मेरठ : शमशेर की कविता फिलहालियत की कविता नहीं। शमशेर की कविता को जरा गौर से पढ़ना होगा। उनकी कविता अन्तःकरण में सीधे नहीं उतरेगी, उससे सम्वाद करने के लिए विशेष तरह की तैयारी की जरूरत है। ये विचार 3 जनवरी, 2012 को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता’ के उद्घाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जानी-मानी आलोचक प्रोफेसर निर्मला जैन ने व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि यह गौरव की बात है कि इतना बड़ा कवि स्थानीय स्तर पर हुआ। शमशेर की स्थिति दो मेडों पर खड़े हुए कवि की स्थिति है। उन्होंने वामपन्थी और प्रेम दोनों ही तरह की कवितायें लिखीं। उन्हें रूप का कवि, एन्द्रियता का कवि तथा बिम्बों का कवि कहा गया। शमशेर उनमें से एक हैं जिन्होंने ऊँचाई ग्रहण की। उन्होंने कहा कि हम सभाओं, संगोष्ठियों में वही कह रहे हैं जो अब से पहले शमशेर के सन्दर्भ में कहा गया है। आज जरूरत इस बात की है कि शमशेर की कुछ ऐसी कवितायें खोजी जायें जो सीधे-सीधे पर्यावरण नष्ट होने की समस्या से, बाजारवाद से, भूमण्डलीकरण से सम्बन्ध रखती हों। जिन्होंने उन्हें आज का कवि बना दिया है। कुछ शोधार्थी उनके अनदेखे पक्षों पर शोध करें।
उन्होंने कहा कि मैं आज तक यह समझ नहीं पाई कि शमशेर को ‘कवियों का कवि’ क्यों कहा गया है। शमशेर जनता के कवि हैं, पाठक मात्र के कवि हैं। ‘हम न बोलेंगे-बात बोलेगी’ जैसी उनकी पंक्ति से पता चलता है कि यहाँ व्यक्ति का महत्व नहीं, बल्कि रचना का महत्व है। शमशेर की कविता हिन्दी कविता में स्वाभिमान व निर्भयता की आवाज है- इसलिये वह कवियों के कवि हैं। शमशेर की कविता में बड़े धीमे-धीमे गाड़ी चलती है जो हिन्दी कविता की निर्भयता की अदम्य आवाज है। शमशेर के यहाँ कविता मनुष्य की सबसे अदम्य आवाज है, वह समयबद्ध होते हुए भी समयातीत है। शमशेर ने कहा भी है कि ऐतिहासिक राजनीति को परास्त करती हुई कविता भाषा की कालातीत राजनीति है। कुछ कवि शमशेर को अपना मॉडल बनाकर उनके जैसी कविता करना चाहेंगे। यदि यह कवि किसी का आदर्श है तो उसका आदर्श कौन है? वह हैं निराला। निरला और शमशेर में समानता यह है कि दोनों समतल नहीं हैं। हर बड़ा कवि अनुकरणीय नहीं होता। निराला और शमशेर का कोई अनुकरण नहीं। उनको कवियों का कवि कहने वाले कवि भी उनका अनुकरण नहीं कर सके।
प्रोफेसर निर्मला ने कहा कि शमशेर वो नदी हैं जिस पर पुल नहीं बनता। शमशेर ऐसे कवि हैं जो सोहबत से समझ में आते हैं, धीरे-धीरे आपको गिरफ्त में लेंगे, धीरे-धीरे प्रभाव डालेंगे। पचास साल तक शमशेर ने निरन्तर कविता लिखी। ‘एक पीली शाम’, ‘बेठौस’, ‘एक आदमी’, ‘उषा’, ‘कत्थई गुलाब’, ‘एक नीला दरिया बरस रहा’ तथा ‘बैल’ उनकी प्रसिद्ध कवितायें हैं। ‘बैल’ कविता कवि की आत्मस्वीकृति है। शमशेर गहन संवेदनशीलता के कवि हैं, उनके अनुभवों पर विचार हावी नहीं होता। शमशेर की कविता गढी़ हुई नहीं- विचार उनपर हावी नहीं होता। प्रेम की पीडा़, अकेलेपन का अवसाद ये जीवन निरपेक्ष नहीं है। शमशेर बाहर तक पीडा़ का विस्तार करते हैं। जितने शोकगीत शमशेर ने लिखें शायद ही बाद के किसी कवि ने लिखे