Tag: pakistan

वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब-जालिब कहता था : मृत्‍युंजय

पाकिस्‍तान के अवाम के शायर हबीब जालिब पर युवा कवि मृत्‍युंजय का आलेख और उनकी कुछ रचनाएं-

“वली दकनी से लगाय आज तलक, सुनने वालों की इतनी बड़ी ज़मात का शायर पैदा नहीं हुआ। वे हकीकतन अवाम के शायर  हैं।”- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
एजाज़ अहमद साहब ने पाकिस्तान के उपरले तबकों के बीच चल रहे सियासी दाव-पेंचों को बखूबी दिखाने के नाते सलमान रश्दी के बहुचर्चित उपन्यास ‘शरम’ की तारीफ़ की है। बात तो सच है, पर मुझे तो इस उपन्यास को पढ़ने के दौरान पाकिस्तान की आम-अवाम का ख्याल आया, जिनकी ज़म्हूरियत की ख्वाहिश पर अयूब,  भुट्टो और जिया से लेकर आज तक के हुक्मरां कहर की तरह नाजिल हैं। उपन्यास में आम-अवाम हाशिये पर भी नहीं है और मैं इसकी मांग करने की बेवकूफी भी नहीं करूंगा। पर यह सवाल तो मौजूं है ही क़ि पाकिस्तानी आम-अवाम की जुबान आखिर है कहाँ? साहित्य जगत में उसकी तरफ से कौन बोलता है? हुक्मरानों के सियासी सवालों के जवाब कौन देता है? बिलाशक हबीब जालिब।
हबीब जालिब मैट्रिक में थे जब देश तक्सीम हुआ। वालिद सूफी इनायतुल्लाह खुद पंजाबी के शायर थे। तक्सीम में जालिब वालिदैन के साथ पाकिस्तान आये। यहाँ जालिब ने कुछ वक्त ‘डेली इमरोज़द’ में प्रूफ रीडरी की और फिर कविता के पूरावक्ती कार्यकर्ता बन गए। मार्क्सवादी-लेनिनवादी जालिब पहले पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे, पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा और उसने नेशनल अवामी पार्टी के नाम से काम करना शुरू किया। जालिब अपनी पूरी शिद्दत से इस आन्दोलन में शरीक हो गए। उन्होंने अपना मोर्चा चुन लिया था- कविता का मोर्चा। 1956 में उनका पहला दीवान साया हुआ- ‘बुर्ज ए आवारा’। बाद के तीन संग्रहों अलग-अलग निजामों के दौर में ज़ब्त हुए- ‘ज़िक्र बहते खून का’, ‘गुम्बद ए बेदर’, और ‘सर ए मक्तल’। पाकिस्तान जैसे तानाशाहियों के मारे  अभागे मुल्क में अगर आप प्रतिरोध का परचम उठाते हैं तो जेल जाने से आपको खुदा भी नहीं बचा सकता। इसी मोर्चे पर लड़ते- भिड़ते जालिब बार-बार जेल गए, लगभग सभी हुक्मरानों ने उन्हें इस सम्मान से नवाज़ा। ज़रा उनकी  गिरफ्तारियों के सालों पर नज़र डालिए- 1954, 1964 , 1966, 1973, 1976, 1984  और 1985। सुनते हैं क़ि जालिब साहब के बदन पर पाकिस्तानी निज़ाम की लाठियों के नीलगूं नक्श हमेशा ही दर्ज रहा करते थे। उनकी बिटिया के एक इंटरव्यू से शब्द उधार लें तो ‘अब्बा तकरीबन तीस साल जेल में रहे। आधी उमर जेल में और आधी अस्पताल में।’ यों हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘ओल्ड मैं एंड द सी’ की इस बात को जालिब ने मजबूती से दर्ज किया कि आदमी को मारा जा सकता है, पर उसे हराया नहीं जा सकता।
हुक्मरान चाहे जिस रंग के रहे हों,  हुक्मरानों के बरक्स प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद की हबीब जालिब ने। पाकिस्तान में ज़नरल अयूब खान ने जब नया फौजी संविधान बनाया, तो हबीब जालिब ने लिखा- दीप जिसका महल्लात ही में जले/ चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले/ वो जो साए में हर मसलहत के पले/ ऐसे दस्तूर को, सुबहे बेनूर को/ मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।यह नज़्म पाकिस्तान में ज़म्हूरियत का अकीदा है। जन विरोधी कानूनों, जिनसे की आज हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और बांग्लादेश, तीनों मुल्कों की अवाम जूझ रही है, के खिलाफ यह नज़्म आज भी उतनी ही मौजूं है। तीनों मुल्कों की सरकारें संविधान को आम-अवाम के खिलाफ खड़ा करने के लिए दृढ-संकल्प रहती हैं। जालिब लोकतंत्र  के सवाल को बहुत ही जमीनी सच्चाइयों से जोड़ देते हैं और तीसरी दुनिया की अवाम की आवाज़ से आवाज़ मिलाते हुए हुक्मरानों और अवाम की दो दुनियायों में से अपना पक्ष चुनते हैं।
हबीब जालिब के शब्दकोश से शक और वहम तब गायब हो जाता है जब वे सियासतदारों से बात करते हैं। गहरे आत्मविश्वास के रथ पर सवार बेख़ौफ़ गूंजती हुई आवाज। इस रथ में ईमान के पहिये हैं, सत्य की पताका है, आन्दोलनों के घोड़े हैं, विचारधारा का चाबुक है, अभय सारथी है और गद्दीनशीनों की हकीकत समझने की कूबत का वेग। ज़रा इस आवाज में यह बेख़ौफ़ टिप्पणी सुनिए- अगर मैं फिरंगी का दरबान होता/ तो जीना किस कदर आसान होता/ मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते/ हर गर्मीं में इंगलिश्तान होता/ मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते/ हर गर्मीं में मैं इंगलिस्तान होता/ मेरी इंग्लिश भी बला की चुस्त होती/ बला से जो न मैं उर्दूदान होता/ सर झुका के जो हो जाता सर मैं/तो लीडर भी अजीमुस्सान होता/ज़मीनें मेरी हर सूबे में होतीं/मैं वल्लाह सदरे पाकिस्तान होता।लेकिन अवाम से बातचीत करते हुए उनकी आवाज करुणा से भर जाती है और तीखी शैली समझाने-बुझाने में बदल जाती है- छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात/ और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात/ दुनियावालों कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात/ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान/बगिया लहू लुहान,जैसी नज्मों से गुजरते हुए अपनी पैदाइश से ही कत्लो-गारत झेलते मुल्क की पुरनम आँखें हमारे जिगर में पैवस्त हो जाती हैं।
तक्सीम ने जालिब के मन में गहरे घाव किये थे। फ़ैज़ की ही तरह उनकी शायरी में भी तक्सीम बेहद दुखभरी याद है। न सिर्फ हिन्दुस्तान-पाकिस्तान, बल्कि पाकिस्तान-बांग्लादेश का बंटवारा भी पाकिस्तानी अवाम की किस्मत में बदा था। अपनी ‘जाग मेरे पंजाब’ वाली नज़्म में जालिब बंटवारे के अगले चरणों को रोकने के लिए पंजाब की अवाम को आवाज़ देते हुए बताते है कि हुक्मरानों के ‘इसी चलन से हमसे अलग बंगाल हुआ’। आगे एक शेर में कश्मीर के बारे में वे लिखते हैं-ये जमीं तो हसीन है बेहद/ हुक्मरानों की नीयतें हैं बद हबीब जालिब एक मुश्तरका तहजीब का नाम है। प्रतिरोध की तहजीब। पाकिस्तान के इतिहास में सियासी विपक्ष बार-बार न सिर्फ कमजोर पड़ा बल्कि कई बार तो सिरे से उखाड़ फेंका गया। ऐसे में जालिब की शायरी सियासी विपक्ष की जगह ले लेती  है। यह अनायास नहीं कि लगभग हर दौर के निजामों ने, चाहे वे तानाशाह हों  या भुट्टो जैसे तथाकथित जम्हूरियतपसंद, उनकी मुठभेड़ जालिब की शायरी से हुई। नतीजे में जालिब जेल जाते रहे। और उन्हीं के शब्दों में ‘आमिरों के जो गीत गाते रहे/वही इनामो-दाद पाते रहे’।
