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लक्ष्मण राव यानी चाय वाला उपन्यासकार : अनुराग

लक्ष्मण राव- लगन और श्रम की गरिमा का साकार रूप हैं, जिसने विषमताओं से कभी हार नहीं मानी और सफलता जिसकी मुट्ठी में है। उनके बारे में आलेख-

नई दिल्ली के हिंदी भवन में, जहां साहित्य के दिग्गज कभी खत्म न होने वाली साहित्यिक सभाओं और गोष्ठियों में उलझे रहते हैं, वहीं भवन के ठीक सामने पटरी पर एक चायवाला चुपचाप चाय बनाता रहता है। ग्राहक के लिए चाय बनाने के बाद अगर तुरंत कोई ग्राहक उसके सामने नहीं होता, तो उस अतंराल में वह पढऩे या लिखने लगता है। पढऩे और लिखने में अजीब-सी लगने वाली यह बात उस समय अविश्वसनीय हो उठती है, जब हमें यह बताया जाता है कि वह शख्स साहित्यकार है। यह है- चायवाला साहित्यकार यानी लक्ष्मण राव, जो दो ग्राहकों के बीच मिले समय का सदुपयोग अपने सृजन में करता है।

लक्ष्मण राव का जन्म 22 जुलाई, 1954 को महाराष्ट्र में, अमरावती जिले की धामणगांव तहसील के छोटे से गांव तड़ेगांव-दशासर में हुआ। गांव की याद आते ही वह अपने अतीत में खो जाते हैं। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। उनके पिता की दो शादी हुई। पहली पत्नी से दो बेटी हुईं। पत्नी की मृत्यु होने पर उन्होंने दूसरी शादी पत्नी की बहन से कर ली। उनसे चार बेटे और एक बेटी हुई। इस तरह परिवार में तीन बहनें, चार भाई, माता-पिता और दादी थीं। कुल छह एकड़ जमीन थी। उससे गुजारा नहीं हो पाता था। पूरा परिवार खेतों में मजदूरी करता था।

आसपास दो-चार संपन्न परिवार भी थे। वे सभ्य दिखाई देते थे। उनका बड़ा सम्मान होता था। लक्ष्मण राव सोचता कि हम ऐसे क्यों नहीं हैं? हमारी आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण हमें कोई पूछता नहीं है। हमें भी इनके जैसा बनना है।

लक्ष्मण की आठवीं तक की शिक्षा गांव में स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हुई। उसके स्कूल में रामदास पढ़ता था। सीनियर था। आवारा था। वह अमीर घर से था। उसका बाप मर चुका था। उसने प्रिंसिपल पर डस्टर फेंका था। अगर फल नहीं तोडऩे दिए जाते तो टहनियां तोड़ देता। वह बोर्ड की परीक्षा में दूसरी बार भी फेल हो गया। उसकी मां एडमिशन दिलाने आई। प्रिंसिपल ने पूछा कि क्यों लाई हो इस लड़के को? मां ने कहा कि हमारा एक ही बच्चा है। हम इसे पढ़ाना चाहते हैं। पढ़ाना आपका काम है। हमारा काम है स्कूल में लाना। प्रिंसिपल ने उसका एडमीशन कर लिया।

कुछ दिन पहले स्कूल में अंग्रेजी के टीचर आए थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा भव्य था। अपटूडेट रहते थे। हैंड राइटिंग सुधारने पर जोर देते। विद्यार्थियों से कहते कि जब तक हैंड राइटिंग नहीं सुधारोगे, मैं नहीं पढ़ाऊंगा। उच्चारण सुधारने को कहते। जब कोई बच्चा फिलिम कहता तो वह टोक देते, ”फिलिम क्या होता है, फिल्म बोलो।” ऐसे बहुत से शब्द उन्होंने सुधरवाए। उनका बहुत सम्मान था। जब वह सड़क से गुजरते थे तो ग्रामीण सम्मान में खड़े हो जाते थे।

एक दिन उन्होंने प्रिंसिपल से पूछा, ”यह रामदास कौन है? पंद्रह दिन से एबसेंट है।”

प्रिंसिपल ने कहा, ”यह लड़का ऐसा ही है। यह तुम्हारे ऊपर भी डस्टर फेंकेगा या थप्पड़ मार देगा।”

टीचर ने कहा, ”इससे मैं मिलना चाहता हूं।”

वह उसी दिन रामदास के घर गए। उससे बात की। उन्होंने सोचा कि इतने इंटेलीजैंट लड़के को खराब बता रहे हैं। उससे कहा, ”तुम्हें कल से स्कूल आना है। आओगे तो हां बोलो और यदि नहीं आना है तो अभी मना कर दो।”

रामदास ने कहा, ”सर, मैं जरूर आऊंगा।”

टीचर ने उसे ऐसा माहौल दिया कि वह पूरी तरह बदल गया। उसने सभी शरारतें छोड दीं। पढाई-लिखाई में ध्यान देने लगा। सभी टीचर उसे पसंद करने लगे। एक दिन रामदास अपने मामा के घर जा रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। रामदास की नहाने की इच्छा हुई। वह नदी में कूद गया। लेकिन वह लौटकर नहीं आया। बाद में गांव वालों ने उसके शव को बाहर निकाला।

इस घटना ने बालक लक्ष्मण राव को अंदर तक झकझोर दिया। वह दिन-रात रामदास के बारे में सोचता रहता। यह घटना उसके लेखक बनने में प्रेरणा बनी। उसने सोचा कि इस पर कोई कहानी लिखी जाए। उसने तय कर लिया कि उसे लेखक बनना है। तय तो कर लिया, लेकिन इससे लेखक तो नहीं बना जा सकता था। लेखक बनने के लिए गहरे अध्ययन की जरूरत थी। इसके लिए वह पाठ्यक्रम की पुस्तकों के साथ-साथ विद्यालय के पुस्तकालय में साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन भी करने लगा। इस दौरान उसने कई लेखकों की रचनाएं पढ़ीं।

लक्ष्मण सातवीं-आठवीं में पढ़ता था। स्कूल में कोई कार्यक्रम होता तो टीचर कहते कि कुछ नाटक-वाटक कर। वह कहता कि नाटक तो मैं कर नहीं पाऊंगा क्योंकि मुझे आता नहीं। कोई कविता या लेख पढ़कर सुनाऊंगा। वह किसी का लेख या निबंध याद कर सुना देता। टीचर पूछते कि तेरा लिखा हुआ है। वह मना कर देता। टीचर कहते कि तू लिख। उसे सुना। लक्ष्मण ने गांधीजी, विवेकानंदजी आदि महापुरुषों के बारे में निबंध लिखे। अपने स्कूल के बारे में भी लिखा। लोगों को बहुत पसंद आया। लोगों ने कहा कि हम भी स्कूल देखते हैं, लेकिन हमारे दिमाग में ये बाते नहीं आईं। इससे लक्ष्मण को लेखन के लिए प्रोत्साहन मिला। उसने उपन्यास लिखा- ‘रामदास’।

गांव के संपन्न लोगों के बच्चे उच्च शिक्षा के लिए गांव से बाहर जाते थे। लक्ष्मण ने सोचा कि मैं भी उच्च शिक्षा के लिए अमरावती जाऊंगा। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। पैसे थे नहीं। गंभीर समस्या खड़ी हो गई कि कैसे जाया जाए?