हों। एक मित्र के दिवंगत शिशु की याद में भी उन्होंने शोकगीत लिखा। उनकी एक भी ऐसी कविता नहीं जहाँ किसी के प्रति कोई काँटा हो, किसी का अपमान हो। उन्होंने कहा कि उनकी भाषा सीमित काव्य भाषा नहीं, बल्कि स्थापत्य, चित्र और संगीत उनकी भाषा में है। उन्होंने ग्रीक भाषा पर कविता लिखी, मणिपुरी भाषा की ध्वनियों पर कविता लिखी। उनकी लय शब्दों की नहीं, अर्थ की लय हुआ करती थी। उन्होंने खड़ीबोली को बोली की तरह इस्तेमाल किया- ‘निंदिया सतावै मौहे।’ अंत में उन्होंने कहा कि शमशेर को पूरा नहीं बल्कि चयन करके पढ़ना चाहिए, उनके पोजेटिव को ही ग्रहण करना चाहिए।
दिल्ली से आए डॉक्टर रामेश्वर राय ने कहा कि शमशेर की कविता विशेष तैयारी की मांग करती है। शमशेर की कविता के कथ्य ज्यादा परिचित नहीं। कथ्य का अपरिचयपन ही जटिलता है। विजय देव नारायण साही ने कहा है कि शमशेर बुनियादी रूप से दुरूहता के कवि हैं। प्रोफेसर राय ने मलयज की पंक्तियाँ व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता की कुछ निजी माँगें हैं। शमशेर की कविता का संसार आपा-धापी वाले संसार से बिलकुल अलग है। सामान्यतः शमशेर की चर्चा प्रगतिवादी कवि के रूप में होती है। वह- अज्ञेय-मुक्तिबोध-शमशेर – नागार्जन-मुक्तिबोध-शमशेर- दोनों तरफ की त्रयी में आते हैं। शमशेर सौंदर्य के कवि हैं तथा साथ ही मार्क्सवादी रचनाकार भी। उन्होंने कहा कि हमें यह देखना है कि शमशेर मार्क्स के बारे मे क्या कहते हैं ? मार्क्स के साथ उनकी कविता का क्या सम्बन्ध है ? इन प्रश्नों के संकेत देते हुए शमशेर ने कहा है- ‘मैं उस अर्थ में कभी मार्क्सवादी नहीं रहा जिस अर्थ में मेरे प्रगतिशील कवि रहे हैं। मार्क्सवाद मेरी जरूरत थी, मार्क्स ने मुझे उबारा।’ मार्क्सवाद उनकी पूरी अन्तश्चेतना पर छाया हुआ था और वह कहते थे कि मुझे हर वह चीज आकर्षित करती है जो मेरी प्रकृति से भिन्न है। मार्क्स के प्रति उनका रूझान प्रकृति की भिन्नता के कारण है। उन्होंने दर्जनों कविता मार्क्सवाद पर लिखी इसलिए मार्क्सवादी सिद्ध हो सकते हैं। उनकी ऐसी ही कविताओं को नामवर सिंह ने प्रमाणवाद की कविता कहा है। कविताओं के आधार पर यह कहना कठिन नहीं कि उन्होंने मजदूरों पर, आन्दोलनों पर, प्रभातफेरियों पर कवितायें लिखीं। शमशेर की कविता वैयक्तिकता की कविता है या निजता की कविता है। यह देख कर ही 1956 में नामवर सिंह ने उनकी कविताओं को एकालाप की कविता कहा है। उदय प्रकाश ने कहा था कि शमशेर प्रेम के अद्वितीय रचनाकार हैं। उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक कविता में अपने साथियों पर लिखा, राजनीति पर लिखा। यह सोचने का विषय है कि प्रेम का इतना बड़ा कवि प्रेम या प्रकृति पर लिखते हुए कोई प्रतिरोध पैदा करता है या नहीं। प्रेम के वह बहुत वाचाल कवि हैं। उनकी पंक्तियां है- ‘तुम मुझसे प्रेम करो, जैसे मछलियाँ पानी से करती हैं। तुम मुझसे प्रेम करो, जैसे मैं तुमसे करता हूँ।’ यह साफगोई शमशेर में बच्चन से भी कई अधिक दिखाई देती है। एक खास तरह की सघन एन्द्रियता उनके काव्य में दिखाई देती है। शमशेर ने कई जगह अपने अकेलेपन की चर्चा की है- ‘कोई पास नहीं, वजूज एक सुराही के, वजूज एक चटाई के, वजूज एक आकाश के।’ प्रोफेसर राय ने कहा कि शमशेर सिर्फ एक सुराही, सिर्फ एक चटाई, सिर्फ खुले आकाश के साथ अकेले रह सकते हैं। खुश रहने की जो यह स्वीकृति है, साहस है, वह बाजार की पूरी संग्रहकारी बाजारवादी संस्कृति के विरोध में है। शमशेर की कविता अकादमिक विचारधारा की कविता नहीं, बल्कि ऐसी कविता है जो मनुष्य की विडम्बनाओं को देखती है।