तंज़, जालिब की शायरी की खूबसूरती है। पर इस व्यंग्य में हंसी से बेहद  कम है। यह आंसुओं से लथपथ व्यंग्य है। जनता में शामिल जालिब बार-बार उसकी  हकीकतों और सपनों के बीच की आसमान जैसी खाई के अंतर को बुझी-बुझी आँखों से देखते हैं। जनता, जिसे सदियों से अपने लिए ज़म्हूरियत की तलाश है, जो चंद ताकतवर लोगों की कठपुतली की तरह इस्तेमाल की जाती रही है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी शासक है, लाशों और खून के अम्बार पर मुस्कुराते हुक्मरां हो गए कमीने लोग।  अपनी प्यारी मातृभूमि और अवाम के हालात एक कवि के लिए भयानक हैं। वह क्या करे? फ़ैज़ साहब ने एक रास्ता लिया, करुणा का और उसमें से उभरते प्रतिरोध का। जालिब ने अपने लिए करुणा से उबरते व्यंग्य का रास्ता चुना। यह व्यंग्य कोई शैली भर नहीं है। गहरी राजनीतिक समझ की सान पर पैनी हो जनता की यह आवाज ‘स्रवन द्वार ह्वै संचरै, बेधै सकल शरीर’ की तासीर पैदा करती है। पाकिस्तानी हुकूमतों के खौफ़ का तसव्वुर किये बगैर इस व्यंग्य की गहराई समझनी मुश्किल है। और तब तानाशाही की लम्बे चलन वाले मुल्क में जालिब सड़कों पर अपने हज़ारों समर्थकों के साथ चीख पड़ते हैं- बिरसे में हमें जो ग़म है मिला, उस ग़म को नया क्या लिखना
जालिब की आवाज में एक ख़ास जादू है। गहरी बेचैनी से भरी मीठी आवाज में उनकी शायरी अपने हर सुनने वाले से सीधे संवाद करती है, उनके दिल में उतरती चली जाती है। इसलिए भी जालिब जैसे शायरों पर लिखना बेहद मुश्किल काम है  क्योंकि उनकी शायरी और अवाम के बीच फासला लगभग न के बराबर है। शुरुआत से ही  कविता मूलतः सुनने की विधा रही आयी है। सीधे अपनी अवाम से बात करने के लिए, उससे मुखातिब शायर को इस फ़न की जरूरत है। जालिब ने कविता के इस मूल  गुण को पकड़ा और अवाम से सीधे संबोधित हुए।  फ़ैज़ साहब चाहे अपने कलाम बहुत अच्छी तरह न पढ़ते रहे हों,  इससे कौन इनकार करेगा क़ि  हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के तमाम फनकारों ने उनके कलाम को लोगों को सुनाया और समझ बढ़ाई।
जालिब ने कभी-कभार फिल्मों के लिए भी गीत लिखे पर उन गीतों में भी जालिब की ख़ास बेचैनी की मुहर लगी होती। इस सिलसिले में ‘ज़रक़ा’ फिल्म का एक गीत मौजूं  है, मेहदी हसन साहब ने इसे आवाज़ दी है- तू कि नावाकिफे-आदाबे-गुलामी है अभी/रक्स जंजीर पहन कर भी किया जाता है। प्रसंग यह कि नीलू नाम की अभिनेत्री को पश्चिमी पाकिस्तान के गवर्नर, कालाबाघ के नवाब अमीर मोहम्मद खान ने अपने विदेशी मेहमानों के सामने रक्स करने के लिए बुलवाया। नीलू ने आने से मना किया तो पुलिस पहुँची। नीलू के सामने मुश्किलें बढ़ती गयीं और इस सबके नतीजतन आखिरकार उस खुद्दार महिला ने  खुदकुशी की कोशिश की। इसी घटना पर यह नज़्म जालिब ने लिखी थी।
हबीब जालिब का कहा हुआ पहला शेर गौर फरमाएं- ‘वादा किया था आयेंगें इन शब जरूर वो/वादाशिकन को देखते वक्ते सहर हुआ’। यह उर्दू शायरी की खासियत है क़ि वह इंसानी जज्बातों और रिश्तों के नाज़ुक पेंचो-ख़म के मुहाविरे को इतना फैला देती है क़ि बड़ी-बड़ी घटनाएं और कौमी तजुर्बे शायरी में घुल-मिल जाते हैं। शायरी की यह रवायत उर्दू शायरी की जान है। ग़ालिब के एक शेर के मार्फ़त बात थोड़ी और साफ़ करने की कोशिश करता हूं। ग़ालिब, दो दुनियाओं के बीच खड़े थे. संक्रमण का दौर. अंग्रेज आ रहे थे और देशी निज़ाम ढह रहा था. ग़ालिब की तरफदारी कोई साफ़ न थी। ऐसे में शेर में  बंधीं इस उपमा को देखिये- ‘चलता हूं थोड़ी दूर हर एक तेज रौ के साथ/ पहचानता नहीं हूं अभी राहबर को मैं’। फ़ैज़ हों या जालिब, यह अर्थ-संभावनाएं इन सभी कवियों को विरासत में मिलीं। इश्क के कभी पुराने न पड़ने  वाले मुहाविरे में लिखे गए जालिब के ऊपर के शेर के वादा शब्द को ज़रा उनकी काफी बाद की  ग़ज़ल के एक शेर के ‘वादे’ के संग मिलाकर पढ़िए- या वादा था हाकिम का/या अखबारी कालम था। यहां ‘वादा’ शब्द की अर्थ छवियाँ माशूक के वादे की याद दिलाती तो हैं, पर उसका बहुत बेहतरीन रूपांतर अपने ही मुल्क की सियासत की वादाफरोशी के लिए कर लिया गया है। अर्थ के रूपांतरण की इस गली में बात थोड़ी और आगे तक जाती है क़ि माशूक जालिम होता आया है। सियासतदान भी जालिम  हैं। पर ‘वादे’ के माशूक वाले अर्थ में माशूक से इश्क ही असली बात है। जालिब इस अर्थ के एक ही हिस्से को अपनाते हैं क़ि सियासतदान इसी मुल्क के  हैं पर उनसे इश्क की बात को पलट देते हैं। वह ऐसा कैसे कर पाते हैं ? इसके लिए वे तंज़ का सहारा लेते हैं। पूरी ग़ज़ल, जिसका शेर ऊपर दर्ज है, जनरल जिया के समय हुए जनमत-संग्रह का मज़ाक उड़ाते हुई कही गई है- ‘शहर में हू का आलम था, जिन था या रिफरेंडम था’। ज्यों-ज्यों आप ग़ज़ल पढ़ते जाते हैं, तानाशाह पर तंज़ और जनता के प्रति करुणा का एक विस्तार खुलता जाता है। इस संरचना से गुजरते हुए जब  आखिर में वादा’ वाला शेर आता है, तब तक पाठक सत्ता की कारगुजारियों से खूब वाकिफ हो चुका होता है। अब ‘वादा’ को मनचाहे अर्थ में इस्तेमाल किया जा सकता है, और जालिब ने यही किया। इसी तरह ‘धर्म के मुहावरे के साथ काव्यात्मक छेड़छाड़ करने की उर्दू कविता की पुरानी रवायत को वह अपने तईं  बरतते हैं। फ़ैज़ ने  ऐसा अपने चर्चित तराने ‘हम देखेंगें’ में बेहद खूबसूरती से किया। ज़रा जालिब का प्रयोग देखिये- ‘एक नजर अपनी ज़िंदगी पर डाल/एक नजर अपने अर्दली पर डाल, फासला खुद ही कर ज़रा महसूस/यूं न इस्लाम का निकाल जुलूस!’ एक तानाशाह को दी गई इस सीख में एक टुकड़े को गौर से  देखिये। ‘इस्लाम का जुलूस’, जुलूस माने चौकी। हास्यास्पद बना देना। बराबरी के बुनियादी इस्लामी उसूल को जालिब अपनी शायरी के चुनते हैं और उसे हुक्मरानों के खिलाफ खड़ा कर देते हैं। याहिया खान के लिए कहा गया एक और शेर यों रहा- ‘जो शख्स तुम से पहले यहाँ तख़्तनशीं था/उसको भी खुदा होने पर, इतना ही यकीं था। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं क़ि जालिब उर्दू शायरी की धर्म संबंधी तीखी आलोचनाओं के वारिस नहीं हैं। वह धर्म के आधुनिक रूप को देख रहे थे। हिन्दुस्तान की ही तरह पाकिस्तान में भी धर्म को राजनीति के औज़ार की तरह  इस्तेमाल किया जाता रहा है। एक ज़माना पाकिस्तान में ऐसा भी गुजरा जब पार्टियों को इस्लामी और गैर-इस्लामी में बांटा जा रहा था। जालिब ने अपनी शैली में ग़ज़ल कही- ‘खतरे में इस्लाम नहीं। और अब जालिब की शायरी में दर्ज अआधुनिक मौलाना के भी ज़रा दर्शन करते चलें- ‘नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से, यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर मौलाना/ हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने, सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना
12 मई, 1993 को अवाम के इस शायर का इंतकाल हुआ। सरकारों ने चैन की सांस ली और मरने के बाद 1996 में निशान ‘ए इम्तिआज़’ और 2009 में निशान ‘ए हिलाल पुरस्कार’ देकर जालिब की कविता को दूर अतीत में फेंकने की कोशिश की। नवाज़ शरीफ ने जालिब की शायरी की कीमत 25 लाख रूपये लगाई, पर उनकी खुद्दार बेगम साहिबा को जालिब के उसूल प्यारे थे। उन्होंने यह खैरात लेने से मना कर दिया। जालिब की कवितायें हमेशा पाकिस्तानी ही नहीं,  हुक्मरानों की किसी भी जाति को चुभती रहेंगी। जालिब को पचा पाना असंभव है। जब भी पाकिस्तान की आम अवाम अमन और जम्हूरियत के लिए अपने शासकों के खिलाफ बगावत का परचम उठायेगी, जालिब की कवितायें उसकी संगी होंगी। यह उसकी कविता की ताकत थी क़ि उसके कवि मित्रों ने मुल्क के इस हिरावल शायर को इस तरह याद किया-
अपने सारे दर्द भुलाकर औरों के दुःख सहता था
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था
आखिरकार चला ही गया वो रूठ के हम फरजानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था
-कतील शिफाई

