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नए साल पर : कमल जोशी

kamal joshi. new year
इस बार मत सोचना
अपने और अपनों के बारे में।
सोचना कुछ
उदास आँखोंवाले भूखे बचपन के बारे में।
खाली हाथ जवानी के बारे में।
जीने, और थोड़ा और बेहतर जीने के
सपने देखनेवाली लड़की के बारे में।
दिन-भर हाड़ तुड़ाती, मेहनत करती
फिर भी भूखी रहती व पिटती औरत के बारे में।
बंधती, बिकती और लुटती नदी के बारे में।
पानी के बारे में, हवा के बारे में, जंगल के बारे में
और गौरय्या के बारे में।

और हाँ! सोचना जरूर,
इन नेताओं के बारे में,
अपने गुस्से के बारे में
अपने निश्चय के बारे में !

नये साल पर कमल जोशी की कविताएं

kamal joshi
नए साल में सामाजिक, राजनीतिक व सांस्‍कृतिक चेतना का विकास हो। इस कामना के साथ प्रसिद्ध फोटोग्राफर और लेखक कमल जोशी की कविताए- 

1.

खेतों को नाज मिले
बैलों को सानी
जंगल को पेड़ मिलें
नदिया को पानी

बिटिया को प्‍यार मिले
बेटे को काज
तवे को रोटी मिले
चूल्‍हे को आग

बटिया को राही मिले
प्‍यासे को कुव्‍वां
बच्‍चों को खेल मिले
चिमनी को धव्‍वां

जुगनू को रा‍त मिले
चिडि़या को आसमान
‘होरी’ को मान मिले
संघर्ष को दास्‍तान

सागर भी नीला रहे
पर्वत हो धानी
ऐसा हो नया साल
सपनों के मानी।

2.

दिल कहे आऊँ मैं
सबको ले जाऊँ मैं
खुशियों की नाव में
छोटे से गाँव में
पेड़ों की छाँव में।

3.

माना की सर्द हो गया है मौसम
धरती ढक गई है बरफ से
फिर भी
खुद को सम्‍भालो
कुछ इरादे समेटो
ठण्‍ड से काँपती उंगुलियों से
मिट्टी में दबा दो कुछ सपने।

बुराँस लायेगा वसंत
और आग लगा देगा जंगल में
मिट्टी के गरम होते ही
तुम्‍हारे इरादों की कोंपले
जमीन को फोड़ निकलेंगी बाहर
बाँहे फैला कर करने लगेंगी
आसमान से बातें

उठो! आओ, कि बो दो कुछ इरादे
मैं लाऊँगा बुराँस
कभी, कहीं से
जंगल में लगाने को आग।

4.

इस साल
बात करना किसी पेड़ से!

पूछना उससे
जब तुम्‍हारा सर
छू रहा होता है आसमान
तुम तब भी क्‍यों
पकडे़ रहते हो मिट्टी?

जब तुम्‍हारे पत्‍ते
हरे होकर
सूरज से करने लगते हैं बातें
क्‍यों तब भी नहीं छोड़ते
वो शाखों को ?

तुम
अपनी छाया में आने वाले से
नहीं पूछते
उसकी जाति ना पाति
न उसका धर्म!

पत्‍थर मार कर
फल तोड़ते बच्‍चों से
कभी नहीं पूछा तुमने
कि
क्‍या दोगे इसके बदले?

पूछना उससे,
पेड़! तुम ऐसे क्‍यों हो
कैसे करते हो तुम ऐसा
हम क्‍यों नहीं कर पाते ऐसे!
मालूम करना तो जरा उससे।

सृष्टि बीज का नाश न हो, हर मौसम की तैयारी है : सुधीर सुमन

वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की डायरी के अंश-

यह सोच के चला था कि पुराने साल में ही परिजनों और साथियों के बीच पहुँच जाऊँगा और अपनी ही जमीन पर नये साल का इंतजार करूँगा। रिजर्वेशन मिला नहीं, पर चूँकि ट्रेन के प्रस्थान स्टेशन से चलना था, इसलिए बैठने की जगह मिल गई। ट्रेन थी एक्सप्रेस, नाम के अनरूप सचमुच विभूति। इलाहाबाद से बनारस के बीच सिंगल लाइन में उसे यूँ भी चार-पाँच क्रासिंग का सामना करना पड़ता है, लेकिन उस रोज तो 35-40 मिनट चलने के बाद इंजन ने ही जवाब दे दिया। ट्रेन हंडिया स्टेशन से पहले ही खड़ी हो गई। दोनों ओर दूर तक गेहूँ के खेत। सामने रेल ट्रैक के बगल में लगाए गए पौधे, जो अभी पेड़ हुए नहीं, पौधे और पेड़ के बीच हैं, उनमें से सूखी लकडियाँ बटोरती कुछ लड़कियाँ, दायीं ओर बहुत लम्‍बा फ्लाईओवर, सूर्य का तेज पहले से ही गायब, अब तो उसके होने का भी कोई मतलब नहीं, धुआँ-धुआँ-सा चारों ओर। इंजन का इंतजार।

वक्त कैसे कटे! अरे हाँ,  ट्रेन लेट है तो क्या, मेरे पास तो जरूरी काम है। मैं भी लेट हूँ। एक पत्रिका का नागार्जुन विशेषांक मुझे निकालना है, कई माह हो गए हैं, अब उसे तैयार ही कर देना है। उसमें आरा में उनकी जन्मशताब्दी के समापन के अवसर पर आयोजित समारोह में दिये गये कुछ वक्तव्यों को भी छापना है। मैंने अपना नन्हा-सा रिकार्डर निकाला और एक वक्तव्य, जो लगभग 36 मिनट का है, उसका ट्रांस्क्रिप्शन शुरू कर दिया। बीच-बीच में घड़ी भी देख रहा हूँ। डेढ़ घंटे गुजर गए। लोग एक-दूसरे को आश्वस्त कर रहे हैं कि सूचना मिली है, इंजन पंद्रह-बीस मिनट में पहुँच जाएगा। कोई कहता है, इंजन की लाइट नजर आ रही है। खैर, एक इंजन आ ही गया। वह ले चला, पर विभूति के नखरे, ब्रेक जाम या इंजन का दम उखड़ रहा, कुछ अजीब सी आवाजें आने लगीं, जैसे पहिये में कुछ फँस गया हो, कुछ घिसट रहा हो साथ। कुछ जलने की तीखी बू। गनिमत है कि ट्रेन फिर रुक गई। पर मेरी कलम की रफ्तार तेज, मानो ट्रेन के रुकने की भरपाई इससे हो जाएगी। एक वजह यह भी है कि रिकार्डर की बैट्री की एक ही डंडी बची हुई है, कहीं वह गायब, तो फिर कलम भी रुक जाए। कहीं एक आशंका कि डब्बे में आग न लग जाए। शंका-समाधान हेतु कुछ लोग गार्ड को बुला लाते हैं। लोग निश्चिंत हैं, यानी घड़बराने की बात नहीं।

सात बज गए, अब तक तो ट्रेन को बनारस से आगे निकल जाना चाहिये था। अरे अब तो मेरा ट्रास्क्रिप्शन भी खत्म होने वाला है। 5 मिनट का बचा हुआ है। 7 : 20 हुआ है। ट्रांस्क्रिप्शन पूरा हुआ और साथ ही बैट्री की इकलौती डंडी भी गायब हो गई, मगर ट्रेन अभी भी रुकी हुई है। सोचता हूँ कि अब भी ट्रेन चल पड़े तो 12 बजे अपने शहर में पहुँचा जाऊँगा। दो वर्षों के संधिकाल का संधिस्थल मेरा शहर बने मेरे लिए, तो क्या बात होगी, पर ये विभूति यहाँ से हिले तो सही! आखिर 8 बजे ट्रेन चल पड़ी, उम्मीद जगी कि ट्रेन जरूर रात 12 बजे मेरे शहर पहुँच जाएगी। ये नेहरू की तरह tryst with destiny का कोई चक्कर नहीं है। वैसे भी इस महान लोकतंत्र की संसद की सर्वोच्चता का चरम पाखंड साल के गुजरते-गुजरते हम देख चुके हैं, अब तो बस यही सोच रहा हूँ कि जरा आने वाले साल में जनता की सर्वोच्चता से और तीखेपन से साक्षात्कार हो हमारे रहनुमाओं, सरकारों और पार्टियों का, तो मजा आ जाए। जरा सर्वोच्चता के सिंहासन पर बैठे उद्दंड, भ्रष्ट और लुटेरे लोगों की अक्ल तो ठिकाने आए। मगर अभी तो सवाल यह है कि यह ट्रेन कब मेरे शहर पहुँचेगी! बीच-बीच में इसका रुकना जारी है।

