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फिर क्या हुआ: अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि फिर सनूबर का क्या हुआ…

आपने उपन्यास लिखा और उसमें यूनुस को तो भरपूर जीवन दिया। यूनुस के अलावा सारे पात्रों के साथ भी कमोबेश न्याय किया। उनके जीवन संघर्ष को बखूबी दिखाया, लेकिन उस खूबसूरत प्यारी सी किशोरी सनूबर के किस्से को अधबीच ही छोड़ दिया।

क्या समाज में स्त्री पात्रों का बस इतना ही योगदान है कि कहानी को ट्विस्ट देने के लिए उन्हें प्रकाश में लाया गया और फिर जब नायक को आधार मिल गया तो भाग गए नायक के किस्से के साथ। जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है कि अभिनेत्रियों को सजावटी रोल दिया जाता है।

अन्य लोगों की जिज्ञासा का तो जवाब मैं दे ही देता, लेकिन मेरे एक पचहत्तर वर्षीय प्रशंसक पाठक का जब मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला कि बरखुरदार, उपन्यास में आपने जो परोसना चाहा बखूबी जतन से परोसा…लेकिन नायक की उस खिलंदड़ी सी किशोरी प्रेमिका ‘सनूबर’ को आपने आधे उपन्यास के बाद बिसरा ही दिया। क्या सनूबर फिर नायक के जीवन में नहीं आई  और यदि नहीं आई तो फिर इस भरे-पूरे संसार में कहाँ गुम हो गई सनूबर….
मेरी कालेज की मित्र सुरेखा ने भी एक दिन फोन पर याद किया और बताया कि कालेज की लाइब्रेरी में तुम्हारा उपन्यास भी है। मैंने उसे पढ़ा है और क्या खूब लिखा है तुमने। लेकिन यार, उस लड़की ‘सनूबर’ के बारे में और जानने की जिज्ञासा है।
वह मासूम सी लड़की ‘सनूबर’…तुम तो कथाकार हो, उसके बारे में भी क्यों नहीं लिखते। तुम्हारे अल्पसंख्यक-विमर्श वाले कथानक तो खूब नाम कमाते हैं,  लेकिन क्या तुम उस लड़की के जीवन को सजावटी बनाकर रखे हुए थे या उसका इस ब्रह्माण्ड में और भी कोई रोल था…क्या नायिकाएं नायकों की सहायक भूमिका ही निभाती रहेंगी..?
मैं इन तमाम सवालों से तंग आ गया हूँ और अब प्रण करता हूँ कि सनूबर की कथा को ज़रूर लिखूंगा…वाकई कथानक में सनूबर की इसके अतिरिक्त कोई भूमिका मैंने क्यों नहीं सोची थी कि वो हाड-मांस की संरचना है…मैंने उसे एक डमी पात्र ही तो बना छोड़ा था। क्या मैं भी हिंदी मसाला फिल्मों वाली पुरुष मानसिकता से ग्रसित नहीं हूँ, जिसने बड़ी खूबसूरती से एक अल्हड पात्र को आकार दिया और फिर अचानक उसे छोड़ कर पुरुष पात्र को गढने, संवारने के श्रम लगा दिया।
मुझे उस सनूबर को खोजना होगा…वो अब कहाँ है, किस हाल में है…क्या अब भी वो एक पूरक इकाई ही है या उसने कोई स्वतंत्र इमेज बनाई है ?

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तब पंद्रह वर्षीय सनूबर कहाँ जानती थी कि उसके माँ-बाप उसे जमाल साहब के सामने एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। हाँ, उत्पाद ही तो थी सनूबर…विवाह-बाज़ार की एक आवश्यक उत्पाद…एक ऐसा उत्पाद जिसका मूल्य कमसिनी में ही अधिकतम रहता है…जैसे-जैसे लडकी की उम्र बढ़ती जाती है, उसकी कीमत घटती जाती है। सनूबर की अम्मी के सामने अपने कई बच्चों की ज़िन्दगी का सवाल था। सनूबर उनकी बड़ी संतान है…गरीबी में पढा़ई-लिखाई कराना भी एक जोखिम का काम है। कौन रिस्क लेगा। जमाना ख़राब है कितना..ज्यादा पढ़ लेने के बाद बिरादरी में वैसे पढ़े-लिखे लड़के भी तो नहीं मिलेंगे?

चील-गिद्धों के संसार में नन्ही सी मासूम सनूबर को कहीं कुछ हो-हुआ गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। फिर उसके बाद और भी तो बच्चे हैं। एक-एक करके पीछा छुडा़ना चाह रही थीं सनूबर की अम्मी।

सनूबर की अम्मी अक्सर कहा करतीं–“ जैसे भिन्डी-तुरई..चरेर होने के बाद किसी काम की नहीं होती, दुकानदार के लिए या किसी ग्राहक के लिए..कोई मुफ्त में भी न ले..ऐसे ही लड़कियों को चरेर होने से पहले बियाह देना चाहिए…कम उमिर में ही नमक रहता है उसके बाद कितना स्नो-पाउडर लगाओ, हकीकत नहीं छुपती…!”

सनूबर की अम्मी जमाल साहब के सामने सनूबर को अकारण डांटती और जमाल साहब का चेहरा निहारती। इस डांटने-डपटने से जमाल साहब का चेहरा मुरझा जाता। जैसे- यह डांट सनूबर को न पड़ी हो, बल्कि जमाल साहब को पड़ी हो। यानी जमाल साहब उसे मन ही मन चाहने लगे हैं।
जमाल साहब का चेहरा पढ़ अम्मी खुश होतीं और सनूबर से चाय बनाने को कहती या शरबत लाने का हुक्म देतीं।
कुल मिलाकर जमाल साहब अम्मी की गिरफ्त में आ गये थे।
बस एक ही अड़चन थी कि उन दोनों की उम्र में आठ-दस बरस का अंतर था।
सनूबर की अम्मी तो आसपास के कई घरों का उदाहरण देतीं, जहां पति-पत्नी की उम्र में काफी अंतर है। फिर भी जो राजी-ख़ुशी जीवन गुज़ार रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि सनूबर यूनुस की दीवानी है….या उसे शादी-बियाह नहीं करवाना है।
यूनुस जब तक था, तब तक था….वो गया और फिर लौट के न आया…
सुनने में आता कि कोरबा की खुली खदानों में वह काम करता है। बहुत पैसे कमाने लगा है और अपने घरवालों की मदद भी करने लगा है।
यूनुस ने अपने खाला-खालू को जैसे भुला ही दिया था। यह तो ठीक था, लेकिन सनूबर को भूल जाना उसे कैसे गवारा हुआ होगा। वही जाने…
सनूबर तो एक लड़की है…लडकी यानी पानी…जिस बर्तन में ढालो वैसा आकार ग्रहण कर लेगी।
सनूबर तो एक लड़की है। लड़की यानी पराया धन, जिसे अमानत के तौर पर मायके में रखा जाता है और एक दिन असली मालिक ढोल-बाजे-आतिशबाजी के साथ आकर उस अमानत को अपने साथ ले जाते हैं।
सनूबर इसीलिए ज्यादा मूंड नही खपाती- जो हो रहा है ठीक हो रहा है, जो होगा ठीक ही होगा।
आखिर अपनी माँ की तरह उसका भी कोई घर होगा, कोई पति होगा, कोई नया जीवन होगा।

हर लडकी के जीवन में दोराहे आते हैं। ऐसे ही किसी दोराहे पर ज्यादा दिन टिकना उसे भी पसंद नहीं था। क्या मतलब पढा़ई-लिखाई का, घर में माहौल नहीं है। स्कूल भी कोई ऐसा प्रतिस्पर्धा वाला नहीं कि जो बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़े और आगे की राह दिखलाए। सरकारी स्कूल से ज्यादा उम्मीद क्या रखना। अम्मी-अब्बू वैसे भी लड़की जात को ज्यादा पढा़ने के पक्षधर नहीं हैं। लोक-लाज का डर और पुराने खयालात- लड़कियों को गुलाबी उम्र में सलटाने वाली नीति पर अमल करते हैं।बस जैसे ही कोई ठीक-ठाक रिश्ता जमा नहीं कि लड़की को विदा कर दो। काहे घर में टेंशन बना रहे। हाँ, लड़कों को अच्छे स्कूल में पढा़ओ और उन पर शिक्षा में जो भी खर्च करना हो करो।
अब वो जमाल साहब के रूप में हो तो क्या कहने। साहब-सुह्बा ठहरे।अफसर कालोनी में मकान है उनका। कितने सारे कमरे हैं ।दो लेट्रिन-बाथरूम हैं। बड़ा सा हाल और किचन कितना सुविधाजनक है।
सनूबर का क्वार्टर तो दो कमरे का दडबा है। उसी में सात-आठ लोग ठुंसे पड़े रहते हैं। आँगन में बाथरूम के नाम पर एक चार बाई तीन का डब्बा, जिसमे कायदे से हाथ-पैर भी डुलाना मुश्किल।
यदि ये शादी हो जाती है तो कम से कम उसे एक बड़ा सा घर मिल जाएगा।
घूमने-फिरने के लिए कार और इत्मीनान की ज़िन्दगी।
इसलिए सनूबर भी अपनी अम्मी के इस षड्यंत्र में शामिल हो गई कि उसकी शादी जमाल साहब से हो ही जाये।

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ये अलग बात है कि उसे यूनुस पसंद है।
सनूबर का कजिन यूनुस…
सनूबर अपनी अम्मी की इसीलिए कद्र नही करती कि उनकी सोच का हर कोण सनूबर की शादी की दिशा में जाता है। अम्मी हमेशा बच्चियों की शादी के लिए अब्बू को कोसती रहती हैं कि वे काहे नहीं इतना कमाते कि बच्चियों के लिए गहने-जेवर ख़रीदे जाएँ, जोड़े जाएँ…फिक्स्ड डिपोजिट में रकम जमा की जाए और नाते-रिश्तेदारों में उठे-बैठें ताकि बच्चियों के लिए अच्छे रिश्ते आनन-फानन मिल जाएँ।
लड़कियों के बदन का नमक ख़त्म हो जाए तो रिश्ता खोजना कितना मुश्किल होता है, ये वाक्य सनूबर अम्मी के मुख से इतना सुन चुकी है कि उसने अपने बदन को चखा भी एक बार और स्वाद में बदन नमकीन ही मिला।
इसका मतलब कि‍ उम्र बढ़ने के साथ लड़कियों के बदन में नमक कम हो जाता होगा।
इस बात की तस्दीक के लिए उसने खाला की लड़की के बदन को चाट कर देखा था। उसके तो तीन बच्चे भी है और उम्र यही कोई पच्चीस होगी, लेकिन उसका बदन का स्वाद नमकीन था।
एक बार सनूबर ने अम्मी के बदन को चाट कर देखा। वह भी नमकीन था। फिर अम्मी ऐसा क्यों कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ बदन में नमक कम हो जाता है।
ये सब देहाती बातें हैं और तेरी अम्मी निरी देहातन है।
ऐसा अब्बू ने हंसते हुए कहा था, जब सनूबर ने बताया कि सबके बदन में नमक होता है, क्योंकि इंसान का पसीना नमकीन होता है और इस नमक का उम्र के साथ कोई ताल्लुक नहीं होता है।
अम्मी को सोचना चाहिए कि स्कूल में पढ़़ने वाली लड़की ये तो कतई नहीं सोचती होगी कि उसकी शादी हो जाए और वो लड़की अपने आस-पास के लड़कों या मर्दों में पति तलाशती नहीं फिरती है।
फिर लड़कियों की बढ़ती उम्र या बदन की रानाइयां माँ-बाप और समाज को क्यों परेशान किये रहते हैं। उठते-बैठते, सोते-जागते, घुमते-फिरते बस यही बात कि मेरी सनूबर की शादी होगी या नहीं।
सनूबर कभी खिसिया जाती तो कहती, “मूरख अम्मी…शादी तो भिखारन की, कामवाली की, चाट-वाले की बिटिया की भी हो जाती है। और तो और तुम्हारी पड़ोसन पगली तिवारिन आंटी की क्या शादी नहीं हुई, जो बात-बेबात तिवारी अंकल से लड़ती रहती है और दिन में पांच बार नहाती है कि कहीं किसी कारण अशुद्ध तो नहीं हो गई हो।दुनिया में काली-गोरी, टेढ़ी-मेढ़ी, लम्बी-ठिगनी सब प्रकार की लडकियाँ तो ब्याही जाती हैं अम्मी। और तुम्हारी सनूबर तो कित्ती खूबसूरत है।जानती हो मैथ के सर मुझे नेचुरल ब्यूटी कहते हैं।तो क्या मेरी शादी वक्त आने पर नहीं होगी?”
सनूबर के तर्क अपनी जगह और अम्मी का लड़का खोज अभियान अपनी जगह।
उन्हें तो जमाल साहब के रूप में एक दामाद दिखलाई दे रहा था।

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निकिता स्कूल में आज संजीदा दिखी।
सनूबर ने कारण जानने की कोशिश नही की। यह सनूबर की स्टाइल है। वह ज़बरदस्ती किसी के राज उगलवाने में यकीन नहीं करती। उसे मालूम है कि जिसे सुख या दुःख की बात शेयर करनी होगी, वो खुद करेगी। यदि बात एकदम व्यक्तिगत होगी तो फिर काहे किसी के फटे में टांग अड़ाना।
टिफिन ब्रेक में जब दोनों ने नाश्ते की मिक्सिंग की तो निकिता आहिस्ता से फूट पड़ी- “जानती है सनूबर, कल गज़ब हो गया रे !”
सनूबर के कान खड़े हुए लेकिन उसने रुचि का प्रदर्शन नहीं किया।
निकिता फुसफुसाई- “कल शाम मुझे देखने लड़के वाले आने वाले हैं!”
जैसे कोई बम फटा हो, निकिता का मुंह उतरा हुआ था। सनूबर भी जैसे सकते में आ गई। यह क्या हुआ, अभी तो मिडिल स्कूल में नवमी ही तो पहुँची हैं सखियाँ। उम्र पंद्रह या कि सोलह साल ही तो हुई है। इतनी जल्दी शादी!
-“तेरी मम्मी ने ऐतराज़ नहीं किया पगली।”
-“काहे, मम्मी की ही तो कारस्तानी है यह। उन्होंने मेरी दीदी की शादी भी तो जब वह सत्रह साल की थीं, तभी करा दी थी। कहती हैं कि उम्र बढ़ जाने के बाद लड़के वाले रिजेक्ट करने लगते हैं और हमें पढ़ा-लिखा कर नौकरी तो करानी नहीं बेटियों से।चार बहनों के बाद एक भाई है। एक-एक कर लड़कियाँ निपटती जाएँ, तभी सुकून मिलेगा उन्हें !”
सनूबर क्या कहती..कितने बेबस हैं सखियाँ इस मामले में।
उन्हें घर का सदस्य कब समझा जाता है।हमेशा पराई अमानत ही तो कहते हैं लोग।उनका जन्म लेना ही दोख और असगुन की निशानी है।
लड़कियों के सतीत्व की रक्षा और दहेज़ ऐसे मसले हैं, जिनसे उनके परिवार जूझते रहते हैं।