अमरावती के एक डॉक्टर लक्ष्मण के पिताजी के परिचित थे। उन्होंने कहा कि इसे हमारे यहां भेज दो। यह क्लीनिक का काम कर लेगा। इसके साथ पढ़ भी लेगा। यह थोड़ा-सा आधार उसे मिला और वह अमरावती चला गया।

डॉक्टर के यहां आने के बाद उसे लगा कि वह पढऩे के लिए नहीं आया है, एक नौकर बनकर आया है। वह यहां नौकर की तरह काम कर रहा है। सुबह सात बजे उठने के बाद झाडू-पोंछे से लेकर दूसरे कई काम थे- शाम का सामान खरीदना, बच्चों की देखभाल करना और फिर चौकीदारी करना। वह सोचता कि यदि वापस जाऊंगा तो लोग पूछेंगे कि तू वापस क्यों आया? पिताजी बार-बार कहते कि मुझे अपनी समस्या बता। वह कहता कि उसे कोई परेशानी नहीं है। समस्या थी तो लेकिन बताने की इच्छा नहीं होती। वह सोचता कि पिताजी को बताऊंगा तो वह गांव वापस ले जाएंगे और फिर पढ़ाई छूट जाएगी। इसलिए वह चुपचाप सब सहता रहा। वहां वह तीन साल रहा। नौवीं और दसवीं पास की।

हिंदी पर अधिकार जमाने के लिए वह ‘धर्मयुग’, ‘सप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी हिंदी पत्रिकाएं, हिंदी उपन्यास व निबंध पढऩे लगा। इससे भाषा में सुधार हुआ। भाषा में तराश लाने के लिए वह इलाहाबाद से प्रकाशित ‘संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ’ नामक हिंदी संस्कृत शब्दकोश खरीदकर उसकी सहायता से अध्ययन करने लगा। उसे लगने लगा कि हिंदी पर उसका अच्छा अधिकार हो गया है, तो उसने 1973 में मुंबई हिंदी विद्यापीठ की हिंदी की परीक्षा दी। किसी ने सलाह दी की हिंदी का लेखक बनना है तो हिंदी की रचनाएं पढ़ो। वह पढ़ता गया।

अमरावती में एक सोसायटी लोन देती थी। उससे लोन लेकर लक्ष्मण मुबई चला गया। यह 1973 की बात है। अपने जीवन के अनुभवों का आधार बनाकर उपन्यास लिखा था- ‘नई दुनिया की नई कहानी’। ‘रामदास’ था ही। मुंबई जाने का मकसद था उपन्यासों पर फिल्मों का निर्माण हो। कई डायरेक्टरों, अभिनेता व अभिनेत्रियों से बात हुई। कोई बहाना बना देता तो कोई कहता कि आठ दिन बाद आना। आठ दिन बाद आने के लिए कहने का मकसद यह था कि आठ दिन तक कोई यहां रह नहीं पाएगा। तब तक वापस चला जाएगा। लेकिन लक्ष्मण की समझ में यह बात नहीं आई। वह उनकी बात सच समझता। इस तरह धक्के खाते चार दिन बीत गए।

वह डायरेक्टर के दफ्तर में गया। वहां का चपरासी अमरावती का रहने वाला था। उसने पूछा कि तुम यहां क्यों घूम रहे हो? लक्ष्मण ने कारण बता दिया। उसने सलाह दी कि फटाफट अपना टिकट कटाओ और वापस चले जाओ। ये सब तुमसे झूठ बोल रहे हैं। यहां कुछ नहीं होगा। बड़े-बड़े धक्के खा रहे हैं। तुम कहां हो? तुम्हें हिंदी भी ढंग से नहीं आती। लक्ष्मण वहां से वापस आ गया।

डॉक्टर साहब अमरावती स्पिनिंग मिल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में थे। उन्होंने चिट्ठी लिखी और अगले दिन ही लक्ष्मण को वहां नौकरी मिल गई। वह मजदूरी करने लगा। नेकर-बनियान पहनकर धागे के बंडल उठाना, दूसरी जगह ले जाना, इस तरह के काम करता।

1975 में बिजली कटौती के कारण मिल बंद हो गई। लक्ष्मण गांव चला गया और खेती करने लगा। लेकिन गांव में उसका मन नहीं लगा। कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उसे लगता कि यहां उसकी जिंदगी बरबाद हो रही है। गांव वाले कहते कि तूने पांच-दस साल खराब कर दिए। अब फिर गांव में आया है। गांव में रहता तो और कुछ कर लेता। गांव के तेरे साथ के लड़के मैट्रिक पास कर आगे निकल गए। कोई बी.ए. कर रहा है, कोई एम.ए., एम.कॉम. कर रहा है। तू बेकार की कहानियां बनाता है कि यह हो गया, वो हो गया। इन बातों से उसका मन खिन्न हो जाता।

लक्ष्मण ने पिताजी से कहा, ”आप मुझे कुछ पैसे दे दो। मैं नौकरी के लिए अमरावती जाना चाहता हूं।” यह उसने झूठ बोला था। उसका विचार भोपाल जाने का था। भोपाल जाने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि जब वह मुंबई गया था तो वह दिल्ली और भोपाल भी गया था। भोपाल दिल्ली के रास्ते में था। लक्ष्मण का मकसद लेखक बनना था। उसने सोचा कि भोपाल ही काम बन जाएगा तो दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा।

पिताजी ने कहा, ”नौकरी नहीं लगी तो वापस आ जाना। परेशान मत होना।” उन्होंने चालीस रुपये दे दिए।

गांव का एक लड़का अमरावती में इंजीनियरिंग कर रहा था। लक्ष्मण उसके साथ अमरावती आ गया।

वह लड़का बोला, ”तू चल, मेरे साथ हॉस्टल में ठहर जा।”

लक्ष्मण ने कहा, ”नहीं, तुम्हारे साथ हॉस्टल में नहीं ठहरना।”

वह बोला, ”एक दिन क्यों नहीं रह पाएगा। मैं हॉस्टल में रख लूंगा।”

लक्ष्मण लड़के के साथ हॉस्टल चला गया।

लक्ष्मण ने कहा, ”मैं तुझे काम की बात बताता हूं। मैं भोपाल जा रहा हूं। घर जाकर बता देना कि मैं भोपाल चला गया।”

वह बोला, ”यार, यह तू बड़ा गलत काम कर रहा है।” वह पढ़ रहा था। उसने किताब बंद कर दी। आगे बोला, ”तू पहले बता देता तो मैं साथ नहीं लाता। घर वाले कहेंगे कि तू साथ में ले गया था और पता नहीं कहां भगा दिया? ”

लक्ष्मण ने कहा, ”डरने वाली कोई बात नहीं है। मैं बच्चा नहीं हूं। 19-20 साल का हूं। तू चिंता मत कर। कह देना भोपाल चला गया।”

वह बोला, ”देख भई, यह बड़ी बुरी बात है। अगर तेरे पास पैसे नहीं हैं तो कोई बात नहीं। मैं तुझे देता हूं। तू वापस चला जा।”

लक्ष्मण ने कहा, ”पैसे मेरे पास हैं। लेकिन मैं वापस नहीं जाऊंगा। मैं भोपाल ही जाऊंगा। मैं तेरे से झूठ नहीं बोलूंगा।”

