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प्रसून पाण्‍डेय की कवितायें

प्रसून पाण्डेय

युवा कवि प्रसून पाण्डेय की रचनाओं में समाज के सर्वहारा वर्ग के प्रति हो रहे अन्याय के विरोध में विद्रोह है, एक निराशा भी है। कवि खुद को असहाय महसूस करता है क्योंकि व्यवस्था निरंकुश हो चुकी है। किन्तु तमाम निराशा और हताशा के बाद भी कवि की सम्‍वेदनाएं जीवित है। जन की वेदना ही कवि की वेदना है, वह तोड़ना चाहता है ख़ामोशी पर खुद अकेला पाकर खेद प्रकट करता है…बावजूद इसके वह हिम्मत नहीं हारता।
-नित्यानंद गायेन

कश्मकश की कहकशा

दिन-ब- दिन
रोज हर रोज
बद से बदतर होते वो
जो दरबदर कर जतन
अथक परिश्रम लहूलुहान-लथपथ
सींचते सीना धरा का
बीहड़, बंजर, उबड़- खाबड़
फिर  भी उगाते सोना-खरा
जैसे ली हो जन्मोजन्मांतर शपथ
लहलाती चहचहाती
चंचल चितवन- सी वसुंधरा
आँख फाड़ देखती दुर्दशा
और कुछ दम भरते, गाल बजाते बहुतेरे
साँझ- सबेरे
चीरते सीना धरा का
पग-पग, डग भरते
कर पतन
टिमटिमाते लुपलुपाते जैसे कश्मकश की कहकशा।

फफूंद-सी-कपास

आज फिर वह उदास हैं
भीतर- बाहर उठते कयास हैं
निहारते आसमाँ की तरफ
पर वहाँ नहीं पिघलती जमी बरफ
कौतूहल-कोलाहल
शोर-शराबा गली-चौबारा
विवश कुछ पीने को हलाहल
और कुछ घूमते खानाबदोश-आवारा
घटती- बढ़ती
आगे चलती एक साथ कई आस हैं
और कुछ की तो हलक में अटकी साँस है
आवाज उठी स्वर भी हुए बुलंद
चाहे-अनचाहे
अनगिनत प्रदर्शन बंद
कुछ बढ़ाते भीड़ भाड़ अनायास हैं
कुछ निराश फिर भी जारी प्रयास हैं
पर कैसे और कब ?
ऊपर बैठे हैं कुछ धृतराष्ट्र जब
और कानों में उनके ठसी ‘फफूंद-सी-कपास’ है।

खेद

सफ़ेद-काले
मिले-जुले चमचमाते
लिबास में
चिकने चुपड़े- मुखड़े..
पेंच डाले
हिले-डुले-डगमगाते
आभास में
चढ़ने चोंटी पर अकड़े..
भेद पाले
जल-जले दनदनाते
झगड़े, अगड़े- पिछड़े..
भोले- भाले
गले-ग्वाले निहारते
सुनाने सुर दीन-दुखड़े..
‘खेद’, चले
सिलसिले शरमाते
लिहाज़ में
सहमे सिकुड़े-जकड़े..

कलाकार का कवि या कवि का कलाकार : नित्यानंद गायेन

वरि‍ष्‍ठ चि‍त्रकार और कवि‍ कुँवर रवीन्‍द्र की कला यात्रा पर एकाग्र विजय कुमार देव द्वारा सम्‍पादि‍त पुस्‍तक ‘रवीन्द्र और रेखांकन’ के सन्‍दर्भ में युवा कवि‍ नि‍त्‍यानंद गायेन की टि‍प्‍पणी-

“किसी भी कलाकार से उसकी अवधारणा, शैली और कला–प्रक्रिया की बारीकियाँ सतही तौर पर नहीं जानी जा सकती है, उसके चेतन–अवचेतन में भीतर तक पैंठने की कोशिश करनी होती है उस तल तक जहाँ से वह उदित होता है। उन तरंगों को महसूस करना होता है जिनके संचरण से वह कलाकर्म में प्रवृत्त होता है- विजय कुमार देव, सम्पादक ‘अक्षरा’ द्वारा व्यक्त ये बातें बहुत सटीक हैं।

