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संजीव ठाकुर की कवि‍ताएं        

संजीव ठाकुर

पीढ़ियाँ

हम पीते थे चाय एक साथ
फुटपाथ पर बैठते थे
अपने गम बिछाकर
बतियाते थे दुनिया की, जहान की
गलियाते थे
साहित्यिक चूतियापे को
मठों को, मठाधीशों को
पत्रिकाओं के संपादकों को
प्रकाशकों के कारनामों को
आलोचकों की क्षुद्रताओं को
पिछले दरवाजे से पुरस्कार झटकता कोई शख़्स
हमें नागवार गुजरता था
पुस्तक विमोचन समारोहों को हम
कहा करते थे
भांड -मिरसियों का काम !

समय बदलता गया धीरे–धीरे
हममें से कुछ लोग
आलोचक बन गए
झटक लिया किसी ने कोई पुरस्कार
सुशोभित कर रहा कोई
किसी पत्रिका के संपादक का पद
अकादमी की गतिविधियाँ
किसी की जेब में हैं !
डोलते हैं दस–बीस प्रकाशक
कंधे पर रखे झोले की तरह
विमोचन समारोहों में
झलक जाता है
किसी का विहंसता चेहरा ।

गलिया रहे हैं चार लोग
सफदर हाशमी मार्ग के फुटपाथ पर
चाय पीते हुए–
संपादकों को,
प्रकाशकों को,
आलोचकों को,
मठाधीशों को…!

लगाम दो

अब भी लगाम दो
चाह को
इतना भी चाहता है कोई
मृग मारीचिका को ?

हल

हल हो सकता है सवाल
सुख के एक टुकड़े का
तुम
मेरे बारे में सोचना
शुरू तो करो !

वस्तुस्थिति

कुछ भी तो नहीं है
अपने लिए
आँसू के सिवा

किसे बताऊँ ?

किसे बताऊँ
उसने
मेरे हृदय पर मूत दिया है ?
कचरे की टोकरी
रख दी है
नाक पर !मेरी कमजोरी तुम जानते हो
कृपा कर किसी को नहीं बताना –
मैं अव्वल दर्जे का पाजी हूँ
मेरे पास वह सब नहीं
जो जरूरी है जीने के लिए
आज की परिभाषा में !

कक्षा पहली के बच्चे : भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

एक

आपने सुना कभी
किसी हिटलर को कहते
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ

कक्षा पहली के बच्चे
ऐसा हर रोज़ कहते हैं-
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ।

दो

कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
हथेलियों के बीच
बच्चे के गाल
महसूस कर रहे हैं
उंगलियों का दबाव
और ठोढ़ी टिकी हुई है
हथेलियों की जड़ों पर
कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
जैसे थामा हो पृथ्वी
हथेलियों के बीच !

तीन

कक्षा पहली के बच्चे
नहीं जानते सौदा
किस चिड़िया का नाम होता है
वे नहीं समझते गिव एंड टेक का अर्थ
कक्षा पहली के बच्चे
हमारे थोड़े से समय के बदले
ढेर सारा प्यार दे देते हैं।

चार

कक्षा पहली के बच्चे
कहीं भी कभी भी
गाने लगते हैं जन गण मन…
जब चाहे
उनका मनकक्षा पहली के बच्चे
सुबह की प्रार्थना सभा में
पैर के अंगूठे से
धरती पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते हैं
जब और लोग गाते हैं जन गण मन…

पाँच

बहुत दिनों के बाद
अपनी कक्षा से बाहर आए हैं
कक्षा पहली के बच्चे
जैसे अपने नीड़ों से निकलकर मेमनें
चल पड़ते हैं भेड़ों के साथ
उनसे सटकर
कक्षा पहली के बच्चे
अपनी टीचर जी के साथ
तितलियाँ पकड़ने का खेल खेल रहे हैं
बहुत दिनों के बाद
खिली है धूप
तो जैसे शामिल हो गई हो
चुपके से बच्चों की दूधिया खुशी में…
पहली कक्षा के बच्चे जैसे
बादलों के पीछे से
सूरज की तरह निकले
और छा गए
धूप की तरह पूरे मैदान में..

छः

कक्षा पहली के बच्चे
मायूस दिखते हैं जब
टॉयलेट के सामने
निकर आधी ऊपर चढ़ाए
बटन या हूक लगाने का
सफल-असफल प्रयास करते हैं
वे नहीं चाहते
कोई उन्हें देख ले नंगा
पहली कक्षा के बच्चे
अपनी टीचरजी से सटकर खड़े होते हैं
वे टीचरजी के होंठों को देखकर
और छूकर सीखते हैं-
‘आ’ आम का, ‘ए’ से एप्पल
‘औ’ से औरतकक्षा पहली के बच्चे
उनकी टीचरजी के ज़रा देर करते ही
खुद बन जाते हैं टीचर
चॉक पकड़कर श्यामपट पर
बनाते आदमी मकान चिड़िया तितली
छड़ी पकड़कर नन्हें हाथों में
खेलने लगते मैडम-मैडम
कक्षा पहली में
कम अज कम पाँच बच्चे होते
कक्षा के मॉनीटर….कक्षा पहली के बच्चे
केवल अपने टीचर को पहचानते हैं
वे उन्हें ‘टीचरजी’ कहकर पुकारते हैं
टीचरजी के मुंह पर उंगली रखते ही
अपने मुंह पर उंगलियाँ रख लेते हैं
और इशारा होते ही उनका
नाचने लग जाते हैंकक्षा पहली के बच्चे
समझते हैं प्यार की भाषा !!

