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नागार्जुन की काव्य-चेतना ही जनचेतना है : आलोकधन्वा

बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने पिछले वर्ष उनके जन्‍मशताब्‍दी समारोह की शुरुआत की थी। इस वर्ष 25 जून को आरा में आयोजित समारोह के साथ यह संपन्‍न हो गया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-

आरा : नागार्जुन इसलिए बडे़ कवि हैं कि वे वर्ग-संघर्ष को जानते हैं। वे सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक कवि हैं। आज उन पर जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें उन्हें मार्क्सवाद से प्रायः काटकर देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि  नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते। नागार्जुन की कविता बुर्जुआ से सबसे ज्यादा जिरह करती है। उनकी कविताएं आधुनिक भारतीय समाज के सारे अंतर्विरोधों की शिनाख्त करती हैं। नागार्जुन की काव्य धारा हिंदी कविता की मुख्य-धारा है। उनकी जो काव्य-चेतना है, वही जनचेतना है। यह बात नक्सलबाड़ी विद्रोह की धारा के मशहूर कवि आलोकधन्वा  ने नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून, 2011 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का उद्घाटन करते हुए कही।

उन्‍होंने खुद को भोजपुर में चल रहे सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य के लिए जितनी उसकी आत्मा अनिवार्य है, राजनीति भी उसके लिए उतनी ही अनिवार्य है। बेशक हमारा आज का दौर बहुत मुश्किलों से भरा है, लेकिन इसी दौर में नागार्जुन के प्रति पूरे देश में जैसी उत्कंठा और सम्मान देखने को मिला है, वह उम्मीद जगाता है। संभव है हम चुनाव में हार गए हैं, लेकिन जो जीते हैं, अभी भी विरोध के मत का प्रतिशत उनसे अधिक है। वैसे भी दुनिया में तानाशाह बहुमत के रास्ते ही आते रहे हैं। लेकिन जो शहीदों के रास्ते पर चलते हैं, वे किसी तानाशाही से नहीं डरते और न ही तात्कालिक पराजयों से विचलित होते हैं। भोजपुर में जो कामरेड शहीद हुए उन्होंने कोई मुआवजा नहीं मांगा। उन्होंने तो एक रास्ता चुना, कि जो समाज लूट पर कायम है उसे बदलना है, और उसमें अपना जीवन लगा दिया।

पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने उनके जन्मशताब्दी समारोहों की शुरुआत की थी और यह निर्णय किया था कि इस सिलसिले का समापन भोजपुर में किया जाएगा। उसी फैसले के अनुरूप नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का आयोजन किया गया।  जनता, जनांदोलन, राजनीति, इंकलाब और कविता के साथ गहन रिश्ते की जो नागार्जुन की परंपरा है, उसी के अनुरूप यह समारोह आयोजित हुआ। लगभग एक सप्ताह तक जनकवि नागार्जुन की कविताएं और उनका राजनीतिक-सामाजिक स्वप्न लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। अखबारों की भी भूमिका साकारात्मक रही। समारोह की तैयारी के दौरान आरा शहर और गड़हनी व पवना नामक ग्रामीण बाजारों में चार नुक्कड़ कविता पाठ आयोजित किए गए, जिनमें नागार्जुन के महत्व और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताया गया तथा उनकी कविताएं आम लोगों को सुनाई गईं। अपने जीवन के संकटों और शासकवर्गीय राजनीति व संस्कृति के जरिए बने विभ्रमों से घिरे आम मेहनतकश जन इस तरह अपने संघर्षों और अपने जीवन की बेहतरी के पक्ष में आजीवन सक्रिय रहने वाले कवि की कविताओं से मिले। यह महसूस हुआ कि जो जनता के हित में रचा गया साहित्य है उसे जनता तक ले जाने का काम सांस्कृतिक संगठनों को प्रमुखता से करना चाहिए। यह एक तरह से जनता को उसी की मूल्यवान थाती उसे सौंपने की तरह था।

नागार्जुन का भोजपुर से पुराना जुड़ाव था। साठ के दशक में वह पूर्वांचल नाम की संस्था के अध्यक्ष बनाए गए थे। जनांदोलनों में शामिल होने के कारण उन्हें बक्सर जेल में भी रखा गया था। नागार्जुन ने तेलंगाना से लेकर जे.पी. के संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक पर लिखा, लेकिन भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन में तो जैसे उन्हें अपना जीवन-स्वप्न साकार होता दिखता था। ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ जैसी कविताएं इसकी बानगी हैं।

बारिश दस्तक दे चुकी थी, उससे समारोह की तैयारी थोड़ी प्रभावित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद 25 जून को नागरी प्रचारिणी सभागार में लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी के बीच समारोह की शुरुआत हुई। सभागार के बाहर और अंदर की दीवारों पर लगाए गए  नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवियों की कविताओं पर आधारित राधिका  और अर्जुन द्वारा निर्मित आदमकद कविता-पोस्टर और बाबा नागार्जुन की कविताओं व चित्रों वाले बैनर समारोह स्थल को भव्य बना रहे थे। कैंपस और सभागार में बाबा की दो बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। बाबा के चित्रों वाली सैकड़ों झंडियां हवा में लहरा रही थीं।

विचार-विमर्श के सत्र में ‘प्रगतिशील आंदोलन और नागार्जुन की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिन्हें लगता है कि प्रगतिशीलता कहीं बाहर से आई उन्हें राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोशांबी, हजारी प्रसाद द्विवेदी  और नागार्जुन की परंपरा को समझना होगा। सारी परंपराओं को आत्मसात करके और उसका निचोड़ निकालकर प्रगतिशील आंदोलन को विकसित किया गया। हिंदी कविता में तो बाबा प्रगतिशीलता की नींव रखने वालों में से हैं। नागार्जुन की काव्य यात्रा के विभिन्न पड़ावों का जिक्र करते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि वे प्रगतिशीलता के आंदोलन के आत्मसंघर्ष के भी नुमाइंदे हैं। ऊंचे  से ऊंचे दर्शन को भी उन्होंने संशय से देखा। बुद्ध और गांधी पर भी सवाल किए। योगी अरविंद पर भी कटुक्ति की। वे किसी से नहीं डरते थे, इसलिए कि वे अपनी परंपरा में उतने ही गहरे धंसे हुए थे। बाबा शुरू से ही सत्ता के चरित्र को पहचानने वाले कवि रहे। नामवर सिंह 1962 के बाद के दौर को मोहभंग का दौर मानते हैं, लेकिन नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदार जैसे कवियों में 1947 की आजादी के प्रति कोई मोह नहीं था, कि मोहभंग होता। स्वाधीनता आंदोलन के कांग्रेसी नेतृत्व में महाजनों-जमींदारों के वर्चस्व को लेकर इन सबको आजादी के प्रति गहरा संशय था। नागार्जुन ने तो कांग्रेसी हुकूमत की लगातार आलोचना की। दरअसल प्रगतिशीलता की प्रामाणिक दृष्टि हमें इन्हीं कवियों से मिलती है। तेलंगाना के बाद साठ के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए किसानों की खुदमुख्तारी का जो संघर्ष नए सिरे से सामने आया, उसने प्रगतिशीलता और वर्ग संघर्ष को नई जमीन मुहैया की और सत्तर के दशक में जनांदोलनों ने नागार्जुन सरीखे कवियों को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में जितने भी जनांदोलन हुए, नागार्जुन प्रायः उनके साथ रहे और उनकी कमजोरियों और गड़बडि़यों की आलोचना भी की। लेकिन नक्सलबाड़ी के स्वागत के बाद पलटकर कभी उसकी आलोचना नहीं की। जबकि संपूर्ण क्रांति के भ्रांति में बदल जाने की विडंबना पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा। आज जिस तरीके से पूरी की पूरी राजनीति को जनता से काटकर रख दिया गया है और जनता को आंदोलन की शक्ति न बनने देने और बगैर संघर्ष के सत्ता में भागीदारी की राजनीति चल रही है, तब जनता की सत्ता  कायम करने के लिहाज से नागार्जुन पिछले किसी दौर से अधिक प्रांसगिक हो उठे हैं।

