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एक आतंकवादी की मौत और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबे : सुधीर सुमन

अमेरिका द्वारा आसोमा को मारने के लिए की गई कार्रवाई के पीछे की सच्‍चाई को उजागर करता और अमेरिका के नापाक इरादे से भारत के राजनीतिज्ञों को आगाह करता वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का लेख-

ओसामा मारा गया और भारत में एसएमएस वीर सक्रिय हो उठे। मुझे भी इस तरह के एसएमएस मिले, जिनका आशय था कि मुझे आनंदित होना चाहिए। समझ में नहीं आया कि इसमें इतना ज्यादा आनंदित होने की क्या बात है! ओसामा तो वैसे भी कुछ वर्षों से कमजोर पड़ चुका था, और जिसने बनाया उसने मिटा दिया, इसमें मुझे क्यों खुश होना चाहिए? वैसे मारने वाला भी अमेरिका था और घटना का गवाह भी वही और वही उसे समुद्र में दफनाने वाला भी। आज दुनिया यह जानना चाहती है कि ऐसी हड़बड़ी उसे क्यों थी? इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और कई तरह की थ्योरी सामने आ रही हैं, लेकिन मेरे लिए तो बड़ा सवाल यह है कि हमें चिंतित क्यों नहीं होना चाहिए कि अमेरिका एकदम पड़ोस में डेरा डाल चुका है और आतंकवादियों को मिटाने के नाम पर वहां अपनी जड़ें और मजबूत करता जा रहा है।

चलिए, मान लिया कि ओसामा के मास्टर माइंड की वजह से ही अमेरिकी चौधराहट को कायम रखने वाला एक केंद्र- वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह गया था, जिसमें महान अमेरिका के तीन हजार नागरिक मारे गए थे और उसने गुनाहगार को उसके कुकृत्य की वाजिब सजा दे दी। लेकिन मारे गए अमेरिकी नागरिकों के प्रति संवेदना की आड़ लेकर अमेरिकी न्याय के पक्ष में खड़ा कैसे हुआ जा सकता है? जबकि उसके खुद के अन्याय की लंबी फेहरिश्त हमारे सामने है और आज भी उसके द्वारा अन्याय का सिलसिला जारी है। सच तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुनाव से पहले एक उपलब्धि हासिल करने के लिए ही सारे अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून का उल्लंघन करते हुए ओसामा की हत्या की है। ओसामा के हाथ निर्दोषों के खून से सने हुए थे, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन अमेरिकी नेवी सील ने जिस तरह एक लाइसेंसी आपराधिक गिरोह की तरह ओसामा की क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या की है, उससे हम भारतीय लोगों को आह्लादित क्यों होना चाहिए? अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी विचारक नोम चोम्स्की ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ‘‘यह अधिक से अधिक साफ होते जाने से कि यह एक योजनाबद्ध अभियान था, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सबसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन का मामला भी उतना ही गहराता जा रहा है।…. जिन समाजों में कानून को लेकर थोड़ा भी सम्मान होता है, वहां संदिग्धों को पकड़कर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई के लिए पेश किया जाता है। मैं ‘संदिग्ध’ शब्द पर जोर दे रहा हूं।’’ जिस अमेरिका की खुफियागिरी का इतना गौरव-गान हो रहा है, उस अमेरिका से पूछा जाना चाहिए कि जब तालिबान कह रहे थे कि सबूत दो कि ओसामा अफगानिस्तान में है, तब उसने सबूत क्यों नहीं दिए? नोम चोम्स्की तो अमेरिका के इस दावे पर ही संदेह करते हैं कि 9/11 की योजना अलकायदा ने अफगानिस्तान में बैठकर बनाई थी। सच्‍चाई जो भी हो, लेकिन चोम्स्की ने ओसामा की मौत और मौत के बाद की परिस्थितियों का जो आकलन किया है, वह गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘मीडिया में वाशिंगटन के गुस्से के बारे में भी बहुत चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान ने बिन लादेन को उसे नहीं सौंपा, जबकि पक्के तौर पर फौज और सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारी एबटाबाद में उसकी मौजूदगी से वाकिफ थे। पाकिस्तान के गुस्से के बारे में बहुत कम कहा जा रहा है कि अमेरिका ने एक राजनीतिक हत्या के लिए उनकी जमीन में हस्तक्षेप किया। पाकिस्तान में अमेरिका-विरोधी गुस्सा पहले से बहुत है, और इस घटना से वह और बढ़ेगा। जैसा अंदाजा लगाया जा सकता है, लाश को समुद्र में फेंक देने के फैसले ने मुसलिम जगत में गुस्से और संदेह को ही भड़काया है।

हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई इराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुसकर उसकी हत्या कर देता और उसकी लाश अटलांटिक में बहा देता। यह तो निर्विवाद है कि बुश के अपराध बिन लादेन के अपराधों से बहुत अधिक हैं और वह ‘संदिग्ध’ नहीं हैं, बल्कि निर्विवाद रूप से उसने ‘फैसले’ लिये।’’