हमारे समय के वरिष्ठ एवं चर्चित कला सम्‍पादक, कवि–लेखक कुँवर रवीन्द्र जी पर ये सभी बातें लागू होती हैं | कुँवर जी पर सम्पादित पुस्तक ‘रवीन्द्र और रेखाँकन’ में विजय जी ने लिखा है–“वैयक्तिक रूप से रवीन्द्र को समझना बड़ी टेड़ी खीर है। अपने निजी जीवन में वह जितने अक्खड़, अस्त–व्यस्त और लापरवाह है, कला कर्म में उतने ही महीन, पारदर्शी और सम्‍वेदनशील हैं।” रवीन्द्र जी के बारे में बहुत सही लिखी हैं ये बातें।

आज हम सभी देख पा रहे हैं कि के. रवीन्द्र जी अपनी कला के साथ निरंतर प्रयोग करने वाले कलाकार हैं। एक ऐसा कलाकार जो आत्मगान और यशगान के इस स्वार्थवादी समय में भी निजप्रचार से खुद को मीलों दूर रखे हुए हैं, और यही इस कलाकार की महानता की निशानी है। एक ऐसा कलाकार जिसकी कला को आज देश के लगभग सभी चर्चित पत्र–पत्रिकाएँ छापने को आतुर हैं और पहले भी छापते रहे हैं, वह गर्व और घमंड से खुद को बचाकर रखने में सफल है | यही गुण है जो रवीन्द्र को औरों से अलग और महान बनाते हैं।

कुँवर जी अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु प्रताप सिंह, जो एक समय जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई में मानसेवी व्याख्याता रहे हैं और अपने मित्रों को देते हैं | वह कहते हैं– “मेरे मित्रों में खासियत तो रही कि मुझे मैं बनाने में या मेरी अपनी पहचान बनाने में कोई कोर–कसर नहीं छोड़ी।” (पृष्ठ 15, आत्मकथ्य)

रवीन्द्र जी क्या कहना चाहते हैं रेखाओं और रंगों के माध्यम से यह कुछ हद तक हम उनकी कुछ कवितायेँ पढ़ कर शायद जान सकते हैं। उनकी एक कविता का यह अंश देखिये–“ आजकल मैं/एक ही बिम्ब में/सब कुछ देखता हूँ/एक ही बिम्ब में ऊँट और पहाड़ को/समुद्र और तालाब को/मगर आदमी/मेरे बिम्बों से बाहर छिटक जाता है/पता नहीं क्यों/आदमी बिम्ब में समा नही पाता है ?”

इन पंक्तियों से इस महान कलाकार के भीतर मनुष्य के प्रति जो बेचैनी है उसे देख सकते हैं। वहीं एक और कविता में वह लिखते हैं –

“इस शहर में
एक घर, जहाँ
मैं ठहर गया हूँ
रहस्य में लिपटा सा
फिर भी पहचाना सा
और घर में एक छज्जा,
छज्जे पर मैं
सामने एक घर, दो घर, ढेर सारे घर
घर, घर
घर पर घर
पतझड़ में बिखरे पत्तों की तरह”

इस कविता में ‘शहर’ का चित्र उकेर रहे हैं, वहीं एक दूसरी कविता में वह प्रतीकों का चित्र प्रस्तुत करते हैं–

“कितने खूबसूरत लगते हैं हम
एक कलेंडर की तरह
जड़े हुए दीवार से
या फिर कुत्ते की तरह
अपनी दुम खुजलाने के प्रयास में
गोल–गोल
बस एक ही दायरे में घूमते हुए”।

इन रचनाओं से गुजरने के बाद यह तय करना कठिन हो जाता कि रवीन्द्र जी उच्च दर्जे के चित्रकार हैं या कवि ?

इस सन्दर्भ में विनय उपाध्याय ने सही लिखा है– दरअसल अपनी रचना में रवीन्द्र भारतीय जीवन मूल्यों की पुरजोर वकालत करते हैं। वे षड्यंत्रों पर, आक्रमणों पर अभिव्यक्ति भर प्रहार करते हैं। उन प्रवित्तियों पर उनकी रेखाओं का वलय साक्षात होता है जिनके वर्चस्व में ईमानदारी हाशिये पर चला गया है। अपने जीते–जी बदल गई दुनिया के सच को रवीन्द्र के चित्र और कविता बखूबी बयान करते हैं। (रवीन्द्र और रेखांकन, पृष्ठ-48)

पुस्तक : रवीन्द्र और रेखांकन
सम्‍पादक : विजय कुमार देव
प्रकाशक : पड़ाव प्रकाशन
46 एल.आई.जी. नेहरू नगर, भोपाल-462003
मूल्य : 25 रुपये