आइसा नेता रामायण राम ने नागार्जुन की कविता ‘हरिजन-गाथा’ को एक सचेत वर्ग-दृष्टि का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें जनसंहार को लेकर कोई भावुक अपील नहीं है, बल्कि एक भविष्य की राजनैतिक शक्ति के उभार की ओर संकेत है। उत्तर भारत में दलित आंदोलन जिस पतन के रास्ते पर आज चला गया है, उससे अलग दिशा है इस कविता में। एक सचेत राजनीतिक वर्ग दृष्टि के मामले में इससे साहित्य और राजनीति दोनों को सही दिशा मिलती है।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने ‘भोजपुर’ और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न विषय पर बोलते हुए कहा कि नागार्जुन अपने भीतर अपने समय के तूफान को बांधे हुए थे। मार्क्सवाद में उनकी गहन आस्था थी। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था कि बाजारू बीजों की निर्मम छंटाई करूंगा। जाहिर है उनके लिए कविता एक खेती थी, खेती- समाजवाद के सपनों की। भोजपुर उन्हें उन्हीं सपनों के लिए होने वाले जनसंघर्षों के कारण बेहद अपना लगता था और इसी कारण भगतसिंह उन्हें प्यारे थे। वह भारत में इंकलाब चाहते थे। उसे पूरा करना हम सबका कार्यभार है।

विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता डा. गदाधर सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार डा. नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक डा. रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष आलोचक रामनिहाल गुंजन ने की। संचालन सुधीर सुमन ने किया। डा.रवींद्रनाथ राय ने समारोह की शुरुआत में स्वागत वक्तव्य दिया और जनता के राजनीतिक कवि नागार्जुन के जन्मशताब्दी पर भोजपुर में समारोह होने के महत्व के बारे में चर्चा की। डा. गदाधर  सिंह ने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनके कविता पाठ में छात्रों की भारी उपस्थिति रहती थी। वे एक स्वतंत्रचेत्ता प्रगतिशील कवि थे।  उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, मजाज और गोपाल सिंह गोपाली पर केंद्रित समकालीन चुनौती के विशेषांक का लोकार्पण भी किया। डा. नीरज सिंह ने कहा कि बाबा नागार्जुन सीधे-सीधे किसान आंदोलन में शामिल हुए और किसान-मजदूरों की मानसिकता को जिया। वे चाहते थे कि परिवर्तन जब भी हो, मजदूर-किसानों के लिए हो। बाबा ने अपनी कविताओं के जरिए जनांदोलनों को शक्ति दी। रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा हमारे दौर के जनपक्षधर साहित्यकारों और जनता की राजनीति करने वालों के लिए बड़े प्रेरणास्रोत हैं। सही मायने में उन्होंने ही कविता को जनता के संघर्षों का औजार बनाया। कथाकार सुरेश कांटक ने एक संस्मरण सुनाया कि किस तरह बाबा को जब खून की जरूरत पड़ी, तो संयोगवश जिस नौजवान का खून उनसे मिला, वह भोजपुर का निवासी था। इस नाते भी बाबा कहते थे कि उनकी रगों में भोजपुर का खून दौड़ता है।

दूसरे सत्र की शुरुआत युवानीति द्वारा बाबा की चर्चित कविता ‘भोजपुर’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। उसके बाद कवि जितेंद्र कुमार की अध्यक्षता और कवि सुमन कुमार सिंह के संचालन में कविता पाठ हुआ, जिसमें कृष्ण कुमार निर्मोही, श्रीराम तिवारी, रामनिहाल गुंजन, जगतनंदन सहाय, दीपक सिन्हा, कुमार वीरेंद्र, संतोष श्रेयांश, ओमप्रकाश मिश्र, सरदार जंग बहादुर, सुनील चैध्री, रहमत अली रहमत आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। समारोह स्थल पर एक बुक स्टाल भी लगाया गया था। समारोह में शामिल होने के लिए उत्तर बिहार के जसम के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी सुरेंद्र प्रसाद सुमन के नेतृत्व में भोजपुर पहुंचे थे। 24 जून को इन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बाबा नागार्जुन के ननिहाल सतलखा चंद्रसेनपुर से की थी, जहां एक सभा में उनके ननिहाल के परिजनों ने उनकी मूर्ति स्थापना, पुस्तकालय और उनके नाम पर एक शोध संस्थान बनाने के लिए एक कट्ठा जमीन देने की घोषणा की। उसके बाद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी दरभंगा और समस्तीपुर में सभा करते हुए पटना पहुचे  और फिर 25 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में शामिल हुए। समारोह में जसम राष्ट्रीय पार्षद संतोष सहर, जसम बिहार के सचिव संतोष झा, कवि राजेश कमल, संस्कृतिकर्मी समता राय, प्रो. पशुपतिनाथ सिंह आदि भी मौजूद थे।

समारोह में बाबा नागार्जुन की कविता पाठ का वीडियो प्रदर्शन और कवि मदन कश्यप का काव्य-पाठ भी तय था। लेकिन ट्रेन में विलंब के कारण ये कार्यक्रम अगले दिन स्थानीय बाल हिंदी पुस्तकालय में आयोजित किए गए। कवि-फिल्मकार कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई नागार्जुन के काव्य पाठ के वीडियो का संपादन रोहित कौशिक ने किया है और इसके लिए शोध कवि श्याम सुशील ने किया है। करीब 13 मिनट का यह वीडियो नागार्जुन के सरोकार और कविता व भाषा के प्रति उनके विचारों का बखूबी पता देता है। बाबा इसमें मैथिली और बांग्ला में भी अपनी कविताएं सुनाते हैं। एक जगह इसमें नागार्जुन कहते हैं कि कविता में अगर कवि को गुस्सा नहीं आता, अगर वह निडर नहीं है, डरपोक है, तो बेकार है। इस वीडियो में बाबा नागार्जुन को कविता कविता पाठ करते देखना और उनके विचारों को सुनना नई पीढ़ी के लिए एक रोमांचक और उत्प्रेरक अनुभव था।
मदन कश्यप के एकल कविता पाठ की अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया। उन्होंने गनीमत, चाहतें, थोड़ा-सा फाव, सपनों का अंत और चिडि़यों का क्या नामक अपनी कविताओं का पाठ किया। उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां गौरतलब हैं-
सपने के किसी अंत का मतलब
स्वप्न देखने की प्रक्रिया का अंत नहीं है।
000
गनीमत है
कि पृथ्वी पर अब भी हवा है
और हवा मुफ्त है…
गनीमत है
कि कई पार्कों में आप मुफ्त जा सकते हैं
बिना कुछ दिए समुद्र को छू सकते हैं
सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य देख सकते हैं
गनीमत है
कि गनीमत है।

इस तरह नागार्जुन जन्मशताब्दी  समारोह तीन दिनों तक चला, जो बाबा के जन्मस्थान सतलखा चंद्रसेनपुर से शुरू होकर भोजपुर में उनके महत्व और प्रासंगिकता पर विचार विमर्श से गुजरते हुए उनपर केंद्रित वीडियो के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ। यद्यपि भोजपुर के सांस्कृतिक जगत के लिए तो पूरा हफ्ता ही नागार्जुनमय रहा।