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निकिता की चिंता, “मुझे आगे पढा़ई करना है रे।अभी शादी नहीं करनी।क्या मेरी कोई सुनेगा?”
सनूबर क्या जवाब देती।
लड़कियों की कहाँ सुनी जाती है। उन्हें तो हुकुम सुनने और तामील करने की ट्रेनिंग मिली होती है।
अजब समाज है, जहां लड़कियों को एक बीमारी की तरह ट्रीट किया जाता है। बीमारी हुई नहीं कि जो भी कीमत लगे लोग, उस बीमारी से निजात पाना चाहते हैं।
और जब बिटिया बियाह कर फुर्सत पाते हैं लोग तब दोस्त-अहबाबों में यही कहते फिरते हैं- “गंगा नहा आये भाई…अच्छे से अच्छा इंतज़ाम किया। लेन-देन में कोई कसर नहीं रक्खी।”
सनूबर की भी तो अपने घर में यही समस्या थी।
आये दिन अम्मी अब्बू को ताने देती हैं- “कान में रुई डाले रहते हैं और बिटिया है कि ताड़ की तरह बढ़ी जा रही है। सोना दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है। न जेवर बनाने की चिंता न कहीं रिश्तेदारी में उठाना-बैठना। क्या घर-बैठे रिश्ता आएगा? जूते घिस जाते हैं, तब कहीं जाकर ढंग का रिश्ता मिलता है ?”
अब्बू मजाक करते, “तुम्हारे माँ-बाप के कितने जूते घिसे थे।कुछ याद है, जो मैं मिला।ऐसे ही अल्लाह हमारी बिटिया सनूबर का कोई अच्छा सा रिश्ता करा ही देगा।”
अम्मी गुस्सा जातीं, “अल्लाह भी उसी की मदद करता है, जो खुद कोई कोशिश करे। हाथ पे हाथ रखकर बैठे आदमी के मुंह में अल्लाह निवाला नहीं डालता।आप मज़ाक में बात न टालिए और दुनियादार बनिए। अभी से जोड़ेंगे, तभी आगे जाकर बोझा नहीं लगेगा।”
सनूबर ने अपनी व्यथा निकिता को सुनाई।
दोनों सहेलियाँ उदास हो गईं.।
तभी टिफिन खत्म होने की घंटी बजी और वे क्लास-रूम की तरफ भागीं।

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सनूबर को स्कूल जाना बहुत पसंद है। इस बहाने उसे घर-परिवार की बेढंगी वयस्तता से मुक्ति मिलती है। अम्मी चिल्लाती रहती है कि इतनी जल्दी क्यों स्कूल भागने की फिराक में रहती है सनूबर। टाइम होने से पांच मिनट पहले घर छोड़ना चाहिए। कितना नजदीक है स्कूल।
-“का करती है माटीमिली इत्ता पहले जाकर, झाडू लगाती है का वहां?”
सनूबर का स्कूल में बहुत मन लगता है। वहाँ तमाम सहेलियाँ मिल जाती हैं। उनके सुख-दुःख सुनना, बेहिसाब गप्पें मारना। एक-दूसरे की ज़िन्दगी में समानता-असमानता की विवेचना करना। टीवी पर देखी फिल्म या सीरियल पर बहस करना।
और भी इधर-उधर की लटर-पटर…लंतरानियाँ….
घर में क्या हो सकता है। बस अम्मी के आदेश सुनते रहो। काम हैं कि ख़तम ही नहीं होते हैं। जब कुछ काम न हो तो कपड़ों का ढेर लेकर प्रेस करने बैठो। ये भी कोई ज़िन्दगी है।
सनूबर के घर में तो और भी मुसीबतें हैं।कोई न कोई मेहमान आता रहता है। उनकी खातिरदारी करना कितना बोरिंग होता है। उस पर अम्मी-अब्बू के नए दोस्त जमाल साहेब। वह आये नहीं कि जुट जाओ खिदमत में। प्याज काटो, बेसन के पकौड़े बनाओ। बार-बार चाय पेश करो। अम्मी भी उनके सामने जमीन्दारिन बन कर हुकुम चलाती हैं-“कहाँ मर गई रे सनूबर, देखती नहीं..कित्ती देर हो गई साहब को आये। तेरी चाय न हुई मुई बीरबल की खिचड़ी हो गई।जल्दी ला!”
सनूबर न हुई नौकरानी हो गई।
-“कहाँ मर गई रे।देख, तेरे अब्बू का मोजा नहीं मिल रहा है।जल्दी खोज कर ला!”
-“मेरा पेटीकोट कहाँ रख दि‍या तूने।पेटी के ऊपर रखा था, नहीं मिल रहा है…जल्दी खोज कर ला!”
-“जा जल्दी से चावल चुन दे।फिर स्कूल भागना। बस सबेरे से स्कूल की तैयारी करती रहती है, पढ़-लिख कर नौकरी करेगी क्या। तेरी उम्र में मेरी शादी हो गई थी और तू जाने कब तक छोकरी बनी रहेगी।”
ऐसे ही जाने-कितने आदेश उठते-बैठते, सोते-जागते सनूबर का जीना हराम करते रहते।
सनूबर स्कूल के होमवर्क हर दिन निपटा लेती थी।
उसके टीचर इस बात के लिए उसकी मिसाल देते।
उससे गणित न बनती थी इसलिए उसने गणित की कुंजी अब्बू से खरीदवा ली थी।
बाकी विषय को किसी तरह वह समझ लेती।
वैसे भी बहुत आगे पढ़ने-पढ़ाने के कोई आसार उसे नज़र नहीं आते थे, यही लगता कि दसवीं के बाद अगर किस्मत ने साथ दिया तो बारहवीं तक ही पढ़ पाएगी वर्ना उसके पहले ही बैंड बज सकता है। अम्मी बिटिया को घर में बिठा कर नहीं रखेंगी- “जमाना खराब है।जवान लड़की घर में रखना बड़ा जोखिम भरा काम है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर माथा पीटने के अलावा क्या बचेगा। इसलिए समय रहते लड़कियों को ससुराल पहुंचा दो। एक बार विदा कर दो। बाद में सब ठीक हो जाता है। घर-परिवार के बंधन और जिम्मेदारियां उलटी-सीधी उड़ान को ज़मीन पर ला पटकती हैं।”
अम्मी कहती भी हैं- “अपने घर जाकर जो करना हो करियो।यह घर तुम्हारा नहीं सनूबर!”
तो क्या लड़की अपने माँ-बाप के घर में किरायेदार की हैसियत से रहती है?
यही तो निकिता ने भी थक-हार कर कहा- “मुझे उन लोगों ने पसंद कर लिया है सनूबर। इस साल गर्मियों में मेरी शादी हो जायेगी रे!”
सनूबर का दिल धड़क उठा।
-“गज़ब हो गया। पिछले साल यास्मीन ने इस चक्कर में पढाई छोड़ दी और ससुराल चली गई। कितनी बढ़िया तिकड़ी थी अपनी। जानती है- मार्केट में यास्मीन की अम्मी मिलीं थीं। उन्होंने बताया कि यास्मीन बड़ी बीमार रहती है। उसका ससुराल गाँव में है, जहां आसपास कोई अस्पताल नहीं है। उसकी पहली डिलवरी होने वाली थी और कमजोरी के कारण बच्चा पेट ही में मर गया। बड़ी मुश्किल से यास्मीन की जान बची। ईद में यास्मीन आएगी, तो उससे मिलने चलेंगे न। पता नहीं तुम्हारा साथ कब तक का है!”
निकिता की आँखों में आंसू थे।
उसने स्कूल के मैदान में बिंदास क्रिकेट खेलते लडकों को देखा।
सनूबर की निगाह भी उधर गई।
लडकों की ज़िन्दगी में किसी तरह की आह-कराह क्यों नहीं होती।
सारे दुःख, सारी दुश्वारियां लड़कियों के हिस्से क्यों दी मेरे मौला…मेरे भगवान।
और तभी निकिता ने घोषणा की- “हम लड़कियों का कोई भगवान या अल्लाह नहीं सनूबर!”
सनूबर ने भी कुछ ऐसा ही सोचा था, कहा नहीं कि कहीं ईमान न चला जाए।अल्लाह की पाक ज़ात पर ईमान और यकीन तो इस्लाम की पहली शर्त है।
लेकिन निकिता ठीक ही तो कह रही है।
कितनी तनहा, कितनी पराश्रित, कितनी समझौता-परस्त होती हैं लड़कियाँ।

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लड़कियाँ ज़िन्दगी के तल्ख़ हकीकतों से कितनी जल्दी वाकिफ होती जाती हैं।
लड़के जो लड़कियों को सिर्फ एक ‘माल’ या ‘कमोडिटी’ के रूप में देखते हैं, वे कहाँ जान पाते हैं कभी कि इन शोख चुलबुली लड़कियों को प्रतिदिन ज़िन्दगी की कई नई सच्चाइयों से दो-चार होना पड़ता है।
ऐसे ही एक दिन सनूबर और निकिता यास्मीन से मिलने उसके घर गई।
मस्जिद-पारा में घर है यास्मीन का।
बड़ी मस्जिद के पीछे वाली गली में रहती है वह।
निकिता ने जींस-टॉप पहना था, जबकि सनूबर सलवार-सूट में थी। सनूबर मस्जिद-पारा आती है, तो बाकायदा सर पर दुपट्टा डाले रहती है।
यास्मीन ने घर का दरवाज़ा खोला था।
आह, कितना बेरौनक चेहरा हो गया है…गाल पिचके हुए और आँखों के इर्द-गिर्द काले घेरे। जैसे लम्बी बीमारी से उठी हो। तभी पीछे से यास्मीन की अम्मी भी आ गईं और उन्हें अन्दर आकर बैठने को कहा।
निकिता और सनूबर चुपचाप यास्मीन का चेहरा निहारे जा रही थीं। कितनी खूबसूरत हुआ करती थी यास्मीन, शादी ने उससे ख़्वाब और हंसी छीन ली थी।
यास्मीन स्कूल भर के तमाम बच्चों और टीचरों की मिमिक्री किया करती और खुद न हंसती, जब सब उसके मजाक को समझ कर हंसते तब ठहाका मार कर हंसती थ। उसकी हंसी को ग्रहण लग गया था।
निकिता और सनूबर उसकी दशा देख खौफज़दा हो चुकी थीं। क्या ऐसा ही कोई भविष्य उनकी बाट जोह रहा है। कम उम्र में शादी का यही हश्र होता है।फिर उनकी मांए ये क्यों कहती हैं कि उनकी शादियाँ तब हुई थीं, जब वे तेरह या चौदह साल की थीं। लेकिन वे लोग तो मस्त हैं, अपनी ज़िन्दगी में। फिर ये स्कूल पढ़ने वाली लड़कियाँ क्यों कम उम्र में ब्याहे जाने पर खल्लास हो जाती हैं?
ऐसे ही कई सवालात उनके ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रहे थे।
यास्मीन शादी का एल्बम लेकर आ गई और उन लोगों ने देखा कि यास्मीन का शौहर नाटे कद का एक मजबूत सा युवक है। दिखने में तो ठीक-ठाक है, फिर उन लोगों ने क्यों कम उम्र में बच्चों की ज़िम्मेदारी का निर्णय लिया। मान लिया शादी हो ही गई है, फिर इतनी हड़बडी़ क्यों की? बच्चे दो-चार साल बाद भी हो जाते तो क्या संसार का काम रुका रह जाता?
यास्मीन बताने लगी- “उनका मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज है। सुबह दस बजे जाते हैं तो रात नौ-दस के बाद ही लौटते हैं। गैरेज अच्छी चलती है, लेकिन काम तो मेहनत वाला है। मेरी जिठानी मेरी ही उम्र की है और उसके दो बच्चे हैं। इस हिसाब से तो उस परिवार में मैं बच्चे जनने के काबिल तो थी ही। मुझे वैसे भी कहानियों की किताब पढ़ने का शौक है। वहां पढाई-लिखाई से किसी का कोई नाता नहीं। बस कमाओ और डेली बिस्सर खाना खाओ- मटन न हो तो मछली और नहीं तो अंडा।इसके बिना उनका निवाला मुंह के अन्दर नहीं जाता। ये लोग औरत को चारदीवारी में बंद नौकरानी और बच्चा जनने की मशीन मानते हैं!”
तो ये सब होता है शादी के बाद और अपनी निकिता भी इस घनचक्कर में फंसने वाली है।
सनूबर ने गौर किया कि निकिता के चेहरे पर डर के भाव हैं।आशंकाओं के बादल तैर रहे हैं, उसके चेहरे पर।
लड़के वालों ने उसे पसंद कर लिया है।
निकिता को जो मालूम हुआ है, उसके मुताबिक बीस एकड़ की खेती है उनकी, एक खाद-रसायन की दूकान है। दो लड़के और दो लड़कियाँ हैं वहां। निकिता का होने वाला पति बड़ा भाई है, बीए करने के बाद खेती संभालता है और छोटा भाई इंजीनियरिंग कर रहा है। दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी है। इसका मतलब निकिता घर की बड़ी बहू होने जा रही है।
ससुराल झारखण्ड के गढ़वा में है।नगर से सटा गाँव है उनका। वैसे तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन निकिता की इच्छा किसी ने जाननी चाही। क्या निकिता अभी विवाह की जिम्मेदारियों में बंधने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार है? कहाँ बच्चियों की इच्छा पूछी जाती है। माँ-बाप पर एक अघोषित बोझ जो होती हैं लड़कियाँ।
यास्मीन का इलाज चल रहा है, डॉक्टर खान मेडम उसका इलाज कर रही हैं। उसे रक्ताल्पता है और ससुराली दिक्कतों ने मानसिक रूप से उसे कन्फ्यूज़ का कर दिया है।
-“अल्ला जाने कब उसका आत्म-विश्वास लौटेगा।कितनी बिंदास हुआ करती थी अपनी यास्मीन !” घर लौटते हुए सनूबर ने गहरी सांस लेकर यही तो कहा था, और निकिता भी भर रास्ता खामोश बनी रही।

(उपन्यास अंश)

सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं संजीव : रवीन्‍द्र त्रिपाठी