सात

मेरे सपनों में आते हैं
कक्षा पहली के बच्चे
आते हैं और गुदगुदाने लगते है
पत्नी कहती है
हँसता हूँ मैं नींद में…।

आठ

दौड़ता रहता हूँ मैं
बड़ी कक्षाओं के बच्चों के बीच
कि जैसे एक डर सा लगने लगा है
इन दिनों बड़ी कक्षाओं के बच्चों से
ज़रा सी देर हुई नहीं कि
घटी कोई दुर्घटना
कि जैसे बच्चे बच्चे नहीं रहे
बड़ी कक्षाओं के…

कि जैसे-
बड़ी कक्षाओं के बीच
झूलता रहता हूँ
दोनों हाथों के बल
हवा में लटके होते हैं
दोनों पैर…
कि जैसे-
फुरसत ही नहीं
सांस लेने की भी …

पर मिलते ही
पहली कक्षा के बच्चों को
सांसों को इत्मिनान आ जाता है।

नौ

कक्षा पहली के बच्चे
दौड़ रहे हैं/कूद रहे हैं
मचल रहे हैं
गिर रहे हैं/उठ रहे हैं
उड़ रहे हैं
कक्षा पहली के बच्चे
गा रहे हैं कोई गीत
समूह में नाच रहे हैं
खेल रहे हैं कित-कित
लूट रहे हैं मज़ा
हल्की-हल्की बारिश में भीगने का

कक्षा पहली के बच्चे को भूख लगी है
वे मिड डे मील खा रहे हैं…

कक्षा पहली के बच्चे
तड़प रहे हैं
पेट पकड़-पकड़ कर
उल्टियाँ कर रहे हैं
पास पड़ी हुई
खुली हुई किताबे है
हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे हैं…

दस

कक्षा पहली का बच्चा
चलता है सड़क पर ज
सड़क पर नहीं होती उसकी आँखें
वह देखता है
फूल पत्ती तितली आसमान
बादल बिजली बरसात गाय और गोबर
चीटियाँ पिल्ले और कुत्ते और कौवें धूल धुआ
तेज रफ्तार गाड़ियाँ
बाइकों का शोर और
रिक्‍शे की पों पों
भले लगते हैं
कक्षा पहली के बच्चे को
पहली कक्षा का बच्चा
छूता है जब कागज़ की नाव
उंगलियों के पोरों से
तो वह चलने लगती है बेपाँव
पाँव की ठोकर लगते ही
छोटा गोलाकार पत्थर
फुटबाल बन जाता है
क्क्षा पहली का बच्चा नहीं होता

सड़क पर कभी अकेला-उदास!!

ग्यारह

वह बच्चा
कक्षा पहली का
पहुँच नहीं पाया
अपनी कक्षा में
अब तक
दरअसल
खोज रही है
उसकी आँखें
धरती पर कोई नई चीज़
जो काम की हो उसके
मसलन
चकमक पत्थर
लकड़ी का एक
अदद टुकड़ा-
चिकना और बेलनाकार
सुनहली मक पत्ती !!

अंग्रेजी बनाम देशी पुस्तक : शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

आज के युग में इंटरनेट सूचना प्रसार का सबसे बड़ा, लोकप्रिय और सशक्‍त माध्यम है। वर्तमान युग में इंटरनेट पर किसी भी सूचना को आसानी से प्राप्त करने के अवसर सुलभ हैं। नेट पर पुस्तकें, पत्रिकाएँ और समाचार-पत्र भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं। माना जाता है कि नेट की वजह से आज पुस्तकों के पाठकों की संख्या कम हो गयी है, लेकिन यह देखा गया है कि प्रायः प्रिंट माध्यम के पाठक और इंटरनेट के पाठक अलग-अलग होते हैं। जो लोग पुस्तक खरीद कर पढ़ने में रुचि रखते हैं, उन्हें इंटरनेट पर उपलब्ध मूल्यरहित सामग्री भी अच्छी नहीं लगती और वे पुस्तक खरीदकर ही पढ़ते हैं। साथ ही लोग पुस्तकें इस लिये भी खरीदते हैं, क्योंकि पुस्तकों का घर और पुस्तकालय में संकलन किया जा सकता है और जब चाहे उन्‍हें पढ़ा जा सकता है। पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि घटने का एक बड़ा कारण पुस्तकों का मूल्य है। इस महंगाई के दौर में किताब खरीदना पाठकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। स्तरीय साहित्य अगर कम कीमत पर उपलब्ध हो तो पाठक इसे छोड़ना नहीं चाहते। वे श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। इसका उदहारण गत वर्ष प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में देखने को मिला। नौ दिवसीय इस मेले के अंतिम दिन शनिवार को कई प्रकाशकों ने किताबों पर भारी छूट दे दी थी, जिसके कारण खूब बिक्री हुई। कुछ स्टालों पर तो पुस्तकों की खरीद पर कपड़ों की सेल की तर्ज पर छूट दी गई। कहीं 20 व 50 रुपये में किताबों का बंडल था तो कहीं 100 रुपये में चार किताबों का ऑफर। ऐसे स्टाल पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी थी। रीडर्स लाउंज में बैठकर लोग किताबें पढ़ रहे थे। जाहिर है कि पुस्तकों के पाठक आज भी हैं, बशर्ते उचित मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकें।

भारत में प्रिंट मीडिया उद्योग लगातार विकास के पथ पर अग्रसर है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष में इसमें  6.25  प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का पुख्ता सबूत है। देश में पंजीकृत समाचारपत्रों की कुल संख्या 82 हजार 237 है। प्रेस की स्थिति के संबंध में जारी  55वीं वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में प्रिंट मीडिया दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार समाचारपत्रों के प्रकाशन के मामले में हिन्दी सभी भाषाओं पर भारी है। समाचारपत्रों के पंजीयक की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में प्रकाशित हो रहे हिन्दी समाचारपत्रों की संख्या 7,910 है। एक हजार 406  समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ अंग्रेजी दूसरे स्थान पर और  938  समाचारपत्रों के साथ उर्दू तीसरे स्थान पर है। गुजराती के 761, तेलुगु के 603, मराठी के 521, बांग्ला के 472, तमिल के 272, ओडिया 245, कन्नड़ के 200 और मलयालम के 192  समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं।

प्रसार संख्या के मामले में भी हिन्दी के अखबार अव्वल हैं। हिन्दी अखबारों की कुल प्रसार संख्या 15 करोड़ 54 लाख 94  हजार 770 है, जबकि अंग्रेजी के समाचारपत्रों की कुल प्रसार संख्या दो करोड़ 16 लाख 39 हजार 230 प्रतियाँ हैं।