नि‍त्यानंद गायेन की कवि‍तायें

नि‍त्या’नंद गायेन

वि‍भि‍न्‍न राजनीति‍क और सामाजि‍क समस्याओं पर युवा कवि‍ नि‍त्यानंद गायेन की कवि‍तायें-

तेल पर खेल, जनता झेल

तेल पर खेल
जनता झेल
पूँजीपति सत्ता का
गजब मेल
महंगाई का है पेलम-पेल
बना फिर कार्टून
चला जा जेल
मांगों न कोई बेल (जमानत)
भोजन, पानी, बिजली
सबका मजा मुफ्त में ले
विरोध में
मानव श्रृंखला का
बना दे रेल

सरकार आज
बनी साहूकार
देश मच गया हाहाकार..

बिना सिर -पैर के

पूरा माहौल
कार्टून जैसा हो गया
दिल्ली से मुंबई तक
फिर उधर कोलकाता में भी
रोज बन रहे हैं
नये-नये कार्टून

कार्टूनिस्ट भटक गये हैं क्या ?
ममता जी से पूछिए
कितना दर्दनाक होता है
कार्टून में होना

सारी मर्यादाओं को तार-तार
बेरोजगार कार्टूनिस्ट बना रहे हैं
नित एक कार्टून
ताकि मिल जाये जेल की रोटियाँ
और खूब सारा नाम

अरे भाई
एक तरीका भी होता है
यह संसार का विशाल लोकतंत्र है
जानते हुए भी
आप कार्टून बनाते हैं
संसद में मारपीट करना
जूता-चप्पकल फेंकना
हंगामा करना, बिल की प्रति फाड़ना
रोज होता है
फिर भी कार्टून बनाते हैं लोग ?
हद हो गई यार …

अब मैं नही देखता
टाम एंड जैरी शो
देखता हूँ
लोक सभा,राज्य सभा टीवी
बंगाल न्यूज़ ….

बहुत याद आता हैं मुझे
आर के. लक्ष्म ण का आम आदमी…

‘असीम’ की भी एक सीमा है

असीम’ की भी
एक सीमा है
उसे थमना था
मान लिया
किन्तु ,
उन सबका क्या
जिन्होंने फहराए
तिरंगा
फिर कसमें भी खाईं
लेकर हाथ में संविधान कि
‘हम देश की अखंडता पर
न आने देंगे आँच,
नागरिकों के हित में
करेंगे काम ……..’
वे भूल गये सब कसमें, वादे
सत्मेव जयते का नारा
गुम हो गया
सांसदों के हल्ला–गुल्ला में
क्या नहीं यह अपमान ?
सच है ..
प्रतीकों से मिलता है बल
पर यहाँ
आदमी भी मर रहा है
इसे रखिये ध्यान में मित्रों
‘अपना चेहरा न बदला गया
आईने से खपा हो गये ?
लोकतंत्र में
राजद्रोह ?
इस पर भी सोचिये
राजा को भी खोजिये ..

जो खडे़ हैं पानी में

उन सब बुद्धिजीविओं ने
कई दिनों तक नहीं ली खबर
जो खड़े हुए हैं पानी में
खुद को बचाने के लिये

उन्हें खबर नहीं
गलते हुए पैरों की
सिकुड़ते हुए बदन की खाल

उन्हें बस चिंता है
ठाकरे ने क्या कहा सुषमा के बारे में

भारत सरकार
पड़ोसी को खुश करने में आमादा है
वीजा में अब ढील है
और वहाँ से भगाये गये परिवार
रो रहे हैं

इस पर सब चुप है
ताकि बनी रहे उनकी
धर्मनिरपेक्ष छवि

मैं चिंतित हूँ
पता नहीं क्यों

मुझे मालूम है
बहुत प्रश्नि उठेंगे
मेरी इस चिंता पर
और मैं शायद अब
न रहूँ धर्मनिरपेक्ष उनकी नज़रों में

पर, मुझे नहीं परवाह
अपनी छवि की
मैं पानी में गलते इंसानी माँस नहीं देख सकता
नहीं सह सकता मैं
अपनी जमीन से बेदखल
परिवारों की पीड़ा ..

अब कह लो जो कहना है तुम्हें
मेरी सोच पर
मुझे फर्क नहीं पड़ता

फिर भी क्यों नहीं होता हमें विश्वास ?

‘अघोरी’
जलते मानव शव का
खाता है माँस
फिर भी क्यों नहीं होता
हमें विश्वांस
ये साधु नहीं, दानव हैं ?