संजीव कुमार को देवीशंकर पुरस्कार प्रदान करते विश्‍वनाथ त्रिपाठी।

नई दि‍ल्‍ली : युवा आलोचक संजीव कुमार को उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ के लिए पंद्रहवां देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार वरिष्‍ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। 05 अप्रैल, 2011 को नई दिल्‍ली स्थित साहित्‍य अकादेमी के रवीन्‍द्र भवन में आयोजित समारोह में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी समाज अवस्‍थी जी के प्रति बहुत ही आत्‍मीय और अपनापन महसूस करता है। इसलिए युवा आलोचक संजीव कुमार को यह सम्‍मान प्रदान करते हुए मैं स्‍वयं को सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं।
समारोह के संचालक रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्‍वों की ओर ध्‍यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए हैं। वह अध्‍यवसाय और सूक्ष्‍म-द़ृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं और उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते हैं। उनकी पुरस्‍कृत पुस्‍तक ऐसी कोशिश का सुफल है।
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अवस्‍थी जी के सहकर्मी रहे सत्‍यदेव चौधरी ने संस्‍मरणात्‍मक वक्‍तव्‍य में कहा कि अवस्‍थी जी अपने अध्‍ययन-अध्‍यापन, लेखन व जीवन-शैली में आधुनिक थे। उन्‍होंने हमेशा अख्‍यात और नए लेखकों को लेखन के लिए प्रेरित और प्रोत्‍साहित किया। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निधन से पूर्व उनकी केवल पांच पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं, जबकि उसके बाद से अब तक कई किताबें आ चुकी हैं और लगातार चर्चा में रही हैं।
पुरस्‍कृत आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि यह अवसर मुख्‍यत: अवस्‍थी जी का जन्‍मदिन मनाने का है और किसी युवा आलोचक को उसके कार्य के लिए प्रोत्‍साहित करना तो उसका हिस्‍सा भर है। उन्‍होंने इस तथ्‍य की ओर ध्‍यान दिलाया कि छत्‍तीस साल की छोटी-सी उम्र में अवस्‍थी जी ने साहित्यिक हलके में जैसा और जितना हस्‍तक्षेप किया, वह हम जैसों के लिए गहरे आश्‍चर्य का विषय है और अपने समय का कोई ज्‍वलंत प्रश्‍न नहीं रहा होगा जिस पर अवस्‍थी जी ने लिखित मुठभेड़ न की हो। और इस मुठभेड़ के लिए भारतीय काव्‍य और काव्‍यशास्‍त्र की परंपरा से लेकर पश्चिम के साहित्‍य सिद्धांतों के अपने ज्ञान का समुचित उपयोग ने किया हो।
इस अवसर पर आयोजित ‘उपन्‍यास और हमारा समय’ विषयक विचार गोष्‍ठी का प्रारंभ करते हुए पंकज बिष्‍ट (रामजी यादव द्वारा पढ़े गए पर्चे में) ने कहा कि उपन्‍यास की पहली और आखिरी विशेषता उसकी समकालीनता ही है और इस रूप में उपन्‍यास और हमारे समय पर बात करने का दूसरा अर्थ उपन्‍यास और हमारा समाज या फिर समाज और उपन्‍यास के रिश्‍ते को रेखांकित करना है। आजादी के बाद हिंदी उपन्‍यास को हाशिए पर धकेल दिए जाने का परिणाम भी हम देख रहे हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि 40 करोड़ हिंदीभाषियों के पास 40 अच्‍छे उपन्‍यासकार नहीं हैं। रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज कोई निश्चित या पारिभाषिक शब्‍द नहीं है। इससे गांव-शहर, परंपरा-आधुनिकता के साथ बहुत कुछ समाया है। हिंदी में उपन्‍यास-आलोचना का आत्‍मविश्‍वास कविता-आलोचना की तुलना में काफी संकट में रहा है। आशुतोष कुमार ने समय के साथ उपन्‍यास के रिश्‍ते को विश्‍लेषित करते हुए कहा कि उपन्‍यास समय की सूची अवधारणा के खिलाफ खड़ा है और स्‍मृति, यथार्थ और कल्‍पना के बीच की दूरी उपन्‍यास की औपन्‍यासिकता को तय करती है, औपनिवेशिक इतिहास के शोषण के रूपों का आख्‍यान बनाती है और इस तरह वह खंडित होते मनुष्‍य के मनुष्‍य होने के अहसासों को रेखांकित करता है।
संजीव कुमार ने कहा कि लेखक पाठक को रोना तो रोते हैं, लेकिन खुद उन्‍होंने इस पाठक तक जोड़ने, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्‍या किया ? अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे भाषीय खिलंदड़ापन करता गप्‍पोड़ कहा गया। उपन्‍यासकार को अगर उपन्‍यासकार बने रहना है तो उसे तरह-तरह की आवाजों को स्‍पेस देना ही होगा।
अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में अशोक वाजपेयी ने महाकाव्‍य और उपन्‍यास के अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि महाकाव्‍य मनुष्‍य को पवित्रता के बोध से मुक्‍त नहीं हो पाता ओर उपन्‍यास मनुष्‍य की अपवित्रता के बोध से। एक लोकतांत्रिक कर्म के रूप में उपन्‍यास ने ही सबसे अधिक चालू नैतिकता को चुनौती दी है, एक तरह की नैतिक प्रश्‍नवाचकता को चिह्नित किया है। इस मायने में वह हमारी स्‍वतंत्रता का विस्‍तार करता है, उसके प्रति हमारी जवाबदेही पुष्‍ट करता है।
अंत में अनुराग अवस्‍थी ने सभी को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।

समर्थों को जीने का सलीका सिखाती निरीहों की दुनिया : रामदेव शुक्ल

वरि‍ष्‍ठ लेखक और एंथ्रोपॉलोजि‍स्‍ट प्रबोध कुमार ने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। बेहतर दुनि‍या की तलाश करने वाले इस उपन्‍यास पर डॉ. रामदेव शुक्‍ल का आलोचनात्‍मक आलेख-

लोकतंत्र अबतक आजमाई गयी सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली है, किन्तु बीसवीं सदी में यह प्रणाली जितनी विकृत हुई है, उसकी कल्पना भी पहले कभी नहीं की गई। लोकतंत्र को भ्रष्ट करने वाले कौन हैं और कौन लोग सबसे ज्यादा लोकतंत्र के शत्रुओं के हाथों छले जाते है? इससे भी आगे बढ़कर वे उपाय कौन से हैं जो लोकतंत्र की बहाली कर सकते हैं? इन सवालों और इन जैसे अनेक सवालों के जवाब के लिए पंचतंत्र के शिल्प में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है- ‘निरीहों की दुनिया’, जिसके लेखक प्रबोध कुमार छठे-सातवें दशक में मानव-मन की अतल गहराइयों में झाँकने वाली कहानियाँ लिखने के लिए पहचाने जाते थे। इस कथा में प्रबोध कुमार कछुआ, कछुई, खरगोश और चिड़ियों के मन की गहराइयों में प्रवेश करके उनके अनुरूप भाव का अनुभव करते हैं। आधार सूत्र है किसी समय कछुआ और खरगोश की दौड़ में अप्रत्याशित रूप से खरगोश की हार और कछुए की जीत की कहानी। उन दोनों की दौड़ में आदमी का हस्तक्षेप लेखक ने इब्ने इंशा के माध्यम से दिखाया है, जिसने हार-जीत के निर्णय को एक शर्त के साथ जोड़ दिया कि जो जीतेगा, वह हारने वाले के कान काट लेगा। इस दौड़ में गंतव्य स्थल तक खरगोश पहले पहुँच गया और जब लम्बी प्रतीक्षा के बाद हारने वाला कछुआ नहीं आया तो मरने से पहले खरगोश वसीयत कर गया कि कछुआ जब भी वहाँ पहुँचे, उसके कान काट लिए जाएँ। उपन्यास में तीसरी दौड़ का सस्पेंस परी कथा में व्याप्त है। खरगोश नीम के टीले पर पहुँच गया है, कछुआ अपने ऊपर हुए पत्थरों के आक्रमण के बीच अपनी जान बचाकर कछुई के पास लौट आया है। आगे की बात सोची जा रही है। यहीं से चलकर कथा चक्राकार-भारतीय अवधारणा में काल-गति के अनुरूप सम्पन्न हो जाती है और पाठक कथा-रस के साथ अपनी शक्ति और सीमा के अनुसार लोकतंत्र के प्रति अपनी भूमिका को लेकर बेचैन हो उठता है।

कथाकार की अनेक बड़ी उपलब्धियों में एक है बच्चों को अपनी पकड़ में लेकर उनके दिलदिमाग पर छा जाने वाली सरल, तरल भाषा। हिन्दी में मुहावरा है- ‘यह बात उसने एक साँस में कह दी।’ इस उपन्यास की भाषा अर्द्धविराम आदि से लगभग मुक्त है। लगातार अनेक वाक्यों तक बातें ऐसी सरपट दौड़ती हैं कि जब पूर्ण विराम आता है, तभी पाठक को साँस लेने की सुधि आती है। ‘निरीहों की दुनिया’ की बोलती-बतियाती भाषा भावावेग के दबाव में उमड़ती-घुमड़ती बच्चों की भाषा है, जो पाठक की चेतना पर छा जाती है। ऐसी भाषा में प्रौढ़ों की गम्भीर समस्याओं को कदम-कदम पर इस कदर बिम्बित कर दिया गया है कि उनकी अर्थ व्यंजना बेचैन करती है और इस दारुण समय की विडम्बनाओं का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख देती है।

उपन्यास शुरू होता है, रास्ते में सड़क पर अपने ऊपर की गई पत्थरों की बौछार से बचकर अपने अड्डे लौट रहे कछुए को देखकर कछुई के गुस्से से। ‘कछुई के फूले मुँह को देख कछुआ बोला कुछ नहीं, बस एक ठंडी साँस ले उसके पास जा लेटा और आसपास में इधर-उधर भागने की कोशिश में बादलों की हर पल बनती-बिगड़ती शक्लें देखने लगा। कछुई का गुस्सा चिंता में बदल गया। दौड़ बीच में छोड़कर पहले वह जब भी अड्डे पर लौटा था तो सफाई देने के नाम पर किसी मजेदार घटना का वर्णन कर उसने खुश कर दिया था उसे और फिर दौड़ जारी करने तक का समय उन्होंने बच्चे पैदा करने में लगाया था। जरूर कोई गम्भीर बात है नहीं तो भला बच्चे पैदा करने का ऐसा अवसर कछुआ छोड़ता, यह सोच उसने कछुए की पीठ सहलाते जानना चाहा कि वह लौट कैसे आया ? कोई स्नेह से पीठ सहलाए तो सभी प्राणियों को अच्छा लगता है, उनका मनमरापन गायब हो जाता है और मन में छिपा रखा सब कुछ उड़ेल देने की इच्छा होने लगती है। कछुए के साथ भी यही हुआ।’

कछुए कछुई का यह शारीरिक मानसिक सहचार दाम्पत्य-रस का आस्वादन कराने वाला है, जो अन्य प्राणियों में तो अभी तक सुरक्षित है, किन्तु ‘सभ्य वैज्ञानिक’ होते जा रहे मनुष्य-समाज में दुर्लभ होता जा रहा है। कोई गम्भीर बात न होती तो इस अवसर को वे दोनों बच्चे पैदा करने के अवसर में बदल देते। इसी का नतीजा है कि ‘उसका कुटुम्ब इतना बड़ा हो गया है कि अब पोखरे में मुश्किल से समा रहा है।’ पृथ्वीरूपी पोखरे में यही हाल मानुष बच्चों के कारण भी हो रहा है, जिनके माता-पिता उस वर्ग के हैं जिनके जीवन में सुख के नाम पर केवल ‘रति सुख’ बचा है। इसका कारण यह है कि दुनिया की सत्तर फीसदी दौलत उनके कब्जे में है, जिनका श्रम केवल ‘रति श्रम’ है। श्रम और सुख की यह विषमता ही धरती को रसातल की ओर लिए जा रही है। कछुए ने दौड़ से लौटने का जो कारण बताया, वह सभ्य मनुष्य के असभ्य आचरण का नमूना है जो आज के समाज में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ‘यही कारण है कि अपने स्वाभाविक आवास से कटा हुआ हर प्राणी मनुष्य की छाया से भी दूर रहने में अपना कल्याण समझता है।’ यह उपन्यास कथाप्रवाह में यह भी बता देता है कि सृष्टि के अन्य प्राणियों के दारुण भय का कारण मनुष्य क्यों और कैसे बनता जा रहा है। कछुए-खरगोश की मस्ती भरी दुनिया में ‘आदमी’ के हस्तक्षेप से उपजी समस्या पर सोचने के लिए कछुई पोखरे में जाती है तो अनगिनत बच्चों में से एक उसकी पीठ पर सवार होकर वह सवाल पूछता है जो उसने पतंग उड़ाने वाले बच्चे के बाप से सुना है- ‘दुनिया में एक भी पेंच ऐसा नहीं है, जिसकी काट न हो।’ बच्चा जानना चाहता है कि यह बात वह जानती है या नहीं। प्रबोध कुमार यहाँ बालपन में उगने वाले प्रश्‍नों, उनके अचेतन मन में चले जाने और जीवन भर प्रभावित करते रहने को लाक्षणिक रूपक में रचते हैं। ‘बात मामूली थी लेकिन बचपन में ऐसी बातों को अद्भुत मान बच्चे हर किसी को इतनी बार सुनाते हैं कि बात बेचारी घबरा कर उनके मन की पिटारी में ऐसे छिपकर बैठ जाती है कि लाख ढूँढ़ने पर भी नही मिलती।’ कछुई के बहाने कथाकार भारतीय समाज की स्त्रियों की मनोदशा की एक तस्वीर बनाता है- ‘कछुई को औरतों की तरह पतंगबाजी से चिढ़ थी, जिसकी एक वजह यह भी थी कि पतंग की तरह वह आसमान में उड़ नहीं सकती थी।’ व्यथा भारी है कछुई की या औरतों की?

चतुर कछुई की सुरक्षा का पुख्ता प्रबन्ध करने के लिए कछुए को मुखिया तथा अपने को मुखिनी घोषित कर देती है। पूरे कछुआ समाज में इसे प्रसारित करा देती है। सत्ता का खेल शुरू होते ही ‘सत्ता के दलाल’ का प्रवेश होता है। ‘कछुई की चौथी बेटी के सातवें बेटे के भेष में स्कूल के बच्चों से सुन-सुनकर वह अंग्रेजी बोलने लगा है पर देसी बोली कामचलाऊ जानता है, क्योंकि वे बच्चे उसमें ज्यादा बात नहीं करते।’ भारत की शिक्षा ओर सारे ज्ञान पर एकाधिकार जताने वाले विलैती ज्ञानियों की एक झलक है यह। अंग्रेजीभाषी कछुआ मुखिनी से कछुआ समाज में अपने लिए नम्बर तीन का पद पक्का कर लेता है और अपना नाम डबल ओ सेवन (007)  चुन लेता है। आदमियों ने अपने लिए नम्बर से पहचाना जाना स्वीकार कर लिया है, इसलिए कछुआ समाज में भी नाम के लिए नम्बर का चलन होगा। मनचाहे नम्बर देने के लिए कछुओं से घूस लेने का काम अंग्रेजीभाषी कछुआ खुद ही शुरू कर देता है। अंग्रेजीभाषी कछुआ पूर्णतः निरीह कछुआ समाज को आधुनिक अंग्रेजी (विलायती) सभ्यता के सारे दुर्गुण सिखा देना चाहता है। इसके लिए जासूसी ऐय्यारी हथकण्डों से लेकर हथियार जमा करने और भ्रष्टाचार को सबकी चाहत बना देने की कोशिश करता है। उसका आखिरी लक्ष्य है प्रगाढ़ मित्र कछुआ और खरगोश में मित्रभेद उपजा कर कछुआ समाज का मुखिया बन जाना। खरगोश और कछुआ मित्र हैं, एक दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहते हैं। उनके लिए खेल मनोरंजन और त्याग भाव से युक्त है। अंग्रेजीभाषी कछुआ (007) खेल में किलर इंस्टिंक्ट (प्रतिस्पर्धी के प्रति घृणा और उसको मार कर जीतने की हिंसक भावना) की सीख देना चाहता है। आधुनिक सभ्य आदमियों की सारी बुराइयों से कछुआ समाज को भर देने की इच्छा से परिचालित डबल ओ सेवन किसी तरह शान्त, सुखी, सहज कछुआ-खरगोश, चिड़ियों की दुनिया मे जहर घोलना चाहता है। अंत में वे निरीह कैसे अपना बचाव करते हैं और अंग्रजीभाषी सत्ताकामी की परिणति क्या होती है, इसे जानने के लिए पाठक को उपन्यास का आखिरी शब्द तक पढ़ना पड़ेगा। चमत्कार यह कि उपन्यास पढ़ने के लि‍ए पाठक को अपनी ओर से प्रयत्‍न नहीं करना पडे़गा। एकबार पढ़ना शुरू करने पर उसकी पकड़ से छूटना गैरमुमकिन है।