दरअसल आज अमेरिका के खिलाफ दुनिया में जो नफरत है वह उसके किसी भी दुश्मन को छुपाने का आधार बन सकती है, यह उसे क्यों समझ में नहीं आता? जिस तरह के बदले की कार्रवाई को अमेरिका न्याय की जीत बता रहा है, यही तर्क ओसामा द्वारा किए गए बदले की कार्रवाइयों पर क्यों नहीं लागू हो सकता, आखिर उसे भी ऊर्जा तो अमेरिका द्वारा मुस्लिम देशों में मचाई जा रही तबाही के कारण ही मिल रही थी? बेशक ओसामा साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीति करने वाला कोई राजनेता नहीं था, वह एक जुनूनी और कट्टर मुसलमान था, जेहादी था, लेकिन ओसामा के प्रति जन-समर्थन का आधार क्या सिर्फ इस्लामिक कट्टरपंथ था, क्या महज सांप्रदायिक कट्टरता की वजह से ही लोग उसका समर्थन करते थे। इस सवाल की ओर आमतौर पर आज अमेरिका के प्रायोजित शौर्य में डूबे लोग ध्यान नहीं देना चाहते? ओसामा इस्लाम के विजय की ध्वजा फैलाने निकला कोई मध्ययुगीन शहंशाह तो नहीं था। वह तो कई हुकूमतों के बीच चक्कर लगा रहा था, कुछ दिनों के लिए भी अपनी स्थाई हुकूमत तो उसकी भूगोल के किसी हिस्से में नहीं बन पाई थी। वह बुश या ओबामा की तरह किसी राष्ट्र का प्रतिनिधि भी नहीं था। उसकी ताकत के उभार से लेकर पतन तक कोई ऐसा राष्ट्र सामने नहीं आया, जिसने उसे अपना प्रतिनिधि चेहरा बनाया हो। दरअसल ओसामा बिन लादेन और अलकायदा अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के खिलाफ इस्लामी जगत में हुई जबर्दस्त प्रतिक्रिया के दौर में अमेरिका की सोवियत-विरोधी रणनीति के खतरनाक बाईप्रोडक्ट थे। आज के दौर का जो आतंकवाद है वह प्रायः अमेरिकी रणनीति की सीधी प्रतिक्रिया है, अमेरिका इस पर लगाम नहीं लगा सकता, इसे खत्म नहीं कर सकता, भले ही ओसामा खत्म हो गया हो। कुछ लोग ओसामा के अंत की तुलना हिटलर के अंत और फासीवाद के पराजय से कर रहे हैं। सिर्फ 1 मई को होने वाली मौत की घोषणाओं के कारण की जा रही ये तुलनाएं निराधार हैं। हिटलर का अंत द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत का स्पष्ट संकेत था और दुनिया में फासीवाद के ऐतिहासिक पराजय का भी। लेकिन ओसामा की हत्या न तो आतंकवाद का अंत है और न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद का। जाहिर है इराक, अफगानिस्तान, लिबिया और पाकिस्तान में जो कुछ भी अमेरिका कर रहा है, उससे आतंकवाद पैदा होगा, मिटेगा नहीं। ओसामा की हत्या के चंद रोज बाद ही हाल में सत्ताविरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए चर्चित काहिरा में मुस्लिम-ईसाई दंगों की खबरें आई हैं। जाहिर है इससे अमेरिकी रणनीतिकारों को तो हर्ष ही होगा।

ओसामा की हत्या के बाद मुझे एक दूसरा एसएमएस मिला, जिसमें ग्रेट ओबामा की शान में कशीदे काढ़े गए हैं और यह कल्पना की गई है कि अमेरिका एक दिन पाकिस्तान समेत सारे मुस्लिम राष्ट्रों को ध्वस्त कर देगा। उसमें एक बात और कही गई है कि जिस तरह दुनिया में बुश और ओबामा हैं, उस तरह भारत में नरेंद्र मोदी हैं। भारत में मोदी मिजाज वाले ये तथाकथित राष्ट्रभक्त अब पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी शिविरों को अमेरिकी स्टाइल में ध्वस्त करने की हुंकार भरने लगे हैं? पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका ने बाहर से पाकिस्तानी राष्ट्र पर अचानक हमला नहीं कर दिया है, बल्कि वह तो वहां पाकिस्तानी सरकार की मर्जी से मौजूद है। प्रचार तो यही है कि अमेरिका पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदारी निभा रहा है। और लगता है कि भारत भी इसी तरह की घनिष्ठ साझेदारी के लिए लालायित है, क्योंकि कुख्यात एफबीआई और सीआईए के साथ इसकी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं। इसकी शुरुआत एक दशक पहले एनडीए के शासनकाल में ही हो चुकी थी, जिसकी प्रक्रिया यूपीए के शासनकाल में जोर-शोर से जारी है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि निकट भविष्य में कुछ आतंकवादी घटनाएं भारत में घटें और अमेरिका यहां भी तारणहार बनकर आ जाए। तब किस तरह का आतंकवाद-विरोधी अभियान चलेगा, पाकिस्तान में हो रहे हमलों को देखते हुए इसकी कल्पना की जा सकती है। जो मारे जाएंगे वे आतंकवादी ही होंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होगी। वैसे भी भारत में पिछले दो दशकों में हुई आतंकवादी घटनाओं की गहरी तहकीकात प्रायः नहीं की गई है। अमेरिका की तर्ज पर भारत में भी पूरे मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद के लिए संदेह के घेरे में डाला गया, सैकड़ों बेगुनाह नौजवान फर्जी मुकदमों में फंसाए गए और उन्हें यातनाएं दी गईं, लेकिन उन पर न्यायालय में कोई आरोप साबित नहीं किया जा सका, जिससे सरकारों की भद्द भी पिटी। आखिर जिस देश में करीब तीन हजार लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार नरेंद्र मोदी ठाठ से मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, वहां किस तरह इस्लाम की आड़ में आतंक फैलाने वालों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है? क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद जितने दंगे और सांप्रदायिक कत्लेआम हुए हैं, उसमें मुसलमानों को ज्यादा जानमाल का नुकसान उठाना पड़ा है? ऐसे में अगर कुछ मुसलमान प्रतिक्रिया में आतंकवाद के रास्ते पर चल निकल पड़ते हैं, तो क्या इसके लिए सिर्फ इस्लाम धर्म के बारे में प्रचारित कट्टरता और पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाए?