लक्ष्मण भोपाल की गाड़ी में बैठ गया।

चालीस रुपये दो दिन में खत्म हो गए। उसने सोचा कि ऐसा काम मिलना चाहिए कि रहने की भी जगह हो और खान-पान भी होता रहे। ऐसा काम या तो मजदूरी होता है या ढाबे में बरतन मांजना। वह प्लेटफार्म पर सोता था। आखिर के तीन रुपये रह गए थे। वह दिन में काम ढूंढता। भोपाल में कालोनियां बन रही थीं। वह वहां गया। उसे ईंटें ढोने का काम मिल गया। पांच रुपये रोज मिलते। वहां उसने नब्बे दिन काम किया। उसके पास 110 रुपये हो गए।

30 जुलाई, 1975 को जीटी एक्सपे्रस से दिल्ली आ गया। जो समस्या भोपाल की थी, वो दिल्ली की भी थी। सबसे पहले यहां जमना था। वह काम ढूंढने लगा। दो दिन बिरला मंदिर की धर्मशाला में रहा। उन दिनों दिल्ली में खूब बारिश हो रही थी। करीब रोज ही सुबह से शाम तक वर्षा होती रहती। इसलिए इमारत का काम नहीं मिला। विष्णु दिगंबर मार्ग पर पांच-छह ढाबे थे। एक में वह काम करने लगा। वहां उसने छह महीने खाने-पीने और 35 रुपये महीने पर काम किया। यहां काम करते हुए लिखने-पढऩे के लिए समय नहीं मिल रहा था। उसका मन उचटने लगा। मालिक उसकी ईमानदारी को देखते हुए छोडऩा नहीं चाहता था। उसने वेतन बढ़ाकर 60 रुपये महीने कर दिया। लेकिन लक्ष्मण ने कहा कि मेरा मन इस काम में नहीं लग रहा है। उसने काम छोड़ दिया। वह मजदूरी का काम ढूढऩे लगा।

राउ तुला मार्ग पर भवन बन रहे थे। लक्ष्मण वहां मजदूरी करने लगा। वहां उसने करीब एक साल काम किया। इस दौरान कुछ पैसे भी इकट्ठा कर लिए। चिट्ठी के लिए पता ढाबे का दिया हुआ था, वह वहां बीच-बीच में आता रहता। उसने सोचा कि क्यों न वहां दुकान जमा ले। ढाबे वाला मालिक उसे बहुत चाहता था। वह भी कहने लगा कि दुकान लगा ले। मैं पैसे दे दूंगा। मेरी दुकान की देखभाल भी हो जाएगी। तू ईमानदार आदमी है। मेरी मदद भी हो जाएगी।

20 जून, 1977 को लक्ष्मण राव ने दिगंबर मार्ग पर स्थित सुचेता भवन के सामने चबूतरा बनाकर पान, बीड़ी-सिगरेट बेचना शुरू कर दिया। यहां भी चैन नहीं मिला। समय-समय पर उसके चबूतरे को दिल्ली पुलिस व दिल्ली नगर निगम ने उजाड़ा। लक्ष्मण राव का मकसद दुकानदार बनना नहीं, साहित्यकार बनना था।

लक्ष्मण राव साहित्यकार बनने की धुन में दिन में मेहनत करता और रात को पढ़ता-लिखता। उसे पता चला कि दरियागंज में संडे को किताबों का मार्केट लगता है। वह दरियागंज की पटरी पर लगने वाले पुस्तक बाजार में संडे को किताबें ढूंढ़ता और सप्ताह भर पढऩे के लिए खरीद लेता। यहां से उसने शेक्सपीयर, पे्रमचंद, शरत आदि का साहित्य पढ़ा। इन्हें पढ़कर उसे लगा कि उसने जो कुछ लिखा है, वह कुछ भी नहीं है। इसमें भाषा बिल्कुल ठीक नहीं है। ये जो पढ़ा वह कहां और जो मैंने लिखा वो कहां? इस कमी को दूर करने के लिए वह दिन-रात पढ़ता रहता। उसने धीरे-धीरे ‘रामदास’ को इम्प्रूव किया।

उन्होंने सोचा कि अब इनका प्रकाशन कराना चाहिए। वे अपनी पांडुलिपि लेकर दरियागंज में प्रकाशकों के पास गए। यह 1978 के मध्य की बात है। उन्हें बेहद कड़ुवे अनुभव हुए।

प्रकाशकों से कहा कि यह मेरी लिखी हुई पुस्तकें हैं। इन्हें प्रकाशित कराना चाहता हूं। किसी प्रकाशक ने कहा कि पेपर नहीं है। किसी ने कोई और बहाना बनाया। एक प्रकाशक ने तो यहां तक कहा, ”गेट आउट फ्राम हियर। तुम्हें पता नहीं किताबें कैसे छपती हैं।”

प्रकाशकों के इस अपमानपूर्ण व्यवहार को उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने तय किया कि किताबें खुद ही छापनी पड़ेंगी। अगर खुद छापते हैं तो छपेंगी, नहीं तो नहीं छप पाएंगी। उन्होंने सात हजार रुपये इकट्ठा किए। जीवन की घटनाओं पर आधारित उपन्यास ‘नई दुनिया की नई कहानी’ 1979 में स्वयं खर्च कर प्रकाशित किया। उस समय दिल्ली में जमीन पचास रुपये गज मिल जाती थी। यदि वह चाहते तो इतने पैसों में मकान बना सकते थे। लेकिन उन्होंने मकान बनाने की बजाए, किताब प्रकाशित करना बेहतर समझा। लोग आश्चर्य से कहते, ”देखो, पान बेचने वाले ने किताब लिखी है।” तरह-तरह की बातें होतीं। बहुत से लोग उत्साहित होकर कहते कि देखो, पान बेच रहा है और किताब लिख रहा है। कुछ कहते कि यह सीआईडी का आदमी है, क्योंकि यह ढंग से रहता है। अच्छा बोलता है। यह पान बेच रहा है, लेकिन पान वाला लगता नहीं है। किताब भी छप रही है इसकी।

लक्ष्मण राव के पास टाइम्स ऑफ इंडिया की सीनियर रिपोर्टर उषा राय आईं। उन्होंने इंटरव्यू लिया। एक फरवरी, 1981 को टाइम्स ऑफ इंडिया की संडे मैगजीन में आलेख छपा। इसके छपते ही लक्ष्मण राव के पास जगह-जगह से पत्र आने लगे। लोग मिलने आने लगे। रेडियो-टेलीविजन वाले आए। कई लोग अंग्रेजी में बात करते। उन्हें लगता कि और अध्ययन करना पड़ेगा। पढऩा पड़ेगा। तिमारपुर पत्राचार विद्यालय में ग्यारहवीं में एडमीशन ले लिया। वहां से बारहवीं की। दिल्ली विश्वविद्यालय से एक्सटर्नल केनडीडेट के रूप में बी.ए. किया। इस समय उनकी आयु थी चालीस वर्ष।

13 जून, 1986 में उनकी शादी हुई। हर आदमी की तरह शादी के बाद लेखन में थोड़ा-बहुत व्यवधान आया। लेकिन उन्होंने लिखना-पढऩा जारी रखा। 2000 में ‘नर्मदा’  छपा।

1992 में उनका महत्वाकांक्षी उपन्यास ‘रामदास’ प्रकाशित हुआ। इसे लोगों ने बहुत पसंद किया। इसकी 2200 प्रतियां प्रकाशित कराई गई थीं।