मुक्तिबोध ने रचना को सभ्यता-समीक्षा कह दिया। हिन्दी आलोचक इस पर इतना लुब्ध हुआ कि आज लगभग हर किताब ‘सभ्यता-समीक्षा’ बताई जाती है। ‘निरीहों की दुनिया’ किस अर्थ में ‘सभ्यता-समीक्षा’ है ? यह उपन्यास बार-बार बताता है कि सभ्य आदमी कितना बर्बर हो गया है ओर सभ्यता की छाया से भी दूर निरीह पशुपक्षी परस्पर व्यवहार में कितने शिष्ट, भावनाप्रवण, सहनशील, त्यागी, सहज बचे हुए हैं। आदि काल से अब तक संतों ने जिस ‘रहनी’ की बात की है, वह अब पशुपक्षियों में ही सुरक्षित रह गयी है। आदमी तो इतना ‘सभ्य’ हो गया है कि लगभग ‘भस्मासुर’। इसीलिए पशुपक्षी आपस में तय करने जा रहे हैं कि जहां वे जन्मे और पले बढ़े हैं, उस जगह को छोड़ने की जरूरत न पड़े। इसके अलावा भी क्या कोई उपाय अपनाया जा सकता है जिससे आदमियों के बीच सुरक्षित रहा जा सके।’ मुखिया कछुआ सोचता है- ‘डबल ओ सेवन को उसके अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देना जरूरी है नहीं तो कछुआ समाज को आदमि‍यों में दिन पर दिन बढ़ती उन बुराइयों से बचाना मुश्किल हो जाएगा जिन्हें फैलाने की वह कोशिश कर रहा है।’ सभ्य मनुष्यों के समाजों ने अपनी-अपनी भाषाओं में इस प्रकार के मुहावरे गढ़ लिए हैं जिससे किसी ‘कदाचारी’ आदमी को ‘जानवर’ कह दिया जाता है। यह उपन्यास ऐसे मुहावरों को उलट कर ‘आदमियत’ की रक्षा करने की जुगत बताता है। इस समय सुविधा सम्पन्न नागरजन अपने बच्चों पर कितना अमानवीय अत्याचार कर रहें हैं, उन्हें ‘बड़ा’ बनाने की कोशिश में, इसे वे जानते भी नहीं। ‘‘कछुआ और खरगोश समाज में बच्चों को बच्चों की ही तरह पलने बढ़ने दिया जाता है, माने बच्चों की आदतों पर कोई लगाम नहीं लगाई जाती और इसीलिए इन समाजों में बच्चे बिल्कुल बच्चों की तरह प्यारे, नटखट, शैतान होते हैं और जैसा कि होना भी चाहिए। झगड़ते, मचलते ओर रूठते भी हैं।’’ बच्चों से आज उनका बचपन क्रूरतापूर्वक छीना जा रहा है, इसका रोना सभी रोते हैं। कछुआ और खरगोश अपने बच्चों को कैसे बढ़ने देते हैं आदमी उनसे सीख सके तो मनुष्यता नष्ट होने से बच सकती है। आदमियों को कछुआ सलाह देना चाहता है कि ‘‘टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाइल के ऊपर भरोसा न कर वे अपना अधिक से अधिक समय अपने बच्चों के साथ बिताएं। इससे दोनों को फायदा होगा। बड़ों की बातें बच्चे अपनी यादों की पिटारी में सहेज कर रख लेंगे और जब बड़ा बनने का मन हुआा तो पिटारी में से उन्हें निकाल लेंगे। बड़े भी बच्चों के साथ मिलते-जुलते रहने से अपने मन में कहीं गहरे दबी बचपन की यादों को ढूँढ़ निकालेंगे और अपनी ढलती उम्र की ऊब से राहत पाने के लिए उन यादों की मदद से कभी-कभी बच्चे बन जा सकेंगे।’’

‘शिक्षित’ और ‘समझदार’ बनाने के नाम पर आदमी अपने बच्चों को क्या बना देता है, मुखिनी कछुई का एक बयान यह बताने के लिए काफी है। ‘‘वह अभी तक यह समझती थी कि आदमी जन्म से ही बदमाश होते हैं, लेकिन जिस प्यार से पतंग उड़ाते एक लड़के ने उसके एक छोटे बच्चे को अपनी जेब में रखा और जिस प्यार से स्कूली लड़के-लड़कियां उसे खिलाते-पिलाते हैं और नई-नई बातें सिखाते हैं उससे अब वह इस नतीजे पर पहुंच रही है कि बालिग आदमियों से उनके लड़के-लड़कियों की जात अलग होती है।’’

निरीहों की दुनिया की आचार संहिता वही है, जिसका सपना मानव समाज के सच्चे पथप्रदर्शक सदा से देखते रहे हैं। कछुआ, खरगोश और चिड़ियों के समाज में किसी के ऊपर हंसना बुरा माना जाता है। अभिव्‍यक्‍ति‍ की स्वतंत्रता का कछुआ समाज में यह आलम है कि ‘किसी को भी बोलने से नहीं रोकना चाहिए।’ कछुआ समाज में कोई अपने को और कछुओं से ऊंचा समझे, इसे अच्छी बात नहीं माना जाता। डबल ओ सेवन आदमियों की नकल करके कछुआ समाज को बांटना चाहता है तो उसे दंड मिलना ही चाहिए। कछुआ समाज नंबर वाली बात को नकार देता है क्योंकि कछुआ समाज में तो नामों की जरूरत भी नहीं है। उनके लिए इतना जानना काफी है कि वे नर हैं या मादा, बच्चे हैं या बूढ़े। कछुआ समाज में बच्चों को भी दंडित नहीं किया जा सकता। खरगोश यहां तक सोचता है कि किसी का बच्चा कभी नहीं मरे। चिड़िया भी नहीं चाहती कि कोई मरे या घायल हो। आदमियों के समाज में बड़ी आसानी से उन्हें भी मुखिया बना दिया जाता है, जो कोई सजा काट चुके होते हैं, कछुआ समाज में ऐसा नहीं होता। कथाकार वर्तमान राजनीति के धुरंधरों की ‘राजनीति’ की एक झलक देते हैं- ‘‘कछुआ समाज में सबको पता रहता है कि अगला मुखिया कौन बनेगा’’ जबकि आदमियों के समाज में अपने लिए जेल जाने का अवसर आने पर मुख्यमंत्री अपनी निरक्षर पत्नी को मुख्यमंत्री बना देता है। आदमियों के समाज में मानवीय भावनाओं के नाम पर अमानवीय कृत्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं। एक है ‘भावनाओं का आहत होना’। एक फिल्म को और एक कला प्रदर्शनी के चित्रों को दर्शकों सहित जला दिया गया। कारण बताया गया कि फिल्म और चित्रों से जलाने वालों की भावनाएँ आहत हुई हैं। खरगोश एक खास बात यह बताया है कि दोनों जगहों की आक्रामक भीड़ के सभी सदस्यों के हाथों में कोई न कोई हथियार था, जबकि दर्शक पूरी तरह निहत्थे थे। वास्तव में जिनकी भावनाएँ आहत हुईं, फिल्म बनाने वाले, चित्रकार और दर्शक- उनकी ओर से कौन बोले? चिड़ियों का बसेरा उजड़ते देखकर खरगोश काटे गए पेड़ के शेष साथियों के पास जाकर कहता है- ‘‘एक निरीह अन्य निरीहों को सांत्वना छोड़कर और दे ही क्या सकता है?’’

यह उपन्यास ऐसे ही मर्मभेदी घटना-विन्यास के माध्यम से आत्मघाती दौड़ में शामिल सभ्य नागरिकों को आचरण की सभ्यता सिखाता चलता है।

पाठक की चेतना में अपनी बात बिठा देने के लिए कथाकार किस प्रकार के बिंब रचता है। एक उदाहरण- खरगोश अपने दोस्त कछुवे को बताना चाहता है, ‘‘बातों के भूखे को जबतक कोई सुनने वाला नहीं मिलता, तब तक वह उस मछली की तरह तड़पता है जिसे तपती बालू पर छोड़कर कोई कछुआ अपनी बीड़ी सुलगाने लगा हो।’’ ‘रेत की मछली’ हिन्दी भाषा का समर्थ मुहावरा है। इसी नाम का एक उपन्यास भी है। प्रबोध कुमार ने तपती रेत पर तड़पती मछली और बगल में अपनी बीड़ी सुलगाते कछुवे को साथ रखकर जीवन्त बिंब निर्मित कर दिया है। इस उपन्यास की भाषा एक शब्द में भी बिंब रचती है। मनमरापन, गुत्थमगुत्था, खोजीपने की आदत, लादीपोटी जैसे देशी शब्द पूरे दृश्य को मूर्त कर देते हैं।

वकील और पत्रकार बुद्धि व्यवसाय और लेखन कौशल के बल पर स्याह को सफेद करने को अपनी उपलब्धि मानते हैं। डबल ओ सेवन वकील की सलाह मुखिया कछुआ को सुनाता है- ‘‘मुखिया यदि हारी बाजी जीतना चाहता है तो उसे अपने में किलर इंस्टिंक्ट पैदा करना होगा और उसके लिए यह जरूरी है कि मुखिया खरगोश से इतनी नफरत करने लगे कि उसे मार डालने के लिए तैयार हो जाए।’’ वह आगे कहता है कि ‘‘वकील बहुत लालची होते हैं और उनसे भी बढ़कर लालची होते हैं पत्रकार, जिनकी जरूरत असली खरगोश को नकली साबित करने के लिए पड़ेगी।’’ जघन्य अपराधों का वर्णन करते समय ‘‘पत्रकार मसालेदार, दिलचस्प और रोचक जैसे शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं।’’ दूसरी ओर खरगोश को बेहोश करके उसके पेट से सभी अंग काटकर निकाले जाने के बाद भी खरगोश की नींद न टूटने को ‘मजेदार बात’ कह देने के लिए खरगोश माफी माँगता है।

हिंसा, आतंक, प्रदूषण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अमानवीय शोषण जैसी ज्वलंत समस्याएँ इस कथा में पशुपक्षियों की जबानी बच्चों की समझ में आने वाली झरने की तरह प्रवाहित प्रसन्न भाषा में मूर्त कर दी गई है। इस अद्भुत कथा को पढ़कर 1909 ई. में लिखी महात्मा गाँधी की किताब ‘हिन्द स्वराज’ याद आती है। उसमें वकील, जज, डॉक्टर आदि को आदमी के स्वास्थ्य और सहज न्याय का वध करने वालों के रूप में देखा गया है। विश्‍वविख्यात शिकारी और कथा लेखक जिम कारबेट ने अपने संस्मरणों के संग्रह ‘माई इण्डिया’ में आदिवासियों के चित्त में बसी न्याय-भावना के उत्कृष्ट उदाहरण देकर बताया है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय समाज में सहज न्याय भावना थी। उसे अंग्रेजों ने अपने कानून और उसके व्यवहार से नष्ट कर दिया। पशुपक्षियों के रूपक में लिखी विश्‍वविख्यात व्यंग्य कथा ‘एनीमल फार्म’ को भी स्मरण किया जा सकता है। जार्ज आरवेल ने कम्युनिस्ट व्यवस्था के मॉडल की परिणति बताई है। एक फार्म हाउस के दो युवा सूअर नेपोलियन और स्नोबाल दो पैर वालों के विरुद्ध वि‍द्रोह करके सभी जानवरों के नेता बन जाते हैं। अंतिम दृश्य में वे दोनों मोटे गद्दों पर लेटकर सेब का रस पीते हुए दिखाई पड़ते हैं और श्रमिक बैल, घोड़े सूखी घास चबाने की नियति झेल रहे हैं। ‘निरीहों की दुनिया’ अत्याचारियों के प्रति न घृणा का पोषण करती है, न व्यंग्य का। इस दुनिया में दुश्मन के प्रति भी करुणा और मैत्री की अंतःसलिला प्रवाहित है। हथियार को सबकुछ मानने और उसी की तिजारत के बल पर पूरी पृथ्वी को विनाश की कगार पर ला खड़ा करने वालों को अभ्यासवश मनुष्य भले कह दिया जाय, उनकी असलियत क्या है, यह बात ‘निरीहों की दुनिया’ इस तरह बयान करती है- ‘‘आदमियों का कोई भरोसा नहीं। खरगोशों और कछुओं को तो वे मारते ही हैं पर उनसे भी बहुत बहुत ज्यादा वे उन आदमियों को मार डालते हैं जो बिल्कुल उन्हीं जैसे होते हैं। सच तो यह है कि आदमी ने पता लगा लिया है कि हथियार से बढ़कर कोई ताकत दुनिया में नहीं है और जिसके पास हथियार है वह जो मन चाहे कर सकता है।’’ पाठक की चेतना में कुवैत, ईराक, अफगानिस्तान जैसे दृश्य अपने आप उभर आते हैं। खरगोश आगे कहता है- ‘‘हथियार हाथ में होने से वह खरगोशों, कछुओं की कौन कहे बड़े-बड़े जानवरों और अच्छे बुरे सभी तरह के लोगों की हत्या कर सकता है। ऐसे में खरगोश और कछुए जैसे निरीह प्राणी उससे अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं ?’’

कथा के आखिरी पृष्ठ पर मुखिनी कहती है- ‘‘आदमी से बचने का सबसे सरल उपाय उसके हथियार से दूर रहना है, क्योंकि बिना हथियार के वह उन्हीं जैसे निरीह होता है।’’ कछुआ उस दुनिया के बारे में सोचने लगता है जो सिर्फ निरीह प्राणियों की होगी। विश्‍व से सारे हथियारों के मिट जाने के बाद आदमी भी निरीह प्राणियों में शुमार हो जाएगा। तब उसके पास प्रेम, सहजीवन और त्याग की अपराजेय शक्ति होगी। खरगोश कछुए की तीसरी दौड़ खारिज कर दी जाती है। कथाकार बच्चों की कथालिप्सा का पोषण करते हुए मुखिनी से कहलवाते हैं- ‘‘यह खारिज दौड़ जब भी हो तो निरीहों की दुनिया की पहली खरगोश और कछुए की दौड़ होगी।’’

यह पंचतंत्र-परम्परा की वह कथा है जो कूटनीति को भी हथियार की तरह ही त्याज्य समझकर खारिज कर देती है। अपने समय की जटिलता से सहमे हुए, बेहतर दुनिया की तलाश करने वाले प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को यह उपन्यास बेहद आत्मीय लगेगा। लेखक के प्रति कृतज्ञता और प्रकाशक को बधाई।

पुस्तक : नि‍रीहों की दुनि‍या, पृष्ठ  : 136, मूल्य  : 70 रुपये
प्रकाशक- रोशनाई प्रकाशन, 212 सी.एल./ए., अशोक मि‍त्र रोड,
कांचरापाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्‍चि‍म बंगाल

जोसेफ मेकवान को मत भूलिए

जोसेफ मेकवान

गुजराती के महत्वपूर्ण कथाकार जोसेफ मेकवान को उनके उपन्यास आंगलियात के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है। उनसे करीब तीन साल पहले परिचय हुआ था। अकसर फोन पर लंबी बातचीत होती, लेकिन मिलना नहीं हुआ। दो-तीन दिन पहले फोन किया तो दुखद समाचार मिला कि उनका 28 मार्च को देहांत हो गया है। इससे भी ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि मीडिया में इस बारे में कोई खबर नहीं छपी। एक महत्वपूर्ण रचनाकार के संबंध में इस तरह की उपेक्षा अफसोसजनक है।
श्रद्धांजलि स्वरूप उनके बारे में आलेख-