सर्द स्याह रात में अपनी ही गति से ट्रेन जा रही है। बनारस पहुँचते-पहुँचते चार घण्‍टे विलंबित हो चुकी है। अब मैंने समय का ख्याल छोड़ दिया है। कई तरह के विचार आ-जा रहे हैं, नींद नहीं आ रही है। घड़ी से ध्यान हट चुका है। मालूम नहीं कब और कहाँ एक साल से दूसरे साल में मैं दाखिल हो गया। एक किशोर का कॉल- हैपी न्यू ईयर, कहाँ पहुँचे? मैं- मालूम नहीं, बक्सर भी नहीं पहुँची। आखिरकार 2:30 में ट्रेन आरा प्लेटफार्म पर दाखिल हुई। बाहर आया, रिक्शा लिया, सारी दूकानें बंद हैं, सिर्फ मुर्गे जाग रहे हैं और मुर्गों को बेचने वाले, रौशनी वहीं है। सन्नाटा, शीत और हवा। रिक्शा रुका, कुछ नौजवान आग ताप रहे हैं,  उनके देखते-देखते मैं एक पतली गली में दाखिल हुआ, फिर एक सड़क पार किया, फिर एक लम्‍बी गली और पाँच-सात मिनट पैदल चलने के बाद अपने एक रिश्तेदार के यहाँ पहुँचा। इंतजार करते करते सो गए हैं लोग, पर तुरन्‍त जग गए। खाना मिला, खाया और फिर सो गया। घण्‍टे-डेढ़ घण्‍टे बाद ही एक चित्रकार साथी की शुभकामना नए साल की, उसके बाद फिर एक कॉल एक रिश्तेदार की, फिर नींद, फिर कुछ देर बाद एक कॉल इस बार एक रंगकर्मी साथी हैं- मौसम ठीक नहीं है, इसलिए सफदर हाशमी के शहादत दिवस के अवसर पर आज कार्यालय में ही एक संगोष्ठी रख ली गई है। बाहर नाटक करना सम्‍भव नहीं है।

लीजिए साहब, मौसम भी खराब हो गया। कितना खराब होगा! बाहर निकल के देखता हूँ। अच्छा, यह तो हल्की सी बूँदा-बाँदी है कितने देर तक चलेगी! लेकिन मौसम का मिजाज ठीक नहीं होता। नहाने-वहाने के बाद यार-दोस्तों, साहित्यकारों से मिलने के लिए निकलना है, पर बारिश बढ़ जाती है, और फिर लिहाफ में गुड़ुम। नींद जिसे दूर कर रखा था रात में वह आ दबोचती है, और फिर वक्त गुजरता जाता है, अवचेतन में कई-कई अनदेखे परिचित से प्रसंग चलते रहते हैं, लगता है कि मोबाइल बज रहा है देर से, आँख खुलती है, मोबाइल ही बज रहा है। फिर रंगकर्मी साथी हैं- आइए, थोड़ी देर में सबलोग आ जाएँगे।

अब तो निकलना ही पड़ेगा। हर साल यहां नाट्य संस्था ‘युवानीति’ सफदर की याद में नुक्कड़ नाटक करती है। नये साल की शुरुआत को मौज-मस्ती और जश्न के साथ लोग मनाते हैं, उस पूरे माहौल में यह बिल्कुल अलग किस्म का काम लगता है, पर ‘युवानीति’ के रंगकर्मी हर साल सफदर को याद करते ही हैं, नये साल के एक जरूरी कार्यभार की तरह। सड़कों पर कीचड़ है, हाल में दुबारा पढ़े गए श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘रागदरबारी’ की याद आती है, जिसमें गन्‍दगी के प्रसंगों का जिक्र कई बार आया है। काश, ऐसा होता कि घर से निकलता, सड़क और गलियाँ साफ होतीं और बिना किसी मुश्किल के मैं ‘युवानीति’ के कार्यालय पहुँच जाता, लेकिन जो नहीं है, उसका क्या गम! अभी तो हम जो कर सकते हैं, वह कर रहे हैं। गन्‍दगी हो या सफाई पैदल पहुँचने में समय लगभग दस-पंद्रह मिनट ही लगता है। तो इतने समय में मैं पहुँच गया कार्यालय।

मेरे सहपाठी कवि सुमन कुमार सिंह हैं, ‘युवानीति’ के नए संयोजक राजू रंजन हारमोनियम लिए बैठे हैं, कथाकार विजेंद्र अनिल के पुत्र कवि सुनील श्रीवास्तव हैं, रंगकर्मी अरुण प्रसाद है, सत्यदेव हैं, दो नए किशोर हैं। अभी और लोगों का इंतजार है। कवि जितेंद्र कुमार आते हैं, फिर आलोचक रामनिहाल गुंजन और हमारे पुराने रंगकर्मी साथी पत्रकार शमशाद प्रेम हमेशा की तरह लेट-लतीफ, उनके पहले कवि सुनील चौधरी आ चुके हैं। अरुण प्रसाद संगोष्ठी का संचालन शुरू करते हैं। राजू रंजन महेश्वर जी का गीत ‘सृष्टिबीज का नाश न हो, हर मौसम की तैयारी है/कल का गीत लिए होठों पर आज लड़ाई जारी है’ गाकर सफदर हाशमी और उनके साथ शहीद हुए रामबहादुर को श्रद्धांजलि देते हैं, सारे लोग उनकी आवाज में आवाज मिलाते हैं। एक मिनट का मौन के बजाय गीत के जरिये श्रद्धांजलि देना मुझे ज्यादा उचित लगता है।

मुझे बोलना है। मैं याद दिलाता हूँ कि हमारी सफदर हाशमी से नुक्कड़ नाटक और विचारधारा को लेकर बहसें भी थीं, लेकिन वाम सांस्कृतिक आंदोलन की वे ऐसी शख्सियत थे, जिनकी शहादत के बाद नए सिरे से कुछ वर्षों के लिए नुक्कड़ नाट्य आंदोलन में एक उभार आया था। 1992 में ‘युवानीति’ के रंगकर्मियों ने छात्रों की एक टीम बनाई थी, जिसने पहला जो नाटक किया था, वह सफदर का ही लिखा हुआ था- ‘राजा का बाजा’। मैंने भी उसमें एक प्रतिकोरस की भूमिका निभाई थी। यह अजीब विडम्‍बना रही कि जिस कांग्रेस के गुंडों ने उन्हें मारा, उसी  कांग्रेस के साथ आने वाले सालों में सीपीएम का घनिष्ठ रिश्ता बनता गया। यहाँ तक कि उसी के आर्थिक नुस्खे को लागू करने के कारण भारी नुकसान भी उठाना पड़ा। जो हो, आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद के दौर में हमें सफदर को इसलिए भी याद करना जरूरी लगता रहा कि इसके जरिये हम विचारधारा और संस्कृतिकर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की परख करते थे, अपने अंदर इस धारणा को और मजबूत बनाते थे कि संस्कृतिकर्म हमारी जिंदगी में दोयम दर्जे का काम नहीं, बल्कि रोजी-रोटी की जद्दोजहद से भी ज्यादा अर्थपूर्ण काम है, जिसे करते हुए जान भी दी जा सकती है। यह सच है कि संकट पहले से अधिक है, एक समय आरा में कई-कई नाट्य संस्थाएं थीं, पर आज जिस रूप में हो, ‘युवानीति’ ही बची हुई है, जो अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। बेशक इसने हाल के वर्षों में कोई यादगार प्रस्तुति नहीं की है, पर निरंतरता बनाए रखने के लिए यह हमेशा प्रयासरत है।

अरुण प्रसाद और राजू रंजन बताते हैं कि अगले दस दिन वे लोग स्कूल-कालेजों में जनकला को मजबूत करने के लिहाज से विचार-विमर्श चलाएँगे और नए सदस्य बनाएँगे। उसके बाद जनवरी में ही एक नाट्य कार्यशाला की जाएगी, जिसमें नाट्य कला के साथ-साथ नाटकों के वैचारिक सरोकार पर विचार-विमर्श भी होगा। इस कार्यशाला के जरिये एक नाटक भी तैयार किया जाएगा, जिसकी प्रस्तुति जसम के प्रथम महासचिव गोरख पांडेय के स्मृति दिवस पर 29 जनवरी को की जाएगी। नाटकों के जरिये संस्कृति, समाज और राजनीति की दुनिया में निरंतर वैचारिक हस्तक्षेप कैसे किया जाए, लोग यह सोच रहे हैं। छात्र राजनीति और संस्कृतिकर्म से जुड़े रहने वाले सत्यदेव कहते हैं कि सैद्धांतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता ने ही युवानीति को बचा रखा है। जाहिर है, यह सब सुनना अच्छा लगता है।

जो संस्कृतिकर्मी यह समझते हों कि जो उनके जीवन का संकट है, सिर्फ उनका ही संकट नहीं है, बल्कि बड़ी आबादी उसी संकट को झेल रही है, उनसे सचमुच एक उम्मीद सी बंधती है। कवि सुनील चौधरी ने यही तो कहा कि संकट सिर्फ हमारे लिए नहीं है, हमारी उपयोगिता तो यह है कि हम संकट के लिए जिम्मेदार चेहरे को चिह्नित करें और उससे मुक्ति का रास्ता बताएं। राजनीति से किसी किस्म के जनसंस्कृतिकर्म की दूरी को वह आज के दौर में आत्मघाती मानते हैं। देश-दुनिया में बढ़ रहे जनांदोलनों की खबरों से सुनील उत्साहित हैं और चाहते हैं कि संस्कृतिकर्मी उनके पक्ष में गीत-संगीत का कैसेट बनाएं, उनके बारे में नाटक करें। ‘युवानीति’ का बेहद मशहूर नाटक है- तेरा नहीं, मेरा नहीं सब कुछ हमारा। सुनील खुश हैं कि यही आवाज बदले हुए रूप में वालस्ट्रीट पर कब्जा करने वाले आंदोलनकारियों के नारों में गूँज रही है, भले उन्होंने हमारे नाटक से यह सब न सीखा हो, पर 1 प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत के नारे में ‘तेरा नहीं, मेरा नहीं, सब कुछ हमारा’ की अनुगूँज ही उन्हें सुनाई देती है।

जसम बिहार के अध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन मानो अपने लंबे अनुभवों के आधार पर बोलते हैं- ‘‘जो जनपक्षधर रचनाकार होते हैं, उनका व्यवस्था से टकराव लाजिमी है। सफदर की शहादत ने कई प्रश्न खड़े किए। लेकिन शहादत के बावजूद उनकी परंपरा खत्म नहीं हो गई। जिन्हें उनके कार्यों को आगे बढ़ाना है, वही उन्हें याद करते हैं।’’