वहीं इंडियन रीडरशिप सर्वे का डाटा रिलीज हुआ है। उसके अनुसार हिन्‍दी अखबार दैनिक जागरण लगातार पहले स्थान पर है। इसकी कुल पाठक संख्या 5.45 करोड़ बतायी गयी है। दैनिक भास्कर 3.19 करोड़ पाठकों के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा अखबार बना हुआ है। तीसरे नंबर पर हिन्दी का ही एक अखबार है- अमर उजाला। इसके पाठकों की संख्या 2.87 करोड़ बतायी गयी है। चौथे नंबर पर भी हिन्दी का एक और अखबार दैनिक हिन्दुस्तान है। आईआरएस के आँकड़े बताते हैं कि इसकी कुल पाठक संख्या 2.67 करोड़ पहुँच गयी है। पाँचवे स्थान पर मराठी दैनिक लोकमत काबिज है। इसके पाठकों की संख्या 2.06 करोड़ है। छठे नंबर पर तमिल अखबार डेली थंथी के पाठकों की संख्या 2.04 करोड़ पर पहुँच गयी है। सातवें नंबर भी एक तमिल दैनिक दिनकरण है। इसके पाठकों की संख्या ताजा सर्वे के अनुसार 1.68 करोड़ है। आठवें स्थान पर पश्‍चि‍म बंगाल का बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। इसके पाठकों की संख्या 1.55 करोड़ है। नौंवे स्थान पर हिन्दी अखबार राजस्थान पत्रिका है। इसके कुल 1.4 करोड़ पाठक हैं। 1.39 करोड़ पाठकों के साथ तेलुगु दैनिक इनाडु दसवें नंबर पर है।

भारत के शीर्ष दस अखबारों में अंग्रेजी का एक भी अखबार शामिल नहीं है। अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के पाठकों की संख्या 1.33 करोड़ है, जबकि दूसरे नंबर के अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के पाठकों की संख्या 63.4 लाख है। हिन्दू तीसरे नंबर पर है और उसके पाठकों की संख्या 53.73 लाख है। 28.18 लाख पाठकों के साथ द टेलीग्राफ चौथे नंबर पर है। 27.68 लाख पाठकों के साथ डेक्कन क्रानिकल पाँचवे नंबर पर है। छठे नंबर पर टाइम्स समूह का व्यावसायिक अखबार द इकोनामिक टाइम्स है। उसके कुल पाठकों की संख्या 19.17 लाख है। मुंबई से निकलनेवाला टैबलाइड मिड-डे सातवें नंबर पर है। इसके पाठकों की संख्या 15.83 लाख है। आठवें नंबर पर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस है जिसके पाठकों की संख्या 15.66 लाख है। मुंबई मिरर के पाठकों की संख्या 15.57 लाख है और वह नौवें नंबर पर है, जबकि दसवें नंबर पर डीएनए है और उसके पाठकों की कुल संख्या 14.89 लाख है।

साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिन्‍दी का स्पेस बढ़ रहा है और लेखन में विविधता भी बढ़ रही है। भारतीय भाषाओं के बीच हिन्दी का विशेष महत्व है। इसके लेखक भी खासी बड़ी संख्या में हैं। हिन्दी भाषा में प्रकाशन भी बहुत होता है। इसके प्रकाशकों की संख्या भी अच्छी खासी है। हिन्दी में पत्रिकाएँ बड़ी तादाद में निकलती हैं। इस दृष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी एक बहुप्रचलित भाषा है।

कहते हैं कि कबीर और तुलसी आज भी लोकप्रिय हैं, लेकिन आज कितने लोग तुलसीदास को काव्य-प्रेम के कारण पढ़ते हैं। भक्ति भावना के अन्तर्गत धार्मिक आन्दोलनों के अंग के रूप में इन्हें अधिक प्रसार मिला। बाद में स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा दिनकर को लोकप्रियता मिली। प्रगतिशील आन्दोलन ने नागार्जुन, शील आदि को कुछ जनप्रियता दी,  लेकिन कुल मिलाकर कविता-प्रेम के कारण कविता पढ़ने-सुनने वाले हमेशा कम ही रहे। इसलिए आज भी यदि कविता के प्रति प्रेम कम है, तो कोई अनहोनी बात नहीं है। अक्सर सुनने को आता है कि कविता के पाठक नहीं रहे और कविता का भविष्य खतरे में है। लोग मान कर चलते हैं कि पहले का युग कविता के लायक था, आज का युग विरोधी है। सच तो यह है कि पिछले पाँच सौ वर्षों से स्वयं अंग्रेजी में कविता को लेकर क्षमायाचना का भाव रहा है। दो सौ साल पहले शेली को कहना पड़ा कि कवि दुनिया के मान्यताविहीन विधायक हैं, और वे आज भी हैं। हिन्दी में खड़ी बोली का इतिहास महज सौ साल का है। एक समय था जब निराला, पंत और प्रसाद की पुस्तकें भी बहुत कम छपती और बिकती थीं। कवि सम्मेलनों की परम्परा ने अवश्य कविता को साधारण लोगों से जोड़ा पर वह भी धीरे-धीरे फूहड़ हो गई।  बहरहाल इस विषय में कवियों को गंभीरता से सोचना होगा कि ऐसा क्यों हैं? आज कविता पाठकों के मन पर प्रभाव छोड़ पाने में अक्षम क्यों हो गई है?  कहीं उनमें ही तो कोई कमी नहीं है?

निश्‍चि‍त रूप से हिन्‍दी में साहित्य के पाठक कम हुए हैं। यह बात हिन्‍दी के तमाम प्रकाशक भी मानते हैं कि कविता-कहानी-उपन्यास के पाठक कम हुए हैं। आलोचना के पाठक तो पहले ही कम थे। हिन्‍दी के कई शीर्ष प्रकाशकों ने तो साहित्य छापना ही कम कर दिया है । साहित्येत्तर विषयों की किताबें धड़ाधड़ बिक रही है। कहीं आज का हिन्‍दी का लेखक-कवि  मध्यवर्ग का वह प्राणीभर तो नहीं, जिसे जनता और जनसामान्य से कोई लेना-देना नहीं इसलिए वह जन सामान्य से कोई तादात्म्य ही नहीं बिठा पा रहा है। वह ग्लोबलाइज हो गया है। व्यक्तिगत लाभ-हानि की बात भर सोच पा रहा है। उसका सोच द्विस्तरीय है। ऐसे में साहित्य के कम पढ़े जाने का रोना-धोना छोड़ उसे वस्तुगत आत्मविश्‍लेषण अवश्य करना होगा।

वसुंधरा पाण्डेय की कवि‍ताएं

वसुंधरा पाण्डेय

वसुंधरा पाण्डेय

वसुंधरा पाण्डेय की कवि‍ताएं-

सिंदूर

बचपन में
माँ को सिंदूर लगाते देख
जिद की थी मैंने भी
माँ
मुझे भी लगाना है सिंदूर
मुझे भी लगा दो न
तब माँ ने समझाया था-

ऐसे नहीं लगाते
बहुत कीमती होता है यह
घोड़ी पे चढ़के एक राजा आएगा
ढेरों गहने लाएगा
तुमको पहनाएगा
फिर सिंदूर तुम्हे ‘वही’ लगाएगा
रानी बनाके तुम्हे डोली में
ले जाएगा
तब उन बातों को, पलकों ने
सपने बना के अपने कोरों पे सजाया

बड़ी हुई
देखा…बाबा को भटकते दर-बदर
बिटिया की माँग सजानी है
मिले जो कोई राजकुमार
सौंप दूँ उसके हाथों में इसका हाथ

राजकुमार मिला भी पर
शर्त-दर-शर्त
‘आह’
किस लिए
चिटुकी भर सिंदूर के लिए

‘उफ्फ’…..माँ
क्या इसे ही राजकुमार कहते हैं ?