जोसेफ मेकवान का जन्म 9 अक्तूबर, 1935 को खेड़ा जिले की आणंद तहसील के गांव त्रणोल में हुआ। उसके पिता डाहयाभाई रोमन कैथालिक चर्च के मिशनरी केटेकिस्ट (अध्यापक) एवं धर्म प्रचारक थे।
डाहयाभाई खाते-पीते, समृद्ध परिवार के वारिस थे। 26 बीघा जमीन थी। छह दुधारू भैंसें थीं। जोसेफ की दादी का नाम धन्नी मां (धनवाली) था। घर-खेत के पूरे कामकाज पर उनका अधिकार था। कहा जाता था कि धन्नी डोसी (बुढिय़ा) के टोकरी भर गहने हैं। वह छोटे बेटे से बार-बार बहियां लिखवातीं और लेनदारों से सूद वसूलने खुद दौड़-धूप करती थीं।
डाहयाभाई नौंवी तक पढ़े थे। उन्होंने बाइबिल की थीम पर ‘डेविड और गोलियाथ’, ‘सयाना राजा साऊल’, ‘महान मोजेज’, ‘जोसेफ एवं उसके भाई’ तथा ‘सच्चा दोस्त’, ‘धन्य वह जो मथ्था (सिर) दे दे’ और ‘अब जागो’ सामाजिक नाटक लिखे थे। वह निर्देशन और अभिनय भी करते थे। गुजराती के विख्यात रंगकर्मी एवं अभिनेता चीमन मारवाड़ी से उनकी दोस्ती थी।
डाहयाभाई पहनावे के शौकीन थे। रंगीन मिजाज और अय्याश किस्म के थे। शास्त्रीय संगीत के अनुरागी थे। खूब गाते थे। उनके छह विवाह हुए। बाल विवाह की स्त्री पसंद न आने पर उससे गौना ही नहीं किया। नाता तोड़ दिया। दूसरी शादी की। वह निपट गंवारू निकली। तीसरा विवाह गंगा से हुआ। सुहागरात को वह घुंघट तान कर उलटे मुंह बैठ गई। पूछने पर पता चला कि उनसे पहले उनके ममेरे भाई की मंगनी हुई थी। मायके वालों ने हामी कर दी थी। बाद में उनसे मंगनी हो गई। खाता-पीता घर देखकर मायके वालों ने पहली मंगनी नकार दी। दूसरी कबूल कर ली। गंगा के मन में यही मलाल था।
डाहयाभाई ने पूछा, ”क्या तुम्हें यह घर पसंद नहीं है?”
गंगा ने कहा, ”मैंने उनको बैन दिया था। चाहे वे गरीब रहे। मेरा मन नहीं मानता।”
यह सुनकर वह बाहर निकल गए। दूसरे दिन भाई के साथ गंगा को उसके मायके सादर पहुंचा दिया। समाज का दंड भुगत लिया। एक ही महीने में गंगा का पुनर्विवाह ममेरे भाई के साथ करा दिया।
चौथे विवाह में उनसे धोखा किया गया। तब तक वे बाइस साल के हो चुके थे। पांचवी शादी जोसेफ  की मां हीरी बहन से हुई। इन दोनों का गृहस्थ जीवन नौ साल चला।
1938 में हीरी बहन को टी.बी. हो गई। उस जमाने में यह असाध्य रोग था। इसलिए डाहयाभाई ने मान लिया कि अब यह बचने वाली नहीं है। उनका पत्नी की ओर से दिल-दिमाग उचट गया। हीरी बहन करीब सात माह तक अस्पताल में रहीं। डाहयाभाई उस दौरान गांव खंभोलज में मिशनरी महकमे में तैनात थे। उसी गांव की एक तलाकशुदा औरत दिवाली बहन से उनकी आंखें लड़ गईं। वह बहुत खूबसूरत थी। जब हीरी बहन वापस आईं, तब तक बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी। वह सब जान चुकी थीं। एक दिन कुंए पर जाकर दिवाली बहन से मिलीं। उससे गुहार लगाई कि अब जीने का मन नहीं रहा है। मैं तो मर जाऊंगी। ये अवश्य तेरे साथ विवाह कर लेंगे। मेरे दो बेटे हैं। इन्हें प्यार से पालने-पोसने का वचन दे दो तो तुम्हारा सौभाग्य अमर रहे, ऐसा आशीष देती जाऊंगी। दिवाली बहन ने कोई जवाब नहीं दिया और मुंह चढ़ाकर चली गई।
चौथे दिन रविवार था। खंभोलज से ओड आठ मील की दूरी पर था। डाहयाभाई के छोटे भाई सोमभाई भाभी को लेने बैलगाड़ी लेकर आने वाले थे। लेकिन उन्होंने पति के साथ पैदल चलने का आग्रह किया। वह पति से सच्ची बात जानना चाहती थीं।
जोसेफ और उसका पांच साल बड़ा भाई मनु बाते करते, खेलते थोड़ा आगे चल रहे थे। हीरी का स्वर पति के साथ उलझ रहा था। मनु बार-बार पीछे मुड़कर देख लेता। वह कुछ-कुछ समझता था। इसलिए चिंता में था।
अचानक हीरी बहन के कंठ से करुण चीख निकली। मुड़कर देखते ही जोसेफ और मनु सहम गए। हीरी बहन नीचे पड़ी थी और डाहयाभाई उसे छाते से बेरहमी से पीट रहे थे। उन पर मानों शैतान सवार हो गया था। हीरी बहन के लिए यह अनेपक्षित था। वह बीच-बचाव का कोई प्रयास नहीं कर रही थीं। डर के मारे जोसेफ का पेशाब निकल गया। वह जोर-जोर से चीख-पुकार कर रोने लगा। मनु से नहीं रहा गया। वह झपटा और पिता की कोहनी पर दांत गड़ा दिए। उनके हाथ से छाता छूट गया। वे कोहनी छुड़ाने का प्रयास करने लगे। लेकिन छुड़वा नहीं पाए। उनका दूसरा हाथ मारने के लिए उठा भी, लेकिन शर्मिंदगी के कारण ठिठक गए। आखिर खून की उल्टी करती हीरी बहन ने लडख़ड़ाते स्वर में कहा, ”छोड़ दे बेटे! ये तो हमें मार डालने के लिए पैदा हुए हैं।”
मां के स्वर ने मनु को पिघला दिया। डाहयाभाई का झटका और मनु का जबड़ा खोलना एक साथ हुआ। इससे लगे धक्के से वह झड़बेरी की झाड़ी में जा फंसा। कांटों से उसकी छाती और पीठ छलनी हो गई। वह ज्यों-ज्यों कंटीली झाडिय़ों से अपने को छुड़ाने का प्रयास करता, त्यों-त्यों और अधिक फंसता जाता।
इस अशुभ घटना ने जोसेफ के बाल सुलभ मन को मार दिया- पिता मेरे लिए मर गया। गोदी में बिठाकर निवाले खिलाते, कंधे पर बिठाकर मौज कराते, बड़े चाव से नहलाते और कपड़े पहनाते, रात को कहानियां सुनाते, लोरियां गाकर सुलाते पिता की छवि धूमिल हो गई।
बैलगाड़ी लेकर आते सोमभाई ने जोसेफ की आवाज सुन ली। वह बैलगाड़ी को छोड़कर उस ओर दौड़ पड़े। करीब आकर उन्होंने यह दृश्य देखा तो मानों उन्हें काठ मार गया। वह बड़े भाई का बहुत आदर करते थे। भाभी को मां की तरह चाहते थे। वह कुछ नहीं बोले, तिरस्कृत नजरों से भाई को घूरते रहे। डाहयाभाई छोटे भाई की आंखों से आंखें नहीं मिला सके और मुंह मोड़कर वापस चले गए।
सोमभाई ने पहले मनु को कांटों से मुक्त कराया। फिर भाभी को उठाकर गाड़ी पर रखे गुदड़ पर लिटा दिया। जोसेफ को गोद में लिया और बैलगाड़ी चला दी।
उसी शाम धन्नी मां ने डाहयाभाई को बुलावा भेजा। शाम के धुंधलके में वे आए। धन्नी मां औसरे में बैठी थीं। डाहयाभाई देहरी पर पैर रख ही रहे थे कि वह चिल्लाईं, ”मेरे घर की देहरी पर पैर रखकर उसे छूत मत लगा। कान खोलकर सुन ले। आज से तू मेरे लिए मर गया। यदि मैं मर भी जाऊं तो मेरे मुर्दा शरीर पर मिट्टी डालने भी मत आना। मेरी अवगति होगी। मुझे मुंह मत दिखा। बस लौट जा।” वह अंदर चली गईं।
डाहयाभाई का चेहरा उतरा हुआ था। कोहनी पर पट्टी बंधी थी। पहनावा सादा था। पैर में जूते तक नहीं थे। दोपहर को उन्होंने शायद खाना नहीं खाया था। जब वह जाने लगे तो पास वाले दूसरे घर के किवाड़ की ओट में खड़ी जोसेफ की छोटी चाची जवेरबा मनौवल करने लगी, ”जेठजी, बिना खाये-पीये मत जाइए। मैंने खिचड़ी और गर्म दूध रखा है। थोड़ा खाते जाइए।”
एक पल के लिए वह ठिठके फिर चले गए। इस हादसे के बाद से हीरी बहन की जीने की इच्छा नहीं रही। लाख मनाने पर भी वह दूध-घी आदि पौष्टिक आहार नहीं लेतीं। वह बार-बार देवरानी जवेरबा से चिरौरी करतीं कि मनु को भी गोद ले ले। चाचा-चाची निसंतान थे। दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते थे। दूध, दही, घी, मक्खन से बच्चे पुष्ट हों इसलिए ज्यादातर वे गांव में दादी के साथ ही रहते थे।
उस हादसे को दो महीने बीत गए थे। सितंबर का महीना था। हीरी बहन के चेहरे पर अजीब-सी दीप्ति थी। सास, देवरानी और ननद, सभी गहरी चिंता में पड़ गईं। देवर दु:खी थे। पर हीरी बहन खुश थीं। उन्होंने साग्रह देवरानी और ननद की सहायता से स्नान किया। नई साड़ी पहनी। लंबे बालों में वेणी गुंथवाई। देवरानी से हलवा बनवाया। अपने हाथों से दोनों बेटों को खिलाया, खुद भी खाया। फिर जोसेफ को आदेश दिया कि अब नाटक खेलो। दिसंबर में क्रिसमस-नाताल की रात को पिता द्वारा लिखे नाटक ‘विलहेम टेईल’ को बच्चे खेलते थे। विलहेम का बेटा वॉल्टेर जोसेफ बना था। उसे नाटक के कई संवाद याद थे। मां को खुश करने के लिए वह कई बार यह नाटक खेल चुका था। उस रात भी उसने यही किया। बूट, मौजे, कोट, पतलून, फैल्टकैप से मनु ने उसे सजाया। नाटक शुरू हुआ। गेस्लर नाम का अधिकारी विलहेम की तीरंदाजी को परखने के लिए उसके बेटे वॉल्टेर के सिर पर सफरजन (सेब) रखकर उसे बींधने का आदेश देता है। विलहेम पशोपेश में पड़ जाता है। वॉल्टेर कहता है, ”आप बिना किसी डर और चिंता के तीर चलाइये पिताजी। मैं तिलभर हिलूंगा नहीं। निशाना लगेगा ही। आपका लक्ष्य कभी निष्फल नहीं जाता।”
इस संवाद को सुनते ही हीरी बहन की ‘हायÓ निकल गई। सांसों की छूत के डर से वह कभी बच्चों को पास फटकने भी नहीं देती थीं, लेकिन जोसेफ को खींचकर छाती से लगा लिया और सुबक पड़ी, ”मुझे चारों और अंधेरा ही अंधेरा दिखता है, बेटे। मुझे पता नहीं, तुम कैसे जी पाओगे।” जवेरबा जोसेफ को पास वाले घर में ले गई। वह वहां सो गया। सुबह उठा तो सारा घर स्त्रियों से भरा था। चाची, बुआ, दादी सब रो रहे थे। सोमभाई की आंखें सुर्ख हो गई थीं। मनु पागल सा हो गया था। डाहयाभाई आ गए थे। वह सबसे दूर सिर झुकाए बैठे थे।
दोपहर को श्मशान यात्रा शुरू हुई। रिवाज के अनुसार पति अपनी पत्नी की अर्थी को दाहिनी ओर कंधा देता है। पति जिंदा न हो तो यह रस्म बड़ा बेटा निभाता है। अर्थी उठाते समय डाहयाभाई आगे बढ़े तो सोमभाई ने सिर हिलाकर मना कर दिया। वह स्वयं आगे बढ़े। ग्यारह साल के मनु को साथ रखा और अपने दाहिने कंधे पर अर्थी उठा ली। दफन क्रिया में मिट्टी की रस्म सोमभाई और दोनों बेटों ने निभायी। डाहयाभाई को पति का एक भी फर्ज अदा नहीं करने दिया। यह धन्नी मां का हुक्म था।
हीरी बहन की मृत्यु के बाद जवेरबा ने जोसेफ को मनु के साथ पाठशाला भेजा। मनु चौथी कक्षा में पढ़ता था। वह और उसके साथी कविताएं गाया करते थे। मास्टरजी हुक्का पिया करते थे। लड़कों की कविताओं की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती थी। लोगों को लगता कि स्कूल अच्छा चल रहा है। मनु पढऩे में होनहार था। एक बार पढ़ लेने पर ही उसे कविता या पाठ याद हो जाता था। उसकी तथा साथियों को कविताएं सुन-सुनकर जोसेफ को भी तीसरी और चौथी कक्षा की सभी कविताएं याद हो गईं। सुर सुरीला था। एक दिन मास्टरनी ने उसे गाते सुन लिया। सबको शांत कर उसे अकेले गाने का आदेश दिया। उसे संकोच हुआ। मनु ने हिम्मत बंधाई। मास्टरनी मुंह न देखे इसलिए आगे किताब रख दी। कविता पूरी हुई तो कमरा तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज गया। तब भौंरे वाली कविता की फरमाइश हुई। पहली मुर्गे वाली थी। उसमें मुर्गे का चित्र था। इसलिए किताब सीधी पकड़ी थी। भौंरे वाली किताब पर चित्र नहीं था। उल्टी किताब पकड़े जोसेफ गा रहा था। सभी बच्चे मुंह दबाकर हंस रहे थे। जोसेफ को यह बात मालूम हुई तो वह वह रो पड़ा। इस फजीहत को खत्म करने के लिए मनु ने उसे अक्षरों की पहचान करवाई। हर एक शब्द पर अंगुली रखकर पढऩा सिखाया।
जोसेफ बिना मां का बच्चा था। मास्टरनी उसे बहुत चाहती थी। उनका प्यार करुणा से आद्र्र होता था। बिना एडमिशन लिए ही जोसेफ पढऩा सीख गया। वह पढऩे में होनहार था। सीधे दूसरी कक्षा में भर्ती करा दिया गया। सालाना इम्तहान में वह प्रथम आया।
पत्नी की मौत का कोई गम किए बिना डाहयाभाई ने चौथे ही महीने अपनी प्रेमिका से सगाई कर ली।
धन्नी मां ने जाना तो पुत्र को बुलाकर सुना दिया, ”देखो, बहुत मनमानी करते रहे हो। पर मेरे जीते जी उस औरत का पैर मैं अपने घर में नहीं पडऩे दूंगी।”
डाहयाभाई नहीं माने। शादी की तैयारी होने लगीं। उन्होंने सोमभाई को किसी तरह मना लिया। जिस रोज बारात जाने वाली थी, उसकी पहली रात को धन्नी मां ने बेटी से दूध गरम करवाया। उसमें ढाई-तीन तौला अफीम मिलाकर पी लिया। रोज दूध पीते समय घर की बिल्ली के लिए दो-तीन घूंट दूध रख छोड़ती थीं। बिल्ली ने खाली कटोरा चाटा और मुंह फेर लिया। छोटी बेटी ने यह भांप लिया।