इतने वर्षों से भारतीय सरकारें चिल्लाती रही हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप चलते हैं और वही आतंकवादियों को धन देता है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि खुद पाकिस्तान के पास धन और हथियार कहां से आते हैं ? जहां से धन आता है, उसका विरोध क्यों नहीं किया जाता? और यदि पाकिस्तान आतंकवाद का पनाहगाह है तो आतंकवादी पाकिस्तान में भी कत्लेआम क्यों मचाए रहते हैं? विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने लादेन की हत्या को ‘ऐतिहासिक’ और ‘मील का पत्थर’ बताते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों में हजारों निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चे इन आतंकवादी गुटों के हाथों मारे गए। विदेश मंत्री का कहना है कि वे अमेरिका पर दबाव डालेंगे। क्या शेखचिल्ली का सपना है! अगर आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान का हाथ है और उसके सिर पर अमेरिका का हाथ है, तो अमेरिका से भारत अपनी यारी तोड़ता क्यों नहीं, क्यों अमेरिका के चारण बनने के लिए हमारे नेता भी बेकरार हैं?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चों की हत्या करने वालों का विरोध ही भारत का मकसद है, तो उसकी उंगली सबसे पहले अमेरिका पर क्यों नहीं उठती? आखिर पाकिस्तान से हमारे देश को ज्यादा खतरा है या अमेरिका से? आतंकवादी क्या हमारे लिए उन अमेरिकापरस्त नीतियों को लागू करने वाले शासकवर्ग से भी ज्यादा खतरनाक हैं जिनकी वजह से लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है? क्या कुछ सिरफिरे आतंकवादियों द्वारा मारे गए लोगों के प्रति संवेदित होना ही काफी है, या उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि भारत में प्राकृतिक संपदा और जीविका के संसाधनों को अमेरिकी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देने का जो खतरनाक खेल चल रहा है, उसका तीखा विरोध किया जाए? क्या अब भीषण लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ उभर रहे जनता के प्रतिरोध का मुकाबला यहां की सरकारें आतंकवाद-विरोधी अभियानों के जरिए करेंगी? छत्तीसगढ़ में तो इसका रंग-रूप हम देख ही रहे हैं। क्या हमारे शासकवर्ग का जो निरंतर अमेरिकीकरण हो रहा है, वह खतरनाक नहीं है?

इस देश की शासकवर्गीय पार्टियां ही नहीं, आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की मीडिया भी तुरंत भूल गई कि ओसामा की हत्या के ठीक एक दिन पहले नाटो ने लिबिया में हमला करके गद्दाफी के सबसे छोटे बेटे सैफ अल अरब और तीन पोतों को मार डाला, जबकि गद्दाफी ने नाटो से बातचीत की पेशकश की थी। इस पर नाटो कमांडर का कहना था कि नाटो ने गद्दाफी के परिवार को नहीं, बल्कि सैन्य ठिकाने को निशाना बनाते हुए हमला किया था। यह एक अपवाद घटना नहीं है, जितना अकेले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोग मारे गए उससे कहीं अधिक बेगुनाह नागरिक अमेरिकी सेना द्वारा हाल के वर्षों में इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जा चुके हैं? आखिर इसकी सजा अमेरिका को क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