काश! बचपन में यह बात भी बताई होती
राजकुमार तुम्हारी राजकुमारी को
ले जाने लिए इतनी शर्तें मनवाएगा

तुम्हारी मेहनत की गाढ़ी कमाई
ले जाएगा
तुम्हारी राजकुमारी पर आजीवन
राजा होने का हुक्म चलाएगा
तो सिंदूर लगाने का सपना
कभी नहीं सजाती.
कभी नहीं माँ !!

वह मथानी है

पीडा में घुले शब्दों को
मथता है मथे जाता है

पता नहीं
कहाँ से पाता है यह ताकत
और निथार लाता है
दिल की कविता

नहीं भाग पाती
बीच में छोड़ कर इसे
कई बार सोचती हूँ
अब नहीं…और नहीं

पर वह तो
पीडाओं के झुण्ड और
शब्दों के रेवड लिए
जैसे कोई
सधा हुआ… प्रशिक्षित !

चमेली के फूल पर

बारिश की वह बूंद
सुवास से महक उठी थी

बूंद ने चमेली से कहा
अपनी बाहों में ले ले मुझे

तभी
हवा का इक झोका आया

बूंद
फूल से फिसल
रेत में जा गिरी

काश!
इस बूंद को
नदी मिल गयी होती !

अँधेरे बंद कमरे में

गोल-गोल घूमती
कोल्हू के बैल सी
खटती
डरती
अपनी ही परछाई से
परछाइयाँ घूरतीं रहीं
मुझे दिन-रात

आँखों पर पट्टी थी
या आँखें ही…

फिर भी टटोलती रही
शायद कहीं
सौगात सा कोई सपना
बचा हो मेरे लिए भी !

बरसात की फुहार से

ख्वाबों में
तेरी बाँहों का दुशाला ओढ़
सोयी रही मैं
सहर अलसायी रही

श्यामल घटाओं में
गुनगुनाते
बिजलियों से
स्पर्श की बौछार में
नहाई मैं
दुपहर भरमाई रही…!

अनवर सुहैल की कवि‍ताएं

अनवर सुहैल

09 अक्टूबर 1964 को जन्‍में अनवर सुहैल के दो उपन्यास, तीन कथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुके हैं। वह ‘संकेत’ का संपादन कर रहे हैं। अनवर सुहैल की कवि‍ताएं-

सबूत

कर रहा हूँ इकट्ठा
वो सारे सबूत
वो सारे आँकडे

जो सरासर झूठे हैं
और
जिन्‍हें बडी खूबसूरती से
तुमने सच का जामा पहनाया है
कितना बडा़ छलावा है
मेरे भोलेभाले मासूम जन
आसानी जाते हैं झाँसे में

जादूगरों
हाथ की सफाई के माहिर लोगों
तुम्हारा तिलस्म है ऐसा
कि सम्मोहित से लोग
कर लेते यकीन
अपने मौजूदा हालात के लिए
खुद को मान लेते कुसूरवार
खुद को भाग्यहीन……”

 उसने अपनी बात कही तो

उसने अपनी बात कही तो
भड़क उठे शोले
गरज उठी बंदूकें
चमचमाने लगीं तलवारें
निकलने लगी गालियाँ…

चारों तरफ उठने लगा शोर
पहचानो…पहचानो
कौन हैं ये
क्या उसे नही मालूम
हमारी दया पर टिका है उसका वजूद
बता दो संभल जाए वरना
च्यूंटी की तरह मसल दिया जायेगा उसे…

वो सहम गया
वो संभल गया
वो बदल गया
जान गया कि
उसका पाला सांगठनिक अपराधियों से है….

प्रेम कविता

उसने मुझसे कहा
ये क्या लिखते रहते हो
गरीबी के बारे में
अभावों, असुविधाओं,
तन और मन पर लगे घावों के बारे में
रईसों, सुविधा-भोगियों के खिलाफ
उगलते रहते हो ज़हर
निश-दिन, चारों पहर
तुम्हे अपने आस-पास
क्या सिर्फ दिखलाई देता है
अन्याय, अत्याचार
आतंक, भ्रष्टाचार!!
और कभी विषय बदलते भी हो
तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का
उड़ेल देते हो
कविताओं में
कहानियों में
क्या तुम मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए
नहीं लिख सकते प्रेम-कवितायें…

मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये
कि  बेशक मैं लिख सकता हूँ
कवितायें सावन के फुहारों की
रिमझिम बौछारों की
उत्सव-त्योहारों की कवितायें
कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कवितायें
लेकिन तुम मेरी कविताओं को
गौर से देखो तो सही
उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो
जिन पंक्तियों में
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीने की चाह लिए खडा़ दि‍खता हूँ
उसमें  तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो…
तुम्ही तो मेरा संबल हो…..

सिर झुकाना नहीं आता

क्या करें,
इतनी मुश्किलें हैं फिर भी
उसकी महफ़िल में जाकर मुझको
गिडगिडाना नहीं भाता…..
वो जो चापलूसों से घिरे रहता है
वो जो नित नए रंग-रूप धरता है
वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है
वो जो यातनाएँ दे के हँसता है
मैंने चुन ली हैं सजा की राहें
क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे
सर झुकाना नहीं आता…
उसके दरबार में रौनक रहती
उसके चारों तरफ सिपाही हैं
हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद
उसके नज़दीक पहुँचने के लिए
हर तरफ होड मची रहती है
और हम दूर दूर रहते हैं
लोगों को आगाह किया करते हैं
क्या करें,
इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको
दुनियादारी निभाना नहीं आता……

दुःख सहने के आदी

उनके जीवन में है दुःख ही दुःख
और हम बड़ी आसानी से कह देते
उनको दुःख सहने की आदत है
वे सुनते अभाव का महा-आख्यान
वे गाते अपूरित आकांक्षाओं के गान
चुपचाप सहते जाते जुल्मो-सितम

और हम बड़ी आसानी से कह देते
अपने जीवन से ये कितने संतुष्ट हैं
वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए
उनकी शिक्षा, स्वास्थ और उन्नति के लिए
कितने चिंतित हैं हम और
सरकारी,  गैर-सरकारी संगठन
दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन
की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएं
हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठिया…

वे नही जान पायेंगे कि उन्हें
मुख्यधारा में लाने के लिए
तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए
कर चुके हजम हम
कितने बिलियन डालर
और एक डालर की कीमत
आज साठ  रुपये  है!

