ये कविताएं समग्रता में तो कई बातों को, सवालों को सामने लाती ही हैं, साथ ही इन कविताओं को अलग-अलग भागों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने पर भी पूरी कविता ही लगती हैं। ‘नई खेती’ का कवि नई दुनिया रचने की बात करता है। नयापन लिए हुए यह कवि कई स्तरों पर नवीनता लिए है। ‘नई दुनिया’ कविता में कवि कहता है- ‘एक दुनिया हमको गढ़ लेने दो/जहां आदमी-आदमी की तरह/रह सके, कह सके, सुन सके, सह सके।’ क्रांति के लिए आगे बढ़ने को कवि प्रेरित करता है। कई छोटी कविताओं में कबीर के तेवर मिलते हैं। कबीर ने जैसे दो टूक बात कही थी वैसा ही भाव यहां भी है- तुम्हारे मान लेने से/पत्थर भगवान हो जाता है/लेकिन तुम्हारे मान लेने से/पत्थर पैसा नहीं हो जाता।’ कवि नये समाज की बात करता है- ‘उनका मानना है कि बगैर हाथ-पैर हिलाए-डुलाए न तो सामाजिक बदलाव संभव है ना ही क्रांति। व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि उसको बदलना जोखिम जैसा है। राहें पथरीली उबड़-खाबड़ और टेढ़ी है। अब तो टेढ़ी राहे हैं कि टांगे टूट जाएंगी,/ये मां की पोसी टागें हैं भला कब काम आएगीं।’ इंकलाब का आकांक्षी कवि विद्रोही वामपंथी राजनीति में अपनी आस्था रखता है। इंकलाब के लिए खून का होना जरूरी है। खून होने भर से भी बात बनने वाली नहीं है। अनहोनी, भ्रष्टाचार, साम्राज्यवादी ताकतों, फिरकापरस्त नीतियों, जन विरोधी नीतियों के खिलाफ खून खौलना भी जरूरी है- ‘खून मर जाए तो इंकलाब ही न हो/इंकलाब न हो तो खून मर जाएगा।’ ‘अंधकार में’ कविता के माध्यम से कवि पंचायत बिठाना चाहता है। जिन बातों पर पंचायत बैठनी है वे हैं- गरीबों के तन पर वस्त्र और पेट में अनाज क्यों नहीं है, गरीबों की लाशों को गिद्ध नालियों में क्यों फेंक रहा है? दरोगा की बीबी का हार खोने पर बेवाओं के गहने को क्यों बटोरा जा रहा है? काजल, टिकुली, सिंदूर लगाना प्रश्नवाचक क्यों बन गया गरीबों के लिए?

विद्रोही के इस संग्रह में जहां रूढि़यों का सीधा-सीधा नकार है, क्रांति का आह्वान है, नये समाज की संकल्पना है, वहीं कवि चीजों को लेकर साफ और सुलझी समझ रखता है। तर्क देता है, जोश से भरता है, नई पौधों को, कुछ न करने की स्थिति में दुत्कारता है, मानदण्डों को पलटना चाहता है। वह ‘जन प्रतिरोध’ कविता में कहता है- ‘बड़ा भयंकर बदला चुकाती है ये जनता’।

‘औरतें’ इस संग्रह की जबरदस्त कविता है । कुएं में कूदकर जान देनेवाली और चिता में जलकर जान देनेवाले बयान के लिये वह पुलिस और पुरोहित दोनों को जिम्मेवार मानती हैं। कुएं में कूदकर जान देनेवाली और चिता में जलकर मरने के बयान के पीछे कवि पुलिस और पुरोहित दोनों को जिम्मेदार मानता है। औरतों की दशा के लिए जिम्मेदार मर्द ही होते हैं- ‘औरतें रोती जाती हैं/मरद मारते जाते हैं/औरतें और जोर से रोती हैं/मरद और जोर से मारते हैं/औरतें खूब जोर से रोती हैं/मरद इतने जोर से मारते हैं कि/वे मर जाती हैं।’ औरतों को मारने-पीटने, यातना देने का पुराना इतिहास रहा है। औरतों की मौत का शिनाख्त करते हुए विद्रोही मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी से वहां तक जाता है, जहां तक औरतों की जली लाश और इंसानों की हडि्डयां बिखरी पड़ी हैं। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए वह बयान देते हैं कि- ‘इतिहास में वह पहली औरत कौन थी/जिसे सबसे पहले जलाया गया/मैं नहीं जानता/लेकिन जो भी रही होगी/ मेरी माँ रही होगी।’