ओसामा ऑपरेशन के बाद भारत में 26/11 के मास्टर माइंड लोगों के खिलाफ सीधी कार्रवाई की मांग उठने लगी है। और हद है कि भारतीय सेना और एयरफोर्स के चीफ ने इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान दिए हैं कि भारत भी इसी तरह का ऑपरेशन पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कर सकता है। इस तरह से युद्धोन्माद बढ़ेगा, जो पाकिस्तान को पता नहीं कितना नुकसान पहुंचाएगा, पर अमेरिका को जरूर फायदा दिलाएगा। जबकि भारत को इस वक्त चाहिए कि जो व्यवहार अमेरिका ने पाकिस्तान में किया है, उसके आलोक में वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करे। बेशक भारत पाकिस्तान से आतंकवादियों के प्रत्यर्पण की मांग करे, लेकिन खाली खबर बनाने के लिए उन्हें आतंकवादियों की बड़ी लिस्ट देने के बजाए, कुछ आतंकवादियों के बारे में ठोस सबूत दे। कुछ खुफियागिरी की काबलियत तो हमारी सरकारें भी दिखाएं। ओसामा ऑपरेशन के पहले रेमंड डेविस के मामले में भी पाकिस्तान की संप्रभुता और आजादी का माखौल उसके साझेदार अमेरिका ने खुलकर उड़ाया। दो बेगुनाह पाकिस्तानी नागरिकों की दिनदहाड़े हत्या करने वाले इस सीआईए एजेंट को पाकिस्तान में कोई दंड नहीं मिला। ओबामा ने बाकायदा पाकिस्तान पर दबाव डाला और कहा कि वह अमेरिकी राजनयिक था, इसलिए उस पर स्थानीय कानून के अनुसार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब तो अमेरिका के सारे सहयोगियों और उसके साथ गलबहियां होने को आतुर भारत को सावधान हो जाना चाहिए। आतंकवाद और साम्राज्यवाद एक समान खतरे हैं पाकिस्तान और भारत के लिए। इसका सामना इन देशों को खुद मिलकर करना होगा। अमेरिका को दक्षिण एशिया से बाहर खदेड़ना बेहद जरूरी है, वर्ना उसकी बर्बरता का अखाड़ा यह इलाका बनेगा और मध्यपूर्व की तरह हमें भी भीषण तबाही झेलनी पड़ेगी।

अमेरिकी सेना किसी आतंक-वातंक को मिटाने और स्वतंत्रता व लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी ही नहीं है, बल्कि अमेरिकी पूंजी के विस्तार और दुनिया के संसाधनों की लूट को ध्यान में रखकर ही उसका इस्तेमाल किया जाता है, आखिर इस सच से आंखों को कैसे मूंदा जा सकता है? जिन खतरों का प्रचार करके उसने इराक पर हमला किया और सद्दाम हुसैन की हत्या की, वे प्रचार तो सही साबित नहीं हुए। कोई रासायनिक हथियार तो नहीं मिला। बल्कि दुनिया के अधिकांश लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि खाड़ी में अमेरिकी आतंक का मकसद क्या है? क्या महज तेल पर अपने वर्चस्व के लिए ही उसने मध्यपूर्व में सीधे सैनिक हमलों और प्रतिबंधों के जरिए लाखों लोगों की हत्या नहीं की है? जब तक अमेरिकी साम्राज्यवाद है, क्या हम दुनिया में अमन की उम्मीद कर सकते हैं? ओसामा जैसों से लाख गुना खतरनाक है अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसके कारनामों की विस्तार से चर्चा करती और अमेरिकी नागरिकों की मौतों के प्रति संवेदित लोगों को संबोधित करती एम्मानुएल ओर्तीज की लंबी कविता- ‘एक मिनट का मौन’ के साथ मैं इस लेख को समाप्त करना चाहता हूं। यह कविता 9/11 की घटना के बाद लिखी गई थी। कवि असद जैदी ने इसका अनुवाद किया है-

एक मिनट का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूं
मेरी गुजारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितंबर को वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सबके लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, कैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफगानिस्तान के मजलूमों और अमेरिकी मजलूमों के लिए
और अगर आप इजाजत दें तो
एक पूरे दिन का मौन
हजारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज
इस्राइली फौजों ने अमरीकी सरपस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पंद्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लंबी घेराबंदी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
दो महीने का मौन दक्षिण अफ्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया।
नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहां मौत बरसी
चमड़ी, जमीन, फौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहां बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन वियतनाम के लाखों मुर्दों के लिए….
कि वियतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है…..
एक साल का मौन कंबोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे…. और जरा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं।
दो महीने का मौन
कोलंबिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए  और जबान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं।
एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासियों के लिए
जिन्हें अपनी जिंदगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी कब्रें समुंदर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुंबी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकार्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम
एक सदी का मौन
यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिंदों के लिए
जिनकी जमीनें और जिंदगियां उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्टकार्ड से मनोरम खित्तों में…..
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालन टिंबर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुंबकीय काव्य-पंक्तियां भर हैं।
तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा
जबकि हम बेआवाज हैं
हमारे मुंहों से खींच ली गई हैं जबानें
हमारी आंखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको गम है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।
क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।
यह कविता उन चीजों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर:
यह सितंबर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितंबर 12, 1977 दक्षिण अफ्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितंबर 1971 और एटिका जेल, न्यूयार्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।
यह कविता सोमालिया, सितंबर 14, 1992 के बारे में है।
यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुंछ रही है और मिट जाया करती है
यह कविता उन 110 कहानियों के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं,
110 कहानियां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई जिक्र नही पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स और न्यूजवीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन:
बिना निशान की कब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएं
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए खामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढंक जाएं
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पंप
बंद कर दो इंजन और टेलिविजन
डूबा दो समुद्र सैर वाले जहाज
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सारे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर्र ईंट मारो,
और वहां के मजदूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्ले बॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ‘सुपर बॉल’ इतवार के दिन
फोर्थ ऑफ जुलाई के रोज
डेटन की विराट 13 घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफे जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों

और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।
अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।
(11 सितंबर, 2002)

जाहिर है कि 9/11 की घटना के लिए अमेरिका द्वारा दोषी करार दिए गए ओसामा की हत्या के बाद भी अमेरिका से यारी बढ़ाने की बजाए उसकी शैतानियत की लंबी फेहरिश्त के मद्देनजर उसके वास्तविक मंसूबों पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी है। आतंकवाद की सचाइयों और साम्राज्यवाद के साथ उसके रिश्ते के आधार को जानना-समझना भी जरूरी है, जैसा कि फिल्मकार माइकल मूर ने अपनी बेहद लोकप्रिय डाक्यूमेंट्री फैरेनहाइट 9/11 में इसका खुलासा किया था कि किस तरह बुश और ओसामा के खानदान के बीच तेल के धंधे में साझीदारी थी। और उनके बीच टकराव में इस धंधे की भी बड़ी भूमिका रही। एक बाद तो तय है कि ओसामा जैसों का आतंकवाद दुनिया से साम्राज्यवाद का नाश नहीं कर सकता और अमेरिकी साम्राज्यवाद जब तक रहेगा तब तक आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता।

अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र : अनिल सिन्हा

हाल ही में (25 फरवरी को) जाने-माने लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा का नि‍धन हो गया है। श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप में उनका यह यात्रावृतांत दि‍या जा रह है-

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

वह एक ठंडा दिन था। 31 दिसंबर, 2008 की मध्य रात्रि, कुहराविहीन, झक्क तारों से भरे आसमान में अमेरिकी बत्तियों की तेज रोशनी तुरंत ही कहीं गुम हो जा रही थी। अमेरिका में और शायद पश्‍चि‍म में भी दो बड़े त्यौहार समारोह होते हैं- बड़ा दिन (क्रिसमस) और नया साल। सैन फ्रांसिस्‍को में नये साल का भारी उत्सव होता है। पूरी बे एरिया (खाड़ी) के शहर से लोग सैन फ्रांसिस्को के घंटाघर के खुले में इकट्ठे होते हैं। पुराने साल की वि‍दाई देने के लिए और नए साल का स्वागत करने के लिए। प्रशांत महासागर की खाड़ी पर बसा सैन फ्रांसिस्को इस समय जन समुद्र की लहरें एक तरह से संभाल नहीं पा रहा है। फ्रीमांट से हम भी सैन फ्रांसिस्को के इस समुद्र में खो गए थे। मेरे लिए नया अनुभव था जहां उम्र और अवस्था, काले-गोर का भेद नहीं था। कोई एक समारोह-उत्सव था जो लोगों को जोड़े हुए था इस घंटाघर चौक से। शीत की परवाह नहीं, लोग कॉफी पी रहे हैं, आइसक्रीम, बर्गर और पेस्ट्री खा रहे हैं, कोक पी रहे हैं और बारह बजने का इंतजार कर रहे हैं। एक दूसरे पर गिरते पड़ते व घंटाघर के नजदीक पहुंचना चाहते हैं। चारों ओर ऊंची अट्टालिकाएं हैं। विशाल होटल सीरीज बल्ब से जगमगा रहे हैं। दूर-दूर तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट (गो की अमेरिका में सार्वजनिक यातायात अच्छा नहीं है) और निजी वाहन का पता नहीं। आज सब प्रतिबंधित हैं और सुरक्षा के जवान चारों ओर छितराए हैं- पूरी तरह से चौकस। बिल्ली की तरह उनकी नजरें चारों ओर घूम रही हैं पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही हैं। बारह बजा और पटाखों और विभिन्न प्रकार की आतिशबाजियों से सैन फ्रांसिस्को जगमगा उठा। ऐसी ही आतिशबाजियां तमाम लोगों के मन में छूट रही थीं। यहां हम विदेशी थे फिर भी पूरा माहौल अच्छा लग रहा था, खुशियों से भरा हुआ और उन युवाओं का तो पूछना ही क्या जिन्होंने प्यार की दुनिया की पहली यात्रा शुरू की थी। अभी तो कुछ ही कदम चले थे। पूरी यात्रा बाकी थी…

हम फ्रीमांट से सैन फ्रांसिस्को ‘बार्ट’ (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट डिस्ट्रिक्ट- इसे बोलचाल में यहां बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट भी कहते हैं) से आए थे। वापसी भी उसी से थी क्योंकि आज निजी वाहन समारोह स्थल तक पहुंच ही नहीं सकते थे। छोटी दूरी की रेल सेवाओं में ‘बार्ट’ सबसे सुव्यवस्थित सेवा मानी जाती है। (कुछ दूरी तक इसे समुद्र के नीचे से भी गुजरना पड़ता है)। कुछ सेवायें सैन फ्रांसिस्को से सीध हैं, कुछ बीच में तोड़कर यानी सेवा बदल कर फ्रीमांट पहुंचती हैं। सुरक्षा का प्रबंध बार्ट में भी है। जिस तरह भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) होते हैं, उसी तरह ‘बार्ट’ में भी बार्ट पुलिस हैं- अपने ‘काम’ में पूरी तरह चाक चौबंद।