हबीब जालिब की कुछ रचनाएं-

दस्तूर1

दीप जिसका महल्लात2 ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार3 से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ4 की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्‍यों
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
1. संविधान, 2.  महलों, 3. फांसी का तख्ता, 4. जेल

मुशीर1

मैंने उससे ये कहा
ये जो दस करोड़ हैं
जेहल का निचोड़ हैं

इनकी फ़िक्र सो गई
हर उम्मीद की किरन
ज़ुल्मतों2 में खो गई

ये खबर दुरुस्त है
इनकी मौत हो गई
बेशऊर लोग हैं
ज़िन्दगी का रोग हैं
और तेरे पास है
इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा
तू ख़ुदा का नूर है
अक्ल है शऊर है
क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ3
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये सरपसंद4 हैं
इनकी खींच ले ज़बां
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा
जिनको था ज़बां पे नाज़
चुप हैं वो ज़बां दराज़
चैन है समाज में
वे मिसाल फ़र्क है
कल में और आज में
अपने खर्च पर हैं क़ैद
लोग तेरे राज में
आदमी है वो बड़ा
दर पे जो रहे पड़ा
जो पनाह मांग ले
उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा
चीन अपना यार है
उस पे जाँ निसार है
पर वहाँ है जो निज़ाम
उस तरफ़ न जाइयो
उसको दूर से सलाम
दस करोड़ ये गधे5
जिनका नाम है अवाम
क्या बनेंगे हुक्मराँ
तू यक़ीं ये गुमाँ
अपनी तो दुआ है ये
सदर तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा
1.  सलाहकार, 2.  अंधेरा, 3.  नई सुबह का सूरज, 4.  शरारती तत्व,  5. जब यह नज़्म लिखी गई उस वक्त पाकिस्तान की आबादी दस करोड़ थी।

भए कबीर उदास

इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए
दूजा जुल्फ़ों की छाओं में सुख की सेज पे सोए
राज सिंहासन पर इक बैठा और इक उसका दास
भए कबीर उदास

ऊँचे ऊँचे ऐवानों में मूरख हुकम चलाएं
क़दम क़दम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएं
धरती पर भगवान बने हैं धन है जिनके पास
भए कबीर उदास

गीत लिखाएं पैसे ना दे फिल्म नगर के लोग
उनके घर बाजे शहनाई लेखक के घर सोग
गायक सुर में क्योंकर गाए क्यों ना काटे घास
भए कबीर उदास

कल तक जो था हाल हमारा हाल वही हैं आज
‘जालिब’ अपने देस में सुख का काल वही है आज
फिर भी मोची गेट पे लीडर रोज़ करे बकवास
भए कबीर उदास

ख़तरे में इस्लाम नहीं

ख़तरा है जरदारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को
रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से लज़ी है बया ऐवानों में
बिक न सकेंगे हसरतों अमों ऊँची सजी दुकानों में

ख़तरा है बटमारों को
मग़रिब के बाज़ारों को
चोरों को मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अम्न का परचम लेकर उठो हर इंसाँ से प्यार करो
अपना तो मंशूर1 है ‘जालिब’ सारे जहाँ से प्यार करो

ख़तरा है दरबारों को
शाहों के ग़मख़ारों को
नव्वाबों ग़द्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
1. घोषणा पत्र

मौलाना

बहुत मैंने सुनी है आपकी तक़रीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मेरी तक़दीर मौलाना

खुदारा सब्र की तलकीन1 अपने पास ही रखें
ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से
यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर2 मौलाना

हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने
सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना

ज़मीनें हो वडेरों की, मशीनें हों लुटेरों की
खुदा ने लिख के दी है आपको तहरीर मौलाना

करोड़ों क्यों नहीं मिलकर फ़िलिस्तीं के लिए लड़ते
दुआ ही से फ़क़त कटती नहीं जंजीर मौलाना
1.   उपदेश, 2. पाप

बगिया लहू लुहान

हरियाली को आंखे तरसें बगिया लहू लुहान
प्यार के गीत सुनाऊँ किसको शहर हुए वीरान
बगिया लहू लुहान

डसती हैं सूरज की किरनें चांद जलाए जान
पग पग मौन के गहरे साये जीवन मौत समान
चारों ओर हवा फिरती है लेकर तीर कमान
बगिया लहू लुहान

छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात
और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात
दुनियावालों कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात
ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान
बगिया लहू लुहान

बीस घराने

बीस घराने हैं आबाद
और करोड़ों हैं नाशाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

आज भी हम पर जारी है
काली सदियों की बेदाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

बीस रूपय्या मन आटा
इस पर भी है सन्नाटा
गौहर, सहगल, आदमजी
बने हैं बिरला और टाटा
मुल्क के दुश्मन कहलाते हैं
जब हम करते हैं फ़रियाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

लाइसेंसों का मौसम है
कंवेंशन को क्या ग़म है
आज हुकूमत के दर पर
हर शाही का सर ख़म है
दर्से ख़ुदी देने वालों को
भूल गई इक़बाल की याद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

आज हुई गुंडागर्दी
चुप हैं सिपाही बावर्दी
शम्मे नवाये अहले सुख़न
काले बाग़ ने गुल कर दी
अहले क़फ़स की कैद बढ़ाकर
कम कर ली अपनी मीयाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

ये मुश्ताके इसतम्बूल
क्या खोलूं मैं इनका पोल
बजता रहेगा महलों में
कब तक ये बेहंगम ढोल
सारे अरब नाराज़ हुए हैं
सीटो और सेंटों हैं शाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद
गली गली में जंग हुई
ख़िल्क़त देख के दंग हुई
अहले नज़र की हर बस्ती
जेहल के हाथों तंग हुई
वो दस्तूर1 हमें बख़्शा है
नफ़रत है जिसकी बुनियाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद
1. संविधान

हबीब जालिब की आवाज में कुछ नज्‍म सुनने के लिए क्लिक करें-

http://video.google.com/videoplay?docid=-7992173788748993874#

एक आतंकवादी की मौत और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबे : सुधीर सुमन

अमेरिका द्वारा आसोमा को मारने के लिए की गई कार्रवाई के पीछे की सच्‍चाई को उजागर करता और अमेरिका के नापाक इरादे से भारत के राजनीतिज्ञों को आगाह करता वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का लेख-

ओसामा मारा गया और भारत में एसएमएस वीर सक्रिय हो उठे। मुझे भी इस तरह के एसएमएस मिले, जिनका आशय था कि मुझे आनंदित होना चाहिए। समझ में नहीं आया कि इसमें इतना ज्यादा आनंदित होने की क्या बात है! ओसामा तो वैसे भी कुछ वर्षों से कमजोर पड़ चुका था, और जिसने बनाया उसने मिटा दिया, इसमें मुझे क्यों खुश होना चाहिए? वैसे मारने वाला भी अमेरिका था और घटना का गवाह भी वही और वही उसे समुद्र में दफनाने वाला भी। आज दुनिया यह जानना चाहती है कि ऐसी हड़बड़ी उसे क्यों थी? इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और कई तरह की थ्योरी सामने आ रही हैं, लेकिन मेरे लिए तो बड़ा सवाल यह है कि हमें चिंतित क्यों नहीं होना चाहिए कि अमेरिका एकदम पड़ोस में डेरा डाल चुका है और आतंकवादियों को मिटाने के नाम पर वहां अपनी जड़ें और मजबूत करता जा रहा है।

चलिए, मान लिया कि ओसामा के मास्टर माइंड की वजह से ही अमेरिकी चौधराहट को कायम रखने वाला एक केंद्र- वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह गया था, जिसमें महान अमेरिका के तीन हजार नागरिक मारे गए थे और उसने गुनाहगार को उसके कुकृत्य की वाजिब सजा दे दी। लेकिन मारे गए अमेरिकी नागरिकों के प्रति संवेदना की आड़ लेकर अमेरिकी न्याय के पक्ष में खड़ा कैसे हुआ जा सकता है? जबकि उसके खुद के अन्याय की लंबी फेहरिश्त हमारे सामने है और आज भी उसके द्वारा अन्याय का सिलसिला जारी है। सच तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुनाव से पहले एक उपलब्धि हासिल करने के लिए ही सारे अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून का उल्लंघन करते हुए ओसामा की हत्या की है। ओसामा के हाथ निर्दोषों के खून से सने हुए थे, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन अमेरिकी नेवी सील ने जिस तरह एक लाइसेंसी आपराधिक गिरोह की तरह ओसामा की क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या की है, उससे हम भारतीय लोगों को आह्लादित क्यों होना चाहिए? अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी विचारक नोम चोम्स्की ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ‘‘यह अधिक से अधिक साफ होते जाने से कि यह एक योजनाबद्ध अभियान था, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सबसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन का मामला भी उतना ही गहराता जा रहा है।…. जिन समाजों में कानून को लेकर थोड़ा भी सम्मान होता है, वहां संदिग्धों को पकड़कर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई के लिए पेश किया जाता है। मैं ‘संदिग्ध’ शब्द पर जोर दे रहा हूं।’’ जिस अमेरिका की खुफियागिरी का इतना गौरव-गान हो रहा है, उस अमेरिका से पूछा जाना चाहिए कि जब तालिबान कह रहे थे कि सबूत दो कि ओसामा अफगानिस्तान में है, तब उसने सबूत क्यों नहीं दिए? नोम चोम्स्की तो अमेरिका के इस दावे पर ही संदेह करते हैं कि 9/11 की योजना अलकायदा ने अफगानिस्तान में बैठकर बनाई थी। सच्‍चाई जो भी हो, लेकिन चोम्स्की ने ओसामा की मौत और मौत के बाद की परिस्थितियों का जो आकलन किया है, वह गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘मीडिया में वाशिंगटन के गुस्से के बारे में भी बहुत चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान ने बिन लादेन को उसे नहीं सौंपा, जबकि पक्के तौर पर फौज और सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारी एबटाबाद में उसकी मौजूदगी से वाकिफ थे। पाकिस्तान के गुस्से के बारे में बहुत कम कहा जा रहा है कि अमेरिका ने एक राजनीतिक हत्या के लिए उनकी जमीन में हस्तक्षेप किया। पाकिस्तान में अमेरिका-विरोधी गुस्सा पहले से बहुत है, और इस घटना से वह और बढ़ेगा। जैसा अंदाजा लगाया जा सकता है, लाश को समुद्र में फेंक देने के फैसले ने मुसलिम जगत में गुस्से और संदेह को ही भड़काया है।

हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई इराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुसकर उसकी हत्या कर देता और उसकी लाश अटलांटिक में बहा देता। यह तो निर्विवाद है कि बुश के अपराध बिन लादेन के अपराधों से बहुत अधिक हैं और वह ‘संदिग्ध’ नहीं हैं, बल्कि निर्विवाद रूप से उसने ‘फैसले’ लिये।’’