इंसान मर रहा है
घुट-घुट कर
तड़प-तड़प कर
वे कर रहे हैं पूजा
सांप, बंदर और चमगादड की

क्यों पहनते हैं कुछ
गेरुवा रंग के वस्त्र
और क्यों घूमते हैं कुछ
एक दम नग्न ?

शुद्र का प्रवेश
वर्जित क्यों है
तुम्हारे मंदिरों में
तुम तो करते हो
इंसानियत की बात ?

बहुत है सवाल
जवाब नही मिलता
कभी भी
ठीक-ठीक ..

गाँव से लौटकर : नि‍त्‍यानंद गायेन

नि‍त्या‍नंद गायेन

कुछ दि‍न गाँव में रहकर लौटे युवा कवि‍ नि‍त्‍यानंद गायेन की कवि‍ता-

गाँव से
अभी-अभी
लौटा हूँ शहर में

याद आ रही है
गाँव की शामें
सियार की हुक्का हू
टर्र -टर्र करते मेंढक
सुलटी*के नवजात पिल्ले

कुहासा में भीगी हुई सुबह
घाट की युवतियाँ
सब्जी का मोठ उठाया किसान
धान और पुआल
आँगन में मुर्गिओं की हलचल

डाब का पानी
खजूर का गुड़
अमरुद का पेड़
मासी की हाथ की गरम रोटियाँ
माछ-भात

पान चबाते दाँत
और …
नन्ही पिटकुली* की
चुलबुली बातें

*सुलटी- हमारी कुतिया
*पिटकुली- छोटे मामा की 5 वर्ष की बिटिया

समय को प्रभावित करतीं कविताएं : विजय राठौर

युवा कवि नित्‍यानंद गायेन के कविता संग्रह पर वरिष्‍ठ कवि और आलोचक विजय राठौर की टिप्‍पणी-

युवा कवि नित्यानंद गायेन का नवीन कविता संग्रह ‘अपने हिस्से का प्रेम’ पढ़ने को मिला। इस प्रतिक्रियावादी समय में सडांधयुक्त विशाल जन राशि में एक कंकर फेंक कर अस्सी वर्षीय अन्ना हजारे व्याकुल लहरों के उपजने की प्रतीक्षा में हैं। ठीक यही काम तीस वर्षीय युवा कवि नित्यानंद गायेन कर रहे हैं। अपने समय के सच को पहचानना और उस पर जिम्मेदारीपूर्वक सटीक वार करना हिम्मत का काम है। सहज सरल एवं आम जन के लिए शब्दों के साथ शब्दों की बाजीगरी से बहुत दूर खडे़ हैं नित्यानंद गायेन। इनकी ज्यादातर कविताएं अनुभव सत्य पर आधारित हैं। ‘कृति ओर’ के संपादक डॉ. रमाकांत शर्मा कहते हैं कि कविता लोक मनुष्य से जुड़कर ही अपनी सार्थकता सिद्ध करती है। केवल कला और स्थापत्य से काम नहीं चलेगा, वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ जीवन से जुडा़व जरूरी है।

नित्यानंद की कविताओं में गरीब, वंचित, पीडित मजदूर और मजबूर वर्ग की पीड़ा है। इनकी कविताओं में सामाजिक सरोकारों का स्पष्ट प्रतिविबंन है। ये सारी कविताएं स्वतःस्फूर्त लगती हैं। बच्चों के लिए लिखी गई अत्यंत छोटी रचना ‘हाथी का चित्र’ मनुष्येतर प्राणियों की चिंता जताती है। वह लिखते हैं-

जब मेरे बच्चे होंगे तब
हाथी नही होंगे शायद जंगल में

आंतरिक संवेदनाओं को कुरेदते हुए सामाजिक चेतना जागृत करने की कोशिश में वह लिखते हैं कि

यह पक्का है काटने वाला
आँखों की भाषा नहीं समझता
और बकरा सिर्फ आँखों से बोलता हैं
कटने से पहले

मनुष्य में ही सोचने-समझने की शक्ति है। आत्मचिंतन मंथन की अद्भुत क्षमता है। परंतु जब हिंसा की बात चलती है, उसका चिंतन-मनन काफूर हो जाता है। यही मुख्य चिंता है गायने की।

पर्यावरण की गहरी चिंता उनकी कविताओं के प्राण तत्व हैं। आने वाले समय की पग ध्वनियाँ वे अभी से सुन रहे हैं। अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा यह बोतल बंद पानी चीख-चीख कर कह रहा है। आगे क्या-क्या बिकेगा कौन जाने। उनकी कविता कहती है-