कवि सुमन कुमार सिंह टीम की निरंतरता में बाधा बनने वाले कारणों की ओर ध्यान खींचते हैं। रोजी-रोटी की जद्दोजहद के बीच से संस्कृतिकर्म के लिए पहलकदमी और ज्यादा समय निकालने की जरूरत पर बल देते हैं। संस्कृति की दुनिया में बढ़ रहे सत्ता और बड़ी पूँजी के खेल पर वह चौकस निगाह डालते हैं। दिल्ली में करोड़ों रुपये के खर्च से हुए ‘अंधायुग’ के मंचन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि आज के अंधे युग में कोई ‘अंधायुग’ नाटक पर क्यों इतने पैसे खर्च कर रहा है, इसके बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। बिहार में भी तरह-तरह के महोत्सव किये जा रहे हैं। वह सवाल उठाते हैं कि आखिर संस्कृति के क्षेत्र में सरकारें इतना पैसा क्यों बहा रही हैं? फिर खुद ही जवाब देते हैं, कि इसके जरिये सरकारें अपनी कमजोरियों को ढँकना चाहती हैं। सुमन ने हिंदी से एम.ए. किया है, बेनीपुरी पर उनकी पीएच.डी. हैं और एक स्कूल में वह दसवीं तक के छात्रों को पढ़ाते हैं। वह सफदर की ‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं’ और ‘बारिशें’ कविता का जिक्र करते हैं। उनका मानना है कि एक संवेदनशील व्यक्ति द्वारा सामाजिक जरूरत के तहत ये रचनाएं लिखी गई हैं।

सुनील श्रीवास्तव इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि बिहार शिक्षा परियोजना की किताबों में बल्ली सिंह चीमा की ‘ले मशालें ले चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के’ तथा अदम गोंडवी की ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है/दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आजाद है?’ नाम की गजलें भी है, पर उनकी जो पँक्तियां क्रांतिकारी राजनीति से संबंधित है, उसे हटा दिया गया है। जनवादी शायरों की रचनाओं का इस्तेमाल इस तरीके से भी किया जा रहा है। इसी संगोष्ठी में लोगों ने अदम गोंडवी पर जसम की ओर से 8 जनवरी को कार्यक्रम तय कर लिया। यह भी तय हुआ कि जो रचनाकार हैं, वे आज की परिस्थितियों पर बिल्कुल नई रचनाएं लिखकर अदम की जनधर्मी रचनाशीलता को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। जाहिर है अदम गोंडवी से जुड़े संस्मरण और उनकी गजलें तो सुनाई जाएँगी ही। खासकर ‘सौ में सत्तर आदमी’, ‘हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडि़ए’ ये दो गजलें युवानीति के कलाकारों द्वारा खूब गायी गई हैं, इस मौके पर वे उनकी कुछ और गजलों को गाएंगे।

आखिर में संगोष्ठी के अध्यक्ष कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार सावधान करते हैं- सत्ता युवाओं को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के जाल फैला रही है, गीत-नाटक वहाँ भी होता है, लेकिन हमारी मुश्किलों का हल वहाँ नहीं मिलता। पूंजीवाद जितने ही संकट में जाएगा, उतने ही उसके हमले हर स्तर पर बढ़ेंगे, ऐसी स्थिति में जनपक्षधर लोगों की आपसी एकजुटता और वैचारिक प्रतिबद्धता बेहद जरूरी है।

हमारे कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने वाले ‘जनपथ’ पत्रिका के संपादक अनंत कुमार सिंह नहीं हैं। उनका आपरेशन हुआ है। संगोष्ठी के बाद हम उनसे मिलने निकल जाते हैं। इस तरह नये साल की शुरुआत होती है।

उसके अगले दिन शाम में एक दूसरे रिश्तेदार के यहाँ जब यह डायरी लिख रहा हूँ तो सातवीं में पढ़ने वाली एक लड़की और दो छोटे लड़के मुझे घेरे हुए हैं। मैं अपने मोबाइल से की गई केरल के समुद्र की रिकार्डिंग दिखा रहा हूँ। वे चाहते हैं कि उन्हें कविता पढ़ते हुए रिकार्ड करूँ। मैं रिकार्ड करना शुरू करता हूँ। फिर तो जैसे तीनों में होड़ लग जाती है, मछली जल की रानी है से लेकर झाँसी की रानी और हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा तक, धड़ाधड़ वीडियो क्लिपें बनती जाती हैं। आह्लादित हूँ। वाह, कविता अपने तरीके से बची हुई है।

कथाकार मधुकर सिंह से भी मिलने जाना है। अगले दिन उनसे मिलता हूँ। वह अपनी पत्रिका ‘इस बार’ का रजिस्ट्रेशन करवाना चाहते हैं। उसी का फार्म लेकर गया हूँ। उनके पैरों पर पैरालाइसिस का गंभीर असर है। तेज-तेज चल नहीं सकते। घर में ही बैठे रहते हैं। कहते हैं- ‘क्या करूँ, कब तक चुपचाप पड़ा रहूँ। कुछ पढ़ू-लिखूँ न तो समय कैसे गुजरे!’ मधुकर सिंह पिछले ही दिन यानी 2 जनवरी को 77 साल के हुए हैं। शारीरिक लाचारी के बावजूद वह जोश से भरे हैं। बस रजिस्ट्रेशन हो जाये और वे पत्रिका निकालने में जुट जायें। पिछली मुलाकात में ही मुझसे शेयर किया था कि कहाँ-कहाँ से उसके लिए आर्थिक सहयोग मिल जाएगा। बस उन्हें इंतजार है कि पत्रिका का रजिस्ट्रेशन हो जाए, इस उम्र में वह एक और पारी खेलने को तैयार हैं। दिल्ली की पत्रिकाओं और उनके संपादकों के बारे में पूछते हैं। किसने-किसने नये साल की शुभकामनाएं उन्हें दी, यह भी बताते हैं। नई उम्र के नौजवानों के पास उनसे बतियाने की फुर्सत है नहीं, गाँव शहर के बिल्कुल किनारे है, इस कारण साहित्यकार बंधु भी कम ही पहुँचते हैं। ‘जनमत’ का अंक उन्हें अभी डाक से मिला नहीं है। एक प्रति उन्हें अपने झोले से निकालकर देता हूँ। वे उसके पन्ने पलटते हैं। कवि रामकुमार कृषक की पत्रिका ‘अलाव’ का ताजा अंक निकालकर दिखाते हैं। हाल में उन्हें एक पुरस्कार मिला है। उसी पुरस्कार समारोह में ‘लोकायत’ के संपादक कथाकार बलराम से उनकी मुलाकात हुई, इसकी चर्चा वह करते हैं। मेरे साथ भाकपा-माले के साथी गुड्डू उर्फ दिलराज प्रीतम हैं, उनसे पार्टी का हालचाल पूछते हैं। मैं दुबारा उनसे मिलने का वादा करके लौटता हूँ।

रास्ते में पटना से साथी नवीन का कॉल आता है- 5 जनवरी को कुमार मुकुल, अरविंद श्रीवास्तव और कई नए कवियों का कविता पाठ है, आइए। अब बीच में एक दिन बच रहा है- 4 जनवरी, शाम तक उसके लिए भी प्रस्ताव आ जाता है। किसानों ने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद रिकार्ड उत्पादन किया है, पर सरकार और प्रशासन को उसकी तय कीमत 1080 रुपये प्रति क्विंटल के अनुसार खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं है, जबकि सहकारिता मंत्री का वादा था कि खलिहान से ही सरकार धान खरीद लेगी, बिचैलियों और कालाबाजारियों की बहार है। किसान कालाबाजारियों को 600 रुपये प्रति क्विंटल धान बेचने के लिए मजबूर हैं। ‘युवानीति’ के पुराने साथी सुदामा प्रसाद आजकल अखिल भारतीय किसान सभा में हैं, उनका आग्रह है कि संस्कृतिकर्मी भी जिलाधिकारी के समक्ष किसानों के धरना में कुछ समय के लिए आएं। तो धरना में भी जाया जाएगा और अदम गोंडवी की ही कोई गजल सुनाई जाएगी, साथी सुमन कुमार सिंह की राय है।

9 जनवरी को पटना में नाट्य टीम ‘हिरावल’ गुरशरण सिंह का नाटक ‘जंगीराम की हवेली’ का मंचन कर रही है, उसे भी देखने का मौका निकालना है। नाट्य संस्था ‘प्रेरणा’ वहाँ सफदर हाशमी की स्मृति में दस दिनों का आयोजन कर रही है, जिसमें वह नाटक भी मंचित होगा।

वाह, नया साल तो काफी सक्रियता से भरा हुआ है! अभी ‘जनपथ’ पत्रिका का नागार्जुन विशेषांक भी इसी बीच तैयार करना है। सो अब डायरी बंद।

सलाम नए साल! बहुत बहुत सलाम!!
पाश की उसी मशहूर कविता के साथ-
मैं सलाम करता हूँ
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूँ
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबतों से पाले गए प्यार जब सफल होंगे
बीते वक्तों का बहा हुआ लहू
जिन्‍दगी की धरती से उठा कर
मस्तकों पर लगाया जायेगा

नया साल मुबारक : अनुराग

हर तरफ लोग अपने-अपने अंदाज में नये साल का जश्‍न मना रहे हैं और शुभकामनाएं दे रहे हैं। मेरी ओर से भी मुबारकबाद-

सचिन का सौवां शतक लगे
मीडिया में क्रिकेट रहे
नया साल मुबारक !

सोना चालीस हजारी बने
सेंसेक्‍स भी नए कीर्तिमान गढे़
नया साल मुबारक !

