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परमानंद श्रीवास्तव को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

परमानंद श्रीवास्तव

परमानंद श्रीवास्तव

नई दि‍ल्‍ली : सुप्रसिद्ध आलोचक परमानंद श्रीवास्तव ( 1935-2013) का 5 नवम्बर 2013 को गोरखपुर में 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया। आधी सदी से भी ज़्यादा के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने आलोचना की एक दर्जन पुस्तकें लिखीं। ‘नयी कविता का परिप्रेक्ष्य’(1965), ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’ (1965), ‘कवि-कर्म और काव्य-भाषा’ (1975), ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’ (1976), ‘जैनेन्द्र के उपन्यास’ (1976), ‘समकालीन कविता का व्याकरण’ (1980), ’समकालीन कविता का यथार्थ’ (1988). ‘शब्द और मनुष्य’ (1988), ‘उपन्यास का पुनर्जन्म’(1995), ‘कविता का यथार्थ’(1999), ‘कविता का उत्तर जीवन’ (2005), ‘दूसरा सौंदर्यशास्त्र क्यों?’(2005) उनकी आलोचना संबंधी पुस्तकें हैं। उनके छः कविता संग्रह हैं- ‘उजली हँसी के छोर पर’( 1960), ‘अगली शताब्दी के बारे में’ (1981), ‘चौथा शब्द’ (1993),‘एक अनायक का वृत्तांत’ (2004), ‘प्रतिनिधि कवितायें’(2008) और  ‘इस बार सपने में ‘(2008)। ‘मेरे साक्षात्कार’ शीर्षक से उनके साक्षात्कारों की पुस्तक 2005 में प्रकाशित हुई। उनके दो निबंध संग्रह ‘अँधेरे कुँए से आवाज़’ और ‘सन्नाटे में बारिश’ क्रमशः 2005 और 2008 में प्रकाशित हुए। उन्होंने पाब्लो नेरुदा की 70 कविताओं का अनुवाद किया और साहित्य अकादमी से निराला और जायसी पर उनके दो मोनोग्राफ प्रकाशित हुए। साहित्य अकादमी से ही ‘समकालीन हिन्दी कविता’ और ‘समकालीन हिन्दी आलोचना’ के संचयन उनके सम्पादन में क्रमशः 1990 और 1998 में निकले। काफी समय तक वे ‘आलोचना’ पत्रिका से जुड़े रहे, पहले नामवर सिंह के सम्पादक रहते हुए- उनके साथ सह-सम्पादक के रूप में, फिर सम्पादक के बतौर और इस दरम्यान दोनों आलोचकों ने इस पत्रिका को रचना और विचार की एक समर्थ और अग्रणी पत्रिका के रूप में निखार दिया।

परमानंदजी कविता के मर्मज्ञ आलोचक ही नहीं थे, बल्कि कहना चाहिए कि उन्होंने कविता के जीवन को आखिरी हद तक जा कर देखने का मिजाज़ विकसित किया था, कविता के जीवन को ही नहीं उसके उत्तर-जीवन को, उसके पुनर्जन्म को भी। वे कविता ही नहीं, बल्कि समूचे सृजन की उत्तर-जीविता को एक ऐसे समय में रेखांकित कर रहे थे, जब इतिहास, कर्ता, कला, साहित्य और सृजन सबके अंत की घोषणाएँ हो रही थीं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस परिघटना के कुछ अन्य आयाम भी थे। ‘कविता का उत्तर-जीवन’ शीर्षक पुस्तक के पूर्वकथन में वे लिखते हैं- ‘देखते-देखते कविता को सस्तेपन की ओर,  भद्दी तुकबंदियों की ओर और अश्लील मनोरंजन तक सीमित रखने का जो दुश्चक्र साम्प्रदायिक ताकतों के एजेंडे पर है,  उसे देखते हुए भी कहा जा सकता है कि कविता की जीवनी शक्ति असंदिग्ध है। यही समय है कि ग़ालिब, मीर, दादू, कबीर भी हमारे समकालीन हो सकते हैं।’

कविता के श्रेष्ठ आलोचक और भी रहे और हैं, लेकिन कविता को एक असमाप्त जीवंत-प्रक्रिया के रूप में देखना समझना और उससे डूब कर प्यार करना परमानंद जी का अपना निराला रास्ता था। उन्‍होंने कविता के अर्थ, कविता में बहते समय, कविता और समाज के रिश्ते, कविता और पाठक के बीच संवाद पर लगातार विचार किया और उसे जीवनानुभूति और जीवन-ज्ञान के एक समानांतर संसार की तरह समझा। काव्यभाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी, लेकिन नयी कविता के संस्कार में दीक्षित आलोचकों की तरह उन्होंने उसे एकमात्र या सर्वोपरि निकष नहीं बनाया। भक्ति-काल से लेकर बिलकुल अभी तक की कविता पर उन्होंने लिखा। हिन्दी कविता में जितने कवियों पर उन्होंने लिखा, शायद अन्य किसी आलोचक ने नहीं और जिन पर उन्होंने लिखा उनमें समकालीन कविता के नव्यतम हस्ताक्षर तक शामिल हैं। उपन्यास और कहानी पर लिखते हुए भी वे बराबर नव्यतम पीढी़ के रचना संसार से रिश्ता जोड़े रहे। स्त्री जीवन पर केन्द्रित और खुद स्त्रियों द्वारा लिखे साहित्य को उन्होंने ख़ास तौर पर रेखांकित किया और स्त्री रचनाशीलता की अपनी अलग शख्सियत को महत्त्व दिया। अनामिका, गगन गिल, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, अनीता वर्मा, कात्यायनी या तेजी ग्रोवर, इन कवयित्रियों के काव्यस्वर में समवेत क्या है और इनकी विशिष्टताएं क्या हैं, उन्हें लक्षित करना उन्होंने ज़रूरी समझा। परमानंद जी ने आधुनिक भारतीय कविता के बुनियादी सेक्युलर चरित्र का बारम्बार रेखांकन करते हुए मराठी, बांग्ला, मलयालम, उडिया, असमिया, पंजाबी, कन्नड़ आदि भाषाओं की समकालीन रचनाशीलता को भी सामने रखा।

उनके जीवन में सादगी और खुलापन तो था ही, साम्प्रदायिकता और जन-विरोधी शासकीय नीतियों के खिलाफ एक नागरिक के बतौर वे लगातार मुखर रहे। पूर्वी उत्तर-प्रदेश के नाभि-केंद्र गोरखपुर में रहते हुए सेक्युलर और प्रगतिशील बौद्धिक दायरे के निर्माण में कई दशकों से उनकी एक प्रमुख भूमिका रही और यह कार्य आसान कतई न था। वाद- विवाद, सहमति-असहमति को उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत नहीं माना और हरदम उसे वैचारिक दायरे की ही चीज़ समझा। उन्होंने लिखा है, ‘कविता शब्दों में या शब्दों से लिखी ज़रूर जाती है पर साथ ही अपने बाहर या आसपास वह जगह भी छोड़ती चलती है जिसे पाठक अपनी कल्पना और समय के अनुरूप भर सकता है।’ परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना के बारे में भी बहुत हद तक यही बात कही जा सकती है।

परमानंद जी का जाना साहित्य की दुनिया में एक बड़े खालीपन की तरह लगता है। नयी रचनाशीलता को इस खालीपन को भरने की चुनौती और दायित्व को उठाना होगा।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)