उन्होंने ‘रामदास’ कई दुकानों और वितरकों के पास बेचने के लिए रखा। उनकी चाय की दुकान से कुछ लोग किताब ले जाते। जब वे पढ़कर आते तो गले मिलते। बहुत से पैसे भी दे जाते। इससे प्रमाणित था कि ‘रामदास’ अच्छा उपन्यास है। उन्हें लगा कि जहां-जहां ‘रामदास’ रखा, बिक गया होगा। वह दुकानदारों और वितरकों के पास गए। सबके पास ‘रामदास’ वैसे ही पड़ा था। एक-दो ने तो उपन्यास उठाकर भी नहीं देखा था। कारण पूछने पर वे बहाने बनाने लगे। उन्होंने सभी प्रतियां वापस ले लीं। वह किताबों को थैले में रखकर स्कूल-कॉलेजों के पुस्तकालय में बेचने के लिए जाने लगे। अधिकतर अध्यापक-अध्यापिकाओं ने ‘रामदास’ पसंद किया और खरीदने की इच्छा जाहिर की। इस तरह उन्होंने पांच-छह साल में ‘रामदास’ की सभी प्रतियां बेच दीं।

भारतीय अनुवाद परिषद की प्रोपराइटर नीता गुप्ता ने 15000 रुपये दिए और अगले उपन्यास को प्रकाशित करने की योजना बनाने को कहा। सन् 2000 में उपन्यास ‘नर्मदा’ छपा। इसका विमोचन परिषद के मंच पर हुआ। कार्यक्रम में कमलेश्वर, मृणाल पांडे, टी.एन. चतुर्वेदी उपस्थित थे।

एक दिन पूर्व सांसद शशिभूषण आए। उन्होंने पूछा, ”भाई, क्या तुम्हारा नाम लक्ष्मण राव है? ”

लक्ष्मण राव ने कहा, ”हां, जी।”

शशिभूषण बोले, ”तुम इंदिराजी से मिल लो। वह बार-बार कहती हैं कि ‘महाराष्ट्र से एक लड़का आया हुआ है। पेड़ के नीचे बैठकर किताबें लिखता है। तुम लोग कुछ काम नहीं करते हो।’ तुम इंदिराजी से जरूर मिल लो।”

लक्ष्मण राव ने कहा, ”मुझे वहां कौन मिलने देगा? आप अपने साथ ले चलो।”

शशिभूषण ने कहा, ”नहीं…नहीं। तुम्हें वहां सिफारिश की जरूरत नहीं है। तुम चले जाओ। तुम्हारे बारे में अखबारों में बहुत छपा है। उसकी कटिंग और अपनी कुछ किताबें ले जाना।”

लक्ष्मण राव ने जवाब दिया, ”ठीक है। मैं मिल लूंगा।”

27 मई, 1984 को त्रिमूर्ति भवन में लक्ष्मण राव को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौका मिला। इंदिरा गांधी उनसे बहुत प्रभावित हुईं। लक्ष्मण राव ने कहा कि मैं आपके बारे में लिखना चाहता हूं। इंदिरा गांधी ने कहा कि मेरे बारे में लोगों ने बहुत लिखा है। आप लिखना चाहते हैं तो हमारे कार्यकाल के बारे में लिखिए। हमारे प्रशासनकाल में क्या होता है, वो सब लिखिए। लक्ष्मण राव ने एक आउट लाइन तैयार की और दिन-रात जुटकर तीन महीने में नाटक लिखा- ‘प्रधानमंत्री’ और छाप भी दिया। 31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की हत्या कर दी गई। लक्ष्मण राव अपना नाटक उन्हें भेंट न कर सके। इसका उन्हें आज भी मलाल है।

इस नाटक के छपने के बाद लेखन के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया। अहिंदी भाषी होने के कारण उनकी भाषा अटपटी थी। आलोचकों ने भाषा में सुधार लाने पर जोर दिया। उन्होंने दिन-रात मेहनत कर भाषा को सुधार लिया।

1995 में लक्ष्मण राव का स्टाल तोड़ दिया गया। जहां उनका स्टाल था, वह जगह किसी ओर को दे दी। लक्ष्मण राव को उसी जगह जमना था। आसपास भवन बन रहे थे। हिंदी भवन, पंजाबी भवन की लेबर उनके पास चाय पीने आती थी। उन्होंने सोचा कि क्यों ने मैं हिंदी और पंजाबी भवन के सामने बैठकर चाय बेचूं। उसके बाद से वह वहां चाय बेचते हैं।

प्रकाशक अकसर शिकायत करते हैं कि हिंदी की पुस्तकें बिकती नहीं। लोगों की दिलचस्पी पढऩे में नहीं है। हिंदी का भविष्य अंधकारमय है। लेकिन अकेले लक्ष्मण राव इस अंधकार को चीरने वाली मशाल की तरह दिपदिपा रहे हैं।

यह सफेद झूठ है कि हिंदी में पाठकों की कमी है। जो समाचारपत्र कुछ बरस पहले हजारों में बिकते थे, उनकी पाठक संख्या लाखों में और कुछ की तो करोड़ों में पहुंच गई है। समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के पाठक इतनी बड़ी संख्या में हैं तो पुस्तकों के पाठकों का अकाल क्यों पड़ा है? सच यह है कि हिंदी के प्रकाशक धन कमाने के शार्टकट- सरकारी खरीद पर निर्भर हैं। उन्होंने पाठक की पूरी तरह उपेक्षा कर दी है। आप पाठक की उपेक्षा करेंगे तो जाहिर है, पाठक भी आपकी उपेक्षा करेंगे।

सरकारी खरीद में पुस्तकें जिस-तिस का प्रभाव डलवा कर और अधिकारियों को रिश्वत देकर बेची जाती हैं। रिश्वत की दर तीस प्रतिशत से लेकर चालीस प्रतिशत तक पहुंच गई है। रिश्वत में इतनी मोटी रकम तभी दी जा सकती है, जबकि किताबों की कीमतें अनाप-शनाप बढ़ाई जाएं। भ्रष्टाचार की इस आपाधापी में हिंदी पुस्तकों की कीमतें इस कदर बढ़ गई हैं कि वे बेचारे पाठक की पहुंच से बाहर हो गई हैं। वह किसी तरह जोर खाकर अपनी पसंद की पुस्तक खरीदना चाहे तो भी पुस्तक मिल ही नहीं पाती। प्रकाशक पाठक तक पहुंचने की कोशिश तो करता ही नहीं, उसे पुस्तक सुलभ भी नहीं कराता। हिंदी प्रकाशकों के लिए (और लेखकों के लिए भी) यह शर्म की बात है कि पुस्तक जैसी पवित्र वस्तु को रिश्वत के सहारे बेचा जा रहा है और साहित्य के नाम पर लाखों के घोटाले किए जा रहे हैं।

लक्ष्मण राव कहते हैं- अगर पुस्तकों की कीमतें मुनासिब रखी जाएं और उन्हें पाठकों तक पहुंचाया जाए तो हिंदी में पाठकों की कमी नहीं है। मेरे पास न कोई वितरण तंत्र है, न प्रचार तंत्र, फिर भी मैं आधे दिन परिश्रम करके अपनी पुस्तकों की 2000 प्रतियां आराम से बेच लेता हूं। इसके विपरीत पूरे वितरण तंत्र वाले प्रकाशक 500 और कभी-कभी 300 प्रतियां छाप कर ही भरपूर मुनाफा कमा लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे लेखक और पाठक के बीच सेतु की अपनी भूमिका को कतई भूल गए हैं।

