
युवा कवि नित्यानंद गायेन के कविता संग्रह पर वरिष्ठ कवि और आलोचक विजय राठौर की टिप्पणी-
युवा कवि नित्यानंद गायेन का नवीन कविता संग्रह ‘अपने हिस्से का प्रेम’ पढ़ने को मिला। इस प्रतिक्रियावादी समय में सडांधयुक्त विशाल जन राशि में एक कंकर फेंक कर अस्सी वर्षीय अन्ना हजारे व्याकुल लहरों के उपजने की प्रतीक्षा में हैं। ठीक यही काम तीस वर्षीय युवा कवि नित्यानंद गायेन कर रहे हैं। अपने समय के सच को पहचानना और उस पर जिम्मेदारीपूर्वक सटीक वार करना हिम्मत का काम है। सहज सरल एवं आम जन के लिए शब्दों के साथ शब्दों की बाजीगरी से बहुत दूर खडे़ हैं नित्यानंद गायेन। इनकी ज्यादातर कविताएं अनुभव सत्य पर आधारित हैं। ‘कृति ओर’ के संपादक डॉ. रमाकांत शर्मा कहते हैं कि कविता लोक मनुष्य से जुड़कर ही अपनी सार्थकता सिद्ध करती है। केवल कला और स्थापत्य से काम नहीं चलेगा, वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ जीवन से जुडा़व जरूरी है।
नित्यानंद की कविताओं में गरीब, वंचित, पीडित मजदूर और मजबूर वर्ग की पीड़ा है। इनकी कविताओं में सामाजिक सरोकारों का स्पष्ट प्रतिविबंन है। ये सारी कविताएं स्वतःस्फूर्त लगती हैं। बच्चों के लिए लिखी गई अत्यंत छोटी रचना ‘हाथी का चित्र’ मनुष्येतर प्राणियों की चिंता जताती है। वह लिखते हैं-
जब मेरे बच्चे होंगे तब
हाथी नही होंगे शायद जंगल में
आंतरिक संवेदनाओं को कुरेदते हुए सामाजिक चेतना जागृत करने की कोशिश में वह लिखते हैं कि
यह पक्का है काटने वाला
आँखों की भाषा नहीं समझता
और बकरा सिर्फ आँखों से बोलता हैं
कटने से पहले
मनुष्य में ही सोचने-समझने की शक्ति है। आत्मचिंतन मंथन की अद्भुत क्षमता है। परंतु जब हिंसा की बात चलती है, उसका चिंतन-मनन काफूर हो जाता है। यही मुख्य चिंता है गायने की।
पर्यावरण की गहरी चिंता उनकी कविताओं के प्राण तत्व हैं। आने वाले समय की पग ध्वनियाँ वे अभी से सुन रहे हैं। अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा यह बोतल बंद पानी चीख-चीख कर कह रहा है। आगे क्या-क्या बिकेगा कौन जाने। उनकी कविता कहती है-
आज पानी बिकता है
कल हवा बिकेगी बाजार में
नित्यानंद बगावती तेवर के ईमानदार कवि हैं। इतनी कम उम्र में इतनी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया समय को लेकर बहुत कम नवोदित कवियों में देखने को मिलती है। अपने स्वत्व को बचा कर हजार खतरे मोल लेते हुए समय के सच को उजागर करना समकालीनता की जरूरी प्रतिबद्धता है। वह लिखते हैं-
मैं बेचने की लिए नहीं लिखता
बिक गया तो लिख नहीं पाऊँगा
कोई नई कविता
फिर कभी
छत्तीसगढ़ के जन कवि लक्ष्मण मस्तूरिया कहते हैं- वो गिरे परे हपटे मन मोर संग चलो रे। नित्यांनद भी अपनी कविता ‘मेरे शून्य आकाश में’ में एक निरापद संसार की कल्पना करते हैं। जहाँ भय नहीं, पीड़ा नहीं, धर्म के झगडे़ नहीं, एकछत्र राज्य होगा मनुष्यता का। ऐसी निरापद जगह बुनने के लिए वह आवाहित करतें हैं आम जन को। वह कहते हैं-
कोई नहीं होगा यहाँ आरक्षित किसी स्तर पर
समय समान होंगे
मेरे शून्य आकाश में
ऐसे दुखविहीन लोक की कल्पना एक सजग कवि ही कर सकता है। गायेन की पैनी दृष्टि अपने स्थान से मीलों दूर की स्थिति को भाँप लेती है। यह समय रोटी के लिए जद्दोजहद का समय है। ऐसे समय में जब मनुष्य को गरीबी रेखा के नीचे भी तीन स्तरों में बांटा जा चुका है, तब स्थिति कितनी भयावह है यह कल्पनातीत है। अपनी कविता ‘मेरे आँगन में’ में गायेन ने निम्न वर्ग की स्थिति को बड़ी सरलता से बयान किया है-
मेरे आँगन में
अब चिडिया नही आती
दाना चुगने
शायद उन्हें पता चल गया है
मंहगाई का स्तर और
मेरी हालत का
‘आत्म सो गई’, ‘उसकी माँ’, ‘आज देश में’, ‘मैं वह नहीं था’, ‘भूले बिसरे’, ‘तहकीकात’ आदि कविताएं व्यवस्था के विरुद्ध तीखे बयान हैं। इसी सड़ी हुई व्यवस्था का परिणाम कविता ‘शांति पाठ’ है। जिसमें असहाय मनुष्य की खुदकुशी का चित्रण है।
संग्रह की कुछ प्रेम कविताएं ‘तुम भी दूरी मापती होगी’, ‘अभ्यास पुस्तिका’, ‘भूलोगे न मुझे उम्र भर’, ‘वक्त था अपना भी’, ‘खोया था एक दिन’, ‘नियंत्रण’ आदि प्रेम को नये ढंग से परिभाषित करती हैं। उन्होंने कहना चाहा है कि प्रेम जब खत्म होता है तो कुछ नया उपजता भी है। प्रेम के टूटने पर नहीं जाती साँसें। अंतरतम के किसी कोने में उस प्रेम की कोई न कोई फाँस गडी़ रह जाती है जो सालती है रह-रह कर समय-समय पर। और अंत में उनकी कविता ‘यह वही बाबा नार्गाजुन हैं’ की चर्चा आवश्यक है। यह कविता थोडे़ में नार्गाजुन को समझने के लिए पर्याप्त है। इस कविता की एक पंक्ति ‘ये वही अंतहीन कवि हैं’ नार्गाजुन की हजारों वर्ष जीवित रखने की लालसा रखने वाली पंक्ति है। नार्गाजुन के कविताओं के संप्रषण का कोई अंत नहीं है। यह संग्रह की श्रेष्ठ कविताओं में से एक है।
मैं गायेन को उनकी इन वैचारिक कविताओं के लिए साधुवाद देता हूँ। ईश्वर करे उनकी आँखों में नमी बनी रहे और वह शांत जल में कंकर फेंकने का उपक्रम करते रहें।
(समकालीन तीसरी दुनिया, जून-जुलाई 2011 से साभार)
पुस्तक : अपने हिस्से का प्रेम(कविता संग्रह), पृष्ठ: 88, मूल्य: 50 रुपये
कवि : नित्यानंद गायेन
प्रकाशक: संकल्प प्रकाशन, बागबहरा, जिला महासमुंद- 493449
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