31 दिसंबर 2008 की मध्य रात्रि थी पूरी तरह सर्द और हमारे लिए हाड़ भेदने वाली फिर भी बहुत उत्साह के साथ लोगों ने सन् 2009 का स्वागत किया था। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि रात कितनी सर्द है या समय कितनी तेजी से भाग रहा है पर लोगों को पता था कि तीन बजे भोर में अंतिम गाड़ी जाएगी। फिर ट्रेनें विराम लेंगी और सुबह से ही शुरू हो पाएंगी। इसी अहसास के कारण लोगों के समय बंध गए थे और भीड़ लगातार ‘बार्ट’ स्टेशन की ओर भाग रही थी। अमूमन यहां की बसें और ट्रेनें खाली होती हैं पर उस दि‍न सर्द रात में भी ट्रेनें ठसाठस भरीं थी। हम दो बजे तक ही स्टेशन पहुंच पाए तब पता चला कि सीधी फ्रीमांट जाने वाली अब कोई ट्रेन नहीं हैं। हमें बीच के किसी स्टेशन संभवत ओकलैंड में ट्रेन बदलनी होगी। एशियाई मूल के हर उम्र के लोगों से स्टेशन भरा था। उनमें काले लोगों की संख्या ज्यादा थी। अमेरिकी नागरिकों में काले लोगों की संख्या काफी है, फिर भी वे कानूनी दृष्टि से हर चीज में बराबर हैं। जहां मेरिट का मामला है अगर वे उसमें आ जाते हैं तो किसी गोरे अमेरिकी नागरिक को वहां नहीं डाल दिया जाएगा, पर अंदर कहीं एक जातीय श्रेष्ठता का दर्प गोरे अमेरिकी नागरिकों में मौजूद है। कई जगह इसके उदाहरण भी मिलते हैं। व्यवहार में ऐसी जातीय श्रेष्ठता या काले होने के कारण उसे दोयम दर्जे का मानाना दीखता है।

शायद यह संयोग ही होगा कि हमारे आगे युवाओं का एक जत्था चलता रहा। उनमें पांच लड़के और तीन लड़कियां । सभी 20 से 25 वर्ष के आसपास रहे होंगे- पर्व के उत्साह से भरे हुए- बहस, हंसी ठट्ठा, थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे पर उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे उनके युवा- मस्ती व फाकेमस्ती के दिन थे। वे काम भी करते थे, पढ़ भी रहे थे। अपनी प्रेमिकाओं से शादी भी करना चाहते थे और रि‍सेशन (व्यापक छटनी, मंदी, बेरोजगारी) से डरे हुए थे। दुनिया के पहले देश का युवा नागरिक बेरोजगारी व अनिश्‍चि‍त  भविष्य ये चिंतित था। वे इन्हीं बातों को लेकर आपस में बहस भी कर रहे थे और शायद बुश प्रशासन की आलोचना भी जिसने अमेरिका को गारत में डाल दिया। उनकी बातें शायद कुछ सफेद, गोरे बुजुर्गों को अच्छी नहीं लग रही थीं। वे भी हमारे साथ ही चल रहे थे और भीड़ के दबाव के कारण कभी उन्‍हीं की तरफ हो जाते तो कभी हमारी तरफ। वे उन्हें घूर रहे थे। हमारी ओर भी देख रहे थे पर उन्हें अहसास हो गया कि हम एशियाई विदेशी हैं।

ट्रेन आई। भीड़ जितनी उतरी उससे ज्यादा चढ़ गई। हम सब एक ही डिब्बे में चढ़े पर एक किनारे हम थे और दूसरे किनारे आठ युवाओं की वह जत्था और गोरे अमेरिकी। युवाओं का जत्था पहले की तरह  उन्मुक्त होकर बातें कर रहा था, कभी-कभी उनकी आह्लाद भरी चीख हमारे पास भी पहुंच रही थी जिससे लगता था कि गाड़ी की गति के शोर, भीड़ भरे डिब्बे का शोर चीर कर अगर वह हमारे तक पहुंच रही है तो उस आह्लाद में कितना जोश होगा। नये साल के स्वागत ने शायद उनमें आशाएं भर दी थीँ क्योंकि ओबामा उन्हीं की बदौलत उन्हीं की बिरादरी का देश का सर्वशक्तिशाली नेता बन गया था और बुश प्रशासन के विभिन्‍न कदमों के विरुद्ध निर्णय लेने की सार्वजनिक घोषणाएं कर चुका था। खासतौर से इस खाड़ी क्षेत्र और कैलिफोर्निया से उसे भारी समर्थन मिला था।

