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मेरा आत्मसंघर्ष : मणिकुंतला भट्टाचार्य

असमिया की चर्चित लेखिका के सृजनात्मक सफर की दास्तां…

कौन जानता है कि आनंद की तुलना में विषाद क्यों गहरा स्थायित्व प्राप्त करता है! खुद नहीं जानती, कब विषादग्रस्तता ने सीने में जगह बना ली थी। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटकती फिरी थी शून्यता और निराशा। हजारों लोगों के बीच रहते हुए भी, साधारण जीवन गुजारती हुई भी, चुपके से समाती गई थी एकाकीपन के व्यूह में।
मेरे बंधु, पथ प्रदर्शक पिता ने मेरी हालत को शायद समझ लिया था। अनगिनत किताबें लाकर उन्होंने मेरे लिए ग्रंथशैया बना दी। वहीं सिर रखकर स्वप्न विभोर हुई थी, मेरे भीतर अंतहीन लहरें पैदा होने लगी थीं। आलोडि़त हृदय के साथ मैंने कलम थाम ली थी और 1981 से ही मैं एकाग्र होकर कविताएं लिखने लगी थी। जहां भी भेजती थी, प्रकाशित हो जाती थीं। दिनोंदिन पाठकों की तादाद बढऩे लगी और साथ ही लोग मेरी सराहना भी करने लगे। मगर आश्चर्य की बात थी कि तारीफों की तरफ मैं गौर नहीं कर पा रही थी। मैं ऐसी किसी खास भावना को उजागर करने की कोशिश कर रही थी, जो इस विशाल जगत और महाशून्य के बीच असंतुलन में एक अद़भुत स्थायित्व प्राप्त कर सके। मगर क्या थी वह भावना? गद्य-पद्य या दर्शन का विश्लेषण?
खुद ही रचे गए एकाकीपन के भीतर गुमसुम-सी रहने लगी। दिनोंदिन वह अव्यक्त यंत्रणा इस कदर बढ़ती गई कि कि उसका बोझ उठाते हुए मैं बार-बार कातर होने लगी। असहाय होने लगी। दिन के बाद दिन विषादग्रस्तता में डूबी रहने लगी।
1987 में पिताजी ने मुझे व्यक्तिगत संपत्ति की तरह किसी एक युवक के साथ ब्याह दिया। हां, कन्या संप्रदान के जरिए उन्होंने पिता के दायित्व का पालन किया और एक अचल संपत्ति की तरह, आर्य नारी की परंपरा के अनुसार पिता की छांव छोड़कर स्वामी के पास चली आई।… मानों जीवन ही बदल गया! पिता की बनाई ग्रंथशैया से उत्पन्न हुई भिन्न अनुभूतियों की जगह अब भौतिकवाद खड़ा हो गया था। पता ही नहीं चला कि कुछ भी किए बगैर किस तरह बारह साल गुजर गए। एक युग। आज के युग में किसी नारी की चाही गई हर चीज मुझे मिली, मगर सीने में कायम रही वही प्राचीन विषादग्रस्तता। मानों वह मेरी आजन्म सहचर हो। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटक रही शून्यता और निराशा मानों अब मेरे कंधों पर सवार हो गईं! कुछ समझ नहीं पा रही थी। अद़भुत यंत्रणा!