कटोरे में स्याह परत देखकर उन्होंने पूछा, ”मां, अफीम तो नहीं घोला?”
”हां बेटी, वही किया। मैंने कहा था कि मेरे जीते जी उस औरत के पैर घर में नहीं पडऩे दूंगी, न उसका मुंह देखूंगी। यह कपूत मेरी एक नहीं सुनता। मैं भी अपने जबान पर अटल हूं। सोने जैसी मेरी बहू की मौत का लोकाचार भी पूरा नहीं हुआ है और यह फिर ब्याहने घोड़े चढ़ रहा है। मैं इस घर में अच्छा शगुन नहीं छोडूंग़ी।” धन्नी मां रो पड़ी।
उस रात ढाई बजे वह मर गईं। छोटी बेटी सारी रात अकेली मृत मां का हाथ पकड़े बैठी सुबकती रही। मरने से पहले धन्नी मां ने उससे कहा था, ”सुबह का मुर्गा न बोले, तब तक मेरी मौत पर रोना मत।”(गुजराती में इसे मरणपोक कहते हैं)
सुबह होते ही वह गला फाड़कर रो पड़ी। पास वाले घर से सोमभाई और जवेरबा दौड़ आये। मनु ने जोसेफ को झकझोरा, ”चल उठ, दादी मां भी मर गई।”
खबर मिलते ही डाहयाभाई भी दौड़कर आए। बड़ी बेटी के आने पर दोपहर डेढ़ बजे श्मशान यात्रा शुरू हुई। कब्र में अंतिम पानी डालने की रस्म जोसेफ ने निभायी। धन्नी मां को दाहिना कंधा सोमभाई ने दिया। ढाई बजे सब लौट गए। स्नानादि से निपटकर साढ़े तीन बजे डाहयाभाई की बारात सजी।
मान-मनौवल कर सोमभाई ने दोनों भतीजों को भी बाराती बनाया। दूसरे दिन चर्च में लग्न विधि हुई। दस बजे विदाई हुई। सभी पैदल चल रहे थे। किसी ने जोसेफ से कहा, ”तू पैदल क्यों चल रहा है? जा तेरी नई मां गोद में ले लेगी।” नई मां ने सुना और उसे गोद में ले लिया।
रास्ते में वह स्थान पड़ा, जहां मां के साथ वारदात हुई थी। मनु के मुंह से चीख निकल गई, ”जोशिया, देख अपनी मां वाली जगह। उतर जा। उसके पास हम नहीं जा सकते।” जोसेफ नई मां की गोद से जबरदस्ती छूट कर भाई के पास दौड़ गया। मनु और सोमभाई भीगी आंखों से उस जगह को निहार रहे थे। डाहयाभाई कुछ दूरी पर अपने दोस्त से बात कर रहे थे। वे वहीं खड़े रहे। नई मां कुछ समझी नहीं। पर उसी क्षण से जोसेफ उसकी नजरों से उतर गया।
अच्छा-खासा, भला-चंगा मनु नई मां के आते ही मुरझा गया। वह ठीक से खाता-पीता नहीं। सदैव झींकता रहता। दो महीने में वह सूखकर कांटा हो गया। तीन दिन बीमार रहा और एक दिन शाम को चल बसा। घर में सभी रो रहे थे। नई मां अप्रभावित थीं। न उनके आंसू थे, न चेहरे पर दर्द।
मनु की मौत के दूसरे महीने सोमभाई का दाहिना घुटना फूलने लगा। उसमें असह्य दर्द होने लगा। बहुत इलाज किया। यहां तक की लोहा गर्म करके पांच दाग भी दागे गए। लेकिन आराम नहीं हुआ। आखिरकार आणंद के साल्वेशन आर्मी अस्पताल में मेंडोकूक साहब ने जांघ से पैर काट दिया। दो महीने में ही वह बैशाखियों के सहारे चलने लगे।
जवेरबा भैंसों के चारे के लिए तड़के ही खेत में चली जाती थी। जिस रोज नई मां रोटियां सेंकती थीं, जोसेफ के लिए कम पड़ जाती थीं। वह चिल्लाने लगता और नई मां से जो मुंह में आए बोल देता।
उस रोज जवेरबा ननद की सुसराल गई थीं। दिवाली बहन और डाहयाभाई खेत में से जैसे ही आए भूख से परेशान जोसेफ बोल पड़ा, ”रोटी रखने के बक्से में ताला क्यों लगता है? मेरे लिए दही-रोटी क्यों नहीं रखी? जिस दिन तुम रोटी पकाती हो… मेरा पेट काटती हो…।”
डाहयाभाई आपे से बाहर हो गए। चारे की गठरी पटककर वह उसकी ओर लपके। एक भरपूर तमाचा कनपटी पर जड़ दिया। जोसेफ गिर पड़ा। वह बाल पकड़कर उसे पीटने लगे। झुंझलाहट के मारे उन्होंने उसे दीवार की ओर धक्का दे दिया। वह उखल पर जा गिरा। बाईं ओर सिर पर एक ईंच गहरा घाव हो गया। ज्वर के कारण सोमभाई पास वाले घर में सो रहे थे। जोसेफ की चीख-पुकार सुन वह दौड़कर आए। जीवन में उन्होंने पहली बार बड़े भाई को ललकारा, ”आप पड़साल (औसारा) से नीचे उतर जाइए। वर्ना मेरी बैशाखी आपकी सगी नहीं होगी। एक को तो मार डाला। अब दूसरे का भी खून कर रहे हो।”
डाहयाभाई मुंह लटकाये पड़साल से उतर गए। दिवाली बहन भी डरकर कोने में दुबक गई।
सोमभाई अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहे थे। भयंकर क्रोध की कंपन और जोसेफ की चिंता में वह लडख़ड़ाकर गिर पड़े। पूरा बोझ कटी हुई टांग पर पड़ा। कठोर धरती ने रुझान भरे आवरण को कुचल डाला। सारा पड़साल खून से भर गया। खून रुक नहीं रहा था। धर्मादा दवाखाने के डॉक्टर ने दवा और पट्टी बांधकर बड़े अस्पताल ले जाने को कहा। बैलगाड़ी जोत कर उन्हें आणंद ले जाया गया। तब तक बहुत रक्त बह चुका था। वह बेहोश हो गए। डॉक्टर कूक के कारण वह बच तो गए, लेकिन फिर अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाए। डेढ़-दो महीने में साढ़े तीन मन की काया कंकाल सी हो गई। फिर एक उदास सांझ को उन्होंने अपनी पत्नी को पास बुलाया और सिरहाने खड़े रहने को कहा। वह आंखों में दृष्टि लगाए कुछ देर देखते रहे, फिर उनका सिर दाईं ओर लुढ़क गया, जहां जोसेफ बैठा था। पछाड़ खाकर जवेरबा गिर पड़ीं।
मातमपुर्सी और लोकाचार के साथ महीना बीत गया। अब साड़ी बदलवाने* की रस्म आई। छोटी ननद उन्हें नहला रही थी। तब उन्होंने कहा, ”ननदजी, तुम्हारे भाई का वंश मेरी कोख में पल रहा है। तीन महीनों से मेरे कपड़े नहीं आए। तुम्हारे भाई यदि यह जानते तो वे जी जाते। अब जेठजी से इतनी गुहार कीजिए कि पास वाला घर मुझे दे दें। जोशिया को लेकर मैं वहीं रहूंगी। खेत, घर और भैंसों का काम मैं कर लूंगी।”
भाई की मौत के बाद पहली बार छोटी बुआ के होंठो पर खुशी छा गई। भाभी को उसने बांहों में भर लिया। नई साड़ी पहनाकर केशों में बेणी सजाई। इसका मतलब था कि वैधव्य धर्म का पालन करते हुए वह अब आजीवन पति का घर नहीं छोड़ेगी। यह देख डाहयाभाई का माथा ठनका। उन्होंने छोटी बहन से पूछा। उसने सारी बात बता दी।
दिवाली बहन को यह कतई पसंद नहीं था कि जवेरबा का बेटा आधी मिल्कियत का भागीदार बने। अंतत: उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध मायके भेज दिया गया। घर छोड़ते समय वह इतनी बेजार थी कि जोसेफ को भी साथ ले चलीं। इतना भी ध्यान नहीं रहा कि इसे साथ नहीं ले जा सकती। जब वह जा रही थीं, खेत से लौटती लाडो मिल गई। वह उनके मातहत मणिभाई चमार की पत्नी थी। ये लोग घर और खेत में काम करते थे। इनसे रोटी, पानी का व्यवहार न था,  लेकिन लाडो इतना घुलमिल गई थी कि धन्नी मां से आंखें बचाकर रोटियों सेंक देती, विलौना चला दिया करती थी।
लाडो जोसेफ को अपने घर ले गई। जानती थी फिर भी खाना बनाकर खिलाया। वहीं सुला दिया। चार बजने को आए तब उसके हाथ-मुंह धुलाकर घर भेजने चल दी।
डाहयाभाई बाहर बैठे हुक्का पी रहे थे। वह घूंघट ताने, जरा तिरछी होकर बोली, ”बड़े ताऊजी, छोटी भौजी आज सुबह पीहर चली गईं। वह तो नहीं चाहतीं, पर पेट छुट्टा होने पर शायद इनका दूसरा विवाह हो जाएगा। आपने उसे सहारा दिया होता तो छोटे चाचा के बेटे को यहीं जन्म देतीं।”
डाहयाभाई मौन-मूक सुनते रहे।
”एक और अर्ज गुजारती हूं।” वह जोसेफ को आगे धकेल कर बोलीं, ”इस नन्हे की बद्दुआ न लीजिएगा।”
अंधेरा उतरा। दीया-बाती हो गई। पड़साल में बैठे जोसेफ की किसी को चिंता न थी। ऐसे की किवाड़ बंद हो जाएंगे, यह सोचकर उसकी रूलाई फूट गई। सामने वाले घर से जीवी काकी निकल आईं और कहने लगीं, ”अरे रोता क्यों हैं रे? तेरी चाची कहां गई?”
यह सुनकर दिवाली बहन बाहर निकली, ”यह मेरी आबरू किरकिरी करके ही रहेगा। नई मां जो हूं। कब की खाने को बुलाती हूं, पर सुनता ही नहीं।”
इतने में डाहयाभाई आ गए। पिता के डर से जोसेफ भीतर चला गया। दिवाली बहन ने एक प्लेट उसकी ओर ठेल दी। इसमें बची-खुची थोड़ी-सी खिचड़ी थी। घी नहीं था। ज्यादा घी नहीं लेने की रोज चाची से हठ करता था। पर आज उसकी समझ में आ गया कि लाड़-प्यार के दिन अब लद गए हैं। वक्तपर अच्छा-पेट भर कर खाना अब शायद ही मयस्सर हो।
उस रात जोसेफ को पड़साल में अकेला सोने के लिए छोड़ दिया गया। जाड़े का मौसम। खुली पड़साल में सनसनाती ठंडी हवा में छोटी-सी खटिया में पतली गुदड़ी ओढ़े, घुटने छाती से लगाए वह दुबका पड़ा था। बहुत डर लग रहा था। टावर में ग्यारह के टकोरे लगे और लाल कुतिया आ गई। उसने जोसेफ को सूंघा। जरा-सी कू-कू की और खाट के नीचे सो गई। उसकी उपस्थिति ने जोसेफ के डर को दूर कर दिया। उसे लगा जैसे- तारों में छिपी मां ने कुतिया को भेज उसे अकेला नहीं छोड़ा। निश्चिंत मन से वह सो गया। रात को ठंड का प्रकोप बढ़ा। कुतिया खाट पर चढ़ आई। इसका जोसेफ को पता नहीं चला। कुतिया की देह की गर्माहट से उसे ऊष्मा मिली। वह खूब सोया और सुबह तरोताजा जागा। बगैर भय-चित्कार के जोसेफ ने शांति से रैन बसर कर दी, इस बात का दिवाली बहन को अजीब आश्चर्य हुआ।
उसी साल दिवाली बहन ने बेटे को जन्म दिया। उनकी पहली शादी इसलिए टूटी थी कि तीन-चार साल बीतने पर भी मां नहीं बन पाईं। उन्हें बच्चे को जन्म देने के बड़े अरमान थे। बेटा होने पर वह आसमान में उडऩे लगीं। अब घर का सारा काम- झाडऩा, पौंछना, बुहारना, बर्तन मांजना, गोबर के टोकरे सिर पर लादकर खाद के लिए गड्ढे में डालना, भैंसों की नाद साफ करना सभी जोसेफ के सिर पर आ पड़ा। सुबह पांच बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक वह काम में लगा रहता। सब्जी बघारना और रोटी सेंकना भी सीखना पड़ा।
आठ साल के जोसेफ को वह कुंए पर ले जाती। कुंए बहुत गहरे थे। कहावत थी-
ओड-उमरेठ के गहरे कुंए
बेटी ब्याहे उसके मां-बाप मुए!
अर्थात् ओड और उमरेठ गांवों के कुंए इतने गहरे हैं कि कोई इन दो गांवों में अपनी दुलारी बेटी का ब्याह नहीं करेगा, करने वालों को बेटी की इतनी बद्दुआ पहुंचती है कि मानों वे बेमौत मर गए।
तीन साल इसी तरह गुजर गए। जोसेफ की पढ़ाई छूट गई। उस की किसी को चिंता नहीं थी। उस साल बारिश बहुत कम हुई। खेती बेकार हुई। बैल मर गया। दुर्भाग्य से दिवाली बहन के बेटे को कोई रोग लग गया। उसके पेट में कुछ टिकता नहीं था। छह महीने में वह सूखकर कांटा हो गया। उसके इलाज पर बेशुमार खर्च हुआ। गहने भी बिक गए। खाने के लाले पड़ गए। गांव में मिशन का मास्टर कहीं चला गया था। डाहयाभाई के घर की हालत बहुत खस्ता जानकर पादरी आए। उन्होंने डाहयाभाई को स्कूल चलाने का जिम्मा सौंप दिया। तनख्वाह 60 रुपये महीना निश्चित हुई। अब डाहयाभाई को जोसेफ को स्कूल में नए सिरे से दाखिल करना पड़ा। यहीं से जोसेफ के जीवन में नया मोड़ आया।
डाहयाभाई ने किसी तरह जोसेफ की चौथी कक्षा में भर्ती करा दिया था। घर के काम का बोझ जोसेफ के सिर से नहीं टला था। वह सप्ताह में दो-तीन घंटे जाकर स्कूल में बैठता और मिशनरी महकमे से आई चौथी कक्षा की किताबें पढ़ता।
कुंए में पानी भरते हुए जोसेफ की लड़कियों से अच्छी बनती थी। इनमें आणंद मिशनरी बोर्डिंग में सातवीं में पढऩे वाली सुमित्रा भी थी। वह बड़े प्यार से गणित और गुजराती सिखाती थी। पुस्तक पढऩे का चस्का भी उसने लगाया। कहानी-उपन्यास का भेद समझाया। इसी की वजह से मुख्यालय के हैडमास्टर वार्षिक परीक्षा लेने आए तो जोसेफ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया। हैडमास्टर ने डाहयाभाई से कहा, ”लड़का बहुत होशियार है। इसका भविष्य बनाओ। मिशन स्कूल में मुश्किल पड़ता है तो गांव के लोकल बोर्ड स्कूल में भेजो। वर्नाक्यूलर फाइनल हो जाएगा तो प्राइमरी स्कूल का मास्टर तो बन ही जाएगा।”