गाडियाँ सस्‍ती बनें
अन्‍न के दाम बढें
नया साल मुबारक !

देश को रोबोट प्रधानमंत्री मिले
सत्‍ता के लिए नूरा कुश्‍ती चले
नया साल मुबारक !

भारत अमेरिका बने
बात-बात पर गोली चले
नया साल मुबारक !

किसान आत्‍महत्‍या करें
पूंजीपतियों को कर्ज में छूट मिले
नया साल मुबारक !

शेयर, रीयल स्‍टेट का कारोबार बढे़
टोपी पहनने से भ्रष्‍टाचार मिटे
नया साल मुबारक !

पेड न्‍यूज का चलन बढे़
शीला-चमेली का जादू चले
नया साल मुबारक !

आदिवासी विकास से दूर रहें
सन्‍नी लियोन खबर बने
नया साल मुबारक !

नये साल पर प्रकाश मनु के दो गीत

 

नये साल के अवसर पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रकाश मनु के दो गीत-

नये साल क्या-क्या लाओगे?

नये साल क्या-क्या लाओगे?
प्यारा-प्यारा नया कलेंडर
ताजा दिन, ताजी-सी शाम,
चिडिय़ाघर की सैर, और फिर
हल्ला-गुल्ला मार तमाम।
हलुआ, पूड़ी, बरफी, चमचम
से मुँह मीठा करवाओगे?

मीठी-मीठी एक बाँसुरी
नयी कहानी, नयी किताब,
मीठी-मीठी अपने शामें
हँसता जैसे सुर्ख गुलाब।
खुशबू का एक झोंका बनकर
सबके मन को बहलाओगे?

या बुखार पढऩे का सब दिन
कागज-पतर रँगवाओगे,
टीचर जी की डाँट-डपट
मम्मी की झिडक़ी बन जाओगे।
खेलकूद के, शैतानी के
सारे करतब भुलवाओगे?

झगड़ा-टंटा रस्ता चलते
जाने कैसे-कैसे झंझट,
बिना बात की ऐंचातानी
बिना बात की सबसे खटपट।
गया साल सच, बहुत बुरा था,
उसकी चोटें सहलाओगे?

नया कलेंडर

पापा, नए साल पर लाना,
बढिय़ा सा
एक नया कलेंडर!

बैठक में जो टँगा हुआ है
हुआ कलेंडर बहुत पुराना,
उस पर मैंने कभी लिखा था
कालू-भालू वाला गाना।
मम्मी ने भी लिखा उसी पर
शायद राशन का हिसाब है,
इसीलिए बिगड़ा-बिगड़ा सा
जैसे डब्बू की किताब है!

नया कलेंडर लाना जिस पर
फूल बने हो
सुंदर-सुंदर!

फूलों पर उड़ती हो तितली
उसे पकडऩे डब्बू भागा,
आसमान में नया उजाला
सूरज भी हो जागा-जागा।
ऐसा नया कलेंडर जिसमें
गाना गाये मुनमुन दीदी,
सुनकर के पेड़ों पर बैठी,
चिडिय़ा चहके चीं-चीं, चीं-चीं!

नई सुबह आएगी पापा
उस नन्ही
चिडिय़ा-सी फुर-फुर!

चित्रांकन  : प्रगति त्‍यागी

अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र : अनिल सिन्हा

हाल ही में (25 फरवरी को) जाने-माने लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा का नि‍धन हो गया है। श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप में उनका यह यात्रावृतांत दि‍या जा रह है-

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

वह एक ठंडा दिन था। 31 दिसंबर, 2008 की मध्य रात्रि, कुहराविहीन, झक्क तारों से भरे आसमान में अमेरिकी बत्तियों की तेज रोशनी तुरंत ही कहीं गुम हो जा रही थी। अमेरिका में और शायद पश्‍चि‍म में भी दो बड़े त्यौहार समारोह होते हैं- बड़ा दिन (क्रिसमस) और नया साल। सैन फ्रांसिस्‍को में नये साल का भारी उत्सव होता है। पूरी बे एरिया (खाड़ी) के शहर से लोग सैन फ्रांसिस्को के घंटाघर के खुले में इकट्ठे होते हैं। पुराने साल की वि‍दाई देने के लिए और नए साल का स्वागत करने के लिए। प्रशांत महासागर की खाड़ी पर बसा सैन फ्रांसिस्को इस समय जन समुद्र की लहरें एक तरह से संभाल नहीं पा रहा है। फ्रीमांट से हम भी सैन फ्रांसिस्को के इस समुद्र में खो गए थे। मेरे लिए नया अनुभव था जहां उम्र और अवस्था, काले-गोर का भेद नहीं था। कोई एक समारोह-उत्सव था जो लोगों को जोड़े हुए था इस घंटाघर चौक से। शीत की परवाह नहीं, लोग कॉफी पी रहे हैं, आइसक्रीम, बर्गर और पेस्ट्री खा रहे हैं, कोक पी रहे हैं और बारह बजने का इंतजार कर रहे हैं। एक दूसरे पर गिरते पड़ते व घंटाघर के नजदीक पहुंचना चाहते हैं। चारों ओर ऊंची अट्टालिकाएं हैं। विशाल होटल सीरीज बल्ब से जगमगा रहे हैं। दूर-दूर तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट (गो की अमेरिका में सार्वजनिक यातायात अच्छा नहीं है) और निजी वाहन का पता नहीं। आज सब प्रतिबंधित हैं और सुरक्षा के जवान चारों ओर छितराए हैं- पूरी तरह से चौकस। बिल्ली की तरह उनकी नजरें चारों ओर घूम रही हैं पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही हैं। बारह बजा और पटाखों और विभिन्न प्रकार की आतिशबाजियों से सैन फ्रांसिस्को जगमगा उठा। ऐसी ही आतिशबाजियां तमाम लोगों के मन में छूट रही थीं। यहां हम विदेशी थे फिर भी पूरा माहौल अच्छा लग रहा था, खुशियों से भरा हुआ और उन युवाओं का तो पूछना ही क्या जिन्होंने प्यार की दुनिया की पहली यात्रा शुरू की थी। अभी तो कुछ ही कदम चले थे। पूरी यात्रा बाकी थी…

हम फ्रीमांट से सैन फ्रांसिस्को ‘बार्ट’ (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट डिस्ट्रिक्ट- इसे बोलचाल में यहां बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट भी कहते हैं) से आए थे। वापसी भी उसी से थी क्योंकि आज निजी वाहन समारोह स्थल तक पहुंच ही नहीं सकते थे। छोटी दूरी की रेल सेवाओं में ‘बार्ट’ सबसे सुव्यवस्थित सेवा मानी जाती है। (कुछ दूरी तक इसे समुद्र के नीचे से भी गुजरना पड़ता है)। कुछ सेवायें सैन फ्रांसिस्को से सीध हैं, कुछ बीच में तोड़कर यानी सेवा बदल कर फ्रीमांट पहुंचती हैं। सुरक्षा का प्रबंध बार्ट में भी है। जिस तरह भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) होते हैं, उसी तरह ‘बार्ट’ में भी बार्ट पुलिस हैं- अपने ‘काम’ में पूरी तरह चाक चौबंद।

31 दिसंबर 2008 की मध्य रात्रि थी पूरी तरह सर्द और हमारे लिए हाड़ भेदने वाली फिर भी बहुत उत्साह के साथ लोगों ने सन् 2009 का स्वागत किया था। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि रात कितनी सर्द है या समय कितनी तेजी से भाग रहा है पर लोगों को पता था कि तीन बजे भोर में अंतिम गाड़ी जाएगी। फिर ट्रेनें विराम लेंगी और सुबह से ही शुरू हो पाएंगी। इसी अहसास के कारण लोगों के समय बंध गए थे और भीड़ लगातार ‘बार्ट’ स्टेशन की ओर भाग रही थी। अमूमन यहां की बसें और ट्रेनें खाली होती हैं पर उस दि‍न सर्द रात में भी ट्रेनें ठसाठस भरीं थी। हम दो बजे तक ही स्टेशन पहुंच पाए तब पता चला कि सीधी फ्रीमांट जाने वाली अब कोई ट्रेन नहीं हैं। हमें बीच के किसी स्टेशन संभवत ओकलैंड में ट्रेन बदलनी होगी। एशियाई मूल के हर उम्र के लोगों से स्टेशन भरा था। उनमें काले लोगों की संख्या ज्यादा थी। अमेरिकी नागरिकों में काले लोगों की संख्या काफी है, फिर भी वे कानूनी दृष्टि से हर चीज में बराबर हैं। जहां मेरिट का मामला है अगर वे उसमें आ जाते हैं तो किसी गोरे अमेरिकी नागरिक को वहां नहीं डाल दिया जाएगा, पर अंदर कहीं एक जातीय श्रेष्ठता का दर्प गोरे अमेरिकी नागरिकों में मौजूद है। कई जगह इसके उदाहरण भी मिलते हैं। व्यवहार में ऐसी जातीय श्रेष्ठता या काले होने के कारण उसे दोयम दर्जे का मानाना दीखता है।