डीन कलासंकाय प्रोफेसर आरएस अग्रवाल ने कहा कि शमशेर ने अनुभव व विचार को आख्यान में बदल दिया, इस तथ्यात्मक प्रस्तुति को हम आख्यान कहते हैं, यह कहानी नहीं। शमशेर अपने आप में एक संस्था थे, संस्था वही होता है जिसके इर्द-गिर्द बहुत सी प्रतिभायें घुमती हैं। हम उन्हें संस्था के रूप में देखकर विचार करें। उनके व्यक्तित्व, रचनाशीलता का मूल्याँकन यदि निष्पक्ष रूप से किया जाये तो शमशेर एक संस्था के रूप में दिखाई देंगे। उद्घाटन सत्र का संचालन ललित कुमार सारस्वत, परियोजना अध्येता, उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र, हिन्दी विभाग ने किया।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र ‘शमशेर की कविता के विविध आयाम’ की अध्यक्षता करते हुए कवि लीलाधर जगूडी ने कहा कि शमशेर को समझने के लिए खास तैयारी की जरूरत है। शमशेर से टक्कर लेनी चाहिए। वह शब्दों को गायब कर देते हैं, जैसे- ‘एक नीला आइना बेठोस।’ – इससे वह केवल आकाश कहना चाहते हैं और आकाश जिस दिन ठोस हो जाएगा तो मैं हाथ-पैर भी नहीं हिला पाऊँगा। ऐसा बिम्ब पूरे साहित्य में नहीं मिलता। उन्हें समझने के लिए उनकी भाषा को, बिम्बों को जानना होगा। शमशेर ने निराला के बाद एक नई काव्य भाषा का निर्माण किया। निराला की भाषा को ढकेलते हुए शमशेर ने उस भाषा में सुन्दर और शानदार कविता रची। वह प्रतिरोध के कवि हैं। उन्होंने मार्क्सवाद को भी कविता से अलग किया। शमशेर ने कहीं न कहीं प्रगतिशीलता को मार्क्सवादी दृष्टिकोण से अलग किया। ‘अब गिरा, अब गिरा वह अटका हुआ, सान्ध्यतारक सा’, इन पंक्तियों में जीवन की, प्रेम की, बहुत बड़ी व्यंजना मिलती है।
डॉक्टर जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि एक नये कवि के रूप में जब मैं उन्हें देखता हूँ, कविता की कला सीखने के लिए मैं जिन लोगों के पास जाता हूँ उनमें पहला नाम शमशेर का है। उनकी कविता अपने आप को पहचाने का सलीका सीखाती है। आप सीखते जायेंगे कि एक अच्छी कविता के क्या-क्या गुण हों? आप सौन्दर्यवादी हो या मार्क्सवादी हो, आप को बस कविता की बेसिक समझ होनी चाहिए। कविता की फॉर्म में लिखी हुई हर कविता कविता ही हो यह जरूरी नहीं, कविता की पहचान है कि वह सिखाती है। क्या कविता है और क्या कविता नहीं यह शमशेर की कविता के साथ जुड़ने पर साफ हो जाता है। शमशेर की कविता ऊँचाइयों के लिए दम भरती है, ये क्रान्तिकारी कवितायें हैं या सौन्दर्यवादी कवितायें, इस पर विचार किया जाना चाहिए।