दरअसल आज अमेरिका के खिलाफ दुनिया में जो नफरत है वह उसके किसी भी दुश्मन को छुपाने का आधार बन सकती है, यह उसे क्यों समझ में नहीं आता? जिस तरह के बदले की कार्रवाई को अमेरिका न्याय की जीत बता रहा है, यही तर्क ओसामा द्वारा किए गए बदले की कार्रवाइयों पर क्यों नहीं लागू हो सकता, आखिर उसे भी ऊर्जा तो अमेरिका द्वारा मुस्लिम देशों में मचाई जा रही तबाही के कारण ही मिल रही थी? बेशक ओसामा साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीति करने वाला कोई राजनेता नहीं था, वह एक जुनूनी और कट्टर मुसलमान था, जेहादी था, लेकिन ओसामा के प्रति जन-समर्थन का आधार क्या सिर्फ इस्लामिक कट्टरपंथ था, क्या महज सांप्रदायिक कट्टरता की वजह से ही लोग उसका समर्थन करते थे। इस सवाल की ओर आमतौर पर आज अमेरिका के प्रायोजित शौर्य में डूबे लोग ध्यान नहीं देना चाहते? ओसामा इस्लाम के विजय की ध्वजा फैलाने निकला कोई मध्ययुगीन शहंशाह तो नहीं था। वह तो कई हुकूमतों के बीच चक्कर लगा रहा था, कुछ दिनों के लिए भी अपनी स्थाई हुकूमत तो उसकी भूगोल के किसी हिस्से में नहीं बन पाई थी। वह बुश या ओबामा की तरह किसी राष्ट्र का प्रतिनिधि भी नहीं था। उसकी ताकत के उभार से लेकर पतन तक कोई ऐसा राष्ट्र सामने नहीं आया, जिसने उसे अपना प्रतिनिधि चेहरा बनाया हो। दरअसल ओसामा बिन लादेन और अलकायदा अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के खिलाफ इस्लामी जगत में हुई जबर्दस्त प्रतिक्रिया के दौर में अमेरिका की सोवियत-विरोधी रणनीति के खतरनाक बाईप्रोडक्ट थे। आज के दौर का जो आतंकवाद है वह प्रायः अमेरिकी रणनीति की सीधी प्रतिक्रिया है, अमेरिका इस पर लगाम नहीं लगा सकता, इसे खत्म नहीं कर सकता, भले ही ओसामा खत्म हो गया हो। कुछ लोग ओसामा के अंत की तुलना हिटलर के अंत और फासीवाद के पराजय से कर रहे हैं। सिर्फ 1 मई को होने वाली मौत की घोषणाओं के कारण की जा रही ये तुलनाएं निराधार हैं। हिटलर का अंत द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत का स्पष्ट संकेत था और दुनिया में फासीवाद के ऐतिहासिक पराजय का भी। लेकिन ओसामा की हत्या न तो आतंकवाद का अंत है और न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद का। जाहिर है इराक, अफगानिस्तान, लिबिया और पाकिस्तान में जो कुछ भी अमेरिका कर रहा है, उससे आतंकवाद पैदा होगा, मिटेगा नहीं। ओसामा की हत्या के चंद रोज बाद ही हाल में सत्ताविरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए चर्चित काहिरा में मुस्लिम-ईसाई दंगों की खबरें आई हैं। जाहिर है इससे अमेरिकी रणनीतिकारों को तो हर्ष ही होगा।

ओसामा की हत्या के बाद मुझे एक दूसरा एसएमएस मिला, जिसमें ग्रेट ओबामा की शान में कशीदे काढ़े गए हैं और यह कल्पना की गई है कि अमेरिका एक दिन पाकिस्तान समेत सारे मुस्लिम राष्ट्रों को ध्वस्त कर देगा। उसमें एक बात और कही गई है कि जिस तरह दुनिया में बुश और ओबामा हैं, उस तरह भारत में नरेंद्र मोदी हैं। भारत में मोदी मिजाज वाले ये तथाकथित राष्ट्रभक्त अब पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी शिविरों को अमेरिकी स्टाइल में ध्वस्त करने की हुंकार भरने लगे हैं? पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका ने बाहर से पाकिस्तानी राष्ट्र पर अचानक हमला नहीं कर दिया है, बल्कि वह तो वहां पाकिस्तानी सरकार की मर्जी से मौजूद है। प्रचार तो यही है कि अमेरिका पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदारी निभा रहा है। और लगता है कि भारत भी इसी तरह की घनिष्ठ साझेदारी के लिए लालायित है, क्योंकि कुख्यात एफबीआई और सीआईए के साथ इसकी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं। इसकी शुरुआत एक दशक पहले एनडीए के शासनकाल में ही हो चुकी थी, जिसकी प्रक्रिया यूपीए के शासनकाल में जोर-शोर से जारी है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि निकट भविष्य में कुछ आतंकवादी घटनाएं भारत में घटें और अमेरिका यहां भी तारणहार बनकर आ जाए। तब किस तरह का आतंकवाद-विरोधी अभियान चलेगा, पाकिस्तान में हो रहे हमलों को देखते हुए इसकी कल्पना की जा सकती है। जो मारे जाएंगे वे आतंकवादी ही होंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होगी। वैसे भी भारत में पिछले दो दशकों में हुई आतंकवादी घटनाओं की गहरी तहकीकात प्रायः नहीं की गई है। अमेरिका की तर्ज पर भारत में भी पूरे मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद के लिए संदेह के घेरे में डाला गया, सैकड़ों बेगुनाह नौजवान फर्जी मुकदमों में फंसाए गए और उन्हें यातनाएं दी गईं, लेकिन उन पर न्यायालय में कोई आरोप साबित नहीं किया जा सका, जिससे सरकारों की भद्द भी पिटी। आखिर जिस देश में करीब तीन हजार लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार नरेंद्र मोदी ठाठ से मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, वहां किस तरह इस्लाम की आड़ में आतंक फैलाने वालों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है? क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद जितने दंगे और सांप्रदायिक कत्लेआम हुए हैं, उसमें मुसलमानों को ज्यादा जानमाल का नुकसान उठाना पड़ा है? ऐसे में अगर कुछ मुसलमान प्रतिक्रिया में आतंकवाद के रास्ते पर चल निकल पड़ते हैं, तो क्या इसके लिए सिर्फ इस्लाम धर्म के बारे में प्रचारित कट्टरता और पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाए?

इतने वर्षों से भारतीय सरकारें चिल्लाती रही हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप चलते हैं और वही आतंकवादियों को धन देता है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि खुद पाकिस्तान के पास धन और हथियार कहां से आते हैं ? जहां से धन आता है, उसका विरोध क्यों नहीं किया जाता? और यदि पाकिस्तान आतंकवाद का पनाहगाह है तो आतंकवादी पाकिस्तान में भी कत्लेआम क्यों मचाए रहते हैं? विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने लादेन की हत्या को ‘ऐतिहासिक’ और ‘मील का पत्थर’ बताते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों में हजारों निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चे इन आतंकवादी गुटों के हाथों मारे गए। विदेश मंत्री का कहना है कि वे अमेरिका पर दबाव डालेंगे। क्या शेखचिल्ली का सपना है! अगर आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान का हाथ है और उसके सिर पर अमेरिका का हाथ है, तो अमेरिका से भारत अपनी यारी तोड़ता क्यों नहीं, क्यों अमेरिका के चारण बनने के लिए हमारे नेता भी बेकरार हैं?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चों की हत्या करने वालों का विरोध ही भारत का मकसद है, तो उसकी उंगली सबसे पहले अमेरिका पर क्यों नहीं उठती? आखिर पाकिस्तान से हमारे देश को ज्यादा खतरा है या अमेरिका से? आतंकवादी क्या हमारे लिए उन अमेरिकापरस्त नीतियों को लागू करने वाले शासकवर्ग से भी ज्यादा खतरनाक हैं जिनकी वजह से लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है? क्या कुछ सिरफिरे आतंकवादियों द्वारा मारे गए लोगों के प्रति संवेदित होना ही काफी है, या उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि भारत में प्राकृतिक संपदा और जीविका के संसाधनों को अमेरिकी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देने का जो खतरनाक खेल चल रहा है, उसका तीखा विरोध किया जाए? क्या अब भीषण लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ उभर रहे जनता के प्रतिरोध का मुकाबला यहां की सरकारें आतंकवाद-विरोधी अभियानों के जरिए करेंगी? छत्तीसगढ़ में तो इसका रंग-रूप हम देख ही रहे हैं। क्या हमारे शासकवर्ग का जो निरंतर अमेरिकीकरण हो रहा है, वह खतरनाक नहीं है?