नागार्जुन की प्रतिबद्धता : राधेश्याम तिवारी

जनकवि‍ नागार्जुन की जनपक्षरता पर वरि‍ष्ठ कवि‍ राधेश्याम ति‍वारी का आलेख-

अपने यहां एक परम्परा है गणेश वंदना की। किसी भी काम को शुरू करने से पहले लोग गणेश की वंदना करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि विरोधी भी शांत रहें, लेकिन नागार्जुन ने एक साथ इतने विरोधी पैदा कर दिए हैं कि उनपर चर्चा करते हुए यह संभव ही नहीं है कि आप सबको खुश रख सकें। नागार्जुन हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जो परम्परा से निकलकर प्रगतिशीलता की ओर प्रवृत्त हुए। बाबा से ऐसा इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि वे संस्कृत के अलावा पाली, बांग्ला आदि भाषाओं से तो परिचित थे ही, मार्क्सवादी विचारधारा के भी करीब आए। नागार्जुन ने भी वंदना की है, लेकिन वह वंदना बुद्ध, मार्क्स्, फ्रायड के अलावा पिशाच और वैताल की। वे गणेश के माध्यम से अपने विरोधियों को खुश नहीं करना चाहते, इसलिए वे पिशाच को पिशाच ही कहते हैं, उसे खुश करने के लिए किसी अलंकार से अलंकृत नहीं करते-
नमस्ते स्तु पिशाचाय
वैतालाय नमो नमः।
नमो, बुद्धाय मार्क्साय
फ्रायडाय च ते नमः।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए आप आसानी से समझ सकते हैं कि उनकी दृष्‍टि‍ में  पिशाच  और वैताल कौन हैं। एक बार जब मैंने बाबा से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘पिशाच कई तरह के होते हैं। जिसके पास जैसे-तैसे बहुत धन इकट्ठा हो गया हो वह धन पिशाच  है, जो अति विनम्र होकर भी पीछे से वार करता हो वह विनम्र पिशाच है और जो ऐसी कविताएं लिखता हो जिसे पाठक तो क्या, स्वयं कवि भी न समझता हो, उसे कवि पिशाच कहेंगे।’’ गनीमत है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि जो आलोचक ऐसी कविताओं को महान बनाने पर उतारू हैं उन्हें आलोचक पिशाच कहेंगे।
नागार्जुन मुलतः राजनीतिक चेतना के कवि हैं। जनपक्षधरता ही उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। जनता से उनका जुड़ा़व विश्वव्यापी है। उनकी यह विश्‍वदृष्टि ही है कि वे दुनिया के तमाम दबे-कुचले लोगों की समस्याओं पर नजरें गडा़ए रखते हैं।
कोरिया समस्या पर उनकी एक कविता है-
‘‘गली-गली में आग लगी है घर-घर बना मसान
लील रहा कोरिया मुलुक को अमरीकी शैतान
जूझ रहे किस बहादुरी से धरती के वे लाल
मुझे रात भर नींद न आती सुन सिऊल का हाल।’’
यहां याद कीजिए गालिब का वह शेर-
‘‘मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती।’’
बाबा ने गालिब की तरह नींद न आने के कारणों को रहस्य नहीं बनाया, बल्कि साफ-साफ बता दिया कि उन्हें रातभर नींद  क्यों नहीं आती। हालांकि उन्हें सांस की भी बीमारी थी। मैंने भी उन्हें रात भर जागते हुए देखा है। जब व्यक्ति को रात में नींद नहीं आये तो वह कुछ सोचता रहता है। यह हो ही नहीं सकता कि रात में जगा व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना सोचे रह जाए। एक बीमार व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के बारे में ही सोचेगा, लेकिन नागार्जुन उस स्थिति में भी अपने सांसों के बारे में न सोचकर उस सिऊल के बारे में सोचते हैं जहां की जनता अमेरिकी आतंकवाद से लोहा ले रही है। यह है बाबा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।
वे मनुष्य को सर्वोपरि मानते हैं और राजनीतिक दलों के विचारों को भी उसी परिप्रेक्ष में देखते हैं। एक घोषित कम्युनिस्ट होकर भी जब नागार्जुन यह लिखते हैं-
‘‘आ गए अब दिन ऐश के
मार्क्स, तेरी दाढ़ी में जूं ने दिए होंगे चीनी अंडे
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बावन अंडे
लाल पान के गुलाम ढोएंगे हंडे
सर्वहारा क्रान्ति की गैस के !
आ गए अब तो दिन ऐश के!’’ तो इसका यही अर्थ है कि वे सत्ता के चरित्र को अलग कर नहीं देखते। वे किसी भी तरह के शोषण के विरूद्ध थे। वह चाहे धर्म के नाम पर हो या विचारधारा के नाम पर। इसमें एक बात मैं और जोड़ना चाहूंगा कि मार्क्सवाद का जितना अहित गैर मार्क्संवादियों ने किया है उससे कहीं अधिक उन लोगों ने किया है जो मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए ही बाबा ने लिखा है-
‘‘दिल में चाहे जो हो/गले में अगर मार्क्‍स है अटका!/बताओ मैं कौन हूं भला?’’ शायद ऐसे ही कम्युनिस्टों के लिए मार्क्‍स ने कहा था- ‘‘मुझे मार्क्सवादियों से बचाओ।’’
नागार्जुन जनता के पक्ष में किसी भी तरह का जोखिम उठाने वाले रचनाकार हैं। वे लक्षणा और व्यंजना में बात करते-करते सीधे अभिधा में भी उतर आते हैं। वे यह मानते हैं कि यह व्यवस्था पूरी तरह भोथरा गई है। इसकी चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि यह लक्षणा और व्यंजना की भाषा नहीं समझती। इसीलिए वे सीधे नाम लेकर कविताएं लिखते हैं। अगर इमरजेंसी के खिलाफ लिख रहे हैं तो सीधे-सीधे नाम लेकर-
‘‘इंदिराजी-इंदिराजी क्या हुआ आपको
सत्ता के मद में भूल गई बाप को।’’
मैं ऐसे कई लेखकों को जानता हूं जो इमरजेंसी में लक्षणा और व्यंजना के इतने कायल हो गए थे कि सार्वजनिक स्थलों की बातें तो दूर, बंद कमरे में भी लक्षणा और व्यंजना में ही बातें करते थे। वही लेखक इमरजेंसी के बाद अपनी रचनाओं के भीतर छूपे विद्रोह की आग को इस तरह उजागर करने लगे मानों दुनिया के सारे क्रांतिकारी उनके पट शिष्य हों। ऐसे ही क्रांतिकारियों के लिए बाबा ने लिखा-
क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
भ्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
कूट-कपट की भीतर घाती
शांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
अर्धशती अभियान मुबारक
अंतरिक्ष अभियान मुबारक
एक आंख का भौतिक बाद
द्वन्द्वात्मक विज्ञान मुबारक।’’
बाबा ऐसे कम्युनिस्ट नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। उनके लिए जनता पहले थी। जो जनता के साथ था, बाबा उसके साथ थे। आप याद करें इमरजेंसी का वह समय जब सीपीआई इमरजेंसी के समर्थन में थी और बाबा भी सीपीआई में ही थे, लेकिन वे जेपी के पक्ष में बिहार की सड़कों पर घूम-घूम कर कविताएं सुना रहे थे-
‘‘एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या ?
बर्बरता के मांग चढे़गा योगी अब क्या ?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की।
जयप्रकाश पर चली लाठियां लोकतंत्र की !
देश में जब जनता दल की सरकार बनी तो बाबा की भी बांछें खिल गईं। उन्होंने उसी उत्साह में यह कविता लिखी-
‘‘शासन बदले, झंडा बदला तीस साल के बाद
नेहरू, शास्त्री और इंदिरा हमें रहेंगे याद
कोटि-कोटि मत पत्र बन गए जादूवाले वाण
मूर्छित भारत मां के तन में वापस आए प्राण
नसबंदी के जोर-जुलुम से मचा बहुत कुहराम
किया सभी ने शासन को अंतिम बार सलाम।’’
लेकिन सत्ता मिलने के बाद जिस तरह जेपी के चेलों का पतन देश ने देखा उससे जनता बुरी तरह मर्माहत हुई। जिस उम्मीद के साथ जनता दल की सरकार बनी वह उम्मीद कुछ ही समय में मटियामेट हो गई। सत्ता के लिए मंडल और कमंडल का जो खेल हुआ सो तो हुआ ही, ऐसे-ऐसे घोटाले भी सामने आये जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। सत्ता पर नए-नए काबिज इन समाजवादियों के पेट इतने बड़े हो गए कि उन्होंने पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा। परिवारवाद को गालियां देने वाले ये नेता खुद परिवारवाद के इतने कायल हो गए कि अपनी निरक्षर पत्नी तक को मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठाने में तनिक संकोच नहीं किया। बाबा ने जब यह सब देखा तो उन्होंने लिखा-
‘‘पूर्ण हुए तो सभी मनोरथ
बोलो जेपी, बोलो जेपी
सघे हुए चौकस कानों में
आज ढूंसली कैसे ठेपी
जोर जुल्म की मारी जनता
सुन लो कैसी चीख रही है
तुमको क्या अब सारी दुनिया
ठीक-ठाक ही दीख रही है।’’
यानी जो दल या व्यक्ति जनता से दूर होता गया बाबा भी उससे दूर होते गए। उनके लिए प्रथमतः और अन्ततः जनता ही थी। उन्हें जनता में विश्वास था। वे यह मानते थे कि जनशक्ति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। अभी हाल में मिश्र की घटनाओं को देखा होगा कि किस तरह वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को जनाक्रोश के कारण पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और उसके बेटे गमाल मुबारक ने आत्महत्या तक की कोशिश की। इसी तरह लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को भी जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। नागार्जुन की कविताएं प्रतिपक्ष की कविताएं हैं। ये कविताएं तानाशाही व्यवस्था के विरूद्ध बार-बार हस्तक्षेप करती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कहने को हम आजाद देश के नागरिक हैं और देश की सीमाओं में कहीं भी रहने को स्वतंत्रा हैं, लेकिन क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर महाराष्ट्र, असम और कश्मीर में जो रह-रह कर तांडव होता रहा है उसका कोई निदान आजतक नहीं निकल पाया। बाबा की कविताओं को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि उन्होंने एक खोजी पत्रकार की तरह खबरे खोज-खोजकर अपनी कविताओं में दर्ज की हैं।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि सूचना के लिए अखबार और दूसरे संचार माध्यमों पर निर्भर रहना सबसे बड़ा भ्रम है। श्री उदय सहाय ने अपने एक लेख में लिखा है कि अपराध की जितनी घटनाएं घटती हैं उनमें मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत घटनाओं को ही मीडिया उजागर कर पाता है। नागार्जुन की कविताओं में ऐसी खबरें भी दर्ज हैं जो मीडिया की नजरों से ओझल हैं या उन्हें ओझल कर दिया गया है। आजादी के बाद हमारे नेताओं ने देश में जिस चरित्र का निर्माण किया ये सारी विद्रूपताएं उसी की देन है। यह क्या कम चिन्ता का विषय है कि आज देश में एक भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ सके। हिन्दूवाद के झंडावरदार ठाकरे क्या कर रहे हैं। उनको सिर्फ महाराष्ट्र और वहां के लोग ही अपने लग रहे हैं। बाबा की नजर वहां भी है। वे लिखते हैं-
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की
गला रहा है दाल ठाकरे
या
कैसा शिव?
कैसी शिव सेना?
कैसे शिव के बैल
चौपाटी के सागर तटपर
नाच रहा है भस्मासुर बिगडै़ल।
यही हाल धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर का भी है। अब वह स्वर्ग न होकर स्वर्गवासियों की धरती बनकर रह गया है। वहां के आका ही जब विखंडनवादी बयान देते नहीं थकते तब दूसरों को क्या कहा जाए। इन लोगों पर केन्द्र का भी कोई अंकुश नहीं है। सबसे चिन्ताजनक स्थिति तो इस देश के बौद्धिक वर्ग की है। ये अपने बौद्धिकता के नशे में वही कर रहे हैं जो दुश्मन किया करते हैं। अरुंधति‍ राय का मामला आपके सामने है। अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद लोकतंत्र एक मजाक बन कर गया है। नेताओं ने लोकतंत्र को भी अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बाबा अपनी एक कविता में लिखते हैं-
‘‘तानाशाही तामझाम है/सोसलिज्म का नारा/पार्लमेंट पर चमक रहा है मारुति का ध्रुव तारा/तेरी पुलिस मिलिटरी/तेरी गोली गोले/ हिंसा की बहती गंगा में/ मां तू आंचल धो ले!
तरुणों की सौ-सौ कलेजियां/तुम पर करूं निछावर/ बना रहे दरबार रात-दिन/ मंत्र पढ़ूं मैं शाबर।’’
यहां यह ध्यान देने की बात है कि यह शाबर मंत्र क्या है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस मंत्र का उल्लेख किया है। बाबा ने इस मंत्र को नये संदर्भ में देखा है। इसी अर्थ में उनकी ‘मंत्र’ कविता भी है। शाबर मंत्र शिव का मंत्र है, जिसका कोई अर्थ नहीं होता। बिना अर्थ के ही जाप करते जाइए। वैसे तो निकालने को कोई कहीं से कुछ भी अर्थ निकाल सकता है। जिसे आप कविता भी नहीं मानते उसमें से भी बड़े-बड़े आलोचक ऐसे-ऐसे अर्थ निकाल लेते हैं कि आप चकित रह जाएंगे। आजकल जो कुछ भी हो रहा है वह सब शाबर मंत्र की तरह ही है। अधिकांश विश्वभर में पढ़ी जाने वाली हिन्दी की कविताएं भी शाबर मंत्र का ही सहोदर हैं। ऐसे में नागार्जुन की कविताएं शुद्ध देसी लगती हैं। सही अर्थ में नागार्जुन भारतीय कवि हैं, जिनकी कविताओं का सरोकार जनता से है। चूंकि जन शब्द जनतंत्र में ही अर्थवान होता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद जनता की समस्याओं पर सबसे अधिक लिखने वाले नागार्जुन हैं। इसीलिए सही अर्थों वे जनकवि हैं। जनतंत्र की दुर्दशा पर वे लिखते हैं-
‘‘सामंतों ने कर दिया प्रजातंत्र का होम
लाश बेचने लग गए खादी पहने डोम
खादी पहने डोम लग गए लाश बेचने
माइक गरजे, लगे जादुई ताश बेचने
इंद्रजाल की छतरी ओढ़ी श्रीमंतों ने
प्रजातंत्र का होम कर दिया सामंतों ने।’’ अतः कह सकते हैं कि नागार्जुन की कलम जनता के इशारे पर चलती है, न कि किसी राजनीतिक दल के इशारे पर। इस ईमानदार जनकवि को याद करने का अर्थ है उनके पूरे समय को याद करना।