इत्ते सारे

इत्ते सारे लोग यहाँ हैं
इत्ती सारी बातें हैं
इत्ते सारे हँसी-ठहाके
इत्ती सारी घातें हैं

बहुतों के दिल चोर छुपे हैं
साँप कई हैं अस्तीनों में
दाँत कई है तेज-नुकीले
बड़े-बड़े नाखून हैं इनके
अक्सर ऐसे लोग अकारण
आपस में ही, इक-दूजे को
गरियाते हैं..लतियाते हैं

इनके बीच हमें रहना है
इनकी बात हमें सुनना है
और इन्हीं से बच रहना है

जो थोड़ें हैं सीधे-सादे
गुप-चुप, गम-सुम
तन्हा-तन्हा से जीते हैं
दुनियादारी से बचते हैं
औ’ अक्सर ये ही पिटते हैं
कायरता को, दुर्बलता को
किस्मत का चक्कर कहते हैं
ऐसे लोगों का रहना क्या
ऐसे लोगों का जीना क्या

रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

बीनू भटनागर की कवि‍तायें

14 सि‍तम्‍बर 1947 को बुलन्दशहर ( उत्‍तर प्रदेश) में जन्‍मी बीनू भटनागर के लेख, व्‍यंग्‍य, कवि‍तायें आदि‍ रचनाएं वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन कवि‍तायें-

पचास के उस पार

माना कि यौवन के वो क्षण,
खो गये कुछ उलझनों में,
मैं वही हूँ तुम वही हो,
फिर न क्यों,
जी लें वही उन्माद के क्षण।

तुम मेरे हो शांत सागर,
लक्ष्य मेरा,
मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली हूँ,
बाँहें फैला दो ज़रा मैं तो वही हूँ।
महसूस मुझको करा दो मैं नहीं हूँ।

तुम हो इक चट्टान हो संबल मेरा,
फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।
भूल जाओ बालों मे चाँदी के जो तार हैं
भूल जाओ कि हम पचास के उस पार हैं।
फिर से जी लो कुछ पल,
जो हथेली से फिसलकर,
रेत के ढेर में,
ओंस की बूँदों से खो गये हैं।
आज भी मेरे वो पल,
तुम पर उधार हैं।

ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा

दूर गगन पर एक सितारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा,
फिर भी लगता कितना प्यारा।

नीड़ पेड़ का रैन बसेरा,
पक्षी का आकाश है सारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

नदिया का बहता जलधारा,
प्यास बुझाता हरता पीड़ा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

फूलों का मुस्काता चेहरा,
उनपर मंडरता एक भँवरा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

सुर लय पर संगीत की धारा,
तन मन सबे प्रभु पर वारा,
वो तेरा भी है, और है मेरा।

ये मेरा है वह है तेरा,
कितना अर्थहीन ये नारा,
ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा।

नदिया

हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ़ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,
पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो
ये ही हैं कहानियाँ।

सुनीता की कवि‍तायें

12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे चकियाँ में जन्मीं डॉक्‍टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू. से पी-एच.डी. की  है। इनके  लेख–कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्थायी

अख़बारों के चंद पन्नों में सिमटी जिंदगियों में
ताजेपन सा कुछ भी नहीं
रात के पड़े खाने सुबह की तरह
रोते-बिलखते मासूम चेहरे पल के मेहमाँ
गाते-गुनगुनाते मुखड़े होंठो की चुभन
एक क्षण के पश्‍चात ढल जाते हैं रात्रि सरीखे
चंद चर्चाओं के बाज़ार क्षणिक गरम, तवे से
छपाक-छपाक की भड़ास क्षण में गायब
रेत पर गिरे बूंदों के अस्तित्व के मानिंद
बरखा-बहार और मधुवन की मधुर ध्वनि
धड़कनों में शोर मचाते खलबली अभी-अभी
करवट के साथ पन्ने पलटते दृश्य और दृष्टि बदले सभी
परिवर्तित परिवेश की पुकार सुनाई देती कभी-कभी
सुमधुर योजनाओं की ललकार दिखाई देती चहुओर
न रुकने वाली वक्त की सुइयाँ टीम-टीम कर लुप्त होतीं
एक चेहरा उभरता है प्रेयसी के जुल्फों में कैद
चितवन की चंचलता चहक उठती
नयेपन का अंदाज़ पलक झपकने के साथ
बुलबुले से अस्तित्ववि‍हीन हो जाता
खबरों की दुनिया में निरंतर गहमागहमी बनी रहती
निरुउत्तर प्रजा पल्लवित पुण्य बनी हुई
लेकिन भू धरा थमने के जगह डोलती रहती
थिरकती साँसों के लय पर वायु नृत्य करते
नटते, रिझते और रिझाते रम्भाने लगते
पात्र में रखे पानी सा मटमैला और फीका बन जाते
दिखने में धवल और स्वच्छ लगते
भागते, दौड़ते कल्पना के सागर में छलांग लगाते
छलकते आँसू रंगीन चित्रों के गुजरते ही सूख जाते
चिथड़े-चिथड़े सुख की तलाश में निकल पड़ते एक और लम्‍बी यात्रा पर
नंगे, खुले और खुरदरे पैरों के निशान जह-तह बिखरे पड़े
उनकी आवाज़ाही का कोई स्थायी प्रमाण नहीं
नर-शरीर की तरह अस्थायी, क्षणभंगुर और जुगनू की तरह
यहाँ सब कुछ सिमटा हुआ है बिखरे तौर पर
ढेर में तब्दील होते मलबा सा नहीं
बल्कि सपनों के कलेजे पर बिछे फूलों के कतारों की तरह
एक-एक कतरन से तैयार वस्त्र सा सुसज्जित, आकर्षक किन्तु अस्थायी

इस जिंदगी के बदले

इस जिंदगी के बदले
दो जून की रोटी नहीं मिली
सौदों के अम्बार मिले जिनकी वजह से नर्क के द्वार खुले
हँसते-खिलते गुलशन में
पतझड़ सदियों से बने हुए हैं

पगडंडियों से झुरमुट की तरह रौंद दिये गये
एक-एक करके चुने गए उम्मीद के दाने
भेड़-बकरियों में बाँट दिये गये
गर्दन जबह करके जबरदस्ती जुराबे बाँधी गई
कपड़े तार-तार कर दिये गये…!