मगर सारे दरवाजे बंद होने पर भी बाहर निकलने का कोई रास्ता निकल ही आता है। अनजाने में ही मैंने एक दिन कलम उठा ली और उस लंबी निस्तब्धता को तोड़ती हुई प्रवाहित हुई एक मायामय कविता। मनुष्य की कविता। यह 1991 के दिसंबर महीने के आखिरी हफ्ते की बात है। उस समय एक लोकप्रिय अखबार को कविता भेजी और वह प्रकाशित भी हो गई। उसके बाद फिर एक… उसके बाद फिर… और एक अन्य कविता। गुजरे हुए खामोश युग में कौन क्या रच रहा है, किधर जा रही है साहित्य की धारा, कुछ खबर नहीं थी मुझे। इस बार कुछ कविताएं पढ़कर ही एक-एक कर कई सराहना करने वाले लोग करीब आते गए। तीव्रता के साथ मैंने अध्ययन शुरू किया। कलम थामते ही स्वत: स्फूर्तता के साथ सिर्फ कविता ही नहीं रची जाती थीं, बल्कि गद्य भी निकलने लगा था।
धीरे-धीरे महसूस हुआ कि लिखते रहने से कई तरह से मेरे सीने का भार हल्का होता जाता है। हां, विषादग्रस्तता की भी जो भाषा होती है, जिसे अब तक बेवजह ढोते रहने के बारे में सोचती रही थी, वही अब विभिन्न रंग, सुर और भंगिमा के साथ मुझे सुख और आराम प्रदान करने में जुट गई थी।… आत्ममग्नता के साथ लिखने में मैं जुट गई। पूजा-अर्चना की तरह, ध्यान की तरह आश्चर्यजनक थी यह निमग्नता। अभिभूत हो उठी। भीतर से समझ गई कि जीवन के जिस महान और श्रेष्ठï चिंतन को व्यक्त करना चाहती हूं, उसके करीब जाने की यह महज सीढ़ी ही है, और कुछ नहीं। इसीलिए लोगों की प्रशंसा या अपने सुखानुभव को लेकर संतुष्ट या गौरवांवित होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कहानी भी लिखने लगी। हर रविवार दो-तीन अखबारों में लगातार कविताएं छप रही थीं, साथ ही कहानियां भी छपने लगीं। कोई भेद-भाव किए बिना या पत्र-पत्रिका के स्तर को अहमियत दिए बिना रचना मांगने आए किसी भी व्यक्ति को मैंने निराश नहीं किया। तेजी से मेरी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं। इस तरह कलम रखने की फुरसत मेरे पास नहीं रह गई। याद है कि दो महीने के भीतर मैंने ग्यारह कहानियां लिखीं। इसके साथ ही समानांतर रूप से दो पत्रिकाओं और एक पत्र में स्तंभ लिखने की व्यस्तता भी बनी रही। जो भी लिखती, मन लगाकर लिखती। हृदय खोलकर, प्राण उड़ेलकर लिखती। मगर विषादग्रस्तता? वह मानों कभी साथ नहीं छोड़ेगी। मेरे बिलकुल अपने, सिर पर छतरी की तरह छांव देने वाले पिताजी का देहांत हो गया। मेरे हाथ की मुट़ठी में हाथ रखकर चले गए वे।… तड़पती रही मैं… और निरंतर कलम की व्यस्तता ने मुझे महान अनुभव से सराबोर कर दिया। इन रचनाओं के जरिए ही मानों मैं श्मशान के भस्म के बीच से ले आई हूं पिता को हाथ थामकर…। एक वास्तविक जीवन की समस्त प्राप्ति और समृद्धि के साथ इस अनुभव की कोई तुलना नहीं हो सकती। घटती गई सीने के भीतर जमी हुई यातना… कलम चलती रही।
मैंने जीवन का पहला उपन्यास ‘अरुंधती’ लिखा। क्या यह उपन्यास ही था? खुद ही जानती हूं कि किस तरह खुद को ‘अरुंधती’ के किरदार के साथ उजागर किया है मैंने। उसी समय, 2002 में मेरी पहली पुस्तक ‘प्रस्तर कन्या’ (कथा संकलन) प्रकाशित हुई। एक दैनिक पत्र के साप्ताहिक परिशिष्टï में ‘अरुंधतीÓ के प्रकाशन के साथ ही पाठक समाज में आलोडऩ आ गया। पत्र, फोन के अलावा उपन्यास की नायिका को देखने के लिए लोग मेरे घर आने लगे। नायिका को एक नया जीवन प्रदान करने का प्रस्ताव देने वालों में हाई स्कूल के छात्र भी शामिल थे। फिर वह उपन्यास दैनिक सेंटिनल में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ। असमिया पाठकों की तरह हिंदी पाठकों ने भी उपन्यास को अपनाया। फिलहाल इस उपन्यास का अंगे्रजी अनुवाद हो रहा है और इस पर फिल्म बनाने का भी विचार है।