शमशेर, केदार और नागार्जुन जन्‍मशती पर आयोजन 27 को

नई दि‍ल्‍ली : कवि‍ शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की जन्‍मशती के अवसर जन संस्‍कृति‍ मंच, लखनऊ की ओर 27 फरवरी, 2011 को उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान, हजरतगंज, लखनऊ में कार्यक्रम काल से होड़ करती कवि‍ता का आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम में मुख्‍य अति‍थि‍ मैनेजर पाण्‍डेय और वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ राजेन्‍द्र कुमार व बलराज पाण्‍डेय होंगे। कार्यक्रम का पहला सत्र दोपहर 3.30 शुरू होगा। इसकी अध्‍यक्षता नरेश सक्‍सेना करेंगे। इसमें शमशेर, केदार और नागार्जुन की कवि‍ताओं का पाठ कि‍या जाएगा। साथ ही चंद्रशेखर के कवि‍ता संग्रह अब भी का लोकार्पण कि‍या जाएगा। इनके अलावा हमारे वक्‍त शमशेर का महत्‍व व प्रासंगि‍कता पर मैनेजर पाण्‍डेय, हमारे अपने व जरूरी नागार्जुन पर राजेन्‍द्र कुमार और समय के महत्‍वसि‍द्ध कवि‍ केदार पर बलराज पाण्‍डेय का व्‍याख्‍यान होगा।

दूसरा सत्र शाम 7.00 बजे शुरू होगा। इसमें हमारे सम्‍मुख शमशेर के तहत उनके कवि‍ता पाठ की वीडि‍यो फि‍ल्‍म का प्रदर्शन कि‍या जाएगा।

नि‍राला जयंती पर कवि‍तायें

हिंदी साहि‍त्य के प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला की जयंती वसंत पंचमी को मनायी जाती है। इस अवसर पर उन पर लि‍खी लेखक/कवि‍ शमशेर, राजेंद्र कुमार, भवानीप्रसाद मि‍श्र, नागार्जुन, शेखर जोशी और रामवि‍लास शर्मा की कवि‍ताएं-

निराला के प्रति : शमशेर

भूलकर जब राह- जब-जब राह भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम को आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वा स बन मेरे लिए-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि ! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते ‘शक्ति औ’ कवि के मिलन का हास मंगलमय,
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कठस्वर में तुम्हारे कवि,
एक ऋतुओं के विहँसते सूर्य !
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह !
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
सधना स्वर से
शांत-शीतलतम।
हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि:
जानता क्या मैं-
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(और विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !

दृष्टि-दान : राजेंद्र कुमार

जहां-जहां हम देख सके
आपनी आँखें
तुमको,
देखा, तुम हो
दिखलाते वहाँ-वहाँ, दुख की
दिपती आँखें,
ऐंठीले सुख की –
जिन्हें देख-छिपती आँखें;
यह दृष्टि तुम्हारी ही है दुख को मिली
दिख गई खुद की ताकत
उसे, अनेक मोर्चों पर-
हार-हार
जिन पर हम सबको
बार-बार डटना ही है
छंटना ही है, वह कोहरा-घना-
दृष्टि को छेंक रहा है जो
यों दृष्टि तुम्हारी मिली
हमारी मिली
वह दृष्टि तुम्हारी
मिली
दिख सकी हमें जुही की कली
‘विजन बन वल्लारी पर … सुहाग-भरी
स्नेह-स्पप्न-मग्न… अमल-
कोमल तनु तरुणी…’
नहीं तो रह जाती वह
किसी नायिका के जूडे़ में खुँसी,
किसी नायक के गले-पड़ी
माला में गुँथी…
कहाँ वह होती यों सप्राण
कि होती उसकी खुद भी
कोई अपनी प्रेम-कथा उन्मुक्त!
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
दिख सकी हमें- तोड़ती पत्थर
वह- ‘जो मार खा रोई नहीं’
रह जाती जो अनदिखी
अन्यथा
इलाहाबाद के पथ पर
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
राम पा गये जिं‍दगी में आने की राह
नहीं तो
भटक रहे होते पुराण के पन्नों पर प्रेतात्म…,
आ रमे हमारे बीच
ठीक हम जैसों
की फि‍क्रों में हुए शरीक
‘अन्याय जिधर हैं, उधर शक्ति’-
यह प्रश्न
विकटता में अपनी
पहले से भी कुछ और विकट है आज,
वह आवाज़-
‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ कहां
गुम हुई,
खोजते हमें निकलना है,
नहीं हम दृष्टि-हीन
फिर हमें प्रमाण पात्रता का देना होगा
फिर शक्ति करेगी हमें
और, हम ही होंगे-
हाँ,  हम ही-पुरुषोत्तम नवीन
(‘आदर्श’, कलकत्ता, 1965 में प्रकाशि‍त)