इस जिंदगी के बदले
खपचालियाँ घोंप-घोंप कर मुरब्बे बना दिये गये
चीनी की जगह नमक रगड़ा गया
स्वाद लेकर चखने के स्थान पर
कसैले पान की तरह थूक दिये गये

खाने के लिये जूठन परोसे गये जैसे ज़ायकेदार छप्पन भोग
छटपटाहट होती रही लेकिन कोलाहल न बन सके
हवन कुण्ड में डाले गये घी की भाँति
धीरे-धीरे जलते हुए बदबू फैलाने लगे
गीली लकड़ी की तरह सुलग-सुलग कर

इस जिंदगी के बदले
मुझे बना दिया गया
आस्मा से गिरती हुई ओसें की बूंदें
पशुओं के आगे पड़े चारे के तिनके की भाँति
बिछा दिये गये अरमान के सारे उपागम

ठहरे हुए पानी के चारों-ओर
फैली हुई बजबजाती काई
जिसके चौमुहाने पर जैसे भिनभिनाती मख्खियाँ
मछली की सी तड़फाड़ाहट
उथल-पुथल करती नसें

इस जिंदगी के बदले
हमें दिये गये
बदलते विस्तर की तरह रोज़ एक नई सेज
उठाये-बिछाए जाते रहे
एक दिन से कई रातों तक
फैले बदबू से गहन घृणा के पात्र बनने तक

बेमज़ा भोजन की तरह
पटक दी जाती थाली सी
वदन माज दिए जाते
पेस्ट से घिसते दाँतों से
मशीन में काट दिये जाते चारे की तरह

इस जिंदगी के बदले
धब्बे लगी दीवार में तब्दील कर दिये जाते
एक नामुराद मुलाजिम की तरह
धकिया दिये जाते
घुटन के मकान में कैद किये जाते

परिंदे के पर काटकर उसे उड़ने पर मजबूर से किये जाते
हथेलियों पर अंगारे रख दिये जाते
बर्फ के टुकड़े मुख में घुसेड़ कर
आँखों में फूलों के सेज सजाये जाते
सिसकी अन्तःपुर में सुरक्षित रह जाती

इस जिंदगी के बदले
खुरपी पकड़ाकर बिराने में ठेल दिये जाते
उड़ती रेतों को पकड़ने की फरमाईश की जाती
घुमड़ते बादलों के झुर्रियों को गिनवाए जाते
एक बैल की तरह बलुहट में जोत दिये जाते

ताबूत में कैद लाश से जुगाली कराई जाती
पर्वत शिखरों पर जमें बर्फ के रेम्बों दिखाये जाते
अनसुनी कहानियों के किस्से दोहराते हुए
गरम तवे पर रोटी सेंकती उसे ठंडा लोहे में परिवर्तित कर दिये जाते
फिर घन पर घन बरसाए जाते
उसके सपाट होने तक

इस जिंदगी के बदले
नेत्रों पर चिलमन चढ़ा दिये गये
झूठे वादों के साथ दगा ही मिले
कुत्तों की तरह बोटी-बोटी नोचकर खाए
भूखे पेट पर रोलर चलाकर
जश्न मनाने की मन्नत मानी गई

धमकियों के दम पर धमनियाँ जब्त कर लिये गये
तपते रेत पर छोड़ दिये गये
महल की नींव रखने के लिये
इमारत के चारों पाए कूल्हों पर टिका दिये
भावी रिश्तों के नाम पर सब कुछ होता रहा

इस जिंदगी के बदले
खच्चर सरीखे लादी ढोते रहे
लगन कभी भी कम न हुई
चाहत के दिये जलते रहे
एक-एक दिन गुजरते गये उम्मीद बंधी रही

सुबह की किरण फूटते ही
हिम्मत की ताकत दुगुने दम से लग जाती
लेकिन बेड़ियों में कैद जिंदगी
अपने अंत की ओर बढ़ रही थी
उसे रोकना मुमकिन न था
हथौड़े की मार से जिस्‍म बेजान हो गये

इस जिंदगी के बदले
यातना के सागर में डुबो दिये गये
खारे पानी से गल गये
हड्डियों का ढ़ाँचा बरकारार रहा
युगों-युगों तक सिला की तरह

लहराते ख़्वाब खो गये
यादों के पट पलकों में खुल रहे हैं
चीनी-जल की तरह घुल गये
जीवन से इस कदर मोह बढ़ता रहा लेकिन उड़ान भरने की मनाही थी
वह आज भी बरौनियों में मसखारे से चिपके हैं

सूरज कुछ कहता

सूरज कुछ कहता है
सदा चुप-चुप रहता है
बंधनमुक्त विचरता है
स्नेहमग्न उलहना देता है।

धूप की तपिस तड़प रही है
अनजाने जख्म से जूझ रही है
कब मुक्त होंगें कर्तव्य से
पीड़ा की वेदना व्यथा सुना रही है।

नीरव में पड़े तन्हा खड़े हैं
दयार्द्र की उम्मीद से भरे हैं
मदांध मानव से गिला है
हम भी प्रेमातुर हेतु बने हैं।

यावज्जीवन के आमरण हैं
प्रतिक्षण के विवरण हैं
कष्टापन्न को सहते हैं
देशार्पण में लगे रहते हैं।

मार्गव्यय का लोभ नहीं है
सदाचार में तल्लीन हैं
व्यभिचार से रिश्ता नहीं है
भयमुक्त संचित नरोत्तम हैं।

नीलाम्बर के वासी हैं
पृथ्वीजन के पोषक हैं
शरणागत के दास हैं
कलाप्रवीण विद्यार्थी हैं।

धर्मविमुख नहीं करते हैं
पथभ्रष्ट के भी हमराही हैं
अँधेरे के दुश्मन हैं
उजाले के देवालय हैं।

पनचक्की से घुमरते हैं
देहलता से लिपटते हैं
नीलकमल से सुसज्जित हैं
पीताम्बर से चमकते हैं।