‘अरुंधतीÓ की लोकप्रियता देखकर एक और पत्र के संपादक ने नया उपन्यास लिखने के लिए मुझ पर दबाव डाला। इस तरह एड्स की पृठभूमि में मैंने द्वितीय उपन्यास ‘स्वप्न संभव’ की रचना की। मगर दो अध्याय छापने के बाद प्रकाशन रोक दिया गया। आश्चर्यजनक रूप से इसके पीछे था संपादक की तरफ से मुझे दिया गया अशोभनीय प्रस्ताव। मनुष्य का ऐसा निर्लज्ज रूप देखकर मैं स्तब्ध रह गई। किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो गई। क्रोधित होने की जगह उदास हो गई और एक दिन विनम्रता के साथ मैंने अप्रकाशित पांडुलिपि वापस मांग ली। उसी दौरान, 2004 में ‘प्रस्तर कन्या’ को असम का प्रसिद्ध साहित्यिक पुरस्कार ‘मुनीन बरकटकी पुरस्कार’ प्रदान किया गया। इसके साथ ही ‘स्वप्न संभव’ को भी छापने के लिए प्रकाशक तैयार हो गए और वह ‘संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास को आकाशवाणी, गुवाहाटी ने भी धारावाहिक रूप से प्रसारित किया। इसके चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और इस पर फिल्म बन रही है।
इसके बाद ठहर जाने का कोई सवाल ही नहीं था। कलम चल रही है। धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगी कि कुछ चित्रण करते समय मैं असाधारण रूप से निर्भीक हो उठती हूं, सहज-सरल अथावा सीधे-सीधे लिख देती हूं मानव जीवन की रहस्यमयता के बारे में। एक परिपूर्ण परिवार की एक साधारण गृहिणी होकर भी लिखते समय कैसे इस तरह निर्भीक हो जाती हूं? मेरे अपने लिए यह एक चमत्कारिक अनुभव है। कोई दुविधा-संकोच नहीं, लज्जाबोध नहीं। मातृभाषा के निर्वाचित-उपयुक्त-सौजन्यमूलक शब्दों से वे वर्णन इतने जीवंत हो उठते हैं कि पाठक उनमें अपनी गोपनीयता ढूंढऩे लगते हैं। मैं समझ गई कि कोई भी ऐसे वर्णन को ऊपर-ऊपर से पढ़ नहीं सकता या उसकी अनदेखी नहीं कर सकता। मुक्त रचना और पोर्नोग्राफी के बीच की सीमा रेखा को भी अच्छी तरह पहचानती हूं। इसमें कुछ पाठक नाराज भी हुए हैं। वे मुझे शालीनता का पाठ पढ़ाने लगे और विनम्रता के साथ सिर झुकाए मैं सब कुछ सुनती रही। बहस नहीं करती, असंतुष्ट भी नहीं होती, सिर्फ सुनती रहती हूं। रोकती भी नहीं। मगर उस पाठ को ग्रहण नहीं कर पाती। ग्रहण कर भी नहीं सकती। मैं मनुष्य के बारे में लिखती हूं। मनुष्य में ही प्रकृति, ईश्वर, धर्म और त्रिलोक को ढूंढती हूं। मूलरूप से मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- प्रेममय और दुर्बल। मुझे लगता है कि मनुष्य हमेशा प्रेम का आधार रहा है। प्रेम ही सबकुछ नियंत्रित करता है। जिसे व्यभिचार कहते हैं, जिसे हिंसा-द्वेष कहते हैं, वह है दुर्बल को खुद ही दमित न की जाने वाली रिपुजात प्रक्रिया। वैसी दुर्बल श्रेणी को पहले दया और फिर क्षमा का पात्र ही मानती हूं मैं। शायद इसीलिए समालोचक मेरी कहानी में जब विलेन को ढूंढते हैं, वैसे पात्र की कमजोरियों को भी मैं तर्क के साथ प्रस्तुत करती हूं। मैं खुद ही अपने साथ बार-बार बहस करती हूं और सशक्त तर्क के पक्ष में कलम चलाती हूं। किसी का पाठदान नहीं मानती। मानव जीवन के रहस्यमय खंडचित्रों के अंकन की प्रक्रिया से जुड़ती चली गई। बिलकुल स्वत:स्फूर्त रूप से वे सब बातें कलम से प्रवाहित होती हैं। श्मशान से उठकर आए पिता आजकल एक रोशनी बन गए हैं। स्वामी के चेहरे की तरफ देखती हूं, उत्साह और साहस पाती हूं। शायद लोगों की शालीनता की सीख मेरे कान में समा नहीं पाती, उसका वह अहम कारण हो सकते हैं।