शायद यह संयोग ही होगा कि हमारे आगे युवाओं का एक जत्था चलता रहा। उनमें पांच लड़के और तीन लड़कियां । सभी 20 से 25 वर्ष के आसपास रहे होंगे- पर्व के उत्साह से भरे हुए- बहस, हंसी ठट्ठा, थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे पर उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे उनके युवा- मस्ती व फाकेमस्ती के दिन थे। वे काम भी करते थे, पढ़ भी रहे थे। अपनी प्रेमिकाओं से शादी भी करना चाहते थे और रि‍सेशन (व्यापक छटनी, मंदी, बेरोजगारी) से डरे हुए थे। दुनिया के पहले देश का युवा नागरिक बेरोजगारी व अनिश्‍चि‍त  भविष्य ये चिंतित था। वे इन्हीं बातों को लेकर आपस में बहस भी कर रहे थे और शायद बुश प्रशासन की आलोचना भी जिसने अमेरिका को गारत में डाल दिया। उनकी बातें शायद कुछ सफेद, गोरे बुजुर्गों को अच्छी नहीं लग रही थीं। वे भी हमारे साथ ही चल रहे थे और भीड़ के दबाव के कारण कभी उन्‍हीं की तरफ हो जाते तो कभी हमारी तरफ। वे उन्हें घूर रहे थे। हमारी ओर भी देख रहे थे पर उन्हें अहसास हो गया कि हम एशियाई विदेशी हैं।

ट्रेन आई। भीड़ जितनी उतरी उससे ज्यादा चढ़ गई। हम सब एक ही डिब्बे में चढ़े पर एक किनारे हम थे और दूसरे किनारे आठ युवाओं की वह जत्था और गोरे अमेरिकी। युवाओं का जत्था पहले की तरह  उन्मुक्त होकर बातें कर रहा था, कभी-कभी उनकी आह्लाद भरी चीख हमारे पास भी पहुंच रही थी जिससे लगता था कि गाड़ी की गति के शोर, भीड़ भरे डिब्बे का शोर चीर कर अगर वह हमारे तक पहुंच रही है तो उस आह्लाद में कितना जोश होगा। नये साल के स्वागत ने शायद उनमें आशाएं भर दी थीँ क्योंकि ओबामा उन्हीं की बदौलत उन्हीं की बिरादरी का देश का सर्वशक्तिशाली नेता बन गया था और बुश प्रशासन के विभिन्‍न कदमों के विरुद्ध निर्णय लेने की सार्वजनिक घोषणाएं कर चुका था। खासतौर से इस खाड़ी क्षेत्र और कैलिफोर्निया से उसे भारी समर्थन मिला था।

ट्रेन की गति काफी तेज थी। इस बीच उन गोरे बुजुर्गों में कोई कहीं बार-बार फोन कर रहा था। उनके चेहरों पर संताप व क्षोभ के भाव रहे होंगे। डिब्बे में तेज रोशनी होते हुए भी जहां हम बैठे थे वहां से उनका चेहरा नहीं दिख रहा था। गाड़ी बीच में ही (शायद टवे, ओकलैंड) रुक गई। उसका अंतिम पड़ाव यहीं था। अब हमें दूसरी गाड़ी में सवार होकर फ्रीमांट पहुचना था। डिब्बे में जो सुखद गर्मी थी वह प्लेटफार्म पर आकर लहूलुहान हो गयी। हमने अपने कोर्ट के कालर खड़े कर लिए। मफलर को इस तरह लपेटा जो कान, गला ढंकते हुए सिर पर पहुंचकर टोपी का भी काम दे दे। गो कि यह मौसम यहां पतझड़ का था पर ठंड मेरे लिए दुख पहुंचाने वाली स्थिति तक जा रही थी- रात्रि के ढाई बज रहे थे। इसी समय प्लेटफार्म पर गोली चली, उसकी बहुत धीमी आवाज के बावजूद वह हमें सुनाई दे गई क्योंकि जितने लोग भी यहां चढऩे-उतरने वाले थे सब चुपचाप अगली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, सर्द रातें वैसे भी काफी सन्नाटा भरी होती हैं। गाड़ी दो मिनट बाद आने वाली थी।

गोली की आवाज से हम चौंके। जिस डिब्बे से हम उतरे थे उसी के दूसरे दरवाजे के सामने गोली चली थी और उन आठों में से एक गठीला नौजवान प्लेटफार्म पर खून के बीच तडफ़ड़ाकर शांत हो चुका था। बार्ट पुलिस के एक अधिकारी ने उसे गोली मार दी थी। अधिकारी गोरा था जोहान्स मेहशर्ल। बार्ट पुलिस ने उन्हें घेर रखा था और बाकी लोगों को वहां से हटा रही थी। लोगों को हटाने के लिए महिला पुलिस को तैनात किया गया था। शायद पुलिस लोगों को लिंग संबंधी कमजोरी को जानती थी। पर प्लेटफार्म पर ही बार्ट पुलिस के विरोध में नारे लगने शुरू हो गए। नारे उस जत्थे के बचे सात साथियों ने शुरू किये जो एकदम से प्लेटफार्म के इस पार से उस पार फैल गए। मीडिया ने तत्काल कवर किया। कुछ ही देर में खबर आग की तरह फैल गई। और प्लेटफार्म के बाहर शहर का जो हिस्सा था वहां से भी नारे की आवाजें आ रही थीं। वह लड़का ओकलैंड का निवासी ऑस्कर ग्रांट था। वह काम भी करता था, पढ़ाई भी करता था। उसकी एक बेटी थी और वे फरवरी, 2009 में किसी तारीख को शादी करने वाले थे। बाइस साल के किसी युवा को तड़प कर शांत होते हुए मैंने पहली बार देखा था। इस घटना ने मुझे सन्न कर दिया था। स्टेशन पर ट्रेन आने की जो सूचना आ रही थी वह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी। सन् 1984 में जब भारत में सिख विरोधी दंगा हुआ था, तब लखनऊ जंक्‍शन के बाहर कुछ सांप्रदायिक उग्रवादी हिंदुओं द्वारा मैंने एकसिख युवा को जलाया जाते हुए देखा था। वहां स्टेशन पर पंजाब मेल घंटों से रुकी थी, वह कब आएगी इसकी कोई सूचना नहीं आ रही थी। सारा देश स्थगित था उस दिन। पंजाब मेल से ही आनंद स्वरूप वर्मा, अजय सिंह तथा पार्टी के विभिन्न साथियों को कलकत्ता सम्मेलन में जाना था। मैं उन्हें विदा करने आया था क्योंकि मेरा जाना संभव नहीं हो पाया था। उस एक घटना ने मुझे कई साल तक परेशान किया। आज भी वह समय-समय पर एक काले निशान की तरह उभरता है और असहज कर जाता है- कम से कम उस दिन तो कोई काम नहीं हो पाता। और इतने वर्षोँ बाद एक काले अमेरिकी नागरिक की गोरे अमेरिकी पुलिस के एक हिस्से द्वारा सरेआम पहली तारीख के नव वर्ष पर्व के दिन हत्या कर दिया जाना…

हम जानते हैं कि अमेरिकी पुलिस लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है। उसके लिए वह किसी हद तक जा सकती है (इसके ताजा उदाहरण हावर्ड के प्रोफेसर के साथ बदसलूकी, पिछले दिनों भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम, शाहरुख खां आदि की घटनाओं को लिया जा सकता है)

दरअसल, अमेरिकी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को लेकर बहुत सारे प्रश्‍न उठते रहे हैं। मसलन इस पुलिस पर किसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण है- वहां के कॉरपोरेट घरानों का, राजसत्ता का ? क्योंकि हावर्ड के प्रोफेसर की तमाम दलीलों के बावजूद उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाना और बाद में पुलिस के उस छोटे से अधिकारी को ओबामा द्वारा आमंत्रित कर बियर पिला कर एक तरफ उसे हीरो बना देना और दूसरी तरफ पुलिस की ज्यादतियों को किसी आवरण में लपेट कर जस्टीफाई करना। संभवत: कछ ऐसा ही रुख होगा जिसके कारण घोर जन प्रतिरोध के बावजूद आस्कर ग्रांट के हत्यारे पुलिस अधिकारी को अब तक कोई सजा नहीं हुई। उसने दूसरे दिन ही यानी पहली जनवरी, 2009 को अपने कार्यालय जाकर बड़े अधिकारियों के सामने त्यागपत्र दे दिया जो स्वीकार भी कर लिया गया और व्यापक जन प्रतिरोध व मीडिया की भूमिका के कारण उसके विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया। बस मामला ठंडे बस्‍ते में पड़ गया है गो कि समय-समय पर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी होते ही रह रहे हैं। अमेरिका में इस मानी में व्यापक लोकतंत्र है कि लोग खुले तौर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्हें तंग नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (जिसके सर्वेसवा हैं चेयरमैन बॉब अवेकन) के कुछ फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन जैसे बे एरिया रिवोल्यूशन क्लब, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स आदि ने इस घटना को लेकर 22 मार्च, 2009 को ओकलैंड में एक बड़ा प्रदर्शन किया। उन्होंने जन अदालतें भी लगाईं और पिछले 15 वर्षों में कानून लागू कराने के नाम पर हजारों काले नागरिकों को वहां की पुलिस द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने की एक लिस्ट भी जारी की और सबके विरुद्ध चल रहे मुकदमें को न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने की मांग की। ऐसे कुछ लोगों के नाम हैं- ऑस्कर ग्रांट, अमाडू डिआलो, ताइशा मिलर, जे रॉल्ड हाल, गैरी किंग, अनीता गे, जुलिओ परेड्स, असा सुलिवान, मार्क गार्सिया, रैफेल ग्रिनेत, ग्लेन विलिस, रिचर्ड डी सैन्टिस आदि थे। ये केवल कैलिफोर्निया खाड़ी क्षेत्र के ही काले अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, बल्कि इनमें न्यायार्क के भी लोग हैं। इन्हें गोलियों से, पीट-पीट कर और आंख-मुंह में मिर्ची का चूरा झोंक कर यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया। यह ठीक उसी तरह का कृत्य था जैसा अमेरिका के ईजाद के बाद आम लोगों को भूखे रखकर, बीमारी की हालत में छोड़कर, सोने की जगह न देकर, कोड़ों से पिटाई कर-यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। लगभग तीन सौ साल बाद आज अमेरिका अपने को हर तरह से दुनिया का ‘नंबर वन’ देश घोषित करता रहाता है। ओबामा ने भी अपने शुरुआती भाषण में यही कहा था कि हम दुनिया के नंबर वन देश हैं और भविष्य में भी बने रहेंगे।