प्रोफेसर दुर्गाप्रसाद गुप्त ने कहा कि शमशेर की पूरी कविता पर पश्चिमी आंदोलनों का प्रभाव है। उस पर प्रतीकवाद, प्रभाववाद, रूपवाद, व्यंजनावाद का प्रभाव है। इसलिए पश्चिमी आंदोलनों के संदर्भ में शमशेर की कविताओं को देखा जाए। औपनिवेशिक दौर में दौ सौ वर्षों में हिन्दी में जो मध्य वर्ग तैयार हुआ था, उससे भी शमशेर की कविता जुड़ती है। उन्होंने कहा कि शमशेर को मैं इस रूप में देखता हूँ कि वह बोलियों के मर्मज्ञ विद्वान थे, साथ ही उनका उर्दू व अंग्रेजी पर पूरा अधिकार था। उर्दू शायरी की परम्परा का प्रभाव शमशेर पर है तथा अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव भी उनकी कविता पर देखा जाना चाहिए। इनकी कविताओं पर यथार्थवाद व बिम्बवाद का प्रभाव भी है जो खुद शमशेर ने स्वीकार किया है। वह अतियथार्थवाद के निकट हैं। पश्चिम के आंदोलन आधुनिकतावादी आंदोलन हैं, उनकी कुछ कविताओं पर, उनके शिल्प पर, भाषा पर पश्चिम का प्रभाव है। उनकी कविता पूरा रंगों का महोत्सव है। उनकी कविता में संगीत है, संगीत का साथ है जो इससे पहले हिन्दी कविता में नहीं मिलेगा। शमशेर की कविताओं में रूमानी तत्व उर्दू से आते हैं और वह उन्हें एक नया रूप देते हैं। शमशेर इस नाते भी बड़े हैं कि जो कविता में है, वहीं उनके जीवन में है। साहित्य की पूरी नैतिकता, पवित्रता को शमशेर जैसा कवि बहुत सहेज कर आगे बढ़ाता है। आज शमशेर की कविता आदर्श हो सकती है। उनके साहित्य के नैतिक स्वरों को अगर देखें तो उनके जैसा उनका समकालीन कोई नहीं। पूरी पाश्चात्य परम्परा को सजोते हुए शमशेर कहाँ स्थापित होते हैं, यह सोचने का विषय है। द्वितीय सत्र का संचालन एसडी कॉलेज, मुजफरनगर के प्रवक्त डॉक्टर विश्वम्भर पाण्डेय ने किया।
तृतीय सत्र ‘शमशेर का गद्य और अन्य पक्ष’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र में मुख्य अतिथि प्रोफेसर प्रेमचन्द पातंजलि, दिल्ली ने कहा कि जब व्यक्ति जीवित रहता है तो उसे कोई याद नहीं करता, यही विडम्बना शमशेर के साथ भी रही। ईर्ष्या जन्य पीढ़ी ने शमशेर को पनपने नहीं दिया। साहित्य के मठाधीशों ने उन्हें दूर रखा। वह किसी मठ से बंधने वाले कवि नहीं थे। शमशेर निराला का कौरवी एडीसन हैं। मेरी इच्छा है कि उनके नाम पर पुस्तकालय अथवा स्मारक बनना चाहिए।
डॉक्टर गजेन्द्र सिंह ने कहा कि शमशेर आधुनिक सन्दर्भों में ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें पढ़ा जाना जरूरी है। शमशेर को साहित्यिक गुटबदियों के कारण उस तरह से नहीं पढ़ा गया जैसे पढ़ा जाना चाहिए। परिवेश से व्यक्ति अपने गद्य का निर्माण करता है। हर व्यक्ति संघर्ष से आगे बढ़ता है। जिस तरह निराला संघर्ष कर आगे बढ़े उसी प्रकार शमशेर भी। चाहे अज्ञेय हो, मुक्तिबोध हो या कीर्ति चौधरी, उनके बीच शमशेर ने अपना स्थान बनाया। शमशेर ने अपने गद्य में गाँव की समस्या, बेरोजगारी की समस्या को उठाया। अन्तरराष्ट्रीय संबंधों पर जैसा शमशेर ने लिखा, वैसा कोई नहीं लिख सका। प्रोफेसर मीरा गौतम ने शमशेर के गद्य से जुड़े कुछ ज्वलन्त मुद्दों की ओर संकेत किया। तृतीय सत्र का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया। हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर नवीन चन्द्र लोहनी ने आभार व्यक्त किया।









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