कनकलता से मिताई है
यहाँ न कोई महाजन है
नगरवास में रहता हूँ
शिलालेख सा अमिट हूँ।

सुनता न कोई आपबीती है
आनंदमग्न लोग स्नेहमग्न हैं
दर्द के रेखांकित से अंजान हैं
बीचोंबीच उभरे, जवाब खामोश हैं।

शोकाकुल करुणा से देखते हैं
मुँहमाँगा वरदान सहश्र पाते हैं
व्याकुल मन बेमतलब भटकते हैं
कर्मभूमि को मालगाड़ी सा ठेलते हैं।

गगन में हरफनमौला से फिरते हैं
पदच्युत का कोई भय नहीं है
देशनिकाला कभी नहीं हो सकता है
हम सृष्टि संचालन के पथगामी हैं।

कमलनयन में उम्मीद बन सजते हैं
पंचतत्व के उत्कृष्टतम स्वामी हैं
पर्णकुटी से महलों तक में रहते हैं
आशाओं के दीपक बन जलते हैं।

छटपटाहट

कहीं दूर से रौशनी आ रही थी
आसमान में बादलों के बीच तारें
मिट्टी के जर्रे-जर्रे में कसक थी
कमरे में बल्ब खमोशी के गीत गा रहे थे
वह दूर खड़ी कुकृत्य को देख रही थी
लब खामोश थे पलाश के पेड़ रो रहे थे
पत्तों की सरसराहट भय चित्र खींच रहे थे
बगल कमरे में लेटी माँ खाँस रही
पीड़ा, दर्द, कसक की आहटें हल्की-हल्की आ रही थीं
पेड़ों पर अपने घोसले में पंक्षी गहरी निद्रा में निमग्न थे
दरवाजे के कोने खड़ी शीतल छाया
अंदर के जलन से लपलपा रहे थे
अपनी गरज बाबली जबरदस्ती घसीटती रही
अफ़यूनी जुनूनी निर्णय से तन-वदन टूट रहा था
अफ़सोस, दिल गड्ढे में धँसता जा रहा था
स्त्री के समक्ष स्त्री का लूट लिया संसार
दम तोड़ दिए आह, सिसकी और लज्जता ने
नोटों की गड्डियाँ आँखों में लहरा रही थीं
नसों में दौड़ते खून पानी के शक्ल अख्तियार करते जा रहे थे
अय तेरी कुरबत, मनमाने सो कर ले
चक्कर काटती धरती घूम कर आ जायेगी दुबारा अपनी जगह
इस काया को छोड़ते ही एक नए छाया में अवतरित होते हुए
आस्मा में टिमटिमायेंगे
उड़ता गप्पा का उपहार देते हुए
कुछ गाँठे खोलते हुए चिंता की लकीरे घिर आईं
बादलों के आँचल न ढक सके
समाज के ताने में गूंथे व्यंगवाणों को।
(एक सच्ची घटना पर आधारित है।)

शरद तिवारी की कविताएं

युवा कवि शरद तिवारी की कविताएं

क्या होगा

एक पेड़ था
जिसकी डालियों पर
चिडियाएँ घोसले बनाती थीं
वहीं पर उनका बसेरा था
वहीं चहचहाती थीं
एक पेड की जटाएँ
धरा में धँसी थीं
उसके तले
कहते हैं किसी योगी ने
परमत्व पाया था
एक पेड़ था विशाल
जाने कहाँ से आया था
उसके तने को चीर
कभी किसी ने
एक सुन्‍दर घर बनाया था
उपलब्धि को सबने सराहा था
एक पेड़ था वह
जो आँधियों में टूटकर
किसी राहगीर के सिर पर गिरा था
वह भी पेड़ ही था
जिसकी शीतल छाया ने
पथिक का श्रम हरा था
सहारा बना था
पेड़ थे बहुत से और भी
जो अब भी हैं
नही भी हैं
जो सामानों में बदल गए हैं
जिनके फल हमने तोडे़ थे
बच्चे, बन्‍दर जिन पर चढे़ थे
जो कुल्हाडी़ की चोटें खा
धरा पर पडे़ थे
पतझड़ में जिनके पत्ते झडे़ थे
और फिर बहार आई थी
कथाएँ लिखी गईं
कवियों ने पोथियाँ सजाई थीं
यह सब हुआ था
और भी न जाने क्या-क्या हुआ था
और क्या-क्या होगा
रह गया था
यह सब कुछ सोचता-सा मैं
उस नन्हे बीज को
हथेली पर रखकर
उलटता-पुलटता
देखता हुआ।

योग

इस दृश्य से
अलग रहने की कोशिश में
रहता हूँ हरदम
सोचता हूँ विचरूँ
‘दृष्टा’ बनकर सतत्
बस
असंपृक्‍त
अपनी मौत को भी देखूँ
तमाशे की तरह
अलग खड़ा रहकर
शरीर क्या हैं ?
सिर्फ हाड़-माँस
भौतिक राशियों का पुंज
आँखें हैं
बस किसी लैंस की तरह
गले से निकली आ़वाज
मह़ज वोकल कॉर्ड की कम्‍पन ही तो है
ऐसी ही व्याख्या करता हूँ अक्सर
ताकि बना रहूँ
एक अंसग दृष्टा
पर जब भी कभी
कोई सुगठित सुसज्जित
हा़ड़ माँस का पिंड
जिसमें जडे़ हों
दो सुन्‍दर लैंस
सामने आ जाता है
और
वोकल कॉर्ड करती है
सुरीली कम्‍पन
यह दृष्टा
दृश्य में विलीन हो जाता है
ऐसे में फिर
योग कहाँ रह पाता है।

भेडि़या धसान

चलते चलते
देखा किसी ने पीछे मुड़कर
ज़रा गौर से
और चल दिया
देखा देखी देखा
कुछ इसी तरह
दूसरे ने भी
और चल पड़ा
तीसरा भी देखकर चलता हुआ
चलते हुए और भी कुछ लोगों ने
देखा जिस ओर
मैंने भी देखा
चलते-चलते
उसी ओर
कुछ भी न था जहाँ पर
गर था तो बस वही
भेडिया धसान
जो चल रहा है
ज़माने में
ज़ोरों पर
जिसके चलते
चलते हैं लोग
एक दूसरे को देखकर
बिना किसी तर्क के।

छुई मुई

छुई मुई
छूते ही मुई
सिमटी
मुरझा-सी गई
नाज़ुकी
ऩाज होता है जिसपे
तमाशा बन गई
उँगलियाँ उठीं सबकी
उसकी ही ओर
न चाहते हुए भी।