लफ्फा़ज़ मैं बनाम निराला : भवानी प्रसाद मिश्र

लाख शब्दों के बराबर है
एक तस्वीर !
मेरे मन में है एक ऐसी झांकी
जो मेरे शब्दों ने कभी नहीं आँकी
शायद इसीलिए
कि, हो नही पाता मेरे किए
लाख शब्दों का कुछ-
न उपन्यास
न महाकाव्य !
तो क्या कूँची उठा लूँ
रंग दूँ रंगों में निराला को ?
आदमियों में उस सबसे आला को?
किन्तु हाय,
उसे मैंने सिवा तस्वीरों के
देखा भी तो नहीं है ?
कैसे खीचूँ, कैसे बनाऊँ उसे
मेरे पास मौलिक कोई
रेखा भी तो नहीं है ?
उधार रेखाएँ कैसे लूँ
इसके-उसके मन की !
मेरे मन पर तो छाप
उसकी शब्दों वाली है
जो अतीव शक्तिशाली है-
‘राम की शक्ति पूजा’
‘सरोज-स्मृति’
यहाँ तक कि ‘जूही की कली’
अपने भीतर की हर गली
इन्हीं से देखी है प्रकाशित मैंने,
और जहाँ रवि न पहुँचे
उसे वहाँ पहुँचने वाला कवि माना है,
फिर भी कह सकता हूँ क्या
कि मैंने निराला को जाना है ?
सच कहो तो बिना जाने ही
किसी वजह से अभिभूत होकर
मैंने उसे
इतना बड़ा मान लिया है-
कि अपनी अक्ल की धरती पर
उस आसमान का
चंदोबा तान लिया है
और अब तारे गिन रहा हूँ
उस व्यक्ति से मिलने की प्रतीक्षा में
न लिखूंगा हरफ, न बनाऊंगा तस्वी्र !
क्यों कि‍ हरफ असम्भव है,  तस्वीर उधार
और मैं हूँ आदत से लाचार-
श्रम नहीं करूँगा
यहाँ तक
कि निराला को ठीक-ठीक जानने में
डरूँगा, बगलें झाँकूँगा,
कान में कहता हूँ तुमसे
मुझ से अब मत कहना
मैं क्या खाकर
उसकी तस्वीर आँकूँगा !

निराला के नाम पर : नागार्जुन

बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न  तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।
क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे श्रृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !
राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !
रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ,  मुख से न फूटा वचन ?
क्षेपकों की बाढ़ आयी, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, वेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

संगम स्मृति : शेखर जोशी

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती।
इन्दीवर की कथा रही:
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।
ओ महाप्राण !
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती !
किन्तु न रीती !

कवि : रामविलास शर्मा

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अब कहां यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाटवाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
घूसर संध्या में कवि उदास है बीतराग !
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण,- ज्योति का सहस्नार।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिये लेख,
गाते हैं वन के विहग ज्योति का गीत एक।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।
इन वन्य जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छंट गया तीक्ष्‍ण बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि घूसर प्रकाश।
उस वज्र हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिये विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।
कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक  कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।