मेरे वहां रहते ही एक दूसरी घटना घटी,  बीस साल का ब्रैंडनली इवांस नवंबर, 2008 में सैन फ्रांसिस्को पढ़ाई और नौकरी के लिए सैन्टियागो से आया था। सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध गोल्डेन गेट ब्रिज के पास उसने शेयर में एक फ्लैट लिया था, पर दिसंबर के अंत में गोल्डेन गेट ब्रिज पार्क में उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस जिस तरह से इस मामले की छानबीन में उदासीन दिखाई दे रही है, उससे वहां के लोगों को अंदाज है कि शायद इसमें पुलिस की भी भूमिका है क्योंकि वह इलाका अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण है और सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस।

अमेरिकी पुलिस कानून लागू कराने के लिए तो किसी हद तक जा सकती है पर उसकी केवल यही भूमिका नहीं है- अपराध रोकना उसकी मुख्य भूमिका है। पर अमेरिका में अपराध बेतहाशा हैं चाहे हत्या हो, अपहरण हो, या अपराध के जितने भी रूप हो सकते हें। जि‍स अपराध को हम अपनी आंखों के सामने देख आए हैं, वह अमेरिकी पुलिस की तस्वीर बहुत साफ करती है।

पूरा प्रकरण देखते हुए लगता है कि अपराध जगत में यहां भी कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूंजीपतियों का हाथ है। एक उदाहरण देकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूंगा क्योंकि मेरे फ्रीमांट में रहते हुए यह मामला उछला था। इलेना मिशेल नाम की एक लड़की थी जो 13 वर्ष की उम्र में ही पूरे बे एरिया (खाड़ी क्षेत्र) में आइस स्केटिंग में नंबर एक पर पहुंच गई थी और 30  जनवरी, 1989 के ओलंपिक गेम्स में भागीदारी की उसकी दावेदारी तय हो गई थी। 30 जनवरी, 1989 में उसका अपहरण कर लिया गया। आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। अमेरिका स्टेट डिपार्टमेंट आफ जस्टिस की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैलि‍फोर्निया राज्‍य से पचास बच्‍चों का अपहरण होता है और उनका मि‍ल पाना असंभव सा ही होता है, बल्‍कि‍ वहां के संघीय आंकड़ों के अनुसार गायब बच्‍चों में से केवल एक प्रति‍शत ही 10 वर्षों की अवधि‍ में वापस आ पाते हैं।

फ्रीमांट लौटने के लि‍ए ट्रेन कुछ देर से मि‍ली। भारी मन से हम सवार हुए। ठंड गायब हो चुकी थी और मन पर तकलीफ का एक कुहासा छा गया था। आज भी वह घटना याद आती है तो प्रशांत महासागर की खाड़ी का सारा सौन्‍दर्य ति‍रोहि‍त हो जाता है और रातभर नींद नहीं आती…।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या, अक्‍टूबर, 2009 से साभार)

रमेश तैलंग के बालगीत

2 जून, 1946 को टीकमगढ़ में जन्‍में चर्चित लेखक रमेश तैलंग की बाल साहि‍त्‍य में अलग पहचान है। वि‍षय,  भाषा और शि‍ल्प की वि‍वि‍धता उनके बाल गीतों की वि‍शि‍ष्‍टता है-

सर्दी की धूप

थोड़ी-सी सर्दी क्‍या पड़ने लगी।
धूप बड़ी छुट्टि‍यॉं करने लगी।
मौसम पर कुहरे का रंग चढ़ गया,
दादी के घुटने का दर्द बढ़ गया,
छाती भी घरर-घरर करने लगी।
अम्‍मॉं के ऊनी कपडे़ रो रहे,
सूरज दादा मुँह ढक के सो रहे,
चाय की खपत घर में बढ़ने लगी।
दॉंत अचानक कँपकँपाने लगे,
बाथरूम में पापा गाने लगे,
हीटर की कि‍स्‍मत बदलने लगी।

गुस्‍सा

सममुच बहुत बुरा है गुस्‍सा।
गुस्‍से में सब उल्‍टा-पुल्‍टा।
गुस्‍से में है तोड़ा-फोड़ी।
गुस्‍से में है नाक-सि‍कोड़ी।
गुस्‍से में है मारा-मारी।
गुस्‍सा है गड़बड़ बीमारी।
जब आए तब चलता कर दो।
हँसकर मुँह में हलुवा भर दो।

धूप

लि‍ए हाथ में फूल छड़ी।
आंगन में धूप खड़ी।
झरने जैसी झरती है।
आंख-मि‍चौली करती है।
पर्वत पर चढ़ जाती है।
सागर पर इठलाती है।
दि‍न भर शोर मचाती है।
शाम ढले सो जाती है।

भोलू

भोलू से पूछा मैंने-
‘स्‍कूल नहीं क्‍यों जाते ?’
भोलू बोला- ‘हम ढाबे पर
करते काम, कमाते।’
भोलू से पूछा मैंने-
‘क्‍या अनपढ़ बने रहोगे ?’
भोलू बोला- ‘अच्‍छा, पढ़ने की
तनख्‍वाह क्‍या दोगे ?’

मुनि‍या तू शैतान बड़ी

मुझे चि‍ढ़ाकर पूछा करते
मुझसे मेरे दादाजी-
‘बोलो, तुमको कौन है प्‍यार
मम्‍मीजी या पापाजी ?’
क्‍या जवाब दूँ सोच-सोचकर
होती मुझको हैरानी,
मम्‍मी की मैं रानी बेटी
पापा की बि‍टि‍या रानी।
मैं कह देती- ‘मम्‍मी प्‍यारी,
प्‍यारे-प्‍यारे पापाजी,
मम्‍मी-पापा से भी प्‍यारे
लेकि‍न मेरे दादाजी।’
दादाजी के होंठों पर तब
आ जाती मुस्‍कान बड़ी,
कान पकड़कर मेरा कहते-
‘मुनि‍या तू शैतान बड़ी।’

ऐसा क्‍यों होता है ?

अपनी बकरी काली
फि‍र भी देती दूध सफेद
नहीं समझ में आया अब तक
क्‍या है इसका भेद ?
पत्‍ती होती हरी, हथेली पर
रचती है लाल,
जाने कैसी करती मेंहदी
जादू-भरा कमाल ?
मुट्ठी में हर चीज पकड़ लो
हवा न पकड़ी जाती,
जाने ऐसा क्‍यों होती है
मैं ये समझ न पाती।
मम्‍मी से पूछो तो कहती-
खा मत यहाँ दि‍माग’
पापा कहते- ‘जा मम्‍मी के
पास चली जा भाग।

छुट्टी हों

छुट्टी हों छ: दि‍न ही
एक दि‍न पढ़ाई।
आए फि‍र बड़ा मजा भाई !
टीचर के आते ही
टन-टन घंटी बजे,
काम करो न करो
अपनी मर्जी चले,
देनी न पड़े रोज-रोज ही सफाई।
आए फि‍र बड़ा मजा भाई !
इम्‍तहान में टूटे
नि‍यम फेल करने का,
भूलों के सौ नबंर
जीरो हो रटने का,
नकल पर इनाम मि‍ले,
अकल पर पि‍टाई।
आए फि‍र बड़ा मजा भाई !

साल पुराने

साल पुराने जा रे जा
कपडे़ नये पहनकर आ।
झगड़ा-कुट्टी, माथा फुट्टी,
नये साल में सबकी छुट्टी,
रोनी-धोनी दूर भगा।
हँसी-हँसी फि‍र वापस ला।
वैर की बातें, झूठ की बातें,
टूट की बातें, फूट की बातें,
अब न हमको याद दि‍ला।
हँसी-खुशी फि‍र मेल मि‍ला।
साल पुराने जा रे जा।
कपडे़ नये पहनकर आ।

हँसा कीजि‍ए

रोज हर बात पर न कुढ़ा कीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।
फालतू की ये मनहूसि‍यत छोड़ि‍ए,
जो रुलाए कि‍सी को वो लत छोड़ि‍ए,
चुटकुले कुछ सुनाया-सुना कीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।
क्‍या पता कल हँसी के भी पैसे लगें,
चि‍ड़चि‍ड़े बच्‍चे बूढ़ों जैसे लगें।
मुस्‍कराहट को झटपट बुला लीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।
काम धंधे लगे ही रहेंगे यहॉं,
लोग हैं ढेर बातें कहेंगे यहाँ,
आप बस अपने मन को मना लीजि‍ए।
खि‍ल उठेगा ये चेहरा, हँसा कीजि‍ए।

टि‍न्‍नीजी !