हिन्दी कविता के साथ-साथ भोजपुरी और अवधी के लोकगीत में भी हक़ हुकूक मांगते हैं- ‘जनी जनिहा मनइया जगीर मांगात/ई कलिजुगहा मजूर पूरी शीर मांगात/बीड़ी-पान मांगात/सिगरेट मांगात/कॉफी-चाय मांगात/ कप-प्लेट मांगात/नमकीन मांगात/आमलेट मांगात/कि पसिनवा के बाबू आपन रेट मांगात।’ पसीने का रेट मांगता यह कवि नई खेती कर नई फसल उगाने का ठान चुका है और कहता है- ‘अगर जमीन पर भगवान जम सकता है/तो आसमान में धान भी जम सकता है/और अब तो/दोनों में एक होकर रहेगा/या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा/ या आसमान में धान जमेगा।’

कविता संग्रह में एक बेचैनी है कुछ कर गुजरने की,  कुछ नया न होने की। व्यवस्था के प्रति कड़वाहट है, खीझ है और धिक्कार है। कवि की पूरी लड़ई हक और हुकूक की लड़ाई है, मनुष्य के मनुष्य होने की लड़ाई है। मनुष्य को उसके हक दिलाने की कोशिश है। विद्रोही कहते हैं कि ‘लोग हक छोड़ दें पर मैं क्यूं हक छोड़ दूं।’

गजल और नज्म संग्रह का अंतिम पड़ाव है। इनमें भी कवि का वही स्वर है जो कविताओं और गीतो में है। यहां भी वही तड़प,  बेचैनी,  कुछ कर गुजरने की तमन्ना,  कुछ ठोस न कर पाने की छटपटाहट है। ‘तोड़ पाऊंगा किसी दिन क्या मैं जंजीरें गुलामी/रोक पाऊंगा किसी दिन क्या मैं जंजीरें गुलामी।’

पिछले कई वर्षों या एक दशक की कविता को उठाकर यदि निष्पक्ष भाव से उसका मूल्यांकन किया जाए और अकेले विद्रोही की कविता को सामने रखा जाए तो पाठकों में बेचैनी, पछतावा, इच्छा और सामने कई सारे सवाल होंगे। बेचैनी कि  इनकी और कविता कहां है,  चलो उसको ढूँढ़ निकाले,  पछतावा कि कहां था यह कवि जिसे हम ढूँढ़ नहीं पा रहे थे, जिसका पाठ नहीं कर पा रहे थे पहले,  और सवाल और इच्छा यह जानने की क्या नागार्जुन, धूमिल, मुक्तिबोध जैसी जन की कविताएं अभी लिखी जाती हैं ?

विद्रोही का रचना संसार इतना व्यापक है कि ‘सुरती’  से लेकर ‘व्हाइट हाऊस’ तक की बात करता है। वहां मोहनजोदड़ो,  बेवीलोनिया, मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता भी है।

कवि विद्रोही की यह पुस्तक ऐसे समय में हमारे बीच आई है जब सारी हदें पार हो रही हैं। घोटालेबाजों और घूसखोरों की जमात खड़ी है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं, मारी जा रही हैं, मुश्किल से किसी संस्थान पहुंचे पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राएं भी आत्महत्याएं कर रहे हैं। यह संग्रह सिलसिलेवाद, भ्रष्टाचार पर तो तमाचा है ही साथ ही साथ पूरी पीढ़ी के सामने प्रश्न छोड़ता हैं कि कब तक यह सब यूं ही चलता रहेगा ?

पुस्‍तक - नयी खेती( कविता संग्रह), कवि – रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’
मूल्‍य : पेपर बैक- 60 रुपये, सजिल्‍द- 100 रुपये, पृष्‍ठ- 150
प्रकाशक: सांस्‍कृतिक संकुल, जन संस्‍कृति मंच
टी-10, पंचपुष्‍प अपार्टमेन्‍ट, अशोक नगर, इलाहाबाद- 211001, उत्‍तर प्रदेश
नोट – पुस्‍तक मंगाने के लिए के.के. पाण्‍डेय से 09415366520 पर संपर्क किया जा सकता है।

विद्रोही जी से संबंधित दो लिंक-

विद्रोही की कविताएं

हमारे विद्रोही जी : प्रणय कृष्ण