बाबा नागार्जुन: कुछ संस्मरण : अतुल शर्मा

जनशताब्दी वर्ष पर बाबा नागार्जुन को शि‍द्दत से याद कर रहे हैं कवि‍, लेखक और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा-
प्रतिष्ठित जनकवि बाबा नागार्जुन उम्र की जिस दहलीज पर मिले, उस समय स्वाभाविक थकान घेरे रहती है। लेकिन बाबा नागार्जुन इसके अपवाद रहे। मैंने पहली मुलाकात में ही मस्ती, घुमक्कड़ी फक्कड़पन और ठहाकों से घुली मिली अद्भुत गहरी जि‍जि‍वि‍षा अनुभव की।
डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून का यूनियन वीक। एक तरफ चुटकुलेबाजों का तथाकथित कवि सम्मेलनीय मंच और दूसरी तरफ युवाओं से भरे हॉल में बाबा नागार्जुन का इंतजार। यह जनपक्षीय संदेश देने के लिए किया गया कार्यक्रम था। साहित्य का जनसंघर्षों के साथ भीतरी रिश्ता नागार्जुन जैसे प्रतीक को लेकर किया गया आयोजन था।
बाबा देहरादून पहुंचे। कुछ समय बाद उन्हें एक बड़े होटल में ठहरा दिया गया। मोटा खादी का कुर्ता, ऊंचा पजामा, खि‍चड़ी दाढ़ी, सिर से गले तक मफलर और मफलर के ऊपर टोपी। मोटा खादी का कोट, हाथ में छड़ी। एक दरी में छोटा सा बिस्तर रस्सी से बंधा था। एक झोला था जिसमें किताबें व दवाई की बोतलें थीं। सहज देहाती युगपुरुष बाबा नागार्जुन भव्य होटल के रंगीन पर्दों, दीवारों, खिड़कियों और फर्नीचरों के बीच चल रहे थे। पीछे युवाओं की उत्साही भीड़ थी। एक सुविधाजनक सोफे में बैठकर उन्होंने अपनी सांसों को संयत करने के लिए पानी मांगा। एक नजर युवाओं की तरफ डाली और मुस्कुफराये। फिर पैर सोफे पर चढ़ा कर बैठ गए। छात्र संघ अध्यक्ष जो उन्हें सादतपुर से गाड़ी में लाए थे, उन्हें इशारे से बुलाया और कहा, ‘‘अतुल को बुला सकते हो?’’
मेरे पास फोन आया- ‘बाबा देहरादून पहुंच गए हैं। आपको याद कर रहे हैं।’ कुछ ही देर बाद मैं बाबा के सामने था। वह मेरा हाथ पकड़कर बैठ गए। हंसे और कुछ बातें कीं। फिर धीरे-धीरे उठे, अपना छोटा सा रस्सी बंधा बि‍स्तर सामने रखवाया, झोला कंधे पर टांगा और छड़ी ढूंढने लगे। न मैं कुछ समझ पाया और न कोई और।
‘‘अतुल के घर जाऊंगा।’’ विनम्रता और दृढ़ता के साथ बाबा ने कहा। सब चौंके। उन्होंनें मेरा हाथ पकड़ा। सब बाहर की तरफ चलने लगे। न कोई विवाद न कोई संवाद। मेरी क्या हिम्मत मैं कुछ कहूँ। मेरे लिए तो यह अप्रत्याशित सौभाग्य था।
‘‘वहीं रहूंगा।’’ बाबा ने निर्णायात्मक स्वर में कहा। बाहर निकल छात्रसंघ अध्यक्ष ने मुझे अलग बुलकर कहा, ‘‘एक- डेढ़ घंटे बाद कार्यक्रम है। बाबा को वहां भी पहुंचना है।’’
‘‘मुझे बताओ मैं क्या कर सकता हूं ?’’ मैंने कहा।
‘‘मैं आपके साथ चलता हूं और साथ ही कॉलेज ले आयेंगे।’’ छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा। गाड़ी में बाबा बहुत खुश थे।
हम जहां पहले रहते थे, उसके सामने बजरी बिछा एक लॉन था। और उसके आसपास पिताजी के लगाए बावन तरह के गुलाब, कैक्टस, बोगेनवैलिया, कुछ सब्जियां और अन्य पौधे लगे थे। जाफरी वाला मकान, टीन की छत, नींबू के पेड़ से सटा हुआ एक कमरा। वहां रखी चारपाई और दो कुर्सियां। बाबा वहीं बैठे, फिर लेट गए। मैंने परिवार में अम्मा जी, रीता, रेखा और रंजना को मिलवाया। वह उठकर बैठ गए। एकदम बोले, ‘‘अतुल, मुझे तो मेरा परि‍वार मि‍ल गया।’’ अम्मा जी से कहा, ‘‘थोड़ी सी खिचड़ी खाऊंगा।’’ हमें बहुत अच्छा लग रहा था, पर छात्रसंघ पदाधिकारियों की धड़कनें बहुत बढ़ रही थीं।
बाबा मेरा हाथ पकड़कर बाहर आये। और क्यारियों में घूमने लगे। अपनी छड़ी से इशारा करते हुए बोले, ‘‘यह तो सर्पगंधा है। रक्तचाप की अचूक औषधि। यह कैलनडूला एन्टीबायटिक।’’ ऐसे कई पौधे उन्होंने गिना दिये। वह कहने लगे, ‘‘लगता है बहुत जानकार आदमी थे शर्मा जी।’’ (शर्मा जी यानी स्वतंत्रता सेनानी कवि श्रीराम शर्मा प्रेम)। काफी देर गुलाब को देखते रहे। और फिर कमरे की ओर जाने लगे। इतनी देर में खिचड़ी बन चुकी थी। उन्होंने बहुत थोड़ी-सी खिचड़ी और सब्जी खाई। और फिर मुझसे पूछा, ‘‘कितनी देर में है आयोजन?’’ मैंने कहा, ‘‘शुरू ही होने वाला होगा।’’ ‘‘तो फिर चलते हैं वहीं पर, सामान यहीं रहेगा। मैं भी यहीं रहूंगा।’’ मैंने न जाने क्यों पूछ लिया, ‘‘यहां कोई असुविधा तो नहीं होगी?’’  इस पर वह नाराज हो गए। उन्होंने कहा, ‘‘खबरदार जो मेरे घर को असुविधाजनक कहा।’’
डी.ए.वी. कॉलेज हॉल- बाबा के आने से खलबली मच गई। राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत यात्रा और निराला के समकालीन आपातकाल में सक्रिय काव्यमय विद्रोह करने वाले मैथिली साहित्य में साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हिंदी के वरिष्ठतम कवि, गद्यकार व आन्दोलनकारी बाबा नागार्जुन बार-बार मंच से यही कहते रहे कि- जन से होते हुए जन तक पहुंचना ही लक्ष्य है। दिल्ली से उनके साथ आये महेश दर्पण और देहरादून के कवियों के साथ उन्होंने काव्यपाठ किया। ‘मंत्र’ कविता सुनाई। छात्र-छात्राओं के साथ घंटों बैठे रहे। रिश्ते जोड़ लिये। सबको हमारे घर का पता देते रहे। और अद्भुत निरन्तरता के संवाद बाबा नागार्जुन से मिलने दो दिन तक हमारे यहां मेला लगा रहा। चाय का बड़ा भगोना रेखा ने चढ़ा दिया था। युवा और वृद्ध, साहित्यकार और रंगकर्मी अलग-अलग सोच के राजनीतिक लोगों से हमारा घर भरा रहा। बाबा क्या आये जश्न हो गया। तभी तो वे जनकवि हुए।
अगले दिन मेरे आग्रह पर महादेवी पीजी कॉलेज के हिन्दी विभाग में भी उन्होंने शिरकत की। रात को सोते समय कहने लगे, ‘‘आज मेरी पांच हजार से ऊपर फोटो खिंची होंगी। ये सोच रहे हैं कि मैं इतनी जल्दी चला जाऊंगा। इन्हें पता नहीं कि अभी बहुत दिन जियूंगा।’’ वह ठहाका मार कर हंसे। मैंने मन ही मन सोचा, बाबा नागार्जुन कभी समाप्त हो ही नहीं सकते। वह हमारे यहां कई दिन तक रहे।
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जयहरि‍खाल, पौड़ी गढ़वाल- बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस। वाचस्पति के यहां आकर वह हर साल रहते थे। उसका फोन आया कि ‘‘बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस है। तुम्हें आना है।’’ मैं यह अवसर कैसे चूकता। लैंसडाउन के पास छोटी-सी बस्ती जयहरिखाल पहुंच गया। वहां वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित बाबा नागार्जुन की काव्यपुस्तक ‘ऐसा क्या कह दिया मैंने’ का विमोचन हुआ। शेखर पाठक, गिर्दा आदि मौजूद थे। काव्यगोष्ठी  हुई। बाबा ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘अकाल’ सुनाई। और लोगों ने भी काव्य पाठ किया। मैंने दो जनगीत सुनाए। उसकी एक पंक्ति पर बाबा काफी देर तक बोले। यह मेरे लिये उत्साहजनक था। पहली पंक्ति थी-
‘ये जो अपनी शिरायें हैं सारी पगडंडियां गांव की हैं।’
और दूसरी कविता की पंक्ति थी- ‘जिस घर में चूल्हा नहीं जलता, उसके यहां मशाल जलती है।’ मेरी इन दोनों पंक्तियों पर काफी देर तक चर्चा की। जयहरिखाल को केन्द्र मान कर कई कविताएं लिखी थीं जो गढ़वाल विश्वविद्यालय के कोर्स में पढ़ाई जाती हैं।
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नैनीताल- नागार्जुन, गिर्दा और मैं नुक्कड़ कवि सम्मेलन में काव्यपाठ कर रहे थे। बाबा ने एक पंक्ति सुनाई- ‘एक पूत भारत माता का। कंधे पर है झंडा। पुलिस पकड़ कर जेल ले गई। बाकी रह गया अंडा।’ यह सबको बहुत पसंद आई। साहित्य समझ भी आये और परिवर्तन की दिशा में कार्य भी करे। यह मकसद ठीक लगा। उन्होंने चलते समय अपनी घड़ी देते हुए कहा, ‘‘अतुल, यह लो मैं तुम्हें समय देता हूं।’’ यह कहकर वह खुद ही ताली बजाकर बच्चों की तरह खिलखिलाये और बाबाओं की तरह चले गये मुड़कर नहीं देखा।
ये दृश्य कभी भूलता नहीं। ऐसे बहुत से संस्मरण मेरे पास हैं जो नैनीताल, हल्द्वानी, कौसानी, पौड़ी, अल्मोड़ा, देहरादून ही नहीं, बल्कि दिल्ली तक फैले हुए हैं। बहुत लोगों में बाबा इस तरह से जीवित हैं।
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दिल्ली विश्वपुस्तक मेला। एक स्टॉल पर बाबा बैठे हैं। वह किसी पुस्तक का विमोचन करने को तैयार हैं। उनसे मिले बहुत वर्ष हो गये थे। सोचा कि पहचान भी पायेंगे कि नहीं। उनके पास गया और प्रणाम किया। वह किसी और से बात करने लगे। मैं चलने लगा। उन्होंने लपक कर मेरा हाथ पकड़ा, ‘‘अरे, इतनी जल्दी क्या है? देहरादून जाना है क्या?’’ वह फिर चिरपचित हंसी के साथ मिले। अच्छा लगा कि भीड़ भरी दुनिया में अभी कुछ लोग ऐसे हैं जो मन से जुड़ते हैं। उन्होंने गढ़वाल की कई बातें पूछीं। एकएक दिल्ली के नामवर लोगों ने उन्हें घेर लिया। भीड़ के पीछे खड़ा मैं भी बाबा के साथ जुड़ा रहा। आज भी जुड़ा हूं।

कवियों-शायरों की नजर में आजादी

 

आजादी को लेकर देशवासियों ने बहुत से सपने देखे थे। नेताओं ने बड़े-बड़े वायदे किए, लेकिन अंतत: यह आजादी महज सत्ता स्थानांतरण साबित हुई। इसका लाभ एक वर्ग विशेष ही उठा रहा है। इसे लेकर कवियों-शायरों ने समय-समय पर चेताया भी। युवा पत्रकार देवेंद्र प्रताप ने ऐसी ही कुछ रचनाओं का संकलन किया है-

अगस्‍त 1947 में आज़ादी मिलने के कुछ ही समय बाद मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने इस आज़ादी को ‘दाग-दाग उज़ाला’ कहा। उन्‍होंने कहा:
ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शबगुज़ीदा सहर
वो इन्‍तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्‍त में तारों की आख़री मंज़ि‍ल
कहीं तो होगा शबे सुस्‍त मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा, सफ़ीन-ए-ग़मे-दिल……….
अली सरदार जाफ़री ने इस आजादी के बारे में लिखा :

कौन आज़ाद हुआ
किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
मादरे-हिन्‍द के चेहरे पे उदासी वही
कौन आज़ाद हुआ…

खंजर आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए
मौत आज़ाद है लाशों पे गुज़रने के लिए
कौन आज़ाद हुआ…

जब आज़ाद भारत की सरकार ने हकों-अधिकारों की बात करने वालों और जनांदोलनों को कुचलने में अंग्रेजों को भी मात देनी शुरु कर दी तो शंकर शैलेन्‍द्र ने लिखा :
भगतसिंह इस बार न लेना
काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी
सज़ा मिलेगी फांसी की