उन्होंने जोसेफ के लिविंग सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर किए और उसे रजिस्टर में रखते हुए कहा, ”देखो, स्कूल खुलने पर अगर तुम्हारे पिताजी आनाकानी करें तो यह सर्टिफिकेट लेकर तुम खुद चले जाना। वहां के हैडमास्टर मेरे दोस्त हैं। मैं उन्हें चिट्ठी लिख दूंगा। वे तुझे दाखिला दे देंगे।”
डाहयाभाई टालमटोल करने लगे। जोसेफ एक दिन सर्टिफिकेट हथिया कर हैडमास्टर के पास चला गया। उसके पास शुल्क जमा करने को दस आने नहीं थे। उसने वादा किया, ”कल दे दूंगा।”
जून का महीना था। वह सुबह चार बजे उठा। आम पकने पर रात को टपक जाते हैं। उसने बाग में जाकर टोकरा भर आम बटोर लिए। करीब बीस किलो आम थे। वह टोकरा सिर पर रख दो-तीन मील दूर गांव चला गया। वहां रामजी मंदिर के चबूतरे पर बैठ गया। ग्राहक आने लगे। मोलभाव उसे आता नहीं था।
एक ने पूछा, ”पूरा टोकरा कितने में दोगे?”
जोसेफ ने कहा, ”आपको जो वाजिब लगे दे दो।”
”दो रुपये देता हूं। टोकरा मेरे घर पहुंचाना होगा।” ग्राहक बोला।
पास खड़ा दूसरे टोकरे वाला बोला, ”क्यों महाराज! बच्चा जानकर ठग लेना चाहते हो? क्यों रे, तू भाव बिगाड़ता है? मुफ्त में आते हैं आम? देखो साहजी, पूरे पांच लगेंगे। लेना है तो ले लो।”
ग्राहक ने पांच रुपये गिन दिए। जोसेफ टोकरा खाली करके लौटा तो उस आदमी के आम भी बिक चुके थे। वह बोला, ”तू नया लगता है। धंधा करना नहीं जानता। कल मेरे पास ही खड़े रहना।”
जोसेफ के मन में ऐसा कोई विचार नहीं था। फिर उसने सोचा कि उसके खाने-पीने, कपड़े और सुध लेने वाला कौन है? उसने आम मिलने तक यह धंधा करने का निश्चय कर लिया।
छह-सात दिन उसने यह कारोबार किया। उसने बयालीस रुपये कमाए। घर में किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। ये पैसे उसने बचपन के दोस्त मगन के घर रख दिए क्योंकि घरवालों को पता चल जाता तो वह सारे रुपये ले लेते।
इन्हीं रुपयों से मगन के पिताजी जोसेफ के लिए दो जोड़ी कपड़े (कमीज, हॉफ पैंट और चड्ढी) और चप्पल ले आए। तेरह साल की उम्र में पहली बार उसने चप्पल पहनी।
नए कपड़े मिलने पर भी तत्काल पहन न सका। अब तक वह उपेक्षित जीवन जी रहा था। तन के कपड़े जब जीर्ण हो जाते तभी या तो बंबई बसे चचेरे भाइयों के उतरे हुए या फिर सिंधी व्यापारी के पास से तैयार हल्की किस्म के नसीब होते थे। वह नहाता रोज था, लेकिन सिर पर न तेल लगाता और न कंघा फिराता। ऐसी हालत में किसी शिक्षक का ध्यान उसकी ओर नहीं गया।
स्कूल खुले एकाध महीना हुआ था। क्लास टीचर ने युवा कवि कलापि (वह लाठी स्टेट के राजा थे) की कविता ‘एक घा’ पढ़ानी शुरू की। कविता का भावार्थ समझाने के बाद उन्होंने उसका मंदाक्रांता छंद सुनाया। विद्यार्थियों से पूछा, ”कौन यह कविता गाएगा?”
जोसेफ के पास मगन बैठा था। उसने कोहनी मारते हुए कहा, ”तू खड़ा हो जा और सुना दे। आज तेरा सिक्का जम जाएगा।” जोसेफ खड़ा नहीं हुआ तो वह बोला, ”मास्टरजी, जोसेफ गाएगा। इसका कंठ बहुत सुरीला है।”
जोसेफ को उठना पड़ा। शुद्ध रूप से मंदाक्रांता छंद का गान सुनकर मास्टरजी आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने पूछा, ”यह छंद तू पहले से जानता था?” जोसेफ ने इनकार कर दिया। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि मैला-कुचैला गंवार लड़का एक बार सुनकर शास्त्रीय शुद्धता से गा पाये। उन्होंने परखना चाहा। पुस्तक के कुछ पन्ने पलट उन्होंने ‘शार्दुल विक्रिडित’ छंद का एक अष्टक निकाला। एक बार स्वयं सुनाया और जोसेफ से सुनाने के लिए कहा। बिना यतिभंग के उसने सुना दिया। वह अब भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने ‘काचला-काचबी’ का भजन अपनी तर्ज में गाया और फिर उसे गाने के लिए कहा। यह भजन उसने पहले कई बार सुना था। राग भी परिचित था। उसने इस ढंग से गाया कि सहपाठी तालियां बजा उठे। मास्टरजी ने उसे गले से लगा लिया। दूसरे दिन उन्होंने उसे प्रार्थना गवाने के लिए आगे भेजा। वहां भी वह खूब जमा। वह सबका चहेता बन गया।
मास्टरजी अत्यंत निष्ठावान, शील और संस्कार संपन्न थे। जाति के वाघरी थे। यह एक नीची जाति कहलाती है, जो घरफोड़ चोरी के लिए जानी जाती है। लेकिन वे सबसे अलग थे। अपने विषयों पर पूरा प्रभुत्व था। तन्मय होकर पढ़ाते थे। अपने बनाए टाइम टेबिल में एक पल भी व्यर्थ न करते थे। वे जोसेफ को हर विषयों में सर्वश्रेष्ठ रहने की प्रेरणा देते थे।
स्कूल गए जोसेफ को चार महीने हुए थे। मास्टरजी ने ब्लैक बोर्ड पर विषय लिखा- दारू निषेध अर्थात् शराबबंदी। यह 1948 की बात है। नई-नई आजादी आई थी। गुजरात मुंबई राज्य में सम्मिलित था। गांधीजी की नसीहत मानते हुए मुख्यमंत्री बाला साहब खैर ने पूरे राज्य में शराबबंदी कानून लागू कर दिया था।
ब्लैक बोर्ड पर विषय लिखकर मास्टरजी ने कहा, ”इस विषय पर निबंध लिखो।”
जोसेफ की समझ में बात नहीं आई। उसने पूछा, ”क्या लिखें मास्टरजी?”
वे बोले, ”निबंध।”
जोसेफ ने कहा, ”ठीक है। पर लिखें क्या?”
मास्टरजी को भी दिक्कत हो रही थी कि वह क्या व्याख्या समझाएं। वह बोले, ”निबंध… निबंध माने… देखो ‘निषेध’ का मतलब है- नहीं पीना। दारू पीने के फायदे नहीं होते, बहुत नुकसान होता है। पैसों की बर्बादी… आदमी, आदमी नहीं रहता, हैवान बन जाता है। बस! ऐसा ही तुम्हारे मन में जो आए, वही लिखो।”
फतेहसिंह दरबार नाम का एक मुंहफट लड़का बोला, ”कम पीयें तो हिचकोले आते हैं और ज्यादा पीयें तो चला नहीं जाता, धड़ाम से गिर पड़ते हैं। इसमें लिखने को क्या रखा है?”
मास्टरजी सहित सभी बच्चे हंस पड़े। पर क्या लिखना है यह बात जोसेफ के समझ में आ गई।
मगन के पिताजी गोरधन हफ्ते में एक बार शराब पीकर आते थे। वह तीन-चार घंटे बस्ती को सिर पर उठाकर रखते थे। वह गर्जना करते हुए बस्ती के नुक्कड़ पर आते तो स्त्रियां किवाड़ बंद कर घरों में घुस जातीं। वह बलिष्ठ थे। नशे में धुत्त होने पर भी अच्छे-खासे जवान भी उनसे डरते थे। उनके मन में जिनके दुर्गुण होते उनके नाम ले-लेकर जलील करते थे। वह थोड़ा-बहुत भवान भगत या डाहयाभाई से डरते थे।
एक बार उन्होंने डाहयाभाई का मुंह नोंच लिया, ”डाया काका, मैं आपका आदर करता हूं। आप मेरे आड़े मत आओ। अपना घर संभालो। नई बहू क्या लाए, खुद के बेटे और धरम-करम को ही बिसर गए। आपको देखता हूं तो मुझे लाज आती है।”
उसके बाद डाहयाभाई उसके सामने आने की हिम्मत न जुटा सके। वह दिवाली बहन को भी नहीं बख्शते थे। वह दूर के रिश्ते में उनकी बहन लगती थीं। वह मर्यादा रखकर गाना जोड़ते –
प्रभु मुझे ऐसी बहन ना दे
जिसका हिरदा पत्थर का हो
कलेजा कंटीला हो।
नशा उतरा पाते तो वह कमर में बंधी बोतल निकालकर मुंह में उड़ेल लेते। फिर घर की देहरी चढ़ते और निर्दोष पत्नी को पीट देते। चीख-पुकार का उनपर कोई असर न पड़ता। एक बार तो उसका हाथ टूट गया था। मगन कद-काठी में मासूम था। उस दिन मां की हालत उससे देखी नहीं गई। घर में बर्छा था। बर्छे की नोक बाप के गले पर लगाकर वह चीखा, ”छोड़ दे मेरी मां को, वर्ना घुसेड़ दूंगा तेरे गले के आरपार।” बेटे के तमतमाये चेहरे से गोरधन दहशत खा गए। शर्मिंदा होकर वह वहां से चले गए।
यह घटनाक्रम जोसेफ के मन में था। दूसरा- बंबई से उसके दो चाचा आते। शाम को घर में शराबखोरी का दौर चलता। शराब का ठेका एक किलोमीटर दूर था। एक रुपया लेकर वह जाता। बारह आने की देशी शराब की बोतल आती। बड़े चाचा उदारता से कहते, ”तू बहुत सयाना है, चवन्नी अपने पास रख ले।”
आधे घंटे बाद दूसरी, फिर तीसरी और रात के ग्यारह बजे चौथी का हुक्म होता। तब कहा जाता कि अपने पास जमा हुए बारह आने की बोतल ले आ। दूसरी सुबह रुपया देने के वचन से वह मुकर जाते।
इन अनुभवों के आधार पर जोसेफ ने ‘दारू-निषेध’ पर निबंध लिखा। मास्टरजी ने क्लास में पढ़वाया। ताली पिटी। मास्टरजी ने फुलस्केप कागज दिए और करीने से कागज के एक ओर पुनर्लेखन के लिए कहा। उसने लिखकर मास्टरजी को दे दिया।
दो महीने बीत गए। धर्मादा दवाखाने के पास प्रसूति ग्रह बन रहा था। इसकी ईंट भिगोने की मजदूरी जोसेफ के सिर पर लाद दी गई थी। दो दिन से वह स्कूल नहीं जा सका था। दोपहर को मगन दौड़ता हुआ आया और बोला, ”तेरा लिखा वह निबंध प्रतियोगिता में प्रथम आया। मास्टरजी तुझे बुला रहे हैं।”
जोसेफ ने कहा, ”कल शाम तक मैं नहीं आ पाऊंगा।”
दूसरे दिन शनिवार था। जोसेफ ने गहरे कुंए से पानी खींचकर दो बड़े कनस्तर भर दिए थे। बारह बजने वाले थे। वह ईंट भिगोकर बाहर रख रहा था। मास्टरजी वहां आ पहुंचे, ”भाई जोसेफ, पांचवीं से ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों की निबंध प्रतियोगिता में तुम्हारे निबंध को प्रथम पुरस्कार मिला है। मैं धन्य हो गया हूं तुम्हें पाकर।”
जोसेफ गद्गद् हो गया। वह कुछ बोल न पाया।
वह करुणाद्र्र आंखों से उसे निहारते हुए बोले, ”कल स्कूल के पास वाले खेत में पंडाल बंधेगा। मुंबई से राज्य के गृहमंत्री मोरारजी देसाई पधारेंगे। उनके हाथों तुझे इनाम मिलेगा। कल तो तुम आओगे न?”
”जी, कल छुट्टी है। अवश्य आऊंगा।” जोसेफ ने जवाब दिया।
वह उसे सिर से पैर तक निहार कर बोले, ”तुम्हारे पास दूसरे कपड़े हैं।”
उसके पास दो जोड़ी कपड़े थे। मगर उनको निकालने का साहस नहीं था। अधिक पूछताछ होती, इससे पहले ही वह बोल पड़ा, ”जो हैं, यही हैं मास्टरजी।”
”अच्छा। काम से निपटकर इन्हें धो डालना।” मास्टरजी कहकर चले गए।
ईंटों के गेरुए रंग से उसकी सफेद कमीज रंग गई थी। धोने के लिए साबुन नहीं था। कपड़े का रंग ही बदल गया। चड्ढी पर दो बड़े टांके लगे थे। वह इन्हीं कपड़ों को पहनकर दोस्तों के साथ पंडाल में गया।
पंडाल हजारों लोगों से भरा था। निबंध के विजेता की हकीकत पढ़कर मोरारजी देसाई ने आदेश दिया, ”वह निबंध लाओ और सबसे पहले इसे पढ़कर सुनाओ।”
शिक्षक रमणभाई गणपतभाई पाठक आगे बढ़े तो मोरारजी देसाई ने फरमाया, ”मास्टरजी, आप नहीं। उस लड़के से पढ़वाओ, जिसने इसे लिखा है।”
डर के मारे जोसेफ की टांगे थरथरा रही थीं। महिजीभाई मास्टरजी ने हौंसला बढ़ाया, ”घबरा मत। जैसा क्लास में पढ़ा था, वैसे ही पढ़ दे। मेरा नाम रख।”
निबंध के प्रारंभ में शराब न पीने की सीख देने वाली कुछ पंक्तियां थीं। जोसेफ ने सबसे पहले वह गाईं। पूरे पंडाल में निस्तब्धता छा गई। उसने दस-बारह मिनट में निबंध पूरा कर दिया। अंत में मास्टरजी द्वारा लिखाए दो नारे लगाए- जय मातृभूमि, जय हिंद।
पूरा पंडाल ताली की गडग़ड़ाहट से भर गया। इससे जोसेफ को एक अलग किस्म का रोमांच हुआ।
मोरारजी देसाई ने इनाम स्वरूप उसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ दी। उसके मन में आया कि इससे तो पांच रुपये मिल जाते तो ज्यादा अच्छा रहता। कम-से-कम अंग तो ढकता।
मास्टरजी बोल उठे, ”तू लेखक होगा बेटे। तू बहुत नाम कमाएगा।”
जोसेफ को घर में प्रोत्साहित करनेवाला कोई न था। वह अपना सुख-दु:ख भवान भगत से बांटता था। वह उसे बहुत चाहते थे। उस दिन अनेक बधाइयां पाता हुआ जोसेफ उनके पास गया। वह बहुत खुश हुए। एकाध पृष्ठ सुनने के बाद उन्होंने उसे रोक दिया। फिर गोरधन और डाहयाभाई को बुलाया। दोनों को अपने पास बिठाकर जोसेफ से शुरू से निबंध पढऩे को कहा। निबंध में दोनों के चरित्र उजागर हुए थे। उसे डर लगा।
भगतजी बोले, ”पढ़। मैं बैठा हूं। तुझे डर काहे का?”
जोसेफ पढ़ता गया। उसने कनखियों से देखा कि गोरधन काका मिट्टी कुरेद रहे हैं और पिताजी छत की ओर टकटकी लगाए कहीं खो गए हैं।
निबंध पूरा होने पर भगतजी बोले, ”सुन रे गोधा… इस बच्चे की नाल भी नहीं कटी, जिसने तेरे कुचरित्र का लेखा-जोखा लिया है। और मास्टरजी तुम्हारे लहू ने ही तुम्हारे अवगुण गाए हैं। अब तो मानुष की खाल अपनाओ।”