लक्ष्मण राव की की दिनचर्या बेहद व्यस्त है। वह नौ बजे चाय की दुकान पर आ जाते हैं। रात नौ बजे तक चाय बेचते हैं। जिन दिनों स्कूल-कॉलेज खुले रहते हैं, ग्यारह बजे से डेढ़-दो बजे तक किताबें बेचते हैं। बहुत से लोग सलाह देते हैं कि अब चाय क्यों बेच रहे हो? उनका कहना है कि चाय की दुकान से घर चल रहा है। इस काम को कैसे छोड़ दूं। बीच में समय मिलता है तो लिख-पढ़ लेता हूं। घर जाकर देर रात तक लिखते-पढ़ता हूं। रात को नींद खुल जाती है तो फिर पढऩे या लिखने लगता हूं। उन्हें लगता है कि कोई जरूरी काम करना था, जो रह गया है। उनके जीवन का एक ही मकसद है- पढऩा और लिखना। उनकी महत्वाकांक्षा है कि उनकी किताबों को स्कूलों के कोर्स में पढ़ाया जाएं। उनके लिखने का मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि एक लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त करना है। लक्ष्मण राव की इच्छा है कि अगले दस वर्षों में लगभग 20 किताबें लिखूं। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि वह इस मकसद में कामायब होंगे।