ट्रेन की गति काफी तेज थी। इस बीच उन गोरे बुजुर्गों में कोई कहीं बार-बार फोन कर रहा था। उनके चेहरों पर संताप व क्षोभ के भाव रहे होंगे। डिब्बे में तेज रोशनी होते हुए भी जहां हम बैठे थे वहां से उनका चेहरा नहीं दिख रहा था। गाड़ी बीच में ही (शायद टवे, ओकलैंड) रुक गई। उसका अंतिम पड़ाव यहीं था। अब हमें दूसरी गाड़ी में सवार होकर फ्रीमांट पहुचना था। डिब्बे में जो सुखद गर्मी थी वह प्लेटफार्म पर आकर लहूलुहान हो गयी। हमने अपने कोर्ट के कालर खड़े कर लिए। मफलर को इस तरह लपेटा जो कान, गला ढंकते हुए सिर पर पहुंचकर टोपी का भी काम दे दे। गो कि यह मौसम यहां पतझड़ का था पर ठंड मेरे लिए दुख पहुंचाने वाली स्थिति तक जा रही थी- रात्रि के ढाई बज रहे थे। इसी समय प्लेटफार्म पर गोली चली, उसकी बहुत धीमी आवाज के बावजूद वह हमें सुनाई दे गई क्योंकि जितने लोग भी यहां चढऩे-उतरने वाले थे सब चुपचाप अगली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, सर्द रातें वैसे भी काफी सन्नाटा भरी होती हैं। गाड़ी दो मिनट बाद आने वाली थी।

गोली की आवाज से हम चौंके। जिस डिब्बे से हम उतरे थे उसी के दूसरे दरवाजे के सामने गोली चली थी और उन आठों में से एक गठीला नौजवान प्लेटफार्म पर खून के बीच तडफ़ड़ाकर शांत हो चुका था। बार्ट पुलिस के एक अधिकारी ने उसे गोली मार दी थी। अधिकारी गोरा था जोहान्स मेहशर्ल। बार्ट पुलिस ने उन्हें घेर रखा था और बाकी लोगों को वहां से हटा रही थी। लोगों को हटाने के लिए महिला पुलिस को तैनात किया गया था। शायद पुलिस लोगों को लिंग संबंधी कमजोरी को जानती थी। पर प्लेटफार्म पर ही बार्ट पुलिस के विरोध में नारे लगने शुरू हो गए। नारे उस जत्थे के बचे सात साथियों ने शुरू किये जो एकदम से प्लेटफार्म के इस पार से उस पार फैल गए। मीडिया ने तत्काल कवर किया। कुछ ही देर में खबर आग की तरह फैल गई। और प्लेटफार्म के बाहर शहर का जो हिस्सा था वहां से भी नारे की आवाजें आ रही थीं। वह लड़का ओकलैंड का निवासी ऑस्कर ग्रांट था। वह काम भी करता था, पढ़ाई भी करता था। उसकी एक बेटी थी और वे फरवरी, 2009 में किसी तारीख को शादी करने वाले थे। बाइस साल के किसी युवा को तड़प कर शांत होते हुए मैंने पहली बार देखा था। इस घटना ने मुझे सन्न कर दिया था। स्टेशन पर ट्रेन आने की जो सूचना आ रही थी वह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी। सन् 1984 में जब भारत में सिख विरोधी दंगा हुआ था, तब लखनऊ जंक्‍शन के बाहर कुछ सांप्रदायिक उग्रवादी हिंदुओं द्वारा मैंने एकसिख युवा को जलाया जाते हुए देखा था। वहां स्टेशन पर पंजाब मेल घंटों से रुकी थी, वह कब आएगी इसकी कोई सूचना नहीं आ रही थी। सारा देश स्थगित था उस दिन। पंजाब मेल से ही आनंद स्वरूप वर्मा, अजय सिंह तथा पार्टी के विभिन्न साथियों को कलकत्ता सम्मेलन में जाना था। मैं उन्हें विदा करने आया था क्योंकि मेरा जाना संभव नहीं हो पाया था। उस एक घटना ने मुझे कई साल तक परेशान किया। आज भी वह समय-समय पर एक काले निशान की तरह उभरता है और असहज कर जाता है- कम से कम उस दिन तो कोई काम नहीं हो पाता। और इतने वर्षोँ बाद एक काले अमेरिकी नागरिक की गोरे अमेरिकी पुलिस के एक हिस्से द्वारा सरेआम पहली तारीख के नव वर्ष पर्व के दिन हत्या कर दिया जाना…

हम जानते हैं कि अमेरिकी पुलिस लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है। उसके लिए वह किसी हद तक जा सकती है (इसके ताजा उदाहरण हावर्ड के प्रोफेसर के साथ बदसलूकी, पिछले दिनों भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम, शाहरुख खां आदि की घटनाओं को लिया जा सकता है)