आज पानी बिकता है
कल हवा बिकेगी बाजार में

नित्यानंद बगावती तेवर के ईमानदार कवि हैं। इतनी कम उम्र में इतनी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया समय को लेकर बहुत कम नवोदित कवियों में देखने को मिलती है। अपने स्वत्व को बचा कर हजार खतरे मोल लेते हुए समय के सच को उजागर करना समकालीनता की जरूरी प्रतिबद्धता है। वह लिखते हैं-

मैं बेचने की लिए नहीं लिखता
बिक गया तो लिख नहीं पाऊँगा
कोई नई कविता
फिर कभी

छत्तीसगढ़ के जन कवि लक्ष्मण मस्तूरिया कहते हैं- वो गिरे परे हपटे मन मोर संग चलो रे। नित्यांनद भी अपनी कविता ‘मेरे शून्य आकाश में’ में एक निरापद संसार की कल्पना करते हैं। जहाँ भय नहीं, पीड़ा नहीं, धर्म के झगडे़ नहीं, एकछत्र राज्य होगा मनुष्यता का। ऐसी निरापद जगह बुनने के लिए वह आवाहित करतें हैं आम जन को। वह कहते हैं-

कोई नहीं होगा यहाँ आरक्षित किसी स्तर पर
समय समान होंगे
मेरे शून्य आकाश में

ऐसे दुखविहीन लोक की कल्पना एक सजग कवि ही कर सकता है। गायेन की पैनी दृष्टि अपने स्थान से मीलों दूर की स्थिति को भाँप लेती है। यह समय रोटी के लिए जद्दोजहद का समय है। ऐसे समय में जब मनुष्य को गरीबी रेखा के नीचे भी तीन स्तरों में बांटा जा चुका है, तब स्थिति कितनी भयावह है यह कल्पनातीत है। अपनी कविता ‘मेरे आँगन में’ में गायेन ने निम्न वर्ग की स्थिति को बड़ी सरलता से बयान किया है-

मेरे आँगन में
अब चिडिया नही आती
दाना चुगने
शायद उन्हें पता चल गया है
मंहगाई का स्तर और
मेरी हालत का

‘आत्म सो गई’, ‘उसकी माँ’, ‘आज देश में’, ‘मैं वह नहीं था’, ‘भूले बिसरे’, ‘तहकीकात’ आदि कविताएं व्यवस्था के विरुद्ध तीखे बयान हैं। इसी सड़ी हुई व्यवस्था का परिणाम कविता ‘शांति पाठ’ है। जिसमें असहाय मनुष्य की खुदकुशी का चित्रण है।

संग्रह की कुछ प्रेम कविताएं ‘तुम भी दूरी मापती होगी’, ‘अभ्यास पुस्तिका’, ‘भूलोगे न मुझे उम्र भर’, ‘वक्त था अपना भी’, ‘खोया था एक दिन’, ‘नियंत्रण’ आदि प्रेम को नये ढंग से परिभाषित करती हैं। उन्होंने कहना चाहा है कि प्रेम जब खत्म होता है तो कुछ नया उपजता भी है। प्रेम के टूटने पर नहीं जाती साँसें। अंतरतम के किसी कोने में उस प्रेम की कोई न कोई फाँस गडी़ रह जाती है जो सालती है रह-रह कर समय-समय पर। और अंत में उनकी कविता ‘यह वही बाबा नार्गाजुन हैं’ की चर्चा आवश्यक है। यह कविता थोडे़ में नार्गाजुन को समझने के लिए पर्याप्त है। इस कविता की एक पंक्ति ‘ये वही अंतहीन कवि हैं’ नार्गाजुन की हजारों वर्ष जीवित रखने की लालसा रखने वाली पंक्ति है। नार्गाजुन के कविताओं के संप्रषण का कोई अंत नहीं है। यह संग्रह की श्रेष्ठ कविताओं में से एक है।

मैं गायेन को उनकी इन वैचारिक कविताओं के लिए साधुवाद देता हूँ। ईश्वर करे उनकी आँखों में नमी बनी रहे और वह शांत जल में कंकर फेंकने का उपक्रम करते रहें।

(समकालीन तीसरी दुनिया, जून-जुलाई 2011 से साभार)