मेरी पाठशाला

मैंने रैक में किताब के ऊपर किताब रख दी।
”अनुराग, यह क्या कर रहा है? ऐसे किताब के ऊपर किताब या कोई चीज नहीं रखते। कवर खराब हो जाता है।”
मैंने चौंककर देखा, कोई नहीं था।
मैं लेख लिख रहा था। शब्द गलत लिखा गया। मैंने उस पर चार-पांच बार पेन फेर दिया।
”यह क्या किया? एक बार पेन फेरने से नहीं पता चल रहा था कि शब्द काट दिया? गंदा करने की क्या जरूरत थी?”
मैंने सिर उठाकर देखा, कोई नहीं था।
अगस्त, 1993 का पहला सप्ताह। दिनभर जोरदार बारिश हुई थी। शाम को बारिश बंद हुई। मैं कंप्यूटर पर टाइप कराए गए अपने उपन्यास का प्रिंटआउट लेकर भीमसेन त्यागी से मिलने चल दिया।
उन दिनों मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था। मेरा रूम-पार्टनर त्यागीजी के प्रिंटिंग पे्रस में काम करता था। उसने त्यागीजी से मिलवाने की बात कही थी।त्यागीजी घर में अकेले थे। लुंगी और बनियान में। परिचय के बाद उन्होंने पूछा, ”किन-किन लेखकों की कौन-कौन-सी किताबें पढ़ी हैं?” 
मैंने बताया तो बोले, ”अभी तुम्हें बहुत पढऩे की जरूरत है। पहले खूब पढ़ो। फिर लिखने की सोचो।” 
मैंने उपन्यास का प्रिंटआउट दिखाया। उन्होंने दो-तीन पेज पढ़े। गलतियों पर निशान लगा दिए। मैं उपन्यास के नेगेटिव बनवा चुका था। केवल छपाई शेष थी। इसमें तीन-चार हजार रुपए खर्च हो गए थे। मैंने त्यागीजी को यह बात बताई।
उन्होंने सलाह दी कि यह उपन्यास मत छपवाओ। इसमें बहुत-सी कमियां हैं। इससे तुम्हें फायदा होने के बजाए नुकसान ही होगा। इसमें जो पैसा लग गया है, उसे भूल जाओ।
न जाने क्यों मेरे मन में यह बात बैठी हुई थी कि बड़े लेखक नए लेखकों को आगे नहीं आने देना चाहते। मैंने दहेज की समस्या पर उपन्यास लिखा था। मेरा खयाल था कि यह उपन्यास समाज को नई दिशा देगा और दहेज समस्या के समाधान में सहायक होगा। मुझे लगा कि त्यागीजी ने इसे जान-बूझकर खारिज कर दिया है। इसलिए मुझे उनकी सलाह अच्छी नहीं लगी। मैं मायूस होकर लौटा, लेकिन उपन्यास छपवाया नहीं।
त्यागीजी के बहनोई वेदप्रकाश त्यागी बिजली विभाग (अब पावर कारपोरेशन) में कार्यरत हैं। मेरे पापा बिजली विभाग से रिटायर हुए हैं। वेदप्रकाशजी से करीब 27-28 साल पुराने संबंध हैं। 1992 में मैंने पालीटैक्निक की। मैं नौकरी के लिए उनके पास नोएडा आ गया। उन्होंने एक फैक्ट्री में नौकरी लगवा दी।
उन दिनों पापा मवाना, मेरठ में कार्यरत थे। मवाना के नजदीक पेपर मिल खुली। मैं वापस चला गया। वहां आठ-नौ महीने काम किया। एक तो वेतन बहुत कम मिल रहा था, दूसरे पापा रिटायर होनेवाले थे। छोटा भाई आईटीआई कर रहा था। उसके सामने नौकरी की समस्या आनेवाली थी इसलिए वहां नौकरी छोड़ मैं दोबारा नोएडा आ गया। मैं वेदप्रकाशजी के साथ रहकर नौकरी ढूंढऩे लगा। तीन-चार महीने उनके साथ रहा। त्यागीजी उनके यहां आते-जाते रहते थे। वेदप्रकाशजी के बच्चे उन्हें मामाजी कहते, तो मैं भी मामाजी कहने लगा।
एक दिन मामाजी वेदप्रकाशजी के यहां आए थे। उन्होंने मुझे पेन-कागज लेकर बुलाया। मैंने सोचा कि वह कुछ लिखवाना चाहते हैं। उन्होंने तीन-चार लाइनें बोलीं और कागज ले लिया। वह मेरी हैंडराइटिंग देखना चाहते थे। इससे संतुष्टï हुए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जब तक नौकरी नहीं लग जाती, हमारे यहां काम कर लिया कर। कुछ पेमेंट कर दूंगा। इससे आने-जाने का और जेब-खर्च निकल जाएगा। वह साप्ताहिक पत्र ‘जनचेतना’ और साक्षरता अभियान के लिए ‘नवसाक्षर चेतना’ प्रकाशित कर रहे थे। प्रिंटिंग पे्रस चल रहा था। मुझे इनके लिए काम करना था।
मैं प्राय: रोज सुबह उनके यहां चला जाता। ग्राउंड फ्लोर पर पे्रस थी। फस्र्ट फ्लोर पर वे रह रहे थे। छत पर एक छोटा कमरा बना हुआ था। असल में वह रसोई थी। लेकिन ऊपर-नीचे बार-बार आने-जाने में ज्योति भाभी (उनकी पुत्रवधू) को दिक्कत होने के कारण रसोई नीचे ही बना ली। ऊपरवाली रसोई को मामाजी पढऩे-लिखने के कमरे के रूप में इस्तेमाल करने लगे। इसी में किताबों की रैक लगा दी गईं।
यह वह दौर था, जब परिवार पर लगातार आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा था। पे्रस बंद होने के कगार पर पहुंच गया था। ऐसा भी होता कि दो-ढाई सौ रुपए के चलते प्रिंटिंग का आर्डर पूरा न हो पाता और घाटा उठाना पड़ता। पे्रस को जिंदा रखने के लिए हर संभव प्रयास किया गया। जरूरत पडऩे पर मित्रों और रिश्तेदारों से कर्ज लिया गया। मगर तमाम प्रयासों के बावजूद पे्रस अंतत: बंद हो गया और पीछे छोड़ गया मोटा कर्ज। 
मामाजी 1984 के अंत में नोएडा आ गए थे। किराए पर रहे। 1987 में डी-180, सेक्टर-10 की बिल्डिंग खरीदी। 1988 में बेटे विवेक त्यागी ने एम।ए. कर ली। उत्तरप्रदेश फाइनेंस कारपोरेशन से लोन लेकर पे्रस लगाया- चेतना पे्रस। इसके पीछे मकसद था कि बेटा पे्रस संभाल लेगा। आय का साधन हो जाएगा और वे अपना समय लिखने-पढऩे में लगाएंगे। मामाजी का यह सपना फलीभूत नहीं हो सका। अव्यवस्था के कारण पे्रस घाटे में जाने लगा। तमाम तरह की दिक्कतें आने लगीं और मानसिक शांति छिन्न-भिन्न हो गई।
यूपीएफसी की किश्तें समय पर नहीं जा पा रही थीं। पेनल्टी लग गई। नौबत आ गई कि यदि आज पैसा जमा नहीं हुआ तो नोएडा प्राधिकरण फैक्ट्री सील कर देगा।
सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले मैं वहां गया। घर पर केवल मामीजी थीं। घर के बाकी सदस्य पैसे की व्यवस्था करने के लिए गए थे। मामीजी की आंखें भरी थीं। कागजात और आवश्यक सामान एक जगह रख लिया गया था कि दुर्भाग्यवश अगर फैक्ट्री सील हो जाती है तो कम-से-कम जरूरी सामान बाहर निकाला जा सके। हर किसी के जहन में एक ही सवाल था- अब क्या होगा! मैं चुपचाप मामीजी की बातें सुनता रहा। सांत्वना देने की स्थिति में भी नहीं था क्योंकि पैसे की समस्या तो पैसे से ही हल हो सकती थी। मैं काम पर चला गया। सारे दिन मन बेचैन रहा। रह-रहकर खयाल आता कि आज क्या होगा! शाम को वापस आया। जानकारी मिली कि आवश्यक पैसों का इंतजाम हो गया और यूपीएफसी में जमा करा दिया है। फैक्ट्री सील होने से बच गई है। राहत की सांस ली। दिन था 19 सितंबर, 1994। मामाजी का जन्मदिन। परिस्थितियां ऐसी थीं कि सुबह शुभकामना नहीं दे पा रहा था। शाम को बधाई दी।
तत्कालीन संकट तो टल गया, लेकिन उधार की राशि में मोटा इजाफा हो गया। 1995 में प्रिंटिंग पे्रस बेचनी पड़ी। उससे जो पैसा मिला, वह कर्ज के सामने ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ। परिवार पर आर्थिक और उससे भी ज्यादा मानसिक दबाव बढ़ गया।
ऐसी विषम परिस्थितियों में किसी का भी धैर्य चुक सकता था लेकिन मामाजी ने साहस से मुकाबला किया। उन्हें इस मुद्दे को लेकर हमने न कभी झींकते देखा और न घबराते। बाहर का आदमी तो जान भी नहीं सकता था कि यह परिवार इस समय किन कांटों-भरी राह से गुजर रहा है।
कुछ दिनों बाद मैं उन्हीं के साथ रहने लगा। मामाजी ने ऊपरवाला कमरा मुझे दे दिया। खुद नीचे ही सोने और पढऩे-लिखने लगे। परिवार के सभी सदस्य बहुत अच्छे हैं, इसलिए जल्द ही आत्मीय संबंध हो गए।
मामाजी के साथ रहते हुए सही मायनों में ‘लेखन की पाठशाला’ में भर्ती हुआ। मेरी भाषा में अशुद्धियां थीं। कभी-कभी शब्दों के चयन में गलती कर देता। उन्होंने मेरी शिक्षा के बारे में पूछा। कहने लगे कि तुझे किसी ने भाषा का ज्ञान नहीं दिया और न ही ऐसा माहौल मिला, इसलिए गलती करता है। लेकिन इसमें घबराने की कोई बात नहीं।
मामाजी ने भाषा सुधारने पर बहुत जोर दिया। उनका कहना था कि जिसकी भाषा ही भ्र्रष्टï है, वह कैसा लेखक? लेखक का भाषा पर पूरा अधिकार होना चाहिए। कुछ बड़े लेखकों की भाषा में बाद तक भी अशुद्धियां रह जाती हैं, लेकिन इसे आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता। रचना में भाषागत अशुद्धियां होंगी तो संपादक तुझे लेखक मानने से इनकार कर देगा और रचना पर विचार भी नहीं करेगा, इसलिए सबसे पहले भाषा पर ध्यान दे। मैं तेरी रचनाएं देखकर गलतियों पर निशान लगा दिया करूंगा। एक कॉपी पर इन्हें नोट करते रहना। सही शब्द को कम-से-कम पांच बार लिखना। धीरे-धीरे यह कमी दूर हो जाएगी। किसी शब्द को लेकर कनफ्यूजन हो सकता है। वह गलती क्षम्य है, लेकिन सामान्य शब्दों में गलती नहीं होनी चाहिए। 
