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गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन

जन संस्कृति तभी बचेगी जब जन बचेगा: मैनेजर पांडेय

संस्कृति के क्षेत्र में सामूहिकता के मूल्यों को प्रतिष्ठित करने का आह्वान जसम का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न-

गोरखपुर। ‘आज की सांस्कृतिक संकट का सीधा संबंध अमेरिकी साम्राज्यवाद और उच्‍छृंखल वित्तीय पूँजी से है। यह जो आवारा, लपंट और उच्छृंखल पूँजी है वह लोभ लालच, अवसरवाद, लूट, बर्बरता और उच्छृंखलता की संस्कृति का प्रसार कर रही है। 70 के दशक से अमेरिकी साम्राज्यवादी अर्थनीति ने पूरी दुनिया पर कब्जे के जिस अभियान की शुरुआत की थी उसका 90 के दशक में डंकल और गैट व नई आर्थिक नीतियों के जरिए भारत पर भी जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। आर्थिक उदारीकरण दरअसल अमेरिकीकरण ही है जिसके साथ भारत के तमाम शासक वर्गीय पार्टियों की पूरी सहमति है। इस साँठगाँठ ने पूरे देश को बाजार में तब्दील कर दिया है।’ ये बातें गोरखपुर के विजेन्द्र अनिल सभागार (गोकुल अतिथि भवन) में 3 नवम्बर को आयोजित जन संस्कृति मंच के 13वें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर रविभूषण ने कही। ‘ साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ जसम के सम्मेलन का केन्द्रीय थीम था।

प्रोफेसर रविभूषण ने कहा कि पूँजी की जो संस्कृति है, वह श्रम से निर्मित जनता की सामूहिकता की संस्कृति को नष्ट कर रही है। साम्राज्यवादी पूँजी साम्प्रदायिकता को भी बढा़वा दे रही है। समाज और भाषा का व्याकरण बदल रही है। देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो रही है। ऐसे में संस्कृतिकर्मियों की सामाजिक-राजनीतिक जिम्मेवारी बढ़ गई है। संघर्ष, प्रतिरोध, सच और न्याय के लिये उन्हें साम्राज्यवाद और उनकी सहायक राजनीतिक शक्तियों के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा। उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने याद दिलाया कि वह जसम के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष थे और कवि गोरख पांडेय से उनके गहरे संबंध थे। उन्‍होंने कहा जन संस्कृति मंच युवा रचनाकारों व संस्कृतिकर्मियों को सर्वाधिक आकर्षित कर रहा है जो इसकी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने तीनों वामपंथी लेखक संगठनों की एकता पर जोर देते हुए इसे साम्राज्यवाद से मुकाबले के लिये जरूरी बताया। जनभाषाओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भाषा की मुक्ति जनमुक्ति की पहली शर्त है। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव राजेन्द्र राजन ने लेखक संगठनों की एकता के साथ-साथ भारतीय भाषाओं की एकता की जरूरत पर बल दिया। आजादी के आंदोलन के क्रांतिकारी इतिहास को पुनर्जीवित करने तथा कलम की हिफाजत को देश की हिफाजत के लिये उन्होंने जरूरी बताया।

जलेस के प्रमोद कुमार ने अपने महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चौहान के संदेश का पाठ किया। इस संदेश में अंतरराष्ट्रीय पूँजी के प्रभाव में विचार और संस्कृति के क्षेत्र में किये जाने वाले संगठित प्रयासों के नकार या निषेध की प्रवृत्ति के प्रति चिंता जाहिर करते हुए वाम संस्कृतिकर्मियों की एकजुटता को आज के वक्त की जरूरत के तौर पर चिन्हित किया गया।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात आलोचक प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि साम्राज्यवाद केवल राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था ही नहीं, एक विचार व्यवस्था भी है। वह गुलाम देशों की बुद्धिजीवियों और जनता की चेतना पर विजय पाना चाहता है। विचारधारा का अंत, मुक्ति के आख्यान का अंत, इतिहास का अंत, साहित्य का अंत, भूमण्डलीकरण, सभ्यताओं का संघर्ष आदि सभी सिद्धान्त अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित में बनाए गये। उन्‍होंने कहा कि अमेरिकी साम्राज्यवाद से चिंतित होना चाहिए, पर भयभीत होने की जरूरत नहीं है। एक अकेले असांजे ने उसका पर्दाफाश कर दिया है। लैटिन अमेरिकी देशों ने उसकी धौंस को धता बता दिया है। बेशक जब पूँजीवाद खतरे में होता है तो वह आक्रामक होता है। अमेरिका भी आक्रामक हुआ है, पर हर जगह उसे मुँह की खानी पड़ रही है। अमेरिकन साम्राज्यवाद डूबता हुआ जहाज है। उन्होंने कहा कि संस्कृति हमारे लिये एक राजनीतिक प्रश्‍न है। जन संस्कृति तभी बचेगी जब जन बचेगा। मानव सभ्यता के इतिहास के किसी भी दौर में 3 लाख किसानों ने आत्महत्या नहीं की होगी जैसा आज अपने देश में हुआ है। इसलिए कला साहित्य संस्कृति के सवालों से भी ज्यादा जरूरी है जनता के सवालों पर आंदोलन खड़ा करना। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाईटिस के सवाल पर संस्कृतिकर्मियों को आंदोलन की पहल करनी चाहिए। जनांदोलन जरूरी है, उसी से जन संस्कृति निकलेगी और जनता के लिए हितकर राजनीति भी। राजनीति को निराशाजनक मानकर उससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। प्रोफेसर पांडेय ने कहा कि भारत में पूँजीवाद सामंतवाद के कंधे पर चढ़कर चल रहा है, इसलिए संस्कृतिकर्मियों को दोनों के खिलाफ संघर्ष करना होगा।