गरमी आ रही है

ट्यूब लाइट की फट्टी के पीछे से
बड़े दिनों बाद आज अचानक
हँसता-सा मुँह लिए
ख़ामोशी से गरदन लटकाए
लगातार झाँकती छिपकली
इशारा करती है
कि गरमी आ पहुँची है
ठसाठस भरी नगर बस के
सहयात्रियों के चढ़ते-उतरते
रगड़ खाकर गुज़रते समय
झटके से झोंके के साथ आने वाली
बदन की मंद-मंद बदबू भी
यही बतलाती है
कि गरमी आ पहुँची है
कुछ देर तेज रौ चलने पर
कहीं टुक बैठकर आराम करने पर
गालों पर चोरी से ढुलक आने वाली
नन्हीं-सी पसीने की एक-दो बूँदें भी
मानो कह जाती हैं
कि गरमी आ पहुँची है
रसोई की नाली के इर्दगिर्द
एक अरसे बाद
अजनबी से चहल क़दमी करते
कुछेक चींटे और कॉकरोच
आगाह कर जाते हैं कि कि गरमी आ पहुँची है
कैलेंडर की तेजी से बीत गई ठण्डी तारीखों के अलावा
वसंत की उन्मादी पवन के उन्हीं बासी इशारों के सिवा भी
और भी कई बातें बतलाती हैं
कि गरमी आ पहुँची है
ज़रा ग़ौर तो कीजिए।

आत्मश्‍लाघा

गम्‍भीरता
गहराई तक जाने वाली नज़र
वह विचारों की प्रौढ़ता
बुद्धि का वह पैनापन
हर एक बात की बुनियादी समझ
दक्षता, दृढ़ निश्‍चय और दबंगपन
अलावा इसके
और भी बहुत कुछ हैं मुझमें…
– जब-जब उस ऊँची आकांक्षा को
न पा सकने की कसक
मन में उपजती है
तब-तब
देने लगती है संबल
वहीं आत्‍मश्‍लाघा

वह मरेगी नहीं

कितना छिपाने
दबाने और मारने की
कोशिश करोगे उसको
फिर भी
वह तुम्‍हारी देह के
हर सँकरे मोड़ पर
तुम्‍हारे भीतर
बसी ही रहेगी कमोबेश
चली जाएगी भले
थोड़ी देर के लिए
तुम्‍हारी खीझ मिटाने
तुम्‍हें खुश करने के लिए
पर भागेगी नहीं सदा के लिए
बद है वह, यानी बुरी है
तुम्‍हें नापसंद है
क्‍योंकि वह दिखावा नहीं
आडम्‍बर नहीं
इसलिए मारना चाहते हो उसे हर बार
हटाना चाहते हो अपने पास से
किसी खुशफहमी में रहने के लिए
पर सोच लो
वह मरेगी नहीं कभी भी
क्‍योंकि वह सच्‍चाई है
तुम्‍हारे तन की
जो मरेगी नहीं
तुम्‍हारे मरने के बाद भी
बल्कि प्रकट होगी
और भीषण रूप में
इसलिए खत्‍म करेंगे
लोग एक बार फिर तुम्‍हें
मरने के बाद भी
शायद उसके ही डर से
पर फिर भी तो रहेगी वह
उनके साथ
जो तुम्‍हें खत्‍म करके चले थे।

भास्कर चौधुरी की छ: कवितायें

27 अगस्त, 1969 को रामानुजगंज, सरगुजा (छत्‍तीसगढ़.) में जन्‍में भास्कर चौधुरी का काव्‍य संग्रह ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ प्रकाशित हो चुका है। कविताओं के अलावा समीक्षा, संस्मरण आदि विधाओं में उनकी रचनाएं विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी छ: कवितायें-

ज़ेहादी

कहो यदि तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
खिल जाएँगे असंख्य फूल
जी उठेंगे खेत-खलिहान
खत्म हो जाएगी भुखमरी
साफ हो जाएगी दुनिया से सारी गन्दगी
ग़ायब हो जाएगी हवा से बदबू

कहो यदि तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
मिल जाएँगे पश्चिम और पूरब
उत्तर और दक्षिण
रेगिस्तानों में बारिश होगी कई दिनों तक
भर जाएँगे लबालब
मीठे जल से –
सूखे पोखर नदी और तालाब

यदि कहो तुम
कि मरने से हज़ारों हज़ार
असमय
सुन्दनर हो जाएगी धरती
नारंगी के बागानों सी
हरी-भरी
धान के लहलहाते फसलों सी

तो लो
मैं प्रस्तुत हूँ
मरने के लिए
असमय
शामिल होने के लिए
उन हज़ारों हज़ार लोगों की भीड़ में
शामिल जिनमें नवजात शिशु
और अजन्में भी
बच्चे, जवान स्त्रियाँ और बूढ़े
जिनके पास बची नहीं होती साँसें
यह जानने के लिए
कि क्यों मारे गये वे
कसूर क्या था उनका
क्या बिगाड़ा था उन सबने
तुम्हारा
किसी का…

कहो यदि तुम !

फूल

फिर
फिर
झर जाते हैं फूल
फिर
फिर
खिलने के लिए.

इस सदी में दुःख

यह कैसा दुःख है
जो
रात के करवट बदलते ही
ग़ायब हो जाता है.

प्रेम

अड़सठ के पिता
साठ की माँ

माँ आती है
कहती है-
अकेले हैं तुम्हारे पिता
और लौट जाती है
तय समय से पहले
पिता के पास

पिता आते हैं तो
चिन्ता  करते हैं माँ के लिए
और लौट जाते हैं
तय समए से पहले
माँ के पास….

निठल्ले

देखते-देखते
दिन गुजर गए
शाम ढल गई
देखते-देखते
बूढ़ा हो गया मैं
देखते-देखते
कितनी बड़ी हो गई वह
देखते-देखते….

दरअसल कुछ नहीं
बीतता देखते-देखते
बीतता है केवल उनके लिए
जो केवल देखते हैं –
निठल्ले !!

सुख

आसमान का सुख
बादलों से ढक जाने का

सुख प्रसव के बाद
नवजात को छूने का

पत्तों का सुख
पत्तों पर बारिश की बूदों के ठहरने का

सुख परिश्रम के बाद
गिलास भर ठंडा पानी पीने का

आम का सुख
पकने के बाद
ढेले की चोट से तोड़ जाने का

सुख
थोड़े में गुजारा करने का

सुख
सुख बांटने का !