टि‍न्‍नीजी ! ओ टि‍न्‍नीजी !
ये लो एक चवन्‍नी जी।
बज्‍जी से प्‍यारा-प्‍यारा
लाला छोटा गुब्‍बारा।
ऊपर उसे उड़ाएँगे,
आसमान पहुँचाएँगे।
टि‍न्‍नीजी ! ओ टि‍न्‍नीजी !
ये लो एक चवन्‍नीजी।
बज्‍जी से ताजी-ताजी
लाना पालक की भाजी।
घर पर उसे पकाएँगे,
साथ बैठकर खाएंगे !
टि‍न्‍नीजी ! ओ टि‍न्‍नीजी !
ये लो एक चवन्‍नीजी।
जल्‍दी से बज्‍जी जाना,
एक डुगडुगी ले आना।
डुग-डुग उसे बजाएँगे,
मि‍लकर गाने गाएँ
(मेरे प्रि‍य बालगीत से साभार )
चि‍त्रांकन- भूमि‍का बुडाकोटी, कक्षा- 4

नव वर्ष के संकल्‍प : अनुराग

मैंने नव वर्ष पर कुछ संकल्‍प लि‍ए हैं। मेरा दावा है कि‍ यदि‍ हर भारतीय इन संकल्‍पों को ले और इन पर अमल करे तो देश का वि‍कास होगा। फि‍‍र हर रात दि‍वाली और हर दि‍न होली होगी। हर भारतीय 27 मंजि‍ले घर में रहेगा और अपनी पत्‍नी को जेट वि‍मान खरीद कर दे सकेगा।

पहला संकल्‍प- इस साल कम से दो सौ लाख करोड़ का घोटाला करूंगा। लक्ष्‍मी जी तो आएंगी ही, साथ ही चर्चा में भी बना रहूंगा।

दूसरा संकल्‍प- मुझे जि‍स भी आयोजन की जि‍म्‍मेदारी सौंपी जाएगी, उसके लि‍ए एक का सामान सौ में खरीदूंगा। उसका कोई काम ऐसा नहीं होगा, जि‍समें पैसे नहीं बनाऊं। उन्‍हीं कम्‍पनि‍यों को काम के ठेके दूंगा, जो मेरे परि‍जनों को बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर में रखेंगी।

तीसरा संकल्‍प- अपने और अपने परिचि‍तों के हि‍त में लॉबिंग करूंगा। मंत्रीमंडल में उन्‍हीं मंत्रि‍यों को जगह दि‍लवाने का प्रयास करूंगा, जो मेरे और मेरे अपनों के हि‍त में नि‍र्णय लेंगे।

चौथा संकल्‍प- कि‍सी पर वि‍श्‍वास नहीं करूंगा और जो मुझ पर वि‍श्‍वास करेंगे, उन्‍हें हर हाल में धोखा दूंगा।

पांचवां संकल्‍प- महंगाई आसमान छू ले, परेशान कि‍सान आत्‍महत्‍या कर लें, अपराध कि‍तने भी बढ़ जाए, कुछ नहीं बोलूंगा। और अगर कुछ बोला तो बस मैडम-मैडम बोलूंगा।

छठा संकल्‍प- शासन-प्रशासन की तरह गांधीजी के तीन बंदरों से प्ररेणा लेकर न बुरा देखूंगा, न कहूंगा और न सुनूंगा।

सातवां संकल्‍प- जैसे गणेशजी ने अपने माता-पि‍ता शि‍व-पार्वती की परि‍क्रमा कर दुनि‍या का चक्‍कर लगा लि‍या था, वैसे ही मैं अपने घर-परि‍वार को सारा जहां मानूंगा और उसके हि‍त में हर तरह के काम करूंगा।

आठवां संकल्‍प- खेल से ज्‍याद कैटवॉक और वि‍ज्ञापनों पर ध्‍यान दूंगा। लगातार तीन टैस्‍ट मैचों में जीरो पर आउट होकर वि‍श्‍व रि‍कोर्ड बनाऊंगा।

नौंवा संकल्‍प- मैं प्रयोजि‍त खबरें लि‍खूंगा और फोन के अनुसार ही लेख लि‍खूंगा।

दसवां संकल्‍प- सरकार के दमन, शोषण, अन्‍याय, अत्‍याचार का गुणगान करूंगा। मैं आजाद रहना चाहता हूं।

नया साल मुबारक : भीमसेन त्‍यागी

वरि‍ष्‍ठ कथाकार भीमसेन त्‍यागी का यह व्‍यंग्‍य नूतन सवेरा के जनवरी, 1997 अंक में प्रकाशि‍त हुआ था।  उस समय त्‍यागीजी ने जो शंकाएं प्रकट की थीं, दुर्भाग्‍यवश वे और भी भीषण रूप में सामने है-

नया साल करीब आ रहा है और मेरी डाक में रंग-बिरंगे, खुशबूदार बधाई कार्डों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन कार्डों में फूल हैं, पत्ते हैं, चिडिय़ा हैं, सुख-समृद्घि की शुभकामनाएँ हैं। मैं इन पत्रों को पढ़ता हूँ और दु:खी हो जाता हूँ। आश्‍चर्य है- इस प्रदूषित राजनैतिक माहौल में लोग खुशियों को मन के किस कोने में छिपाकर रखते हैं!
नये साल के शुभ अवसर पर आप मेरी बधाई स्वीकार करें। यह वर्ष निरंतर आपत्तियों और आशंकाओं से भरा रहे। केन्द्र और राज्यों में फिर चुनाव हों। लेकिन सरकार कहीं भी न बन सके। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पदों के लिए बराबर खींचतान चलती रहे। हम लोकतंत्र का असली मजा चखते रहें।
भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमें चलते रहें। जिन नेताओं का नकाब अभी तक नहीं उठा है, उनका भी उठ जाए। सब सुखी हो जाएं। तिहाड़ जेल संसद भवन बन जाए। जय ललिता के घर से एक टन सोना और एक लाख जूते बरामद हों, ताकि देश अपनी समृद्घि पर गर्व कर सके! जो नेता भ्रष्ट सिद्घ हो जाएं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हो और जो अभी तक भ्रष्ट नहीं हुए हों, उन पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चलाए जाएं।
राजनैतिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ सांस्कृतिक भ्रष्टाचार का भी विकास हो। सभी संस्कृतिकर्मी राजनेताओं के पिछलग्गू बन जाएं। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में गोते लगाएं और मानद पदों के ऊँचे सिंहासन प्राप्त करें। जो इनाम पाकर भी सरकार को गाली देने का दु:साहस करें, उन्हें उनकी औकात बता दी जाए।
केन्द्र और राज्यों में कहीं सरकार हो तो उनका संचालन पार्टी प्रमुखों के रिमोट कंट्रोल से हो। राजनैतिक पार्टियों की अपनी-अपनी सेनाएं हों। तमाम गुण्डे उन सेनाओं के नायक हों। शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक न्याय दिलाने का काम उनके जिम्मे हो।
कोई किसी भले आदमी के मकान में लम्बे अर्से से रह रहा हो और सिर्फ किराया देकर मकान में जमें रहना चाहता हो तो नायक धमकी के बल पर मकान खाली करवा कर बेचारे मकान मालिक को सामाजिक न्याय दिलवायें। किरायेदार नायकों को धमकी में न आए तो वे प्रेमपूर्वक हत्या करके उसे तमाम दु:खों से मुक्त कर दें। पत्रकार ऐसे कल्याणकारी कामों का विरोध करें तो उनकी जम कर ठुकायी हो और समाचार पत्रों के खिलाफ धर्मयुद्घ घोषित कर उनके दफ्तरों पर हमले किए जाएं।
नये साल में राजनेताओं और धर्मगुरूओं क संबंध प्रगाढ़ हों। वे मिलजुल कर घोटाला उद्योग का विकास करें। कोई सिरफिरा लक्खूभाई उन्हे मुकदमें में फंसाकर तिहाड़ भिजवा दे तो वे एक दूसरे के आंसू पोंछ कर आध्यात्मिक सुख प्राप्त करें।
देश में भीषण बाढ़ आए और अकाल पड़ें। नेता हेलिकॉप्टरों में बैठ कर त्रस्त इलाकों का दौरा करें और उनकी मदद के लिए मोटी-मोटी रकम मंजूर कराएं !
पुलिस के उच्च अधिकारी सुदंर महिलाओं की लिस्ट बनाएं और निर्भीक होकर एक-एक के साथ छेडख़ानी करें।
अति-अति महत्वपूर्ण दो प्रतिशत लोगों की भाषा हिं‍गलीश को देखकर देश की राष्ट्रभाषा घोषित की जाय। हिन्दी तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं में काम करने और बोलने को अपराध माना जाय!
नये साल में फिल्मी तारों और तारिकाओं के यहां बड़े-बड़े छापे पड़ें, ताकि उनके स्टेटस और काम करने के पारिश्रमिक की दरों में बृद्घि हो।
माइकेल जैक्सन बार-बार हमारे देश में आएं और फूहड़ भांड संस्कृति को स्थापित करें। वह ज्यादा से ज्यादा भारतीय लड़कियों के साथ नाचें, ताकि वे नहाना-धोना बंद कर दें और इस तरह जो पानी बचे, उससे कुछ प्यासों की प्यास बुझायी जा सके!
हमारे तमाम बेहतरीन खिलाड़ी खूबसूरत माडलों और एक्ट्रेसों से शादी कर लें और खेल के मैदान में दूसरों को जीतने का मौका देकर अपनी उदारता का परिचय दें!
देश में अंतर्राष्टरीय सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन हो और फिर मुहल्ले-मुहल्ले में वैसी प्रतियोगिताएं होती रहें! तमाम खूबसूरत लड़कियां कपड़ों में से निकल कर फ्लोर पर आ जाएं और दर्शकों की आंखों की सिकाई करती रहें।
भूमंडलीकरण और नयी आर्थिक नीति का खुल कर विस्तार हो। देश में बहुराष्टरीय कंपनियों की बाढ़ आ जाए। बाजार बिदेशी माल से पटे रहें। विज्ञापन का जादम लोगों में अंतराष्ट्रीय स्तर की विदेशी चीजें इस्तेमाल करने का उन्माद जगाए। देशी कारखाने एक-एक कर बंद होते रहें। मुल्क में बेरोजगारी बढ़े। नौजवानों को भरपूर आराम और मनोरंजन के अवसर मिलें।
देश में विदेशी टी.वी. चैनलों की भरमार हो! वे टी.वी. चैनल देशी भगवान को बेच कर खाते रहें। ज्यादा से ज्यादा सैक्स और अपराध परोसें! बेडरूम सिमटकर टी.वी. के स्क्रीन पर आ जाए। अवैध संबंधों और बलात्कारों में उफान आए। फैशन की मारी अधनंगी समाजसेविकाएं बलात्कार के विरूद्घ प्रदर्शन करती रहें !
गली-गली में बीयर बार खुले। घी-दूध की तमाम नदियां सूख जाएं और उनमें शराब उफन-उफन कर बहे। सुदंर बार-बालाएं अपने ग्राहकों का हर तरह से मनोरंजन करती रहें।
हम गरीबी, बेरोजगारी और भूखमरी का ताज पहन कर शान के साथ इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करें।
नया साल आपके लिए छोटी-छोटी खुशियां और बड़े-बड़े गम लेकर आए।