सम्मेलन में स्वागत वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कथाकार एवं आलोचक प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने कहा कि संस्कृति की जो अभिजात्य परिभाषा है, उसे बदलकर संस्कृति को जनता की संस्कृति के तौर पर स्थापित करने के लिये जसम संघर्ष कर रहा है। इसी के जरिए जन की तबाही को रोका जा सकता है। सम्मेलन की शुरुआत पश्‍चि‍म बंगाल गण सांस्कृतिक परिषद के निताई दा द्वारा भगत सिंह पर प्रस्तुत गीत से हुई।

उद्घाटन सत्र में तीन पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। रामनिहाल गुंजन द्वारा सम्पादित ‘विजेन्द्र अनिल होने का अर्थ’ का लोकार्पण डॉक्‍टर केदारनाथ सिंह ने, अरविंद कुमार द्वारा सम्पादित ‘प्रेमचंद विविध प्रसंग’ का प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने तथा दीपक सिन्हा के नाटक ‘कृष्ण उवाच’ का लोकार्पण प्रोफेसर रविभूषण ने किया। इस सत्र का संचालन के.के. पांडेय ने किया।

सम्मेलन के पहले दिन शाम को सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत पत्रकार-संस्कृतिकर्मी अनिल सिन्हा की स्मृति में बने मंच पर हिरावल के कलाकारों ने कवि शमशेर की ‘यह शाम है’ और दिनेश शुक्ल की ‘जाग मछन्दर’ की संगीतबद्ध प्रस्तुति से हुई। इसके बाद झारखंड जन संस्कृति मंच के कलाकारों ने झूमर नृत्य और जनगीत पेश किया। कवि सम्मेलन में बल्ली सिंह चीमा, राजेन्द्र कुमार, अष्टभुजा शुक्ल, रमाशंकर विद्रोही, पंकज चतुर्वेदी, देवेन्द्र आर्य, रंजना जायसवाल, जितेन्द्र कुमार, उस्मान, शंभू बादल, बलराज पांडेय,  चन्द्रेश्‍वर, कौशल किशोर, बलभद्र, सुमन कुमार सिंह, भगवान स्वरूप कटियार, प्रमोद कुमार, सुरेश चन्द्र, महेश अश्क, श्रीधर मिश्र समेत तीन दर्जन से अधिक कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संरक्षक रहे प्रोफेसर रामकृष्ण मणि त्रिपाठी की स्मृति में सभागार के बाहर एक गैलरी बनाई गई थी जिसमें गोरखपुर फिल्म सोसाइटी, अलख कला समूह, लेनिन पुस्तक केन्द्र और समकालीन जनमत की ओर से बुक स्टाल लगाए गये थे। आयोजन स्थल पर तथा सभागार में संभावना कला मंच गाजीपुर के राजकुमार और उनके साथियों द्वारा भोजपुरी के महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं पर आधारित पोस्टर लगाए गये थे तो अर्जुन और राधिक द्वारा तैयार किए गये हिन्दी के कई महत्वपूर्ण कवियों के कविता पोस्टर सम्मेलन में आकर्षण का केन्द्र थे।