मगर दो तरीके से इसके नतीजे सामने आए। एक वर्ग ने मेरी भर्त्‍सना की कि बेबाक लेखन से मैं बाजार में छा जाना चाहती हूं। दूसरी तरफ कुछ अवसर की खोज करने वाले पुरुष सामने आए। जिन्हें मैं ‘दुर्बल मनुष्य’ मानती हूं। बेहिचक वे लोग अपनी इच्छा मेरे सामने व्यक्त करने लगे, मगर सामने तो है पिता की रोशनी और स्वामी की सबल उपस्थिति। इसीलिए उन पुरुषों के आचरण को मैंने लेखन के कच्चे माल के रूप में ग्रहण किया। मेज के करीब बैठकर ही देखती रही आदमी के भीतर के आदमी को। भौतिकवादी जीवन की प्राप्ति के एकाकीपन से टूटे हुए पुरुषों को।… कलम के साथ रिश्ता गहरा होता गया। नहीं लिखने से सीने में जमने लगती है विषादग्रस्तता। सबके साथ ऐसा ही होता है क्या? इसके साथ-साथ एक अदृश्य प्रतिबद्धता भी खींचती रही मुझे। प्रत्येक कहानी के जरिए कोई संदेश देने की कोशिश करती हूं। मेहनत करती हूं। जुटी रहती हूं लगातार… जुटी रहती हूं। 2004 में दूरदर्शन धारावाहिक ‘गेटवे’ की कहानी लिखने का काम मुझे सौंपा गया। तथ्य बटोरने के लिए घूमते समय मेेरे विचारों की चकरी भी घूमने लगी। अपनी प्रेममय पृथ्वी के नेपथ्य में बर्बर घटनाओं ने मुझे अवाक कर दिया। मेरे कोमल कवित्व को मानों इस्पाती पोशाक पहना दी गई। इस तरह लेखन में यथार्थ बढ़ता गया। 2005 में पुस्तकाकार रूप में ‘अरुंधती’ का प्रकाशन हुआ, उसी वर्ष कविता संकलन ‘मणिकुंतलार कविताÓ भी प्रकाशित हुआ। वर्ष 2006 में असम की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर ‘बरदोवानी’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की जन्मभूमि बरदोवा से संबंधित पृष्ठभूमि पर इस उपन्यास को लिखना मेरे लिए एक चुनौती थी। पिता व स्वामी के कर्मजीवन में होते रहे तबादलों के चलते मेरा जीवन नगर केंद्रित रहा है। ग्रामीण परिवेश को महसूस करना आसान काम नहीं था। पाठकों की सराहना से लगता है कि मैं इस कोशिश में सफल हुई हूं। इसके बाद समकालिता विषय पर ‘मुक्ति’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। डायन प्रथा को केंद्र में रखकर मैंने ‘शामियाना’ नामक उपन्यास लिखा। इसी दौरान एक बाल उपन्यास ‘शांत पापूहंतर कथारे’ प्रकाशित हुआ। इसके आधार पर दूरदर्शन धारावाहिक का निर्माण हो रहा है।
एक मासिक पत्रिका में धारावाहिक उपन्यास ‘दस्तखत’ लिख रही हूं। असम के मोबाइल थियेटर की पृष्ठïभूमि पर एक उपन्यास ‘मई डेस्डिमोना होषो खोजो’ लिख रही हूं। यह भी प्रकाशित  होनेवाला है। ‘मां, मेकले साहब आस बाढैशाकर पिता’, ‘गेटवे’ उपन्यास भी प्रकाशित होने वाले हैं। एक और उपन्यास तथा एक बाल उपन्यास पर काम भी चल रहा है। संभवत: इसी वर्ष ये भी प्रकाशित हो जाएंगे।… ठिठकी नहीं हूं मैं। अगर बेबाक लेखन से समाज का नुकसान ही कर रही हूं तो क्यों मेरी रचनाओं के आधार पर दूरदर्शन-आकाशवाणी के कार्यक्रम बनाए जाते हैं? क्यों लेखकों की अग्रज पीढ़ी उम्मीद भरी नजरों से मुझे देखती है, जागरूक वर्ग गौर करता है और नए लेखक सराहना करते हैं?
जरूर ये सब संकेत करते हैं पिता द्वारा रोशन की गई राह की तरफ। इसीलिए मैं आगे बढ़ती हूं सांप्रतिक समय से कुछ आगे अधिक परिश्रम के साथ। गहरी एकाग्रता के साथ लिखती हूं मैं, हृदय खोलकर लिखती हूं- ईश्वर के साथ एकाकार होने की प्रार्थना की तरह…। 
                                                                                (अनुवाद : दिनकर कुमार, वरिष्ठ पत्रकार)