दरअसल, अमेरिकी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को लेकर बहुत सारे प्रश्‍न उठते रहे हैं। मसलन इस पुलिस पर किसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण है- वहां के कॉरपोरेट घरानों का, राजसत्ता का ? क्योंकि हावर्ड के प्रोफेसर की तमाम दलीलों के बावजूद उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाना और बाद में पुलिस के उस छोटे से अधिकारी को ओबामा द्वारा आमंत्रित कर बियर पिला कर एक तरफ उसे हीरो बना देना और दूसरी तरफ पुलिस की ज्यादतियों को किसी आवरण में लपेट कर जस्टीफाई करना। संभवत: कछ ऐसा ही रुख होगा जिसके कारण घोर जन प्रतिरोध के बावजूद आस्कर ग्रांट के हत्यारे पुलिस अधिकारी को अब तक कोई सजा नहीं हुई। उसने दूसरे दिन ही यानी पहली जनवरी, 2009 को अपने कार्यालय जाकर बड़े अधिकारियों के सामने त्यागपत्र दे दिया जो स्वीकार भी कर लिया गया और व्यापक जन प्रतिरोध व मीडिया की भूमिका के कारण उसके विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया। बस मामला ठंडे बस्‍ते में पड़ गया है गो कि समय-समय पर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी होते ही रह रहे हैं। अमेरिका में इस मानी में व्यापक लोकतंत्र है कि लोग खुले तौर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्हें तंग नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (जिसके सर्वेसवा हैं चेयरमैन बॉब अवेकन) के कुछ फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन जैसे बे एरिया रिवोल्यूशन क्लब, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स आदि ने इस घटना को लेकर 22 मार्च, 2009 को ओकलैंड में एक बड़ा प्रदर्शन किया। उन्होंने जन अदालतें भी लगाईं और पिछले 15 वर्षों में कानून लागू कराने के नाम पर हजारों काले नागरिकों को वहां की पुलिस द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने की एक लिस्ट भी जारी की और सबके विरुद्ध चल रहे मुकदमें को न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने की मांग की। ऐसे कुछ लोगों के नाम हैं- ऑस्कर ग्रांट, अमाडू डिआलो, ताइशा मिलर, जे रॉल्ड हाल, गैरी किंग, अनीता गे, जुलिओ परेड्स, असा सुलिवान, मार्क गार्सिया, रैफेल ग्रिनेत, ग्लेन विलिस, रिचर्ड डी सैन्टिस आदि थे। ये केवल कैलिफोर्निया खाड़ी क्षेत्र के ही काले अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, बल्कि इनमें न्यायार्क के भी लोग हैं। इन्हें गोलियों से, पीट-पीट कर और आंख-मुंह में मिर्ची का चूरा झोंक कर यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया। यह ठीक उसी तरह का कृत्य था जैसा अमेरिका के ईजाद के बाद आम लोगों को भूखे रखकर, बीमारी की हालत में छोड़कर, सोने की जगह न देकर, कोड़ों से पिटाई कर-यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। लगभग तीन सौ साल बाद आज अमेरिका अपने को हर तरह से दुनिया का ‘नंबर वन’ देश घोषित करता रहाता है। ओबामा ने भी अपने शुरुआती भाषण में यही कहा था कि हम दुनिया के नंबर वन देश हैं और भविष्य में भी बने रहेंगे।

मेरे वहां रहते ही एक दूसरी घटना घटी,  बीस साल का ब्रैंडनली इवांस नवंबर, 2008 में सैन फ्रांसिस्को पढ़ाई और नौकरी के लिए सैन्टियागो से आया था। सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध गोल्डेन गेट ब्रिज के पास उसने शेयर में एक फ्लैट लिया था, पर दिसंबर के अंत में गोल्डेन गेट ब्रिज पार्क में उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस जिस तरह से इस मामले की छानबीन में उदासीन दिखाई दे रही है, उससे वहां के लोगों को अंदाज है कि शायद इसमें पुलिस की भी भूमिका है क्योंकि वह इलाका अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण है और सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस।

अमेरिकी पुलिस कानून लागू कराने के लिए तो किसी हद तक जा सकती है पर उसकी केवल यही भूमिका नहीं है- अपराध रोकना उसकी मुख्य भूमिका है। पर अमेरिका में अपराध बेतहाशा हैं चाहे हत्या हो, अपहरण हो, या अपराध के जितने भी रूप हो सकते हें। जि‍स अपराध को हम अपनी आंखों के सामने देख आए हैं, वह अमेरिकी पुलिस की तस्वीर बहुत साफ करती है।

पूरा प्रकरण देखते हुए लगता है कि अपराध जगत में यहां भी कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूंजीपतियों का हाथ है। एक उदाहरण देकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूंगा क्योंकि मेरे फ्रीमांट में रहते हुए यह मामला उछला था। इलेना मिशेल नाम की एक लड़की थी जो 13 वर्ष की उम्र में ही पूरे बे एरिया (खाड़ी क्षेत्र) में आइस स्केटिंग में नंबर एक पर पहुंच गई थी और 30  जनवरी, 1989 के ओलंपिक गेम्स में भागीदारी की उसकी दावेदारी तय हो गई थी। 30 जनवरी, 1989 में उसका अपहरण कर लिया गया। आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। अमेरिका स्टेट डिपार्टमेंट आफ जस्टिस की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैलि‍फोर्निया राज्‍य से पचास बच्‍चों का अपहरण होता है और उनका मि‍ल पाना असंभव सा ही होता है, बल्‍कि‍ वहां के संघीय आंकड़ों के अनुसार गायब बच्‍चों में से केवल एक प्रति‍शत ही 10 वर्षों की अवधि‍ में वापस आ पाते हैं।

फ्रीमांट लौटने के लि‍ए ट्रेन कुछ देर से मि‍ली। भारी मन से हम सवार हुए। ठंड गायब हो चुकी थी और मन पर तकलीफ का एक कुहासा छा गया था। आज भी वह घटना याद आती है तो प्रशांत महासागर की खाड़ी का सारा सौन्‍दर्य ति‍रोहि‍त हो जाता है और रातभर नींद नहीं आती…।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या, अक्‍टूबर, 2009 से साभार)