सम्मेलन के दूसरे दिन 4 नवम्बर की सुबह सांगठनिक सत्र की शुरुआत हिरावल द्वारा जमुई खां आजाद के गीत ‘’बड़ी-बड़ी कोठियाँ सजाए पूँजीपतिया’ तथा रमाकांत द्विवेदी रमता के गीत ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईंजा’  के गायन से हुई। इसके बाद महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट पर पेश दस्तावेज पर चर्चा शुरु हुई। दस्तावेज में आज के दौर को विश्‍व पूँजी के साम्राज्यवादी प्रसार के सबसे आक्रामक, खतरनाक और मानवद्रोही दौर के तौर पर चिन्हित किया गया है। दस्तावेज के अनुसार देश की संसद पहले किसी दौर के मुकाबले आज कहीं ज्यादा साख खोती जा रही है। बड़े-बड़े फैसले संसद की अवहेलना कर सीधे साम्राज्यवाद और बड़ी पूँजी के दबाव में लिये जा रहे हैं। अदालतों ने साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ फैसले देने से लगातार गुरेज किया है। दमन के नये-नये रूप विकसित हुए हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से पूँजी के साम्राज्यवादी अभियान ने मनुष्य की सोचने, जीने और साथ-साथ रहने की क्षमता को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया है। मनुष्य को भीतर से पराजित, विभाजित और विघटित करना, कर्ता के भाव से उसे वंचित करना यह साम्राज्य की संस्कृति की पहचान है। खंड-खंड कर इकाइयों में तब्दील की जा रही व्यक्तिगत मनुष्यता को फिर से समूहबद्ध करना और संस्कृति के क्षेत्र में सामूहिकता के मूल्यों को प्रतिष्ठित करना अपने आप में एक प्रतिरोधात्मक कार्रवाई है।

सांस्कृतिक चिंतन और व्यवहार में प्रतिरोधी विमर्श को विकसित करने और साम्राज्यवाद के दौर में सांस्कृतिक चुनौतियों से जूझने के लिये संगठन के ढाँचे और कामकाज के तरीकों के संदर्भ में सांगठनिक सत्र में प्रतिनिधियों ने विचार रखे। दस्तावेज पर बहस में जितेन्द्र कुमार (आरा-बिहार), जेवियर कुजूर, एसके राय (झारखंड), जय प्रकाश, कैलाश, बनवासी (छत्तीसगढ़), कौशल किशोर, मदन मोहन, चन्द्रेश्‍वर, पंकज चतुर्वेदी (उत्तर प्रदेश), मुकुल सरल, कपिल शर्मा, रंजीत वर्मा (दिल्ली), दीपक सिन्हा, राकेश दिवाकर (बिहार) आदि ने हिस्सा लिया। सांगठनिक सत्र की अध्यक्षता मैनेजर पांडेय, राजेन्द्र कुमार, रामजी राय और रविभूषण ने की।

रामजी राय ने जसम के सम्मेलन में युवाओं की अच्छी-खासी मौजूदगी को सकारात्मक बताया और कहा कि संस्कृति मूल्यों और विचारों का क्षेत्र है। आज साम्राज्यवाद की विचार पद्धति और स्त्री विरोधी सामंती पितृसत्तात्मक मूल्यों के पुनरूत्थान के खिलाफ संघर्ष बेहद जरूरी है। नगराभिमुख संस्कृतिकर्म को गाँवों की ओर ले जाने तथा प्रमुख सामाजिक प्रश्‍नों पर संस्कृतिकर्मियों की भूमिका बढ़ाने को उन्होंने साम्राज्यवाद के मुकाबले के लिए जरूरी बताया।

प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार ने संस्कृतिकर्मियों के विचारधारात्मक स्तर को ऊँचा उठाने के लिये कार्यशालाएं आयोजित करने का सुझाव दिया। प्रोफेसर रविभूषण ने स्कूल-कॉलेजों में जनसांस्कृतिक गतिविधियाँ बढ़ाने पर जोर दिया। प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि जनता से गहरा सम्बन्ध बनाते हुए उसकी प्रगतिशीलता, अनुभव पर आधारित उसके यथार्थबोध को विकसित करना होगा। साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों को जनता से सीखने की भी आदत डालनी पड़ेगी।

सांगठनिक सत्र में खाप पंचायतों के हिंसक रवैये, महिला हिंसा की बढ़ती घटनाओं के प्रति चिंता जाहिर की गई तथा स्त्रियों की सुरक्षा व सम्मान के लिये पूँजीवादी सामंतवादी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष को जरूरी बताया गया।