परिवार पर आर्थिक दबाव बेहद बढ़ गया था। सवाल उठा कि इससे कैसे छुटकारा पाया जाए। परिवार के सभी सदस्य इस पर चर्चा करते। योजना बनती, बिगड़ती। लेकिन कोई उचित समाधान नहीं मिल रहा था। कर्जा लाखों में था। उसमें पांच-दस हजार रुपए महीने की आमदनी से कुछ होनेवाला नहीं था। काफी सोच-विचार कर मामाजी ने फैसला किया कि वह मुंबई जाकर फिल्मी लेखन करेंगे।
मामाजी फिल्मी लेखन को अच्छा नहीं मानते थे। लेकिन समस्या का समाधान तो करना ही था। उन्होंने तय किया कि मुंबई केवल तब तक रहेंगे, जब तक कर्जे का एक बड़ा भाग चुकता न हो जाए।
वह सितंबर, 1995 में मुंबई चले गए। बीच-बीच में नोएडा आते। पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 13 अपै्रल, 1997 को मेरी शादी हुई। उनके आने का कार्यक्रम था, नहीं आ पाए। 9 अपै्रल का लिखा उनका पत्र मिला। शादी में परिजनों, मित्रों ने अपने-अपने तरीके से शुभकामनाएं दीं, बधाइयां दीं और उपहार दिए। लेकिन मामाजी ने जो शुभकामनाएं दीं, वे मेरे लिए अद्भुत हैं। उन्होंने लिखा, ”विवाह का निमंत्रण मिल गया है। मेरा आने का पक्का इरादा था। 5 तारीख का रिजर्वेशन भी करा लिया था। लेकिन यहां कुछ अर्जेंट काम ऐसा आ गया कि रिजर्वेशन कैंसिल कराना पड़ा।
”मैं शरीर से नहीं आ सकूंगा, लेकिन मन से उत्सव में ही रहूंगा। कामना करता हूं- तुम्हारा वैवाहिक जीवन सुखी, समृद्ध तथा यशस्वी हो।
”आशीर्वाद की औपचारिकता मुझे नहीं आती, लेकिन मेरा आशीर्वाद तो साक्षात तुम हो!”शादी के बाद बहू के साथ मुंबई घूमने आओ।
”अमित स्नेह- तुम दोनों को!” 
डी-180 कोने की बिल्डिंग है। आर्थिक दबाव से छुटकारा पाने के लिए सड़क की ओर दुकानें निकाल दी गई थीं। फैक्ट्री के पीछे एक लंबी दुकान निकली। उसमें शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने फोटोस्टेट की मशीन लगाई हुई थी। उसने प्रस्ताव रखा कि सभी दुकानदार मिलकर पांच-छह लाख रुपए दे देंगे। आप लिखकर दे दो कि यह जगह तुम्हें दी जा रही है। मालिकाना हक आपका ही रहेगा। परिवार के कुछ सदस्यों को यह प्रस्ताव अच्छा लगा। इसमें उन्हें कुछ बुराई नहीं दिखाई दी, तत्कालीन संकट में थोड़ी राहत मिल रही थी। लेकिन मामाजी की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने विवेकजी से कहा, ”बेटे, शर्मा की नीयत ठीक नहीं है। यह फैक्ट्री कब्जाना चाहता है। सबसे पहले इसे नोटिस देकर यहां से निकालो। यह यहां रहेगा तो और दुकानदारों को भी उल्टी-सीधी पट्टïी पढ़ाता रहेगा।” दुकानदारों से सिक्योरिटी और किराया एडवांस लिया हुआ था। उसको निकालने के लिए करीब पच्चीस हजार रुपए की जरूरत थी। इस बात से मामाजी घबराए नहीं। उन्होंने जैसे-तैसे पैसे का इंतजाम किया और शर्मा को अलविदा कह दिया।
विवेकजी एक दैनिक समाचारपत्र में नौकरी कर रहे थे। भाभी किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही थीं। दोनों की सीमित आय से लाखों का कर्जा उतारना असंभव था। दूसरी ओर बच्चे बड़े हो रहे थे। खर्चा भी बढ़ रहा था। इसका एक ही उपाय था कि अपना कोई काम किया जाए और इस तरह अक्तूबर, 1999 को शुरू हुआ ‘ज्योति ग्राफिक्स’। एक छोटी फोटोकॉपी की मशीन लगाई गई। शुरू-शुरू में समस्याएं अधिक आईं। एक तो अनुभवहीनता, दूसरे कभी मशीन खराब तो कभी कोई और तकनीकी समस्या। मशीन एक ही थी। कोई खराबी आ जाती तो काम ठप्प हो जाता।
जुलाई, 2000 को मामाजी मुंबई से आए हुए थे। मैं मिलने गया।
”यहां कुछ काम नहीं हो पा रहा है। इससे मुंबई ही अच्छे थे। वहां से तो यह सोचकर आया था कि यहां अनुराग जैसे बच्चों से मुलाकात होती रहेगी, लेकिन वह तो दुर्लभ हो गया है।” मामाजी ‘वर्जित फल’ के पन्नों को देखते हुए बोले।
मैंने बताया कि इंटरव्यू के चक्कर में लगा था। इस वजह से नहीं आ पाया।
उनकी नजर पांडुलिपि के पेज नंबर 196 पर पड़ी। वह उलटा लगा था। ”यह कैसे हो गया? वैसे तो कंपोजिंग करते समय ऑपरेटर भी इसे ठीक कर लेता। लेकिन ऐसी गलती हो कैसे गई?” वह टैग से पेज निकालने लगे।
ज्योति भाभी आ गईं। बोलीं, ”आज पापा का उपन्यास पूरा हो गया है। मैं कितनी देर से कह रही हूं कि ऊपर जाकर आराम से बैठकर काम कर लो, लेकिन जा नहीं रहे। पसीने से कैसे भीगे हुए हैं।”
मामाजी ने पेज सीधा किया और टैग लगाते हुए बोले, ”इस बात का भी बहुत असर पड़ता है कि पांडुलिपि नीट और क्लीन हो। खासकर शुरुआती दौर में।” वह आगे बोले, ”यह उपन्यास पूरा हो गया है। अब मैं अपना बड़ा उपन्यास शुरू करूंगा। उसे शुरू करने का उत्साह जरूर है। यदि बड़ा उपन्यास शुरू कर देता तो यह अधूरा रह जाता। मैंने निश्चय कर लिया है कि साल में कम-से-कम छह किताबें पूरी करूंगा। भले ही छपें नहीं, लेकिन प्रकाशक के पास तो चली जाएं। किताबें तैयार हैं। थोड़ा-बहुत काम करना है। कुछ मैटर कट जाएगा तो कुछ बढ़ जाएगा।”
 फोटोस्टेट मशीन खराब थी। मामीजी गुस्से में बोलीं, ”यह मशीन राक्षस हो गई है। जितना कमाती है, उतना खा जाती है।”
मामाजी मुस्कुराए, ”अनुराग, तुझे एक किस्सा सुनाता हूं। हमारे एक परिचित ने गाड़ी ली। उसका रजिस्ट्रेशन देहरादून कराया। इसका नियम है, जहां का रजिस्ट्रेशन होगा, वहीं से रिन्यू कराना होता है। वह रिन्यू कराने देहरादून जा रहे थे। जो भी मिलता, उसी से कहते, ‘चल तुझे देहरादून घुमा लाऊं।’ लोगों ने सोचा- आना-जाना फ्री है और जो ले जाएगा खाना उसके जिम्मे रहेगा ही। कई लोग तैयार हो गए।”
देहरादून में बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। एक कोठी में आरटीओ का दफ्तर था। वहां आम के कई पेड़ थे। एक पेड़ के नीचे सभी बैठ गए। आम पके हुए थे। एक कौवा पेड़ पर बैठा था। वह जैसे ही डाल हिलाता, आम टप से नीचे। एक आदमी बड़ा खुश होता हुआ आम सबकी ओर बढ़ा देता, ‘लो जी, आप भी खाओ। आप भी लो।” वह ऊपर की ओर देखते हुए बोला, ‘वाह! काकभुशंडीजी वाह! वाह! काक ऋषिजी, वाह!’ थोड़ी देर में आम गिरने बंद हो गए। उसने ऊपर देखा। कौआ उड़कर दूसरे पेड़ पर चला गया था। वह गुस्से में चिल्लाया, ‘कौआ ढेढ़ उड़ गया।’ ”
कहकर वे जोर से हंसे, ”यही तेरी मामी का हाल है। कल कह रही थी कि यदि ऐसे ही मशीन चलती रही तो एक-डेढ़ साल में कर्जा चुकता हो जाएगा। आज मशीन खराब हो गई तो उसे राक्षसी बना दिया।” 
मैं प्रकाशित रचनाओं की कटिंग मुंबई भेजता रहता था। मैंने पत्र में वहां आने की इच्छा जाहिर की और कहानी ‘भूख’ भेजी।
मामाजी ने 12 जून, 1997 को भेजे पत्र में लिखा, ”तुम्हारे पत्र और कहानी सब मिले। कटिंग्स भी समय-समय पर मिलती रहीं। तुम्हारी लिखने की प्रगति देखकर संतोष होता है। लेकिन अभी तुम्हें बहुत गहरे अध्ययन और मनन की आवश्यकता है।
”कहानी ‘भूख’ मैंने आते ही उत्सुकतापूर्वक पढ़ी थी। आज फिर पढ़ी। यह दैहिक स्तर पर ही अटक गई है। मानव-मन की किसी सूक्ष्म अनुभूति का स्पर्श नहीं करा पाती। दिक्कत यह है कि इसमें समस्या का गांभीर्य स्थापित नहीं होता। और, समस्या ही स्थापित नहीं होगी तो कहानी का आधार क्या होगा? सवाल समस्या के छोटी या बड़ी होने का नहीं। महत्वपूर्ण सवाल उसे गंभीरता से फील करने और कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने का है। राष्टï्रीय तथा अंतरराष्टï्रीय महत्व के मुद्दों पर बहुत निकृष्टï कहानियां लिखी गई हैं और एक साधारण-सी घटना पर मास्टरपीस।
”मेरी राय है कि तुम लिखने में जल्दबाजी न करो। जो भी थीम आए, उसे धीरे-धीरे अनुभूति की आंच पर पकने दो। बहुत लगन से अच्छा साहित्य पढ़ो, तभी महत्वपूर्ण रचनाएं आएंगी।
”तुम्हारे यहां आने का प्रस्ताव मेरे लिए खुशी का बायस है। लेकिन यह बहुत महंगा और बेमुरव्वत शहर है। यहां भयानक संघर्ष है और संघर्ष का समापन किसी सार्थक उपलब्धि में नहीं, फ्रस्ट्रेशन में होता है। यह सब मैंने यहां आकर नहीं जाना, पहले से ही जानता था। इसीलिए बहुत थोड़े समय के लिए आर्थिक दबाव के कारण आया। अब ज्यादा समय यहां नहीं रहूंगा। ऐसे में तुम्हें आने की सलाह नहीं दे सकता। बेहतर है, वहीं किसी फैक्ट्री में सर्विस देख लो। साहित्य को आजीविका का साधन मत बनाओ। यह बहुत कठिन है। मैं इतना काम करके भी आज तक नहीं बना सका।”अपनी किताबों के प्रकाशन की चिंता मुझे भी है। लेकिन डेढ़ साल में एक बार भी दिल्ली नहीं आ सका। जब भी आऊंगा, तभी यह काम हो सकेगा! इनके अलावा जो किताबें फाइलों में हैं, उनकीभी व्यवस्था करनी है।”
वह दुर्भाग्यवश ये दोनों काम नहीं कर पाए। 
जैसा कि मामाजी ने लिखा था वह ज्यादा दिन मुंबई नहीं रुके और जनवरी या फरवरी, 2001 को मुंबई को अलविदा कहकर वापस आ गए।
 