इस देश की शासकवर्गीय पार्टियां ही नहीं, आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की मीडिया भी तुरंत भूल गई कि ओसामा की हत्या के ठीक एक दिन पहले नाटो ने लिबिया में हमला करके गद्दाफी के सबसे छोटे बेटे सैफ अल अरब और तीन पोतों को मार डाला, जबकि गद्दाफी ने नाटो से बातचीत की पेशकश की थी। इस पर नाटो कमांडर का कहना था कि नाटो ने गद्दाफी के परिवार को नहीं, बल्कि सैन्य ठिकाने को निशाना बनाते हुए हमला किया था। यह एक अपवाद घटना नहीं है, जितना अकेले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोग मारे गए उससे कहीं अधिक बेगुनाह नागरिक अमेरिकी सेना द्वारा हाल के वर्षों में इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जा चुके हैं? आखिर इसकी सजा अमेरिका को क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

ओसामा ऑपरेशन के बाद भारत में 26/11 के मास्टर माइंड लोगों के खिलाफ सीधी कार्रवाई की मांग उठने लगी है। और हद है कि भारतीय सेना और एयरफोर्स के चीफ ने इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान दिए हैं कि भारत भी इसी तरह का ऑपरेशन पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कर सकता है। इस तरह से युद्धोन्माद बढ़ेगा, जो पाकिस्तान को पता नहीं कितना नुकसान पहुंचाएगा, पर अमेरिका को जरूर फायदा दिलाएगा। जबकि भारत को इस वक्त चाहिए कि जो व्यवहार अमेरिका ने पाकिस्तान में किया है, उसके आलोक में वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करे। बेशक भारत पाकिस्तान से आतंकवादियों के प्रत्यर्पण की मांग करे, लेकिन खाली खबर बनाने के लिए उन्हें आतंकवादियों की बड़ी लिस्ट देने के बजाए, कुछ आतंकवादियों के बारे में ठोस सबूत दे। कुछ खुफियागिरी की काबलियत तो हमारी सरकारें भी दिखाएं। ओसामा ऑपरेशन के पहले रेमंड डेविस के मामले में भी पाकिस्तान की संप्रभुता और आजादी का माखौल उसके साझेदार अमेरिका ने खुलकर उड़ाया। दो बेगुनाह पाकिस्तानी नागरिकों की दिनदहाड़े हत्या करने वाले इस सीआईए एजेंट को पाकिस्तान में कोई दंड नहीं मिला। ओबामा ने बाकायदा पाकिस्तान पर दबाव डाला और कहा कि वह अमेरिकी राजनयिक था, इसलिए उस पर स्थानीय कानून के अनुसार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब तो अमेरिका के सारे सहयोगियों और उसके साथ गलबहियां होने को आतुर भारत को सावधान हो जाना चाहिए। आतंकवाद और साम्राज्यवाद एक समान खतरे हैं पाकिस्तान और भारत के लिए। इसका सामना इन देशों को खुद मिलकर करना होगा। अमेरिका को दक्षिण एशिया से बाहर खदेड़ना बेहद जरूरी है, वर्ना उसकी बर्बरता का अखाड़ा यह इलाका बनेगा और मध्यपूर्व की तरह हमें भी भीषण तबाही झेलनी पड़ेगी।

अमेरिकी सेना किसी आतंक-वातंक को मिटाने और स्वतंत्रता व लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी ही नहीं है, बल्कि अमेरिकी पूंजी के विस्तार और दुनिया के संसाधनों की लूट को ध्यान में रखकर ही उसका इस्तेमाल किया जाता है, आखिर इस सच से आंखों को कैसे मूंदा जा सकता है? जिन खतरों का प्रचार करके उसने इराक पर हमला किया और सद्दाम हुसैन की हत्या की, वे प्रचार तो सही साबित नहीं हुए। कोई रासायनिक हथियार तो नहीं मिला। बल्कि दुनिया के अधिकांश लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि खाड़ी में अमेरिकी आतंक का मकसद क्या है? क्या महज तेल पर अपने वर्चस्व के लिए ही उसने मध्यपूर्व में सीधे सैनिक हमलों और प्रतिबंधों के जरिए लाखों लोगों की हत्या नहीं की है? जब तक अमेरिकी साम्राज्यवाद है, क्या हम दुनिया में अमन की उम्मीद कर सकते हैं? ओसामा जैसों से लाख गुना खतरनाक है अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसके कारनामों की विस्तार से चर्चा करती और अमेरिकी नागरिकों की मौतों के प्रति संवेदित लोगों को संबोधित करती एम्मानुएल ओर्तीज की लंबी कविता- ‘एक मिनट का मौन’ के साथ मैं इस लेख को समाप्त करना चाहता हूं। यह कविता 9/11 की घटना के बाद लिखी गई थी। कवि असद जैदी ने इसका अनुवाद किया है-

एक मिनट का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूं
मेरी गुजारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितंबर को वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सबके लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, कैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफगानिस्तान के मजलूमों और अमेरिकी मजलूमों के लिए
और अगर आप इजाजत दें तो
एक पूरे दिन का मौन
हजारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज
इस्राइली फौजों ने अमरीकी सरपस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पंद्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लंबी घेराबंदी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
दो महीने का मौन दक्षिण अफ्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया।
नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहां मौत बरसी
चमड़ी, जमीन, फौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहां बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन वियतनाम के लाखों मुर्दों के लिए….
कि वियतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है…..
एक साल का मौन कंबोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे…. और जरा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं।
दो महीने का मौन
कोलंबिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए  और जबान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं।
एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासियों के लिए
जिन्हें अपनी जिंदगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी कब्रें समुंदर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुंबी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकार्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम
एक सदी का मौन
यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिंदों के लिए
जिनकी जमीनें और जिंदगियां उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्टकार्ड से मनोरम खित्तों में…..
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालन टिंबर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुंबकीय काव्य-पंक्तियां भर हैं।
तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा
जबकि हम बेआवाज हैं
हमारे मुंहों से खींच ली गई हैं जबानें
हमारी आंखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको गम है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।
क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।
यह कविता उन चीजों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर:
यह सितंबर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितंबर 12, 1977 दक्षिण अफ्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितंबर 1971 और एटिका जेल, न्यूयार्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।
यह कविता सोमालिया, सितंबर 14, 1992 के बारे में है।
यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुंछ रही है और मिट जाया करती है
यह कविता उन 110 कहानियों के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं,
110 कहानियां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई जिक्र नही पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स और न्यूजवीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन:
बिना निशान की कब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएं
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए खामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढंक जाएं
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पंप
बंद कर दो इंजन और टेलिविजन
डूबा दो समुद्र सैर वाले जहाज
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सारे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर्र ईंट मारो,
और वहां के मजदूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्ले बॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ‘सुपर बॉल’ इतवार के दिन
फोर्थ ऑफ जुलाई के रोज
डेटन की विराट 13 घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफे जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों

और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।
अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।
(11 सितंबर, 2002)

जाहिर है कि 9/11 की घटना के लिए अमेरिका द्वारा दोषी करार दिए गए ओसामा की हत्या के बाद भी अमेरिका से यारी बढ़ाने की बजाए उसकी शैतानियत की लंबी फेहरिश्त के मद्देनजर उसके वास्तविक मंसूबों पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी है। आतंकवाद की सचाइयों और साम्राज्यवाद के साथ उसके रिश्ते के आधार को जानना-समझना भी जरूरी है, जैसा कि फिल्मकार माइकल मूर ने अपनी बेहद लोकप्रिय डाक्यूमेंट्री फैरेनहाइट 9/11 में इसका खुलासा किया था कि किस तरह बुश और ओसामा के खानदान के बीच तेल के धंधे में साझीदारी थी। और उनके बीच टकराव में इस धंधे की भी बड़ी भूमिका रही। एक बाद तो तय है कि ओसामा जैसों का आतंकवाद दुनिया से साम्राज्यवाद का नाश नहीं कर सकता और अमेरिकी साम्राज्यवाद जब तक रहेगा तब तक आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता।