जसम के सांगठनिक सत्र में कहानी, कविता, लोक कला, जनभाषा और चित्रकला-मूर्तिकला के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर विशेष समूह बनाए गए। इन विशेष समूहों के संयोजकों और प्रस्तावकों ने इन क्षेत्र में कामकाज के दृष्टिकोण से विजन डाक्यूमेंट प्रस्तुत किया। इसमें बताया गया है कि किस तरह सृजन के इन क्षेत्रों में वैचारिक-सांस्कृतिक धार को तेज किया जाये। इन प्रस्तावों को सुभाषचन्द्र कुशवाहा, आशुतोष कुमार, बलभद्र, अशोक भौमिक, विनीत, अंकुर और प्रज्ञा की ओर से तैयार किया गया था। सिनेमा के क्षेत्र में पहले से कार्य कर रहे विशेष समूह ‘द ग्रुप’ के संयोजक संजय जोशी का भी विजन डाक्यूमेंट रखा गया, जिसमें प्रतिरोध के सिनेमा की सात वर्ष की यात्रा की उपलब्धियों की चर्चा की गई है और इस क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों और आने वाले दिनों में कामकाज को और सुदृढ़ करने के बारे में रणनीति का ब्योरा दिया गया है।

प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने साहित्य-कला की विधा में केन्द्रित कामकाज के लिये बनाए गए समूहों के निर्माण का स्वागत किया। उन्होंने पुनः जनता और जनांदोलनों से रचनाकारों के जुड़ाव को जरूरी बताते हुए याद दिलाया कि किस तरह अपने समय में नक्सलबाड़ी आंदोलन ने साहित्य को बदलकर रख दिया था। उन्होंने कहा कि लोकप्रियता यदि विचारहीनता पर आधारित हो तो खतरनाक होती है, लेकिन जन संस्कृतिकर्मियों को लोकप्रियता को एक मूल्य के रूप में स्थापित करना होगा।

जनसंस्कृति मंच के 13वें राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से प्रोफेसर मैनेजर पांडेय को राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रणय कृष्ण का राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर चुना। सांगठनिक सक्रियता को और तेज करने के लिहाज से रविभूषण और राजेन्द्र कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। मनोज कुमार सिंह को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी गई। जेवियर कुजूर, जितेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन और प्रेमशंकर राष्ट्रीय सहसचिव चुने गये। पूर्व की 111 की राष्ट्रीय परिषद को बहाल रखते हुए 12 नये रचनाकारों, संस्कृतिकर्मियों को शामिल किया गया। अब राष्ट्रीय परिषद 123 सदस्यों की हो गई है। पहले के राष्ट्रीय उपाध्यक्षों के अतिरिक्त बलराज पांडेय, मदन मोहन, सुरेश कांटक, बल्ली सिंह चीमा, निर्मला पुतुल, कंवल भारती नये राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गये।

जसम राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन शाम को सांस्कृतिक सत्र में मशहूर फिल्मकार आनन्द पटवर्धन की चर्चित फिल्म ‘जय भीम कामरेड’ और दो युवा फिल्मकारों धीरज सार्थक व आशीष कुमार सिंह द्वारा गोरखपुर-महराजगंज के वनटांगिया मजदूरों के संघर्ष की दास्तान पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘बिटवीन द ट्रीज’ दिखाई गई। वनटांगिया मजदूरों की जिंदगी पर बनाई गई डाक्यूमेंटरी ‘बिटवनी द ट्रीज’ उन मजदूरों के अस्तित्व और जीवन संघर्ष की कहानी है जिन्होंने ब्रिटिश राज में सरकारी आदेश पर उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में साखू के जंगल लगाये। ये भूमिहीन लोग थे। जंगल लगाने और उसकी देखरेख के अलावा वे दूसरा काम जानते न थे। आजादी के बाद उनकी हालत खराब होती गई। 84 में जब उनकी आजीविका खत्म की जाने लगी तो उन्होंने संगठित होकर संघर्ष शुरू किया। यह फिल्म उनकी पीड़ा और संघर्ष का दस्तावेज है। फिल्म प्रदर्शन के बाद निर्देशकों से दर्शकों की विचारोतेजक बातचीत हुई।

‘जय भीम कामरेड’ दलितों के दमन, उनके प्रतिरोध और राजनीतिक व सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की एक महागाथा है। भारत में जाति के भीतर आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष के दोनों आयाम रहे हैं। यह फिल्म दिखाती है कि दलित और मजदूर की पहचान आपस में गहरे में गुंथी हुई है। यह उनके क्रांतिकारी संभावनाओं की ओर इशारा करने वाली फिल्म भी है। इस फिल्म के प्रदर्शन के साथ जसम का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ।

(सुधीर सुमन/मनोज कुमार सिंह द्वारा जारी)