इप्‍टा ने आम लोगों की आवाज को अल्‍फाज़ दिए :
तोड़ो बंधन तोड़ो
ये अन्‍याय के बंधन
तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो…
हम क्‍या जानें भारत भी में भी आया है स्‍वराज
ओ भइया आया है स्‍वराज
आज भी हम भूखे-नंगे हैं आज भी हम मोहताज
ओ भइया आज भी हम मोहताज

रोटी मांगे तो खायें हम लाठी-गोली आज
थैलीशाहों की ठोकर में सारे देश की लाज

ऐ मज़दूर और किसानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
ऐ छात्रो और जवानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
झूठी आशा छोड़ो…
तोड़ो बंधन तोड़ा…

ख़लीलुर्रहमान आज़मी ने आज़ादी मिलने के दावे को नकार दिया-
अभी वही है निज़ामे कोहना अभी तो जुल्‍मो सितम वही है
अभी मैं किस तरह मुस्‍कराऊं अभी रंजो अलम वही है

नये ग़ुलामो अभी तो हाथों में है वही कास-ए-गदाई
अभी तो ग़ैरों का आसरा है अभी तो रस्‍मो करम वही है

अभी कहां खुल सका है पर्दा अभी कहां तुम हुए हो उरियां
अभी तो रहबर बने हुए हो अभी तुम्‍हारा भरम वही है

अभी तो जम्‍हूरियत के साये में आमरीयत पनप रही है
हवस के हाथों में अब भी कानून का पुराना कलम वही है

मैं कैसे मानूं कि इन खुदाओं की बंदगी का तिलिस्‍म टूटा
अभी वही पीरे-मैकदा है अभी तो शेखो-हरम वही है

अभी वही है उदास राहें वही हैं तरसी हुई निगाहें
सहर के पैगम्‍बरों से कह दो यहां अभी शामे-ग़म वही है

रघुवीर सहाय ने जन-गण-मन के ‘अधिनायक’ के बारे में कहा :
राष्‍ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्‍य विधाता है
फटा सुथन्‍ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्‍लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उने
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

विष्‍णु नागर ने तो राष्‍ट्रगीत की वैधता पर ही सवाल खड़ा कर दिया-
जन-गण-मन अधिनायक जय हे
जय हे, जय हे, जय जय हे
जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय
जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय
हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे
हें-हें, हें-हें, हें-हें, हें
हा-हा, ही-ही, हू-हू है
हे-है, हो-हौ, ह-ह, है
हो-हो, हो-हो, हो-हौ है
याहू-याहू, याहू-याहू, याहू है
चाहे कोई मुझे जंगली कहे।

शलभ श्रीराम सिंह ने लिखा-
तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल, सोच और सोचकर सवाल कर
किधर गये वो वायदे? सुखों के ख्‍वाब क्‍या हुए?
तुझे था जिनका इंतज़ार वो जवाब क्‍या हुए?

तू इनकी झूठी बात पर, न और ऐतबार कर
कि तुझको सांस-सांस का सही हिसाब चाहिए!

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए!

अंत में, शहीदों की ओर से
शहादत थी हमारी इसलिए
कि आज़ादियों का बढ़ता हुआ सफीना
रुके न पल भर को!
पर ये क्‍या?
ये अंधेरा!
ये कारवां रुका क्‍यों है?
बढ़े चलो, अभी तो
काफिला-ए-इंक़लाब को
आगे, बहुत आगे जाना है!

बाबा नागार्जुन ने अपनी विशिष्ट शैली में सवाल खड़ा किया-

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्‍कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्‍चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला
जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्‍बीस
उसीका पन्‍द्रह अगस्‍त है
बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्‍त है…

कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्‍त है?
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्‍त है
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्‍त है
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्‍त है

पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मास्‍टर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
बच्‍चे की छाती में कै ठो हाड़ है!
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है
ग़रीबों की बस्‍ती में उखाड़ है, पछाड़ है
धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्‍छों नहीं! कुच्‍छों नहीं
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
ताड़ के पत्‍ते हैं, पत्‍तों के पंखे हैं
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है
कुच्‍छों नहीं, कुच्‍छों नहीं…
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है!
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है!
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्‍त है
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्‍त है
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्‍त है…