कश्मीर को बनाया जा रहा है, प्रेत-प्रश्‍न : प्रभु जोशी

कश्‍मीर की संवदेशनशीलता को समाने रख वहां से सेना को हटाए जाने का वि‍रोध कर रहे हैं वरि‍ष्‍ठ पत्रकार और लेखक प्रभु जोशी-

अब हमें यह स्वीकारने में कोई शर्म नहीं अनुभव होना चाहिए कि भारत एक निहायत ही कमजोर बौद्धिक आधार वाला बावला समाज है, जिसे इन दिनों ‘उदारीकरण’ के उन्माद ने ऐसे गुब्बारे में बदल दिया है, जिसकी हवा किसी भी दिन आसानी से निकाली जा सकती है। बस इतना भर मान लेना चाहिए कि चूंकि अमेरिका उसे एक बड़े बाजार के रूप में देख रहा है, इसलिए उसका ‘फुगावा’, हाथी के उन दांतों की तरह बाहर दिख रहा है, जिनसे खाने का काम लेना असंभव है।

यहां यह नहीं भूल जाना चाहिए कि ‘रिंग-काम्बिनेशन‘ की तरह ख्यात सूचना के निर्माण, विपणन और वितरण वाली कम्पनियों द्वारा धीरे-धीरे उसे एक खोखले मुगालते में उतार दिया गया है कि वह इस भूमण्डलीकृत विश्‍व में स्वयं को सूचना-प्रौद्योगिकी का महारथी समझने लगा है, जबकि हकीकतन उसकी हैसियत स्वर्णाभूषणों की दूकानों के बाहर बैठे रहने वाले उन कारीगरों की-सी है, जो गहने चमकाने का काम करते हैं। दरअस्ल, माइक्रोसाफ्ट उत्पाद अमेरिका बनाता है और भारत उसको महज अपडेट करने की कारीगरी करता है। जहां तक चीन का सवाल है, उसके सामने इसकी हैसियत उस आत्मग्रस्त ऊंट की तरह है, जिसमें पहाड़ की तरफ देखने वाली सहज बुद्धि का अकाल पड़ गया है। उसकी सरकार भी देश की भूख और भूगोल को भूल कर भुलावे को ऐसी भोंगली में घुस गयी है, जहां से वह सिर्फ स्टाक एक्सचेंज के ग्राफ में डुंकरते साण्डे के सींगों के सहारे अर्थ-व्यवस्था में उछाल की उम्मीद करती रहती है। उसकी सफलता के सारे सूत्र ‘विकास दर’ के दरदराते नांदीपाठ में समाहित हैं। वह लगातार ‘बाजार-निर्मित आशावाद‘ के आधार पर यह प्रचारित कर रही है कि जल्दी ही आंकड़ा दस के पार हुआ कि वह मंदी की मारामारी में भी महाबली हो जायेगा, लेकिन असलियत यह कि वह बली नहीं, निर्बली है। इसका प्रमाण कश्मीर के मुद्दे पर उसकी सत्ता के कर्णधारों के वे उदगार हैं, जो सांध्यभाषा में मूलतः लीपापोती की लीला में लगे हुए हैं।

उहोंने जैसे अपनी भू-राजनीतिक समझ को ताक पर रखकर घाटी में फैलती आग के आगे पर्दा खींच दिया है- और उस पर्दे पर वह गरीब भारत के हिस्से की पूंजी को फूंकता हुआ, इण्डिया के जश्‍न, जोश और जुनून में है। उसके कानों में अभी तक एक ही धुन गूंजती रही है, जिसमें इंडिया के बुलाये जाने का खेलराग है। जबकि कूटनीति के कुरूक्षेत्र में असली खेल चीन का चल रहा है, जिसकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। पिछले दिनों जब कश्मीर की राजनीति के युवराज ने लगभग हड़काऊ शैली में यह कह दिया कि कश्मीर को बार-बार भारत का अभिन्न अंग बताने के होहल्ले की जरूरत नहीं है, कश्मीर का भारत में ‘विलय‘ नहीं हुआ है, तो सत्ताधीशों द्वारा उल्टे मीडिया को कोसना शुरू हो गया कि वे उमर की सहज-सरल बात को बतंगड़ बनाये दे रहे हैं ताकि वह ‘भड़़काऊ‘ बन सके। वह तो विलय संबंधी ऐतिहासिक करार की तरफ इशारा भर कर रहे हैं। निश्‍चय ही यह समझ से परे है कि वे ऐसी भोली भाषा के आवरण में उमर की टिप्पणी के भीतर लपट बन सकने वाली चिनगारी को क्यों छुपा रहे हैं ? जबकि, उमर ‘इतिहास के प्रेत’ को फिर से जगाने की कोशिश कर रहे हैं। यह उनके दादा की आंख में जीवन भर अर्द्धमृत से दफ्न स्वप्न में पूर्ण प्राण फूंकने की दबी हुई इच्छा का सिर उठाना ही है। क्योंकि उनके दादा ने भी नेहरू से मैत्री के बावजूद सन् तिरेपन के आसपास आजाद कश्मीर का मामला उठ पड़ा था। कहने की जरूरत नहीं कि यह ऐसे ही नहीं हो गया कि उमर के दो वर्षीय शासन के दौरान ही ऐसा पहली बार हुआ कि छोटे-छोटे मासूम से दिखाई देने वाले किशारों तक के हाथों में पत्थर आ गये। उमर ने अपनी टिप्पणी में साफ लफ्जों में यह कह दिया कि कश्मीर के युवाओं द्वारा हिंस्र रास्ता चुन लेने के पीछे आर्थिक और बेरोजगारी जैसे कारण नहीं है। यह शत-प्रतिशत सही भी है कि क्योंकि कश्मीर को पैकेज के रूप में केन्द्र अपना खजाना उदारता से उलीचता रहा है। सन् 89 से अभी तक वह अस्सी हजार करोड़ रूपये दे चुका है, जिसमें से लगभग सत्तर हजार करोड़ के खर्च का राज्य के पास कोई हिसाब-किताब ही नहीं है कि वह कहां और कैसे खर्च किया गया। और सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल की अनुशंसा पर प्रधानमंत्री सौ करोड़ के पैकेज की घोषणा पहले ही कर चुके हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘कन्ज्यूमरिज्म‘ की वकालत करने वाली हमारी इस सरकार को यह इलहाम हो चुका हो कि वह कश्मीर में शांति और साम्प्रदायिक-सौहार्द्र का इस तरह से पूंजी के बल पर सुरक्षित सौदा पटा लेगी। वह कदाचित यह भूल चुकी है कि कश्मीर अब देश का परम्परागत अर्थों में राज्य नहीं बल्कि अलगाववादियों की सुनियोजित रणनीति ने उसे एक इस्लामिक इथनोस्केप में बदल दिया है। गैर-मुस्लिम आबादी के प्रतिशत को हिंसात्मक कार्यवाही से नृशंस अलगाववादियों ने जैसे ही कम किया, उसके अंदर शत-प्रतिशत की उतावली इतनी बढ़ चुकी है कि वे कश्मीरी पण्डितों के पश्‍चात अब सिक्खों को भी कश्मीर से खदेड़ कर बाहर कर देना चाहते हैं। उन्हें पैकेज नहीं भूगोल के बंटवारे के साथ पूरी आजादी चाहिए। अब वे जर्जर हो चुके पाकिस्तान के बलबूते नहीं, चीन के पाकिस्तान पर बढ़े वरदहस्त में संभावना देख रहे हैं। क्योंकि, चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है और उसे वह उत्तरी पाकिस्तान कहता है। हाल ही में अमेरिका ने वहां लगभग दस हजार चीनी सैनिकों की उपस्थिति के बारे में सूचना दी थी, हालांकि चीन ने इसके प्रति उत्तर में कहा कि वह वहां बाढ़ की संकटग्रस्त स्थिति में मानवीय मदद के लिए पहुचा है, लेकिन ये कूटनीतिक झूठ हैं। उसकी पूरी रूचि सामरिक आधार की वजह से है। उन्होंने पाकिस्तान और चीन के बीच आमदरफ्त के लिए कराकोरम राजमार्ग पूरा कर लिया है- स्मरण रहे यह वही इलाका है, जिसे पाकिस्तान ने जंग के जरिये हमसे हथियाया और सड़क निर्माण हेतु चीन के जिम्मे कर दिया। यह एक तरह से उस क्षेत्र का सामरिक हस्तान्तरण है।