मामाजी छठे दशक के अंत में इलाहाबाद गए थे। वहां उनकी भेंट श्री भारतीय से हुई थी। श्री भारतीय ने 1935 में लेखन कला की मासिक पत्रिका ‘लेखक’ का प्रकाशन किया था। उन्होंने ‘लेखक’ के चार अंक भी दिखाए। मामाजी ने इस तरह की पत्रिका के प्रकाशन पर जोर दिया तो श्री भारतीय ने चारों अंक उन्हें दे दिए और कहा कि आप इसका पुनप्र्रकाशन कर सकें तो अवश्य कीजिए। मामाजी ने वादा कर लिया। उनके मन में रह-रहकर बात उठती कि ऐसी पत्रिका जरूर निकलनी चाहिए।
एक दिन उन्होंने ‘लेखक’ के अंक दिखाए और ये सब बातें बताईं। मैंने अंक देखे। अपने तरीके की विशिष्ट पत्रिका लगी। बिल्कुल नया कलेवर। उसमें सभी महत्वपूर्ण लेखकों ने लिखा था। पे्रमचंद ने भी लिखा था।
मामाजी बोले, ”मैं नए लेखकों के लिए इस तरह की पत्रिका निकालना चाहता हूं। इसमें तुझे मदद करनी होगी। लघु पत्रिका निकालना घरफूंक तमाशा देखना है। कोई आर्थिक लाभ इससे नहीं हो सकेगा। सोच-समझ ले।”
मैंने हर संभव सहयोग देने का वादा किया।
उन्होंने पत्रिका की रूपरेखा बनाई। प्रपत्र तैयार किया। लेखक-मित्रों को भेजा। कुछ के घर गए। उनसे रचनाएं लीं। इस तरह ‘भारतीय लेखक” की शुरुआत हुई। जनवरी, 2003 में पहला अंक निकला और इस तरह करीब पांच दशक बाद उन्होंने अपना वादा पूरा किया।
‘भारतीय लेखक’ निकालने का मकसद केवल एक वादा पूरा करना नहीं था। वह गोर्की और अन्य देशी-विदेशी लेखकों का उदाहरण देकर कहते थे कि हर रचनाकार को सृजनात्मक लेखन के साथ-साथ नए लेखकों को भी आगे बढ़ाना चाहिए, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। वे नए लेखकों के प्रति अपने दायित्व को लेकर सजग थे। ‘भारतीय लेखक’ में एक खंड ‘नए लेखकों के लिए’ रखा। इसमें लेखन संबंधी रचनाएं प्रकाशित करते।
‘भारतीय लेखक’ के प्रवेशांक के संपादकीय में उन्होंने पत्रिका निकालने के औचित्य पर लिखा था, ”पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक और पत्रिका की क्या सार्थकता है? यह सवाल बार-बार प्रायोजकों के सामने आया और हर बार एक ही उत्तर मिला- रचना की आंतरिक प्रक्रिया तथा लेखकीय संघर्ष से संबद्ध कुछ ऐसे अहम सवाल हैं, जिनका हर सृजनशील लेखक को सामना करना पड़ता है। उन सवालों के उत्तर न इन पत्रिकाओं के पास हैं, न अकादमियों के पास और न इन लेखक-संघों के पास। उन सवालों के सार्थक उत्तरों की खोज में अंतत: लेखकों को जूझना पड़ता है। इस खोज का ही विनम्र किंतु सजग प्रयास है ‘भारतीय लेखक’।”
इसके अलावा ‘भारतीय लेखक’ के माध्यम से वह हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को एक मंच प्रदान करना चाहते थे। वह कहते थे कि यह केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सचमुच में ‘भारतीय लेखक’ हो। इसके लिए उन्होंने गैर-हिंदीभाषी लेखकों से सहयोग लिया और अन्य लेखकों से संपर्क कर रहे थे।
‘भारतीय लेखक’ का एक महत्वपूर्ण और चर्चित स्तंभ ‘विशिष्ट लेखक’ है। इसमें लेखक का आत्मकथ्य, उसकी एक रचना, रचना-प्रक्रिया, रचनाओं पर मूल्यांकनपरक लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदि प्रकाशित किए जाते हैं। इसका मकसद एक ओर किसी लेखक को फोकस करना, दूसरी ओर लेखक की रचना-प्रक्रिया और आत्मकथ्य के माध्यम से नए लेखक के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना है।
मामाजी का कहना था कि ‘विशिष्ट लेखक’ में जेनुइन राइटरों को लिया जाए, दंदफंद से महापुरुष बन बैठे लेखकों को नहीं। यही कारण है कि उन्होंने शेखर जोशी जैसे सहज, सरल और कलम के धनी लेखक को प्रवेशांक में लिया। ‘महापुरुषोंÓ को तो उन्होंने विशिष्टï लेखक की सूची में भी शामिल नहीं किया।
‘भारतीय लेखक’ की सामग्री ही नहीं, ले-आउट का भी साहित्य जगत में जोरदार स्वागत हुआ। साहित्य-पे्रमियों ने इसे हाथों-हाथ लिया। मामाजी के देहांत तक ‘भार