अनभै सांचा का कवि : विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी

विगत 25 जून को नागार्जुन के जन्म स्थान तरौनी गांव में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में उनके जन्मशताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। मिथिलांचल बिहार प्रदेश के अंतर्गत है। इसमें बिहार के अनेक प्रगतिशील साहित्यकारों ने भाग लिया। बाहर से भी अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार पहुंचे। आयोजन बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। वहां से लौटकर बाबा को याद कर रहे हैं- 
समारोह में शामिल होने के लिए तरौनी की यह यात्रा वस्तुत: तीर्थयात्रा थी। नागार्जुन को बाबा के नाम से कहा और जाना जाता था। हिंदी में बाबा नाम से केवल एक और साहित्यकार को जाना जाता है। वे हैं बाबा तुलसीराम। तुलसीदास ने घर और परिवार छोड़ दिया था। बाबा ने घर-परिवार से संबंध तो नहीं तोड़ा, लेकिन वे अधिकांशत बाहर ही रहते थे।
गृहस्थ से ज्यादा यात्री थे। तुलसीदास की कविता के बारे में समालोचकों का विचार है कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य रूपों का उपयोग किया। नागार्जुन ने आधुनिक समय में प्रचलित शायद ही कोई ऐसा छंद हो जिसमें कविता न की हो- केवल शिष्ट साहित्यिक छंद ही नहीं, लोक गानों और लोक धुनों में भी। लेकिन तुलसीदास और नागार्जुन में केवल समानता ढूंढना गलत तो होगा ही अनर्थक भी। बाबा नागार्जुन सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के वर्णाश्रम व्यवस्थावादी रामभक्त नहीं, बीसवीं शताब्दी के समाजवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। उन्होंने ‘हरिजन गाथा’ नामक महाकाव्यात्मक कविता लिखी, जिसमें नए युग के नायक का हरिजनावतार कराया। नागार्जुन ने इस हरिजन शिशु को वराह अवतार कहा है। वराह का अवतार अर्थात् वह धरती का उद्धार करने वाला होगा। नागार्जुन की कविता हिंदी साहित्य में एक नए बोध और शिल्प का आविष्कार करती है। दलितों और हरिजनों को सहानुभूति देने वाली कवितायें तो इसके पहले लिखी गई थीं, लेकिन हरिजन का यह सशक्त रूप हिंदी साहित्य में पहले नहीं दिखलायी पड़ा था। हरिजन शिशु की छोटी हथेलियों में- आड़ी तिरछी रेखाओं में हथियारों के ही निशान हैं खुखरी है, बम है, अस्ति भी है, गंड़ासा माला प्रधान है।
नागार्जुन के रचनाकार में कबीर और तुलसीदास का मणि कांचन योग है। नागार्जुन का व्यक्तित्व भी कालजयी लगता है। नागार्जुन दिल्ली प्राय: आते रहते थे। पूर्वी दिल्ली में सादतपुर में एक छोटा सा मकान था। उसमें अपने पुत्र श्रीकांत के साथ ठहरते थे। अगर आप यह पता लगाएं कि दिल्ली आकर वे किन लोगों से मिलते थे तो आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। मैंने उनकी कोई ऐसी फोटो नहीं देखी जिसमें वे किसी मंत्री, उद्योगपति, नेता या गुंडे के साथ दिखलाई पड़े। वे अज्ञात या अल्प-अज्ञात निम्न वर्गीय नवयुवक साहित्यकारों या उपेक्षित अधेड़ या वृद्ध मित्र साहित्यकारों के यहां बिन बुलाये पहुंच जाते थे। जिस घर पहुंचते थे कुछ दिनों के लिए उस घर के हो जाते थे। कभी-कभी तो अतीव मनोरंजक तनाव की स्थितियां पैदा हो जाती थीं। सो एक बार नागार्जुन ने मेरे घर पर भी आने की कृपा की।
मैं सादतपुर से उन्हें रिक्शे पर बिठाकर अपने घर लाया। रास्ते भर बाबा भुनभुनाते रहे ऑटो नहीं कर सकते थे। खैर किसी तरह घर पहुंचे। आते ही फरमाइश की दलिया खिलाओ। पत्नी ने दलिया बनाया। चखा, तो बोले, कैसी दलिया बनायी है? इसमें नमक ही नहीं है। पत्नी ने कहा कि इन्हें ब्लड प्रेशर है इसलिए हम नमक कम खाते हैं। अतिथि को इतना तेज गुस्सा आया कि दलिया का कटोरा लेकर चौके में जा पहुंचे। बोले- दलिया ऐसे बनाया जाता है? दलिया को पहले घी में भूना जाता है। फिर दूध या पानी से पकाया जाता है। तब दलिया खिलता है। पत्नी चुप रहीं। अकेले में मुझसे बोली, यह तुम मेरी सास को कहां से पकड़ लाए? लेकिन चार-पांच दिनों के बाद जब नागार्जुन जाने लगे तो पत्नी रोने लगी। मां-बाप की तरह ऐसे लोग बड़े भाग्य से घर आते हैं। इन्हीं दिनों मैंने नागार्जुन के रचना धर्मी रूप की एक झलक भी देखी। मेरी बड़ी नातिन चार-पांच साल की थी। उससे नागार्जुन की सबसे ज्यादा पटती। एक दिन तीसरे पहर भोजनोपरांत शयन के बाद उठा तो देखा नागार्जुन बहुत देर तक फर्श पर पड़ी किसी चीज को बड़ी गंभीरता से देखने में तन्मय हैं। समाधि लगी हो मानो। जब उन्हें मेरी आहट मिली तो बोले ‘देखो, कविता है यह। ‘नातिन की छोटी-छोटी चप्पलों को वह देख रहे थे। रचना-समाधि में लीन उनका चेहरा मैं कभी नहीं भूल सकता।
नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग-जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ हो जाते थे। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है वे लिस्ट को आगे बढ़ाएंगे। अपनी एक कविता में वह शिशु चिनार से बात करते हैं और कालिदास से जवाब-तलब करते हैं- ‘कालिदास सच-सच बतलाना।’ उनका जीवन अनुभव व्यापक था, कबीरदास की भांति वह अनेक परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय थे। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति थी। तीव्र सौंदर्यानुभूति के रचनाकार थे और इसलिए गहरी घृणा और तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है। जटिल अंतर्वस्तु के बगैर सहजता आ ही नहीं सकती। कविता की बात छोडि़ए, जीवन में भी वह जो इतने सहज थे, उसकी भी वजह व्यापक परस्पर-विरोधी जीवन स्थितियों को पचा सकने वाली क्षमता का ही प्रभाव है। बात सुनने में थोड़ा अजीब लगेगी, लेकिन है सच कि नागार्जुन कविता करते समय भी सिर्फ कवि नहीं, आदमी बने रहते हैं। मतलब यह कि वे रचना की प्रक्रिया में रचनात्मकता के व्याकरण का ही पालन नहीं करते। आम आदमी की तरह स्थितियों और घटनाओं का प्रभाव ग्रहण करने वाले नागार्जुन काव्य-रूढिय़ों का अतिक्रमण करते हैं। संवेदना और शिल्प का तालमेल करते हैं। ऐसा व्यक्ति साहित्य रचते समय भी न तो काव्य रूढिय़ों का ही अनुशासन पूरी तरह स्वीकार कर सकता है और न विचारधारा या पार्टी का ही। नागार्जुन की कवितायें पढ़ते ही पाठक कविता की दुनिया से निकलकर जीवन में आ जाता है। और उसके लिए जीवन-रस ही काव्य स्वाद बन जाता है। नागार्जुन की बहुत अच्छी कविता है- फूले कदंब। कंदब पुष्प की शोभा का बयान करके उसे साक्षात कर दिया। यह हो गया कवि का काम। अपने ही द्वारा रचित पुष्पित कंदब को छूने का मन कवि में छिपे आदमी का हो रहा है। सो आखिर में लिखा ‘मन कहता है छू ले कदंब’।
अनार के दानों का उपमान सुंदर दंत पंक्ति के लिए किया जाता है। प्राय: सुंदर नायिकाओं की सुंदर दंत पंक्ति के लिए। लेकिन उस आदमी के दांत जो अभी दिल्ली से टिकट मार कर लौटा है। पान चबा रहा है। इतना पुलकित-प्रसन्न है। कैसा लग रहा है। कुटिल आदमी की प्रसन्नता कितनी घृणास्पद होती है। दांत तो अनार ही जैसे हैं, लेकिन खिले हुए हैं। खिले क्रिया से दांतों का दूर-दूर होना, बीच की खाली जगह का दिखलाई पडऩा। जिसे ‘बीडर’ कहते हैं ‘खिले’ क्रिया से अनार के दानों का उपमान सौंदर्य नहीं, कुरुचि प्रदान करता है। और यह व्यंग्य का प्रहार निर्मम है-
आये दिन बहार के
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के
दिल्ली से लौटे हैं अभी टिकट मारकर
नागार्जुन को आधुनिक कबीर यों ही नहीं कहा जाता है। कबीर ‘आंखिन देखी’ में विश्वास करते थे। ‘अनभै सांचाÓ की अभिव्यक्ति का साहस रखते थे। ‘अनभै सांचा’ अनुभव और निर्भीकता दोनों का अर्थ देने वाला संश्लिष्ट पद है। प्रगतिशील कवि कल्पना, स्मृति आदि की अपेक्षा देखने पर अर्थात् जो सामने दिख रहा है, उससे ज्यादा आकृष्ट होते हैं। ‘जो सामने हैÓ उसी में इतिहास, भविष्य सब कुछ समाया है। इसलिए देखने की कल्पना आदि से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। वस्तुत: यह अंतर लोक और वेद का है। लोक और वेद के संतुलन की बात तुलसी करते थे। कबीर लोक और वेद के संतुलन पर नहीं, उसके अंतर पर बल देते थे- तू कहता है कागद लेखी, मैं कहता हूं आंखिन देखी।
इस देखी की रचनात्मकता में बड़ी महिमा है। नागार्जुन की एक कविता है- बादल को घिरते देखा है। ‘देखा है’ का अर्थ प्रत्यक्ष अनुभव किया है, अपनी आंखों देखकर जाना है। किताबों में पढ़कर, सुनी-सुनाई बात नहीं। मैं अपने अनुभव को अभिव्यक्त कर रहा हूं। आंख और कान में अंतर होता है। अनुभव का सर्वाधिक विश्वसनीय इंद्रिय माध्यम आंख है। आंख प्रतीक है प्रत्यक्ष अनुभव का, अनुमान इससे कमतर है। इसी कविता में नागार्जुन ने लिखा-
कहां गया धनपति कुबेर वह, कहां गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के, व्योम-प्रवाही गंगाजल का
ढूंढ़ा बहुत परंतु लगा क्या, मेघदूत का पता कहीं पर
जाने दो वह कवि-कल्पित था
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ चुंबी कैलाश-शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।
कुबेर, अलका, व्योम-प्रवाही गंगाजल- सुनी-सुनाई बातें हैं, मेघदूत किताब है- मैंने जो बादल देखे, वे किताबी नहीं- आंखों से देखे, ये पंक्तियां उनको चित्रित करती हैं। लोग कालिदास के बादलों के बारे में लिखते होंगे।
‘मैंने तो में ‘तो’ के आग्रह पर विचार कीजिए। कालिदास की महानता से इंकार नहीं, लेकिन उनका अनुभव नागार्जुन का अनुभव हो- तो नागार्जुन की कविता की क्या जरूरत है। सच्चे अर्थ में यह कवि की स्वायत्तता और निजता है। ‘यह देखना’ कबीर का ‘आंखिन देखी’ ही है। कवि सरस्वती-पुत्र होता है। वह ‘अनभै साँचा’ की ही अभिव्यक्ति करता है। कबीर भक्त होते हुए भी राम के सामने भी तन कर खड़े होते थे। नागार्जुन सामाजिक विचारों के हैं, अपने को बार-बार प्रतिबद्ध घोषित करते हैं, लेकिन वामपंथी पार्टियों की खुलकर आलोचना करते हैं। बड़े कवि के पास विचारधारा का आग्रह तो होता है, लेकिन वह अपने अनुभव के आधार पर विचारधारा को तोड़ता भी है। नागार्जुन ने पारंपरिक काव्य-रूपों का हिंदी और उसकी बोलियों की क्षमता का अभूतपूर्व उपयोग किया है। नागार्जुन मैथिली और हिंदी दो भाषाओं के महाकवि हैं। जैसे तुलसीदास अवधी और ब्रजभाषा के। नागार्जुन ऐसे आधुनिक कवि हैं, जिनके पास विद्यापति, कबीर और तुलसी की परंपरा का उत्तराधिकार है। वे आधुनिक हिंदी और मैथिली के कालजयी कवि हैं।