बेचारे जॉर्ज फर्नांडिस ने केन्द्र में रक्षामंत्री रहते हुए एक दफा यह कह भर दिया था, जो कि शत-प्रतिशत सही भी था कि पाकिस्तान नहीं, हमारा पहले नम्बर का शत्रु तो चीन है। लेकिन, इस वक्तव्य से हंगामा मच गया। हालांकि यह एक रक्षामंत्री की कूटनीतिक दृष्टि से एक असावधान टिप्पणी थी, लेकिन वही हमरी सीमाओं का कटु सत्य भी था और है भी उसने पिछले एक दशक में अपनी कूटनीतिक हैसियत ऐसी बना ली है कि हमारे सारे पड़ोसी अर्थात् नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार भी पूरी तरह से चीन की छत्रछाया में जा चुके हैं। सामरिक स्तर पर आज भारत एकदम अकेला है और परिणामस्वरूप वह बार-बार कश्मीर के बारे में जबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। कश्मीर के मुद्दे पर अभी तक रूस की तरह कोई मुल्क स्पष्ट पक्षधरता के साथ नहीं है।

मुझे याद है, बीबीसी आज तक के हमारे कश्मीर को अपने प्रसारणें में भारत अधिकृत कश्मीर कहता है। एकदफा दिल्ली की एक कार्यशाला में आये बीबीसी एक प्रोड्यूसर से मैंने बीबीसी की बहु-प्रचारित तटस्थता की नीति के विरूद्ध टिप्पणी करते हुए अपनी आपत्ति दर्ज की कि जिस निष्पक्ष प्रसारण की आप बात करते हैं, मैं पूछना चाहता हूं कि फॉकलैण्ड के युद्ध के समय बीबीसी ने फॉकलैण्ड में श्रीमती मार्गट थेचर की कार्यवाही के विरोध में एक भी शब्द नहीं कहा। कश्मीर के मामले में बीबीसी हमेशा थोड़ा बहुत भू-भाग ले देकर झगड़ा निपटाने की बात करता है, लेकिन क्या आपने अभी तक फॉकलैण्ड के बारे में सोचा, जिस पर आपने अब तक अपना कब्जा नहीं छोड़ा है, जबकि वह ब्रिटेन से लगभग ढाई हजार किलोमीटर दूर है। और आप साढ़े सात सौ साल से वहां लड़़ रहे हैं ? कश्मीर के संदर्भ में जब-तब इमनेस्टी इंटरनेशनल के बहाने से भारत की भर्त्सना की जाती रही है।

बहरहाल, कश्मीर में जिस तरह की स्थिति बन चुकी है, भारत को पश्‍चि‍म के नैतिकतावाद के झांसे में आकर मुल्क को एक बार फिर विखण्डन की ओर धकेलने की सोचना भी नहीं चाहिए। एमनेस्टी इंटरनेशनल भारत को अपनी रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए धिक्कारती रहे, लेकिन हमने उसे यह तय करने का अधिकार कतई नहीं दिया है कि वह हमारी भू-राजनीति समस्या को बढ़ा कर अधिक विराट बनाते हुए, पाकिस्तान के पक्ष में परोक्ष आधार गढ़ती रहे।

पश्‍चि‍म की प्रेस में जख्मी जहन और आंसूतोड़ भाषा में लिखे गये लेखों से जो मानवतावादी रूदन भारत की भर्त्सना में चलता है, और ये ही लोग है, जिसने भारत के अभिन्न भूभाग को ग्रीस-तुर्की, जर्मनी-चेकोस्लोवा किया, पौलेण्ड-जर्मनी, बोसनिया-सर्बिया ही नहीं, क्यूबा और अमेरिका की तरह व्याख्यायित करने की धूर्तता शुरू कर रखी है। हमें इस तरह की व्याख्याओं के दबाव में आकर भारतीय सेना को कश्मीर से हटाये जाने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए। क्योंकि कश्मीर एक बहुत संवेदनशील राज्य नहीं बल्कि खासा विस्फोटक सीमावर्ती राज्य है, जहां से सेना के हटाने का अर्थ कश्मीर को भारत से अलग करने की पूरी गारंटी दे देना है। यहां तक कि वहां सीमित स्वायत्ता की बात करना यानी दृष्टिहीन राजनीति के द्वारा रचा जाने वाला ‘पैराडाइज लास्ट‘ ही होगा।

यह एल्विन टॉफलर द्वारा सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में बड़े राष्ट्रों के विघटन की जो भविष्योक्ति अपनी पुस्तक ‘तीसरी लहर‘ में की गयी थी, वह सच हो जायेगी। क्योंकि, रूस में सबसे पहले आर्मेनिया में ही उथल-पुथल शुरू हुई थी। तब किसी पता था कि एक दिन महाशक्ति की तरह जाने वाला रूस मात्र दस वर्षों के भीतर सोलह टुकड़ों में विखण्डित हो जायेगा। लेकिन नब्बे के दशक में अचानक गोर्बाचोव नामक एक जनप्रिय नेता का उदय होता है और वह ‘ग्लासनोस्त‘ तथा ‘पेरोस्त्रोइका‘ जैसी उदारवादी धारणाओं को नवोन्मेष के नाम पर लागू करता है, जिसके चलते ‘आधार‘ (बेस) में परिवर्तन होता है और ‘अधिरचना‘ (सुपर स्ट्रक्चर) ढह जाती है। हमारे यहां भी परिवर्तन की शुरूआत ‘आधार’ में की गई और अभी हमारी सारी ‘अधिरचना’ की चूलें हिल चुकी हैं। एक चौतरफा बदहवासी है, भूख है, बढ़ती बेरोजगारी है, खाद्य सामग्री महंगाई है- भ्रष्टाचार की दर ऊंची है और विकास के ग्राफ की असमानता है, इसीलिए अब हमें हमारा बुन्देलखण्ड, हमारा बघेलखण्ड चाहिए। ऐसी मांगों के बीच यदि कश्मीर को स्वायत्ता देने की ओर हम बढ़ते हैं तो बहुत जल्दी भारत भी बहुवचन में बदल जायेगा।

निश्‍चय ही इसके टुकड़े रूस से कहीं ज्यादा होंगे। हम चाहेंगे कि ऐसे सोच से हमारी सरकार दूर ही रहे। क्योंकि, हम कभी नहीं चाहेंगे कि वक्त एक दिन इतिहास के सफों पर मनमोहन सिंह को पगड़ी में गोर्बाचोव कहने को मजबूर हो जाये।