वीरेंद्र नारायण झा की लघुकथाएं

 

गांव समया, महिनाथपुर(बिहार) में 08 अप्रैल, 1954 को जन्में चर्चित कथाकार-पत्रकार वीरेंद्र नारायण के लेख, कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएं और कविताएं हिंदी तथा मैथिली की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके पहले मैथिली कहानी संग्रह जीबाक बाट का प्रकाशन 2004 में हुआ।
समाजिक जीवन की विद्रुपताओं, राजनीतिक पतन और तेजी से फैल रही अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों को चित्रित करती उनकी लघुकथाएं झकझोर देती हैं –
  

बच्चे की खुशी

शहर के सबसे बड़े सेठ के एक वर्षीय पुत्र का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। शानदार पार्टी रखी गई थी। शहर के तमाम बड़े लोगों को पार्टी में शिरकत करने के लिए निमंत्रण भेजा गया। आखिर वह शाम भी आई, जब सेठ के बच्चे का हाथ पकड़कर केट कटवाया गया तथा मोमबत्तियां बुझाने की रस्म अदा की गई। प्राय: सारे मेहमान पहुंच चुके थे।
ऐन वक्त पर बच्चा रोने लगा। सारे नौकर-चाकर दौड़े, आया दौड़ी। सभी बच्चे को चुप कराने का प्रयास करने लगे। जब उसने रोना बंद नहीं किया तो सेठ तथा सेठानी मेहमानों से क्षमायाचना करते हुए लाडले को चुप कराने में जुट गए। बच्चा था कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। सेठ के डॉक्टर मित्र जो वहां मौजूद था, उसने बच्चे का डॉक्टरी जांच की, लेकिन सब कुछ ठीक-ठाक था। फिर भी बच्चे रोये जा रहा था।
अब मेहमान भी परेशान हो उठे। सभी बारी-बारी से बच्चे को चुप करने का उपाय करने लगे। एक महिला मेहमान ने सोने की साड़ी-पिन(ब्रोच) खोलकर बच्चे की हथेली पर रख दी। नेता-मंत्री मित्रों ने अपनी-अपनी टोपी उसके हवाले कर दी, अमीर मित्रों ने सोने की अंगूठी तथा सोने का फाउंटेन पेन दिखाई। कई घोड़े बने और बच्चे को अपनी पीठ पर लादकर घुमाया। छोटे-छोटे बच्चों ने भालू-बंदर की आवाज निकाली लेकिन सब व्यर्थ। जिद्दी बच्चे ने किसी भी चीज में अपनी रुचि नहीं दिखाई। रोता ही रहा।
अंत में पुलिस के एक बहुत बड़े अफसर तथा सेठ के जिगरी दोस्त ने अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर बच्चे के हाथ में पकड़ा दी। बच्चा पिस्तौल थामते ही न केवल चुप हुआ, बल्कि खुशी के मारे उछलने भी लगा। सभी खुश थे कि बच्चे ने रोना बंद किया। पार्टी में जैसे जान आ गई।

संदेश

एक नोबेल पुरस्कार विजेता बाढ़ पीडि़तों की व्यथा-कथा जानने हेतु मिथिलांचल पहुंचा। व्यथा सुनने के बाद उसने सबसे एक ही प्रश्न पूछा, ”फिलवक्त आप लोग अपने भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं?” सबने एक ही उत्तर दिया, ”हमने सपने देखने छोड़ दिए।” पहले तो वह चकित हुआ, लेकिन जब अपने प्रश्न को उसने अन्य लोगों के समाने रखा तो तब भी उनके उत्तर एक-से थे।
पीडि़तों का साहस, धैर्य तथा सुख-दुख के प्रति उनका समत्व भाव देखकर वह दंग रह गया।
राजधानी वापस आने पर पत्रकारों ने उनसे पूछा, ”मिथिलावासियों के नाम कोई संदेश?”
उसने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया, ”संदेश में क्या दूं? संदेश लेकर तो मैं वापस जा रहा हूं।”
”वह क्या?” पत्रकारों ने एक साथ प्रश्न किया।
”यही कि कम सपने देखने वाले अधिक सुखी रहते हैं।”

शुक्रगुजारी

 पति और पत्नी दोनों कोख में पल रहे बच्चे के लिंग को लेकर काफी चिंतित थे। इस बार वे किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। डॉक्टरी जांच के बाद पाया गया कि कोख में दो जुड़वा बच्चे हैं। एक लड़का और दूसरी लड़की। उन्होंने भगवान को याद किया और आभार प्रकट किया।
उधर, लड़की अपने भाई का तहे दिल से शुक्रिया अदा कर रही थी जिसकी वजह से उसकी जान बच गई।

फिर हम क्या करेंगे

”बापू कल क्या है?” रसिया ने अपने बापू से पूछा।
बापू ने जवाब दिया, ”बेटी, कल नया साल आनेवाला है।”
”नया साल आने से क्या होता है, बापू?”
रामसरूप जो ग्रेजुएट था, रिक्शा चलाकर आपने परिवार का निर्वाह करता था। परिवार में पत्नी तथा सात साल की बेटी रसिया थी। पत्नी भी सरकारी फ्लैटों में कामकाज कर थोड़ा-बहुत उपार्जन कर लिया करती थी।
रामसरूप ने बिटिया को समझाते हुए कहा, ”बेटी, बारह महीने का एक साल होता है और आज रात खत्म हो जाएगा। कल आनेवाले साल का पहला दिन होगा। लोग खुशियां मनाएंगे, मिठाई खाएंगे, नाचेंगे-गाएंगे…।”
”फिर हम क्या करेंगे, बापू?” रसिया की आंखों में चमक थी।
”तुम भी इस्त्री किया हुआ कपड़ा पहनकर अम्मा के साथ मेमसाहब के यहां चली जाना। वहीं नया साल मना लेना। ढेर सारी मिठाई खाना, खेलना-कूदना…।”
”लेकिन बापू, मैं उनके यहां कैसे जाऊंगी! अम्मा बता रही थी कि साहब और बच्चों के साथ मेमसाहब मोटरगाड़ी में कही घूमने जाएंगी। रात को देर से घर वापस आएंगी। फिर हम नया साल कैसे मनाएंगे?”
रसिया के चेहरे पर उदासी छायी हुई थी। रामसरूप ने ढाढ़स देते हुए कहा, ”कल ने सही, एक दिन बाद तो मिठाई मिलेगी। मेमसाहब के यहां तो रोज नया-नया पकवान बनता है…। अब खुश?”
रसिया चहक उठी, उल्लास से बोली, ”क्या मेमसाहब के यहां रोज नया साल आता है बापू।”

सेज

एक किसान ने सपने में देखा कि उसके खेत में धान, गेहूं, मक्का, बाजरा वगैरहा की जगह छोटी-छोटी मोटरों के पौधे उग आएं हैं। पहले तो चकित हुआ, लेकिन चारों ओर रंग-बिरंगी चमचमाती मोटर कार की फसलें देखकर खुशी से खिल उठा। उसने अपने पड़ोसी के खेतों पर नजर दौड़ाई तो सब ओर मोटर की ही फसलें लहलहा रही थीं। फिर सबने एक-दूसरे को यह खुशखबरी सुनाई और समय से मोटरें काटरक घर लाने लगे। घर के बच्चे-बढ़े-औरतें सभी खुश थे कि उनका खेत अब अन्न के बदले मोटरें उगलने लगा है।
मोटरें बेचकर वे आराम से गुजर-बसर करने लगे। खाने के लिए घर में अन्न-पानी था ही, कमी होने पर दूर के हाट-बाजार से मोटरों में भरकर ले आते।
कुछ महीने बड़े ही आराम से कटे। धीरे-धीरे सब तरफ आनाज की कमी होती गई, क्योंकि किसानों ने अब मोटरों की खेती शुरू कर दी थी। हालात कुछ ऐसे बदले कि अन्न के लाले पडऩे लगे किसानों के घर। फिर उन्होंने खेती में आग लगा दी ताकि मोटरों की फसल नष्टï हो जाए और वे फिर से खेतीबारी शुरू कर सकें। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। मोटरें जल तो गईं, लेकिन जमीन खेती के लायक नहीं रह पाई। लाख कोशिशों के बावजूद वे खेतों में अन्न नहीं उगा सके।
अब वे अपने खेतों की मिट्टी के भाव बेचकर कहीं और पलायान करने की सोच रहे थे।
अचानक किसान की नींद खुली और वह सीधा खेत की ओर दौड़ा, यह देखने केे लिए नहीं कि वहां अन्न की फसल लहलहा रही है या मोटरों की, बल्कि यह देखने के लिए कि कहीं उसकी जमीन मिट्टी के भाव तो नहीं बिक गई?

(लघुकथा संग्रह भगवान भरोसे से साभार)