दोनों शर्मसार होकर चुपचाप चले गए।
तभी एक चमत्कार हुआ। गोरधन ने शराब छोड़ दी। वह जोसेफ के साथ आदर और स्नेह से पेश आने लगे। उन्होंने दो जोड़ी कपड़े लाकर डाहयाभाई को दिए, ”मैं जोसेफ के लिए यह इनाम लाया हूं।” उसी दिन से डाहयाभाई के घर में होने वाली महफिलें बंद हो गईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि वे जोसेफ के साथ बेरुखी बरत रहे हैं।
इन दो घटनाओं ने ‘शब्द’ में जोसेफ की असीम श्रद्धा जगा दी।
नई मां से दो टूक बातें हो जाने के बावजूद जोसेफ ने घर-खेती के कुछ काम नहीं छोड़े। उनमें एक था- कुंए से पानी भरना। यह काम उसे बहुत अच्छा लगता था। हमउम्र लड़कियों से मेल-मिलाप होता था। मोहल्ले की स्त्रियां अपना सुख-दु:ख सुनातीं थीं। जोसेफ बहुत छोटा था, लेकिन बहुत कुछ समझने लगा था। कुंआ उसके लिए जीवन की पाठशाला बन गया।
अगले साल लाडो की खूबसूरत जवान बेटी हेता तंबाकू मिल के नराधम मालिक की हवस का शिकार बन गई। उसे गर्भ ठहर गया। मां-बेटी दोनों ने आत्महत्या कर ली। उसी साल सुमित्रा की शादी हो गई। गहरा आघात देकर वह चली गई। इन दोनों घटनाओं ने जोसेफ को झकझोर दिया। उसे लगा जैसे उसके अंदर कुछ टूट गया।
पांचवीं क्लास में जोसेफ प्रथम श्रेणी से उत्र्तीण हुआ। छठी के क्लास टीचर रमणभाई पाठक थे। बड़े आलसी थे। पूरे साल उन्होंने कुछ नहीं पढ़ाया। जोसेफ पांचवीं क्लास में जाकर बैठ जाता था। महिजीभाई ने उसे छठी का गणित और विज्ञान सिखाया। बाकी उसने खुद पढ़ लिया। वह प्रथम श्रेणी से पास हो गया। महिजीभाई ने उसका लीविंग सर्टिफिकेट काट दिया और डाहयाभाई को थमाते हुए कहा, ”आणंद में मिशनरी बोर्डिंग स्कूल है। इसे वहां भर्ती करा दो। अच्छे प्रतिशत से फाइनल पास हो जाएगा तो प्राइमरी शिक्षक की नौकरी मिल जाएगी। इसका भविष्य बर्बाद न होने दो।”
डाहयाभाई के न चाहने पर भी मिशनरी पादरी ने जोसेफ को नडीआद भेज दिया। वहां 76 फीसदी अंक से वर्नाक्यूलर फाइनल किया। उसी पादरी ने सोलह साल की उम्र होते हुए जोसेफ को खंभोलज गांव की सात कक्षाओं के प्राइमरी स्कूल में पहली से तीसरी क्लास का शिक्षक नियुक्त कर दिया। दो वर्ष वह वहां रहा। धर्म के प्रति लापरवाही का कारण बताते हुए पादरी ने उसकी छुट्टी कर दी।
19 साल की उम्र न हो तब तक लोकल बोर्ड की नौकरी नहीं मिल सकती थी। उसने पुलिस में भर्ती होने का निश्चय किया। नडियाद, जहां वह सातवीं तक पढ़ा था, के पादरी ने फिर शिक्षक बना दिया। दो वर्ष के बाद उसे प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग के लिए प्रतिनियुक्त किया गया। तब तक उसने एक्सटर्नल रूप से एस.एस.सी. मैट्रिक का प्राइवेट एग्जाम पास कर लिया।
आणंद के स्कूल में दो वर्ष टीचर ट्रेनिंग ली। यहां के आचार्य मगनभाई ओझा प्रखर गांधीवादी और शिक्षा शास्त्री थे। जोसेफ ने उनसे बहुत कुछ सीखा। इस दौरान जोसेफ ने राष्ट्रभाषा हिंदी की ‘साहित्य विशारद’, ‘राष्ट्रभाषा रत्न’ तथा ‘साहित्य अलंकार’ की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। पी.टी.सी. होते ही उन्हें आणंद के प्रसिद्ध सेंट जेवियर्स में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गई। इसी दौरान डाहयाभाई का देहांत हो गया। वह अपने पीछे छोड़ गए पांच हजार का ऋण, सौतेली मां और उनके चार बच्चे। सारी जिम्मेदारी जोसेफ पर आ गई। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह पिताजी का ठीक से उपचार भी न करा सके। उम्र इक्कीस साल हो गई थी। शादी हो चुकी थी।
पिताजी का ऋण अदा करने के लिए जोसेफ ट्यूशन, प्रूफरीडिंग और प्रतिष्ठित लेखक ईश्वर पेटलीकर के कार्यालय में पुनर्लेखन भी करने लगे। सुबह सात बजे से रात ग्यारह बजे तक यह सब चलता।
हिंदी की परीक्षाओं के दौरान जोसेफ मेकवान सूरदास, तुलसी, जायसी, कबीर, मीरा, केशवदास, बिहारी, रहीम, रसखान, निराला, महादेवी, पंत, प्रसाद से लेकर प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, अश्क, यशपाल, कृश्नचंदर, धर्मवीर भारती, दिनकर सहित मोहन राकेश, कमलेश्वर तक को भली-भांति पढ़ चुके थे। प्रेमचंद तो मानो उनके रूह में बस गए।
1954 में उनकी पहली कहानी ‘गेंगड़ी के फूल’ पत्रिका ‘सविता’ में छपी। 1956 से 64 तक उन्होंने 60 से अधिक कहानियां लिखीं।
जोसेफ के पैतृक नाते से तीसरी पीढ़ी के पूर्वज रामदास युवा आयु में चल बसे। उनकी पत्नी गर्भवती थी। पति की मौत के छह महीने बाद वह मां बनी। रिवाज के मुताबिक उन्होंने मायके जाकर पुनर्विवाह नहीं किया। बेटे के सहारे जिंदगी बिताना तय किया। बेटा जवान हुआ। उसका विवाह हुआ। पत्नी का नाम था आसीमां। तीन साल बाद पति दानजी की सांप के काटने से मौत हो गई। आसीमां को तीसरा महीना चल रहा था। उसने भी ससुराल में जीवन बिताने का निश्चय किया। उसका भी बेटा हुआ कानजी। भरी जवानी में दो पुरुषों की मौत हो गई थी। लोग कहने लगे कि यह घर अभिशप्त है। वह चाहे आजीवन कुंवारा रहे। उसका विवाह न किया जाए। कोई बच्चा गोद ले लेना। मां का मन नहीं माना। ब्राह्ïण को बुलाकर सभी व्रत-जप कर बेटे की शादी रचाई। बहू का नाम था पसी। ढाई साल बाद कानजी को टी.बी. हो गई। इलाज में सैकड़ों का ऋण हो गया। खेत गिरवी चला गया। कानजी नहीं बचे।
आसीमां और अन्य लोगों के कहने के बावजूद पसी ने घर नहीं त्यागा। उसके भी बेटा हुआ नाम रखा- देवा। पर टी.बी. वाले बाप का बेटा था। दूध-दवा से छह महीने में भला-चंगा हो गया।
पौष का महीना था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। गिरवी रखे ख्त में तंबाकू के तीन फुट के पौधे के तने और पत्तों की जोड़ में जो फुनगी फूटती है, उसे गुजराती में ‘पीला’ कहते हैं। बच्चे की बीमारी के कारण ‘पीला’ तोडऩे-बीनने पसी नहीं जा सकी। ऋण देने वाला पटेल शाम को ज्यों-त्यों बोल गया था। दूसरी सुबह पसी बच्चे को गुदड़ी में लपेटकर खेत में गई। पेड़ पर पालना पड़ा था। बच्चे को सुलाया और ‘पीला’ निकालने में लग गई। एक दिन पहले बेमौसम बारिश हुई थी। इसलिए शीत लहर चल रही थी। सूरज कुछ चढ़ा। ग्यारह बजने को आए पर बच्चा रोया नहीं। जब पसी की छाती से दूध का उफान आया तो बावरी-सी दौड़ पड़ी। देवा ठिठुर कर ‘देव’ हो चुका था। मृत बच्चे को छोड़कर पसी ने दो बजे तक काम किया। फिर बच्चे को लेकर वह घर की ओर दौड़ी। वह खेत से बाहर निकल रही थी। प्रभुदास पटेल आ पहुंचा। उसने उस सद्य: मृत बच्चे को मां के मुंह की ओर नहीं देखा। ”कर दिया काम पूरा।” पूछते वह खेत की ओर देख रहा था। वह बोला, ”यह रुपया लेती जा। तय किया था। मजदूरी दो रुपये एक सूद में काट लिया जाएगा। दूसरा रोकड़ रूप में देना तय था।”
कुंए पर पसी को पागलों की तरह जोसेफ ने देखा। सामने मिलने वाली स्त्रियां भी उसके पीछे जाने लगीं। घर पहुंचकर पसी ने सास से कहा, ”लो मांजी, यह रुपया और यह आपके घर का दीया।” कहकर वह मूर्छित होकर गिर पड़ी।
जोसेफ मेकवान ने इस घटना को आधार बनाकर कहानी लिखी और सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘नवचेतन’ में भेज दी। तुरंत स्वीकृति का पत्र आ गया। अगस्त, 64 में वह छपने वाली थी। जुलाई के मध्य में कहानी वापस आ गई। संपादक ने लिखा था, ”माना कि कहानी का सघन करुणांत वास्तवदर्शी है, पर इससे सामाजिक अर्थ क्या संपन्न होगा? यही प्रश्नार्थ होते वापस कर रहा हूं। ‘नवचेतन’ के स्तर की दूसरी कहानी लिखो तो अवश्य भेजना।” उसी क्षण जोसेफ मेकवान ने हाथ में पकड़े फाउंटेन पैन की निब टूट जाए इस प्रकार फर्श पर प्रहार कर प्रण किया कि फिर कभी नहीं लिखूंगा। उन्होंने सोचा कि जिस वास्तव को, शोषण को, निर्मम अत्याचारों, बलात्कारों और क्रूर सामाजिक अन्याय की परंपराओं को देखा या अनुभूत किया, वही यथार्थ यदि गुजराती साहित्य को रास नहीं आ रहा है तो लिखना व्यर्थ है।
उन्होंने 1964 से 80 तक कुछ नहीं लिखा। गुजराती, बंग्ला, हिंदी, अंगे्रजी साहित्य पढ़ा खूब। मंथन चलता रहता।
उनके स्कूल में एक घटना घटी। नौंवी क्लास का एक होनहार विद्यार्थी फेल हो गया। सोलह साल का वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के बाद उसके बाप ने अपनी पत्नी से संबंध तोड़ लिए। वह किशोर इस हादसे को सह न सका और आत्महत्या के लिए उतारू हो गया। जोसेफ मेकवान ने उस लड़के को आत्महत्या से रोक लिया, लेकिन उसके बाल मन पर जो कुठाराघात हुआ, उसका मरहम उनके पास भी नहीं था। इस घटना ने उन्हें फिर से कलम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने कहानी लिखी- ‘मेरा कौन’। दूसरे ही सप्ताह ‘जनसत्ता’ में छप गई। उनके पास पत्रों का तांता लग गया- लिखो, लिखो और लिखते ही रहो।
‘नया मार्ग’, ‘अखंड आनंद’, ‘जनकल्याण’ आदि कई पत्रिकाएं उनकी रचनाओं को छापने को तत्पर थीं। 1981 से 84 तक उन्होंने बीसियों रेखाचित्र और कई कहानियां लिखीं। 1985 में उनके पहले रेखाचित्र संग्रह ‘व्यथानां वीतक’ का प्रकाशन ‘खेतभवन’ से हुआ। इसे समालोचकों ने बहुत सराहा।
1986 में जोसेफ मेकवान का पहला उपन्यास ‘आंगलियात’ प्रकाशित हुआ। वह अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ। गुजराती साहित्य में इसे चौथी लहर माना गया। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने उसे पुरस्कृत किया। गुजरात साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनके अलावा कई अन्य पुरस्कार मिले। इसका हिंदी, राजस्थानी, अंगे्रजी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ। गुजराती साहित्य के गद्य के डेढ़ सौ वर्ष के इतिहास में ऑक्सफॉर्ड से अनुदित होने वाला यह प्रथम उपन्यास है।
पढ़ाते समय ही जोसेफ मेकवान ने बी.ए., एम.ए., बी.एड., सब एक्सटर्नल किया। 36 साल तक हाईस्कूल में शिक्षक रहे। बीच में सात-आठ साल हिंदी के अध्यापक रहे। वहां के दंभी वातावरण में उन्हें घुटन महसूस होती। हिंदी के हैड ऑफ डिपार्टमेंट ने सेमीनार का विषय रखा- ‘क्या माक्र्स पे्ररित साहित्य शुद्ध साहित्य है! शुद्ध साहित्य में उसका क्या स्थान है।’ अपने व्याख्यान में उन्होंने साहित्य की शुद्धतिशुद्ध, कला के लिए जैसी अगड़म-बगड़म स्थापनाएं कर डालीं। जोसेफ मेकवान ने उन्हें आड़े हाथों लिया, ‘यदि इन महोदय की स्थापनाएं सही मानें तो पे्रमचंद के समूचे साहित्य सृजन से लेकर अमृतलाल नागर के ‘बूंद और समुंद्र’, रेणु के ‘मैला आंचल’, मंटो की कहानियां और यशपाल को साहित्य से निष्कासन देना पड़ेगा। 1936 में प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता क्यों की?’ और बहुत से संदर्भ दिए। किसी से जवाब देते नहीं बना।
दूसरे दिन हैड ने उन्हें बुलाया, ”देखिए, मैं आपका हैड हूं। आप मेरे मातहत हैं। हैड की स्थापना से विपरीत बोलना विवेक सम्मत नहीं है।”
जोसेफ मेकवान ने मुंहतोड़ जवाब दिया, ”तुम्हारे हैड पद की ऐसी की तैसी। तुमने समझ क्या रखा है? तुम्हारे हैड पर जूती मारता हूं। जाओ, जो बन पाए, कर दिखाओ।”
हैड सकपका गया। वह प्रिंसिपल से मिला, लेकिन  प्रिंसिपल ने जोसेफ मेकवान का पक्ष लिया। उसकी हेठी हो गई। वर्ष के अंत में जोसेफ ने इस्तीफा दे दिया।
36 साल की नौकरी के बाद 1993 में वह सेवानिवृत हुए। तब से लेखन में संलग्न रहे। उपन्यास, रेखाचित्र, कहानी, निबंध, आलोचना आदि विषयों पर उनकी करीब 50 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।