पुस्‍तक : अपने हिस्‍से का प्रेम(कविता संग्रह), पृष्‍ठ: 88, मूल्‍य: 50 रुपये
कवि : नित्‍यानंद गायेन
प्रकाशक: संकल्‍प प्रकाशन, बागबहरा, जिला महासमुंद- 493449

 

मीडिया क्या है ? : नित्यानंद गायेन

जन सरोकारों से कट चुके मीडिया पर चल रहे प्रहसन पर युवा कवि नित्‍यानंद गायेन की कविता-

मीडिया दूर-दर्शन है
सरकारी वाचक है
मीडिया प्रभु है
बरखा है
वीर है
मीडिया–
दिशाहीन योद्धा का
छोड़ा हुआ तीर है

मीडिया–
सत्ता है
राडिया है
बहुत बढिया है
नोट के बदले
खबर है मीडिया
स्टिंग आपरेशन है
शोषण है
बार-बार एक ही समाचार
लगता है लूज मोशन है
मीडिया राखी सावंत है

मुठभेड़ है
मीडिया मतभेद है
हमें इसका बेहद खेद है
मीडिया डांस-डांस-डांस है
सास-बहू और साज़िश है
अपवाद है
अवसाद है
मीडिया अवसरवाद है
कुछ एकदम बर्बाद है

सबसे आगे
सबसे तेज़ है
सनसनी है
मीडिया वारदात है

यह सर-देसाई है
ज्ञानियों का
दबंगों का हक़ है
गुड लक है
मीडिया जानता है
जनता अनपढ़ है
भुलक्कड़ है
यह टी.आर.पी. की होड़ है
भ्रष्टाचार का नया पेड है
अदालत है
मीडिया कुछ लोगों की वकालत है
नेता-उद्योगपतियों का
पूंजी निवेश कुञ्ज है
यह हाथी का सूंड है

मीडिया –
तुलसी-मिहिर का
प्रेम प्रसंग है
खली है
महाबली है
मीडिया ख़बरों की उछाल है
देश में भूचाल है
मीडिया मायाजाल है …

नित्यानंद गायेन की तीन कवितायें

20 अगस्त 1981 को शिखरबाली, पश्‍चिम बंगाल में जन्‍में नित्यानंद गायेन की कवितायें और लेख सर्वनाम, अक्षरपर्व,  कृति ओर, समयांतर, समकालीन तीसरी दुनिया, जनसत्ता, हिंदी मिलाप  आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। उनका काव्‍य संग्रह ‘आपने हिस्से का प्रेम’ भी प्रकाशित हो चुका है। फिलहाल हैदराबाद के एक निजी संस्थान में अध्यापन व स्वतंत्र लेखन। उनकी तीन कवितायें-

आज़ाद कब हुआ मैं ?

15 अगस्त
सन् 1947 से
अबतक
आज़ाद कहाँ हो पाया मैं
अभी तक घिरा हुआ हूँ
भूख-शोषण
और धर्म की गुलामी में
किन्तु सुना है मैंने
कई बार-
हम आज़ाद हो चुके हैं
उन्हें कहते हुए
कुछ तो सच्चाई होगी
उनकी बातों में
वे शायद सच में आज़ाद हैं
तभी तो लूट रहे हैं
जी भर कर
उन्हें लूटने की आज़ादी है
मेरी आज़ादी के नाम पर
मिली है मुझे
गरीबी, शोषण, अशिक्षा
और कुछ आरक्षण का वादा
एक सरकारी कागज़ पर
उन्हें मालूम था
मुझे पढना नही आता .

वह खोद रहा है जमीन

पिछले कई वर्षों से
या कहिये सदियों से
वह खोद रहा है ज़मीन
इस उम्मीद से कि-
एक दिन निकलेगा पानी
और वह बोयेगा धान अपने छोटे से खेत में
और बचा लेगा
अपने परिवार को
भूख से
अचानक एकदिन
चीख उठी धरती-
मुझे माफ़ कर देना मेरे पुत्र
अब कुछ नहीं बचा मेरे गर्भ में
मैं लूट चुकी हूँ
सब कुछ बिक चुका है मेरा
अब मैं खुद प्यासी हूँ

मेरा बजूद

मैं नही चाहता
मरने के बाद
अपनी चर्चा तुम्हारी
किसी महफिल में
जीते जी थोड़ा मिल जाये
वही बहुत है
आधी उम्र तो
बीत चुकी  है
जीने की  लड़ाई में
बस मान लो इतना
कि मैं भी इन्सान हूँ
यही बहुत है
यही मेरा वज़ूद है